गुरुवार, 22 सितंबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-02)-प्रवचन-001

सत्य एक--जानने वाले अनेक



श्री भगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।। 1।।

श्रीकृष्ण भगवान बोलेहे अर्जुनमैंने इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में सूर्य के प्रति कहा था और सूर्य ने अपने पुत्र मनु के प्रति कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु के प्रति कहा।
सत्य न तो नया हैन पुराना। जो नया हैवह पुराना हो जाता है। जो पुराना हैवह कभी नया था। जो नए से पुराना होता हैवह जन्म से मृत्यु की ओर जाता है। सत्य का न कोई जन्म हैन कोई मृत्यु है। इसलिए सत्य न नया हो सकता है,न पुराना हो सकता है। सत्य सनातन है।
सनातन का अर्थसत्य समय के बाहर हैबियांड टाइम है। वस्तुतः समय के भीतर जो भी हैवह नया भी होगा और पुराना भी होगा। समय के भीतर जो हैवह पैदा भी होगा और मरेगा भीजवान भी होगा और बूढ़ा भी होगा। कभी स्वस्थ भी होगा और कभी अस्वस्थ भी होगा। समय के भीतर जो हैवह परिवर्तनमय होगासमय के बाहर जो हैवही अपरिवर्तित हो सकता है।
कृष्ण ने इस सूत्र में बहुत थोड़ी-सी बात में बहुत-सी बात कही है। एक तो उन्होंने यह कहा कि यह जो मैं तुझसे कहता हूं अर्जुनवही मैंने सूर्य से भी कहा थासमय के प्रारंभ मेंआदि में। इसमें दोत्तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
समय के प्रारंभ का क्या अर्थ हो सकता हैसच तो यह है कि जहां भी प्रारंभ होगावहां समय पहले से ही मौजूद हो जाएगा। सब प्रारंभ समय के भीतर होते हैंसमय के बाहर कोई प्रारंभ नहीं हो सकताक्योंकि सब अंत समय के भीतर होते हैं। कृष्ण जब कहते हैंसमय के प्रारंभ मेंतो उसका अर्थ ही यही होता हैसमय के बाहर। समय के भीतर अगर कोई प्रारंभ होगा,तो वह शाश्वत सत्य की घोषणा नहीं कर सकता है।
जब समय नहीं थातब मैंने सूर्य को भी यही कहा है। इस बात को भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है कि सूर्य को भी यही कहा हैइस मेटाफर काइस प्रतीक का क्या अर्थ हो सकता है?
जो भी अध्यात्म की गहराइयों में उतरे हैंउन सबका एक सुनिश्चित अनुभव है और वह यह कि अध्यात्म की आखिरी गहराई में प्रकाश ही शेष रह जाता है और सब खो जाता है। जब व्यक्ति अध्यात्म में शून्य होता हैअहंकार विलीन होता हैतो प्रकाश ही रह जाता हैऔर सब खो जाता है। व्यक्ति जब अध्यात्म की गहराई में उतरता हैतो वह वहीं पहुंच जाता हैजब समय के पहले सब कुछ था। गहरे अनुभवप्रथम और अंतिमसमान होते हैं।
यही मैंने सूर्य को कहा थाकृष्ण जब यह कहते हैंतो वे यह कहते हैंयही मैंने प्रकाश की पहली घटना को कहा था।
इस जगत के प्रारंभ की पहली घटना प्रकाश है और इस जगत के अंत की अंतिम घटना भी प्रकाश है। व्यक्ति के आध्यात्मिक जन्म का भी प्रारंभ प्रकाश है और आध्यात्मिक समारोप भी प्रकाश है।
कुरान कहता हैपरमात्मा प्रकाश-स्वरूप है। बाइबिल कहती हैपरमात्मा प्रकाश ही है। कृष्ण यहां प्रकाश को सूर्य कहते हैं। सूर्य को कहा था सबसे पहलेक्योंकि सबसे पहले प्रकाश थाऔर फिर जो भी जन्मा हैवह प्रकाश से ही जन्मा है। फिर प्रकाश के पुत्र को कहा थाफिर उसके पुत्र को कहा था।
इसमें यह भी समझ लेने जैसा है कि कृष्ण कहते हैंमैंने। निश्चित हीयह मैंवह जो कृष्ण की देह थी अर्जुन के सामने खड़ीउसके संबंध में नहीं हो सकता। वह देह तो अभी कुछ वर्ष पहले पैदा हुई थी और कुछ वर्ष बाद विदा हो जाएगी। कृष्ण जिस मैं की बात कर रहे हैंवह कोई और ही मैं होना चाहिए।
जीसस ने अपने एक वक्तव्य में कहा है--किसी ने जीसस को पूछाअब्राहम के संबंध में आपका क्या खयाल हैअब्राहम एक पुराना पैगंबर हुआ यहूदियों का। पूछा जीसस से किसी नेअब्राहम के संबंध में आपका क्या खयाल हैतो जीसस ने कहा,बिफोर अब्राहम वाज़आई वाज़। इसके पहले कि अब्राहम थामैं था। अब्राहम के पहले भी मैं था।
निश्चित हीयह मरियम के बेटे जीसस के संबंध में कही गई बात नहीं है। अब्राहम के पहले! अब्राहम को हुए तो हजारों साल हुए!
कृष्ण सूर्य की--जगत की पहली घटना की--फिर मनु कीइक्ष्वाकु कीइनकी बात कर रहे हैं। उन्हें हुए हजारों वर्ष हुए। कृष्ण तो अभी हुए हैं। अभी अर्जुन के सामने खड़े हैं। जिस कृष्ण की यह बात हैवह किसी और कृष्ण की बात है।
एक घड़ी है जीवन की ऐसीजब व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़ देतातो उसके भीतर से परमात्मा ही बोलना शुरू हो जाता है। जैसे ही मैं की आवाज बंद होती हैवैसे ही परमात्मा की आवाज शुरू हो जाती है। जैसे ही मैं मिटता हूंवैसे ही परमात्मा ही शेष रह जाता है।
यहां जब कृष्ण कहते हैंमैंने ही कहा था सूर्य सेतो यहां वे व्यक्ति की तरह नहीं बोलतेसमष्टि की भांति बोलते हैं। और कृष्ण के व्यक्तित्व में इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है कि बहुत क्षणों में वे अर्जुन के मित्र की भांति बोलते हैं,जो कि समय के भीतर घटी हुई एक घटना है। और बहुत क्षणों में वे परमात्मा की तरह बोलते हैंजो समय के बाहर घटी घटना है।
कृष्ण पूरे समय दो तलों परदो डायमेंशंस में जी रहे हैं। इसलिए कृष्ण के बहुत-से वक्तव्य समय के भीतर हैंऔर कृष्ण के बहुत-से वक्तव्य समय के बाहर हैं। जो वक्तव्य समय के बाहर हैंवहां कृष्ण सीधे परमात्मा की तरह बोल रहे हैं। और जो वक्तव्य समय के भीतर हैंवहां वे अर्जुन के सारथी की तरह बोल रहे हैं। इसलिए जब वे अर्जुन से कहते हैंहेमहाबाहो! तब वे अर्जुन के मित्र की तरह बोल रहे हैं। लेकिन जब वे अर्जुन से कहते हैंसर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज--सब छोड़तू मेरी शरण में आ--तब वे अर्जुन के सारथी की तरह नहीं बोल रहे हैं।
इसलिए गीताऔर गीता ही नहींबाइबिल या कुरान या बुद्ध और महावीर के वचन दोहरे तलों पर हैं। और कब बीच में परमात्मा बोलने लगता हैइसे बारीकी से समझ लेना जरूरी हैअन्यथा समझना मुश्किल हो जाता है।
जब कृष्ण कहते हैंसब छोड़कर मेरी शरण आ जातब इस मेरी शरण से कृष्ण का कोई भी संबंध नहीं है। तब इस मेरी शरण से परमात्मा की शरण की ही बात है।
इस सूत्र में जहां कृष्ण कह रहे हैं कि यही बात मैंने सूर्य से भी कही थी--मैंने। इस मैं का संबंध जीवन की परम ऊर्जा,परम शक्ति से है। और यही बात! इसे भी समझ लेना जरूरी है।
सत्य अलग-अलग नहीं हो सकता। बोलने वाले बदल जाते हैंसुनने वाले बदल जाते हैंबोलने की भाषा बदल जाती है;बोलने के रूप बदल जाते हैंआकार बदल जाते हैंसत्य नहीं बदल जाता। अनेक शब्दों मेंअनेक बोलने वालों नेअनेक सुनने वालों से वही कहा है।
