बुधवार, 28 सितंबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-02)-प्रवचन-003

दिव्य जीवन, समर्पित जीवन

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। 9।।

हे अर्जुन! मेरा यह जन्म और कर्म दिव्य अर्थात अलौकिक है। इस प्रकार जो पुरुष तत्व से जानता हैवह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता है,
किंतु मुझे ही प्राप्त होता है।
जीवन विपरीत ध्रुवों का संगम हैअपोजिट पोलेरेटीज का। यहां प्रत्येक चीज अपने विपरीत के साथ मौजूद हैअन्यथा संभव भी नहीं है। अंधेरा हैतो साथ में जुड़ा हुआ प्रकाश है। जन्म हैतो साथ में जुड़ी हुई मृत्यु है। जो विपरीत हैंवे सदा साथ मौजूद हैं।
जो हमें दिखाई पड़ता हैवह लौकिक है। जो हमारी इंद्रियों की पकड़ में आता हैवह लौकिक है। जिसे हमारी आंख देखती और कान सुनते और हाथ स्पर्श करते हैंवह लौकिक है। हमारी इंद्रियों के जगत का नाम लोक है। लेकिन इंद्रियों की पकड़ के बाहर भी कुछ सदा मौजूद हैवह अलौकिक है।
इंद्रियां जिसे नहीं पकड़तींहाथ जिसे स्पर्श नहीं कर पातेवाणी जिसे प्रकट नहीं करतीमन जिसे समझ नहीं पातावह भी सदा मौजूद हैउस मौजूद का नाम अलौकिक है। वह लोक के साथ ही निरंतर उपस्थित है।
जो व्यक्ति इंद्रियों पर ही अपने को समाप्त कर लेता हैउसे अलौकिक का कोई संस्पर्श नहीं हो पाता। जो ऐसा मानकर बैठ जाता है कि इंद्रियां ही सब कुछ हैंवह अलौकिक से वंचित रह जाता है।
कृष्ण कहते हैंमेरा यह जीवन अलौकिक है।
जीवन सभी का अलौकिक है। जन्म और मृत्यु लौकिक हैजीवन अलौकिक है। शरीर में जीवन हैलेकिन शरीर जीवन नहीं है। फूल में सौंदर्य हैलेकिन सौंदर्य फूल नहीं है। दीए में ज्योति हैलेकिन ज्योति दीया नहीं है। यद्यपि ज्योति दीए के बिना प्रकट न हो सकेगीइंद्रियों की पकड़ में न आ सकेगी। सौंदर्य फूल के बिना तिरोहित हो जाएगाखोजे से भी मिलेगा नहीं।
जीवन भी जन्म और मृत्यु के दो तटों के बीच बहती हुई धारा है। दोनों तट न होंगेधारा दिखाई पड़नी बंद हो जाएगी। लेकिन फिर भी स्मरण रखेंतट धारा नहीं है। और ऐसा भी हो सकता है कि धारा सूख जाएतट बने रहें और धारा न हो। तट बिना धारा के भी हो सकते हैं। तट स्थूल हैंदिखाई पड़ते हैंधारा सूक्ष्म हैअगर तट न हों तो दिखाई पड़नी बंद हो जाएगी।
जीवन सभी का अलौकिक हैलेकिन कृष्ण जोर देकर कहते हैंमेरा जीवन अलौकिक है। इस जोर का कारण क्या है?इस जोर के दो कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि दूसरों का जीवन अलौकिक नहीं हैकृष्ण का जीवन अलौकिक हैऐसा जो अर्थ लेंगेवे भूल में पड़ेंगे। जीवन तो सभी का अलौकिक हैकृष्ण का ही नहीं। फिर कृष्ण क्यों जोर देकर कहते हैं कि मेरा जीवन अलौकिक है?
वे इसलिए जोर देकर कहते हैं कि जिस दिन कोई अपने भीतर के अलौकिक जीवन को जानेगाउस दिन वह मुझसे भिन्न नहीं रह जातावह मुझसे एक ही हो जाता है। उस दिन से उसका जीवन उसका नहीं रह जातापरमात्मा का ही हो जाता है। मेरा जीवन अलौकिक हैऐसा जानते हीजीवन मेरा नहीं रह जाता। इस तथ्य को ठीक से समझ लेना जरूरी है।
जैसे ही बूंद ने जाना कि वह सागर हैवैसे ही बूंद बूंद नहीं रह जातीसागर ही हो जाती है। जैसे ही व्यक्ति ने जाना कि मेरे भीतर कुछ असीम भी मौजूद हैवैसे ही वह व्यक्ति नहीं रह जाताअसीम हो जाता है।
यहां कृष्ण उस असीम की तरफ से ही कहते हैं कि मेरा जीवन अलौकिक है। इसलिए जो भी इस अलौकिक का दर्शन कर लेता हैवह मुझे उपलब्ध हो जाता है। इसलिए वे कहते हैंमरकर वह व्यक्ति नए जन्म को नहीं उपलब्ध होतावह मुझे उपलब्ध हो जाता है।
जन्म का अर्थ हैबूंद अभी अपने को बूंद ही मानती हैबूंद अभी अपने को सीमा में बंधा हुआ मानती है। न जन्म होने का अर्थ है कि बूंद ने अब सीमाओं के बाहर अतिक्रमण कियाट्रांसेंडेंस हुआ। अब बूंद अपने को बूंद नहीं मानतीअब बूंद अपने को सागर ही जानती है।
कृष्ण कहते हैंजो भी अलौकिक जीवन के अनुभव को उपलब्ध हो जाता हैवह फिर मुझे ही उपलब्ध हो जाता है। फिर उसका जन्म नहीं होताफिर उसका जीवन ही होता है।
जन्म और मृत्यु का भ्रम जिन्हें हैउन्हें जीवन का अनुभव नहीं है। जिन्हें जीवन का अनुभव हैउन्हें जन्म और मृत्यु का भ्रम नहीं है। जब तक हमें लगता हैमैं जन्मा और मैं मरातब तक मुझे उसका पता नहीं चलेगाजो जन्म और मृत्यु के तट के बीच अदृश्य बहता थाजो जीवन था। मुझे किनारों का पता हैबीच की धारा का कोई भी पता नहीं है। इन दोनों किनारों के बीच में तीसरी चीज भी थीजीवन भी था। जन्म से शुरू हुआमृत्यु से तिरोहित हुआलेकिन इन दोनों के बीच में जीवन भी था। वह जीवनउसका हमें कोई पता नहीं हैवह अलौकिक है।
अलौकिक का अर्थ यह हुआइंद्रियों से पकड़ में आने योग्य नहीं है। अलौकिक का अर्थ यह हुआ कि पदार्थ को जिस भांति हम जानते हैंउस भांति उसे जानने का उपाय नहीं है।
पत्थर को मुझे हाथ में उठाकर देखना हैतो मैं स्पर्श करके देख सकता हूं। आपको अगर मुझे देखना हैतो आपके शरीर के स्पर्श से मैं आपको नहीं जानताकेवल आपके गृह कोआपके घर को जानता हूं। आप भीतर अछूतेअनटच्ड छूट जाते हैं। शरीर छू जाता हैआपको नहीं छू पाता हूं। स्पर्श की सीमा हैवह पदार्थ के पार नहीं जाती।
इसलिए विज्ञान कठिनाई में पड़ गया है। क्योंकि विज्ञान का खयाल हैजो इंद्रियों के भीतर हैवही रियलिटी हैवही यथार्थ हैजो इंद्रियों के भीतर नहीं हैवह यथार्थ नहीं है। लेकिन अब विज्ञान को रोज-रोज उन चीजों का पता चल रहा हैजो इंद्रियों की सीमा के भीतर नहीं हैं।
जैसे आज तक किसी ने भी इलेक्ट्रिसिटी नहीं देखी। आप कहेंगेहम रोज देखते हैं। घर हमारे बल्ब जलता हैपंखा चलता हैरेडियो बजता हैहम रोज देखते हैं। लेकिन जो आप देख रहे हैंवह सिर्फ परिणाम हैविद्युत नहीं है। वह सिर्फ कांसिक्वेंस हैरिजल्ट हैकाज़ नहीं है। आप जो देख रहे हैंवह विद्युत का परिणाम हैकाम हैविद्युत नहीं है। जब आप बल्ब को फोड़ देते हैंतो विद्युत नहीं फूटतीसिर्फ विद्युत को प्रकट करने वाला उपकरण टूट जाता हैइंस्ट्रूमेंट टूट जाता है;विद्युत नहीं टूट जाती। आप बिजली के तार को काट देते हैंतब बिजली नहीं कटतीसिर्फ बिजली का तार कटता हैजिससे बिजली बहती थी। जब आप बिजली के तार को पकड़ लेते हैंतो जो झटकाजो शॉक आपको लगता हैवह भी बिजली नहीं है;वह भी बिजली का परिणाम है। हम सिर्फ बिजली का परिणाम जानते हैंबिजली को नहीं जानतेवह अदृश्य है।
अगर हम जीवन को इसी तरह खोजेंतो हम पाएंगे कि हम सिर्फ परिणाम जानते हैं। मूल कारण भीतर अदृश्य रह जाता है। जड़ें दिखाई नहीं पड़तींशाखाएं दिखाई पड़ती हैं। जड़ें अदृश्य में रह जाती हैं। उस अदृश्य का नाम अलौकिक है।
इस अलौकिक को जो पुरुष जान लेता हैकृष्ण कहते हैंवह फिर शरीर में जन्म नहीं लेता। क्योंकि वह विराट शरीर के साथ एक हो जाता है। फिर उसे छोटे-छोटे शरीरों में जन्म लेने की जरूरत नहीं रह जाती। फिर वह मेरे साथ ही एक हो जाता है। यहां जब कहते हैं कृष्णमेरे साथतो उसका अर्थ है अस्तित्व के साथ। वन विद दि एक्झिस्टेंसवह जो समस्त अस्तित्व हैउसके साथ एक हो जाता है। फिर उसे अलग-अलग छोटे-छोटे घर बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।
