सोमवार, 26 सितंबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-02)-प्रवचन-002

भागवत चेतना का करुणावश अवतरण

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।। 3।।

वह ही यह पुरातन योग अब मैंने तेरे लिए वर्णन किया हैक्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है इसलिए। यह योग बहुत उत्तम और रहस्य अर्थात अति मर्म का विषय है।
 जीवन रोज बदल जाता हैऋतुओं की भांति। जीवन परिवर्तन का एक क्रम है,गाड़ी के चाक की भांति घूमता चला जाता है। लेकिन चाक का घूमना भी एक न घूमने वाली कील पर ठहरा होता है। घूमता है चाक गाड़ी कालेकिन किसी कील के सहारेजो सदा खड़ी रहती है। कील भी घूम जाएतो चाक का घूमना बंद हो जाए। कील नहीं घूमतीइसलिए चाक घूम पाता है।

सारा परिवर्तन किसी अपरिवर्तित के ऊपर निर्भर होता है।
जीवन के परम नियमों में से एक नियम यह है कि दृश्य अदृश्य पर निर्भर होता हैमृत्यु अमृत पर निर्भर होती है;पदार्थ परमात्मा पर निर्भर होता है। घूमने वाला परिवर्तित जगतसंसारन घूमने वाले अपरिवर्तित सत्य पर निर्भर होता है। विपरीत पर निर्भर होती हैं चीजें।
इसलिए जो दिखाई पड़ता हैउस पर ही जो रुक जाता हैवह रहस्य से वंचित रह जाता है। जो दिखाई पड़ता हैउसके भीतर जो न दिखाई पड़ने वाले को खोज लेता हैवह रहस्य को उपलब्ध हो जाता है।
कृष्ण कहते हैंवही योगवही सत्य पुरातन हैसदा से चला आता है जो। या कहें कि सदा से ठहरा हुआ है जोवही जो पहले भी ऋषियों ने कहा थावही मैं तुझसे पुनः कहता हूं। लेकिन पुनः कहता हूं वहीजो सदा से है। कुछ नया नहीं है। कुछ अपनी ओर से नहीं है।
सत्य में अपनी ओर से कुछ जोड़ा भी नहीं जा सकता। सत्य को नया करने का भी कोई उपाय नहीं है। सत्य है। सत्य के साथ सिर्फ एक ही काम किया जा सकता है और वह यह कि हम उसकी तरफ मुंह करके खड़े हो सकते हैंया पीठ करके खड़े हो सकते हैं। और हम सत्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकते हैं। एक ही काम कर सकते हैंया तो हम जानें उसेया हम न जानने की जिद करें और अज्ञान में खड़े रहें। लेकिन हम न जानेंतो भी सत्य बदलता नहीं हमारे न जानने से। और हम जान लेंतो भी सत्य बदलता नहीं हमारे जानने से।
हांबदलते हम जरूर हैं। सत्य को न जानेंतो हम एक तरह के होते हैं। सत्य को जान लेंतो हम दूसरे तरह के हो जाते हैं। सत्य वही है--जब हम नहीं जानते हैंतब भीऔर जब हम जानते हैंतब भी। ऐसा अगर सत्य न होतो फिर सत्य और असत्य में कोई अंतर न रहेगा।
यह बहुत मजे की बात है कि असत्य हमारा इनवेंशन हैहमारा आविष्कार है। सत्य हमारा इनवेंशन नहीं है। सत्य को हम निर्मित नहीं करतेबनाते नहीं। असत्य को हम निर्मित करते हैं और बनाते हैं।
जो मेरे द्वारा बनाया जा सकता हैवह असत्य होगा। और जिसके द्वारा मैं भी बनाया गयाऔर जिसमें मैं भी लीन होजाऊंगावह सत्य है। कृष्ण नहीं थेतब भी जो थाकृष्ण नहीं होंगेतब भी जो होगाऔरों ने भी जिसे कहाऔर भी आगे जिसे कहेंगे--वह सत्य है।
सत्य नित्य है। इस नित्य सत्य को अर्जुन से कृष्ण कहते हैंमैं पुनः तुझसे कहता हूं। और क्यों कहता हूंउसका कारण बताते हैं। वह कारण समझ लेने जैसा है। वह कहते हैंक्योंकि तू मेरा सखा हैमेरा मित्र हैमेरा प्रिय है।
ऊपर से देखने पर यह बात बड़ी अजीब-सी लगेगी कि क्या कृष्ण भी किसी शर्त के आधार पर सत्य को बताते हैं--मित्र हैसखा हैप्रिय है! मित्र न होसखा न होप्रिय न होतो कृष्ण फिर सत्य को नहीं बताएंगेक्या सत्य को बताने की भी कोई शर्तकोई कंडीशन हैक्या कृष्ण उसको नहीं बताएंगे जो प्रिय नहींमित्र नहींसखा नहींतब तो कृष्ण भी पक्षपात करते हुए मालूम पड़ेंगे। ऊपर से जो देखेगाऐसा ही लगेगा। लेकिन और थोड़ा गहरा देखना जरूरी है। और कृष्ण जैसे व्यक्तियों के साथ ऊपर से देखना खतरनाक है।
कृष्ण जब यह कहते हैं कि मैं तुझे सत्य की यह बात बताता हूंक्योंकि तू मेरा प्रिय हैक्योंकि तू मेरा सखा हैमेरा मित्र है। इसके पीछे कारण यह नहीं है कि कृष्ण उसे न बताएंगे जो मित्र नहींसखा नहींप्रिय नहीं। कारण यह है कि जो मित्र नहींप्रिय नहींसखा नहींवह पीठ करके खड़ा हो जाता है सत्य की ओर। प्रिय होनेसखा होनेमित्र होने का कुल प्रयोजन इतना ही है कि अर्जुन मुंह करके खड़ा हो सकता है।
सत्य को जानने कीसत्य को समझने की तैयारी मैत्री में संभव है। शत्रु के साथ हम पीठ करके खड़े हो जाते हैंद्वार बंद कर लेते हैं। शत्रु का हम स्वागत नहीं कर पाते। कृष्ण तो बताने को राजी हो जाएंगे शत्रु को भीलेकिन शत्रु अपने द्वार बंद करके खड़ा हो जाएगा। यह शर्त कृष्ण की तरफ से नहीं है।
सत्य तो सभी को उपलब्ध है। सूर्य निकला हैसभी को उपलब्ध है। लेकिन जिसे नहीं उपलब्ध करना हैवह आंख बंद करके खड़ा हो सकता है। नदी बही जाती हैसभी को उपलब्ध है। लेकिन जिसे नहीं नदी के पानी को देखना हैनहीं पानी को पीना हैवह पीठ करके खड़ा हो सकता है। नदी कुछ भी न कर सकेगी। पीठ करके खड़े होने में आपकी स्वतंत्रता है।
इसलिए सत्य को जब भी किसी के पास समझने कोई गया होतो एक मैत्री का संबंध अनिवार्य है। अन्यथा सत्य को पहचाना नहीं जा सकतासमझा नहीं जा सकतासुना भी नहीं जा सकता।
जिसके प्रति मैत्री का भाव नहींउसे हम अपने भीतर प्रवेश नहीं देते हैं। और सत्य बड़ा सूक्ष्म प्रवेश है। उसके लिए एकरिसेप्टिविटीएक ग्राहकता चाहिए।
जब आप अपरिचित आदमी के पास होते हैंतो शायद आपने खयाल किया होन किया होन किया होतो अब करें;जब आप अपरिचितअजनबी आदमी के पास होते हैंतो क्लोज्ड हो जाते हैंबंद हो जाते हैं। आपके सब द्वार-दरवाजे चेतना के बंद हो जाते हैं। आप संभलकर बैठ जाते हैंकिसी हमले का डर है। अनजान आदमी से किसी आक्रमण का भय है। न हो आक्रमणतो भी अनजान आदमी अनप्रेडिक्टिबल है। पता नहीं क्या करे! इसलिए तैयार होना जरूरी है। इसलिए अजनबी आदमी के साथ बेचैनी अनुभव होती है। मित्र हैप्रिय हैतो आप अनआर्म्ड हो जाते हैं। सब शस्त्र छोड़ देते हैं रक्षा के। फिर भय नहीं करते। फिर सजग नहीं होते। फिर रक्षा को तत्पर नहीं होते। फिर द्वार-दरवाजे खुले छोड़ देते हैं।
मित्र हैतो अतिथि हो सकता है आपके भीतर। मित्र नहीं हैतो अतिथि नहीं हो सकता। सत्य तो बहुत बड़ा अतिथि है। उसके लिए हृदय के सब द्वार खुले होने चाहिए। इसलिए एक इंटिमेट ट्रस्टएक मैत्रीपूर्ण श्रद्धा अगर बीच में न होएक भरोसा अगर बीच में न होतो सत्य की बात कही तो जा सकती हैलेकिन सुनी नहीं जा सकती। और कहने वाला पागल हैअगर उससे कहेजो सुनने में समर्थ न हो।
इसलिए कृष्ण कहते हैं कि तू मित्र हैप्रिय हैसखा हैइसलिए तुझे मैं यह पुनः उस सत्य की बात कहता हूंजो सदा हैचिरस्थाई हैसनातन हैनित्य है।
एक और भी बात ध्यान रख लेनी जरूरी है। कृष्ण यह याद क्यों दिलाते हैं अर्जुन को कि तू सखा हैप्रिय हैमित्र है?इस बात को याद दिलाने की जरूरत क्या हैअर्जुन मित्र हैसखा हैयाद दिलाने की क्या जरूरत हैयहां भी एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक सत्य खयाल में ले लेना जरूरी है।
हम इतने विस्मरण से भरे हुए लोग हैं कि अगर हमें निरंतर चीजें याद न दिलाई जाएंतो हमें याद ही नहीं रह जाती। हम प्रतिपल भूल जाते हैं। हमारी स्मृति बड़ी दीन हैऔर हमारा विवेक अत्यंत रुग्ण है। मित्र को भी हम भूल जाते हैं कि वह मित्र हैप्रिय को भी हम भूल जाते हैं कि वह प्रिय हैनिकट को भी हम भूल जाते हैं कि वह निकट है।
दूसरे को भूल जाना तो बहुत आसान है। हम अपने को ही भूल जाते हैं। हमें अपना ही कोई स्मरण नहीं रह जाता है। हम कौन हैंयही स्मरण नहीं रह जाता है। हम किस स्थिति में हैंयह भी स्मरण नहीं रह जाता है। हम करीब-करीब एक बेहोशी में जीते हैं। एक नींद जैसे हमें पकड़े रहती है। क्रोध आ जाता हैतब हमें पता चलता है कि क्रोध आ गया। आ गया,तब भी पता बहुत मुश्किल से चलता है। सौभाग्यशाली हैंजिन्हें पता चल जाता है। हो गयातब पता चलता है। लेकिन तब कुछ किया नहीं जा सकता। पक्षी हाथ के बाहर उड़ गया होता है। लोग क्रोध कर लेते हैंफिर कहते हैं कि हमें पता नहींकैसे हो गया! आपने ही कियाआपको ही पता नहींहोश में थेबेहोश थेनींद में थेलेकिन हम करीब-करीब नींद में होते हैं।
