बुधवार, 14 सितंबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-027

परधर्मस्वधर्म और धर्म

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। ३५।।
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से,
गुणरहित भीअपना धर्म अति उत्तम है।
अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।

प्रत्येक व्यक्ति की अपनी निजताअपनी इंडिविजुएलिटी है। प्रत्येक व्यक्ति का कुछ अपना निज हैवही उसकी आत्मा है। उस निजता में ही जीना आनंद है और उस निजता से च्युत हो जानाभटक जाना ही दुख है।
कृष्ण के इस सूत्र में दो बातें कृष्ण ने कही हैं। एकस्वधर्म में मर जाना भी श्रेयस्कर है। स्वधर्म में भूल-चूक से भटक जाना भी श्रेयस्कर है। स्वधर्म में असफल हो जाना भी श्रेयस्कर हैबजाय परधर्म में सफल हो जाने के।

स्वधर्म क्या हैऔर परधर्म क्या हैप्रत्येक व्यक्ति का स्वधर्म है। और किन्हीं दो व्यक्तियों का एक स्वधर्म नहीं है। पिता का धर्म भी बेटे का धर्म नहीं है। गुरु का धर्म भी शिष्य का धर्म नहीं है। यहां धर्म से अर्थ हैस्वभावप्रकृति,अंतःप्रकृति। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अंतःप्रकृति हैलेकिन है बीज की तरह बंदअविकसितपोटेंशियल है। और जब तक बीज अपने में बंद हैतब तक बेचैन है। जब तक बीज अपने में बंद है और खिल न सकेफूट न सकेअंकुर न बन सकेऔर फूल बनकर बिखर न सके जगत सत्ता मेंतब तक बेचैनी रहेगी। जिस दिन बीज अंकुरित होकर वृक्ष बन जाता हैफूल खिल जाते हैंउस दिन परमात्मा के चरणों में वह अपनी निजता को समर्पित कर देता है। फूल के खिले हुए होने में जो आनंद हैवैसा ही आनंद स्वयं में जो छिपा हैउसके खिलने में भी है। और परमात्मा के चरणों में एक ही नैवेद्यएक ही फूल चढ़ाया जा सकता हैवह है स्वयं की निजता का खिला हुआ फूल--फ्लावरिंग आफ इंडिविजुएलिटी। और कुछ हमारे पास चढ़ाने को भी नहीं है।
जब तक हमारे भीतर का फूल पूरी तरह न खिल पाएतब तक हम संतापदुखबेचैनीतनाव में जीएंगे। इसलिए जो व्यक्ति परधर्म को ओढ़ने की कोशिश करेगावह वैसी ही मुश्किल में पड़ जाएगाजैसे चमेली का वृक्ष चंपा के फूल लाने की कोशिश में पड़ जाए। गुलाब का फूल कमल होने की कोशिश में पड़ जाएतो जैसी बेचैनी में गुलाब का फूल पड़ जाएगा। और बेचैनी दोहरी होगी। एक तो गुलाब का फूल कमल का फूल कितना ही होना चाहेहो नहीं सकता है;असफलता सुनिश्चित है। गुलाब का फूल कुछ भी चाहेतो कमल का फूल नहीं हो सकता। न कमल का फूल कुछ चाहेतो गुलाब का फूल हो सकता है। वह असंभव है। स्वभाव के प्रतिकूल होने की कोशिश भर हो सकती हैहोना नहीं हो सकता।
इसलिए गुलाब का फूल कमल का फूल होना चाहेतो कमल का फूल तो कभी न हो सकेगाइसलिए विफलता,फ्रस्ट्रेशनहारहीनता उसके मन में घूमती रहेगी। और दूसरी उससे भी बड़ी दुर्घटना घटेगी कि उसकी शक्ति कमल होने में नष्ट हो जाएगी और वह गुलाब भी कभी न हो सकेगा। क्योंकि गुलाब होने के लिए जो शक्ति चाहिए थीवह कमल होने में लगी है। कमल हो नहीं सकतागुलाब हो नहीं सकेगाजो हो सकता थाक्योंकि शक्ति सीमित है। उचित है कि गुलाब का फूल गुलाब का फूल हो जाए। और गुलाब का फूल चाहे छोटा भी हो जाएतो भी हर्ज नहीं। न हो बड़ा फूल कमल कागुलाब का फूल छोटा भी हो जाएतो भी हर्ज नहीं है। और अगर न भी हो पाएगुलाब होने की कोशिश भी कर लेतो भी एक तृप्ति हैकि जो मैं हो सकता थाउसके होने की मैंने पूरी कोशिश की। उस असफलता में भी एक सफलता है कि मैंने वह होने की पूरी कोशिश कर लीकुछ बचा नहीं रखा थाकुछ छोड़ नहीं रखा था।
लेकिन जो गुलाब कमल होना चाहेवह सफल तो हो नहीं सकता। अगर किसी तरह धोखा देने में सफल हो जाए,आत्मवंचना मेंसेल्फ डिसेप्शन में सफल हो जाएसपना देख ले कि मैं कमल हो गया...सपने ही देख सकता है,परधर्म में कभी हो नहीं सकता। सपना देख सकता है कि मैं हो गया। भ्रम में पड़ सकता है कि मैं हो गया। तो वैसी सपने की सफलता से वह छोटा-सा गुलाब हो जानाअसफलबेहतर है। क्योंकि एक तृप्ति का रस सत्य से मिलता है,स्वप्न से नहीं मिलता है।
कृष्ण ने यहां बहुत बीज-मंत्र कहा है। अर्जुन को वे कह रहे हैं कि स्वधर्म में--जो तेरा धर्म हो उसकी तू खोज कर। पहले तू इसको खोज कि तू क्या हो सकता है। तू अभी दूसरी बातें मत खोज कि तेरे वह होने से क्या होगा। सबसे पहले तू यह खोज कि तू क्या हो सकता है। तू जो हो सकता हैउसका पहले निर्णय ले ले। और फिर वही होने में लग जा। और सारी चिंताओं को छोड़ दे। तो ही तू किसी दिन संतृप्ति के अंतिम मुकाम तक पहुंच सकता है।
परधर्म लेकिन हम ओढ़ लेते हैं। इसके दो कारण हैं। एक तो स्वधर्म तब तक हमें पूरी तरह पता नहीं चलताजब तक कि फूल खिल न जाए। गुलाब को भी पता नहीं चलता तब तक कि उसमें से क्या खिलेगाजब तक गुलाब खिल न जाए। तो बड़ी कठिनाई हैस्वधर्म क्या है! मर जाते हैं और पता नहीं चलताजीवन हाथ से निकल जाता है और पता नहीं चलता कि मैं क्या होने को पैदा हुआ था! परमात्मा ने किस मिशन पर भेजा था! कौन-सी यात्रा पर भेजा था। मुझे क्या होने को भेजा था! मैं किस बात का दूत होकर पृथ्वी पर आया थाइसका मरते दम तक पता नहीं चलता।
न पता चलने में सबसे बड़ी जो बाधा हैवह यह है कि चारों तरफ से परधर्म के प्रलोभन मौजूद हैंजो कि पता नहीं चलने देते कि स्वधर्म क्या है। गुलाब तो खिला नहीं हैअभी उसे पता नहीं हैलेकिन बगल में कोई कमल खिला है,कोई चमेली खिली हैकोई चंपा खिली है। वे खिले हुए हैंउनकी सुगंध पकड़ जाती हैउनका रूप पकड़ जाता है,उनका आकर्षणउनकी नकल पकड़ जाती है और मन होता है कि मैं भी यही हो जाऊं। महावीर के पास से गुजरेंगेतो मन होगा कि मैं भी महावीर हो जाऊं। खिला फूल है वहां। बुद्ध के पास से गुजरेंगेतो मन होगाकैसे मैं बुद्ध हो जाऊं! क्राइस्ट दिखाई पड़ जाएंगेतो प्राण आतुर हो जाएंगे कि ऐसा ही मैं कब हो जाऊं! कृष्ण दिखाई पड़ जाएंगेतो प्राण नाचने लगेंगे और कहेंगेकृष्ण कैसे हो जाऊं!
