बुधवार, 5 जून 2019

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--13

ओम शांति शांति शांति

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

ओम पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
                  ओम शांति: शांति: शांति:।

ओम वह पूर्ण है और यह भी पूर्ण हैक्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बच रहता है।
                  ओम शांतिशांतिशांति।

जीवन का शाश्वत नियम हैजहां से होता है प्रारंभवहीं होती है परिणति। जो है आदिवही है अंत। जीवन के इसी शाश्वत नियम के अंतर्गत ईशावास्य जिस सूत्र से शुरू होता हैउसी सूत्र पर पूर्ण होता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। सभी यात्राएं वर्तुल में हैं। दि फर्स्ट स्टेप इज दि लास्ट आलसो। पहला कदम आखिरी कदम भी है।

जो ऐसा समझ लेते हैं कि पहला कदम आखिरी कदम भी हैवे व्यर्थ की दौड़— धूप से बच जाते हैं। जो जानते हैंजो प्रारंभ है वही अंत भी हैवे व्यर्थ की चिंता से बच जाते हैं। पहुंचते हैं हम वहींजहां से हम चलते हैं। यात्रा का जो पहला पड़ाव हैवही यात्रा की अंतिम मंजिल है। इसलिए बीच में हम बिलकुल आनंद से चल सकते हैं। क्योंकि अन्यथा कोई उपाय नहीं है। हम वहां नहीं पहुंचेंगे जहां हम नहीं थे। हम वहां पहुंचने की कितनी ही चेष्टा करेंहम वहां नहीं पहुंचेंगे जहां हम नहीं थे। हम वहीं पहुंचेंगेजहां हम थे। 
इसे ऐसा समझें कि हम वही हो सकते हैंजो हम हैं ही। अन्यथा कोई उपाय नहीं है। जो हममें छिपा हैवही प्रगट होगा। और जो प्रगट होगावह वापस लुप्त हो जाएगा। बीज वृक्ष बनेगावृक्ष फिर बीज बन जाते हैं। ऐसा ही जीवन का शाश्वत नियम है। इस नियम को जो समझ लेते हैंउनकी चिंता क्षीण हो जाती है। उनके त्रिविध ताप शांत हो जाते हैं। कोई फिर कारण नहीं है। न दुख कान सुख का। दुखी होने का कोई कारण नहीं हैक्योंकि हम अपनी मंजिल अपने साथ लेकर चलते हैं। सुखी होने का कोई कारण नहीं हैक्योंकि हमें ऐसा कुछ भी नहीं मिलताजो हमें सदा से मिला हुआ ही नहीं है।
इसलिए इस महानियम की सूचना के लिए ही उपनिषद शुरू होता है ईशावास्य के जिस मंत्र सेउसी मंत्र पर पूरा होता है। बीच में हमने जो यात्रा कीवे भी उसी मंत्र तक पहुंचने के अलग—अलग द्वार थे। प्रत्येक मंत्र पुनः—पुन: उसी महासागर की स्मृति को जगाने के लिए सूचना थी। और प्रत्येक घाट और प्रत्येक तीर्थ उसी सागर में नाव छोड़ देने के लिए पुकारआमंत्रण,आह्वान था। इस सूत्र को अगर आपने खयाल रखा होतो हर सूत्र के प्राणों में यही अनुस्यूत था। इसीलिए इसे पहले ही घोषणा कर दी थी और अब अंत में उसकी निष्पत्ति की घोषणा है। मैंने पहले ही दिन इस सूत्र का अर्थ आपको कहा थाआज इसका अभिप्राय कहूंगा।
पूछेंगे आपअर्थ और अभिप्राय में क्या फर्क होता होगा?
अर्थ तो बहुत प्रगट बात हैअभिप्राय बहुत गुप्त। अर्थ तो शरीर हैअभिप्राय आत्मा। अर्थ तो बुद्धि से भी समझा जा सकता हैअभिप्राय सिर्फ हृदय से। स्वभावत: प्राथमिक रूप से अर्थ ही कहा जा सकता थाअभिप्राय नहीं। लेकिन अब हमने बहुत—बहुत द्वारों से भी झांककर देखा उस मंदिर मेंजिस मंदिर के लिए यह सूत्र घोषणा करता है। न केवल हमने समझा,बल्कि ध्यान में उतरकर भी देखने की कोशिश की।
एक अर्थ में यह घटना अनूठी है। उपनिषद पर बहुत टीकाएं हुई हैं। लेकिन ध्यान के साथ कभी कोई टीका हुई होयह पृथ्वी पर पहला मौका है। उपनिषद के शब्दों का अर्थ हुआ हैलेकिन अभिप्राय में छलांग लगाने की जीवंत चेष्टा भी हुई होयह पहला मौका है। अभिप्राय में अर्थ लगाने की जीवंत चेष्टाएं भी हुई हैं। लेकिन अर्थ के साथ अभिप्राय की दोहरी खोज एक साथ हुई होयह पहला मौका है।
मेरी दृष्टि मेंजो मैं बोल रहा थावह सिर्फ इसीलिए था कि जब आप छलांग लगाएंगेतो उसके लिए जंपिंग बोर्ड बन जाए। लेकिन प्रयोजन छलांग ही था। इसलिए हर सूत्र के बाद हम ध्यान में कूदते रहे। शब्द जिसे जाना थाउसे छलांग लगाकर अनुभव से भी जानने की चेष्टा की। इसलिए अब मैं अभिप्राय कह सकता हूं। क्योंकि अब आपने शब्द भी सुन लिए हैं और शब्द को समझकर पर्याप्त नहीं मानाशब्द के बाद कुछ और भी किया है — निःशब्द में पहुंचने के लिए। अर्थ तो केवल वे ही जान पाते हैंवे भी जान लेते हैंजो शब्द को जानते हैं। लेकिन अभिप्राय केवल वे ही जानते हैं और जान पाते हैंजो निःशब्द को जान लेते हैं। अगर थोड़ी भी झलक निःशब्द की मिली होगीतो अब मैं जौ अभिप्राय कहता हूं वह समझ में आ सकेगा।
इस सूत्र का अभिप्राय क्या हैइस सूत्र के अभिप्राय में पहली बात तो आपसे यह कह दूं यह सूत्र घोषणा करता है कि जीवन अतर्क्य हैइल्लाजिकल है। कहीं भी इस सूत्र में कहा नहीं है कि जीवन अतर्क्य है। इशारा है यह। जो कहा हैउसका अर्थ मैंने कह दिया। जो नहीं कहा हैउसका अर्थ आप से कहता हूं। जो सिर्फ इशारा है।
विट्गिस्टीन ने इस सदी में लिखी गई संभवत: सर्वाधिक कीमती किताब में.. इन पूरे सौ वर्षों में लाखों किताबें लिखी गई हैंलेकिन विट्गिस्टीन की किताब अनूठी है। किताब का नाम है — ट्रेक्टेटस। इस ट्रेक्टेटस में विट्गिस्टीन ने एक बात कही है — दैट व्हिच कैन नाट बी सेडमस्ट नाट बी सेड। जो नहीं कहा जा सकताउसे कभी नहीं कहना चाहिए। उसे अनकहा छोड़ देना चाहिए। एक बात और कही है कि दैट व्हिच कैन नाट बी सेडकैन बी शोड। जो नहीं कहा जा सकता हैवह भी बताया जा सकता है।
ऐसा समझेंजो नहीं कहा जा सकता हैउसकी तरफ भी इशारा किया जा सकता है। जो कहा जा सकता थावह मैंने पहले सूत्र के अर्थ में आपसे कहा। जो नहीं कहा जा सकता है और न ही कहे जाने का जिसका उपाय हैवह इस सूत्र का अभिप्राय है। वह मैं अब आपसे इशारा करता हूं। पहला इशारा जीवन अतर्क्य है। इसलिए जो लोग तर्क से जीवन को खोजने जाएंगेवे केवल मृत्यु के आसपास भटकेंगेजीवन को कभी नहीं जान पाएंगे। क्योंइस सूत्र से अतर्क्य की तरफइररेशनल की तरफ इशारा क्यों मिलता है?
क्योंकि सूत्र कहता हैपूर्ण से पूर्ण निकल आता है।
पहली तो बात पूर्ण से पूर्ण निकलेगा कैसेक्योंकि पूर्ण के बाहर कोई जगह भी नहीं होतीजिसमें पूर्ण निकल आए। पूर्ण का मतलब ही है एब्लोल्युटजिसके पार कुछ भी नहीं है। अगर कुछ भी होतो उतना तो अपूर्ण हो जाएगा इसके भीतर। पूर्ण के बाहर कुछ भी नहीं होता। जगह भी नहीं होतीस्पेस भी नहीं होतीआकाश भी नहीं होता। तो पूर्ण के बाहर पूर्ण निकलेगा कैसेनिकलेगा तो कहां जाएगा निकलकरनिकलने की कोई भी सुविधा नहीं है।
लेकिन यह सूत्र कहता हैपूर्ण से पूर्ण निकाल लो। न केवल इतना कहता हैबल्कि और एक अतर्क्य बात कहता है कि फिर पीछे पूर्ण शेष रह जाता है।
एक तो निकल नहीं सकता पूर्ण से पूर्णक्योंकि निकलेगा कहांऔर अगर निकल आएपूर्ण ही निकल आएतो पीछे शेष कैसे रह जाएगापीछे तो सब शून्य हो जाएगा।
यह तथ्य तर्क का नहीं हैतर्क से कोई सोचेगा तो यह किसी पागल का वक्तव्य है। गणित से कोई सोचेगातो यह सूत्र बिलकुल गलत है। यह किसी ने होश में नहीं लिखा हैकोई नशे में रहा होगा। मस्तिष्क ठीक न रहा होगातब कहा होगा। अगर कोई तर्क और गणित से सोचेगा तब।
