शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-02)-प्रवचन-005

जीवन एक लीला

प्रश्न:
भगवान श्रीकल के तेरहवें श्लोक की व्याख्या में आपने चार वर्णों की बात कही। कृष्ण इस श्लोक के दूसरे हिस्से में कहते हैं कि इन चारों वर्णों की गुण और कर्मों के अनुसार रचना करते हुए भी मैं अकर्ता ही रहता हूं।
कृपया इसे स्पष्ट करें कि वे कैसे अकर्ता रहे?

रते हुए भी मैं अकर्ता हूंकृष्ण का ऐसा वचन गहरे में समझने योग्य है। पहली बातकर्म से कर्ता का भाव पैदा नहीं होता। कर्म अपने आप में कर्ता का भाव पैदा करने वाला नहीं है। कर्ता का भाव भीतर मौजूद होतो कर्ता का भाव कर्म के ऊपर सवार हो जाता है। भीतर अहंकार होतो कर्म पर सवारी कर लेता है। ऐसेकर्म अपने आप मेंकर्ता के भाव का जन्मदाता नहीं है।
तो कृष्ण की बात तो छोड़ें एक क्षण कोहम भी चाहेंतो कर्म करते हुए अकर्ता हो सकते हैं। कर्म ही कर्ता का निर्माता नहीं हैकर्ता का निर्माता अहंकार का भाव है। और अहंकार का भाव इतना अदभुत है कि आप कुछ न करेंतो भी कुछ न करने का कर्ता भी बन जाता है।
आप रास्ते पर चल रहे हैंचलने की क्रिया घटित होती है। अगर इस चलने के कर्म को बहुत गौर से देखेंतो आप भीतर कहीं भी चलने वाले को न पाएंगेसिर्फ चलने की क्रिया ही मिलेगी। कितना ही खोजेंचलने वाला कहीं न मिलेगा। क्योंकि भीतर जो मौजूद हैवह चलता ही नहीं है। क्रिया चलने की बाहर ही होती हैभीतर चलने वाला कोई भी नहीं है। भीतर तो जो हैवह अचल हैचलता ही नहीं। कभी चला ही नहीं। आप हजारों मील की यात्रा कर चुके होंतो भी भीतर जो हैवह अपनी ही जगह है। वह इंचभर भी नहीं चला है। लेकिन अहंकार का भाव चलने की क्रिया पर सवार हो जाता है और कहता है,मैं चलता हूं।
रास्ते पर चलते वक्त गौर से देखनाचलने वाला कहीं भी मिलता है खोजने सेचलने की क्रिया हैसच। चलने वाला कहीं भी नहीं है। लेकिन हमारी भाषा में कुछ बुनियादी भूलें हमारे अहंकार के कारण प्रवेश कर गई हैं। हमें ऐसा लगता है कि जब चलने की क्रिया हैतो चलने वाला भी होना ही चाहिए।
यह करीब-करीब बात वैसी ही हैजैसे हम कहते हैं कि आकाश में बिजली चमकती है। यह वाक्य बिलकुल ही गलत है। अस्तित्व की दृष्टि से बिलकुल ही गलत है। इसमें ऐसा लगता हैबिजली कुछ और है और चमकना कुछ और है। बिजली चमकती है। सच बात इतनी है कि चमकने का नाम बिजली है। इसमें चमकने वाला औरऔर चमकने की क्रिया और--ऐसी भ्रांति पैदा होती है वाक्य से। बिजली चमकती हैऐसा ठीक नहीं है। चमकता है जोउसका नाम बिजली है। चमकना बिजली है।
हम कहते हैंवर्षा बरसती है। एकदम ही गलत बात कहते हैं। वर्षा का मतलब हैजो बरस रही है। अब वर्षा बरसती है,यह रिपीटीशन हैयह पुनरुक्ति हैयह व्यर्थ ही हम कह रहे हैं।
अगर हम किसी भी क्रिया के भीतर प्रवेश करेंतो हम कर्ता को कभी न पाएंगेसिर्फ क्रिया ही मिलेगी। भीतर कौन मिलेगा लेकिनभीतर जरूर कोई है। वह कर्ता नहीं हैद्रष्टा हैसाक्षी है। समस्त क्रियाओं के भीतर द्रष्टा हैसाक्षी है।
आपके पेट में भूख मालूम होती है। आप कहते हैंमुझे भूख लगी है। जैसे कि आप भूख को लगा रहे हैंजैसे कि आप कर्ता हैं! सचाई उलटी है। सचाई इतनी ही है कि आपको पता चलता है कि भूख लगी है। आपको भूख नहीं लगती। भूख की क्रिया घट रही हैआप सिर्फ जानते हैं कि भूख लगी है। अगर ठीक से हम कहेंतो कहना चाहिए कि मैं जान रहा हूं कि भूख लगी है। ऐसा नहीं कहना चाहिएमुझे भूख लगी है।
आपके सिर में दर्द हैतो भी आप में दर्द नहीं हैआप सिर्फ जान रहे हैं कि सिर में दर्द है। और जब आपको दर्द के मिटाने वाली दवा दे दी जाती हैएस्पिरिन दे दी जाती हैतो आप यह मत सोचना कि दर्द मिट गया। दर्द अपनी जगह है। लेकिन दर्द का जानने वाले तक पहुंचने का रास्ता टूट गया। अब आप जान नहीं रहे कि दर्द हो रहा है। जान नहीं रहे हैं,इसलिए अब आप कहते हैं कि अब सिर में दर्द नहीं हो रहा है।
पिछले महायुद्ध में ऐसा हुआ कि फ्रांस में एक सैनिक के पैर में बहुत चोट लगी। वह बेहोश हो गया। चोट ऐसी थी कि पैर बचाया नहीं जा सका। रात बेहोशी में ही घुटने से नीचे का हिस्सा काट दिया गया। अंगूठे में बहुत तकलीफ थीजब वह होश में था। सुबह जब वापस होश में आयातो उसने कहा कि मेरे अंगूठे में बहुत तकलीफ है। पर अंगूठा तो अब था ही नहीं! पास की नर्स ने कहाआप जरा फिर से सोचें। अंगूठे में तकलीफ हैमजाक में ही कहा। उसने कहाबहुत तकलीफ है।
नर्स ने कंबल उठाकर बताया कि पैर के नीचे का हिस्सा तो अब है ही नहीं। जो अंगूठा नहीं हैउसमें तकलीफ कैसे हो सकती हैउस आदमी ने देखा और उसने कहा कि दिखाई पड़ रहा है मुझे भलीभांति कि पैर घुटने से नीचे का काट दिया गया हैनहीं है। लेकिन फिर भी मुझे अंगूठे में तकलीफ है। मैं भी क्या कर सकता हूंउस सैनिक ने कहाअगर अंगूठे में तकलीफ हैतो मैं भी क्या कर सकता हूं?
डाक्टर बुलाए गए। समझा कि कुछ भ्रम हो गया है उस आदमी को। बहुत तकलीफ थीभूला नहीं है। अब तो हो नहीं सकती। समझाने-बुझाने की कोशिश की। लेकिन उस आदमी ने कहामैं पूरे होश में हूं। मुझे दिखाई पड़ रहा है कि अब पैर नहीं बचाइसलिए तकलीफ होनी नहीं चाहिए। तर्कयुक्त मुझे भी मालूम पड़ती है बात। लेकिन मैं क्या कर सकता हूं! तकलीफ है!
फिर और खोजबीन की गईतो पाया गया कि वह आदमी ठीक कहता थातकलीफ थी। तो बहुत मुश्किल हो गई। जो अंगूठा नहीं हैउसमें तकलीफ कैसे हो सकती हैखोजबीन से पता चला कि अंगूठे की तकलीफ जिन तंतुओं के द्वारा मस्तिष्क तक पहुंचती हैवे अभी भी खबर दे रहे हैं। अंगूठा तो बहुत दूर है मस्तिष्क सेबीच में तो तारों का जाल हैजो खबर पहुंचाते हैं। वे कंपते हैं और कंपकर खबर पहुंचाते हैं। वे अभी भी कंप रहे हैं। मस्तिष्क के पास जो छोर है तंतु कावह अभी भी कंपकरखबर दे रहा है कि दर्द है। अंगूठा नहीं हैऔर दर्द है!
