शनिवार, 3 सितंबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-018

विषाद की खाई से ब्राह्मी-स्थिति के शिखर तक
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।। ६५।।
उस निर्मलता के होने पर इसके संपूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है।

विक्षेपरहित चित्त में शुद्ध अंतःकरण फलित होता हैया शुद्ध अंतःकरण विक्षेपरहित चित्त बन जाता हैकृष्ण जो कह रहे हैंवह हमारी साधारण साधना की समझ के बिलकुल विपरीत है। साधारणतः हम सोचते हैं कि विक्षेप अलग होंतो अंतःकरण शुद्ध होगा। कृष्ण कह रहे हैंअंतःकरण शुद्ध होतो विक्षेप अलग हो जाते हैं।
यह बात ठीक से न समझी जाएतो बड़ी भ्रांतियां जन्मों-जन्मों के व्यर्थ के चक्कर में ले जा सकती हैं। ठीक से काज और इफेक्टक्या कारण बनता है और क्या परिणामइसे समझ लेना ही विज्ञान है। बाहर के जगत में भीभीतर के जगत में भी। जो कार्य-कारण की व्यवस्था को ठीक से नहीं समझ पाता और कार्यों को कारण समझ लेता है और कारणों को कार्य बना लेता हैवह अपने हाथ से हीअपने हाथ से ही अपने को गलत करता है।
वह अपने हाथ से ही अपने को अनबन करता है।
किसान गेहूं बोता हैतो फसल आती है। गेहूं के साथ भूसा भी आता है। लेकिन भूसे को अगर बो दिया जाएतो भूसे के साथ गेहूं नहीं आता। ऐसे किसान सोच सकता है कि जब गेहूं के साथ भूसा आता हैतो उलटा क्यों नहीं हो सकता है! भूसे को बो देंतो गेहूं साथ आ जाए--वाइस-वरसा क्यों नहीं हो सकतालेकिन भूसा बोने से सिर्फ भूसा सड़ जाएगागेहूं तो आएगा ही नहींहाथ का भूसा भी जाएगा। भूसा आता है गेहूं के साथगेहूं भूसे के साथ नहीं आता है।
अंतःकरण शुद्ध होतो चित्त के विक्षेप सब खो जाते हैंविक्षिप्तता खो जाती है। लेकिन चित्त की विक्षिप्तता को कोई खोने में लग जाएतो अंतःकरण तो शुद्ध होता नहींचित्त की विक्षिप्तता और बढ़ जाती है।
जो आदमी अशांत हैअगर वह शांत होने की चेष्टा में और लग जाएतो अशांति सिर्फ दुगुनी हो जाती है। अशांति तो होती ही हैअब शांत न होने की अशांति भी पीड़ा देती है। लेकिन अंतःकरण कैसे शुद्ध हो जाएपूछा जा सकता है कि अंतःकरण शुद्ध कैसे हो जाएगाजब तक विचार आ रहेविक्षेप आ रहेविक्षिप्तता आ रहीविकृतियां आ रहीं,तब तक अंतःकरण शुद्ध कैसे हो जाएगाकृष्ण अंतःकरण शुद्ध होने को पहले रखते हैंपर वह होगा कैसे?
यहां सांख्य का जो गहरा से गहरा सूत्र हैवह आपको स्मरण दिलाना जरूरी है। सांख्य का गहरा से गहरा सूत्र यह है कि अंतःकरण शुद्ध है ही। कैसे हो जाएगायह पूछता ही वह हैजिसे अंतःकरण का पता नहीं है। जो पूछता हैकैसे हो जाएगा शुद्धउसने एक बात तो मान ली कि अंतःकरण अशुद्ध है।
आपने अंतःकरण को कभी जाना हैबिना जाने मान रहे हैं कि अंतःकरण अशुद्ध है और उसको शुद्ध करने में लगे हैं। अगर अंतःकरण अशुद्ध नहीं हैतो आपके शुद्ध करने की सारी चेष्टा व्यर्थ ही हो रही है। और यह चेष्टा जितनी असफल होगी--सफल तो हो नहीं सकतीक्योंकि जो शुद्ध हैवह शुद्ध किया नहीं जा सकतालेकिन जो शुद्ध है,उसे शुद्ध करने की चेष्टा असफल होगी--असफलता दुख लाएगीअसफलता विषाद लाएगीअसफलता दीनता-हीनता लाएगीअसफलता हारापनफ्रस्ट्रेशन लाएगी। और बार-बार असफल होकर आप यह कहेंगेअंतःकरण शुद्ध नहीं होता,अशुद्धि बहुत गहरी है। आप जो निष्कर्ष निकालेंगेनिष्पत्ति निकालेंगेवह बिलकुल ही उलटी होगी।
एक घर में अंधेरा है। तलवारें लेकर हम घर में घुस जाएं और अंधेरे को बाहर निकालने की कोशिश करें। तलवारें चलाएंअंधेरे को काटें-पीटें। अंधेरा बाहर नहीं निकलेगा। थक जाएंगेहार जाएंगेजिंदगी गंवा देंगेअंधेरा बाहर नहीं निकलेगा। क्योंतो शायद सारी मेहनत करने के बाद हम बैठकर सोचें कि अंधेरा बहुत शक्तिशाली हैइसलिए बाहर नहीं निकलता।
तर्क अनेक बार ऐसे गलत निष्कर्षों में ले जाता हैजो ठीक दिखाई पड़ते हैंयही उनका खतरा है। अब यह बिलकुल ठीक दिखाई पड़ता है कि इतनी मेहनत की और अंधेरा नहीं निकलातो इसका मतलब साफ है कि मेहनत कम पड़ रही हैअंधेरा ज्यादा शक्तिशाली है। सचाई उलटी है। अगर अंधेरा शक्तिशाली होतब तो किसी तरह उसे निकाला जा सकता है। शक्ति को निकालने के लिए बड़ी शक्ति ईजाद की जा सकती है।
अंधेरा है ही नहींयही उसकी शक्ति है। वह है ही नहींइसलिए आप उसको शक्ति से निकाल नहीं सकते। वह नान- एक्झिस्टेंशियल हैउसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। और जिसका अस्तित्व नहीं हैउसे तलवार से न काटा जा सकता हैन धक्के से निकाला जा सकता है। असल में अंधेरा सिर्फ एब्सेंस है किसी चीज कीअंधेरा अपने में कुछ भी नहीं है। अंधेरा सिर्फ अनुपस्थिति है प्रकाश कीबस।
इसलिए आप अंधेरे के साथ सीधा कुछ भी नहीं कर सकते हैं। और अंधेरे के साथ कुछ भी करना होतो प्रकाश के साथ कुछ करना पड़ता है। प्रकाश जलाएंतो अंधेरा नहीं होता। प्रकाश बुझाएंतो अंधेरा हो जाता है। सीधा अंधेरे के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता हैक्योंकि अंधेरा नहीं है। और जो नहीं हैउसके साथ जो सीधा कुछ करने में लग जाएगावह अपने जीवन को ऐसे उलझाव में डाल देता हैजिसके बाहर कोई भी मार्ग नहीं होता। वह एब्सर्डिटी में पड़ जाता है।
अंतःकरण अगर शुद्ध हैतो अंतःकरण को शुद्ध करने की सब चेष्टा खतरनाक हैअंधेरे को निकालने जैसी चेष्टा है। क्योंकि जो नहीं है अशुद्धिउसे निकालेंगे कैसेसांख्य कहता हैअंतःकरण अशुद्ध नहीं है। और अगर अंतःकरण भी अशुद्ध हो सकता हैतो इस जगत में फिर शुद्धि का कोई उपाय नहीं है। फिर शुद्ध कौन करेगाक्योंकि जो शुद्ध कर सकता थावह अशुद्ध हो गया है।
अंतःकरण अशुद्ध नहीं है। अगर ठीक से समझेंतो अंतःकरण ही शुद्धि है--दि वेरी प्योरीफिकेशनदि वेरी प्योरिटी। अंतःकरण शुद्ध ही है। लेकिन अंतःकरण का हमें कोई पता नहीं है कि क्या है। आप किस चीज को अंतःकरण जानते हैं?
अंग्रेजी में एक शब्द हैकांशिएंस। और गीता के जिन्होंने भी अनुवाद किए हैंउन्होंने अंतःकरण का अर्थ कांशिएंस किया है। उससे गलत कोई अनुवाद नहीं हो सकता। कांशिएंस अंतःकरण नहीं है। कांशिएंस अंतःकरण का धोखा है। इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी होगाक्योंकि वह बहुत गहरेरूट्स में बैठ गई भ्रांति है सारे जगत में।
जहां भी गीता पढ़ी जाती हैवहां अंतःकरण का अर्थ कांशिएंस कर लिया जाता है। हम भी अंतःकरण से जो मतलब लेते हैंवह क्या हैआप चोरी करने जा रहे हैं। भीतर से कोई कहता हैचोरी मत करोचोरी बुरी है। आप कहते हैं,अंतःकरण बोल रहा है। यह कांशिएंस हैअंतःकरण नहीं। यह सिर्फ समाज के द्वारा डाली गई धारणा हैअंतःकरण नहीं। क्योंकि अगर समाज चोरों का होतो ऐसा नहीं होगा। ऐसे समाज हैं।
जाट हैं। तो जाट लड़के की शादी नहीं होतीजब तक वह दो-चार चोरियां न कर ले। जाट का लड़का जब चोरी करने जाता हैतो कभी उसके मन में नहीं आता कि बुरा कर रहा है। अंतःकरण उसके पास भी हैआपके पास ही नहीं है। लेकिन सोशल जो बिल्ट-इन आपके भीतर डाली गई धारणा हैवह उसके पास नहीं है।
मेरे एक मित्र पख्तून इलाके में घूमने गए थे। तो पेशावर में उन्हें मित्रों ने कहा कि पख्तून इलाके में जा रहे हैंजरा सम्हलकर बैठना। जीप तो ले जा रहे हैंलेकिन होशियारी रखना। उन्होंने कहाक्याखतरा क्या हैहमारे पास कुछ है नहीं लूटने को। उन्होंने कहा कि नहींयह खतरा नहीं है। खतरा यह है कि पख्तून लड़के अक्सर सड़कों पर निशाना सीखने के लिए लोगों को गोली मार देते हैं--निशाना सीखने के लिएदुश्मन को नहीं! पख्तून लड़के निशाना सीखने के लिए सड़क के किनारे से चलती हुई कार में गोली मारकर देखते हैं कि निशाना लगा कि नहीं। मित्र तो बहुत घबड़ा गए। उन्होंने कहा कि आप क्या कहते हैंनिशाना लगाने के लिए! तो क्या उनके पास कोई अंतःकरण नहीं है?