खुद का तो पता नहीं कि मैं क्या हो सकता हूंलेकिन आस-पास खिले हुए फूल दिखाई पड़ सकते हैं। और उनमें भटकाव है। क्योंकि कृष्णइस पृथ्वी पर कृष्ण के सिवाय और कोई दूसरा नहीं हो सकता है। उस दिन नहींआज भी नहींकल भी नहींकभी नहीं। परमात्मा पुनरुक्ति करता ही नहीं हैरिपिटीशन करता ही नहीं है। परमात्मा बहुत मौलिक सर्जक है। उसने अब तक दुबारा एक आदमी पैदा नहीं किया। हजारों साल बीत गए कृष्ण को हुएदूसरा कृष्ण पैदा नहीं हुआ। हजारों साल बुद्ध को हो गएदूसरा बुद्ध पैदा नहीं हुआ। हालांकि लाखों लोगों ने कोशिश की है बुद्ध होने कीलेकिन कोई बुद्ध नहीं हुआ। और हजारों लोगों ने आकांक्षा की है क्राइस्ट होने कीलेकिन कहां कोई क्राइस्ट होता है! बसएक बार।
इस पृथ्वी पर पुनरुक्ति नहीं है। पुनरुक्ति तो सिर्फ वे ही करते हैंजिनके सृजन की क्षमता सीमित होती है। परमात्मा की सृजन की क्षमता असीम है। अक्सर बुढ़ापे में कवि अपनी पुरानी कविताओं को फिर-फिर लिखने लगते हैं। चित्रकार चुक जाते हैं और फिर उन्हीं चित्रों को पेंट करने लगते हैंजिनको वे कई दफा कर चुके। थोड़ा बहुत हेर-फेरऔर फिर वही पेंट करते हैं। आदमी की सीमाएं हैं।
खलील जिब्रान ने अपनी पहली किताबप्रोफेटइक्कीस साल की उम्र में लिखीबस चुक गया। फिर बहुत किताबें लिखींलेकिन वे सब पुनरुक्तियां हैं। फिर प्रोफेट के आगे कोई बात नहीं कह सका। इक्कीस साल में मर गयाएक अर्थ में। एक अर्थ मेंखलील जिब्रान इक्कीस साल में मर जाएतो कोई बड़ी हानि होने वाली नहीं थी। जो वह दे सकता थादिया जा चुका थाचुक गया।
अगर पिकासो के चित्र उठाकर देखेंतो पुनरुक्ति ही है फिर। फिर वही-वही दोहरता रहता है। फिर आदमी जुगाली करता हैजैसे भैंस घास खा लेती है और जुगाली करती रहती है। अंदर जो डाल लियाउसी को निकालकर फिर चबा लेती है।
लेकिन परमात्मा जुगाली नहीं करताअनंत है उसकी सृजनशीलताइनफिनिट क्रिएटिविटी। जो एक दफा बनाया,बनाया। उस माडल को फिर नहीं दोहराता। लेकिन हमारा मन होता है कि किसी को देखकर हम आकर्षित हो जाते हैं कि ऐसे हो जाएं। बसभूल की यात्रा शुरू हो गई।
परधर्म लुभाता हैक्योंकि परधर्म खिला हुआ दिखाई पड़ता है। स्वधर्म का पता नहीं चलताक्योंकि वह भविष्य में है। परधर्म अभी हैपड़ोस में खिला हैवह आकर्षित करता है कि मैं भी ऐसा हो जाऊं।
कृष्ण जब कहते हैं कि स्वधर्म में हार जाना भी बेहतर हैपरधर्म में सफल हो जाने के बजाएतो वे यह कह रहे हैं कि परधर्म से सावधान। परधर्म भयावह है। इससे बड़ी फिअरफुल कोई चीज नहीं है जगत मेंपरधर्म से। दूसरे को अपना आदर्श बना लेने से बड़ी और कोई खतरनाक बात नहीं हैसबसे ज्यादा इससे भयभीत होना। लेकिन हम इससे कभी भयभीत नहीं हैं। हम तो अपने बच्चों को कहते हैं कि विवेकानंद जैसे हो जाओरामकृष्ण जैसे हो जाओबुद्ध जैसे हो जाओमोहम्मद जैसे हो जाओ। जैसे कि परमात्मा चुक गया होकि मोहम्मद को बनाकर अब कुछ और अच्छा नहीं हो सकता हैकि कृष्ण को बनाकर अब कुछ होने का उपाय नहीं रहा है। जैसे परमात्मा हार गया और अब आपके लिए सिर्फ रिपिटीशन के लिए भेजा हैपुनरुक्ति के लिएडिट्टो आपको लगाकर भेज दिया है कि बस हो जाओ किसी के जैसे। जैसे कार्बन कापी होने का ही आपका अधिकार है।
नहींपरमात्मा चुकता नहीं है। कृष्ण के इस सूत्र में बड़े कीमती अर्थ हैंभयावह है परधर्म। अगर भयभीत ही होना है,तो मौत से भयभीत मत होना। कृष्ण नहीं कहेंगे कि मौत से डरो। जो आदमी कहता हैमौत से मत डरोवह आदमी कहता हैपरधर्म से डरो! मौत से भी ज्यादा खतरनाक है परधर्म! क्योंक्योंकि परधर्म स्युसाइडल है। जिस आदमी ने दूसरे के धर्म को स्वीकार कर लियाउसने आत्महत्या कर ली। उसने अपनी आत्मा को तो मार ही डालाअब वह दूसरे की आत्मा की कापी ही बनने की कोशिश में रहेगा।
और कोई कितनी ही कोशिश करेआवरण ही बदल सकता है। भीतर की आत्मा तो जो है अपनीवही है। वह कभी दूसरे की नहीं हो सकती। भयावह है मृत्यु से भी ज्यादा परधर्मक्योंकि आत्मघात है। आत्मघात जिसे हम कहते हैं,उससे भी ज्यादा भयावह है। क्योंकि जिसे हम आत्मघात कहते हैंउसमें सिर्फ शरीर मरता हैऔर जिसे कृष्ण भयावह कह रहे हैंउसमें आत्मा को ही हम दबाकर मार डालते हैंआत्मा को ही घोंट डालते हैं।
दूसरे के धर्म से सावधान होने की जरूरत है और स्वधर्म पर दृष्टि लगाने की जरूरत है। इस बात की खोज करने की जरूरत है कि मैं क्या होने को हूंमैं क्या हो सकता हूंमेरे भीतर छिपा बीज क्या मांगता हैऔर साहसपूर्वक उस यात्रा पर निकलने की जरूरत है।
इसलिए धर्म सबसे बड़ा दुस्साहसिक काम हैसबसे बड़ा एडवेंचर है। न तो चांद पर जाना इतना दुस्साहसिक हैन एवरेस्ट पर चढ़ना इतना दुस्साहसिक हैन प्रशांत महासागर की गहराइयों में डूब जाना इतना दुस्साहसिक हैन ज्वालामुखी में उतर जाने में इतना दुस्साहस हैजितना दुस्साहस स्वधर्म की यात्रा पर निकलने में है। क्योंक्योंकि भला चाहे एवरेस्ट पर कोई न पहुंचा होलेकिन बहुत लोगों ने पहुंचने की कोशिश की है। भला कोई ऊपर तक तेनसिंह और हिलेरी के पहले न पहुंचा होलेकिन आदमी के चरण-चिह्न काफी दूर तकएप्प्रॉक्सिमेटली करीब-करीब पहुंच गए हैं। यात्री जा चुके उस रास्ते पर। चाहे प्रशांत महासागर में कोई इतना गहरे न गया होलेकिन लोग जा चुके हैं। लोग निर्णायक रास्ता छोड़ गए हैं। लेकिन स्वधर्म की यात्रा परआपके पहले आपके स्वधर्म की यात्रा पर कोई भी नहीं गया,बिलकुल अननोन हैएक इंच कोई नहीं गया। आप ही जाएंगे पहली बार एकदम अज्ञात में छलांग लगानेजहां कोई नहीं गया है।
इसलिए परधर्म आकर्षक मालूम पड़ता है। क्योंकि परधर्म में सिक्योरिटी मालूम पड़ती है। नक्शा मिलता है न परधर्म में! हमें पता हैबुद्ध ने क्या-क्या किया है। तो ठीक वैसे ही पालथी मारकर हम भी कुछ करेंतो नक्शा हमारे पास होता है। हमें पता हैकृष्ण ने क्या किया। तो ठीक हैहम भी एक बांसुरी खरीद लाएं और किसी झाड़ के नीचे खड़े होकर बजाएं। नक्शे हैं पास में। परधर्म में नक्शा हैस्वधर्म अनचार्टर्ड है। कोई नक्शा नहींकोई कुतुबनुमा नहींकोई रास्ता बताने वाला नहीं। क्योंकि आप ही पहली दफा उस यात्रा पर जा रहे हैंजो आपका स्वधर्म है। इसलिए आदमी डरकर दूसरे के रास्ते पर चला जाता है। बंधे-बंधाए रास्तेतैयार पगडंडियांराजपथ लुभाते हैं कि बंधा हुआ रास्ता है,लोग उस पर जा चुके हैं पहले भीमैं भी इस पर चला जाऊं।
लेकिन ध्यान रहेदूसरे के रास्ते से कोई अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच सकता है। जब रास्ता दूसरे कातो मंजिल भी दूसरे की। और दूसरे की मंजिल पर पहुंच जाने से बेहतरअपनी मंजिल को खोजने में भटक जाना है। क्योंकि भटकना भी सीख बन जाती है। और भूल भी सुधारी जा सकती है। और भूल सेआदमी भूल करने से बचता है। भूल ज्ञान है। अपनी खोज में भटकना और गिरना भी उचित। दूसरे की खोज में अगर बिलकुल राजपथ हैतो भी व्यर्थक्योंकि वह आपके मंदिर तक नहीं पहुंचता।
स्वधर्म दुस्साहस है। अज्ञात दुस्साहस है। अनजानअपरिचितयहां रास्ता बना-बनाया नहीं है। यहां तो चलना और रास्ता बनानाएक ही बात के दो ढंग हैं कहने के। यहां तो चलना ही रास्ता बनाना है। एक बीहड़ जंगल में आप चलते हैं और रास्ता बनता है। जितना चलते हैंउतना ही बनता है। बेकार है। क्योंकि रास्ता होना चाहिए चलने के पहलेतो उसका कोई सहारा मिलता है। आप चलते हैं जंगल मेंलताएं टूट जाती हैंवृक्षों को हटा लेते हैंजगह साफ कर लेते हैंलेकिन उससे कोई हल नहीं होता। आगे फिर रास्ता बनाना पड़ता है।
स्वधर्म में चलना ही मार्ग का निर्माण है। इसलिए भटकन तो निश्चित है। लेकिन भटकन से जो भयभीत हैवह कहीं परधर्म की सुरक्षापूर्णसिक्योर्ड यात्रा पर निकल गयातो कृष्ण कहते हैंवह और भी भयपूर्ण है। क्योंकि यहां तुम भटक सकते थेलेकिन वहां तुम पहुंच ही नहीं सकते हो। भटकने वाला पहुंच सकता है। भटकता वही हैजो ठीक रास्ते पर होता है।
जरा इसे समझ लेना उचित होगा। भटकता वही हैजो ठीक रास्ते पर होता हैक्योंकि तभी उसे भटकाव का पता चलता है कि भटक गया। लेकिन जो बिलकुल गलत रास्ते पर होता हैवह कभी नहीं भटकताक्योंकि भटकने के लिए कोई मापदंड ही नहीं होता। दूसरे के रास्ते पर आप कभी नहीं भटकेंगेरास्ता मजबूती से दिखाई पड़ेगाकोई चल चुका है। आप लकीर पीटते हुए चले जाएं। लेकिन स्वधर्म के रास्ते पर भटकाव का डर हैसाहस की जरूरत है।
इसलिए मैं कहता हूंधर्म बहुत जोखिम है। और उसी जोखिम की वजह सेउसी रिस्क की वजह से हम दूसरे का धर्म चुन लेते हैं। बेटा बाप का चुन लेता हैशिष्य गुरु का चुन लेता हैपीढ़ियां-दर-पीढ़ियां एक-दूसरे के पीछे चलती चली जाती हैं। कोई इसकी फिक्र नहीं करता कि दूसरे का धर्म मेरा धर्म नहीं हो सकता है। मैं एक स्वभाव लेकर आया हूं,जिसका अपना स्वर हैजिसका अपना संगीत हैजिसकी अपनी सुगंध हैजिसका अपना जीने का ढंग है। उस ढंग को मुझे विकसित करना होगा।
कृष्ण बहुत जोर देकर अर्जुन से कहते हैंतू ठीक से पहचान लेतेरा स्वधर्म क्या है। और अर्जुन अगर आंख बंद करे और जरा ध्यान करेतो वह कह सकता है कि उसका स्वधर्म क्या है। हम कभी आंख बंद नहीं करतेनहीं तो हम भी कह सकते हैं कि हमारा स्वधर्म क्या है। हम कभी खयाल नहीं करते कि हमारा स्वधर्म क्या है। और इसीलिए कोई चीज हमें तृप्त नहीं करती है। जहां भी जाते हैंवहीं अतृप्ति।
आज सारी दुनिया उदास है और लोग कहते हैंजीवन अर्थहीन है। अर्थहीन नहीं है जीवनसिर्फ स्वधर्म खो गया है। इसलिए अर्थहीनता है। दूसरे के काम में अर्थ नहीं मिलता। अब एक आदमी जो गणित कर सकता हैवह कविता कर रहा है! अर्थहीन हो जाएगी कविता। सिर्फ बोझ मालूम पड़ेगा कि इससे तो मर जाना बेहतर है। यह कहां का नारकीय काम मिल गया। अब जो गणित कर सकता हैवह कविता कर रहा है। गणित और बात हैबिलकुल और। उसका काव्य से कोई लेना-देना नहीं है। काव्य में दो और दो पांच भी हो सकते हैंतीन भी हो सकते हैं। गणित में दो और दो चार ही होते हैं। वहां इतनी सुविधा नहीं हैइतनी लोच नहीं है। गणित बहुत सख्त है। काव्य बहुत लोचपूर्ण,फ्लेक्सिबल है। काव्य तो एक बहाव है। गणित एक बहाव नहीं है।
अब जो गणितज्ञ हो सकता थावह कवि होकर अगर बैठ जाएतो जीवनभर पाएगा कि किसी मुसीबत में पड़ा है;कैसे छुटकारा हो इस मुसीबत से! जो कवि हो सकता थावह गणितज्ञ हो जाएतो कठिनाई खड़ी होने वाली हैबहुत कठिनाई खड़ी हो जाने वाली है। क्योंकि इन दोनों के जीवन को देखने के ढंग ही भिन्न हैं। इन दोनों के सोचने की प्रक्रिया अलग है। इनके पास आंखें एक-सी दिखाई पड़ती हैंएक-सी हैं नहीं।
मैंने सुना हैएक जेलखाने में दो आदमी एक ही दिन बंद किए गए। सांझपूर्णिमा की रातचांद निकला है। दोनों सीखचों को पकड़कर खड़े हैं। एक के चेहरे पर इतना आह्लाद है कि जैसे उसे स्वर्ग का खजाना मिल गया होजेल के सीखचों के भीतर! दूसरे के चेहरे पर ऐसा क्रोध है कि अगर उसका बस चलेतो सब आग लगा देजैसे नर्क में खड़ा हो। तो उस दूसरे आदमी ने पास खड़े आदमी से कहाइतने प्रसन्न दिखाई पड़ रहे होपागल तो नहीं हो! यह जेलखाना हैइतनी प्रसन्नताऔर सामने देखते होडबरा भरा हुआ हैगंदगी फैली हुई हैबास आ रही हैमच्छड़-कीड़े घूम रहे हैं। कहां बंद किया हुआ है हमें लाकर! उस दूसरे आदमी ने कहातुमने कहा तो मुझे याद आया कि जेल के भीतर हूंअन्यथा मैं पूर्णिमा के चांद के पास पहुंच गया था। मुझे पता ही नहीं था कि मैं जेल के भीतर हूं। और तुम कहते हो तो मुझे दिखाई पड़ता है कि सामने डबरा हैअन्यथा पूर्णिमा का चांद जब ऊपर उठा होतो डबरे सिर्फ पागल देखते हैंडबरे को देखने की फुर्सत कहांआंख कहां?
