बुधवार, 5 जून 2019

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--07

वह अव्‍याख्‍य है


ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।। 10।।

विद्या से और ही फल बतलाया गया है तथा अविद्या से और ही फल बतलाया है। ऐसा हमने बुद्धिमान पुरुषों से सुना हैजिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी।। १०।।


पनिषद अविद्या का अर्थ मात्र अज्ञान नहीं करते हैं। और विद्या का अर्थ मात्र ज्ञान नहीं करते हैं। अविद्या से उपनिषद का अभिप्रेत भौतिक ज्ञान है। अविद्या से अर्थ है वैसी विद्याजिससे स्वयं नहीं जाना जातालेकिन और सब जान लिया जाता है। अविद्यापदार्थ विद्या का नाम है। 
साधारणत: भाषा कोश में खोजने जाएंगे तो अविद्या का अर्थ होगा अज्ञान। लेकिन उपनिषद अविद्या का अर्थ करते हैं ऐसा ज्ञान, जो ज्ञान जैसा प्रतीत होता हैफिर भी स्वयं व्यक्ति अज्ञानी रह जाता है। ऐसा ज्ञानजिससे हम और सब जान लेते हैंलेकिन स्वयं से अपरिचित रह जाते हैं। धोखा देता है जो ज्ञान काऐसी विद्या को उपनिषद अविद्या कहते हैं।
अगर ठीक से अनुवाद करेंतो अविद्या का अर्थ होगा साइंस। बहुत अजीब लगेगी यह बात। अविद्या का अर्थ होगा पदार्थज्ञानपरज्ञान। और विद्या का अर्थ होता है आत्मज्ञान। विद्या से सिर्फ ज्ञान अभिप्रेत नहीं है। विद्या से ट्रांसफामेंशन,रूपांतरण अभिप्रेत है। जो ज्ञान स्वयं को बिना बदले ही छोड़ जाएउसे उपनिषद ज्ञान नहीं कहेंगेउसे विद्या नहीं कहेंगे। मैंने कुछ जाना और जानकर भी मैं वैसा ही रह गयाजैसा न जानने पर थातो ऐसे जानने को उपनिषद विद्या न कहेंगे। विद्या कहेंगे तभीजब जानते ही मैं रूपांतरित हो जाऊं। मैंने जाना कि मैं बदला। मैंने जाना कि मैं दूसरा हुआ। जानकर मैं वही न रह जाऊंजो मैं न जानकर था। अगर मैं वही रह गयातो वह अविद्या है। अगर मैं रूपांतरित हो गयातो वह विद्या है। ऐसा ज्ञान जो सिर्फ एडीशन नहीं हैजो आपमें कुछ जानकारी नहीं जोड़ जाता, वरन ट्रासफामेंशन हैरूपांतरण हैआपको बदल जाता हैआपको और ही कर जाता हैआपको नया जन्म दे जाता हैउसे उपनिषद विद्या कहते हैं।

सुकरात ने ठीक इसी अर्थों मेंउपनिषद के अर्थों मेंएक छोटा सा सूत्र कहा है। और कहा हैनालेज इज वर्चू। ज्ञान ही सदगुण है। यूनान में सैकड़ों वर्ष तक इस पर विवाद चला। क्योंकि साधारणत: हम सोचते हैंअकेले ज्ञान से सदगुण का क्या संबंध हैएक आदमी जान लेता हैक्रोध बुरा है। फिर भी क्रोध तो नहीं जाता। एक आदमी जान लेता हैचोरी बुरी है। फिर भी चोरी तो बंद नहीं होती। एक आदमी जान लेता हैलोभ बुरा है। फिर भी लोभ तो जारी रहता है।
लेकिन सुकरात कहता है कि जिसने जान लिया कि लोभ बुरा हैउसका लोभ चला ही जाएगा। जिसने जाना कि लोभ बुरा है और लोभ न गयातो अविद्या हैतो जानने का धोखा है। फाल्स नालेज है। भ्रम पैदा हुआ। ज्ञान की कसौटी यही है कि वह आचरण बन जाए तत्‍क्षणबनाना भी न पड़े। अगर कोई सोचता हो कि पहले हम जानेंगे और फिर आचरण में ढालेंगेतो फिर वह विद्या नहीं हैअविद्या है। जानते ही — जैसे कि आपके सामने रखी है कोई चीज और आपको पता चला कि जहर है,आपने जाना कि जहर हैकि हाथ उठता था प्याली को लिए ओंठों की तरफऔर रुक गया। जाना कि जहर है और हाथ से प्याली छूट गई। जानना ही आचरण बन गया तो विद्या है। और अगर जानने के बाद चेष्टा करनी पड़ेकोशिश करनी पड़े,एफर्ट करना पड़े और आचरण को बदलना पड़ेतो फिर आचरण थोपा हुआ हैजबर्दस्ती लादा गया है। ज्ञान से निर्मित नहीं है,आरोपित है।
और ऐसा जान जिसको आचरण बनाने के लिए आरोपित करना पड़ेजो अपने आप आचरण न बनेउसे उपनिषद अविद्या कहते हैं। उपनिषद उसे विद्या कहते हैंजिसे जाना नहीं कि जीवन बदला नहीं। इधर जला दीयाउधर अंधेरा खो गया। अगर ऐसा हम कोई दीया बना सकें कि दीया तो जल जाए और अंधेरा न खोए! अगर हम ऐसा कोई दीया बना सकें कि दीया जल जाए और अंधेरा न खोए और फिर दीया जलाकर हमको अंधेरे को मिटाने की भी चेष्टा करनी पड़ेअगर ऐसा कोई दीया हम बना सकेंतो वह अविद्या का प्रतीक होगा। दीया जला और अंधेरा नहीं रह जाता है। दीए का जलना अंधेरे का मिट जाना बन जाता है। तो ऐसा दीयाऐसी विद्या उपनिषद को अभिप्रेत है।
इसमें दो बातें और खयाल में ले लेनी जरूरी हैं।
ऐसा क्यों होता है कि हम जान तो लेते हैंलेकिन रूपांतरण नहीं होता! न मालूम कितने लोग मुझे आकर कहते हैं कि हमें पता हैक्रोध बुरा हैजहर हैजलाता हैआग हैनर्क है। फिर भी क्रोध छूटता तो नहींजानते तो हम हैं। तो उनसे मैं कहता हूं कि तुम जानते होयहीं तुम्हारी भूल हो रही है। तुम सोचते होजानते तो हम हैंअब हम क्या करें जिससे कि क्रोध बंद हो जाए। यहीं तुम्हारी भूल हो रही है। तुम जानते नहीं हो। तुम्हें पता नहीं है कि सच में ही क्रोध नर्क है। क्या यह संभव है कि किसी को पता हो कि क्रोध नर्क है और वह क्रोध के बाहर छलांग न लगा जाए?
बुद्ध ने एक जगह कहा है कि एक व्यक्ति को मैंने समझाया। दुख था उसका जीवनपीड़ा से भरा थाचारों ओर सिवाए चिंताओं के उसके जीवन में कुछ भी न था। मैंने उससे कहा कि तू इन सारी चिंताओं को छोड्कर बाहर आ जा। मैं तुझे मार्ग बता देता हूं। उस आदमी ने कहामार्ग आप अभी बता देंफिर बाद में मैं कोशिश करूंगा बाहर आने की  — आहिस्ताक्रमश:। तो बुद्ध ने कहा कि तू उस आदमी जैसा हैजिसके घर में आग लगी होहम उससे कहें कि तेरे घर में आग लगी हैऔर वह कहे कि आपने बताया तो बड़ी कृपा हैअब मैं क्रमश:आहिस्ताधीरे— धीरे बाहर निकलने की कोशिश करूंगा। बुद्ध ने कहा,अच्छा होतावह आदमी कह देता कि तुम झूठ कहते होमुझे कोई आग दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन वह यह नहीं कहता। वह यह कहता है कि मानातुम ठीक कहते होआग लगी हैलेकिन मैं धीरे— धीरे निकलूंगा।
आग अगर सच में ही दिखाई पड़ जाएतो कोई धीरे— धीरे निकलता हैछलांग लगाकर बाहर हो जाता है। बताने वाला भले पीछे रह जाए। जिसे पता चल गया कि आग लगी हैवह तो पहले बाहर हो जाएगा। धन्यवाद भी बाहर ही देगा घर के।
तो बुद्ध ने कहा कि तुम कहते हो कि माना कि आग लगी हैलेकिन तुम्हें आग दिखाई नहीं पड़ती है। तुम व्यर्थ ही हां भर रहे हो। तुम खोजने का कष्ट भी नहीं उठाना चाहते। तुम मेरी बात को कसौटी पर कसने की चेष्टा भी नहीं करना चाहते। तुमने आंख खोलकर भी नहीं देखा चारों तरफ कि आग लगी हैतुम मान लिए और इसलिए तुम्हारे मन में अब यह सवाल उठता है कि आग तो लगी हैअब मैं धीरे— धीरे निकलूंगा। मुझे कोई विधिकोई मैथड बता दें कि मैं कैसे बाहर हो जाऊं।
जब मुझसे कोई कहता है कि मैं जानता हूं कि क्रोध बुरा है और फिर भी क्रोध से छुटकारा नहीं होतातो उससे मैं कहता हूं कि अच्छा हो कि तुम जानो कि तुम नहीं जानते हो कि क्रोध बुरा है। जानते तो तुम यही हो कि क्रोध अच्छा है। हम अच्छे को ही किए चले जाते हैं। लेकिन लोगों से हमने सुन लिया है कि क्रोध बुरा है। सुने हुए को ज्ञान मान लिया है। तो वह अविद्या है। वह विद्या नहीं है।
फिरफिर विद्या कैसी होगी?
