बुधवार, 31 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-015

मोह-मुक्तिआत्मत्तृप्ति और प्रज्ञा की थिरता

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।। ५२।।

और हे अर्जुनजिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल को बिलकुल तर जाएगीतब तू सुनने योग्य और सुने हुए के वैराग्य को प्राप्त होगा।

मोहरूपी कालिमा से जब बुद्धि जागेगीतब वैराग्य फलित होता है। मोहरूपी कालिमा से! मनुष्य के आस-पास कौन-सा अंधकार है?
एक तो वह अंधकार हैजो दीयों के जलाने से मिट जाता है। धर्म से उस अंधकार का कोई भी संबंध नहीं है। वह हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता हैनहीं हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। फिर धर्म किस अंधकार को मिटाने के लिए चेष्टारत है?
एक और भी अंधकार हैजो मनुष्य के शरीर को नहीं घेरतावरन मनुष्य की चेतना को घेर लेता है। एक और भी अंधकार हैजो मनुष्य की आत्मा के चारों तरफ घिर जाता है। उस अंधकार को कृष्ण कह रहे हैंमोहरूपी कालिमा। तो अंधकार और मोह इन दो शब्दों को थोड़ा गहरे में समझना उपयोगी है।

अंधकार का लक्षण क्या हैअंधकार का लक्षण है कि दिखाई नहीं पड़ता जहांजहां देखना खो जाता हैजहां देखना संभव नहीं हो पाताजहां आंखों पर परदा पड़ जाता है--एक। दूसराजहां दिखाई न पड़ने से कोई मार्ग नहीं मालूम पड़ताकहां जाएं! क्या करें! तीसराजहां दिखाई न पड़ने से प्रतिपल किसी भी चीज से टकरा जाने की संभावना हो जाती है। अंधकार हमारी दृष्टि का खो जाना है।
मोह में भी ऐसा ही घटित होता है। इसलिए मोह को अंधकार कहने की सार्थकता है। मोह में जो हम करते हैंमोह में जो हम होते हैंमोह में जैसे हम चलते हैंमोह में जो भी हमसे निकलता हैवह ठीक ऐसा ही हैजैसे अंधेरे में कोई टटोलता हो। नहीं कुछ पता होताक्या कर रहे हैं! नहीं कुछ पता होताक्या हो रहा है! नहीं कुछ पता होताकौन-सा रास्ता है! कौन-सा मार्ग है! आंखें नहीं होती हैं। मोह अंधा है। और मोह का अंधापन आध्यात्मिक अंधापन हैस्प्रिचुअल ब्लाइंडनेस है।
सुना है मैंनेएक आदमी के मकान में आग लग गई है। भीड़ इकट्ठी है। वह आदमी छाती पीटकर रो रहा हैचिल्ला रहा है। स्वभावतःउसके जीवनभर की सारी संपदा नष्ट हुई जा रही है। जिसे उसने जीवन समझा हैवही नष्ट हुआ जा रहा है। जिसके आधार पर वह खड़ा थावह आधार गिरा जा रहा है। जिसके आधार पर उसके मैं में शक्ति थी,बल थाजिसके आधार पर वह कुछ थासमबडी थावह सब बिखरा जा रहा है।
जान सोलिज ने एक किताब लिखी हैअरेस्ट्रोस। उसमें कुछ कीमती वचन लिखे हैं। उसमें एक कीमती वचन हैनोबडी वांट्स टु बी नोबडी। नोबडी वांट्स टु बी नोबडी। ठीक-ठीक अनुवाद मुश्किल है। कोई भी नहीं चाहता कि ना-कुछ हो। सभी चाहते हैंसमबडी होंकुछ हों।
उसकी समबडीनेस बिखरी जा रही हैउस आदमी की। वह कुछ था इस मकान के होने से। और जिनका भी कुछ होना किसी और चीज के होने पर निर्भर हैकिसी दिन ऐसा ही रुदनऐसी ही पीड़ा उन्हें घेर लेती है। क्योंकि वे सब जो बाहर की संपदा पर टिके हैंकिसी दिन बिखरते हैंक्योंकि बाहर कुछ भी टिकने वाला नहीं है। वह उसी के मकान में आग लग गई होऐसा नहींसभी के बाहर के मकानों में आग लग जाती है। असल में बाहर जो भी हैवह आग पर चढ़ा हुआ ही है।
तो छाती पीटता हैरोता है। स्वाभाविक है। फिर पड़ोस में से कोई दौड़ा हुआ आता है और कहता हैव्यर्थ रो रहे हो तुम। तुम्हारे लड़के ने मकान तो कल बेच दिया। उसका बयाना भी हो गया है। क्या तुम्हें पता नहींबसआंसू तिरोहित हो गए। उस आदमी का छाती पीटना बंद हो गया। जहां रोना थावहां वह हंसने लगामुस्कुराने लगा। सब एकदम बदल गया।
अभी भी आग लगी हैमकान जल रहा हैवैसा ही जैसा क्षणभर पहले जलता था। फर्क कहां पड़ गयामकान अब मेरा नहीं रहाअपना नहीं रहा। मोह का जो जोड़ था मकान सेवह टूट गया है। अब भी मकान में आग हैलेकिन अब आंख में आंसू नहीं हैं। आंख में जो आंसू थेवे मकान के जलने की वजह से थेवह मकान अब भी जल रहा है। आंख में जो आंसू थेवे मेरे के जलने की वजह से थे। मेरा अब नहीं जल रहा हैआंखें साफ हो गई हैं। अब आंसुओं की परत आंख पर नहीं है। अब उस आदमी को ठीक-ठीक दिखाई पड़ रहा है। अभी उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था।
उधर आग की लपटें थींतो इधर आंख में भी तो आंसू थेसब धुंधला थासब अंधेरा था। अब तक उसके हाथ-पैर कंपते थेअब हाथ-पैर का कंपन चला गया। अब वह आदमी ठीक वैसा ही हो गया हैजैसे और लोग हैं। और कह रहा हैठीकजो हो गयाठीक है।
तभी उसका लड़का दौड़ा हुआ आता है। और वह कहता हैबात तो हुई थीलेकिन बयाना नहीं हो पाया। बेचने की बात चली थीलेकिन हो नहीं पाया। और अब इस जले हुए मकान को कौन खरीदने वाला है!
फिर आंसू वापस लौट आएफिर छाती पीटना शुरू हो गया। मकान अब भी वैसा ही जल रहा है! मकान को कुछ भी पता नहीं चला कि इस बीच सब बदल गया है। सब फिर बदल गया है। मोह फिर लौट आया है। आंखें फिर अंधी हो गई हैं। फिर मेरा जलने लगा है।
इस जीवन में मोह ही जलता हैमोह ही चिंतित होता हैमोह ही तनाव से भरता हैमोह ही संताप को उपलब्ध होता हैमोह ही भटकाता हैमोह ही गिराता है। मोह ही जीवन का दुख है।
इसे कृष्ण मोह कह रहे हैं। बुद्ध ने इसे तृष्णा कहा हैतनहा कहा है। इसे कोई और नाम देंइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके भीतरी रहस्य में एक गुण हैऔर वह यह कि जो मेरा नहीं हैवह मेरा मालूम होने लगता है। मोह की जो हिप्नोसिस हैमोह का जो सम्मोहन हैवहां जो मेरा नहीं हैवह मेरा मालूम होने लगता हैऔर जो मेरा है,उसका कुछ पता ही नहीं चलता।
मोह के अंधकार का जो गुणधर्म हैवह यह है कि जो मेरा नहीं हैवह मेरा मालूम होता है। और जो मेरा हैवह मेरा नहीं मालूम होता है। एक रिवर्सनएक विपर्यय हो जाता है। चीजें सब उलटी हो जाती हैं।
मकान मेरा कैसे हो सकता हैमैं नहीं थातब भी था। मैं नहीं रहूंगातब भी रहेगा। जमीन मेरी कैसे हो सकती है?मैं नहीं थातब भी थी। मैं नहीं रहूंगातब भी होगी। और जमीन को बिलकुल पता नहीं है कि मेरी है। और मेरा मोह एक सम्मोहन का जाल फैला लेता है--मेरा बेटा हैमेरी पत्नी हैमेरे पिता हैंमेरा धर्म हैमेरा धर्मग्रंथ हैमेरा मंदिर हैमेरी मस्जिद है--मैं के आस-पास एक बड़ा जाल खड़ा हो जाता है। वह जो मैं का फैलाव हैवही मोह का अंधकार है।
असल में मैं जो हैउसे ठीक ऐसा समझें कि वह अंधेरे का दीया है। जैसे दीए से रोशनी गिरती हैऐसे मैं से अंधकार गिरता है। जैसे दीया जलता हैतो प्रकाश हो जाता हैऐसे मैं जलता हैतो अंधकार हो जाता है। जितना सघन मैं,उतनी डार्कनेसउतना निबिड़ अंधकार चारों ओर फैलता चला जाता है। जो आदमी मैं में ही जीता हैवह अंधकार में जीता है--मोह-निशा में।
तो कृष्ण कहते हैंइस मोह की कालिमा से जो मुक्त हो जाता हैवैसा व्यक्ति वैराग्य को उपलब्ध होता है। लेकिन कृष्ण जिसे वैराग्य कहते हैंहम आमतौर से उसे वैराग्य नहीं कहते हैं। इसलिए इस बात को भी ठीक से समझ लेना जरूरी है।
हम तो वैराग्य जिसे कहते हैंवह राग की विपरीतता को कहते हैं। विपरीत राग को कहते हैं वैराग्यहम जिसे वैराग्य कहते हैं। मकान मेरा हैऐसा जानना राग है--हमारी बुद्धि में। मकान मेरा नहीं हैऐसा जानना वैराग्य है--हमारी बुद्धि में। लेकिन मेरा है या मेरा नहीं हैये दोनों एक ही चीज के दो छोर हैं। कृष्ण इसे वैराग्य नहीं कहते। यह विपरीत राग है। यह राग से मुक्ति नहीं है। नहींमेरा नहीं है।
रामतीर्थ अमेरिका से वापस लौटेटेहरी गढ़वाल में मेहमान थे। उनकी पत्नी मिलने आई। खिड़की से देखा पत्नी को आते हुएतो खिड़की बंद करके द्वार बंद कर लिया। एक मित्र साथ ठहरे हुए थेसरदार पूर्ण सिंह। उन्होंने कहा,दरवाजा क्यों बंद करते हैंक्योंकि मैंने आपको किसी भी स्त्री के लिए कभी दरवाजा बंद करते नहीं देखा! पूर्ण सिंह जानते हैं कि जो आ रही हैउनकी पत्नी है--या थी। रामतीर्थ ने कहावह मेरी कोई भी नहीं है। पर पूर्ण सिंह ने कहा कि और भी जो स्त्रियां आती हैंवे भी आपकी कोई नहीं हैं। लेकिन उन और कोई नहीं स्त्रियों के लिए कभी द्वार बंद नहीं किया! नहींयह स्त्री जरूर आपकी कोई है--विशेष आयोजन करते हैंद्वार बंद करते हैं! रामतीर्थ ने कहावह मेरी पत्नी थीलेकिन मेरी कोई पत्नी नहीं है। पूर्ण सिंह ने कहाअगर वह पत्नी नहीं हैतो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेंजैसा किसी भी स्त्री के साथ करते हैं। द्वार खोलें!
यह व्यवहार विशेष हैयह विपरीत राग का व्यवहार है। एक भ्रम था कि मेरी पत्नी हैअब एक भ्रम है कि मेरी पत्नी नहीं है। लेकिन अगर पहला भ्रम गलत थातो दूसरा भ्रम सही कैसे हो सकता हैवह पहले पर ही खड़ा हैवह पहले का ही एक्सटेंशन हैवह उसी का विस्तार है।
पहला भ्रम तो हमारी समझ में आ जाता है। दूसरा भ्रम विरागी का भ्रम है--संन्यासी कात्यागी का--वह जरा हमारी समझ में मुश्किल से आता है। लेकिन साफ है बात कि यह पत्नी विशेष हैयह साधारण नहीं है। इस स्त्री के प्रति रामतीर्थ की कोई दृष्टि है। किसी दिन रामतीर्थ ने इस स्त्री के लिए उठकर द्वार खोला होताअब उठकर द्वार बंद कर रहे हैं। लेकिन इस स्त्री के लिए उठते जरूर हैं। किसी दिन द्वार खोलने उठे होतेअपनी पत्नी हैआज द्वार बंद करने उठे हैंअपनी पत्नी नहीं है। लेकिन द्वार तक रामतीर्थ को उठना पड़ता हैवैराग्य नहीं है।
पूर्ण सिंह ने कहा कि अगर आप द्वार नहीं खोलते हैंतो मैं नमस्कार करता हूं। मेरे लिए आपका सब ब्रह्मज्ञान व्यर्थ हो गया। मैं जाता हूं। यह कैसा ब्रह्मज्ञान है! क्योंकि किसी स्त्री से आपने नहीं कहा अब तक रुकने के लिए। सभी स्त्रियों में ब्रह्म दिखाई पड़ा। आज इस स्त्री में कौन-सा कसूर हो गया है कि ब्रह्म नहीं है!