बुद्ध को ज्ञान हुआतो ज्ञान की घड़ी के बाद आनंदमग्न हो उन्होंने जोर से कहामेरे मन! मेरे अहंकार! अब तक तुझे मेरे लिए छोटे-छोटे घर बनाने पड़ेलेकिन अब तुझे मैं काम से मुक्त करता हूं। अब तुझे मेरे लिए छोटे-छोटे घर न बनाने पड़ेंगे।
कृष्ण उसी का दूसरा हिस्सा कह रहे हैं। कह रहे हैंछोटे घर इसलिए नहीं बनाने पड़ेंगे कि घर नहीं रहेगाछोटे घर इसलिए नहीं बनाने पड़ेंगे कि सारा विश्वसारा अस्तित्ववैसी चेतना का घर हो जाता है। फिर छोटे की जरूरत नहीं रह जाती।
स्वभावतःजिसे हीरे मिल जाएंवह कंकड़-पत्थर मुट्ठी से छोड़ देता हैऔर जिसे महल मिल जाएंवह झोपड़ियों को भूल जाता है। जिसे अलौकिक का दर्शन हो जाएलौकिक कंकड़-पत्थर जैसा हो जाता हैफिर उसमें प्रवेश की आकांक्षा नहीं रह जाती।
यहां कृष्ण का यह जोर कि मेरा जीवन दिव्य और अलौकिक हैइस बात का ही जोर है कि जीवन दिव्य और अलौकिक है। यहां कृष्ण जीवन के प्रतिनिधि की तरह बोलते हैं। और इससे बड़ी भ्रांति होती है। उनकी भी मजबूरी है।
जीसस भी इसी तरह बोलते हैंऔर इसीलिए जीसस को सूली पर लटका दिया। क्योंकि समझने वालों ने समझा कि यह तो गलत बात बोलते हैं। जीसस ने कहा कि वह परमात्मा जो आकाश में है और मैंहम दोनों एक हैं। लोगों ने कहायह तो कुफ्र हो गयायह आदमी तो काफिर मालूम होता है! परमात्मा के साथ अपने को एक बताता है! यह तो बड़ा अहंकारी मालूम होता है।
नहींवे नहीं समझ सकेनहीं समझ पाए।
जब जीसस ने कहा कि मैं और परमात्मा एक हैतो जीसस यही कह रहे हैं कि मैं अब कहां हूंपरमात्मा ही है। सूली पर लटका दिया लोगों ने। सूली पर लटके आखिरी क्षण में जीसस ने कहाहे प्रभु! इन्हें माफ कर देनाक्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं! क्या कर रहे हैंयह तो जानते ही नहींक्या समझ रहे हैंयह भी नहीं जानते। गलत ही समझ रहे हैं।
कृष्ण को हमने सूली नहीं लगाईउसका कारण था। कृष्ण के पीछे कोई पांच-दस हजार साल की ऐसे लोगों की परंपरा थीजिन्होंने बहुत बार यह कहा था कि हम परमात्मा हैं। हम इसे सुनने के आदी हो गए थे। जीसस ने पहली दफापहली दफा यहूदी जगत में घोषणा की कि मैं और परमात्मा एक हैं। लोगों की बर्दाश्त के बाहर हो गया। ऐसा नहीं कि हम समझ गए कृष्ण की बातहम भी नहीं समझे। हमने नासमझी और तरह की की। जीसस को सुनने वालों ने नासमझी और तरह की की।
जीसस को सुनने वालों ने पहली दफा यह बात सुनी कि कोई आदमी कहता हैमैं परमात्मा हूंमैं दिव्य हूंमैं डिवाइन हूं। उन्होंने कहायह तो ज्यादती हो गई! यह आदमी अहंकारी हैसूली पर लटका दो!
हमने बहुत बार यह बात सुनी थी। उपनिषद कह गए थेवेद कह गए थेकृष्ण की बात हमें नई नहीं थी। लेकिन हमने भी भूल की। हमने कहायह आदमी भगवान हैइसकी पूजा करो।
सूली पर लटकाओ या पूजा करोदोनों में ही भूल हो गई। उन्होंने भूल की कि यह आदमी अपने को भगवान कह रहा है,सूली पर लगा दो। हमने भूल की कि यह आदमी अपने को भगवान कहता हैपूजा करो। हम दोनों नहीं समझे।
जीसस का भी मतलब यही था कि जिस दिन तुम भी जानोगे कि तुम कौन होतब तुम जानोगे कि तुम भी परमात्मा हो। और कृष्ण का भी मतलब यही है कि अगर तुम खोजोगेझांकोगे भीतरतो पाओगे कि तुम भी परमात्मा हो। मैं तुम्हारी संभावनाओं की आहट हूं। मैं तुम्हारी संभावनाओं की सूचना हूं। मैं तुम्हारी पोटेंशियलिटीज की तरफ से बोलता हूं। तुम जो हो सकते होमैं उसका प्रतिनिधि हूं।
इस बात को ठीक से समझ लें। कृष्ण कहते हैंतुम जो हो सकते होमैं उसका प्रतिनिधि हूं। तुम जो हो सकते होवह मैं हो गया हूं। तुम जो कल होओगेवह मैं आज हूं। मैं तुम्हारा कल हूं। मैं तुम्हारा भविष्य हूं। मैं तुम्हारे भविष्य की तरफ से बोलता हूं।
लेकिन यह हम न समझे। हम समझे कि कृष्ण कह रहे हैंवे भगवान हैंठीक हैपूजा करो। हम यह न समझे कि वे हमारे भविष्य के प्रतिनिधि हैंवे हमारी तरफ से बोल रहे हैं। जो हमारे बीज में छिपा हैवह उनका वृक्ष हो गया है। जो हमारे भीतर अभी अप्रगट हैवह उनके भीतर प्रगट हो गया है। जो अभी हम नहीं जानते अपने ही खजाने कोवह उन्होंने जान लिया है। वे हमारे सारे भविष्यहमारी सारी संभावनाओं की आवाज हैं।
हमने पूजा कीहम भी गलत समझे। जीसस को सूली लगाईवे भी गलत समझे। मंसूर को मुसलमानों ने काट डालावे भी न समझे। क्योंकि मंसूर ने कहाअनलहक! मैं ही ब्रह्म हूं। लोगों ने कहायह तो ज्यादती हैयह आदमी अहंकारी है।
हमने आज तक दुनिया में दो तरह की भूलें की हैं। न समझेतो सूली लगा दी। न समझेतो पूजा कर ली। पूजा में हम सिंहासन पर बिठा देते हैं और दूर कर देते हैं। सूली पर हम सूली पर लटका देते हैं और दूर कर देते हैं। लेकिन दोनों हालत में हम यह बात मानने को राजी नहीं होते कि यह आदमी हमारे भीतर की छिपी हुई संभावनाओं की आवाज है।
इसलिए कृष्ण दूसरे ही वचन में कहते हैं कि जो यह अनुभव कर लेगाफिर उसे जन्म की जरूरत नहींवह फिर मुझको उपलब्ध हो जाता है।
बड़ी कठिनाई है। उनकी कठिनाई भी है। आदमी के पास जो भाषा हैउसी भाषा में बोलना पड़ता है। उस भाषा में मैं के बिना बोले काम नहीं चल सकताया फिर हमारी समझ में कुछ भी न आएगा।
अगर परमात्मा भी जमीन पर उतरकर खड़ा होतो भी हमारी भाषा में ही उसे बोलना पड़ेगा। अगर वह अपनी भाषा में बोलेगातो हमें पागल मालूम पड़ेगा। उसे हमारी भाषा में ही बोलना पड़ेगा।
और मजा यह है कि हमारी भाषा में बोलेतो भी हम नहीं समझ पातेअपनी भाषा में बोलेतो भी नहीं समझ सकते। हमारी भाषा में भी बोलेतो भी हम नहीं समझ पातेलेकिन अपनी भाषा में बोलेतब तो हम बिलकुल ही न समझ पाएंगे। हमारी भाषा में बोलेतो कम से कम हम नासमझी कर पाते हैं। वह भी समझने का एक गलत ढंग है। लेकिन कोई शायद समझ लेइसलिए कृष्ण हमारी भाषा में बोलते हैंमैं का प्रयोग करते हैं।
कृष्ण जैसे व्यक्तियों के भीतर मैं बचता नहीं। बचेतो गीता बेकार हैफिर गीता पैदा नहीं हो सकती। लेकिन कृष्ण बार-बार मैं शब्द का प्रयोग करते हैं।
हमारी भी कठिनाई है। जब वे मैं का प्रयोग करते हैंतो हम समझते हैंजिस भांति हम मैं का प्रयोग करते हैंउसी भांति वे भी करते होंगे। हमारे और उनके प्रयोग में बिलकुल ही कोई साम्य नहीं है।
कृष्ण जब कहते हैं मैंतो उनके मैं में सब तू समाए हुए हैं। और जब हम कहते हैं मैंतो हमारे मैं में सब तू अलग हैं,बाहर हैंकोई भी समाया हुआ नहीं है। कृष्ण के मैं में तू इनक्लूसिव है। हमारे मैं में तू एक्सक्लूसिव हैबाहर है।
हम जब बोलते हैं मैंतो हम तू से फासला बताने के लिए बोलते हैं। कृष्ण जब बोलते हैं मैंतो वे तू को ढांक लेने के लिए बोलते हैं। लेकिन यह हमारे खयाल में नहीं आ सकता।
उनका मैं इतना बड़ा है कि उस मैं के बाहर और कोई भी नहीं। और हमारा मैं इतना छोटा है कि उस मैं के भीतर हमारे सिवाय और कोई भी नहीं। इस फर्क को खयाल में रखेंगेतो बार-बार उनके मैं का प्रयोग ठीक से समझ में आ सकता है।

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।। 11।।

और हे अर्जुन! पहले भी रागभय और क्रोध से रहितअनन्य भाव से मेरे में स्थित रहने वालेमेरे शरण हुए बहुत से पुरुषज्ञानरूप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
और पहले भी राग के ऊपर उठेक्रोध से मुक्त हुएमोह के पाश के बाहरतप से पवित्र हुए पुरुष मेरे शरीर को उपलब्ध हो चुके हैं!