ये दोनों आदमी एक ही साथ खड़े हैंएक ही जेलखाने में। इन दोनों के पास एक-सी आंखें हैंलेकिन एक-सा स्वधर्म नहीं हैस्वधर्म बिलकुल भिन्न है। अब वह आदमी कहता हैमुझे पता ही नहीं था कि मैं जेलखाने में हूं। जब पूर्णिमा का चांद निकला होतो कैसे पता हो सकता है कि जेलखाने में हूं। वह दूसरा आदमी कहेगापागल हो गए हो! जब जेलखाने में होतो पूर्णिमा का चांद निकल ही कैसे सकता हैठीक है न! जब जेलखाने में बंद है आदमीतो पूर्णिमा का चांद निकलता है कहीं जेलखानों में! जेलखानों में कभी पूर्णिमा नहीं होतीवहां अमावस ही रहती है। पर ये दो आदमीइनके देखने के दो ढंग। और दो ढंग ही होतेतो भी ठीक था। जितने आदमी उतने ढंग हैं।
स्वधर्म का मतलब हैपृथ्वी पर जितनी आत्माएं हैंउतने धर्म हैंउतने स्वभाव हैं। दो कंकड़ भी एक जैसे खोजना मुश्किल हैंदो आदमी तो खोजना बहुत ही मुश्किल है। सारी पृथ्वी को छान डालेंतो दो कंकड़ भी नहीं मिल सकते,जो बिलकुल एक जैसे हों। आदमी बड़ी घटना है। कंकड़ों तक के संबंध में परमात्मा व्यक्तित्व देता हैतो आदमी के संबंध में तो देता ही है।
इसलिए कृष्ण कहते हैंखोजपीछे देखलौटकर देखतू क्या हो सकता है! अर्जुन को कृष्णअर्जुन से भी ज्यादा बेहतर ढंग से जानते हैं। कृष्ण की आंखें अर्जुन को आर-पार देख पाती हैं।
अब पश्चिम में मनोविज्ञान कह रहा है कि प्रत्येक नर्सरी स्कूल मेंकिंडरगार्टन मेंप्रत्येक प्राइमरी स्कूल में मनोवैज्ञानिक होने चाहिएजो प्रत्येक बच्चे का एप्टिटयूड--अगर कृष्ण की भाषा में कहेंतो स्वधर्म--उस बच्चे का झुकाव पता लगाएं। और मनोवैज्ञानिक कहे कि इस बच्चे का यह झुकाव हैतो बाप उस बच्चे का कुछ भी कहे कि इसको डाक्टर बनाना हैअगर मनोवैज्ञानिक कहे कि चित्रकारतो बाप की नहीं चलनी चाहिए। सरकार कहे कि इसे डाक्टर बनाना हैतो सरकार की नहीं चलनी चाहिए। सरकार कितना ही कहे कि हमें डाक्टरों की जरूरत हैहमें पेंटर की जरूरत नहीं हैतो भी नहीं चलनी चाहिए। क्योंकि यह आदमी डाक्टर हो ही नहीं सकता। हांडाक्टर की डिग्री इसे मिल सकती हैलेकिन यह डाक्टर हो नहीं सकता। इसके पास चिकित्सक का एप्टिटयूड नहीं है। इसके पास वह गुणधर्म नहीं है।
इसलिए पश्चिम का मनोवैज्ञानिक इस सत्य को समझने के करीब आ गया है। और वह कहता हैअब तक बच्चों के साथ ज्यादती हो रही है। कभी बाप तय कर लेता है कि बेटे को क्या बनाना हैकभी मां तय कर लेती हैकभी कोई तय कर लेता है। कभी समाज तय कर देता है कि इंजीनियर की ज्यादा जरूरत है। कभी बाजार तय कर देता है। मार्केट वेल्यू होती है--डाक्टर की ज्यादा हैइंजीनियर की ज्यादा हैकभी किसी की ज्यादा है--इन सब से तय हो जाता है। सिर्फ एक व्यक्तिजिसे तय किया जाना चाहिए थावह भर तय नहीं करता है। वह उस व्यक्ति की अंतरात्मा से कभी नहीं खोजा जाता है कि यह आदमी क्या होने को है। बाजार तय कर देगामां-बाप तय कर देंगेहवा तय कर देगीफैशन तय कर देगी कि क्या होना है।
स्वभावतः मनुष्य विजड़ित हो गया हैक्योंकि कोई मनुष्य वह नहीं हो पाता हैजो हो सकता है। और जब कभी भी हम करोड़ों लोगों में एकाध आदमी वही हो जाता हैजो होने को पैदा हुआ थातो उसका आनंद और हैउसका नृत्य और हैउसका गीत और है। उसकी जिंदगी में जो खुशी हैफिर हम तड़पते हैं कि यह खुशी हमको कैसे मिलेकौन-सा मंत्र पढ़ेंकौन-सा ग्रंथ पढ़ेंयह खुशी कैसे मिलेसच बात यह है कि खुशी सिर्फ स्वधर्म के फुलफिलमेंट से मिलती है और किसी तरह मिलती नहीं है। बाकी सब समझाने की तरकीबें हैंकन्सोलेशंस हैं। सिर्फ आदमी को आनंद उसी दिन मिलता हैजिस दिन उसके भीतर का बीज पूरा खिल जाता है और फूल बन जाता है। उस दिन वह परमात्मा के चरणों में समर्पित कर पाता है। उस दिन वह धन्यभागी हो जाता है। उस दिन वह कह पाता हैप्रभु तेरी अनुकंपा है,तेरी कृपा हैधन्यभागी हूं कि तूने मुझे पृथ्वी पर भेजा है। अन्यथा जिंदगीभर वह कहता रहता है कि मेरे साथ अन्याय हुआ हैमुझे क्यों पैदा किया हैक्या वजह है मुझे सताने कीमुझे क्यों न उठा लिया जाए?
