शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-017

मन के अधोगमन और ऊर्ध्वगमन की सीढ़ियां
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। ६२।।
विषयों को चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। और आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है। और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।। ६३।।
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है। और मोह से स्मरणशक्ति भ्रमित हो जाती है। और स्मरणशक्ति के भ्रमित हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है। और बुद्धि के नाश होने से यह पुरुष अपने श्रेय साधन से गिर जाता है।



मनुष्य के मन की भी अपनी शृंखलाएं हैं। मनुष्य के मन के भी ऊर्ध्वगमन और अधोगमन के नियम हैं। मनुष्य के मन का अपना विज्ञान है। यहां मनुष्य के मन का अधोगमन कैसे होता हैकैसे वह पतन के मार्ग पर एक-एक सीढ़ी उतरता हैकृष्ण उन सीढ़ियों का पूरा ब्योरा दे रहे हैं।
सूक्ष्मतम होता है प्रारंभस्थूलतम हो जाता है अंत। मन के बहुत गहरे में उठती है लहरफैलती हैऔर पूरे मन को ही नहींपूरे आचरण कोपूरे व्यक्तित्व को ग्रसित कर लेती है। सूक्ष्म उठी इस लहर को इसके स्थूल तक पहुंचने की जो पूरी प्रक्रिया हैजो उसे पहचान लेता हैवह उससे बच भी सकता हैवह उसके पार भी जा सकता है।
कहां से मन का पतन शुरू होता हैकहां से मन संसार-उन्मुख होता हैकहां से मन स्वयं को खोना शुरू करता है?
तो कृष्ण ने कहा है कि विषय के चिंतन सेवासना के विचार से। जो पहला वर्तुलजहां से पकड़ा जा सकता हैवह है विचार का वर्तुल--सूक्ष्मतमजहां से हम पकड़ सकते हैं। विषय की इच्छाविषय का विचारभोग की कामना उठती है मन में। विषय का संग करने की आकांक्षा जगती है मन में। वह पहली लहर हैजहां से सब शुरू होता है। काम की जो बीज-स्थिति हैवह विषय का विचार है। संग की कामना पैदा होती हैभोग की कामना पैदा होती है।
राह पर देखते हैं भागती एक कार को। चमकती हुईआंखों में कौंधकर निकल जाती है। देखते हैं एक सुंदर स्त्री को;देखते हैं एक सुंदर बलिष्ठ पुरुष कोआंख में एक कौंध--और व्यक्ति निकल जाता है। वह जो सुंदर स्त्री या सुंदर पुरुष या सुंदर कार या सुंदर भवन दिखाई पड़ा है--तत्क्षण भीतर खोजने की जरूरत है--जैसे ही वह दिखाई पड़ा हैक्या आपको सिर्फ दिखाई ही पड़ा हैसिर्फ आपने देखा हीया देखने के साथ ही मन के किसी कोने में चाह ने भी जन्म लिया! सिर्फ देखा ही या चाहा भी! दिखाई पड़ी है एक सुंदर स्त्रीदेखी ही या भीतर कोई और भी कंपन उठा--चाह का भीमांग का भीपा लेने का भीपजेस करने का भी।
अगर सिर्फ देखातो बात आई और गई हो गई। सिर्फ बहिर-इंद्रियों ने भाग लिया। आंख ने देखामन ने खबर की,कोई जाता है। लेकिन चाहा भीतो जो देखावहीं बात समाप्त नहीं हो गई। मन में वर्तुल शुरू हो गएमन में लहरें शुरू हो गईं। देखने तक बात समाप्त नहीं हुईभीतर चाह ने भी जन्म लियामांग भी उठी।
आप कहेंगेनहींमांगा नहींचाहा नहींदेखासिर्फ इतना हुआ मन में कि सुंदर है। इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है।
इतना भी मन में उठा कि सुंदर हैतो चाह ने अपने अंकुर फैलाने शुरू कर दिए। क्योंकि सुंदर का कोई और मतलब नहीं होता। सुंदर का इतना ही मतलब होता हैजिसे चाहा जा सकता है। सुंदर का और कोई मतलब नहीं होता। असुंदर का इतना ही मतलब होता हैजिसे नहीं चाहा जा सकता।
सुंदर हैइस वक्तव्य में चाह कहीं दिखाई नहीं पड़तीयह वक्तव्य बड़ा निर्दोष मालूम पड़ता है। यह वक्तव्य सिर्फ स्टेटमेंट आफ फैक्ट मालूम पड़ता है। नहींलेकिन यह सिर्फ तथ्य का वक्तव्य नहीं है। इसमें आप संयुक्त हो गए। क्योंकि चीजें अपने आप में न सुंदर हैंन असुंदर हैंचीजें सिर्फ हैं। आपने व्याख्या डाल दी।
एक स्त्री निकली है राह सेवह सिर्फ है। सुंदर और असुंदर देखने वाले की व्याख्या है। सुंदर-असुंदर उसमें कुछ भी नहीं है। व्याख्याएं बदलती हैंतो सौंदर्य बदल जाते हैं। चीन में चपटी नाक सुंदर हो सकती हैभारत में नहीं हो सकती। चीन में उठे हुए गाल की हड्डियां सुंदर हैंभारत में नहीं हैं। अफ्रीका में चौड़े ओंठ सुंदर हैं और स्त्रियां पत्थर लटकाकर अपने ओंठों को चौड़ा करती हैं। सारी दुनिया में कहीं चौड़े ओंठ सुंदर नहीं हैंपतले ओंठ सुंदर हैं। वे हमारी व्याख्याएं हैंवे हमारी सांस्कृतिक व्याख्याएं हैं। एक समाज ने क्या व्याख्या पकड़ी हैइस पर निर्भर करता है। फिर फैशन बदल जाते हैंसौंदर्य बदल जाता है। तथ्य वही के वही रहते हैं।
अफ्रीका में जो स्त्री पागल कर सकती है पुरुषों कोवही भारत में सिर्फ पागलों को आकर्षित कर सकती है। क्या हो गया! स्त्री वही हैतथ्य वही हैलेकिन व्याख्या करने वाले दूसरे हैं। जब हम कहते हैंसुंदर हैतभी हम सम्मिलित हो गएतभी तथ्य नहीं रहा।
बुद्ध एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे हैं। रात है पूर्णिमा की। गांव से कुछ मनचले युवक एक वेश्या को लेकर पूर्णिमा की रात मनाने आ गए हैं। उन्होंने वेश्या को नग्न कर लिया हैउसके वस्त्र छीन लिए हैं। वे सब शराब में मदहोश हो गए हैंवे सब नाच-कूद रहे हैं। उनको बेहोश हुआ देखकर वेश्या भाग निकली।
थोड़ा होश आयातो देखाजिसके लिए नाचते थेवह बीच में नहीं है। खोजने निकले। जंगल हैकिससे पूछेंआधी रात है। फिर उस वृक्ष के पास आएजहां बुद्ध बैठे हैं। तो उन्होंने कहायह भिक्षु यहां बैठा हैयही तो रास्ता है एक जाने का। अभी तक कोई दोराहा भी नहीं आया। वह स्त्री जरूर यहीं से गुजरी होगी। तो उन्होंने बुद्ध को कहा कि सुनो भिक्षुयहां से कोई एक नग्न सुंदर युवती भागती हुई निकली हैदेखी है?
बुद्ध ने कहाकोई निकला जरूरलेकिन युवती थी या युवककहना मुश्किल है। क्योंकि व्याख्या करने की मेरी कोई इच्छा नहीं। कोई निकला है जरूरसुंदर था या असुंदरकहना मुश्किल है। क्योंकि जब अपनी चाह न रहीतो किसे सुंदर कहेंकिसे असुंदर कहें!
सौंदर्य चुनाव हैसौंदर्य निर्णय है। असल में जैसे ही सुंदर कहामन के किसी कोने पर बनना शुरू हो गया भाव--कि मिले। सौंदर्य पसंदगी की शुरुआत है। वह वक्तव्य सिर्फ तथ्य का नहींवह वक्तव्य वासना का है। वासना छा गई है तथ्य परवह कहती हैसुंदर है।
हम साधारणतया कहेंगे कि नहींसुंदर कहने से कोई मतलब नहीं होता। सुंदर है। जब पहला मन का विषयों में गमन शुरू होता हैतो अति सूक्ष्म है। वह ऐसे ही शुरू होता है: सुंदर हैअसुंदर हैप्रीतिकर हैअप्रीतिकर हैअच्छा लगता हैबुरा लगता है। चाह जब पैदा होती है पहलेतो पसंद और नापसंद के रूप में झलकती हैफिर बढ़ती है। अभी बीज हैअभी पहचानना बहुत मुश्किल है। अभी कोई कृष्णकोई बुद्ध पहचान सकेगा। हम तो तब पहचानेंगेजब वृक्ष हो जाएगा।
लेकिन बीज से मुक्त हुआ जा सकता हैवृक्ष से मुक्त होना अति कठिन है। जितनी बढ़ जाएगी वासना भीतर गहरी और प्रगाढ़ और जड़ों को फैला देगीउतना ही उससे छूटना कठिन होता जाएगा। जब अभी वासना सिर्फ बीज हैजब उसमें कोई जड़ें नहीं हैं अभीअभी जब उसने चित्त की भूमि में कहीं जड़ों को फैलाकर भूमि को पकड़कर कस नहीं लिया हैतब तक बहुत आसान है। बीज फेंके जा सकते हैंवृक्षों को काटना और उखाड़ना पड़ता है।
और मजा यह है कि वृक्ष काटने से भी कटते होंऐसा नहीं है। अक्सर तो काटने से सिर्फ कलम होती है। एक शाखा कटती है और चार शाखाएं निकल आती हैं। जड़ों तक काट डालने से भी जड़ें नए अंकुर और नई कोंपलें छोड़ जाती हैं और एक वृक्ष के अनेक वृक्ष भी हो जाते हैं। और जड़ों को उखाड़ना बहुत कठिन हैक्योंकि जड़ें मनुष्य के मन के अचेतन गर्भों में फैल जाती हैं। उन तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है।
इसलिए कृष्ण का यह सूत्र साधक के लिए बहुत समझ लेने जैसा है। इस पर पूरा हीमन के रूपांतरण की पूरी काजेलिटीपूरा कारणउसका राज छिपा है।
तथ्य तभी तक तथ्य हैजब तक आपने व्याख्या नहीं की है। बुद्ध ने कहानिकला कोई जरूर। यह व्याख्या नहीं है,निकला है कोई। युवक था कि युवतीकहना कठिन है। क्योंकि--बुद्ध ने कहा--जब तक मेरे भीतर पुरुष बहुत लालायित थातब तक बाहर खोज चलती थीकौन स्त्रीकौन पुरुष!