लेकिन जो तर्क और गणित से सोचता हैवह वैसी ही भूल करता हैजैसी एक बार एक बगीचे में हो गई।
एक माली ने अपने एक मित्र को निमंत्रण दे दिया कि गुलाब में बहुत खूबसूरत फूल आए हैं। आओ बगीचे में! लेकिन मित्र तो था सुनार। तो वह अपने सोने के कसने की कसौटी साथ ले आया। और जब गुलाब के फूल उसने देखेतो उसने कहा,ऐसे मैं न मानूंगा। मुझे तुम धोखा न दे पाओगे। मैं कोई बच्चा नहीं हूं। मैं सोने तक को परख लेता हूं इस फूल का क्या वश! इसको भी परख लूंगा। उस माली ने कहाफूल को परखोगे कैसेउसने कहामैं सोने को कसने की कसौटी साथ ले आया हूं। माली घबराया कि गलती हो गई इस आदमी को निमंत्रण देकर। लेकिन तब तक तो उस आदमी ने फूल को तोड़कर और पत्थर की कसौटी पर घिस डाला था। घिसकर फूल को नीचे फेंक दिया था और कहा कि सब झूठ है। फूल सच नहीं है। कसौटी कहती है।
जैसा उस माली को लगा होगावैसे ही अगर कोई तर्क और गणित से इस सूत्र को समझने जाएतो इस सूत्र के ऋषि को लगेगा। फूल सोने को कसने की कसौटियों पर नहीं कसे जाते। और कसे जाएं तो इसमें फूलों की गलती नहीं हैकसने वाले की नासमझी है।
यह सूत्र — इस ईशावास्य में कहे गए सभी सूत्रऔर विशेषकर यह सूत्र — आत्म— अनुभव में खिला हुआ फूल है। इसे तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। और इस सूत्र में पूरी खबर है कि तर्क की कसौटी पर कसना मतक्योंकि सूत्र इशारा कर रहा है। वह यह कह रहा है कि हम कुछ ऐसी बात कहने जा रहे हैंजो अतर्क्य है। जो हो नहीं सकती हैलेकिन होती है। जो होनी नहीं चाहिएफिर, गई घटित होती है। जिसके घटने का कोई आधार नहीं मिलताखोजने से कोई उपाय नहीं मिलता,फिर भी है।
जीवन अतर्क्य हैइसका क्या अर्थ हुआइसका अर्थ हुआ कि जो जीवन को नियमगणिततर्कन्यायविधिव्यवस्था से सोचेंगेवे जीवन के रहस्यमिस्ट्री से वंचित रह जाएंगे। एक फूल को सुनार ने कस लिया पत्थर पर। इसी फूल को अगर वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में ले जाएंगे और कहेंगेबहुत सुंदर हैतो वह भी इस फूल के एक—एक टुकड़े को काटकर देखेगा कि सौंदर्य कहां हैवह भी इस फूल के एक—एक तत्व को निकालकर बिखरा लेगाएक—एक केमिकल को अलग कर लेगा और कहेगासौंदर्य कहा हैइसमें रस हैखनिज हैंकेमिकल हैसब हैसौंदर्य कहीं भी नहीं है। वह एक—एक बोतल में निकालकर अलग—अलग चीजें रख देगा और कहेगा कि ये सब चीजें हो गईंफूल पूरा हो गयासब बोतलों में सब चीजों के लेबल लगा दिएलेकिन सौंदर्य कहीं भी मिलता नहीं है।
फूल का कोई कसूर नहीं है कि वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में सौंदर्य न मिले। वैज्ञानिक का भी कसूर नहीं हैक्योंकि उसके पास जो प्रयोगशाला हैवह सौंदर्य को मापने के लिए नहीं है। सौंदर्य को मापने का आयाम दूसरा है।
जीवन को जो लोग गणित की तरह सोचते हैंवे लोग जीवन को कभी नहीं माप पाते। क्योंकि जीवन मूलत: एक रहस्य है। कितना ही हम जान लेंहमारा सब जाना हुआऔर गहरे अज्ञान पर खड़ा होता है। कितना ही हम जान लेंहमारा सब जाना हुआऔर भी जानने को शेष हैउसकी तरफ इंगित मात्र करता है। कितना ही हम जान लें। और जितना हम जानते हैं,उतना ही पता चलता है कि आदमी का अज्ञान गहन है।
जीवन को हम खोल नहीं पाते हैं। खोलते हैं तो और उलझ जाता है। हमारे जीवन को खोलने की सब कोशिश वैसी ही है,जैसा मैंने सुना हैईसप ने एक कहानी कही है। कहा है कि एक सेंटीपीडएक शतपदी जानवर गुजरता है एक रास्ते से। एक खरगोश ने देखाबहुत चकित हुआ। खरगोश की दिक्कत यह हुई — खरगोश किसी तर्क की पाठशाला में शिक्षा पाया होगा — उसकी कठिनाई यह हुई कि यह शतपदी जानवरसौ पैर वाला जानवरपहले कौन सा पैर उठाता होगाफिर कौन सा उठाता होगाफिर कौन सा उठाता होगाकैसे हिसाब रखता होगा कि कौन सा पैर उठ गयाकौन सा नहीं उठा! सौ पैर हैं लड़खड़ा जाते होंगेदिक्कत में पड़ जाता होगा! चलता कैसे होगा?
रोका। कहा कि रुको! एक जवाब देते जाओ। मैं जरा एक तर्क का विद्यार्थी हूं। मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। चार पैर चलाते हैं हमतब तो समझ में आता हैहिसाब रह जाता है। सौ पैर चलाते होओगेहिसाब कैसे रखते हो? शतपदी जानवर ने कहाअब तक चलता रहा हूं भलीभांतिहिसाब रखने की जरूरत नहीं पड़ी। अब तक कभी सोचा भी नहीं इस भांति कि कौन सा पैर पहले उठता हैकौन सा पीछे उठता है। लेकिन तुम कहते हो तो अब मैं सोचकर तुम्हें बताऊंगा।
खरगोश वहीं बैठा रहा। शतपदी मे पैर उठाने की कोशिश कीलड़खड़ाकर गिर गया। सौ पैरकौन सा उठाऊं! वह भी मुश्किल में पड़ गया। दयनीय मन से उसने खरगोश से कहामेरे मित्र! तुम्हारे तर्क ने मुझे मुश्किल में डाल दिया है। तुम कृपा करके अपने तर्क को अपने पास रखना। और शतपदी यहां से कोई गुजरे तो तुम यह प्रश्न मत पूछना। हम बड़े मजे से जी रहे थे। कभी पैरों ने कोई दिक्कत न दी थी। कभी पैरों ने कोई सवाल न उठाया और कोई तर्क खड़ा न किया था। और कभी हमने सोचा न था कि कौन सा पहले उठता हैकौन सा पीछे उठता है। पता नहींकौन पहले उठता थाकौन पीछे उठता था। इतना तय है कि हम अब तक चले हैं। अब तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया।
आदमी की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि वह शतपदी जानवर की हालत में है और सवाल किसी खरगोश ने नहीं पूछा,आदमी खुद ही पूछ लेता है। खुद ही पूछ—पूछकर उलझता चला जाता है। खुद ही सवाल पूछ लेता है और खुद ही जवाब निर्मित कर लेता है। सवाल तो गलत होते ही हैंजवाब उनसे भी गलत हो जाते हैं। हर जवाब नए सवाल उठा देता है। फिर सवालों की भीड़ और जवाबों की भीड़ और आदमी उलझता चला जाता है। और वह घड़ी आ जाती हैजब उसे कुछ भी पता नहीं रहता है कि क्या—क्या है — व्हाट इज व्हाट। हम सब उस हालत में हैं।
संत अगस्तीन से किसी ने पूछा कि एक सवाल मेरे मन को बड़ा परेशान करता है। मुझे जवाब दे दें तो मुझे बड़ी राहत मिले। सुना हैआप ज्ञानी हैं। अगस्तीन ने कहा कि सुना होगा तुमने कि ज्ञानी हूं लेकिन जब से मैंने सुना हैतब से मैं जरा मुश्किल में पड़ गया हूं। उस आदमी ने पूछा कि आपकी क्या मुश्किल हैमुश्किल हम अज्ञानियों की होती है। अगस्तीन ने कहामैं इसलिए मुश्किल में पड़ गया हूं कि जब से मैं सुन रहा हूं कि मैं इतनी हूं तब से मैं बहुत खोजता हूं अपने भीतर कि ज्ञान कहां हैकहीं पाता नहीं। पहले तो भूल—चूक से मैं भी मानता था। अबअब मानना कठिन है। फिर भी तुम्हारा सवाल क्या हैजब तुम इतनी दूर चलकर आ गए हो तो सवाल पूछ ही लो। भला मैं जवाब न दे सकूंतुम्हें कम से कम राहत तो रहेगी कि सवाल पूछ लिया है। और चाहे मैं जवाब दे भी दूं जवाब कोई दे देसवालों के जवाब कहीं किसी को मिलते हैं?इसलिए तुम पूछ तो लो ही।