अंतःकरण तो पख्तून के पास भी है। अंतःकरण किसी की बपौती नहीं है। लेकिन पख्तून के पासजिसको हिंसा-अहिंसा का सामाजिक बोध कहते हैंउसे डालने का कोई बचपन से प्रयास नहीं किया गया है।
एक हिंदू को कहें कि चचेरी बहन से शादी कर लेतो उसका अंतःकरण इनकार करता हैमुसलमान का नहीं करता। कारण यह नहीं है कि मुसलमान के पास अंतःकरण नहीं है। सिर्फ चचेरी बहन से शादी करने की धारणा का भेद है। वह समाज देता है। वह अंतःकरण नहीं है।
समाज ने एक इंतजाम किया हैबाहर अदालत बनाई है और भीतर भी एक अदालत बनाई है। समाज ने पुख्ता इंतजाम किया है कि बाहर से वह कहता है कि चोरी करना बुरा हैवहां पुलिस हैअदालत है। लेकिन इतना काफी नहीं हैक्योंकि भीतर भी एक पुलिसवाला होना चाहिएजो पूरे वक्त कहता रहे कि चोरी करना बुरा है। क्योंकि बाहर के पुलिसवाले को धोखा दिया जा सकता है। उस हालत में भीतर का पुलिसवाला काम पड़ सकता है।
कांशिएंस अंग्रेजी का जो शब्द हैउसको हमें कहना चाहिए अंतस-चेतनअंतःकरण नहीं। सांख्य का अंतःकरणबात ही और है। अंतःकरण को अगर अंग्रेजी में अनुवादित करना होतो कांशिएंस शब्द नहीं है। अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है ठीक। क्योंकि अंतःकरण का मतलब होता हैदि इनरमोस्ट इंस्ट्रूमेंटअंतरतम उपकरणअंतरतम--जहां तक अंतस में जाया जा सकता है भीतर--वह जो आखिरी है भीतरवही अंतःकरण है। इसका मतलब क्या हुआइसका मतलब आत्मा नहीं।
अब यह बड़े मजे की बात हैअंतःकरण का मतलब आत्मा नहीं है। क्योंकि आत्मा तो वह हैजो बाहर और भीतर दोनों में नहीं हैदोनों के बाहर है। अंतःकरण वह हैआत्मा के निकटतम जो उपकरण हैजिसके द्वारा हम बाहर से जुड़ते हैं।
समझ लें कि आत्मा के पास एक दर्पण हैजिसमें आत्मा प्रतिफलित होती हैवह अंतःकरण हैनिकटतम। आत्मा में पहुंचने के लिए अंतःकरण आखिरी सीढ़ी है। और अंतःकरण आत्मा के इतने निकट है कि अशुद्ध नहीं हो सकता। आत्मा की यह निकटता ही उसकी शुद्धि है।
यह अंतःकरण कांशिएंस नहीं हैजो हमारे भीतरजब हम सड़क पर चलते हैं और बाएं न चलकर दाएं चल रहे होंतो भीतर से कोई कहता है कि दाएं चलना ठीक नहीं हैबाएं चलना ठीक है। यह अंतःकरण नहीं है। यह केवल सामाजिक आंतरिक व्यवस्था है। यह अंतस-चेतन हैजो समाज ने इंतजाम किया हैताकि आपको व्यवस्था और अनुशासन दिया जा सके।
समाज अलग होते हैंव्यवस्था अलग हो जाती है। अमेरिका में चलते हैंतो बाएं चलने की जरूरत नहीं है। वहां अंतःकरण-- जिसको हम अंतःकरण कहते हैं--वह कहता हैदाएं चलोबाएं मत चलना। क्योंकि नियम बाएं चलने का नहीं हैदाएं चलने का है। सामाजिक व्यवस्था की जो आंतरिक धारणाएं हैंवे अंतःकरण नहीं हैं।
तो अंतःकरण का हमें पता ही नहीं हैइसका मतलब यह हुआ। हम जिसे अंतःकरण समझ रहे हैंवह बिलकुल ही भ्रांत है। अंतःकरण नैतिक धारणा का नाम नहीं हैअंतःकरण मारैलिटी नहीं है। क्योंकि मारैलिटी हजार तरह की होती हैंअंतःकरण एक ही तरह का होता है। हिंदू की नैतिकता अलग हैमुसलमान की नैतिकता अलगजैन की नैतिकता अलगईसाई की नैतिकता अलगअफ्रीकन की अलगचीनी की अलग। नैतिकताएं हजार हैंअंतःकरण एक है।
अंतःकरण शुद्ध ही है। आत्मा के इतने निकट रहकर कोई चीज अशुद्ध नहीं हो सकती। जितनी दूर होती है आत्मा सेउतनी अशुद्ध की संभावना बढ़ती है। अगर ठीक से समझेंमोर दि डिस्टेंसमोर दि इंप्योरिटी। जैसे एक दीया जल रहा है यहांदीए की बत्ती जल रही है। बत्ती के बिलकुल पास रोशनी का वर्तुल हैवह शुद्धतम है। फिर बत्ती की रोशनी आगे गईफिर धूल हैहवा हैऔर रोशनी अशुद्ध हुई। फिर और दूर गईफिर और अशुद्ध हुईफिर और दूर गईफिर और अशुद्ध हुई। और थोड़ी दूर जाकर हम देखते हैं कि रोशनी नहीं हैअंधेरा है। एक-एक कदम रोशनी जा रही है और अंधेरे में डूबती जा रही है।
शरीर तक आते-आते सब चीजें अशुद्ध हो जाती हैंआत्मा तक जाते-जाते सब शुद्ध हो जाती हैं। शरीर के निकटतम इंद्रियां हैं। इंद्रियों के निकटतम अंतस-इंद्रियां हैं। अंतस-इंद्रियों के निकटतम स्मृति है। स्मृति के निकटतम बुद्धि है--प्रायोगिक। प्रायोगिकएप्लाइड इंटलेक्ट के निकटतम अप्रायोगिक बुद्धि है। अप्रायोगिक बुद्धि के नीचे अंतःकरण है। अंतःकरण के नीचे आत्मा है। आत्मा के नीचे परमात्मा है।
ऐसा अगर खयाल में आ जाएतो सांख्य कहता है कि अंतःकरण शुद्ध ही है। वह कभी अशुद्ध हुआ नहीं। लेकिन हमने अंतःकरण को जाना नहीं हैइसलिए लोग पूछतेअंतःकरण कैसे शुद्ध होअंतःकरण शुद्ध नहीं किया जा सकता। करेगा कौनऔर जो शुद्ध है हीवह शुद्ध कैसे किया जा सकता हैपर जाना जा सकता है कि शुद्ध है। कैसे जाना जा सकता है?
एक ही रास्ता है--पीछे हटेंपीछे हटेंअपने को पीछे हटाएंअपनी चेतना को सिकोड़ेंजैसे कछुआ अपने अंगों को सिकोड़ लेता है। शरीर को भूलेंइंद्रियों को भूलें। छोड़ें बाहर की परिधि कोऔर भीतर चलें। अंतस-इंद्रियों को छोड़ें,और भीतर चलें। स्मृति को छोड़ेंऔर भीतर चलें। भीतर याद आ रही हैशब्द आ रहे हैंविचार आ रहे हैंस्मृति आ रही है। छोड़ेंकहें कि यह भी मैं नहीं हूं। कहें कि नेति-नेतियह भी मैं नहीं हूं। हैं भी नहींक्योंकि जो देख रहा है भीतर कि यह स्मृति से विचार आ रहा हैवह अन्य हैवह भिन्न हैवह पृथक है। जानें कि यह मैं नहीं हूं। आप मुझे दिखाई पड़ रहे हैं। निश्चित हीआप मुझे दिखाई पड़ रहे हैंपक्का हो गया कि मैं आप नहीं हूं। नहीं तो देखेगा कौन आपकोदेखने वाला और दिखाई पड़ने वाला भिन्न हैंदृश्य और द्रष्टा भिन्न हैं।
यह सांख्य का मौलिक साधना-सूत्र हैदृश्य और द्रष्टा भिन्न हैं। फिर सांख्य की सारी साधना इसी भिन्नता के ऊपर गहरे उतरती है। फिर सांख्य कहता हैजो भी चीज दिखाई पड़ने लगेसमझना कि इससे भिन्न हूं। भीतर से देखें,शरीर दिखाई पड़ता है। और भीतर देखेंहृदय की धड़कन सुनाई पड़ती है। आप भिन्न हैं। और भीतर देखेंविचार दिखाई पड़ते हैं। आप भिन्न हैं। और भीतर देखेंऔर भीतर देखेंसमाज की धारणाएं हैंचित्त पर बहुत सी परतें हैं--वे सब दिखाई पड़ती हैं। और उतरते जाएं। आखिर में उस जगह पहुंच जाते हैंजहां अंतःकरण हैसब शुद्धतम है। लेकिन शुद्धतमवह भी भिन्न हैवह भी अलग है। इसीलिए उसको आत्मा नहीं कहाउसको भी अंतःकरण कहा। क्योंकि आत्मा उस शुद्धतम के भी पार है। शुद्धतम का अनुभव कैसे होगाआपको अशुद्धतम का अनुभव कैसे होता है?
कोई मुझसे आकर पूछता हैशुद्ध का हम अनुभव कैसे करेंगेतो उसको मैं कहता हूं कि तुम बगीचे की तरफ चले। अभी बगीचा नहीं आयालेकिन ठंडी हवा मालूम होने लगी। तुम्हें कैसे पता चल जाता है कि ठीक चल रहे हैंक्योंकि ठंडी हवा मालूम होने लगी। फिर तुम और बढ़ते होसुगंध भी आने लगीतब तुम जानते हो कि और निकट है बगीचा। अभी बगीचा आ नहीं गया है। शायद अभी दिखाई भी नहीं पड़ रहा हो। और निकट बढ़ते होअब हरियाली दिखाई भी पड़ने लगी। अब बगीचा और निकट आ गया है। अभी फिर भी हम बगीचे में नहीं पहुंच गए हैं। फिर हम बगीचे के बिलकुल द्वार पर खड़े हो गए। सुगंध हैशीतलता हैहरियाली हैचारों तरफ शांति और सन्नाटा और एक वेल बीइंगएक स्वास्थ्य का भाव घेर लेता है।
ऐसे ही जब कोई भीतर जाता हैतो आत्मा के जितने निकट पहुंचता हैउतना ही शांतउतना ही मौनउतना ही प्रफुल्लितउतना ही प्रसन्नउतना ही शीतल होने लगता है। जैसे-जैसे भीतर चलता हैउतना ही प्रकाशितउतना ही आलोक से भरने लगता है। जैसे-जैसे भीतर चलने लगता हैकदम-कदम भीतर सरकता हैकहता हैयह भी नहींयह भी नहींयह भी नहीं। पहचानता हैरिकग्नाइज करता है--यह भी नहीं। यह दृश्य हो गयातो मैं नहीं हूं। मैं तो वहां तक चलूंगाजहां सिर्फ द्रष्टा रह जाए। तो द्रष्टा जब अंत में रह जाएउसके पहले जो मिलता हैवह अंतःकरण है। अंतःकरण जो हैवह अंतर्यात्रा का आखिरी पड़ाव है। आखिरी पड़ावमंजिल नहीं। मंजिल उसके बाद है।
यह अंतःकरण शुद्ध ही हैइसीलिए सांख्य की बात कठिन है। कोई हमें समझाए कि शुद्ध कैसे होतो समझ में आता है। सांख्य कहता हैतुम शुद्ध हो ही। तुम कभी गए ही नहीं वहां तक जाननेजहां शुद्धि है। तुम बाहर ही बाहर घूम रहे हो घर के। तुम कभी घर के भीतर गए ही नहीं। घर के गर्भ में परम शुद्धि का वास है। उस परम शुद्धि के बीच आत्मा और उस आत्मा के भी बीच परमात्मा है। पर वहां गए ही नहीं हम कभी। घर के बाहर घूम रहे हैं। और घर के बाहर की गंदगी है।
एक आदमी घर के बाहर घूम रहा है और सड़क पर गंदगी पड़ी है। वह कहता है इस गंदगी को देखकर कि मेरे घर के अंदर भी सब गंदा होगाउसको मैं कैसे शुद्ध करूंहम उसे कहते हैंयह गंदगी घर के बाहर है। तुम घर के भीतर चलोवहां कोई गंदगी नहीं है। तुम इस गंदगी से आब्सेस्ड मत हो जाओ। यह घर के बाहर होने की वजह से है। यहां तक वह शुद्धि की धारा नहीं पहुंच पाती हैमाध्यमों में विकृत हो जाती हैअनेक माध्यमों में विकृत हो जाती है। अंदर चलोभीतर चलोगो बैकवापस लौटो।
तो कृष्ण कह रहे हैंअंतःकरण शुद्ध होता हैऐसा जिस दिन जाना जाता हैउसी दिन चित्त के सब विक्षेपचित्त की सारी विक्षिप्तता खो जाती है--खोनी नहीं पड़ती।