असल में मस्तिष्क तक चेतना में कोई दर्द नहीं है। चेतना को सिर्फ पता चलता है। अगर पता चलता रहेतो ऐसा दर्द भी मालूम पड़ेगाजो नहीं है। और अगर पता न चलेतो ऐसा दर्द भी मालूम नहीं पड़ेगाजो है।
चेतना सिर्फ ज्ञाता हैनोअर हैविटनेसिंग है। सिर्फ एक साक्षी-भाव है।
हम भी क्रिया के भीतर कर्ता नहीं हैं। कर्ता हमारा भ्रम है। परमात्मा को ऐसा भ्रम नहीं हो सकता। इसलिए कृष्ण कहते हैंयह सब करते हुए भी मैं अकर्ता हूं। हम भी जिस दिन जानेंगेपाएंगे यही कि सब करते हुए भी अकर्ता हूं। लेकिन वह दिन दूर है। जिस दिन हम यह जानेंगेउस दिन हम भी परमात्मा का हिस्सा हो जाएंगे।
एक तो इस दृष्टि से इस सूत्र को समझें। यह साधक के लिए उपयोगी है कि वह धीरे-धीरे अकर्ता होता चला जाएसाक्षी बनता चला जाए। एक दिन ऐसी घड़ी आ जाए कि उसकी जिंदगी में कर्ता का कोई बोध ही न बचे। बसवह सिर्फ जानने वाला रह जाए।
जिस दिन यह घड़ी आती हैउसी दिन समाधि फलित हो जाती है। उसी दिन जीवन का परम सौभाग्य का क्षण आ जाता है। उसी दिन हम वहां पहुंच जाते हैंजहां जन्मों से पहुंचने की आकांक्षा है। उस दिन मंजिल मिल जाती है। वह यात्रा-पथ समाप्त होता हैमुकाम आ जाता है। उस दिन हम मंदिर में प्रविष्ट होते हैं। उस दिन तीर्थ आ गयाजिस दिन हमने जाना कि अब कर्ता कोई भी नहीं हैसिर्फ देखने वालाजानने वाला है।
दूसरे अर्थों में भी कृष्ण के कहने का प्रयोजन है। परमात्मा के पास अहंकार नहीं हो सकता। क्योंक्योंकि अहंकार अहंकारों के बीच में ही हो सकता हैअकेला नहीं हो सकता। दो परमात्मा जगत में नहीं हैं। अहंकारमैं का भाव सदा तू के भाव से जुड़ा हुआ है। अगर तू न बचेतो मैं नहीं बच सकता। कोई अर्थ नहीं रह जाता उसमें।
इसलिए जितने आप भीड़ में होते हैंउतने अहंकार से भर जाते हैं। जितने एकांत में होते हैंउतने अहंकार से खाली हो जाते हैं।
अगर साधक एकांत की तरफ भागता रहा हैतो उसका कारण यह नहीं है कि वह समाज से भाग रहा है। उसका बहुत गहरे में कारण यही है कि अकेले में उसे अहंकार के विसर्जन की सुविधा मालूम पड़ती है। जैसे ही दूसरा मौजूद हुआ कि मेरा मैं भी खड़ा हो जाता है।
आप अपने कमरे में अकेले बैठे हैंकोई नहीं है। तब अहंकार बहुत क्षीण होता है। होता हैक्योंकि आपके मन में दूसरे मौजूद होते हैं। कमरे में तो मौजूद नहीं होतेमन में मौजूद होते हैं। मन में मौजूद होने के कारण थोड़ा-सा अहंकार शेष रहता है।
रात गहरी नींद में सो गए हैं। जब तक सपना चलता हैतब तक अहंकार थोड़ा-सा मौजूद रहता है। लेकिन जब सपना भी बंद हो जाता हैतब कोई अहंकार मौजूद नहीं रह जातातब आपके भीतर मैं का कोई भाव नहीं होता। इसलिए सुबह जब आप उठकर कहते हैं कि रात बड़ी गहरी नींद आईबड़ा आनंद आयावह आनंद गहरी नींद का नहीं हैवह आनंद मैं से मुक्त हो जाने के क्षणों का है। क्षणभर के लिए भी रात अगर इतनी गहरी नींद हो गई कि मैं न रहातो बड़ी गहरी ब्लिसबहुत गहरे आनंद के लोक से संस्पर्श हो जाता है। एक स्वर्ग उस गहराई से आ जाता हैजो परमात्मा का है।
इसलिए सुषुप्ति समाधि के बहुत करीब हैऔर बहुत दूर भी। करीब इसलिए है कि जैसे समाधि में मैं मिट जाता हैवैसे ही सुषुप्ति में भी मिट जाता है। दूर इसलिएकि सुषुप्ति में प्राकृतिक मूर्च्छा के कारण मैं मिटता हैऔर समाधि में व्यक्ति की सजगता के कारण मैं मिटता है।
मैं की मौजूदगी के लिए तू का होना जरूरी है। तू के बिना मैं के बनने का कोई उपाय नहीं है। मैं और तू पोलेरिटी है। जैसे कि बिजली ऋण और धन के बिना नहीं हो सकती। पाजिटिव इलेक्ट्रिसिटी अकेली नहीं हो सकतीनिगेटिव के बिना। निगेटिव अकेली नहीं हो सकतीपाजिटिव के बिना। जैसे इस पृथ्वी पर पुरुष अकेले नहीं हो सकतेस्त्रियों के बिनास्त्रियां अकेली नहीं हो सकतींपुरुषों के बिना।
आपको शायद खयाल न आया होजब स्त्री आपके सामने मौजूद होती हैतब आपके भीतर का पुरुष बहुत सक्रिय हो जाता है। जब स्त्री मौजूद नहीं होतीतब निष्क्रिय हो जाता है। जब स्त्री के सामने पुरुष मौजूद होता हैतब स्त्रैणता आ जाती हैजब पुरुष नहीं रह जातातो स्त्रैणता विलीन हो जाती है।
दूसरा पोल सदा मौजूद चाहिए। मैं का दूसरा हिस्सा तू है। मैं और तू एक ही घटना के दो छोर हैंजैसे एक ही डंडे के दो छोर। अगर तू गिर जाएतो भी मैं गिर जाता हैअगर मैं गिर जाएतो भी तू गिर जाता है। परमात्मा के लिए कोई तू नहीं है। इसलिए मैं के बनने का कोई उपाय नहीं है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैंविशेषकर पश्चिम का एक मनोवैज्ञानिक पियागेटजिसने पूरी जिंदगीबच्चों में मैं का भाव कैसे पैदा होता हैइस पर समर्पित की हैउसकी बड़ी हैरानी की खोजें हैं। वह कहता है कि बच्चे में मैं का भाव बाद में पैदा होता है,तू का भाव पहले पैदा होता है। बच्चे को पहले दूसरों का पता चलता हैफिर अपना पता चलता है। ठीक भी यही है। बच्चे को पहले पता चलता है और लोगों का।
इसलिए अक्सर बच्चे ऐसा नहीं कहते कि मुझे भूख लगी है। छोटा बच्चा कहता हैइसको भूल लगी है। यह भी उसके लिए दि अदरऔर की तरह मालूम पड़ता है। छोटे बच्चे अक्सर अपना नाम लेते हैंवे कहते हैंबबलू को भूख लगी है! उनका नाम बबलू है। वे ऐसा नहीं कहतेमुझे भूख लगी है। अभी मुझे का भाव बहुत गहरा नहीं हुआ है। अभी बबलू भी थर्ड पर्सन है। कहता हैबबलू को नींद आ रही है।
पियागेट कहता है कि बच्चों को पहले तू का पता चलता हैफिर धीरे-धीरे मैं का पता चलता है। इसलिए बच्चे इतने भोले मालूम पड़ते हैंक्योंकि मैं का पता चलने में जरा देर है अभी। अभी मैं का छोर निर्मित हो रहा है। जब निर्मित हो जाएगा,तो बच्चे कठिन और कठोर हो जाएंगे।
इसलिए जब बच्चों में पहली दफा मैं पैदा होता हैतब रिबेलियन पैदा होता है। इसलिए एक उम्र है बच्चों कीजोरिबेलियन की हैविद्रोह की हैबगावत की है। जब पहली दफे बच्चे में मैं आता हैतब वह सब तरफ मैं की परीक्षा करता है। बाप के खिलाफमां के खिलाफगुरु के खिलाफ वह मैं की परीक्षा करता है--मैं हूं।
तो अगर मां कहती है कि यह मत करोतो वह करके दिखाता हैनहीं तो पता कैसे चले कि मैं हूं! अगर बाप कहता है,वहां मत जाओतो वह जाकर बताता हैनहीं तो पता कैसे चले कि मैं हूंइसलिए बड़ी स्वाभाविक बात है कि बच्चे कुछ दिनों मां-बाप के खिलाफ लड़ते हैं। वह खिलाफ लड़कर हीवे अपनी ईगो को मजबूत करते हैं।
यह मैंने इसलिए कहा कि परमात्मा के लिए मैं का कोई उपाय नहीं हैक्योंकि तू का कोई उपाय नहीं है।
इसलिए कृष्ण कहते हैंमैं करता हुआ भी अकर्ता हूं। मैं होते हुए भी न होने जैसा हूं। हूंऔर फिर भी मैं नहीं हूं। क्योंकि तू का तो कोई उपाय नहीं है। परमात्मा किसको कहे तूकोई उपाय नहीं है। इसलिए भी उनका यह वचन बहुत अर्थपूर्ण है। और एक तीसरे अर्थ में भी।
परमात्मा के लिए अस्तित्व ऐसे ही हैजैसे हमारे लिए शरीर। एक आर्गेनिक यूनिटी है। मैं अपने हाथ को तू नहीं कहता;मैं अपने हाथ को मैं ही कहता हूं। मैं अपने पैर को तू नहीं कहतामैं अपने पैर को मैं ही कहता हूं। मेरा शरीर मेरा ही विस्तार है। परमात्मा के लिए समस्त अस्तित्व उसका ही विस्तार है। वही है। इसलिए जब परमात्मा कुछ निर्माण भी करता हैसृजन भी करता हैक्रिएट भी करता हैतो वह सृजन भी पराए का सृजन नहीं है। उस सृजन को भी समझ लेना उचित है।