स्त्री और पुरुष भीतथ्य होते हुए भीहमारी व्याख्या के कारण ही वह तथ्य दिखाई पड़ता है। अब यह बड़े मजे की बात है। हम जिंदगी में सब भूल जाते हैं। एक आदमी मुझे आज मिले। मैं भूल जाता हूं कि उसका नाम क्या है दस साल बादभूल जाता हूंजाति क्या हैधर्म क्या हैचेहरा कैसा थाआंखें कैसी थींकितना पढ़ा-लिखा था--सब भूल जाता हूं। एक बात नहीं भूल पाता कि स्त्री था कि पुरुष था।
यह बड़े मजे की बात है। कभी आप भूले हैं किसी के बाबत कि मुझे पक्का याद नहीं आता कि वह जो मिला थास्त्री थी या पुरुष थासब भूल जाते हैं--नामशकलचेहराजातिधर्म--कई बार यह भी शक होता है कि वह मिला था कि नहीं मिला थायह भी भूल सकते हैं। लेकिन वह स्त्री थी या पुरुषयह नहीं भूल सकते हैं। जरूर और सब पहचान से यह स्त्री और पुरुष की पहचान आपके किसी गहरे मन ने की हैजहां से भूल नहीं होती।
अगर एक हवाई जहाज आपके गांव में गिर पड़ेसमझें कोई अंतरिक्ष यान गिर पड़ेकोई दूसरे ग्रह के यात्री का जहाज आपके गांव में गिर पड़ेउसमें से पायलट को आप बाहर निकालेंतो जो पहली जिज्ञासा उठेगीवह यह कि वह स्त्री है या पुरुष! पहली जिज्ञासा कि वह स्त्री है या पुरुष! फिर दूसरी जिज्ञासाएं उठेंगी।
निश्चित हीस्त्री और पुरुष होना एक बायोलाजिकल फैक्ट हैएक जैविक तथ्य है। स्त्री और पुरुष के शरीर में फर्क है। लेकिन यह फर्क इतना प्रगाढ़ होकर दिखाई पड़ेइसकी अनिवार्यता उसमें नहीं है। इसकी अनिवार्यता हमारे मन की चाह में है।
रास्ते से आप निकलते हैंवृक्ष लगे हैं। आपने शायद ही कभी देखा हो कि सभी वृक्ष एक जैसे हरे नहीं हैं। हरेपन में भी हजार तरह के हरेपन हैं। हरा कोई एक रंग नहीं हैहरा भी हजार रंग है। लेकिन आपको नहीं दिखाई पड़ेंगे। एक चित्रकार निकलेतो उसे दिखाई पड़ेगाहजार रंग के हरे रंग हैं। दो हरे रंग एक-से हरे रंग नहीं हैं। ये सामने दस वृक्ष हैंदस तरह के हरे हैं। आपको नहीं दिखाई पड़ेगा। इन वृक्षों के नीचे से आप रोज निकलते हैं। इनका दस तरह का हरा होना प्राकृतिक तथ्य है। लेकिन आपके भीतर चित्रकार चाहिएतब वह दिखाई पड़ेगा। उसकी खोज भी आपके भीतर कोई चीज खोजती होतो ही दिखाई पड़ेगीअन्यथा दिखाई नहीं पड़ेगी। चित्रकार को दिखाई पड़ेगा कि रंग ही रंग हैंहरे रंग भी कई रंग हैं।
स्त्री और पुरुष जैविक तथ्य है। लेकिन आपको इतना प्रगाढ़ होकर दिखाई पड़ता हैयह जैविक तथ्य नहीं हैयह मानसिक तथ्य हैयह साइकोलाजिकल तथ्य है। इसमें कुछ न कुछ आपने जोड़ना शुरू कर दिया। इसमें आपने कुछ डालना शुरू कर दिया। थोड़ा-सा आप भी इसमें प्रवेश कर गएफिर चिंतन शुरू होगा।
यह तो हैपनिंग हुईरास्ते पर स्त्री दिखीपुरुष दिखा। फिर आपने कहासुंदर हैफिर आपकी यात्रा शुरू हुई चित्त की;अब चिंतन होगा। सुंदर हैतो पीछे से चाहपीछे से चाह चली आएगी। चाह आएगीतो भोग--कामना में हीमन में हीस्वप्न में ही प्रतिमाएं निर्मित होनी शुरू हो जाएंगी।
अगर किसी दिन हम आदमी की खोपड़ी में विंडो बना सके--बना सकेंगेअब तो सर्जन्स कहते हैंबहुत कठिनाई नहीं हैमनोवैज्ञानिक भी कहते हैंबहुत कठिनाई नहीं है--अगर हम आदमी की खोपड़ी में एक कांच की खिड़की बना सके,जो कि हम बना ही लेंगेतब आपको मुसीबत पता चलेगी। अगर बाहर से भी आपकी खोपड़ी में झांका जा सके कि भीतर क्या-क्या हो रहा है!
एक स्त्री जा रही हैतत्काल आपके मन के भीतर बहुत कुछ होना शुरू हो गया है। यह होना किसी को पता नहीं चलताआपको ही पता चलता है। बहुत मौकों पर तो आपको भी पता नहीं चलता। बहुत मौकों पर तो यह इतना अचेतन होता है कि आपको भी पता नहीं चलता। दूसरों को तो पता चलता ही नहींखुद आप भी चूक जाते हैं। यह भीतर चलता रहता है और आप कहीं और चलते रहते हैं। लेकिन कैसे यह शुरू हो रहा है?
तथ्य हैं जगत मेंफिक्शंस वहां नहीं हैंफैक्ट्स हैं। कल्पनाएं मनुष्य डालता है। सुंदर है--यात्रा शुरू हुई। सुंदर हैतो चाह है। चाह हैतो भोग है। अब चिंतन शुरू हुआ। अब वासना चिंतन बनेगी। चिंतन को कहेंकाल्पनिक संग पैदा हुआ। जब काल्पनिक संग पैदा होगातो क्रिया भी आएगीकाम भी आएगा। और कृष्ण कहते हैंकाम आएगातो क्रोध भी आएगा। क्योंकाम आएगातो क्रोध क्यों आ जाएगा?
असल में जो कामी नहीं हैवह क्रोधी नहीं हो सकता। क्रोध काम का ही एक और ऊपर गया चरण है। क्रोध क्यों आता हैक्रोध का क्या गहरा रूप हैक्रोध आता ही तब हैजब काम में बाधा पड़ती हैअन्यथा क्रोध नहीं आता। जब भी आपकी चाह में कोई बाधा डालता है--जो आप चाहते हैंउसमें बाधा डालता है--तभी क्रोध आता है। जो आप चाहते हैं,अगर वह होता चला जाएतो क्रोध कभी नहीं आएगा।
समझें आप कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हैंतो कल्पवृक्ष के नीचे क्रोध नहीं आ सकताअगर कल्पवृक्ष नकली न हो। कल्पवृक्ष असली हैतो क्रोध नहीं आ सकता। क्योंकि क्रोध का उपाय नहीं है। आपने चाहा कि यह सुंदर स्त्री मिले;मिल गई। आपने चाहायह मकान मिलेमिल गया। आपने चाहायह धन मिलेमिल गया। आपने चाहासिंहासन मिलेमिल गया। आपने चाहा नहीं कि मिला नहींतो क्रोध के लिए जगह कहां है!
क्रोध आता हैचाहा और नहीं मिले के बीच में जो गैप हैउस गैप का नामउस अंतराल का नाम क्रोध है। चाहा और नहीं मिलाअटक गई चाहरुक गई चाहहिन्डर्ड डिजायरचाह के बीच में अड़ गया पत्थरचाह के बीच में पड़ गई बाधाक्रोध के वर्तुल को पैदा कर जाती है।
नदी भाग रही है सागर की तरफआ गया एक पत्थर बीच मेंतो सब खड़बड़ हो जाता है। आवाज हो जाती है। पत्थर न हो तो नदी में आवाज नहीं होती। नदी आवाज नहीं करतीपत्थर के साथ टकराकर आवाज हो जाती है।
अगर काम की नदी बहती रहे और कोई बाधा न होतो क्रोध कभी पैदा न होगा। लेकिन काम की नदी बहती है और बाधाओं के पत्थर चारों ओर खड़े हैं। वे खड़े ही हैं। कोई आपके काम को रोकने के लिए नहीं खड़े हैं वेवे खड़े ही थे। आपके काम ने वहां से बहना शुरू किया।
अब एक स्त्री सुंदर मुझे दिखाई पड़ीमैंने उसे चाहना शुरू किया। अब हजार पत्थर हैं। उस स्त्री का पति भी हैवह भी पत्थर है। उस स्त्री का पिता भी हैवह भी पत्थर है। उस स्त्री का भाई भी हैवह भी पत्थर है। कानून भी है,अदालत भी हैपुलिस भी है--वे भी पत्थर हैं। और ये कोई भी न होंतो कम से कम वह स्त्री भी तो है। मैंने चाहा इसलिए वह चाहेयह तो जरूरी नहीं है। मेरी चाह कोई उसके लिए नियम और कानून तो नहीं है। वह स्त्री तो है ही;इस जगत में हम सारे पत्थर हटा देंतो भी वह स्त्री तो है ही। और फिर अगर वह स्त्री भी राजी होतो भी पत्थर नहीं रहेंगेऐसा नहीं है।
यहां थोड़े और गहरे उतरना पड़ेगा।
अगर ऐसा भी हम कर लें जैसा कि समाजशास्त्री सोचते हैंजैसा कि समाजवादी सोचते हैं कि सारे पत्थर अलग कर देंजैसा कि हिप्पी और बीटनिक और प्रवोस सोचते हैं कि सारे पत्थर अलग कर दो--कानून अलग करोपुलिस अलग करो--जहां-जहां पत्थर हैवह अलग कर दोक्योंकि व्यर्थ ही उनसे क्रोध पैदा होता है और मनुष्य दुखी होता है। सब पत्थर अलग कर दो। तो भी एक स्त्री को पचीस पुरुष नहीं चाह लेंगेएक पुरुष को पचीस स्त्रियां नहीं चाह लेंगी,इसका क्या उपाय है?
