बुधवार, 5 जून 2019

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--13

ओम शांति शांति शांति

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

ओम पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
                  ओम शांति: शांति: शांति:।

ओम वह पूर्ण है और यह भी पूर्ण हैक्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बच रहता है।
                  ओम शांतिशांतिशांति।

जीवन का शाश्वत नियम हैजहां से होता है प्रारंभवहीं होती है परिणति। जो है आदिवही है अंत। जीवन के इसी शाश्वत नियम के अंतर्गत ईशावास्य जिस सूत्र से शुरू होता हैउसी सूत्र पर पूर्ण होता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। सभी यात्राएं वर्तुल में हैं। दि फर्स्ट स्टेप इज दि लास्ट आलसो। पहला कदम आखिरी कदम भी है।

जो ऐसा समझ लेते हैं कि पहला कदम आखिरी कदम भी हैवे व्यर्थ की दौड़— धूप से बच जाते हैं। जो जानते हैंजो प्रारंभ है वही अंत भी हैवे व्यर्थ की चिंता से बच जाते हैं। पहुंचते हैं हम वहींजहां से हम चलते हैं। यात्रा का जो पहला पड़ाव हैवही यात्रा की अंतिम मंजिल है। इसलिए बीच में हम बिलकुल आनंद से चल सकते हैं। क्योंकि अन्यथा कोई उपाय नहीं है। हम वहां नहीं पहुंचेंगे जहां हम नहीं थे। हम वहां पहुंचने की कितनी ही चेष्टा करेंहम वहां नहीं पहुंचेंगे जहां हम नहीं थे। हम वहीं पहुंचेंगेजहां हम थे। 
इसे ऐसा समझें कि हम वही हो सकते हैंजो हम हैं ही। अन्यथा कोई उपाय नहीं है। जो हममें छिपा हैवही प्रगट होगा। और जो प्रगट होगावह वापस लुप्त हो जाएगा। बीज वृक्ष बनेगावृक्ष फिर बीज बन जाते हैं। ऐसा ही जीवन का शाश्वत नियम है। इस नियम को जो समझ लेते हैंउनकी चिंता क्षीण हो जाती है। उनके त्रिविध ताप शांत हो जाते हैं। कोई फिर कारण नहीं है। न दुख कान सुख का। दुखी होने का कोई कारण नहीं हैक्योंकि हम अपनी मंजिल अपने साथ लेकर चलते हैं। सुखी होने का कोई कारण नहीं हैक्योंकि हमें ऐसा कुछ भी नहीं मिलताजो हमें सदा से मिला हुआ ही नहीं है।
इसलिए इस महानियम की सूचना के लिए ही उपनिषद शुरू होता है ईशावास्य के जिस मंत्र सेउसी मंत्र पर पूरा होता है। बीच में हमने जो यात्रा कीवे भी उसी मंत्र तक पहुंचने के अलग—अलग द्वार थे। प्रत्येक मंत्र पुनः—पुन: उसी महासागर की स्मृति को जगाने के लिए सूचना थी। और प्रत्येक घाट और प्रत्येक तीर्थ उसी सागर में नाव छोड़ देने के लिए पुकारआमंत्रण,आह्वान था। इस सूत्र को अगर आपने खयाल रखा होतो हर सूत्र के प्राणों में यही अनुस्यूत था। इसीलिए इसे पहले ही घोषणा कर दी थी और अब अंत में उसकी निष्पत्ति की घोषणा है। मैंने पहले ही दिन इस सूत्र का अर्थ आपको कहा थाआज इसका अभिप्राय कहूंगा।
पूछेंगे आपअर्थ और अभिप्राय में क्या फर्क होता होगा?

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--12

असतो मा सदग्मय

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।


अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मच्चहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम।। 18।।

हे अग्ने। हमें कर्म फल भोग के लिए सन्मार्ग से ले चल। हे देव! तू समस्त ज्ञान और कर्मों को जानने वाला है। हमारे पाखंडपूर्ण पापों को नष्ट कर। हम तेरे लिए अनेकों नमस्कार करते हैं।। 18।।

र्वतों से उतरते हुए झरनों को हमने देखा है। सागर की ओर बहती हुई नदियों से हम परिचित हैं। जल सदा ही नीचे की ओर बहता है — और नीची जगहऔर नीची जगह खोज लेता है। गड्डों में ही उसकी यात्रा है। अधोगमन ही उसका मार्ग है। उसकी प्रकृति है नीचेऔर नीचेऔर नीचे। जहां नीची जगह मिल जाए वहीं उसकी यात्रा है।