उपनिषद जो कहते हैंबुद्ध उससे भिन्न नहीं कहतेलेकिन बिलकुल भिन्न कहते मालूम पड़ते हैं। बोलने वाला बदल गयासुनने वाला बदल गया और युग के साथ भाषा बदल गई।
महावीर जो कहते हैंवह वही कहते हैंजो वेदों ने कहा हैपर भाषा बदल गईबोलने वाला बदल गयासुनने वाले बदल गए। और कई बार शब्दों और भाषा की बदलाहट इतनी हो जाती है कि दो अलग-अलग युगों में प्रकट सत्य विपरीत और विरोधी भी मालूम पड़ने लगते हैं।
मनुष्य जाति के इतिहास में इससे बड़ी दुर्घटना पैदा हुई है। इस्लाम या ईसाइयत या हिंदू या बौद्ध या जैनऐसा मालूम पड़ते हैं कि विरोधी हैंराइवल्स हैंशत्रु हैं। ऐसा प्रतीत होता हैइन सबके सत्य अलग-अलग हैं। इन सबके युग अलग-अलग हैं,इन सबके बोलने वाले अलग-अलग हैंइन सबके सुनने वाले अलग-अलग हैंइनकी भाषा अलग-अलग हैलेकिन सत्य जरा भी अलग नहीं है। और धार्मिक व्यक्ति वही हैजो इतने विपरीत शब्दों में कहे गए सत्य की एकता को पहचान पाता हैअन्यथा जो व्यक्ति विरोध देखता हैवह व्यक्ति धार्मिक नहीं है।
तो कृष्ण यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी कह रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि यही सत्यठीक यही बात पहले भी कही गई है। यहां एक बात और भी खयाल में ले लेनी जरूरी है।
कृष्ण ओरिजिनल होने कामौलिक होने का दावा नहीं कर रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे हैं कि यह मैं ही पहली बार कह रहा हूंयह नहीं कह रहे हैं कि मैंने ही कुछ खोज लिया है। वे यह भी नहीं कह रहे हैं कि अर्जुनतू सौभाग्यशाली हैक्योंकि सत्य को तू ही पहली बार सुन रहा है। न तो बोलने वाला मौलिक हैन सुनने वाला मौलिक हैन जो बात कही जा रही हैवह मौलिक है। इसका यह मतलब नहीं है कि पुरानी है।
अंग्रेजी में जो शब्द है ओरिजिनल और हिंदी में भी जो शब्द है मौलिकउसका मतलब भी नया नहीं होता। अगर ठीक से समझेंतो ओरिजिनल का मतलब होता हैमूल-स्रोत से। मौलिक का भी अर्थ होता हैमूल-स्रोत से। मौलिक का अर्थ भी नया नहीं होता। ओरिजिनल का अर्थ भी नया नहीं होता।
अगर इस अर्थों में हम समझें मौलिक कोतो कृष्ण बड़ी मौलिक बात कह रहे हैं। वे कह रहे हैंसमय के मूल में यही बात मैंने सूर्य से भी कही थीवही सूर्य ने अपने पुत्र को कही थीवही सूर्य के पुत्र ने अपने पुत्र को कही थी। यह बात मौलिक है। मौलिक अर्थात मूल से संबंधितनई नहीं। ओरिजिनलकंसर्न्ड विद दि ओरिजिनवह जो मूल-स्रोत हैजहां से सब पैदा हुआवहीं से संबंधित है।
लेकिन आज के युग में मौलिक का कुछ और ही अर्थ हो गया है। मौलिक का अर्थ हैकोई आदमी कोई नई बात कह रहा है। मूल की बात कह रहा है। नए अर्थों में कृष्ण की बात नई नहीं हैमूल के अर्थों में मौलिक हैओरिजिनल है। वह जो सभी चीजों का मूल हैसभी अस्तित्व कावहीं से इस बात का भी जन्म हुआ है।
मौलिक का जो आग्रह है नए के अर्थों मेंअहंकार का आग्रह हैईगोइस्टिक है। जब भी कोई आदमी कहता हैयह मैं ही कह रहा हूं पहली बारतो पागलपन की बात कह रहा है।
लेकिन ऐसे पागलपन के पैदा होने का कारण है। इस बार वसंत आएगाफूल खिलेंगे। उन फूलों को कुछ भी पता नहीं होगा कि वसंत सदा ही आता रहा है। उन फूलों का पुराने फूलों से कोई परिचय भी तो नहीं होगाउन फूलों को पुराने फूल भी नहीं मिलेंगे। वे फूल अगर खिलकर घोषणा करें कि हम पहली बार ही खिल रहे हैंतो कुछ आश्चर्य नहीं हैस्वाभाविक है। लेकिन सभी स्वाभाविकसत्य नहीं होता। स्वाभाविक भूलें भी होती हैं। यह स्वाभाविक भूल हैनेचरल इरर है।
जब कोई युवा पहली दफा प्रेम में पड़ता है या कोई युवती पहली बार प्रेम में पड़ती हैतो ऐसा लगता हैशायद ऐसा प्रेम पृथ्वी पर पहली बार ही घटित हो रहा है। प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं से कहते हैं कि चांदत्तारों ने ऐसा प्रेम कभी नहीं देखा। और ऐसा नहीं कि वे झूठ कहते हैं। ऐसा भी नहीं कि वे धोखा देते हैं। नेचरल इरर हैबिलकुल स्वाभाविक भूल करते हैं। उन्हें पता भी तो नहीं कि इसी तरह यही बात अरबों-खरबों बार न मालूम कितने लोगों नेन मालूम कितने लोगों से कही है।
हर प्रेमी को ऐसा ही लगता है कि उसका प्रेम मौलिक है। और हर प्रेमी को ऐसा लगता हैऐसी घटना न कभी पहले घटी और न कभी घटेगी। और उसका लगना बिलकुल आथेंटिक हैप्रामाणिक है। उसे बिलकुल ही लगता हैउसके लगने में कहीं भी कोई धोखा नहीं है। फिर भी बात गलत है।
सत्य का अनुभव भी जब व्यक्ति को होता हैतो ऐसा ही लगता है कि शायद इस सत्य को और किसी ने कभी नहीं जाना। ऐसा ही लगता है कि जो मुझे प्रतीत हुआ हैवह मुझे ही प्रतीत हुआ है। यह स्वाभाविक भूल है।
कृष्ण इस स्वाभाविक भूल में नहीं हैं।
ध्यान रहेकी गई भूलों के ऊपर उठना बहुत आसान हैहो गई भूलों के ऊपर उठना बहुत कठिन है। जानकर की गई भूल बहुत गहरी नहीं होती। जानने वाले कोकरने वाले को पता ही होता है। जो भूलें सहज घटित होती हैंबहुत गहरी होती हैं।
अगर हम प्लेटो से पूछेंतो वह कहेगाजो मैं कह रहा हूंवह मैं ही कह रहा हूं। अगर हम कांट से पूछेंतो कांट कहेगाजो मैं कह रहा हूंवह मैं ही कह रहा हूं। अगर हम हीगल से पूछेंतो हीगल भी कहेगा कि जो मैं कह रहा हूंवह मैं ही कह रहा हूं। अगर हम कृष्णमूर्ति से पूछेंतो वे भी कहेंगेजो मैं कह रहा हूंमैं ही कह रहा हूं। यह बड़ी स्वाभाविक भूल है।
कृष्ण कह रहे हैंयही बात--नई नहींपुरानी नहीं-- अनंत-अनंत बार अनंत-अनंत ढंगों से अनंत-अनंत रूपों में कही गई है।
सत्य के संबंध में इतना निराग्रह होना अति कठिन है। इतना गैर-दावेदार होनायह दावा छोड़ना है।
ध्यान रहेहम सब को सत्य से कम मतलब होता हैमेरे सत्य से ज्यादा मतलब होता है। पृथ्वी पर चारों ओर चौबीस घंटे इतने विवाद चलते हैंउन विवादों में सत्य का कोई भी आधार नहीं होतामेरे सत्य का आधार होता है। अगर मैं आपसे विवाद में पडूंतो इसलिए विवाद में नहीं पड़ता कि सत्य क्या हैइसलिए विवाद में पड़ता हूं कि मेरा सत्य ही सत्य है और तुम्हारा सत्य सत्य नहीं है।
समस्त विवाद मैं और तू के विवाद हैंसत्य का कोई विवाद नहीं है। जहां भी विवाद हैगहरे में मैं और तू आधार में होते हैं। इससे बहुत प्रयोजन नहीं होता है कि सत्य क्या हैइससे ही प्रयोजन होता है कि मेरा जो हैवह सत्य है। असल में सत्य के पीछे हम कोई भी खड़े नहीं होना चाहतेक्योंकि सत्य के पीछे जो खड़ा होगावह मिट जाएगा। हम सब सत्य को अपने पीछे खड़ा करना चाहते हैं।