इसे ऐसा समझेंएक पहाड़ के किनारे एक खाई में हम बसे हैं। अंधेरा है बहुत। सीलन है। सब गंदा है। पहाड़ को घेरे हुए बादल घूमते हैं। वे वादी कोखाई को ढक लेते हैं। उनकी वजह से ऊपर का सूर्य भी दिखाई नहीं पड़ता। उनकी काली छायाएं डोलती हैं घाटी में और बड़ी भयानक मालूम होती हैं।
और एक आदमी शिखर पर खड़ा हैवह कहता हैतुम पहाड़ चढ़ो। लेकिन हम नीचे से पूछते हैं कि इन बादलों से छुटकारा कैसे होगाये काली छायाएं सारी घाटी को घेरे हुए हैंइनसे मुक्ति कैसे होगीवह आदमी कहता हैतुम इनकी फिक्र छोड़ोतुम पहाड़ चढ़ो। तुम उस जगह आ जाओगेजहां तुम पाओगे कि बदलियां नीचे रह गई हैं और तुम ऊपर हो गए हो। और जिस दिन तुम पाओगे कि बदलियां नीचे रह गई हैं और तुम ऊपर हो गए होउस दिन बदलियां तुम पर कोई छाया नहीं डालतीं।
बदलियां सिर्फ उन्हीं पर छायाएं डालती हैंजो बदलियों के नीचे हैं। बदलियां उन पर छाया नहीं डालतींजो बदलियों के ऊपर हैं। अगर कभी हवाई जहाज में आप उड़े हैंतो बदलियां फिर आप पर छाया नहीं डालतीं। बदलियों का वितान नीचे रह जाता हैआप ऊपर हो जाते हैं। लेकिन पृथ्वी पर बदलियां बहुत छाया डालती हैं।
मन के जो विक्षेप हैंविक्षिप्तताएं हैंविकार हैंवे बदलियों की तरह हैं। और हम पर छाया डालते हैंक्योंकि हम घाटियों में जीते हैं।
कृष्ण कहते हैंचलो अंतःकरण की शुद्धि की यात्रा पर। जब तुम अंतःकरण पर पहुंचोगेतब तुम हंसोगे कि ये बदलियांजो बड़ी पीड़ित करती थींअब ये नीचे छूट गई हैं। अब इनका कोई खयाल भी नहीं आताअब ये कोई छाया भी नहीं डालतीं। अब इनसे कोई संबंध ही नहीं है। अब सूरज आमने-सामने है। अब बीच में कोई बदलियों का वितान नहीं हैकोई जाल नहीं है।
विचार घाटियों के ऊपर बादलों की भांति हैं। जो अंतःकरण तक पहुंचता हैवह शिखर पर पहुंच जाता है। वहां सूर्य का प्रकट प्रकाश है। यह यात्रा हैयह शुद्धि नहीं है। यह यात्रा हैशुद्धि फल है। पता चलता है कि शुद्ध है।
कृष्ण कह रहे हैंअंतःकरण शुद्ध हैवहां चित्त का कोई विक्षेप नहीं है।


नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।। ६६।।
अयुक्त पुरुष के अंतःकरण में श्रेष्ठ बुद्धि नहीं होती है और उसके अंतःकरण में भावना भी नहीं होती है और बिना भावना वाले पुरुष को शांति भी नहीं होती है। फिर शांतिरहित पुरुष को सुख कैसे हो सकता है?


अयुक्त पुरुष को शांति नहीं। युक्त पुरुष को शांति है। अयुक्त पुरुष क्यायुक्त पुरुष क्याअयुक्त पुरुष को भावना नहींशांति नहींआनंद नहीं। यह युक्त और अयुक्त का क्या अर्थ है?
अयुक्त का अर्थ हैअपने से ही अलगअपने होने से ही दूर पड़ गयाअपने से ही बाहर पड़ गयाअपने से ही टूट गया--स्प्लिट।
लेकिन अपने से कोई कैसे टूट सकता हैअपने से कोई कैसे अयुक्त हो सकता हैअपने से टूटना तो असंभव है। अगर हम अपने से ही टूट जाएंइससे बड़ी असंभव बात कैसे हो सकती है! क्योंकि अपने का मतलब ही यह होता है कि अगर मैं अपने से ही टूट जाऊंतो मेरे दो अपने हो गए--एक जिससे मैं टूट गयाऔर एक जो मैं टूटकर हूं। अपने से टूटना हो नहीं सकता।
और अपने से जुड़ने का भी क्या मतलबअपने से युक्त होने का भी क्या मतलबजब टूट ही नहीं सकता हूं! तो फिर बात कहां है?
सच में कोई अपने से टूटता नहींलेकिन अपने से टूटता हैऐसा सोच सकता हैऐसा विचार सकता है। ऐसे भावऐसे सम्मोहन से भर सकता है कि मैं अपने से टूट गया हूं।
आप रात सोए। सपना देखा कि अहमदाबाद में नहींकलकत्ते में हूं। कलकत्ते में चले नहीं गए। ऐसे सोए-सोए कलकत्ता जाने का अभी तक कोई उपाय नहीं है। अपनी खाट पर अहमदाबाद में ही पड़े हैं। लेकिन स्वप्न देख रहे हैं कि कलकत्ता पहुंच गए। सुबह जल्दी काम है अहमदाबाद में। अब चित्त बड़ा घबड़ायायह तो कलकत्ता आ गए! सुबह काम है। अब वापस अहमदाबाद जाना है! अब सपने में लोगों से पूछ रहे हैं कि अहमदाबाद कैसे जाएं! ट्रेन पकड़ेंहवाई जहाज पकड़ेंबैलगाड़ी से जाएं। जल्दी पहुंचना हैसुबह काम है और यह रात गुजरी जाती है।
आपकी घबड़ाहट उचित हैअनुचित तो नहीं। अहमदाबाद में काम हैकलकत्ते में हैं। बीच में फासला बड़ा है। सुबह करीब आती जाती है। वाहन खोज रहे हैं। लेकिन क्या अहमदाबाद आने के लिए वाहन की जरूरत पड़ेगीक्योंकि अहमदाबाद से आप गए नहीं हैं क्षणभर को भीइंचभर को भी। न भी मिले वाहनतो जैसे ही नींद टूटेगीपाएंगे कि लौट आए। मिल जाएतो भी पाएंगे कि लौट आए। असल में गए ही नहीं हैंलौट आना शब्द ठीक नहीं है। सिर्फ गए के भ्रम में थे।
तो जब कृष्ण कहते हैंअयुक्त और युक्ततो वास्तविक फर्क नहीं है। कोई अयुक्त तो होता नहीं कभीसिर्फ अयुक्त होने के भ्रम में होता हैस्वप्न में होता है। सिर्फ एक ड्रीम क्रिएशन हैएक स्वप्न का भाव है कि अपने से अलग हो गया हूं। युक्त पुरुष वह हैजो इस स्वप्न से जाग गया और उसने देखा कि मैं तो अपने से कभी भी अलग नहीं हुआ हूं।
अयुक्त पुरुष में भावना नहीं होती। क्यों नहीं होतीभावना से मतलब आप मत समझ लेना आपकी भावनाक्योंकि हम सब अयुक्त पुरुष हैंहममें भावना बहुत है। इसलिए कृष्ण इस भावना की बात नहीं कर रहे होंगेजो हममें है।
एक आदमी कहता है कि भावना बहुत है। पत्नी मर गई हैरो रहा है। बेटा बीमार पड़ा हैआंसू गिरा रहा है। कहता हैभावना बहुत है। यह भावना नहीं हैयह फीलिंग नहीं हैयह सिर्फ सेंटिमेंटलिटी है। फर्क क्या हैअगर यह भावना नहीं हैसिर्फ भावना का धोखा हैतो फर्क क्या है?
एक आदमी रो रहा है अपने बेटे के पास बैठा हुआ--मेरा बेटा बीमार है और चिकित्सक कहते हैंबचेगा नहींमर जाएगा। रो रहा हैछाती पीट रहा है। उसके प्राणों पर बड़ा संकट है। तभी हवा का एक झोंका आता है और टेबल से एक कागज उड़कर उसके पैरों पर नीचे गिर जाता है। वह उसे यूं ही उठाकर देख लेता है। पाता है कि उसकी पत्नी को लिखा किसी का प्रेम-पत्र है। पता चलता है पत्र को पढ़कर कि बेटा अपना नहीं हैकिसी और से पैदा हुआ है। सब भावना विदा हो गई। कोई भावना न रही। दवाई की बोतलें हटा देता है। जहर की बोतलें रख देता है। रात एकांत में गरदन दबा देता है। वही आदमी जो उसे बचाने के लिए कह रहा थावही आदमी गरदन दबा देता है।
भावना का क्या हुआयह कैसी भावना थीयह भावना नहीं थी। यह मेरे के लिए भावना का मिथ्या भ्रम था। मेरा नहींतो बात समाप्त हो गई।
टाल्सटाय ने एक कहानी लिखी है। लिखा है कि एक आदमी का बेटा बहुत दिन से घर के बाहर चला गया। बाप ही क्रोधित हुआ थाइसलिए चला गया था। फिर बाप बूढ़ा होने लगा। बहुत परेशान था। अखबारों में खबर निकाली,संदेशवाहक भेजे। फिर उस बेटे का पत्र आ गया कि मैं आ रहा हूं। आपने बुलायातो मैं आता हूं। मैं फलां-फलां दिन,फलां-फलां ट्रेन से आ जाऊंगा।
स्टेशन दूर हैदेहात में रहता है बाप। अपनी बग्घी कसकर वह उसे लेने आया। मालगुजार हैजमींदार है। लेकिन उसके आने पर पता चला कि ट्रेन आ चुकी है। वह सोचता था चार बजे आएगीवह दो बजे आ गई। तो धर्मशाला में ठहरा जाकर। अब अपने बेटे की तलाश करे कि वह कहां गया!
धर्मशाला में कोई जगह खाली नहीं है। धर्मशाला के मैनेजर को उसने कहा कि कोई भी जगह तो खाली करवाओ ही। वह जमींदार है। तो उसने कहा कि अभी एक कोई भिखमंगा-सा आदमी आकर ठहरा है इस कमरे में--उसको निकाल बाहर कर देंउसने कहा कि निकाल बाहर करो। उसे पता नहीं कि वह उसका बेटा है। उसे निकाल बाहर कर दिया गया। वह अपने कमरे में आराम से...। उसने आदमी भेजे कि गांव में खोजो।
वह बेटा बाहर सीढ़ियों पर बैठा है। सर्द रात उतरने लगी। उस गरीब लड़के ने बार-बार कहा कि मुझे भीतर आ जाने दें,बर्फ पड़ रही है और मुझे बहुत दर्द है पेट में। पर उसने कहा कि यहां गड़बड़ मत करोभाग जाओ यहां सेरात मेरी नींद हराम मत कर देना। फिर रात पेट की तकलीफ से वह लड़का चीखने लगा। तो उसने नौकरों से उसे उठवाकर सड़क पर फिंकवा दिया।
फिर सुबह वह मर गया। सुबह जब वह जमींदार उठातो वह लड़का मरा हुआ पड़ा था। लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। लोग कह रहे थेकौन हैक्या हैकुछ पता लगाओ। किसी ने उसके खीसे में खोज-बीन की तो चिट्ठी मिल गई। तब तो उन्होंने कहा कि अरेवह जमींदार जिसको खोज रहा हैयह वही है। यह जमींदार को लिखी गई चिट्ठी-पत्रीयह अखबारों की कटिंग! यह उसका लड़का है।
वह जमींदार बाहर बैठकर अपना हुक्का पी रहा है। जैसे ही उसने सुना कि मेरा लड़का हैएकदम भावना आ गई। अब वह छाती पीट रहा हैअब वह रो रहा है। अब उस लड़के को--मरे को--कमरे के अंदर ले गया है। जिंदा को रात नहीं ले गया। मरे को दिन में कमरे के अंदर ले गया। अब उसकी सफाई की जा रही है--मरे पर। मरे को नए कपड़े पहनाए जा रहे हैं! वह जमींदार का बेटा है। अब उसको घर ले जाने की तैयारी चल रही है। और रात उसने कई बार प्रार्थना की,मुझे भीतर आने दोतो उसको नौकरों से सड़क पर फिंकवा दिया। यह भावना है?
