शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-02)-प्रवचन-004

परमात्मा के स्वर

यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। 11।।


हे अर्जुन! जो मेरे को जैसे भजते हैंमैं भी उनको वैसे ही भजता हूं। इस रहस्य को जानकर ही बुद्धिमान मनुष्यगण सब प्रकार से मेरे मार्ग के अनुसार बर्तते हैं।
यह वचन बहुत अदभुत है।
कृष्ण कहते हैंजो मुझे जिस भांति भजते हैंमैं भी उन्हें उसी भांति भजता हूं। और बुद्धिमान पुरुष इस बात को जानकर इस भांति बर्तते हैं।
भगवान भजता है! इस सूत्र में एक गहरे आध्यात्मिक रिजोनेंस कीएक आध्यात्मिक
प्रतिसंवाद की घोषणा की गई है। संगीतज्ञ जानते हैं कि अगर एक सूने एकांत कमरे में कोई कुशल संगीतज्ञ एक वीणा को बजाए और दूसरे कोने में एक वीणा रख दी जाए--खाली, अकेली। 
कमरे में गूंजने लगे आवाजें एक बजती हुई वीणा कीतो कुशल संगीतज्ञ उस शांत पड़ी हुई वीणा के तारों को भी झंकृत कर देता हैरिजोनेंस पैदा हो जाता है। वह जो खाली पड़ी वीणा हैजिसे कोई भी नहीं छू रहा हैवह भी उस गूंजते संगीत से गुंजायमान हो जाती है। वह भी गूंजने लगती हैउससे भी संगीत का स्फुरण होने लगता है।
परमात्मा भी रिजोनेंस हैप्रतिध्वनि देता है। जैसे हम होते हैंठीक वैसी प्रतिध्वनि परमात्मा भी हमें देता है। हमारे चारों ओर वही मौजूद है। हमारे भीतर जो फलित होता हैतत्काल उसमें प्रतिबिंबित हो जाता हैवह दर्पण की भांति हमें लौटा देता हैहमारे प्रतिबिंबों को।
कृष्ण कहते हैंजो मुझे जिस भांति भजता हैउसी भांति मैं भी उसे भजता हूं। जो जिस भांति मेरे दर्पण के समक्ष आ जाता हैवैसी ही तस्वीर उस तक लौट जाती है।
परमात्मा कोई मृत वस्तु नहीं हैजीवंत सत्य है। परमात्मा कोई बहरा अस्तित्व नहीं हैकोई डंब एक्झिस्टेंस नहीं है,परमात्मा हृदयपूर्ण है। परमात्मा भी प्राणों के स्पंदन से भरा हुआ अस्तित्व है। और जब हमारे प्राणों में कोई प्रार्थना उठती है और हम परमात्मा की तरफ बहने शुरू होते हैंतो आप मत सोचना कि यात्रा एक तरफ से होती है। यात्रा दोहरी है। जब आप एक कदम उठाते हैं परमात्मा की तरफतब परमात्मा भी आपकी तरफ कदम उठाता है।
यह हमें साधारणतः दिखाई नहीं पड़ता। यह साधारणतः हमारे खयाल में नहीं आता। यह खयाल में हमारे इसीलिए नहीं आता कि हम जीवन की क्षुद्रता में इस भांति उलझे हुए हैं कि उसकी गहरी प्रतिध्वनियों को पकड़ने की क्षमता खो देते हैं। हम इतने शोरगुल में डूबे हुए हैं कि वह जो धीमी-धीमी आवाजें अस्तित्व हमारे पास पहुंचाता हैवे हमें सुनाई नहीं पड़तीं। बहुत स्टिल स्माल वाइसबड़ी छोटी आवाज है। बड़ी बारीकमहीन आवाज में ध्वनियां हम तक लौटती हैंलेकिन हमें सुनाई नहींपड़तीं। हम इतने उलझे होते हैं।
कभी खयाल किया होआप अपने कमरे में बैठे हैंखयाल करेंतो पता चलता है कि बाहर वृक्ष पर चिड़िया आवाज कर रही है। खयाल न करेंतो वह आवाज करती रहती हैआपको कभी पता नहीं चलता। रात के सन्नाटे से गुजर रहे हैंअपने विचारों में खोए हुए हैं। पता नहीं चलता है कि बाहर झींगुर की आवाज है। होश में आ जाएंचौंककर जरा रुक जाएंसुनेंतो पता चलता है कि विराट सन्नाटा आवाज कर रहा है।
ठीक ऐसे ही परमात्मा प्रतिपल हमें प्रतिध्वनित करता हैलेकिन झींगुर की आवाज से भी सूक्ष्म है आवाज। सन्नाटे की आवाज से भी बारीक है। पक्षियों की चहचहाहट से भी नाजुक है। बहुत चुप होकरमौन होकर जो उसे पकड़ेगावही पकड़ पाता है।
गहरे मौन मेंकृष्ण जो कहते हैंउसका निश्चित ही पता चलता है। यहां उठती है एक ध्वनिचारों ओर से उसकी प्रतिध्वनि लौट आती है और उसकी हमारे ऊपर वर्षा हो जाती है।
मैं एक पहाड़ पर था। कुछ मित्रों के साथ था। उस पहाड़ पर एक जगह थी इकोप्वाइंट। वहां जाकर आवाज करतेतोपहाड़ियों की घाटियां सात बार उस आवाज को लौटा देतीं।
एक मित्र साथ थेउन्होंने कुत्ते की आवाज में चिल्लाना शुरू किया। पहाड़ चारों तरफ से कुत्ते की आवाज लौटाने लगे। वे खेल में ही कर रहे थेपर खेल भी तो खेल नहीं है। मैंने उनसे पूछा कि तुम्हें और आवाजें करनी भी आती हैंफिर कुत्ते की आवाज ही क्यों कर रहे होउन मित्र ने कोयल की आवाज करनी शुरू की और पहाड़ की घाटियां कोयल की आवाज से गूंज कर हम पर लौटने लगी। मैंने उनसे कहापहाड़ वही लौटा देते हैंजो हम उन तक पहुंचाते हैं। सात गुना वापस कर देते हैं।
कृष्ण कहते हैंजो जिस रूप में...।
जिस रूप में भी हम अपने अस्तित्व के चारों ओर अपने प्राणों से प्रतिध्वनियां करते हैंवे ही हम पर अनंतगुना होकर वापस लौट आती हैं। परमात्मा प्रतिपल हमें वही दे देता हैजो हम उसे चढ़ाते हैं। हमारे चढ़ाए हुए फूल हमें वापस मिल जाते हैं। हमारे फेंके गए पत्थर भी हमें वापस मिल जाते हैं। हमने गालियां फेंकींतो वे ही हम पर लौट आती हैं। और हमने भजन की ध्वनियां फेंकींतो वे ही हम पर बरस जाती हैं।
अगर जीवन में दुख होतो जानना कि आपने अपने चारों तरफ दुख के स्वर भेजे हैंवे आप पर लौट आए हैं। अगर जीवन में घृणा मिलती होतो जानना कि आपने घृणा के स्वर फेंके थेवे आप पर वापस लौट आए। अगर जीवन में प्रेम न मिलता होतो जानना कि आपने कभी प्रेम की आवाज ही नहीं दी कि आप पर प्रेम वापस लौट सके।
इस जीवन के महा नियमों में से एक हैहम जो देते हैंवह हम पर वापस लौट आता है।
कृष्ण वही कह रहे हैं। वे कहते हैंजो जिस रूप में मुझे भजता है...।
जिस रूप मेंइस शब्द को ठीक से स्मरण रख लेना। जो जिस रूप में मुझे भजता हैमैं भी उसे उसी रूप में भजता हूं। मैं उसे वही लौटा देता हूंइन दि सेम क्वाइन
वह कहानी तो हम सबको पता है। सभी को पता होगा। एक आदमी पर अदालत में मुकदमा चला। वकील ने उससे कहा कि तू बोलना ही मत। तू तो इस तरह की आवाजें करना कि पता चलेगूंगा है। जब मजिस्ट्रेट पूछेतभी तू गूंगे की तरह आवाजें करना। कहनाआ  आ। कुछ भी करनालेकिन बोलना मत।
अदालत में वही किया। फिर मुकदमा जीत गया। वह आदमी बोल ही नहीं सकता था और उस पर जुर्म था कि उसने गालियां दींअपमान कियायह कियावह किया। मजिस्ट्रेट ने कहाजो आदमी बोल ही नहीं सकतावह गालियां कैसे देगा,अपमान कैसे करेगा! वह छूट गया। बाहर आकर वकील ने कहामुकदमा जीत गए। अब मेरी फीस चुका दो। उस आदमी ने कहाआ  आ। इन दि सेम क्वाइन! उसने उसी सिक्के में वापस फीस भी चुका दी। उस वकील ने कहाबंद करो यह बात। यह अदालत के लिए कहा था। उस आदमी ने कहाआ  आ। उसने कहाकुछ समझ आता नहीं कि आप क्या कह रहे हैं?हाथ से इशारा कियाआंख से इशारा किया।
जिंदगी भी उसी सिक्के में हमें लौटा देती है। हमें तब तो पता नहीं चलताजब हम जिंदगी को देते हैं अपने सिक्के। हमें पता तभी चलता हैजब सिक्के लौटते हैं। हम जब बीज बोते हैंतब तो पता नहीं चलताजब फल आते हैंतब पता चलता है। और अगर फल विषाक्त आते हैंजहरीलेतो हम रोते हैं और कोसते हैं। हमें पता नहीं कि यह फल हमारे बीजों का ही परिणाम है।
ध्यान रहेजो भी हम पर लौटता हैवह हमारा दिया हुआ ही लौटता है। हांलौटने में वक्त लग जाता है। प्रतिध्वनि होने में समय गिर जाता है। उतने समय के फासले से पहचान मुश्किल हो जाती है।
इस जगत में किसी भी व्यक्ति के साथ कभी अन्याय नहीं होता। अन्याय नहीं होताउसी का यह सूत्र है।