उस आदमी ने पूछा कि मैं यही जानना चाहता हूं कि समय क्या है — व्हाट इज टाइमअगस्तीन ने कहा कि बसवही सवाल पूछ लियाजो मैं सोचता था और डरता था कि तुम पूछ न लो। कुछ ऐसे सवाल हैं कि जब तक तुम न पूछोहमें पता होता है — अगस्तीन ने कहा — कि मतलब क्या है। और पूछा कि हम मुश्किल में पड़े। मुझे पक्की तरह पता है कि समय क्या है। लेकिन तुमने पूछा कि मुश्किल में डाला।
आपसे भी कोई पूछे कि समय क्या हैभलीभांति आप जानते हैं। वक्त पर ट्रेन पकड़ लेते हैंबस पकड़ लेते हैंदफ्तर पहुंच जाते हैंदफ्तर से घर आ जाते हैं। समय का आपको भलीभांति पता हैलेकिन कोई पूछे भर न आपसे कि समय क्या है,नहीं तो शतपदी जानवर की हालत हो जाए।
समय क्या हैजन्मेतारीखें पता हैंघड़ियां पास में हैंकैलेंडर लटके हैंसब पता हैफिर भी समय क्या है? अभी तक कोई उत्तर नहीं दे सका है। और जितने उत्तर दिए गए हैंवे सब अंधेरे में टटोलने जैसे हैंजिनसे कुछ हल नहीं होता है।
पूछे कोईआत्मा क्या हैहै आपके पास। जन्मेउस दिन से है। जो जानते हैंवे कहते हैंजन्मे उसके पहले से है। इतने दिन हो गएआत्मा आपके पास हैअभी तक पता नहीं लगा पाए कि क्या है। कोई न पूछे तो सब ठीक है। कोई पूछे तो अड़चन खड़ी हो जाती है।
प्रेम क्या हैकोई पूछे। करते हैं सब। नहीं भी करतेतो भी करते हुए बताते हैं। कितनी प्रेम की कहानियां हैं! सभी कहानियां प्रेम की हैं। और इसीलिए प्रेम की हैंक्योंकि प्रेम आदमी अब तक कर नहीं पाया। कहानी लिख—लिखकर मन को समझाता है। सब कविताएं प्रेम की हैं। जिस आदमी की भी जिंदगी में प्रेम नहीं होतावह प्रेम की कविता लिखने लगता है। कविता लिखना बहुत आसान हैप्रेम करना बड़ा कठिन है। कविता तो तुक बांध लेने से बंध जाती हैप्रेम तो सब तुक तोड़ने से बनता है। कविता के तो छंद और नियम हैंप्रेम तो बिलकुल निश्छंद है — छंदहीन। कहां शुरू होता हैकहां अंत होता हैकुछ पता नहीं। कोई मात्रा नहींकोई ठिकाना नहीं। तो कविता तो सीखी जा सकती हैबनाई जा सकती है। प्रेम को बनाने और सीखने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन प्रेम की हम चौबीस घंटे बात करते हैं और कोई पूछ ले कि प्रेम क्या है?
इस सदी के एक बहुत बड़े विचारकऔर कहना चाहिए सबसे बड़े तार्किक आदमी जी.ई.मूर ने एक किताब लिखी है। इन पचास वर्षों में जिस आदमी ने मनुष्य जाति के मन को सर्वाधिक तार्किक रूप से प्रभावित किया हैवह जी.ई मूर है। उसने एक किताब लिखी है। किताब का नाम हैप्रिंसिपिया इथिका — नीति—शास्त्र के सिद्धांत। बड़ी किताब हैबड़ी मेहनत की है। और एक ही सवाल पर मेहनत की है — व्हाट इज गुडशुभ क्या हैअच्छाई क्या हैभलाई क्या है न:
और इस बड़े ग्रंथ में इतना श्रम किया है कि मैं मानता हूं कि किसी दूसरे आदमी ने मनुष्य जाति के पूरे इतिहास में किसी प्रश्न पर इतना श्रम नहीं किया है। और इतनी मेहनत के बाद यह तर्कशास्त्रीआक्सफोर्ड युनिवर्सिटी का सबसे ज्यादा विचारशील व्यक्तिइतनी बड़ी किताब कोवर्षों की मेहनत के बाद — एक—एक इंच सरककर किताब लिखी गई हैऔर एक—एक शब्द तौलकर लिखा गया है — आखिर के नतीजे में कहता हैगुड इज इनडिफाइनेबल। वह जो शुभ हैउसकी कोई व्याख्या नहीं हो सकती। और आखिर में कहता है कि शुभ ऐसा ही हैजैसा कि कोई मुझसे पूछेव्हाट इज यलो — पीला रंग क्या है?तो मैं क्या कहूंपीला रंग पीला हैयलो इज यलो! और क्या कहिएगाकि पीला रंग पीला है।
लेकिन यह कोई कहना हुआ! यह तो हमें भी पता है कि पीला रंग पीला है। हम यह पूछते हैं कि पीला रंग है क्याआप क्या करोगेतोड़कर ले आना एक फूल। कहना कि यह है। लेकिन वह जी.ई.मूर कहता है कि यह पीला फूल हैपीला रंग नहीं। एक पीली दीवार है रंगी हुई। लेकिन वह पीली दीवार हैपीला रंग नहीं। एक पीला कपड़ा है। लेकिन वह पीला कपड़ा हैपीला रंग नहीं है। हम यह पूछते हैं कि पीले फूल मेंपीले कपड़े मेंपीली दीवार में जो पीलापन हैवह क्या है — व्हाट इज यलोनेस?आप क्या कहिएगाआप कहेंगे कि यह रहीइससे ज्यादा और बकवास न करो।
मूर भी यही कहता है। मूर भी यही कहता है इतनी मेहनत के बाद कि ज्यादा से ज्यादा हम कह सकते हैं कि दिस इज यलोनेस। हम इशारा कर सकते हैंव्याख्या नहीं कर सकते। क्या व्याख्या करिएगाअगर पीले रंग की व्याख्या नहीं हो सकती तो परमात्मा की करिएगाकोई जी.ई.मूर से जाकर कहे — अब तो वह मर गया बेचाराजिंदा होता तो मैं सोचता था उससे कहूंया फिर कभी आगे यात्रा में मिल जाएतो उससे कहूं — कि जब पीले रंग को भी तुम पाते हो कि उसकी व्याख्या नहीं हो सकतीतो परमात्मा की व्याख्या हो सकेगी रा
जीवन के क्षुद्रतम तथ्य भी अव्याख्य हैं। जब मैं कहता हूं जीवन अतर्क्य हैतब मैं कह रहा हूं कि जीवन अव्याख्य,इनडिफाइनेबल है। आप उसकी व्याख्या नहीं कर सकते। जी सकते हैंकह नहीं सकतेक्या है। और जब भी कहने जाएंगेतो ऐसी ही गलती हो जाएगीजैसी इस सूत्र का ऋषि कहकर पड़ गया गलती में। कहता हैपूर्ण से पूर्ण निकल आता हैपीछे पूर्ण शेष रह जाता है। यह तो पहेली हुई।
यह तो पहेली ऐसी हुईजैसा कि एक झेन फकीर था रिंझाई। और ये फकीरों को बड़ा मजा आता है पहेलियां खड़ी करने में। क्योंकि उनसे इशारे किए जा सकते हैं। जब भी कोई उसके पास आता सत्य की खोज करनेतो वह कहतासत्य पीछे खोज लेना। मैं जरा एक मुश्किल में पड़ा हूं। पहले वह तुम मेरी हल कर दो। तो कोई भी पूछता कि क्या मुश्किल हैजो सत्य खोजने आया थावह भी यह भूल जाता कि मैं सत्य खोजने आया हूं मैं दूसरे की मुश्किल क्या हल करूंगा! लेकिन जब रिंझाई कहता कि तुम जरा पीछे पूछ लेनामेरी जरा एक मुसीबत हैवह तुम हल कर दो। तो वह भी आदमी पूछता कि आपकी क्या मुश्किल है?
शिष्य बनने आया आदमी भी गुरु बनने की कोशिश करता है। वह भूल ही गया कि हम पूछने आए थे। कहना था कि हम पूछने आए हैंहम तुम्हारी मुश्किल क्या हल करेंगे!
हम खुद मुसीबत में पड़े हैं। लेकिन रिंझाई ने लिखा है कि जिंदगी में हजारों लोगों से मैंने यह कहा और हर बार यही हुआ कि उस आदमी ने पूछाकौन सी मुश्किल हैबोलिएकि यह आदमी खोजने मेरे पास आया। पर उसने तरकीब बना रखी थी। मुश्किल ऐसी थी कि वह हल होने वाली नहीं थी।
असल में तो सभी मुश्किलें ऐसी हैं कि हल होने वाली नहीं हैं। कोई मुश्किल हल होने वाली नहीं है। क्योंकि मुश्किल कोई आदमी की बनाई हुई नहीं हैएक्सिस्टेंशियल हैअस्तित्व में है। आदमी की बनाई हुई होतो हम हल कर लें। पहेलियां आदमी की बनाई हुई होंतो हम हल कर लें।
बच्चों की किताब होती है गणित कीतो ऊपर सवाल लिखा रहता हैपन्ना उलटाकर पीछे जवाब लिखा रहता है। जिंदगी में ऐसा कहीं किताब उलटाने का उपाय नहीं कि उलटा लो जिंदगी की किताबपीछे देख लो कि उत्तर क्या है। इसीलिए तो जिंदगी में नकल नहीं चलती। जिंदगी में नकल का कोई उपाय नहीं है। करिएगा कहांकिसकी नकल करिएगाऔर उलटाकर देखने की कोई स्थिति नहीं है कि जिंदगी की किताब को उलटा लो और देख लो कि उत्तर क्या है! प्रश्न ही हैंउत्तर कुछ है नहीं।
उसने एक सवाल बना रखा था। वह कहता कि सुनोमेरी तकलीफ हल कर दोतो मैं तुम्हारी कर दूंगा। आदमी आश्वस्त होता कि चलो ठीक हैएक आदमी तो मिलाजो कहता हैमैं तुम्हारी हल कर दूंगा। लेकिन उसे पता नहीं कि वह एक बड़ी कंडीशन साथ में रख रहा है कि पहले तुम मेरी तकलीफ हल कर दोतो मैं तुम्हारी कर दूंगा।