एक चित्रकार एक चित्र बनाता है। तो जब चित्रकार चित्र बनाता हैतो चित्र अलग हो जाता हैचित्रकार अलग हो जाता है। फिर चित्रकार मर भी जाएतो भी चित्र नहीं मरेगाचित्र बना रहेगा। चित्र का अपना अस्तित्व हो गया। एक मूर्तिकार मूर्ति निर्माण करता है। मूर्ति अलग बन गई। मूर्तिकार न भी रहेतो अब मूर्ति को कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे मां ने बेटे को जन्म दे दियाअब मां मर जाएगीतो भी बेटा रहेगा। अब बेटे का अस्तित्व अलग हो गया। ऐसे ही मूर्तिकार ने मूर्ति को जन्म दे दिया। मूर्ति अलग हो गई। मूर्ति जन्मते ही तू हो गई। मूर्तिकार अब मूर्ति को मैं नहीं कह सकताअब उसको तू ही कहना पड़ेगा। अब मूर्ति का अपना अस्तित्व है।
लेकिन एक नृत्यकार हैएक डांसर है। वह नाचता है। नाच अलग नहीं हो पाता। कितना ही नाचेतो भी नृत्य और नर्तक एक ही रहते हैं। इसलिए हमने परमात्मा को नृत्य करते हुए नटराज की तरह सोचामूर्ति बनाते हुए नहीं सोचाचित्र बनाते हुए नहीं सोचा। नृत्य करते हुए सोचा। उसका गहरा रहस्य है। उसका कुल कारण यह है कि जैसे नर्तक और नृत्य एक ही हैंअगर नर्तक रुक जाएतो नृत्य रुक जाएगा। और बड़े मजे की बात हैअगर नृत्य रुक जाएतो नर्तक नर्तक नहीं रह गया;क्योंकि नर्तक तभी तक नर्तक हैजब तक नृत्य चल रहा है। नर्तक और नृत्य के बीच एक एकात्मता हैएक ही हैं वे। नर्तक नृत्य को अलग रखकर तू नहीं कह सकता और न नर्तक नृत्य को अलग रखकर नर्तक रह सकता है।
तो परमात्मा के और सृष्टि के बीच जो संबंध हैवह नर्तक और नृत्य का है। न तो परमात्मा स्रष्टा रह सकता है सृष्टि को बंद करके--इसलिए बंद ही नहीं कर सकतानहीं तो स्रष्टा नहीं रह जाएगा। बंद होना होगा ही नहीं। सृष्टि शाश्वत चलती ही रहेगी। क्योंकि स्रष्टा और सृष्टि एक हैं। दि क्रिएटर एंड दि क्रिएशन आर वन। नर्तक और नृत्य की भांति। इसलिए सृष्टि को भी परमात्मा तू नहीं कह सकता। वहां भी तू के लिए कोई उपाय नहीं हैगुंजाइश नहीं हैअवकाश नहीं हैजगह नहीं हैजहां वह तू को खड़ा कर सके।
इसलिए कृष्ण कहते हैं कि सब करते हुए भी मैं अकर्ता हूं। कर्ता मुझे नहीं पकड़ पाता। मैं मुझे नहीं पकड़ पाता। कर्म अहंकार को निर्मित नहीं कर पाते हैं।
करीब-करीब ऐसे हीजैसे कभी गर्मी के दिनों में देखा हो अंधड़। कभी हवा का तेज अंधड़ आता है गर्मी के दिनों में। धूल का बवंडर उठता है वर्तुलाकार। धूल के आकाश में बवंडर ऊंचे उठते चले जाते हैं। जब बवंडर चला जाएतो जाकर जमीन को देखनातो बहुत हैरानी होगी। बड़ा बवंडर थाबड़ा तूफान था। निशान बन गए होंगे जमीन परउसके घूमने के। लेकिन बीच में एक सूनी खाली जगह भी होगी--शून्यजहां कोई निशान नहीं होगा। उसी शून्य पर सारा बवंडर घूमा। जैसे कील पर चाक घूमता है। उस खाली शून्य पर सारे बवंडर का तूफान आयाबीच में सब शून्य था।
परमात्मा एक बवंडर की तरह अस्तित्व है। बीच में कोई मैं नहीं हैवहां सब बीच में शून्य है। चारों तरफ अस्तित्व की विराट लीला है।
इसीलिए हम जगत को परमात्मा की लीला कहते हैं। सृष्टि से भी सुंदर शब्द है वहलीलाप्ले। क्योंकि खेल में अहंकार नहीं होता।
हमें हो जाता है। और जब खेल में अहंकार हो जाता हैतो खेल काम हो जाता हैफिर खेल नहीं रह जाता। हमें तो खेल में भी हो जाता है। दो आदमी ताश भी खेल रहे होंतो अकड़ आ जाती है। शतरंज भी खेल रहे होंतो तलवारें खिंच जाती हैं। हमें तो खेल में भी अहंकार आ जाता हैहार-जीत जोर से पकड़ जाती है। फिर वह खेल नहीं रहाफिर तो वह काम ही हो गया;दुकान ही हो गई।
खेल तभी तक हैजब तक भीतर मैं नहीं है। लीला चल रही है। हारेतो भी ठीक हैजीतेतो भी ठीक है। कोई खास फर्क नहीं पड़ता। हांकभी-कभी ऐसा होता है। अगर बाप कभी बच्चे के साथ खेल खेलता हैतो ऐसा होता है। बाप बच्चे के साथ खेल खेलता हैतो ऐसा होता हैक्योंकि बच्चे के साथ अहंकार पकड़ने में बाप को भी नासमझी मालूम पड़ती है। फिर हारने कीजीतने की फिक्र नहीं करता। कई दफे तो खुद ही हार जाता हैक्योंकि बच्चा नहीं तो जीतेगा कैसेखुद लेट जाता हैबच्चे को छाती पर बिठा लेता हैऔर बच्चा खुशी से भर जाता है। और बच्चे की जीत की खुशी बाप की भी खुशी बन जाती है--हारकर। अब यह खेल है।
परमात्मा के लिए जगत एक खेल है। कई बार हमें जिताता भी है। बसबच्चे की तरह। कई बार हम उसकी छाती पर भी होते हैंपर बच्चे की तरह। भीतर उसके लिए कोई अहंकार नहीं है। ऐसी निरहंकार स्थिति की घोषणाकृष्ण ने इस वचन में की है। उसे समझें। और धीरे से वह जीवन में कभी उतर आएतो बड़ा सौभाग्य है।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।। 14।।

कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं हैइसलिए मेरे को कर्म लिपायमान नहीं करते। इस प्रकार जो मेरे को तत्व से जानता हैवह भी कर्मों से नहीं बंधता है।

कृष्ण कहते हैंकर्मों के फलों में मेरी स्पृहा नहीं हैइसलिए कर्म मुझे लिप्त नहीं कर पाते हैं। और जो मुझे ऐसा जानता हैवह भी कर्मों के लिप्त होने से मुक्त हो जाता है।
कर्मों के फलों में स्पृहा नहीं हैकर्मों के फलों की आकांक्षा नहीं है। खेल और कर्म का यही फर्क है। फल की आकांक्षा हो,तो खेल भी कर्म बन जाता। फल की आकांक्षा न होतो कर्म भी खेल बन जाता। बसकर्म और खेल का फर्क ही फल की आकांक्षा है।
आप सुबह-सुबह घूमने निकले हैं--घूमनेजस्ट फार ए वाक--कोई पूछता हैकहां जा रहे हैंआप कहते हैंकहीं जा नहीं रहाघूमने जा रहा हूं। कहते हैंकहीं जा नहीं रहाघूमने जा रहा हूंअर्थात फल का कोई सवाल नहीं हैकहीं पहुंचने का कोई प्रयोजन नहीं है। कहीं पहुंचने को नहीं जा रहा। कोई मंजिल नहीं हैकोई मुकाम नहीं हैजहां के लिए जा रहा हूं। बसघूमने जा रहा हूं।
इसी रास्ते से दोपहर को आप दुकान की तरफ भी जाते हैं। तब आप बस घूमने नहीं जा रहे हैंकहीं जा रहे हैं। रास्ता वही हैआप वही हैंपैर वही हैं। लेकिन कभी आपने फर्क देखा कि सुबह के घूमने का आनंद और हैऔर दोपहर को दुकान की तरफ जाने का बोझ और है। रास्ता वहीआप वहीपैर वहीहवाएं वहीसूरज वहीफर्क कहां है?
फर्क--सुबह खेल थादोपहर काम हो गया। सुबह स्पृहा न थी फल की। कहीं पहुंचने का कोई प्रयोजन न था। कर्म ही फल था। कर्म के बाहर कोई फल न था। घूम लिएकाफी है। घूमना अपने आप में अंत थाएंड इन इटसेल्फ। पार कहीं कोई बात न थी। कहीं जाना न थाकुछ पाना न था। कुछ पाने को न थाघूमना ही पाना था। वही क्षणवही कृत्य सब कुछ था। उसके बाहर कोई स्पृहा न थी। तब एक हल्कापन था पैरों मेंपक्षियों के परों का हल्कापन था। मन में हवाओं की ताजगी थी;आंखों में फूलों की सरलता थी। कहीं जा न रहे थेकोई तनाव न थाकोई टेंशन न था। एक-एक कदम स्पांटेनियस था। कहीं भी रुक सकते थे और कहीं से भी वापस लौट सकते थे। कोई दबाव न था। कहीं खींचे न जा रहे थेकहीं से धकाए न जा रहे थे। न तो पीछे से कोई धक्का दे रहा था कि जाओन आगे से कोई खींच रहा था कि आओ। प्रत्येक कदम अपने आप में पूरा थाटोटल इन इटसेल्फ। कहीं भी रुक सकते थेवापस लौट सकते थे। कोई न कहता कि वापस क्यों लौटते होमन न कहता कि अरेबिना मुकाम पाए वापस क्यों जाते होघूमने में खेल थाकर्म की स्पृहा न थी।
परमात्मा कहीं पहुंचने को नहीं कर रहा है। यह परमात्मा काअस्तित्व काएक्झिस्टेंस का कोई उद्देश्य नहीं है। यह बड़ी कठिन बात है समझनी।
अस्तित्व निरुद्देश्य है। निरुद्देश्य ही खिलते हैं फूल। निरुद्देश्य ही गीत गाते हैं पक्षी। निरुद्देश्य ही चलते हैं चांदत्तारे। निरुद्देश्य ही पैदा होता है जीवन और विलीन। हमें बहुत कठिन हो जाएगा!