असल में कानून और व्यवस्था इसीलिए बनानी पड़ी कि अव्यवस्था इससे भी बदतर हो जाएगी। यह बदतर है काफी,लेकिन अव्यवस्था इससे भी बदतर हो जाएगी। यह चुनाव रिलेटिव है। यह बदतर है काफी कि हर जगह चाह के बीच में उपद्रव खड़ा हैलेकिन अगर सारे उपद्रव हटा लोतो महाउपद्रव खड़ा हो जाएगा। अभी एक ही पति है उसका खड़ा। पति की व्यवस्था को हटा दोतो हजार पति नहीं खड़े हो जाएंगेइसका क्या उपाय है रोकने काअभी एक ही पत्नी उस पति के ऊपर पहरा दे रही है। हटा दो उसेतो हजार पत्नियां नहीं पहरा देंगीइसकी क्या गारंटी है?
फिर हम कल्पना भी कर लें कि सब हटा दिया जाए और ऐसा भी कुछ हो जाए कि बाहर से कोई बाधा नहीं आतीतो भीतरी बाधाएं हैंजो और भी बड़ी बाधाएं हैं। क्योंकि जिस स्त्री को आप चाहते हैंजो स्त्री आपको चाहती हैबीच में और कोई बाधा नहीं हैतो भी आप दो हैं और दो होना भी काफी बड़ी बाधा है। और क्रोध रोज-रोज जन्मेगाजरा-जरा सी बात में जन्मेगा।
आप सुबह पांच बजे उठना चाहते हैं और आपकी स्त्री सुबह छः बजे उठना चाहती है। बसइतना भी काफी है। कोई पुलिसअदालतकानून और राज्य की जरूरत नहीं है क्रोध के लिएइतनी ही बाधा काफी है। छोटी-छोटी अड़चनें चाह में खड़ी होती हैं और बाधा खड़ी हो जाती है। वह दूसरा व्यक्ति भी व्यक्ति हैमशीन नहीं है। उसकी भी अपनी चिंतना हैअपना सोचना हैअपना ढंग है। और दो चिंतन एकदम पैरेलल नहीं हो पातेहो नहीं सकते। सिर्फ दो मशीनें समानांतर हो सकती हैंदो व्यक्ति कभी समानांतर नहीं हो सकते।
असल में दो व्यक्तियों का साथ रहना उपद्रव है। न रहना भी उपद्रव हैक्योंकि चाह है। साथ न रहेंतो पूरी नहीं हो सकती। साथ रहेंतो भी पूरी नहीं हो पाती है।
तो वे जितनी अड़चनें हैंवे सब काम में अड़चनेंपत्थर बन जाती हैं और क्रोध को जन्माती हैं। कामी क्रोधी हो जाता है।
अगर कृष्ण ने कहा है कि स्थितप्रज्ञ को क्रोध नहीं होतातो उसका कारण यही है कि स्थितप्रज्ञ को काम नहीं होता;वह निष्काम है। ये नेसेसरी स्टेप्स हैंये अनिवार्य सीढ़ियां हैंजो एक के पीछे चली आती हैं। और एक को लाएंतो दूसरे को लाना पड़ता है। वह दूसरा उससे इतना बंधा है कि वह एक को लाते वक्त ही उसके साथ छाया की तरह भीतर प्रवेश कर जाता है। आपको मैंने निमंत्रण दियाआपकी छाया भी मेरे घर में आ जाती है। आपकी छाया को मैंने कभी निमंत्रण नहीं दिया थापर वह आपके साथ ही हैवह भीतर चली आती है।
काम के पीछे आता है क्रोध। अगर चित्त में क्रोध होतो जरा भीतर खोजने से पता चलेगाकहीं काम है। अटका हुआ काम क्रोध है। रुका हुआ काम क्रोध है। बाधा डाला गया काम क्रोध है। क्रोध का सांप फुफकारता तभी हैतभी वह फन फैलाता हैजब मार्ग में कोई अड़चन आ जाती है और द्वार नहीं मिलता है। जब कोई रोकता हैकोई अटकाता है...।
फिर हम अकेले नहीं हैं इस जगत में। विराट यह जगत है। सभी की कामनाएं एक-दूसरे की कामनाओं को क्रिस-क्रास कर जाती हैंतो सब जगह अटकाव हो जाता है। मैं कुछ चाहता हूंलेकिन साढ़े तीन अरब लोग और हैं पृथ्वी परवे कुछ चाहते हैं। फिर अदृश्य परमात्मा हैफिर अदृश्य जीव-जंतु हैंफिर अदृश्य देवी-देवता हैंफिर अदृश्य वृक्षपशु-पक्षी सब हैंउन सब की चाहें हैं। अगर हम अपने ऊपर देख सकेंतो हमें पता चले कि पूरा आकाशपूरा व्योम अनंत चाहों से क्रिस-क्रास है। अनंत चाहें एक-दूसरे को काट रही हैं। एक-एक चाह पर करोड़-करोड़ चाहों का कटाव है। वह कटाव क्रोध पैदा करता हैकरेगा ही। जहां भी वासना कटी कि पीड़ा हुई। जैसे किसी ने रग काट दी हो और खून बहने लगे। वासना की रग कटती हैतो क्रोध का खून बहता है।
कृष्ण कहते हैंकाम से क्रोध पैदा होता है।
क्रोधक्रोध बहुत ही...। मनुष्य के अस्तित्व मेंजैसा मनुष्य हैबड़ी गहरी आधारशिलाएं उसकी रखी हैं। है क्या क्रोध,अपने मेंशक्तिएनर्जी! तृप्ति के लिए काम के मार्ग से जाती थीलेकिन मार्ग अवरुद्ध पाकर शक्ति उद्विग्न हो गई है। चाहा था कुछउस चाह की पगडंडी से प्राणों की ऊर्जा बहनी थीआ गया है पत्थरअटक गया सब। शक्ति अपने पर लौट पड़ी है। सब भीतर क्रुद्ध हो गया है। लौटा हुआ कामकाम के मार्ग से जाती हुई ऊर्जा अवरुद्ध होकर विद्रोह से भर गई हैविक्षिप्त हो गई हैइनसेन हो गई है। इसलिए क्रोध है।
जैसे-जैसे क्रोध बढ़ता हैवैसे-वैसे मोह बढ़ता है। क्योंजिसे हम चाहते हैं और नहीं पा पातेउसके प्रति मोह और गहरा हो जाता है। मिल जाएतो मोह कम हो जाता है। न मिलेतो मोह बढ़ जाता है। जो नहीं मिलताउसी के प्रति मोह होता हैजो मिलता हैउसके प्रति मोह नहीं रह जाता। क्रोध मोह को जन्म दे जाता है। मोह का मतलब क्या है?
मैंने सुना है कि नादिरशाह ने एक दफे एक बहुत गहरा मजाक किया। गहरा कहना चाहिए। और कभी-कभी पाप में गहरे गए लोगों की बुद्धि भी पुण्य में गहरे गए लोगों की बुद्धि जैसी ही गहरी हो जाती है--उलटी होती हैलेकिन गहरी हो जाती है।
नादिरशाह किसी स्त्री के प्रति लोलुप हैलेकिन वह स्त्री उसके प्रति बिलकुल ही अनासक्त हैपर नादिरशाह के एक सैनिक के प्रति पागल है। स्वभावतःनादिर के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया। पकड़वा भिजवाया दोनों को। पूछा अपने वजीरों से कि कोई नई सजा खोजोजो कभी न दी गई हो।
ऐसी कोई सजा हैजो कभी न दी गई हो! सब सजाएं चुक गई हैं। वजीर बड़ी मुश्किल में पड़े। नई-नई सजाएं खोजकर लातेलेकिन नादिर कहता कि यह हो चुकायह कई बार दी जा चुकी है। हम ही दे चुके हैं। दूसरे दे चुके हैं। नई चाहिए! और सच में ही एक बूढ़े वजीर ने नई सजा खोज ली। आप भी न सोच सकेंगे कि नई सजा क्या हो सकती थी!
नई सजा यह थी कि दोनों को नग्न करकेएक-दूसरे के चेहरों को आमने-सामने करकेदोनों को एक खंभे से बांध दिया गया। कभी सोचा भी नहीं होगा किसी ने! एक दिनदो दिनएक-दूसरे के शरीर से बास आने लगीमल-मूत्र छूटने लगा। तीन दिनएक-दूसरे के चेहरे को देखने की भी इच्छा न रही। चार दिनएक-दूसरे पर भारी घृणा पैदा होने लगी। पांच दिननींद नहींमल-मूत्रगंदगीऔर बंधे हैं दोनों एक साथ--यही चाहते थे! पंद्रह दिनदोनों पागल हो गए कि एक-दूसरे की गर्दन काट दें।
और नादिर रोज आकर देखता कि कहो प्रेमियोइच्छा पूरी कर दी न! मिला दिया न दोनों को! और ऐसा मिलाया है कि छूट भी नहीं सकते। जंजीरें बंधी हैं। पंद्रह दिन बाद जब उन दोनों को छोड़ातो कथा है कि उन्होंने लौटकर एक-दूसरे को जिंदगी में न दुबारा देखा और न बोले। जो भागे एक-दूसरे सेतो फिर लौटकर कभी नहीं देखा!