कृष्ण अर्जुन को गीता में बहुत बार याद दिलाते हैं कि तू मेरा मित्र है। बहुत बारपरोक्ष-अपरोक्षसीधे भीकभी घूम-फिर कर भी वे अर्जुन को याद दिलाए चले जाते हैं कि तू मेरा मित्र है। जब भी कृष्ण को लगता होगाअर्जुन बंद हो रहा है,खुल नहीं रहा हैतभी वे कहते हैंतू मेरा मित्र हैस्मरण कर। प्रिय है। और इसलिए ही तो तुझसे मैं सत्य की बात कह रहा हूं। यह सुनकर शायद क्षणभर को अर्जुन की स्मृति लौट आए और वह खुला हो जाएनिकट हो जाएओपेन हो जाएऔर कृष्ण जिस सत्य के संबंध में उसे जगाना चाहते हैंउस जगाने की कोई किरण उसके भीतर पहुंच जाए। इसलिए कृष्ण बहुत बार गीता में बार-बार कहते हैं उसे कि तू मेरा मित्र हैतू मेरा प्रिय हैतू मेरा सखा हैइसलिए कहता हूं।
यहजब भी हम किसी के भी प्रति एक इंटिमेसीएक आंतरिकता से भरे होते हैंतो एक क्षण में हमारी चेतना का तल बदल जाता है। हम कुछ और हो जाते हैं। जब हम किसी के प्रति बहुत मैत्री और प्रेम से भरे होते हैंतो हम बड़ी ऊंचाइयों पर होते हैं। और जब हम किसी के प्रति घृणा और शत्रुता से भरे होते हैंतो हम बड़ी नीचाइयों में होते हैं। और जब हम किसी के प्रति उपेक्षा से भरे होते हैंतो हम समतल भूमि पर होते हैं।
सत्य के दर्शन तो वहीं हो सकते हैंजब हम शिखर पर होते हैंअपनी चेतना की ऊंचाई पर। कृष्ण जो बात कह रहे हैं,अर्जुन छलांग लगाएतो ही समझ सकता है। अर्जुन अपनी जगह खड़ा रहेतो नहीं समझ सकेगा। अर्जुन उछले थोड़ाछलांग लगाएतो शायद जो सूर्य उसे दिखाई नहीं पड़ रहा अपनी जगह सेउसकी एक झलक मिल जाए। कोई हर्ज नहींझलक के बाद वह अपनी जगह पर वापस लौट आएगा। लेकिन एक झलक भी जीवन को रूपांतरित करने का आधार बन जाती है।
इसलिए कृष्ण कहते हैंअर्जुनतू मित्र मेराप्रिय मेराइसलिए तुझसे सत्य की बात कहता हूं। यह मित्रता की स्मृति अर्जुन को एक छलांग लगाने के लिए हैताकि अर्जुन किसी तरह कृष्ण के पास आ जाए।
ध्यान रहेदो ही उपाय हैं संवाद के। या तो कृष्ण अर्जुन के पास खड़े हो जाएं उसी चित्त-दशा मेंजिसमें अर्जुन हैतो संवाद हो सकता है। लेकिन तब सत्य का संवाद मुश्किल होगा। और या फिर अर्जुन कृष्ण की चित्त-दशा में पहुंच जाएतो फिर संवाद हो सकता है। तब संवाद सत्य का हो सकता है। दोनों के बीच पहाड़ और खाई का फासला है।
यह चर्चा एक पर्वत के शिखर की और एक गहन खाई से चर्चा है। पीक टाकिंग टु दि एबिस। एक पर्वत का शिखरगौरीशंकरपास में पहाड़ों के गङ्ढ में अंधेरे में दबी हुई खाई से बात करता है। कठिन है चर्चा। भाषा एक नहींनिकटता नहीं,बहुत मुश्किल है। लेकिन खाई डर न जाएअन्यथा और अंधेरे में छिप जाएगी और सिकुड़ जाएगी। तो शिखर पुकारता है कि मित्र हूं तेरानिकट हूं तेरे। खुलभय मत करसिकुड़ मतसंकोच मत कर। द्वार बंद मत कर। जो कहता हूंउसे भीतर आ जाने दे।
अर्जुन को सब तरह का भरोसा दिलाने के लिए कृष्ण बहुत-सी बात कहते हैं। पहली बात तो उन्होंने यह कही कि यह सत्य अति प्राचीन है अर्जुनअति पुरातन हैसनातनअनादिसबसे पहलेसमय नहीं हुआतब भी यह सत्य था। क्योंइसे याद न दिलातेतो चल सकता था।
लेकिन अर्जुन से अगर कृष्ण कहें कि यह सत्य मैं ही दे रहा हूंतो शायद अर्जुन ज्यादा खुल न पाएशायद बंद हो जाए। शायद इतना भरोसा न कर पाएशायद इतना ट्रस्ट पैदा न हो। तो कृष्ण शुरू करते हैं अनादि सेकिस-किस ने किस-किस से कहा। ऐसे वे अर्जुन को राजी करते हैंखुलने के लिएओपनिंग के लिएद्वार खुला रखने के लिए।
फिर याद दिलाते हैं कि मित्र हैप्रिय है। और जब अर्जुन को वे पाएंगे कि वह ठीक टयूनिंगठीक उस क्षण में आ गया हैजहां मिलन हो सकता हैवहीं वे सत्य कहेंगे। इसलिए गीता में कुछ क्षणों में टयूनिंग घटित हुई है। किसी जगह अर्जुन बिलकुल कृष्ण के करीब आ गयातब कृष्ण एक वचन बोलते हैंजो बहुमूल्य हैजिसका फिर मूल्य नहीं चुकाया जा सकता।
लेकिन वह उसी समयजब अर्जुन और कृष्ण की चेतना तादात्म्य को उपलब्ध होती हैतभी। जब बोलने वाला और सुनने वाला एक हो जाते हैंएक रस हो जाते हैंतभी--मैं आपको कहूंगायाद दिलाऊंगा कि किन क्षणों में--तब महावाक्य गीता में उत्पन्न होते हैंतब जो कृष्ण बोलते हैंवह महावाक्य है। उसके पहले नहीं बोला जा सकता। प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
सत्य को बोलना होतो प्रतीक्षा करनी पड़ती है। सत्य को सुनना होतो भी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। आज की दुनिया तो बहुत जल्दी में है। इसलिए शायदशायद इसीलिए सत्य की चर्चा बहुत मुश्किल हो गई है।
मैंने सुना हैएक फकीर के पास एक युवक सत्य की शिक्षा के लिए आया। पर उसने कहामुझे जल्दी हैमेरे पिता बूढ़े हो गए हैं। और घर मुझे जल्दी लौट जाना है। यह सत्य मैं कब तक जान लूंगाउस गुरु ने उसे देखा नीचे से ऊपर तक और कहाकम से कम तीन वर्ष तो लग ही जाएंगे। उस युवक ने कहातीन वर्ष! भरोसा नहींमेरे पिता बचें या न बचें। कुछ और जल्दी नहीं हो सकता हैमैं जितना आप कहेंगेउतना श्रम करूंगासुबह से सांझ तक। गुरु ने कहातब तो शायद दस वर्ष लग जाएंगे। उस शिष्य ने कहाआप पागल तो नहीं हो गएमैं कहता हूंमैं बहुत श्रम करूंगा। रात सोऊंगा भी नहींजब तक आप जगाएंगे जागूंगा। रात-दिन सततकभी इनकार न करूंगा। जो भी करने को कहेंगेकरूंगा। लेकिन कुछ जल्दी न हो सकेगागुरु ने कहाबहुत मुश्किल है। तीस वर्ष से कम में होना मुश्किल है।
उस युवक ने कहाआप क्या कह रहे हैं! मेरे पिता वृद्ध हैं और मैं जल्दी में हूं। इसके पहले कि वे जगत से विदा हों,मुझे घर लौट जाना है। उस गुरु ने कहाफिर तू लौट ही जा अभी। क्योंकि पिता वृद्ध हैंउनके लिए तो मैं कुछ नहीं कह सकता। लेकिन तू जब तक वृद्ध न हो जाएतब तक यह सत्य नहीं मिलेगा। इसमें साठ-सत्तर वर्ष लग जाएंगे। उस युवक ने कहापुरानी बात पर वापस लौट आएं। वह तीन वर्ष वाली योजना ठीक है। गुरु ने कहाअब लौटना बहुत मुश्किल हैक्योंकि जो इतनी जल्दी में हैउसे बहुत देर लग जाएगी।
वह शिष्य पूछने लगाइतनी देर क्यों लग जाएगी जो जल्दी में हैतो गुरु ने कहाजो जल्दी में हैउसके साथ टयूनिंगबिठानी बहुत मुश्किल हैउसके साथ तालमेलउसके साथ एक आंतरिक संबंध बिठाना बहुत मुश्किल है। और संबंध न बैठेतो मैं कह ही न सकूंगा। क्योंकि जो मुझे कहना हैवह तो एक क्षण में भी हो सकता है। लेकिन वह क्षण कब आएगासवाल यह है। वह क्षण--तीन वर्ष भी लग सकते हैंतीस वर्ष भी लग सकते हैं। और अगर तू विश्राम चित्त सेसहजता सेचुपचाप प्रतीक्षा से मेरे पास हैतो शायद वह क्षण जल्दी आ जाए। और तू जल्दी में हैतो तू इतने तनाव और इतनी बेचैनी में है कि वह क्षण कभी भी न आए। क्योंकि बेचैन चित्त के साथ संबंध जोड़ना बहुत कठिन है।
निश्चित हीकृष्ण को तो अर्जुन के साथ संबंध जोड़ना जितना कठिन हुआ होगाइतना कठिन बुद्ध को अपने किसी शिष्य के साथ कभी नहीं हुआमहावीर को अपने किसी शिष्य के साथ कभी नहीं हुआजीसस कोमोहम्मद कोकंफ्यूशियस कोलाओत्से को--किसी को अपने शिष्य के साथ इतना कठिन कभी न हुआ होगा। क्योंकि युद्ध के मैदान पर सत्य को सिखाने का मौका कृष्ण के अलावा और किसी को आया नहीं।
कितनी जल्दी न रही होगी! भेरियां बज गईं युद्ध कीशंख-ध्वनियां हो गई हैंघोड़े बेताब हैं दौड़ पड़ने कोअस्त्र-शस्त्र सम्हल गए हैंयोद्धा तैयार हैं जीवनभर की उनकी साधना आज कसौटी पर कसने कोदुश्मन आमने-सामने खड़े हैं। और अर्जुन ने सवाल उठाए। ऐसी क्राइसिसऐसे संकट के क्षण में सत्य की शिक्षा बड़ी ही कठिन पड़ी होगीबड़ी मुश्किल गई होगी।
इसलिए कृष्ण बहुत बार जो बातें कह रहे हैं अर्जुन सेवह सिर्फ निकट लाने के लिए हैउसे आश्वस्त करने के लिए है। वह भूल जाएयुद्ध है चारों तरफवह भूल जाएजल्दी हैवह भूल जाएसंकट हैऔर वह सत्य के इस संवाद को सुनने को अंतस से तैयार हो जाए। इस आंतरिक तैयारी के लिए वे बहुत-सी बातें कहेंगे। और जब अर्जुन तैयार होता हैतब वे एक महावाक्य कहते हैं। थोड़े-से महावाक्य गीता में हैंजिनका सारा फैलाव है।

