बुधवार, 5 जून 2019

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--11

वह शून्‍य है

ध्‍यान योग शिविर
माउंट आबू, राजस्‍थान।

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
            
ओम क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर।। 17।।

अब मेरा प्राण सर्वात्मक वायुरूप सूत्रात्मा को प्राप्त हो और यह शरीर भस्मशेष हो जाए। हे मेरे सकल्पात्मक मन! अब तू स्मरण करअपने किए हुए को स्मरण करअब तू स्मरण करअपने किए हुए को स्मरण कर।। 17।।

जीवन मिल जाए उसी मेंजहां से जन्मा है। आकार खो जाए उस निराकार मेंजहां से आकार निर्मित हुआ है। ये प्राण वायु के साथ एक हो जाएं। शरीर धूल मेंमिट्टी में समा जाए। ऐसे क्षण में — और ऐसे क्षण दो हैंउनकी मैं आपसे बात करूंगा — ऐसे क्षण में ऋषि ने कहा है अपने संकल्पात्मक मन से कि हे मेरे संकल्प करने वाले मनअपने किए हुए कर्मों का स्मरण करअपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर।

ऐसे क्षण दो हैंजब यह प्रार्थना सार्थक हो सकती है। एक तो मृत्यु के क्षण में और दूसरा समाधि के क्षण में। एक तो तबजब सच में ही आदमी मृत्यु को उपलब्ध होने के दार पर खड़ा होता है। और या फिर तबजब मृत्यु से भी बडी मृत्यु में,समाधि के द्वार पर व्‍यक्ति अपनी बूंद को सागर में खोने के लिए तत्पर होता है।
साधारणत: जिन लोगों ने भी उपनिषद के इस सूत्र की व्याख्या की हैउन्होंने पहले ती अर्थ में की है। यही मानकर की है कि मृत्यु के समय ऋषि कह रहा है कि मेरा सब वही मिला जा रहा है मेरा अस्तित्व जहां से आया थाउस क्षण में कह रहा है अपने मन से कि मेरे संकल्पात्मक मनअपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर।
लेकिन जैसा मैं देख पाता हूं यह स्मरण मृत्यु के समय में किया गया नहीं है। यह स्‍मरण समाधि के क्षण में किया गया है। मृत्यु के क्षण में इसलिए किया गया नहीं है कि मृत्‍यु की कोई पूर्वसूचना नहीं होती। आप नहीं जानते कभी भी कि मृत्यु किस क्षण आ जाती है। मृत्यु आ जाती हैतभी पता चलता है। लेकिन तब तक जिसे पता चलता हैवह मर चुका होता हैवह जा चुका होता है। जब तक मृत्यु आई नहींतब तक पता नहीं चलताऔर जब आती हैतब पता चलने वाला खो चुका होता है।
सुकरात मर रहा था तो उसके मित्रों ने उससे कहा कि तुम भयभीत नहीं मालूम पड़ते  — दुखी—पीड़ित नहींचिंतित नहीं,भयातुर नहीं! तो सुकरात ने कहा कि मैं सोचता हूं कि जब तक मृत्यु नहीं आई हैतब तक तो मैं जीवित ही हूं। और जीवित जब तक हूं तब तक मृत्यु की चिंता क्यों करूंऔर या फिर यह भी सोचता हूं कि जब मृत्यु आ ही जाएगी और मर ही जाऊंगातो फिर चिंता करने वाला कौन बचेगाफिर यह भी सोचता हूं कि या तो मृत्यु में मैं मर ही जाऊंगाबिलकुल मिट जाऊंगाकोई बचेगा ही नहीं। अगर मृत्यु के पार कोई बचेगा ही नहींतो भयभीत होने का कोई कारण नहीं। और यदि जैसा कि और कुछ लोग कहते हैं कि मृत्यु आ जाएगीफिर भी मैं मरूंगा नहीं। यदि मृत्यु आ जाएगी और मैं मरूंगा ही नहींतो फिर चिंता का तो कोई भी कारण नहीं।
मैंने कहादो क्षणों में यह सूत्र सार्थक हो सकता है — मृत्यु के क्षण में या समाधि के क्षण में। लेकिन मृत्यु के क्षण का हमें कोई भी पता नहीं होता। अनप्रिडिक्टेबल हैमृत्यु की कोई भविष्यवाणी नहीं है। अनायास हैइसीलिए किसी भी क्षण हो सकती है। अगले क्षण भी हम होंगेइसका कुछ पक्का नहीं है। किसी भी क्षण हो सकती हैफिर भी किस क्षण होगीइसकी कोई पूर्वसूचना नहीं है। और यह प्रार्थना तो तभी हो सकती हैजब पूर्वसूचना हो। जब कि ऋषि को पता हो कि मैं मरने के द्वार पर खड़ा हूं — मैं मर रहा हूं। नहींइसलिए मैं कहता हूं कि यह मृत्यु के समय में किया गया स्मरण नहीं है। यह महामृत्यु के क्षण में किया गया स्मरण है। महामृत्यु समाधि का नाम है।
मृत्यु को मैं साधारण मृत्यु कहता हूं क्योंकि सिर्फ शरीर मरता हैमन नहीं मरता। सिर्फ शरीर मरता हैमन नहीं मरता। ध्यान कोसमाधि को मैं महामृत्यु कहता हूं क्योंकि शरीर का तो सवाल ही नहींमन ही मर जाता है। और इसलिए भी मैं कहता हूं कि यह स्मरण समाधि के समय में किया गया हैक्योंकि ऋषि कह रहा है अपने संकल्पात्मक मन सेस्मरण कर अपने किए हुए कर्मों कास्मरण कर।
इस दूसरे हिस्से के संबंध में भी बड़ी भ्रांति हुई है। असल बात यह है कि साधारणत: जिन्हें हम पंडित कहते हैंवे व्याख्याएं करते हैं। वे कितनी ही कुशल व्याख्या करेंउनकी व्याख्या में बुनियादी भूल हो जाती है। भूल इसलिए हो जाती है,शब्द वे समझते हैं ठीक सेसिद्धांत भी समझते हैंशास्त्र भी समझते हैंलेकिन शब्द और शास्त्र के पीछे जो अनकहा छिपा हैउसे वे बिलकुल नहीं समझते। और धर्म के सत्य शब्दों में नहीं कहे जातेशब्दों के बीच में जो खाली जगह छूट जाती है,उसी में कहे जाते हैं। पंक्तियों में नहींपंक्तियों के बीच में जो रिक्त स्थान छूट जाता हैउसी में कहे जाते हैं। जो रिक्त स्थान को पढ़ने में समर्थ नहीं हैजो केवल काले अक्षरों को पढ़ने में समर्थ हैवह इन महासूत्रों का अर्थ करने में समर्थ नहीं हो सकेगा।
पश्चिम में एक आंदोलन चलता है कृष्णा कासशनेस काकृष्ण चेतना का। उस आंदोलन को चलाने वाले स्वामी भक्ति वेदांत प्रभुपाद की ईशावास्योपनिषद पर मैं एक किताब देख रहा था। बहुत हैरान हुआ। इस सूत्र का अर्थ उन्होंने जो किया है,इतना चकित करने वाला मालूम पड़ा! इस सूत्र का अर्थ किया है कि मैं मर रहा हूं मैं मृत्यु के द्वार पर खड़ा हूं —हे प्रभुमैंने जो—जो त्याग तेरे लिए किएउनका स्मरण रखना। मैंने जो—जो त्याग तेरे लिए किएउनका स्मरण रखना! मैंने जो—जो कर्म तेरे लिए किएउनका स्मरण रखना!