नहींयह भावना का धोखा है। भावना मेरेत्तेरे से बंधी नहीं होतीभावना भीतर का सहज भाव है। अगर भावना होती,तो उसे कमरे के बाहर निकालना मुश्किल होता। अगर भावना होतीतो रात उसके पेट में दर्द हैसर्द रात हैबर्फ पड़ती हैउसे बाहर बिठाना मुश्किल होता। यह सवाल नहीं है कि वह कौन है। सवाल यह है कि भाव है भीतर!
ध्यान रहेभावना स्वयं की स्फुरणा है। दूसरे का सवाल नहीं कि वह कौन है। मर रहा है एक आदमीनौकरों से फिंकवा दिया उसको उठवाकर!
टाल्सटाय ने जब यह कहानी लिखीतो उसने अपने संस्मरणों में लिखा है कि यह कहानी मेरी एक अर्थों में आटोबायोग्राफी भी है। यह मेरा आत्मस्मरण भी है। क्योंकि खुद टाल्सटाय शाही परिवार का था।
उसने लिखा हैमेरी मां मैं समझता था बहुत भावनाशील है। लेकिन यह तो मुझे बाद में उदघाटन हुआ कि उसमें भावना जैसी कोई चीज ही नहीं है। क्यों समझता था कि भावना थीक्योंकि थिएटर में उसके चार-चार रूमाल भीग जाते थे आंसुओं से। जब नाटक चलता और कोई दुखट्रेजेडी होतीतो वह ऐसी धुआंधार रोती थी कि नौकर रूमाल लिए खड़े रहते--शाही घर की लड़की थी--तत्काल रूमाल बदलने पड़ते थे। चार-चारछह-छहआठ-आठ रूमाल एक नाटकएक थिएटर में भीग जाते। तो टाल्सटाय ने लिखा है कि मैं उसके बगल में बैठकर देखा करता थामेरी मां कितनी भावनाशील!
लेकिन जब मैं बड़ा हुआ तब मुझे पता चला कि उसकी बग्घी बाहर छह घोड़ों में जुती खड़ी रहती थी और आज्ञा थी कि कोचवान बग्घी पर ही बैठा रहे। क्योंकि कब उसका मन हो जाए थिएटर से जाने कातो ऐसा न हो कि एक क्षण को भी कोचवान ढूंढ़ना पड़े। बाहर बर्फ पड़ती रहती और अक्सर ऐसा होता कि वह थिएटर में नाटक देखतीतब तक एक-दो कोचवान मर जाते। उनको फेंक दिया जातादूसरा कोचवान तत्काल बिठाकर बग्घी चला दी जाती। वह औरत बाहर आकर देखती कि मुरदे कोचवान को हटाया जा रहा है और जिंदा आदमी को बिठाया जा रहा है। और वह थिएटर के लिए रोती रहतीवह थिएटर में जो ट्रेजेडी हो गई!
तो टाल्सटाय ने लिखा है कि एक अर्थ में यह कहानी मेरी आटोबायोग्राफिकल भी हैआत्म-कथ्यात्मक भी है। ऐसा मैंने अपनी आंख से देखा है। तब मुझे पता चला कि भावना कोई और चीज होगी। फिर यह चीज भावना नहीं है।
जिसको हम भावना कहते हैंकृष्ण उसको भावना नहीं कह रहे। भावना उठती ही उस व्यक्ति में हैजो अपने से संयुक्त हैजो अपने में युक्त है। युक्त यानी योग को उपलब्धयुक्त यानी जुड़ गया जोसंयुक्त। अयुक्त अर्थात वियुक्त--जो अपने से जुड़ा हुआ नहीं है। वियुक्त सदा दूसरों से जुड़ा रहता है। युक्त सदा अपने से जुड़ा रहता है।
वियुक्त सदा दूसरों से जुड़ा रहता है। उसके सब लिंक दूसरों से होते हैं। वह किसी का पिता हैकिसी का पति है,किसी का मित्र हैकिसी का शत्रु हैकिसी का बेटा हैकिसी का भाई हैकिसी की बहन हैकिसी की पत्नी है। लेकिन खुद कौन हैइसका उसे कोई पता नहीं होता। उसकी अपने बाबत सब जानकारी दूसरों के बाबत जानकारी होता है। पिता हैअर्थात बेटे से कुछ संबंध है। पति हैयानी पत्नी से कोई संबंध है। उसकी अपने संबंध में सारी खबर दूसरों से जुड़े होने की होती है।
अगर हम उससे पूछें कि नहींतू पिता नहींभाई नहींमित्र नहीं--तू कौन हैहू आर यूतो वह कहेगाकैसा फिजूल सवाल पूछते हैं! मैं तो पिता हूंमैं तो पति हूंमैं तो क्लर्क हूंमैं तो मालिक हूं। लेकिन ये सब फंक्शंस हैं। यह सब दूसरों से जुड़े होना है।
अयुक्त व्यक्ति दूसरों से जुड़ा होता है। जो दूसरों से जुड़ा होता हैउसमें भावना कभी पैदा नहीं होती। क्योंकि भावना तभी पैदा होती हैजब कोई अपने से जुड़ता है। जब अपने भीतर के झरनों से कोई जुड़ता हैतब भावना का स्फुरण होता है। जो दूसरों से जुड़ता हैउसमें भावना नहीं होती--एक। जो दूसरों से जुड़ा होता हैवह सदा अशांत होता है--दो। क्योंकि शांति का अर्थ ही अपने भीतर जो संगीत की अनंत धारा बह रही हैउससे संयुक्त हो जाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
शांति का अर्थ हैइनर हार्मनीशांति का अर्थ हैमैं अपने भीतर तृप्त हूंसंतुष्ट हूं। अगर सब भी चला जाएचांदत्तारे मिट जाएंआकाश गिर जाएपृथ्वी चली जाएशरीर गिर जाएमन न रहेफिर भी मैं जो हूंकाफी हूं--मोर दैन इनफ--जरूरत से ज्यादाकाफी हूं।
पाम्पेई नगर मेंपाम्पेई का जब विस्फोट हुआज्वालामुखी फूटातो सारा गांव भागा। आधी रात थी। गांव में एक फकीर भी था। कोई अपनी सोने की तिजोरीकोई अपनी अशर्फियों का बंडलकोई फर्नीचरकोई कुछकोई कुछजो जो बचा सकता हैलोग लेकर भागे। फकीर भी चला भीड़ मेंचलाभागा नहीं।
भागने के लिए या तो पीछे कुछ होना चाहिए या आगे कुछ होना चाहिए। भागने के लिए या तो पीछे कुछ होना चाहिएजिससे भागोया आगे कुछ होना चाहिएजिसके लिए भागो।
सारा गांव भाग रहा हैफकीर चल रहा है। लोगों ने उसे धक्के भी दिए और कहा कि यह कोई चलने का वक्त है! भागो। पर उसने कहाकिससे भागूं और किसके लिए भागूंलोगों ने कहापागल हो गए हो! यह कोई वक्त चलने का है। कोई टहल रहे हो तुम! यह कोई तफरीह हो रही है!
उस आदमी ने कहालेकिन मैं किससे भागूं! मेरे पीछे कुछ नहींमेरे आगे कुछ नहीं। लोगों ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा और उससे कहा कि कुछ बचाकर नहीं लाए! उसने कहामेरे सिवाय मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैंने कभी कोई चीज बचाई नहींइसलिए खोने का उपाय नहीं है। मैं अकेला काफी हूं।
कोई रो रहा है कि मेरी तिजोरी छूट गई। कोई रो रहा है कि मेरा यह छूट गया। कोई रो रहा है कि मेरा वह छूट गया। सिर्फ एक आदमी उस भीड़ में हंस रहा है। लोग उससे पूछते हैंतुम हंस क्यों रहे होक्या तुम्हारा कुछ छूटा नहीं?वह कहता है कि मैं जितना थाउतना यहां भी हूं। मेरा कुछ भी नहीं छूटा है।
उस अशांत भीड़ में अकेला वही आदमी हैजिसके पास कुछ भी नहीं है। बाकी सब कुछ न कुछ बचाकर लाए हैंफिर भी अशांत हैं। और वह आदमी कुछ भी बचाकर नहीं लाया और फिर भी शांत है। बात क्या है?
युक्त पुरुष शांत हो जाता हैअयुक्त पुरुष अशांत होता है। ज्ञानी युक्त होकर शांति को उपलब्ध हो जाता है।


इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।। ६७।।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। ६८।।
क्योंकिजल में वायु नाव को जैसे कंपित कर देता है,
वैसे ही विषयों में विचरती हुई इंद्रियों के बीच में
जिस इंद्रिय के साथ मन रहता हैवह एक ही इंद्रिय
इस अयुक्त पुरुष की प्रज्ञा का हरण कर लेती है।
इससे हे महाबाहोजिस पुरुष की इंद्रियां सब प्रकार
इंद्रियों के विषयों से वश में की हुई होती हैं,
उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।


जैसे नाव चलती हो और हवा की आंधियों के झोंके उस नाव को डांवाडोल कर देते हैंआंधियां तेज होंतो नाव डूब भी जाती हैऐसे ही कृष्ण कहते हैंअर्जुनजिसके चित्त की शक्ति विषयों की तरफ विक्षिप्त होकर भागती हैउसका मन आंधी बन जाता हैउसका मन तूफान बन जाता है। उस आंधी और तूफान में शांति कीसमाधि कीस्वयं की नाव डूब जाती है। लेकिन अगर आंधियां न चलेंतो नाव डगमगाती भी नहीं। अगर आंधियां बिलकुल न चलेंतो नाव के डूबने का उपाय ही नहीं रह जाता।
ठीक ऐसे ही मनुष्य का चित्त जितने ही झंझावात से भर जाता है वासनाओं केजितने ही जोर से चित्त की ऊर्जा और शक्ति विषयों की तरफ दौड़ने लगती हैवैसे ही जीवन की नाव डगमगाने लगती है और डूबने लगती है।
ज्ञानी पुरुष इस सत्य को देखकरइस सत्य को पहचानकर यह चित्त की वासना की आंधियों को नहीं दौड़ाता। क्या मतलब हैरोक लेता हैलेकिन आंधियां अगर रोकी जाएंगीतो भी आंधियां ही रहेंगी। और दौड़ रही आंधियां शायद कम संघातक होंरोकी गई आंधियां शायद और भी संघातक हो जाएं। तो क्या ज्ञानी पुरुष आंधियों को रोक लेता है,रिस्ट्रेन करता हैअगर रोकेगातो भी आंधियां आंधियां ही रहेंगी और रुकी आंधियों का वेग और भी बढ़ जाएगा। तो क्या करता है ज्ञानी पुरुष?