कामू ने अपनी एक किताब का प्रारंभ एक बहुत अजीब शब्द से किया है। लिखा हैदि ओनली मेटाफिजिकल प्राब्लम बिफोर ह्यूमन काइंड इज़ स्युसाइड--मनुष्य जाति के सामने एक ही धार्मिकआध्यात्मिकदार्शनिक प्रश्न हैसवाल है और वह हैआत्महत्या। कि हम आत्महत्या क्यों न कर लेंरहने का क्या प्रयोजन हैक्या अभिप्राय हैक्या अर्थ हैठीक कहता है वह।
एक ओर कहां हम कृष्ण को देखते हैं बांसुरी बजातेनाचतेकहां एक ओर हम दुख-पीड़ा से भरे हुए लोग! कहां एक ओर बुद्ध कहते हैंपरम शांति हैकहां एक ओर हम कहते हैंशांति परिचित नहीं हैकोई पहचान नहीं है। कहां एक ओर क्राइस्ट कहते हैंप्रभु का राज्यऔर कहां हम एक ओरजहां सिवाय नर्क के और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है। या तो ये सब पागल हैंया हम चूक गए हैं कहीं। जहां ये नहीं चूके हैंवहां हम चूक गए हैं। चूक गए हैंस्वधर्म से चूक गए हैं।
इसलिए मैं भी दोहराता हूंस्वधर्म में असफल हो जाना भी श्रेयस्करपरधर्म में सफल हो जाना भी अश्रेयस्कर। स्वधर्म में मर जाना भी उचितपरधर्म में अनंतकाल तक जीना भी नर्क। स्वधर्म में एक क्षण भी जो जी लेवह मुक्ति को अनुभव कर लेता है। एक क्षण भी अगर मैं पूरी तरह वही हो जाऊंजो परमात्मा ने चाहा है कि मैं होऊंबसउससे ज्यादा प्राणों की और कोई प्यास नहीं है।


प्रश्न: भगवान श्रीआप कहते हैंधर्म एक हैसमाधि एक हैपरमात्मा एक हैलेकिन स्वधर्म अनेक हैं। तो इन दोनों में कैसे तालमेल बैठेइसे स्पष्ट करें।
ऐसे हीजैसे सरिताएं बहुत हैं और सागर एक है। ऐसे हीजैसे वर्षा की बूंदें बहुत हैंवर्षा एक है। ऐसे हीजैसे गुलाब अलग हैकमल अलग हैलेकिन फ्लावरिंग एक हैफूल हो जाना एक हैखिल जाना एक है। स्वधर्म अलग-अलग हैं,धर्म अलग नहीं है। और जिस दिन स्वधर्म कीमैं अपने स्वधर्म की पूर्ति करता हूं और आप अपने स्वधर्म की पूर्ति करते हैंतो जिस मंदिर पर हम पहुंच जाते हैंवह एक है। लेकिन रास्ते अलग हैं। जिस रास्ते आप पहुंचते हैंवह मेरा रास्ता नहीं है। जिस रास्ते मैं पहुंचता हूंवह आपका रास्ता नहीं है।
एक कवि भी अपने गीत को गाकर उसी आनंद को उपलब्ध हो जाता हैजो एक गणितज्ञ अपने सवाल को हल करके होता है। लेकिन सवाल अलग और कविता अलग। एक चित्रकार भी अपने चित्र को बनाकर उसी आनंद को उपलब्ध हो जाता हैजैसे एक नृत्यकार नाचकर होता है। लेकिन नाचना अलगचित्रकारी अलगवह आनंद एक है। स्वधर्म जहां पहुंचा देता हैवह मंजिल एक है।
जैसे पहाड़ पर हम चढ़ते हों अपने-अपने रास्तों से और सब शिखर पर पहुंच जाएं। वह शिखर पर पहुंच जाना एकउस शिखर पर हवाएंऔर सूरजऔर आकाशऔर उड़ते हुए बादलवे एक हैंलेकिन जिन रास्तों से हम आएवे सब अलग।
दो आदमी एक रास्ते से नहीं पहुंचते शिखर तकक्योंकि दो आदमी एक जगह नहीं खड़े हैं। एक जगह खड़े भी नहीं हो सकते। जो जहां खड़ा हैवहीं से तो यात्रा शुरू करेगा। अब मैं यहां बैठा हूंआप सब अगर मेरी तरफ चलना शुरू करें,तो आप वहीं से शुरू करेंगे न जहां आप बैठे हैं! और आप अपनी जगह अकेले ही बैठे हैं। आपकी जगह और कोई नहीं बैठा हुआ है। दूसरे जहां बैठे हैंवहां से चलेंगे। दिशाएं अलग होंगीढंग चलने के अलग होंगेचलने की शक्तियां अलग होंगीचलने के इरादे अलग होंगेपहुंचने के खयाल अलग होंगे। पहुंच जाएंगे एक जगह। जैसे सब सरिताएं सागर में पहुंच जाती हैंऐसे ही सब स्वधर्म महाधर्म में पहुंच जाते हैं। वह धर्म एक है। लेकिन वह धर्म उस दिन मिलता हैजिस दिन स्व मिट जाता है।
अर्जुन से अभी कृष्ण उस धर्म की बात नहीं कर रहे हैं। उसकी भी बात करेंगे। तब वे अर्जुन से कहेंगेसर्वधर्मान् परित्यज्य...। वे उसकी भी बात करेंगे। वे कहेंगेअब तू सब धर्म छोड़ दे। अभी वे कह रहे हैंस्वधर्म पकड़ ले। यही कृष्ण अर्जुन से कहेंगेअब तू सब धर्म-वर्म छोड़। अब तू मुझमें आ जा।
हम गंगा से नहीं कह सकते कि तू यमुना के रास्ते पर चल। हम यमुना से नहीं कह सकते कि तू सिंधु के रास्ते पर चल। हम सिंधु से नहीं कह सकते कि तू ब्रह्मपुत्र के रास्ते पर चल। लेकिन फिर सागर के किनारे पहुंचेंगी वेऔर सागर कहेगाआ जाओसब अपने रास्तों को छोड़ो और मुझमें आ जाओ। चलेंगी अपने रास्ते परफिर एक दिन रास्ते भी छोड़ देने पड़ते हैं। जिस दिन मंजिल मिल जाती हैउस दिन रास्ता छोड़ देना पड़ता है। मंजिल मिलकर जो रास्ते को पकड़े रहेवह पागल है। परमात्मा सामने आ जाए और स्व को पकड़े रहेवह पागल है। लेकिन परमात्मा सामने न हो और कोई पर को पकड़ ले परमात्मा की जगहवह भी पागल है। परपरमात्मा नहीं है। दि अदरपर परमात्मा नहीं है।
स्व कोतब तक तो स्व ही सब कुछ है। जब तक परमात्मा नहीं मिलतातब तक आत्मा ही सब कुछ हैतब तक आत्मा की ही फिक्र करें। जब तक सागर नहीं मिलतातब तक नदी अपने रास्ते को पकड़े रहे। और जिस दिन सागर मिलेनाचे और लीन हो जाए। उस दिन सब रास्ते छोड़ देतट तोड़ दे। फिर उस दिन मोह न करे कि इन तटों ने इतने दिन साथ दियाअब कैसे छोडूं! फिर उस दिन चिंता न करे कि जिन रास्तों ने यहां तक पहुंचायाउन्हें कैसे छोडूं! रास्तों ने यहां तक पहुंचाया ही इसलिए कि अब यहां उन्हें छोड़ दो। बसरास्ते समाप्त हुए। धर्म वहां मिलता है,जहां स्वधर्म लीन हो जाता है।
तीन बातें हुईं--परधर्मस्वधर्मधर्म। हम परधर्म में जीते हैं। अर्जुन परधर्म के लिए लालायित हो रहा है। है क्षत्रिय,एप्टिटयूड उसका वही है। अगर मनोवैज्ञानिक कहतेतो वे कहते कि तू कुछ और नहीं कर सकता। तेरी आत्मा निखरेगी तेरी तलवार की चमक के साथ। तू जागेगा उसी क्षण मेंजहां प्राण दांव पर होंगे। तू कोई आंख बंद करके ध्यान करने वाला आदमी नहीं है। तुझे ध्यान लगेगालेकिन लगेगा युद्ध की प्रखरता मेंइंटेंसिटी में। वहां तू लीन हो जाएगा। वहां तू भूल जाएगा। तू ऐसा बैठकर सुबह और ध्यान नहीं कर सकता कि मैं शरीर नहीं हूं। नहींजब तलवारें चमकेंगी धूप में और दांव पर सब कुछ होगातब तू भूल जाएगा कि तू शरीर हैतब तुझे पता भी नहीं रहेगा कि तू शरीर है। तू भी जानेगा कि शरीर नहीं हूं। लेकिन वह तलवार के दांव पर होगा। वह यहां घर में बैठकर माला पकड़कर तुझसे होने वाला नहीं है। वह तेरा एप्टिटयूड नहीं हैवह तेरा स्वधर्म नहीं है। तो अभी तू परधर्म पकड़ने की मत सोच।
बड़े मजे की बात हैजो परधर्म को पकड़ लेवह परमात्मा तक कभी नहीं पहुंच सकता। परधर्म पकड़ने वाला तो स्वधर्म तक ही नहीं पहुंचतापरमात्मा तक पहुंचने का तो सवाल ही नहीं उठता। पहले परधर्म छोड़स्वधर्म पकड़। फिर घड़ी आएगी वह भी--उसकी हम बात करेंगे--जब कृष्ण कहेंगेअब स्वधर्म भी छोड़अब परमात्मा में लीन हो जा। पर को छोड़ पहलेफिर स्व को भी छोड़ देनातब सर्व उपलब्ध होता है। पर को छोड़कर स्वस्व को छोड़कर सर्व। उसके आगे फिर कुछ छोड़ने-पकड़ने को नहीं रह जाता।
स्वधर्म परधर्म के विपरीत है। और धर्म जो हैवह अधर्म के विपरीत है। स्वधर्म परधर्म के विपरीत हैधर्म जो है वह अधर्म के विपरीत है। परधर्म से यात्रा स्वधर्म तकस्वधर्म से यात्रा धर्म तक। जो आदमी स्वधर्म को लेकर चलेगाएक दिन धर्म में पहुंच जाएगाऔर जो आदमी परधर्म को पकड़कर चलेगाएक दिन अधर्म में पहुंच जाएगा। परधर्म का आखिरी कदम अधर्म होगा। क्योंकि परधर्म को पकड़ने वाले की निजता खो जाती हैउसकी आत्मा खो जाती है। और जिस दिन आत्मा खो जाती हैउसी दिन अधर्म घर कर लेता है। खुद का दीया तो बुझ गयाअब अंधेरा घर में प्रवेश कर जाएगा। जिसका स्वधर्म जागता हैवह अधर्म में कभी नहीं गिर पाता। स्वधर्म बढ़ते-बढ़तेज्योति बढ़ते-बढ़ते एक दिन सूर्य के साथ एक हो जाती है। उस दिन वह धर्म को उपलब्ध हो जाता है।
तो ये चार बातें खयाल में ले लें। हमारे सामने अभी विकल्प हैया तो स्वधर्मया परधर्म। अगर अधर्म तक जाना हो,तो परधर्म का रास्ता उपयोगी हैहितकर हैसहयोगी है। अगर धर्म तक जाना होतो स्वधर्म का रास्ता हितकर है,सहयोगी है। अधर्म तक हम दूसरे के द्वारा पहुंचते हैं।
इस संबंध में एक छोटी-सी कहानी आपको कहूं। अधर्म तक सदा ही हम वाया दि अदरदूसरे के द्वारा पहुंचते हैं। और धर्म तक हम सदा ही वाया दि सेल्फस्व के द्वारा पहुंचते हैं।
इसलिए धर्म पर जाने वाला आदमी एकांत में चला जाता हैताकि दूसरे न होंजहां दूसरे न होंदूसरे का चित्र भी न बने। इसलिए धर्म की खोज में बुद्ध जंगल चले जाते हैंमहावीर पहाड़ों पर चले जाते हैंमोहम्मद पहाड़ चढ़ जाते हैं,मूसा सनाई के पर्वत पर खो जाते हैं।
धर्म की खोज में जाने वाला आदमी दूसरे से हटता हैचुपचाप हट जाता है। न पर रहे--न रहे बांसन बजे बांसुरी--न पर रहेन पर को पकड़ने का प्रलोभन रहे। हट जाता है छोड़कर चुपचाप। लेकिन जिस आदमी को अधर्म करना हैवह आदमी भीड़ खोजता है। वह आदमी कभी अकेलापन नहीं खोजता। क्योंकि अधर्म करने के लिए दूसरा बिलकुल जरूरी है।
यह बड़े मजे की बात है कि शांत तो आप अकेले भी हो सकते हैंअशांत के लिए दूसरा बिलकुल जरूरी है। यह बड़े मजे की बात है कि आनंदित तो आप अकेले भी हो सकते हैंलेकिन दुखी होने के लिए दूसरा बहुत जरूरी है। यह बड़े मजे की बात है कि पवित्रता में तो आप अकेले भी हो सकते हैंलेकिन पाप में उतरने के लिए दूसरा बिलकुल जरूरी है। ब्रह्मचर्य में तो आप अकेले भी हो सकते हैंलेकिन कामुकता के लिए दूसरा बिलकुल जरूरी है। त्याग तो आप अकेले भी कर सकते हैंलेकिन भोग के लिए दूसरा बिलकुल जरूरी है। इसे खयाल ले लें।
एक ईसाई पैरेबल हैईसाई कहानी है ओल्ड टेस्टामेंट में। ईदन के बगीचे में अदम और ईव को परमात्मा ने बनाया। कहानी हैलेकिन एक बात देखने जैसी हैइसलिए आपसे कहता हूं। और परमात्मा ने कहा कि यह एक वृक्ष हैइसके फल मत खाना। यह ज्ञान का वृक्ष हैइसके फल खाए कि तुम स्वर्ग के दरवाजे के बाहर कर दिए जाओगे। बड़ी अजीब बात! बड़ी अजीब बात! अज्ञान का कोई फल खाए और स्वर्ग के बाहर कर दिया जाएसमझ में आता है। ज्ञान का कोई फल खाए और स्वर्ग के दरवाजे के बाहर कर दिया जाएसमझ में आने में कठिनाई होती है। लेकिन साफ परमात्मा ने कहा कि यह ज्ञान का वृक्ष हैइसके फल खाए तो स्वर्ग के बाहर कर दिए जाओगे।
सांप ने आकर ईव कोस्त्री को कहा कि तू पागल हैइस धोखे में मत पड़ना। परमात्मा खुद इसी वृक्ष के फल खाकर परमात्मा है। और पागलकहीं ज्ञान के फल खाकर कोई स्वर्ग खोता है! ज्ञान के फल से ही स्वर्ग मिलता है। तुम्हें पता ही नहीं है कुछ। खा लो और परमात्मा जैसे हो जाओ। ईव ने अदम को समझाया कि इस फल को खा ही लेना चाहिए। इसमें जरूर कोई राज हैजरूर कोई रहस्य है। और जब परमात्मा ने रोकातो मतलब गहरा है। और परमात्मा ज्ञान के फल खाने से रोकेतो हमारा दोस्त नहीं दुश्मन है। ज्ञान का फल!