रामतीर्थ को भी चुभी बातखयाल में पड़ी। द्वार तो खोल दिया। लेकिन विचारशील व्यक्ति थे। यह तो दिखाई पड़ गया कि वैराग्य फलित नहीं हुआ है। क्योंकि वैराग्य का अर्थ ही यह है कि जहां न राग रहा होन विराग रहा हो। वैराग्य भी न रहा होवहीं वैराग्य है। मोह की निशा पूरी ही खो गई हो। मेरा खो गया होमेरा नहीं हैयह भी खो गया हो। जहां वैराग्य भी नहीं हैवहीं वैराग्य है।
रामतीर्थ को भी दिखाई तो पड़ गया। समझ में तो आ गया। उसी दिन उन्होंने गेरुए वस्त्र छोड़ दिए। यह जानकर आपको हैरानी होगी कि रामतीर्थ ने जिस दिन जल-समाधि लीउस दिन वे गेरुए वस्त्र नहीं पहने हुए थे। उस दिन उन्होंने साधारण वस्त्र पहन लिए थे। क्योंकि यह उनको भी यह साफ हो गया था कि यह वैराग्य नहीं है।
वैराग्य का अर्थजहां न राग रह गयान विराग रह गया। न जहां किसी चीज का आकर्षण हैन विकर्षण हैन अट्रैक्शन हैन रिपल्शन है। जहां न किसी चीज के प्रति खिंचाव हैन विपरीत भागना है। न जहां किसी चीज का बुलावा हैन विरोध है। जहां व्यक्ति थिर हुआसम हुआजहां पक्ष और विपक्ष एक से हो गएवहां वैराग्य फलित होता है।
लेकिन इसे विराग क्यों कहते हैंवैराग्य क्यों कहते हैंक्योंकि जहां वैराग्य भी नहीं हैवहां वैराग्य क्यों कहते हैं?कोई उपाय नहीं है। शब्द की मजबूरी हैऔर कोई बात नहीं है। आदमी के पास सभी शब्द द्वंद्वात्मक हैं,डायलेक्टिकल हैं। आदमी की भाषा में ऐसा शब्द नहीं है जो नान-डायलेक्टिकल होद्वंद्वात्मक न हो। मनुष्य ने जो भाषा बनाई हैवह मन से बनाई है। मन द्वंद्व है। इसलिए मनुष्य जो भी भाषा बनाता हैउसमें विपरीत शब्दों में भाषा को निर्मित करता है।
बड़े मजे की बात है कि हमारी भाषा बन ही नहीं सकती विपरीत के बिना। क्योंकि बिना विपरीत के हम परिभाषा नहीं कर सकतेडेफिनीशन नहीं कर सकते। अगर कोई आपसे पूछे कि अंधेरा यानी क्यातो आप कहते हैंजो प्रकाश नहीं है। बड़ी सर्कुलर डेफिनीशन है। कोई पूछेप्रकाश यानी क्यातो आप कहते हैंजो अंधेरा नहीं है। न आपको अंधेरे का पता है कि क्या हैन प्रकाश का पता है कि क्या है। अंधेरे को जब पूछते हैंक्या हैतो कह देते हैंप्रकाश नहीं है। और जब पूछते हैंप्रकाश क्या हैतो कह देते हैंअंधेरा नहीं है। यह कोई परिभाषा हुईयह कोई डेफिनीशन हुई?परिभाषा तो तभी हो सकती हैजब कम से कम एक का तो पता हो!
मैंने सुना हैएक आदमी एक अजनबी गांव में गया। उसने पूछा कि अ नाम का आदमी कहां रहता हैतो लोगों ने कहाब नाम के आदमी के पड़ोस में। पर उसने कहामुझे ब का भी कोई पता नहींब कहां रहता हैउन्होंने कहा,अ के पड़ोस में। पर उसने कहा कि इससे कुछ हल नहीं होताक्योंकि न मुझे अ का पता हैन ब का पता है। मुझे ठीक-ठीक बताओअ कहां रहता हैउन्होंने कहाब के पड़ोस में। लेकिन ब कहां रहता हैउन्होंने कहाअ के पड़ोस में।
आदमी से पूछोचेतना क्या हैवह कहता हैपदार्थ नहीं। उससे पूछोपदार्थ क्या हैवह कहता हैचेतना नहीं। माइंड क्या हैमैटर नहीं। मैटर क्या हैमाइंड नहीं। बड़े से बड़ा दार्शनिक भी इसको परिभाषा कहता हैइसको डेफिनीशन कहता है। यह डेफिनीशन हुईधोखा हुआडिसेप्शन हुआ--परिभाषा न हुई। क्योंकि इसमें से एक का भी पता नहीं है।
लेकिन आदमी को कुछ भी पता नहीं हैकाम तो चलाना पड़ेगा। इसलिए आदमी बेईमान शब्दों को रखकर काम चलाता है। उसके सब शब्द डिसेप्टिव हैं। उसके किसी शब्द में कोई भी अर्थ नहीं है। क्योंकि अपने शब्द में वह जिस शब्द से अर्थ बताता हैउस शब्द में भी उसको कोई अर्थ नहीं है। उसकी सब परिभाषाएं सर्कुलर हैंवर्तुलाकार हैं। वह कहता हैबाएं यानी क्या! वह कहता हैदाएं जो नहीं है। और दाएंवह कहता हैबाएं नहीं। लेकिन इनमें से किसी का पता है कि बायां क्या है?
यह आदमी की भाषा डायलेक्टिकल है। डायलेक्टिकल का मतलब यह कि जब आप पूछें अ क्यातो वह ब की बात करता हैजब पूछें ब क्यातो वह अ की बात करने लगता है। इससे भ्रम पैदा होता है कि सब पता है। पता कुछ भी नहीं हैसिर्फ शब्द पता हैं। लेकिन बिना शब्दों के काम नहीं चल सकता। राग है तो विराग है। लेकिन तीसरा शब्द कहां से लाएंऔर तीसरा शब्द ही सत्य है। वह कहां से लाएं?
महावीर कहते हैंवीतराग। लेकिन उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। वीतराग का भी मतलब राग के पार हो जाना,बियांड अटैचमेंट होता है। विराग का भी मतलब वही होता है कि राग के बाहर हो जाना। कोई फर्क नहीं पड़ता। हम कोई भी शब्द बनाएंगेवह किसी शब्द के विपरीत होगा। वह तीसरा नहीं होतावह हमेशा दूसरा ही होता है। और सत्य तीसरा है। इसलिए दूसरे शब्द को कामचलाऊ रूप से उपयोग करते हैं। कृष्ण भी कामचलाऊ उपयोग कर रहे हैं।
इसलिए वैराग्य का अर्थ राग की विपरीतता मत समझ लेना। वैराग्य का अर्थ हैद्वंद्व के पारराग और विराग के पार जो हो गयाजिसे न अब कोई चीज आकर्षित करती हैन विकर्षित करती है। क्योंकि विकर्षण आकर्षण का ही शीर्षासन है। क्योंकि विकर्षण आकर्षण का ही शीर्षासन है। वह सिर के बल खड़ा हो गया आकर्षण है। और मोह की अंध-निशा टूटे तो। शर्त साफ है। वैराग्य को कौन उपलब्ध होता हैमोह की अंध-निशा टूटे तोमोह की कालिमा बिखरे तो।
लेकिन हम क्या करते हैंहम मोह की कालिमा नहीं तोड़तेमोह के खिलाफ अमोह को साधने लगते हैं। हम मोह की कालिमा नहीं तोड़तेमोह के खिलाफविरोध में अमोह को साधने लगते हैं। हम कहते हैंघर में मोह हैतो घर छोड़ दोजंगल चले जाएं। लेकिन जिस आदमी में मोह थाआदमी में था कि घर में था?
अगर घर में मोह थातो आदमी चला जाए तो मोह के बाहर हो जाएगा। अगर घर मोह था। लेकिन घर को कोई भी मोह नहीं है आपसेमोह आपको है घर से। और आप भाग रहे हैं और घर वहीं का वहीं है। आप जहां भी जाएंगेमोह वहीं पहुंच जाएगा। वह आपके साथ चलेगावह आपकी छाया है। फिर आश्रम से मोह हो जाएगा--मेरा आश्रम। क्या फर्क पड़ता हैमेरा घरमेरा आश्रम--क्या फर्क पड़ता हैमेरा बेटामेरा शिष्य--क्या फर्क पड़ता हैमोह नया इंतजाम कर लेगामोह नई गृहस्थी बसा लेगा।
यह बड़ी मजेदार बात है कि गृह का अर्थ घर से नहीं है। गृह का अर्थ उस मोह से हैजो घर को बसा लेता हैदैट व्हिच बिल्ट्स दि होम। होम से मतलब नहीं है गृह काउससे मतलब हैजो घर को बनाता है। वह कहीं भी घर को बना लेगा। वह झाड़ के नीचे बैठेंगेतो मेरा हो जाएगा। महल होगातो मेरा होगा। लंगोटी होगीतो मेरी हो जाएगी। और मेरे को कोई दिक्कत नहीं आती कि बड़ा मकान हो कि छोटा होइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे का आयतन कितना हैइससे मेरे के होने में कोई फर्क नहीं पड़ता। मेराआयतन पर निर्भर नहीं है।
इसे ऐसा समझेंएक आदमी दो लाख रुपए की चोरी करे और एक आदमी दो पैसे की चोरी करेतो क्या आप समझते हैं कि दो पैसे की चोरी छोटी चोरी है और दो लाख रुपए की चोरी बड़ी चोरी हैआयतन बड़ा हैचोरी बराबर है। दो लाख की चोरी उतनी ही चोरी हैजितनी दो पैसे की चोरी है। क्योंकि चोरी करने में जो भी घटना घटती हैवह दो पैसे में भी घट जाती हैदो लाख में भी घट जाती है। चोर तो आदमी हो ही जाता है दो पैसे में उतना हीजितना दो लाख में। हांअदालत दो पैसे के चोर को छोटा चोर कहेदो लाख के चोर को बड़ा चोर कहेसजा कम-ज्यादा करेवह बात अलग है। क्योंकि अदालत को चोरी से मतलब नहीं हैदो लाख से मतलब है। अदालत क्वांटिटी पर जीती है।
धर्म का क्वांटिटी सेपरिमाण से कोई संबंध नहीं। धर्म का क्वालिटी से संबंध हैगुण से संबंध है। धर्म कहेगादो पैसे की चोरी या दो लाख की चोरीबराबर चोरी है। इसमें कोई फर्क नहीं। गणित में होगा फर्कधर्म में कोई भी फर्क नहीं है। धर्म के लिए चोरी हो गई। आदमी चोर है।
सच तो यह है कि धर्म को और थोड़ा गहरे में उतरेंतो अगर दो लाख और दो पैसे की चोरी में कोई फर्क नहीं हैतो दो लाख की चोरी और चोरी करने के विचार में भी कोई फर्क हो सकता हैधर्म के लिए कोई फर्क नहीं है। चोरी की या चोरी करने का विचार कियाकोई अंतर नहीं हैबात घटित हो गई। हम जो करते हैंवह भी हमारे जीवन का हिस्सा हो जाता है। जो हम करने की सोचते हैंवह भी हमारे जीवन का हिस्सा हो जाता है।
यह जान सोलिज की जिस किताब का मैंने नाम लियाअरेस्ट्रोसउसमें उसका एक वचन और है कि आदमी अपने कर्मों से ही नहीं बंधता--सिर्फ कर्मों से नहीं बंधता--बल्कि जो उसने करना चाहा और नहीं कियाउससे भी बंध जाता है।
हम सिर्फ चोरी से ही नहीं बंधते--की गई चोरी से--नहीं की गई चोरी सेसोची गई चोरी से भी उतने ही बंध जाते हैं। की गई चोरी से दूसरे को भी पता चलता हैन की गई चोरी से जगत को पता नहीं चलतालेकिन परमात्मा को पूरा पता चलता है। क्योंकि परमात्मा से हमारे संबंध भाव के हैंकृत्य के नहीं। करने के नहीं हैं हमारे संबंध परमात्मा से,करने के संबंध जगत से हैंसमाज से हैंबाहर से हैं। होने के संबंध हैं हमारे परमात्मा से--बीइंग केडूइंग के नहीं।