ह्यूमन माइंडमनुष्य का मन उद्देश्य के बिना कुछ भी नहीं समझ पाता। हमें लगता हैबिना उद्देश्य! फिर किसलिए?यानी मतलबहम फिर से पूछते हैं कि फिर उद्देश्य क्यानिरुद्देश्य है जीवन। इसका दूसरा अगर पर्याय बनाएंतो होगा जीवन आनंद है अपने मेंउसके बाहर कहीं कोई पहुंचने की बात नहीं है।
कृष्ण यही कहते हैंपरपजलेसनेस। कहते हैंमेरे लिए कोई ऐसा नहीं है कि जो मैं कर रहा हूंउसमें कोई मजबूरीकोईकंपल्शन नहीं हैआनंद है। सुबह बच्चे उठकर खेल रहे हैंनाच रहे हैं--बसऐसे ही। बसऐसे ही सारा अस्तित्व आनंदमग्न है,आनंद के लिए ही।
इसलिए कृष्ण के जीवन को हम लीला कहते हैं। राम के जीवन को चरित्र कहते हैं। राम का जीवन बड़ा गंभीर है। बड़े उद्देश्यपूर्ण चलते मालूम पड़ते हैं। एक-एक बात का चुनाव है। यह करेंगे और यह न करेंगे। ऐसा ठीक है और ऐसा गलत है।
राम के जीवन में उद्देश्य की बड़ी स्पष्टता है। कृष्ण के जीवन में उद्देश्य बिलकुल ही मटियामेट हो जाते हैं। कृष्ण के जीवन में बड़ी निरुद्देश्यता है। इसलिए राम को हम आंशिक अवतार ही कह पाएपूर्ण अवतार न कह सके। कृष्ण को हम पूर्ण अवतार कह सकेक्योंकि परमात्मा जिस तरह पूरा निरुद्देश्य हैऐसा ही यह व्यक्ति भी पूरा निरुद्देश्य है। एक-एक कृत्य खेल की तरह हैकाम की तरह नहीं है।
पर कृष्ण जो यह वक्तव्य देते हैंफल की स्पृहा नहीं है। हमें समझना बहुत कठिन हो जाएगा। क्योंकि हम तो कहेंगे,फल की स्पृहा न होतो हम कदम ही न उठाएंगे। अगर फल न पाना होतो हम कुछ करेंगे ही क्योंहमें तो सारा कर्म फल प्रेरित हैरिजल्ट ओरिएंटेड है। फल आता होतो हम करेंगे। फल न आता हो तोफल न आता होतो हम क्यों करेंगेहमारा जीवन वर्तमान में नहींसदा भविष्य में है। हम आज नहीं जीतेसदा कल जीते हैं।
कल कभी जी नहीं सकतेसिर्फ खयाल में ही रहते हैं। इसलिए हम जीते कममरते ही ज्यादा हैं। हम कहते हैंकल। फल सदा कल है। फल का मतलबकल।
फल कभी आज नहीं है। फल आज हो नहीं सकता। आज तो कर्म ही हो सकता हैफल तो कल ही होगा। कल भी आ जाएगातब भी फल आगे कल पर सरक जाएगा। कल फिर जब आज बनेगातो कर्म ही होगा।
आज सदा कर्म हैफल सदा कल है। आजवर्तमान। कलभविष्य। फल सदा कल्पना में है। फल का कोई अस्तित्व नहीं हैअस्तित्व तो कर्म का है। परमात्मा भविष्य में नहीं जीताक्योंकि परमात्मा कल्पना में नहीं जीता।
कल्पना में कौन जीते हैंइसे समझ लेंतो कृष्ण की यह बात समझ में आ जाएगी। कल्पना में कौन जीते हैंजोफ्रस्ट्रेटेड हैंवे कल्पना में जीते हैं। जिनका जीवन विषाद से भरा हैदुख से भरा हैवे कल्पना में जीते हैं। क्योंक्योंकि कल्पना से वे अपने विषाद की परिपूर्ति करते हैंसब्स्टीटयूट करते हैं।
आज जिंदगी इतनी उदास है कि कल के फल की आशा से उस उदासी को हम मिटाए चले जाते हैं। आज तो जिंदगी में कुछ भी नहीं है। कल के फूलों की आशा में आज को सजाए चले जाते हैं। आज तो सब खाली और रिक्त है। कल का शृंगार,कल की आशाआज पैरों को गति देती है।
कल भी यही हुआ थाकल भी यही होगा। आज होगा सदा खालीऔर कल होगा सदा भरा हुआ! और अंत में जब जिंदगी का जोड़ लगाइएगातो ध्यान रखेंजिंदगी कल का जोड़ नहीं हैजिंदगी आज का जोड़ है। सब खाली आज जब आखिर में जुड़ेंगेतो पता चलेगाहाथ खाली के खाली रह गए। क्योंकि जिंदगी आज का जोड़ हैकल का जोड़ नहीं है।
आज अस्तित्व हैकल तो सिर्फ कल्पना हैइमेजिनेशन है। कल कभी आता नहीं। पर आज है पीड़ा से भरा। अगर कल भी न रह जाएतो बहुत मुश्किल हो जाएपैर का उठना मुश्किल हो जाए।
यह जो हमारी दुख से भरी स्थिति हैइसके लिए हम फलातुर हैं। परमात्मा आनंदमग्न है। फलातुर होने की जरूरत नहीं है। सिर्फ दुखी आदमी फलातुर होता हैदुखी चित्त फलातुर होता है। आनंदित चित्त फलातुर नहीं होता। आप भी जब कभी आनंद में होते हैंतो भविष्य मिट जाता है और वर्तमान रह जाता है। जब भी!
अगर आप किसी के प्रेम में पड़ गएतो भविष्य मिट जाता है। अगर आपका प्रेमी आपके पास बैठा हैतो वर्तमान ही रह जाता है। फिर आप यह नहीं सोचतेकल क्या होगाफिर आप वही जानते हैंजो अभी हो रहा है। कल खो जाता है।
जब आप संगीत में डूब जाते हैंतो कल खो जाता है। फिर आप यह नहीं सोचतेकल क्या होगाफिर आज हीअभी,दिस वेरी मोमेंटयही क्षण काफी हो जाता है। जब कोई भजन में लीन हो गयाकीर्तन में डूब गयातब यही क्षण सब कुछ हो जाता है। सारा अस्तित्व इसी क्षण में समाहित हो जाता है। सब सिकुड़करसारा अस्तित्व इसी क्षण में केंद्रित हो जाता है। इस क्षण के बाहर फिर कुछ भी नहीं है।
जीवन के जो भी आनंद के क्षण हैंवे वर्तमान के क्षण हैं। परमात्मा तो प्रतिपल आनंद में है। इसलिए उसकी कोई फलाकांक्षा नहीं हो सकती।
कृष्ण कहते हैंजिस दिन कोई इस सत्य को समझ लेता हैउस दिन वह भी फलातुर नहीं रह जाता।
अब मैं दूसरी बात आपसे कहूं। मैंने कहादुखी आदमी फलातुर होता है। और अब मैं आपसे यह भी कहूं कि फलातुरआदमी दुखी होता चला जाता है। यह विसियस सर्किल हैयह दुष्टचक्र है। दुखी होंगेतो फल की आकांक्षा करेंगे। फल की आकांक्षा करेंगेदुखी होंगे। ये जुड़ी हुई बातें हैं दोनों। क्योंदुखी होंगेतो मैंने समझायाफल की आकांक्षा क्यों करेंगे! क्योंकि इस क्षण के दुख को मिटाने का भविष्य की कल्पना के अतिरिक्त आपके पास कोई भी उपाय नहीं है। दिखाई नहीं पड़ताउपाय तो है।
कृष्ण उसी उपाय को बताते हैंलेकिन वह हमें दिखाई नहीं पड़ता। हमें यही दिखाई पड़ता है कि कल्पना में भूल जाओ। इस क्षण को भूल जाओ। भरोसा रखोकल सब ठीक हो जाएगा। आज जिंदगी अभिशाप हैकल वरदान बन जाएगी। आज कांटे हैंकल फूल हो जाएंगे। भरोसा रखो! कल तो आने दोकल सब ठीक हो जाएगा। कल तक प्रतीक्षा करने में इससे सहारा मिल जाता है। कंसोलेशनसांत्वना बन जाती है। फिर कल आ जाता है।
लेकिन दुख के कारण फल के तीर हमने भविष्य में पहुंचाए। दुख के कारण कामना के सेतु बनाए--इंद्रधनुष के सेतु,रेनबो ब्रिजेज--जिन पर चल नहीं सकतेजो सिर्फ दिखाई पड़ते हैं। पास जाओखो जाते हैं। इसलिए कभी इंद्रधनुष के पास नहीं जाना चाहिए। खो जाता है। दूर से लगता है कि बड़ा सेतु बना है। चाहो तो जमीन से आकाश में चले जाओ चढ़कर। पास भर न जाना। जाना खतरनाक है।
तो इच्छाओं के सेतु बनाते हैं कल में। बड़े प्रीतिकर लगते हैं। इंद्रधनुष के सब रंग होते हैं उनमें। शायद इंद्रधनुष से भी ज्यादा रंग होते हैं। फिर कल आता है और इंद्रधनुष दिखाई नहीं पड़ता कि कहां है। तब दुख पैदा होता है। दुख थाइसलिए इंद्रधनुष बनायाफिर इंद्रधनुष नहीं मिलतातो दुख पैदा होता है। फिर और बड़े इंद्रधनुष बनाते हैं। लगता हैशायद छोटे बनाए थेइसलिए मिल नहीं सके। लगता हैशायद थोड़ी कम मेहनत कीइसलिए कल्पनाएं अधूरी रह गईं। लगता हैशायद थोड़ा दौड़ने में कंजूसी हुईइसलिए पहुंच नहीं पाए। और जोर से दौड़ोऔर बड़े धनुष बनाओऔर फैलाओ कल्पना के जाल कोतो कल तृप्ति होगी।
फिर वह कल भी आ जाता है। फिर वे कल्पना के जाल भी अधूरे और टूटे के टूटे रह जाते हैं। टूटे हुए इंद्रधनुष फिर बड़ा दुख देते हैं। फिर और बड़ा करो। फिर जीवन से मृत्यु तक यही करते रहो। बनाओ इंद्रधनुष और खंडों को बटोरो। टूटे हुएइंद्रधनुषों को इकट्ठे करते चले जाओ। फिर आखिर में जिंदगी एक खंडहरआर्चिओलाजी के काम काऔर किसी काम का नहीं। खंडहर-- पुरातत्व के शोधियों के काम का। हाथ में कुछ भी नहींसिर्फ आशाओं के खंडहरभग्न आशाओं के सेतुखो गए सब! और मौत सामने है। फिर सेतु बनाना भी मुश्किल हो जाता है।
इसलिए मौत से हम डरते हैं। मौत से डरने का कारण यह नहीं है कि मौत से हम डरते हैं। क्योंकि जिससे हम परिचित नहीं हैंउससे डरेंगे कैसे! जिसे हम जानते नहीं हैंउससे डरेंगे कैसे! जिसे हमने कभी देखा नहींउससे डरेंगे कैसे! डरने के लिए भी थोड़ा परिचय जरूरी है। मौत से हम नहीं डरते। डरते हम इससे हैं कि मौत का मतलब हैकल अब नहीं होगा। मौत का मतलब हैनो टुमारो नाउ। मौत का मतलब हैअब आगे कल नहीं है। फिर हमारे इंद्रधनुषों का क्या होगाफिर हमारी कल्पनाओं के जाल का क्या होगाहम तो सदा कल में ही जीए थेआज तो कभी जीए नहीं थे। मौत कहती हैबसअब आज हैकल नहीं। तो हम क्या करें?