अदम को भी बात जंचीजैसा कि सदा ही स्त्रियों की बातें पुरुषों को जंच जाती हैं। यानी उसी दिन ईदन के बगीचे में ऐसी भूल हुई होऐसा नहींहर बगीचे में और हर घर में यही भूल होती है। जंच ही जाती है। क्योंकि स्त्री परसुएड करने में बहुत कुशल है।
उसने फुसलाया अदम को। अदम ने फल खा लियाऔर तत्काल स्वर्ग के दरवाजे के बाहर निकाल दिए गए। परमात्मा ने कहाअदमतूने फल क्यों खायाउसने कहामैं क्या करूं! दूसरे ने मुझे फुसलायाईव ने मुझे फुसलाया। ईव से कहा कि तूने इसे क्यों फुसलायातो उसने कहादूसरे ने मुझे फुसलायासांप ने मुझे फुसलाया।
ईसाई कहानी कहती है कि दूसरे के मार्ग से पाप आता है। इस कहानी में दोत्तीन बातें हैं। दूसरे के मार्ग से! और इसमें एक और बात खयाल करने की है। और वह यह कि ज्ञान के फल ने आदमी को स्वर्ग के बाहर क्यों कर दियाक्योंकि जैसे ही अदम ने फल खाया और जैसे ही ईव ने फल खाया उस ट्री आफ नालेज काज्ञान के वृक्ष कावैसे ही अदम को पता चला कि मैं नंगा हूंईव को पता चला कि मैं नग्न हूंउसने जल्दी से पत्ते रखकर अपनी नग्नता ढांक ली। परमात्मा ने कहा कि तुमने ज्ञान तो पा लियालेकिन सरलता खो दी। और सरलता में ही स्वर्ग हैकांशसनेस में नहीं,ज्ञान में नहींसरलता में। अब तक तुम बच्चों जैसे सरल थे। नग्न थेतो तुम्हें पता न था कि तुम नग्न हो। अब तुम बच्चों जैसे सरल न रहे। अब तुम चालाक हो गएअब तुम कनिंग हो गएअब तुम कैलकुलेटिंग हो गएअब तुम हिसाब लगाने लगे कि नग्न हैंऐसा हैवैसा है। अब तुम सवाल उठाओगेअब तुम सवालों में उलझोगे और गिरोगे।
ज्ञान का फल इसलिएजो ज्ञान इसलिए सरलता को नष्ट कर देवह धोखा हैज्ञान नहीं है। नाम ही उसका ज्ञान है। जो ज्ञान सरलता को वापस लौटा देवही ज्ञान है। और दूसरे के मार्ग से ज्ञान नहीं आताअज्ञान आता है। और दूसरे के मार्ग से धर्म नहीं आताअधर्म आता है। धर्म का मार्ग स्वयं के भीतर है। वह गंगोत्री स्वयं के भीतर है जहां से ज्ञान कीधर्म की गंगा जन्मती है और एक दिन सर्व के सागर में लीन हो जाती है।


अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।। ३६।।
श्री भगवानुवाच
काम एष कोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्।। ३७।।
इस पर अर्जुन ने पूछा कि हे कृष्णफिर यह पुरुष बलात्कार से लगाए हुए के सदृशन चाहता हुआ भीकिससे प्रेरा हुआ पाप का आचरण करता है?
श्री कृष्ण भगवान बोलेहे अर्जुनरजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम क्रोध ही हैयही महाअशन अर्थात अग्नि के सदृशभोगों से तृप्त न होने वाला और बड़ा पापी है।
इस विषय में इसको ही तू वैरी जान।


अर्जुन ने एक बहुत ही गहरा सवाल कृष्ण से पूछा। अर्जुन ने कहाफिर अगर सब कुछ परमात्मा ही कर रहा हैअगर सब कुछ प्रकृति के गुणधर्म से ही हो रहा हैअगर सब कुछ सहज ही प्रवाहित है और अगर व्यक्ति जिम्मेवार नहीं है,तो फिर पाप कर्म न चाहते हुए भी कि करेआदमी बलात पाप कर्म क्यों कर लेता हैकौन करवा देता हैअगर परमात्मा ही चला रहा है सब कुछ और मैं भी नहीं चाहता कि बुरा कर्म करूंऔर परमात्मा चला रहा है सब कुछ,फिर भी मैं बुरे कर्म में प्रवृत्त हो जाता हूंतो बलात मुझे कौन बुरे कर्म में धक्का दे देता है?
गहरा सवाल है। कहना चाहिए कि मनुष्य जाति में जो गहरे से गहरे सवाल उठाए गए हैंउनमें से एक है। सभी धर्मों के सामने--चाहे हिब्रूचाहे ईसाईचाहे मोहमडनचाहे हिंदूचाहे जैन--गहरे से गहरा सवाल यह उठा है कि अगर परमात्मा ही चला रहा है और हम भी नहीं चाहते...। और फिर आप तो कहते हैं कि हमारे चाहने से कुछ होता नहीं। हम चाहें भीतो भी परमात्मा जो चाहता हैउससे अन्यथा नहीं हो सकता। और हम चाहते भी नहीं कि बुरा कर्म करें और परमात्मा तो चाहेगा क्यों कि बुरा कर्म हो! फिर कौन हमें धक्के देता है और बलात बुरे कर्म करवा लेता हैफ्राम व्हेयर इज़ ईविलयह बुराई कहां से आती है?
अलग-अलग चिंतकों ने अलग-अलग उत्तर खोजे हैं जो बहुत गहरे नहीं गएउन्होंने कहाशैतान हैवह करवा लेता है। उत्तर खोजना जरूरी थालेकिन यह कोई बहुत गहरा उत्तर नहीं है। वे कहते हैंडेविल हैएक पापात्मा हैवह सब करवा लेती है। लेकिन यह उत्तर बहुत गहरा नहीं हैक्योंकि अर्जुन को अगर यह उत्तर दिया जाएतो अर्जुन कहेगा,वह परमात्मा उस पापात्मा पर कुछ नहीं कर पातावह परमात्मा उस शैतान को कुछ नहीं कर पातातो क्या वह शैतान परमात्मा से भी ज्यादा शक्तिशाली हैऔर अगर शैतान परमात्मा से ज्यादा शक्तिशाली हैतो मुझे परमात्मा के चक्कर में क्यों उलझाते होमैं शैतान को ही नमस्कार करूं!
अनेक चिंतकों ने दूसरा एक तत्व खोजने की कोशिश की है। कि एक दूसरा भी है परमात्मा के अलावाजो लोगों को पाप में धक्के दे रहा है। लेकिन यह उत्तर न तो मनोवैज्ञानिक हैन बहुत गहरा है। इससे तो केवल वे ही राजी हो सकते हैंजो किसी भी चीज के लिए राजी हो सकते हैं। इस उत्तर से और कोई राजी नहीं हो सकता।
इसलिए कृष्ण ऐसा उत्तर नहीं देते हैं। कृष्ण बहुत मनोवैज्ञानिक उत्तर देते हैं। वे यह कहते हैंप्रकृति के तीन गुण हैं,रजसतमस और सत्व। उनका उत्तर बहुत वैज्ञानिक है। वे कहते हैंप्रकृति त्रिगुणा है।
और मैं आपको यह कहूं कि यह तीन गुणों की बात जब कृष्ण ने कही थीतब बड़े वैज्ञानिक आधार रखती थी। लेकिन कृष्ण के बाद पिछले पांच हजार सालों में जितने लोगों ने कहीउनको इसके विज्ञान का कुछ बोध नहीं था। दोहराते रहे। लेकिन अभी पश्चिम में पिछले बीस साल में विज्ञान ने फिर कहा कि प्रकृति त्रिगुणा है। जिस दिन हम आधुनिक सदी में परमाणु का विश्लेषण कर सकेपरमाणु को तोड़ सकेउस दिन बड़े चकित होकर हमें पता चला कि परमाणु तीन हिस्सों में टूट जाता है। पदार्थ का जो अंतिम परमाणु हैवह तीन हिस्सों में टूट जाता हैइलेक्ट्रानन्यूट्रान और प्रोटान में टूट जाता है। और वैज्ञानिक कहते हैं कि इन तीन के बिना परमाणु नहीं बन सकता। और इन तीन के जो गुणधर्म हैंवे वही गुणधर्म हैंजो सतरज और तम के हैं। ये तीन जो काम करते हैंवे वही काम करते हैंजो हम बहुत पुराने दिनों से सतरज और तम शब्दों से लाते थे।
उसमें तमस जो हैइनरशियावह अवरोध का तत्व हैस्थिरता का तत्व है। अगर तमस न होतो जगत में कोई भी चीज स्थिर नहीं रह सकती। आप एक पत्थर उठाकर फेंकते हैं। अगर जगत में कोई तमस न होकोई ग्रेविटेशन न हो,रोकने वाली कोई ताकतअवरोधक न होतो फिर पत्थर कभी भी गिरेगा नहीं। फिर आपने फेंक दियाफेंक दिया;फिर वह चलता ही रहेगाअनंत काल तक। फिर वह गिरेगा कैसेकुछ अवरोध होकोई हो जो रोकता हो। आप भी पृथ्वी पर नहीं हो सकेंगे। कभी के हम उड़ गए होते। वह जमीन खींच रही हैतमसग्रेविटेशन का भार हमें रोके हुए है।
अभी जो अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष यात्रा पर गएउनकी बड़ी से बड़ी कठिनाइयों में एक कठिनाई यह है कि जैसे ही जमीन के ग्रेविटेशन के बाहर होते हैं दो सौ मील के पारवैसे ही कशिश समाप्त हो जाती हैतो आदमी गुब्बारे जैसा हो जाता हैजैसे गैस भरा गुब्बारा उड़ने लगता है। तो अगर बेल्ट न बंधा हो कुर्सी सेतो आप यान की कुर्सी से तत्काल उठकर यान के टप्पर से गुब्बारे की तरह टकराने लगेंगे। फिर नीचे भी उतर नहीं सकतेकोई ताकत काम नहीं करती नीचे उतरने के लिए। चांद पर यही कठिनाई हैक्योंकि तमस चांद का कम हैआठ गुना कम है। इसलिए चांद पर अगर हम मकान बनाएंगेतो चोर आठ गुना ऊंची छलांग लगा सकता है। फुटबाल को वहां चोट मारेगा खिलाड़ी,तो यहां जमीन पर जितनी ऊंची जाती हैउससे आठ गुनी ऊंची चली जाएगी।
यह जो तमस का अर्थ है इनरशियाअवरोधक शक्ति। अब बड़े मजे की बात है कि अगर अवरोधक शक्ति न होतो गति भी असंभव है। गति भी इसीलिए संभव है कि अवरोधक शक्ति का उपयोग कर पाते हैं। आपकी कार में जैसे ब्रेक न होंफिर गति भी संभव नहीं हैआप पक्का समझ लेना। फिर कार चलनी भी संभव नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि नहीं चल सकती। चल गईबस एक ही दफा चल गई। उसमें वह ब्रेक भी चाहिएजो अवरोधक है। एक्सीलेरेटर ही काफी नहीं हैउसमें अवरोधक...।
जीवन एकदम विस्फोट हो जाएअगर उसमें रोकने वाली ताकत न हो। इनरशियातमस जो हैवह रोकने वाली ताकत है। रजस जो हैवह गति की मूवमेंट की ताकत है। ये उलटी ताकते हैं। तमस रोकतारजस गति देता। शक्ति हैएनर्जी है। सत्व तीसरा कोण है। जैसे कि हम एक ट्राएंगल बनाएंदो कोण नीचे हों और एक ऊपर हो। सत्व इन दोनों के ऊपर हैकहें कि इन दोनों का बैलेंस हैसंतुलन है। सत्व बैलेंसिंग हैवह संतुलन है। अगर गति भी हो,रोकने वाला भी होलेकिन संतुलन न हो...।