तकलीफ यह थीरिंझाई कहता है कि मैंने एक बोतल में एक मुर्गी का अंडा रख दिया था। अंडा फूट गया। मुर्गी बड़ी होने लगी। मैं उसको बोतल के मुंह से खाना खिलाता रहा। अब मुर्गी बहुत बड़ी हो गई है। बोतल का मुंह छोटा है। मुर्गी को बाहर निकालना है और बोतल को तोड़ना नहीं है। कुछ रास्ता बताओ। बोतल तोड़नी नहीं हैबोतल कीमती है। और मुर्गी बड़ी हो गई हैफंस गई है बोतल में बिलकुल। और मुंह बड़ा छोटा है। मुंह से निकल नहीं सकतीध्यान रखना। मुंह बहुत छोटा है। वह हम सब कोशिश कर चुकेइसलिए यह मत कहना कि मुंह से निकाल लो। मुंह से निकलती नहीं हैबोतल तोड़नी नहीं है। और मुर्गी अगर ज्यादा देर रह गई तो मर जाएगीजिम्मेदार तुम रहोगे। है कोई उत्तरवह आदमी कहता कि आप कैसी बातें कर रहे हैं!
अगर कोई आदमी कहता कि मैं कोशिश करूंगासोचता हूं विचारता हूं तो रिंझाई कहता कि बगल के कमरे में चले जाओ। ध्यान करो — मेडीटेट। मुर्गी बंद हैजान संकट में हैदेर मत लगाना। ध्यान तेजी से करनागहरा करना। क्योंकि जान संकट में हैमुर्गी किसी भी क्षण मर सकती है। मुंह छोटा हैबोतल तोड़नी नहीं है! ध्यान करो।
कमरे के उस तरफ भी उसने एक दरवाजा रख छोड़ा था। जब आधा घंटे बाद वह दरवाजा खोलतातो दूसरे दरवाजे से आदमी भाग गया होता। उनकी भी मजबूरी है। लौटकर रिंझाई दूसरों से कहतादि गज इज आउट। मुर्गी भाग गई। मुर्गी बोतल के बाहर निकल गई। बोतल खाली पड़ी है।
सिर्फ एक आदमी ने रिंझाई को एक दफा उत्तर दिया। लेकिन वह आदमी वह नहीं थाजो रिंझाई से कुछ पूछने आया हो। एक दिन सुबह एक आदमी आकर बैठ गया रिंझाई के पास। रिंझाई ने कहाकुछ पूछना हैउस आदमी ने कहा कि तुम्हें कुछ बताना हैरिंझाई थोड़ा डरा। उसने कहाहमें कुछ नहीं पूछना। हम तो उस आदमी की तलाश में हैंजो कोई कुछ बताने को उत्सुक हो तो बता दे। रिंझाई डरायह आदमी खतरनाक है। या तो मुर्गी मार डालेगा या बोतल तोड़ देगा। फिर भी कोई उपाय न था। रिंझाई की इतनी पुरानी आदत थी कि उसने कहानहींकुछ बताना नहीं है। हम खुद एक मुसीबत में हैं। उसने कहाबोलो! कही अपनी कथा उसने पूरी। जब पूरी कह चुकातो उस आदमी ने रिंझाई की गर्दन पकड़ ली। रिंझाई ने कहा कि मुर्गी मेरे भीतर नहीं हैमुर्गी बोतल के भीतर है। उस आदमी ने कहामैं मुर्गी को निकाले देता हूं। उस आदमी ने कहामुर्गी बोतल के बाहर हैबोलो! रिंझाई ने कहाहै।
जीवन कोई पहेली नहीं है। जो उसे पहेली बनाते हैंवे ही मुश्किल में पड़ जाते हैं। जिंदगी कोई प्रश्न नहीं है। जो प्रश्न बनाते हैंउन्हें उत्तर खोजना पड़ता है। सब उत्तर उलझाते चले जाते हैं।
जीवन एक खुला रहस्य है — ओपन सीक्रेट। ध्यान रहेदोहरे शब्द उपयोग करता हूं ओपन सीक्रेट — खुला रहस्य। जीवन बिलकुल खुला हैआंख के सामने हैचारों तरफ। कहीं भी छिपा नहीं है। कोई पर्दा नहीं है। फिर भी रहस्य है।
रहस्य और पहेली में फर्क होता है। पहेली का मतलब होता हैजो खुल सकती है। रहस्य का मतलब होता हैजो खुला हुआ है और फिर भी — फिर भी खुला हुआ नहीं है। रहस्य का मतलब हैजो बिलकुल खुला हुआ है और फिर भी इतना गहरा है कि तुम अनंत—अनंत यात्रा करोफिर भी पाओगे कि सदा शेष रह गया। पूर्ण से पूर्ण बाहर भी निकल आएतो भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। पूर्ण में पूर्ण लीन भी हो जाएतो भीतो भी पूर्ण उतना ही रहता हैजितना था।
इस रहस्यमयताइस मिस्टीरियसनेस की सूचना देने वाला यह सूत्र है। यह इशारा है। यह इशारा है इस बात का कि जो इस सूत्र को राजी हो जाएगावह जीवन में प्रवेश कर सकता है। जो इस सूत्र को कहेगा कि नहींयह नहीं हो सकतावह दरवाजे के बाहर ही रह जाएगा। वह दरवाजे के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।
रहस्य है जीवन। रहस्य का मतलब है तर्कातीत। तर्क के नियम आदमी ने अपनी बुद्धि से खोजे हैं। तर्क के नियम कहीं प्रकृति में लिखे हुए नहीं हैं। प्रकृति तर्क के नियम सप्लाई नहीं करती। प्रकृति कोई तर्क का नियम नहीं देती। तर्क के नियम आदमी निर्मित करता है। कामचलाऊ हैं। लेकिन भूल जाते हैं हम कि कामचलाऊ हैं।
हमारे सब नियम ऐसे ही हैंजैसे हमारे खेल के नियम होते हैं — रूल्स आफ दि गेम। शतरंज का खेल है — घोड़ा है,हाथी हैसब हैं। सबकी चालें बंधी हैं। भारी गंभीरता से खिलाड़ी खेलते हैं। सच तो यहै कि शतरंज के खेल में जितने गंभीर लोग दिखाई पड़ते हैंउतने शायद असली जिंदगी में भी दिखाई नहीं पड़ते। तलवारें खिंच जाती हैं। लकड़ी के घोड़े बिछाए हुए हैं। लकड़ी के हाथी बनाए हुए हैं। लकड़ी के प्यादेराजा बनाए हुए हैं। मगर जब खेल में लीन होते हैंतो यह बिलकुल भूल जाते हैं कि यह बच्चों का काम कर रहे हैं। कोई घोड़ा नहीं हैकोई हाथी नहीं हैकोई राजा नहीं हैकोई प्यादा नहीं हैसब माना हुआ है। सब अज़भ्यांस हैं।
ठीक जिंदगी के भी सब तर्क के नियम ऐसे ही हैं। सब माने हुए नियम हैं। कोई नियम नहीं हैजो प्रकृति ने हमें दिया हैजो जीवन ने हमें दिया है। हमने थोपे हैं। हमारे नियम वैसे ही हैंजैसे सड़क पर चलने केट्रेफिक के नियम होते हैं। बाएं चलोकि दाएं चलो। हिंदुस्तान में लोग बाएं चलते हैंअमरीका में लोग दाएं चलते हैं। उनका नियम है कि दाएं चलो। अमरीका में बाएं चलो तो पुलिस का आदमी पकड़कर थाने ले जाएगा। इधर दाएं चले तो पुलिस का आदमी पकड़कर...। बड़े अजीब लोग हैं। लेकिन एक बात पक्की है कि कहीं न कहीं चलना पड़ेगादाएं चलो कि बाएं चलो। कोई भी नियम बनाओ। लेकिन एक नियम बनाना पड़ेगाक्योंकि रास्ते पर भीड़ है और चलना है। धीरे— धीरेबाएं चलते—चलते ऐसा लगता है कि बाएं चलने में कोई अल्टीमेटनेसकोई आत्यतिकता हैकि बाएं चलने में कोई बड़ी गहरी कोई व्यवस्था है। कोई व्यवस्था नहीं है। हमारी व्यवस्था है। झूमन अरेंजमेंट है।
हमारे सब तर्क के नियम भी ऐसे ही हैं। हमारी व्यवस्था है। काम चलाने के लिए बिलकुल जरूरी हैंयूटिलिटेरियन हैं। लेकिन धीरे— धीरे हम इतने फंस जाते हैं उनमें कि उनको पूरी जिंदगी के रहस्य पर फैलाने की कोशिश करते हैं। कोशिश करते हैं इस बात की कि जिंदगी हमारे नियम मानकर चले। और जिस दिन कोई आदमी जिंदगी को अपने नियम मनवाने लगता है,उसी दिन पागल हो जाता है। पागलपन का एक ही लक्षण है।
स्वस्थ मनुष्य मैं उसे कहता हूं जो जिंदगी के रहस्य को मानकर चलता है। और पागल आदमी उसको कहता हूं जो अपने नियमों को जिंदगी पर थोपने की कोशिश कर रहा है। फिर कठिनाई खड़ी होनी शुरू होती है। हमने सब थोपे हुए हैं हमारे नियम। तर्क के एक—दो नियमों को हम समझ लेंतो इस सूत्र को समझने में आसानी हो जाएगी।