और होने में क्या फर्क पड़ता हैमैंने चोरी की कल्पना की या मैंने चोरी कीइससे होने में कोई फर्क नहीं पड़ताचोर मैं हो गया। परमात्मा की तरफ तो चोरी की खबर पहुंच गई कि यह आदमी चोर है। हांजगत तक खबर नहीं पहुंची। जगत तक खबर पहुंचने में देर लगेगी। जगत तक खबर पहुंचने में चोरी का विचार ही नहींचोरी को हाथ का भी सहयोग लेना होगा। जगत तक पहुंचने में भाव ही नहींपौदगलिक कृत्यमैटीरियल एक्ट भी करना होगा। इससे चोरी बढ़ती नहींसिर्फ चोरी प्रकट होती हैअनमैनिफेस्ट चोरी मैनिफेस्ट होती हैअव्यक्त चोरी व्यक्त होती है। बस और कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अव्यक्त चोरी उतनी ही चोरी हैजितनी व्यक्त चोरी हैजहां तक धर्म का संबंध है।
तो यह सवाल नहीं है कि आपके पास कितना बड़ा मकान हैकि मकान नहीं हैझोपड़ा है। यह सवाल नहीं है कि आपके पास करोड़ों रुपए हैंकि कौड़ियां हैं। यह सवाल नहीं है। सवाल यह है कि आपके पास मेरा कहने का भाव है या नहीं है।
वही मेरे का भाव मोह की निशा हैमोह का अंधकार है। जब तक आप कह सकते हैं मेराचाहे यह मेरा किसी भी चीज से जुड़ता हो--मेरा धर्म--फर्क नहीं पड़तामोह की निशा जारी है। आप कह सकते हैं: हिंदूमुसलमान मेराकुरान,बाइबिलगीता मेरीमंदिर-मस्जिद मेरा।
हम अजीब लोग हैं। सारी दुनिया के धर्म चिल्लाते हैं कि जिसे परमात्मा को पाना होउसे मेरे को छोड़ना पड़ेगा। और हम इतने कुशल हैं कि हम परमात्मा को भी मेरा बना लेते हैं कि मेरा! वह परमात्मा तेरायह परमात्मा मेरा।
मैंने सुना है कि किसी गांव में एक बहुत मजेदार घटना घटी। गणेशोत्सव था और गणेश का जुलूस निकल रहा था। लेकिन पूरे गांव के लोगों के हर मोहल्ले के गणेश होते थे। अब गणेश हर मोहल्ले के होतेकोई ब्राह्मणों का गणेश होताकोई भंगियों का गणेश होताकोई चमारों का गणेश होताकोई लोहारों काकोई तेलियों का। लेकिन नियम था,डिसिप्लिन थी गणेशों की भी एक। और वह यह थी कि ब्राह्मणों का गणेश पहले चलताफिर उसके बाद किसी का,फिर किसी काऐसी प्रोसेशन में व्यवस्था थी।
लेकिन एक वर्ष ऐसा हुआ कि ब्राह्मणों के गणेश जरा समय से देर से पहुंचे। ब्राह्मणों के गणेश थेसमय में जरा देर दिखानी ही चाहिए! आदमी के बड़े होने का पता ही चलता है कि वह समय से जरा देर से पहुंचे। जितना बड़ा नेता,उतनी देर से पहुंचता है। जरा देर से पहुंचे ब्राह्मणों के गणेशऔर तेलियों के गणेश जरा पहले पहुंच गए। गरीब गणेश थेवह जरा पहले पहुंच गएसमय से पहुंच गए कि कहीं जुलूस न निकल जाए। क्योंकि तेलियों के गणेश के लिए कोई जुलूस रुकेगा नहीं। उनको तो समय पर पहुंचना ही चाहिएवे समय पर पहुंचे।
फिर समय से बहुत देर हो गईजुलूस निकालना जरूरी थारात हुई जाती थीतो तेलियों के गणेश ही आगे हो गए। पीछे से आए ब्राह्मणों के गणेश! तो ब्राह्मणों ने कहाहटाओ तेलियों के गणेश को! तेलियों का गणेश और आगेयह कभी नहीं हो सकता। बेचारे तेलियों के गणेश को पीछे हटना पड़ा।
हिंदू के भी देवता हैंमुसलमान के भी। हिंदुओं में भी हिंदुओं के हजार देवता हैं। एक देवता भी तेलियों और ब्राह्मणों का होकरअलग हो जाता है। भगवान मेरे को छोड़ने से मिलता है। और हम इतने कुशल हैं कि भगवान को भी मेरे की सीमाओं में बांधकर खड़ा कर देते हैं। मंदिर जलता हैतो किसी मुसलमान को पीड़ा नहीं होतीखुशी होती है। मस्जिद जलती हैतो किसी हिंदू को पीड़ा नहीं होतीखुशी होती है। और हर हालत में भगवान ही जलता है। लेकिन मेरे की वजह से दिखाई नहीं पड़ता। मेरा अंधा कर जाता है। वह मेरा अंधकार है।
किसी भी तरह के मेरे का भाव मोह की निशा है। इसके प्रति जागना हैभागना नहीं है। भागे कि मैं की विपरीतता शुरू हुईकि फिर मैं कहीं और निर्माण होगा। फिर वह वहां जाकर अपने को निर्मित कर लेगा।
मैं जो हैबड़ी क्रिएटिव फोर्स हैमैं जो हैबड़ी सृजनात्मक शक्ति है। वास्तविक नहींस्वप्न का सृजन करती हैड्रीम क्रिएटिंग। स्वप्न का निर्माण करती हैलेकिन करती है। बहुत हिप्नोटिक है। जहां भी खड़ी हो जाती हैवहां एक संसार बन जाता है।
सच तो यह है कि मेरे के कारण ही संसार है। जिस दिन मेरा नहीं हैउस दिन संसार कहीं भी नहीं है। मेरे के कारण ही गृह हैगृहस्थी है। जिस दिन मेरा नहीं हैउस दिन कहीं कोई गृह नहीं हैकहीं कोई गृहस्थी नहीं है। संन्यासी वह नहीं हैजो घर छोड़कर भाग गयासंन्यासी वह हैजिसके भीतर घर को बनाने वाला बिखर गया। जिसके भीतर से वह निर्माण करने वाली मोह की जो तंद्रा थीवह खो गई है।
इसे कृष्ण कहते हैंइस मोह की निशा को जो छोड़ देता है और जिसकी बुद्धि वैराग्य को उपलब्ध हो जाती हैउसके जीवन मेंउसके जीवन में फलित होता है--कहें उसे मोक्षकहें उसे ज्ञानकहें उसे आनंदकहें उसे परमात्माकहें उसे ब्रह्मइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे सिर्फ नामों के भेद हैं।


श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।। ५३।।
और जब तेरी अनेक प्रकार के सिद्धांतों को सुनने से विचलित हुई बुद्धि परमात्मा के स्वरूप में अचल और स्थिर ठहर जाएगीतब तू समत्वरूप योग को प्राप्त होगा।


जैसी बुद्धि हैनिश्चल नहीं है। जैसी बुद्धि हैदृढ़ नहीं है। जैसी बुद्धि हैवेवरिंगकंपितकंपती हुईलहराती हुई है। जैसी बुद्धि है वह ऐसी हैजैसे तूफान और आंधी में दीए की ज्योति होती है। एक क्षण भी एक जगह नहींएक क्षण में भी अनेक जगह। क्षण के शुरू में कहीं होती हैतो क्षण के अंत में कहीं। एक क्षण को भी आश्वस्त नहीं कि बचेगीबुझती-जलती मालूम पड़ती है। झोंके हवा के--और ज्योति अब गईअब गईऐसी ही होती रहती है।
कीर्कगार्ड ने मनुष्य को कहा हैए ट्रेंबलिंगएक कंपन। पूरे समय--जन्म से लेकर मृत्यु तक--एक कंपनजहां सब कंप रहा हैजहां सब भूकंप है। जहां भीतर कोई थिरता नहींकोई दृढ़ता नहीं। जो हम बाहर से चेहरे बनाए हुए हैंवे झूठे हैं। हमारे बाहर के चेहरे ऐसे लगते हैंबड़े अकंप हैं। सचाई वैसी नहीं हैभीतर सब कंपता हुआ है। बहादुर से बहादुर आदमी भीतर भय से कंप रहा है। बहादुर से बहादुर आदमी भीतर भय से कंप रहा है।
स्टैलिन था। नाम ही उसको स्टैलिन इसलिए दिया--मैन आफ स्टीललौहपुरुष। नाम नहीं है उसका असली वहदिया हुआ नाम है--लौहपुरुषस्टैलिनस्टील का आदमी। लेकिन ख्रुश्चेव ने अभी संस्मरण लिखे हैं। तो उसमें लिखा है कि वह इतना भयभीत आदमी थाजिसका कोई हिसाब नहीं। और एक दिन तो ख्रुश्चेव से उसने कहा कि अब तक तो मैं दूसरों से डरता थाअब तो मैं अपने से भी डरने लगा हूं। डर भारी था।
स्टैलिन कभी भी भोजन नहीं कर सकता था सीधाजब तक कि दो-चार को खिलाकर न देख ले। अपनी लड़की पर भी भरोसा नहीं थाकि जो खाना बना हैउसमें जहर तो नहीं है! ख्रुश्चेव ने लिखा हैहम सब को उसका भोजन पहले चखना पड़ता था। हम भी कंपते हुए चखते थे कि जिससे स्टैलिन घबड़ा रहा हैलौहपुरुषवह हमको चखना पड़ रहा है! लेकिन मजबूरी थी। पहले चार को भोजन करवा लेता सामने बिठाकर। जब देख लेता कि चारों जिंदा हैंतब भोजन करता। भोजन करना भी निश्चिंतता न रही।
घर से बाहर नहीं जाता था। समझा तो यह जाता है कि उसने एक डबल आदमी रख छोड़ा थाअपनी शकल का एक आदमी और रख छोड़ा थाजो सामूहिक जलसों में सम्मिलित होता था। हिटलर ने भी एक डबल रख छोड़ा था। सामूहिक जलसे में कहां-कब गोली लग जाएगी! सब इंतजाम हैफिर भी डर है। इंतजाम भारी था। स्टैलिन और हिटलर के पास जैसा इंतजाम थाऐसा पृथ्वी पर किसी आदमी के पास कभी नहीं रहा। एक-एक आदमी की तलाशी ले ली जाती थी। हजारों सैनिकों के बीच में थे। सब तरह का इंतजाम था। लेकिन फिर भी आखिरी इंतजाम यह था कि जो आदमी सलामी ले रहा है जनता कीवह असली स्टैलिन नहीं है। वह एक नकली अभिनेता हैजो स्टैलिन का काम कर रहा है। स्टैलिन तो अपने घर में बैठा हुआ देख रहा हैखबर सुन रहा है कि क्या हो रहा है।
कैसी विडंबना है कि स्टैलिन और हिटलर जैसे आदमी इसी यश को पाने के लिए इतना श्रम करते हैं! और फिर कोई अभिनेता नमस्कार लेता है जाकर। पत्नी को भी कमरे में सुला नहीं सकते। क्योंकि रात कब गरदन दबा देगीकुछ पता नहीं।
खूब स्टील के आदमी हैं! तो घास-फूस का आदमी कैसा होता हैभूसे से भरा आदमी कैसा होता हैऔर अगर स्टैलिन इतने भूसे से भरे हैंतो हमारी क्या हालत होगीहम तो स्टैलिन नहीं हैंहम तो स्टील के आदमी नहीं हैं। स्टील के आदमी की यह हालत होतो हमारी क्या हालत होगी?