इसलिए मौत उदास कर जाती है। मौत नहीं करती उदासकल का अभावकल का समाप्त हो जाना। अब कोई कल नहीं हैअब आज ही है। अब हम मरे! अब हम अपने पर ही फेंक दिए गए। थ्रोन बैक टु वनसेल्फ। अब कोई कल का उपाय न रहा,जिसमें हम भरोसे खोज लें। अब कल का कोई उपाय न रहाजिसमें हम सहारे बना लें। अब कल न रहाजिसमें हम सपने गूंथलेंसपने बुन लें। अब ड्रीम की कोई जगह न रही। अब रिअलिटी हैअब तथ्य ही सामने रह गया। अब आज ही बचा।
आज के साथ जीने की हमारी कोई आदत नहीं है। कल के साथ ही सदा जीए थे। अब जीना बहुत मुश्किल है। इसलिए हम मौत से डरते और भयभीत होते हैं। मौतकल की मौत हैइससे हम डरते हैं।
कृष्ण कहते हैं--वह जो परम सत्ता हैउसकी तरफ से--कि मैं आज ही जीता हूंअभी और यहीं। फल की स्पृहा नहीं है। कल की आकांक्षा नहीं है। टुडे इज़ इनफआज काफी है।
जीसस अपनी प्रार्थना में कहते हैंगिव मी टुडेज ब्रेडआज की रोटी पर्याप्त है।
न्यू मैन ने अपने गीत में लिखा हैआई डू नाट लांग फार दि डिस्टेंट सीनदूर के दृश्यों की आकांक्षा नहीं है मुझे। वनस्टेप इज़ इनफ फार मीएक कदम काफी है। दूर के दृश्यों की आकांक्षा नहीं मुझेएक कदम काफी है।
कृष्ण कहते हैंअभी और यहीं--हियर एंड नाउ--सब है। फल की स्पृहा नहीं है मुझे। दो कारणों से।
एक तो आनंदमग्न चित्त अभी और यहीं होता है। और जैसा मैंने कहा कि दुख से कल की आकांक्षा पैदा होतीकल की आकांक्षा से दुख घना होताऐसे ही यह भी आपसे कहूंआनंदित चित्त में कल की आकांक्षा पैदा नहीं होती। और कल की आकांक्षा जिस चित्त में पैदा नहीं होतीउसका आनंद सघन होता है। उसका भी अपना एक वर्तुल है।
जितना-जितना कल की आकांक्षा नहीं होतीउतना-उतना आज सघन आनंद से भरता चला जाता है। अनंत आनंद आज ही सिकुड़कर मिलने लगता है।
परमात्मा क्षणजीवी है। लेकिन उसका क्षण इटरनिटी हैउसका क्षण अनंत है। एक क्षण ही अनंत है। हम भविष्यजीवी हैं। लेकिन हमारा भविष्य सिवाय मृत्यु के और कुछ नहीं लाता। हमारा भविष्य अमावस की रात के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं निर्मित करता। हमारा भविष्य प्राणों में सिर्फ घाव छोड़ जाता हैअनजीए घाव। घाव उस जीवन केजो हमने जीया नहीं और जिसे हम चूक गए हैं।
कृष्ण कहते हैंजो इस बात को समझ लेताजो मेरे इस स्वरूप को समझ लेतावह भी मेरे जैसा हो जाता है।
आनंद की जिन्हें भी तलाश हैवे कल से मुक्त हो जाएं। सत्य की जिन्हें भी खोज हैवे भविष्य को विदा कर दें। हां,दुख की जिन्हें तलाश हैवे कल को खोजें। नर्क के द्वार पर जिनको खटखटाना हैवे भविष्य में सेतु बनाएं स्वप्नों के। स्वर्ग के द्वार को जिन्हें खोल लेना हैउनके लिए द्वार अभी और यहीं है।
लेकिन अभी और यहीं होने का राज क्या हैसीक्रेट क्या हैसीक्रेट है--फल की स्पृहा नहींकर्म काफी है। जो कर रहे हैं,उतना ही काफी है। लेकिन वह कब होगा काफीजब कर्म खेल बन जाएलीला बन जाए।
लेकिन हम तो खेल को भी कर्म बना लेते हैं। हम तो इतने कुशल हैं कि हम खेल को कर्म बना लेते हैं। कृष्ण कहते हैं,कर्म को खेल बनाओ। हम दूसरे छोर हैंठीक उलटे। हम खेल को कर्म बना लेते हैं! कृष्ण कहते हैंजीवन नाटक हो जाए। हमने उलटी कुशलता अर्जित की है। हम नाटक को जीवन बना लेते हैं।
देखा हैसिनेमागृह में बैठे लोगों कोरूमाल गीले कर रहे हैंआंसू पोंछ रहे हैं। पर्दे पर कुछ भी नहीं हैसिवाय छायाओं के। सिवाय प्रकाश के और छायाओं के मेल-जोल केपर्दे पर कुछ भी नहीं है। खाली पर्दा है। आंसू पोंछ रहे हैं! हृदय की धड़कन बढ़ गई है। कोई का ब्लडप्रेशर बढ़ गया होगा! निकलते हैं सिनेमागृह सेदेखें लोगों के चेहरेतो पता चलेगानाटक जिंदगी बन गई है। वह तो सिनेमागृह में अंधेरा रहता हैयह बड़ा अच्छा है। आदमी अपना चुपचाप रो लेता हैपोंछ लेता हैबैठ जाता है। देखें सिनेमागृह में! अब की बार सिनेमा न देखेंजाएं तो देखने वालों को देखें। अच्छा तो यह होअपने को देखेंतो और मजा आएगा कि क्या कर रहे हैं! यह क्या हो रहा है!