अर्जुन उवाच:

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।। 4।।

अर्जुन ने पूछाहे भगवान! आपका जन्म तो आधुनिक अर्थात अब हुआ है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है। इसलिए इस योग को कल्प के आदि में आपने कहा थायह मैं कैसे जानूं?


कृष्ण ने कहा है कि मैंने ही समय के पहलेसृष्टि के पूर्व मेंआदि में सूर्य को कही थी यही बात। फिर सूर्य ने मनु को कहीमनु ने इक्ष्वाकु को कही और ऐसे अनंत-अनंत लोगों ने अनंत-अनंत लोगों से कही। स्वभावतःअर्जुन के मन में सवाल उठेआश्चर्य नहीं है। वह पूछता हैआपका जन्म तो अभी हुआसूर्य का जन्म तो बहुत पहले हुआ। आपने कैसे कही होगी सूर्य से यह बात?
कृष्ण खींचने की कोशिश करते हैं अर्जुन कोकि छलांग ले। अर्जुन सिकुड़कर अपनी खाई में समा जाता है। वह जो सवाल उठाता हैवे सब सिकुड़ने वाले हैं। वह कहता हैमैं कैसे भरोसा करूं?
अब यह बड़े मजे की बात है। यह ध्यान रहे कि जो आदमी पूछता हैमैं कैसे भरोसा करूंउसे भरोसा करना बहुत मुश्किल है। या तो भरोसा होता है या नहीं होता है। कैसे भरोसा बहुत मुश्किल है।
जो आदमी कहता हैकैसे भरोसा करूंदूसरी बात के उत्तर में भी वह कहेगाकैसे भरोसा करूंयह कैसे भरोसे का सवालइनफिनिट रिग्रेस है। इसका कोई अंत नहीं है।
भरोसा किया जा सकतानहीं किया जा सकता। लेकिन अगर किसी ने पूछाकैसे भरोसा करूंहाउ टु बिलीवकैसे करूं विश्वासफिर कठिन है। कठिन इसलिए है कि कैसे का सवाल ही अविश्वास में और गैर-भरोसे में ले जाता है।
अर्जुन संदिग्ध हो गया। यह कैसे हो सकता हैएब्सर्डबिलकुल व्यर्थ की बात हैअसंगत। संगति भी नहींतर्क भी नहीं। कहते हैंसूर्य को कही थी मैंने यही बात।
देखेंकैसा मजा है! कृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन को भरोसा आ जाएइसलिए वे कहते हैंसूर्य को भी मैंने कहा थातुझसे भी वही कहता हूं। कृष्ण चाहते हैं जिससे भरोसा आ जाएअर्जुन के लिए वही गैर-भरोसे का कारण हो जाता है।
पूछता हैसूर्य सेआपनेआप अभी पैदा हुएसूर्य कब का पैदा हुआ! जो बात कृष्ण ने कही हैअर्जुन उसके संबंध में सवाल नहीं उठा रहा। वह सत्य क्या हैजो सूर्य से कहा था आपनेवह यह नहीं पूछता। कंटेंट के बाबत उसका सवाल नहीं है। उसका सवाल उस व्यवस्था और कंटेनर के बाबत हैजो कृष्ण ने मौजूद किया। वह कहता है कि कैसे मानूं?
यह ध्यान देने की बात है कि आज तक जगत में सत्य को जानने वाले लोगों ने न जानने वाले लोगों के मन में भरोसे के लिए जितने उपाय किए हैंन जानने वाले भी कमजोर नहीं हैंउन्होंने उन सब उपायों को भरोसा न करने का उपाय बना लिया।
जानने वालों ने जितने भी उपाय किए हैं कि न जानने वालों और उनके बीच में भरोसे का एक सेतुए ब्रिज आफ ट्रस्ट पैदा हो जाए कि जिसके आधार पर सत्य कहा जा सकेलेकिन न जानने वाले भी अपने न जानने की जिद्द में उस सेतु को टिकने ही नहीं देते। उस सेतु से जो आएगाउसकी तो बात ही नहीं है। पहले तो वे उस सेतु पर ही संदेह खड़ा करते हैं कि यह सेतु हो कैसे सकता है?
कृष्ण तो कहते हैंमैं सखामित्रप्रिय! अर्जुन जो सवाल उठाता हैवह बहुत प्रेमपूर्ण नहीं है। क्योंकि प्रेम भरोसा है। प्रेम भरोसा हैनिष्प्रश्न भरोसा। जहां सवाल है भरोसे परकि क्योंवहां प्रेम नहीं है। वहां प्रेम का अभाव है।
कभी आपने खयाल किया है कि जब भी जीवन में प्रेम की घड़ी होती हैतब आप क्योंकैसेक्या--सब भूल जाते हैं। प्रेम एकदम भरोसा ले आता है। और अगर प्रेम भरोसा न ला पाएतो फिर प्रेम कुछ भी नहीं ला सकता। और अगर प्रेम भरोसा न ला पाएतो प्रेम है ही नहीं।
अर्जुन पूछता हैमानने योग्य नहीं लगती यह बात! यह भी समझ लेने जैसा जरूरी है कि कृष्ण ने क्या कहा था!
सुबह मैंने आपको कहा थाकृष्ण जब कह रहे हैं कि यही मैंने कहा थातो यह तो कृष्ण भी जानते हैं कि यह शरीर तो अभी पैदा हुआ। यह अर्जुन ही पूछेतब कृष्ण जानेंगेऐसा नहीं है। यह कृष्ण भी जानते हैं कि यह शरीर तो अभी पैदा हुआ है। और अगर इतना भी कृष्ण नहीं जानतेतो बाकी और कुछ पूछना उनसे व्यर्थ है।
एक बार ऐसा हुआ। रामकृष्ण का चित्र किसी ने उतारा। फिर फोटोग्राफर चित्र को लेकर आयातो रामकृष्ण उस चित्र के पैर पड़ने लगे। पास-पड़ोस बैठे शिष्यों ने कहाक्या करते हैं परमहंस देवलोग पागल कहेंगे! अपने ही चित्र केऔर पैर पड़ते हैंरामकृष्ण खूब हंसने लगे। उन्होंने कहातुम क्या सोचते हो कि मुझे इतना भी पता नहीं कि यह मेरा ही चित्र हैऔर अगर इतना भी मुझे पता नहीं हैतो लोग पागल कहेंगेतो ठीक ही कहेंगे। अगर इतना भी मुझे पता नहींतो लोग जो कहेंगे,ठीक ही कहेंगे।
बहुत बार जिन्होंने जाना हैउन्होंने न जानने वालों को तो सलाह दी ही हैजो नहीं जानते हैंवे भी जानने वालों को सलाह देने पहुंच जाते हैं। इस बात को भी भूलकर कि जब जानने वालों को भी आपकी सलाह की जरूरत पड़ती हैतो फिर अब उसकी सलाह की आपको कोई जरूरत नहीं रह गई।
रामकृष्ण ने कहा कि यह तो मुझे भी पता है कि तस्वीर मेरी है। और यह कहकर फिर भी पैर पड़े और खड़े होकर तस्वीर को लेकर नाचने लगे। एक शिष्य ने कहाआप क्या कर रहे हैंरामकृष्ण ने कहाकुछ समझने की कोशिश करो। यह चित्र मेरा ही हैइतना ही नहींयह चित्र साथ किसी और चीज का भी है। उन्होंने कहावह हमें दिखाई नहीं पड़तीआपका ही चित्र है। रामकृष्ण ने कहायह मेरे शरीर की आकृति हैसो तो ठीकलेकिन जब यह चित्र लिया गयातब मैं गहरी समाधि में था। यह समाधि का भी चित्र हैमेरा ही नहीं। मैं तो सिर्फ रूप हूं। और मेरी जगह और भी रूप हो सकता था। लेकिन भीतर जो घटना घट रही थीउसका भी चित्र है। मैं उसी को नमस्कार कर रहा हूं।
लेकिन वह भीतर की घटना तो हमारी बाहर की आंखों को दिखाई नहीं पड़ती। अर्जुन को भी न दिखाई पड़ीतो आश्चर्य नहीं है।
अर्जुन ठीक हमारे जैसा सोचने वाला आदमी हैठीक तर्क सेगणित सेहिसाब से। वह कहता हैआपस्वभावतःजो सामने तस्वीर दिखाई पड़ रही है कृष्ण कीवह सोचता हैयही आदमी कहता हैतो इसकी तो जन्मत्तारीख पता है। सूर्य की तोजन्मत्तारीख कुछ पता नहीं है। और यह आदमी जिस दिन पैदा हुआउस दिन भी सूरज निकला था। उसके पहले भी निकलता रहा है।
उसका सवाल ठीक मालूम पड़ता है। हमें भी ठीक मालूम पड़ेगा। लेकिन वह इस भीतर के आदमी को देखने में असमर्थ हैहम भी असमर्थ हैं।
कृष्ण जिसकी बात कर रहे हैंवह इस शरीर की बात नहीं है। वह उस आत्मा की बात हैजो न मालूम कितने शरीर ले चुकी और छोड़ चुकीवस्त्रों की भांति। न मालूम कितने शरीर जरा-जीर्ण हुएपुराने पड़े और छूटे! वह उस आत्मा की बात है,जो मूलतः परमात्मा से एक है। वह सूर्य के पहले भी थी। सूर्य बुझ जाएगाउसके बाद भी होगी।
जहां तक शरीरों का संबंध हैयह सूर्य हमारे जैसे न मालूम कितने करोड़ों शरीरों को बुझा देगा और नहीं बुझेगा। लेकिन जहां तक भीतर के तत्व का संबंध हैऐसे सूरज जैसे करोड़ों सूरज बुझ जाएंगे और वह भीतर का तत्व नहीं बुझेगा
लेकिन उसका अर्जुन को कोई खयाल नहीं हैइसलिए वह सवाल उठाता है। उसका सवालअर्जुन की तरफ से संगत,कृष्ण की तरफ से बिलकुल असंगत। अर्जुन की तरफ से बिलकुल तर्कयुक्तकृष्ण की तरफ से बिलकुल अंधा। अर्जुन की तरफ से बड़ा सार्थककृष्ण की तरफ से अत्यंत मूढ़तापूर्ण। लेकिन अर्जुन क्या कर सकता है! कृष्ण की तरफ से होगा मूढ़तापूर्ण,उसकी तरफ से तो बहुत तर्कपूर्ण है। यद्यपि अंततः सभी तर्क अत्यंत मूर्खतापूर्ण सिद्ध होते हैंलेकिन जब तक वे ऊंचाइयांनहीं मिलींतब तक अर्जुन की भी मजबूरी है। और उसका सवाल उसकी तरफ से बिलकुल संगत है।