नहींये रिक्त स्थान जो नहीं पढ़ सकतेवे तो ऐसा भूल भरा अर्थ करें तो क्षमा किए जा सकते हैंयह तो ऐसा मालूम पड़ता है कि जो शब्द भी नहीं पढ़ सकतेवे भी अर्थ करते हैं।
ऋषि कह रहा हैहे मेरे संकल्पात्मक मन! यहां ईश्वर का कोई सवाल ही नहीं है। और ऋषि यह तो कह ही नहीं रहा है कि मेरे किए हुए कर्मों को जो मैंने तेरे लिए किएमेरे किए हुए त्यागों को जो मैंने तेरे लिए किएउनका स्मरण रखना! लेकिन हमारी जो व्यवसायात्मक वृद्धि हैवह जो बिजनेस माइंड हैवह शायद यही अर्थ कर पाएगा। कहेगामरने का क्षण करीब आ गयामैंने दान किया थामंदिर बनवाया थातालाब का पाट बनवाया थास्मरण रखना! हे प्रभुमैंने जो—जो कर्म किए थे तेरे लिएजो—जो त्याग किए थेअब घड़ी आ गईअब मुझे ठीक से उनका फल दे देनाप्रतिफल दे देना।
मेरे संकल्पात्मक मन...! संकल्प है हमारे मन की अभीप्सा का स्रोत। संकल्प अर्थात विल। इसे थोड़ा समझ लें तो आगे की बात खयाल में आ सके।
इच्छा तो हमारे मन में सबको होती है — डिजायरवासनाएं। लेकिन वासना तब तक संकल्प नहीं बनतीजब तक वासना से अहंकार जुड़ न जाए। वासना अहंकार संकल्प बन जाता है। वासना तो सभी लोग करते हैंलेकिन अगर अपने अहंकार से वासना को न जोड़ पाएं तो वासना सिर्फ स्वप्न बनकर रह जाती है। वह कर्म नहीं बन पाती। कर्म बनने के तो अहंकार जुड़ जाना चाहिए। अहंकार जुड़ जाए वासना में तो संकल्प निर्मित होता है। फिर किसी कर्म को करने की अहंता और अस्मिता निर्मित होती है। फिर कर्ता बनने का भाव निर्मित होता है। वासना के साथ जैसे ही अहंकार जुड़ा कि आप कर्ता बने।
ऋषि कह रहा हैमेरे संकल्पात्मक मनमेरे अहंकार और वासनाओं से भरे मन, —अपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर!
क्यों कह रहा है यहऔर एक बार नहींदो बार — अपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर अपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर! क्योंसमाधि के क्षण में इस स्मरण की क्या जरूरत हैया मृत्यु के क्षण में भी इस स्मरण की क्या जरूरत है?
मजाक कर रहा हैव्यंग्य कर रहा है ऋषि। वह यह कह रहा है कि अब सब खोया जा रहा है समाधि के द्वार पर — मन खो रहा हैशरीर खो रहा हैभूत खो रहे हैंसब लीन हुआ जा रहा है — अब मेरे मनतू जो सोचता था कि मैंने यह कियामैंने यह कियाअब उसका क्या हुआ! वह जो तू सोचता थामैंने यह कियामैंने यह कियावे सब पानी पर खींची गई रेखाएं अब कहां हैंस्मरण कर! अब तू भी खो रहा हैतेरा किया हुआ भी खो गया हैअब तू भी खो रहा है। अब तू स्मरण करलौटकर पीछे देख। कितने गौरव से भरकर तूने सोचा थायह मैंने किया है! कितने अहंकार से भरकर तूने कहा थायह मैंने किया है! कितनी आकांक्षाओं को तूने संजोया था कि यह मैं करूंगा! जन्म—जन्मअनंत यात्राओं परकितने चरण—चिह्न तूने छोड़े थे और कहे थे कि ये मेरे चरण—चिह्न हैं! आज उनका कहीं भी कोई निशान नहीं रहा। उनका तो निशान रहा ही नहीं,आज तू भी शून्य हुआ जा रहा है। आज तेरा भी निशान नहीं रहेगा। आज तू भी मिटने के करीब आ गया है। आज तू भी विदा हो रहा है। आज सब भूत अपने में लीन हो जाएंगे। आज सारी यात्रा समाप्त होगी। तो एक बार लौटकर तू पीछे देख लेकिस भ्रम में तू जीया थाकिस इलूजन मेंकिस माया में तू जीया था। किस पागलपन में कैसे सपने तूने देखे थे और उन सपनों के लिए कितनी पीड़ा झेली थी। और उन सपनों के लिए कितना चिंतित हुआ था। अगर कभी कोई स्वप्न तेरा पूरा नहीं हुआ था तो कितनी परेशानीकितनी विफलताकितना फ्रस्ट्रेशन तूने पाया था। और अगर कभी कोई सपना सफल हो गया था तो तू कितना फूला नहीं समाया था। आज सब सपने भी जा चुकेआज सब कर्म भी खो चुके। तू भी खोने के करीब आ गया। तू भी न होने के करीब आ गया। लौटकर एक बार स्मरण कर।
यह बहुत व्यंग्य मेंअपने ही संकल्प और अपने ही अहंकार को उदबोधन है। इसलिए मैं कहता हूं यह मृत्यु के समय किया गया उदबोधन नहीं हैसमाधि के समय किया गया उदबोधन है। क्योंकि मृत्यु में तो सिर्फ शरीर ही मरता है,संकल्पात्मक मन नहीं मरता। मृत्यु के बाद भी आप अपने मन को लिए चले जाते हैं।
वही मन तो आपके अनंत जन्मों का स्रोत है। शरीर तो गिर जाता है यहीं। मन साथ यात्रा करता है। वासना साथ चली जाती है। अहंकार साथ चला जाता है। किए हुए कर्मों की स्मृति साथ चली जाती है। करने थे जो कर्म और नहीं कर पाएउनकी आकांक्षा साथ चली जाती है। पूरा मनोशरीर साथ चला जाता है। सिर्फ देह गिरती हैसिर्फ फिजियोलाजिकलसिर्फ देहगत जो हमारा ढांचा हैवह भर गिर जाता है मृत्यु में। लेकिन मन साथ चला जाता है। वही मन फिर नए शरीर को पकड़ लेता है। वही मन अनंत शरीरों को पकड़ चुका है। वह अनंत शरीरों को पकड़ता चला जाता है।
इसलिए ज्ञानी मृत्यु को वास्तविक मृत्यु नहीं कहतेक्योंकि कुछ भी तो नहीं मरता। सिर्फ वस्त्र ही बदलते हैं। शरीर वस्त्र से ज्यादा नहीं है। इस बात को भी ठीक से समझ लें।
साधारणत: हम सोचते हैं कि शरीर हमारा पहले आता हैफिर उसके भीतर मन जन्म लेता है। और विगत सौ दो सौ वर्षों की पश्चिम की चितना और धारणा ने सारी दुनिया में यह भ्रांति फैला दी है कि शरीर पहले निर्मित होता हैफिर शरीर के भीतर से मन जन्मता है। वह बाई प्रोडक्ट हैइपिफिनामिना है। वह शरीर का ही एक गुण है।
ऐसे हीजैसे पुराने चार्वाकों ने कहा है कि शराब जिन चीजों से मिलकर बनती हैअगर उनको एक—एक को आप ले लें,तो नशा नहीं चढ़ेगा। उन सबके मिल जाने से नशा बाई प्रोडक्ट की तरह पैदा होता है। नशा का अपना कोई आगमन नहीं है कहीं से। नशा पांच—दस चीजों के मिलने से पैदा हो जाता है। पांच—दस चीजों को अलग कर लेंनशा तिरोहित हो जाता है। और उन पांच—दस चीजों को आप अलग—अलग ले लेंतो भी नशा नहीं चढ़ेगा। तो नशा उनके मिलन सेउनके बीच में पैदा होता है। इसलिए पुराने चार्वाक कहते थे कि मनुष्य का शरीर निर्मित होता है पंच भूतों से और उन पंच भूतों के मिलन से मन निर्मित होता है। मन एक बाई प्रोडक्ट है।
पश्चिम का विज्ञान भी फिलहाल अभी जैसे अज्ञान की स्थिति में हैउसमें वह भी मानता है कि मन जो हैवह शरीर के पीछे पैदा हो गई एक छाया मात्र है। लेकिन पूरब मेंजिन्होंने बहुत गहरी खोज की हैउनका कहना है कि मन पहले है और शरीर उसके पीछे छाया की तरह निर्मित होता है।