कृष्ण कहते हैंयह पूरा जीवन ही नाटक है। हम कहते हैंनाटक! नाटक खुद ही जीवन है। अगर यह बात दिखाई पड़ जाए कि फिल्म के पर्दे पर सिवाय विद्युत के किरणों के जाल के और कुछ भी नहींतो किसी दिन यह भी पता चल जाएगा कि इस पृथ्वी पर भी विद्युत की किरणों के जाल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यहां भी कुछ भी नहीं है। तब यह सब नाटक हो जाता हैतब एक अभिनय हो जाता है।
इसलिए कृष्ण एक कुशल अभिनेता हैं। बांसुरी भी बजा सकते हैंसुदर्शन भी उठा सकते हैं। परम ज्ञान की बात भी कर सकते हैंगंवार ग्वालों के साथ नाच भी सकते हैं। गीता का उपदेश भी दे सकते हैंस्त्रियों के वस्त्र उठाकर वृक्ष पर भी बैठ सकते हैं। ऐसा इनकंसिस्टेंटऐसा असंगत आदमी पृथ्वी पर दूसरा नहीं हुआ है।
लेकिन उस असंगति में एक राज है। इतना असंगत वही हो सकता हैजो बिलकुल गंभीर नहीं है। सिर्फ खेल समझ रहा है। इसलिए ठीक है।
उसे राम का पार्ट दे दोतो भी पूरा कर देगारावण का दे दोतो भी पूरा कर देगा। वह यह नहीं कहेगा कि रावण का पार्ट हम पूरा नहीं करते! खेल ही हैतो झंझट क्या हैचलेगा। राम का दे दोतो वह कहेगाचलेगा। राम और रावण में उसे असंगति नहीं दिखाई पड़ेगी। इसलिए कि वह कहता हैपर्दे के पीछे न कोई राम हैन कोई रावण है। वह पर्दे के बाहर खेल है,जो मर्जीहम पूरा किए देते हैं। गंभीर नहीं हैक्योंकि खेल है जिंदगी। स्पृहा नहीं है भविष्य कीफल कीक्योंकि खेल है जिंदगी। परम अस्तित्व के लिए तो सभी कुछ खेल हैभविष्य है ही नहीं।
यह आखिरी बात इस सूत्र में आपसे कहूं। हम समय को तीन हिस्सों में बांटते हैं--हमह्यूमन माइंडमनुष्य का मन समय को तीन हिस्सों में बांटता है--भविष्यवर्तमानअतीतपास्टप्रेजेंटफ्यूचर। समय बंटा हुआ नहीं है। परमात्मा से अगर जाकर पूछेंगेतो वह कहेगातीनसमय तो सदा वर्तमान है। समय न तो पास्ट हैऔर न फ्यूचर है। समय सिर्फ वर्तमान ही है। हम बांटते हैं।
सच तो यह है कि अगर हम और थोड़ी बुद्धिमानी करेंतो हमें वर्तमान को अलग कर देना चाहिएक्योंकि वर्तमान का हमें कोई अनुभव ही नहीं है। हमें या तो अतीत का अनुभव है या भविष्य का। या तो हमें उस राख के ढेर का पता हैजो हमारी आकांक्षाओं की हमारे पीछे लग गई है। या तो हमें उस सबका पता हैजो बीत गया--अतृप्ति के ढेर। और या हमें पता है वहजो अभी नहीं बीताहोना चाहिएहोगा--आकांक्षाओं के इंद्रधनुष। वर्तमान का हमें कोई भी पता नहीं है। हमारे लिए समय अतीत और भविष्य है।
वर्तमान हम किसे कहते हैंहम वर्तमान उस क्षण को कहते हैंजिस क्षण में हमारा भविष्य अतीत बनता हैदि फ्यूचरपासेस इनटु दि पास्ट। हम उस संक्रमण के क्षण कोट्रांजीशन कोउस दरवाजे को वर्तमान कहते हैंजिससे भविष्य अतीत बनता हैजिससे जीवन मृत्यु बनती हैजिससे जो नहीं थावह नहीं था में वापस चला जाता है।
हमारे लिए वर्तमान सिर्फ एक द्वार हैबहुत बारीकजिसे हम कभी नहीं पकड़ पाते हैं कि वह कहां है। जब हम पकड़ पाते हैंतब तक अतीत हो चुका होता है। जब तक हम नहीं पकड़ पाते हैंतब तक वह भविष्य रहता है। लेकिन परमात्मा की स्थिति बिलकुल और है। परमात्मा के लिए भविष्य है ही नहीं। और कोई अतीत भी नहीं है। परमात्मा के लिए सिर्फ वर्तमान है;मात्र वर्तमान। इसलिए परमात्मा के लिए समय इटरनिटी हैएक अनंतता है। बहाव नहीं हैएक अनंतता हैएक ठहरी हुई अनंतता। सब ठहरा हुआ हैसरोवर की भांति।
परमात्मा के लिए काज और इफेक्ट नहीं हैंकार्य और कारण नहीं हैं। हमारे लिए हैं। कार्य का मतलबभविष्यकारण का मतलबअतीत। वर्तमानजिसमें से कारण कार्य बनता है या कार्य पुनः कारण बनता है। परमात्मा के लिए कार्य-कारण नहीं हैं।
हमारी स्थिति करीब-करीब ऐसी हैपूरे हमारे दिमाग कीचाहे वह वैज्ञानिक का दिमाग होचाहे दार्शनिक का होचाहे गहरे से गहरे सोचने वाले का हो। मनुष्य के मस्तिष्क के सोचने का ढंग करीब-करीब ऐसा हैजैसे कि एक छोटा-सा छेद हो दीवाल में और एक बिल्ली कमरे के भीतर बंद हो। धुंधला प्रकाश हो। और हम छेद से देख रहे हों।
बिल्ली निकले छेद के सामने से। पहले उसका चेहरा दिखाई पड़े। छेद छोटा है। चेहरा दिखाई पड़ता है। फिर उसकी पीठ दिखाई पड़ती है। फिर उसकी पूंछ दिखाई पड़ती है। फिर बिल्ली लौटती हैफिर उसका चेहरा पहले दिखाई पड़ता हैफिर उसकी पीठ दिखाई पड़ती हैफिर उसकी पूंछ दिखाई पड़ती है। फिर हम कहते हैंहेड मस्ट बी दि काज एंड टेल मस्ट बी दि इफेक्ट। क्योंकि हमेशा सिर के पीछे पूंछ है। कहीं से भी बिल्ली घूमती हो कमरे मेंहमारे छेद में से दिखाई पड़ता है पहले सिरफिर पीठफिर पूंछ। निश्चित ही सिर कारण हैपूंछ कार्य है।
बेचारी बिल्ली को पता ही नहीं। वहां हेडटेल एक ही हैंवहां कोई कार्य-कारण नहीं हैं। वहां दोनों ही एक हैं। वहां बिल्ली के लिए सिर और पूंछ एक ही चीज के दो हिस्से हैं।
परमात्मा के लिए बीज और वृक्षकार्य और कारण नहीं हैंएक ही चीज के दो हिस्से हैं। परमात्मा के लिए जन्म और मृत्युअतीत और भविष्य नहीं हैंएक ही चीज के दो छोर हैं। हेड एंड टेलसिर और पूंछ। हमारे लिए सब दिक्कत है। हमारे देखने के ढंग की वजह से सारी दिक्कत है। बहुत छोटा छेद है हमारे सोचने का। वह छोटा छेद क्यों हैक्योंकि वर्तमान बहुत छोटा है हमाराइसलिए छेद छोटा है। वर्तमान बड़ा हो जाएछेद बड़ा हो जाए। वर्तमान ही रह जाएतो सब दीवाल गिर जाती है। फिर अस्तित्व को हम वैसा ही जानते हैंजैसा वह है। अस्तित्व में न तो कुछ बीता हैन कुछ होने वाला है। सब है। सब मौजूद है।
कृष्ण इसलिए कहते हैंफल की कोई स्पृहा नहीं। भविष्य ही नहींफल की स्पृहा कैसे करेंगे! यही क्षण सब कुछ है। ऐसा जो जान लेता हैवह भी इसी स्थिति को उपलब्ध हो जाता है।
इस सूत्र को गहरे में अनुभव करने की जरूरत है। यह सार सूत्रों में से एक है।

प्रश्न:

भगवान श्रीबारहवें श्लोक में कहा गया है कि कर्मफलों को चाहने वाले लोग देवताओं को पूजते हैं और उनके कर्मों की सिद्धि भी शीघ्र ही होती है। परंतु उनको मेरी प्राप्ति नहीं होती। इसलिए तू मेरे को ही सब प्रकार से भज। कृपया इसका अर्थ स्पष्ट करें। और दूसरी बातआठवें श्लोक में हैकि धर्म के संस्थापन के लिए मैं आता हूं। धर्म के संस्थापन का अर्थ भी कृपया समझाएं।

कर्मफलों की चाहना करने वाले लोग देवताओं को भजते हैं! कर्मफल की चाहना करने वाला व्यक्ति परमात्मा को नहीं भज सकता। कर्मफल की चाहना करने वाला व्यक्ति देवताओं को ही भज सकता है। क्योंक्योंकि परमात्मा के भजने की शर्त हैकर्मफल की चाहना न करना। परमात्मा के भजन का एक ही अर्थ हैकर्मफल की चाहना छोड़ देनाफल की आकांक्षा छोड़ देना।
तो फल के लिए तो परमात्मा को भजा ही नहीं जा सकता। वह कंडीशन में ही नहीं आता। वह बेशर्त! परमात्मा की शर्त ही यही है कि तू मेरे पास आएगा तभीजब बिना कुछ मांगता हुआ आएगा। कुछ मांगातो मुझसे दूरी हो जाएगी। तेरी मांग ही दूरी बन जाएगी।
असल में मांग बताती है कि परमात्मा की हमें जरूरत नहीं है। परमात्मा की सेवाओं की जरूरत है। सर्विसेस आर नीडेड;परमात्मा की कोई जरूरत नहीं है। एक आदमी को अपनी दुकान में सफलता पानी हैचुनाव में जीत जाना है। किसी को धन कमाना हैकिसी को बीमारी से मुक्ति पानी है। किसी को चाहे गए व्यक्ति से विवाह करना है। परमात्मा की सेवाओं की जरूरत हैकि उससे विवाह करा दोजिससे करना चाहता हूंउस कुर्सी पर पहुंचा दोजहां चढ़ना चाहता हूं। लेकिन मांग बताती है कि परमात्मा की जरूरत नहीं है। मांग ही फासला है। फल की जरूरत है! और परमात्मा मिलता है उसकोजिसको फल की आकांक्षा नहीं है।