जानना पड़ेगा स्वयं ही कि क्रोध बुरा है। क्रोध से गुजरना पड़ेगा। क्रोध की आग में तपना पड़ेगाक्रोध की पीड़ा और कष्ट झेलना पड़ेगा। क्रोध की अग्नि में जब सब अंग जलेंगे और प्राण उत्तप्त होंगे और जीवन धुआ— धुआ हो जाएगातबतब किसी से पूछने नहीं जाना पड़ेगा कि क्रोध बुरा है। तब किसी से समझने नहीं जाना पड़ेगा कि क्रोध बुरा है। और तब क्रोध से बाहर कैसे हो जाएंइसकी कोई विधिकोई उपायकोई साधना नहीं खोजनी पड़ेगी। यह जानना ही कि क्रोध आग हैक्रोध से छुटकारा हो जाता है। ऐसे ज्ञान का नाम विद्या है।
उस ज्ञान को उपनिषद विद्या कहते हैंजो अपने में ही मुक्ति है। जो ज्ञान स्वयं में मुक्ति नहीं हैवह विद्या नहीं है।
हम सबके पास बहुत विद्या है। हम सभी कुछ न कुछ जानते हैं। कहना चाहिएबहुत कुछ जानते हैं। उपनिषद से पूछें,तो हमारा जानना क्या हैहमारे जानने को उपनिषद अविद्या कहेगा। हमारे जानने को विद्या नहीं कहेगा। क्योंकि हमारा जानना हमें छूता ही नहीं है। हमें बदलता ही नहीं है। हमें स्पर्श ही नहीं करता। हम वही के वही रह आते हैंजानना बढ़ता चला जाता है। जानना एक संग्रह की भांति हैहम दूर ही रह जाते हैं। जानने की तिजोरी में संग्रह बढ़ता चला जाता हैहम वही के वही रह जाते हैं। तिजोरी बड़ी होती चली जाती हैसंग्रह बड़ा होता चला जाता है। एक्युमुलेशन हैजिसे हम अभी ज्ञान कह रहे हैं। इसे ज्ञान जिसने समझावह बुरी तरह भटक जाएगा। इसे अविद्या समझना।
विद्या तो सिर्फ उसे ही समझना जो आप में जुड़ती न होआपको बदलती हो। जो आपके साथ संगृहीत न होती हो,आपको रूपांतरित कर जाती हो। विद्या तो वही हैजिसे याद न रखना पड़ेजो आपका जीवन बन जाती हो। विद्या तो वही है,जो स्मृति न बनेजो आपका प्राण बन जाए। ऐसा नहीं कि आप स्मृति से समझें कि क्रोध बुरा है। ऐसा कि आपका आचरण कहे कि क्रोध बुरा है। ऐसा नहीं कि आप घर की दीवारों पर लिख दें कि लोभ पाप हैवरना आपकी आंखें कहेंआपके हाथ कहें,आपका चेहरा कहे कि लोभ पाप है। आपका समग्र व्यक्तित्व कहे कि लोभ पाप हैतब विद्या है।
उपनिषद ने विद्या को बड़ा आदर दिया है। उस शब्द को बड़ी कीमत दी है। वह जीवन को बदलने की कीमिया है। हम जिसे विद्या समझते हैं वह केवल आजीविका चलाने की व्यवस्था है। आजीविका चलाने की व्यवस्था। एक आदमी डाक्टर है,एक आदमी इंजीनियर हैएक आदमी दुकानदार है। उन सबके पास विद्याएं हैंलेकिन उनसे जीवन नहीं बदलता हैसिर्फ जीवन चलता है। उनसे जीवन नया नहीं होतासिर्फ सुरक्षित होता है। उनसे जीवन में कोई नए फूल नहीं खिलते सिर्फ जीवन की जड़ें नहीं सूख पातीं। उनसे जीवन में कोई आनंद नहीं आतालेकिन दुख के लिए सुरक्षाआयोजनव्यवस्था निर्मित हो जाती है। हम जिसे विद्या कहते हैंवह सिर्फ आजीविका को कुशलता से चलाए रखने की सुविधा है। उपनिषद उसे अविद्या कहते हैं। विद्या कहते हैं उसेजिससे जीवन चलता नहींबदलता है। जिससे जीवन आगे की तरफ खिंचता नहींऊपर की तरफ उठता है।
ध्यान रहेअविद्या हारिजेंटल है — क्षितिज की रेखा में चलती है। विद्या वर्टिकल है  — आकाश की तरफ उठती है। बैलगाड़ी की तरह है अविद्याजमीन पर चलती है। हवाई जहाज की तरह टेकआफ नहीं है उसमें। जमीन को छोड्कर वह ऊपर नहीं उठ जाती। जमीन पर चलती चली जाती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक यात्रा पूरी हो जाती हैलेकिन तल नहीं बदलतातल वही होता है। जहां हम जन्मते हैंजिस तल परउसी तल पर हम मरते हैं। अक्सर झूला ही कब्र होता है। कोई बहुत फर्क नहीं होता हैतल वही होता हैवहीं के वहीं होते हैं। हारिजेंटलक्षितिज की रेखा में चलते चले जाते हैं। सभी अपनी—अपनी कब खोज लेते हैं। लेकिन झूलों से बहुत दूर नहीं होती। और दूर होतो भी तल— भेद नहीं होता। तल वही होता हैस्तर वही होता है।
विद्या है वर्टिकलआकाश की तरफ उठतीऊर्ध्वगामी। ऊपर की तरफ जाती है। तल बदलता है। आप वही नहीं रहते। जाना कि आप दूसरे हुए। बुद्ध या महावीर या कृष्ण हमारे पास खड़े होते हैंलेकिन हमारे पास होते नहीं। हमारे बिलकुल पड़ोस में खड़े होते हैंहमारे शरीर से शरीर लगकर खड़ा होता हैफिर भी हमारे पास होते नहीं हैं। वे किन्हीं और ही शिखरों पर होते हैं। शरीर ही हमारे पास मालूम होता है। उनका अस्तित्व हमारे पास नहीं होता। विद्या से गुजरे हैं वे। शानी हैं।
उपनिषद का यह सूत्र कहता हैअविद्या के अपने गुण हैंविद्या के अपने गुण हैं। अविद्या के अपने गुण हैंअविद्या का अपना उपयोग हैयुटिलिटी है। उपनिषद यह नहीं कहते कि अविद्या को नष्ट कर दो। उपनिषद कहते हैंअविद्या को विद्या मत मानना — बसइतना। ऐसा नहीं है कि आकाश की तरफ बढ़ते चले जाओ और जमीन पर जीयो मत। सच तो यह है कि जिन्हें भी आकाश में ऊपर उठना हैउन्हें भी अपने पैर जमीन पर ही टिकाए रखने पड़ते हैं।
नीत्से ने कहीं कहा है कि जिस वृक्ष को आकाश छूना होउसकी जड़ों को पाताल छूना पड़ता है। जितना ऊंचा जाता है वृक्षउतना ही नीचे भी जाता है। जो वृक्ष आकाश के तारों को छूने की चेष्टा करता हैअभीप्सा करता हैउसकी जड़ों को नीचे,और नीचे उतरते जाना होता है। जितनी गहरी जड़ेंउतना ही ऊपर उठ पाता है।
अविद्या के इनकार में नहीं हैं उपनिषद। यह भी बड़ी भ्रांति हुई। इसे आपसे कहना चाहूंगा। क्योंकि इस भांति के कारण पूरब ने इतना सहा दुखइतनी पीड़ा उठाई हैजिसका कोई हिसाब नहीं है।
उपनिषद को ठीक समझा नहीं जा सका। या तो हम यह भूल करते हैं कि अविद्या को विद्या मान लेते हैं। उपनिषद इसके विरोध में हैं। वे कहते हैंअविद्या विद्या नहीं है — यह डिसटिंक्यानयह भेद—रेखा ठीक से समझ लेना — तो हम दूसरी भूल करते हैं। हम भूल करने की जिद में हैं। या तो हम यह भूल करेंगे या हम विपरीत भूल करेंगे। या तो हम भूल करते हैं कि अविद्या को विद्या मान लेते हैं। अभी हमारे जितने विद्यालय हैंउन सबको अविद्यालय कहा जाना चाहिए उपनिषद के हिसाब से। क्योंकि वहां विद्या का कोई भी संबंध नहीं है। हमारे जो विद्यापीठ हैंवे अविद्यापीठ हैं। और हमारे जो विद्यापीठों के कुलपति हैंवे अविद्याओ के कुलपति हैं। वहां से सिर्फ अविद्या...।