राग के पार हुएवीतराग हुए। वीतराग शब्द गहरा है और बहुत अर्थपूर्ण है। वीतराग का अर्थ वैराग्य नहीं है। वीतराग का अर्थ विराग नहीं है। विराग का अर्थ हैराग के विपरीत हुआ। वीतराग का अर्थ हैराग के पार हुआ।
राग का अर्थ हैएक आदमी धन के पीछे पागल है। धन को पकड़ता है। धन देखता हैतो लार टपक-टपक जाती है। रात-दिन गिनता ही रहता है! विराग का अर्थ हैधन के विपरीत हुआधन से भागता है। कोई धन उसके सामने करेतो आंख फेर लेता है। कोई रुपया उसके पास रखेतो छलांग लगाकर खड़ा हो जाता है।
राग धन को पकड़ता हैविराग धन को छोड़ता है। विरागविपरीत राग हैउलटा हुआ राग है। राग स्त्री के पीछे दौड़ता,पुरुष के पीछे दौड़ताविराग स्त्री से भागतापुरुष से भागतालेकिन दोनों का केंद्र एक ही है। हांकोई उसकी तरफ भागता,कोई उससे पीठ करके भागतालेकिन वही दोनों के ध्यान में है। दोनों की अटेंशनदोनों की एकाग्रता वही है। दोनों की एकाग्रता में भेद नहीं है।
जो आदमी स्त्री के पीछे भागताउस आदमी की एकाग्रताऔर जो आदमी स्त्री को छोड़कर भागताउस आदमी की एकाग्रता में भेद नहीं है। उनका कनसनट्रेशन एक है--स्त्री। जो आदमी स्त्री के लिए पागल हैउसके मन में भी स्त्री के चित्र चलते हैं। या जो स्त्री आदमी के लिए पागल हैउसके मन में पुरुष के चित्र चलते हैं। और जो छोड़कर भागता हैविपरीत रूप से पागल हो जाता हैउसके मन में भी चित्र चलते हैं।
वीतराग का अर्थ हैपार हुआ। वीतराग तीसरी बात है। न रागन विराग। जो राग और विराग दोनों के पार होता हैवह वीतराग है। जिसके लिए बात बस व्यर्थ हो जाती है।
ध्यान रहेजो आदमी कहता हैमैं धन का त्याग कर रहा हूंधन उसे व्यर्थ नहीं हुआधन उसे अभी भी सार्थक है। जो आदमी कहता हैमैं लाखों त्याग किया हूंउसके लिए भी व्यर्थ नहीं हुआअभी उसके लिए भी धन सार्थक हैमीनिंगफुल है। हांमीनिंग बदल गयाअर्थ बदल गया। पहले तिजोरी में बंद करने का अर्थ थाअब त्याग करने का अर्थ हैलेकिन अर्थ है। जो आदमी तिजोरी में बंद कर रहा थावह भी कह रहा थामेरे पास इतने लाख हैंऔर जिस आदमी ने त्याग कियावह भी कह रहा हैमैंने इतने लाख का त्याग किया। लेकिन धन दोनों के लिए मूल्यवान हैवेल्युएबल है।
वीतराग वह हैजो कहता हैधन में कुछ अर्थ ही नहीं। न मैं तिजोरी में बंद करतान मैं त्यागता। धन में कुछ अर्थ नहीं। जिसके लिए धन बस मिट्टी जैसा हो गया। जिसके लिए धन मिट्टी जैसा हो गयावह त्याग के अहंकार से भी नहीं भरता है।
बड़ी मीठी कथा हैयाज्ञवल्क्य घर छोड़कर जाने लगा। उसकी दो पत्नियां हैंकात्यायिनी और मैत्रेयी। उसने उन दोनों को बुलाकर कहा कि मेरी धन-संपदा आधी-आधी बांट देता हूं। मैं जाता हूं अब त्याग करके। अब मैं प्रभु की खोज में निकलता हूं।
मैत्रेयी राजी हो गईसाधारण स्त्री थी। साधारण स्त्री का मतलबजिसे पति भी इसीलिए मूल्यवान होता है कि उसके पास संपत्ति है। ठीक हैपति जाता हैसंपत्ति दे जाता है--कुछ भी नहीं जाता। मैत्रेयी राजी हो गई। वह ठीक स्त्री थी।
लेकिन कात्यायिनी ने एक सवाल उठाया। वह साधारण स्त्री न थी। कात्यायिनी ने कहा कि जो धन तुम्हें व्यर्थ हो गया,तो तुम मुझे किसलिए दे जाते होअगर व्यर्थ हैतो बोझ मुझे मत दे जाओ। और अगर सार्थक हैतो तुम भी छोड़कर क्यों जाते हो?
कात्यायिनी ने बड़ा ठीक सवाल उठाया। अगर व्यर्थ हैराख हैधूल हैतो मुझे देकर इतने गौरवान्वित क्यों होते हो?अगर सार्थक हैतो छोड़कर कहां जाते होरुको! अगर सार्थक हैतो हम साथ-साथ भोगें। और अगर व्यर्थ हैतो मुझे भी उसी धन की खबर दोजो सार्थक हैजिसकी खोज में तुम जाते हो।
याज्ञवल्क्य मुश्किल में पड़ गया होगा। अभी याज्ञवल्क्य सिर्फ विराग में जा रहा था। कात्यायिनी ने उसे वीतराग के डायमेंशन मेंवीतराग के आयाम में उन्मुख किया। अभी उसे सार्थक था धनइसीलिए तो बांटने को उत्सुक था। अभी कुछ न कुछ अर्थ था उसे धन में। छोड़ता था जरूरलेकिन सार्थक था। अभी वह विराग की दिशा में मुड़ता था। लेकिन कात्यायिनी ने उसे एक नई दिशा मेंएक नए आयाम का इशारा किया। उसने कहा कि छोड़कर जाते होदेकर जाते होगौरवान्वित हो कि काफी दे जा रहे होतो फिर तुम छोड़कर जाते नहीं। धन तुम्हें सार्थक हैधन तुम्हें पकड़े ही हुए है!