क्या हुआमोह पैदा होने का उपाय न रहा। अमोह पैदा हो गया। करीब-करीब जिसको हम विवाह कहते हैंवह भी नादिरशाह का बहुत छोटे पैमाने पर प्रयोग है--बड़े छोटे पैमाने पर। किसी बहुत होशियार आदमी ने कोई गहरी ईजाद की है। मैरिज मोह को नहीं जमने देतीमोह को मार डालती है। असल में मोहजो नहीं मिलताउसके लिए पैदा होता है।
इसलिए कृष्ण की इनसाइटउनकी अंतर्दृष्टि गहरी है। वे कहते हैंक्रोध से मोह पैदा होता है अर्जुन! क्योंकि क्रोध का मतलब ही यह है कि जिसे चाहा थावह नहीं मिल सकाइसलिए क्रोध आया। नहीं मिल सकाइसलिए मिलने की और आकांक्षा आएगी। नहीं मिल सकाइसलिए पाने का और पागलपन आएगा। नहीं मिल सकाइसलिए मन और-और विक्षिप्त हो जाएगा और मांग करेगा।
जापान में वेश्याओं का एक वर्ग है--गेसा गर्ल्स। उनकी जो ट्रेनिंग हैउस ट्रेनिंग का एक हिस्सा है--दुनिया में सभी वेश्याओं की ट्रेनिंग का हिस्सा है। वेश्याएं पत्नियों से ज्यादा होशियार हैं। गेसा गर्ल्स को सिखाया जाता है कि कभी इतनी मत मिल जाना किसी को कि अमोह पैदा हो जाए। बसमिलना और न मिलनाइनके बीच सदा खेल को चलाते रहना। पास बुलाना किसी को और दूर हो जाना। कोई निकट आ पाए कि सरक जाना। बुलाना भरमिल ही मत जानाक्योंकि मिल ही गए कि मोह नष्ट हो जाता है। वेश्याएं भी जानती हैं कृष्ण के राज कोउनको भी पता है।
अब यह बड़े मजे की बात है। खयाल में आती हैआपसे कहता हूं। स्त्रियां थीं पृथ्वी की घूंघट में दबीअंधेरे में छिपी। पति भी नहीं देख पाता था सूरज की रोशनी में। कभी खुले में बात भी नहीं कर पाता था। अपनी पत्नी से भी बात चोरी से ही होती थीरात के अंधेरे मेंवह भी खुसुर-फुसुर। क्योंकि सारा बड़ा परिवार होता थाकोई सुन न ले! आकर्षण गहरा थामोह जिंदगीभर चलता था।
स्त्री उघड?परदा गया--अच्छा हुआस्त्री के लिए बहुत अच्छा हुआ--सूरज की रोशनी आई। लेकिन साथ ही मोह क्षीण हुआ। स्त्री और पुरुष आज कम मोहग्रस्त हैं। आज स्त्री उतनी आकर्षक नहीं हैजितनी सदा थी। और यूरोप और अमेरिका में और भी अनाकर्षक हो गई हैक्योंकि चेहरा ही नहीं उघड़ापूरा शरीर भी उघड़ा। आज यूरोप और अमेरिका के समुद्रत्तट पर स्त्री करीब-करीब नग्न हैपास से चलने वाला रुककर भी तो नहीं देखतापास से गुजरने वाला ठहरकर भी तो नहीं देखता कि नग्न स्त्री है।
कभी आपने देखाबुरके में ढकी औरत जाती होतो पूरी सड़क उत्सुक हो जाती है। ढके का आकर्षण हैक्योंकि ढके में बाधा है। जहां बाधा हैवहां मोह है। जहां बाधा नहीं हैवहां मोह नहीं है।
स्त्री और पुरुष का आकर्षण जितना सेक्सुअल हैजितना कामुक हैउससे ज्यादा सोशल हैकल्चरल है। जितना ज्यादा काम से पैदा हुआ हैउतना काम में डाली गई सामाजिक बाधाओं से पैदा हुआ है।
अब मैं मानता हूं कि आज नहीं कलपचास साल के भीतरसारी दुनिया में घूंघट वापस लौट सकता है। आज कहना बहुत मुश्किल मालूम पड़ता हैयह भविष्यवाणी करता हूंपचास साल में घूंघट वापस लौट आएगा। क्योंकि स्त्री-पुरुष इतनी अनाकर्षक हालत में जी न सकेंगे। वे आकर्षण फिर पैदा करना चाहेंगे। आने वाले पचास वर्षों में स्त्रियों के वस्त्र फिर बड़े होंगेफिर उनका शरीर ढकेगा।
बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि जब वह बच्चा थातो विक्टोरियन युग समाप्त हो रहा था। और स्त्रियों के पैर का अंगूठा भी देखना मुश्किल था। घाघरा ऐसा होता थाजो जमीन छूता था। तो बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि अगर किसी स्त्री के पैर का अंगूठा भी दिख जाता थातो चित्त में बिजली कौंध जाती थी। और उसने लिखा है कि अब कल्पना करने को भी कुछ नहीं बचा है। स्त्री पूरी दिखाई पड़ जाती है और चित्त में कोई बिजली नहीं कौंधती।
नग्न स्त्री उतनी आकर्षक नहीं हैनग्न पुरुष उतना आकर्षक नहीं है। और स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा होशियार हैंइसलिए कोई स्त्री नग्न पुरुष में कभी उत्सुकता नहीं लेती। गहरे से गहरे प्रेम के क्षण में स्त्रियां आंख बंद कर लेती हैं कि पुरुष दिखाई ही न पड़े। स्त्रियां ज्यादा होशियार हैंशायद इंसटिंक्टिवली वे प्रकृति के ज्यादा करीब हैं और राजों से परिचित हैं।
कृष्ण कहते हैंक्रोध से मोह पैदा होता है। क्योंकि क्रोध से बाधा पैदा होती है। जहां भी बाधा हैवहां आकर्षण खड़ा हो जाता है।
अब यह बड़े मजे की बात है कि जिन लोगों ने बाधाएं खड़ी की हैंवे ही आकर्षण के लिए जिम्मेदार हैं। ईसाइयत ने पाप को इतना आकर्षक बना दियाक्योंकि पाप के लिए इतनी बाधाएं खड़ी कीं। धर्मों ने सेक्स को बहुत आकर्षक बना दियाक्योंकि उसके लिए बहुत बाधाएं खड़ी कीं।
आमतौर से लोग समझते हैं कि फिल्में हैंनग्न-चित्र हैंनग्न-अश्लील तस्वीरें हैं--ये लोगों को कामुक बना रही हैं। कृष्ण यह नहीं कह सकते कि कामुक बना रही हैं। कृष्ण कहेंगे कि यह लोगों का तो सारा मोह खराब कर देंगी। क्योंकि लोगों के लिए अनाकर्षक हो जाएगीजो चीज परिचित हो जाती है। जिसमें बाधा नहीं हैवह अनाकर्षक हो जाती है।
अगर कृष्ण से हम पूछें मनोविज्ञान का सत्यतो वह यह है कि अगर दुनिया में स्त्री-पुरुष के आकर्षण को बढ़ाना हो,तो नग्न तस्वीरें बंद करोअश्लील तस्वीरें बंद करोस्त्री को नग्न मत करो। ढांकोबाधाएं खड़ी करोस्त्री-पुरुष को एकदम मिल जाने की सुविधा मत बनाओअसुविधाएं खड़ी करो--अगर मोह पैदा करना है।
अगर कृष्ण से हम पूछेंतो कृष्ण वह जवाब नहीं देंगेजो हिंदुस्तान के सब साधु दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि फिल्मों में चुंबन न हो। चुंबन हुआतो लोग कामुक हो जाएंगे। गलत हैं! उन्हें बिलकुल मनोविज्ञान का कोई भी पता नहीं। कृष्ण को ज्यादा पता है। वह कृष्ण कह रहे हैं कि अगर बाधा बिलकुल नहीं हैतो मोह बिलकुल गिर जाएगा। अगर चीजें बिलकुल साफ हैंतो आकर्षण खो देती हैं। निषेध में निमंत्रण है। जहां ढका हैवहां उघाड़ने का मन है। जहां बाधा है!
अब मेरी अपनी समझ यही है कि पुरानी मनुष्य की संस्कृति स्त्री और पुरुष के बीच ज्यादा आकर्षण को जन्माती थी। पुरानी संस्कृति में तलाक मुश्किल था। आकर्षण भारी था। अपनी ही पत्नी से मिलना कहां हो पाता था! कितनी बाधाएं थीं! संयुक्त परिवार बड़ी बाधा का काम करता था। आकर्षण जीवनभर खिंचता था। जीवनभर ही नहींस्त्री और पुरुष चाहते थे कि मरकर भी यही स्त्रीयही पुरुष मिल जाए। तलाक जन्म के साथ भी करने का मन नहीं था। जन्मों-जन्मों तक एक को ही पा लेने का आकर्षण था। राज कहां हैराज इसी सूत्र में हैबाधाएं बहुत थीं।
क्रोध सबसे बड़ी बाधा है। असल में क्रोध बाधा से ही पैदा हुआ चित्त-विकार है। तो मोह पैदा हो जाता है। और जहां मोह पैदा होता हैवहां स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति मोह से भ्रष्ट क्यों हो जाती है?