लेकिन उपनिषद अविद्या के विरोध में नहीं हैं। उपनिषद कहते हैंउन्हें विद्या मत समझ लेनाइस भूल में मत पड़ जाना। भेद को साफ समझ लेना। वह अविद्या है और अविद्या का अपना गुण हैअपनी युटिलिटी है। ऐसा नहीं है कि डाक्टर की जरूरत नहीं है। ऐसा नहीं है कि इंजीनियर बेमानी है। ऐसा भी नहीं है कि दुकानदार न हो तो अच्छा है। नहींदुकानदार भी जरूरी हैडाक्टर भीइंजीनियर भीसड़क साफ करने वाला भीमकान बनाने वाला राजगीर भीसब जरूरी हैं। सबकी उपयोगिता है। लेकिन उस आजीविका की विद्या को अगर किसी ने जीवन की कला समझ लियातो भूल हो गई। तो फिर वह सिर्फ रोटी—रोजी कमाएगा और मर जाएगा।
जीसस का वचन हैयू कैन नाट लिव बाई बेड अलोन — सिर्फ रोटी से नहीं जी सकोगे तुम। यद्यपि इसका यह मतलब नहीं है कि रोटी के बिना जी सकोगे तुम। अकेली रोटी से नहीं जी सकोगे तुम। अकेली रोटी भी कोई जीवन होगीजीवन की जरूरत है रोटीजीवन नहीं है। रोटी के बिना जीवन नहीं विकसित हो सकेगानहीं खड़ा रह सकेगालेकिन फिर भी रोटी जीवन नहीं है।
नींव में हम पत्थर भरते हैं मकान के। नींव में भरे हुए पत्थर के बिना मकान खड़ा नहीं होगा। लेकिन ध्यान रखनानींव में भरे हुए पत्थर मकान नहीं हैं। और अगर सिर्फ नींव भरकर आप बैठ गएतो आप इस भांति में मत रहना कि मकान बन गया। इसका यह मतलब भी नहीं है कि नींव नहीं भरी तो मकान बन जाएगा। नींव तो भरनी ही पड़ेगी। वह नेसेसरी ईविल है। वह जरूरी बुराई हैजो करनी पड़ेगी।
उपनिषद कहते हैं कि अविद्या का अपना गुण है। वह गुण हैआजीविका। वह गुण हैजीवन का जो बाह्य रूप हैजो शरीरगत जीवन हैउसको चलाए रखने की व्यवस्था। पर उसे ही सब कुछ मत समझ लेना। वह जरूरी हैलेकिन काफी नहीं है। इट इज नेसेसरीबट नाट इनफ — आवश्यक तो हैपर्याप्त नहीं है। उतने से सब नहीं हो जाएगा।
पूरब के मुल्कों नेविशेषकर भारत ने दूसरी भूल की। कहा कि जब उपनिषद के ऋषि कहते हैंइतनी कहते हैं कि अविद्या है यहतो छोड़ो अविद्या। हम विद्या ही पकड़े। इसलिए पूरब में विज्ञान विकसित न हो पाया। जिसे हमने मान लिया कि अविद्या हैउसे छोड़ दिया। इसलिए पूरब गरीबदीन और दरिद्र और गुलाम हो गया। अविद्या को या तो हम इतना पकड़ने को राजी थे कि आत्महीन हो जाते या हम अविद्या को इतना छोड़ने को उत्सुक हो गए कि शरीर सेबाह्य जीवन से दीन—हीन हो गए।
उपनिषद कहते हैंदोनों की उपादेयता है। दोनों अलग आयाम मेंअलग डायमेंशन में जरूरी हैं। अविद्या की अपनी जगह है। अविद्या छोड़ देने की नहींअविद्या को सब कुछ नहीं मान लेना है। विद्या का अपना गुण है।
और इस सूत्र में एक बात और ऋषि ने कही है कि ऐसा हमने उनसे सुनाजो जानते हैं।
इसे भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है। कहते हैंऐसा हमने उनसे सुना हैजो जानते हैं।
क्या उपनिषद का यह ऋषिजिसने यह वचन कहास्वयं नहीं जानता हैक्या इसने सुना है जोवही कह रहा हैइसे स्वयं पता नहीं हैसुनी हुई बात कही जा रही है?
नहींइस बात को भी थोड़ा ठीक से समझ लेना जरूरी हैक्योंकि इससे बड़ी भ्रांति हुई है। पुराने दिनों मेंजब ये उपनिषद के वचन रचे गएतब अभिव्यक्ति का जो रूप थाउसे समझ लेना चाहिए। कोई भी व्यक्ति कभी ऐसा नहीं कहता था कि मैं जानता हूं। कारण थे उसके। कारण यह नहीं था कि वह नहीं जानता था। कारण यह था कि जानने के बाद मैं नहीं बचता। इसलिए अगर यह उपनिषद का ऋषि कहे कि ऐसा मैं जानकर कह रहा हूं तो उस जमाने के लोग हैसे होते और कहते कि अभी तुम मत कहोक्योंकि अभी तुम जान न सकोगेक्योंकि अभी मैं मौजूद हूं। तो उपनिषद का वह ऋषि जानता है भलीभांतिपर वह कहता हैऐसा हमने उनसे सुना हैजो जानते हैं। और मजा यह हैजिनसे उसने सुना हैउन्होंने भी ऐसा ही कहा है कि यह हमने उनसे सुना हैजो जानते हैं। और जिनके संबंध में वे कह रहे हैंउन्होंने भी ऐसा ही कहा है कि हमने उनसे सुना हैजो जानते हैं।
इसके पीछे राज है। इसके पीछे व्यक्तिगत दावा नहीं है। इसके पीछे कोई इगोइस्टिक क्लेम नहीं है। इसके पीछे ऐसा नहीं है कि मैं जानता हूं। क्योंकि जानने वाले का मैं कहां बचता है। इसलिए कहते हैंजो जानते हैं। औरऔर मजे की बात आपसे कहना चाहूं कि जो जानते हैंउनसे हमने सुना हैइसमें वह व्यक्ति स्वयं भी सम्मिलित हैजो जानते हैं उनमें। यह थोड़ा कठिन पड़ेगा। यह थोड़ा कठिन पड़ेगा।
जैसा मैंने सुबह आपसे कहा कि जब मैं आपसे कुछ कह रहा हूं तो जैसा आप सुन रहे हैंऐसा मैं भी सुन रहा हूं। जो बोलने वाला सुनने वाला भी नहीं हैउस बोलने वाले को कुछ भी पता नहीं है। सत्य रेडीमेड नहीं होतेपूर्व—निर्मित नहीं होते। आविर्भूत होते हैंसहज—जात होते हैंस्पाटेनियस होते हैं। ऐसे ही निकलते हैंजैसे वृक्षों से फूल निकलते हैं और सुगंध निकलती है। तो अगर मैं कुछ आपसे कह रहा हूं तो दो तरह से कहा जा सकता है। एक तो कि मैंने उसे पहले तय किया हो,तैयार किया होफिर आपसे कहूं। तब वह बासा होगा। तब वह ताजा नहीं रहा। तब वह जीवंत भी नहीं रहा। तब वह मुर्दा हो गया। तब वह मरा हुआ हो गया। लेकिन जो आ रहा है वह आपसे कहता हूं तो जिस भांति आप उसे सुन रहे हैं पहली बार,उसी तरह मैं भी सुन रहा हू। तो मैं भी एक श्रोता हूं। आप ही श्रोता हैंऐसा नहींमैं भी फिर श्रोता हूं। तो जो उपनिषद का ऋषि कहता है कि जो जानते हैंउनसे हमने सुना हैइसमें जिन्होंने जाना हैउनसे तो सुना ही हैअगर खुद भी जाना है तो वह भी सुना है। उसके लिए भी ऋषि अपने को श्रोता ही कह रहा हैसुनने वाला ही कह रहा है।
और भी एक कारण है। जब भी कोई व्यक्ति परम सत्य को उपलब्ध होता हैतो परम सत्य ऐसा मालूम नहीं पड़ता कि मैंने बना लिया है। परम सत्य ऐसा मालूम पड़ता है कि मुझ पर उतरा हैअवतरित हुआ है। परम सत्य ऐसा मालूम नहीं पड़ता कि मेरा क्रिएशनमेरा निर्माण है। बल्कि ऐसा मालूम पड़ता है कि मेरे समक्ष एक रिविलेशनएक उदघाटनएक इलहाम।
अगर कोई मोहम्मद से पूछे कि कुरान तुमने लिखी हैतो मोहम्मद कहेंगे कि क्षमा करनाऐसे पाप की बात मुझसे मत कहना। मैंने कुरान सुनी है। मैंने कुरान देखी है। मैंने कुरान लिखी है — सुनकरदेखकर। मैंने नहीं लिखी है।
इसलिए मोहम्मद पैगंबर हैं। पैगंबर का अर्थ है मैसेजर — वन हू हैज डिलीवर्ड दि मैसेजजिसने सिर्फ खबर पहुंचा दी। उसे खबर दी गई थीसत्य उसके सामने प्रगट हुआ थाउसने आकर आपको कह दिया कि सत्य ऐसा है। यह सत्य उसका निर्मित नहीं है। इसलिए हमने ऋषियों को द्रष्टा कहा। स्रष्टा नहीं कहाद्रष्टा कहा। क्रिएटर्स नहींसीअर्स। नहीं कहा कि उन्होंने सत्य का सृजन कियाकहा कि उन्होंने सत्य को देखा। इसलिए हमनेजो उन्होंने देखाउसको दर्शन कहा। चाहे दर्शन हम कहें,चाहे श्रवण हम कहें। यह ऋषि कहता हैसुना है हमने उनसेजो जानते हैं।