लेकिन ध्यान रहेसत्य जब हमारे पीछे खड़ा होता हैतो झूठ हो जाता है। हमारे पीछे सत्य खड़ा ही नहीं हो सकता,सिर्फ झूठ ही खड़ा हो सकता है। सत्य के तो सदा ही हमें ही पीछे खड़ा होना पड़ता है। सत्य हमारी छाया नहीं बन सकता,हमको ही सत्य की छाया बनना पड़ता है। लेकिन जब विवाद होते हैंतो ध्यान से सुनेंगे तो पता चलेगाजोर इस बात पर है कि जो मैं कहता हूंवह सत्य है। जोर इस बात पर नहीं है कि सत्य जो हैवही मैं कहता हूं।
कृष्ण का जोर देखने लायक है। वे कहते हैंजो सत्य हैवही मैं तुझसे कह रहा हूं। मैं जो कहता हूंवह सत्य है। ऐसा उनका आग्रह नहीं। और इसलिए मुझसे पहले भी कही गई है यही बात।
नए युग में एक फर्क पड़ा है। नया युग बहुत आग्रहपूर्ण है। महावीर नहीं कहेंगे कि मैं जो कह रहा हूंवह मैं ही कह रहा हूं। वे कहते हैंमुझसे भी पहले पार्श्वनाथ ने भी यही कहा है। मुझसे पहले ऋषभदेव ने भी यही कहा है। मुझसे पहले नेमीनाथने भी यही कहा है। बुद्ध नहीं कहते कि जो मैं कह रहा हूंवह मैं ही कह रहा हूं। वे कहते हैंमुझसे भी पहले जो बुद्ध हुए,जिन्होंने भी जाना और देखा हैउन्होंने यही कहा है।
ऐसी भ्रांति हो सकती है कि ये सारे लोग पुरानी लीक को पीट रहे हैं। नहींपर वे यह नहीं कह रहे कि सत्य पुराना है। क्योंकि ध्यान रहेजो चीज भी पुरानी हो सकती हैउसके नए होने का भी दावा किया जा सकता है। नए होने का दावा किया ही उसका जा सकता हैजो पुरानी हो सकती हैजिसकी पासिबिलिटी पुरानी होने की है। ये दावा यह कर रहे हैं कि सत्य पुराना और नया नहीं हैसत्य सत्य है। हम नए और पुराने होते हैंयह दूसरी बात हैलेकिन सत्य में इससे कोई भी अंतर नहीं पड़ता है।
यह सूर्य निकलायह प्रकाश है। हम नए हैं। हम नहीं थेतब भी सूर्य थाहम नहीं होंगेतब भी सूर्य होगा। यह सूर्य नया और पुराना नहीं है। हम नए और पुराने हो जाते हैं। हम आते हैं और चले जाते हैं।
लेकिन हमारी दृष्टि सदा ही यही होती है कि हम नहीं जाते और सब चीजें नई और पुरानी होती रहती हैं। हम कहते हैं,रोज समय बीत रहा है। सचाई उलटी हैसमय नहीं बीततासिर्फ हम बीतते हैं। हम आते हैंजाते हैंहोते हैंनहीं हो जाते हैं। समय अपनी जगह है। समय नहीं बीतता। लेकिन लगता है हमें कि समय बीत रहा है। इसलिए हमने घड़ियां बनाई हैंजो बताती हैं कि समय बीत रहा है। सौभाग्य होगा वह दिनजिस दिन हम घड़ियां बना लेंगेजो हमारी कलाइयों में बंधी हुईबताएंगी कि हम बीत रहे हैं।
वस्तुतः हम बीतते हैंसमय नहीं बीतता है। समय अपनी जगह है। हम नहीं थे तब भी थाहम नहीं होंगे तब भी होगा। हम समय को न चुका पाएंगेसमय हमें चुका देगासमय हमें रिता देगा। समय अपनी जगह हैहम आते और जाते हैं। समय खड़ा हैहम दौड़ते हैं। दौड़-दौड़कर थकते हैंगिरते हैंसमाप्त हो जाते हैंसत्य वहीं है।
जिस दिनकृष्ण कहते हैंमैंने सूर्य को कहा थासत्य जहां थावहीं है। जिस दिन सूर्य ने अपने बेटे मनु को कहा;सत्य जहां थावहीं है। जिस दिन मनु ने अपने बेटे इक्ष्वाकु को कहासत्य जहां थावहीं है। और कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं,तब भी सत्य वहीं है। और अगर मैं आपसे कहूंतो भी सत्य वहीं है। कल हम भी न होंगेफिर कोई कहेगाऔर सत्य वहीं होगा। हम आएंगे और जाएंगेबदलेंगेसमाप्त होंगेनए होंगेविदा होंगे--सत्यसत्य अपनी जगह है। इस सूत्र में इन सब बातों पर ध्यान दे सकेंगेतो आगे की बात समझनी आसान है।
कोई सवाल होतो पूछ लें!

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप।। 2।।

इस प्रकार परंपरा से प्राप्त हुए इस योग को राजर्षियों ने जाना। परंतु हे अर्जुनवह योग बहुत काल से इस पृथ्वी-लोक में लुप्तप्राय हो गया है।
परंपरा से ऋषियों ने इसे जानालेकिन फिर वह लुप्तप्राय हो गया--ये दो बातें। पहली बात तो आपसे यह कह दूं कि परंपरा का अर्थ ट्रेडीशन नहीं है। साधारणतः हम परंपरा का अर्थ ट्रेडीशन करते हैं। टे्रडीशन का अर्थ होता हैरीति। ट्रेडीशन का अर्थ होता हैरूढ़ि। ट्रेडीशन का अर्थ होता हैप्रचलित। परंपरा का अर्थ और है। परंपरा शब्द के लिए सच में अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है। इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
गंगा निकलती है गंगोत्री सेफिर बहती हैफिर गिरती है सागर में। जब गंगा सागर में गिरती हैऔर गंगोत्री से निकलती हैतो बीच में लंबा फासला तय होता है। इस गंगा को हम क्या कहेंयह गंगा वही हैजो गंगोत्री से निकलीठीक वही तो नहीं हैक्योंकि बीच में और न मालूम कितनी नदियांऔर न मालूम कितने झरने उसमें आकर मिल गए। लेकिन फिर भी बिलकुल दूसरी नहीं हो गई हैहै तो वहीजो गंगोत्री से निकली।
तो ठीक परंपरा का अर्थ होता है कि यह गंगापरंपरा से गंगा है। परंपरा का अर्थ है कि गंगोत्री से निकलीवही है;लेकिन बीच में समय की धारा में बहुत कुछ आया और मिला।
ऐसा समझें कि सांझ आपने एक दीया जलाया। सुबह आप कहते हैंअब दीए को बुझा दोउस दीए को बुझा दोजिसे सांझ जलाया था। लेकिन जिसे सांझ जलाया थावह दीए की ज्योति अब कहां हैवह तो प्रतिपल बुझती गई और धुआं होती गई और नई ज्योति आती गई। जिस ज्योति को आपने जलाया था सांझवह ज्योति तो हर पल बुझती गई और धुआं होती गईऔर नई ज्योति उसकी जगह रिप्लेस होती गई। वह ज्योति तो छलांग लगाकर शून्य में खोती गईऔर नई ज्योति का आविर्भाव होता गया। जिस ज्योति को सुबह आप बुझाते हैंयह वही ज्योति हैजिसको सांझ आपने जलाया था?
यह वही ज्योति तो नहीं है। वह तो कई बार बुझ गई। लेकिन फिर भी यह दूसरी ज्योति भी नहीं हैजिसको आपने नहीं जलाया था। परंपरा से यह वही ज्योति है। यह उसी ज्योति का सिलसिला हैयह उसी ज्योति की परंपरा हैयह उसी ज्योति की संतति है।
आप आज हैंकल आप नहीं थेलेकिन आपके पिता थे। परसों आपके पिता भी नहीं थेउनके पिता थे। कल आप भी नहीं होंगेआपका बेटा होगा। परसों बेटा भी नहीं होगाउसका बेटा होगा। ठीक से समझेंतो जैसे ज्योति जली और बुझीठीक ऐसे ही व्यक्ति जलते और बुझते हैंलेकिन फिर भी एक परंपरा है।
मां और बाप अपने बेटे को ज्योति दे जाते हैं। ज्योति जलती हैफिर नई संतति। अगर हम ठीक से देखेंतो आप हो नहीं सकते थेअगर हजारों-लाखों वर्ष पहले एक व्यक्ति भी आपकी परंपरा में न हुआ होता। अगर लाखों वर्ष पहले एक व्यक्ति जो आपकी पिता की पीढ़ियों में रहा होन होतातो आप कभी न हो सकते थे। वह गंगोत्री अगर वहां न होतीतो आज आप न होते। आप उसी धारा के सिलसिले हैंशरीर की दृष्टि से आप उसी के सिलसिले हैं।