श्री भगवानुवाच:
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।। 5।।

भगवान बोले: हे अर्जुनमेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैंपरंतु हे परंतप! उन सबको तू नहीं जानता है और मैं जानता हूं।
कृष्ण ने अर्जुन से कहामेरे और तेरेहे परंतप! बहुत-बहुत अनेक जन्म हो चुके हैंलेकिन उन्हें तू नहीं जानता और मैं जानता हूं।
इस संबंध में दोत्तीन बातें स्मरणीय हैं।
एक तोजो हम नहीं जानतेवह नहीं हैऐसा मानने की जल्दी नहीं कर लेनी चाहिए। अर्जुन जो नहीं जानता हैवह नहीं हैऐसी निष्पत्ति निकाल लेनी बहुत चाइल्डिशजुवेनाइल हैबचकानी है। बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते हैंफिर भी है। हमारे न जानने से नहीं नहीं हो जाता। लेकिन अर्जुन की जो भूल हैवह नेचरल फैलेसी हैबड़ी प्राकृतिक भूल है। हम भी यही भूल करते हैं। मनुष्य की सहज भूलों में एक भूल हैजो नहीं जानतेहम मानते हैंवह नहीं है। न मालूम किस भ्रांति के कारण हम ऐसा सोचते हैं कि हमारा जानना ही सब कुछ है।
अगर हमारा जानना ही सब कुछ है--अगर मैं आपसे पूछूं कि उन्नीस सौ इकसठएक जनवरी थी या नहींआप कहेंगे,थीमैं था। लेकिन अगर मैं पूछूं कि एक जनवरीउन्नीस सौ इकसठ की कोई याददाश्त बताइएअगर थी! तो क्या किया था सुबह उठकरदोपहर क्या किया थासांझ क्या बोले थेरात नींद आई थीनहीं आई थीस्वप्न कौन-सा आया थाआप कहेंगेकुछ भी याद नहीं है। अगर एक जनवरीउन्नीस सौ इकसठ की कोई भी याद नहीं हैतो एक जनवरीउन्नीस सौ इकसठ थीइसके कहने का हक क्या हैआप कहेंगेथी तो जरूरमैं थालेकिन याद! याद बिलकुल नहीं है।
याद दिलाई जा सकती है। क्योंकि एक गहरा नियम है मन का कि जो भी जाना जाता हैवह कभी भूलता नहीं। विस्मृति असंभव है। जिस बात को हम कहते हैं विस्मृति हो गईउसका भी इतना ही मतलब है कि हम उसे पकड़ नहीं पा रहे हैं। हम नहीं पकड़ पा रहे हैंकहां रख गई वह यादकिस कोने-कातर में मन के समा गई!
छोटा मन हैकरोड़ों स्मृतियां हैं। मन को छांटना पड़ता है स्मृतियों को। छांट-छांटकर काम की बचा लेता हैबाकी कोकचरेघर में डाल देता है। लेकिन कचराघर भी भीतर ही है। जैसे अपने घर में कोई नीचेतहखाने में चीजों को डालता चला जाता हैजो बेकार हैं। लेकिन बिलकुल बेकार नहीं हैकभी काम में आ सकती हैंइसलिए इकट्ठी भी करता चला जाता है।
हम भी अपने मन में सब इकट्ठा करते चले जाते हैं। इसलिए जो आपको एक जनवरी उन्नीस सौ इकसठ याद न आती होवह आपको सम्मोहित करकेबेहोश किया जाएतो याद आ जाती है। आप एक जनवरी उन्नीस सौ इकसठ का ऐसे ही वर्णन कर देंगेजैसे एक जनवरी उन्नीस सौ इकहत्तर का भी करना मुश्किल पड़ेगा। बिलकुल कर देंगे। बेहोशी कीसम्मोहन की अवस्था में सब याद आ जाएगासब उठ आएगा।
अभी मनोवैज्ञानिक सम्मोहन के द्वारा जन्म के पहले दिन तक की स्मृति तक ले जाने में समर्थ हो गए हैं। पहले दिन जब आपका जन्म हुआ थाकुछ भी तो याद न होगी उसकी। लोग कहते हैंइसलिए मान लेते हैं कि हुआ था। अगर कोई दिक्कत आ जाए और सारे प्रमाण पूछे जाएंतो सिवाय उधार प्रमाणों के कोई प्रमाण न मिलेगा आपके पास। कोई कहता है,इसलिए आप कहते हैं कि मैं पैदा हुआ था। लेकिन आपको कोई याद हैआप विटनेस हैंउस घटना के गवाह हैंआप कहेंगे,मैं तो गवाह नहीं हूं। तब बड़ी मुश्किल है। आपके जन्म की गवाही आप न दे सकेंतो दूसरों की गवाही का भरोसा क्या है?जन्म है आपकागवाही है दूसरे की!
लेकिन पहले दिन जन्म की स्मृति भी भीतर है। और जिन्होंने और गहरे प्रयोग किए हैंजैसे तिब्बत में लामाओं ने और गहरे प्रयोग किए हैंतो मां के पेट में भी नौ महीने आप रहे। जन्म का ठीक दिन वह नहीं हैजिसको हम जन्म-दिन कहते हैं। उसके ठीक नौ महीने पहले असली जन्म हो चुका। जिसे हम जन्म-दिन कहते हैंवह तो मां के शरीर से मुक्त होने का दिन है,जन्म का दिन नहीं। नौ महीने तक सेटेलाइट था आपका शरीरमां के शरीर के साथ घूमता थाउपग्रह था। अभी इतना समर्थ न था कि स्वयं ग्रह हो सके। इसलिए घूमता थासेटेलाइट था। अब इस योग्य हो गया कि मां से मुक्त हो जाएअब अलग जीवन शुरू करे। लेकिन जन्म तो उसी दिन हो गयाजिस दिन गर्भ धारण हुआ है।
तो लामाओं ने इस पर और गहरे प्रयोग किए हैं और नौ महीने की स्मृतियां भी उठाने में सफल हुए हैं। जब मां क्रोध में होती हैतब भी बच्चे की पेट में स्मृति बनती है। जब मां दुखी होती हैतब भी बच्चे की स्मृति बनती है। जब मां बीमार होती हैतब भी बच्चे की स्मृति बनती है। क्योंकि बच्चे की देह मां की देह के साथ संयुक्त होती है। और मां के मन और देह पर जो भी पड़ता हैवह संस्कारित हो जाता है बच्चे में।
इसलिए अक्सर तो माताएं जब बाद में बच्चों के लिए रोती हैं और पीड़ित और परेशान होती हैंउनको शायद पता नहीं कि उसमें कोई पचास प्रतिशत हिस्सा तो उन्हीं का हैजो उन्होंने जन्म के पहले ही बच्चे को संस्कारित कर दिया है। अगर बच्चा क्रोध कर रहा हैऔर गालियां बक रहा हैऔर दुखी हो रहा हैऔर दुष्टता बरत रहा हैतो मां सोचती है कि यह कहां सेकैसे ये सब कहां सीख गया! दिखता हैकहीं दुष्ट-संग में पड़ गया है।
दुष्ट-संग में बहुत बाद में पड़ा होगादुष्ट-संग में बहुत पहले नौ महीने तक पड़ चुका है। और नौ महीने बहुत संस्कार संस्कारित हो गए हैं। उनकी भी स्मृतियां हैं। लेकिन और भी गहरे लोग गए हैं। पिछले जन्मों की स्मृतियों में भी गए हैं।
कृष्ण कहते हैं कि अर्जुनजो तुझे पता नहीं हैवह मुझे पता है। वे इतनी सरलता से कहते हैं कि जो तुझे पता नहीं है,वह मुझे पता है। वे इतनी सहजता से कहते हैं कि उनका वचन बड़ा प्रामाणिक और आथेंटिक मालूम पड़ता है।
ध्यान रहेझिझक कृष्ण में जरा भी नहीं है। जरा-सी भी झिझक बताती है कि आदमी को खुद पता नहीं है। किसी और से पता होगासेकेंड हैंड पता होगा।
कृष्ण कहते हैंअर्जुनजो तुझे पता नहीं हैवह मुझे पता है। हमारे और भी जन्म हुए हैं। मैं इसी जन्म की बात नहीं कर रहा हूं। लेकिन वे इतनी सरलता से कहते हैंजरा भी झिझक नहीं।
और एक बात और ध्यान देने योग्य है। दार्शनिकों और ऋषियों के वचनों में एक फर्क दिखाई पड़ेगा। दार्शनिक जब भी बोलेंगेतो हाइपोथेटिकल बोलेंगे। वे बोलेंगेइफयदि ऐसा होतो ऐसा होगा। ऋषि जब बोलेंगेतो उनका बोलना स्टेटमेंट का होगावक्तव्य का होगा। वे कहेंगेऐसा है।
इसलिए जब पहली बार उपनिषद का अनुवाद हुआ पश्चिम मेंतो पश्चिम के विचारक बहुत मुश्किल में पड़े कि उपनिषद के लोग कैसे हैं! ये सीधा कह देते हैं कि ब्रह्म है। पहले बताना चाहिएक्योंक्या कारण हैक्या दलील हैक्या प्रमाण हैफिर निष्कर्ष देना चाहिए कि ब्रह्म है। ये तो सीधा कह देते हैंकैटेगोरिकलहाइपोथेटिकल नहीं। सीधा वक्तव्य दे देते हैं कि ब्रह्म है। इसके आगे-पीछे कुछ भी नहीं। ये वक्तव्य ऐसे दे देते हैंजैसे कोई कहेसूरज है।
पश्चिम के जिन लोगों को यह चकित होने का कारण बनाउसका आधार है। पश्चिम में ऋषियों की वाणी बहुत कम पैदा हुई। पश्चिम में दार्शनिक बोलते रहेफिलासफर्स बोलते रहे। वे जो भी कहते हैंउसको दलीलआर्ग्युमेंट से कहते हैं। लेकिन ध्यान रहेदलील और तर्क इस बात की खबर देते हैं कि यह एक निष्कर्ष हैअनुभव नहीं। और सत्य एक अनुभव हैनिष्कर्ष नहीं। ट्रुथ इज़ नाट ए कनक्लूजनबट एन एक्सपीरिएंस। निष्कर्ष नहीं है सत्य। वह दो और दो चार होते हैंऐसा जोड़ा गया हिसाब नहीं हैजाना गया अनुभव है।
इसलिए कृष्ण जब कहते हैं कि अर्जुनतुझे पता नहीं और मुझे पता है। और जब मैं कहता हूं कि सूर्य को मैंने कहा था,तो मैं किसी और जन्म की बात कर रहा हूं। यह इस जन्म की बात नहीं है।
एक और ध्यान देने की बात हैकि ज्ञान कृष्ण के समय या बुद्ध के समय या महावीर के समय में इतना झिझकता हुआ नहीं थाजितना आज है। बहुत बोल्ड थाबहुत साहसी था। जो कहना हैकहता था। आज ज्ञान बहुत झिझकता हुआ है। जो भी कहना हैवह सीधा कहना मुश्किल है। क्या कारण होगाकारण एक ही है। आज जिसे हम ज्ञान कहते हैंसौ में निन्यानबे मौके पर उधार होता हैइसलिए झिझकता है।
एक साध्वी ने योग पर एक किताब लिखीमुझे भेजी। देखाकिताब मुझे बहुत पसंद पड़ीबहुत अच्छी लिखी। लेकिन दो-चार जगह मुझे ऐसा लगा कि उस साध्वी को योग का या ध्यान का कोई भी अनुभव नहीं है। क्योंकि जो फिजूल बातें थीं,वह तो उसने बड़े बलपूर्वक कहींऔर जो सार्थक बातें थींउनमें बड़ी झिझक थी।