अग्नि बिलकुल ही उलटी है। सदा ही ऊपर की तरफ बहती है। ऊर्ध्वगामी उसका पथ है। आकाश की ओर ही दौड़ती चली जाती है। कहीं भी जलाएं उसेकैसे भी रखें उसेउलटा भी लटका दें दीए कोतो भी ज्योति ऊपर की तरफ भागना शुरू कर देती है।
अग्नि का यह ऊर्ध्वगमन अति प्राचीन समय में भी ऊर्ध्वगामी चेतनाओं को खयाल में आ गया। चेतना दोनों तरह से बह सकती है। पानी की तरह भी और अग्नि की तरह भी। साधारणत: हम पानी की तरह बहते हैं। साधारणत: हम भी नीचे गड्डे और गड्डे खोजते रहते हैं। हमारी चेतना नीचे उतरने को रास्ता पा जाए तो हम ऊपर की सीढ़ी तत्काल छोड़ देते हैं। साधारणत: हम जल की तरह हैं। होना चाहिए अग्नि की तरह कि जहां जरा सा अवसर मिले ऊपर बढ़ जाने काहम नीचे की सीढ़ी छोड़ दें। जहां जरा सा मौका मिले पंख फैलाकर आकाश की तरफ उड़ जाने काहम तैयार हों।
अग्नि इसलिए प्रतीक बन गयादेवता बन गया। ऊर्ध्वगमन की जिनकी अभीप्सा थीऊपर जाने का जिनका इरादा था,आकांक्षा थी जिनकी निरंतर श्रेष्ठतर आयामों में प्रवेश करने कीउनके लिए अग्नि प्रतीक बन गयादेवता बन गया।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--11

वह शून्‍य है

ध्‍यान योग शिविर
माउंट आबू, राजस्‍थान।

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
            
ओम क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर।। 17।।

अब मेरा प्राण सर्वात्मक वायुरूप सूत्रात्मा को प्राप्त हो और यह शरीर भस्मशेष हो जाए। हे मेरे सकल्पात्मक मन! अब तू स्मरण करअपने किए हुए को स्मरण करअब तू स्मरण करअपने किए हुए को स्मरण कर।। 17।।

जीवन मिल जाए उसी मेंजहां से जन्मा है। आकार खो जाए उस निराकार मेंजहां से आकार निर्मित हुआ है। ये प्राण वायु के साथ एक हो जाएं। शरीर धूल मेंमिट्टी में समा जाए। ऐसे क्षण में — और ऐसे क्षण दो हैंउनकी मैं आपसे बात करूंगा — ऐसे क्षण में ऋषि ने कहा है अपने संकल्पात्मक मन से कि हे मेरे संकल्प करने वाले मनअपने किए हुए कर्मों का स्मरण करअपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर।

ऐसे क्षण दो हैंजब यह प्रार्थना सार्थक हो सकती है। एक तो मृत्यु के क्षण में और दूसरा समाधि के क्षण में। एक तो तबजब सच में ही आदमी मृत्यु को उपलब्ध होने के दार पर खड़ा होता है। और या फिर तबजब मृत्यु से भी बडी मृत्यु में,समाधि के द्वार पर व्‍यक्ति अपनी बूंद को सागर में खोने के लिए तत्पर होता है।
साधारणत: जिन लोगों ने भी उपनिषद के इस सूत्र की व्याख्या की हैउन्होंने पहले ती अर्थ में की है। यही मानकर की है कि मृत्यु के समय ऋषि कह रहा है कि मेरा सब वही मिला जा रहा है मेरा अस्तित्व जहां से आया थाउस क्षण में कह रहा है अपने मन से कि मेरे संकल्पात्मक मनअपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर।
लेकिन जैसा मैं देख पाता हूं यह स्मरण मृत्यु के समय में किया गया नहीं है। यह स्‍मरण समाधि के क्षण में किया गया है। मृत्यु के क्षण में इसलिए किया गया नहीं है कि मृत्‍यु की कोई पूर्वसूचना नहीं होती। आप नहीं जानते कभी भी कि मृत्यु किस क्षण आ जाती है। मृत्यु आ जाती हैतभी पता चलता है। लेकिन तब तक जिसे पता चलता हैवह मर चुका होता हैवह जा चुका होता है। जब तक मृत्यु आई नहींतब तक पता नहीं चलताऔर जब आती हैतब पता चलने वाला खो चुका होता है।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--10