इसे ऐसा समझेंपहले आपके जीवन में कर्म आता है या पहले वासना आती हैपहले आती है वासना मन मेंफिर बनता है कर्म। लेकिन बाहर से कोई अगर देखेगा तो पहले दिखाई पड़ता है कर्म और वासना का अनुमान करना पड़ता है। मेरे भीतर आया क्रोधमैंने आपको उठकर चांटा मार दिया। क्रोध मेरे भीतर पहले आया — मन पहले — फिर हाथ उठाशरीर ने कृत्य किया। लेकिन आपको पहले दिखाई पड़ेगा मेरा हाथ और चांटे का पड़नापीछे आप सोचेंगे कि जरूर इस आदमी को क्रोध आ गया। पहले शारीरिक घटना दिखाई पड़ेगीपीछे मन का अनुमान होगा। लेकिन वास्तविक जगत में पहले मन निर्मित होता हैपीछे वास्तविक घटना घटती हुई मालूम होती है।
हमें भीजब एक बच्चा जन्म लेता हैतो पहले शरीर दिखाई पड़ता है। लेकिन जो गहरा जानते हैंवे कहते हैं कि पहले मन है। वही मन इस शरीर को निर्मित करवाता है — वही मन। वही मन इस शरीर कोढांचे कोव्यवस्था को बनाता है। वह मन ब्‍लू प्रिंट है। वह बिल्ट इन प्रोग्राम है। इस जनम में जब मैं मरूंतो मेरा मन एक ब्‍लू प्रिंटएक नक्‍शा लेकर यात्रा करेगा। वही नक्शा नए शरीर कोनए गर्भ को निर्मित करेगा।
और आप हैरान होंगेसाधारणत: हम सोचते हैं कि एक स्त्री और पुरुष संभोग में रत होते हैंतो जब वे संभोग में रत होते हैंतब शरीर निर्मित हो जाता हैफिर एक आत्मा प्रवेश कर जाती है। लेकिन गहरे देखने पर पता चलता है कि जब कोई आत्मा प्रवेश करना चाहती है तब दो स्त्री—पुरुष संभोग करने के लिए आतुर होते हैं। लेकिन पहले हमें शरीर दिखाई पड़ता है,मन का तो हम अनुमान करते हैं। मन की तरफ से जिन्होंने गहरी खोज की हैवे कहते हैं कि पहले गर्भातुरगर्भ लेने के लिए आतुर आत्मा जब आपके आसपास परिभ्रमण करने लगती हैतब संभोग की आतुरता जन्मती है। मन अपना शरीर निर्मित करवाने की चेष्टा करता है।
सांझ आप सोते हैं। कभी आपने खयाल न किया होगा कि.. रात सोते वक्त खयाल करेंआखिरी विचार जब नींद उतरती होउतर ही रही होउतर ही गई होतब पकड़े अपने मन में कि आखिरी विचार क्या है। फिर सो जाएं। और जब सुबह नींद टूटेहोश आएतब तत्काल पहली खोज करें कि सुबह जागने का पहला विचार कौन सा है। तो आप बहुत चकित होंगे। रात जो आखिरी विचार होता हैवही सुबह पहला विचार होता है। रात सोते समय जो चेतना में अंतिम विचार होता हैसुबह जागते समय चेतना में पहला विचार होता है। ठीक ऐसे ही मरते वक्त जो अंतिम वासना होती हैवह जन्म लेते वक्त पहली वासना होती है।
शरीर तो गिर जाता है हर मृत्यु मेंलेकिन मन चलता चला जाता है। तो आपके शरीर की उम्र हो सकती है पचास साल होलेकिन आपके मन की उम्र पचास लाख साल हो सकती है। आपने जितने जन्म लिए हैंउन सभी मनों का संग्रह आपके भीतर आज भी मौजूद हैअभी भी मौजूद है। बुद्ध ने उसे बहुत अच्छा नाम दिया है। पहला नाम बुद्ध ने ही उसको दिया। उसे उन्होंने नाम दियाआलय—विज्ञान। आलय—विज्ञान का अर्थ होता है स्टोर हाउस आफ कांशसनेस। स्टोर हाउस की तरह आपने जितने भी जन्म लिए हैंवे सभी स्मृतियां आपके भीतर संगृहीत हैं।
आपका मन बहुत पुराना है। और ऐसा भी नहीं है कि आपके पास जो मन है वह सिर्फ मनुष्य—जन्मों का है। अगर आपके पशुओं में जन्म हुएजो कि हुएअगर आपके वृक्षों में जन्म हुएजो कि हुएतो वृक्षों की स्मृतिपशुओं की स्मृतिवे सभी स्मृतियां आपके भीतर मौजूद हैं। जो लोग आलय—विज्ञान की प्रक्रिया में गहरे उतरते हैंवे कहेंगे कि अगर किसी व्यक्ति को गुलाब के फूल को देखकर अचानक प्रेम उमड़ता हैतो उसका गहरा कारण उसका गहरा कारण यही है कि उसके भीतर गुलाब के होने की कोई गहरी स्मृति आज भी शेष हैजो समतुलजो रिजोनेंसजो गुलाब को देखकर प्रतिध्वनित हो उठती है।
अगर एक व्यक्ति कुत्ते को बहुत प्रेम किए चला जा रहा है तो यह बिलकुल आकस्मिक नहीं है। उसके भीतर के आलय—विज्ञान में स्मृतियां हैंजो उसे कुत्ते के साथ बड़ी सजातीयता बड़ा अपनापनबड़ी निकटता का बोध करवाती हैं। हमारे जीवन में जो भी घटता हैवह आकस्मिक नहीं हैएक्सीडेंटल नहीं है। उसकी गहरी कार्य—कारण की प्रक्रिया पीछे काम करती होती है।
मृत्यु में शरीर गिरता हैलेकिन मन यात्रा करता चला जाता है। और मन संगृहीत होता चला जाता है। इसलिए आपके मन में कई बार ऐसे रूप आपको दिखाई पड़ेंगेजिनको आप कहेंगेये मेरे नहीं हैं। आपको भी कई बार लगेगा कि कुछ काम आप ऐसे कर लेते हैं जिनको आपको कहना पड़ता हैइनस्पाइट आफ मीमेरे बावजूद हो गया।
एक आदमी का किसी से झगड़ा होता है और वह दांत से उसकी चमड़ी काट लेता है। पीछे वह सोचता है कि मैं और दांत से चमड़ी काट सका! मैं कोई जंगली जानवर हूंआज वह नहीं हैकभी वह था। और किसी क्षण में उसके भीतर की स्मृति इतनी सक्रिय हो सकती है कि वह बिलकुल पशु जैसा व्यवहार करे। हममें से सभी लोग अनेक मौकों पर पशुओं जैसा व्यवहार करते हैं। वह व्यवहार आसमान से नहीं उतरताहमारे भीतर के ही चित्त के संग्रह से आता है।
हमारी मृत्यु सिर्फ हमारे शरीर की मृत्यु हैसंकल्पात्मक मन मरता नहीं। इसलिए ऋषि को मजाक का मौका न होता,अगर मृत्यु हो रही होती। इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि यह सूत्र समाधि के क्षण का है। समाधि के साथ एक भेद है कि समाधि की पूर्वघोषणा हो सकती है। क्योंकि मृत्यु आती हैसमाधि लाई जाती है। मृत्यु घटती हैसमाधि का आयोजन करना पड़ता है। एक—एक कदम ध्यान का उठाकर आदमी समाधि तक पहुंचता है।
यह भी आप खयाल रख लें कि समाधि शब्द बड़ा अच्छा है। कब्र के लिए भी कभी आप समाधि बोलते हैं। साधु मर जाता है तो उसकी कब्र को समाधि कहते हैं। सच है यह बात। समाधि एक तरह की मृत्यु है। बड़ी गहरी मृत्यु है। शरीर तो शायद वही रह जाता हैलेकिन भीतर जो मन था वह विनष्ट हो जाता है।
उस मन के विनष्ट होने के क्षण में ऋषि कह रहा है कि हे मेरे संकल्पात्मक मनअपने किए हुए का स्मरण करअपने किए हुए का स्मरण कर।
क्योंइसलिए कि इसी मन ने कितने धोखे दिए। और यह मन आज खुद ही नष्ट हुआ जा रहा है। जिस मन को हमने समझा मेरा हैजिसके आधार पर जीए और मरे। जिसके आधार पर काम किएहारे और जीते। जिसके आधार पर जय और पराजय की आकांक्षाएं बांधी। जिसके आधार पर सुखी और दुखी हुए। सोचा था कि जो सदा साथ देगाआज वही धोखा दिए जा रहा है। जिसके कंधे पर हाथ रखकर इतनी लंबी यात्रा कीआज पाया कि वह कंधा भी विदा हो रहा है। जिस नाव को समझा था कि नाव हैआज पाया कि वह भी पानी ही सिद्ध हुई और नदी में मिली जा रही है।