और आत्मा की दृष्टि से भी आप सिलसिला हैंएक परंपरा हैं। यह आत्मा कल भी थीपरसों भी थी--किसी और देह में,किसी और देह में। अरबों-खरबों वर्षों में इस आत्मा की भी एक परंपरा हैशरीर की भी एक परंपरा है। परंपरा का अर्थ हैसंतति प्रवाहकंटिन्युटी
वैज्ञानिक एक शब्द का प्रयोग करते हैंकंटीनम। अगर ठीक करीब लाना चाहेंतो परंपरा का अर्थ होगाकंटीनम--संतति प्रवाहसिलसिला।
कृष्ण कह रहे हैंपरंपरा से इसी सत्य को ऋषियों ने एक-दूसरे से कहा।
इसमें दूसरी बात भी ध्यान रखें। जोर कहने पर हैजोर सुनने पर नहीं है। इसमें कृष्ण कह रहे हैंपरंपरा से ऋषियों ने कहा। कृष्ण यह भी नहीं कह रहे कि परंपरा से ऋषियों ने सुना। जब भी कहा गया होगातो सुना तो गया ही होगालेकिन जोर कहने पर है। कहने वाले का अनिवार्य रूप से ऋषि होना जरूरी हैसुनने वाले का ऋषि होना जरूरी नहीं है। जिसने सुनाउसने समझा होजरूरी नहीं है। लेकिन जिसने कहाउसने न समझा होतो कहना व्यर्थ हैकहा नहीं जा सकता।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कृष्ण कहते हैं कि ऋषियों ने परंपरा से इस सत्य को कहापरंपरा से पाया नहीं। किसी ने उनसे कहा हो और उनको मिल गया होऐसा नहीं। जाना होगा। जानना और बात हैसुन लेना और बात है।
इसलिए हम पुराने शास्त्रों को कहते हैंश्रुतिसुने गए। या कहते हैंस्मृतिमेमोराइज्डस्मरण किए गए। ध्यान रहे,शास्त्र जानने वालों ने नहीं लिखेसुनने वालों ने लिखे हैं।
इस पृथ्वी का कोई भी महत्वपूर्ण शास्त्र लिखा नहीं गया है। सुना गया है और लिखा गया है। गीता भी सुनी गई और लिखी गई। जिसने लिखीजरूरी नहीं कि वह जानता हो। बाइबिल लिखी गईकुरान लिखा गयावेद लिखे गएमहावीर-बुद्ध के वचन लिखे गए। महावीर और बुद्ध ने लिखे नहीं हैंकहे। जिन्होंने लिखेउनके लिए वह ज्ञान नहीं थाश्रुति थी। उसे उन्होंने सुना थाउसे उन्होंने स्मरण किया थाउसे उन्होंने लिखा थासंजोयासम्हाला। कहना चाहिएशास्त्र एक अर्थ में डेड प्रोडक्टहै। कहना चाहिएमरे हुए का संग्रह है। जिन्होंने कहाउन्होंने परंपरा से जाना।
परंपरा से जानने के दो अर्थ हो सकते हैं। एक अर्थजैसा साधारणतः लिया जाता हैजिससे मैं राजी नहीं हूं। एक अर्थ तो यह लिया जाता है कि हम शास्त्र को पढ़ लें और जान लेंतो जो हमने जानावह हमने परंपरा से जाना। नहींवह हमने परंपरा से नहीं जाना। वह हमने केवल रूढ़ि से जानारीति से जानाव्यवस्था से जाना। और उस तरह का जानना ज्ञान नहीं बन सकता। सिर्फ इन्फर्मेशन ही होगानालेज नहीं बन सकता। उस तरह का जानना मात्र सूचना का संग्रह होगाज्ञान नहीं।
शास्त्र पढ़कर कोई सत्य को नहीं जान सकता है। हांसत्य को जान ले तो शास्त्र में पहचान सकता हैरिकग्नाइज कर सकता है। शास्त्र पढ़कर ही कोई सत्य को जान लेतो सत्य बड़ी सस्ती बात हो जाएगी। फिर तो शास्त्र की जितनी कीमत है,उतनी ही कीमत सत्य की भी हो जाएगी। शास्त्र पढ़कर सत्य जाना नहीं जा सकतासिर्फ पहचाना जा सकता है।
लेकिन पहचान तो वही सकता हैजिसने जान लिया होअन्यथा पहचानना मुश्किल है। आप मुझे जानते हैंतो पहचान सकते हैं कि मैं कौन हूं। और आप मुझे नहीं जानते हैंतो आप पहचान नहीं सकते। इसलिए सत्य शास्त्रों में सिर्फ रिकग्नाइजहोता हैकग्नाइज नहीं होता। जाना नहीं जातापुनः जाना जाता है। जानने का मार्ग तो कुछ और है।
इसलिए कृष्ण जिस परंपरा की बात कर रहे हैंवह परंपरा शास्त्र की परंपरा नहीं हैवह परंपरा जानने वालों की परंपरा है। जैसे परमात्मा ने सूर्य को कहा। लेकिन इसमें स्मरणीय है यह बात कि परमात्मा ने सूर्य को कहा। बीच में किताब नहीं है,बीच में शास्त्र नहीं है। डाइरेक्ट कम्युनिकेशन है। सत्य सदा ही डाइरेक्ट कम्युनिकेशन है। सत्य सदा ही परमात्मा से व्यक्ति में सीधा संवाद है। शास्त्रशब्द बीच में नहीं है।
मोहम्मद पहाड़ पर हैं। बेपढ़े-लिखेमोहम्मद जैसे बेपढ़े-लिखे लोग बहुत कम हुए हैं। लेकिन अचानक उदघाटन हुआ;डाइरेक्ट कम्युनिकेशन हुआ। जिसे इस्लाम कहता हैइलहाम। ईसाइयत कहती हैरिवीलेशन। सत्य दिखाई पड़ा। इसलिए हम ऋषियों को द्रष्टा कहते हैं। सत्य देखा गया। पढ़ा नहीं गयासुना नहीं गयादेखा गया।
पश्चिम में भी ऋषियों को सीअर्स ही कहते हैं। देखा गयादेखने वाले। इसलिए हमने तो पूरे तत्व को दर्शन कहा। दिखाई जो पड़े सत्यसीधा दिखाई पड़ेसीधा सुनाई पड़ेसीधा परमात्मा से मिले।
लेकिन परमात्मा से मिलने की भी परंपरा है। परमात्मा से आपको ही पहली दफा नहीं मिल रहा है। परमात्मा से अनेकों को और भी पहले मिल चुका है। मिलने वालों की भी परंपरा है। दो परंपराएं हैंएक लिखने वालों की परंपरा है--लेखकों की। और एक जानने वालों की परंपरा है--ऋषियों की।
इसलिए कृष्ण कह रहे हैंपरंपरा से ऋषियों ने जाना। यह परंपरा का बोध कि मुझसे पहले भी सत्य औरों को मिलता रहा है इसी भांति।
आपने आंख खोली और सूरज को जाना। जहां तक आपका संबंध हैआप पहली बार जान रहे हैं। लेकिन आपके पहले इस पृथ्वी पर जब भी आंख खोली गई हैसूरज जाना गया है। सूरज को इस भांति जानने की भी एक परंपरा है। आप पहले आदमी नहीं हैं।
और ध्यान रहेजिस आदमी को भी भ्रम पैदा हो जाता है कि सत्य को मैं जानने वाला पहला आदमी हूंउसको दूसरा भ्रम भी पैदा हो जाता है कि मैं अंतिम आदमी भी हूं। भ्रम भी जोड़े से जीते हैंपेअर्स में जीते हैं। भ्रम भी अकेले नहीं होते। जिस आदमी को भी यह खयाल पैदा हो जाएगा कि सत्य को जानने वाला मैं पहला आदमी हूंमुझसे पहले किसी ने भी नहीं जानाउस आदमी को दूसरा भ्रम भी अनिवार्य पैदा होगा कि मैं आखिरी आदमी हूं। मेरे बाद अब सत्य को कोई नहीं जान सकेगा। क्योंकि जो कारण पहले भ्रम का हैवही कारण दूसरे भ्रम में भी कारण बन जाएगा। पहले भ्रम का कारण अहंकार है। और ध्यान रहेजिसका अभी अहंकार नहीं मिटाउसको सत्य से कोई सीधा संबंध नहीं हो सकता। अहंकार बीच में बाधा है।
इसलिए कृष्ण बहुत जोर देकर कहते हैं कि परंपरा से ऋषियों ने जाना। लेकिन ध्यान रखना आपपरंपरा इस तरह की नहीं कि एक ने दूसरे से जान लिया हो। परंपरा इस तरह की कि जब भी एक ने जानाउसने यह भी जाना कि मैं जानने वाला पहला आदमी नहीं हूंन ही मैं अंतिम आदमी हूं। अनंत ने पहले भी जाना हैअनंत बाद में भी जानेंगे। मैं जानने वालों की इस अनंत शृंखला में एक छोटी-सी कड़ीएक छोटी-सी बूंद से ज्यादा नहीं हूं। यह सूरज मेरी बूंद में ही झलकाऐसा नहींयह सूरज सब बूंदों में झलका है और सब बूंदों में झलकता रहेगा। जब कोई बूंद इतनी विनम्र हो जाती हैतो उसके सागर होने में कोई बाधा नहीं रह जाती।