नहींएक चेहराएक मास्कएक मुखौटा हैजो ऊपर से बिलकुल थिर है। भीतर असली चेहरा पूरे वक्त कंप रहा है। वहां कंपन ही चल रहा है। वहां बहादुर से बहादुर आदमी भीतर भयभीत है। वहां तथाकथित ज्ञानी से ज्ञानीभीतर गहरे में अज्ञान से कंप रहा है। यहां वह कह रहा है कि मुझे पता हैब्रह्म है। और वहां भीतर वह जान रहा हैमुझे कुछ भी पता नहीं। यह भी पता नहीं है कि मैं भी हूं। बाहर वह दिखला रहा है अधिकारकि मुझे मालूम है। भीतर उसे कुछ भी मालूम नहीं है। भीतर अज्ञान खाए जा रहा है। बाहर से वह कह रहा हैआत्मा अमर है। और भीतर मौत मुंह बाए मालूम पड़ती है।
ऐसी जो हमारी बुद्धि हैजो दृढ़ नहीं है। लेकिन दृढ़ का क्या मतलब हैफिर वही कठिनाई है शब्दों की। दृढ़ का क्या मतलब हैजिसको हम दृढ़ आदमी कहते हैंक्या उसके भीतर कंपन नहीं होताअसल में जितनी दृढ़ता आदमी बाहर से दिखाता हैउतना ही भीतर कंपित होता है। असल में दृढ़ता जो हैवह सेफ्टी मेजर हैवह भीतर के कंपन को झुठलाने के लिए आयोजन है।
एडलर ने इस संबंध में बड़ी मेहनत की है। शायद मनुष्य जाति के इतिहास में इस दिशा में एडलर की खोज सर्वाधिक कीमती है। एडलर कहता है कि एक बड़ी अजीब घटना आदमी के साथ घटती है कि आदमी जो भीतर होता हैउससे ठीक उलटा बाहर आयोजन करता हैदि एग्जेक्ट कानट्रेरीठीक उलटा आयोजन करता है। जितना मनुष्य भीतर हीनता से पीड़ित होता हैउतना बाहर श्रेष्ठता का आयोजन करता है।
सभी राजनीतिज्ञ इनफीरिअरिटी कांप्लेक्स से पीड़ित होते हैं। होंगे हीअन्यथा राजनीतिज्ञ होना मुश्किल है। राजनीतिज्ञ होने के लिए जरूरी है कि भीतर हीनता का भाव हो कि मैं कुछ भी नहीं हूं। तभी आदमी दौड़कर सिद्ध करता है कि देखोमैं कुछ हूं। यह आपको कम सिद्ध करता हैअपने को ज्यादा सिद्ध करता है--अपने सामने--कि नहींगलत थी वह बात कि मैं कुछ नहीं हूं। देखोमैं कुछ हूं।
एडलर का कहना है कि बड़े से बड़े जो संगीतज्ञ हुए हैं जगत मेंवे वे ही लोग हैंजिनके बचपन में कान कमजोर होते हैं। कमजोर कान का आदमी संगीतज्ञ हो जाता है। कमजोर आंख के आदमी चित्रकार हो जाते हैं।
लेनिन कुर्सी पर बैठता थातो उसके पैर जमीन नहीं छूते थे। पैर बहुत छोटे थेऊपर का हिस्सा बहुत बड़ा था। लेकिन बड़ी से बड़ी कुर्सी पर वह आदमी बैठ सका। उसने सिद्ध करके बता दिया कि तुम्हारे पैर अगर जमीन को छूते हैंतो कोई बात नहींकोई फिक्र नहींहम कुर्सी को आसमान से छूकर बताए देते हैं। एडलर कहेगा कि लेनिन की इस महत्वाकांक्षा में उसके पैरों का छोटा होना ही कारण थावह हीनता ही उसको पीड़ित कर रही थी। पैर बहुत छोटे थे,साधारण कुर्सी पर भी लटक जाते थेजमीन पर नहीं पहुंचते थे।
बर्नार्ड शा ने मजाक में कहा है कि छोटे पैर से क्या फर्क! छोटा हो पैर कि बड़ा होजमीन पर आदमी खड़ा होतो सभी के पैर जमीन पर पहुंच जाते हैं। क्या फर्क पड़ता है छोटे-बड़े पैर सेजमीन पर खड़ा होतो सभी के पैर जमीन पर पहुंच जाते हैं।
वह तो ठीक है। लेकिन छोटे पैर से फर्क पड़ता हैआदमी कुर्सी पर पहुंच जाता है। क्योंकि जब तक कुर्सी पर नहीं पहुंच जातातब तक उसके प्राण पीड़ित होते रहते हैं कि पैर छोटे हैंपैर छोटे हैंपैर छोटे हैं। वही पीड़ा उसको विपरीत यात्रा पर ले जाती है।
तो एडलर से अगर पूछें कि दृढ़ता का क्या मतलब हैतो एडलर और कृष्ण के मतलब में फर्क हैवह मैं समझाना चाहता हूं। एडलर कहेगादृढ़ता का मतलब कि आदमी वीकलिंग हैभीतर कमजोर है। आदमी भीतर कमजोर है,इसलिए बाहर से दृढ़ता आरोपित कर रहा है। आदमी भीतर घास-फूस का हैइसलिए बाहर से स्टैलिन है। आदमी भीतर से कुछ नहीं हैइसलिए बाहर से सब कुछ बनने की कोशिश में लगा है। क्या कृष्ण भी इसी दृढ़ता की बात कर रहे हैंअगर इसी दृढ़ता की बात कर रहे हैंतो दो कौड़ी की है।
नहींइस दृढ़ता की वे बात नहीं कर रहे हैं। एक और दृढ़ता हैजो भीतर की कमजोरी को दबाने से उपलब्ध नहीं होतीजो भीतर के चित्त के विपरीत आयोजन करने से उपलब्ध नहीं होतीबल्कि भीतर के कंपित चित्त के विदा हो जाने से उपलब्ध होती है।
दो तरह की दृढ़ताएं हैं। एक दृढ़ता वह हैजिसमें मेरे भीतर कमजोरी तो मौजूद रहती हैऔर उसकी छाती पर सवार होकर मैं दृढ़ हो जाता हूं। और एक ऐसी दृढ़ता हैजो मेरी कमजोरी बिखर जाती हैविलीन हो जाती हैउसके अभाव में जो मेरे भीतर छूट जाती है। लेकिन उसे हम क्या कहेंउसे दृढ़ता कहना ठीक नहीं हैक्योंकि सच तो यह है कि दृढ़ता पहले वाली ही है। वह एडलर ठीक कहता है। उसे हम क्या कहेंजो कमजोरी के विसर्जन पर बचती है?
एक तो स्वास्थ्य वह हैजो भीतर बीमारी को दबाकर प्रकट होता है। और एक स्वास्थ्य वह हैजो बीमारी के अभाव परएब्सेंस में प्रकट होता है। लेकिन जो बीमारी के अभाव में प्रकट होता हैउस स्वास्थ्य को हम क्या कहेंक्योंकि हम एक ही तरह के स्वास्थ्य से परिचित हैंजो बीमारी को दबाकर उपलब्ध होता है। दबाने की प्रक्रिया को इसलिए हम दवा कहते हैं। दवाई--दबाने वाली। जिससे हम बीमारी को दबाते रहते हैंउसको हम दवा कहते हैं।
लेकिन एक और स्वास्थ्य हैजो बीमारी का अभाव है--दबाव नहींसप्रेशन नहीं--एब्सेंस। लेकिन अगर हम मेडिकल साइंस से पूछने जाएंतो वह कहेगी कि नहींहम ऐसे किसी स्वास्थ्य को नहीं जानते हैंजो बीमारी का अभाव है। हम तो ऐसे ही स्वास्थ्य को जानते हैंजो बीमारी से लड़कर उपलब्ध होता है।
इसलिए अगर आप किसी चिकित्सक से जाकर कहें कि मुझे स्वस्थ होना हैतो वह कहेगाहम कुछ रास्ता नहीं बता सकते हैं। हमसे तो यह पूछो कि कौन-सी बीमारी हैउसे अलग करना हैउसे मिटाना हैतो हम रास्ता बता सकते हैं।
इसलिए आज तक दुनिया की कोई भी मेडिकल साइंसचाहे वह आयुर्वेद हो और चाहे वह एलोपैथी हो और चाहे होमियोपैथी हो और चाहे यूनानी हो और चाहे कोई और होकोई भी पैथी होवह अब तक स्वास्थ्य की परिभाषा नहीं कर पाईसिर्फ बीमारियों की परिभाषा कर पाई है। उससे पूछो कि स्वास्थ्य क्या हैतो वह कहेगीहमें पता नहीं। हमसे पूछो कि बीमारियां क्या हैंतो हम बता सकते हैंटी.बी. का मतलब यहकैंसर का मतलब यहफ्लू का मतलब यह। लेकिन स्वास्थ्य का क्या मतलब हैस्वास्थ्य का हमें कोई पता नहीं है।
हीनता को दबाकर एक श्रेष्ठता प्रकट होती हैयह श्रेष्ठता सदा ही नीचे की हीनता पर कंपती रहती है। सदा भयभीत,सदा अपने को सिद्ध करने को आतुरसदा अपने को तर्क देने को चेष्टारतसदा संदिग्धसदा भीतर से भयग्रस्त।
और एक ऐसी भी श्रेष्ठता है--असंदिग्धअपने को सिद्ध करने को आतुर नहींअपने को प्रमाणित करने के लिए चेष्टारत नहींजिसे अपने होने का पता ही नहीं।
अब ध्यान रहेजिस दृढ़ता का आपको पता हैवह एडलर वाली दृढ़ता होगी। और जिस दृढ़ता का आपको पता ही नहीं हैवह कृष्ण वाली दृढ़ता होगी। जिस दृढ़ता का पता है...पता चलेगा कैसेपता हमेशा कंट्रास्ट में चलता है। स्कूल में शिक्षक लिखता है सफेद खड़िया से काले ब्लैक-बोर्ड पर। सफेद दीवार पर भी लिख सकता हैलिख जाएगापता नहीं चलेगा। लेकिन काले ब्लैक-बोर्ड पर लिखता हैलिखता हैदिखाई पड़ता है। काले पर लिखता ही इसीलिए है कि दिखाई पड़ सके। जितना काला ब्लैक-बोर्डउतने अक्षर साफ दिखाई पड़ते हैं।
जितना हीन आदमीउतनी श्रेष्ठता दिखाई पड़ती है। जितना श्रेष्ठ आदमीउतनी श्रेष्ठता सफेद दीवार पर सफेद अक्षरों जैसी लीन हो जाती हैदिखाई नहीं पड़ती है। कंट्रास्ट मेंविरोध में दिखाई पड़ती है।
अगर आपको पता चलता है कि मैं स्वस्थ हूंतो समझना कि बीमारी कहीं दबी है। अगर आपको पता चलता हैमैं ज्ञानी हूंतो समझना कि अज्ञान कहीं दबा है। अगर आपको पता चलता है कि मैं दृढ़ चित्तवान हूंतो समझना कि भीतर भूसा कहीं भरा है। अगर पता ही नहीं चलता...।
इसलिए उपनिषद कहते हैं कि जो कहता हैमैं जानता हूंसमझना कि नहीं जानता है। इसलिए उपनिषद एक अदभुत वचन कहते हैं। शायद इससे ज्यादा करेजियस स्टेटमेंटइससे ज्यादा साहसी वक्तव्य पृथ्वी पर कभी नहीं दिया गया है। उपनिषद कहते हैं कि ज्ञानी को क्या कहें! अज्ञानी तो भटक ही जाते हैं अंधकार मेंज्ञानी महा-अंधकार में भटक जाते हैंग्रेटर डार्कनेस। अज्ञानी तो भटकते ही हैं अंधकार मेंज्ञानी महा-अंधकार में भटक जाते हैं। किन ज्ञानियों की बात कर रहा है उपनिषदउन ज्ञानियों की बात कर रहा हैजिन्हें ज्ञान का पता है कि ज्ञान है।
जिन्हें दृढ़ता का पता हैवे दृढ़ नहीं हैं। कृष्ण जिस दृढ़ता की बात कह रहे हैंउसे एडलर की दृढ़ता से बिलकुल भिन्न जान लेना। कृष्ण का मनोविज्ञान बहुत और है। वह विपरीत पर खड़ा हुआ नहीं है। क्योंकि जो विपरीत पर खड़ा हुआ मकान हैकिसी भी दिन गिर जाएगाउसका कोई भरोसा नहीं है। जो प्रतिकूल पर ही निर्मित हैवह अपने शत्रु पर ही आधार बनाए है। स्वभावतःअपने ही शत्रु के कंधे पर हाथ रखकर जो बलशाली हुआ हैवह कितनी देर बलशाली रहेगाजो अपने ही विपरीत को अपनी बुनियाद में आधारशिला के पत्थर बनाया हैउसके शिखर कितनी देर तक आकाश मेंसूर्य की रोशनी में उन्नत रहेंगेकितनी देर तक?
नहींयह नहीं हो सकता ज्यादा देर। और जितनी देर ये शिखर ऊपर उन्नत दिखाई भी पड़ेंगेउतनी देर नीचे बुनियाद में पूरे समय संघर्ष हैपूरे समय द्वंद्व हैपूरे समय प्राणों में कंपन हैवेवरिंग हैट्रेंबलिंग है। वहां कंपन चलता ही रहेगावहां भय हिलता ही रहेगावहां पानी की धार कंपती ही रहेगी। यह रेत पर बनाया हुआ मकान है। रेत पर भी नहींपानी पर बनाया हुआ मकान है। यह अब गिराअब गिराअब गिरा--भीतर आप जानते ही रहेंगेअब गिराअब गिराअब गिरा--भीतर आप डरते ही रहेंगे। जितना भीतर डरेंगेउतनी बाहर दृढ़ता दिखलाएंगे--अपने को धोखा देने के लिएदूसरों को धोखा देने के लिए।
लेकिन कृष्ण जिस दृढ़ता की बात कर रहे हैंवह प्रवंचना नहीं हैवह रूपांतरण है। लेकिन वह कब फलित होता है?वह तभी फलित होता हैवह तभी फलित होता हैजब चित्त राग और विराग सेजब बुद्धि चुनाव सेऔर जब मन विषयों के बीच कंपन को छोड़कर अकंप हो जाता हैजब मन इच्छाओं के बीच कंपन को छोड़कर अनिच्छा को उपलब्ध हो जाता है। अनिच्छा का मतलब विपरीत इच्छा नहींइच्छा के अभाव को उपलब्ध हो जाता है। तब वे कहते हैं कि अर्जुनऐसी अकंप चित्त की दशा में जीवन की संपदा की उपलब्धि है। तब चित्त दृढ़ है। तब चित्त पानी पर नहीं,चट्टानों पर है। और तब आकाश में शिखर उठ सकता है। और तब पताकाजीवन कीअस्तित्व की ऊंचाइयों में फहरा सकती है।


अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत ब्रजेत किम्।। ५४।।
इस प्रकार भगवान के वचनों को सुनकर अर्जुन ने पूछा:
हे केशवसमाधि में स्थित स्थिर प्रज्ञा वाले पुरुष का क्या लक्षण है और स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता हैकैसे बैठता हैकैसे चलता है?