वह ब्रह्म है

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।


सम्भूतिं च विनाश च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्यु तीर्त्वा सम्भूत्याध्मृतमश्नुते।। 16।।

जो असंभूति और कार्य—ब्रह्म — इन दोनों को साथ—साथ जानता हैवह कार्य—ब्रह्म की उपासना से मृत्यु को पार करके असंभूति के द्वारा अमरत्व प्राप्त कर लेता है।। 16।।


क वर्तुल खींचें हमएक सर्किल बनाएं तो बिना केंद्र के नहीं बना सकेंगे। केंद्र के चारों ओर परिधि को खींचेंगे। केंद्र से परिधि जितनी दूर होती जाएगी उतनी बड़ी होती चली जाएगी। अगर परिधि पर हम दो बिंदुओं को लें तो उनमें फासला होगा। अगर दोनों बिंदुओं से दो रेखाएं खींचेंजो केंद्र को जोड़ती होंतो जैसे—जैसे केंद्र की तरफ बढ़ेंगेवैसे—वैसे फासला कम होता चला जाएगा। ठीक केंद्र पर आकर फासला समाप्त हो जाएगा। परिधि पर कितना ही फासला रहा हो दो बिंदुओं के बीच में, खींची गई रेखाएं वहां से केंद्र की ओर क्रमश: निकट आती चली जाएंगी। और केंद्र पर आकर बिलकुल ही दूरी समाप्त हो जाएगी। केंद्र पर एक हो जाएंगी। अगर परिधि की ओर उन रेखाओं को और आगे बढ़ाते चले जाएं, तो जितनी बड़ी परिधि होती चली जाएगी उतना ही दोनों रेखाओं के बीच का फासला बड़ा होता चला जाएगा। ज्यामिति के इस उदाहरण से दो—तीन बातें इस सूत्र को समझाने के लिए आपसे कहना चाहता हूं।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--09

वह ज्‍योतिर्मय है

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।


हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।



तत्व पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।। 14।।




आदित्य मण्डलस्थ ब्रह्म का मुख ज्योतिर्मय पात्र से ढंका हुआ है। हे पूषन्! मुझ सत्यधर्मा को आत्मा की उपलब्धि कराने के लिए तू उसे उघाड़ दे।। 14।।





सहज ही खयाल में न आ सके, सहज ही समझ में न आ सके, ऐसा यह सूत्र कई अर्थों में बहुत असाधारण अभिप्राय को लिए हुए है। पहली तो बात यह, साधारणत: सोचते हैं हम, मानते हैं ऐसा कि सत्य अगर ढंका होगा तो अंधकार से ढंका होगा। पर यह सूत्र कहता है कि ज्योति से, प्रकाश से ढंका है सत्य। 
हे प्रभु, तू उस प्रकाश के पर्दे को अलग कर ले। यह बहुत ही बहुत ही गहरी जिसने खोज की हो सत्य के आयाम में उसकी प्रतीति है। जिन्होंने केवल सोचा होगा वे सदा कहेंगे कि अंधकार में ढंका है सत्य। लेकिन जिन्होंने जाना है वे कहेंगे प्रकाश में ढंका है सत्य। और अगर अंधकार मालूम होता है 
प्रकाश के आधिक्य में आंखें अंधी हो जाती हैं। प्रकाश बहुत हो तो अंधकार जैसा हो जाता है। आंखों की कमजोरी के कारण। सूरज को देखें। आंख खोलें सूरज की तरफ। थोड़ी देर में अंधकार हो जाएगा। इतना ज्यादा है प्रकाशआंखें झेल नहीं पातींइसलिए अंधकार हो जाता है।


उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--08

यह चैतन्‍य है


ध्‍यान योग शिविर,

माउंट आबू, राजस्‍थान।


अन्ध तम: प्रविशन्ति ये sसम्‍भूतिमुपासते।


ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रता:।। 12।।



जो असंभूति की उपासना करते हैंवे घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं। और जो संभूति में रत हैंवे मानो उनसे भी अधिक अंधकार मे प्रवेश करते हैं।। 12।।