फिर दो-चार वर्ष के बाद वह साध्वी मुझे मिली। मैंने कुछ बात न की उस किताब की। थोड़ी देर के बाद उसने कहामुझे अकेले में कुछ बात करनी है। मैंने कहापूछें। उसने कहामुझे ध्यान के संबंध में कुछ बताएं कि कैसे करूंमैंने कहाचार वर्ष हुए तुम्हारी किताब देखी थीतब भी मुझे लगा था कि ध्यान का तुम्हें कुछ पता नहीं होना चाहिए। क्योंकि जो-जो गहरी बात थीउसमें झिझक थी। और जो-जो बेकार बात थीबहुत बोल्डबहुत साहस से कही गई थी! उसने कहामुझे तो कुछ भी पता नहीं। फिरमैंने कहावह किताब क्यों लिखीउसने कहावह तो मैंने दस-पचास किताबें पढ़कर लिखी--लोगों के लाभ के लिए। मैंने कहाजिस किताब को लिखने से भी तुम्हें लाभ नहीं हुआउस किताब को पढ़ने से लोगों को लाभ होगातुम लिखने के चार साल बाद भी अभी ध्यान कैसे करेंयह पूछती होऔर तुमने उसमें ध्यान के चार प्रकार होते हैं और क्या-क्या होता है,सब गिनाया हुआ है! उसने कहावह सब शास्त्रों में लिखा है।
पर ध्यान को शास्त्रों से जो जानेगाउसने सूरज नहीं देखासूरज की तस्वीर देखी। तस्वीर को हाथ में रखा जा सकता हैसूरज को हाथ में नहीं रखा सकता। तस्वीर जला नहीं सकतीसूरज के पास जाना बड़ा कठिन है। जिसने शास्त्र से ध्यान सीखाउसने कागज की नाव में यात्रा करने का विचार किया है। खतरनाक है वह यात्रा।
उधार है ज्ञानइसलिए झिझकता हुआ है। ज्ञान ने साहस खो दिया। बल्कि और मजे की बात हैअज्ञान बहुत साहसी है आज। अज्ञान इतना साहसी कभी भी न था।
ध्यान रहेअगर चार्वाक को कहना पड़ता था कि ईश्वर नहीं हैतो हजार दलीलें देनी पड़ती थींतब चार्वाक कहता था,ईश्वर नहीं है। ईश्वर नहीं हैएक कनक्लूजन थाएक निष्पत्ति थी। हजार दलील देता था और फिर कहता थादेखोयह दलील,यह दलीलयह दलीलतब मैं कहता हूं कि ईश्वर नहीं है। हजार दलील देता थातब कहता था कि देखोमैं कहता हूंआत्मा नहीं है। ज्ञान बहुत शक्तिशाली थावह कहता थाब्रह्म है--बिना दलील के। और अज्ञान बहुत कमजोर थावह हजार दलील जुटाता थातब कहता था कि शक होता है आत्मा पर।
आज हालत बिलकुल उलटी है। आज जिसको कहना हैआत्मा नहीं हैबिना दलील के कहता हैआत्मा नहीं हैईश्वर नहीं हैकोई दलील देने की जरूरत नहीं है। और जिसको कहना हैईश्वर हैवह हजार दलीलें इकट्ठी करता है कि यह कारण,यह कारणइसलिए। जैसे कि कुम्हार घड़े को बनाता हैऐसे भगवान जगत को बनाता है। कुम्हारभगवान को सिद्ध करने के लिए दलील है। बेचारा कुम्हारउसका कोई हाथ नहीं! इतनी कमजोर दलीलों पर कहीं ज्ञान खड़ा हुआ है?
ज्ञान अनुभव है।
जब कृष्ण कहते हैंबिना दलीलकृष्ण आर्ग्युमेंट नहीं दे रहे हैं। कोई आर्ग्युमेंट ही नहीं देते। वे कहते हैंअर्जुन तुझे पता नहीं और मुझे पता हैइसलिए मैं कहता हूं। वे दलील नहीं जुटाते।
यह वक्तव्य सीधा और साफ है। और सीधा और साफ जब भी वक्तव्य होता हैतो वह प्राणों के अंतस्तल को छेद पाता है। दलीलें जहां नहीं पहुंचती हैंवहां सीधे वक्तव्य पहुंच जाते हैं। प्रमाण जहां नहीं पहुंचतेवहां आंखों की गवाही पहुंच जाती है।
अर्जुन दलील मांग रहा है। कृष्ण दलील नहीं दे रहे। अर्जुन दलील ही मांग रहा हैकि कोई सर्टिफिकेट दिखाओ कि तुम थे। तुम सूरज के पहले थेकहीं किसी कारपोरेशन के दफ्तर में कहीं कोई जन्मत्तारीखकहीं कुछ लिखा-पढ़ी हैनहींवे इतना ही कहते हैं कि अर्जुनतू जानता नहीं और मैं जानता हूं।
इतना साहस था जब सत्य मेंतब अगर सत्य परिणाम लाता थातो कुछ आश्चर्य नहीं है। और आज अगर अज्ञान साहसी हैतो अज्ञान दुष्परिणाम लाता हैतो भी कुछ आश्चर्य नहीं है।
आज नास्तिक सारे जगत में जिस भाषा में बोलता हैवह उसी ताकत की भाषा हैजिस ताकत में कभी कृष्णमहावीर और बुद्ध बोले। आज उस ताकत की भाषा में माक्र्सस्टैलिन और माओत्से तुंग बोलते हैं। उसी ताकत की भाषा में। आज अगर पुरी के शंकराचार्य को बोलना हैतो ताकत नहीं हैतो फिर शास्त्रवेदपुराणउन सबसे इकट्ठा करके बोलना है।
पुरी के शंकराचार्य कहते हैं कि कोई अगर सिद्ध कर दे कि शास्त्रों में लिखा है कि गौवध होता था यज्ञों मेंकोई अगर सिद्ध कर दे कि शास्त्रों में लिखा हैतो मैं गौवध का विरोध छोड़ दूंगा। बड़ी कमजोर दुनिया है। कोई अगर सिद्ध कर दे कि शास्त्रों में लिखा है कि गौवध होता थातो पुरी के शंकराचार्यगौवध बंद होऐसा आंदोलन छोड़ने को तैयार हैं! दलील और प्रमाण कोई दे दे।
लेकिन इतना साहस नहीं सत्य में कि वह सीधा कहे कि सब शास्त्रों में लिखा हो कि गौवध होता थातो भी गौवध नहीं हो सकता हैक्योंकि ऐसा हमारी आत्मा कहती है कि यह गलत है--ऐसा। ऐसा नहीं कह सकता कोई हिम्मतवर आजतब फिर अर्थ नहीं है। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि तुम नहीं जानते और मैं जानता हूं। लेकिन ऐसा कोई कहना चाहेतो नहीं कह सकता। कहना चाहेतो बहुत मुश्किल में पड़ेगा।
ठीक ऐसी मुश्किल में पड़ेगामैंने सुना हैएक साधक एक गुरु के पास बहुत दिन तक था। गुरु उससे कहता कि इस तरह ध्यान करो कि तुम बचो ही नबिलकुल मर जाओतभी परमात्मा मिलेगा। उसने कई तरह की कोशिशें कींलेकिन मर कैसे जाएरोज गुरु के पास आता और गुरु कहता कि तुम अभी भी हो! फिर ध्यान क्या खाक होगामिटोगे नहींमरोगे नहीं,ध्यान नहीं होगा। वह बेचारा रोज लौट जाता। फिर दूसरे दिन सुबह आता कि फिर अपनी खबर कर दे कि अभी तक ध्यान हुआ नहीं। गुरु उसे देखते से ही कहताअरे! तुम अभी भी जिंदा हो?
एक दिन उसने सोचायह कब तक चलेगा! सुबह वह पहुंचागुरु के दरवाजे पर खड़ा ही हुआ थागुरु ने कहाअरे! उसने कहामत कहो। और एकदम गिरा और मर गया। वहीं गिरा और मर गया। आंखें बंद कर लींसांस रोककर पड़ रहा। गुरु पास आयाउसने कहा कि बिलकुल ठीक। अच्छामैंने तुम्हें कल एक सवाल दिया थाउसका जवाब तो दो। उस आदमी ने एक आंख खोली और कहाउसका जवाब तो अभी तक नहीं मिला। उसके गुरु ने कहामूरखमरे हुए लोग जवाब नहीं देते। उठ,और अपने घर जा! मर गया थातो मर जाना था। जवाब देने की इतनी क्या जल्दी थीलेकिन मरने का कोई नाटक नहीं हो सकता है।
अब यह जो गुरु कह रहा है कि मर जावह समझ ही नहीं पा रहा हैकिस मृत्यु की बात हो रही है। जब गुरु कह रहा हैअरेफिर तू आ गयातब भी वह नहीं समझ पा रहा है कि किसके आने की बात हो रही है। जिस अहंकार के मरने के लिए वह गुरु बात कर रहा हैवह उसके खयाल में नहीं आता। ज्यादा से ज्यादा उसे खयाल में आया कि इस शरीर को गिरा दो,आंख बंद करके पड़े रह जाओ। और क्या हो सकता है?
शरीर केंद्रित दृष्टि शरीर के बाहर की बातों को सुन नहीं पाती। अर्जुन भी शरीर केंद्रित है। उसकी सारी चिंतनाउसका सारा संताप शरीर केंद्रितबाडी ओरिएंटेड है। वह कहता हैये मेरे प्रियजन मर जाएंगे। कृष्ण कहते हैंये कोई नहीं मरने वाले हैं। ये पहले भी थे और फिर भी रहेंगे। वही-वही सवाल लौट-लौटकर चला आता है। अभी कृष्ण पहले समझाते हैं कि कोई ये मरेंगे नहीं। ये पहले भी थेपीछे भी रहेंगे। तू इनकी फिक्र मत कर। कुछ समझता नहीं है अर्जुन। अब वह फिर वही पूछता है,आप! आप सूर्य के पहले कहां थेआप तो अभी पैदा हुए हैं!
वही शरीर से बंधी हुई दृष्टि! लेकिन कृष्ण एक सीधा वक्तव्य देते हैं। दलील दे सकते थे। लेकिन जिनके पास अनुभव है,वे दलील हमेशा पीछे देते हैंवक्तव्य पहले दे देते हैं। जिनके पास अनुभव नहीं हैवे दलील पहले देते हैंवक्तव्य पीछे देते हैं। जिनके पास अनुभव हैवे दलील का उपयोग सिद्ध करने के लिए नहीं करते। वे दलील का उपयोग ज्यादा से ज्यादा समझाने के लिए करते हैं।
तो पहली तो बात यह समझ लें कि कृष्ण ने बेझिझक कहा कि तू नहीं जानता और मैं जानता हूं। इतना बेझिझक अनुभव ही हो सकता है। लेकिन गुरु भी झिझकते हुए हो सकते हैं। और तब अगर शिष्य झिझकते हुए हो जाएंतो बहुत कठिनाई क्या हैगुरु भी सोच-विचार करके उत्तर देते होंतो फिर शिष्य भी उत्तर से वंचित रह जाएंतो हैरानी क्या है?
यह सोच-विचार नहीं है कृष्ण की तरफयह सीधी प्रतीति है कि तू नहीं जानता। यह ठीक वैसे ही है जैसे एक अंधे आदमी से कोई आंख वाला कहे कि सूरज हैमैं जानता हूं और तू नहीं जानता। यह इतनी ही सरल और सीधी बात उन्होंने कही है।


अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।। 6।।

मैं अविनाशी स्वरूप अजन्मा होने पर भी तथा सब भूत प्राणियों का ईश्वर होने पर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके योगमाया से प्रकट होता हूं।
कृष्ण यहां चेतना कैसे प्रकट होती है पदार्थ मेंपरमात्मा कैसे आविर्भूत होता है प्रकृति मेंअदृश्य कैसे दृश्य के शरीर को ग्रहण करता हैअलौकिक कैसे लौकिक बन जाता हैअज्ञात असीम अनंत कैसे सीमा और सांत में बंधता हैउसका सूत्र कहते हैं।
वे कहते हैंमैं और लोगों की भांति जन्मा हुआ नहीं हूं।
यहां एक बात तो सबसे पहले ठीक से समझ लें कि जब वे कहते हैंमैं और लोगों की भांति जन्मा हुआ नहीं हूंतो इसका जैसा अब तक मतलब लिया जाता रहा हैवैसा मतलब नहीं है। लोग कहेंगे कि यहां वे कह रहे हैं कि मैं भगवान का अवतार हूंबाकी लोग नहीं है। ऐसा नहीं कह रहे हैं। यहां वे इतना ही कह रहे हैं कि जन्मता तो कोई भी नहीं हैलेकिन दूसरे मानते हैं कि वे जन्मते हैंऔर जब तक वे मानते हैं कि जन्मते हैंतब तक मरते हैं। उनकी मान्यता ही उनकी सीमा है। यहां वे कह रहे हैंमैं औरों की भांति जन्मा हुआ नहीं हूं। यहां उनका प्रयोजन है कि मैं जानता हूं भलीभांतिजैसा कि और नहीं जानते--कि मैं अजन्मा हूंमेरा कभी जन्म नहीं हुआ।
एक बहुत सोचने और खयाल में और कभी भीतर खोजने जैसी बात है। कितना ही मन में सोचेंआप यह कभी सोच न पाएंगेइनकंसीवेबल हैइसकी कल्पना नहीं बनती कि मैं मर जाऊंगा। कितनी ही कोशिश करें इसकी कल्पना बनाने की,कल्पना भी नहीं बनती कि मैं मर जाऊंगा। इसका खयाल ही भीतर नहीं पकड़ में आता कि मैं मर जाऊंगा। इसीलिए तो इतने लोग चारों तरफ मरते हैंफिर भी आपको खयाल नहीं आता कि मैं मर जाऊंगा। भीतर सोचने जाओतो ऐसा लगता ही नहीं कि मैं मरूंगा। भीतर मृत्यु के साथ कोई संबंध ही नहीं जुड़ता
कल्पना करेंअगर आपको ऐसी जगह रखा जाए जहां कोई न मरा हो और आपने कभी मरने की कोई घटना न देखी हो,आपने मृत्यु शब्द न सुना होआपको किसी ने मौत के बाबत कुछ न बताया होक्या आप अपने ही तौर अकेले ही कभी भी सोच पाएंगे कि आप मर सकते हैंनहीं सोच पाएंगे। यह निजी एकांत में आप न खोज पाएंगे कि आप मर सकते हैंक्योंकि मृत्यु की कल्पना ही भीतर नहीं बनती।
भीतर जो हैवह मरणधर्मा नहीं है। भीतर जो हैवह मरणधर्मा नहीं हैवह अजन्मा भी है। असल में वही मरता हैजो जन्मता है। जो नहीं जन्मतावही नहीं मरता है।
कृष्ण कहते हैंमैं अजन्मा हूंअजातजो कभी जन्मा नहींअनबॉर्न। और इसलिए अनडाइंग हूंमरूंगा भी नहीं। औरों की भांति मैं जन्मा हुआ नहीं हूंअर्जुन!
और तो सभी मानते हैं कि उनका जन्मदिन है। उनके मानने में ही उनकी भ्रांति है। ऐसा नहीं है कि वे जन्मे हैंजन्मे तो वे भी नहीं हैं। लेकिन जिस दिन वे जान लेंगे कि वे जन्मे नहीं हैंवे भी मेरे ही भांति हो जाएंगेवे भी मेरे ही रूप हो जाएंगे।
यह जो अजन्मा हैजो कभी जन्मता नहीं हैवह भी तो आया है। वह भी तो उतरा हैआविर्भूत हुआ है। वह भी तो पैदा हुआ है। वह भी तो जन्मा ही है। कृष्ण भी तो जन्मे ही हैं।
कहानी है कि जरथुस्त्र पैदा हुआतो जैसे कि और बच्चे रोते हैंजरथुस्त्र रोया नहींहंसा। अब जरथुस्त्र वैसे ही थोड़े-से लोगों में एक हैजैसे कृष्ण। शायद पृथ्वी पर अकेला एक ही बच्चा जन्म के साथ हंसा हैवह जरथुस्त्र। घबड़ा गए लोग। घबड़ा ही जाएंगे। बच्चा पैदा हो और हंसने लगे खिलखिलाकरतो घबड़ा ही जाएंगे। क्योंकि हंसना बच्चे के लिए स्वाभाविक नहीं है,रोना बिलकुल स्वाभाविक है।
लेकिन कभी आपने सोचा कि बच्चे के लिए अगर रोना स्वाभाविक हैतो बूढ़े के लिए रोते हुए मरना स्वाभाविक नहीं होना चाहिए। क्योंकि जो बच्चे के लिए स्वाभाविक हैबूढ़े को कम से कम अनुभव से इतना तो हो जाना चाहिए कि वह बच्चे के पार चला जाए।
बच्चा रोता हुआ पैदा होमाफ किया जा सकता है। बूढ़ा रोता हुआ मरेतो माफ नहीं किया जा सकता। जिंदगी इतना भी न सिखा पाई कि बचपन में जन्म के साथ जो हुआ थावह कम से कम मृत्यु के साथ न हो!
लेकिन बच्चे रोते हुए पैदा होते हैं और बूढ़े रोते हुए मरते हैं। असल में दोनों छोर हमेशा मिल जाते हैं। असल में दोनों छोर बराबर एक से हो जाते हैं। बूढ़ा रोता हुआ मरता हैतो हमारी समझ में आता है कि क्यों मरता है रोता हुआजिंदगी छूट रही है इसलिए। इसलिए हम सोचते हैंरो रहा है। जिसे हम जिंदगी जानते थेवह हाथ से जा रही हैइसलिए रो रहा है। लेकिन बच्चा क्यों रोता हैठीक वही बात जो बूढ़े की है। उसकी भी कोई जिंदगी छूटती है। हमें दूसरा छोर दिखाई पड़ रहा है उसके छूटने का। बूढ़े का पहला छोर दिखाई पड़ रहा है छूटने काबच्चे का दूसरा छोर दिखाई पड़ रहा है छूटने का।
असल में बूढ़ा जो रोता हैवही रोना बच्चे के जन्म तक जारी रहता है। वे एक ही चीज के दो छोर हैं। इधर बूढ़ा रोता हैयह एक पर्दा गिरा नाटक का। यह आदमी पर्दे के पीछे गयारोता हुआ पर्दे के पीछे गया। पर्दे के पीछे उतरारोता हुआ उतरा। उधर उसका जन्म हो रहा हैइधर उसकी मौत हुई थी। इधर एक आदमी मराउधर जन्मा। रोता हुआ मरता हैरोता हुआ जन्मता है।
जरथुस्त्र से किसी ने बाद में पूछा कि हमने सुना हैतुम हंसते हुए पैदा हुए! तो जरथुस्त्र ने कहा कि ठीक सुना है,क्योंकि मैं उसके पहले हंसता हुआ मरा। हम हंसते हुए चले आ रहे थे पर्दे के पीछे से। लोगों ने पूछातुम हंसते हुए क्यों मरे?तो जरथुस्त्र ने कहाहंसते हुए इसलिए मरे कि लोग रो रहे थे और हम समझ रहे थे कि हम मर ही नहीं रहे हैंवे व्यर्थ रो रहे हैंतो हंसी आ गई।
कृष्ण कहते हैंअजन्मा हूं मैं। यहां जिस मैं की बात कर रहे हैंवह परम मैंपरमात्मा का मैं। मेरा कोई जन्म नहीं;फिर भी उतरा हूं इस शरीर में। तो फिर इस शरीर में उतरना क्या हैउसको वे कहते हैंयोगमाया से।
इस शब्द को समझना जरूरी होगाक्योंकि यह बहुत कीबहुत कुंजी जैसे शब्दों में से एक हैयोगमाया। योगमाया से,इसका क्या अर्थ हैइसका क्या अर्थ हैथोड़ा-सा सम्मोहन की दो-एक बातें समझ लेंतो यह समझ में आ सकेगा।
योगमाया का अर्थ है--या ब्रह्ममाया कहें या कोई और नाम देंइससे कोई फर्क नहीं पड़ता--अर्थ यही है कि अगर आत्मा चाहेआकांक्षा करेतो वह किसी भी चीज में प्रवेश कर सकती है। आकांक्षा करेतो किसी भी चीज के साथ संयुक्त हो सकती है। आकांक्षा करेतो जो नहीं होना चाहिए वस्तुतःवह भी हो सकता है। संकल्प से ही हो जाता है।
सम्मोहन के मैंने कहा एक-दो सूत्र समझेंतो योगमाया समझ में आ सके। वह भी एक ग्रेटर हिप्नोसिस है। कहें कि स्वयं परमात्मा अपने को सम्मोहित करता हैतो संसार में उतरता हैअन्यथा नहीं उतर सकता। परमात्मा को भी संसार में उतरना है--हम भी उतरते हैंतो सम्मोहित होकर ही उतरते हैं। एक गहरी तंद्रा में उतरेंतो ही पदार्थ में प्रवेश हो सकता है,अन्यथा प्रवेश नहीं हो सकता। इसलिए जाग जाएंतो पदार्थ के बाहर हो जाते हैं। और सम्मोहन में डूब जाएंतो पदार्थ के भीतर हो जाते हैं।
अगर किसी व्यक्ति को सम्मोहित किया जाए--जो कि दुनिया में हजारों जगह प्रयोग किए गए हैंखुद मैंने भी प्रयोग किए हैं और पाया कि सही हैं--आपको अगर सम्मोहित करके बेहोश किया जाएफिर आपके हाथ में एक कंकड़ रख दिया जाए साधारण सड़क का उठाकर और कहा जाएअंगारा रखा है आपके हाथ में। आप चीख मारकर उस कंकड़ को--मेरे लिए--और आपके लिए उस अंगारे को फेंक देंगे और चीख मारेंगेजैसे अंगारे में हाथ जल गया।
यहां तक तो हम कहेंगेठीक है। आदमी गहरी बेहोशी में है। उसे भ्रम हुआ कि अंगारा है। लेकिन बड़ा मजा तो यह है कि उस बेहोश आदमी के हाथ पर फफोला भी आ जाएगा। फफोला होश में आने पर भी रहेगाउतनी ही देरजितनी देर असली अंगारे से पड़ा हुआ फफोला रहता है। यह फफोला क्या हैयह योगमाया है। यह फफोला सिर्फ संकल्प से पैदा हुआ हैक्योंकि अंगारा हाथ पर रखा नहीं गया थासिर्फ सोचा गया था।