वह यह कह रहा है कि सत्य हमसे मुक्त और पृथक है। हम उसे बनाते नहीं हैं। हम उसे निर्माण नहीं करते। हम केवल सुनते हैंजानते हैंदेखते हैं। हम साक्षी भर हैं। साक्षी कहेंद्रष्टा कहेंश्रोता कहें — पैसेविटी पर ध्यान रखें।
ऋषि कह रहा है कि हम पैसिव हैंएक्टिव नहीं। एक तो आप जब कुछ निर्मित करते हैंतो आप एक्टिव होते हैंसक्रिय होते हैं। जब आप कुछ ग्रहण करते हैं...। एक चित्रकार एक फूल बना रहा हैतब वह एक्टिव एजेंट हैतब वह सक्रिय काम कर रहा है। पर एक चित्रकार एक गुलाब के फूल के पास खड़े होकर उसका दर्शन कर रहा हैतब वह पैसिव एजेंट है। तब वह कुछ कर नहीं रहा हैसिर्फ ग्राहक हैरिसेप्टिव है। सिर्फ अपने दरवाजे खुले छोड़ दिए हैं। खिड़कियांद्वार मन के खुले छोड़ दिए। फूल को कहाआ जा! निमंत्रण दे दिया। हृदय पर लटका दिया — स्वागत हैऔर चुप खड़ा हो गया। तब वह रिसेप्टिव है। तब फूल भीतर जाएगाहृदय पर उसकी पखुडियां स्पर्श करेंगीप्राणों में उसकी सुगंध गूंजेगी। तो जो ग्राहक की भांति फूल को अपने भीतर ले गया हैउसके प्राण के कोने—कोने तक फूल समा जाएगा। लेकिन यहां वह जो ग्राहक हैवह पैसिव है। वह सिर्फ ग्रहण कर रहा है।
उपनिषद का यह ऋषि कहता हैऐसा सुना हमने। इसमें वह खबर दे रहा है कि सत्य केवल उन्हें ही उपलब्ध होता है,जो पैसिव हैं। पैसिविटी इज दि डोर — ग्रहणशीलता द्वार है। जैसे कि सूरज निकला है दरवाजे के बाहर। हम सूरज को भीतर ला नहीं सकतेद्वार खोलकर बैठ सकते हैं लेकिन। और द्वार खुला है तो सूरज भीतर आ जाएगा। उसकी किरणें धीरे— धीरे नाचते—नाचते घर के भीतर के कोने तक पहुंचने लगेंगी। तो हम यह नहीं कह सकते कि हम सूरज को घर के भीतर ले आए। ले आनाजरा ज्यादा कहना होगा। हम इतना ही कह सकते हैं कि हमने सूरज को आने में बाधा न दी। हमने द्वार बंद न रखा। हम द्वार खुला करके बैठे। जरूरी नहीं था कि हमारा द्वार खुला होता तो भी सूरज आता। हालांकि यह जरूरी है कि हमारा द्वार बंद होता तो कभी न आता। जरूरी नहीं है कि द्वार खुला हो तो सूरज आए ही। द्वार खुला हो और सूरज न आएतो हम कुछ कर न सकेंगे। लेकिन द्वार न खुला होतो फिर सूरज नहीं आ सकता है। मेरा मतलब समझ रहे हैं आपद्वार खुला हो तो सूरज का आना जरूरी नहीं है। आए उसकी मर्जीन आए उसकी मर्जी। लेकिन द्वार बंद हो तो सूरज का न आना सुनिश्चित है। अब उसकी मर्जी भी हो आने की तो भी नहीं आ सकता। इसका मतलब यह है कि हम अगर चाहें तो सत्य के प्रति अंधे हो सकते हैं। फिर सत्य कुछ भी न कर सकेगा। चाहें तो सत्य के प्रति आंख वाले हो सकते हैं। लेकिन तब सत्य को हम निर्मित नहीं करते हैंसिर्फ दर्शन होता है।
जीवन में जो भी मूल्यवान हैजो भी सुंदर हैजो भी श्रेष्ठ हैजो भी सत्य हैजो भी शिव हैवह सभी ग्राहक मन को उपलब्ध होते हैं। द्वार देने वाला मन उन्हें पाता है। इसलिए ऋषि नहीं कहते ऐसा कि हमनेमैंने...! नहींवे कहते हैंजिन्होंने जानाउनसे हमने सुना। जहां ज्ञान हैवहां से हमने सुना। जहा ज्ञान हैवहां से हमने पाया। इसमें मैं को पूरी तरह पोंछ डालने की आकांक्षा है। इसीलिए तो किसी उपनिषद पर कोई हस्ताक्षर नहीं है। नहीं जानतेकोन बोल रहा हैकोन कह रहा हैकिसका वचन है! कोई हस्ताक्षर नहीं है। कुछ पता नहीं है कि कोन आदमी है जिसने यह कहा! इतने महासत्य बिना हस्ताक्षर के कोई कह गया! असल में महासत्य बिना हस्ताक्षर के ही कहे जा सकते हैं। क्योंकि महासत्य के जन्म के पहले ही वह मिट जाता है।
यह ऋषियों का अपने को बिलकुल हटा देना बीच से! कुछ पता नहीं चलता कि कोन इन वचनों को कहा है। यह भी पक्का नहीं है कि ये वचन एक ही आदमी के हों। इसमें एक वचन एक का हो सकता हैदूसरा दूसरे कातीसरा तीसरे का हो सकता है। लेकिन फिर भी एक मजा है। ये विभिन्न लोगों के वचन हैंफिर भी इनमें एक संगति हैएक हार्मनी हैएक संगीत है। ये कितने ही भिन्न रहे होंगे लोगये एक—एक वचन को अलग—अलग लोगों ने कहा होगालेकिन फिर भी भीतर कहीं गहरे में बिलकुल एक जैसे हो गए होंगे।
कभी जाएं किसी जैन मंदिर मेंतो वहां चौबीस तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। एक मूर्ति में दूसरी मूर्ति में कोई भी भेद नहीं है। तो नीचे थोड़ा सा चिह्न होता हैजिसमें फर्क है। वह हमने अपने हिसाब के लिए निशान लगा रखे हैं। नहीं तो पहचानना मुश्किल होगाकोन महावीर हैंकोन पार्श्वनाथ हैंकोन नेमिनाथ हैंहमने अपनी पहचान के लिए नीचे निशान लगा रखे हैं। नीचे के निशान पोंछ देंफिर मूर्तियां बिलकुल एक जैसी हो जाएंगी। चेहरे भी बिलकुल एक जैसे।
यह बात ऐतिहासिक तो नहीं हो सकती। महावीर का चेहरा पार्श्वनाथ से एक जैसा नहीं हो सकता। और फिर चौबीस तीर्थंकर बिलकुल एक ही शकल—सूरत के हो गए होंयह जरा मुश्किल मालूम पड़ता है। दो आदमी नहीं होते एक शकल—सूरत केतो चौबीस आदमी एक ही शकल—सूरत के खोज लेना तो मिरेकल है! पर क्या जिन्होंने बनाई थीं मूर्तियांउनको इतनी समझ न आई कि किसी दिन कोई हंसेगा और कहेगा कि ये ऐतिहासिक नहीं हैंनहींउनको पूरी समझ थी। लेकिन हमने किन्हीं और भीतरी चेहरों की मूर्तियां बनाई हैंबाहर के चेहरों को छोड्कर। वह एक भीतर एक सिमिलेरिटी है। महावीर के ऊपर के चेहरे में तो निश्चित ही फर्क रहा होगा पार्श्वनाथ से — लंबाईनाक—नक्शआंखचेहरा सब अलग रहा होगा — लेकिन फिर भी एक जगह आती है जिंदगी में जहां मैं खो जाता है। फिर वहां भीतर तो कोई फासला नहीं रह जाताफिर एक फेसलेसनेस — चेहरे से छुटकारा हो जाता है। फिर ऊपर के चेहरे बेमानी हैं।
इसलिए हमने ऊपर की मुर्तियां नहीं बनाई हैं। वह मूर्तियां भीतर की सिमिलेरिटीवह भीतर की जो समता हैवह भीतर का जो एक जैसा पन हैउसकी फिकर की है। इसलिए एक जैसी मूर्तियां हैं।
ये उपनिषद के वचन अलग—अलग लोगों के हैं। और कुछ आश्चर्य न होगा कि यह भी हो सकता है कि दो कड़ी का जो पद हैउसमें एक कड़ी एक की हो और दूसरी दूसरे की हो।
ऐसा हुआ। अंग्रेजी का महाकवि कूलरिज मरा तो उसके घर में चालीस हजार कविताएं अधूरी मिलीं। मरने के पहले उसके मित्रों ने बहुत बार कूलरिज को कहा कि इतनी अद्भुत कविताएं अधूरी क्यों छोड़ रखी हैं! ये तुम पूरी कर दो। तुमसे बड़ा महाकवि दुनिया में नहीं होगा। चालीस हजार कविताएं अधूरी! इनको तुम पूरा कर दो। किसी में तीन पंक्तियां हैंचौथी नहीं है। किसी में सात पंक्तियां हैंआठवीं नहीं है। किसी में ग्यारह पंक्तियां हैंबारहवीं नहीं है। एक पंक्ति के पीछे अटकी है। तुम पूरी क्यों नहीं कर देते?