कृष्ण कहते हैंजो राग के पार हो जाता है--बियांड। वीतराग का अर्थ हैबियांड अटैचमेंटडिटैचमेंट नहीं। वीतराग का अर्थ हैआसक्ति के पारविरक्त नहीं। विरक्त विपरीत आसक्ति में होता हैपार नहीं होता। वह एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव पर चला जाता हैदोनों ध्रुव के पार नहीं होता। वह एक द्वंद्व के छोर से द्वंद्व के दूसरे छोर पर सरक जाता हैलेकिन द्वंद्वातीत नहीं होता।
कृष्ण कहते हैंजो वीतराग हो जाता हैवह मेरे शरीर को उपलब्ध हो जाता है। वीतरागवीतभयवीतक्रोधजो इन सबके पार हो जाता है। वीतलोभ। वह तीसरा ही आयाम है। थर्ड डायमेंशन है।
तीन आयाम हैं जगत में। किसी चीज के प्रति रागअर्थात उसे पास रखने की इच्छा। किसी चीज के प्रति विरागअर्थात उसे पास न रखने की इच्छा। और किसी चीज के प्रति वीतरागअर्थात वह पास हो या दूरअर्थहीनउससे भेद नहीं पड़ता।
बुद्ध ने कहा हैराग का अर्थ हैप्रियजन घर आतासुख मालूम पड़ता। अप्रियजन घर आ जातातो दुख मालूम पड़ता। मित्र घर से जातातो दुख मालूम पड़ता। शत्रु घर से जातातो सुख मालूम पड़ता। शत्रु के प्रति तो सभी विरागी होते हैंमित्र के प्रति सभी रागी होते हैं।
वीतराग का अर्थ हैजिसका न कोई मित्र हैन कोई शत्रु। वीतराग का अर्थ हैजिसका चित्त किसी भी चीज सेकिसी भी कारण से बंधा हुआ नहीं है। मित्रता से भी बंधा हुआ नहींशत्रुता से भी बंधा हुआ नहीं।
और ध्यान रहेमित्र भी बांध लेते हैं और शत्रु भी बांध लेते हैं। मित्रों की भी याद आती हैशत्रुओं की भी याद आती है। सच तो यह हैशत्रुओं की थोड़ी ज्यादा आती है। मित्रों को भूलना आसानशत्रुओं को भूलना कठिन है। राग को भूलना आसान;विराग को भूलना कठिन हैबहुत कठिन है। प्रेम को भूलना आसानघृणा को भूलना कठिन है। शत्रु पीछा करते हैंछाया की भांति पीछे होते हैं और बदला लेते हैं। सब विराग बदला लेता है।
इसलिए एक बहुत अदभुत घटना घटती है मनुष्य के मन में। और वह घटना यह घटती है कि जो धन को पकड़ते हैंवे कभी-कभी इंटरवल्स मेंबीच-बीच में छुट्टी भी लेते हैं। बीच-बीच में उनका मन आता हैछोड़ो सबकुछ सार नहीं है। तेईस घंटे दुकान पर होते हैंकभी घंटेभर मंदिर भी हो आते हैं।
लेकिन ध्यान रहेइससे उलटी घटना भी घटती है। जो चौबीस घंटे मंदिर में रहता हैउसका मन भी घंटे दो घंटे को बाजार में आ जाता है। वह भी छुट्टी लेता है। भला हिम्मत न होखुद न आ पाता होलेकिन मन आ जाता है।
विरागी भी छुट्टी पर होते हैं। चौबीस घंटे विरागी होना मुश्किल है। चौबीस घंटे रागी होना मुश्किल है। क्योंकि मन थक जाता हैऊब जाता है एक ही चीज से। इसलिए जो रागी हैंवे अक्सर विराग के सपने देखते हैंऔर जो विरागी हैंवे राग के सपने देखते हैं। जो रागी हैंवे कई बार सोचते हैंसब छोड़-छाड़कर चले जाएंसब बेकार है। जो विरागी हैंवे कई बार सोचते हैं कि बड़ी मुश्किल में पड़ गएनाहक छोड़-छाड़कर आ गए। इसमें कुछ सार नहीं हैइस छोड़ने-छाड़ने में कुछ अर्थ नहीं है।
मन द्वंद्वों में डोलता रहता है। विश्राम चाहता है मन। इसलिए बुरे आदमियों के भी अच्छे क्षण होते हैंऔर अच्छे आदमियों के भी बुरे क्षण होते हैं। ऐसा बुरा आदमी खोजना मुश्किल हैजिसके अच्छे क्षण न होते हों। और कभी-कभी बुरे आदमी अच्छे क्षणों में साधुओं को पार कर जाते हैं। और अच्छे आदमी भी खोजने मुश्किल हैंजिनके बुरे क्षण न होते हों। और अच्छे आदमी भीजब उनके बुरे क्षण होते हैंतो असाधुओं को पार कर जाते हैं।
उसका कारण है। क्योंकि जो आदमी तेईस घंटे कोशिश करके अच्छा हैजब वह एक घंटे बुरा होगातो साधारण बुरा नहीं होगा। तेईस घंटे का बदला एक घंटे में चुकाना पड़ेगा। और जो आदमी तेईस घंटे बुरा हैवह जब एक घंटे के लिए अच्छा होगातो साधारण अच्छा नहीं होगाअतिशय अच्छा हो जाएगा। तेईस घंटे की रुकी हुई अच्छाई बदला मांगती है।
कृष्ण इन दोनों की बात नहीं कर रहे हैं। कृष्ण कहते हैंवीतराग। वीतराग को कभी छुट्टी नहीं लेनी पड़ती हैक्योंकि वीतराग द्वंद्व में नहीं होता। इसलिए सिर्फ वीतरागी पुरुष चौबीस घंटा एक-रस हो सकता हैन रागी हो सकता हैन विरागी हो सकता है। सिर्फ वीतराग एक-रस हो सकता है।
वीतराग ऐसा होता हैजैसे हम सागर को कहीं से भी चखेंऔर वह नमकीन है। बसऐसा वीतरागी होता हैउसे हम कहीं से भी चखेंवह एक ही स्वाद है उसका। वह वेश्या के गृह में बैठकर भी वही होता हैजो प्रभु के मंदिर में बैठकर होता है। वह वेश्यागृह से भी नहीं डरतामंदिर के लिए भी लोलुप नहीं होता। असल में इतना आश्वस्त होता है अपने में कि अब उसका न कोई भय हैन कोई लोभ है। इतना आश्वस्तअपने में इतना भरोसे से भरा हुआ कि छुट्टी का उसे डर ही नहीं है।
एक बार ऐसा हुआ कि बुद्ध के एक भिक्षु कोगांव में गया थाएक वेश्या ने निमंत्रण दे दिया। और कहा कि इस वर्षाकाल में भिक्षुमेरे ही घर चार महीने रुक जाओ! साधारण भिक्षु होताविरागी होतादुबारा लौटकर उस घर के सामने न जाता। वेश्या ने सोचा था कि भिक्षु इनकार कर देगा। कहेगातू वेश्या! और मैं तेरे घर रुकूंनहींयह नहीं हो सकता। कहां भिक्षुकहां संन्यासीकहां वेश्या का घर!
उस भिक्षु ने कहाआ जाऊंगालेकिन बुद्ध से आज्ञा लेनी पड़ेगी। तो मैं कल आज्ञा लेकर जवाब दे दूंगा। उस वेश्या ने कहाऔर अगर बुद्ध ने आज्ञा न दीउस भिक्षु ने कहाइतना आश्वस्त हूं अपने प्रति कि बुद्ध इनकार नहीं करेंगे। कहा,इतना आश्वस्त हूं अपने प्रति कि बुद्ध इनकार न करेंगेबुद्ध मुझे जानते हैं। मंदिर और वेश्यागृह में मेरा स्वाद एक ही रहेगा। उसका भय न कर। नियम हैइसलिए आज्ञा मांगनी जरूरी हैअन्यथा कोई जरूरत नहीं हैमैं भी रुक जा सकता हूं।
दूसरे दिन भिक्षुओं के बीच उस भिक्षु ने खड़े होकर कहा कि एक बहुत मजेदार घटना घट गई। राह पर जाता थाएक वेश्या ने निमंत्रण दिया कि चार महीने वर्षाकालआने वाले वर्षाकाल में उसके घर मेहमान बनूं। आज्ञा मांगता हूं। बुद्ध ने कहा,आज्ञा मांगने की क्या जरूरतजो संन्यासी वेश्या से डर जाएवह संन्यासी ही नहीं है। जाओ! जब उसने निमंत्रण दियातो विश्राम करो। चार महीने वहीं रुको।
अनेक भिक्षुओं के प्राणों में लहरें दौड़ गईं। सुंदरी थी बहुत वेश्या। सारे भिक्षुओं की नजर उस पर थी। गांव में गुजरते थे,तो किसी न किसी बहाने उस रास्ते जरूर निकल जाते थेउस रास्ते पर भिक्षा जरूर मांग लेते थे। कौंध गई होंगी बिजलियां। मुश्किल खड़ी हो गई।
एक भिक्षु ने खड़े होकर कहा कि यह तो अनुचित हैसंन्यासी का और वेश्या के घर में रुकना! और आप आज्ञा देते हैं?
बुद्ध ने कहाअगर तुम आज्ञा मांगोतो नहीं दूंगा। क्योंकि संन्यासी और वेश्या से डरेतो फिर वेश्या जीत गईफिर हम हार गए। यह तो चुनौती हैचैलेंज है। एक वेश्या ने निमंत्रण दिया और वेश्या नहीं डरती कि संन्यासी उसे बदल लेगा और संन्यासी डरे कि वेश्या उसे बदल लेगीतो हम हार गए। तुम्हें आज्ञा न दूंगा। लेकिन जिसने आज्ञा मांगी हैउसने कहा कि बड़ी मजेदार घटना घट गई हैएक वेश्या ने निमंत्रण दिया है। उसे आज्ञा है। वह अपने प्रति आश्वस्त है।
चार महीने वह भिक्षु वेश्या के घर था। वेश्या जैसा भोजन करातीवैसा भोजन कर लेता। वेश्या भी बहुत चिंतित हुई। नाचने लगतीतो नाच देख लेता। गीत गाने लगतीतो गीत सुन लेता। वेश्या बहुत चिंतित हुई। सब उपाय उसने किए। अर्धनग्न होकर नाचतीतो भी देखता रहता। बहुत मुश्किल में पड़ी।
एक महीना बीतादो महीने बीते। वेश्या सब तरह की कोशिश करके थक गईलेकिन न तो उस भिक्षु ने कोई रस लिया,और न विरस प्रकट किया। न तो उसने यह कहा कि सुंदरखूब। न तो उसने वाह-वाह कीन उसने यह कहा कि बंद करो,बेकार हैहमें ठीक नहीं लगताआंख बंद की। नहींयह भी नहीं किया। नाचतीतो देखता। न नाचतीतो कभी यह भी न कहता कि आज नाचो! आज नाचोगी नहींबसघर में ऐसा रहाजैसे हो ही न।
दो महीने बीत गएवेश्या उसके पैरों पर गिर गई और उसने कहा कि मुझे राज बताओ। तुम तो कंपते ही नहीं! यहां न वहां। अगर तुम विपरीतता भी दिखाओतो मैं कुछ कोशिश करूं। अगर तुम यह भी कहो कि यह गलत हैतो भी कुछ रास्ता बने। तुम कुछ तो कहो। तुम कोई वक्तव्य तो दो! तुम कोई निर्णय तो लो। तुम इस पक्ष में या उस पक्ष में कुछ भी तो कहो
उस भिक्षु ने कहापक्ष में गया कि तू जीती और मैं हारा। हम निष्पक्ष ही रहेंगे। तुझे जो करना हैतू करहमें जो करना हैहम करते हैं। जब तू हमारे बाबत कोई पक्ष और विपक्ष नहीं लेतीहम क्यों लें?
चार महीने बीत गए। भिक्षुओं में तो बड़ी बेचैनी थी। न मालूम कितनी खबरें भिक्षु लेकर बुद्ध के पास आते। कोई खबर लाता कि गया वह आदमी। हमने नाचते देखा है कि वह वेश्या नाच रही है और वह देख रहा है! कोई कहता कि सुना आपने! वेश्या उसे बहुत ही मिष्ठान्न खिला रही है और वह खा रहा है! कोई कहतासुना आपने! वेश्या ने उसे रेशम के वस्त्र दे दिए हैं और वह पहने हुए है! कोई कहतासुना आपने! सब नियमसब मर्यादाएं टूट गई हैं।
बुद्ध सुनते और कहते कि ठीक है। लेकिन तुम चिंतित क्यों होतुम उस भिक्षु में उत्सुक हो या उस वेश्या मेंऔर डूबेगा वहतो वह डूबेगातुम्हारी परेशानी क्या हैखोएगातो वह खोएगातुम इतने आतुर क्यों हो?