तर्क के कुछ बुनियादी नियम हैंजिसमें एक नियम उदाहरण के लिए। तर्क का एक बुनियादी नियम हैअ अ है और अ ब नहीं हो सकता — ए इज एए कैन नाट बी बी। ठीक है। बिलकुल ठीक है। अ अ हैअ ब नहीं हो सकता। लेकिन जिंदगी में ऐसी कोई चीज नहीं हैजो अपने से भिन्न में न बदल जाती हो। और जिंदगी में ऐसी कोई चीज नहीं हैजो अपने से विपरीत में भी न बदल जाती हो। जिंदगी में सब चीजें लिक्विड हैंफिक्क नहीं हैंसब चीजें बदलती हैं। रात दिन बन जाती हैदिन रात हो जाता है। बचपन जवानी बन जाता हैजवानी बुढ़ापा हो जाती है। जिंदगी मौत बन जाती है। जहर अमृत हो जाता है कभी। सब औषधियां जहर हैं। बीमार के लिए अमृत बन जाती हैं।
जिंदगी में तरलता हैनियमों में होती है सख्ती। क्योंकि नियम जिंदा तो होते नहीं। अगर एक.. इस कमरे में हम इतने लोग बैठे हैं। अगर घंटेभर बाद मैं आऊं और मैं यह आशा करूं कि आप मुझे वहीं बैठे मिलेंगे जहां छोड़ गया थातो या तो मैं पागल हूं या आप पागल होंगे। अगर लौटकर मैं आपको वहीं बैठा पाऊंतो कुछ गड़बड़ है। या तो मुर्दा आदमी बैठे होंगे। जिंदा आदमी तो बदल गए होंगे।
एक गांव में ऐसी एक बार दिक्कत हो गई। एक तर्कशास्त्री — और तर्क शास्त्रियों से जैसी दिक्कतें होती हैं उनके हिसाब लगाने बड़े मुश्किल हैं — गया था सुबह—सुबह नाई की दुकान पर बाल बनवाने। बाल तो बनवा लिए। रुपया पूरा था। आठ आने दाम होते थे। नाई ने कहा कि कल ले जाना। तर्कशास्त्री ने सोचा कि कल! अगर यह आदमी बदल जाएतो प्रमाण क्या है?स्वभावत: तर्कशास्त्री प्रमाण...। अगर यह आदमी कल बदल जाएतो प्रमाण क्या हैअगर यह आदमी कल अपना धंधा ही बदल लेसमझ लो कि मिठाई की दुकान खोल लेनाईबाड़ा बंद कर देतो अगर मैं किसी से कहूं भी कि मैंने इस आदमी से बाल बनवाए थेतो लोग हंसेंगेकहेंगे कि यह मिठाई वाला है! तो कुछ ऐसी तरकीब करूं कि यह आदमी न बदल पाए।
उसने बहुत खोजबीन की। देखा कि एक भैंस नाईबाड़े के सामने बैठी है। उसने कहा कि ठीक है। भैंस को समझाना बहुत मुश्किल है। भैंस काफी थिर चीज है। तर्क के नियमों जैसी। जमकर बैठती है। सड़क के कानून नहीं मानतीकोई नियम नहीं मानती। इसको नाई शायद ही समझा पाए। तर्कशास्त्री नहीं समझा पाएतो नाई क्या समझा पाएगा! ठीकपक्का निशान लगाकर कि भैंस सामने बैठी हैचला गया।
दूसरे दिन आया। देखाअपनी भैंस खोजीभैंस बैठी थी। सामने देखाबोला कि हो गई वही शरारतजो होनी थी। सामने मिठाई की दुकान थी। दौड़कर मिठाई वाले की गर्दन पकड़ ली और कहा कि मुझे कल ही शक हो गया थाइसलिए इंतजाम मैं पक्का करके गया था। हद कर दी तूने भीआठ आने के पीछे जाति तक बदल डाली!
तर्कशास्त्री को पता नहीं कि भैंस तर्क के नियम नहीं मानतीफिक्स नहीं हैरातभर में चल गईमिठाई वाले के सामने बैठ गई। भैंस को क्या पता?
तर्क के नियम तो मुर्दा हैं। मरे हुए हैं। जिंदगी जीवंत धारा है। जो उनकोतर्क के नियमों कोऊपर बिछाकर जिंदगी को पकड़ने की कोशिश करता हैउसके हाथ में मरी हुई चीजें आती हैं। गलत चीजें आ जाती हैं।
नहींतर्क के जाल को तोड़कर जो जिंदगी में कूदता हैवही जिंदगी के रहस्य को जान पाता हैनहीं तो नहीं जान पाता। इसलिए यह सूत्र कहता हैतर्क के सब जाल तोड़ दो। यह सूत्र का इशारा मैं कह रहा हूं — अभिप्राय — अर्थ नहीं कह रहा हूं। अर्थ तो मैंने आपसे कहा। अभिप्राय है कि तर्क के सब नियम तोड़ दो। तर्क के नियम मानना होतो जिंदगी में जाना मुश्किल होगा।
प्लेटोयूनान का बहुत बड़ा तर्कशास्त्री हुआ। कहना चाहिए पिता। बड़ी एकेडेमी थी उसकीजहां वह लोगों को तर्क सिखाता था। डायोजनीज नाम का एक फकीर — बहुत मस्त फकीरकम ही लोग.. महावीर जैसा आदमीनग्न ही रहता था — वह भी एक दिन घूमता हुआ एकेडेमी में पहुंच गया। वहां क्लास चलती थी। प्लेटो समझा रहा था। प्लेटो बड़ा तर्कशास्त्री था।
हमारे मुल्क में प्लेटो के लिए जो नाम प्रचलित हैवह है अफलातून। इसलिए अगर कोई आदमी बहुत तर्क—वर्क की बात करने लगेतो लोग कहते हैं कि बड़े अफलातून हो गए। अफलातून प्लेटो का नाम है। प्लेल से अफलातून बन गया। बड़े अफलातून हो गए आप। प्लेटो इतना बड़ा तार्किक था कि अगर कोई भी तर्क करे — गांव में भी — तो लोग कह देते हैं कि बड़े अफलातून हो गए हो। उसे भी पता नहीं कि अफलातून किसका नाम है। वह तो एथेंस में हुआ हैढाई हजार साल पहले।
डायोजनीज पहुंच गया एक दिन घूमता हुआ प्लेटो की एकेडेमी मेंजहां वह तर्कशास्त्र पढ़ाता था। वह पढ़ा रहा था। एक विद्यार्थी ने खड़े होकर पूछा — डायोजनीज पीछे खड़ा सुन रहा था — एक विद्यार्थी ने खड़े होकर पूछा कि आदमी की परिभाषा क्या हैहाऊ यू डिफाइन मैनआदमी की क्या व्याख्या करते हैंतो प्लेटो ने कहा कि आदमी बिना पंखों वाला दो पैर का जानवर हैटू लेग्ड एनिमल विदाउट फीदर्स। व्याख्या तो हो गई। पंख नहीं हैंदो पैर वाला जानवर हैबिना पंख के।
डायोजनीज खिलखिलाकर हंसा। प्लेटो ने पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैंउसने कहा कि मैं अभी तो इस परिभाषा का उत्तर भेजता हूं। वह बाहर गया। उसने एक मुर्गे को पकड़ा। उसके सारे पंख नोचकर अलग फेंक दिए। मुर्गे को भेज दिया और कहा कि दिस इज योर डेफिनीशन आफ मैन — टु लेग्ड एनिमल विदाउट फीदर्स। पंख नहीं हैंदो पैर का जानवर है। प्लेटो से कहा उसनेपरिभाषा फिर बदलो। और जब तुम दूसरी परिभाषा बनाओ तो मुझे भेज देना। मैं दूसरी परिभाषा का उत्तर भेजूंगा। तुम परिभाषा बनाओ मैं उत्तर भेजूंगा।
कहते हैंप्लेटो ने फिर परिभाषा नहीं बनाई। यह झंझट का आदमीमुर्गे के पंख तोड़कर भेज दिएऔर पता नहीं क्या करे! डायोजनीज कई बार उसके दरवाजे पर दस्तक देता था कि प्लेटोकोई परिभाषा बनीप्लेटो कहताभई! अभी नहीं बना पाया। आखिर एक दिन प्लेटो घबरा गया और डायोजनीज से कहा कि मुझे माफ करोगलती हो गई कि मैंने वह परिभाषा की। तुम कब तक मेरा पीछा करोगे!
डायोजनीज ने कहामैं यही सुनना चाहता था कि माफी मांग लो। आदमी की क्यापत्थर के टुकड़े की भी परिभाषा नहीं हो सकतीइनडिफाइनेबल। जीवन अव्याख्य है। इसमें किसी चीज की कोई व्याख्या नहीं हो सकती। इतना तुम स्वीकार कर लो,मैं जाऊं। नाहक मुझे भी परेशान होना पड़ रहा है तुम्हारी व्याख्या की वजह से।
तर्क के नियम तो होते हैं थिरफिक्स्‍ड। जीवन होता है तरलबहता हुआ। एक तरंग दूसरी तरंग में बदल जाती है। जब तक तुम व्याख्या करोतब तक कुछ और हो गया। जिस आदमी को तुमने क्रोधी कहाजब तक तुमने क्रोधी कहावह क्षमा कर रहा है। फिर क्या करोगेसच तो यह है कि जब तक तुमने कहायह आदमी क्रोधी हैतब तक क्रोध जा चुका होगा। इस जिंदगी में टिकता क्या है? तब तक क्रोध उतार पर होगा। तुम्हारी व्याख्या गलत हो जाएगी।
व्याख्या सब अतीत की होती है और जिंदगी सदा वर्तमान है। जिंदगी सदा बदल जाती है। सदा बदल जाती है। प्रतिपल बदल रहा है सब। और व्याख्याएं तो ठहर जाती हैं जमकर। व्याख्याओं में कोई ग्रोथ तो होती नहींकोई बदलाहट तो होती नहीं।
व्याख्याएं तो ऐसी हैंजैसे हम फोटोग्राफ ले लेते हैं। मेरा किसी ने फोटोग्राफ ले लियातो व्याख्या फोटोग्राफ जैसी चीज है। मैं तो का होता जाऊंगाफोटोग्राफ वैसा का वैसा ही बना रहेगा। जिंदगी तो जिंदा आदमी जैसी हैबदलती जाएगी। और व्याख्या पकड़कर जकड़ बन जाती है। वह रुक जाती है।
यह सूत्र कहता हैनहीं कोई व्याख्या है जीवन कीनहीं कोई तर्क है जीवन का। जीवन एक रहस्य है।