अर्जुन पहली बारअब तक अर्जुन का जो वर्तुल- व्यक्तित्व थाउससे उठकर प्रश्न पूछ रहा है। पहली बार। अब तक जो भी उसने पूछा थावह पुराना आदमी पूछ रहा थावह पुराना अर्जुन पूछ रहा था। पहली बार उसके प्रश्न ने कृष्ण को छूने की कोशिश की है--पहली बार। इस वचन से पहली बार वह कृष्ण के निकट आ रहा है। पहली बार अर्जुन अर्जुन की तरह नहीं पूछ रहा हैपहली बार अर्जुन कृष्ण के निकट होकर पूछ रहा है। पहली बार कृष्ण अर्जुन के भीतर प्रविष्ट हुए प्रतीत होते हैं।
यह सवाल गहरा है। वह पूछता हैस्थितप्रज्ञ किसे कहते हैंकिसे कहते हैंजिसकी प्रज्ञा स्थिर हो गईवह कौन है?वह कौन है जिसके ज्ञान की ज्योति थिर हो गईवह कौन है जिसकी चेतना का दीया अकंप हैवह कौन है जिसे समाधिस्थ कहते हैंउसकी भाषा क्या हैवह उठता कैसे हैवह चलता कैसे हैवह बोलता कैसे हैउसका होना क्या हैउसका व्यवहार क्या हैउसे हम कैसे पहचानें?
दो बातें वह पूछ रहा है। एक तो वह यह पूछ रहा हैप्रज्ञा का स्थिर हो जानास्थित हो जानाठहर जाना क्या है?लेकिन वह घटना तो बहुत आंतरिक है। वह घटना तो शायद स्वयं पर ही घटेगीतभी पता चलेगा। वह शायद कृष्ण भी नहीं बता पाएंगे कि क्या है। इसलिए अर्जुन तत्काल--और इसमें अर्जुन बहुत ही बुद्धिमानी का सबूत देता है। एक बहुत इंटेलिजेंटबहुत ही विचार काविवेक का सबूत देता है। प्रश्न के पहले हिस्से में पूछता है कि प्रज्ञा का थिर हो जाना क्या है कृष्णलेकिन जैसे किसी अनजान मार्ग से उसको भी एहसास होता है कि प्रश्न शायद अति-प्रश्न है,शायद प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता है। क्योंकि घटना इतनी आंतरिक है कि शायद बाहर से न बताई जा सके।
इसलिए ठीक प्रश्न के दूसरे हिस्से में वह यह पूछता है कि बताएं यह भी कि बोलता कैसे है वहजिसकी प्रज्ञा थिर हो गईजो समाधि को उपलब्ध हुआसमाधिस्थ हैवह बोलता कैसेडोलता कैसेचलता कैसेउठता कैसेउसका व्यवहार क्या हैइस दूसरे प्रश्न में वह यह पूछता है कि बाहर से भी अगर हम जानना चाहेंतो वह कैसा हैभीतर से जानना चाहेंतो क्या हैवह घटना क्या हैवह हैपनिंग क्या हैजिसको समाधिस्थ कहते हैंवह घटना क्या है?यह भीतर से। लेकिन अगर यह न भी हो सकेतो जब किसी व्यक्ति में वैसी घटना घट जाती हैतो उसके बाहर क्या-क्या फलित होता हैउस घटना के चारों तरफ जो परिणाम होते हैंवे क्या हैं?
यह प्रश्न पहला प्रश्न हैजिसने कृष्ण को आनंदित किया होगा। यह पहला प्रश्न हैजिसने कृष्ण के हृदय को पुलकित कर दिया होगा। अब तक के जो भी प्रश्न थेअत्यंत रोगग्रस्त चित्त से उठे प्रश्न थे। अब तक जो प्रश्न थेवे अर्जुन के जस्टीफिकेशन के लिए थे। वह जो चाहता थाउसके ही समर्थन के लिए थे। अब तक जो प्रश्न थेउनमें अर्जुन ने चाहा था कि कृष्णवह जैसा हैवैसे ही अर्जुन के लिए कोई कंसोलेशनकोई सांत्वना बन जाएं।
अब यह पहला प्रश्न हैजिससे अर्जुन उस मोह को छोड़ता है कि मैं जैसा हूंवैसे के लिए सांत्वना हो। यह पहला प्रश्न है जिससे वह पूछता है कि चलोअब मैं उसको ही जानूंजैसे आदमी के लिए तुम कहते होजैसे आदमी को तुम चाहते हो। जिस मनुष्य के आस-पास तुम्हारे इशारे हैंअब मैं उसको ही जानने के लिए आतुर हूं। छोडूं उसेजो अब तक मैंने पकड़ रखा था।
इस प्रश्न से अर्जुन की वास्तविक जिज्ञासा शुरू होती है। अब तक अर्जुन जिज्ञासा नहीं कर रहा था। अब तक अर्जुन कृष्ण को ऐसी जगह नहीं रख रहा थाजहां से उनसे उसे कुछ सीखनाजानना है। अब तक अर्जुन कृष्ण का उपयोग एक जस्टीफिकेशनएक रेशनलाइजेशनएक युक्तियुक्त हो सके उसका अपना ही खयालउसके लिए कर रहा था।
इसे समझ लेना उचित हैतो आगे-आगे समझ और स्पष्ट हो सकेगी।
हम अक्सर जब प्रश्न पूछते हैंतो जरूरी नहीं कि वह प्रश्न जिज्ञासा से आता हो। सौ में निन्यानबे मौके पर प्रश्न जिज्ञासा से नहीं आता। सौ में निन्यानबे मौके पर प्रश्न सिर्फ किसी कनफर्मेशन के लिएकिसी दूसरे के प्रमाण को अपने साथ जोड़ लेने के लिए आता है।
बुद्ध एक दिन एक गांव में प्रविष्ट हुए। एक आदमी ने पूछाईश्वर हैबुद्ध ने कहानहींकहीं नहीं हैकभी नहीं थाकभी नहीं होगा। स्वभावतःवह आदमी कंप गया। कंप गया। उसने कहाक्या कहते हैं आपईश्वर नहीं हैबुद्ध ने कहाबिलकुल नहीं है। सब जगह खोज डालामैं कहता हूंनहीं है।
फिर दोपहर एक आदमी उस गांव में आया और उसने पूछा कि जहां तक मैं सोचता हूंईश्वर नहीं है। आपका क्या खयाल हैबुद्ध ने कहाईश्वर नहीं हैईश्वर ही है। उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। उस आदमी ने कहाक्या कहते हैं! मैं तो यह सोचकर आया कि बुद्ध नास्तिक हैं।
सांझ को एक और आदमी आया और उस आदमी ने बुद्ध से कहा कि मुझे कुछ भी पता नहीं है कि ईश्वर है या नहीं। आप क्या कहते हैंबुद्ध ने कहामैं भी कुछ न कहूंगा। मैं भी चुप रहूंगा। उसने कहा कि नहीं-नहींकुछ तो कहें! बुद्ध ने कहा कि मैं कुछ न कहूंगा।
इन तीन को तो छोड़ देंकठिनाई में पड़ गया बुद्ध का भिक्षु आनंद। वह तीनों समय साथ थासुबह भीदोपहर भी,सांझ भी। उसका कष्ट हम समझ सकते हैं। सोचा न था कभी कि बुद्ध और ऐसे इनकंसिस्टेंटइतने असंगत कि सुबह कुछदोपहर कुछसांझ कुछ। लेकिन कंसिस्टेंट सिर्फ बुद्धुओं के सिवाय और कोई भी नहीं हो सकते। सिर्फ बुद्धिहीन संगत हो सकते हैं। बुद्धिमान के उत्तर असंगत होंगे ही। क्योंकि हर उत्तर किसी को दिया गया हैकोई उत्तर सभी को नहीं दिया गया है।
आनंद ने बुद्ध से कहा कि मुझे परेशानी में डाल दिया। रात सोते समय मुझे नींद न आएगीपहले मेरा उत्तर दो! सही क्या हैइन तीनों में कौन-सी बात ठीक हैया कि चौथी बात ठीक है?
बुद्ध ने कहातुझे क्या मतलब! जिनसे मैंने बात की थीउनसे मतलब पूरा हो गया। तेरा न सवाल थान तेरे लिए जवाब है। तूने पूछा नहीं थातूने सुना क्योंउसने कहाऔर मजा करते हैं आप! मेरे पास कान हैंमैं बहरा नहीं हूं। मैं पास ही मौजूद था। सुनाई मुझे पड़ गया। तो बुद्ध ने कहाजो दूसरे के लिए कहा गया होउसे सुनना उचित नहीं है। तुझे क्या जरूरत थीपर उसने कहाजरूरत थी या नहींमुझे सुनाई पड़ गया और मैं बेचैन हूं। तीन उत्तर एक दिन में! आप कहना क्या चाहते हैं?
बुद्ध ने कहामैंने तीन उत्तर नहीं दिए। मैंने तो उत्तर एक ही दिया है कि मैं तुम्हें कन्फर्म न करूंगा। मैं तुम्हारी हां में हां न भरूंगा। मैंने तो उत्तर एक ही दिया है दिनभर। सुबह जो आदमी आया थावह चाहता था कि मैं कह दूं कि हां,ईश्वर हैताकि जिस ईश्वर को वह मानता हैउसको मेरा भी सहारा मिल जाए। ताकि वह आश्वस्त हो जाए कि चलो,मैं ठीक हूंबुद्ध भी यही कहते हैं। वह सिर्फ मेरा उपयोग करना चाहता था। वह मुझसे सीखने नहीं आया था। वह मुझसे जानने नहीं आया था। वह जानता ही थावह सीखा ही हुआ था। वह सिर्फ मेरा और साथ चाहता थावह सिर्फ एक सर्टिफिकेट और चाहता थाएक प्रमाणपत्र और चाहता था कि जो मैं कहता हूंवही बुद्ध भी कहते हैं! मैं ठीक हूं,क्योंकि बुद्ध भी यही कहते हैं! वह सिर्फ अपने अहंकार के लिए एक युक्ति और खोज रहा था। वह बुद्ध का भी अपने अहंकार के लिए शोषण कर रहा था।
दोपहर जो आदमी आया थावह नास्तिक था। वह भी आश्वस्त था कि उसे पक्का पता है। उसकी कोई जिज्ञासा न थी। जिन्हें पक्का पता हैउनकी कोई जिज्ञासा नहीं होती। जिन्हें पक्का ही पता हैउन्हें जिज्ञासा कैसे हो सकती है?और मजा यह है कि जिन्हें पक्का पता हैवे भी जिज्ञासा करते हैं। तब उनका पक्का पता बहुत कच्चे पते पर खड़ा है। पर वह कच्चा पता बहुत नीचे है। पक्का ऊपर हैकच्चा नीचे है। इसलिए वह कच्चा उनको धक्के देता रहता है कि और पक्का कर लोऔर पक्का कर लो। पक्का नहीं हैपता कुछ भी नहीं हैलेकिन भ्रम है कि पता है।
अर्जुन अभी ऐसे बोलता रहाइस प्रश्न के पहले तकजैसे उसे पता है कि क्या ठीक हैक्या गलत है! चाहता था इतना कि कृष्ण और हामी भर देंगवाह बन जाएंतो कल वह जगत को कह सके कि मैं ही नहीं भागा थाकृष्ण ने भी कहा था। मैंने ही युद्ध नहीं छोड़ा थाकृष्ण से पूछो! रिस्पांसिबिलिटी बांटना चाहता थादायित्व बांटना चाहता था।
ध्यान रहेजो दायित्व बांटना चाहता हैउसके भीतर कंपन है। पक्का उसको भी नहीं हैइसीलिए तो दूसरे का सहारा चाहता है। लेकिन यह बताना भी नहीं चाहता कि मुझे पता नहीं है। यह अहंकार भी नहीं छोड़ना चाहता कि मुझे पता नहीं है।
अर्जुन पूरे समय ऐसे बोल रहा है कि जैसे उसे भलीभांति पता है। धर्म क्या हैअधर्म क्या है! श्रेयस क्या हैअश्रेयस क्या है! जगत का किससे लाभ होगाकिससे नहीं होगा! मरेगा कोईनहीं मरेगा! सब उसे पता है। पता बिलकुल नहीं हैलेकिन अहंकार कहता हैपता है। इसी अहंकार में वह एक टेक कृष्ण की भी लगवा लेना चाहता था। तुम भी बन जाओ उस लंगड़े की बैसाखीयही वह चाहता था।
कृष्ण जैसे लोग किसी की बैसाखी नहीं बनते। क्योंकि किसी लंगड़े की बैसाखी बननाउसको लंगड़ा बनाए रखने के लिए व्यवस्था है। कृष्ण जैसे लोग तो सब बैसाखियां छीन लेते हैं। वे लंगड़े को पैर देना चाहते हैंबैसाखी नहीं देना चाहते। इसलिए कृष्ण ने अभी इस बीच उसकी सब बैसाखियां छीन लींजो उसके पास थींवे भी।
अब वह पहली दफापहली बार कृष्ण से जिज्ञासा कर रहा हैजिसमें अपने लिए समर्थन नहीं मांग रहा है। अब वह उन्हीं से पूछ रहा है कि समाधिस्थ कौन है कृष्णकिसे हम कहते हैं कि उसकी प्रज्ञा ठहर गईऔर जब किसी की प्रज्ञा ठहर जाती हैतो उसका आचरण क्या हैऔर जब किसी के अंतस में ज्योति ठहर जाती हैतो उसके बाहर के आचरण पर क्या परिणाम होते हैंमुझे उस संबंध में बताएं। अब वह पहली बार हंबल हैपहली बार विनीत है।
और जहां विनय हैवहीं जिज्ञासा है। और जहां विनय हैवहां ज्ञान का द्वार खुलता है। जहां अपने अज्ञान का बोध है,वहीं से मनुष्य ज्ञान की तरफ यात्रा शुरू करता है। इस वचन में कृष्ण ज्ञानी और अर्जुन अज्ञानीऐसी अर्जुन की प्रतीति पहली बार स्पष्ट है। इसके पहले अर्जुन भी ज्ञानी है। कृष्ण भी होंगेनंबर दो के। नंबर एक वह खुद था अब तक। बड़ा कठिन हैदूसरे आदमी को नंबर एक रखना बड़ा कठिन है।
मैंने सुना हैगांधी गोलमेज-कांफ्रेंस के लिए गए लंदन। तो उनका एक भक्त बर्नार्ड शा को मिलने गया। और बर्नार्ड शा को कहा उस भक्त ने कि गांधी जी को आप महात्मा मानते हैं या नहीं?