चार महीने बाद वह भिक्षु आयालेकिन अकेला नहीं था। साथ में एक भिक्षुणी भी थीवह वेश्या भिक्षुणी हो गई थी। बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा कि देखो! भिक्षु लौट आयासाथ में एक भिक्षुणी भी लौट आई है। वेश्या से पूछा कि तुझे क्या हुआउसने कहाहुआ कुछ भी नहींमैं हार गई। पहली बार मैं कहीं हारी। सदा मैं जीतती रहीअब मैं हार गई। और अकंप इस आदमी को जाना। वीतराग इस मनुष्य को जाना। और इसकी वीतरागता में जो शांति और जो आनंद अनुभव हुआवही खोजने मैं भी चली आई हूं। बुद्ध ने कहादेखो! संन्यासी जीतकर लौट आया हैवीतराग थाइसलिए। तुम हार जाते। तुम विरागी होतुम्हारे हारने का डर था।
कृष्ण कहते हैंजो वीतराग होतावह मेरे शरीर को उपलब्ध हो जाता है। इसमें बड़े मजे की बात है। वे कह रहे हैंमेरे शरीर को। अच्छा न होता क्या कि वे कहतेमेरी आत्मा को! लेकिन वे कहते हैंमेरे शरीर कोटु माई बाडी। अच्छा होता न कि वे कहतेमेरी आत्मा को उपलब्ध हो जाता है। लेकिन कृष्ण कहते हैंमेरे शरीर को उपलब्ध हो जाता है।
क्या राज हैराज बड़ा है।
यह जो ब्रह्मांड हैयह जो विश्व हैयह शरीर है परमात्मा का। यह जो दृश्य चारों ओर फैला हैयह शरीर है। येचांदत्तारेयह सूरजयह अरबों-अरबों प्रकाश वर्ष की दूरियों तक फैला हुआ एक्सपैंशन जो हैयह जो विस्तार है...।
क्या कभी आपने सोचा कि ब्रह्म शब्द का अर्थ होता हैविस्तारवृहतजो फैलता ही चलता गयाजिसके फैलाव का कोई अंत नहीं है। ब्रह्म बड़ा साइंटिफिक शब्द हैबहुत वैज्ञानिक--धार्मिक बहुत कम। ब्रह्म शब्द धार्मिक जरा भी नहींबिलकुल वैज्ञानिक टरमिनालाजी है। ब्रह्म का मतलब हैजो फैलता ही गया हैदि एक्सपैंडिंगजो फैलता ही चला जाता हैजिसके फैलाव का कोई अंत ही नहीं है। इस फैले हुए का नाम ब्रह्म है।
इस फैले हुएदिखाई पड़ने वाले अस्तित्व को कृष्ण कहते हैंमेरा शरीर। जो वीतराग हो जाता हैवह मेरे शरीर को उपलब्ध हो जाता है।
क्योंआत्मा को तो हम उपलब्ध ही हैंहमारी भूल सिर्फ शरीर की है। कृष्ण की आत्मा को तो हम अभी भी उपलब्ध हैं,लेकिन हम अपने-अपने शरीरों में अपने को बंद मान रहे हैंवह हमारी भूल है। इसलिए कृष्ण आत्मा की बात नहीं करते। उसको तो हम उपलब्ध ही हैंसिर्फ यह शरीर की भूल भर टूट जाए हमारी। हमें किसी दिन यह पूरा ब्रह्मांड अपना शरीर मालूम पड़ने लगेबस।
आत्मा तो हम अभी भी हैं। आत्मा तो हमारी इस अज्ञान के क्षण में भी कृष्ण का हिस्सा है। हमारी भ्रांति है शरीर की सीमा की। अगर शरीर की सीमा की भ्रांति टूट जाएऔर हम कृष्ण के शरीर को--कृष्ण का शरीर अर्थात ब्रह्मांड को--उपलब्ध हो जाएंतो बात पूरी हो जाती है। इसलिए कृष्ण कहते हैंमेरे शरीर को उपलब्ध हो जाता है।
शरीर का क्या अर्थ हैशरीर का अर्थ हैआत्मा का आवरण। शरीर का अर्थ हैआत्मा का गृह। अंग्रेजी का शब्द बाडीबहुत अच्छा है। जिसके भीतर आत्मा एंबाडीड हैजिसके भीतर शरीर छिपा है।
यह जो हमारा शरीरहमें लगता हैमेरा शरीर! यह हमें क्यों लगता हैराग के कारणविराग के कारण। अगर राग और विराग दोनों छूट जाएंतो यह मेरा शरीर हैऐसा नहीं लगेगा। तब सब शरीर मेरे हैं। तब चांदत्तारे मेरे शरीर के भीतर हो जाएंगे;तब मेरी जो चमड़ी हैवह असीम को छू लेगी।
राम कहते थे कि मैंने चांदत्तारों को अपने शरीर के भीतर परिभ्रमण करते देखा। पागलपन की बात है। बिलकुल पागलपन की बात है! लेकिन ठीक कहते थे। जब भी कोई राग और विराग के एक क्षण को भी पार हो जाएउसी क्षण अपने शरीर का स्मरण भूल जाता हैबाडीलेसनेस आ जाती हैशरीरहीन हो जाता है। और ये दोनों बातें एक ही हैं।
ब्रह्म के शरीर को उपलब्ध होना या अपने शरीर को भूल जानाएक ही बात है। जो व्यक्ति अपने शरीर की सीमा को भूल जाता हैवह ब्रह्म के शरीर की सीमा के स्मरण से भर जाता है।
यह शरीर मेरा हैयह हमारे राग और विराग के कारण है। जब तक कोई चीज मेरी है और कोई चीज तेरी हैतब तक यह शरीर मेरा है। अगर ठीक से समझेंतो मेरे का भाव ही मेरा शरीर है। बहुत मनोवैज्ञानिक अर्थों में मेरे का भाव ही मेरा शरीर है। जहां तक मेरे का भाव हैवहां तक शरीर है। अगर मेरे का भाव बड़ा हो जाएइतना बड़ा हो जाए कि वह ब्रह्म को घेर लेब्रह्मांड के साथ एक हो जाएतो फिर सभी कुछ मेरा शरीर है। वस्तुतः सभी कुछ शरीर है--वस्तुतः। लेकिन हमारी एक भ्रांति है।
किस जगह आप अपने शरीर को समाप्त मानते हैंकिस जगहचमड़ी पर अपने शरीर को आप समाप्त मानते हैं। लेकिन आपकी चमड़ी हवा के बिना एक क्षण जी सकती हैनहीं जी सकती। तो हवा भी आपकी चमड़ी के पार की एक पर्त है आपके शरीर की। उसके बिना आप नहीं जी सकते। हवा की पर्त अगर हटा ली जाएतो आप जी नहीं सकते। जिसके बिना आप नहीं जी सकतेवह आपका शरीर है। जिसके बिना जीना मुश्किल हो जाएगावह आपका शरीर है।
रोआं-रोआं श्वास ले रहा है। आप इस भ्रांति में मत रहना कि आपकी सिर्फ नाक ही श्वास ले रही है। अगर आपके पूरे शरीर को पेंट कर दिया जाएऔर सब रोएं बंद कर दिए जाएंऔर सिर्फ नाक खुली छोड़ दी जाएतो आप पांच-सात मिनट में मर जाएंगे। कितना ही फिर आप जोर से श्वास लोकुछ न होगा। क्योंकि रोआं-रोआं श्वास ले रहा हैपूरा शरीर श्वास ले रहा है।
यह चारों तरफ हवा की जो पर्त हैवह भी आपकी चमड़ी है। उसके बिना आप नहीं जी सकते। दो सौ मील तक पृथ्वी के चारों तरफ हवा की पर्त है। लेकिन वह हवा की पर्त भी नहीं जी सकतीअगर उसके पास सूरज की किरणों का जाल न हो। वह हवा भी नहीं जी सकती। फिर दस करोड़ मील दूर तक सूरज की किरणों का जाल हैवह भी आपकी चमड़ी है। उसके बिना भी आप नहीं जी सकते।
वहां सूरज ठंडा हो जाएतो हम यहां अभी ठंडे हो जाएंगे। हमको पता भी नहीं चलेगा कि हम ठंडे हो गएक्योंकि पता चलने के लिए भी हमारा बचना जरूरी है। इसलिए सूरज जब ठंडा होगातो हम लिखने के लिए बचेंगे नहींअखबार में खबर न निकाल पाएंगे कि सूरज ठंडा हो गया। सूरज ठंडा हुआ कि हम ठंडे हुए। सूरज दस करोड़ मील दूर हैलेकिन सूरज की गर्मी हमारी पर्त है शरीर की। हम एंबाडीड हैंसूरज की पर्त के भीतर हम हैंएक बड़ा शरीर है।
लेकिन सूरज भी न बचेअगर महासूर्यों से उसे दिन-रात शक्ति न मिलती हो। हमारा सूरज बड़ा छोटा है। ऐसे बहुत बड़ा हैहमसे बहुत बड़ा लगता है। पृथ्वी से कोई साठ हजार गुना बड़ा है। लेकिन और सूर्यों के मुकाबले बहुत मीडियाकर हैबहुत छोटा सूरज है। रात को जो तारे दिखाई पड़ते हैंवे महासूर्य हैं। हमारा सूरज कोई तीन-चार अरब महासूर्यों की भीड़ में एक छोटा-सा सूरज हैबहुत मीडियाकरबहुत मध्यमवर्गीय। कोई बहुत बड़ा सूर्य नहीं है। उससे करोड़ों बड़े सूर्य हैं। अगर उन सूर्यों से उसे दिन-रात ऊर्जा न मिलती होतो वह कभी का ठंडा हो जाए। वे भी हमारा शरीर हैं।
हमारा शरीर समाप्त कहां होता हैजहां ब्रह्मांड समाप्त होता होवहीं समाप्त होता है। उसके पहले समाप्त नहीं होता।
एक छोटे-से फूल के खिलने में पूरा ब्रह्मांड सहयोगी है। एक छोटा-सा फूल खिलता है घास का। इस घास के फूल केखिलने में अरबों-खरबों मील दूर बैठे हुए महासूर्यों का हाथ हैवे इसका शरीर हैं। उनके बिना यह न हो सके।
तों कृष्ण कहते हैं कि जो वीतराग हो जाता हैजो मेरेत्तेरे के भाव से उठ जाता हैजो आकर्षण-विकर्षण के पार हो जाता हैवह मेरे शरीर को उपलब्ध हो जाता है।
मेरे शरीर का अर्थ हैसमस्त ब्रह्मांड उसका शरीर बन जाता है। और जब ब्रह्मांड शरीर बनता हैतभी हमें ब्रह्म का पता चलता है कि हम कौन हैं! मैं कौन हूंहमें तब तक पता न चलेगा--निश्चित हीजिन्हें अपने शरीर का भी पता नहींउन्हें अपनी आत्मा का क्या पता होगाजिन्हें शरीर का ही पता नहींउन्हें आत्मा का पता न हो सकेगा। जो अपने शरीर के संबंध में ही अज्ञानी हैंवे अपनी आत्मा के संबंध में ज्ञानी कैसे हो सकेंगे?