कृष्ण कहते हैंजो जिस रूप में मुझे भजता हैमैं उसी रूप में उसे भजता हूं।
अगर किसी व्यक्ति ने इस जगत को पदार्थ मानातो उसे यह जगत पदार्थ मालूम होने लगेगा। क्योंकि परमात्मा उसी रूप में लौटा देगा। अगर किसी व्यक्ति ने इस जगत को परमात्मा मानातो यह जगत परमात्मा हो जाएगा। क्योंकि यह अस्तित्व उसी रूप में लौटा देगाजो हमने दिया था।
हमारा हृदय ही अंततः हम सारे जगत में पढ़ लेते हैं। और हमारे हृदय में छिपे हुए स्वर ही अंततः हमें सारे जगत में सुनाई पड़ने लगते हैं। चांदत्तारे उसी को लौटाते हैंजो हमारे हृदय के किसी कोने में पैदा हुआ था। लेकिन अपने हृदय में जो नहीं पहचानतालौटते वक्त बहुत चकित होता हैबहुत हैरान होता है कि यह कहां से आ गयाइतनी घृणा मुझे कहां से आई?इतने लोगों ने मुझे घृणा क्यों कीलौटेखोजेऔर वह पाएगा कि घृणा ही उसने भेजी थी। वही वापस लौट आई है।
इसका एक अर्थ और खयाल में ले लें। जिस रूप में भजता हैइसका एक अर्थ मैंने कहा। इसका एक अर्थ और खयाल में ले लें।
अगर कोई न भजता होकिसी भी रूप में न भजता हो परमात्मा कोतो परमात्मा क्या लौटा देता हैअगर कोई भजता ही नहीं परमात्मा कोतो परमात्मा भी न भजने को ही लौटाता है। अगर कोई व्यक्ति जीवन से किसी भी तरह के संवाद नहीं करतातो जीवन भी उसके प्रति मौन हो जाता हैजड़ पत्थर की तरह हो जाता है। सब तरफ पथरीला हो जाता है। जिंदगी में जिंदगी आती है हमारे जिंदा होने से। इसलिए जिंदा आदमी के पास पत्थर भी जिंदा होता है और मरे हुएमुर्दा तरह के आदमी के पासजिंदा आदमी भी मुर्दा हो जाता है।
एक कवि के संबंध में मैं सुनता हूं कि वह अगर अपने जूते भी पहनतातो इस भांतिजैसे जूते जीवित हों। अगर वह अपने सूटकेस को बंद करतातो इस भांतिजैसे सूटकेस में प्राण हों। मैं उसका जीवन पढ़ रहा था। उसका जीवन लिखने वालों ने लिखा है कि हम सब समझते थेवह पागल है। हम सब समझते थेउसका दिमाग खराब है। वह दरवाजा भी खोलतातो इतने आहिस्ते से कि दरवाजे को चोट न लग जाए। वह कपड़े भी बदलतातो इतने प्रेम से कि कपड़ों का भी अपना अस्तित्व हैअपना जीवन है।
निश्चित ही पागल थाहम तो व्यक्तियों के साथ भी ऐसा व्यवहार नहीं करते कि वे जीवित हैं। आपने कभी अपने नौकर को इस तरह देखा कि वह आदमी हैनहीं देखते हैं। चारों तरफ जीवन हैउसको भी हम मुर्दे की तरह देखते हैंलेकिन वह कविजिन्हें हम साधारणतया मुर्दा चीजें कहते हैंउन्हें भी जीवन की तरह देखता। मित्र समझते कि पागल है। लेकिन अंत में मित्रों ने जब जीवन उसका उठाकर देखातो उन्होंने कहा कि अगर वह पागल थातो भी ठीक था। और अगर हम समझदार हैं,तो भी गलत हैं। क्योंकि उसकी जिंदगी में दुख का पता ही नहीं है। पूरी जिंदगी में वह कभी दुखी नहीं हुआ।
यह तो बाद में पता चला कि उस आदमी की जिंदगी में दुख की एक भी घटना नहीं है। उस आदमी को कभी किसी ने उदास नहीं देखा। उस आदमी को कभी किसी ने रोते नहीं देखा। उस आदमी की आंखों से आंसू नहीं बहे।
पूरी जिंदगी इतने आनंद की जिंदगी कैसे हो सकीजब उससे किसी ने पूछातो उसने कहामुझे पता नहीं। लेकिन एक बात मैं जानता हूं। मैंने अगर पत्थर को भी छुआतो इतने प्रेम से कि जैसे वह परमात्मा हो। बसइसके सिवाय मेरी जिंदगी का कोई राज नहीं है। फिर मुझे सब तरफ से आनंद ही लौटा है।
जिस रूप में हम अस्तित्व के साथ व्यवहार करते हैंवही व्यवहार हम तक लौट आता है। परमात्मा भी प्रतिपलरिस्पांडिंग हैप्रतिसंवादित होता है। बारीक है उसकी वीणा और स्वर हैं महीनलेकिन प्रतिपलजरा-सा हमारा कंपन उसे भी कंपा जाता है। जिस भांति हम कंपते हैंउसी भांति वह कंपता है। अंततः जो हम हैंवही हमारी जिंदगी में हमें उपलब्ध होता है।
इसलिए अगर एक आदमी कहता हो कि मुझे कहीं ईश्वर नहीं मिला...मेरे पास लोग आते हैंवे कहते हैं कि ईश्वरआप ईश्वर की बात करते हैं। ईश्वर कहां है?
मैं उनकी आंखों में देखता हूंतो मुझे पता लगता हैउनकी आंखें पथरीली हैं। उन्हें ईश्वर कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता। उसका कारण यह नहीं है कि ईश्वर नहीं है। उसका कारण यह है कि उनके पास पत्थर की आंखें हैं। पत्थर की आंखों में ईश्वर दिखाई पड़ना मुश्किल है। उनकी आंखों में देखने की क्षमता ही नहीं मालूम पड़तीउनकी आंखों में कुछ नहीं दिखाई पड़ता।
हांउनकी आंखों में कुछ चीजें दिखाई पड़ती हैंवे उन्हें मिल जाती हैं। धन दिखाई पड़ता हैउन्हें मिल जाता है। यश दिखाई पड़ता हैउन्हें मिल जाता है। जो दिखाई पड़ता हैवह मिल जाता है। जो नहीं दिखाई पड़ता हैवह कैसे मिलेगाहम जितना परमात्मा को उघाड़ना चाहेंउतना उघाड़ सकते हैं। लेकिन परमात्मा को उघाड़ने के पहलेउतना ही हमें स्वयं भी उघड़नापड़ेगा।
प्रार्थनाकृष्ण कहते हैंभजनभजना यह अपनी तरफ से परमात्मा के लिए पुकार भेजना है। और जब भी कोईहृदयपूर्वक प्रार्थना से भर जाता हैतो आमतौर से हमें पता नहीं है कि प्रार्थना का असली क्षण वह नहीं है जब आप प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का असली क्षण तब शुरू होता हैजब आपकी प्रार्थना पूरी हो जाती है और आप प्रतीक्षा करते हैं।
प्रार्थना के दो हिस्से हैंध्यान रखें। एक ही हिस्सा प्रचलित है। दूसरे का हमें पता ही नहीं रहा है। और दूसरे का जिसे पता नहीं हैउसे प्रार्थना का ही पता नहीं है।
आपने प्रार्थना कीवह तो एकतरफा बात हुई। प्रार्थना के बाद अब मंदिर से भाग मत जाएं। अब प्रार्थना के बाद मस्जिद को छोड़ मत दें। अब प्रार्थना के बाद गिरजे से निकल मत जाएंएकदम दुकान की तरफ। अगर पांच क्षण प्रार्थना की हैतो दस क्षण रुककर प्रतीक्षा भी करें। उस प्रार्थना को लौटने दें। वह प्रार्थना आप तक लौटेगी। और अगर नहीं लौटती हैतो समझना कि आपको प्रार्थना करने का ही कुछ पता नहीं। आपने प्रार्थना की ही नहीं है।
लेकिन आदमी प्रार्थना कियाऔर भागा! वह प्रतीक्षा तो करता ही नहीं कि परमात्मा को पुकारा थातो उसे पुकार का जवाब भी तो दे देने दो। जवाब निरंतर उपलब्ध होते हैं। कभी भी कोई प्रश्न खाली नहीं गया। और कभी कोई पुकार खाली नहीं गई। लेकिन की गई हो तब। अगर सिर्फ शब्द दोहराए गए होंअगर सिर्फ कंठस्थ शब्दों को दोहराकर कोई क्रिया पूरी की गई हो और आदमी वापस लौट गया होतो फिर नहींफिर नहीं हो सकता।
आज ही कोई मुझे कह रहा था कि आपके ये संन्यासी सड़कों पर नाचते-गाते निकल रहे हैंइससे फायदा क्या हैमैंने उनसे कहाजाओऔर नाचोऔर देखो! उन्होंने कहाहमें कुछ फायदा दिखाई नहीं पड़ता। मैंने कहाबिना नाचे मत कहो। नाचो पूरे हृदय सेफिर प्रतीक्षा करो। फायदे की बड़ी वर्षा हो जाएगी।
निश्चित ही फायदा नोटों में नहीं होगाकि नोट बरस जाएंगे! लेकिन नोटों से भी कीमती कुछ इस पृथ्वी पर है। और जिसके लिए नोट सबसे कीमती चीज हैउससे ज्यादा दरिद्र आदमी खोजना मुश्किल है। भिखारी हैभिखमंगा है। उसे कुछ भी पता नहीं है।
नाचो प्रभु के सामने और छोड़ दो फिर नाच को उसकी तरफफिर लौटेगा। जो नाचकर प्रभु के पास गया हैनाचता हुआ प्रभु उसके पास भी आता है। जिसने गीत गाकर निवेदन किया हैउसने और महागीत में गाकर उत्तर भी दिया है। उसका ही आश्वासन कृष्ण के द्वारा अर्जुन को इस सूत्र में दिया गया है।

कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।। 12।।

और जो मेरे को तत्व से नहीं जानते हैंवे पुरुषइस मनुष्य लोक मेंकर्मों के फल को चाहते हुए देवताओं को पूजते हैं और उनके कर्मों से उत्पन्न हुई सिद्धि भी शीघ्र ही होती है।

जीवन के परम सत्य को भी जो नहीं जानतेवे भी जीवन की बहुत-सी शुभ शक्तियों से लाभान्वित हो सकते हैं। परमात्मा परम शक्ति हैलेकिन शक्ति और छोटे रूपों में भी बहुत-बहुत मार्गों से प्रकट होती है।
कृष्ण अर्जुन को इस सूत्र में कह रहे हैं कि जो मुझे उपलब्ध हो जाते हैंजो मेरी देह को उपलब्ध हो जाते हैंवे जन्म-मरण से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन जो मुझे नहीं भी उपलब्ध होते सीधेजो परम ऊर्जा से परम स्रोत से सीधे संबंधित नहीं होते,वे भी देवताओं सेउनकी पूजा करउनकी सन्निधि में आशुभ को उपलब्ध होते हैं। यहां दोत्तीन बातें समझ लेने जैसी हैं।
साधारणतः परम शक्ति के संपर्क में आना अति कठिन है। परम शक्ति के संपर्क में आने के लिए बड़ी छलांगबड़े साहस की जरूरत है। परम शक्ति के संपर्क में आने का अर्थ अपने को पूरी तरह जलाकर भस्मराख कर डालना है। जो अपने मैं को जरा भी बचाना चाहेवह परम शक्ति के संपर्क में नहीं आ सकता। जैसे सूर्य के पास कोई पहुंचना चाहेतो भस्म हो ही जाएगा। ऐसे ही परम शक्ति के पास कोई पहुंचना चाहेतो स्वयं को मिटाए बिना कोई रास्ता नहीं है। इसलिए परम साहस है,करेज है।
धार्मिक व्यक्ति ठीक अर्थों में अपने को मिटाने के साहस से ही पैदा होता है। इसलिए अधिक धार्मिक लोग इतना साहस तो नहीं कर पाते हैं। लेकिन फिर भी सूर्य के पास कोई न जा पाएतो भी अंधेरे में ही रहेऐसा जरूरी नहीं है। छोटे मिट्टी के दीए भी जलाए जा सकते हैं। और मिट्टी के छोटे से दीए में जो ज्योति जलती हैवह भी महासूर्यों का ही हिस्सा है। लेकिन वह जलाती नहींवह मिटाती नहींवह आपके हाथ में उपयोग की जा सकती है।
देवता परम शक्ति के समक्ष दीयों की तरह हैंछोटे दीयों की तरह हैं। देवता उन आत्माओं का नाम है...इसे थोड़ा-सा समझ लेना जरूरी होगातभी यह बात ठीक से खयाल में आ सकेगी।
जैसे ही कोई व्यक्ति मरता हैइस शरीर को छोड़ता हैसाधारणतः सौ में निन्यानबे मौकों पर तत्काल ही जन्म हो जाता है। कभी-कभीयदि व्यक्ति बहुत बुरा रहा होतो तत्काल जन्म मुश्किल होता हैया व्यक्ति बहुत भला रहा होतो भी तत्काल जन्म मुश्किल होता है। बहुत भले व्यक्ति के लिए भी गर्भ खोजने में समय लग जाता है। वैसा गर्भ उपलब्ध होना चाहिए। बहुत बुरे व्यक्ति को भी। मध्य में जो हैंउन्हें तत्काल गर्भ उपलब्ध हो जाता है। जो बहुत बुरे व्यक्ति हैंउन्हें कुछ समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती हैकरनी पड़ती हैजब तक उनके योग्य उतना बुरा गर्भ उपलब्ध न हो सके। ऐसी आत्माओं को प्रेत पारिभाषिक शब्द है--ऐसी प्रतीक्षा कर रही आत्माओं काजो नई देह को उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं--बहुत बुरी हैं इसलिए। बहुत भली आत्माएं भी शीघ्र जन्म को उपलब्ध नहीं हो पातीं। ऐसी प्रतीक्षा करती आत्माओं का नाम देवता है। वह भी पारिभाषिक शब्द है।
जो सीधे परमात्मा से संबंधित नहीं हो पातेवे भी चाहें तो देवताओं से संबंधित हो सकते हैं। बुरी आत्माएं बुरा करने के लिए आतुर रहती हैंदेह न हो तो भी। अच्छी आत्माएं अच्छा करने के लिए आतुर रहती हैंदेह न हो तब भी। इन आत्माओं का साथ मिल सकता है। इसका पूरा अलग ही विज्ञान है कि इन आत्माओं का साथ कैसे मिल सके! लेकिन आमंत्रण से,इनवोकेशन सेनिमंत्रण से इन आत्माओं से संबंधित हुआ जा सकता है। समस्त यज्ञ आदि शुभ आत्माओं से संबंध स्थापित करने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएं थीं। जिसे दुनिया में ब्लैक मैजिक कहते हैंउस तरह की प्रक्रियाएं बुरी आत्माओं से संबंध स्थापित करने की प्रक्रियाएं थीं।
कृष्ण कहते हैंजो सीधा मुझको न भी उपलब्ध होवह भी देवताओं की पूजा और अर्चना से शुभ कर्मों को करता हुआ,शुभ को उपलब्ध हो सकता है। जो परम सत्य को उपलब्ध न भी होवह भी शुभ को उपलब्ध हो सकता है।
दो कारणों से वह शुभ को उपलब्ध होगा। एक तोजो शुभ की आकांक्षा करता हैवह शुभ कर्म करता है। आकांक्षा का सबूत और कुछ भी नहीं है सिवाय कर्मों के। हम जो करते हैंवही गवाही है हमारी आकांक्षाओं की। हमारी डीडहमारा कर्म ही हमारे प्राणों की प्यास की खबर है।
शुभ कर्मों को करता हुआ।
लेकिन आदमी बहुत कमजोर है और शुभ कर्म भी आदमी अकेला करना चाहेतो अति कठिन है। वह अपने चारों तरफ व्याप्त जो शुभ की शक्तियां हैंउनका सहारा ले सकता है। और कई बार जब आप कोई बड़ा शुभ कर्म करते हैंतो आप खुद भी अनुभव करते हैंजैसे कोई और बड़ी शक्ति भी आपके साथ खड़ी हो गई। जब आप कोई बहुत बुरा कर्म करते हैंतब भी आपको अनुभव होता है कि जैसे आप अकेले नहीं हैं। कोई और बुरी शक्ति भी आपके साथ संयुक्त हो गई है।
हत्यारों ने अदालतों में बहुत बार बयान दिए हैंऔर उनके बयान कभी भी ठीक से नहीं समझे जा सकेक्योंकि अदालतों की समझ की सीमा है। अदालतों में हत्यारों ने सारी पृथ्वी पर अनेक बार यह कहा है कि यह हत्या हमने नहीं की;जैसे हमसे करवा ली गई है। लेकिन अदालत तो इस बात को नहीं मानेगी। मानेगी कि झूठ है वक्तव्य। झूठ बहुत मौकों पर हो भी सकता हैबहुत मौकों पर झूठ नहीं है।
जो लोग प्रेतात्म-विज्ञान पर थोड़ा-सा श्रम उठाए हैंउनको इस बात का अनुभव होना शुरू हुआ है कि बुरी आत्माएं दूसरे व्यक्तियों को कमजोर क्षण में प्रभावित कर लेती हैं।
ऐसे मकान हैं पृथ्वी परजिन मकानों में निरंतर हत्या होती रही हैपीढ़ियों से। और जब उन मकानों के लंबे इतिहास को खोजा गया हैतो जानकर बड़ी हैरानी हुई कि हर बार हत्या का क्रम वही रहा हैजो पिछली बार हत्या का था। उन घरों में उन आत्माओं का वास हैजो उस घर में आने वाले नए लोगों से हत्या करवाने का प्रयास फिर से करवा लेती हैं।
ऐसे स्थान हैंजहां आदमी के मन में शुभ फलित होता है। जिन्हें हम तीर्थ कहते थेउन तीर्थों का कोई और अर्थ नहीं है। जिन स्थानों पर भली आत्माओं के संघट की संभावना अनेक-अनेक रास्तों से निर्मित की गई हैउन स्थानों पर आदमी जाकर अचानक भला कर्म कर पाता हैजो उसके वश के बाहर दिखाई पड़ता है।
हम अकेले नहीं हैं। हमारे चारों ओर और बहुत शक्तियां काम कर रही हैं। जब हम बुरा होना चाहते हैंतो बुरी शक्तियां हमारे साथ खड़ी हो जाती हैं और हमारे हाथों का बल बन जाती हैं। और जब हम अच्छा कुछ करना चाहते हैंतब भी अच्छी शक्तियां हमारे साथ खड़ी हो जाती हैं और हमारे हाथों का बल बन जाती हैं।
तो कृष्ण कह रहे हैंअच्छा कर्म करते हुएदेवताओं की अर्चनाप्रार्थनापूजा सेजो व्यक्ति सीधा मुझ तक न भी पहुंचे वह भी शुभ को उपलब्ध होता है।

प्रश्न:

भगवान श्रीपिछली चर्चाओं के संबंध में दो चीजें स्पष्ट करें। दूसरे श्लोक के हिंदी अनुवाद में लिखा गया है कि बहुत काल से इस पृथ्वी पर योग लुप्तप्राय हो गया हैकिंतु संस्कृत श्लोक में योगो नष्टःऐसा कहा गया हैअर्थात योग करीब-करीब लोप नहींबल्कि योग नष्ट हो गया है। कृपया इसके बारे में थोड़ा समझाइए

और आठवें श्लोक के हिंदी अनुवाद में लिखा गया है कि साधुओं का उद्धार करने के लिए प्रकट होता हूंलेकिन संस्कृत में साधुओं के परित्राण के लिए प्रकट होता हूंऐसा कहा गया है। कृपया 'साधुओं के उद्धारके स्थान पर 'परित्राणका अर्थ स्पष्ट करें।


परित्राण का तो वही अर्थ हैजो उद्धार का है। उसमें कोई भेद नहीं है। नष्टप्राय का या योग नष्ट हो गयाइसका लुप्तप्राय अर्थ करना भी गलत नहीं है। असल में संस्कृत के 'नष्ट होनेका अर्थजिस दिन उस शब्द का प्रयोग किया गयाउस दिन नष्ट होने की जो परिभाषा थीउसको ध्यान में रखकर करना पड़े।
इस देश में कभी भी ऐसा नहीं समझा गया कि कोई चीज पूरी तरह नष्ट हो सकती है। नष्ट होने का इतना ही मतलब होता है कि वह लुप्त हो गई।
आज विज्ञान भी इस बात से सहमति देता है। डिस्ट्रक्शन का अर्थ मिट जाना नहींसिर्फ लुप्त हो जाना है। क्योंकि कोई चीज पूरी तरह नष्ट हो ही नहीं सकती। एक रेत के छोटे-से कण को भी हम नष्ट नहीं कर सकते। हम सिर्फ रूपांतरित कर सकते हैंलुप्त कर सकते हैं। किसी और रूप में वह प्रगट हो जाएगा। नष्ट नहीं हो सकता।
इस पृथ्वी पर कोई चीज नष्ट नहीं होती और न कोई चीज सृजित होती है। जब हम कहते हैंहमने कोई चीज बनाईतो उसका मतलब यह नहीं होता है कि हमने कोई नई चीज बनाई। उसका इतना ही मतलब होता है कि हमने कुछ चीजों को रूपांतरित किया। हमने रूप बदला।
पानी है। गर्म कियाभाप हो गई। पानी नष्ट हो गया। लेकिन क्या अर्थ हुआ नष्ट होने काभाप होकर पानी अब भी है। और अगर थोड़ी ठंडक दी जाए और बर्फ के टुकड़े छिड़क दिए जाएंतो भाप अभी फिर पानी हो जाए। तो पानी नष्ट हुआ था कि लुप्त हुआ था?
पानी लुप्त हुआ भाप मेंरूप बदला। फिर बर्फ छिड़क दीपानी फिर प्रगट हुआ। नष्ट नहीं हुआ था। नष्ट होतातो वापस नहीं लौट सकता था। बहुत ठंडा कर दें पानी कोतो बर्फ बन जाएगा। पानी फिर नष्ट हो गया। पानी नहीं है अबबर्फ है अब। लेकिन बर्फ को गरमा देंतो फिर पानी हो जाएगा।
इस जगत मेंइस अस्तित्व में न तो कोई चीज नष्ट होती और न कोई चीज निर्मित होती है। सिर्फ रूपांतरण होते हैं। इसलिए संस्कृत का जो शब्द हैयोग नष्ट हो गयाउसके लिए हिंदी का अनुवाद लुप्तप्राय करना बिलकुल ही ठीक है। ठीक इसलिए है कि अगर आज हिंदी में हम प्रयोग करेंनष्ट हो गयातो लोग शायद यही समझेंगे कि नष्ट हो गया।
लेकिन जिस दिन इस नष्ट शब्द का प्रयोग कृष्ण ने किया थाउस दिन नष्ट से कोई भी ऐसा नहीं समझता कि नष्ट हो गया। क्योंकि उस दिन की समझ ही यही थी कि कुछ भी नष्ट नहीं होता है। सभी चीजें रूपांतरित होती हैं। इसलिए अनुवादक ने ठीक विवेक का उपयोग किया है। उसने लुप्तप्राय कहा। खो गयानष्ट नहीं हो गया।
नष्ट कभी कुछ होता ही नहीं है। डिस्ट्रक्शन असंभव है। विनाश असंभव है। सिर्फ चीजें बदलती हैंनए रूप लेती हैं। कितने ही नए रूपों में मूलतः वे वही होती हैंजो थीं। लेकिन उनको फिर पुनः नया रूपपुराने रूप में लाने कोपुराने को प्रगट करने के लिए कुछ उपाय करना होता है।
इसलिए कृष्ण का जो अर्थ हैवह लुप्तप्राय ही है। क्योंकि उस दिन नष्ट का यही अर्थ था। आज हमारे लिए दो अर्थ हैं। अगर हम प्रयोग करते हैंनष्ट हो गया। जब हम कहते हैंफलां आदमी मर गयातो हमारे लिए वही मतलब नहीं होता हैजो कृष्ण के लिए था। कृष्ण के लिए तो मरने का इतना ही मतलब होता है कि उस आदमी ने फिर से जन्म ले लिया। हमारे लिए मरने का मतलब होता हैखतम हो गयासमाप्त हो गया। आगे कोई जन्म हमें दिखाई नहीं पड़ता। हमारी मृत्यु में अगला जन्म नहीं छिपा हुआ है। कृष्ण की मृत्यु में भी अगला जन्म छिपा हुआ है। कृष्ण के लिए मृत्यु एक द्वार है नए जन्म का;हमारे लिए द्वार है अंत कासमाप्ति का। उसके आगे फिर कुछ नहीं हैअंधकार है। सब खो गयासब नष्ट हो गया।
इसलिए कृष्ण अगर प्रयोग करेंधर्म मर गयातो भी हर्जा नहीं है। क्योंकि उसका भी मतलब इतना ही होगा कि वह रूपांतरित हो गया किसी और जीवन मेंकहीं और से छिप गयाकहीं और चला गया। लेकिन हम अगर कहें कि धर्म मर गया,तो हमारे लिए मतलब होगासमाप्त हो गयाडेड एंड आ गया।
अंत नहीं आता। कृष्ण की भाषा में कोई शब्द अंतवाची नहीं है। सभी शब्द नए आरंभ के सूचक हैं। मृत्यु नया जन्म है। नष्ट होना नए रूप में खो जाना है। इसलिए नष्ट का अर्थ लुप्त ही है। और परित्राणाय का अर्थ भी उद्धार के लिए ही है,परित्राण के लिए ही है। उसमें कुछ भूल नहीं हो गई है। अनुवाद में कोई भूल नहीं है।

प्रश्न:

भगवान श्रीपिछले एक प्रवचन में आपने कहा है कि प्रत्येक मनुष्य अपने अच्छे और बुरे कर्मों के लिए स्वयं जिम्मेवार हैलेकिन आज सुबह की चर्चा में आपने कहा है कि सब कुछ विराटब्रह्म शक्ति के नियमों के आधार पर होता हैतो व्यक्ति स्वयं कर्मों के लिए जिम्मेवार कैसे होगा?