इसलिए परंपरा का ठीक से अर्थ समझ लेना। अन्यथा हम परंपरा का जो अर्थ लेते हैंवह एकदम गलतएकदम झूठ और खतरनाक है। परंपरा का ऐसा अर्थ नहीं है कि मैं सत्य आपको दे दूंगातो आपको मिल जाएगा। और आप किसी और को दे देंगेतो उसको मिल जाएगा। परंपरा का इतना ही अर्थ है कि मैं पहला आदमी नहींआखिरी नहींजानने वालों की अनंत शृंखला में एक छोटी-सी कड़ी हूं। यह सूर्य सदा ही चमकता रहा हैजिन्होंने भी आंख खोलीउन्होंने जाना है। ऐसी विनम्रता का भाव सत्य के जानने वाले की अनिवार्य लक्षणा है।
दूसरी बात कृष्ण कहते हैंलुप्तप्राय हो गया वह सत्य।
सत्य लुप्तप्राय कैसे हो जाता हैदो बातें इसमें ध्यान देने जैसी हैं। कृष्ण यह नहीं कहते कि लुप्त हो गयालुप्तप्राय। करीब-करीब लुप्त हो गया। कृष्ण यह नहीं कहते कि लुप्त हो गया। क्योंकि सत्य यदि बिलकुल लुप्त हो जाएतो उसकापुनर्आविष्कार असंभव है। उसको खोजने का फिर कोई रास्ता नहीं है।
जैसे एक चिकित्सक किसी आदमी को कहेमृतप्रायतो अभी जीवित होने की संभावना है। लेकिन कहेमर गयामृत हो गयातो फिर कोई उपाय नहीं है। मृतप्राय का अर्थ है कि मरने के करीब हैमर ही नहीं गया। लुप्तप्राय का अर्थ हैलुप्त होने के करीब हैलुप्त हो ही नहीं गया।
सत्य सदा ही लुप्तप्राय होता है। क्योंकि एक दफे लुप्त हो जाएतो फिर मनुष्य की सीमित क्षमता के बाहर है यह बात कि वह सत्य को खोज सके। एक किरण तो बनी ही रहती है सदा। चाहे पूरा सूरज न दिखाई पड़ेलेकिन एक किरण तो सदा ही किसी कोने से हमारे अंधकारपूर्ण मन में कहीं झांकती रहती है। जैसे कि मकान के अंधेरे में द्वार-दरवाजे बंद करके हम बैठे हैं,और खपड़ों के छेद सेकहीं एक छोटी-सी रंध्र सेछोटी-सी किरण भीतर आती हो। इतना सूर्य से हमारा संबंध बना ही रहता है। वही संभावना है कि हम सूर्य को पुनः खोज पाएंउसी किरण के मार्ग से।
सत्य लुप्तप्राय ही होता हैलुप्त कभी नहीं होता। लुप्तप्राय का अर्थ है कि हर युग मेंहर क्षण मेंहर व्यक्ति के जीवन में वह किनारा और वह किरण मौजूद रहती हैजहां से सूर्य को खोजा जा सकता है। यही आशा है। अगर इतना भी विलीन हो जाएतो फिर खोजने का कोई उपाय आदमी के हाथ में नहीं है।
दूसरी बातलुप्तप्राय सत्य क्यों हो जाता हैजैसे कोई नदी रेगिस्तान में खो जाएलुप्त नहीं हो जातीलुप्तप्राय हो जाती है। रेत को खोदेंतो नदी के जल को खोजा जा सकता है। ठीक ऐसे हीजाने गए सत्य की परंपरासुने गए सत्य की परंपरा की रेत में खो जाती है। जाने गए सत्य की परंपराद्रष्टा के सत्य की परंपराशास्त्रों कीशब्दों की परंपरा की रेत में खो जाती है। धीरे-धीरे शास्त्र इकट्ठे होते चले जाते हैंढेर लग जाता है। और वह जो किरण थी ज्ञान कीवह दब जाती है। फिर धीरे-धीरे हम शास्त्रों को ही कंठस्थ करते चले जाते हैं। फिर धीरे-धीरे हम सोचने लगते हैंइन शास्त्रों को कंठस्थ कर लेने से ही सत्य मिल जाएगा। और सत्य की सीधी खोज बंद हो जाती है। फिर हम उधार सत्यों में जीने लगते हैं। फिर राख ही हमारे हाथ में रह जाती है।
लेकिन शास्त्रों के रेगिस्तान में भी सत्य सिर्फ लुप्तप्राय होता हैलुप्त नहीं हो जाता। अगर कोई शास्त्रों के शब्दों को भी खोदकर खोज सकेतो वहां भी सत्य खोजा जा सकता है। लेकिन पहचान बड़ी मुश्किल है। पहचान इसलिए मुश्किल है कि जिस सत्य से हम अपरिचित हैंउसे हम शास्त्रों के शब्दों के रेगिस्तान में खोज न पाएंगे। संभावना यही है कि सत्य तो न मिलेगा,हम भी भटक जाएंगे। ऐसा ही हुआ है।
हिंदूहिंदू शास्त्रों में खो जाता है। मुसलमानमुसलमान के शास्त्रों में खो जाता है। जैनजैन के शास्त्रों में खो जाता है। और कोई यह नहीं पूछता कि जब महावीर को ज्ञान हुआतो उनके पास कितने शास्त्र थे! शास्त्र थे ही नहीं। महावीर के हाथ बिलकुल खाली थे। कोई नहीं पूछता कि जब मोहम्मद को इलहाम हुआतो कौन-सी किताबें उनके पास थीं! किताबें थीं ही नहीं। कोई नहीं पूछता कि जीसस ने जब जानातो किस विश्वविद्यालय में शिक्षा लेकर वे जानने गए थे!
जानने की घटना सदा ही निपट मौन और शून्य में घटी है। और हम सब जानने के लिए शब्द के मार्ग से यात्रा करते हैं। बड़ी उलटी यात्रा है। एक ही लाभ हो सकता हैऔर वह यह कि खोजते-खोजते इतने थक जाएंइतने ऊब जाएंकि शास्त्र को बंद कर दें। इतना ही लाभ हो सकता है। शब्द से इतने परेशान हो जाएं कि शब्द से हाथ जोड़ लें। पढ़ते-पढ़ते इतना समझ में आ जाए कि पढ़ने से कुछ न होगाइतना ही लाभ हो सकता है।
सत्य के लुप्तप्राय होने की प्रक्रिया को थोड़ा समझ लेना जरूरी है। वह उपयोगी है सदा। सत्य के लुप्त होने की एक व्यवस्था है। वह व्यवस्था कैसी हैवह व्यवस्था ऐसी है कि महावीर ने जाना। स्वभावतःजिसने जानावह उससे कहेगा,जिसने नहीं जाना है। क्योंकि दूसरा अगर जानता ही होतो कहना फिजूल है।
इसलिए एक बार ऐसा भी हुआ कि महावीर और बुद्ध एक ही गांव में ठहरेलेकिन मिले नहीं। एक ही गांव में भी कहना ठीक नहींएक ही धर्मशाला के दो हिस्सों में ठहरेएक कोने पर बुद्ध ठहरेएक पर महावीर ठहरेएक ही धर्मशाला में। मिलना नहीं हुआ! लोग सोचते हैंबड़े अहंकारी रहे होंगे। मिलना तो था!
नहींअहंकार का कारण नहीं है। मिलना बिलकुल बेमानीमीनिंगलेस था। कोई अर्थ ही न था मिलने का। मिलना ठीक ऐसे ही थाजैसे दो आईनों को कोई एक-दूसरे के सामने रख दे। बिलकुल बेकार है। आईने के सामने आप खड़े होंतो सार्थक,कुछ दिखाई पड़ता है। आईने के सामने आईना ही रख देंतो बिलकुल बेकार है। आईना आईने को रिफ्लेक्ट करता रहताकुछ नहीं अर्थ होता। आईने आपस में बातचीत नहीं करते। आईने सिर्फ चेहरों से बातचीत करते हैं।
बुद्ध और महावीर को अगर पास बिठा देंतो जैसे दो शून्य पास बिठा दिएउनका कोई अर्थ नहीं होता। शून्य को किसी अंक के पास बिठाएंतो अर्थ होता है। एक के पीछे शून्य रख देंतो दस हो जाते हैं। दो के पीछे रख देंतो बीस हो जाते हैं। और दो शून्यों को आस-पास रख देंतो कुछ मतलब नहीं होता। दो शून्य भी नहीं होते जुड़कर। शून्य दो नहीं होतेशून्य एक ही रहता है। शून्य का कोई जोड़ नहीं होता। बुद्ध और महावीर नहीं मिलेक्योंकि दो शून्य के जुड़ने का कोई अर्थ नहीं था। बात क्या होतीकहने को क्या थाबोलने को क्या थाबताने को क्या था?
इसलिए सत्य को जब भी कोई जानता हैतो जो नहीं जानतेउनसे बोलता है। बसउपद्रव शुरू हो जाता है। जो नहीं जानतावह सुनता है। स्वभावतःजो कहा जाता हैवह कभी नहीं सुना जाताकुछ और ही सुना जाता है। हम वही सुन सकते हैंजो हम जानते हैं। अब यह बड़ी कठिनाई हो गई। यह पैराडाक्स हो गया!