ठीक इससे उलटा भी हो जाता है। अलाव भरे जाते हैं और लोग अंगारों पर कूद जाते हैं और जलते नहीं। वह भी संकल्प है। वह भी गहरा संकल्प हैइससे उलटा। सम्मोहन में अंगारा हाथ पर रख दिया जाए और कहा जाएठंडा कंकड़ रखा हैतो फफोला नहीं पड़ेगा। भीतर हमारी चेतना जो मान लेवही हो जाता है।
कृष्ण कहते हैं कि मैं--परमात्मा की तरफ से बोल रहे हैं कि मैं--अपनी योगमाया से शरीर में उतरता हूं।
शरीर में उतरना तो सदा ही सम्मोहन से होता है। लेकिन सम्मोहन दो तरह के हो सकते हैं। और यही फर्क अवतार और साधारण आदमी का फर्क है। अगर आप जानते हुएकांशसलीसचेतशरीर में उतरें--जानते हुए--तो आप अवतार हो जाते हैं। और अगर आप न जानते हुए शरीर में उतरेंतो आप साधारण व्यक्ति हो जाते हैं। सम्मोहन दोनों में काम करता है। लेकिन एक स्थिति में आप सम्मोहित होते हैं प्रकृति से और दूसरी स्थिति में आप आत्म-सम्मोहित होते हैंआटो-हिप्नोटाइज्ड होते हैं। आप खुद ही अपने को सम्मोहित करके उतरते हैं। कोई दूसरा नहींकोई प्रकृति आपको सम्मोहित नहीं करती।
साधारणतः हमारा जन्म इच्छाओं के सम्मोहन में होता है। मैं मरूंगा। हजार इच्छाएं मुझे पकड़े होंगीवे पूरी नहीं हो पाई हैं। वे मेरे मन-प्राण पर अपने घोंसले बनाए हुए बैठी हैं। वे मेरे मन-प्राण को कहती हैं कि और शरीर मांगोऔर शरीर लोशीघ्र शरीर लोक्योंकि हम अतृप्त हैंतृप्ति चाहिए। जैसे रात आप सोते हैं। और अगर आप सोचते हुए सोए हैं कि एक बड़ा मकान बनाना हैतो सुबह आप पुनः बड़ा मकान बनाना हैयह सोचते हुए उठते हैं। रातभर आकांक्षा प्रतीक्षा करती है कि ठीक हैसो लो। उठोतो वापस द्वार पर खड़ी है कि बड़ा मकान बनाओ।
रात आखिरी समयसोते समय जो आखिरी विचार होता हैवह सुबह के समयउठते वक्त पहला विचार होता है। खयाल करना तो पता चलेगा। अंतिम विचारसुबह का पहला विचार होता है। मरते समय आखिरी विचारजन्म के समय पहला विचार बन जाता है। बीच में नींद का थोड़ा-सा वक्त है। वह खड़ा रहता हैइच्छा पकड़े रहती है। और वह इच्छा आपको सम्मोहित करती है और नए जन्म में यात्रा करवा देती है।
जब कृष्ण कह रहे हैंऔरों की भांतितो फर्क इतना ही है कि और अपनी-अपनी इच्छाओं के सम्मोहन में नए जन्म में प्रविष्ट हुए हैं। उन्हें कुछ पता नहीं है। जानवरों की तरह गलों में रस्सियां बंधी होंऐसे बंधे हुए खींचे गए हैं इच्छाओं से। इच्छाओं के पाश में बंधे पशुओं की भांति बेहोशमूर्च्छित वे नए जन्मों में प्रविष्ट हुए हैं। न उन्हें याद है मरने कीन उन्हें याद है नए जन्म कीउन्हें सिर्फ याद हैं अंधी इच्छाएं। और वे फिर जैसे ही शक्ति मिलेगीशरीर मिलेगाअपनी इच्छाओं को पूरा करने में लग जाएंगे। उन्हीं इच्छाओं कोजिन्हें उन्होंने पिछले जन्म में भी पूरा करना चाहा था और पूरा नहीं कर पाए। उन्हीं इच्छाओं कोजिन्हें उन्होंने और भी पिछले जन्मों में पूरा करना चाहा था और पूरा नहीं कर पाए। उन्हीं इच्छाओं कोजिन्हें उन्होंने जन्मों-जन्मों में पूरा करना चाहा था और पूरा नहीं कर पाए। उन्हीं को वे पुनः पूरा करने में लग जाएंगे। एक वर्तुल की भांतिएक विसियस सर्कल की भांतिदुष्टचक्र घूमता रहेगा।
कृष्ण जैसे व्यक्ति जानते हुए जन्मते हैंकिसी इच्छा के कारण नहींकोई अंधी इच्छा के कारण नहीं। फिर किसलिएजन्मते होंगेजब इच्छा न बचेतो कोई किसलिए जन्मेगाजब इच्छा न बचेतो नए जन्म को धारण करने का कारण क्या रह जाएगाइच्छा तो मूर्च्छित-जन्म का कारण है। फिर क्या कारण रहेगाअकारण तो कोई पैदा नहीं हो सकता। इसलिए अकारण कोई पैदा होता भी नहीं। लेकिन जब इच्छा विलीन हो जाती है--और जब इच्छा विलीन हो जाती है तभी--करुणा का जन्म होता हैकम्पैशन का जन्म होता है।
कृष्णबुद्ध या महावीर जैसे व्यक्ति करुणा के कारण पैदा होते हैं। जो उन्होंने जानाजो उनके पास हैउसे बांट देने को पैदा होते हैं। लेकिन यह जन्म कांशस बर्थसचेष्ट जन्म है। इसलिए उनकी पिछली मृत्यु जानी हुई होती हैयह जन्म जाना हुआ होता है। और जो व्यक्ति अपनी एक मृत्यु और एक जन्म को जान लेता हैउसे अपने समस्त जन्मों की स्मृति वापस उपलब्ध हो जाती है। वह अपने समस्त जन्मों की अनंत शृंखला को जान लेता है।
इसलिए जब कृष्ण कह रहे हैं कि तुझे पता नहींमुझे पता है। और मैं औरों की भांति मूर्च्छित नहीं जन्मा हूंसचेष्ट,अपनी ही योगमाया सेअपने को ही जन्माने की शक्ति का स्वयं ही सचेतन रूप से प्रयोग करके इस शरीर में उपस्थित हुआ हूं। तो वे एक बहुत आकल्टएक बहुत गुह्य-विज्ञान की बात कह रहे हैं।
इस रहस्य की बात को ऊपर से समझा ही जा सकता है। जानना होतब तो भीतर ही प्रवेश करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। और कठिन नहीं है यह बात कि आप औरों की भांति की दुनिया से हटकर कृष्ण की भांति दुनिया में प्रवेश कर जाएं। औरों से हटने और कृष्ण के निकट आने का एक ही रास्ता है।
इस सत्य को पहचान लेना है कि भीतर जो हैवह अजन्मा हैउसका कोई जन्म नहीं है। पहचान लेनादोहराना नहीं। नहीं तो दोहराने की तो कोई कठिनाई नहीं है। सुबह बैठकर हम दोहरा सकते हैं कि आत्मा अजर-अमर हैआत्मा अजर-अमर है। दोहराते रहेंउससे कुछ भी न होगा। जानना पड़ेगा कि मेरे भीतर जो हैवह कभी नहीं जन्मा है।
कैसे जानेंगेपीछे लौटना पड़ेगाभीतरचेतना मेंएक-एक कदम पीछे जाना पड़ेगा। याद करनी पड़ेगी लौटकर। अभी अगर लौटकर याद करेंगेतो आमतौर से पांच साल तक की याद आ पाएगीपांच साल की उम्र तक कीउसके पहले की याददाश्त खो गई होगी। बहुत बुद्धिमान और बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति होंगेतो तीन साल तक की याद आ पाएगीउसके पहले की याद खो गई होगी।
वह जो आखिरी याद है आपकी--समझ लें कि तीन साल की उम्र की आखिरी याद आपको आती है कि वह मेरी आखिरी याद हैउसके बाद शून्य हो जाता है--तो रोज रात को उस आखिरी याद को ही याद करते हुएकरते हुए सो जाएंउसी को याद करते हुए सो जाएं। पता न चले कि कब आप याद करते रहे और कब नींद आ गई। उसको ही याद करते रहेंयाद करते रहें,करते रहेंऔर नींद को आ जाने दें। आपकी याद करने की प्रक्रिया चलती ही रहेजब तक कि आप सो ही न जाएं। जब तक होश रहेचलाए रखें। तो वही याद हुक का काम करती है। जैसे कि कोई मछली को पकड़ता है कांटा डालकर। वह आखिरी याद आपके अचेतन चित्त में अंदर उतर जाती है। और किसी और याद को पकड़कर सुबह तक वापस आ जाती है। सुबह आपको एकाध और याद आएगीजो तीन साल से भी पीछे की है। फिर उसका उपयोग करें।
और रोज ऐसा उपयोग करते रहें और रोज आप पाएंगे कि आप जन्म के करीब सरक रहे हैं। फिर आपको एक दिन वह भी याद आ जाएगीजिस दिन आपका जन्म हुआ। फिर उसको पकड़कर ध्यान करते रहें रात सोते वक्तऔर तब आपको मां के पेट की याद आनी शुरू हो जाएगी। और तब आपको गर्भ-धारण की याद आएगी। फिर उसको पकड़ लेंउस पर प्रयोग करते रहें। और तब आपको पिछले जन्म की मृत्यु की याद आएगी।
फिल्म उलटी चलेगी निश्चित हीफिल्म उलटी चलेगी। पिछले जन्म की याद में पहले मृत्यु की याद आएगीफिर आप बूढ़े होंगेफिर जवान होंगेफिर बच्चे होंगेफिर जन्म होगा। याद उलटी होगीजैसे फिल्म की रील को हम उलटा चला रहे हों। इसलिए पहचानने में थोड़ी कठिनाई होगीवैसी कठिनाई होगी कि जैसे अगर फिल्म को हम उलटा चला दें या किसी उपन्यास को उलटा पढ़ना शुरू करेंतो कठिनाई हो। लेकिन अगर दो-चार दफे पढ़ेंतो उलटे पढ़ने का भी अभ्यास हो जाएगा। और एक दफा उलटा पढ़ लेंतो फिर सीधा भी पढ़ सकते हैं।
पहली दफा बहुत कठिनाई होगीक्योंकि कुछ समझ में नहीं आएगा। उलटा-उलटा लगेगा सब। कैसा उलटा नहीं हो जाएगा! पहले मरेंगेफिर बूढ़े होंगेकठिनाई मालूम पड़ेगी। फिर जवान होंगेबहुत कठिनाई मालूम पड़ेगी। फिर बच्चे होंगेबहुत कठिनाई मालूम पड़ेगी। सब उलटा होगा।
लेकिन एक बार स्मृति आ जाएतो कृष्ण जो कह रहे हैंऔरों में आपकी गिनती न रह जाएगी। और औरों में गिनती न रह जाएयही लक्ष्य है। औरों में गिनती रही आएतो जीवन व्यर्थ है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। 7।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।। 8।।