जब तक व्यक्ति हैतब तक अपने कर्मों के लिए जिम्मेवार है। जब व्यक्ति अपने को विराट में छोड़ देता हैतब जिम्मेवार नहीं है।
इसे ठीक ऐसा समझें कि एक छोटा बच्चा अपने बाप का हाथ पकड़कर रास्ते पर चल रहा है। बच्चा गिर पड़ेबाप जिम्मेवार है। लेकिन लड़के ने बाप का हाथ छोड़ दिया और खुद ही चल रहा हैअब गिर पड़ेतो बाप जिम्मेवार नहीं है।
रिस्पांसिबिलिटीउत्तरदायित्व आपके अपने ऊपर निर्भर है। अगर आप अहंकार के सहारे जीने की कोशिश में लगे हैंतो आप अपने प्रत्येक कर्म के लिए जिम्मेवार हैं। बुरा किया हैतो आपने किया हैअच्छा किया हैतो आपने किया है। क्योंकि आपके प्रत्येक कर्म के पीछे आपके कर्ता का भाव खड़ा है।
लेकिन एक व्यक्ति ने समर्पण किया है सब विराट को। उसने कहाजो तेरी मर्जी। बुरा करवाएतो तू। अच्छा करवाए,तो तू। अगर उसने मंदिर बनाया और गांव में जाकर कहे कि मंदिर मैंने बनाया। और कल चोरी में पकड़ा जाए और कहे कि चोरी परमात्मा ने करवाईतब फिर उस आदमी ने छोड़ा नहीं। तब फिर वह बेईमानी कर रहा हैअपने साथ भी और परमात्मा के साथ भी।
नहींतब वह कहेगा कि परमात्मा ने मंदिर बनवायामैं कौन हूं! और तब वह कहेगापरमात्मा ने चोरी कराईमैं कौन हूं! और अगर अदालत उसे सजा दे देतो वह कहेगापरमात्मा ने सजा दी। मैं कौन हूं!
तब फिर कठिनाई नहीं है। जब तक व्यक्ति कर्ता के भाव से जीता हैतब तक सारी जिम्मेवारी उसकी है। इसलिए है कि वह खुद अपने हाथ से जिम्मेवारी ले रहा है।
उसकी हालत करीब-करीब ऐसी है कि मैंने सुना हैएक फकीर एक ट्रेन में सवार हुआ। बैठा है सीट परलेकिन अपना बिस्तर अपने सिर पर रखे रहा। पास-पड़ोस के लोगों ने जरा चौंककर देखा। फिर किसी ने कहा कि महाशय! बिस्तर नीचे आराम से रखें। आप यह क्या कर रहे हैंउस फकीर ने कहालेकिन टिकट मैंने सिर्फ अपने लिए दियातो बिस्तर का बोझ ट्रेन पर डालना ठीक नहीं है। मैं अपने ही ऊपर बोझ रखे हुए हूं। लेकिन लोगों ने कहा कि महाशयआप अपने सिर पर भी रखेंतब भी कोई फर्क नहीं पड़ताट्रेन पर बोझ पड़ ही रहा है। आप नीचे रखें कि सिर पर रखें। हांसिर पर रखकर आप भर परेशान हो रहे हैं। ट्रेन पर कोई अंतर नहीं पड़ रहा है इससे।
वह फकीर हंसने लगाउसने कहा कि मैं तो सोचा कि अज्ञानी हैं यहांइसलिए सिर पर रखूं। मुझे क्या पता कि इस कमरे में ज्ञानी हैं! उसने बिस्तर नीचे रख दिया। लोग और हैरान हुए। उन्होंने कहाहम तुम्हारा मतलब न समझे! उस आदमी ने कहामैं तो यह सोचकर कि तुम सब सारी जिंदगी का भार अपने ऊपर रखते होओगेऐसे सब भार परमात्मा पर है! लेकिन मकान बनाओगे तो कहोगेमैंने बनाया। बोझ तुम अपने ऊपर रखोगे। इसीलिए मैं बिस्तर अपने सिर पर रखकर बैठा कि तुम्हारे बीच यही संगत होगा। लेकिन तुम बड़े ज्ञानी होअच्छा हुआ।
इस फकीर ने हम सब की मजाक कीगहरी मजाक की और हृदय के गहरे घाव को छूने की कोशिश की।
जब हम जिम्मेवार हैंतब भी वस्तुतः तो परमात्मा ही जिम्मेवार है। लेकिन वस्तुतः का कोई सवाल नहीं है। तब तक हम अपने सिर पर बोझा रखने का कष्ट तो भोगेंगे ही। ट्रेन भला ही पूरे बोझ को ढोती होलेकिन जो आदमी पेटी अपने सिर पर रखे हुए हैवह तो वजन ढोएगा हीतकलीफ भोगेगा ही! और सिर पर से पेटी गिर पड़ेतो हाथ-पैर उसका टूटेगा ही। इस बात के होते हुए भी कि ट्रेन पूरा बोझ ढो रही है।
विराट सब चीजों के लिए जिम्मेवार है। लेकिन ध्यान रहेविराट से समझौता नहीं हो सकता। आप ऐसा नहीं कह सकते कि कुछ के लिए मैं जिम्मेवारकुछ के लिए तुम जिम्मेवार। जब बुरा होतो तुम जिम्मेवारजब भला होतो मैं जिम्मेवार। वैसा नहीं चलेगा। या तो सब छोड़ दो विराट परया फिर सब अपने ही ऊपर रखना पड़ता है। अहंकारी सब अपने ऊपर रखकर चलता है। अधार्मिक सब अपने ऊपर रखकर चलता है। धार्मिक सब उस पर छोड़ देता है। लेकिन सब--टोटल। इसमें रत्तीभर बचाया नहीं जा सकता।
तो दोनों ही बातें दो तलों पर सही हैं। जहां तक आम आदमी का संबंध हैवह हर चीज के लिए खुद ही जिम्मेवार होता है। और इसलिए जिम्मेवारी का दुख भोगता है। जिम्मेवारी में दुख हैपीड़ा हैसंताप है।
जो जानता हैवह सब छोड़ देता है प्रभु पर। फिर वह दुख नहीं भोगता। फिर वह स्वतंत्रता का सुख भोगता है। फिर वह सब दायित्वों से मुक्त होकरफूल की तरह हल्का-फुल्का हो जाता है। फिर वह पक्षियों की तरह गीत गा सकता है और नदियों और झरनों की तरह दौड़ सकता है और नाच सकता है। फिर उसकी जिंदगी किसी भी बोझ से दबी हुई नहीं है।
और ध्यान रहेबड़े मजे की बात है यह कि जो व्यक्ति जितना परमात्मा पर छोड़ देता हैउतना ही बुरा कर्म मुश्किल हो जाता है। क्योंकि बुरे कर्म के लिए अहंकार का होना जरूरी है। जो व्यक्ति जितना परमात्मा पर छोड़ देता हैउतना ही बुरा कर्म मुश्किल हो जाता है। जो पूरा परमात्मा पर छोड़ देता हैउससे बुरा कर्म हो ही नहीं सकता। क्योंकि बुरे कर्म के लिए अहंकार अनिवार्य शर्त है। और जो व्यक्ति जितने अहंकार से भरा होता हैउससे शुभ कर्म हो नहीं सकता। क्योंकि अहंकार शुभ कर्म के लिए अनिवार्य बाधा है।
इसलिए खुद पर जिम्मा लिया हुआ आदमीपाप की गठरी को सिर पर बढ़ाता ही चला जाता है। असल में गठरी सिर्फ पाप की होती है। पुण्य की गठरीऐसा शब्द आपने सुना नहीं होगा। पुण्य की कोई गठरी होती नहीं। पुण्य आया कि गठरी वगैरह से मुक्ति हो जाती हैसिर खाली हो जाता है। पाप की ही गठरी होती हैउसका ही बोझ और बर्डन होता है। पुण्य का कोई बोझ नहीं होता।
जो व्यक्ति सब परमात्मा पर छोड़ देता हैवह हवा-पानी की तरह सरल हो जाता है। फिर जो होता हैहोता है। उसके लिए फिर कोई कठिनाई नहीं है। कोई बोझ नहींकोई दायित्व नहींकोई पुण्य नहींकोई पाप नहींक्योंकि कोई कर्म नहीं।
कृष्ण पूरे वक्त अर्जुन को यही समझा रहे हैं। अर्जुन पक्के बोझ से दबा हुआ है। बहुत रिस्पांसिबल आदमी मालूम होता है! बहुत दायित्वपूर्ण है। वह कहता हैये मर जाएंगेवे मर जाएंगे। जैसे वह बचाएगातो वे बच जाएंगे! जैसे वह न मारेगातो वे नहीं मरेंगे। वह कुछ ऐसा अनुभव कर रहा है कि जैसे वह कोई सारे अस्तित्व का सेंटर हैसब कुछ उसके ऊपर निर्भर है। वह जमाने की बातें कर रहा है कृष्ण सेकि इससे तो कुल का नाश हो जाएगा। इससे तो संतति विकृत हो जाएगी। इससे तो भविष्य में सब अंधकार हो जाएगा। सधवाएं विधवाएं हो जाएंगी। पापाचरण बढ़ेगा। वह सब बता रहा है। उसके कारण! अगर वह युद्ध करेगा! अगर वह युद्ध से हट जाएगातो सब ठीक होगातो अब तो अर्जुन कहीं भी नहीं है। लेकिन सब कहीं भी ठीक दिखाई नहीं पड़ता। अर्जुन का भ्रम यही है कि वह सोच रहा हैसारा जिम्मा मेरा है। मैं हूं सारी चीजों के बीच में।
कृष्ण पूरे समय एक ही बात समझा रहे हैं कि तू अपने को सेंटर न मान। तू अपने को केंद्र न मान। तू व्यर्थ की उलझन में मत पड़। जो करवा रहा हैजो कर रहा हैउस पर तू छोड़ दे। उसे मारना हैतो मारेगा। तेरे बहाने सेकिसी और के बहाने सेकिसी भी कंधे पर तीर रख जाएगा और वे मर जाएंगे। तू फिक्र न करतू सिर्फ उसके हाथ में निमित्त मात्र हो जा।
लेकिन उसकी समझ में नहीं आ रहा है। वह कर्ता है। और जो कर्ता हैवह निमित्त मात्र कैसे हो जाएजिसे खयाल है,मैं करने वाला हूंवह किसी के हाथ का माध्यम कैसे बन जाए?
वह कबीर की तरह अर्जुन नहीं हो सकता। कबीर कहते हैं कि यह बांसुरी मैं बजा रहा हूंइसमें मैं बांसुरी हूंबांस की पोंगरीस्वर मेरे नहीं हैं। स्वर उसके हैंपरमात्मा के हैं। इसलिए अगर गीत के लिए कोई धन्यवाद देना होतो उसी को दे देना। मेरा कोई हाथ नहीं है। मैं तो सिर्फ बांस की पोंगरी हूंजिसमें से स्वर उसके बहते हैं।
कृष्ण पूरी गीता में अर्जुन को कह रहे हैंतू बांस की पोंगरी हो जा। स्वर उसके बहने दे। तू यह मत सोच कि तू गा रहा है। तू बीच में मत आ। तू हट जा। तू निमित्त हो जा। वही उसकी समझ में नहीं आ रहा है।
जब ये दो बातें मैं कहता हूं कि व्यक्ति जिम्मेवार है अपने प्रत्येक कर्म के लिएतो मेरा मतलब हैजब तक आपका अहंकार हैजब तक व्यक्ति हैतब तक आपको जिम्मेवार होना पड़ेगा। व्यर्थ ही आप जिम्मेवार हैं। ट्रेन में चढ़े हैंगठरी सिर पर रखे हैं! कोई ट्रेन की जिम्मेवारी नहीं है। आप व्यर्थ परेशान हो रहे हैं। लेकिन जैसे ही व्यक्ति ने अपने को छोड़ासमर्पित कियावैसे ही व्यक्ति जिम्मेवार नहीं हैविराट ही है। और विराट की कोई जिम्मेवारी नहीं है। क्योंकि विराट किसके प्रतिरिस्पांसिबल होगाकिसके प्रति जिम्मेवार होगाकिसी के प्रति नहीं! व्यक्ति को जिम्मेवार होना पड़ेगा। विराट को जिम्मेवारी का कोई सवाल नहीं है। इनमें कोई विरोध नहीं है। यह दो तलों पर चीजों को देखना है।
दो तल हैं। एक अज्ञानी का तल हैअज्ञानी के तल पर समझना पड़ेगा। एक ज्ञानी का तल हैज्ञानी के तल पर भी समझना पड़ेगा। और बहुत बार बड़ी उलझन होती है कि अज्ञानी होता तो अज्ञानी के तल पर है और ज्ञानी के तल की बातें करने लगता हैतब बड़ी कठिनाई खड़ी हो जाती है। ऐसा रोज होता है। हमारे देश में तो जरूर हुआ है। क्योंकि इस देश में ज्ञान की इतनी बातें थीं कि अज्ञानी भी उनको करना सीख गए। वे भी ज्ञान की बातें करने लगे। रहते अज्ञानी की तरह हैंजीते अज्ञानी की तरह हैंबोझ अज्ञानी का लिए रहते हैं। वक्त परमौके परज्ञानी की तरह बातें करने लगते हैं।
मेरे पड़ोस में एक आदमी मर गयातो मैं उनके घर गया। पास-पड़ोस के लोग इकट्ठे थे। सब समझा रहे थे कि आत्मा तो अमर है। मैंने सोचाइस मुहल्ले में इतने ज्ञानी हैं! कहते हैंआत्मा अमर है! रोने की क्या जरूरत हैक्यों दुख मना रहे हैं?कोई मरता तो है नहींशरीर ही मरता है। मैंने उनके चेहरे गौर से देख लिए कि कभी जरूरत पड़े सलाह-मशविरे कीतो उनके पास चला जाऊंगा
फिर एक दिन पता लगा कि जो सज्जन अगुवा होकर समझाते थेआत्मा अमर हैउनके घर कोई मर गया। तो मैं भागा हुआ पहुंचा। देखातो वे रो रहे हैं। मैं बहुत हैरान हुआ। फिर मैंने कहाथोड़ी चुप्पी साधकर बैठूं। लेकिन हैरानी और बढ़ी। जिनके घर वे समझाने गए थेवे लोग समझाने आए हुए थे। और कह रहे थेआत्मा अमर है। काहे के लिए रो रहे हैं?
अब ये दो तल की बातें हैं। जो आत्मा को अमर जानते हैंउनकी दुनिया बहुत अलग है। लेकिन बात उनकी चुरा ली गई है। और जो आत्मा को मरने वाला मानते हैंजानते हैं भलीभांति कि मरेगीमरे या न मरेउनका जानना यही है कि मरेगी;उनके पास यह चोरी की बात है। इस बात का वहां बड़ा उपद्रव खड़ा हो जाता है। ज्ञान की चर्चा लोग सुनते हैं...।
एक संन्यासी के आश्रम में मैं कुछ दिन मेहमान था। तो वहां वे रोज समझाते थे कि आत्मा शुद्ध-बुद्ध है। वह कभी अशुद्ध होती ही नहीं। उनके सामने मैं लोगों को बैठे देखता था। वे कहतेजी महाराजबिलकुल ठीक कह रहे हैं। मैंने उन लोगों से पूछा अकेले में कि तुम कहते होजीबिलकुल ठीक कह रहे हैं! वे बोले कि बिलकुल ठीक बात हैआत्मा बिलकुल शुद्ध है।
लेकिन वे जो लोग उनके सामने पगड़ियां बांधकर और कहते थेआत्मा बिलकुल शुद्ध हैवे सब तरह के चोरसब तरह के ब्लैक मार्केटियरसब तरह के उपद्रवों में सम्मिलित थे। वे उसी ब्लैक मार्केट से वहां मंदिर भी खड़ा करवाते थे। और बैठकर सुनते थे कि आत्मा शुद्ध-बुद्ध है। सदा शुद्ध है। वह कभी पाप करती ही नहींकभी पाप उससे होता ही नहीं। आत्मा ने कभी कुछ किया ही नहीं। उनके मन को बड़ी राहत और कंसोलेशन मिलता होगा कि अपन ने ब्लैक मार्केट नहीं किया। अपन ने कोई चोरी नहीं की। आत्मा शुद्ध-बुद्ध हैबड़े प्रसन्न घर लौटे। वे प्रसन्न घर लौट रहे हैंवे यहां सुनने सिर्फ यही आ रहे हैं कि आत्मा शुद्ध है अर्थात अशुद्ध तो हो ही नहीं सकती। अब कितनी ही अशुद्धि करोअशुद्ध होने का कोई डर नहीं है। यह ज्ञान की बात और अज्ञान की दुनिया में जाकर बड़ा उपद्रव खड़ा करती है।
भारत के नैतिक पतन का कारण यह हैयहां दो तल की बातें हैं। एक तल पर बहुत ऊंचा ज्ञान था और दूसरे तल पर हमारा आदमी बहुत नीचे है। उस ऊंचे तल की बातें उसके कानों में पड़ गई हैं। वह वक्त-बेवक्त उनका उपयोग करता रहता है। वह कहता हैसब संसार माया है। इधर कहता चला जाता हैसब संसार माया हैऔर जिस-जिस चीज को माया कहता है,उसके पीछे जी-जान लगाकर दौड़ा भी चला जाता है! ये दो तल।
इसलिए मैंने जो बात कहीवह दो तल पर ही समझ लेनी उचित है। जब तक आपको पता है कि आप होतब तक समझना कि सब जिम्मेवारी आपकी है। तब तक ऐसा मत करना कि आप भी बने रहो और जिम्मेवारी परमात्मा पर छोड़ दो। ऐसा नहीं चलेगा। अगर जिम्मेवारी परमात्मा पर छोड़नी होतो आपको भी अपने को परमात्मा के चरणों में छोड़ देना पड़ेगा। वह अनिवार्य शर्त है। और जब तक आप अपने मैं को न छोड़ पाओउसके द्वार परतब तक सारी जिम्मेवारी का बोझ अपने सिर पर रखना। वह ईमानदारी हैसिंसियरिटी है। ठीक है फिर। पाप किया हैपुण्य किया हैमैं जिम्मेवार हूंक्योंकि जो भी किया हैवह मैंने किया है।
और अगर ऐसा लगे कि नहींसब जिम्मेवारी विराट की हैतो फिर इस मैं को उसके चरणों में रख आना। जिस दिन मैं को उसके चरणों में रख दोऔर जिस दिन यह हिम्मत आ जाए कहने की कि मैंने कुछ भी नहीं कियासब उसने कराया है। वही हैमैं नहीं हूं। उसका ही फैला हुआ हाथ हूं। फिर उस दिन से आपकी कोई जिम्मेवारी नहीं है।
लेकिन बड़े मजे की बात है कि उस दिन से आपके जीवन से बुरा एकदम विलीन हो जाएगा। क्योंकि बुरा घटित नहीं हो सकता बिना अहंकार के। उस दिन से आपके जीवन में शुभ के फूल खिलने शुरू हो जाएंगेसफेद फूलों से भर जाएगी जिंदगी। क्योंकि जहां अहंकार नहीं हैवहां शुभ्र फूल अपने आप खिलने शुरू हो जाते हैं।