हम वही सुन सकते हैंजो हम जानते हैं। जो हम नहीं जानतेवह हम सुन नहीं सकते। नहींसुन तो लेंगे। कान सुनने का काम पूरा कर देंगे। लेकिन भीतर वह जो मन हैवह समझ नहीं पाएगा। नहींसमझ भी लेगालेकिन कुछ और समझ लेगाजो कहा नहीं गया है। हम वही समझते हैंजो हम समझ सकते हैं।
कृष्ण अर्जुन से बोल रहे हैं। स्वभावतःअर्जुन वही समझेगाजो अर्जुन समझ सकता है। वह तो अर्जुन कभी नहीं समझ सकताजो कृष्ण बोल रहे हैं। क्योंकि अगर अर्जुन वह समझ सकतातो कृष्ण का बोलना फिजूल हो जाताबेकार हो जाता।
गुरु और शिष्य के बीच फासला न होतब बातचीत हो सकती हैलेकिन तब बातचीत बेकार हो जाती है। और गुरु और शिष्य के बीच फासला होतब बातचीत हो नहीं सकतीहालांकि तब बातचीत की जरूरत होती है! ऐसी स्वाभाविक कठिनाई है।
तो महावीर बोलते हैं उनसेजो नहीं जानते। बुद्ध बोलते हैं उनसेजो नहीं जानते। जो नहीं जानते हैंवे सुनते हैं;सुनकर अर्थ निकालते हैं। अर्थ उनके अपने होते हैं। बुद्ध अगर हजार लोगों में बोलते हैंतो हजार अर्थ होते हैं। मैं आपसे जो कुछ कहूंगाइस भूल में मैं नहीं हो सकता कि आप सब उससे एक ही अर्थ निकाल लेंगे। यह असंभव है। जितने यहां मित्र इकट्ठे हैंउतने ही अर्थ लेकर जाएंगे। उतने अर्थ मेरे बोलने में नहीं हैंमेरे बोलने में सुनिश्चित एक ही अर्थ है। लेकिन आप अपने अर्थ लेकर जाएंगे।
एडमंड बर्क दुनिया का इतिहास लिख रहा था। कोई पंद्रह साल उसने मेहनत की थी और आधा इतिहास लिख चुका था। पंद्रह साल औरतीस सालकरीब अपनी पूरी जिंदगी की समझदारी का समय वह इतिहास पर लगा रहा था। सुबह से उठता था,तो रात आधी रात तक लिखता ही रहता था। क्योंकि बड़ा था काम और जिंदगी थी छोटी। और भरोसा नहीं था कि किताब पूरी हो सके।
आधी किताब जब पूरी हो गई थीएक दिन दोपहर को घर के आस-पास जोर से शोरगुल मचा। लेकिन वह तो अपने काम में लगा रहा। शोरगुल बढ़ता चला गया। तब वह उठकर बाहर आयाउसने कहाबात क्या है! लोग भाग रहे थे। पूछाबात क्या हैकिसी ने कहाहत्या हो गई। तुम्हारे मकान के पीछे मर्डर हो गया। एक से पूछाउसने कुछ कहा कि किस तरह हुआ। दूसरे से पूछाउसने कुछ कहा। वे सब आंखों देखे हुएचश्मदीद गवाह थे।
बर्क भागा हुआ अपने मकान के पीछे पहुंचा। वहां लोग मौजूद थे। भीड़ लगी थी। लाश सामने पड़ी थी। हत्यारा पकड़ लिया गया था। लेकिन सबके वर्सन अलग थे। देखने वाला कोई कह रहा था कि जिम्मेवार कौन है। कोई कह रहा था कि जो मारा गयावह ठीक ही मारा गया। कोई कह रहा थाजिसने माराउसने बहुत बुरा किया। कोई कह रहा थाहत्यारा जिम्मेवार नहीं है। कोई कह रहा था कि हत्यारा जिम्मेवार है। बर्क ने सबसे पूछा और लौटकर पंद्रह साल जो किताब में मेहनत लगाई थी,उसमें आग लगा दी। उसने लिखा कि जब मेरे घर के पीछे हत्या हो जाएऔर आंखों देखने वाले लोगों की गवाहियां अलग हों,तो पांच हजार साल पहले क्या हुआ थाइसको पांच हजार साल बाद मैं लिखूंयह व्यर्थ है। इस झंझट में मैं नहीं पडूंगा। बर्कने अपने पत्र में लिखा है कि इतिहास सरासर झूठ है। सच्चा इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता।
जैसे ही कृष्ण बोलते हैंसत्य बदलने लगा। जैसे ही पहुंचा दूसरे के पासरूप बदलालुप्त होना शुरू हुआ। लेकिन यह तो मैंने बाहर की बात कही। अगर हम थोड़े और भीतर पहुंचेंतो और भी एक कठिनाई है। सत्य बोला गयातब तो लुप्त होता ही हैसुनने वाले के कारणलेकिन जब बोला जाता हैतो बोलने की प्रक्रिया के कारण भी लुप्त होता है।
असल में सत्य है विराटऔर शब्द है संकीर्ण। शब्द बहुत छोटा हैसत्य बहुत बड़ा है। उस सत्य को जैसे ही शब्द में रखने की कोई चेष्टा करता हैकठिनाई शुरू हो जाती है। इसलिए सभी जानने वाले निरंतर कहने के बादयह कहते चले जाते हैं कि जो कहना थावह कहा नहीं जा सका। जो कहना चाहा थावह अनकहा छूट गया।
रवींद्रनाथ मर रहे थे। एक मित्र आया और उसने कहा कि धन्यभागी हो तुम! तुमने तो छह हजार गीत लिखे। तुम्हें तो तृप्त हो जाना चाहिएफुलफिल्ड। इतने गीत किसी एक आदमी ने नहीं गाए।
रवींद्रनाथ ने आंख खोली और कहा कि बंद करो यह बातचीत। मैं तो परमात्मा से और कुछ कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि जो गीत मैं गाना चाहता थावह अभी तक गा नहीं पाया। उसी गीत को गाने की कोशिश में छह हजार गीत लिखे जा चुके हैं। लेकिन जो गीत मैं गाना चाहता था वह अब भी अनगायाअनसंगअभी भी मेरे भीतर पड़ा है। ये छह हजार असफलचेष्टाएं हैंछह हजार फेल्योर्स। छह हजार बार कोशिश कर चुका। जो कहना थावह अभी भी अनकहा है। परमात्मा से प्रार्थना कर रहा हूं कि अभी तो मैं साज ही बिठा पाया थाअभी गाया कहां! और यह तो जाने का वक्त आ गया। यह तो ठोंक-पीटकर अभी साज बिठा पाया थाअभी गाया कहां था! अब कहीं लगता था कि गाने के करीब आ रहा हूंतो यह जाने का वक्त आ गया!
कबीर से पूछेंनानक से पूछेंमीरा से पूछेंकिसी से भी पूछेंवे यही कहेंगे कि जो कहना थावह हम कह नहीं पाए। वह अनकहा रह गया है। बड़े आश्चर्य की बात है। फिर भी कहा तो है। कबीर ने कहा तो है। मीरा गाई तो। और जो कहना था,वह अनकहा रह गया। बात क्या है?
बात यह हैबात ठीक ऐसी ही हैजैसे कि आप देखें सुबह सूरज को उगतेपक्षियों को गीत गातेवृक्षों को खिलते,फूलते। फिर घर जाएंऔर कोई आपसे पूछे कि थोड़ा वर्णन करेंथोड़ा बताएंकैसा था सूरजआप कहेंबहुत कुछ कहें। फिर भी आप पाएंगे कि जो भी आपने कहावह धुंधली तस्वीर भी नहीं हैजो आपने देखा था। क्योंकि जो आप कहेंगेउसमें सूरज की जरा भी गर्मी नहीं होगी। उसमें पक्षियों के गीतों का संगीत नहीं होगा। उसमें हरियाली भी नहीं होगी सुबह की। उसमें सुबह की ठंडी हवाओं की ताजगी भी नहीं होगी। उसमें फूलों के खिलने का आनंदभाव भी नहीं होगा। वह जो सुबह की एक्सटैसी थी,वह जो सुबह की समाधिस्थ अवस्था थी प्रकृति कीवह जो सुबह का ध्यानमग्न रूप थावह कहीं भी नहीं होगा। और जब आप वर्णन करके चुक चुके होंगेतो आप कहेंगे कि कहा तो जरूरलेकिन जो मैंने देखा थावह इसमें कहीं आया नहीं।
फिर वह आदमी सुनकर किसी और को बताएगा। सत्य लुप्त होना शुरू हुआ। कुछ तो आपने लुप्त किया। क्योंकि कहने में हीकहने की प्रक्रिया में ही भूल हुई। फिर वह आदमी सुनेगाफिर वह कहेगाऔर सत्य लुप्त होना शुरू हो जाएगा। नदी चली और रेगिस्तान में खोनी शुरू हुई। यात्रा उठी भी नहींपहला कदम उठा भी नहींकि भटकाव शुरू हुआ। ऐसा है। और अब तक इसके लिए कोई उपाय खोजा नहीं जा सका। आगे भी खोजा नहीं जा सकता है। सदा ऐसा ही रहेगा।
इसलिए कृष्ण कहते हैं कि सत्य लुप्तप्राय है। लेकिन लुप्तप्राय! मैं सुबह के सूरज का वर्णन करूंबिलकुल वर्णन न हो पाएफिर भी मैं वर्णन सुबह के सूरज का ही कर रहा हूं। आप बिलकुल न समझ पाएंफिर भी आप थोड़ा तो समझ ही जाएंगे कि सुबह का वर्णन कर रहा हूं। पक्षियों के गीत मेरे वर्णन में सुनाई नहीं पड़ेंगेलेकिन फिर भी पक्षियों ने गीत गाए हैंइतना तो मैं कह ही पाऊंगा। सूरज की गर्मी मेरे शब्दों में न होगीलेकिन सूरज गर्म थाउत्तप्त थासुखद थाइतनी खबर तो मैं दे ही पाऊंगा। और आप कितना ही गलत समझेंजब आप किसी को कुछ कहेंगे इस संबंध में फिरबात और बिगड़ जाएगी,लेकिन फिर भी सुबह के सूरज से ही संबंधित होगी।
कितनी ही भूल-चूक होती चली जाएरेगिस्तान में नदी कितनी ही खोती चली जाएउसका खोजना भी मुश्किल हो जाए,लेकिन कहीं रेत को उखाड़ने से उसकी बूंदें पकड़ में आ ही जाएंगी। और अगर किसी ने सुबह का सूरज देखा होतो हजारवेंआदमी की बात को सुनकर भी वह समझ जाएगा कि मालूम होता हैसुबह के सूरज की बात करते हैं। रिकग्नाइज कर सकेगा।
सत्य इतना तो सदा बच जाता है कि रिकग्नाइज किया जा सकता है। उसकी प्रत्यभिज्ञा हो सकती है। सत्य सदा ही लुप्तप्राय हो जाता हैलेकिन लुप्तप्राय होकर भी सत्य मौजूद होता है।
दूसरी बात ध्यान रखने जैसी है कि सत्य कितना ही लुप्तप्राय हो जाएअसत्य नहीं हो जाता है। तभी तो लुप्तप्राय है। अगर असत्य हो जाएतो सत्य मर गयाफिर बचा नहींफिर बिलकुल नहीं बचा।
मेरी तस्वीर उतारी जाए। फिर मेरी तस्वीर की तस्वीर उतारी जाए। फिर उस तस्वीर की तस्वीर उतारी जाए। हर निगेटिव फेंट और फीका होता चला जाएगा। फिर भी तस्वीर मेरी ही रहेगी। और ऐसा भी वक्त आ सकता है हजारवें निगेटिव पर कि बिलकुल पहचानना मुश्किल हो जाए। मैं भी न पहचान सकूं कि यह मेरा निगेटिव है। लेकिन फिर भी निगेटिव मेरा ही रहेगा;कितना ही फीकाकितना ही दूरकितनी ही दूर की प्रतिध्वनिलेकिन मेरी ही रहेगी। हो सकता हैमैं भी न पहचान पाऊंतो भीतो भी मेरी ही परंपरा में वह तस्वीर होगी।
सत्य के लुप्तप्राय होने का यही अर्थ है कि कितना ही लुप्त हो जाएफिर भी असत्य नहीं हो जाता है। सत्य की फीकी प्रतिध्वनि उसमें शेष रहती है। जो जानते हैंवे उस प्रतिध्वनि को पुनः पहचान सकते हैं। जो जानते हैंवे उस प्रतिध्वनि की प्रत्यभिज्ञा कर सकते हैं।


प्रश्न: भगवान श्रीदो बातें समझनी हैं। आपने सत्य शब्द का उपयोग किया हैऔर प्रथम दो श्लोक में योग शब्द का उपयोग है। कृपया योग शब्द की परिभाषा व अर्थ समझाएं। और दूसरी बातऋषि शब्द के साथ राज शब्द भी जुड़ा हुआ है। ऋषि के बदले राजर्षि शब्द का क्या विशेष अर्थ है?