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती हैतबत्तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं,
अर्थात प्रकट करता हूं।
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए और दूषित कर्म करने वालों का नाश करने के लिए तथा धर्म स्थापन करने के लिए युग-युग में प्रकट होता हूं।


अंतिम श्लोक की बात कर लेंफिर कल सुबह। मैंने कहाकृष्ण जैसे लोग करुणा से पैदा होते हैं। वासना से नहींकरुणा से। वासना और करुणा का थोड़ा भेद समझेंतो यह सूत्र समझ में आ जाएगा।
वासना होती है स्वयं के लिएकरुणा होती है औरों के लिए। वासना का लक्ष्य होता हूं मैंकरुणा का लक्ष्य होता है कोई और। वासना अहंकार केंद्रित होती हैकरुणा अहंकार विकेंद्रित होती है। ऐसा समझें कि वासना मैं को केंद्र बनाकर भीतर की तरफ दौड़ती हैकरुणा पर को परिधि बनाकर बाहर की तरफ दौड़ती है।
करुणाजैसे फूल खिले और उसकी सुवास चारों ओर बिखर जाए। करुणा ऐसी होती हैजैसे हम पत्थर फेंकें झील में;वर्तुल बनेलहर उठे और दूर किनारों तक फैलती चली जाए।
करुणा एक फैलाव हैवासना एक सिकुड़ाव है। वासना संकोच हैकरुणा विस्तार है।
कृष्ण कहते हैंकरुणा सेयुगों-युगों में जब धर्म विनष्ट होता हैतब धर्म की पुनर्संस्थापना के लिएजब अधर्म प्रभावी होता हैतब अधर्म को विदा देने के लिए मैं आता हूं।
यहां ध्यान रखें कि यहां कृष्ण जब कहते हैंमैं आता हूंतो यहां वे सदा ही इस मैं का ऐसा उपयोग कर रहे हैं कि उस मैं में बुद्ध भी समा जाएंमहावीर भी समा जाएंजीसस भी समा जाएंमोहम्मद भी समा जाएं। यह मैं व्यक्तिवाची नहीं है। असल में वे यह कह रहे हैं कि जब भी धर्म के जन्म के लिए और जब भी अधर्म के विनाश के लिए कोई आता हैतो मैं ही आता हूं। इसे ऐसा समझेंजब भी कहीं प्रकाश के लिए और अंधकार के विरोध में कोई आता हैतो मैं ही आता हूं। यहां इस मैं से उस परम चेतना का ही प्रयोजन है।
जो भी व्यक्ति अपनी वासनाओं को क्षीण कर लेता हैतब वह करुणा के कारण लौट आ सकता हैयुगों-युगों मेंकभी भीजब भी जरूरत हो उसकी करुणा कीकोई लौट आ सकता है। उस व्यक्ति का कोई नाम नहीं रह जाताकि वह कौन है। क्योंकि सब नाम वासनाओं के नाम हैं। जब तक मेरी वासना हैतब तक मेरा नाम हैतब तक मेरी एक आइडेंटिटी है।
इसलिए कृष्ण मुझसे नहीं कह सकते कि तुम कृष्ण हो। लेकिन अगर मेरे भीतर कोई वासना न रह जाएनिर्वासना हो जाएतो कोई अहंकार भी नहीं रह जाएगामेरा कोई नाम भी नहीं रह जाएगा। तब मेरा जन्म भी कृष्ण का ही जन्म है। अगर आपके भीतर कोई वासना न रह जाएतो आपका जन्म भी कृष्ण का ही जन्म है।
असल में ठीक से समझेंतो हमारी अशुद्धियांहमारे व्यक्तित्व हैं। और जब हम शुद्धतम रह जाते हैंतो हमारा कोई व्यक्तित्व नहीं रह जाता। इसलिए कहीं भी कोई पैदा हो...।
मोहम्मद ने कहा है कि मुझसे पहले भी आए परमात्मा के भेजे हुए लोग और उन्होंने वही कहा। उनके ही वक्तव्य को पूरा करने मैं भी आया हूं।
जब जीसस का जन्म हुआतो सारी दुनिया से बुद्धिमान लोग जीसस के गांव पहुंचेबड़ी हजारों मील की यात्रा करके। क्योंकि जो भी इस पृथ्वी पर बुद्धिमान थे और जानते थेउनको तत्काल अनुभव हुआ कि कोई करुणा से प्रेरित आत्मा फिर जन्म गई। इसकी ध्वनियां उन तक पहुंचींइसकी लहरें उन तक पहुंचीं
जब बुद्ध का जन्म हुआतो हिमालय से एक महायोगी उतरकर बुद्ध के गांव आया। बुद्ध के द्वार पर खड़ा हुआ। बुद्ध के पिता बुद्ध को लेकर योगी के चरणों में रख दिए और कहा कि आशीर्वाद देंशुभ वचन कहेंशुभ कामनाएं करें। लेकिन वह योगी रोने लगा। तो बुद्ध के पिता बहुत चिंतित हुए। उन्होंने कहाकोई अपशगुन हैआप रोते हैं! उस योगी ने कहामेरे रोने का कारण दूसरा है। अपशगुन नहींमहाशगुन है। मैं रोता हूं इसलिए कि उस आदमी का जन्म हुआ फिरजिसकी कोई वासना नहीं हैजो करुणा से आया है। लेकिन मैं उसके चरणों में बैठने से वंचित रह जाऊंगाक्योंकि मेरी तो मौत की घड़ी करीब आ रही है। उसके लिए नहीं रोताअपने लिए रोता हूं। क्योंकि ऐसी चेतना जन्मी हैउसी को खोजते मैं हिमालय से यहां तक आया हूं।
जब भी कोई महाकरुणावान चेतना पृथ्वी पर उतरती हैतो जिनके हृदय भी पवित्र हैंउनके हृदयों में कंपन शुरू हो जाते हैं। उन तक खबरें पहुंच जाती हैं। वह लहरवह झील पर पड़ा हुआ पत्थर उन तक लहरें ले जाता है। वे उस ध्वनि तरंग को समझ पाते हैंवे भागे हुए चले आते हैं।
रोने लगा वह महायोगी। उसने कहादुखी हूंक्योंकि मैं मर जाऊंगा। मेरी तो मौत करीब आ गईऔर मैं बुद्ध के चरणों में न बैठ पाऊंगा। अभी ही नमस्कार कर लेता हूं। उस बच्चे के पैरों में सिर रखकर वह योगी चला गया।
जब कृष्ण कहते हैंतो आमतौर से लोग भूल समझ लेते हैं। वे समझ लेते हैं कि अगर आज अधर्म होगादुष्ट होंगे,साधु कष्ट में होंगेतो कृष्ण लौट आएंगे। कृष्ण नहीं लौटेंगे। जो भी लौटेगावही कृष्ण है। कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं है। जहां भी कोई लौटेगावही कृष्ण है। लेकिन जब भी जरूरत होती हैअंधेरा घना होता हैतो कोई प्रकाश किरण लौट आती है। क्यों लौट आती हैकरुणा के कारण। जरूरत हो तो ही लौटती हैअन्यथा कोई जरूरत नहीं।
आपके घर में कोई बीमार हो तो डाक्टर आता हैन हो तो कोई जरूरत नहीं। अंधेरा हो तो ठीकअंधेरा न हो तो कोई जरूरत नहीं। अगर पिछली पीढ़ी में ऐसी आत्माएं मरी हों जो कि वासना से मुक्त हो गई होंलेकिन पृथ्वी पर कोई जरूरत न होतो वे न लौटेंगी। लेकिन अगर जरूरत होतो लौट आ सकती हैं।
जरूरत सदा है। अब तक तो ऐसा कोई समय नहीं आयाजब जरूरत न रही हो। जरूरत सदा है। पृथ्वी सदा ही अंधेरे से भरी है। पृथ्वी सदा ही अधर्म से भरी है। लौटना ही पड़ता है। लेकिन लौटने का प्रयोजन स्वयं की कोई वासना नहीं है। लौटने का प्रयोजन दूसरों पर करुणा है।
इस करुणा के दो कारण उन्होंने कहेअसाधुओं के विनाश के लिएदुष्टों के विनाश के लिएसाधुओं के उद्धार के लिए। ये जरा कठिन हैं दोनों बातें। इन्हें थोड़ा-सा खयाल में ले लेना जरूरी है।
दुष्टों के विनाश के लिए! क्या दुष्टों की हत्या कर देंगेमार डालेंगे दुष्टों कोतब तो खुद ही दुष्ट हो जाएंगे। फिर वह करुणा न हुई।
दुष्टों के विनाश का क्या अर्थ होता हैदुष्टों के विनाश का एक ही अर्थ होता है कि दुष्टों में दुष्टता न रह जाएतो दुष्टों का विनाश हो जाता है। दुष्टों के विनाश का अर्थ यह नहीं कि तलवार से दो टुकड़े कर देंगे। क्योंकि तलवार से दो टुकड़े करने में दुष्ट का तो कुछ विनाश न होगाजिसने विनाश किया वह भी दुष्ट हो जाएगा। दुष्ट के विनाश का क्या अर्थ हैदुष्ट के विनाश का अर्थ हैदुष्ट की दुष्टता खो जाए। दुष्टता मिट जाएतो ही दुष्ट का विनाश हुआ।
साधुओं के उद्धार के लिए! यह और कठिन बात है। साधु का तो अर्थ ही यही है कि जिसके उद्धार की किसी को जरूरत न हो। साधु अगर अपना उद्धार न कर सकेतो साधु कैसादुष्ट न कर सकेसमझ में आता है। कृष्ण कहें कि दुष्टों के उद्धार के लिएचलेगा। लेकिन कृष्ण कहते हैंदुष्टों के विनाश के लिए और साधुओं के उद्धार के लिए। तो साधारणतः हम सोचते हैंशायद साधुओं को दुष्ट सताते होंगेतो उनके उद्धार के लिए।
साधु बड़ा कमजोर हैअगर दुष्ट उसे सता पाए। असल में दुष्ट अगर साधु को सताएतो दुष्ट को ही बदलना पड़ता है;साधु को नहीं बदलना पड़ता। दुष्ट साधु को सताकर अपनी ही बदलाहट के उपाय में लग रहा है। साधु को नहीं सता पाता।
साधु को दुनिया में कोई भी नहीं सता पाता। और अगर साधु को दुष्ट सता पाते हैंतो साधु के नाम से दूसरे ढंग के दुष्ट ही बैठे होंगेअन्यथा नहीं। साधु नहीं होंगे। साधु को सताने का उपाय नहीं है। इसलिए भी उपाय नहीं है कि साधु का मतलब ही यही है कि जिसे अब सताओ और चाहे सम्मान करोदोनों बराबर हो गए। उसे सताओगे कैसेउसे जूते की माला पहना दो कि फूल की माला पहना दोवह दोनों के लिए धन्यवाद देकर अपने रास्ते पर चल पड़ेगा। साधु को सताने का उपाय नहीं है। जिसे हम नहीं सता सकतेवही साधु है।
फिर यह कृष्ण कहते हैंसाधु के उद्धार के लिए! और यह भी बड़े मजे की बात है कि जिस युग में साधु होंउसमें भी दुष्टों को साधु न सुधार पाएं और कृष्ण को आना पड़ेतो साधु बिलकुल नपुंसक हैंइम्पोटेंट हैं। फिर साधु किसलिए हैं?
नहींजिस युग में दुष्ट होते हैंउस युग में साधु भी साधु नहीं होते। असल में दुष्टता से भरे हुए युग दुष्टों के युग होते हैं और पाखंडी साधुओं के युग होते हैं। साधु के उद्धार के लिए अर्थात पाखंड से उद्धार के लिए।
और मजा यह है कि दुष्ट का विनाश करना पड़ता है। क्योंकि दुष्टता कुछ हैजिसका विनाश किया जा सके। पाखंड कुछ है नहींजिसका विनाश किया जा सके। पाखंड से सिर्फ उद्धार किया जा सकता है। दुष्टता का विनाश किया जा सकता है। दुष्टता का पाजिटिव अर्थ है। पाखंड सिर्फ एक चेहरा हैजिससे उद्धार किया जा सकता है। जिसे उतारकर रख दिया नीचेतो पीछे का आदमी प्रकट हो जाता है।
साधु के उद्धार के लिए और दुष्ट के विनाश के लिए! और जिस युग में साधु नहीं होतेउस युग में दुष्ट होते हैं। लेकिन साधु सदा होते हैंतो फिर साधु पाखंडी होते हैं।
पाखंडी साधु के उद्धार के लिए! अन्यथा साधु अगर सच में साधु हैतो कृष्ण से कहेगाक्षमा करें। आप कष्ट न करें,मैं उद्धार कर लूंगा। अपना उद्धार तो कर ही लूंगा। आपको नाहक कष्ट न दूंगा। आप क्यों परेशान होते हैं!
अगर साधु सच में साधु होगातो दुष्ट उसे दुश्मन नहीं मालूम पड़ेगा। दुष्ट उसे सताता हुआ भी मालूम नहीं पड़ेगा। लेकिन साधु के भीतर भी दुष्ट ही छिपा रहता है। फर्कसाधु और दुष्ट के बीचचेहरों का होता है। और इस अर्थ में दुष्ट कहीं ज्यादा ईमानदारऔर साधु कहीं ज्यादा बेईमान होता है।
बेईमानी से उद्धार करना पड़े। धर्म का जब विनाश होता हैतो साधु होंगे कहांक्योंकि अगर साधु होंगेतो धर्म का विनाश कैसे होगाधर्म का विनाश तभी होता हैजब साधु नहीं होते। जब साधु नहीं होतेतभी धर्म का विनाश होता है। और जब धर्म का विनाश होता हैतभी अधर्म प्रभावी होता है।
मैं एक सभा में था। एक बड़े साधु करपात्री जी बोले। बोलने के बाद उन्होंने जनता से कुछ नारे लगवाए। उन्होंने पहला नारा लगवायाधर्म की जय हो। तीन बार लोग चिल्लाएधर्म की जय हो। फिर पीछे उन्होंने नारा लगवायाअधर्म का नाश हो।
मैंने उनके साथ बैठे साधु से कहाजब धर्म की जय हो गईतो अधर्म बचेगा कैसेधर्म की जय हो गईअधर्म का नाश हो गया। यह तो ऐसे ही हुआ कि लोगों से हम कहें कि दीए जलाओऔर फिर कहेंअंधेरा हटाओ। दोनों बातें बेमानी हैं। दीया जल गयातो बात खतम हो गई। जब धर्म की जय हो गई तीन बारअब कृपा करके अधर्म का नाश मत करवाएं। अधर्म नाश हो गया। और अगर धर्म की जय से नाश नहीं हुआतो अधर्म के नाश के नारे लगाने से नाश होने वाला नहीं है।
धर्म नहीं होताक्योंकि धर्म के लिए भी पृथ्वी पर पैर रखने की जगह चाहिए। धर्म को भी पृथ्वी पर पैर रखने की जगह चाहिए। वह जगह साधुओं के हृदय हैं। अगर साधु न होंतो धर्म को पैर रखने की जगह नहीं मिलती। धर्म तब अटक जाता है,त्रिशंकु हो जाता हैआकाश में भटक जाता है।
धर्म को पैर रखने के लिए साधुओं के हृदय चाहिएअधर्म को पैर रखने के लिए असाधुओं के हृदय चाहिए। अधर्म भी खड़ा नहीं हो सकताअधर्म भी हमारे सहारे खड़ा होता हैहमारे सहारे प्रकट होता है। धर्म भी हमारे सहारे प्रकट होता है। साधु होंतो धर्म होता हैउसके लिए सहारे होते हैं। असाधु होंअधर्म होता हैउसके लिए सहारे होते हैं। और जब अधर्म होता है,दुष्ट होते हैंसाधु नहीं होतेधर्म नहीं होतातो कृष्ण कहते हैं कि मैंअर्थात कोई भी चेतना जो अपनी सब वासनाओं से मुक्त हो जाती हैलौट आती है करुणावश--साधुओं के उद्धार के लिएअसाधुओं के विनाश के लिए।

शेष कल सुबह हम बात करेंगे।

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