इस क्षण मेंइस क्षण में ऋषि कहता हैमेरे संकल्पात्मक मनअब स्मरण कर अपने किए हुओं काअपने किए हुए कर्मों का। अपने सोचे हुए कर्मों का। स्मरण कर — कैसे तूने वायदे किए थे! क्या तेरे प्रामिसेज थींक्या तेरा आश्वासन था! कितने तेरे भरोसे थे! तूने मुझसे क्या—क्या करवा लिया! और तूने मुझेक्या—क्या कर रहा हूं इसका भ्रम दिया। और तूने कैसे—कैसे स्वप्न मुझसे निर्मित करवाए। और कैसी विक्षिप्तताएं मुझसे करवाईं। और अब तू खुद विदा हुआ जा रहा है। और अब मैं एक ऐसे लोक में प्रवेश करता हूं जहां तू नहीं होगा। लेकिन अब तक तूने सदा मुझसे यही कहा था कि जहां संकल्प नहीं होगा,वहां तुम नहीं होओगे। लेकिन आज मैं देखता हूं कि तू तो विदा हो रहा हैलेकिन मैं पूरा का पूरा हूं।
मन सदा कहता है कि अगर संकल्प न रहा तो मिट जाओगे। टिक न पाओगे जिंदगी के संघर्ष में। अगर अहंकार न रहा तो खो जाओगे। बच न सकोगेसरवाइवल न होगा। मन सदा कहता है — पुरुषार्थ करोसंकल्प करोलड़ो। नहीं लड़ोगे तो बचोगें नहीं। संघर्ष नहीं करोगे तो मिट जाओगे।
निश्चितऋषि आज मजाक करे तो स्वाभाविक है। वह मन से कहे कि तू तो खुद मिटा जा रहा हैलेकिन मैं तो पूरा का पूरा शेष हूं। तू खो रहा हैमैं नहीं खो रहा हूं। लेकिन अब तक तूने यही धोखा दिया था कि तू नहीं होगा तो मैं नहीं बचूँगा। आज तू तो जा रहा है और मैं बच रहा हूं।
इसइस घड़ी को ऋषि व्यंग्य बनाएदो कारणों से — एक तो अपने मन के लिए और एक उनके मन के लिए भीजो अभी समाधि के द्वार तक तो नहीं पहुंचे हैंलेकिन कर्म कर रहे होंगे। जिनका मन अभी यह कह रहा होगायह करोयह करो। अगर यह न कर पाए तो तुम्हारी जिंदगी व्यर्थ है। अगर यह महल न बना तो बेकार हो गया। अगर इस पद पर न पहुचे तो क्या तुम्हारा अर्थ रहा। अगर तुमने यह पुरुषार्थ सिद्ध न किया तो तुम दो कौड़ी के हो। तुम्हारा जीवन व्यर्थ गया,निष्प्रयोजन हुआ। जिनके मन अभी यह कहे जा रहे होंगेउनको भी ऋषि व्यंग्य कर रहा है। उनसे भी कह रहा है कि एक दफा फिर से सोच लेना।
मन सबसे बड़ा धोखा है। मन सबसे बड़ी प्रवंचना है। हमारी सारी प्रवंचना मन से ही आविर्भूत होती है। हम सब शेखचिल्लियो से ज्यादा नहीं हैं। और मन इतना कुशल है कि कभी भी इस सतह तक हमें गहरे में नहीं देखने देता कि हमें पता चल जाए कि हम धोखा खा रहे हैं। इसके पहले कि पता चलेमन नया धोखा निर्मित कर देता है। इसके पहले कि पुराना धोखा टूटेमन नए धोखे के भवन बना देता है। और कहता हैयहां आ जाओयहां विश्राम करो। एक आकांक्षा पूरी होती हैअगर मन एक क्षण भी गैप दे देएक क्षण भी अंतराल दे देतो आपको पता चल जाए कि जिस वासना को पूरा करने के लिए इतनी पीड़ा झेलीवह पूरा करके कुछ भी नहीं हाथ में आया। राख भी हाथ में नहीं आई।
लेकिन मन इतना अंतराल नहीं देताइतना मौका नहीं देता। इधर एक आकांक्षा पूरी भी नहीं हो पाती कि मन दूसरी आकांक्षा के बीज बोना शुरू कर देता है। इधर एक आकांक्षा पूरी होकर व्यर्थ होती है कि नए अंकुर वासना के मन खड़े कर देता है। दौड़ फिर पुन: शुरू हो जाती है। कभी भी मौका नहीं देता विश्राम काविराम का कि आप देख पाएं कि किस धोखे में पड़े हैं। पैर के नीचे से जमीन का एक टुकड़ा हटता है तो गड्डे को नहीं देखने देतानया जमीन का टुकड़ा दे देता है कि इसके सहारे खड़े रहो।
बुद्ध एक छोटी सी और बड़ी मीठी कहानी कहा करते थेवह मैं आपसे कहूं। सुनी भी होगी। लेकिन शायद इस अर्थ में सोची नहीं होगी। बुद्ध कहते थेभाग रहा है एक आदमी जंगल में। दो कारणों से आदमी भागता है। या तो आगे कोई चीज खींचती होया पीछे कोई चीज धकाती हो। या तो आगे से कोई पुल — खींचता होया पीछे से कोई पुश — धक्का देता हो। वह आदमी दोनों ही कारणों से भाग रहा था। गया था जंगल में हीरों की खोज में। कहा था किसी ने कि हीरों की खदान है। इसलिए दौड़ रहा था। लेकिन अभी— अभी उसकी दौड़ बहुत तेज हो गई थीक्योंकि पीछे एक सिंह उसके लग गया था। हीरे तो भूल गए थेअब तो किसी तरह इस सिंह से बचाव करना था। भाग रहा था बेतहाशाऔर उस जगह पहुंच गयाजहां आगे रास्ता समाप्त हो गया था। गड्ढ था भयंकररास्ता समाप्त था। लौटने का उपाय न था।
लौटने को उपाय कहीं भी नहीं है — किसी जंगल में और किसी रास्ते पर। और चाहे हीरों के लिए भागते हों और चाहे कोई मौत पीछे पड़ी होइसलिए भागते होंलौटने का कोई उपाय कहीं भी नहीं है। असल में लौटने के लिए रास्ता बचता ही नहीं। समय में सब पीछे के रास्ते नीचे गिर जाते हैं। पीछे नहीं लौट सकतेएक इंच पीछे नहीं लौट सकते। वह भी नहीं लौट सकता थाक्योंकि पीछे सिंह लगा था। और सामने रास्ता समाप्त हो गया था। बड़ी घबराहट मेंकोई उपाय न देखकरजैसा निरुपाय आदमी करेवही उसने किया। गड्ढ में लटक गया एक वृक्ष की जड़ों को पकड़कर। सोचा कि तब तक सिंह निकल जाएतो निकलकर वापस आ जाए। लेकिन सिंह ऊपर आ गया और प्रतीक्षा करने लगा। सिंह की भी अपनी वासना है। कभी तो ऊपर आओगे।
जब देखा कि सिंह ऊपर खड़ा है और प्रतीक्षा करता हैतब उस आदमी ने नीचे झांका। नीचे देखा कि एक पागल हाथी चिंघाड़ रहा है। तब उसने कहा कि अब कोई उपाय नहीं है। उस आदमी की स्थिति हम समझ सकते हैंकैसे संताप में पड़ गया होगा! लेकिन इतना ही नहींसंताप जिंदगी में अनंत हैं। कितने ही आ जाएं तो भी कम हैं। जिंदगी और भी दे सकती है। तभी उसने देखा कि जिस शाखा को वह पकड़े हैवह कुछ नीचे झुकती जाती है। ऊपर आंखें उठाईं तो दो चूहे उसकी जड़ों को काट रहे हैं। बुद्ध कहते थेएक सफेद चूहा थाएक काला चूहा था। जैसे दिन और रात आदमी की जड़ों को काटते चले जाते हैं। तो हम समझ सकते हैं कि उसके प्राण कैसे संकट में पड़ गए होंगे।
लेकिन नहींआदमी की वासना अदभुत है। और आदमी के मन की प्रवंचना का खेल अदभुत है। तभी उसने देखा कि ऊपर मधुमक्खी का एक छत्ता है और मधु की एक—एक बूंद टपकती है। फैलाई उसने जीभ अपनीमधु की एक बूंद जीभ पर टपकी। आंख बंद की और कहाधन्यभागबहुत मधुर है। उस क्षण में न ऊपर सिंह रहान नीचे चिंघाड़ता हाथी रहान जड़ों को काटते हुए चूहे रहे। न कोई मौत रहीन कोई भय रहा। एक क्षण को वह मधुर...। कहा उसनेबहुत मधुर हैमधु बहुत मधुर है!