यह बहुत मजे की और समझने की बात है कि आंधियां रोकनी नहीं पड़तींसिर्फ चलानी पड़ती हैं। रोकनी नहीं पड़तीं,सिर्फ चलानी पड़ती हैं। आप न चलाएंतो रुक जाती हैं। क्योंकि आंधियां कहीं बाहर से नहीं आ रही हैंआपके ही सहयोगकोआपरेशन से आ रही हैं।
मैं इस हाथ को हिला रहा हूं। इस हाथ को हिलने से मुझे रोकना नहीं पड़ता। जब रोकता हूंतो उसका कुल मतलब इतना होता है कि अब नहीं हिलाता हूं। कोई हाथ अगर बाहर से हिलाया जा रहा होतो मुझे रोकना पड़े। मैं ही हिला रहा हूंतो रोकने का क्या मतलब होता है! शब्द में रोकना क्रिया बनती हैउससे भ्रांति पैदा होती है। यथार्थ में,वस्तुतः रोकना नहीं पड़तासिर्फ चलाता नहीं हूं कि हाथ रुक जाता है।
एक झेन फकीर हुआउसका नाम था रिंझाई। एक आदमी उसके पास गया और उसने कहा कि मैं कैसे रोकूंउस फकीर ने कहागलत सवाल मेरे पास पूछा तो ठीक नहीं होगा। यह डंडा देखा है! रिंझाई एक डंडा पास रखता था। और वह दुनिया बहुत कमजोर हैजहां फकीर के पास डंडा नहीं होता। कृष्ण कुछ कम डंडे की बात नहीं करते!
एक मित्र कल मुझसे कह रहे थे कि मेरी हालत भी अर्जुन जैसी है। आप मुझे सम्हालना! मेरे मन में हुआ कि उनसे कहूं कि अगर कृष्ण जैसा एक दफा तुमसे कह दूंमहामूर्ख! तुम दुबारा लौटकर न आओगे। तुम आओगे ही नहीं।
अर्जुन होना भी आसान नहीं है। वह कृष्ण उसको डंडे पर डंडे दिए चले जाते हैं। भागता नहीं है। संदेह हैलेकिन निष्ठा में भी कोई कमी नहीं है। संदेह हैतो सवाल उठाता है। निष्ठा में भी कोई कमी नहीं हैइसलिए भागता भी नहीं है।
रिंझाई ने कहा कि देखा है यह डंडा! झूठे गलत सवाल पूछेगासिर तोड़ दूंगा।
उस आदमी ने कहाक्या कहते हैं आप! सिर मेरा वैसे ही अपनी वासनाओं से टूटा जा रहा है। आप मुझे कोई तरकीब रोकने की बताएं। रिंझाई ने कहारोकने की बात नहीं हैमैं तुझसे यह पूछता हूंकिस तरकीब से वासनाओं को चलाता हैक्योंकि तू ही चलाने वाला हैतो रोकने की तरकीब पूछनी पड़ेगी!
एक आदमी दौड़ रहा है और हमसे पूछता हैकैसे रुकेंरुकना पड़ता है! सिर्फ नहीं दौड़ना पड़ता है। रुकना नहीं पड़ता हैसिर्फ नहीं दौड़ना पड़ता है।
हांकोई उसको घसीट रहा होकोई उसकी गरदन में बैल की तरह रस्सी बांधकर खींच रहा होतब भी कोई सवाल है। कोई उसके पीछे से उसको धक्के दे रहा होतब भी कोई सवाल है। न उसे कोई घसीट रहा हैन कोई पीछे से धक्के दे रहा हैवह आदमी दौड़ रहा है। और कहता हैमैं कैसे रुकूंतो उसे इतना ही कहना पड़ेगातू गलत ही सवाल पूछ रहा है। दौड़ भी तू ही रहा हैकैसे रुकने की बात भी तू ही पूछ रहा है। निश्चित ही तू रुकना नहीं चाहताइसीलिए पूछ रहा है।
जो लोग रुकना नहीं चाहतेवे यही पूछते रहते हैंकैसे रुकेंइसी में समय गंवाते रहते हैं। वे पूछते हैंहाऊ टु डू इटकरना नहीं चाहते हैं। क्योंकि मजा यह है कि वासना को कैसे चलाएंइसे पूछने आप कभी किसी के पास नहीं गएबड़े मजे से चला रहे हैं।
तो कृष्ण कह रहे हैं कि जो इन आंधियों को नहीं चलाता है--रोक लेता है नहीं--नहीं चलाता है।
हमारा कोआपरेशन मांगती है वासना। आपने कोई ऐसी वासना देखी हैजो आपके बिना सहयोग के इंचभर सरक जाए! कभी बिना आपके सहयोग के आपके भीतर कोई भी वासना सरकी है इंचभर! तो फिर जरा लौटकर देखना। जब वासना सरकेतो खड़े हो जाना और कहना कि मेरा सहयोग नहींअब तू चल। और आप पाएंगेवहीं गिर गई--वहीं--इंचभर भी नहीं जा सकती। आपका कोआपरेशन चाहिए।
एक मेरे मित्र हैंउनको बड़ा क्रोध आता है। बड़े मंत्र पढ़ते हैंबड़ी प्रार्थनाएं करते हैंमंदिर जाते हैं और वहां से और क्रोधी होकर लौटते हैं। क्रोध नहीं जाता। बसउनकी वही परेशानी है कि क्रोध! पर मैंने उनसे कहा कि तुम ही क्रोध करते हो कि कोई और करता हैउन्होंने कहा कि मैं ही करता हूंलेकिन फिर भी जाता नहीं। कैसे जाए?
मैंने कहा कि अब यह सब छोड़ो। यह कागज मैं तुम्हें लिखकर देता हूं। कागज लिखकर उन्हें दे दिया। उसमें मैंने बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया कि अब मुझे क्रोध आ रहा है। मैंने कहाइसे खीसे में रखो और जब भी क्रोध आएतो इसे देखकर पढ़ना और फिर खीसे में रखनाऔर कुछ मत करना। उन्होंने कहाइससे क्या होगामैं बड़े-बड़े ताबीज भी बांध चुका! मैंने कहाछोड़ो ताबीज तुम। तुम इसको खीसे में रखो। पंद्रह दिन बाद मेरे पास आना।
पंद्रह दिन बाद नहींवे पांच ही दिन बाद आ गए। और कहने लगे कि क्या जादू हैक्योंकि जैसे ही मैं इसको पढ़ता हूं कि अब मुझे क्रोध आ रहा हैपता नहीं भीतर क्या होता है--गया! कोआपरेशन नहीं मिल पाता। एक सेकेंड को कोआपरेशन चूक जाए--गया।
फिर तो वे कहने लगेअब तो खीसे तक अंदर हाथ भी नहीं लगाना पड़ता। इधर हाथ गया कि अक्षर खयाल आए कि अब क्रोध आ रहा हैबस कोई चीज एकदम से बीच में जैसे फ्लाप! कोई चीज एकदम से गिर जाती है।
वासना सहयोग मांगती है आपका। निर्वासना सिर्फ असहयोग मांगती है। निर्वासना के लिए कुछ करना नहीं हैवासना के लिए जो किया जा रहा हैवही भर नहीं करना है।
तो रिंझाई ने मुट्ठी बांध ली उस आदमी के सामने और कहा कि देखयह मुट्ठी बंधी हैअब मुझे मुट्ठी को खोलना है। मैं क्या करूंउस आदमी ने कहा कि क्या फिजूल की बातें पूछते हैं! बांधिए मतमुट्ठी खुल जाएगी। बांधिए मत! क्योंकि बांधना पड़ता हैबांधना एक काम है। खोलना काम नहीं है। बांधने में शक्ति लग रही हैखोलने में कोई शक्ति नहीं लगती। न बांधिए तो मुट्ठी खुली रहती हैबांधिए तो बंधती है।
वासना शक्ति मांगती हैन दीजिए शक्तितो निर्वासना फलित हो जाती है।
ऐसा झंझावात से मुक्त हुआ चित्त स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाता है। कृष्ण कहते हैंहे महाबाहोजो स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाता हैवह सब कुछ पा लेता है।


या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। ६९।।
और हे अर्जुनसंपूर्ण भूत प्राणियों के लिए जो रात्रि हैउसमें भगवत्ता को प्राप्त हुआ संयमी पुरुष जागता है। और जिस नाशवानक्षणभंगुर सांसारिक सुख में सब भूत प्राणी जागते हैंतत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि है।


जो सबके लिए अंधेरी रात हैवह भी ज्ञानी के लिएसंयमी के लिए जागरण का क्षण है। जो निद्रा है सबके लिएवह भी ज्ञानी के लिए जागृति है। यह महावाक्य है। यह साधारण वक्तव्य नहीं है। यह महावक्तव्य है। इसके बहुआयामी अर्थ हैं। दोत्तीन आयाम समझ लेना जरूरी है।
एक तो बिलकुल सीधाजिसको कहना चाहिए लिटरल जो अर्थ हैवह भी इसका अर्थ है। आमतौर से गीता पर किए गए र्वात्तिक उसके तथ्यगत अर्थ को कभी भी नहीं लेते हैं। जो कि बड़ी ही गलत बात है। वे सदा ही उसको मेटाफर बना लेते हैं। वह सिर्फ मेटाफर नहीं है। जब यह बात कही जा रही है कि जो सबके लिए निद्रा हैवह भी संयमी और ज्ञानी के लिए जागरण हैतो इसका पहला अर्थ बिलकुल शाब्दिक है। जब आप रात सोते हैंतब भी संयमी नहीं सोता है।
इसे पहले समझ लेना जरूरी हैक्योंकि इसे कहने की हिम्मत नहीं जुटाई जा सकी है आज तक। सदा उसका अर्थ मोहरूपी निशा और और सब रूपी बातें कही गई हैं। इसका पहला अर्थ बिलकुल ही तथ्यगत है।
जब आप रात सोते हैंतब भी ज्ञानी नहीं सोता है। इसका क्या मतलब हैबिस्तर पर नहीं लेटता है! इसका क्या मतलब हैआंख बंद नहीं करता है! इसका क्या मतलब हैरात विश्राम को उपलब्ध नहीं होता है! नहींयह सब करता हैफिर भी नहीं सोता है। दोत्तीन उदाहरण से इस बात को समझें।
बुद्ध ने आनंद को दीक्षा दी। वह उनका चचेरा भाई था और बड़ा भाई था। तो दीक्षा लेते वक्त आनंद ने कहा कि दीक्षा के बाद तो तुम गुरु और मैं शिष्य हो जाऊंगातो मैं तुमसे फिर कुछ कह न सकूंगा। अभी मैं तुम्हें आज्ञा दे सकता हूं,मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूं। दीक्षा लेने के पहले मैं तुम्हें दोत्तीन आज्ञाएं देता हूंजो तुम्हें छोटे भाई की तरह माननी पड़ेंगी। बुद्ध ने कहाकहो।
आनंद ने कहाएक तो यह कि मैं चौबीस घंटे तुम्हारे साथ रहूंगा। रात तुम सोओगे जहांवहीं मैं भी सोऊंगा। दूसरा यह कि जब भी मैं कोई सवाल पूछूंतुम्हें उसी वक्त उत्तर देना पड़ेगाटाल न सकोगे। तीसरा यह कि मैं अंधेरी आधी रात में भी किसी को मिलाने ले आऊंतो मिलना पड़ेगाइनकार न कर सकोगे। तो ये तीन आज्ञाएं देता हूं बड़े भाई की हैसियत से। फिर दीक्षा के बाद तो मैं कुछ कह न सकूंगा। तुम्हारी आज्ञा मेरे सिर पर होगी।
बुद्ध ने ये वचन दे दिए। फिर आनंद बुद्ध के कमरे में ही सोता। दो-चार-दस दिन में ही बहुत हैरान हुआ। क्योंकि बुद्ध जिस करवट सोते हैं--जहां हाथ रखते हैंजहां पैर रखते हैं--रात में इंचभर भी हिलाते नहीं। कभी करवट भी नहीं बदलते। हाथ जहां रखा हैवहीं रखा रहता है पूरी रात। पैर जहां रखा हैवहीं रखा रहता है पूरी रात। तो आनंद ने कहा कि यह क्या मामला है! यह कैसी नींद है!