आमतौर से हम सोचते होंगेकाम से भ्रष्ट होनी चाहिए स्मृति। काम से भ्रष्ट नहीं होतीक्योंकि काम प्राकृतिक तथ्य है। आमतौर से हमें सोचना चाहिएक्रोध से भ्रष्ट हो जाती है स्मृति। लेकिन क्रोध से भी नहीं होती। क्योंकि क्रोध सिर्फ काम के मार्ग में पड़ी अड़चन से पैदा होता है। क्रोध प्रोजेक्टिव नहीं है। यह समझना पड़ेगा। क्रोध का कोई सम्मोहन नहीं है। क्रोध केवल प्रतिकार हैप्रक्षेप नहीं। क्रोध किसी दूसरे का प्रतिकार हैकिसी बाधा को हटाने की चेष्टा है। बाधा हट जाएक्रोध खो जाएगा।
मोह क्रोध से भी सबल है। मोह प्रोजेक्टिव हैमोह अंधा कर देता है। क्रोध पागल करता हैमोह अंधा कर देता है। मोह कहता हैकुछ भी हो! सब बाधाओं को भूलकर मोह पागल होकर जिसे पाना चाहता हैउसके पीछे दौड़ पड़ता है। क्रोध बाधाओं को अलग करने की कोशिश करता हैकाफी रिअलिस्टिक हैक्रोध बहुत यथार्थ है। लेकिन मोह कहता है,बाधाएं! कोई बाधाएं नहीं हैंछलांग लगाएंगेदौड़कर निकल जाएंगे।
मोह अंधा कर देता है। और जब चित्त अंधा होता हैतभी स्मृति क्षीण होती है। हांमोह तक आने के लिए काम और क्रोध जरूरी हैं। लेकिन मोह कहना चाहिए परिपाक है। मोह हमारे चित्त के विकार की सौ डिग्री अवस्था हैजहां से भाप बनना शुरू होता है। निन्यानबे डिग्री तक भी पानी भाप नहीं बनतागरम ही रहता है। और गरम रहने में एक खूबी है कि अभी चाहेनीचे से अगर ईंधन निकाल लिया जाएतो फिर ठंडा हो सकता है। लेकिन सौ डिग्री पर पहुंचकर भाप बन जाएगा। फिर आप ईंधन निकालो या कुछ करोभाप सिर्फ ईंधन निकालने से फिर ठंडी नहीं हो सकती। पानी ने नई अवस्था पा ली।
क्रोध तक सिर्फ मन गरम हैमोह पर भाप बन जाता है। नई अवस्था शुरू हो गई मन कीए न्यू स्टेटक्वालिटेटिव चेंज हो गयागुणात्मक अंतर हो गया। क्रोध तक गुणात्मक अंतर नहीं हैपरिमाणात्मक अंतर हैक्वांटिटेटिव चेंज हो रहा है सिर्फ। इसलिए क्रोध से वापस लौट जाना आसान हैमोह से वापस लौट जाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
इसलिए मोह को कृष्ण कहते हैं कि उससे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। क्योंकि चित्त भाप-भाप हो जाता है। लौटना बहुत कठिन है। अब उसको ठंडा करना बहुत कठिन है। अब ईंधन हटाने से कुछ न होगा। और फिर मोह के तत्व को ठीक से समझेंतो पता चलेगा कि स्मृति क्यों मोह नष्ट करता है।
मनुष्य के मन में स्मृति का जो काम हैमोह का उससे विपरीत काम है। स्मृति तथ्यगत है। स्मृति का मतलब ही यही है कि जो जानाउसे वैसा ही याद रखना जैसा जाना। मेमोरी का मतलब ही इतना है। राइट मेमोरीठीक स्मृति का मतलब इतना ही है कि हम अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़तेजो हैउसको ही स्मरण रखते हैं। उसमें हमारा कोई जोड़ नहीं होता।
मोह कहना चाहिए क्रिएटिव हैसृजनात्मक है। वह वही नहीं देखताजो हैवह वह प्रोजेक्ट करता हैनिर्माण करता है,जो चाहता है कि हो। मोह स्वप्न-निर्माता है। मोह सम्मोहक हैहिप्नोटिक है। मोह अपने हिप्नोटिज्म का जाल फैला देता है। वह बिलकुल अंधा होकर वही देखने लगता हैजो देखना चाहता है।
इसलिए अक्सर हम कहते हैं कि जब कोई मोहग्रस्त होता हैकोई प्रेम में पागल हो जाता हैतो फिर उसे तथ्य दिखाई नहीं पड़ते। वह आग में चल सकता हैवह पहाड़ों से कूद सकता है। उसे फिर कुछ दिखाई नहीं पड़ता। फिर वह रिअलिस्ट नहीं रह जातावह सोम्नाबुलिस्ट हो जाता हैवह नींद में चलने लगता है। उसका चलना फिर नींद में चलना है।
इसलिए प्रेमी को मनुष्य हमेशा से पागल कहता रहा है। और प्रेम को सदा से अंधा कहता रहा है। ठीक होगा कि प्रेम की जगह हम मोह का उपयोग करें। ठीक शब्द मोह है। मोह अंधा हैब्लाइंड है। प्रेम बड़ी और बात है।
प्रेम को मोह के साथ एक कर लेने से गहराभारी नुकसान हुआ है। प्रेम एक बहुत ही और बात है। प्रेम तो उसी के जीवन में घटित होता हैजिसके जीवन में मोह नहीं होता। लेकिन हम प्रेम को ही मोह और मोह को प्रेम कहते रहे हैं।
प्रेम तो बुद्ध और कृष्ण जैसे लोगों के जीवन में होता है। हमारे जीवन में प्रेम होता ही नहीं है। जिनके जीवन में मोह हैउनके जीवन में प्रेम नहीं हो सकता। क्योंकि मोह मांगता हैप्रेम देता है। बिलकुल अलग अवस्थाएं हैं। उनकी हम आगे थोड़ी बात कर सकेंगे। लेकिन मोह को समझने के लिए उपयोगी है।
प्रेम उस चित्त में फलित होता हैजिसमें कोई काम नहीं रह जाताजिसमें कोई वासना नहीं रह जाती। क्योंकि दे वही सकता हैजो मांगता नहीं। वासना मांगती है। वासना कहती हैमिलना चाहिएयह मिलना चाहिएयह मिलना चाहिए। प्रेम कहता हैअब कोई मांग न रहीहम कोई भिखारी नहीं हैं। वासना भिखारी हैप्रेम सम्राट है। प्रेम कहता हैजो हमारे पास हैले जाओ। जो हमारे पास हैले जाओअब हमें तो कोई जरूरत न रहीअब हमारी कोई मांग न रही। अब तुम्हें जो भी लेना हैले जाओ। प्रेम दान है। वासना भिक्षावृत्ति हैमांग है।
इसलिए वासना में कलह हैप्रेम में कोई कलह नहीं है। ले जाओ तो ठीकन ले जाओ तो ठीक। लेकिन मांगने वाला यह नहीं कह सकता कि दे दो तो ठीकन दो तो ठीक। देने वाला कह सकता है कि ले जाओ तो ठीकन ले जाओ तो ठीक। क्योंकि देने में कोई अंतर ही नहीं पड़तानहीं ले जातेतो मत ले जाओ। मांग में अंतर पड़ता है। नहीं दोगेतो प्राण छटपटाते हैं। क्योंकि फिर अधूरा रह जाएगा भीतर कुछपूरा नहीं हो पाएगा।
मोह पैदा होता है वासना की अंतिम कड़ी मेंऔर प्रेम पैदा होता है निर्वासना की अंतिम कड़ी में। कहना चाहिएजिस तरह मोह से स्मृति नष्ट होती हैउसी तरह से प्रेम से स्मृति पुष्ट होती है। पर उसकी अलग बात करेंगे। अभी उससे कोई लेना-देना नहीं है।
मोह सीढ़ियों का नीचे उतरा हुआ सोपान हैपायदान हैजहां आदमी पागल होने के करीब पहुंचता है। प्रेम सीढ़ियों का ऊपरी पायदान हैजहां आदमी विमुक्त होने के करीब पहुंचता है। विक्षिप्त होने के करीब और विमुक्त होने के करीब। मोह के बाद विक्षिप्तता हैप्रेम के बाद विमुक्ति है।
यह जो मोह पैदा हुआयह स्मृति को नष्ट कर देता है। क्योंक्योंकि स्मृति अब रिकार्ड नहीं कर पाती कि क्या है। स्मृति का काम सिर्फ रिकाघडग का है कि वह वही रिकार्ड कर लेजो हैतथ्य को अंकित कर ले। लेकिन मोह के कारण तथ्य दिखाई नहीं पड़ता। मोह के कारण हम एक जाल अपनी तरफ से प्रोजेक्ट करते हैं।
प्रोजेक्टर आपने देखा होगा। सिनेमागृह में परदा होता है। परदे पर चित्र होते हैं। लेकिन आपकी पीठ के पीछे दीवाल के उस पार छिपा हुआ प्रोजेक्टर होता हैमशीन होती हैजो चित्रों को परदे पर फेंकती है। चित्र उस मशीन में छिपे होते हैंपरदे पर नहीं होते हैं। परदे पर चित्रों का सिर्फ भ्रम पैदा होता है। चित्र होते हैं मशीन में छिपेप्रोजेक्टर मेंफेंकने वाले में। और वहां से चित्र फेंके जाते हैंलेकिन दिखाई पड़ते हैं परदे पर। होते हैं प्रोजेक्टर मेंदिखाई पड़ते हैं परदे पर।
मोह प्रोजेक्टर है। होता है हमारे भीतरदिखाई पड़ता है परदे पर। जब मैं किसी स्त्री के प्रेम में पड़ जाता हूंतो जो चेहरा मुझे दिखाई पड़ता हैवह उस स्त्री का नहीं होतावह मेरे प्रोजेक्टर का होता है। वह होता है मेरे भीतरदिखाई पड़ता है वहां। स्त्री सिर्फ परदा होती है। क्योंकि जिनको उस स्त्री से मोह नहीं हैउनको वहां वैसा चेहरा नहीं दिखाई पड़ताजैसा मुझे दिखाई पड़ता है। मुझे उसके पसीने में भी सुगंध आने लगती हैउसके पसीने में भी गुलाब खिलने लगते हैं। किसी को नहीं खिलते। कुछ दिन बाद मुझे भी नहीं खिलेंगे--जब मोह गिरेगा और प्रोजेक्टर बंद हो जाएगा और परदा दिखाई पड़ेगा। तब मैं कहूंगाअरे! क्या हुआगुलाब के फूल कहां गएवे गुलाब के फूल विदा हो जाएंगे। वे गुलाब के फूल वहां थे ही नहीं। वे गुलाब के फूल मैंने आरोपित किए थेप्रोजेक्ट किए थेवह मेरा प्रक्षेप था।
धन में धन के पागल को जो दिखाई पड़ता हैवह धन में होता नहींप्रोजेक्टेड होता है। धन में क्या होगा! लेकिन धन के पागल को देखा है आपने। वह रुपए को किस मोह से पकड़ता हैजैसे किसी जीवंत चीज को पकड़ रहा हो! वह रुपए को किस प्रेम से सम्हालता हैजैसे उसका हृदय हो! वह तिजोरी को कैसे आहिस्ता से खोलता है! वह तिजोरी को कैसे देखता हैजैसे उसकी आत्मा वहां बंद है! वह रात सोता भी हैतो तिजोरी का ही चिंतन घूमता है। रात सपने भी आते हैंतो रुपयों के ही ढेर बढ़ते चले जाते हैं। वह जिस जगत में जी रहा हैउसका हमें कुछ भी पता नहीं है कि उसका प्रोजेक्शन क्या हो रहा है! वह क्या प्रोजेक्ट कर रहा है!