इसलिए कृष्ण का कहना बहुत अर्थपूर्ण है कि वे मेरे शरीर को उपलब्ध हो जाते हैं। और अर्जुन से वे कहते हैं कि तुझसे जो मैं कह रहा हूंउससे पहले भी जिन-जिन पुरुषों ने वीतरागता पाईवे मेरे शरीर को उपलब्ध हो गए हैंवे मेरे साथ एक हो गए हैं।
दुईदो का भाव भ्रम हैलेकिन बड़ा गहरा है। बड़ा गहरा है। लगता है कि हम अलग हैं। यह हमारा अलग होना बड़ी से बड़ी भ्रांतिदि ग्रेटेस्ट इलूजन है। हम अलग जरा भी नहीं हैं। एक क्षण को भी नहीं हैं। एक क्षण को भी हमें अलग कर दिया जाएऔर हम विलीन हो जाएंगेहम बचेंगे नहीं।
हमारे अलग होने की भ्रांति वैसी हैजैसे कि नदी की छाती पर एक बबूला। पानी का बबूला उठ आया। तैर रहा हैचल रहा हैफिर रहा हैसूरज की किरणों में चमक रहा है। उस बबूले को भी लगता हैमैं अलग।
जरा भी अलग नहीं है। जरा अलग करें नदी से और पता चलेगाकहीं भी न रहा। नदी के पानी की जरा पतली-सी पर्त उसका शरीर थीवह पानी में खो गई। हवा का छोटा-सा आयतन उसके भीतर कैद थावह मुक्त होकर हवा में मिल गया। बस,हम नदी पर तैरते हुए बबूलों की भांति अलग हैं।
इसलिए कृष्ण कहते हैं कि जो तुझसे पहले भीकभी भीजिसने भी जान लिया है इस सत्य कोवह मेरे शरीर कोवह ब्रह्मांड के साथ एक हो जाता है।

प्रश्न:

भगवान श्रीअनन्य भाव से मेरी शरण हुए और ज्ञानरूपी तप से शुद्ध हुए--इन दो दशाओं का अर्थ और अधिक स्पष्ट करने की कृपा करें।


अनन्य रूप से मेरी शरण हुए--बहुत मजेदार हैबहुत कंट्राडिक्टरी हैबहुत विरोधाभासी है।
धर्म के सभी सत्य पैराडाक्सेस हैंविरोधाभासी हैं। विरोध आभास भर है।
कृष्ण कहते हैंअनन्य रूप से मेरी शरण हुए।
अनन्य का अर्थ हैजो अपने को मुझसे अन्य न माने। जो मुझको और अपने को भिन्न न मानेअन्य न माने,अदरनेस न रहे--अनन्य हो। अनन्य भाव से मेरे साथ एक हो गया हो।
लेकिन फिर दूसरी बात कहते हैं। जब एक ही हो गया होतो शरण होने की गुंजाइश कहां रही! क्योंकि शरण तो हम उसी के जा सकते हैंजो अन्य हैदि अदर। शरण तो हम उसी की जा सकते हैंजो दूसरा है। जो दूसरा नहीं हैउसकी शरण हम कैसे जाएंगे?
कृष्ण कहते हैंअनन्य रूप से मेरी शरण। एक हो जाओ मुझसे और मेरी शरण आ जाओ। बड़ी उलटी बात कहते हैं। एक हो जाएंगेतो शरण कौन जाएगाऔर किसकी शरण जाएगाइसीलिए मजेदार है यह वक्तव्य।
असल में जिस दिन न वह बचेजो शरण जाता हैऔर न वह बचेजिसकी शरण जाता हैउसी दिन शरणागत होता है व्यक्ति। उसी दिन शरण पूरी हुई। जब तक आप बचे हैं और दूसरा बचा हैतब तक आप सिर रख दें चरणों मेंआपका अहंकार चरणों में नहीं रखा जातावह भीतर खड़ा रहता है।
मंदिरों में जाकर देखेंसिर रखे हैं पत्थरों के चरणों में और अहंकार अकड़कर खड़े हैं। सिर जमीन पर झुका हैअहंकार आकाश में उठा है। सिर चरणों में झुका हैअहंकार चारों तरफ देख रहा है कि कोई देखने वाला भी मंदिर में है या नहींहम कितनी शरण चले गए हैं! अनन्य भाव सेजब न मैं बचेन तू बचेतभी शरण होती है।
शरण का अर्थसमर्पणसरेंडर। जब तक मैं बचता हैतब तक समर्पण नहीं होता। इसलिए ध्यान रहेकोई आदमी यह नहीं कह सकता कि मैं शरण जाता हूं। कोई आदमी शरण नहीं जा सकताक्योंकि जब तक कहने वाला मौजूद है कि मैं शरण जाता हूंतब तक शरण नहीं होगी। जब मैं नहीं रह जातातब आदमी अनुभव करता है कि शरण जा चुकाशरणागत हो गया।
अनन्य भाव सेनहीं कोई दूसरा है उस तरफन कोई यहांजिस दिन कोई ऐसी भाव-दशा में आता है--जो मैंने कहा कि वीतराग होने से फलित होती है--उस दिन शरणागतिउस दिन शरणउस दिन वह मेरी शरण आ पाता हैकृष्ण कहते हैं। मेरी शरणवही भाषा उपयोग करनी पड़ रही हैजो नहीं करनी चाहिएक्योंकि वहां कोई मेरात्तेरा नहीं है।
दूसरी बात वे कहते हैंज्ञानरूपी तप से शुद्ध हुए।
यह भी बहुत मजेदार वक्तव्य हैयह भी पैराडाक्सिकल है--ज्ञानरूपी तप से शुद्ध हुए। ज्ञानरूपी तपइसे जोड़ने की क्या जरूरत थीतप से शुद्ध हुएइतना कहना काफी न होता क्या?