बुद्ध कहते थेहर आदमी इसी हालत में हैलेकिन मन मधु की एक—एक बूंद टपकाए चले जाता है। आंख बंद करके आदमी कहता हैबहुत मधुर है। स्थिति यही हैसिचुएशन यही है। पूरे वक्त यही है। नीचे भी मौत हैऊपर भी मौत है। जहां जिंदगी हैवहां सब तरफ मौत है। जिंदगी सब तरफ मौत से घिरी है। और प्रतिपल जीवन की जड़ें कटती जा रही हैं अपने आप। जीवन रिक्त हो रहा हैचुक रहा है — एक—एक दिनएक—एक पल। और जीवन की.. जैसे कि रेत की घड़ी होती है और एक—एक क्षण रेत नीचे गिरती चुकती जाती है। ऐसे ही जीवन से समय चुकता जाता है और जीवन खाली होता चला जाता है। लेकिन फिर भी एक बूंद गिर जाए मधु कीस्वप्न निर्मित हो जाते हैंआंख बंद हो जाती है। मन कहता हैकैसा मधुर है! और जब तक एक बूंद चुकेसमाप्त होतब तक दूसरी बूंद टपक जाती है। मन प्रवंचना की बूंदें टपकाए चला जाता है।
इसलिए ऋषि कहता हैहे मेरे संकल्पात्मक मनकितने धोखेकितनी प्रवचनाएं तूने दीं। अब तू उन सबका एक बार स्मरण कर। एक बार स्मरण कर लेजो तूने कियाजो तू सोचता थाकर रहा है। जिसका तू कर्ता बना था। और आज तू समाप्त हुआ जाता हैशून्य हुआ जाता हैमिटा जाता है।
समाधि के द्वार पर मन शून्य हो जाता हैविचार बंद हो जाते हैंचित्त के कल्प—विकल्प ओवेलीन हो जाते हैं। चित्त की तरंगें निस्तरंग हो जाती हैं। मन होता ही नहीं। जहां मन नहीं हैवहीं समाधि है।
मैंने कहा कि समाधि का एक अर्थ तो साधु मर जाए तो उसकी कब्र को हम कहते हैं समाधि। समाधि का दूसरा अर्थ है,समाधि का अर्थ हैजहां समाधान है। जहां कोई समस्या नहीं है। यह भी बड़े मजे की बात है कि जहां मन हैवहां समस्या और समस्या और समस्या — समाधान कभी भी नहीं है। मन समस्याओं को पैदा करने की बड़ी कीमिया है। जैसे वृक्षों पर पत्ते लगते हैंऐसे मन में समस्याएं लगती हैं। समाधान कभी नहीं लगता। मन के तल पर कोई समाधान कभी भी नहीं है। जहां मन खो जाता है वहां समाधान है।
इसलिए जब कोई आकर मुझसे कहता है कि मेरे मन को समाधान करवा देंतो मैं उससे कहता हूं कि तुम इस झंझट में न पड़ो। मन को कभी समाधान न करवा पाओगे। मन को छोड़ो तो समाधान हो पाए।
एक मित्र आज सांझ को ही मुझसे कह रहे थे कि मैं लोभ से कैसे मुक्त हो जाऊंमैंने कहान हो सकोगे। क्योंकि तुम ही लोभ हो। जब तक तुम होतब तक लोभ से मुक्त न हो सकोगे। तुम न हो जाओलोभ नहीं रह जाएगा।
मन का कभी समाधान नहीं होता। मन नहीं होतातब समाधान होता है। इसलिए कहते हैं उसे समाधि। जहां सब समाधान आ गयाजहां कोई समस्या न रही। जब तक मन हैतब तक समस्या बनाए ही चला जाएगा। एक समस्या हल करेंगेदूसरी समस्या निर्मित करेगा। और एक समाधान अगर कोई देगातो दस समस्याएं उस समाधान में से निर्मित करेगा।
एक मित्र आए दो दिन पहले। मुझे उन्होंने पत्र लिखा था कि आता हूं शिविर में। चित्त में बड़ी अशांति है। आए। तीन दिन के प्रयोग ने अशांति को तिरोहित किया। तीन दिन बाद मेरे पास आए और कहने लगेअशांति तो चली गईलेकिन यह शांति कहीं धोखा तो नहीं हैमन ने.. मैंने उनसे पूछा कि अशांति धोखा नहीं हैऐसा कभी मन ने कहा था कि नहींउन्होंने कहामन ने ऐसा कभी नहीं कहा। कितने दिन से अशांत हैंतो उन्होंने कहा कि सदा से अशांत हूं। लेकिन मन ने कभी यह नहीं कहा कि अशांति धोखा तो नहीं है! अभी तीन दिन से शांत हुएतो मन कहता हैकहीं शांति धोखा तो नहीं है!
बहुत अदभुत मन है। अगर परमात्मा भी आपके मन को मिल जाए तो मन कहेगापता नहींअसली है कि नकली — अगर मन हो मौजूद। इसीलिए परमात्मा मन के रहते मिलता नहीं। क्योंकि मन उसको बड़ी दिक्कत में डालेगा। मन को आनंद भी मिल जाए तो भी संदिग्ध होता हैपता नहींहै या नहीं। मन संदेह निर्मित करता हैशंकाएं निर्मित करता हैसमस्याएं निर्मित करता हैचिंताएं निर्मित करता है। फिर भी मन को हम इतने जोर से क्यों पकड़ते हैंअगर मन सारी बीमारियों की जड़ हैजैसा कि समस्त जानने वाले कहते हैंतो फिर हम मन को इतने जोर से क्यों पकड़े हुए हैं?