दो-चार-दस दिनरात में कई बार उठकर उसने देखा। देखा कि वही--वही मुद्रा हैवही आसन हैवही व्यवस्था है--सब वही है। दसवें दिन उसने पूछा कि एक सवाल उठ गया है। रात में सोते हो या क्या करते होबुद्ध ने कहाजब से अज्ञान टूटातब से सिर्फ शरीर सोता हैमैं नहीं सोता हूं। तो अगर करवटतो मुझे बदलनी पड़ेमेरे बिना सहयोग के शरीर नहीं बदल सकता। कोई जरूरत नहीं बदलने की। एक ही करवट से काम चल जाता है। तो फकीर आदमी को जितने से काम चल जाएउससे ज्यादा के उपद्रव में नहीं पड़ना चाहिए। ऐसे ही चल जाता है काम। हाथ जहां रखता हूंवहीं रखे रहता हूं। हाथ सो जाता हैमैं नहीं सोता हूं।
कृष्ण कहते हैंजो सबके लिए अंधेरी निद्रा हैवह भी ज्ञानी के लिए जागरण है।
आप भी पूरे नहीं सोते हैं। क्योंकि ज्ञान का कोई न कोई कोना तो आप में भी जागा रहता है। यहां हम इतने लोग बैठे हैंसब सो जाएंरात कोई आदमी आकर चिल्लाएराम! सबको सुनाई पड़ेगालेकिन सबको सुनाई नहीं पड़ेगा। जिसका नाम राम हैवह कहेगाकौन बुला रहा हैकान सबके हैंसब सोए हैं। राम शब्द गूंजा हैतो सबको सुनाई पड़ा है। लेकिन जो राम हैवह कहता हैकौन बुला रहा हैरात में कौन गड़बड़ करता हैसोने नहीं देता!
क्या हुआ! जरूर इसके भीतर चेतना का एक कोना इस रात में भी जागा हैपहरा दे रहा है। पहचानता है कि राम नाम है अपना।
मां सोई है राततूफान आ जाए बाहरआंधी आ जाएबादल गरजेंबिजली चमकेउसकी नींद नहीं टूटती। उसका बच्चा जरा-सा कुनकुन करेवह फौरन हाथ रख लेती। भीतर कोई हिस्सा जागा हुआ है मां कावह देख रहा है कि बच्चे को कोई गड़बड़ न हो जाए। और बच्चे की गड़बड़ इतनी धीमी है कि मां के एक हिस्से को जागा ही रहना होगा।
आकाश में बिजली चमकती हैबादल गरजते हैंपानी बरस रहा हैउसका कुछ सुनाई नहीं पड़ता उसे। लेकिन बच्चे की जरा-सी आवाजउसका जरा-सा करवट लेनाउसकी धीमी-सी पुकार उसे तत्काल जगा देती है। एक हिस्सा उसका भी जागा हुआ है। पर एक हिस्सा! जरूरत के वक्तइमरजेंसी मेजर है वह हमारा। साधारणतः हमारी पूरी चेतना डूबी रहती है अंधेरे में।
कृष्ण कहते हैंज्ञानी पुरुष नींद में भी जागा रहता है। पहला अर्थपहले आयाम का अर्थवास्तविक निद्रा में भी जागरण है।
और मैं आपसे कहता हूं कि यह बहुत कठिन नहीं है। जो आदमी दिन के जागते हिस्से में बारह घंटे जागा हुआ जीएगावह रात में जागा हुआ सोता है। आप रास्ते पर चल रहे हैंजागकर चलें। आप खाना खा रहे हैंजागकर खाएं। आप किसी से बात कर रहे हैंजागकर बोलें। सुन रहे हैंजागकर सुनें। यह नींद-नींदस्लीपी-स्लीपी न हो। यह सब ऐसे ही चल रहा है।
एक आदमी खाना खा रहा है। हमें लगता है कि नींद में कैसे खाना खा सकता है! लेकिन मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सब लोग नींद में खाना खा रहे हैं।
इमरसन एक बड़ा विचारक हुआ। सुबह बैठा है। उसकी नौकरानी नाश्ता रख गई। किताब में उलझा हैतो नौकरानी ने बाधा नहीं दी। किताब से छूटेगातो नाश्ता कर लेगा।
उसका एक मित्र मिलने आया है। वह किताब में डूबा है। नाश्ता पास है। मित्र ने सोचाइससे बात पीछे कर लेंगेपहले नाश्ता कर लें। मित्र ने नाश्ता कर लियाप्लेट खाली करके बगल में सरका दी। फिर इमरसन ने कहाअरे कब आए?मित्र को देखाखाली प्लेट को देखा और कहा कि जरा देर से आएमैं नाश्ता कर चुका हूं।
इस आदमी ने कभी जागकर नाश्ता किया होगानहींहमने भी नहीं किया है। एक रूटीन हैजिसको हम नींद में भी कर लेते हैं। आदमी साइकिल चलाता है। पैर साइकिल चलाते रहते हैंआदमी भीतर कुछ और चलाता रहता है। चलता चला जाता है। नींद है।
सड़क के किनारे खड़े हो जाएंलोगों को जरा चलते देखें। कोई बातचीत करता दिखाई पड़ेगा किसी सेजो मौजूद नहीं है। किसी के ओंठ हिल रहे हैं। कोई हाथ से किसी को झिड़क रहा है। कोई इशारा कर रहा है। आप बहुत हैरान होंगे कि किससे हो रहा है यह सब! नींदनींद में चल रहे हैं। जब हम जागे हुए भी सोए हैंतो सोए हुए जागना बहुत मुश्किल है।
इसलिए मैं कहता हूं कि जिन लोगों ने गीता के इस महावाक्य पर वक्तव्य दिए हैंउनको खुद का कोई अनुभव नहीं है। अन्यथा यह पहला वक्तव्य चूक नहीं सकता था। उनको साफ पता नहीं है कि नींद में जागा हुआ हुआ जा सकता है। लेकिन जागे हुए ही सोए हुए आदमियों को नींद में जागने का खयाल भी नहीं उठ सकता है! तो वे इसका मेटाफोरिकल अर्थ करते हैं। वह अर्थ ठीक नहीं है।
जो आदमी दिन में जागकर चलेगाउठेगाबैठेगावह रात में भी जागा हुआ सोएगा।
महावीर ने कहा है--अजीब बात कही है--महावीर ने कहा हैसाधुओ! जागकर चलनाजागकर उठनाजागकर बैठना। सब ठीक है। लेकिन आखिर में महावीर कहते हैंजागकर सोना। पागलपन की बातें कर रहे हैं! तो फिर सोएंगे काहे के लिए! जागकर सोनाजागते रहना और देखना कि नींद कब आई।
आप कितनी दफे सोए हैंकभी नींद को आते देखाजिंदगीभर सोएरोज सोए। आदमी साठ साल जीता हैतो बीस साल सोता है। आठ घंटे सोए अगरतो बीस साल सोने में चले जाते हैं। जिंदगी का एक तिहाई सोते हैं। बीस साल सोकर भी कभी आपको पता हैनींद कब आती हैकैसे आती हैनींद क्या है?
कैसा अदभुत है यह मामला! बीस साल जिस अनुभव से गुजरते हैंउस अनुभव की कोई भी पहचान नहीं है! रोज सोते हैं। लेकिन कोई आपसे पूछे कि नींद क्या हैव्हाट इज़ दि स्लीपकैसे आती हैआते वक्त क्या उसकी शकल है,क्या उसका रूप हैकैसे उतरती हैजैसे सांझ उतरती है अंधकार कीसूरज डूबता हैऐसा आपके भीतर क्या उतरता है नींद में?
आप कहेंगे कि कुछ पता नहीं है। क्योंकि जब तक जागे रहते हैंतब तक नींद नहीं आती। जब नींद आ जाती है,उसके पहले तो सो गए होते हैं।
सुबह उठते हैं रोज। कभी देखा है कि नींद का टूटना क्या हैफिनामिनलनींद कैसे टूटती हैक्या होता है नींद के टूटने में?
आप कहते हैंकुछ पता नहीं। जब तक नींद नहीं टूटतीतब तक हम नहीं होते। जब नींद टूट जाती हैतब टूट ही चुकी होती है। कोई हमें पता नहीं।
कृष्ण कह रहे हैंज्ञानी जागकर सोता है।
और जिस व्यक्ति ने अपनी नींद को जागकर देख लियावही व्यक्ति अपनी मृत्यु को भी जागकर देख सकता है,अन्यथा नहीं देख सकता है। इसलिए इस सूत्र को मैं महावाक्य कहता हूं।
मौत तो कल आएगीनींद तो आज ही आएगी। रात नींद को देखते हुए सोएं। आजकलमहीनादो महीनातीन महीना-- रोज सोते वक्त एक ही प्रार्थना मन मेंएक ही भाव मन में आए कि उसे मैं देखूं। जागे रहेंजागे रहेंजागे रहें। देखते रहेंदेखते रहें। आज चूकेंगेकल चूकेंगेपरसों चूकेंगे। महीनादो महीनातीन महीना--अचानक किसी दिन आप पाएंगे कि नींद उतर रही है और आप देख रहे हैं। और जिस दिन आप नींद को उतरते देख लेंगेउस दिन कृष्ण का यह महावाक्य समझ में आएगाउसके पहले समझ में नहीं आ सकता है। यह इसका वास्तविक अर्थ है।
इसका जो मेटाफोरिकल अर्थ हैवह भी आपसे कहूं। वह भी हैलेकिन वह नंबर दो का मूल्य है उसका। नंबर एक का मूल्य इसी का है। वह भी है। लेकिन वह तो और बहुत-सी बातों में भी कह दिया गया है। उसको कहने के लिए इस वाक्य को कहने की कोई भी जरूरत न थी। वह दूसरा जो मोह-निशाउसकी तो बहुत चर्चा हो गई। वह जो विषयों की नींद हैवह जो वासना की नींद हैतो उसकी तो काफी चर्चा हो गई है।
और कृष्ण जैसे लोग एक शब्द भी व्यर्थ नहीं बोलते हैं। एक शब्द पुनरुक्त नहीं करते हैं। अगर पुनरुक्ति दिखती हो,तो आपकी समझ में भूल और गलती होती है। कृष्ण जैसे लोगदे नेवर रिपीट। क्योंकि रिपीट का कोई सवाल नहीं है। दोहराने की कोई जरूरत नहीं है।
क्या आपको पता है कि कौन लोग दोहराते हैं! सिर्फ वे ही लोग दोहराते हैंजिनमें आत्मविश्वास की कमी होती है। दूसरा आदमी नहीं दोहराता। जिसने एक बात पूरे विश्वास से कह दी पूरी तरह जानकरबात खत्म हो गई।
तो कृष्ण दोहरा नहीं सकते। इसलिए मैं कहता हूं कि जो आम व्याख्या की गई है कि जहां कामी आदमी कामवासना मेंमोह-निद्रा मेंविषयों की नींद मेंअंधेरे में डूबा रहता हैवहां संयमी आदमी जागा रहता है। इसको दोहराने के लिए इस वाक्य की बहुत जरूरत नहीं है। लेकिन वह अर्थ करेंतो बुरा नहीं है। लेकिन पहला अर्थ पहले समझ लें।
हांदूसरा अर्थ है। एक तंद्रा का घेराकहना चाहिए एक हिप्नोटिक ऑराहमारे व्यक्तित्व में अटका हुआ है। जब आप चलते हैंतो आपके चारों तरफ नींद का एक घेरा चलता है। जब जागा हुआ पुरुष चलता हैतब उसके पास भी चारों तरफ एक जागरण का एक घेरा चलता है। यह जो हमने फकीरों--नानक और कबीर और राम और कृष्ण और बुद्ध और महावीर के आस-पासउनके चेहरे के पास एक गोल घेरा बनाया हैयह फोटोग्राफिक ट्रिक नहीं है। यह सिर्फ एक मिथ नहीं है। जागे हुए व्यक्ति के आस-पास प्रकाश का एक उज्ज्वल घेरा चलता है।
और जो लोग भी अपने भीतर के प्रकाश को देखने में समर्थ होते हैंवे दूसरे के ऑरा को भी देखने में समर्थ हो जाते हैं। जिन लोगों को भीतर अपने प्रकाश दिखाई पड़ने लगता हैवे उस आदमी के चेहरे के आस-पास प्रकाश के गोल घेरे को तत्काल देख लेते हैं। हांआपको नहीं दिखताक्योंकि आपको उस तरह के सूक्ष्म प्रकाश का कोई भी अनुभव नहीं है।
तो जैसे महावीर और बुद्ध और कृष्ण के चेहरे के आस-पास एक गोल वर्तुल चलता है जागरण कारोशनी काऐसे ही हम सब सोए हुए आदमियों के आस-पास एक गोल वर्तुल चलता है अंधकार कानिद्रा का। वह भी आपको दिखाई नहीं पड़ेगा। क्योंकि उसका पता भी तब चलेगाजब प्रकाश दिखाई पड़े। तब आपको पता चलेगा कि जिंदगीभर एक अंधेरे का गोल घेरा भी आपके पास चलता था। पता तो पहले प्रकाश का चलेगातभी अंधकार का बोध होगा। उसके साथ ही हम पैदा होते हैं। उससे इतने निकट और परिचित होते हैं कि वह दिखाई नहीं पड़ता।
लेकिन मैं देखता हूं कि रास्ते पर दो आदमी चल रहे होंतो दोनों के पास का चलने वाला घेरा अलग होता है। रंगों-रंगों के फर्क होते हैंशेड के फर्क होते हैं। अंधेरे और सफेदी के बीच में बहुत से ग्रे कलर होते हैं।
लेकिन साधारणतः सोए आदमी के पाससौ में से निन्यानबे आदमियों के पास नींद का एक वर्तुल चलता हैएक स्लीपी वर्तुल चलता है। वैसा आदमी जहां जाता हैउसके साथ उसकी नींद भी जाती है। वह जो भी छूता हैउसे नींद में छूता है। वह जो भी करता हैउसे नींद में करता है। वह जो भी बोलता हैनींद में बोलता है।
कभी आपने सोचा है कि आप अपने वक्तव्यों के लिए कितनी बार नहीं पछताए हैं! पछताए हैं। लेकिन कभी आपको पता है कि आपने ही बोला था--होश में!