जैसे एक कार हैउसमें एक्सीलेरेटर भी है और ब्रेक भी हैलेकिन ड्राइवर नहीं है। वह जो ड्राइवर हैवह पूरे वक्त बैलेंसिंग है। जब जरूरत होती हैतो ब्रेक पर पैर ले जाता हैजब जरूरत होती हैतो एक्सीलेरेटर पर पैर ले जाता है। वह पूरे वक्त बैलेंस कर रहा है। सत्व जो हैवह बैलेंसिंग है।
ये तीन तत्व हैंजिनको भारत ने ऐसे नाम दिए थे। पश्चिम जिनको इलेक्ट्रानप्रोटानन्यूट्रान कहेकोई और नाम दे,इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। एक बात बहुत अनिवार्य रूप से सिद्ध हो गई है कि जीवन का अंतिम विश्लेषण तीन शक्तियों पर टूटता है। इसलिए हमने इन तीन शक्तियों को ये कई तरह से नाम दिए थे। जो लोग वैज्ञानिक ढंग से सोचते थेउन्होंने रजसतमससत्व ऐसे नाम दिए। जो लोग मेटाफोरिकलकाव्यात्मक ढंग से सोचते थेउन्होंने कहाब्रह्माविष्णुमहेश। उनका भी काम वही है। वे तीन नाम भी यही काम करते हैं। उसमें ब्रह्मा सर्जक शक्ति हैं,विष्णु सस्टेनिंगसंभालने वाले और शिव विनाश करने वाले। उन तीन के बिना भी नहीं हो सकता। ये जो इलेक्ट्रान,न्यूट्रान और प्रोटान हैंये भी ये तीन काम करते हैं। उसमें जो इलेक्ट्रान हैवह निगेटिव है। वह ठीक शिव जैसा है,निगेट करता हैतोड़ता हैनष्ट करता है। उसमें जो प्रोटान हैवह ब्रह्मा जैसा हैपाजिटिव हैइसलिए प्रोटान उसका नाम है। वह विधायक हैवह निर्माण करता है। और उसमें जो न्यूट्रान हैवह न निगेटिव हैन पाजिटिव है। वह सस्टेनिंग हैवह बीच में हैबैलेंसिंग है।
कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य के भीतर--जो भी घटित होता हैबाहर और भीतर--वह इन तीन शक्तियों का खेल है। इन तीन शक्तियों के अनुसार सब घटित होता है। आदमी धकाया जातारोका जाताजन्माया जातामरण को उपलब्ध होताहंसी को उपलब्ध होतारोने को उपलब्ध होता--वह इन सारी तीन शक्तियों का काम है। ये तीन शक्तियां अपना काम करती रहती हैं। ये परमात्मा के तीन रूप जीवन को सृजन देते रहते हैं।
अर्जुन पूछता हैफिर नहीं भी हम करना चाहतेफिर कौन करवा लेता हैआप तो चाहते हैं कि जमीन पर न गिरें,लेकिन जरा पैर फिसला कि गिर जाते हैं। कोई शैतान गिरा देता हैकोई शैतान नहीं गिरा देताग्रेविटेशन अपना काम करता है। आप नहीं गिरना चाहतेमानास्वीकृत कि आप नहीं गिरना चाहतेलेकिन उलटे-सीधे चलेंगेतो गिरेंगे। आप नहीं गिरना चाहते थेतो भी गिरेंगे। पैर पर पलस्तर लगेगा। आप डाक्टर से कहेंगेमैं नहीं गिरना चाहता था और परमात्मा तो टांग तोड़ता नहीं किसी कीक्यों तोड़ेगाइतना बुरा तो नहीं हो सकता कि अकारण मुझ भले आदमी कीजो गिरना भी नहीं चाहताउसकी टांग तोड़ दे। लेकिन मेरी टांग क्यों टूट गईतो डाक्टर वही उत्तर देगा,जो कृष्ण ने दिया। डाक्टर कहेगाग्रेविटेशन की वजह से। जमीन में गुरुत्वाकर्षण हैआप कृपा करके सम्हलकर चलें। उलटे-सीधे चलेंगेतो ग्रेविटेशन टांग तोड़ देगी। क्योंकि प्रत्येक शक्ति अगर हम उसके अनुकूल न चलेंतो नुकसान पहुंचाने वाली हो जाती है। अगर अनुकूल चलेंतो नुकसान पहुंचाने वाली नहीं होती।
प्रत्येक शक्ति का उपयोग अनुकूल और प्रतिकूल हो सकता है। अब मनुष्य के भीतर कौन-सी शक्तियां हैंजो उसे बलात--जैसे कि एक आदमी नहीं गिरना चाहता है और गिर जाता है और टांग टूट जाती है। और एक आदमी क्रोध नहीं करना चाहता है और क्रोध हो जाता है और खोपड़ी खुल जाती है। या दूसरे की खुल जाती है या खुद की खुल जाती है। क्याकौन कर जाता है यह सबपरमात्मापरमात्मा को क्या प्रयोजन है! और परमात्मा ऐसे काम करेतो परमात्मा हम उसे कैसे कहेंगेकोई कहेगाशैतान। कृष्ण नहीं कहते। कृष्ण कहते हैंसिर्फ जीवन की शक्तियां काम कर रही हैं।
मनुष्य के भीतर क्रोध है। वह भी अनिवार्य तत्व है। कहें कि वह हमारे भीतर निगेटिव फोर्स हैक्रोध विनाश की शक्ति है हमारे भीतर। प्रेम हमारे भीतर निर्माण की शक्ति है। और विवेक हमारे भीतर बैलेंसिंग फोर्स है। जो आदमी विवेक को छोड़कर सारी शक्ति क्रोध में लगा देगावह बलात नर्क की तरफ चलने लगेगानहीं चाहेगातो भी जाएगा। जो सारी शक्ति प्रेम की ओर लगा देगावह बलात स्वर्ग की ओर जाने लगेगाचाहे चाहे और चाहे न चाहे। उसके जीवन में सुख उतरने लगेगा। और जो आदमी बैलेंस कर लेगा और समझ लेगा कि दुख और सुख और दोनों के बीच में अलगवह आदमी मुक्ति और मोक्ष की दिशा में यात्रा कर जाएगा।
इसलिए हमारे पास तीन शब्द और समझ लेने जैसे हैंस्वर्गनर्क और मोक्ष। स्वर्ग में वह जाता हैजो अपने भीतर की विधायक शक्तियों के अनुकूल चलता है। नर्क में वह जाता हैजो अपने भीतर विनाशक शक्तियों के अनुकूल चलता है। मोक्ष में वह जाता हैजो दोनों के अनुकूल नहीं चलता हैदोनों को संतुलित करके दोनों को ट्रांसेंड कर जाता हैपरे हो जाता हैअतीत हो जाता है।
कृष्ण कह रहे हैंशक्तियां हैं और इन तीन शक्तियों के बिना जीवन नहीं हो सकता है। इसलिए अर्जुनकौन तुझे धक्का देता हैऐसा मत पूछ। यह समझ कि धक्का तेरे भीतर से कैसे निर्मित होता है। क्रोधकामअहंकारअगर उनके प्रति तू अतिशय से झुक जाता हैतो जो तू नहीं चाहता वह तुझे करना पड़ता है।
कभी आपने देखाकामवासना मन को पकड़ ले--ऐसा कहना ठीक नहीं है कि कामवासना मन को पकड़ लेकहना यही ठीक होगा कि जब आप कामवासना को मन को पकड़ लेने देते हैंआप जब पकड़ लेने देते हैं...। और ध्यान रहे,कामवासना आपके बिना पकड़ाए आपको नहीं पकड़ती है।
हांएक सीमा होती है हर चीज कीउसके पार मुश्किल हो जाता है रोकना। एक सीमा होती है। जगह-जगह हमने कार की ट्रैफिक पर लिखा हुआ है कि यहां पांच मील रफ्तार। क्योंक्योंकि वहां इतने ज्यादा लोग गुजर रहे हैं कि अगर तीस मील रफ्तार होतो रोकना समय पर मुश्किल है। पांच मील होतो समय पर रोकना आसान है। जहां लोग कम गुजर रहे हैंवहां सत्तर मील भी होतो कोई हर्ज नहीं। वहां समय पर सत्तर मील भी रोकना आसान है। हर चीज की एक सीमा है।
फ्रायडसिग्मंड फ्रायड एक कहानी कहा करता था। वह कहा करता था कि एक छोटे-से गांव में एक गरीब म्युनिसिपल कमेटी ने गांव का कचरा ढोने के लिए एक घोड़ा खरीदाएक घोड़ागाड़ी के लिए। लेकिन गरीब थी म्युनिसिपैलिटी और कहते हैंगांव बड़ा बुद्धिमान था। बुद्धिमान थाऐसा कहेंया लोगों में ऐसी मजाक प्रचलित थी कि गांव बहुत बुद्धिमान हैगांव को ऐसा खयाल था कि बहुत बुद्धिमान है। हालांकि वह जो भी करता थावह बहुत बुद्धिहीनता के काम होते थे। म्युनिसिपल ने एक घोड़ा खरीदा। लेकिन घोड़े को घासदानापानी इतना महंगा पड़ने लगा कि म्युनिसिपल के बजट पर भारी हुआ। गरीबछोटी-सी म्युनिसिपल थी। कमेटी बुलाई गई। उन्होंने तय किया कि क्या किया जाए! उन्होंने कहा कि आधा राशन करके देखा जाए घोड़े के लिए। अगर आधे में काम चल जाए तो ठीकनहीं फिर थोड़ा बढ़ा देंगे।
आधा राशन कियालेकिन काम बिलकुल ठीक चल गया। घोड़ा आधे राशन पर भी जिंदा रहा। तब तो उन्होंने कहा कि हम पागल हैंजो इसको इतना दें। और आधा करके देखें। उन्होंने और आधा किया। घोड़ा फिर भी जिंदा रहा और फिर भी काम करता रहा! उन्होंने कहाहम बिलकुल पागल हैं। इसे और आधा करें। और भी आधा कर दिया। घोड़ा मुश्किल में रहालेकिन फिर भी किसी तरह काम करता रहा। म्युनिसिपल कमेटी ने कहा कि हम बिलकुल नासमझी कर रहे हैं,अब राशन बिलकुल बंद कर दें। राशन बिलकुल बंद कर दिया। जो होना थावही हुआ। घोड़ा मर गया। एक सीमा थी,जहां तक घोड़ा कम राशन पर भी काम कियाफिर एक सीमा आईजहां से काम नहीं कर सका।
हमारी प्रत्येक वृत्ति की सीमाएं हैंजहां तक हम उन्हें रोक सकते हैंऔर जहां से फिर हम उन्हें नहीं रोक सकते। एक विचार मेरे मन में उठाशब्द बना मेरे भीतर। अभी मैं आपको न कहूंतो रोक सकता हूं। फिर मेरे मुंह से शब्द निकल गयाअब इस शब्द को वापस नहीं ला सकता। एक सीमा थीएक जगह थीमेरे भीतर विचार भी थाशब्द भी थाओंठ पर भी आ गया थाफिर भी मैं रोक सकता हूं। फिर एक सीमा के बाहर बात हो गईमैंने आपसे बोल दियाअब मैं इसे वापस नहीं लौटा सकता। अब कोई उपाय इसे वापस लौटाने का नहीं है। एक जगह थीजहां से यह वापस लौट जाता।
क्रोधएक जगह हैजहां से वापस लौट सकता है। लेकिन जब उस जगह के बाहर निकल जाता हैउसके बाद वापस नहीं लौटता। कामएक जगह हैजहां से वापस लौट सकता है। जब उसके आगे चला जाता हैतो फिर वापस नहीं लौट सकता। और ध्यान रहेबड़े मजे की बात यह है कि उस सीमा तकजहां तक काम वापस लौट सकता हैउस समय तक आप उसको सहयोग देते हैं। और जब वह वापस नहीं लौटतातब आप चिल्लाते हैं कि कौन मुझे धकाए जा रहा है परवश! कौन मुझे बलात काम करवा रहा है!