स्तित्व का प्रगट रूप है प्रकृति — जो दिखाई पड़ता है आंखों सेहाथों से स्पर्श में आता हैइंद्रियां जिसे पहचान पाती हैंइंद्रियों को जिसकी प्रत्यभिज्ञा होती है। कहें कि जो दृश्यमान परमात्मा हैवह प्रकृति है। लेकिन यह तो उनका अनुभव हैजिन्होंने परमात्मा को जाना। वे कहेंगे कि परमात्मा की देह प्रकृति है। लेकिन हम तो केवल देह को ही जानते हैं। वह परमात्मा की है देहऐसा हमारा जानना नहीं है। वह जो अप्रगट चैतन्य है, उसकी ही आकृति है प्रकृति उसका ही प्रगट रूप है — ऐसा तो वे जानते हैं जो उस अप्रगट को भी जानते हैं। हमारा जानना तो इतना ही है कि जो यह प्रगट है यही सब कुछ है।
उपनिषद कहते हैं कि जो इस प्रगट प्रकृति की ही उपासना में रत हैंवे अंधकार में प्रवेश करते हैं।

हम सभी रत हैं। उपासना में वे ही लोग रत नहीं हैंजो मंदिरों में प्रार्थना और पूजा कर रहे हैं। उपासना में वे लोग भी रत हैंजो इंद्रियों के मंदिर में पूजा और प्रार्थना कर रहे हैं। उपासना शब्द का अर्थ होता है : पास बैठना। उप आसन — निकट बैठना।

जब आप स्वाद में रस लेते हैं तब आप स्वाद की इंद्रिय के पास बैठ गए हैं। तब आप उससे अभिभूत हैं। तब स्वाद की उपासना चल रही है। जब आप कामवासना में रस लेते हैं तब आप काम—इंद्रिय के निकट बैठ गए हैं। काम—इंद्रिय की उपासना चल रही है। वे जो स्वयं को नास्तिक कहते हैंवे भी उपासना में रत हैं। ईश्वर की उपासना में नहींप्रकृति की उपासना में रत हैं। उपासना से तो बचना कठिन हैकिसी न किसी के पास तो बैठ ही जाना होगा। अगर परमात्मा के पास न बैठेंगे तो प्रकृति के पास बैठ जाएंगे। अगर आत्मा के पास न बैठेंगे तो शरीर के पास बैठ जाएंगे। अगर अलौकिक के पास न बैठेंगे तो लौकिक के पास बैठ जाएंगे। पास तो बैठ ही जाएंगे। सिर्फ एक संभावना को छोड्कर हर हालत में उपासना जारी रहेगी — सिर्फ एक संभावना को छोड्कर। उसकी मैं पीछे बात करूंगा।
उपनिषद का यह सूत्र कहता है कि जो प्रकृति की उपासना में रत हैंवे अंधकार में प्रवेश करते हैं।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--07

वह अव्‍याख्‍य है


ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।। 10।।

विद्या से और ही फल बतलाया गया है तथा अविद्या से और ही फल बतलाया है। ऐसा हमने बुद्धिमान पुरुषों से सुना हैजिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी।। १०।।


पनिषद अविद्या का अर्थ मात्र अज्ञान नहीं करते हैं। और विद्या का अर्थ मात्र ज्ञान नहीं करते हैं। अविद्या से उपनिषद का अभिप्रेत भौतिक ज्ञान है। अविद्या से अर्थ है वैसी विद्याजिससे स्वयं नहीं जाना जातालेकिन और सब जान लिया जाता है। अविद्यापदार्थ विद्या का नाम है। 
साधारणत: भाषा कोश में खोजने जाएंगे तो अविद्या का अर्थ होगा अज्ञान। लेकिन उपनिषद अविद्या का अर्थ करते हैं ऐसा ज्ञान, जो ज्ञान जैसा प्रतीत होता हैफिर भी स्वयं व्यक्ति अज्ञानी रह जाता है। ऐसा ज्ञानजिससे हम और सब जान लेते हैंलेकिन स्वयं से अपरिचित रह जाते हैं। धोखा देता है जो ज्ञान काऐसी विद्या को उपनिषद अविद्या कहते हैं।
अगर ठीक से अनुवाद करेंतो अविद्या का अर्थ होगा साइंस। बहुत अजीब लगेगी यह बात। अविद्या का अर्थ होगा पदार्थज्ञानपरज्ञान। और विद्या का अर्थ होता है आत्मज्ञान। विद्या से सिर्फ ज्ञान अभिप्रेत नहीं है। विद्या से ट्रांसफामेंशन,रूपांतरण अभिप्रेत है। जो ज्ञान स्वयं को बिना बदले ही छोड़ जाएउसे उपनिषद ज्ञान नहीं कहेंगेउसे विद्या नहीं कहेंगे। मैंने कुछ जाना और जानकर भी मैं वैसा ही रह गयाजैसा न जानने पर थातो ऐसे जानने को उपनिषद विद्या न कहेंगे। विद्या कहेंगे तभीजब जानते ही मैं रूपांतरित हो जाऊं। मैंने जाना कि मैं बदला। मैंने जाना कि मैं दूसरा हुआ। जानकर मैं वही न रह जाऊंजो मैं न जानकर था। अगर मैं वही रह गयातो वह अविद्या है। अगर मैं रूपांतरित हो गयातो वह विद्या है। ऐसा ज्ञान जो सिर्फ एडीशन नहीं हैजो आपमें कुछ जानकारी नहीं जोड़ जाता, वरन ट्रासफामेंशन हैरूपांतरण हैआपको बदल जाता हैआपको और ही कर जाता हैआपको नया जन्म दे जाता हैउसे उपनिषद विद्या कहते हैं।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--06