चातुरर्‌वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।। 13।।

तथा हे अर्जुन! गुण और कर्मों के विभाग से ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्र मेरे द्वारा रचे गए हैं। उनके कर्ता को भी,मुझ अविनाशी परमेश्वर कोतू अकर्ता ही जान।

कृष्ण इस श्लोक में कहते हैंगुण और कर्म के अनुसार चार वर्ण मैंने ही रचे हैं! एक बात। और तत्काल दूसरी बात कहते हैं कि फिर भीउन्हें निर्माण करने वाले मुझ कर्ता कोतू अकर्ता ही जान।
बहुत मिस्टीरियसबहुत रहस्यपूर्ण वक्तव्य है। पहले हिस्से को पहले समझ लेंफिर दूसरे हिस्से को समझें।
वर्ण की बात ही असामयिक हो गई है। कृष्ण के इस सूत्र को पढ़कर न मालूम कितने लोग बेचैनी अनुभव करते हैं। परमात्मा ने रचे हैं वर्ण! कठिनाई मालूम पड़ती है। क्योंकि वर्णों के नाम पर इतनी बेहूदगी हुई है और वर्णों के नाम पर इतना अनाचार हुआ हैवर्णों की ओट और आड़ में इतना सड़ापन पैदा हुआ हैइतनी सड़ांध पैदा हुई है कि भारत का पूरा हृदय ही कैंसर से ग्रस्त अगर हुआतो वह वर्णों के सहारे हुआ है।
तो आज कोई भी विचारशील व्यक्ति जब इस सूत्र को पढ़ता हैतो थोड़ा या तो बेचैन होता है या जल्दी इसको पढ़कर आगे निकल जाता है। इस पर ज्यादा रुकता नहीं। ऐसा लगता है कि कुछ ठीक नहीं हैआगे बढ़ो। पर मैं इस पर जरा रुकना चाहूं। क्योंक्योंकि जीवन में सत्यों के आधार पर भी असत्य चल जाते हैं। सच तो यह है कि असत्य के पास अपने पैर नहीं होतेउसे पैर सदा सत्य से ही उधार लेने पड़ते हैं। इसलिए असत्य बोलने वाला बहुत कसमें खाता है कि जो मैं बोल रहा हूंवह सत्य है। बेईमानी को भी ईमानदारी के वस्त्र पहनने पड़ते हैं। और दुनिया में जब भी कोई सत्य जीवन-सिद्धांत प्रकट होता है,तो उसका भी दुरुपयोग किया गया हैकिया जाता रहा है। लेकिन इससे सिद्धांत गलत नहीं होता।
एटम का विश्लेषण हुआ। परिणाम में हिरोशिमा और नागासाकी का विध्वंस मिला। हिरोशिमा और नागासाकी के कारण एटम के विश्लेषण का सिद्धांत गलत नहीं होता। लाख आदमी मर गएजलकर राख हो गए। और पीढ़ियों दर पीढ़ियों तक बच्चे प्रभावित रहेंगे। पंगुअपंगअंधेलंगड़ेलूले पैदा होंगे। लेकिन फिर भी अणु के विश्लेषण का सिद्धांतथिअरी गलत नहीं होती है। गलत उपयोग हुआयह हमारे कारणसिद्धांत के कारण नहीं।
वर्ण के कारण जो-जो हुआउसके लिए हम जिम्मेवार हैंहम गलत लोग। उसके लिए वर्ण की वैज्ञानिक चिंतना जिम्मेवार नहीं है।
कृष्ण जब कहते हैंतो वे दो शब्दों का उपयोग करते हैं। वे कहते हैंगुण और कर्म के अनुसार मैंने चार वर्ण बनाए। गुण और कर्म!
व्यक्ति-व्यक्ति में गुणों का भेद है। और दुनिया में कोई समानता का उपाय नहीं हैजिससे हम गुण-भेद मिटा सकें। हम कितनी ही बड़ी कम्युनिस्टिक सोसायटी को पैदा कर लेंकितना ही साम्यवादी समाज निर्मित कर लेंगुण-भेद नहीं मिटा पाएंगे। धन को बराबर बांट देंकपड़े एक से पहना देंमकान एक से बना देंगुण भिन्न ही होंगे। गुण में अंतर नहीं मिटाया जा सकेगा। कोई उपाय नहीं है। गुण व्यक्ति की आत्मा का हिस्सा हैबाह्य समाज व्यवस्था का हिस्सा नहीं है गुण।
इसलिए पहली बात आपसे कहता हूं कि कृष्ण का यह खयाल कि यह वर्ण की व्यवस्था मैंने बनाईयह व्यक्ति के आंतरिक गुणधर्म की चर्चा है। इसका सामाजिक व्यवस्था से दूर का संबंध है। गहरे में संबंध व्यक्ति के भीतर के निजी व्यक्तित्व से हैइंडिविजुअलिटी से है।
एक-एक व्यक्ति में गुण का भेद है। और गुण हम जन्म से लेकर पैदा होते हैं। गुण निर्मित नहीं होतेबिल्ट-इन हैं;पैदाइश के साथ बंधे हैं। वह जो मां और पिता से जो कण मिलते हैं हमेंहमारे सब गुण उनमें ही छिपे हैं।
आइंस्टीन इतनी बुद्धिमत्ता को उपलब्ध होगायह उसके पहले अणु में छिपी हुई है। और आज नहीं कलवैज्ञानिक पहले अणु की जांच करके खबर कर सकेंगे कि यह व्यक्ति क्या होगा। वैज्ञानिक तो यहां तक पहुंच गए हैं कि उनका खयाल हैजैसे आज बाजार में फलों की और फूलों की दुकान पर फूलों के बीजों के पैकेट मिलते हैंऔर अंदर बीज होते हैं और ऊपर फूल की तस्वीर होती हैकि इन बीजों को अगर बो दियातो ऐसे फूल पैदा हो जाएंगे। वैज्ञानिक कहते हैंपच्चीस साल के भीतरइस सदी के पूरे होते-होतेहम आदमी के जीवाणु को भी पैकेट में रखकर दुकान पर बेच सकेंगे कि यह जीवाणु इस तरह का व्यक्ति बन सकेगा। उसकी तस्वीर भी ऊपर दे सकेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि वह जो पहला अणु हैउसमें सारा बिल्ट-इनसभी भीतर से निर्मित गुणों की व्यवस्था है। वह बाद में प्रकट होगीमौजूद सदा से है। और उस गुण में बुनियादी भेद है।
उन भेदों को कृष्ण कहते हैंचार में मैंने बांटा। मैंने अर्थात प्रभु नेचार में बांटा। प्रकृति नेपरमात्मा नेजो भी नाम हम पसंद करेंचार मोटे विभाजन किए हैं। और चार मोटे विभाजन हैं। यह बहुत संयोग की बात नहीं है कि दुनिया में जब भी जिन लोगों ने मनुष्यों के टाइप का विभाजन कियातो विभाजन हमेशा चार में कियाचाहे कहीं भी किया हो।
अभी पश्चिम के एक बहुत बड़े विचारक कार्ल गुस्ताव जुंग नेइस सदी के बड़े से बड़े मनोवैज्ञानिक नेजब आदमियों के टाइप बांटेतो उसने भी चार में बांटे। नाम अलगलेकिन बांटे चार में ही। इसमें कुछ मजबूरी है। चार ही हैं प्रकारमोटे। फिर तो एक-एक व्यक्ति में थोड़े-थोड़े फर्क होते हैंलेकिन मोटे चार ही प्रकार हैं।
कुछ लोग हैंजिनके जीवन की ऊर्जा सदा ही ज्ञान की तरफ बहती हैजो जानने को आतुर और पागल हैं। जो जीवन गंवा देंगेलेकिन जानने को नहीं छोड़ेंगे
अब एक वैज्ञानिक जहर की परीक्षा कर रहा है कि किस-किस जहर से आदमी मर जाता है। अब वह जानता है कि इस जहर को जीभ में रखने से वह मर जाएगालेकिन फिर भी वह जानना चाहता है। हम कहेंगेपागल हैबिलकुल पागल है! ऐसे जानने की जरूरत क्या है?
लेकिन हमारी समझ में न आएगा। वह ब्राह्मण का टाइप है। वह बिना जाने नहीं रह सकता। जीवन लगा देलेकिन जानकर रहेगा। वह जहर को जीभ में रखकरउस आनंद को पा लेगाजानने के आनंद कोकि हांइस जहर से आदमी मरता है। हम कहेंगेइसमें कौन-सा फायदा हैउस आदमी को क्या मिल रहा हैहम समझ न पाएंगे। सिर्फ अगर हमारे भीतर कोई ब्राह्मण होगातो समझ पाएगाअन्यथा हम न समझ पाएंगे।
आइंस्टीन को क्या मिल रहा हैसुबह से सांझ तक लगा है प्रयोगशाला में! क्या मिल रहा हैकौन-सा धनयह सुबह से सांझ तक पागल की तरह ज्ञान की खोज में किसलिए लगा है?
नहींकिसलिए का सवाल नहीं है। अंत का सवाल नहीं हैमूल का सवाल है। मूल में गुण उसके पास ब्राह्मण का है। वह जानने के लिए लगा हुआ है।
तो कृष्ण कहते हैंगुण और कर्म।
गुण भिन्न हैंचार तरह के गुण हैंचार तरह के आर्च टाइप हैं। जुंग ने आर्च टाइप शब्द का प्रयोग किया है। चार तरह के मूल प्रकार हैं। एक--जो ज्ञान की खोज मेंजिसकी आत्मा आतुर है। जिसकी आत्मा एक तीर हैजो जानने के लिएबस जानने के लिएअंतहीन यात्रा करती है।
अब जो लोग चांद पर पहुंचे हैंचांद पर क्या मिल जाएगाकुछ बहुत मिलने को नहीं है। लेकिन जानने की उद्दाम वासना! चांद पर भी नहीं रुकेंगे--औरऔरऔर आगे। कहीं कोई सीमा नहीं है। ये जो ज्ञान की खोज में आतुर लोग हैंये ब्राह्मण हैं--गुण से।
दूसरा एक वर्ग हैजो शक्ति का खोजी है। जिसके लिए पावरशक्ति सब कुछ हैशक्ति का पूजक है। शक्ति मिलीतो सब मिला। वह कहीं से भी जीवन में शक्ति मिल जाएतो उसी की यात्रा में लगा रहेगा। यह जो शक्ति का खोजी हैवह भी एक टाइप है। उसे इनकार नहीं किया जा सकता। क्षत्रिय उस गुण का व्यक्ति है।
अर्जुन इसी गुण का व्यक्ति हैकृष्ण ने इसी सिलसिले में यह बात भी कही है। वे उसे यही समझाना चाहते हैं कि तू अपने गुण को पहचानतू अपनी निजता को पहचान और उसके अनुसार ही आचरण करअन्यथा तू मुश्किल में पड़ जाएगा। क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति अपने गुण को छोड़कर दूसरे के गुण की तरह व्यवहार करता हैतब बड़ी अड़चन में पड़ जाता है। क्योंकि वह वह काम कर रहा हैजो वह कर नहीं सकता। और उस काम को छोड़ रहा हैजिसे वह कर सकता था।
और जीवन का समस्त आनंद इस बात में है कि हम वही पूरी तरह कर पाएं जो करने को नियतिडेस्टिनीजो करने को प्रभु ने उत्प्रेरित किया है। अन्यथा जीवन में कभी शांति नहीं मिल सकतीआनंद नहीं मिल सकता। जीवन का आनंद एक ही बात से मिलता है कि जो फूल हममें खिलने को थेवे खिल जाएंजो गीत हमसे पैदा होने को थावह पैदा हो जाए।