भक्तों को बड़ी चिंता होती है कि उनके महात्मा को कोई दूसरा महात्मा मानता है कि नहीं! खुद ही संदेह होता है भीतरइसलिए दूसरे से भी पक्की गारंटी करवाना चाहते हैं। अब बर्नार्ड शा से पूछने जाने की क्या जरूरत है भक्त कोइसको खुद ही शक रहा होगा। सोचाचलोबर्नार्ड शा से पूछ लें। और सोचा होगा यह भी कि शिष्टाचारवश भी कम से कम बर्नार्ड शा कुछ ऐसा तो कह नहीं सकता कि नहीं हैं।
लेकिन बर्नार्ड शा जैसे लोग शिष्टाचार नहीं पालतेसत्याचार पालते हैं। और सत्याचार बड़ी और बात है। और शिष्टाचार तो सब दिखावा है। बर्नार्ड शा ने कहामहात्मा हैं तुम्हारे गांधीबिलकुल हैंलेकिन नंबर दो के हैं। भक्त ने कहानंबर दो केनंबर एक का महात्मा कौन हैबर्नार्ड शा ने कहामैं! बर्नार्ड शा ने कहामैं झूठ न बोल सकूंगा। मैं अपने से ऊपर किसी को रख ही नहीं सकता हूं। ऐसी मेरी स्पष्ट प्रतीति है।
भक्त तो बहुत घबड़ा गया कि कैसा अहंकारी आदमी है! लेकिन बर्नार्ड शा बड़ा ईमानदार आदमी है। नंबर एक कोई भी अपने को रखता है। वह जो कहता हैचरणों की धूल हूंवह भी नंबर एक ही रखता है अपने को। यह चरणों की धूल वगैरह सब शिष्टाचार है।
बर्नार्ड शा ने कहासचाई यह है कि ज्यादा से ज्यादा नंबर दो रख सकता हूं तुम्हारे महात्मा को। नंबर एक तो तय ही है। उसकी कोई बात ही मत करो। उसमें कोई शक-शुबहा नहीं है मुझे। मैं नंबर एक हूं।
व्यंग्य कर रहा था गहरा पूरी मनुष्य जाति पर। और कभी-कभी ऐसा होता है कि बहुत बुद्धिमान जो नहीं कह पाते,वह व्यंग्य करने वाले कह जाते हैं।
अरबी में एक कहावत है कि परमात्मा जब भी किसी आदमी को बनाता हैतो दुनिया में धक्का देने के पहले उसके कान में एक मजाक कर देता है। उससे कह देता हैतुझसे अच्छा आदमी कभी भी नहीं बनाया। बस उस मजाक में सभी आदमी जीते हैं। जिंदगीभर कान में वह गूंजती रहती है परमात्मा की बात कि मुझसे अच्छा कोई भी नहीं! मगर वह दिल में ही रखनी पड़ती हैक्योंकि बाकी को भी यही कह दिया है उसने। उसको अगर जोर से कहिएतो झगड़े के सिवाय कुछ हो नहीं सकता। इसलिए मन में अपने-अपने हर आदमी समझता है। दूसरे से शिष्टाचार की बातें करता है,मन में सत्य को जानता हैकि सत्य मुझे पता है।
अभी जो भी प्रश्न पूछे जा रहे थे कृष्ण सेकृष्ण भी समझते हैं कि उनमें अर्जुन अभी तक नंबर एक है। इस पूरे बीच उसके नंबर एक को गिराने की उन्होंने सब तरफ से कोशिश की है। और उसको चाहा है कि वह समझे कि स्थिति क्या है! व्यर्थ ही अपने को नंबर एक न माने। क्योंकि नंबर एक को केवल वही उपलब्ध होता हैजिसको अपने नंबर एक होने का कोई पता नहीं रह जाता। वह हो जाता है। जिसको पता रहता हैवह कभी नहीं हो पाता। पहली दफे अर्जुन विनम्र हुआ है। अब उसकी हंबल इंक्वायरी शुरू होती है। अब वह पूछता है कि बताओ कृष्ण! और इस पूछने में बड़ी विनम्रता है।


प्रश्न: भगवान श्रीजैसा कि आपने बतायास्थितप्रज्ञता एक आंतरिक घटना है। और स्थितप्रज्ञ पुरुष जो जीवन जीता हैवह कोई पैटर्न में तो जीता नहीं हैकोई निश्चित पैटर्न बनाकर नहीं जीता है। जैसे कि बुद्ध के तीनों उत्तर अलग रहे। तो बाहर से भी हम कैसे निश्चित कर पाएं कि वह स्थितप्रज्ञ है?


ठीक पूछते हैं। जिस व्यक्ति के भीतर जीवन में सत्य की किरणें फैल जाती हैंसत्य का सूर्य जगता हैऔर जिसकी आंतरिक चेतना जागृति कोपूर्ण जागृति को उपलब्ध हो जाती हैउसका जीवन स्पांटेनियस हो जाता हैसहज हो जाता हैसहज-स्फूर्त हो जाता है। उसके जीवन में किसी पैटर्न कोकिसी ढांचे को खोजना मुश्किल है। उसके जीवन में कोई बंधी-बंधाई रेखाएं नहीं होतीं। उस व्यक्ति का जीवन रेल की पटरियों पर दौड़ता हुआ जीवन नहीं होतागंगा की तरह भागता हुआस्वतंत्रता से भरा जीवन होता है। वहां कोई रेल की पटरियां नहीं होतीं बंधी हुईकि जिन पर ही चलता है वैसा व्यक्ति।
लेकिन फिर भी कुछ बातें कही जा सकती हैं। क्योंकि उसके नो-पैटर्न में भी एक बहुत गहरा पैटर्न होता है। उसके न-ढांचे में भीउसके ढांचे के अभाव में भीएक गहरी आंतरिक व्यवस्था होती हैएक इनर डिसिप्लिन होती है। ऊपर तो कोई ढांचा नहीं होता।
अब जैसे इतना तो कहा ही जा सकता है कि उसका जीवन सहज-स्फूर्त होता हैस्पांटेनियस होता है। यह भी सूचना हो गई। यह भी सूचना हो गई। बुद्ध सुबह कुछ कहते हैंदोपहर कुछ कहते हैंसांझ कुछ कहते हैं। पैटर्न नहीं हैफिर भी पैटर्न है। ढांचा नहीं है। सुबह जो कहा थावही दोपहर नहीं दोहराया।
बुद्ध जैसे व्यक्ति मरकर नहीं जीते हैंजीकर ही जीते हैं। सुबह जो कहा थाउसको सिर्फ वही दोहराएगाजो दोपहर तक मरा हुआ है। जो दोपहर तक जीया हैवह फिर से उत्तर देगाफिर रिस्पांड करेगा। उसका उत्तर सदा नया होगा। नए का मतलब यह है कि वह पुराने उत्तर को दोहराएगा नहीं। आप पूछेंगेफिर उत्तर उसमें प्रतिध्वनित होगा। वह जो भी हो!
लेकिन इन तीन अलग-अलग घटनाओं मेंइन तीन असंगतियों मेंइस इनकंसिस्टेंसी में भी एक भीतरी कंसिस्टेंसी है। सुबह भी बुद्ध सहज उत्तर देते हैंदोपहर भीसांझ भी। सुबह भी देख लेते हैं कि वह आदमी सिर्फ प्रमाण चाह रहा है,दोपहर भी देख लेते हैं कि प्रमाण चाह रहा हैसांझ भी देख लेते हैं कि प्रमाण चाह रहा है। सुबह भी उसे डगमगा देते,दोपहर भी डगमगा देतेसांझ भी डगमगा देते।
बुद्ध के ऊपर कोई मृत ढांचा नहीं हैलेकिन एक जीवंत धारा है। पर उस जीवंत-धारा के संबंध में कुछ इशारे किए जा सकते हैं। जैसे एक इशारा यही किया जा सकता है कि स्थितप्रज्ञ का जीवन सहज-स्फूर्ततत्क्षण-स्फूर्तस्पांटेनियस है। इसलिए दो स्थितप्रज्ञ के जीवनों को ऊपर से बिलकुल अलग-अलग होते हुए भीभीतर की एकता को जांचा जा सकता हैपहचाना जा सकता है।
जैसा मैंने पीछे कहातो कई मित्रों ने मुझे पूछा कि ऐसा कैसे हो सकता है! मैंने कहा कि महावीर और बुद्ध एक बार एक ही गांव में एक ही धर्मशाला में ठहरे। अब एक ही धर्मशाला में दो स्थितप्रज्ञ--ऐसा कम होता है। एक ही बार पृथ्वी पर दो स्थितप्रज्ञ मुश्किल से होते हैं। एक ही धर्मशाला मेंएक ही गांव में--बहुत रेयर फिनामिननबड़ी अदभुत घटना है। तो मुझसे मित्रों ने पूछा कि क्या इतने अहंकारी रहे होंगे कि मिले नहीं?
हमको ऐसा ही सूझता है एकदम से। क्योंकि हम जब नहीं मिलते किसी सेतो सिर्फ अहंकार के कारण नहीं मिलते। और हमारे पास कोई कारण नहीं होता। क्यों मिलें हमलेकिन हमको यह पता ही नहीं होता कि अहंकार न बचा हो,तो मिलना कैसे हो सकता है। क्योंकि मिलने वाला भी अहंकार हैन मिलने वाला भी अहंकार है। हमें खयाल में नहीं आती वह बात।
मिले कौनहोना तो चाहिए न कोई--मिलने के लिए भीन मिलने के लिए भी। बुद्ध हैं कहां! महावीर हैं कहां! किससे मिलना हैकोई पराया बचा हैजिससे मिलना हैबुद्ध अगर बचे होतेतो चले जाते महावीर से मिलनेया इनकार करते मिलने से।
यह बड़े मजे की बात है कि न मिलेन इनकार किया मिलने से। वह हुआ ही नहींबसइट डिडन्ट हैपेन--बसयह हुआ ही नहीं। इसका कोई उपाय ही नहीं है। क्योंकि कौन मिलेकिससे मिलेमिलने के लिए भी अहंकार चाहिए। और फिर किसलिए मिलेकोई कारण चाहिए।
हांअगर अहंकार होतातो शायद एक ही धर्मशाला में ठहरने से भी इनकार कर देते। कहते कि वहां हम नहीं ठहरते। ठहर गए। अगर कोई पकड़कर ले जातातो चले जाते। रुकते भी नहींरोकते भी नहीं कि नहीं जाते। कोई पकड़कर नहीं ले गया। किसी ने दोनों को खींचा नहीं।
असल में दोनों के आस-पास अहंकारियों का इतना बड़ा जाल रहा होगा कि उसने दीवार का काम किया होगा। दोनों के आस-पास अहंकारियों का इतना जाल रहा होगा कि उसने सख्त प्राचीर का काम किया होगा। अगर कोशिश भी चली होगीतो भक्तों ने न चलने दी होगी--मिलने की। ऐसा कैसे हो सकता है! अगर बुद्ध के भक्तों ने महावीर के भक्तों से कहा होगा कि मिलाने महावीर को ले आओतो उन्होंने कहा होगाहम ले आएंतुम ले आओ अपने बुद्ध को,मिलाना हो तो। उन्होंने कहा होगायह कैसे हो सकता है कि बुद्ध को हम लेकर आएं! बुद्ध नहीं आ सकते। मगर यह बातचीत भक्तों में चली होगी। यह उनमें चली होगीजो चारों तरफ घेरकर खड़े हैं। वे सदा खड़े हैं।
इस दुनिया में बुद्धमहावीरकृष्ण और मोहम्मद और ईसा के बीच कोई दीवार नहीं हैदीवार हैभक्तों के कारणवे जो घेरकर खड़े हैं। भयंकर दीवार है। हांबुद्ध अगर तोड़ना चाहतेतो दीवार को तोड़ सकते थे। लेकिन तोड़ने का भी कोई कारण नहीं है। महावीर अगर चाहते कि मिलना हैतो मिल सकते थे। लेकिन महावीर और बुद्ध चाह से नहीं जीतेएकदम डिजायरलेसअचाह से जीते हैं। मिलना हो जातातो हो जाता। नहीं हुआतो नहीं हुआ। राह पर चलते मिल जातेतो मिल जाते। नहीं मिलेतो नहीं मिले। मगर दोनों बिलकुल एक जैसे हैं। दोनों बिलकुल एक जैसे हैं।
एक और मित्र ने इस संबंध में मुझे चिट्ठी लिखकर भेजी है कि आप कहते हैं कि महावीर और बुद्ध जो कहते हैंवह बिलकुल एक है। तो क्या बुद्ध और महावीर को दिखाई नहीं पड़ा यह कि एक है?