कूलरिज ने कहा कि ग्यारह ही आईंबारहवीं की मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं दस वर्ष हो गए। अभी बारहवीं पंक्ति आई नहीं,तो मैं कैसे जोडूकभी किसी को आ जाएगी तो जोड देगा। आती नहीं है। मैं चाहूं तो बना सकता हूं लेकिन वह झूठी होगी। वह लकड़ी की टांग हो जाएगी। असली आदमी में लकड़ी की टांग हो जाएगी। ये ग्‍यारह पंक्तियां तो जिंदा हैंये उतरी हैं। ये मैंने बनाई नहीं। किसी रिसेप्टिव मोमेंट मेंकिसी ग्राहक क्षण में मुझ पर आ गईं। मैंने उनको नीचे लिख दिया। बारहवीं अभी तक नहीं आई। अब मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं। अगर इस जिंदगी में आ गई तो जोड़ दूंगाअन्यथा इनको छोड़ जाऊंगा। कभी किसी और की जिंदगी में आ सकती है। कोई और किसी दिन द्वार बन जाएबारहवीं पंक्ति वह जोड़ देगा।
जरूरी नहीं है कि इसमें दो पंक्तियां एक ही व्यक्ति की हों। ये उन व्यक्तियों की पंक्तियां हैंजिन्होंने अपनी तरफ से कुछ नहीं लिखा। जो उन पर उतर आया हैउसे कह दिया। इसलिए निश्चित रूप से यह कहना ऋषि का कि सुना हमनेजो जानते हैं वे ऐसा कहते हैं — संपूर्ण रूप से निरहंकार मनोदशा की स्वीकृति हैसूचना हैखबर है। मैं नहीं हूं सिर्फ एक द्वार है — इसकी घोषणा है।


विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्यु तीर्त्वा विद्ययाध्मृतमश्नुते।। 11।।


जो विद्या और अविद्या—इन दोनों को ही एक साथ जानता हैवह
अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमरत्व प्राप्त कर लेता है।। 11।।


दोनों को जानता है जोअविद्या को भी और विद्या को भीवह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमृत को जान लेता है।
बड़ी अनूठी कड़ी है। कहा मैंने कि उपनिषद अविद्या के विरोधी नहीं हैं। विद्या के पक्षपाती हैंअविद्या के विरोधी जरा भी नहीं हैं।
कहा हैअविद्या को जानता है जोवह अविद्या से मृत्यु को पार कर लेता है।
अविद्या की सारी लड़ाई मृत्यु से है। एक डाक्टर लड़ रहा है मृत्यु सेएक इंजीनियर लड़ रहा है मृत्यु से। हमारी सारी साइंस लड़ रही है मृत्यु से। हमारा सारा व्यवसाय जीवन का लड़ रहा है मृत्यु सेबीमारी सेअसुरक्षा सेखतरे से। जीवन मिट न जाएउसके बचाने में लगी है सारी अविद्या। सारी अविद्या का संघर्ष मृत्यु से है। तो जो अविद्या को जानता हैवह मृत्यु को पार कर लेता है। वह जी लेता है ठीक से।
तो अविद्या से मृत्यु को पार कर लेना। लेकिन अविद्या से अमृत न मिलेगा। सिर्फ मृत्यु पार होती रहेगी। अविद्या से सिर्फ हम जी लेंगे। लेकिन जीवन का सार नहीं मिलेगामात्र जी लेंगे। कहना चाहिए — वेजीटेशन। गुजर जाएंगे जिंदगी के रास्ते से। भोजन मिल जाएगामकान मिल जाएगादवा मिल जाएगीऔषधि मिल जाएगीसब मिल जाएगा। जिंदगी ठीक से गुजर जाएगीसुविधा से गुजर जाएगीलेकिन अमृत न मिलेगा। अगर किसी दिन अविद्या मृत्यु को बिलकुल रोक देतो भी अमृत नहीं मिलेगा।
अभी विज्ञान इस चेष्टा में संलग्न है। असल में विज्ञान का सारा संघर्ष ही मृत्यु से बचाव के लिए है। इसलिए विज्ञान सदा ही उत्सुक है कि किस भांति मृत्यु को टाला जाए। अंतहीन टाला जा सके। और किसी दिन ऐसी स्थिति आ जाए कि हम मृत्यु को चाहें तो सदा के लिए टाल सकें। अगर पिछले तीन हजार साल के अविद्या केवितान के विकास को हम समझेंतो सारा संघर्ष मृत्यु से है। और विज्ञान उसमें बहुत दूर तक सफल भी हुआ है। आज से हजार साल पहले दस बच्चे पैदा होते थे तो नौ मर जाते थे।
आज जिन मुल्कों में विज्ञान प्रभावी हो गया हैवहां दस बच्चे पैदा होते हैं तो एक मरता हैनौ बचते हैं। दस हजार साल पुरानी हड्डियां जो मिली हैंतो एक भी हड्डी ऐसी नहीं मिलीजिसकी उम्र पच्चीस साल से ज्यादा रही हो। यानी जिसकी वह हड्डी हैवह आदमी पच्चीस साल से ज्यादा उम्र का नहीं था। दस हजार साल पुरानी एक भी हड्डी नहीं मिली पूरी पृथ्वी पर कि दस हजार साल पहले कोई आदमी की हड्डी बची हो जो पच्चीस साल से ज्यादा जीया हो।
आज सोवियत रूस में एक हजार आदमियों से ऊपर लोग डेढ़ सौ वर्ष के ऊपर हैं। सौ वर्ष सामान्य बात हुई चली जाती है। इसलिए आपको कभी—कभी हैरानी होती है कि अखबार में खबर आ जाती है कि रूस में किसी नब्बे वर्ष के बूढ़े ने विवाह कियातो हमें बड़ा ऐसा लगता है कि का बड़ा नासमझ है। आपको पता होना चाहिए कि का अभी बूढ़ा नहीं हैऔर कोई बात नहीं है। नब्बे वर्ष का बूढ़ा जब शादी करता है तो आप अपने बूढ़े से हिसाब मत लगानाआपका बूढ़ा तो बीस साल पहले मर चुका होगा। वह नब्बे साल का बूढ़ा उस कोम में हैजहां डेढ़ सौ वर्ष तक उम्र खींची जा सकती है। तो जब डेढ़ सौ वर्ष तक उम्र खिंच जाएतो आप जवानी का वक्त कब तक रखिएगाकम से कम सौ साल तो मानिएगा!