तर्तूलियन एक ईसाई फकीर हुआ। तो किसी ने तर्तूलियन को पूछा कि तुम ईश्वर को क्यों मानते होतुम्हारा कारण क्या हैतर्तूलियन ने कहाकारण! जब मैंने जिंदगी में देखा कि कोई कारण किसी चीज के लिए नहीं हैतब मैंने सोचा कि ईश्वर को मानने में अब कोई हर्जा नहीं रहा। अकारण जब जिंदगी है पूरीतो ईश्वर को भी अकारण माना जा सकता है। और अगर तुम नहीं मानतेपूछते ही हो मुझसेतो मैं ईश्वर को इसलिए मानता हूं कि ईश्वर बिलकुल तर्कशून्य हैएब्सर्ड है। जो शब्द उसने उपयोग किया। उसने कहा कि ईश्वर बिलकुल एब्सर्ड हैइसलिए मैं भरोसा करता हूं कि वह ठीक होगा। क्योंकि मैंने सब नियम देखे छान—बीनकरगलत पाए। सब तर्क के मैंने हिसाब देखेगलत पाए। जितनी व्याख्याएं खोजींगलत पाईं। जिन—जिन बातों को मैंने बुद्धि से समझाठीक हैंआखिर में गलत निकलीं। अब मैंने बुद्धि छोड़ दी। अब मैं निर्बुद्धि होकर मानता हूं।
श्रद्धा का यही अर्थ है। यह सूत्र श्रद्धा का सूत्र हैश्रद्धा काफेथ का। श्रद्धा का अर्थ हैजंपिंग इनटु दि अननोन। श्रद्धा का अर्थ हैअज्ञात में छलांग। श्रद्धा का अर्थ हैसमस्त नियमोंसमस्त व्याख्याओंसमस्त परिभाषाओं कोसमस्त गणनाओं को छोड्कर अमाप मेंइम्मेजरेबल मेंअसीम में छलांग। बुद्धि को छोड्कर निर्बुद्धि में छलांग।
ध्यान रहेजीवन का सत्य जिन्होंने बुद्धि से खोजावे तो हैं फिलासफर्सदार्शनिक। वे कुछ नहीं खोज पाए आज तक। हजारों किताबें लिखी हैं दार्शनिकों नेकोरे शब्दों का जाल। कुशल हैं वे शब्दों में। वे जाल भी फैलाते हैं कुशलता से। वे जाल इतना बड़ा फैलाते हैं कि आपको मुश्किल हो जाता है उसके बाहर निकलना। लेकिन कुछ भी उन्हें पता नहीं है — कुछ भी उन्हें पता नहीं है।
जिन्होंने जीवन के सत्य को जानावे दूसरे लोग हैं — वे हैं संतवे हैं ऋषि। वे वे लोग हैंजिन्होंने कहा कि शब्द में हम नहीं उतरतेहम तो अस्तित्व में ही उतरते हैं। क्यों हम जाएं पता लगाने कि गंगा क्या हैजब गंगा बह रही हैतो हम गंगा में ही क्यों न डूबकर देख लें कि गंगा क्या हैशास्त्र में लिखा होगा कि गंगा क्या है। ग्रंथालय में किताबें रखी होंगी,जिनमें लिखा होगा कि गंगा क्या है। लेकिन हम गंगा को ग्रंथालय में खोजने क्यों जाएंजब गंगा ही मौजूद हैतो हम गंगा में ही उतरकर स्नान क्यों न कर लें! हम गंगा को गंगा में ही क्यों न जान लें!
दो रास्ते हैं जानने के। अगर मुझे प्रेम के संबंध में जानना होतो मैं पुस्तकालय में भी जा सकता हूं। वहां प्रेम के संबंध में बहुत कुछ लिखा हुआ रखा है। वह सब मैं जान ले सकता हूं। एक रास्ता और है कि मैं प्रेम में ही उतरूं। निश्चित ही पहला रास्ता सुगम है। इसलिए कमजोर लोग पुस्तकालय का रास्ता पकड़ लेते हैं। सुगम है। किताब में प्रेम को पढ़नाकोई बड़ी कठिन बात हैबच्चे भी पढ़ सकते हैं। लेकिन प्रेम को जानना तो बड़ी आग से गुजरना है — बड़ी तपश्चर्या सेबड़ी अग्नि—परीक्षा से।
पर प्रेम को जानना एक बात है और प्रेम के संबंध में जानना बिलकुल दूसरी बात है। दोनों का कोई संबंध नहीं है। प्रेम को जानना एक बात हैप्रेम के संबंध में जानना बिलकुल दूसरी बात है। सत्य को जानना एक बात हैसत्य के संबंध में जानना बिलकुल दूसरी बात है। सत्य के संबंध में जो भी जाना जाता हैसब उधारसब बासा है। सत्य को जानना एक और ही बात है। सत्य को जिन्हें जानना हैउन्हें अपनी बुद्धि से छलांग लगानी पड़ेगी।
एक मित्र दो दिन पहले मेरे पास आए। उन्होंने कहा कि मैं जो भी — जो भी चीज सुनता हूं उस पर ही मुझे शक होता हैसंदेह होता है। आप भी जो कहते हैंमुझे संदेह होता है। आप आगे भी जो कहेंगेमैं अभी से कह देता हूं कि मुझे उस पर संदेह होगा। फिर भी मैं कुछ प्रश्न लाया हुआ हूं इनके आप उत्तर दें।
मैंने कहा कि फिर उत्तर लेकर क्या करोगेक्योंकि तुम कहते हो कि जो भी मैं कहूंगाउस पर तुम्हें संदेह होगा। तुम अपने संदेह से रत्तीभर हिलोगे नहींतो मुझे क्यों परेशान करते होतुम अपने संदेह में जीयो। मुझसे पूछने क्यों आए होअगर संदेह ही करना हैतो किसी से पूछने मत जाओ। क्योंकि दूसरे से पूछोगेतो दूसरा अपना जानना कहेगावह तुम्हारा जानना बन नहीं सकताउस पर तुम्हें संदेह होगा। तुम मुझसे पूछने क्यों आए होजिंदगी चारों तरफ फैली है — फूल खिले हैंपक्षी नाच रहे हैंआकाश में बादल उड़ रहे हैंसूरज निकला हैतुम्हारे भीतर प्राण धड़क रहे हैं — बाहर जीवन का अनंत विस्तार है। कूदोजाओवहां जानो। मुझसे पूछने क्यों आए होऔर जब तुम कहते हो कि पूछकर भी संदेह तो मैं करूंगा हीतो पूछना व्यर्थ है।
और एक बात कहना चाहूं उनसे कि संदेह करते रहोगेबहुत अच्छा है। लेकिन वह दिन कब आएगाजब अपने संदेह पर संदेह करोगे g: जब यह संदेह आएगा कि यह संदेह कहीं ले जाएगा कि नहींजिस आदमी को संदेह ही करना हैतो फिर पूरा कर ले — देन डाउट दि डाउट इटसेल्फ। तब आखिर में अपने संदेह पर भी संदेह करो कि यह जो मैं संदेह कर रहा हूं इससे कुछ मिलेगाछोड़ोमिलेगा कि नहीं। इतने दिन संदेह किया हैकुछ मिलाअगर इतने दिन संदेह करके कुछ नहीं मिला और संदेह पर संदेह पैदा नहीं होतातो फिर संदेह पूरा नहीं कर रहे हो।
और ध्यान रहेश्रद्धा दो तरह से आती है। या तो संदेह ही मत करोजो कि अति कठिन है। या फिर संदेह पर भी संदेह करो। दो ही रास्ते हैं। या तो संदेह ही मत करोकूद आओ। और या फिर संदेह ही करते होतो गहरा संदेह करो कि संदेह पर भी संदेह आ जाए। संदेह संदेह को काट दे और तुम संदेह से खाली हो जाओ। लेकिन किसी भी तरह— चाहे कोई संदेह न करकेया कोई संदेह बहुत करके — जिस दिन भी संदेह के बाहर जाता हैउसी दिन बुद्धि के बाहर जाता है। बुद्धि संदेह का सूत्र है।
ऐसा नहीं है कि आपकी बुद्धि संदेह करती है। बल्कि ऐसा है कि आपकी बुद्धि संदेह है। इट इज नाट दैट योर इंटलेक्ट डाउट्सयोर इंटलेक्ट इज दि डाउट। वह बुद्धि ही संदेह है।
जो सरल होंवे इस सूत्र को समझकर संदेह न करें। जो जटिल होंवे इस सूत्र को समझकर पूरा संदेह करें — टोटल डाउट। दोनों स्थितियों में श्रद्धा उपलब्ध हो जाएगी। दोनों स्थितियों में छलांग लग जाएगी और फेथश्रद्धा का जन्म हो जाएगा।
यह सूत्र श्रद्धा का सूत्र है। इसे वे समझेंगेजो श्रद्धा को समझेंगे। जो तर्क को समझेंगेवे नहीं समझ पाएंगेक्योंकि तर्क तो इसमें कहीं बैठेगा नहीं। पूर्ण से पूर्ण निकल आता हैपीछे पूर्ण बच जाता है! यह नहीं हो सकता। यह कैसे होगातर्क नहीं मानेगा कि यह हो सकता है। हांश्रद्धा मान लेगी।
पर श्रद्धा बड़ी सरलता है। श्रद्धा अति सरलता है। श्रद्धा ट्रस्ट हैअस्तित्व के ऊपर भरोसा है। कि जिस अस्तित्व ने मुझे जन्म दियाजिस अस्तित्व ने मुझे बड़ा कियाजिस अस्तित्व ने मुझे शक्ति दीसोच—विचार दियाप्रेम दियाहृदय दिया;जिस अस्तित्व ने मुझे इतना दियाउस अस्तित्व पर थोड़ा भरोसा मैं भी दे सकता हूं या नहीं! जिस अस्तित्व ने मुझे जीवन दियाउसको मैं श्रद्धा भी नहीं दे सकता? जिसने मुझे प्राण दिएजिसने मुझे होश दियाजिसने मुझे चेतना दीउसको मैं थोड़ा सा मैत्रीपूर्ण भरोसा भी नहीं दे सकताएक फ्रेंडली ट्रस्ट भी नहीं दे सकतातो फिर कृतध्‍नता की सीमा आ गई। तो फिर अनग्रेटफुलनेस की सीमा आ गई। फिर अकृतज्ञ होने की हद हो गई।