सत्य है अनुभूतियोग है अनुभूति की प्रक्रिया। सत्य है दर्शनयोग है द्वार। सत्य जाना जाता हैजिससे जाना जाता है,वह है योग। योग और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस मार्ग से यात्रा करनी पड़ती हैवह है योगऔर जिस मंजिल पर मार्ग पहुंच जाता हैवह है सत्य। और मंजिल और मार्ग अलग-अलग नहीं हैं। मंजिल मार्ग का ही आखिरी छोर हैमार्ग मंजिल की ही शुरुआत है। पहला कदम भी आखिरी कदम हैक्योंकि पहला कदम आखिरी कदम का प्रारंभ है। और आखिरी कदम भी पहला कदम हैक्योंकि पहले कदम के बिना आखिरी कदम हो नहीं सकता है।
इसलिए मैंने सत्य की बात कहीसमझनी ज्यादा आसान होगी। और योग की बात जानकर छोड़ीक्योंकि आगे योग के संबंध में बहुत बात आएगी और तब योग को विस्तार से समझा जा सकता है।
दूसरी बात पूछी हैराजऋषि कहा है।
साधारणतः जो गलत अर्थ प्रचलित हैवह तो यही है कि अगर कोई राजा ऋषि हो जाएतो राजऋषि है। गलत है अर्थ;प्रचलित है जरूर। सच तो यह है कि जो भी प्रचलित होता हैउसके सौ में निन्यानबे मौके गलत होने के होते हैं। प्रचलित होने के कारण ही गलत होने के मौके होते हैं। राजऋषि का मेरे लिए तीन दिशाओं से अर्थ हैवह मैं आपको कहूं।
पहला तो यहजो भी ऋषि होतावह राजा हो जाता है। राजा ऋषि हो जाता हैऐसा नहीं। जो भी ऋषि हो जाता हैवह एक तरह की बादशाहत पा लेता है। जो भी ऋषि हो जाता हैवह राजा हो ही जाता है।
सच तो यह है कि बिना ऋषि हुए राजा होने का सिर्फ धोखा होता हैराजा कोई होता नहीं। बिना ऋषि हुए तो भिखारी ही होते हैंराजा भी। पात्र बड़ा होता है भिक्षा काइसलिए सबको दिखाई नहीं पड़ताबहुत बड़ा पात्र होता हैइसलिए दिखाई नहीं पड़ता। या इसलिए भी दिखाई नहीं पड़ता कि बाकी भिखारी जरा छोटे भिखारी होते हैं। भिखारियों में भी हायरेरकी होती है! छोटे भिखारीबड़े भिखारीपहुंचे हुए भिखारी! ऐसी उनकी हायरेरकी होती है।
तो राजा जो हैवह भिखारियों के ऊपर सबसे ऊपर हैभिखारियों की धारा में सबसे ऊपर है। पद उसका भिखारियों में परम है। इसलिए भिखारियों की बड़ी दुनिया में राजा भी राजा मालूम पड़ता हैहै तो भिखारी ही। जहां तक मांग हैवहां तकभिखारीपन हैजहां तक हम कुछ मांगते हैं और चाहते हैंवहां तक भिखारी हैं।
स्वामी राम अमेरिका गएतो वे अपने को बादशाह ही कहते थे। वे जब भी बोलते थेतो वे राम बादशाह कहते थे--खुद को ही। वे कहते थे कि आज राम बादशाह किसी के घर भोजन करने गए थे। अमेरिका का तत्कालीन राष्ट्रपति राम से मिलने आया था। उसे बड़ा हास्यास्पद लगा यह कि एक फकीरजिसके पास कुछ भी नहीं हैवह अपने को बादशाह कहे! तो उसने पूछा कि मुझे थोड़ी हैरानी होती है। और सब तो ठीक हैलेकिन यह बादशाह आप अपने को क्यों कहते हैं?
तो राम ने कहाइसलिए कि अब ऐसी कोई भी चीज नहीं हैजिसकी मांग मेरे भीतर बची हो। अब मैं भिखमंगा नहीं हूं। अब ऐसा कुछ भी नहीं हैजिससे तुम मुझमें लालच पैदा कर सकोऐसा कुछ भी नहीं है जिसमें मुझे तुम लोभ में फंसा सको। इसलिए अपने को बादशाह कहता हूं। और इसलिए भी अपने को बादशाह कहता हूं कि जिस दिन से अपना खयाल छोड़ाउस दिन से सभी अपना हो गया है। जिस दिन से यह खयाल छूटा कि मेरा है यहउसी दिन से तेरा का खयाल भी विदा हो गया। सारी दुनिया अब मेरी है। चांदत्तारे मेरे हैं। अब सब मेरा हैक्योंकि अब कुछ भी मेरा नहीं है।
जिस दिन कोई आदमी अपने छोटे-से घर को छोड़ देता हैउस दिन सारी पृथ्वी उसकी अपनी हो जाती है। असल में छोटे-से घर को इतना कसकर पकड़ता है कि पूरी पृथ्वी उसकी अपनी हो कैसे सकती हैहाथ फैले हुए चाहिए पूरी पृथ्वी कोपकड़ने के लिए। तब छोटी चीज को कोई पकड़ेगातो फिर बड़े के लिए फैलाव नहीं रह जाता।
राम ने कहाइसलिए भी अपने को बादशाह कहता हूं कि जब भी भीतर देखता हूंजब भी अपने भीतर झांकता हूंतभी पाता हूं कि अनंत खजानेअनंत साम्राज्यसब मेरा है। ऐसा कुछ भी नहीं हैजो मेरा न हो।
तो राजऋषि का मैं तो अर्थ करता हूंऋषि राजा हो जाता है। सभी ऋषि राजऋषि हैं। एक दिशा से ऐसा अर्थ करना चाहूं। दूसरी दिशा से एक और अर्थ करना चाहूं।
योग की दो प्रक्रियाएं प्रचलित रही हैं। या ज्ञान की या जानने की दो निष्ठाएं हैं। एक निष्ठा का नाम सांख्य हैऔर एक निष्ठा का नाम योग है। कृष्ण ने गीता में बहुत-बहुत बार इन दो निष्ठाओं को स्पर्श किया है। सांख्य-निष्ठा का अर्थ हैकरना कुछ भी नहीं हैकेवल जानना है। करने योग्य कुछ भी नहीं हैसिर्फ जानने योग्य है। रत्तीभर भी कुछ करने की जरूरत नहीं है;सिर्फ जानने की जरूरत है। जानने से ही सब मिल जाएगा। जानने से ही सब हो जाएगाकरने का कोई भी कारण नहीं है।
सांख्य से जो आदमी ज्ञान को उपलब्ध होता हैउसने हाथ भी नहीं हिलाया है। वह राजा की तरह अपने सिंहासन पर ही बैठा रहा है। उसने कुछ किया ही नहीं है। सच तोउसके बिना कुछ किए सब हुआ हैहोता रहा है। राजा का अर्थ ही यही है,उसके बिना कुछ किए सब हो जाए। अगर करना पड़ेतो फिर राजा नहीं है। राजा का जो भीतरी मौलिक अर्थ हैवह यही है कि जिसके बिना किए सब होता होजिसके भीतर इच्छा भी पैदा न हो पाए कि पूर्ति सामने मौजूद हो जाए। ठीक इन अर्थों में राजा कभी पृथ्वी पर होते नहीं। लेकिन सांख्य ऐसा ही राजयोग हैबिना कुछ किए सब मिल जाता है।
सांख्य का कहना ही यही है कि तुम करते होइसीलिए नहीं मिलता है। सांख्य का कहना यही है कि जिसे तुम खोज रहे होवह तुम्हारे भीतर मौजूद है। तुम खोज रहे होइसलिए भीतर नहीं देख पातेक्योंकि खोज में बाहर उलझे रहते हो। करो खोज बंदरुक जाओबैठ जाओ। जैसे सिंहासन पर राजा बैठा होऐसे बैठ जाओ। कुछ मत करो। आंख करो बंदसब छोड़ो;और पा लो उसेजो भीतर मौजूद है।
वह सदा से मौजूद हैलेकिन तुम इतने दौड़ रहे हो कि तुम्हारी दौड़ की वजह से तुम वहां न पहुंच पाओगेजो भीतर है। दौड़ने वाला सदा बाहर जाता है। खोजने वाला बाहर खोजता है। करने वाला बाहर करता है।
ध्यान रहेसब करना बाह्य हैभीतर कुछ भी नहीं किया जा सकता। भीतर तो वही जाता हैजो नान-डूइंग मेंअक्रिया में उतरता हैअकर्म में। जो नहीं करता कुछवह भीतर चला जाता है। जो कुछ करता हैवह बाहर भटक जाता है।
तो सांख्य कहता हैभीतर रखी है संपदा। तुम कुछ मत करोतो पा लो।
लाओत्से ने चीन में कहा हैसीकएंड यू विल लूजखोजोऔर तुमने खोया। सीकएंड यू विल नाट फाइंडखोजोऔर तुम कभी न पा सकोगे। डू नाट सीकएंड फाइंडमत खोजोऔर पा लो।
अब यह सांख्य की निष्ठा है लाओत्से में। खोजो मतऔर पा लो। बड़ी उलटी बात है। करीब-करीब ऐसे हीजैसा मैंने सुना कि एक मछली ने जाकर मछलियों की रानी से पूछा कि सागर के संबंध में बहुत सुनती हूंकहां है यह सागरकहां खोजूं कि मिल जाएकहां जाऊं कि पा लूंकौन-सा है मार्गक्या है विधिक्या है उपायकौन है गुरुजिससे मैं सीखूंयह सागर क्या हैयह सागर कहां हैयह सागर कौन है?