इसलिए कर्मों के फल की चाहना करने वाला मेरे निकट नहीं आताकृष्ण कहते हैंमेरे निकट आएगा ही नहीं। क्योंकि मेरी शर्त ही पूरी नहीं करता। दि कंडीशन इज़ नाट फुलफिल्ड। शर्त ही यही है कि बिना कुछ चाहे मेरे पास आओतो ही मेरे पास आ सकते हो।
अस्तित्व की भी शर्तें हैं। सौ डिग्री तक पानी गर्म हो जाएतो भाप बन जाता है। निन्यानबे डिग्री तक गर्म होतो भी भाप नहीं बनतातो भी पानी ही रहता है। तो भाप कह सकती है कि सौ डिग्री तक बनो तुमतो आ जाओगे मेरे पास। आकाश कह सकता है कि सौ डिग्री तक गर्म हो जाओतो बदलियां बन जाओगेमुझमें तैर सकोगे। लेकिन अगर सौ डिग्री तक गर्म नहीं होतेतो फिर पानी ही रहो और पृथ्वी पर ही चलो। फिर पानी ही रहो और नीचे की तरफ बहो।
कभी खयाल किया है आपनेपानी नीचे की तरफ बहता हैभाप ऊपर की तरफ उठती है! सिर्फ सौ डिग्री की शर्त पूरी हो जाने से ऐसा हो जाता है कि भाप आकाश की तरफ उठने लगती है। समुद्र आकाश की तरफ दौड़ने लगता है। और पानी हिमालय परगौरीशंकर पर भी होतो भी गङ्ढों की तरफ दौड़ता चला जाता हैनीचे उतरता चला जाता है।
कर्मफलों की आकांक्षा परमात्मा के बीच व्यवधान है।
इसलिए कृष्ण कहते हैंजो कर्मों के फल के लिए भजता हैवह मुझे नहीं भज सकता। वह मेरी जगह सिर्फ देवताओं को भजता है।
देवताओं का मैंने रात आपको अर्थ कियावे आत्माएं जो शरीर नहीं ले पातींलेकिन अत्यंत शुभ हैं। लेकिन शरीर लेने को आतुर हैं अभीअभी मुक्त नहीं हो गई हैं।
ध्यान रहेमुक्त वही होता हैजो न शुभ रह जातान अशुभन गुडन बैड। शुभ आत्मा भी मुक्त नहीं होतीअशुभ आत्मा भी मुक्त नहीं होती। अशुभ आत्मा भी बंधी रहती है अपने अशुभ कर्मों सेलोहे की जंजीरों से। शुभ आत्मा बंधी रहती है अपने शुभ कर्मों सेसोने की जंजीरों से। जंजीरों में फर्क है। बुरी आत्मा के पास लोहे की जंजीरें हैंकुरूपजंग खाई हुई। शुभ आत्मा के पास चमकदारपालिश्डसुसंस्कृतसोने की जंजीरें हैंहीरे-जवाहरातों से जड़ी। बाकी बंधन दोनों के हैं।
शुभ आत्माएं भी मुक्त नहीं होती हैं। मुक्त तो वही होता हैजो शुभ-अशुभ के पार हो जाता है। बंधन के ही पार हो जाता है। कर्म के ही पार हो जाता है। कर्ता के ही पार हो जाता है। इसलिए शुभ आत्माएं जन्म लेने को आतुर हैं और शुभ करने को आतुर हैं। इसलिए जो लोग कर्मों के फल चाहते हैंवे देवताओं को भजते हैं। वे शुभ आत्माओं से सहायता मांगते हैं। इनसे सहायता मिल सकती है। इसमें कोई कठिनाई नहीं है।
इसलिए कृष्ण कहते हैं कि मुक्ति के लिए तो तू मुझको भज। शक्ति के लिए भजना होतो देवताओं को भज। मुक्ति के लिए भजना होतो तू मुझको भज।
लेकिन परमात्मा के निकट जाने की शर्त बड़ी कठिन है। सौ डिग्री तक गर्म होना पड़ेभाप बनना पड़ेइवोपरेट होना पड़े। अहंकार जब तक भाप न हो जाएहवा-हवा न हो जाएतब तक आकाश की तरफ उड़ान नहीं होती है। और अहंकार तब तक नहीं मिटताजब तक फल-आकांक्षा शेष रहती है।
इसलिए वे कहते हैं कि तू अगर मुक्त होना चाहे अर्जुनअगर तू सब दुखों सेसब संतापों सेसब पीड़ाओं सेसब बंधनों से मुक्त होना चाहेतो तू मुझे भज।
लेकिन मुझे भजने का मतलब क्यामुझे भजने का मतलब यह है कि जैसे मैं कर्म की स्पृहा सेफल की स्पृहा से,भविष्य की आकांक्षा सेफलाकांक्षा से मुक्त हूंऐसा ही तू भी फलाकांक्षा से मुक्त हो जा। मेरे भांति बर्त। कर्म करकर्ता न रह जा। चलचलने वाला न रह जा। उठ-बैठउठने-बैठने वाला न रह जा। करलेकिन भीतर से कर्ता को विदा कर दे। होने देजो होता है। परम शक्ति के हाथों में साधन मात्र हो जा--समर्पितनिमज्जित। अपने को छोड़। तो तू समस्त दुखों सेसमस्त बंधनों से मुक्त हो सकता है।
और दूसरी बात पूछी हैधर्म-संस्थापना के लिएइसका क्या अर्थ है?
धर्म नष्ट कभी नहीं होता। कुछ भी नष्ट नहीं होतातो धर्म तो नष्ट होगा ही नहीं! धर्म कभी नष्ट नहीं होतालेकिन लुप्त होता है। लुप्त होने के अर्थों में नष्ट होता है। उसकी पुनर्संस्थापना की निरंतर जरूरत पड़ जाती है। उसकी पुनर्प्रतिष्ठा की निरंतर जरूरत पड़ जाती है।
अधर्म कभी अस्तित्ववान नहीं होता। जैसे धर्म कभी अस्तित्वहीन नहीं होताअधर्म कभी अस्तित्ववान नहीं होता। लेकिन बार-बारफिर भी उस अस्तित्वहीन अधर्म को हटाने की जरूरत पड़ जाती है।
इसे थोड़ा समझें। क्योंकि यह बड़ी उलटी बात मालूम पड़ेगी! जो धर्म कभी नष्ट नहीं होताउसकी संस्थापना की क्या जरूरत हैऔर जो अधर्म कभी होता ही नहींउसके मिटाने की क्या जरूरत हैलेकिन ऐसा भी है।
अंधेरा है। अंधेरा है नहीं। रोज मिटाना पड़ता हैऔर है बिलकुल नहीं! अंधेरे का कोई अस्तित्व नहीं है। अंधेराएक्झिस्टेंशियल नहीं है। अंधेरा कोई चीज नहीं है। फिर भी है।
यह मजा हैयह पैराडाक्स है जिंदगी काअंधेरा है नहींफिर भी है। काफी है। घना होता है। डरा देता है। प्राण कंपा देता है। और नहीं है! अंधेरा सिर्फ प्रकाश की अनुपस्थिति है। सिर्फ एब्सेंस है। जैसे कमरे में आप थे और बाहर चले गएतो हम कहते हैंअब आप कमरे में नहीं हैं। अंधेरा इसी तरह है। अंधेरे का मतलब इतना ही है कि प्रकाश नहीं है।
इसलिए अंधेरे को तलवार से काट नहीं सकते। अंधेरे को गठरी में बांधकर फेंक नहीं सकते। दुश्मन के घर में जाकर अंधेरा डाल नहीं सकतेकि डाल दो इसके घर में अंधेरादुश्मन के। अंधेरा डाल नहीं सकते। अंधेरा घर के बाहर निकालना हो,तो धक्का देकर निकाल नहीं सकते। धक्का देते-देते आप घर के बाहर निकल जाओगेअंधेरा पीछे ही रहेगा।
अंधेरा है नहीं। सब्स्टेंशियल नहीं है। अंधेरे में कोई सब्स्टेंस नहीं है। कोई कंटेंट नहीं है। अंधेरे में कोई वस्तु नहीं है। अंधेरा अवस्तु हैनो-थिंग हैनथिंग है। अंधेरे में कुछ है नहीं। लेकिन फिर भी है। रात प्राण कंप जाते हैं अंधेरे में। डर लगता है जाने में। इतना तो है कि डरा दे। इतना तो है कि कंपा दे। इतना तो है कि गङ्ढे में गिरा दे। इतना तो है कि हाथ-पैर टूट जाएं।
अब यह बड़ी मुश्किल की बात है। जो नहीं हैउसके होने से आदमी गङ्ढे में गिर जाता है। अब यह कहना नहीं चाहिए,क्योंकि एब्सर्ड है। जो नहीं हैउसके होने से आदमी गङ्ढे में गिर जाता है! जो नहीं हैउसके होने से हाथ-पैर टूट जाते हैं! जो नहीं हैउसके होने से चोर चोरी कर ले जाते हैं! जो नहीं हैउसके होने से हत्यारा हत्या कर देता है!
नहीं तो है बिलकुल। वैज्ञानिक भी कहते हैंनहीं है। उसका कोई अस्तित्व नहीं है। अस्तित्व है प्रकाश का। अब जिसका अस्तित्व हैउसको रोज लाना पड़ता है। रोज सांझ दीया जलाओ। न जलाओतो अंधेरा खड़ा है।
तो कृष्ण कहते हैंधर्म संस्थापनार्थाय! धर्म की संस्थापना के लिएदीए को जलाने के लिएअधर्म के अंधेरे को हटाने के लिए। अधर्मजो नहीं हैधर्मजो सदा है।
सूरज स्रोत है प्रकाश का। अंधेरे का स्रोत पता हैकहां हैकहीं भी नहीं है। सूरज से आ जाती है रोशनी। अंधेरा कहां से आता हैफ्राम नो व्हेयर। कोई सोर्स नहीं है।
कभी आपने पूछाअंधेरा कहां से आता हैकौन डाल देता है इस पृथ्वी पर अंधेरे की चादरकौन आपके घर को अंधेरे से भर देता हैप्रकाश का तो स्रोत है--सूरज। अंधेरे का स्रोत कहां है?