अक्सर ऐसा होता है कि अज्ञानी बहुत तप कर पाते हैं। असल में अहंकारी बहुत तप कर सकता हैक्योंकि अहंकारी हठी होता है। वह कहता है कि हम रहेंगे साठ दिन भूखेतो रह सकता है। जरा अहंकार कमजोर होतो साठ दिन भूखा रहना मुश्किल हो जाए। अहंकार कमजोर होतो साठ दिन भूखा रहना मुश्किल हो जाएअहंकार मजबूत होतो आदमी साठ दिन भूखा रह सकता है।
अहंकारी तय कर ले कि हम पैर पर ही खड़े रहेंगेअब कभी बैठेंगे नतो खड़ा रह सकता है। गैर-अहंकारी तय कर ले,तो थोड़ी-बहुत देर में सोचेगा कि बहुत से बहुत लोग यही कहेंगे न कि अपना वचन पूरा नहीं कर पाया! बैठ जाते हैं। अहंकारी कहेगा कि अब चाहे प्राण चले जाएंलेकिन अब बैठ नहीं सकता। एक अहंकार की कसम हो गई।
तो ध्यान रहेअहंकारी अक्सर तपश्चर्या में उत्सुक हो जाते हैं। इसलिए तपस्वी अगर अहंकारी मिलते होंतो आश्चर्य नहीं है। आमतौर से तपस्वी अहंकारी मिलते हैं। उसका कारण यह नहीं कि तपस्वी अहंकारी होते हैंउसका बुनियादी कारण यह है कि अहंकारी आसानी से तपस्वी हो जाते हैं। असल में अहंकार जो भी जिद्द पकड़ लेउसको पूरा करने की कोशिश करता है।
तो सौ में अट्ठानबे तपस्वियों का मौका यह है कि वे अहंकार से तपश्चर्या के रास्ते पर आते हैं। इसलिए हम तपस्या की खूब प्रशंसा करते हैंशोभायात्रा निकालते हैं। कोई उपवास कर लेतो शोभायात्रा निकलती हैजुलूस निकलता हैबैंड-बाजे बजाते हैं।
उपवास के लिए बैंड-बाजों की कोई जरूरत नहीं। लेकिन जिस अहंकार से उपवास फलित हुआ हैवह बैंड-बाजे के बिना शिथिल हो जाएगा। उसके लिए बैंड-बाजा बिलकुल जरूरी हैउसको जगाए रखने के लिएफुसलाने के लिए। क्योंकि उस आदमी ने उपवास के लिए उपवास नहीं किया। अंत में यह बैंड-बाजा बजने वाला हैबहुत गहरे में इसकी आकांक्षा है।
तो हम अहंकार को प्रोत्साहित करते हैंक्योंकि अहंकार के आधार पर तप हो सकता है। लेकिन जो तप अहंकार के आधार पर होता हैउससे आत्मा पवित्र नहीं होती और अपवित्र हो जाती है।
इसलिए कृष्ण को कंडीशन लगानी पड़ीज्ञानरूपी तप। अकेला तप काफी नहीं हैक्योंकि अज्ञानरूपी भी हो सकता है। अकेला तप काफी नहीं हैतप अज्ञान से भी निकल सकता है। और जब तप अज्ञान से निकलता हैतो आत्मा को और भी अपवित्र कर जाता है। ज्ञान से निकलना चाहिए।
ज्ञान से निकलने का क्या अर्थ हुआज्ञान से तप कैसे निकलेगाअज्ञान से तो निकल सकता हैबहुत आसान है। हमारी पूरी जिंदगीअज्ञान के केंद्रअहंकार पर खड़ी होती है।
बाप अपने बेटे से कहता है कि देखो पड़ोस का लड़का आगे निकला जा रहा है! हमारे कुल की इज्जत खतरे में है। बेटे के अहंकार को जगाता है। बेटा और रातभर पढ़ने में लग जाता है कि किसी तरह गोल्ड मेडल ले आएक्योंकि इज्जत का सवाल है।
हम अच्छी बात लाने के लिए भी अहंकार का उपयोग करते हैं। बाप अपने बेटे से कहता है कि देखोऐसा आचरण करोगेतो हमारे कुल की बड़ी बदनामी होगी। आचरण बुरा हैऐसा नहीं कह रहा है। वह यह कह रहा है कि ऐसा आचरण करने से कुल की बड़ी बदनामी होगी। लोग क्या कहेंगे कि मेरा बेटा! और ऐसा कर रहा हैउसके बेटे के अहंकार को परसुएड किया जा रहा है।
चारों तरफ ग्रेट परसुएडर्स बैठे हुए हैंचारों तरफ फुसलाने वाले बैठे हुए हैं। वे अहंकार को फुसला रहे हैं। वे उस अहंकार को तरकीबत्तरकीब से फुसलाकर हमसे काम करवा रहे हैं।
हमारी पूरी जिंदगी अहंकार के आधार पर होने वाली तपश्चर्या है।
एक आदमी धन कमाता हैतो कोई कम तप नहीं करता। जंगल में बैठे तपस्वियों से कम नहीं होता तप उसकाएक अर्थ में ज्यादा ही होता है। करता क्या है बेचारादिनभर सुबह से सांझ तक धन इकट्ठा करने में लगा हुआ है। पागल की तरह दौड़ रहा है। जिंदगीभर दौड़ता हैतिजोरी भरकर मर जाता है। लेकिन धन अहंकार के लिए सुख है। जितना ज्यादाउतना सुख है। बसअहंकार धन को इकट्ठा करवा देता है।
एक आदमी दिल्ली की तरफ दौड़ता रहता है। अभी बहुत-से लोग दौड़ रहे हैं। दिल्ली में ऐसा कुछ रस नहीं है। अहंकार में रस है। कितना पागलपन चलता है! कितना बेचारा हाथ-पैर जोड़ता है किसी के भी कि किसी तरह मुझे दिल्ली पहुंचाओ! सब दांव पर लगा देता हैकिसी तरह दिल्ली पहुंचाओ! एक अहंकार है। दिल्ली पहुंचकर वह समबडी हो जाता हैकुछ हो जाता है। फिर और दौड़ पर दौड़ चलती जाती है। वर्तुल के भीतर वर्तुल हैं। फिर दिल्ली पहुंचकर केबिनेट में कैसे प्रवेश कर जाए! फिर सब सिद्धांतों की बात करता हैलेकिन सिर्फ सिद्धांत अहंकार हैऔर कोई सिद्धांत नहीं है। न कोई समाजवाद हैन कोई लोकतंत्र हैन कुछ है।
दुनिया में कोई सिद्धांत नहीं है आदमी के लिए। आदमी का गहरा सिद्धांत एक हैईगो। फिर उस अहंकार के लिए आभूषण--समाजवादलोकतंत्रऔर-और न मालूम क्या-क्या! वे सब आभूषण हैं उस एक सिद्धांत के।
सारी दुनिया अहंकार की तपश्चर्या में रत है। इन्हीं तपस्वियों को हम धर्म की तरफ भी लगा देते हैं। ये ही तपस्वी धर्म में लग जाते हैं। बैठ जाते हैं उपवास करके! अगर लोग न जाएंतो बड़ी मुश्किल हो जाती है।
मेरे एक मित्र हैं। बड़े राजनैतिक नेता हैं। लोगों ने उनसे अनशन करवा दिया। लेकिन कुछ हालात ऐसे हो गए गांव के कि अनशन तो उन्होंने कियालेकिन लोग ज्यादा देखने-दाखने नहीं आए। मैं उनके गांव गया थाउनको मिलने गया। पता चला अनशन करते हैंतो मैंने कहादेख आऊं। बड़ी मुश्किल में होंगे।
गया तो सच में मुश्किल में थे मुझसे दिल की बात कही। कहा कि बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूंकुछ हालात ऐसे उलझ गए हैं कि कोई देखने तक नहीं आ रहा है। और लोग आते-जाते रहतेकैमरामैन फोटो उतारता रहताअखबार में फोटो छपती रहतीतो झेल भी लेते। अब सिवाय भूख के और कुछ नजर नहीं आता चौबीस घंटे। किसी तरह उपवास तुड़वाने का इंतजाम करवा दें।
क्या रास्ता होगा?
कोई भी रास्ता निकाल लें। मेरी मांगें पूरी हों या न हों। मगर अहंकार रास्ते खोजता है। फिर भी उन्होंने कहा कि इक्कीस दिन हो गए हैं मुझे। अब एकदम से तोड़ भी नहीं सकता। इज्जत का भी सवाल है। तो प्रांत के चीफ मिनिस्टर आ जाएंमोसंबी का एक गिलास पिला दें और इतना ही कह दें कि हम आपकी मांगों पर विचार करेंगे!
मैंने कहायह हो सकता है। इसमें बहुत कठिनाई नहीं है। क्योंकि विचार करने में कोई झंझट नहीं है। विचार करेंगे! बस,उन्होंने कहाइतना ही हो जाए तो काफी है। अब और मुझे कोई झंझट नहीं करनी है। मुझे उलझा दिया है शरारतियों ने और वे खुद भी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं कि कहां हैं!