बिलकुल दिखाई पड़ता था। बिलकुल दिखाई पड़ता था। तो उन्होंने पूछा है कि अगर दिखाई पड़ता थातो उन्होंने कह क्यों नहीं दिया कि एक है!
उन्होंने नहीं कहाआप पर कृपा करके। क्योंकि अगर बुद्ध और महावीर कह दें कि बिलकुल एक हैतो आप सिर्फ कनफ्यूज्ड होंगे और कुछ भी नहीं हो सकताआप सिर्फ विभ्रमित होंगेऔर कुछ भी नहीं हो सकता।
इसलिए महावीर कहे चले जाते हैं कि जो मैं कह रहा हूंवही ठीक है। जो बुद्ध...बेकार है। यह जो मैं कह रहा हूंयही ठीक है। आप इतने कमजोर चित्त हैं कि अगर महावीर इतने अतिशय से न बोलेंतो आपके चित्त पर कोई परिणाम ही होने वाला नहीं है। क्योंकि आप इतने कमजोर हैं कि अगर महावीर को आप देखें कि वह कहेंयह भी ठीकवह भी ठीकयह भी ठीकवह भी ठीकसभी ठीकतो आप भाग खड़े होंगे। आप तो खुद ही कमजोर हैं। आप तो चले ही जाएंगे कि जब सभी ठीक हैतो फिर ठीक हैहम भी ठीक हैं। आप उससे जो निष्कर्ष निकालेंगेवह यह कि फिर हम भी ठीक! फिर हम जाते हैं।
अगर महावीर को ज्ञानियों के बीच में बोलना पड़ेतो महावीर कहेंगेसभी ठीक। अगर बुद्ध को ज्ञानियों के बीच में बोलना पड़ेबुद्ध कहेंगेसभी ठीक। अगर ज्ञानियों के बीच में बोलना पड़ेतो बुद्ध बोलेंगे ही नहींमहावीर बोलेंगे ही नहीं। इतना भी नहीं कहेंगे कि सभी ठीक। लेकिन बोलना पड़ता है अज्ञानियों के बीच में।
ये बुद्ध और महावीर की पीड़ा आपको पता नहीं है। बोलना पड़ता है उनके बीच मेंजिन्हें कुछ भी पता नहीं है। उनके लिए इस तरह के एब्सोल्यूट स्टेटमेंटइस तरह के निरपेक्ष वचन कि सभी ठीकसिर्फ व्यर्थ होंगेअर्थहीन होंगे। उनके लिए कहना पड़ता हैयही ठीक। और इतने जोर से कहना पड़ता है कि महावीर के व्यक्तित्व का वजन और गरिमा और महिमाउस यही ठीक के बीच जुड़ जाएतो शायद आप दो कदम उठाएं।
हांमहावीर भलीभांति जानते हैं कि जिस दिन आप पहुंचेंगेजान लेंगेसभी ठीक। लेकिन वह उस दिन के लिए छोड़ दिया जाता है। उसके लिए कोई अभी चिंता करने की जरूरत नहीं है।
पहाड़ पर आप चल रहे हैं। मैं अपने रास्ते को कहता हूंयही ठीक। आप कहते हैंउस रास्ते के बाबत क्या खयाल है,वह जो वहां से जा रहा हैमैं कहता हूंबिलकुल गलत! जब मैं कहता हूंबिलकुल गलततो मेरा मतलब यह नहीं होता कि वह बिलकुल गलत। मैं भलीभांति जानता हूंउससे भी लोग पहुंचे हैं। लेकिन हजार रास्ते जा रहे हैं पहाड़ पर। और आप चल सकते हैं सिर्फ एक परहजार पर नहीं। और अगर आपको हजार ही ठीक दिखाई पड़ जाएंतो संभावना यह नहीं है कि आप हजार पर चलेंसंभावना यही है कि आप एक पर भी न चलें। दो कदम एक पर चलें,फिर दो कदम दूसरे पर चलेंफिर दो कदम तीसरे पर चलें। जैसा आपका चित्त है डांवाडोलवह रास्ते बदलता रहे और आप पहाड़ के नीचे ही भटकते रहें।
हजार रास्ते भी पहुंच जाते हैं पहाड़ परलेकिन हजार रास्तों से चलकर कोई भी नहीं पहुंचता। अनंत रास्ते पहुंचते हैं परमात्मा तकलेकिन अनंत रास्तों से कोई भी नहीं पहुंचता। पहुंचने वाले सदा एक ही रास्ते से पहुंचते हैं।
तो महावीर जिस रास्ते पर खड़े हैंउचित है कि वे कहेंइसी रास्ते से पहुंच जाओगेआ जाओ। और जरूरी है कि आपको इस रास्ते पर चलने के लिए भरोसा और निष्ठा आ सकेवे कहें कि बाकी कोई रास्ता नहीं पहुंचाता है।
महावीर को आपकी वजह से भी असत्य बोलने पड़ते हैं। और बुद्ध को भी आपकी वजह से असत्य बोलने पड़ते हैं। मनुष्य के ऊपर जो अनुकंपा है ज्ञानियों कीउसकी वजह से उन्हें ढेर असत्य बोलने पड़ते हैं। लेकिन इस भरोसे में वे असत्य बोले जाते हैं कि आप एक से भी चढ़कर जब शिखर पर पहुंच जाएंगेतब आप खुद ही देख लेंगे कि सभी रास्ते यहीं ले आए हैं।
अब जैसे पूछा है कि क्या ढांचा होगाढांचा कोई नहीं होगा। लेकिन जैसे यह बात: कृष्ण भी कहेंगे कि इस रास्ते से चलोबुद्ध भी कहेंगे कि इस रास्ते से चलोमहावीर भी कहेंगे कि इस रास्ते से चलोशंकर भी कहेंगे कि इस रास्ते से चलो। और अगर झंझट बनी और शंकर से किसी ने पूछाबुद्ध के रास्ते के बाबत क्या खयाल हैतो वे कहेंगे,बिलकुल गलत। और बुद्ध से अगर किसी ने पूछा कि महावीर के रास्ते के बाबत क्या खयाल हैतो बुद्ध कहेंगे,बिलकुल गलत। और महावीर से किसी ने पूछा कि बुद्ध के रास्ते के बाबत क्या खयाल हैतो महावीर कहेंगे,भटकना हो तो बिलकुल ठीक। इस मामले में तो बिलकुल एक ही बात होगी।
यह जो...ऊपर से ढांचे नहीं दिखाई पड़ेंगेलेकिन अगर बहुत गहरे में खोज-बीन कीतो बहुत जीवंत पैटर्नलिविंग पैटर्न होंगे। पैटर्न भी डेड और लिविंग हो सकते हैं।
एक चित्रकार एक चित्र बनाता हैवह डेड होता है। लेकिन एक चित्र प्रकृति बनाती हैवह लिविंग होता है। एक चित्रकार भी एक वृक्ष बनाता हैलेकिन वह मरा होता है। एक वृक्ष प्रकृति भी बनाती हैलेकिन वह जीवंत होता है। वह प्रतिपल बदल रहा है। कुछ पत्ते गिर रहेकुछ आ रहेकुछ जा रहेकुछ फूट रहेहवाएं हिला रही हैं।
एक सूर्य सुबह उगता हैऔर एक वानगाग भी सूर्योदय का चित्र बनाता है। लेकिन वानगाग के सूर्योदय का चित्र ठहरा हुआ हैस्टैटिकस्टैगनेंट है। सुबह का सूरज कभी नहीं ठहरता हैउगता ही चला जाता हैकहीं नहीं ठहरता। इतना उगता चला जाता है कि डूब जाता हैएक क्षण नहीं ठहरता है।
जिंदगी में जो पैटर्न हैंवे सब जीवित हैं। वे ऐसे ही हैं जैसे किसी वृक्ष के नीचे खड़े हो जाएं। पत्तों से छनकर धूप की किरणें आती हैं। वृक्ष में हवाएं दौड़ती हैंनीचे छाया और धूप का एक जाल बन जाता है। वह प्रतिपल कंपता रहता है,बदलता रहता है--प्रतिपल।
स्थितप्रज्ञ की प्रज्ञा तो स्थिर होती हैलेकिन उसके जीवन का पैटर्न बिलकुल जीवंत होता हैवह प्रतिपल बदलता रहता है।
कृष्ण से ज्यादा बदलता हुआ व्यक्ति खोजना मुश्किल है। नहीं तो हम सोच ही नहीं सकते कि एक ही आदमी बांसुरी भी बजाए और एक ही आदमी सुदर्शन चक्र लेकर भी खड़ा हो जाए। और एक ही आदमी गोपियों के साथ नाचे भी,और इतना कोमलऔर वही आदमी युद्ध के लिए इतना सख्त हो जाए। और वही आदमी नदी में स्नान करती स्त्रियों के कपड़े लेकर वृक्ष पर चढ़ जाएऔर वही आदमी नग्न होती द्रौपदी के लिए वस्त्र बढ़ाता रहेबढ़ा दे। यह एक ही आदमी इतने बदलता पैटर्न!
जिन्होंने कृष्ण को गोपियों के वस्त्र उठाकर वृक्ष पर बैठते देखा होगाक्या वे सोच सकते थे कभी कि किसी नग्न होती स्त्री के यह वस्त्र बढ़ाएगायह आदमी! भूलकर ऐसा नहीं सोच सकते थे। कोई सोच सकता था कि यह आदमीजो मोर के पंख बांधकर और स्त्रियों के बीच नाचता हैयह आदमी कभी युद्ध के लिए जगत की सबसे मुखर वाणी बन जाएगाकोई सोच भी नहीं सकता था। मोर के पंखों से और युद्धों का कोई संबंध हैकोई संगति है?
लेकिन यह मृत आदमी नहीं हैमोर के पंख इसे बांधते नहीं। यह मृत आदमी नहीं हैबांसुरी की धुन इसे बांधती नहीं। यह मृत आदमी नहीं हैयह जीवित आदमी है।
और जीवित आदमी का मतलब ही हैरिस्पांसिव। जगत जो भी स्थिति ला देगाउसमें उत्तर देगा और उत्तर रेडीमेड नहीं होंगे। स्थितप्रज्ञ के उत्तर कभी भी रेडीमेड नहीं हैंतैयार नहीं हैं। उन पर सैमसन की सील नहीं होतीवे रेडीमेड कपड़े नहीं हैं। बने-बनाए नहीं हैं कि बस कोई भी पहन ले। वह प्रतिपलप्रतिपल जीवन को दिए गए उत्तर सेप्रतिपल जीवन के प्रति हुई संवेदना सेसब कुछ निकलता है। इसलिए एक अनुशासन नहीं है ऊपरलेकिन भीतर एक गहरा अनुशासन है।
और एक बात और। जिनके जीवन में ऊपर अनुशासन होता हैउनके जीवन में ऊपर अनुशासन इसलिए होता है कि उन्हें इनर डिसिप्लिन का भरोसा नहीं है। उनके भीतर कोई डिसिप्लिन नहीं है। जिन्हें भीतर के अनुशासन का कोई भरोसा नहीं हैवे ऊपर से अनुशासन बांधकर चलते हैं। लेकिन जिनके भीतर के अनुशासन का जिन्हें भरोसा हैवे ऊपर से बिलकुल स्वतंत्र होकर चलते हैं। कोई डर ही नहीं है। कोई डर ही नहीं है। वे तैयार होकर नहीं जीतेवे जीते हैंक्योंकि वे तैयार हैं। जो भी स्थिति आएगीउसमें उत्तर उनसे आएगा। उस उत्तर के लिए पहले से तैयार होने की कोई भी जरूरत नहीं है।


श्री भगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।। ५५।।
उसके उपरांत श्री कृष्ण भगवान बोले: हे अर्जुनजिस काल में यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता हैउस काल में आत्मा से ही आत्मा में संतुष्ट हुआ,
स्थिर प्रज्ञा वाला कहा जाता है।


स्वरूप से संतुष्ट--टु बी कंटेंट विद वनसेल्फ--इसे पहला स्थितप्रज्ञ का लक्षण कृष्ण कहते हैं। हम कभी भी स्वयं से संतुष्ट नहीं हैं। अगर हमारा कोई भी लक्षण कहा जा सकेतो वह हैस्वयं से असंतुष्ट। हमारे जीवन की पूरी धारा ही स्वयं से असंतुष्ट होने की धारा है। अकेले में हमें कोई छोड़ देतो अच्छा नहीं लगताक्योंकि अकेले में हम अपने ही साथ रह जाते हैं। हमें कोई दूसरा चाहिएकंपनी चाहिएसाथ चाहिए। तभी हमें अच्छा लगता हैजब कोई और हो।
और बड़े मजे की बात है कि दो आदमियों को साथ होकर अच्छा लगता है और इन दोनों आदमियों को ही अकेले में बुरा लगता है। जो अपने साथ ही आनंदित नहीं हैवह दूसरे को आनंद दे पाएगाऔर जो अपने को भी इस योग्य नहीं मानता कि खुद को आनंद दे पाएवह दूसरे को आनंद कैसे दे पा सकता हैकरीब-करीब हमारी हालत ऐसी है कि जैसे भिखारी रास्ते पर मिल जाएं और एक-दूसरे के सामने भिक्षा-पात्र फैला दें। दोनों भिखारी!