तो जहां—जहां वितान सफल हुआ है वहां मौत को धक्के दिए गए हैं। और अभी सफलता, और बढ़ती चली जाती है। अब इसमें कुछ बहुत असंभावना नहीं दिखती कि हम आदमी के शरीर कोबहुत शीघ्रइस सदी के पूरे होते—होते इस स्थिति में आ जाएंगे कि अगर जिलाए रखना चाहेंतो कोई कारण नहीं होगा कि हम न जिला सकें। अंतहीन भी जिलाया जा सकता है।
इसलिए भी पश्चिमविशेषकर अमरीका के कुछ विचारकों में एक बात चलनी शुरू हुई हैविचार तीव्र हुआ हैऔर वह यह कि इसके पहले कि वैज्ञानिक सफल हो जाएं आदमी की उम्र को लंबा करने मेंहमें प्रत्येक आदमी को मरने का जन्मसिद्ध अधिकार हैयह कांस्टीटचूशन में जोड़ लेना चाहिए। नहीं तो बहुत मुश्किल होगी। क्योंकि अगर कोई सरकार किसी आदमी को न मरने देना चाहेतो उस आदमी का कोई हक नहीं होगा। अभी तक हमने दुनिया में कानून बनाए थे कि किसी आदमी को मारने का हक नहीं है। लेकिन अभी सारी दुनिया के विशेष मुल्कों मेंजहां विज्ञान सफल हो रहा है जीवन को लंबा करने में — जैसा कि स्विट्जरलैंड में या स्वीडन में या नावें में — जहां उम्र बहुत ऊपर चली गईतो वहां अथनासिया के लिए आदोलन चलता है। वहां के विचारशील लोग जोर से एक आदोलन चला रहे हैं कि जो आदमी मरना चाहता हैउसे कोई डाक्टर बचाने के लिए हकदार नहीं है। और अगर कोई डाक्टर बचाता है तो वह उस व्यक्ति के मौलिक सिद्धात परजीवन के अधिकार पर हमला करता है।
क्योंकि खतरनाक है। एक आदमी डेढ़ सौ साल का हैअब डेढ़ सौ साल का आदमी शायद ही और जीना चाहे। अगर बिलकुल ही बुद्धिहीन हो तो बात अलग है। नहीं तो डेढ़ सौ साल का आदमी अब चाहेगा कि विश्राम करेविदा हो जाए। लेकिन डाक्टर उसको चाहें तो अस्पतालों में उसे लटकाए रख सकते हैं। उसे जिंदा रख सकते हैं। और डाक्टरों को भी अभी हक नहीं है किसी को मरने में सहायता देने का। इसलिए डाक्टर भी यह नहीं कह सकते कि हम मरने में सहायता दें। हम तो पूरी कोशिश करेंगे तुम्हें बचाने कीतुम मर जाओ वह बात अलग है। इसलिए आंदोलन चलता है कि हम आदमी को मरने का हक दे देंकि कोई आदमी अगर तय कर ले कि मुझे मरना है तो उसे कोई रोक नहीं सकेगा।
यह बहुत जल्दी अर्थपूर्ण बात हो जाएगी। क्योंकि आदमी के शरीर में अब तक ऐसी कोई बात नहीं पाई जा सकी है,जिसके कारण मृत्यु अनिवार्य हो। अगर मृत्यु घटित होती है तो उसका कुल कारण इतना है कि आदमी के शरीर के हिस्से अभी रिप्लेसेबिल नहीं हो सके हैं। हम उसके कुछ पार्ट्स को अभी बदल नहीं पाते हैं इसलिए तकलीफ है। जैसे—जैसे हम उसके शरीर के हिस्सों को बदलने में समर्थ होते चले जाएंगेवैसे—वैसे आदमी को मरना अनिवार्यता नहीं रह जाएगीस्वेच्छा का कृत्य हो जाएगा। ध्यान रखिएबहुत शीघ्र दुनिया में कोई आदमी सिवाय दुर्घटना के अतिरिक्त अपने आप नहीं मरेगा। तो दुनिया में मृत्यु कम और आत्मघात — वह आत्मघात होगा जब आदमी डाक्टर को कहेगामुझे मार डालो — आत्मघात सामान्य प्रक्रिया मृत्यु की हो जाएगी।
उपनिषद बहुत प्राचीन समय में यह कहते हैं कि अविद्या से मृत्यु के पार...। मृत्यु को जीता भी जा सकता है अविद्या से। अभी जो पश्चिम का चिकित्सा—शास्त्र कर रहा हैवह उपनिषद घोषणा करते हैं। वे कहते हैंअविद्या से मृत्यु को जीता भी जा सकता है। इतने दूर हटाई जा सकती है मौतक्योंकि मौत... भीतर हमारे जो तत्व है उसकी तो कोई मौत होती नहीं। मौत होती है हमारे शरीर की। फिर हमारे भीतर के तत्व को नया शरीर ग्रहण करना पड़ता है। अगर हम पुराने शरीर को ही काम योग्य बनाए रख सकेंतो नए शरीर को ग्रहण करने की कोई जरूरत नहीं है। और नया शरीर ग्रहण करना बहुत नान—इकनामिकल हैबहुत गैर— आर्थिक है।
क्योंकि एक का आदमी मरता है। आप सोचें कि प्रकृति को इकनामी नहीं आती। असल में प्रकृति को कोई अर्थशास्त्र का अनुभव नहीं है। बच्चों को पैदा करती हैबूढ़ा को मार देती है। के हमारे सब सीखे—सिखाएसारी मेहनत किए हुएऔर बच्चे पैदा कर देती है बिलकुल बिना सीखे हुएबिलकुल बेकाम। जिनके साथ हमने सत्तर साल मेहनत कीजिनमें किसी तरह थोड़ी—बहुत बुद्धि की मात्रा आईउनको समाप्त कर देती है और फिर निर्बुद्धियों को पैदा कर देती है। उनको फिर हम बड़ा करें। बहुत नान—इकनामिकल है! इकनामिकल तो यही होगा कि सत्तर साल का आदमी मरने न दिया जाएक्योंकि सत्तर साल का अनुभव खोता है व्यर्थ। और सत्तर साल का आदमी मरेगाफिर नया जन्म लेगा — फिर बीस साल शिक्षापच्चीस साल शिक्षा पे व्यतीत होंगेतब कहीं वह फिर उस स्थिति में आ पाएगा मुश्किल सेजिस स्थिति में मरा था। यह व्यर्थ है। तो विज्ञान,अविद्याइस दिशा में संलग्न रही है। और वह इस चेष्टा में है कि हमयह जो अपव्यय होता हैइसे रोकें।
अगर हम आइंस्टीन को बचा सकेंतो बड़ा अपव्यय बचेगा। और आइंस्टीन अगर तीन सौ साल जिंदा रह सकेतो दुनिया के ज्ञान में जो वृद्धि होगीवह आइंस्टीन तीन दफे जन्म ले तो नहीं होगी। क्योंकि यह तीन सौ साल की कंटीन्युअस प्रौढ़ता होगी। और बार—बार इसमें बीच में डिस्कंटीन्यूटी नहीं होगी। बीस—बीसपच्चीस—पच्चीसतीस—तीस साल का गैप बीच में आकर नष्ट नहीं करेगा। तो अगर आइंस्टीन को हम तीन सौ साल जिंदा रख लेंतो आइंस्टीन ज्ञान में इतनी वृद्धि कर जाएगाजिसका कि कोई हिसाब नहीं है।
और ज्ञान का कोई अंत नहीं है। मनुष्य का एक छोटा सा मस्तिष्कइस छोटे से मस्तिष्क में कोई पचास करोड़ सेल हैं,और एक—एक सेल की इतने ज्ञान को संरक्षित करने की क्षमता है कि वैज्ञानिक कहते हैं कि अभी पृथ्वी पर जितने पुस्तकालय हैंएक व्यक्ति के मस्तिष्क में सब समाए जा सकते हैं। पचास करोड़ कोष्ठ इतनी बड़ी शक्ति है कि सारी पृथ्वी पर जितना ज्ञान है अभीवह एक व्यक्ति उसका मालिक हो सकता है। यह दूसरी बात है कि हमारे पास अभी इतना ज्ञान उस व्यक्ति के भीतर डालने की व्यवस्था नहीं है। हमारे डालने की व्यवस्था बहुत आदम है।
एक बच्चे को सिखाते हैंबीस साल लग जाते हैंतब कहीं उसको बीए. करवा पाते हैं। कुछ हल नहीं होता। बीस साल शिक्षा देने के बाद इतना ही हो पाता है कि हम कह सकते हैं कि यह आदमी अशिक्षित नहीं है। बसइतना ही हो पाता है। कुछ खास हो नहीं पाता। सत्तर साल भी शिक्षा देंतो भी कुछ बहुत विशेष नहीं होने वाला है। ज्ञान इतना है और उस ज्ञान को व्यक्ति के मस्तिष्क में डालने की सुविधा और व्यवस्था अभी इतनी नहीं है। इसलिए बड़ी नई व्यवस्थाएं खोजी जा रही हैं कि शिक्षण के नए प्रयोग खोज लिए जाएं।
तो रूस में स्लीप टीचिंग पर भारी काम चलता है कि बच्चे को दिन में पढ़ाना और रातभर वह बेकार सोया रहता हैतो रात के बारह घंटे खराब चले जाते हैंतो रात टेप लगाकर उसके कान मेंरातभर वह सोया रहे और टेप रातभर उसको शिक्षा भी देता रहे। नींद को भी शिक्षा के लिए माध्यम बनाने के बड़े उपाय चलते हैंऔर दूर तक सफलता मिली है। और बहुत जल्दी जो शिक्षा अभी हम पंद्रह वर्ष में दे पाते हैंवह हम सात वर्ष में दे पाएंगे। क्योंकि रात का भी उपयोग कर लेंगे। और भी सुविधा की बात है कि शिक्षक जब जागते में बच्चे को शिक्षा देता है तो बच्चे और शिक्षक के अहंकार में संघर्ष खड़ा हो जाता हैजिसकी वजह से बहुत बाधा पड़ती है। नींद में कोई संघर्ष खड़ा नहीं होताशिक्षा सीधी आत्मसात हो जाती है। शिक्षक होता ही नहीं। विद्यार्थी भी नहीं होता। विद्यार्थी सोया होता हैशिक्षक मौजूद नहीं होता। सिर्फ टेप—रिकार्डर होता है। वह धीरे— धीरे रातभर में बच्चे में शिक्षा डाल देता है। बच्चा उसको सीधा स्वीकार कर लेता है।