पति घर आया है और एक शब्द पत्नी बोल गई है और कलह शुरू हो गई है। और वह जानती है कि यह शब्द रोका जा सकता था। क्योंकि यह शब्द पचीस दफे बोला जा चुका है और इस शब्द के आस-पास इसी तरह की कलह पचीस बार हो चुकी है। फिर यह आज क्यों बोला गयानींद में बोल गईफिर बोल गई। कल फिर बोलेगीपरसों फिर बोलेगी। वह नींद चलेगी। वह रोज वही बोलेगी और रोज वही होगा। पति भी रोज वही उत्तर देगा।
अगर एक पति-पत्नी को सात दिन ठीक से देख लिया जाएतो उनकी पिछली जिंदगी और आगे की सारी जिंदगी की कथा लिखी जा सकती है कि पीछे क्या हुआ और आगे क्या होगा। क्योंकि यही होगा। इसकी पुनरुक्ति होती रहेगी।
ये नींद में चलते हुए लोग--वही क्रोधवही कामवही सबवही दुखवही पीड़ावही चिंता--सब वही। रोज उठते हैं और वही दोहराते हैं। जैसे सब तय हैबंधी हुई मशीन की तरह। बसरोज अपनी मशीन पर जम जाते हैं और फिर दोहराते हैं।
यह नींद है। यह कृष्ण का दूसरा अर्थ है। जागा हुआ पुरुष जो भी करता हैवह नींद में करने वाले आदमी जैसा उसका व्यवहार नहीं है।
क्या फर्क पड़ेगा उसके व्यवहार मेंतो उन्होंने इंगित दिए हैं कि नींद से भरा हुआ आदमी मैं के और अहंकार के आस-पास जीएगा। उसका सब कुछ अहंकार से भरा होगा।
कभी आपने खयाल किया हैआईने के सामने खड़े होकर जो तैयारी आप कर रहे हैंवह आपकी तैयारी है कि अहंकार की तैयारी है! किसकी तैयारी कर रहे हैंअहंकार की तैयारी कर रहे हैं। बाहर निकलते हैंतो झाड़-झूड़ के साफरीढ़ सीधी कर लेते हैं। आंखें तेज हो जाती हैं। या तो सुरक्षा में लग जाते हैं या आक्रमण में लग जाते हैं। चल पड़ेनींद वाला आदमी निकला घर से बाहरउपद्रव संभावित हैकि कुछ होगा अब। अब यह कुछ न कुछ करेगा। और सारे लोग अपने घरों के बाहर निकल रहे हैं। ये कुछ न कुछ करेंगे।
अमेरिका में अभी कार के एक्सिडेंट्स का जो सर्वे हुआ हैउससे पता चला है कि पचहत्तर प्रतिशत कार की दुर्घटनाएं भौतिक नहींमानसिक घटनाएं हैं। पागलपन की बात मालूम होती है न! कार की दुर्घटना और मानसिक! कार का भी कोई माइंड हैकार का भी कोई मन है कि कार भी कोई मन से दुर्घटना करती है! कार का नहीं हैड्राइवर का हैवह जो सारथी बैठे रहते हैं भीतर।
कभी आपको पता है कि जब आप क्रोध में होते हैंतो कार का एक्सेलेरेटर जोर से दबता है--नींद मेंहोश में नहीं। जल्दी आपको कहीं पहुंचना नहीं है। लेकिन चित्त क्रोध से भरा है। किसी चीज को दबाना चाहता है। इसकी फिक्र नहीं कि किसको दबा रहे हैं। एक्सेलेरेटर को ही दबा रहे हैं। अब एक्सेलेरेटर से कोई झगड़ा नहीं है। अब एक्सेलेरेटर को दबाइएगा क्रोध मेंतो खतरा पक्का है। क्योंकि एक तो नींद में दबाया जा रहा है। आपको पता ही नहीं है कि क्यों दबा रहे हैं एक्सेलेरेटर को। पता होना चाहिए कि क्यों दबा रहे हैंकहां दबा रहे हैंकितनी भीड़ हैकितने लोग हैं,कितनी कारें दौड़ रही हैं। आपको कुछ पता नहीं है।
आप एक्सेलेरेटर को नहीं दबा रहे हैं। कोई अपनी पत्नी के सिर पर पैर दबा रहा हैकोई अपने बेटे केकोई अपने बाप केकोई अपने मालिक के। पता नहीं वह एक्सेलेरेटर किन-किन के लिए काम कर रहा है। पता नहीं कौन एक्सेलेरेटर उस वक्त बना हुआ है। दबाए जा रहे हैं। अब यह आदमी जो नींद में एक्सेलेरेटर दबा रहा हैइस आदमी को सड़क दिखाई पड़ रही होगी!
इसकी हालत ठीक वैसी हैमैंने सुना हैवर्षा हो रही है और एक आदमी अपनी कार चला रहा है। जोर से वर्षा हो रही हैलेकिन वह आदमी वाइपर नहीं चला रहा है कार के। तो उसकी पत्नी उससे कहती हैक्या कर रहे हो! जैसा कि पत्नियां आमतौर से ड्राइवर को गाइड करती रहती हैं। पति चलाता हैपत्नियां चलवाती हैं। वे पूरे वक्त बताती रहती हैं कि यह करोयह करो।
पूछाक्यों नहीं चला रहे हैं वाइपरतो उसने कहाकोई फायदा नहीं हैक्योंकि चश्मा तो मैं घर ही भूल आया हूं। वैसे ही नहीं दिखाई पड़ रहा है कुछ। पानी गिर रहा है कि नहीं गिर रहा हैइससे क्या मतलब है!
अब यह जो आदमी हैवह जो एक्सेलेरेटर को क्रोध में दबा रहा हैवह भी अंधा है। उसको भी कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा है कि बाहर क्या हो रहा है। पचहत्तर प्रतिशत दुर्घटनाएं मानसिक घटनाएं हैं। यह नींद है।
इस नींद में हम उलटा भी करते हैं। वह तीसरा आयाम है। फिर हम आगे बढ़ें।
एक तीसरा अर्थ भी हैनींद का कृत्य हमेशाजो आप करते हैं और जो होता हैउसका आपको कोई खयाल नहीं होता। जो आप करते हैंउससे ही होता है। लेकिन जब होता हैतब आप पछताते हैं कि यह कैसे हो गया! क्योंकि हमने तो यह कभी न किया था।
एक स्त्री सज रही हैआईने के सामने सज रही है। अब उसे पता नहीं है कि सजकर वह क्या कर रही है। मैं सज रही हूं और कुछ भी नहीं कर रही! लेकिन वह सज-धजकर सड़क पर आ गई है। उसने चुस्त कपड़े पहन रखे हैं। अब उसको पता नहीं कि वह धक्का निमंत्रित कर रही है। कोई आदमी धक्का मारेगा। जब वह धक्का मारेगातब वह कहेगी कि बहुत ज्यादती हो रही है। वह स्त्री कहेगीबहुत ज्यादती हो रही हैअन्याय हो रहा हैअनीति हो रही है। लेकिन सब तैयारी करके आई है वह। पर वह तैयारी नींद में की गई थीउसे कोई काज-इफेक्ट दिखाई नहीं पड़ता कि ये इतने चुस्त कपड़ेइतने बेढंगे कपड़ेइतनी सजावट किसी को भी धक्का मारने के लिए निमंत्रण है।
और बड़े मजे की बात हैअगर उसको कोई धक्का न दे और कोई न देखेतो भी दुखी लौटेगी कि बेकार गईसब मेहनत बेकार गई। किसी ने देखा ही नहीं! सड़क पर कोई इसे न देखेकोई इसको ले ही नकोई अटेंशन न देतो यह ज्यादा दुखी लौटेगी। धक्का देतो भी दुखी लौटेगी। क्या हो रहा है यह!
मैंने सुना है कि एक बच्चे ने अपने बाप को खबर दी कि मैंने पांच मक्खियां मार डाली हैं। उसके बाप ने कहाअरे! और उसने कहा कि तीन नर थेदो मादाएं थीं। उसके बाप ने कहा कि हद कर रहा हैतूने कैसे पता लगायातो उसने कहा कि दो मक्खियां आईने-आईने पर ही बैठती थीं। समझ गया कि स्त्रियां होनीं चाहिए!
यह जो नींद में सब चल रहा हैइसमें हम ही कारण होते हैं और जब कार्य आता हैतब हम चौंककर खड़े हो जाते हैं कि यह मैंने नहीं किया! अगर हम नींद में न होंतो हम फौरन समझ जाएंगेयह मेरा किया हुआ है। यह धक्का मेरा बुलाया हुआ है। यह धक्का ऐसे ही नहीं आ गया है। इस जगत में कुछ भी आकस्मिक नहीं हैएक्सिडेंटल नहीं है। सब चीजों की हम व्यवस्था करते हैं। लेकिन फिर व्यवस्था जब पूरी हो जाती हैतब पछताते हैं कि यह क्या हो गया! यह क्या हो रहा है?