यह सूत्र पढ़कर जिसको यह खयाल न आए कि यह श्रद्धा की मांग करता हैइशारा करता है कि श्रद्धा से ही वह जीवन का अनंत द्वार खुलेगाश्रद्धा से ही उस जीवन के शिखर पर पहुंचना होगा। यह इसका अभिप्राय है। इसका अंतिम सूत्र अभिप्राय का।
क्योंपूर्ण की क्यों बातशुरू में पूर्ण की बातअंत में पूर्ण की बातपूर्ण की यह बात क्योंजिंदगी में तो सब अपूर्ण मालूम पड़ता हैसब अपूर्ण। अच्छा होता कि अपूर्ण की बात करतेतो वह तथ्य होता — रिअलिस्टयथार्थवादी होता। जीवन में तो कहीं कुछ पूर्ण मिलता नहीं। न कोई व्यक्ति पूर्ण दिखाई पड़ता हैन कोई प्रेम पूर्ण दिखाई पड़ता हैन कोई शक्ति पूर्ण दिखाई पड़ती हैन कोई आकार पूर्ण दिखाई पड़ता है। जीवन में तो सब अपूर्ण है। और ईशावास्य के ऋषि को क्या सूझा कि पूर्ण से चर्चा शुरू करता है और पूर्ण पर ही चर्चा पूरी करता है! इसलिए जो यथार्थवादी हैंवे कहेंगेअनरियलिस्टिकयह कोई यथार्थवादी बात नहीं है। यह काल्पनिक आदर्श मेंआकाश में उड़ने वाले लोगों की बातें हैं। कहां है पूर्ण?
नहींलेकिन यह इशारा है। यह इशारा इस बात का है कि जहा भी आपको अपूर्ण दिखाई पड़ता होअपूर्णता आपकी दृष्टि में होगीअपूर्ण कहीं भी नहीं है। अपूर्ण कहीं है ही नहीं। और अपूर्ण हमें सब जगह दिखाई पड़ता है। अपूर्णता हमारी दृष्टि में है।
हमारी हालत ऐसी हैजैसे कोई आकाश को एक खिड़की से देखेअपने घर की खिड़की से। हम सभी देखते हैं। घर की खिड़की से कोई आकाश को देखेतो आकाश भी खिड़की के आकार में कटा हुआ मालूम होगा। स्वभावत:खिड़की का ढांचा आकाश का ढांचा हो जाएगा। स्वभावत:खिड़की की सीमा आकाश की सीमा बन जाएगी। और अगर किसी ने खिड़की के बाहर निकलकरद्वार—दरवाजे के बाहर निकलकर कभी खुले आकाश को न देखा होतो अगर वह यह कहे कि आकाश चौखटा हैतो कुछ गलती हैकोई गलती तो नहीं है। सदा आकाश चौखटा दिखाई पड़ा है। अपनी खिड़की से देखा तभी चौखटे में कसा हुआ दिखाई पड़ा।
लेकिन यह खयाल आपको आना मुश्किल होगा कि आकाश पर कोई चौखटा नहीं है। चौखटा आपकी खिड़की पर है। आकाश के ऊपर कोई फ्रेम नहीं है। फ्रेम आपका दिया हुआ है। आकाश तो बिलकुल निराकार है।
लेकिन नहींमकान के बाहर जाकर भी आकाश निराकार कहां दिखाई पड़ता है! चौखटा जरा बड़ा हो जाता हैपूरी पृथ्वी का हो जाता है। घर के बाहर भी निकलकर आकाश निराकार नहीं दिखाई पड़ता। सिर्फ चौखटा बड़ा हो जाता हैपृथ्वी का हो जाता हैइसलिए आकाश चारों तरफ पृथ्वी को घेरे हुए गोल दिखाई पड़ता है — गुंबज की भांति।
मंदिरों के गुंबज उसी आधार पर बनाए गए हैं। फिर चौखटा। अब भी आप खिड़की के भीतर खड़े हैं। खिड़की बड़ी हो गई,पृथ्वी की हो गई। जाएंबढ़े आगेआकाश कहीं पृथ्वी को छूता नहीं। घूमें पूरी पृथ्वी के चारों ओरआकाश कहीं पृथ्वी को छूता नहीं। कहीं कोई गोल चौखटा नहीं है। कोई क्षितिजकोई हॉराइजन है नहीं। हॉराइजन बिलकुल वैसा ही झूठ हैजैसे कि आपकी खिड़की का चौखटा आकाश का चौखटा नहीं हैझूठ है।
पर छोड़े पृथ्वी को भी। अंतरिक्ष यान में ऊपर उठ जाएं। तब भी जो आप देखेंगेवह भी एक स्थिति का दर्शन होगा — फ्राम ए स्टेट। एक जगह से देखेंगे आप। वह जगह ही उसकी सीमा बन जाएगी। वह जगह कितनी ही बड़ी होवह जगह उसकी सीमा बन जाएगी।
फिर कहां जाएंजहां से निराकार का दर्शन होपूर्ण का दर्शन हो?
उपनिषद के ऋषि कहते हैंएक ही जगह हैवह अपने भीतरजहां कोई खिड़की नहीं हैजहां कोई चौखटा नहीं है। छोड़े सब इंद्रियों कोक्योंकि जहां इंद्रियां रहेंगीवहां चौखटा रहेगा। क्योंकि इंद्रियां चौखटा निर्मित करती है। इंद्रियां खिड़कियां हैं। उन खिड़कियों से हम देखेंगे कहीं भीखिड़की कितनी ही बड़ी कर लोआंख के ऊपर चश्मा लगा लोचश्मे के ऊपर दूरबीन लगा लोसब कुछ करोलेकिन खिड़की बड़ी होती जातीखिड़की समाप्त नहीं होती। लेकिन आंख बंद कर लो। भीतर चले जाओ। आंख को छोड़ोरहित हो जाओ ऑख के। कान को छोड़ोरहित हो जाओ कान के। छोड़ो हाथ—पैर कोरहित हो जाओ शरीर के। भीतर चले जाओवहां भीतर फिर निराकारपूर्ण का अनुभव होता है।
यह ऋषि ने जो पूर्ण की बात कही हैयह भीतर के पूर्ण को जानकर ही पता चलता है कि सही है। और जिसे भीतर का पूर्ण पता चल गयाफिर वह कहीं भी चला जाएकैसी ही खिड़कियों के भीतर चला जाए...। जिसने बाहर निकलकर आकाश एक दफा देख लिए, एक दफावह कैसी ही छोटी खिड़की के पीछे खड़ा हो जाएवह भलीभांति जानता है कि जो आकाश चौखटे में दिखाई पड़ रहा हैवह चौखटा मेरी खिड़की का हैआकाश का नहीं है। एक बार जिसने भीतर के पूर्ण को देख लियाउसे सब जगह पूर्ण दिखाई पड़ने लगता है। कितने ही चौखटों में बंदकितने ही कारागृहों में बंद। वह जानता है कि कारागृह ऊपर से बैठे हुए हैंभीतर निराकार मौजूद है।
इसलिए ऋषि पूर्ण से बात शुरू करता है और पूर्ण पर ही समाप्त करता है। लेकिन हम तो अपूर्ण में ही जीते हैंअपूर्ण में ही शुरू करतेअपूर्ण में ही समाप्त करते हैं। इसलिए हमारा इस सूत्र से तालमेल कहां बैठेगा! हम तो पीठ करके खड़े हैं,छत्तीस के आंकड़े की तरह। उपनिषद के ऋषि खड़े हैंउनसे हम पीठ लगाए हुए खड़े हैं। उनके शब्द हमें सुनाई पड़ जाते हैं,उनके शब्द हम कंठस्थ कर लेते हैं। लोग सुबह उठकर सूत्र पढ़ लेते हैं। मगर पीठ ऋषि से लगी रहती है। फिर जो अर्थ निकलते हैंवे व्यर्थ हो जाते हैं।
मैं अंतिम बात आपसे यह कहना चाहता हूं कि यह पूर्ण की बात ठीक ही कही है। यही है सचयही है सत्य। पूर्ण ही है सब ओर। सभी कुछ पूर्ण है। अपूर्ण के होने का उपाय नहीं है। अपूर्ण होगा कैसेअपूर्ण करेगा कौनवही है अकेलाकोई दूसरा नहीं हैजो अपूर्ण कर सके। वही है अकेलासीमित कोई करेगा कौनसीमा सदा दूसरे से बनती है। आपके घर की सीमाआप सोचते होंगेआपके घर से बनती है। तो समझ लेनागलत सोचते हैं। आपके घर की सीमा आपके पड़ोसी के घर से बनती है,आपके घर से नहीं बनती। सीमा सदा दूसरे से बनती है। चूंकि परमात्मा अकेला। अस्तित्व एक। जीवन की धारा एक। अन्य तो कोई भी नहीं है। दूसरा कोई भी नहीं है। कौन बनाएगा सीमाकौन करेगा अपूर्ण?
नहींअसीम है अस्तित्वपूर्ण है अस्तित्व — एब्लोल्युटनिरपेक्ष। पर इसे हम जान पाएंगे तभीजब भीतर इस पूर्ण की झलक मिल जाए। तब इसकी झलक सब जगह मिलने लगती है। एक बूंद को भी जिसने अपने भीतर जान लिया उस पूर्णता कीवह फिर उसके अनंत—अनंत सागरों के रहस्य को पा जाता है।
पूर्ण से निकलता है पूर्ण। पूर्ण में ही लीन हो जाता है। बीच में आता है अपूर्णहमारी बुद्धि के चौखटोंइंद्रियों के चौखटों से निर्मित होकर। छोड़े उन चौखटों को। हटें थोड़ा उनके पार। पीछे सरकेदूरअतीत होंट्रांसेंड करेंअतिक्रमण करें,और पूर्ण में प्रतिष्ठा हो जाती है। और जिसकी है पूर्ण में प्रतिष्ठावही समझ पाएगा अर्थ ईशावास्य का कि सब कुछ प्रभु है,सब कुछ प्रभु का है। मैं नहीं हूं तू ही है।