अविद्या के द्वारा मृत्यु को जीता जा सकता हैयह उपनिषद की घोषणा समस्त विज्ञानपीठो के ऊपर लिख दी जानी चाहिए। और उपनिषद का ऋषि ऐसा कहता है कि अविद्या से मृत्यु को जीता जा सकता हैक्योंकि मृत्यु सिर्फ शारीरिक दुर्घटना है। शरीर को अगर हम थोड़ी व्यवस्था दे सकें तो मृत्यु लंबाई जा सकती हैदूर तक ढकेली जा सकती है। कोई अड़चन नहीं है।
अभी अमरीका में एक आदमी मरा है पंद्रह वर्ष पहले। लेकिन अभी तक कोई आदमी मर जाए तो उसे वापस पुनरुज्जीवित करने के विज्ञान के पास उपाय नहीं हैं। लेकिन वैशानिकों का खयाल है कि 198० के पूरे होते—होते हमारे पास उपाय होंगे कि कोई व्यक्ति मर जाए तो हम उसे रिवाइव कर लें। तो वह आदमी दस करोड़ डालर की वसीयत करके गया है कि मेरी लाश को कम से कम 198० तक पूरी तरह सुरक्षित रखा जाएक्योंकि 198० में रिवाइव मैं हो सकूं। तो रोज कोई एक लाख रुपया खर्च उसकी लाश को बिलकुल वैसा ही सुरक्षित रखने में किया जा रहा है कि उसमें रत्तीभर फर्क न पड़े। जैसा वह मरने के क्षण में थावैसा ही 198० तक उसकी लाश को ले जाया जा सके — ठीक वैसा ही। ताकि 198० मेंजब कि विज्ञान हमारे हाथ में आ जाएहम उसके शरीर को वापस पुनरुज्जीवन दे सकें।
इससे अध्यात्मवादी बहुत घबराते हैं। वे कहते हैंअगर ऐसा हो गया तो इसका मतलब हुआ फिरफिर आत्मा का क्या हुआअगर 198० में यह आदमी जिंदा हो जाएतो फिर आत्मा का क्या हुआ?
लेकिन यह आदमी एक ही शर्त पर जिंदा हो सकेगा। विज्ञान शरीर को रिवाइव कर लेइतना जरूरी है हिस्सालेकिन पर्याप्त नहीं। अगर उसकी आत्मा भटकती हो अभी तक और नए शरीर को ग्रहण न किया होतो प्रवेश कर जाएगी। और मुझे लगता हैइस आदमी की भटकेगी। इतनी बड़ी वसीयत करके गया है। दस करोड़ डालर का मामला हैकोई छोटा मामला नहीं है। आदमी भटकेगा। वह बीस साल प्रतीक्षा करेगा। और अगर शरीर उसका पुनरुज्जीवित हो सकता है तो वह वापस पुनर्प्रवेश कर जाएगा। ऐसे ही जैसे मकान गिर जाएफिर बन जाएहम घर में वापस आ जाते हैं।
अविद्या से मृत्यु को जीता जा सकता हैलेकिन अमृत को नहीं पाया जा सकता। यह दूसरा सूत्र और भी जरूरी है। मृत्यु को भी जीत ले किसी दिन विज्ञान और हम आदमी को इस हालत में कर दें कि वह करीब—करीब इम्मार्टल हो जाएन मरेतो भी क्या हुआतो भी अमृत का कोई अनुभव नहीं हुआ। तो भी हमने उसे नहीं जानाजो अमृत है। तब भी हम उसी को जान रहे हैंजो सत्तर साल जीता थाअब सात सौ साल जीता है। तब सत्तर साल जीता थाअब सात हजार साल जीता है। लेकिन जो जीने के भी पहले था, जन्म के भी पहले था और जो मरने के बाद भी बच जाता हैउसका हमें कोई अनुभव नहीं है। अमृत को तो जानना हो तो विद्या से ही जाना जा सकता है।
इसलिए उपनिषद अविद्या को बड़ी कीमत देते हैं। मृत्यु से संघर्ष में वही उपाय है। लेकिन अमृत की उपलब्धि में वह उपाय नहीं है। मृत्यु से संघर्ष एक निगेटिवएक नकारात्मक प्रक्रिया है। अमृत की उपलब्धि एक विधायकएक पाजिटिव अचीवमेंट हैएक विधायक उपलब्धि है। अमृत की उपल्ब्धि उसे जानने की चेष्टा हैजो जन्म के पहले भी था और जो मैं मर जाऊं तो भी रहेगा। जो अभी भी हैकल भी थापरसों भी था। जब यह देह नहीं थी तब भी था और जब यह देह नहीं रहेगी तब भी होगा। उसे जानना अमृत की उपलब्धि है। और इस शरीर को खींचे चले जाना मृत्यु से संघर्ष है। इस शरीर को लंबाए चले जानाजन्म और मृत्यु की सीमा को बड़ा किए चले जाना मृत्यु से संघर्ष है। और जन्म और मृत्यु के जो पार हैउसकी अनुभूति में उतर जाना अमृत की उपलब्धि है।
अमृत की उपलब्धिउपनिषद कहते हैंविद्या से होगी।
इस विद्या के दो—चार सूत्र भी समझ लेने चाहिए। इस अमृत की उपलब्धि की विद्या का सूत्र क्या होगा?
पहली बातजो व्यक्ति भी सोचता है कि मैं शरीर हूं वह कभी अमृत की दिशा में गति नहीं कर पाएगा। इसलिए विद्या का पहला सूत्र हैशरीर से तादात्म्य छिन्न—भिन्न कर लेना। जानते रहना निरंतरस्मरण करना निरंतरबार—बार होश रखना,पुनः—पुन: खयाल में लाना — मैं शरीर नहीं हूं। यह जितना गहरा बैठ जाए कि मैं शरीर नहीं हूं उतना ही अमृत की दिशा में गति हो पाएगी और जितना यह गहरा बैठ जाए कि मैं शरीर हूं उतनी ही अविद्याउतनी ही मृत्यु से संघर्ष की सूँत्रा चलेगी।
और जैसा जीवन हैउसमें मैं शरीर हूँ यह चौबीस घंटे स्मरण आता है। पैर में जरा चोट लगीस्मरण आता हैमैं शरीर हूं। पेट में जरा भूख लगीस्मरण आता हैमैं शरीर हूं। सिर में जरा दर्द हुआस्मरण आता हैमैं शरीर हूं। बुखार आ गया,स्मरण आता हैमैं शरीर हूं। बुढ़ापा उतरने लगास्मरण आता हैमैं शरीर हूं। जवानी उठने लगीस्मरण आता हैमैं शरीर हूं। सब तरफ जीवन मेंसब तरफ से इशारा मिलता है कि मैं शरीर हूं। इसका तो कोई इशारा नहीं मिलता कहीं से कि मैं शरीर नहीं हूं। और मजा यह है कि वही सत्य हैजिसका कोई इशारा नहीं मिलताऔर वही असत्य हैजिसके लिए रोज इशारे मिलते हैं।
लेकिन इशारे मिलते हैं इसलिए कि हमारे इशारे समझने मेंइशारों को डी—कोड करने में बड़ी बुनियादी भूल हो रही है। कुछ कहा जाता हैकुछ हम समझते हैं। बड़ी मिसअंडरस्टैंडिंग है। पूरीजिंदगी एक बड़ी मिसअंडरस्टैंडिग है। इशारे कुछ और कहते हैंहम कुछ और समझते हैं। कहा कुछ और जाता हैहम अर्थ कुछ और निकालते हैं। पेट में लगती है भूखतब मैं कहता हूं मुझे भूख लगी है। गलत। हमनेजो सूचना मिलीउसका गलत अर्थ लिया। सूचना केवल इतनी थी कि मुझे पता चल रहा है कि पेट में भूख लगी है। मुझे पता चल रहा है कि पेट में भूख लगी हैसूचना कुल इतनी है। लेकिन हम कहते हैंमुझे भूख लगी है। हम कैसे इस नतीजे पर पहुंचते हैंआज तक कोई नहीं बता पाया। यह बीच का हिस्सा कैसे गिर जाता है! मुझे पता चलता है कि पेट में भूख लगी है। मुझे भूख कभी नहीं लगती। लेकिन मैं कहता हूं मुझे भूख लगी है। सिर में दर्द होता हैतब मुझे पता चलता है — पता चलता है मुझे — कि सिर में दर्द हो रहा है। लेकिन मैं कहता हूं मेरे सिर में दर्द हो रहा है। ऐसा भी मैं बाहर कहता हूं कि मेरे सिर में दर्द हो रहा हैभीतर तो मैं ऐसा कहता हूं मुझमें दर्द हो रहा है।
शरीर की सूचनाओं में भूल नहीं है। शरीर की सूचनाओं को जब हम डी—कोड करते हैं। जब उसकी सूचनाओं को हम समझने की चेष्टा में व्याख्या करते हैंतब भूल हो जाती है। व्याख्या में भूल है।
स्वामी राम निरंतर ठीक—ठीक बोलते थे। तो लोग उन्हें पागल समझने लगे। पागलों की दुनिया है। वहां कोई ठीक—ठीक आदमी हो तो पागल समझ लिया जाएअड़चन नहीं है। राम कभी नहीं कहते थे कि मुझे भूख लगी है। कभी वह कहते कि सुनो भाईइधर भूख लगी है। थोड़ी सी हैरानी हो जाती कि दिमाग खराब हो गया! आपका दिमाग तो ठीक हैतो ठीक कह रहा है बेचारातो दिमाग ठीक हैयह सवाल उठता है। कभी आकर घर कहते कि आज बड़ा मजा आया। रास्ते से गुजरते थेकुछ लोग राम को गाली देने लगे। राम को — यह नहीं कहते कि मुझको। यह नहीं कि मैं निकलता थामुझे लोग गाली देने लगे। कहते कि कुछ लोग मिल गएबड़ा मजा आयाराम को गाली देने लगे। हम भी सुनते थे। हमने कहादेखो राम! मिला मजा!