मैंने सुना हैएक आदमी एक गांव में बहुत धनपति है। फिर गांव में लोग मरने लगेअकाल पड़ा। तो लोगों ने उससे कहाइतना धन है तुम्हारे पासइतना धान्य है तुम्हारे पासलोग मर रहे हैंऐसे क्षण पर रोको मत--बांटो। तो उस आदमी ने कहाजिसे तुम बांटने के लिए कह रहे होवह अगर बंट जाए तो मैं मर जाऊं। तो लोग मर रहे हैं माना,लेकिन मैं मरना नहीं चाहता! यह तुम भी जानो। और लोग मर रहे हैंतो दूसरे पैदा हो जाएंगे। लेकिन जो धन मैंने इकट्ठा किया हैवह दूसरा कहां से आ सकता हैलोग बड़े चकित हुए। कभी न सोचा था!
लेकिन उन्हें पता नहीं कि लोग उस आदमी के लिए छायाओं की तरह झूठे हैंधन आत्मा की तरह सच्चा है। लोग हैं ही नहीं उसकी जीवन-परिधि में। उसके मन के घेरे में लोगों का कोई अस्तित्व नहीं है। वे प्रतिबिंब हैं। आते हैंजाते हैं। धन बहुत वास्तविक है।
फिर उसकी पत्नी भी बीमार पड़ गई। गांवभर में लोग मर रहे हैंबीमारियां फैल गईं। उसकी पत्नी बीमार पड़ गईतो लोगों ने कहाकम से कम अपनी पत्नी को दिखाने के लिए वैद्य को बुला लो! उसने कहापत्नी फिर भी मिल सकती है। लेकिन धन फिर भी मिलेगाइसका आश्वासन है?
जिसके मन में धन का मोह हैहम नहीं समझ पाते उसकी भाषा। जैसे अर्जुन पूछ रहा है कि स्थितधी कैसी भाषा बोलता हैऐसे ही मोहग्रस्त कैसी भाषा बोलता हैवह भी हम नहीं समझ सकते। मोहग्रस्त कैसे उठताकैसे बैठता,हमारी पकड़ में नहीं आता। हांअपने-अपने मोह को देखेंगेतो पकड़ में आ सकता है। सबके मोह हैं। दूसरे का मोह हमारी समझ में नहीं आताहमारा मोह ही हमारी समझ में आता है।
उसने कहापत्नी दूसरी मिल जाएगी। पत्नी मर गई। फिर तो वह खुद भी मरने के करीब आ गया। बीमारियां उसे भी पकड़ लीं। लोगों ने कहाअब तो कम से कम अपने पर कृपा करो। अब तो तुम्हीं मरने के करीब हो! उसने कहाधन न बचे और मैं बच जाऊंऐसे बचने से तो मर जाना ही बेहतर है। वह तो बड़ा दुखद हैवह तो बड़ा भयप्रद है कि धन न बचे और मैं बच जाऊं। कल्पना ही नहीं कर सकता धन के बिना मेरे होने की। हांमेरे न होने की कल्पना कर सकता हूं। लेकिन धन के बिना मेरे होने की कल्पना नहीं कर सकता।
मोहग्रस्त आदमी ऐसी ही भाषा बोलता है। वह कहता हैयह स्त्री मुझे न मिलीतो मैं मर जाऊंगा। इस स्त्री के बिना होने की मैं कल्पना नहीं कर सकता। हांअपने न होने की कल्पना कर सकता हूं। वही मोहवह कहता हैऐसा नहीं होगा...अगर मंत्री पद नहीं मिलातो मर जाऊंगा। मंत्री पद के बिना अपने होने की कल्पना नहीं कर सकता। हांअपने न होने की कल्पना कर सकता हूं। मोहग्रस्त की यही भाषा है।
फिर लोगों ने कहालेकिन तुम मर जाओगेतो यह धन पड़ा रह जाएगा। इतने दिन बचाया हैफिर इसका क्या होगाउसने कहा कि क्या तुम सोचते होमैं धन को पड़ा रहने दूंगा! मैं साथ ले जाऊंगा। लोगों ने कहाअब तक सुना नहीं कि कोई धन को साथ ले गया हो! उसने कहासुन लेनाजब मैं ले जाऊंगातब तुम्हें पता चल जाएगा।
मोहग्रस्त मन की स्मृति खो जाती हैसोच-विचार खो जाता हैसहज विवेक खो जाता है। वह कह रहा हैमैं धन को भी साथ ले जाऊंगा! मोहग्रस्त आदमी कहता हैछोडूंगा ही नहींप्राण में समा लूंगा। अपना-अपना मोह!
एक मुख्यमंत्री को मैं जानता हूं एक प्रदेश के। जो मरने के एक साल पहले मुझसे ही कहे कि अब एक ही इच्छा है कि मुख्यमंत्री रहते हुए मरूं। मौत करीब दिखने लगी थी। बहुत बीमार थे। कहा कि बस अब एक ही इच्छा है कि मुख्यमंत्री रहते हुए मरूं। मैंने कहामरने का उतना भय नहींजितना मुख्यमंत्री पद के छूटने का भय है। मरते हुए भी कम से कम मुख्यमंत्री पद तो साथ चला जाए! मरे तो मुख्यमंत्री थेसाथ ले गए!
उस आदमी ने कहाले जाऊंगा साथ। और सच में एक रात उसने कोशिश की। मोहग्रस्त आदमी कोई भी कोशिश कर सकता है। उसकी स्मृति खो जाती हैउसका विवेक खो जाता है। रात उसने देखा कि शायद सुबह नहीं होगी। तो आधी रात वह उठा। उसने अपने सारे हीरे-जवाहरातजो भी कीमती थावह एक बोरी में बंद किया। लेकर नदी के किनारे पहुंचा। उसने सोचा कि अपने बोरे को कमर से बांधकर नदी में कूद जाऊं। आखिरी चेष्टा कि साथ ले जाऊं! लेकिन नदी गहरी है और अगर किनारे कूद पड़ेतो लाश तो किनारे लगी रह जाएगी। वह हीरे-जवाहरातों से भरा हुआ बोरा किनारे रह जाएगा। न मालूम कोई उसे उठा ले!
तो उसने नाविकों को जगाया। कहता हूं नाविकों कोएक नाविक के जगाने से काम चल जाता। पर नाविकों को जगायाक्योंकि वह आदमी ठहराए बिना नहीं कर सकता था कामउसे जाना था बीच नदी में। उसने मांझियों को जगाया और कहा कि सबसे कम में कौन ले जा सकता हैसबसे कम में! और वह आदमी मरने जा रहा है। यह सब धन लेकर डूब जाने वाला है। तो सबसे कम में कौन ले जा सकता है! ठहराया उसने। सबसे कमछोटी से छोटी अशर्फी में जो राजी थाउस मल्लाह के साथ वह नदी में उतरा।
और आखिर जब बीच मझधार में पहुंच गयातो उसने उस मल्लाह से कहा कि क्या एक मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा पूरी न करोगेउसने कहाक्या मतलबकैसी आखिरी इच्छातो उसने कहा कि अगर तुम वह अशर्फी न मांगोतो मैं शांति से मर जाऊं। पर एक मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा! इतनी दुष्टता करोगे कि एक मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा पूरी न करो?
गरीब मल्लाह उस मरते हुए आदमी की आखिरी इच्छा पूरी किया। वह धनपति शांति से कूद गया। ऐसे ही हम सब कूद जाते हैंअपने-अपने मोह से भरी हुई मृत्यु में। मोह स्मृति को नष्ट कर देता हैविचार को छुड़ा देता है।
जहां स्मृति नष्ट होती हैकृष्ण कहते हैंवहां बुद्धि भी नष्ट हो जाती है।
स्मृति और बुद्धि में फर्क है। स्मृति बुद्धि नहीं हैस्मृति बुद्धि की एक फैकल्टी है। स्मृति केवल बुद्धि काकहना चाहिएकोषागार है। स्मृतिकहना चाहिएबुद्धि का संग्रहालय हैरिजर्वायर है। कहना चाहिएस्मृति बुद्धि का अतीत है। बुद्धि ने जो-जो जाना हैवह स्मृति में संगृहीत कर दिया है। बुद्धि का अतीत है स्मृतिबुद्धि नहीं। स्मृति का अर्थ ही हैदि पास्टबीता हुआ।
लेकिन पहले अतीत भ्रष्ट होता हैतब वर्तमान भ्रष्ट होता हैतब भविष्य भ्रष्ट होता है। पहले उसका बोध क्षीण होता हैजो था। फिर उसका बोध क्षीण होता हैजो है। फिर उसका बोध क्षीण हो जाता हैजो होगा। स्वाभाविक। क्योंकि अतीत सबसे ज्यादा स्पष्ट है। जो हो चुका हैवह सबसे ज्यादा स्पष्ट है। जो हो रहा हैअभी धूमिल है। जो नहीं हुआअनिश्चित है। बुद्धि की पकड़ सबसे ज्यादा अतीत पर साफ होती है।
जो हो चुकावह साफ होगा ही। सब रेखाएं पूरी हो गईं। घटनाएं घट चुकीं। जो होना थाउसने पूरा रूप ले लियावह आकृति बन गया। जो हो रहा हैअभी निराकार से आकार में आ रहा है। जो होगावह अभी निराकार है। जो भविष्य हैवह अव्यक्त है। जो वर्तमान हैवह व्यक्त होने की प्रक्रिया में है। जो अतीत हैवह व्यक्त हो गया है।
इसलिए जब पहला हमला होगातो स्मृति पर होगा। क्योंकि वही सबसे स्पष्ट है। सबसे पहले स्पष्ट डांवाडोल हो जाएगा। और जब स्पष्ट ही डांवाडोल हो जाएगातो अस्पष्ट के डांवाडोल होने में कितनी देर लगेगी! और जब अस्पष्ट ही डांवाडोल हो जाएगातो जो अभी निराकार हैउस पर तो सारी ही समझ छूट जाएगी। पहले अतीत नष्ट हो जाएगाफिर वर्तमानफिर भविष्य। पहले इतिहास विकृत हो जाएगाफिर जीवनऔर फिर संभावना।
कृष्ण एक-एक कदमठीक वैज्ञानिक कदम की बात कर रहे हैंस्मृति नष्ट हो जाती है अर्जुनफिर बुद्धि का नाश हो जाता है।
बुद्धि क्या हैऔर कृष्ण जिन अर्थों में बुद्धि का उपयोग करते हैंवह क्या हैकृष्ण इंटलेक्ट के अर्थों में बुद्धि का उपयोग नहीं करते। इंटेलिजेंस के अर्थों में बुद्धि का उपयोग करते हैं। इसमें आपको...भाषाकोश में तो दोनों शब्दों का एक ही मतलब है। आप कहेंगेबुद्धिइंटलेक्ट और इंटेलिजेंस में क्या फर्क है?