इसे ठीक से भीतर समझेंगेतो खयाल में आ जाएगा। एक जगह हैजहां तक हर वृत्ति आपके हाथ में होती है। लेकिन जब आप उसे इतना उकसाते हैं कि आप का पूरा शरीर और पूरा यंत्र उसको पकड़ लेता हैफिर आपकी बुद्धि के बाहर हो जाता है। फिर आप कहते हैं कि नहीं-नहीं। और फिर भी घटना घटकर रहती है। तब आप कहते हैंकौन बलात करवाए चला जाता हैजब कि हम नहीं करते हैं! कोई नहीं करवाताशक्तियां करती हैं। लेकिन करवाने का अंतिम निर्णय गहरे में आपका ही कोआपरेशन हैआपका ही सहयोग है।
कृष्ण इतना ही कह रहे हैं कि कोई बैठा नहीं है पारतुम्हें क्रोध मेंकाम मेंयुद्ध मेंलड़ाई-झगड़े में ले जाने को। प्रकृति के नियम हैं। अगर उन नियमों को तुम समझ लेते हो और समता कोसंतुलन को उपलब्ध होते होअनासक्ति कोसाक्षीभाव को उपलब्ध होते होविवेक कोश्रद्धा को उपलब्ध होते होतो फिर तुम्हें कोई फिक्र करने की जरूरत नहीं हैफिर जो भी होगा परमात्मा पर। लेकिन जब तक तुम ऐसी समता को और अनासक्ति को उपलब्ध नहीं होते,भीतर तुम आसक्ति को पालते चले जाते होबारूद में चिनगारी डालते चले जाते होफिर जब आग भड़ककर मकान को पकड़ लेती हैतब तुम कहते होमैं तो चाहता नहीं था कि आग लगेलेकिन यह आग लग गई है। बारूद का नियम हैधर्म हैवह आग लगा देगी। तुमने चिनगारी फेंकीचिनगारी का धर्म है कि वह आग पकड़ा देगी। और जब बारूद भड़क उठेगीतब तुम छाती पीटोगे और चिल्लाओगे कि यह तो मैं नहीं चाहता था।
कभी आपने देखाएक आदमी हत्या कर देता है...दोस्तोवस्की का एक बहुत कीमती उपन्यास हैक्राइम एंड पनिशमेंट। उसमें रोसकोलनिकोव नाम का एक पात्र है। वह रोज अपने सामने उसकी मकान मालकिन जो हैउसके मकान की बुढ़िया जो मालकिन है--वह कोई सत्तर साल की बूढ़ी औरत है--वह गिरवी रखने का काम करती है और लोगों से खींचकर ब्याज चूसती है। मरने के करीब हैलेकिन रत्तीभर दया नहीं करती। कोई नहीं है उसकाबहुत धन है। तो रोसकोलनिकोव--एक विद्यार्थी है--वह देखता रहता अपनी खिड़की से। गरीब आदमी गिड़गिड़ाते हैंरोते हैंचिल्लाते हैं,लेकिन कुछ भी नहीं। उनके कपड़े भी उतरवा लिए जाते हैंकोई दया नहींकोई ममता नहीं। कई बार उसके मन में होता हैइस बुढ़िया को कोई मार क्यों नहीं डालताइसके होने की कोई जरूरत ही क्या हैयह मर भी जाएतो हर्ज क्या हैयह मर जाएतो सैकड़ों लोग जो उसके चक्कर में फंसे हैंवे मुक्त हो जाएं।
गरीब किसानगरीब मजदूरगरीब लोगविधवा औरतेंबीमार आदमीवे सब उससे ब्याज पर रुपया ले लेते हैं। फिर वह कभी चुकता नहीं। उनकी चीजें भी चुक जाती हैं और उन पर अदालत में मुकदमे भी चलते हैंसजाएं भी हो जाती हैं। रोज यही काम। वह कई बार सोचता हैकोई इसकी गरदन क्यों नहीं दबा देता! और बहुत बार उसके हाथ खुद भिंच जाते हैं कि गरदन दबा दूं। फिर वह सोचता है कि मुझे क्या मतलबऔर मैं क्यों दबाऊंऔर मेरा क्या बिगाड़ा हैफिर वह बात भूल जाता है। फिर ऐसे वर्षों चलता रहा।
फिर एक दिन उसे भी फीस भरनी है और घर से पैसे नहीं आए। तो वह अपनी घड़ी रखने उस बुढ़िया के पास गया। सांझ का वक्त हैउसने घड़ी बुढ़िया को दी। बुढ़िया ठीक से देख नहीं सकतीसत्तर साल उसकी उम्र है। वह खिड़की के पास घड़ी को ले जाकर देखती है रोशनी में कि ठीक है या नहींकितने पैसे दिए जा सकते हैं। अचानक बस रोसकोलनिकोव को क्या हुआ कि उसने जाकर उसकी गरदन दबा दी। उसे पता ही नहीं चलाकब यह हुआ। गरदन जब दब गई और जब उसके हाथ में उसकी नसें उभर आईंऔर खून उसके मुंह से गिरने लगातब वह घबड़ाया कि यह मैंने क्या कर दिया! वह बुढ़िया नीचे गिर पड़ी। तब उसे पता चलायह तो मैंने हत्या कर दी! तब वह भागा। और तब वह रातभर अपने बिस्तर में सोचता है कि मैं उसकी हत्या कैसे कर दिया! परवश। जो अर्जुन कह रहा है कि जैसे बलात कोई धक्का दे...। तो वह कहता हैकौन मेरे ऊपर सवार हो गया! कोई भूतकोई प्रेत! क्या हुआमैंने हत्या क्यों कर दीकिसने मुझसे हत्या करवा दीयह कौन शैतान मेरे पीछे पड़ा है?
कोई उसके पीछे नहीं पड़ा है। दो साल तक उसने सोचातैयारी की। दो साल तक उसने शक्तियों को रस दियादो साल तक हाथ भींचेदो साल तक मन में क्रोध का जहर फैलाया। वह सब तैयार हो गया।
बीज बोते वक्त किसको पता चलता है कि वृक्ष निकलेगाबीज बोते वक्त किसको पता चलता है कि इतना बड़ा वृक्ष पैदा होगाफिर बलात वृक्ष पैदा हो जाता है। और बीज हम ही बोते हैं। बीज छोटा होता हैदिखाई भी नहीं पड़ता है। मन में क्रोध के बीज बोते हैंकाम के बीज बोते हैंफिर शक्तियां पकड़ लेती हैं। फिर वे तीन शक्तियां अपना काम शुरू कर देती हैं। आपने बीज बोयाजमीन काम शुरू कर देती हैपानी काम शुरू कर देता हैरोशनी काम शुरू कर देती है। सूरज की किरणें आकर बीज को बड़ा करने लगती हैं।
आप हैरान होंगे कि जमीन बहुत कम काम करती है। अभी एक वैज्ञानिक ने प्रयोग कियानापत्तौलकर प्रयोग किया। एक बट वृक्ष को लगाया एक गमले मेंबड़े गमले मेंनापत्तौलकर बिलकुल। इतनी मिट्टीइतना गमले का वजन,इतने वृक्ष के बीज का वजनसब नापत्तौलकर लगाया। फिर वृक्ष बहुत बड़ा हो गया। फिर उसने वृक्ष पूरा का पूरा निकाल लिया और फिर नापा। तो जितना कोई दो सौ सेर का गमला उसने रखा थाउसमें केवल चार सेर की कमी हुई। चार सेर कुल! और वृक्ष को नापात्तौलातो वह तो कोई दो सौ अस्सी सेर निकला वृक्ष। और कुल चार सेर की कमी हुई मिट्टी में। और उस वैज्ञानिक का खयाल है कि वे चार सेर भी वृक्ष ने नहीं लिए। वह भीहवा भी आती है,तूफान भी आता हैमिट्टी उड़ भी जाती हैपानी में बह भी जाती है। चार सेर! इतना बड़ा वृक्ष कहां से आ गया?सूरज भी दे रहा हैहवाएं भी दे रही हैंपानी भी दे रहा हैजमीन भी दे रही हैचारों तरफ से पूरा कास्मास उसको दे रहा है।
एक छोटे-से बीज को आपने बो दियाफिर सारी दुनिया की ताकत उसको दे रही है और वह बड़ा हो रहा है। आपने इधर क्रोध का बीज बोयासारी दुनिया से क्रोध को साथ देने वाली ताकतें--तमस कीइनरशिया की ताकतें--आपकी तरफ बहनी शुरू हो जाएंगी। आपने प्रेम बोयासारी तरफ से दुनिया से शुभ शक्तियां आपकी तरफ बहनी शुरू हो जाएंगी। आपने साक्षीभाव निर्मित कियादुनिया की सारी ताकतें आपके लिए बैलेंस में हो जाएंगी। कोई आपकी तरफ नहीं बहेगाकोई आपके बाहर नहीं बहेगासब चीजें सम हो जाएंगीठहर जाएंगी।
कृष्ण कहते हैंन तो कोई शैतानन कोई परमात्माये तीन शक्तियां हैं अर्जुन। और तू जिसका बीज बो देता है अपने भीतरवही शक्ति सक्रिय होकर काम करने लगती है।


प्रश्न: भगवान श्रीतीनों गुणों से चलने वाली सृष्टि ईश्वर ने बनाई। तमस गुण मनुष्य की प्रकृति में ईश्वर ने दिया,उसके पीछे क्या उद्देश्य ईश्वर का है?