लोग आते रहतेभीड़-भड़क्का बना रहतातो उनको कष्ट न होता। भूख झेली जा सकती थी। अगर अहंकार भरता हो,तो बड़ी से बड़ी भूख झेली जा सकती है। लेकिन अगर अहंकार भी न भरता होतो फिर कठिनाई हो जाती है।
तपस्वियों को जरा आदर देना बंद कर देंफिर आप देखेंगेसौ में से निन्यानबे विदा हो गए हैं। वे नहीं हैं अब कहीं। आदर मिलेतो वे बढ़ते चले जाते हैं।
कृष्ण बहुत जानकर कहते हैं कि ज्ञानरूपी तप से शुद्ध हुई आत्मा। और ज्ञानरूपी तप से ही शुद्ध होती है।
ज्ञानरूपी तप कैसा होगाक्योंकि अज्ञानरूपी तप में तो अहंकार का शोषण हैअहंकार पर निर्भर है अज्ञानरूपी तप।ज्ञानरूपी तप किस बात पर निर्भर होगाज्ञानरूपी तप समर्पण पर निर्भर होगाअहंकार पर नहींसरेंडर पर।
इस फर्क को ठीक से समझ लें। इसलिए पहले उन्होंने कहाअनन्य रूप से जो मेरी शरणफिर कहा कि जो ज्ञानरूपीतप से शुद्ध हुए हैं।
ज्ञानरूपी तप सदा ही समर्पित है। ज्ञानरूपी तप के पीछे यह भाव नहीं है कि मैं तप कर रहा हूंज्ञानरूपी तप के पीछे यही भाव है कि परमात्मा जो करवा रहा हैवह मैं कर रहा हूं। वह अगर आग में डाल देता हैतो आग में जलने को तैयार हूं। मैं नहीं जल रहा हूं।
एक ईसून करके एक फकीर औरत हुई जापान में--समर्पित जीवन की एक प्रतिमा। भोजन भी करतीतो पहले आंख बंद करके आकाश की तरफथाली सामने रखी होतो भी आंख बंद करके आकाश की तरफ देख लेती। कभी कहती कि ले जाओ। नहींआज भोजन नहीं होगा। लोग कहतेक्या बात हैअभी तक तो तुमने कुछ भी नहीं कहा था। पहले ही कह देना था। उसने कहाजब तक भोजन सामने न आएतब तक मैं प्रभु से पूछूं भी कैसे! मैं पूछी कि क्या करूंक्या इरादे हैंभोजन करूंन करूंआज हां में उत्तर नहीं आता। भोजन ले जाओ। किसी दिन भोजन कर लेतीकहतीहां में उत्तर आता है। मरने के एक दिन पहले आंख बंद कर आकाश की तरफ...।
पर लोगों को कभी भरोसा नहीं आया कि पता नहींऊपर से कोई उत्तर आता है कि नहीं आता! यह अपने ही मन से उत्तर दे लेती है! कभी खाना होतो खा लेती होकभी न खाना होतो न खाती हो।
लेकिन उस ईसून ने साठ वर्ष की उम्र तक कभी यह नहीं कहा कि मैंने एक भी उपवास किया। क्योंकि वह अहंकार से तो उठता न था। मेरे का तो कोई सवाल न था। उसने कोई हिसाब भी न रखाजैसा कि साधु रखते हैं कि उन्होंने इस बार इतने उपवास किएउतने उपवास किए। इस चौमासे में फलाने ने इतने उपवास किए। इसका कुछ हिसाब न था। ये कोई खाते-बही नहीं हैं कि इनके हिसाब रखे जा सकें। लेकिन अहंकार खाते-बही रखता है।
साठ साल! कभी कोई उससे कहता भी कि तूने कितने उपवास किए! वह कहती कि मैंनेमैंने एक भी उपवास नहीं किया। हांकभी-कभी प्रभु ने भोजन का आनंद दिया और कभी-कभी उपवास का आनंद दिया।
फिर साठ वर्ष उसके पूरे हुए। एक दिन उसने आकाश की तरफ--थाली सामने रखी थी--आकाश की तरफ देखकर कहा,भोजन ही नहींआज तो खबर आती है कि यह मेरा आखिरी दिन है। सांझ सूरज के ढलने के साथ मैं विदा हो जाऊंगी। और ठीक सांझ सूरज के ढलने के साथ वह विदा हो गई। सांझ सूरज ढलावह आंख बंद करके बैठी थी और श्वास उड़ गई। तब लोगों को पता चला कि जो आवाज उसे आती थीवह ऐसी ही नहीं थीजैसा हम सोचते थे। क्योंकि भोजन के मामले में धोखा हो सकता हैमौत के मामले में तो धोखा नहीं हो सकता।
समर्पित तपश्चर्या ज्ञानरूपी तप है। परमात्मा के हाथों में जो जीएवह जो ले आए--दुख तो दुखसुख तो सुखअंधेरा तो अंधेराउजेला तो उजेलाभोजन तो भोजनभूख तो भूख--वह जो ले आएउसके लिए राजी होकर जो जीएउसकी जिंदगीज्ञानरूपी तप है। उसका सारा जीवन एक तप हैलेकिन ज्ञानरूपी। वह ईगोइस्टवह अहंकार की जिद नहीं है कि मैं कर रहा हूं ऐसा।
साक्रेटीज एक सांझ अपने घर के बाहर गया। रात देर तक लौटा नहींलौटा नहीं! घर के लोग परेशान। बहुत खोजा,मिला नहीं। फिर सुबह तक राह देखने के सिवाय कोई रास्ता न रहा।
सुबह सूरज निकलातब लोग खोजने गए। देखा कि बर्फ जम गई है उसके घुटनों तक। रातभर गिरती बर्फ में खड़ा रहा। एक वृक्ष से टिका हुआ खड़ा है! आंखें बंद हैं। हिलाया! लोगों ने पूछायह क्या कर रहे होउसने आंख खोलींउसने कहा कि क्या हुआनीचे देखा। जैसे दूसरे लोग चकित थेवैसा ही चकित हुआ। कहा कि अरे! बर्फ इतनी जम गई! रात गईसूरज निकल आयातो लोगों ने कहा कि तुम कर क्या रहे होहोश में हो कि बेहोशतुम रातभर करते क्या रहे?
उसने कहामैं कुछ भी न करता रहा। आज रात सांझ को जब यहां आकर खड़ा हुआतारों से आकाश भरा थादूर तक अनंत रहस्यमेरा मन समर्पित होने का हो गया। मैंने आंख बंद करके अपने को छोड़ दिया इस विराट के साथ। फिर मुझे पता नहीं क्या हुआ। करवाया होगा उसनेमैंने कुछ किया नहीं है।
यह हुआ ज्ञानरूपी तप--समर्पित तपश्चर्यासरेंडर्ड एटिटयूड। फिर जो हो जाए। फिर उसकी मर्जी।
जीसस सूली लटकाए जा रहे हैं। एक क्षण को उनके मुंह से ऐसा निकला कि हे परमात्मा! यह क्या दिखला रहा हैक्या तूने मुझे छोड़ दियाफिर एक क्षण बाद ही उन्होंने कहामाफ कर। कैसी बात मैंने कही! तेरी मर्जी पूरी हो। दाई विल बी डन। तेरी मर्जी पूरी हो। फिर हाथ पर खीलियां ठोंक दी गईंगर्दन सूली पर लटक गईलेकिन फिर जीससतेरी मर्जी पूरी होउसी भाव में हैं। जीसस की यह सूली ज्ञानरूपी तपश्चर्या हो गई। समर्पिततेरी मर्जी पूरी हो। बात समाप्त हो गई।
जब तक मेरी मर्जी से तपश्चर्या होती हैतब तक अज्ञानरूपी है। और जब उसकी मर्जी से तपश्चर्या होती हैतबज्ञानरूपी हो जाती है। वह अनन्य शरण का ही दूसरा रूप है।
और जब कोई समर्पित होकर तप से गुजरता हैतब आत्मा पवित्र हो जाती हैतब भीतर सब शुद्ध हो जाता है। क्योंकि बड़ी से बड़ी अशुद्धि अहंकार है और बाकी सब अशुद्धियां अहंकार की ही बाई-प्रोडक्ट्स हैं। वे अहंकार से ही पैदा हुई हैं।
कभी आपने खयाल कियाअहंकार न होतो क्रोध पैदा हो सकता हैअहंकार न होतो क्रोध कैसे पैदा हो सकता है! कभी आपने खयाल किया है कि अहंकार न होतो लोभ पैदा हो सकता हैअहंकार न होतो लोभ कैसे पैदा हो सकता है! कभी आपने खयाल किया कि अहंकार न होतोर् ईष्या पैदा हो सकती हैअहंकार न होतोर् ईष्या कैसे पैदा हो सकती है!
अहंकार मूल रोग हैमूल अशुद्धि है। बीमारी की जड़ है। बाकी सारी बीमारियां उसी पर आए हुए पत्ते और शाखाएं हैं। इसलिए समर्पण मूल साधना है। समर्पण का अर्थ हैअहंकार की जड़ काट दो! अज्ञानरूपी तपश्चर्या पत्ते काटती है--पत्तेशाखाएं।
लेकिन ध्यान रखेंजैसा नियम बगीचे का हैवैसा ही नियम मन के बगीचे का भी है। आप पत्ता काटेंपत्ता समझता है कि कलम हो रही है। एक पत्ते की जगह चार निकल आते हैं। आप शाखा काटेंशाखा समझती हैकलम की जा रही है! एक शाखा की जगह चार अंकुर निकल आते हैं। आप क्रोध काटें अहंकार को बिना काटेऔर आप पाएंगे कि क्रोध चार दिशाओं में निकलना शुरू हो गया। आप लोभ काटें बिना अहंकार को काटेऔर आप पाएंगेलोभ ने पच्चीस नए मार्ग खोज लिए!
अज्ञानरूपी तपश्चर्या शाखाओं से उलझती रहती है और मूल को पानी देती रहती है। अहंकार की जड़ को पानी डालती रहती है और अहंकार से पैदा हुई शाखाओं को काटती रहती है। शाखाएं फैलती चली जाती हैं। अहंकार की जड़ मजबूत होती चली है।
ज्ञानरूपी तपश्चर्या पत्तों से नहीं लड़तीशाखाओं से नहीं लड़तीमूल जड़ को काट देती है। वह अनन्य भाव से अपने को समर्पित कर देती है। वह कह देती हैपरमात्मातू ही सम्हाल। अब न क्रोध मेरान क्षमा मेरी। अब न सुख मेरान दुख मेरा। अब न जीवन मेरान मृत्यु मेरी। अब तू ही सम्हाल। अब तू ही जो करेकर। अब न मैं छोडूंगान पकडूंगा। अब न मैंभागूंगान मैं राग करूंगान विराग करूंगा। अब तू जो करवाएमैं राजी हूं।
इस राजीपन का नामइस एक्सेप्टेबिलिटी का नाम समर्पण है। इस समर्पण से सब शुद्ध हो जाता हैक्योंकि जड़ कट जाती है। जहां अहंकार नहींवहां अपवित्रता नहीं। और जहां अहंकार हैवहां अपवित्रता होगी ही। उसके रूप कुछ भी हो सकते हैं। और धार्मिक अपवित्रता अधार्मिक अपवित्रता से बदतर होती है।
साधारण अहंकार से तपस्वी अहंकार ज्यादा खतरनाक होता है। साधारण आदमियों के क्रोध से दुर्वासा के क्रोध की हम क्या तुलना कर सकते हैंदुर्वासा के क्रोध की बात ही और हैवह क्रोध है चरम। ऐसा साधारण आदमी ऐसा क्रोध नहीं कर सकता। क्योंकि साधारण आदमी ने तपश्चर्या से अहंकार को इतना पानी भी नहीं दिया है कि इतना क्रोध कर सके।
अज्ञानरूपी तपश्चर्या प्राणों को और अशुद्ध कर जाती है। ज्ञानरूपी तपश्चर्या शुद्ध कर जाती है।
शेषसंध्या हम बात करेंगे।

(अभी आप रुकेंगे। एक पांच-सात मिनट एक समर्पित कीर्तन में सम्मिलित हों।)

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