बुद्धि का वह रूप जो एक्चुअलाइज हो गया हैइंटलेक्ट है। बुद्धि का वह रूप जो वास्तविक हो गया हैजिसका आप प्रयोग कर चुकेजो सक्रिय हो गया हैवह इंटलेक्ट है। कहेंबुद्धिमानी है। जो बुद्धि का रूप अभी भी निष्क्रिय पड़ा हैजो अभी सक्रिय नहीं हुआजो अभी पोटेंशियल में पड़ा हैबीज में पड़ा हैअभी रूपाकृत नहीं हुआरूपायित नहीं हुआजो अभी साकार नहीं हुआजो अभी वास्तविक नहीं हुआ--केवल संभावना है--बुद्धि मेंइंटेलिजेंस में वह भी सम्मिलित है। दि एक्चुअलाइज्ड इंटेलिजेंस इज़ इंटलेक्ट। जो वास्तविक बन गई है बुद्धिवह बुद्धिमानी है। और जो अभी वास्तविक नहीं बनीवह भी बुद्धि के हिस्से में है।
तो आपकी बुद्धिमानी ही आपकी बुद्धि नहीं हैआपकी बुद्धि आपकी बुद्धिमानी से बड़ी चीज है। अगर आपकी बुद्धिमानी ही आपकी बुद्धि हैतो फिर आपमें विकास का कोई उपाय न बचेगा। बात खतम हो गई। बुद्धि का वर्तुल बड़ा है। बुद्धिमानी का वर्तुल बुद्धि के बड़े वर्तुल में छोटा है। वह बुद्धिमानी का वर्तुल बड़ा होता जाएबड़ा होता जाए और किसी दिन बुद्धि के पूरे वर्तुल को छू लेतो आदमी स्थितप्रज्ञ हो जाता है।
कृष्ण कहते हैंबुद्धि विकृत हो जाती है।
बुद्धिमानी तो विकृत हो जाती है स्मृति के साथ ही। क्योंकि बुद्धिमानी यानी स्मृतिनालेज यानी मेमोरी। नोइंग यानी बुद्धिजानने की क्षमता यानी बुद्धि। जानने की क्षमता जितनी सक्रिय हो गईयानी बुद्धिमानी। जो जान लियावह बुद्धिमानीऔर जो जानने की शक्ति है भीतरवह बुद्धि। बुद्धि सदा जानने की शक्ति से बड़ी है। जानने की वास्तविकता से बड़ी क्षमता है।
स्मृति पहले विकृत हो जाती है। स्मृति अर्थात इंटलेक्ट विकृत हो गई। और फिरकृष्ण कहते हैंवह जो अव्यक्त में पड़ी बुद्धि हैउस तक भी डांवाडोल भंवर पहुंचने लगते हैं। वह जो गहरे में छिपी प्रज्ञा हैवह भी कंपित होने लगती है। क्योंकि जब स्मृति की आधारशिलाएं गिर जाती हैंतो उसके ऊपर अव्यक्त का जो भवन हैशिखर हैवे भी कंपने लगते हैं। वह अंतिम पतन है। और जब बुद्धि-नाश हो जाता हैतो सब खो जाता है।
कृष्ण कहते हैंअर्जुनजब बुद्धि-नाश हो जाता हैतो सब खो जाता है। फिर कुछ भी बचता नहीं। वह आदमी की परम दीनता हैबैंक्रप्सीदिवालियापन है। वहां आदमी बिलकुल दिवालिया हो जाता है--धन खोकर नहींस्वयं को ही खो देता है। फिर उसके पास कुछ बचता ही नहीं। वह बिलकुल ही नकार हो जाता है। ना-कुछ हो जाता है। उसका सब ही खो जाता है। यही दीनता हैयही दरिद्रता है। अगर अध्यात्म के अर्थों में समझेंतो ऐसी स्थिति स्प्रिचुअल पावर्टी हैऐसी स्थिति आध्यात्मिक दारिद्रय है।
लेकिन हम भौतिक दारिद्रय से बहुत डरते हैंआध्यात्मिक दारिद्रय से जरा भी नहीं डरते। हम बहुत डरते हैं कि एक पैसा न खो जाए। आत्मा खो जाए--हम नहीं डरते। हम बहुत डरते हैं कि कोट न खो जाएकमीज न खो जाए। लेकिन जिसने कोट और कमीज पहना हैवह खो जाए--हमें जरा भी फिक्र नहीं। कोट और कमीज बच जाएबस बहुत है। वस्तुओं को बचा लेते हैंस्वयं को खो देते हैं।
खोने की जो प्रक्रिया कृष्ण ने कहीवह बहुत ही मनोवैज्ञानिक है। अभी पश्चिम का मनोविज्ञान या आधुनिक मनोविज्ञान इतने गहरे नहीं जा सका है। जाएगाकदम उठने शुरू हो गए हैंलेकिन इतने गहरे नहीं जा सका है। अभी पश्चिम का मनोविज्ञान काम के आस-पास ही भटक रहा हैसेक्स के आस-पास ही भटक रहा है।
अभी पश्चिम का चाहे फ्रायड हो और चाहे कोई और होअभी पहले वर्तुल पर ही भटक रहे हैंजहां काम है। अभी उन्हें पता नहीं है कि काम के बाद और गहरे में क्रोध हैक्रोध के बाद और गहरे में मोह हैमोह के और गहरे में स्मृति-नाश हैस्मृति-नाश के और गहरे में बुद्धि का दिवालियापन हैबुद्धि के दिवालियापन के और गहरे में स्वयं का पूर्णतया नकार हो जाना है।


रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।। ६४।।
परंतुस्वाधीन अंतःकरण वाला पुरुष राग-द्वेष से रहितअपने वश में की हुई इंद्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसाद अर्थात अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है।


ठीक इसके विपरीत--पतन की जो कहानी थीठीक इसके विपरीत--राग-द्वेष से मुक्तकामना के पारस्वयं में ठहरा,स्वायत्त। स्वयं को खो चुकाऔर स्वयं में ठहरा। अभी जो कहानी हमने समझीअभी जो कथा हमने समझीअभी जो यात्रा हमने देखीवह स्वयं को खोने की। और स्वयं को कैसे खोता है सीढ़ी-सीढ़ी आदमीवह हमने देखा। स्वयं से कैसे रिक्त और शून्य हो जाता है। स्वयं से कैसे बाहरऔर बाहरऔर दूर हो जाता है। कैसे स्वयं को खोकर पर में ही आयत्त हो जाता हैपर में ही ठहर जाता है।
जिसको मैंने कहाआध्यात्मिक दिवालियापनस्प्रिचुअल बैंक्रप्सीउसका मतलब हैपर में आयत्त हुआ पुरुष। यह जो पूरी की पूरी यात्रा थीपर में आयत्त होने से शुरू हुई थी। देखा था राह पर किसी स्त्री कोदेखा था किसी भवन को,देखा था किसी पुरुष कोदेखा था चमकता हुआ सोनादेखा था सूरज में झलकता हुआ हीरा--परदि अदरकहीं पर में आकर्षित चित्त पर की खोज पर निकला था। चिंतन किया थाचाह की थीबाधाएं पाई थींक्रोधित हुआ थामोहग्रस्त बना थास्मृति को खोया थाबुद्धि के नाश को उपलब्ध हुआ था। पर-आयत्तदूसरे में--दि अदर ओरिएंटेड। मनोविज्ञान जो शब्द उपयोग करेगावह हैदि अदर ओरिएंटेड।
तो बड़ी मजे की बात है कि कृष्ण ने स्वायत्तसेल्फ ओरिएंटेड शब्द का उपयोग किया है। पर-आयत्तदूसरे की तरफ बहता हुआ पुरुषदूसरे को केंद्र मानकर जीता हुआ पुरुष। इस पुरुष शब्द को थोड़ा समझेंतो इस पर-आयत्त और स्वायत्त होने को समझा जा सकता है।
शायद कभी खयाल न किया हो कि यह पुरुष शब्द क्या है! सांख्य का शब्द है पुरुष। गांव को हम कहते हैं पुर--नागपुरकानपुर--गांव को हम कहते हैं पुर। सांख्य कहता हैपुर के भीतर जो छिपा हैवह पुरुषपुर में रहने वाला। शरीर है पुर। कहेंगेइतना छोटा-सा शरीर पुर! बहुत बड़ा हैछोटा नहीं है। बहुत बड़ा है। कानपुर की कितनी आबादी हैपांच लाखछः लाखसात लाख होगी। शरीर की कितनी आबादी हैसात करोड़। सात करोड़ जीवाणु रहते हैं शरीर में। छोटा पुर नहीं हैसात करोड़ जीवित सेल हैं शरीर में। अभी तक दुनिया में कोई पुर इतना बड़ा नहीं है। लंदन की आबादी एक करोड़टोकियो की सवा करोड़कलकत्ता की अस्सी लाखबंबई की साठ।