वह रानी मछली हंसने लगी। उसने कहाखोजातो भटक जाओगी। गुरु से पूछाकि उलझन हुई। विधि खोजीतो विडंबना है। खोजो मतपूछो मत। उस मछली ने कहालेकिन फिर यह सागर मिलेगा कैसेतो उस रानी मछली ने कहासागर के मिलने की बात ही गलत हैक्योंकि सागर को तूने कभी खोया ही नहीं है। तू सागर ही है। सागर में ही पैदा होती हैसागर में ही बनती हैसागर में ही जीती हैसागर में ही विदा होती हैसागर में ही लीन। जो कुछ हैसागर ही है चारों तरफ। लेकिन उस मछली ने कहामुझे तो दिखाई नहीं पड़ता!
मछली को सागर दिखाई नहीं पड़ सकताक्योंकि हम सिर्फ उसी को देख पाते हैंजो कभी मौजूद होता है और कभी गैर-मौजूद हो जाता है। हम उसको नहीं देख पातेजो सदा मौजूद है। सदा मौजूद दिखाई नहीं पड़ता।
जैसे हमें हवा दिखाई नहीं पड़तीऐसे ही मछली को सागर दिखाई नहीं पड़ता। न दिखाई पड़ने का कारण सिर्फ यही है कि सदा मौजूद है। हम जब आंख खोलेतब भी मौजूद था। जब हम आंख बंद करेंगेतब भी मौजूद होगा। जो सदा मौजूद है,एवरप्रेजेंट हैवह अदृश्य हो जाता है। इसलिए परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता है। जो सदा मौजूद हैवह दिखाई नहीं पड़ सकता। दिखाई वही पड़ सकता हैजो कभी मौजूद हैऔर कभी गैर-मौजूद हो जाता है।
सांख्य की निष्ठा कहती हैकुछ मत करो। करने के भ्रम में ही मत पड़ो। न ध्यानन धारणान योग--कुछ नहीं। कुछ करो ही मत। लेकिन न करना बहुत बड़ा करना है। बाकी सब करना बहुत छोटे-छोटे करना है। बाकी करना सब कर सकते हैं हम। न करना! प्राण कंप जाते हैं। कैसे न करो?
सबसे कठिन करनान करना है। इसलिए सांख्य सबसे कठिन योग है। सांख्य के मार्ग से जो जाते हैंवे राजऋषि हैं। जो उस योग को साध लेते हैंन करने कोनिश्चित ही वे ऋषियों में राजा हैं।
लेकिन जो नहीं साध पातेउनके लिए फिर योग है--यह करोयह करोयह करो। ऐसा नहीं कि उस करने से उनको मिल जाएगा। लेकिन करने से थकेंगेपरेशान होंगेकर-करके मुश्किल में पड़ेंगेजन्म-जन्म भटकेंगे। आखिर में करने से इतने ऊब जाएंगे कि छोड़कर पटक देंगे और बैठ जाएंगे कि अब बहुत कर लियाअब नहीं करते। और जब नहीं करेंगेतब पा लेंगे।
लेकिन करने से गुजरना पड़ेगा उन्हें। उनका योग हठयोग है--जिद्द सेकर-करके। मिलता तो तब हैजब न करना ही फलित होता हैचाहे वह न करने से आया होऔर चाहे करने से आया हो। मिलता तो तभी हैजब न करना फलित होता है। पूर्ण अकर्मतभी। और अकर्म में जो मिलता हैवह राजा जैसा मिलना है।
मजदूर को करना पड़ता हैतब भोजन मिलता है। दुकानदार को कुछ करना पड़ता हैतब भोजन मिलता है। राजा बैठा है अपने सिंहासन परकुछ करता नहींसब मिलता है। ऐसा कोई राजा होता नहीं। राजा को भी बहुत कुछ करना पड़ता है। लेकिन यह राजा की चरम धारणा है। राजऋषि का यहां जो अर्थ हैवह यही है कि जिसने बिना कुछ किए सब पा लियावह ऋषियों में राजा है।
और तीसरी बातफिर हम सांझ बात करेंगे।
राजऋषि का एक तीसरा अर्थ भी खयाल में लेना जरूरी है। व्यक्ति में दो तरह के जीवन हो सकते हैं: तनाव से भरा,टेंस लिविंगऔर रिलैक्स्डविश्रामपूर्णसहज। फूल देखें वृक्षों पर खिलेतो राजयोगी हैं। खिलने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता;खिल जाते हैं। आकाश में बादल देखेंतो राजयोगी हैं। कुछ करते नहींडोलते रहते हैं। कभी आकाश में देखी हो चीलपरों कोतिराकर रह जाती है थिरपर भी नहीं हिलाती! डोलती है हवा पर। उड़ती नहींतिरती है। तैरती भी नहींतिरती है। बसपंखों को फैलाकर रह जाती है। हवा जहां ले जाएडोलती रहती है।
राजयोग उस बात का नाम हैउस प्रक्रिया काजहां व्यक्ति पूर्ण विश्राम में जीता हैकुछ करता नहींतिरता है। श्वास भी नहीं लेता अपनी तरफ से। भविष्य का विचार नहीं करताक्योंकि भविष्य का जो विचार करेगावह तैरना शुरू कर देगा;उसके तनाव शुरू हो जाएंगे। अतीत का विचार नहीं करताक्योंकि जो अतीत का विचार करेगावह टेंस हो जाएगावह रिलैक्स नहीं हो सकतावह विश्राम में नहीं हो सकता। पूर्ण वर्तमान में होता हैअभी और यहींहिअर एंड नाउ। जो हो रहा हैउसमें है। और चील की तरह तिरता है।
जीसस एक गांव से गुजरेऔर अपने शिष्यों से उन्होंने कहा कि देखो इन लिली के फूलों को। खेत में लिली के फूल खिले हैं। जीसस ने कहादेखो इन लिली के फूलों को। सम्राट सोलोमन अपने पूर्ण वैभव में भी इतना शानदार न थाजितने ये लिली के गरीब फूल शानदार हैं। इनके शानदार होने का राज क्या है?
शिष्य क्या कहते! उन्हें तो राज का कुछ पता नहीं था। जीसस उन लिली के फूलों को दिखाकर यह कह रहे हैं कि लिली के छोटे-छोटे फूल सम्राट सोलोमन से भी ज्यादा शानदार हैं। क्या बात हैसम्राट सोलोमन भी तनाव में जीएगालेकिन लिली के फूलों को कोई तनाव नहीं है। न मौत की चिंता हैजो कल होगीन जन्म की फिक्र हैजो कल हो चुका। कुछ भी करना नहीं हैहो रहा है सब। परमात्मा के हाथ में समर्पित हैं। जो परमात्मा करा रहा हैवह हो रहा है।
राजऋषि का अर्थ हैसमर्पितविश्राम को उपलब्ध व्यक्तिजो कुछ करता नहींजो हो रहा हैउसे होने देता है।स्पांटेनियससहज जिसकी जिंदगी हैसहज जिसका जीना है। मौत आ जाएतो इतनी ही सहजता से मर जाएगा। सम्मान कोई देतो इतनी ही सहजता से ले लेगा। और अपमान कोई करेतो इतनी ही सहजता से पी जाएगा। दुख आएतो इतनी ही सहजता से स्वीकृत है। और सुख आएतो इतनी ही सहजता से। कहीं कोई असहजता नहीं हैकोई तनाव नहीं है। जीवन जो भी ले आएउसके लिए राजी है। यह राजीपनटोटल एक्सेप्टिबिलिटीसमग्र स्वीकार।
अगर ठीक से समझेंतो आस्तिकता का भी यही अर्थ हैसमग्र स्वीकार। ऐसी चित्त दशा राजऋषि की है। इसलिए कृष्णराजऋषि शब्द का उपयोग कर रहे हैं।

फिर शेष सांझ।

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