ईश्वर का कोई उद्देश्य नहीं होता। उद्देश्य की भाषा सदा मनुष्य की है। उद्देश्य तो उसका होता हैजिसे भविष्य में कुछ पाना हो। जैसे एक आदमीएक कुम्हार एक घड़ा बनाता है। उसका उद्देश्य होता है कि बाजार में बेचना है या उसका उद्देश्य होता है कि घर का पानी भरना। फिर एक वानगाग चित्र बनाता है। वानगाग से कोई पूछता है कि यह चित्र तुमने किस उद्देश्य से बनाया हैतो वह कहता हैकोई उद्देश्य नहीं है। बनाना ही मेरा आनंद है। आप कहेंगे,बाजार में बिक सकता है। वानगाग का एक चित्र नहीं बिकाएक चित्र जिंदा रहते नहीं बिका। आप कह सकते हैं कि कोई प्रतिष्ठा मिलती होगीकोई सम्मान करता होगा कि बड़े चित्रकार हो। किसी ने प्रतिष्ठा नहीं कीकिसी ने सम्मान नहीं किया। आप कहते होंगे कि बड़ा धन वाला आदमी रहा होगापैसा पास में रहा होगाफुर्सत रही होगीतो कुछ न कुछ करता रहा होगा। नहींवानगाग बहुत गरीब आदमी था। और उसका भाई उसे इतना ही पैसा देता थाजिसमें सात दिन की सिर्फ रोटी चल जाए रूखी-सूखी। न रंग के लिए पैसेन कागज के लिएन कैनवास के लिए। तो वह सप्ताह में चार दिन खाना खाता और तीन दिन उपवास करता। और तीन दिन में उपवास में जो बच जाएउससे पेंट करता। और जब उससे कोई पूछताकिसलिएतो वह कहताबसबना लेने में आनंद है।
परमात्मा उद्देश्य से जगत को नहीं बना रहा हैबना लेने में आनंद हैबनाना ही आनंद है। आगे-पीछे कुछ भी उद्देश्य नहींपरपजलेस। और ध्यान रहेआनंद हमेशा ही परपजलेस होता है। एक मां अपने बेटे को बड़ा कर रही है,उससे पूछेंकिसलिएअगर वह कहे कि बाद में नौकरी करवानी हैतो समझना मां नहीं हैकोई फैक्टरी है। अगर मां हैतो वह कहेगीकिसलिएकैसा गलत सवाल पूछते हो! बसमेरा आनंद है।
परमात्मा के लिए सृष्टि आनंद हैउसका आनंद-कृत्य हैइसलिए उद्देश्य तो कोई नहीं है। हांलेकिन यह सवाल फिर भी संगत है कि वह आदमी में तमस क्यों रखता है?
असल में हम तमस शब्द को सदा ही गलत अर्थों में लेते रहे हैं। हम समझते हैंतमस कोई बुरी चीज है। तमस बुरी नहीं हैतमस अपने आप में बुरी चीज नहीं है। हांतमस में ही पूरी तरह भर जाना बुरा है। तमस अपने आप में बुरा नहीं हैजहर भी अपने आप में बुरा नहीं हैऔर कभी तो बीमारी में दवा का काम करता है। हम कहें कि जहर क्यों बनाया परमात्मा ने! एक आदमी जहर खाकर मर जाए। आप कहेंगे कि जिम्मेदार परमात्मा है। जहर क्यों बनायान बनाता परमात्मान यह आदमी खाता।
लेकिन जहर अपने आप में किसी को मारता नहीं। जहर तो जिला भी सकता है। लेकिन इस आदमी ने जहर ही जहर खा लियातो मर गया। अमृत भी खा लो ज्यादा मात्रा मेंतो मौत घटित हो सकती है। अमृत भी मात्रा में ही खाना,अगर मिल जाए! एक तो मिलता नहींक्योंकि डर यही है कि जहर तो बहुत कम लोग खाते हैंअमृत अगर मिल जाएतो बिना मात्रा में बहुत लोग खा जाएंगे। शायद इसीलिए नहीं मिलता है! क्योंकि रोकेंगे कैसे फिर अमृत मिल जाएतो आप अपने को कि अब कहां रुकेंखाते ही चले जाएंगे। अमृत से मौत आ जाएगी।
जीवन में नियम हैं। कोई नियम बुरा नहींकोई नियम भला नहींअनिवार्य हैं। बिना तमस केबिना इनरशिया के जगत अस्तित्व में नहीं हो सकता। उसके अस्तित्व में होने के लिए कोई अवरोधक शक्ति चाहिए। लेकिन अगर कोई आदमी सिर्फ अवरोधक शक्ति पर ही निर्भर रह जाएतो भी खतरा हो जाएगाक्योंकि दूसरी दो शक्तियां भी चाहिए। और श्रेष्ठतम स्वास्थ्य की स्थिति वह हैजहां तीनों शक्तियां बैलेंस करती हैंसंतुलित होती हैं। उसी क्षण में आदमी तीनों के बाहर निकल जाता है और परमात्मा को अनुभव कर पाता है। जब तक आदमी इधर-उधर डोलता है...।
कभी आपने देखा है नट कोरस्सी पर चलता हैकभी थिर नहीं रहता। आप कहें कि थिर क्यों नहीं रहताथिर रहे--थिर रहेतो फौरन गिरे और मर जाए। थिर क्यों नहीं रहता है नटनट पूरे वक्त बैलेंस करता रहता है। और जब आपको दिखता हैअब बाएं झुक रहा हैतो आप गलती में मत पड़ जाना। बाएं झुकता ही तब हैजब दाएं गिरने का डर पैदा होता है। दाएं तब झुकता हैजब बाएं गिरने का डर पैदा होता है। वह बैलेंस कर रहा है पूरे वक्त। जब दाएं गिरने का डर पैदा होता हैवह वजन को बाएं ले जाता हैताकि बैलेंस हो जाए। जब दाएं से बच जाता हैबाएं गिरने का डर पैदा होता हैतब उलटी तरफ बैलेंस ले जाता है कि बच जाए। और प्रकृति नीचे काम कर रही है। नट अगर बैलेंस न करेतो जमीन पर गिरेहड्डी-पसली टूट जाए। फिर प्रकृति से यह नहीं कह सकता कि तूने मेरी हड्डी-पसली तोड़ी! प्रकृति कहेगीहमें कोई मतलब नहींतुम अपनी रस्सी पर बैलेंस करते रहोहमें कोई मतलब नहीं।
ये तीन जो गुण हैंइनमें जो बैलेंस कर लेता हैवह व्यक्ति धर्म को उपलब्ध हो जाता है। नहीं बैलेंस कर पातातो गिरता हैहड्डी-पसली टूट जाती है। फिर हम कहते हैंकिसने बलात गिरा दिया! किसी ने नहीं गिरायाआप बैलेंस नहीं कर पाए।
कृष्ण का पूरा योग समतायोग हैदि योग आफ बैलेंस। बसनट की तरह पूरे वक्त जिंदगी एक बैलेंस हैएक संतुलन हैसदासदा संतुलन है। ज्यादा खा लियातो उपवास करोज्यादा उपवास कर लियातो ग्लूकोस के इंजेक्शन लो! बसबैलेंस पूरे वक्त। पूरे समय जिंदगी एक बहुत बारीक संतुलन हैडेलिकेट बैलेंस है। उसमें जरा इधर-उधर हुए कि आप गए। प्रकृति अपना काम करती रहेगी। वह नीचे खड़ी है। वह कह रही है कि नटजब तक तुम बैलेंस करोरहो ऊपरजब न कर पाओनीचे आ जाओ। हम तैयार हैं।
अनिवार्य तत्व हैं तीनउससे कम नहीं हो सकते। तीन के बिना सृष्टि खो जाएगीइसलिए वे हैं। लेकिन तमस में आप गिरेंइसलिए नहीं। आप तमस के द्वारा रजस को साधते रहें। जब तमस बढ़ जाएतो रजस की तरफ झुक जाएं। जब रजस बढ़ जाएतो तमस की तरफ झुक जाएं। दोनों को साधते रहें। और जब दोनों बिलकुल सध जाएंतो आपकी वर्टिकल यात्रा सत्व की तरफ शुरू होगी। फिर तीनों के बीच साधना पड़ेगा। वह और भी गहरी कीमिया है। दो के बीच साधना बहुत आसान है। दो के बीच साधेंगेतो सत्व में उठ जाएंगे।
साधु उसे कहते हैंजो सत्व में पहुंच गया हैजिसने दो को साध लिया। जो तमस और रजस के बीच संतुलित हो गयाउसका नाम साधु है। जो रजसतमस और सत्व तीनों के बीच सध गयाउसका नाम संत है। वह बहुत अलग बात है। जब तीनों के बीच कोई साधता हैतो सेंटर पर पहुंच जाता है ट्राएंगल के। वह सेंटर ही द्वार है ट्राएंगल का। तीन शक्तियों के बीच में वह स्पेस हैखाली जगह हैजहां से व्यक्ति परमात्मा मेंब्रह्म में प्रवेश कर जाता है।
लेकिन यह धीरे-धीरे हम बात करेंगेतो खयाल में आएगी। पहले साधु बनेंदो के बीच साधें। फिर संत बनेंतीन के बीच साधें। और जिस दिन तीन के बीच सधाउस दिन बनना बंद हो जाता हैउसी दिन परमात्मा में प्रवेश हो जाता है। उस दिन प्रकृति के तीनों गुणों के बाहर आदमी हो जाता है।
इसलिए प्रकृति है त्रिगुणा और परमात्मा है त्रिगुणातीतवह तीनों के बाहर है।
शेष कल बात करेंगे।

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