वही कारण हैजिससे ऋषि व्यंग्य कर रहा है। मन को हम इसलिए जोर से पकड़े हैं कि हमको डर है कि अगर मन नहीं रहा तो हम न रहेंगे। असल में हमने जाने—अनजाने में मन को अपना होना समझ रखा है। आइडेंटिटी कर रखी है। समझ लिया है कि मैं मन हूं। जब तक आप समझेंगे कि मैं मन हूं तब तक आप समस्त बीमारियों को पकड़े बैठे रहेंगेछाती से लगाए बैठे रहेंगे।
आप मन नहीं हैं। आप तो वह हैंजो मन को भी जानता हैजो मन को भी देखता हैजो मन को भी पहचानता है। पीछे हटना पड़ेगा थोड़ा मन से। थोड़ा दूर होना होगा। थोड़ा पार उठना पड़ेगा। जरा किनारे खड़े होकर मन की धारा को देखना पड़ेगा कि वह रही मन की धारा। आप मन नहीं हैंलेकिन समझा हमने यही है कि मैं मन हूं। जब तक आप समझे हैं कि मैं मन हूं तब तक आप मन को छोड़ेंगे कैसे 2: क्योंकि वह तो प्राणघाती हो जाएगी बात। मन को छोड़ना मतलब मरना हो जाएगा। तो फिर आप मन को नहीं छोड़ सकेंगे। मन को वही छोड़ सकता हैजो जान ले कि मैं मन नहीं हूं।
समाधि का पहला चरण यह अनुभव है कि मैं मन नहीं हूं। जब यह अनुभव गहरा होने लगता है और इतना गहरा हो जाता है कि यह आपकी स्पष्ट अनुभूति हो जाती है कि मैं मन नहीं हूं जिस दिन यह अनुभूति पूर्ण होती हैउसी दिन मन तिरोहित हो जाता है। मन उस दिन उसी तरह तिरोहित हो जाता हैजैसे किसी दीए का तेल चुक जाए। दीए का तेल चुक जाए तो भी थोड़ी देर बाती जलेगीथोड़ी देर। बाती में थोड़ा तेल चढ़ गया होगा इसलिए। लेकिन दीए का तेल चुक जाए तो बाती थोड़ी देर जलेगी चढ़े हुए तेल सेपर थोडी ही देर।
वही स्थिति है ऋषि की। तेल चुक गया है। जान लिया ऋषि ने कि मैं मन नहीं हूं। लेकिन बाती में जो थोड़ा सा तेल चढ़ गया हैअभी ज्योति जल रही है। इस आखिरी जलती और अंतिम समय में बुझती ज्योति से ऋषि कहता हैतूने मुझे धोखा दिया था कि सदा साथ देगी और प्रकाश देगी। तेरा तो बुझने का क्षण आ गया! अब मैं देखता हूं कि तेल तो चुक गया है,कितनी देर जलेगा मेरा संकल्पात्मक मनअब तो सारी बात समाप्त हुई जाती है। लेकिन फिर भी मैं हूं। तो अपने ही विदा होते मन को वह कह रहा है कि मैं थामैं सदा तुझसे अलग थालेकिन सदा मैंने तुझे अपने साथ एक समझा। वही मेरी भ्रांति थी। वही संसार था। वही माया थी।
अपने से तो कह ही रहा हैमैंने आपसे कहा कि आपसे भी कह रहा है। शायद — शायद आपको भी खयाल आ जाए। लौटकर देखें तो शायद खयाल आ जाए। बीस साल पहले लौट जाएंबच्चे थे। क्लास में प्रथम आने की कैसी आकांक्षा थी भारी। रात—रात नींद न आती थी। परीक्षा प्राणों पर संकट मालूम पड़ती थी। लगता था कि सब कुछ इसी पर टिका है। आज न कोई परीक्षा रहीन क्लास रही। लौटकर याद करें। लौटकर याद करेंक्या फर्क पड़ा कि प्रथम आए थे कि द्वितीयकि तृतीयकि बिलकुल नहीं आए थे। क्या फर्क पड़ाआज कोई याद भी नहीं आती।
दस साल पीछे लौटें। किसी से झगड़ा हो गया हैलगता है कि जीवन—मरण का सवाल है। आज दस साल बाद बात ऐसे हो गईजैसे पानी पर खींची गई रेखाएं मिट गई हैं। किसी ने राह में गाली दे दी थी तो ऐसा लगा था कि अब कैसे बचेंगेबचे हैं भली तरह। गाली भी नहीं हैकुछ पता भी नहीं हैआज कोई याद भी नहीं आता। आज लौटकर वापस देखेंकितना मूल्य दिया था उस क्षण! उतना मूल्य रह गया है कुछकुछ भी मूल्य नहीं रह गया। आज जिस चीज को मूल्य दे रहे हैंध्यान रखनाकल इतनी ही निर्मूल्य हो जाएगी। इसलिए आज भी बहुत मूल्य मत देना। कल के अनुभव से आज भी मूल्य को खींच लेना।
ऋषि समस्त अनुभवों के आधार पर कह रहा है कि तेरे ऊपर मैंने बहुत मूल्य दिया संकल्पात्मक मन। आज आखिरी विदा में तुझसे कहता हूं कि धोखा थावंचना थीमूढ़ता थी। मैं तुझसे अलग थाअलग हूं। इस क्षण में जब मन विलीन होता हैतो सब विलीन हो जाता है। क्योंकि मन के आधार पर ही सब जुडा है। मन जो हैवह न्यूक्लियस है। उसके ऊपर ही सारे जीवन का चाक घूमता है। इसलिए ऋषि कह रहा हैवायु वायु में लीन हो जाएगीअग्नि अग्नि में लीन हो जाएगीआकाश आकाश में खो जाएगा। सब खो जाएगा। क्योंकि वह जो जोड़ने वाला मन हैअब वही खो रहा है।
बुद्ध को जिस दिन ज्ञान हुआउन्होंने एक अदभुत बात कही। जिस दिन पहली बार उनका मन मिटा और वह मन—शून्य दशा में प्रविष्ट हुएउस दिन उन्होंने भी ठीक ऐसी ही बात कहीजैसा उपनिषद के इस ऋषि ने कही है। उन्होंने कहा कि मेरे मनअब तुझे विदा देता हूं। अब तक तेरी जरूरत थीक्योंकि मुझे शरीर रूपी घर बनाने थे। लेकिन अब मुझे शरीर रूपी घर बनाने की कोई जरूरत न रहीअब तू जा सकता है। अब तक मुझे जरूरत थीशरीर बनाना पड़ता थातो वह मन के आर्किटेक्ट कोवह मन के इंजीनियर को पुकारना पड़ता था। उसके बिना कोई शरीर का घर नहीं बन सकता था। आज तुझे विदा देता हूं क्योंकि अब मुझे शरीर के बनाने की कोई जरूरत न रही। अब मुझे अपना परम निवास मिल गया हैअब मुझे कोई घर बनाने की जरूरत न रही। अब मैं वहीं पहुंच गया हूं जो मेरा घर है। अब मुझे बनाने की कोई जरूरत न रही। अब मैं असृष्ट स्वरूप के घर में पहुंच गया हूं। स्वयं में पहुंच गया हूं निजता मेंअब मुझे कोई घर बनाने की जरूरत न रही। अब मन तू जा सकता है।
साधक के लिए ऐसे सूत्र कीमत के हैं। कंठस्थ करने से फायदा नहीं है। हृदयस्थ करने से फायदा है। कंठस्थ कर लेंयाद कर लेंरोज दोहरा देंबासे पड़ जाएंगे। धीरे— धीरे अर्थ भी खो जाएगा। धीरे— धीरे शब्द ही रह जाएंगे — मुर्दाअर्थहीन। लेकिन अगर हृदय तक पहुंच जाए बातसमझ में आ जाए यह बात — इंटलेक्युअल अंडरस्टैंडिंग नहींकेवल बौद्धिक समझ नहीं — यह प्राणगत समझ में आ जाए कि सच ही यह मन सिवाय धोखे के और कुछ भी नहीं हैतो आपकी जिंदगी एक नई यात्रा पर,एक नई क्रांति में प्रवेश कर जाएगी।
मैं यदि इन सूत्रों पर बोल रहा हूं तो इसलिए नहीं कि ये सूत्र आपकी समझ में आ जाएंआप थोड़े ज्यादा ज्ञानवान हो जाएं। नहींआप जरूरत से ज्यादा ज्ञानवान पहले ही हैं। आपके शान में बढ़ती की अब कोई भी जरूरत नहीं है। मैं बोल रहा हूं इसलिए इन सूत्रों पर कि आपको जीवन की वास्तविकता का स्मरण आ जाएरिमेंबरिग आ जाएयह होश आ जाए कि हम जैसे जी रहे हैंकहीं ये सूत्र उस जीने के बाबत भी कोई प्रकाश डालते हैं!
च्चांगत्से चीन में एक फकीर हुआ। एक सांझ निकलता है एक मरघट से। किसी की खोपड़ी पैर में लग जाती है। शिष्य उसके साथ हैं। च्चांगत्से खोपड़ी को उठाकर सिर से लगाकर बार—बार क्षमा मांगने लगता है कि मुझे माफ कर दे। हे भाईमुझे माफ कर दे!