लेकिन अगर ब्राह्मण क्षत्रिय बन जाएतो कठिनाई में पड़ जाएगा। क्योंकि शक्ति में उसे कोई रस नहीं है। इसलिए आप देखें कि इस देश में ब्राह्मणों को इतना आदर दिया गयालेकिन ब्राह्मण ने उतने आदरसम्मानसर्वश्रेष्ठ ऊपर होने पर भी कोई शक्ति पाई नहीं। ब्राह्मण भिखारी का भिखारी रहा। उसने कोई शक्ति पाई नहीं। वह दीन का दीन ही रहा। वह अपनेझोपड़े में बैठकर ब्रह्म की खोज करता रहा। आदर उसे बहुत था। सम्राट उसके चरणों पर सिर रखते थे। राज्य उसके चरणों में लोट सकते थे। लेकिन उसे कोई मतलब न रहा। वह अपनी खोज में लगा रहा ब्रह्म कीदूर जंगल में बैठकर। पागल रहा होगा! हम कहेंगेजब सम्राट ही पैर पर सिर रखने आया थातो कुछ तो मांग ही लेना था!
कणाद के जीवन में कथा है। कणाद ब्राह्मण का टाइप है। नाम ही कणाद पड़ गया इसलिए कि कभी इतना अनाज भी घर में न हुआ कि संग्रह कर सकेरोज खेत में कण-कण बीन लेकणों को बीनने की वजह से नाम पड़ गयाकणाद। सम्राट को खबर लगी कि कणाद कण बीन-बीनकर खेतों के खा रहा है। सम्राट ने आज्ञा दी कि भरो रथों को धन-धान्य से! चलो कणाद के पास।
बहुत धन-धान्य को लेकर सम्राट पहुंचा। कणाद के चरणों में सिर रखा और कहा कि मैं बहुत धन-धान्य ले आया हूं। दुख होता है कि मेरे राज्य में आप रहें और आप कण बीन-बीनकर खाएं! आप जैसा महर्षि और कण बीने खेतों मेंतो मेरा अपमान होता है।
तो कणाद ने कहाक्षमा करें! खबर भेज देतेइतना कष्ट क्यों कियामैं तुम्हारा राज्य छोड़कर चला जाऊंगा। सम्राट ने कहाआप क्या करते हैं! कैसी बात कहते हैंआप मेरी बात नहीं समझे! कणाद तो उठकर खड़े हो गए! ज्यादा तो कुछ था नहींजो दो-चार किताबें थींबांधने लगे।
सम्राट ने कहाआप यह क्या करते हैंकणाद ने कहातेरे राज्य की सीमा कहां हैवह बता। मैं सीमा छोड़ बाहर चला जाऊं। क्योंकि मेरे कारण तू दुखी होतो बड़ा बुरा है। सम्राट ने कहायह मेरा मतलब नहीं है। मैं तो सिर्फ यह निवेदन करने आया कि बहुत धन-धान्य लाया हूंवह स्वीकार कर लें।
कणाद ने कहाउसे तू वापस ले जा! उसे तू वापस ले जाक्योंकि उस धन-धान्य की व्यवस्था और सुरक्षा और सुविधा कौन करेगाउसकी देख-रेख कौन करेगाहमें फुर्सत नहीं हैहम अपने काम में लगे हैं। थोड़ी-सी फुर्सत मिलती हैसुबह घूमने निकलते हैंउसी में खेत से कुछ दाने बीन लाते हैंउससे काम चल जाता है। कोई झंझट हमें है नहीं। तू अपना यह सब वापस ले जा। इसकी फिक्र कौन करेगाऔर हम इसकी फिक्र करेंगे कि हम अपनी फिक्र करेंगेजिस खोज में हम लगे हैं। तू जल्दी कर और वापस ले जाऔर दोबारा इस तरफ मत आना। और अगर आना होतो खबर कर देना। हम राज्य छोड़कर चले जाएंगे। हम कण कहीं भी बीन लेंगेसभी जगह मिल जाएंगे।
अब यह जो आदमी हैइसे कण बीनने में सुविधा मालूम पड़ती हैक्योंकि कोई व्यवस्था नहीं करनी पड़ती हैकोई मैनेजमेंट में नाहक समय जाया नहीं करना पड़ता है। नहीं तो बहुत-से मालिक घूम-फिरकर मैनेजर ही रह जाते हैं। लगते हैं कि मालिक हैंहोते कुल-जमा मैनेजर हैं।
एण्ड्रू कार्नेगीअमेरिका का अरबपति मरातो उसने अपने सेक्रेटरी से पूछा--ऐसे ही मजाक में--कि अगर दोबारा जिंदगी फिर से हम दोनों को मिलेतो तू मेरा फिर से सेक्रेटरी होना चाहेगा कि तू एण्ड्रू कार्नेगी होना चाहेगा और मुझको सेक्रेटरीबनाना चाहेगाउस सेक्रेटरी ने कहाआप नाराज तो न होंगेएण्ड्रू कार्नेगी ने कहा कि नाराज क्यों होऊंगा! बिलकुल स्वाभाविक हैतू एण्ड्रू कार्नेगी बनना चाहे। उसने कहामाफ करें। मैं यह नहीं कह रहा। मैं यह कह रहा हूं कि मैं फिर सेक्रेटरी ही होना चाहूंगा। एण्ड्रू कार्नेगी ने कहापागल! तू एण्ड्रू कार्नेगी नहीं बनना चाहताउसने कहाबिलकुल भूलकर नहीं। आपको जब तक नहीं जानता थातब तक तो कभी भगवान से प्रार्थना भी कर सकता थाअब कभी नहीं कर सकता। उसने कहाकारण क्या हैतो उसने कहा कि मैंने अपनी डायरी में कारण नोट किया हुआ है।
उसने अपनी डायरी में लिख छोड़ा था कि हे परमात्माभूलकर मुझे कभी एण्ड्रू कार्नेगी मत बनाना। क्योंकि एण्ड्रू कार्नेगीअपने दफ्तर में सुबह नौ बजे आता। चपरासी दस बजे आते। क्लर्क साढ़े दस बजे आते। मैनेजर ग्यारह बजे आता। डायरेक्टर्सएक बजे आते। डायरेक्टर्स तीन बजे चले जाते। चार बजे मैनेजर चला जाता। फिर क्लर्क चले जाते। फिर चपरासी चले जाते।एण्ड्रू कार्नेगी साढ़े सात बजे शाम को जाता। मुझे कभी एण्ड्रू कार्नेगी मत बनाना।
अब यह एण्ड्रू कार्नेगी दस अरब रुपए छोड़कर मरा है। लेकिन मालिक नहीं था। मैनेजर भी नहीं था। चपरासी भी नहीं था। चपरासी भी दस बजे आताचपरासी भी साढ़े चार बजे चला जाता। एण्ड्रू कार्नेगी चपरासी से पहले मौजूद हैचपरासी के बाद दफ्तर छोड़ रहे हैं! आखिर यह आदमी मैनेज कर रहा हैकिसके लिए?
नहींलेकिन इसका भी अपना टाइप है। वह तीसरा टाइप है। वह धनवैश्य का टाइप है। इसे प्रयोजन नहीं हैन ज्ञान सेन शक्ति से। इसे महाराज्यों से प्रयोजन नहीं है। इसे ब्रह्म से कोई वास्ता नहीं है। इसे ब्रह्मांड से कुछ लेना-देना नहीं है। दूर के तारों से मतलब नहीं है। पास के रुपए काफी हैं। यह तिजोरी बड़ी करता जाएभरता चला जाए। यह भी इसका टाइप है। यह वैश्य का टाइप है। धन इसकी आकांक्षा है।
चौथा एक शूद्र का टाइप हैश्रम उसकी आकांक्षा है। ऐसा नहीं हैजैसा हम साधारणतः समझाए जाते हैं कि कुछ लोगों को हम मजबूर कर देते हैं श्रम के लिएऐसा नहीं है। अगर कुछ लोगों को श्रम न मिलेतो उनके लिए जीना मुश्किल हो जाए। खाली सभी लोग नहीं रह सकते।
अभी अमेरिका में कठिनाई आनी शुरू हुई है। क्योंकि श्रम का काम समाप्त होने के करीब हैमशीनें करने लगी हैं। और अमेरिका के सब बड़े विचारशील लोग--चाहे जेकस ईलूल होऔर चाहे कोई और हों--वे सब इस चिंता में पड़े हैं कि दस-पंद्रह साल में सारा आटोमेटिक इंतजाम हो जाएगा। सब मशीनें काम कर देंगी। तो अब सवाल यह है कि लोग काम मांगेंगेतो हम काम कहां से देंगेऔर लोग काम मांगेंगेक्योंकि लोग बिना काम रह नहीं सकते। कुछ लोग तो रह ही नहीं सकते बिना काम।
एक दिन मैं ट्रेन में सफर कर रहा था। थका था। किसी गांव सेभीड़-भाड़ से लौट रहा थातो मैंने सोचा कि अब चौबीस घंटे सोए ही रहना है। पर एक सज्जन और मेरे कंपार्टमेंट में थे। मैं जैसे ही कमरे में आयामैंने उनकी तरफ देखा नहींक्योंकि देखा कि खतरा शुरू हो जाए! वे कुछ बातचीत शुरू कर दें। मैंने जल्दी से आंख बंद की और मैं सोने लगा। उन्होंने कहाक्या आप इतनी जल्दी सोने लगेमैंने कहा कि आप समझिएमैं सो ही गया। मैं तो चादर ओढ़कर सो रहा। घंटा भरडेढ़ घंटे बाद मैं उठातो देखा कि वही अखबार वे पढ़ रहे थेजब मैं सोया था। फिर उसको ही पढ़ रहे थेफिर से पहले पेज से शुरू कर दिया था। मुझे देखातो उन्होंने जल्दी से अखबार बंद किया। मैंने कहाआप पढ़िएमैं तो फिर वापस सो जाने वाला हूं।
सुबह जब उठातब वे फिर कल वाला ही अखबार पढ़ रहे थे! न मालूम कितनी बार पढ़ चुके थे! जब मुझे देखातो जरा संकोच में उन्होंने अखबार बंद करके रख दिया। मैं करवट लिए पड़ा रहा। कभी वे खिड़की खोलतेकभी सूटकेस खोलतेकभी यह चीज इधर रखतेकभी वह चीज उधर रखते।
दोपहर होते-होते मैंने देखा कि वे बिलकुल पागल हुए जा रहे हैं। दोपहर को जब मैं खाना खाकर फिर सोने लगाउन्होंने कहाक्या आप गजब कर रहे हैं! फिर सोइएगाकुछ बातचीत नहीं करिएगामैंने कहा कि आप अपना काम जारी रखिए। मुझे कोई एतराज नहीं है। आप बार-बार खिड़की खोलिएबंद करिए! सूटकेस दबाइएउठाइए। जो आपको करना है। आप उसी अखबार को हजार दफे पढ़िएमुझे कोई एतराज नहीं है। आप मुझे भूलिए। मैं नहीं हूं। वे बोलेआपने खयाल कर लिया क्या?मैं डर रहा था कि आप क्या सोचेंगे कि यह आदमी क्यों बार-बार खिड़की खोलता बंद करता है! लेकिन मैं क्या करूंमैं खाली बहुत मुसीबत में हूं।
अब यह भी एक टाइप हैजो बिना काम के जी नहीं सकता।
आज अमेरिका में दो दिन की छुट्टी हो गई है सप्ताह मेंतो आप जानकर हैरान होंगे कि अमेरिका में एक कहावत है कि दो दिन की छुट्टी के बाद आदमी इतना थक जाता है कि एक सप्ताह विश्राम की जरूरत पड़ती है। यह बड़ी मुश्किल बात है! दो दिन की छुट्टी के बाद आदमी इतना थक जाता है कि सात दिन के विश्राम की जरूरत पड़ती है! तो छुट्टी में विश्राम किया आपने?
नहींछुट्टी में लोग सैकड़ों-हजारों मील कार चलाएबीच पर पहुंचे। एक नहीं पहुंचानैक टु नैक कारेंएक-दूसरे से फंसी रहीं। लाखों कारें पहुंच गईं। पूरी बस्ती समुद्र के तट पर पहुंच गई। जिस बस्ती से भागे थेलेकिन पूरी बस्ती भाग रही हैवह पूरी बस्ती वहां मौजूद हो गई। इससे तो अच्छा घर रह जातेतो अब घर में थोड़ा सन्नाटा रहता। क्योंकि सारी बस्ती बीच पर आ गई। अब सारी बस्ती बीच पर रही। फिर बीच से भागे!