मैंने सुना हैएक गांव में दो ज्योतिषी रहते थे। सुबह दोनों निकलते थेतो एक-दूसरे को अपना हाथ दिखा देते थे कि आज कैसा धंधा चलेगा!
हम सब स्वयं से बिलकुल राजी नहीं हैं। एक क्षण अकेलापन भारी हो जाता है। जितना हम अपने से ऊब जाते हैं,उतना हम किसी से नहीं ऊबते। रेडियो खोलोअखबार उठाओमित्र के पास जाओहोटल में जाओसिनेमा में जाओ,नाच देखोमंदिर में जाओ--कहीं न कहीं जाओअपने साथ मत रहो। अपने साथ बड़ा...।
कृष्ण पहला सूत्र देते हैंस्वयं से संतुष्टस्वयं से तृप्त। स्वभावतःजो अपने से तृप्त नहीं हैउसकी चेतना सदा दूसरे की तरफ बहती रहेगीउसकी चेतना सदा दूसरे की तरफ कंपती रहेगी। असल में जहां हमारा संतोष हैवहीं हमारी चेतना की ज्योति ढल जाती है। मिलता है वहां या नहींयह दूसरी बात है। लेकिन जहां हमें संतोष दिखाई पड़ता है,हमारे प्राणों की धारा उसी तरफ बहने लगती है।
तो हम चौबीस घंटे बहते रहते हैं यहां-वहां। एक जगह को छोड़कर--अपने में होने को छोड़कर--हमारा होना सब तरफ डांवाडोल होता है। फिर जिसके पास भी बैठ जाते हैंथोड़ी देर में वह भी उबा देता है। मित्र से भी ऊब जाते हैंप्रेमी से भी ऊब जाते हैंक्लब से भी ऊब जाते हैंखेल से भी ऊब जाते हैंताश से भी ऊब जाते हैं। तो फिर विषय बदलने पड़ते हैं। फिर दौड़ शुरू होती है--जल्दी बदलो--नए सेंसेशन कीनई संवेदना की। सब पुराना पड़ता जाता है--नया लाओ,नया लाओनया लाओ। उसमें हम दौड़ते चले जाते हैं।
लेकिन कभी यह नहीं देखते कि जब मैं अपने से ही असंतुष्ट हूंतो मैं कहां संतुष्ट हो सकूंगाजब मैं भीतर ही बीमार हूंतो मैं किसी के भी साथ होकर कैसे स्वस्थ हो सकूंगाजब दुख मेरे भीतर ही हैतब किसी और का सुख मुझे कैसे भर पाएगा?
हांथोड़ी देर के लिए धोखा हो सकता है। लोग मरघट ले जाते हैं किसी कोकंधे पर रखकर उसकी अर्थी कोतो रास्ते में कंधा बदल लेते हैं। एक कंधा दुखने लगता हैतो दूसरे कंधे पर अर्थी कर लेते हैं। लेकिन अर्थी का वजन कम होता हैनहींदुखा हुआ कंधा थोड़ी राहत पा लेता है। नए कंधे पर थोड़ी देर भ्रम होता है कि ठीक है। फिर दूसरा कंधा दुखने लगता है। सिर्फ वजन के ट्रांसफर से कुछ अंतर पड़ता हैनहीं कोई अंतर पड़ता। अपने पर वजन हैतो कंधे बदलने से कुछ न होगा। और भीतर दुख हैतो साथी बदलने से कुछ न होगा। और भीतर दुख हैतो जगह बदलने से कुछ न होगा।
दूसरे में संतोष खोजना ही प्रज्ञा की अस्थिरता हैस्वयं में संतोष पा लेना ही प्रज्ञा की स्थिरता है। लेकिन स्वयं में संतोष वही पा सकता हैजो--दूसरे में संतोष नहीं मिलता है--इस सत्य को अनुभव करता है। जब तक यह भ्रम बना रहता है कि मिल जाएगा--इसमें नहीं मिलता तो दूसरे में मिल जाएगादूसरे में नहीं मिलता तो तीसरे में मिल जाएगा--जब तक यह भ्रम बना रहेगातब तक जन्मों-जन्मों तक प्रज्ञा अस्थिर रहेगी। जब तक यह इलूजनजब तक यह भ्रम पीछा करेगा कि कोई बात नहींइस स्त्री में सुख नहीं मिलादूसरी में मिल सकता हैइस पुरुष में सुख नहीं मिलादूसरे में मिल सकता हैइस मकान में सुख नहीं मिलादूसरे में मिल सकता हैइस कार में सुख नहीं मिला,दूसरी कार में मिल सकता है--जब तक यह भ्रम बना रहेगा कि बदलाहट में मिल सकता हैतब तक प्रज्ञा डोलती ही रहेगीकंपित होती ही रहेगी। यह विषयों की आकांक्षायह भ्रामक दूर के ढोल का सुहावनापनयह चित्त को कंपाता ही रहेगा।
लेकिन आदमी बहुत अदभुत है। अगर उसका सबसे अदभुत कोई रहस्य हैतो वह यही है कि वह अपने को धोखा देने में अनंत रूप से समर्थ है। इनफिनिट उसकी सामर्थ्य है धोखा देने की। एक चीज से धोखा टूट जाएटूट ही नहीं पाता कि उसके पहले वह अपने धोखे का दूसरा इंतजाम कर लेता है।
बर्नार्ड शा ने कहीं कहा हैकि कैसा मजेदार है मन! एक जगह भ्रम के तंबू उखड़ नहीं पाते कि मन तत्काल दूसरी जगह खूंटियां गाड़कर इंतजाम शुरू कर देता है। सच तो यह है कि मन इतना होशियार है कि इसके पहले कि एक जगह से तंबू उखड़ेंवह दूसरी जगह खूंटियां गाड़ चुका होता है।
और हम सब इसको समझ लेते हैं। अगर पत्नी देखती है कि पति थोड़ी कम उत्सुकता ले रहा हैतो वह किसी बहुत गहरे इंसटिंक्टिव आधार पर समझ जाती है कि खूंटियां किसी और स्त्री पर गड़नी शुरू हो गई होंगी। तत्काल! तत्काल कोई उसे गहरे में बता जाता हैकहीं खूंटियां और गड़नी शुरू हो गई हैं। और सौ में निन्यानबे मौके पर बात सही होती है। सही इसलिए होती है कि सौ में निन्यानबे मौके पर आदमी स्थितप्रज्ञ नहीं हो जाता। और मन बिना खूंटियां गाड़े जी नहीं सकता।
हांएक मौके पर गलत होती है। कभी किसी बुद्ध के मौके पर गलत हो जाती है। यशोधरा ने भी सोची होगी पहली बात तो यही कि कुछ गड़बड़ है। जरूर कोई दूसरी स्त्री बीच में आ गईअन्यथा भाग कैसे सकते थे!
इसलिए बुद्ध जब बारह साल बाद घर लौटेतो यशोधरा बहुत नाराज थीबड़ी क्रुद्ध थी। क्योंकि वह यह सोच ही नहीं सकती कि मन ने कहीं खूंटियां ही न गाड़ी होंखूंटियां ही उखाड़ दी हों सब तरफ से। और फिर भी बड़े मजे की बात है कि एक स्त्री को इसमें ही ज्यादा सुख मिलेगा कि कोई किसी दूसरी स्त्री पर खूंटियां गाड़ ले। इसमें ही ज्यादा पीड़ा होगी कि अब खूंटियां गाड़ी ही नहीं हैं। क्योंकि यह बिलकुल समझ के बाहर मामला हो जाता है।
कृष्ण से अर्जुन ने जो बात पूछी हैउसके लिए पहला उत्तर बहुत ही गहरा हैमौलिक हैआधारभूत है। जब तक चित्त सोचता है कि कहीं और सुख मिल सकता हैतब तक चित्त स्वयं से असंतुष्ट है। जब तक चित्त स्वयं से असंतुष्ट है,तब तक दूसरे की आकांक्षादूसरे की अभीप्सा उसकी चेतना को कंपित करती रहेगीदूसरा उसे खींचता रहेगा। और उसके दीए की लौ दूसरे की तरफ दौड़ती रहेगीतो थिर नहीं हो सकती। जैसे ही--दूसरे में सुख नहीं है--इसका बोध स्पष्ट हो जाता हैजैसे ही दूसरे पर खूंटियां गाड़ना मन बंद कर देता हैवैसे ही सहज चेतना अपने में थिर हो जाती है। स्थिरधी की घटना घट जाती है।
बायरन ने शादी की। मुश्किल से शादी की। कोई साठ स्त्रियों से उसके संबंध थे। हमें लगेगाकैसा पुरुष था! लेकिन अगर हमें लगता हैतो हम धोखा दे रहे हैं। असल में ऐसा पुरुष खोजना कठिन है जो साठ स्त्रियों से भी तृप्त हो जाए। यह दूसरी बात है कि समाज का भय हैहिम्मत नहीं जुटतीव्यवस्था हैकानून हैऔर फिर उपद्रव हैं बहुत।
लेकिन बायरन को एक स्त्री ने मजबूर कर दिया शादी के लिए। उसने कहापहले शादीफिर कुछ और। पहले शादी,अन्यथा हाथ भी मत छूना। शादी की। चर्च में घंटियां बज रही हैंमोमबत्तियां जली हैंमित्र विदा हो रहे हैंशादी करके बायरन उतर रहा है सीढ़ियों पर अपनी नव-वधू का हाथ हाथ में लिए हुए। और तभी सड़क से एक स्त्री जाती हुई दिखाई पड़ती है। और उसका हाथ छूट गया। और उसकी पत्नी ने चौंककर देखाऔर बायरन वहां नहीं है। शरीर से ही हैमन उसका उस स्त्री के पीछे चला गया है।
उसकी पत्नी ने कहाक्या कर रहे हैं आपबायरन ने कहाअरेतुम होलेकिन जैसे ही तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में आयातुम मेरे लिए अचानक व्यर्थ हो गई हो। मेरा मन एक क्षण को उस स्त्री के पीछे चला गया। और मैं कामना करने लगा कि काश! वह स्त्री मिल जाए।
ईमानदार आदमी है। नहीं तो पहले ही दिन विवाहित स्त्री से इतनी हिम्मत बहुत मुश्किल है कहने की। साठ साल के बाद भी मुश्किल पड़ती है कहना। पहला दिनपहला दिन भी नहींअभी सीढ़ियां ही उतर रहा है चर्च की। वह स्त्री तो चौंककर खड़ी हो गई। लेकिन बायरन ने कहा कि जो सच है वही मैंने तुमसे कहा है।
ऐसा ही है सच हम सब के बाबत। कभी आपने सोचा है कि जिस कार के लिए आप दीवाने थे और कई रात नहीं सोए थेवह पोर्च में आकर खड़ी हो गई है। फिर! फिर कल दूसरी कोई कार सड़क पर चमकती हुई निकलती है और उसकी चमक आंखों में समा जाती है। फिर वही पीड़ा है। जिस मकान के लिए आप दीवाने थे कि पता नहीं उसके भीतर पहुंचकर कौन-से स्वर्ग में प्रवेश हो जाएगा। उसमें प्रवेश हो गया है। और प्रवेश होते ही मकान भूल गया और कोई स्वर्ग नहीं मिला। और फिर स्वर्ग कहीं और दिखाई पड़ने लगा। मृग-मरीचिका है। सदा सुख कहीं और है और चित्त दौड़ता रहता है।
कृष्ण कहते हैंजब सुख यहीं है भीतरअपने मेंतभी प्रज्ञा की स्थिरता उपलब्ध होती है।
अभी इतना ही। फिर सांझ।