यह भी नींद का अर्थ है। संयमीज्ञानी इस भांति कभी नहीं सोताजागा ही रहता है। स्वभावतःजागकर वह वैसा व्यवहार नहीं करताजैसा सोया आदमी करता है। उसका मैं कभी केंद्र में नहीं होता। मैं सदा नींद के ही केंद्र में होता है। समझ लें कि नींद का केंद्र मैं है। न-मैंईगोलेसनेसनिरअहंकार भावजागरण का केंद्र है।
यह बड़े मजे की बात है। इसको अगर हम ऐसा कहें तो बिलकुल कह सकते हैं कि सोया हुआ आदमी ही होता है,जागा हुआ आदमी होता नहीं। यह बड़ा उलटा वक्तव्य लगेगा। सोया हुआ आदमी ही होता है--मैं। जागा हुआ आदमी नहीं होता है--न-मैं। जागरण आदमी के अहंकार का विसर्जन है। निद्रा आदमी के अहंकार का संग्रहण हैकनसनटे्रशन हैकेंद्रीकरण है।


आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।। ७०।।
और जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में नाना नदियों के जल उसको चलायमान न करते हुए ही समा जाते हैंवैसे ही जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष के प्रति संपूर्ण भोग किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैंवह पुरुष परमशांति को प्राप्त होता है,
न कि भोगों को चाहने वाला।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति।। ७१।।
क्योंकिजो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममतारहित और अहंकाररहितस्पृहारहित हुआ बर्तता हैवह शांति को प्राप्त होता है।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।। ७२।।
हे अर्जुनयह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की ब्राह्मी-स्थिति है। इसको प्राप्त होकर वह मोहित नहीं होता है और अंतकाल में भी इस निष्ठा में स्थिर होकर ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त हो जाता है।


हे पार्थ! जैसे महासागर अनंत-अनंत नदियों को भी अपने में समाकर जरा भी मर्यादा नहीं खोताइंचभर भी परिवर्तित नहीं होताजैसे कुछ समाया ही नहीं उसमेंऐसा ही होता है। जैसा पहले था हजारों नदियों के गिरने केऐसा ही बाद में होता है। ऐसे ही जो व्यक्ति जीवन के समस्त भोग अपरिवर्तित रूप सेभोगने के पहले जैसा थाभोगने के बाद भी वैसा ही होता है। जैसे कि भोगा ही न होअर्थात जो भोगते हुए भी न-भोगा बना रहता हैजो भोगते हुए भी भोक्ता नहीं बनता हैजिसमें कोई भी अंतर नहीं आता हैजो जैसा था वैसा ही हैनहीं होतातो जैसा होताहोकर भी वैसा ही है। ऐसा व्यक्ति मुक्ति कोब्राह्मी-स्थिति को उपलब्ध हो जाता है।
कृष्ण कहते हैंहे पार्थ! तेरी मुक्ति की जिज्ञासा...।
बड़ी मजे की बात कहते हैं। क्योंकि अर्जुन ने जिज्ञासा मुक्ति की नहीं की थी। अर्जुन ने जिज्ञासा मुक्ति की नहीं की थीअर्जुन ने जिज्ञासा सिर्फ युद्ध से बचने की की थी। लेकिन कृष्ण कहते हैंहे पार्थ! तेरी मुक्ति की जिज्ञासातेरे मोक्ष की खोज के लिए तुझे यह बताता हूं।
अर्जुन ने नहीं की थी मुक्ति की जिज्ञासालेकिन अर्जुन ने जो भी जिज्ञासा की थीकृष्ण ने उसे इस बीच मुक्ति की जिज्ञासा में रूपांतरित किया है। इस पूरी यात्रा में कृष्ण ने अर्जुन की जिज्ञासा को भी रूपांतरित किया है। धीरे-धीरे युद्ध गौण हो गया है। धीरे-धीरे युद्ध रहा ही नहीं है। बहुत देर हो गईजब से युद्ध की बात समाप्त हो गई है। बहुत देर हो गईजब से अर्जुन भी और हो गया है।
अर्जुन शब्द का अर्थ होता हैदैट व्हिच इज़ नाट स्ट्रेट। ऋजु से बनता है वह शब्द। ऋजु का मतलब होता हैसीधा-सरल। अर्जुन का मतलब होता हैतिरछा-इरछा। अर्जुन का मतलब होता हैआड़ा-तिरछा। अर्जुन सीधा-सादा नहीं है,बहुत आड़ा-तिरछा है। विचार करने वाले सभी लोग आड़े-तिरछे होते हैं। निर्विचार ही सीधा होता है।
अर्जुन की जिज्ञासा को कृष्ण ने बहुत रूपांतरित किया हैट्रांसफार्म किया है। और ध्यान रहेसाधारणतः मनुष्य धर्म की जिज्ञासा शुरू नहीं करतासाधारणतः मनुष्य जिज्ञासा तो संसार की ही शुरू करता है। लेकिन उसकी जिज्ञासा को संसार से मुक्ति और मोक्ष की तरफ रूपांतरित किया जा सकता है। क्योंइसलिए नहीं कि कृष्ण कर सकते हैंबल्कि इसलिए कि संसार की जिज्ञासा करने वाला मनुष्य भी जानता नहीं कि क्या कर रहा है। उसकी गहरी और मौलिक जिज्ञासा सदा ही मुक्ति की होती है।
जब कोई धन खोजता हैतब भी बहुत गहरे में वैसा व्यक्ति आंतरिक दरिद्रता को मिटाने की चेष्टा में रत होता है--गलत चीज सेलेकिन चेष्टा उसकी यही होती है कि दरिद्र न रह जाऊंदिवालिया न रह जाऊं। जब कोई आदमी पद खोजता हैतब भी उसकी भीतरी कोशिशआत्महीनता न रह जाएउसी की होती है--गलत जगह खोजता है। जब कोई आदमी युद्ध से भागना चाहता हैतब भी वह युद्ध से नहीं भागना चाहताबहुत गहरे में संताप सेएंग्विश सेचिंता से ऊपर उठना चाहता है। लेकिन फिर भी वह ठीक दिशा में नहीं पहुंचता।
इस बात को कहकर कृष्ण बहुत गहरा इंगित दे रहे हैं। वे कह रहे हैंहे अर्जुनतेरी मुक्ति की जिज्ञासा के लिए मैंने यह सब कहा। अगर तू महासागर जैसा हो जाएजहां सब आए और सब जाएलेकिन तुझे छुए भी नहींस्पर्श भी न करेअनटच्डअस्पर्शिततू पीछे वैसा ही रह जाए जैसा थातो तू ब्राह्मी-स्थिति को उपलब्ध हो जाता है। ब्राह्मी-स्थिति अर्थात तब तू नहीं रह जाता और ब्रह्म ही रह जाता है।
और जहां मैं नहीं रह जाताब्रह्म ही रह जाता हैवहां फिर कोई चिंता नहींक्योंकि सभी चिंताएं मैं के साथ हैं। जहां मैं नहीं रह जाता और ब्रह्म ही रह जाता हैवहां कोई दुख नहीं हैक्योंकि सब दुख मैं की उत्पत्तियां हैं। और जहां मैं नहीं रह जाता और ब्रह्म ही रह जाता हैवहां कोई मृत्यु नहींक्योंकि मैं ही मरता हैजन्म लेता है। ब्रह्म की न कोई मृत्यु हैन कोई जन्म है। वह है।
ऐसा कृष्ण ने इस दूसरे अध्याय की चर्चा मेंजिसे गीताकार सांख्ययोग कह रहा हैपहले अध्याय को कहा था विषादयोगदूसरे अध्याय को कह रहा है सांख्ययोग। विषाद के बाद एकदम सांख्य! कहां विषाद से घिरा चित्त अर्जुन का और कहां ब्राह्मी-स्थिति अनंत आनंद से भरी हुई! इस संबंध में एक बातफिर मैं अपनी बात पूरी करूं।
धन्य हैं वेजो अर्जुन के विषाद को उपलब्ध हो जाएं। क्योंकि उतने विषाद में से ही ब्राह्मी-स्थिति तक के शिखर तक उठने की चुनौती उत्पन्न होती है। कृष्ण ने अर्जुन के विषाद को ठीक से पकड़ लिया।
अगर अर्जुन किसी मनोवैज्ञानिक के पास गया होतातो मनोवैज्ञानिक क्या करता! चूंकि मैंने यह कहा कि कृष्ण का यह पूरा शास्त्र एक साइकोलाजी हैइसलिए मैं यह भी अंत में आपसे कह दूंअगर मनोवैज्ञानिक के पास अर्जुन गया होतातो मनोवैज्ञानिक क्या करता! मनोवैज्ञानिक अर्जुन को एडजस्ट करता। मनोवैज्ञानिक कहता कि समायोजित हो जा। ऐसा तो युद्ध में होता ही हैसभी को ऐसी चिंता पैदा होती है। यह बिलकुल स्वाभाविक है। तू नाहक की एबनार्मल बातों में पड़ रहा है। तू व्यर्थ की विक्षिप्त बातों में पड़ रहा है। ऐसे पागल हो जाएगान्यूरोसिस हो जाएगी। अर्जुन नहीं मानतातो वह कहता कि तू फिर इलेक्ट्रिक शॉक ले लेइंसुलिन के इंजेक्शन ले ले।
लेकिन कृष्ण ने उसके विषाद का क्रिएटिव उपयोग किया। उसके विषाद को स्वीकार किया कि ठीक है। अब इस विषाद को हम ऊपर ले चलते हैं। हम तुझे विषाद के लिए राजी न करेंगे। हम विषाद का ही उपयोग करके तुझे ऊपर ले जाएंगे।
असल में ज्ञान सदा ही अभिशाप को वरदान बना लेता है। अभिशाप को वरदान न बनाया जा सकेतो वह ज्ञान नहीं। अर्जुन के लिए जो अभिशाप जैसा फलित हुआ थाकृष्ण ने उसे वरदान बनाने की पूरी चेष्टा की है। उसके दुख का भी सृजनात्मक उपयोग किया है।
इसलिए मैं यह कहता हूं कि भविष्य का जो मनोविज्ञान होगावह सिर्फ मरीज को किसी तरह मरीजों के समाज में रहने योग्य नहीं बनाएगाबल्कि मरीज की यह जो बेचैन स्थिति हैइस बेचैन स्थिति को मरीज की पूरी आत्मा के रूपांतरण के लिए उपयोग करेगा। वह क्रिएटिव साइकोलाजी होगी।
इसलिए कृष्ण का मनोविज्ञान साधारण मनोविज्ञान नहींसृजनात्मक मनोविज्ञान है। यहां हम कोयले को हीरा बनाने की कोशिश करते हैंयह अल्केमी है। जैसा अल्केमिस्ट कहते रहे हैं कि हम लोअर बेस मेटल को--सस्ती और साधारण धातुओं को--सोना बनाते हैं। पता नहीं उन्होंने कभी बनाया या नहीं बनाया। लेकिन यहां अर्जुन बड़े बेस मेटल की तरह कृष्ण के हाथ में आया थाकोयले की तरहउस कोयले को हीरा बनाने की उन्होंने बड़ी कोशिश की।
धन्य हैं वेजो अर्जुन के विषाद को उपलब्ध होते हैं। क्योंकि उनकी ही धन्यता ब्राह्मी-स्थिति तक पहुंचने की भी हो सकती है।
मेरी बातों को इतने प्रेम और आनंद से सुनाइससे बहुत अनुगृहीत हूं और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं।
मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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