सारे अमेरिका में छुट्टी के दिन सर्वाधिक दुर्घटनाएं हो रही हैं। क्योंकि छुट्टी के दिन लोग बिलकुल शैतानी के काम में लग जाते हैं। क्या करेंफुर्सत खतरनाक है! जब तक मिली नहींतब तक आपको पता नहीं। अगर पूरी फुर्सत मिल जाएतो खतरनाक है। तब आपको पता चलेगा कि श्रम करने वाला भी एक टाइप हैजो बिना श्रम किए नहीं रह सकता।
कृष्ण कहते हैंये चार गुण से विभाजित लोग हैं। शायद इन चारों की जरूरत भी है। क्योंकि सारे लोग ज्ञान खोजेंतो जगत अस्तित्व में नहीं रह जाए। और सारे लोग शक्ति खोजेंतो सिवाय युद्धों के कुछ भी न हो। और सारे लोग धन खोजें,तो आदमी मर जाएं और तिजोरियां बचें। और सारे लोग श्रम करेंतो कोई संस्कृतिकोई सभ्यताकोई कलाकोई विज्ञानकोई दर्शनकोई धर्म--कुछ भी न हो। ये चारों कांप्लिमेंट्री हैं। इन चारों के बिना जगत नहीं हो सकता।
इसलिए कृष्ण कहते हैंये चारगुण से और कर्म से।
भीतर तो गुण हैंउन गुणों से जुड़े हुए संयुक्त कर्म हैं। गुण ही बाहर प्रगट होकर कर्म बन जाते हैं। भीतर जिनका नाम गुण हैबाहर उनका नाम कर्म है। जब बीज में होते हैंतो उनका नाम गुण हैऔर जब प्रकट होकर संबंधित होते हैंतो उनका नाम कर्म हो जाता है
गुण-कर्म से मैंने चार में बांटाकृष्ण कहते हैं।
यह चार का विभाजनकृष्ण की दृष्टि में ऊंचे-नीचे का विभाजन नहीं है। कृष्ण की दृष्टि में इसमें कोई हायरेरकी नहीं है। इसमें कोई ऊपर और कोई नीचे नहीं है। ये चार जीवन केशरीर केचार अंग हैंसमान मूल्य के। एक के भी बिना तीन नहीं हो सकते।
विकृति उस दिन आनी शुरू हुईजिस दिन हमने हायरेरकी बनाई। जिस दिन हमने कहा कि नहीं कोई ऊपरऔर कोई नीचे। नहींश्रम भी उतना ही ऊपर हैजितना ज्ञान। और अगर किसी को ज्ञान की पिपासा है और किसी को अगर श्रम की पिपासा हैतो श्रम की पिपासा का भी हकदार है आदमी कि अपनी पिपासा को पूरी करे। ज्ञान की पिपासा का भी हकदार है आदमी कि अपनी पिपासा को पूरी करे। और दोनों ही पिपासाएं विराट से मिली हैंजन्म से मिली हैंबिल्ट-इन हैं। इसलिए गौरव की बात क्या है?
अगर मुझे सत्य की खोज की आकांक्षा हैतो इसमें गौरव की बात क्या हैयह मुझे वैसे ही मिली हैगिवेन हैवरदान है परमात्मा काजैसे एक आदमी को श्रम की क्षमता मिली है। इसमें अगौरव क्या हैकोई नीचे-ऊपर नहीं है। वह उसका बिल्ट-इन प्रोग्रेम है।
एक फूल गुलाब बनने को हुआ हैएक फूल कमल बनने को हुआ हैएक फूल जुही बना हैएक फूल चमेली बना है। दुनिया सुंदर है। जितने ज्यादा फूल हैंउतनी ही सुंदर है। लेकिन गुलाब गुलाब होने की मजबूरी में है। कमल कमल होने की मजबूरी में है। कमल का कमल होनाकमल का गौरव नहीं हैवह कमल की नियति हैडेस्टिनी है। गुलाब का गुलाब होना भी गुलाब की डेस्टिनी है। और एक घास के फूल का घास का फूल होना भी उसकी अपनी डेस्टिनी है।
और मजे की बात यह है कि जब घास का फूल अपने पूरे सौंदर्य में खिलता हैतो किसी गुलाब के फूल से पीछे नहीं होता। आपके लिए होगाक्योंकि बाजार में बेचेंगेतो घास के फूल का दाम नहीं मिलेगा। लेकिन घास के फूल के लिएखुद घास के फूल के लिएघास का फूल जब पूरी तरह खिलता हैतो उतनी ही एक्सटैसी मेंउतने ही हर्षोन्माद में होता हैजितना जब गुलाब का फूल अपनी पूरी पंखुड़ियों को खिलाकर नाचता है सूरज की रोशनी में। दोनों अपने आनंद में होते हैं। और सूरज घास के फूल से यह नहीं कहता कि शूद्र! हटमैं सिर्फ गुलाब के फूलों के लिए आया हूं। नहींसूरज उतने ही आनंद से बरसता है घास के फूल पर। चांद उतने ही आनंद से अमृत बरसाता है। हवाएं उतने ही आनंद से घास के फूल को भी नृत्य और थपकी देती हैंजितनी गुलाब के फूल को देती हैं। इसमें कोई भेद-भाव नहीं है।
जगत केअस्तित्व के भीतर कोई भेद-भाव नहीं है। गुण-भेद हैभेद-भाव नहीं है। कोई नीचे-ऊपर नहीं है। विभाजन है,शत्रुता नहीं है। कोई एक-दूसरे के कांफ्लिक्ट में नहीं है। संघर्ष नहीं हैसहयोग है।
कृष्ण के लिएजिस दिन वर्ण की उन्होंने बात कहीचारों वर्णों में एक अंतर-सहयोग थाएक इनर को-आपरेशन था। एक आर्गेनिक यूनिटी थी। इन चारों के बीच एक शरीर-संबंध था।
इसलिए कृष्ण ने पीछे शरीर से तुलना भी की है कि कोई सिर हैकोई पैर हैकोई पेट है। अंग की भांति सारे वर्ण हैं। कोई नीचे-ऊपर नहीं है। लेकिन नीचे-ऊपर दिखाई पड़ता है। क्योंकि उन्होंने कहा कि सिर। सिर ऊपर मालूम होता है। पैर! पैर नीचे मालूम होते हैं। लेकिन यह ऊपर-नीचे होना फिजिकल है। यह ऊपर-नीचे होना मूल्यांकन नहीं है। यह मूल्यांकनइसमें कोईवेल्युएशन नहीं है कि पैर नीच हैऐसा नहीं है। अगर नीचा हैतो उसका कुल मतलब इतना है कि स्पेस में सिर ऊपर मालूम हो रहा हैपैर नीचे। लेकिन वह भी सब बातचीत काल्पनिक है।
एक आदमी किसी की छत पर खड़े होकर देखेतो आपका सिर नीचे हो जाता हैउसका सिर ऊंचा हो जाता है। छोटे बच्चे करते हैं। कुर्सी पर खड़े हो जाते हैं बाप के पास और कहते हैंहम तुमसे बड़े हैं। फिजिकल! हैं भी बड़ेजब ऊपर हो गए। अगर सिर ऊपर है पैर सेतो बेटा कुर्सी पर खड़ा होकर बड़ा है।
तो छिपकलीजो आपके छत पर चल रही है आपके सिर के ऊपर! छिपकली के बाबत क्या खयाल हैब्राह्मण के ऊपर छिपकली चल रही है! छिपकली बहुत ऊपर है!
ये ऊपर-नीचे की बचकानी बातें हैं। इसमें कुछ भेदकोई मूल्यांकन कृष्ण के मन में नहीं हैकिसी के मन में नहीं था। हमारे मन में पैदा हुआ। हमने थोपा।
कृष्ण कहते हैंगुण और कर्म के अनुसार मैंने विभाजित किया व्यक्तियों को।
गुणभीतरी क्षमताकर्मबाहरी अभिव्यक्तिकर्ममैनिफेस्टेशन
ध्यान रहेगुण जब कर्म बनता हैतभी दूसरों को पता चलता है। जब तक गुण गुण रहता हैतब तक किसी को पता नहीं चलता। दूसरों को ही नहींखुद को भी पता नहीं चलता। खुद को भी पता तभी चलता हैजब गुण कर्म बनता है। जब एक व्यक्ति अपने को प्रकट करता है अपने कर्मों मेंतभी आपको भी पता चलता है और उसको भी पता चलता है कि वह क्या है।
गुणबीज की तरह छिपा हुआ अस्तित्व है। कर्मवृक्ष की तरह प्रकट अस्तित्व है।
गुण और कर्म के अनुसार विभाजित मनुष्य हैं। इस विभाजन को कभी भी तोड़ा नहीं जा सकता। इस विभाजन को इनकार किया जा सकता है। कानून बनाया जा सकता है कि ऐसा कोई विभाजन नहीं है। विधान बनाया जा सकता हैऐसा कोई विभाजन नहीं है। लेकिन विभाजन जारी रहेगा।
अगर हम एक कानून बना लें। और कोई कठिन नहीं हैहम एक कानून बना दें कि स्त्री-पुरुषों के बीच कोई विभाजन नहीं है। कानून बनाया जा सकता हैमेजारिटी चाहिए! और हमेशा मेजारिटी हर तरह की बेवकूफी के लिए मिल सकती है। अगर आपकी धारा-सभा मेंआपकी असेंबली और पार्लियामेंट मेंबहुमत तय कर ले कि स्त्री-पुरुष में कोई फासला नहीं हैतो कानून बन सकता है। लेकिन कानून बनने से प्रकृति नहीं बदल जाती।
कानून बन भी गए हैं करीब-करीब। कानून ही नहीं बन गएपश्चिम के मुल्कों ने स्त्री और पुरुष के बीच के फासले को गिराना भी शुरू कर दिया है। तो पुरुष स्त्रियों जैसे होने की कोशिश में लग गए हैंताकि एक-दूसरे की तरफ थोड़ा-थोड़ा चलेंतो फासला कम हो जाए। स्त्रियां पुरुषों जैसी होने लग गई हैं। स्त्रियां पुरुषों के कपड़े पहन रही हैंपुरुष स्त्रियों के कपड़े पहनने की कोशिश में लगे हैं। स्त्रियां बाल कटा रही हैंपुरुष बाल लंबे कर रहे हैं! ऐसा दोनों थोड़ा-थोड़ा चलेंगेतो कहीं मिलन हो जाएगा,इस आशा में।
लेकिन अगर स्त्रियों और पुरुषों को बिलकुल एक जैसी शकल का भी बनाकर खड़ा कर दिया जाएतो भी नियति का जो फासला हैवह नहीं गिर जाता। लेकिन उस फासले में कोई ऊंच-नीच नहीं है। वह वर्टिकल नहीं हैहारिजांटल है। वह फासला ऊंचा-नीचा नहीं है।
ठीक गुण और कर्म से भी जो भेद हैवह नियतिगतस्वभावगत है। उस स्वभावगत भेद को कृष्ण कहते हैंमैंने ही निर्मित किया।
इस विभाजन को स्वाभाविकपरमात्मा से आया हुआ विभाजन वे कह रहे हैं। इन-बॉर्नइन-बिल्टप्रकृति में ही छिपा हुआयही उनका अर्थ है। और यह वे इसीलिए कह रहे हैंताकि अर्जुन को ठीक से खयाल आ जाए कि उसका अपना गुणकर्मक्या है। और वह उसके स्मरण को ध्यान में लेकर कर्म में सक्रिय हो सकेगुण को पहचानकर कर्म कर सके।
गुण और कर्म का मेल हो जाएतो व्यक्ति के जीवन में एक हार्मनीएक अंतर-संगीत पैदा हो जाता है। गुण और कर्म का भेद टूट जाएतो व्यक्ति के जीवन में विसंगीत उत्पन्न हो जाता है।
एक प्रश्न है आखिरी। फिर हम सुबह बात करेंगे।