स्रोत नहीं हैक्योंकि है ही नहीं अंधेरानहीं तो स्रोत भी होता। कहीं से आताकहीं जाता। जब सुबह सूरज आ जाता है,तो अंधेरा कहां चला जाता हैकहीं सिकुड़कर छिप जाता हैकहीं नहीं सिकुड़ताकहीं नहीं जाता। है ही नहींकभी था नहीं। अंधेरा कभी नहीं हैफिर भी रोज उतर आता है! प्रकाश सदा हैफिर भी रोज सांझ जलाना पड़ता और खोजना पड़ता है।
ऐसा ही धर्म और अधर्म है। अंधेरे की भांति है अधर्मप्रकाश की भांति है धर्म। रोजप्रतिदिन खोजना पड़ता है।
युग-युग मेंकृष्ण कहते हैंलौटना पड़ता है। मूल स्रोत से धर्म को फिर वापस पृथ्वी पर लौटना पड़ता है। सूर्य से फिर प्रकाश को वापस लेना पड़ता है। यद्यपि जब प्रकाश नहीं रह जाता सूर्य कातो हम मिट्टी के दीए जला लेते हैं। केरोसिन की कंदील जला लेते हैं। उससे काम चलाते हैं। लेकिन काम ही चलता है। कहां सूरज! कहां कंदीलें! बसकाम ही चलता है।
तो जब कृष्ण जैसे व्यक्तित्व नहीं होते पृथ्वी परतब छोटे-मोटे दीएकंदीलें केरोसिन कीधुआं भी काफी निकलता है उनमें-- रोशनी कम ही निकलती हैधुआं ही ज्यादा निकलता है--लेकिन उनसे भी काम चलाना पड़ता है। तथाकथित साधु-संतों की भीड़ ऐसी हैकेरोसिन आयलमिट्टी का तेल। मगर रात में बड़ी कृपा है उसकी। रात में बड़ी कृपा है उसकीथोड़ा-सा धीमा-धीमादो-चार-दस फीट पर रोशनी पड़ती रहती है। लेकिन बार-बार अंधेरा सघन हो जाता हैऔर बार-बार करुणावान चेतनाओं को लौट आना पड़ता हैजो आकर फिर सूरज से भर दें। कई बार ऐसा भी होता है कि सूरज जैसी चेतनाओं को आमने-सामने नहीं देखा जा सकता।
आपने कभी खयाल कियासूरज को कभी आप आमने-सामने नहीं देखतेदीए को मजे से देखते हैं। इसलिए साधु-संतों से सत्संग चलता हैकृष्ण जैसे लोगों के आमने-सामने मुश्किल हो जाती है। एनकाउंटर हो जाता हैझंझट हो जाती हैकई दफे तो आंखें चौंधिया जाती हैं। सचसूरज की तरफ देखेंतो रोशनी कम मिलेगीआंखें बंद हो जाएंगीअंधेरा हो जाएगा। सूरज को आदमी तभी देखता हैजब ग्रहण लगता हैअन्यथा नहीं देखता कोई।
अब यह बड़े मजे की बात है! ग्रहण लगे सूरज को लोग देखते हैं। पागल हो गए हैंसूरज बिना ग्रहण के रोज अपनी पूरी ताकत से मौजूद हैकोई नहीं देखता। ग्रहण लगा कि लोग देखते हैं। क्या बात हैग्रहण लगने से थोड़ा भरोसा आता है,अपन भी देख सकते हैं। थोड़ा सूरज कम है। अधूरा है। शायद इतने जोर से हमला नहीं करेगा।
इसलिए कृष्ण जैसे व्यक्तियों को कभी भी समझा नहीं जाताहमेशा मिसअंडरस्टैंड किया जाता है। और जिनको आप समझ लेते हैंसमझ लेनाकेरोसिन की कंदील। अपने घर में जलाई-बुझाईअपने हाथ से बत्ती नीची-ऊंची की। जैसी चाहीवैसी की। जब जैसी चाहीवैसी की। जिनको आप समझ पाते हैंसमझ लेना कि घर के मिट्टी के दीए। जिनको आप कभी नहीं समझ पातेआंखें चौंधिया जाती हैंहजार सवाल उठ जाते हैंमुश्किल पड़ जाती है--समझना कि सूरज उतरा।
इसलिए कृष्ण को हम अभी तक नहीं समझ पाए। न क्राइस्ट को समझ पाए। न बुद्ध कोन महावीर कोन मोहम्मद को। इनको हम किसी को नहीं समझ पाते। इस तरह के व्यक्ति जब भी पृथ्वी पर आते हैंहमारी आंखें चौंधिया जाती हैं। फिर नहीं समझ पातेतो फिर हजारों साल तक समझने की पीछे कोशिश करनी पड़ती है। जब वे हट जाते हैंतब हजारों साल तक;जब आंख के सामने नहीं रहतेतब हम अपने-अपने मिट्टी के दीए जलाकर और समझने की कोशिश करते हैं।
पुनः संस्थापना के लिए!
नष्ट नहीं होता धर्म कभीखो जरूर जाता है। अधर्म कभी स्थापित नहीं होताछा जरूर जाता है। ऐसा समझ में आ सकेतो ठीक। अधर्म कभी स्थापित नहीं होताछा जरूर जाता है। धर्म कभी नष्ट नहीं होताखो जरूर जाता है। उसे पुनः-पुनः खोजना पड़ता है। पुनः-पुनः स्थापित करना पड़ता है।
एक श्लोक और ले लें।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।। 15।।
पहले होने वाले मुमुक्षु पुरुषों द्वारा भी इस प्रकार जानकर कर्म किया गया हैइससे तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए हुए कर्म को ही कर।

कृष्ण कहते हैंऐसा जानकरऐसा स्पृहा से फल की मुक्त होकरकर्ता से शून्य होकरअहंकार से बाहर होकरपहले भी पूर्वपुरुषों ने भी कर्म किया हैऐसा ही तू भी कर्म कर।
पूर्वपुरुषों ने भी ऐसा ही कर्म किया हैकर्ता से मुक्त होकर। जैसेजनक। कहीं जनक का नाम भी कृष्ण ने पहले लिया है--जनकादि। वे कर्म करते रहे हैं कर्ता से मुक्त होकर। यह क्यों याद दिलाते हैं कृष्णक्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि जब तक हम फल की स्पृहा करते हैंतब तक कर्म करते हैं। और जब हम कहते हैं फल की स्पृहा नहीं करतेतो हम फिर अकर्म करते हैं। फिर हम कहते हैंअब हम जाते हैं।
दो बातें हमारे लिए संभव मालूम पड़ती हैं। या तो हम फल की आकांक्षा करेंगेतो कर्म करेंगेया फल की आकांक्षाछोड़ेंगेतो कर्म भी छोड़ेंगे
इसलिए दो तरह के नासमझ पृथ्वी पर हैं। फल की आकांक्षा करने वाले गृहस्थ और फल की आकांक्षा के साथ कर्म छोड़ देने वाले संन्यासी। दो तरह के नासमझ पृथ्वी पर हैं। फल की आकांक्षा के साथ कर्म करने वाले गृहस्थफल की आकांक्षा के साथ कर्म भी छोड़ देने वाले संन्यासी--ये एक ही चीज के दो पहलू हैं। गृहस्थ कहता है कि हम कर्म कैसे करें बिना फल की आकांक्षा केतो छोड़ देता है।
कृष्ण बहुत तीसरी बात कह रहे हैं। वे कह रहे हैंतू कर्म तो कर और फल की आकांक्षा छोड़ दे। आर्डुअस हैबड़ा सूक्ष्म हैपर बड़ा रूपांतरकारी हैबड़ा ट्रांसफाघमग है।
अगर एक आदमी ने फल की आकांक्षा के साथ कर्म भी छोड़ दियातो कुछ भी तो नहीं किया। यह तो कोई भी कर सकता था। फल की आकांक्षा के साथ कर्म के छोड़ने मेंकुछ भी तो खूबी नहीं है। जैसे फल की आकांक्षा के साथ कर्म करने में कुछ खूबी नहीं हैवैसे ही फल की आकांक्षा के साथ कर्म छोड़ देने में भी कुछ भी खूबी नहीं है। कोई भी विशेषता नहीं है। कोई भी साधना नहीं है। यह तो बड़ी आसान बात है। इसमें तो कुछ कठिनाई नहीं है। यह तो गृहस्थ ही पीठ करके खड़ा हो गया;मन जरा भी नहीं बदला।
कृष्ण कहते हैंकर्म तो तू करकर्ता मत रह जा। कृष्ण कहते हैंगृहस्थ तो तू रहऔर संन्यासी हो जा। और कहते हैं,ऐसा पूर्वपुरुषों ने भी किया है। यह सिर्फ भरोसे के लिएआश्वासन के लिए--कि तू घबड़ा मत! ऐसा मत सोच कि ऐसा कभी नहीं किया गया है। ऐसा पहले भी किया गया है।
सच में ही इस पृथ्वी पर जो लोग ठीक से जाने हैंउन्होंने कर्ता को छोड़ दिया और कर्म को जारी रखा है।
ठीक संन्यास: कर्ताहीनकर्म-सहित। ठीक संन्यास: अहंकार-मुक्तकर्म-संयुक्त। ठीक संन्यास: स्वयं को छोड़ देताशेष सबको जारी रखता है। ऐसे ठीक-ठीक संन्यास कीसम्यक संन्यास कीऐसे राइट रिनंसिएशन की कृष्ण अर्जुन को शिक्षा देते हैं।

(शेष हम रात बात करेंगे। पांच मिनट आप रुकेंगे। पांच मिनट कीर्तन में सम्मिलित हों। कर्ता को छोड़कर नाचें। पांच मिनट आनंद से भरें। और विदा हो जाएं।)

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