उसके शिष्यों ने कहा कि आप कैसी बात कर रहे हैं! हमने सदा आपको बुद्धिमान जाना। आप यह क्या पागलपन कर रहे हैंच्चांगत्से ने कहा कि तुम्हें पता नहीं हैयह छोटे लोगों का मरघट नहीं हैयह बड़े लोगों का मरघट है। यहां गांव के जो बड़े आदमी हैंवे दफनाए जाते हैं। उन्होंने कहाकोई भी होबड़ा हो कि छोटा होमौत सबको बराबर कर देती है।
मौत तो बहुत कम्युनिस्ट हैएकदम समान कर देती है।
पर च्चांगत्से ने कहा कि नहींमाफी तो मांगनी ही पड़ेगी। अगर यह आदमी जिंदा होतातो पता नहीं आज मेरी क्या हालत होती। पर उन्होंने कहायह आदमी जिंदा नहीं है। इसलिए तुम चिंता मत करो। पर च्चांगत्से उस खोपड़ी को घर ले आया और अपने कमरे में अपने बिस्तर के पास ही रखने लगा। जो भी आतावही चौंककर देखता कि यह खोपड़ी यहां क्यों है?च्चांगत्से कहता कि मेरा जरा पैर लग गया था। अब यह आदमी मर गया हैअब बड़ी मुश्किल है। माफी किससे मांगतो इसकी खोपड़ी ले आया हूं रोज इससे माफी मांगता हूं कि शायद सुनाई पड़ जाए।
लोग कहतेआप कैसी बातें कर रहे हैं! तो च्चांगत्से कहता कि इसलिए भी इस खोपड़ी को ले आया हूं कि इसे देखकर मुझे रोज खयाल बना रहता है कि आज नहीं कल अपनी भी खोपड़ी किसी मरघट पर ऐसी ही पड़ी होगी। लोगों की ठोकरें लगेंगी। कोई माफी भी मांगेगा तो हम माफ करने की हालत में भी नहीं होंगेनाराज होने की तो बात अलग है। तो जिस दिन से इस खोपड़ी को लाया हूं अपनी खोपड़ी के बाबत बड़ी समझ पैदा हुई है। अब अगर कोई मेरी खोपड़ी को लात मार जाएतो मैं इस खोपड़ी की तरफ देखकर शांत रहूंगा।
यह एक्सिस्टेंशियल अंडरस्टैंडिंग हुई। यह अस्तित्वगत समझ हुईबौद्धिक नहीं। इसका परिणाम हो गया। यह आदमी बदल गया।
यह सूत्र आपके हृदय तक पहुंच जाए और जब आप कोई कर्म कर रहे हों या कर्म की योजना बना रहे हों और मन कह रहा हो कि ऐसा करोकि यह इलेक्यान आ रहा हैइसमें लड़ो और जीत जाओ...। जैसे यह सूत्र मोरारजी को दे देना चाहिए — अभी मन बड़े संकल्प कर रहा होगा। वह मरते दम तक करता चला जाता है संकल्प। हालांकि किसी चीज से कुछ मिलता नहीं। अब मोरारजी डिप्टी कलेक्टर से लेकर डिप्टी प्राइम मिनिस्टर तक की यात्रा कर लिए। उससे कोई हल नहीं होता। आगे भी कितनी यात्रा करेंकुछ हल नहीं होगा।
पर मन हारे तो मुसीबत में डालता हैजीते तो मुसीबत में डालता है। मन की हालत जुआरी बता है। जुआरी हार जाए तो सोचता हैएक दांव और लगा लूं शायद जीत जाऊं। और जीत जाए तो सोचता है कि अब चूकना ठीक नहीं हैएक दांव और लगा लूं जब जीत ही रहा हूं। इसलिए जुआरी कभी जीतकर नहीं लौटता। जीतता है तो और लगाता हैक्योंकि जीतने से आशा बढ़ जाती है। जब तक हार न जाएतब तक जीतना कहता हैऔर दांव लगा लूं। हार जाए तो मन कहता है कि हार गए। हारकर लौटना उचित है कहीं! एक दांव और देख लो। कौन जाने जीत हो जाए!
मन जुआरी की तरह है। इस सूत्र को स्मरण रखना। जब मन दांव लगाने की बात करेहार—जीत की बात करेतब कहना कि हे मेरे संकल्पात्मक मनअपने किए हुए का स्मरण कर। इससे कर्म के प्रति जो भारी लगाव है वह क्षीण होगाऔर कर्ता होने की जो जड़ता है वह टूटेगी। और समाधि की ओर कदम बढ़ सकेंगे। ध्यान की ओर यात्रा हो सकेगी।
ध्यान रखेंमन के साथ मूर्च्छा नहीं चलेगी। मन के साथ बेहोशी नहीं चलेगी। अगर आप बेहोश ही चले जाते हैं मन के साथमूर्च्छित ही चले जाते हैं मन के साथतो मन पुनरुक्त करता रहेगा वहीजो उसने कल किया था। यह बात आपसे कहना चाहूंगाशायद आपके खयाल में न हो कि आपका मन कोई नए काम नहीं करता। बसउन्हीं—उन्हीं कामों को पुनरुक्त करता चला जाता है।
कल भी क्रोध किया थापरसों भी क्रोध किया था। और मजा यह है कि परसों क्रोध करके भी पछताए थे कि अब न करेंगे। और कल भी क्रोध करके पछताए थे कि अब न करेंगे। आज भी क्रोध किया है और आज भी पछताए हैं कि अब न करेंगे। क्रोध भी पुराना हैपश्चात्ताप भी पुराना है। रोज उसको दोहराए चले जाते हैं। अगर क्रोध न छूटता हो तो कम से कम पश्चात्ताप ही छोड़ दें। कहीं से तो पुराना टूटे। लेकिन नहींक्रोध भी जारी रहेगापश्चात्ताप भी जारी रहेगा। वही—वही दोहरता रहेगा। पूरी जिंदगी एक रिपीटीशन है। कोल्हू के बैल से भिन्न नहीं है। लेकिन कोल्हू के बैल को भी शक पैदा होता होगा कि बड़ी यात्रा कर रहे हैं। क्योंकि आंखें तो बंधी होती हैंपैर चलते रहते हैंतो कोल्हू के बैल को भी खयाल तो आता ही होगा कि कितना चल चुके! न मालूम पृथ्वी की यात्रा कर लीकहां पहुंच चुके!