अभी मनुष्य के शरीर के बराबर पुर पृथ्वी पर बना नहीं है। सात करोड़! क्या इससे कोई फर्क पड़ता है कि छोटे-छोटे प्राणी रहते हैं। छोटा कौन हैबड़ा कौन हैसब रिलेटिव मामला है। आदमी कोई बहुत बड़ा प्राणी हैहाथी से पूछें,ऊंट से पूछेंतो बहुत छोटा प्राणी है। तो ये ऊंट या हाथी क्या कोई बहुत बड़े प्राणी हैंपृथ्वी से पूछेंहिमालय से पूछें...।
सोचते होंगे शायदहिमालय में कोई प्राण नहीं हैं। तो गलत सोचते हैं। हिमालय अभी भी बढ़ रहा हैअभी भी ग्रोथ है,अभी भी बड़ा हो रहा है। हिमालय अभी भी जवान है। सतपुड़ा और विंध्याचल बूढ़े हैंअब बढ़ते नहीं हैं। अब सिर्फ थकते हैं और झुक रहे हैं। हिमालय अभी भी बढ़ रहा है। हिमालय की उम्र भी बहुत कम हैसबसे नया पहाड़ है। सब पुराने पहाड़ हैं। विंध्या सबसे ज्यादा पुराना पहाड़ है। सबसे पहले पृथ्वी पर विंध्या पैदा हुआ। बूढ़े से बूढ़ा पर्वत है। अब उसकी ग्रोथ बिलकुल रुक गई है। अब वह बढ़ता नहीं है। अब वह थक रहा हैटूट रहा हैझुक रहा हैकमर उसकी आड़ी हो गई है। हमारे पास कहानी हैउसकी कमर के आड़े होने की।
अगस्त्य की कथा हैकि मुनि गए हैं दक्षिण और कह गए हैं कि झुका रहनाजब तक मैं लौटूं न। फिर वे नहीं लौटे। कर्म आदमी के हाथ में हैफल आदमी के हाथ में नहीं है। लौटना मुनि का नहीं हो सका। फिर वह बेचारा झुका है। पर यह जियोलाजिकल फैक्ट भी हैयह पुराण कथा ही नहीं है। विंध्या झुक गया है और अब उसमें विकास नहीं है;बूढ़ा है। हिमालय बच्चा है।
हिमालय से पूछेंऊंटहाथी! वह कहेगाबहुत छोटे प्राणी हैं। खुर्दबीन से देखूं तब दिखाई पड़ते हैंनहीं तो नहीं दिखाई पड़ते। पृथ्वी से पूछें कि हिमालय की कुछ खबर है! वह कहेगीऐसे कई हिमालय पैदा हुएआए और गए। सब मेरे बेटे हैंमुझ में आते हैंसमा जाते हैं। धरित्री--वह मां है। लेकिन पृथ्वी कोई बहुत बड़ा प्राण रखती है! तो सूरज से पूछें। सूरज साठ लाख गुना बड़ा है पृथ्वी से। उसे दिखाई भी नहीं पड़ती होगी पृथ्वी। साठ लाख गुने बड़े को कैसे दिखाई पड़ेगी?
पर सूरज कोई बहुत बड़ा हैमत इस खयाल में पड़ना। बहुत मीडियाकर स्टार हैबहुत मध्यमवर्गीय है। उससे बहुत बड़े सूर्य हैंउससे करोड़ और अरब गुने बड़े सूर्य हैं। ये जो रात को तारे दिखाई पड़ते हैंये सब सूर्य हैं। छोटे-छोटे दिखाई पड़ते हैंक्योंकि बहुत दूर हैं। ये छोटे होने की वजह से छोटे नहीं दिखाई पड़ते। ये बहुत दूर हैंइसलिए छोटे दिखाई पड़ते हैं। बहुत बड़े-बड़े महासूर्य हैंजिनसे पूछें कि हमारा भी एक सूर्य है! तो वे कहेंगे कि हैपर बहुत गरीब हैछोटा है। किसी गिनती में नहीं आता। कोई वी.आई.पी. नहीं है!
लेकिन वे महासूर्यजो इस सूर्य से भी अरबों गुने बड़े हैंवे भी क्या बहुत बड़े हैंतो पूरे जगत से पूछें। तो अब तक वैज्ञानिक कहते हैं कि चार अरब सूर्यों का हमें पता चला है। मगर वह अंत नहीं है। उसके पार भीउसके पार भी,बियांड एंड बियांड--कुछ अंत नहीं है। यहां कौन छोटाकौन बड़ा! सब छोटा-बड़ा रिलेटिव है।
आपके शरीर में जो जीवाणु हैंवे भी छोटे नहीं हैंआप भी बड़े नहीं हैं। सात करोड़ की एक शरीर में बसी हुई बस्ती! और आप सोचते हों कि इन सात करोड़ जीवाणुओं को आपका कोई भी पता हैइनका आपको कोई भी पता है--तो नहीं है। आपको इनका पता नहीं हैइनको आपका पता नहीं है। उनको भी आपका पता नहीं है कि आप हैं। आप जब नहीं होंगे इस शरीर मेंतब भी उनमें से बहुत-से जीवाणु जीए चले जाएंगे। मर जाने के बाद भी! आप मरते हैंवे नहीं मरते। उनमें जो अमीबा हैंबहुत छोटे हैंवे तो मरते ही नहीं। उनकी लाखों साल की उम्र है। अगर उम्र के हिसाब से सोचेंतो आप छोटे हैंवे बड़े हैं।
कब्रिस्तान में दबे हुए आदमी के भी नाखून और बाल बढ़ते रहते हैं। क्योंकि बाल और नाखून बनाने वाले जो जीवाणु हैंवे आपके साथ नहीं मरते। वे अपना काम जारी रखते हैं। उनको पता ही नहीं पड़ता कि आप मर गए। वे नाखून और बाल को बढ़ाए चले जाते हैं। और जब आप मरते हैंतो सात करोड़ कीटाणुओं की संख्या में कमी नहीं होती है और बढ़ती हो जाती है। आपके मरने से जगह खाली हो जाती है और हजारों कीटाणु प्रवेश कर जाते हैं। जिसको आप सड़ना कहते हैंडिटेरियोरेशनवह आपके लिए होगानए कीटाणुओं के लिए तो जीवन है।
यह पुरइसमें जो बीच में बसा है इस नगर केवह पुरुष। यह पुरुष दो तरह से हो सकता है: पर-आयत्त हो सकता है,स्वायत्त हो सकता है। जब यह वासनाग्रस्त होता हैतो यह दूसरे को केंद्र बनाकर घूमने लगता है। सैटेलाइट हो जाता है।
जैसे चांद है। चांद सैटेलाइट है। वह जमीन को केंद्र बनाकर घूमता है। जमीन भी सैटेलाइट हैवह सूर्य को केंद्र बनाकर घूमती है। सूर्य भी सैटेलाइट हैवह किसी महासूर्य को केंद्र बनाकर घूमता है। सब अदर ओरिएंटेड हैं।
लेकिन उन्हें माफ किया जा सकता हैक्योंकि उनकी चेतना इतनी नहीं कि वे जान सकें कि क्या अदर और क्या सेल्फक्या स्वयं और क्या पर। आदमी को माफ नहीं किया जा सकतावह जानता है। पति पत्नी का सैटेलाइट है,पत्नी के आस-पास घूम रहा है। कभी छोटा वर्तुल बनाता हैकभी बड़ा वर्तुल बनाता हैलेकिन पत्नी के आस-पास घूम रहा है। पत्नी पति की सैटेलाइट है। वह उसके आस-पास घूम रही है। कोई धन के आस-पास घूम रहा हैकोई काम के आस-पास घूम रहा हैकोई पद के आस-पास घूम रहा है--सैटेलाइटपर-आयत्त। दूसरा केंद्र हैहम तो सिर्फ परिधि पर घूम रहे हैं--यही दिवालियापन है।
लेकिन हम अपने केंद्र स्वयं हैंकिसी के आस-पास नहीं घूम रहे हैंतो आदमी स्वायत्त है। यही सम्राट होना है। यही स्प्रिचुअल रिचनेस है। जिसको जीसस ने किंगडम आफ गाडपरमात्मा का साम्राज्य कहाउसको कृष्ण कह रहे हैं,स्वायत्त हुआ पुरुष परम आनंद को उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि पर-आयत्त हुआ पुरुष परम दुख को उपलब्ध हो जाता है। दुख यानी पर-आयत्त होनाआनंद यानी स्वायत्त होना।
ये सब समाधिस्थ व्यक्ति की तरफ ही वे इशारे करते जा रहे हैं अर्जुन को। सब दिशाओं सेअनेक-अनेक जगहों से वे इशारे कर रहे हैं कि समाधिस्थ पुरुष यानी क्या। वह जो सवाल पूछ लिया था अर्जुन नेहो सकता हैवह खुद भी भूल गया हो कि उसने क्या सवाल पूछा था। लेकिन कृष्ण उसके सवाल को समस्त दिशाओं से ले रहे हैं। कहीं से भी उसकी समझ में आ जाए।
तो वे यह कह रहे हैं कि जो स्वयं ही अपना केंद्र बन गयाजिसका अब कोई पर केंद्र नहीं हैऐसा पुरुष परम ज्ञान कोपरम शांति कोपरम आनंद को उपलब्ध हो जाता है।
अभी इतना। फिर शेष सांझ हम बात करेंगे।

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