प्रश्न:
भगवान श्रीअभी आपने कहा कि ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्र में मूल्यों की श्रेष्ठताहायरेरकी नहीं है। लेकिन चेतना की ऊंचाइयों एवं चेतना के विकास को खयाल में रखने परक्या ब्राह्मण की चेतना शूद्र की चेतना से श्रेष्ठ नहीं है?

नहींचेतना किसी की श्रेष्ठ नहीं है। चेतना श्रेष्ठ होती है अपने गुण को पूरा उपलब्ध कर लेने परकिसी की भी श्रेष्ठ हो जाती है।
अगर ब्राह्मण ज्ञान के साथ आत्मसात हो जाएतो उसकी चेतना श्रेष्ठ हो जाती है। अगर क्षत्रिय शक्ति के साथ आत्मसात हो जाएएक हो जाए...। अर्जुन जब तीर चलाएतो तीर और अर्जुन अलग-अलग न रह जाएंअर्जुन तीर बन जाए। अर्जुन जब तलवार हाथ में लेतो हाथ और तलवार के बीच का फासला गिर जाएहाथ और तलवार एक हो जाएं। तो ब्राह्मण जब ध्यान में पूरा लीन होकर ब्रह्म के साथ एक होता हैतो जिस अनुभव को उसकी चेतना उपलब्ध होती हैउसी अनुभव को अर्जुन की चेतना भी उपलब्ध हो जाएगीजब वह घूमती हुई तलवार के साथ एक हो जाएगा। अर्जुन के लिए वही ध्यान बन जाएगा।
जापान में मंदिर हैंजिन मंदिरों पर तलवारों के चिह्न बने हुए हैं। जापान में क्षत्रियों का एक समूह हुआसमुराई। मंदिरों पर तलवार! और मंदिरों के भीतर तलवार सिखाने के लिए स्कूल हैं। कभी बहुत चौंकने की बात मालूम पड़ती है! मंदिर के भीतर तलवार चलाने का स्कूलतलवार की ट्रेनिंगपागल हो गए हैं आपमंदिर में तलवार चलाना सिखाकर क्या करिएगा?
लेकिन समुराई कहते हैं कि हम क्षत्रिय हैं। हम तो तलवार की चमक पर जब एक हो जाएंगेजब तलवार और हमारे बीच कोई फासला न रहेगातलवार का नृत्य ही जब हमारे प्राणों का नृत्य हो जाएगाहम बिलकुल एक हो सकेंगेवही हमारा ध्यान हैवही हमारी समाधि है। वहीं से समाधि मिल जाएगी।
अगर श्रम का आतुर व्यक्ति अपने श्रम में इतना डूब जाए कि पीछे कोई भी न बचेफावड़े से खोदता है जमीन को या काटता है लकड़ी को कुल्हाड़ी सेउसकी कुल्हाड़ी के उठने के साथ ही उसका भी उठना होऔर कुल्हाड़ी के गिरने के साथ उसका भी गिरना होकुल्हाड़ी और उसके बीच कोई अंतर न रह जाएतो वह उसी ध्यान को उपलब्ध हो जाता हैजो ब्राह्मण अपनी कुटी में बैठकर ध्यान करके उपलब्ध होता है।
ध्यानचारों वर्ण के लोग अपने-अपने ढंग से उपलब्ध हो सकते हैं। और जो भी चेतना ध्यान को उपलब्ध हो जाती है,वह श्रेष्ठ हो जाती है। श्रेष्ठता का संबंध शूद्रब्राह्मण और वैश्य और क्षत्रिय से नहीं है। श्रेष्ठता का संबंध ध्यान से है। जो चेतना ध्यान को उपलब्ध हो जाएकिसी भी मार्ग सेवह चेतना श्रेष्ठता को उपलब्ध हो जाती है।
श्रेष्ठता ध्यान से उपलब्ध होती है। और चार तरह के ध्यान होंगे मोटे--शूद्र के लिएब्राह्मण के लिएक्षत्रिय के लिए,वैश्य के लिए। तल्लीनता! इतनी तल्लीनता कि भीतर से कर्ता मिट ही जाएएक हो जाए। यह एकता किसी भी भांति आ जाए। यह प्रयोगशाला में आ जाए वैज्ञानिक कोकि नृत्यकार को नाचते हुए आ जाएयह वाद्य बजाने वाले वीणावादक को वीणा में आ जाएयह शिक्षक को पढ़ाने में आ जाएयह गिट्टी फोड़ने वाले को गिट्टी फोड़ने में आ जाए। कहीं भी आ जाए। यह ध्यान जहां भी आ जाएवहीं श्रेष्ठता चेतना की उपलब्ध हो जाती है।

चेतना की श्रेष्ठता वर्ण पर निर्भर नहींचेतना की श्रेष्ठता ध्यान पर निर्भर है।
और कुछ सवाल होंगेतो कल सुबह। आज की रात की बैठक पूरी हुई।

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