मन भी कोल्हू के बैल की तरह चलता है वर्तुल में। वही कर रहे हैं आप रोज। अगर एक आदमी अपनी जिंदगी की डायरी रखेलेखा—जोखा रखेतो बहुत चकित होगा कि मैं मशीन तो नहीं हूंवही—वही दोहराए चला जा रहा है! वही सुबह हैवही उठना हैवही सांझ है! अगर पति—पत्नी बीस साल साथ रह लेते हैंतो पति सांझ को देर से लौटकर घर में क्या कहेगापत्नी पहले से जानती है। बीस साल का अनुभव! पति जो भी कहेगाउसका क्या परिणाम पत्नी पर होगावह पति जानता है। फिर भी पति वही कहेगा और पत्नी वही कहेगी।
इस तरह मन की यांत्रिकता में जो डूबकरमूर्च्‍छित होकर चल रहा हैउसे कितने ही अवसर मिलेंवह सारे अवसर चूक जाएगा। अवसर हमें कम नहीं मिलते। अवसर बहुत हैं। लेकिन हम हर अवसर चूक जाते हैं। हम अवसर चूकने में कुशल हैं। जिंदगी रोज मौका देती है कि तुम नए हो जाओमत करो पुराना। लेकिन हम फिर पुराना करते हैं।
क्योंयह क्यों होता होगा ऐसायह अपने किए हुए का स्मरण करयह सूत्र हमारे खयाल में नहीं है। जब आप कल क्रोध करें तो क्रोध करने के पहले अपने मन से कहना कि हे मेरे मनअपने पहले किए हुए क्रोधों का स्मरण कर! पहले इसको कह लेना। फिर दो क्षण रुककर अपने पहले किए हुए क्रोधों का स्मरण कर लेना। और मैं आपसे कहता हूं कि आप क्रोध करने में असमर्थ हो जाएंगे। जब कल मन फिर वासना से भर जाएतब अपने मन को कहना कि हे मेरे संकल्पात्मक मनअपनी पहले की हुई वासनाओं का स्मरण कर! पहले उनका स्मरण कर ले। नई यात्रा पर निकलने के पहले पुराने अनुभव को खयाल में ले ले। नहींफिर आप यात्रा पर नहीं निकल पाएंगे। वासना वहीं ठिठककर खड़ी हो जाएगी। इतना होश काफी है मन की यांत्रिकता को तोड़ देने के लिए।
गुरजिएफ ने लिखा है अपने संस्मरणों में कि मेरा पिता मर रहा था। उसके एक वचन ने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी। मरता था पिता। गुरजिएफ तो बहुत छोटा था। घर में सबसे छोटा लड़का था। बाप तो बहुत का था। सब बेटों को बाप ने अपने पास बुलाकर कान में मरते वक्त कुछ कहा। सबसे छोटे बेटे को भी बुलाया। उसको कहा कि झुक आ मेरे पास और एक बात तुझसे कह जाता हूं वह भर स्मरण रखना। मेरे पास तुझे देने को और कोई संपत्ति नहीं है। भोला लड़काउसने कान झुका लिया। बाप ने उससे कहा कि एक बात का वचन मुझे दे दे कि जब भी कोई बुरा काम करने का सवाल उठेतो तू चौबीस घंटे रुककर करना। करना जरूर। लेकिन चौबीस घंटे रुक जाना। वह मेरे से वायदा कर। क्रोध करना होबिलकुल करना। मैं मना नहीं करता हूं। लेकिन चौबीस घंटे रुककर करना। किसी की हत्या करनी होबिलकुल करना। लेकिन चौबीस घंटे रुककर करना। उसके बेटे ने पूछालेकिन इसका मतलब क्या हैतो उसके बाप ने कहा कि इससे तू अच्छी तरह से कर सकेगा। चौबीस घंटे रुक जाएगा तो ठीक से नियोजनायोजना बना सकेगाप्लानिंग कर सकेगा। और भूल—चूक कभी नहीं होगीयह मेरी जिंदगी का अनुभव है। इसको मैं तुझे दे जाता हूं।

गुरजिएफ ने लिखा है कि वह एक बात मेरी जिंदगी बदल गई। क्योंकि चौबीस घंटे के बाद तो बहुत देर की बात हो गई,चौबीस क्षण भी अगर कोई बुराई करने में ठहर जाएतो नहीं कर पाता है। चौबीस क्षण भी।
क्रोध जब आपको आएआप घड़ी देखने लगेंऔर कहें कि एक मिनट घड़ी देख लूं फिर करूंगा। एक मिनट घड़ी का कांटा देख लें। जब सेकेंड का कांटा पूरे साठ सेकेंड का चक्कर लगा लेतब घड़ी नीचे करके क्रोध शुरू कर दें। आप क्रोध नहीं कर पाएंगे। स्मरण—भा गयापिछले किए हुए.. उस एक साठ सेकेंड के बीच में पिछले किए हुए क्रोधों की सारी झलक और प्रतिबिंब लौट आएगा। वे सारे पश्चात्तापवे सारी कसमें जो खाई थींवे सब निर्णय कि अब नहीं करूंगावे सब दोहर जाएंगे।
लेकिन बुराई करने में हम इतना नहीं रुकते। हांभलाई करने में हम जरूर रुकते हैं।
एक मित्र को संन्यास लेना है। वह आज आए थे। वह कहने लगे कि मेरा जन्मदिन आ रहा है दों—तीन महीने बाद — तब। अगर क्रोध करना हो तो जन्मदिन तक कोई नहीं रुकतासंन्यास लेना हो तो जन्मदिन तक! मैंने उनसे कहा कि पक्का हैऐसा तो नहीं है कि अगली बार तुम कहो कि मृत्युदिन जब आएगा तब लूंगा! जन्मदिन का भरोसा है कि वह मृत्युदिन नहीं बन जाएगाएक पल का भरोसा हैलेकिन भलाई को हम पोस्‍टपोन करते हैं। बुराई को हम तत्काल करते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि समय चूक जाए और बुराई न हो पाए।
बुराई को स्थगित करनाभलाई को तत्काल कर लेना। क्योंकि पल का भरोसा नहीं है। भलाई एक क्षण भी चूक गई,फिर जरूरी नहीं कि होने का मौका मिलेगा। और पलभर भी बुराई के लिए रुक गए तो मैं कहता हूं कि फिर कभी न कर पाएंगे। क्योंकि उतना रुकने में जो समर्थ हैवह बुराई करने में असमर्थ हो जाता है। ध्यान रखेंएक पल बुराई को रोकने में जो समर्थ हैवह बुराई करने में असमर्थ हो जाता है। वह बड़ा सामर्थ्य है — एक क्षण रुक जाने का सामर्थ्य। जब आंख में खून उतरने लगे और हाथ की मुट्ठियां भिंचने लगेंतब एक क्षण क्रोध में रुक जाने का सामर्थ्य इस जगत में बड़े से बड़ा सामर्थ्य है।
इस सूत्र को इसलिए ऋषि ने कहा है — खुद के व्यंग्य के लिए भी और आप सबके व्यंग्य के लिए भी। आप सबकी भी खूब हंसी है उसमें।
एक सूत्र और ले लेंनहींआज के लिए इतना ही।
दो—तीन बातें ध्यान के संबंध में समझ लेंफिर हम ध्यान के लिए बैठेंगे। और कह दूं सबसे पहले कि ध्यान को स्थगित मत करना — पल भर के लिए भी। यह मत सोचना कि कल कर लेंगे। ध्यान को करना अभी। दो—तीन बातें समझ लेंफिर उठें। अभी बैठे रहें। एक तोजो लोग मेरे पीछे बैठे हैंजिनको मैंने कल कहा कि पीछे बैठेंउनसे यह नहीं कहा है कि बैठे रहें। उनसे यह नहीं कहा है कि बैठे रहें। कुछ ऐसा समझ गए मालूम होता है कि बैठे रहो! नहींबैठकर करने को कहा है। मैंने पीछे कल लौटकर देखा तो मुश्किल से आठ—दस लोग कर रहे थेबाकी लोग बैठे हुए थे।
बैठे होने से कुछ भी न चलेगा। और कभी—कभी मुझे हैरानी होती हैइतने लोग कर रहे हैंइतने लोग आंदोलित हैं,इतने लोग आनंदमग्न होकर नाच रहे हैंक्या आपके भीतर पत्थर है हृदय नहीं हैजिसमें जरा सी भी कोई चहल—पहल नहीं होती! इतने लोगों को आनंदित देखकर आपका कोई रोआं नहीं कंपता!
नहींमुझे लगता है कि रोआं तो कंपता होगाआप बड़े समझदार हैंउसको दबाकर बैठे रहते होंगे कि कहीं कंप न जाए। कृपा करके अपने को छोड़े। लेट गो! इतने शरीर जहां नाच रहे हैंइतने लोग जहां मुक्त—मन सेसरल—चित्त से बच्चों जैसे सरल हो गए हैंवहां अपनी कठोरता को लिए बैठे मत रहें। कठोरता को छोड़े। आंदोलित हों।
और ध्यान रखेंकुछ मित्रों को ऐसा खयाल है कि जब अपने से होगा तब करेंगे। सौ में से नब्बे प्रतिशत लोगों को तो अपने से हो जाएगादस प्रतिशत लोगों को नहीं होगा। और दस प्रतिशत वे ही लोग हैं जिनको समझदार होने का भ्रम होता है। उनको कुछ तोड़ना पड़ेगा अपनी तरफ से।
तो मैं आपसे कहूंगा कि जिनको अपने से न होता होवे करना शुरू करें। दो क्षण करेंगेतीसरे क्षण स्पांटेनियससहज आविर्भाव हो जाएगा। एक दफा झरना टूट जाएगति आ जाएतो सहज स्फुरणा शुरू हो जाती है।
आज तो — एक दिन और बचा है — इसलिए मैं चाहूंगा कि कोई भी वंचित न रहे। इसलिए सारे लोग सम्मिलित हों। नीचे जो लोग हैंवे खड़े हो जाएं। ऊपर से भी जिनको खड़े होकर करना है वे नीचे चले जाएं!

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