आज इतना ही।

अब हम अंत में भीतर की यात्रा पर निकलेंगे। दो मिनट रुक जाएं। दो—तीन बातें — अंतिम दिन है — इसलिए ध्यान के लिए आपसे कह दूं। आखिरी दिन हैदो—तीन बातें।
एक तोछह दिन के प्रयोग ने उस जगह आपको ला दिया है कि आज मैं इस प्रयोग में एक छोटी सी बात और जोड़ना चाहता हूं। उसके जोड़ते ही बहुत विस्फोट होगा। बहुत एक्सप्लोजन होगा। उसके लिए तैयार रहें। वह छोटी सी बात हैआज जब आप मेरी तरफ देखेंगेतो मेरी तरफ देखें भी — अपलकपलक नहीं झपनी है — नाचे भीऔर हू हू हू की हुंकार भी करें।
यह हुंकार आपके भीतर सोई हुई कुंडलिनी पर गहरी चोट करती है। सूफियों ने अल्लाहू का बड़ा गहरा प्रयोग किया है। अल्लाहू से शुरू करेंगे वेफिर धीरे— धीरे अल्ला छूट जाएगा और हू हू हू रह जाएगा।
इतने जोर से हू कहें.. खयाल करेंजैसे ही आप हू कहेंगेवैसे ही आपकी नाभि सिकुड़ जाएगी और नाभि के नीचे जोर से चोट पड़ेगी। हू — पूरी नाभि सिकुड़कर चोट करेगी। वहीं कुंडलिनी का वास है। उस पर जोर से धक्का पड़ेगा।

अब हम इस हालत में हैं — करीब—करीब नब्बे प्रतिशत मित्र — कि उन्होंने इसकी चोट कीकि उनके भीतर से ऊर्जा तेजी से ज्योति की लपट की तरह ऊपर की ओर उठेगी। जब लपट की तरह ऊपर की ओर उठेगी ज्योतितब मैं आपको हाथ से इशारा करूंगा।

मेरे इशारे के साथ बिलकुल पागल हो जाना है। जब मैं नीचे से ऊपर की तरफ हाथ ले जाऊंतब अपने भीतर अनुभव करना कि ऊर्जा उठती हैलपट की तरह आग ऊपर जा रही है। सारे प्राण ऊपर उठ रहे हैं। ऊर्ध्वगमन हो रहा है। चिल्लाना हू नाचनाकूदनापूरी शक्ति लगाना।

और जब मुझे लगेगा कि आप उस जगह आ गए बहुत से मित्रजहां से शक्तिपात हो सकता हैकि परमात्मा की शक्ति भी आप पर उतर सकती हैतब मैं ऊपर हाथ उठाकर नीचे की तरफ करूंगा। जब मैं ऊपर हाथ उठाकर नीचे की तरफ करूंतब जितनी सामर्थ्य आपमें होउसमें से रत्तीभर बचाना मतपूरी लगा देना।
जो मित्र ऊपर बैठे रहते हैंउनको बैठे नहीं रहना हैउनके बैठने से हमें बाधा पड़ती है। क्योंकि उन्हें बैठे देखकर बाकी लोग शिथिल होते हैं।

ओम शांति शांति शांति,

ईशावास्‍य उपनिषद  समाप्‍त।
माउंट आबू राजस्‍थान।

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