पहली बार जब स्वामी राम अमरीका गए और जब ऐसा बोलने लगे थर्ड पर्सन मेंतो बड़ी कठिनाई हुई। यहां तो उनके मित्र उनको जानते थे कि ठीक हैइनका दिमाग थोड़ा...! लेकिन वहां बड़ी मुश्किल हुईलोग बिलकुल समझ ही न पाएं कि वे क्या कह रहे हैं। लेकिन वही ठीक कहते हैं। वह बिलकुल ही ठीक कहते हैं। पेट को ही भूख लगती हैआपको कभी भूख नहीं लगी। आज तक नहीं लगी। लग नहीं सकती। क्योंकि आत्मतत्व में भूख का कोई उपाय नहीं है। आत्मतत्व के पास भूख का कोई यंत्र नहीं है। आत्मतत्व के पास भूख की कोई सुविधा नहीं है। आत्मतत्व में न कुछ कम होतान ज्यादा होता। आत्मतत्व के लिए कोई कमी नहीं होती जिसको पूरा करने के लिए भूख लगे। शरीर में रोज कमी होती है। क्योंकि शरीर रोज मरता है। असल में मरने की वजह से भूख लगती है।
अब आपको यह बहुत हैरानी लगेगी कि आप चूंकि रोज मर जाते हैंइसलिए जितना हिस्सा मर जाता है उसको रिप्लेस करना पड़ता है भोजन से। और कुछ नहीं है। आपके भीतर कुछ हिस्सा मर जाता है। उस मरे हुए हिस्से को आपको वापस जीवित हिस्से से पूरा करना पड़ता हैतब आप जिंदा रह पाते हैं।
इसीलिए तो एक दिन उपवास कर लेंतो एक पौंड वजन कम हो जाता है। क्या हुआवह एक पौंड हिस्सा आपका मर गया। उसको आपने रिप्लेस नहीं किया। उसको फिर से स्थापित करना पड़ेगा। इसलिए वैज्ञानिक कहते हैं कि एक आदमी नब्बे दिन तक भूखा रह सकता है। इससे ज्यादा मुश्किल पड़ जाएगा। क्योंकि नब्बे दिन तक उसके भीतर अर्जित, इकट्ठी चर्बी होती हैजितने से वह अपना काम चला सकता है। मरता जाएगा और पूरा करता रहेगा भीतर। कमजोर होता जाएगावजन कम होता जाएगाजीर्ण— क्षीण होता चला जाएगालेकिन जिंदा रह लेगा।
भोजन से हम अपने मरे हुए तत्व की कमी पूरी कर देते हैं। जो कमी हो गई हैउसको पूरा कर देते हैं। लेकिन आत्मा तो मरती नहींउसका कोई तत्व कम नहीं होताइसलिए आत्मा को भूख का कोई कारण नहीं। पर एक और मजे की बात है। आत्मा को भूख नहीं लगतीशरीर को भूख पता नहीं चलती। शरीर को भूख लगती हैआत्मा को भूख पता चलती है।
यह करीब—करीब मामला वैसा ही है जैसा एक बार आपको पतही होगाएक जंगल में आग लग गई थी। और एक अंधे और लंगड़े को जंगल के बाहर निकलना पड़ा था। अंधा देख नहीं पाता था। आग थी भयंकर। चल तो सकता थापैर मजबूत थे,लेकिन चलना खतरनाक था। जहां खड़ा थाकम से कम वहां अभी आग नहीं थी। अंधा आदमी भागेबचने का उपाय करेऔर जल जाए! पास में लंगड़ा भी थावह चल नहीं सकता था। बेशक उसको दिखाई पड़ता था कि आग आ रही है।
वह अंधे और लंगड़े समझदार रहे होंगेजैसा कि सामान्य रूप से अंधे और लंगड़े रहते नहीं। समझदार इतने होते नहीं। आंख वाले नहीं होतेअंधे कैसे होंगे! पैर वाले नहीं होतेतो लंगड़े कैसे होंगे!
उन दोनों ने एक समझौता कर लिया। लंगड़े ने कहा कि अगर बचना है हमें तो एक ही रास्ता है कि मैं तुम्हारे कंधों पर आ जाऊं। तुम्हारे पैर का उपयोग करोमेरी आंख का। मैं देखूंगातुम चलोतो हम बच सकते हैं। बच गए वे। आग के बाहर निकल आए।
जीवन के बाहरआत्मा और शरीर की जो यात्रा है जीवन के भीतर और बाहरवह अंधे—लंगड़े की यात्रा है। वह एक गहरा समझौता है। आत्मा को अनुभव होता हैघटना कोई नहीं घटती। शरीर में घटनाएं घटती हैंअनुभव कोई नहीं होता। अनुभव सब आत्मा को होते हैंघटनाएं सब शरीर में घटती हैं। इसीलिए तो उपद्रव हो जाता है। इसलिए उपद्रव ऐसे ही हो जाता है। उस दिन भी शायद हुआ होगा। कहानी में ईसप ने लिखा नहीं है। जिसने यह कहानी लिखी है अंधे—लंगड़े कीउसने लिखा नहीं हैलेकिन हुआ जरूर होगा। जब अंधा तेजी से दौड़ा होगा और लंगड़े ने तेजी से देखा होगा — दोनों को तेजी की जरूरत थीआग थी जंगल में — तो यह पूरी संभावना है कि अंधे को ऐसा लगा हो कि मैं देख रहा हूं और लंगड़े को ऐसा लगा हो कि मैं भाग रहा हूं। इसकी बहुत संभावना है।
बसवैसा ही हमारे भीतर घट जाता है। इसको तोड़ना पड़ेगा। इसको अलग—अलग करना पड़ेगा। ये उलझे तार हैं। शरीर में सब घटनाएं घटती हैंआत्मा सब अनुभव करती है। इन दोनों को अलग—अलग कर लेंतो विद्या का सूत्र पकड़ में आने लगे। अमृत की यात्रा शुरू हो जाए।
बसआज के लिए इतना ही। फिर कल सुबह।
अब अमृत की यात्रा पर निकलें।

दो—तीन बातें आपसे कह दूं। आज चूंकि हाल हैइसलिए परिणाम बहुत ज्यादा होंगे। बंद है जगहतो इतने लोगों के प्राणों की आकांक्षा और संकल्प के वाइब्रेशंसइतनी तरंगें बहुत व्यापक परिणाम लाएंगी। कोई भी बच नहीं सकेगा। फिर तीन दिन भी हो गए हैंतो गहराई बढ़ेगी। जो पीछे रह गए होंआज अगर खुद न भी चल पाते होंतो दूसरों की तरंगों पर सवारी कर जाएं। लेकिन आज कोई खड़ा न रह जाए।
जो मित्र देखने ही आ गए होंवे कृपा करके बाहर निकल जाएं। कोई व्यक्ति देखने वाला भीतर न रहेउसे नुकसान हो सकता है। जो देखने आ गया होवह चुपचाप बाहर निकल जाए। भीतर तो वही लोग रहेंगे जो करेंगे।
आज इतना ही।

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