वह स्‍वयंभू है

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।


स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्

अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।

कविर्मनीषी पीरभू स्वयंभू—

र्याथातथ्यतोर्ध्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:।। 8।।

वह आत्मा सर्वगतशुद्धअशरीरीअक्षतस्नायु से रहितनिर्मलअपापहतसर्वद्रष्टासर्वज्ञसर्वोत्कृष्टऔर स्वयंभू है। उसी ने नित्यसिद्ध संवत्सर नामक प्रजापतियों के लिए यथायोग्य रीति से अर्थों का विभाग किया है।। 8।।

स आत्मतत्व के लिएउस आत्मतत्व के स्वभाव के लिए कुछ सूचनाएं इस सूत्र में हैं। सबसे पहली — वह आत्मतत्व स्वयंभू है। इस जगत में अस्तित्व के अतिरिक्त और कुछ भी स्वयंभू नहीं है। स्वयंभू का अर्थ हैसेल्फ ओरिजिनेटेड। स्वयंभू का अर्थ हैजो किसी और के द्वारा पैदा नहीं किया गया। स्वयंभू का अर्थ हैजो किसी और के द्वारा सृजा नहीं गया। जो स्वयं ही हुआ है। 

जिसका होना स्वयं से ही निकला है। जिसका अस्तित्व किसी और के हाथ में नहीं। जिसका अस्तित्व स्वयं में ही निर्भर है। आत्मतत्व स्वयंभू है, यह पहली बात खयाल में ले लेनी चाहिए।

हम जिन चीजों को देखते हैंवे निर्मित हो सकती हैं। जो—जो निर्मित हो सकता हैजो भी बनाया जा सकता हैवह आत्मतत्व नहीं होगा। एक मकान हम बनाते हैं। मकान स्वयंभू नहीं हैनिर्मित है। एक यंत्र हम बनाते हैंस्वयंभू नहीं है,निर्मित है। हमने बनाया। उस तत्व को खोजेंजो हमने नहीं बनाया हैजो किसी ने भी नहीं बनाया है। जो अनबना है,अनक्रिएटेड है। उस तत्व का नाम ही आत्मतत्व है। यदि हम जगत के अस्तित्व में खोजते हुए वहां तक पहुंच जाएंउस आधार को पकड़ लेंजिसे किसी ने भी नहीं बनायाजो है सदा सेअनबनास्वयं हीतो हम परमात्मा को पा लेंगे। और अगर हम अपने भीतर प्रवेश करें और खोजते चले जाएं और वहां पहुंच जाएंजो अनबना हैस्वयं हैतो हम आत्मा को पा लेंगे।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--05

वह समत्‍व है


ध्‍यान योग शिविर,

मांउट आबू, राजस्‍थान।

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।

सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते।। 6।।

जो संपूर्ण भूतों को आत्मा में ही देखता है और समस्त भूतों में भी आत्मा को ही देखता हैवह इसके कारण ही किसी से घृणा नहीं करता।। 6।।

नुष्य की गहरी से गहरी उलझनों में घृणा आधारभूत है। कहें कि घृणा का जहर ही मनुष्य की और समस्त विषाक्त अभिव्यक्तियों में प्रगट होता है।
घृणा का अर्थ है. दूसरे के विनाश की आतुरता। प्रेम का अर्थ है : दूसरे के जीवन की आकांक्षा। घृणा का अर्थ है दूसरे की मृत्यु की आकांक्षा। प्रेम का अर्थ है जरूरत पड़े तो दूसरे के लिए स्वयं को समाप्त कर देने की तैयारी। घृणा का अर्थ है : जरूरत न भी पड़े तो भी स्वयं के लिए दूसरे को समाप्त कर लेने की तैयारी।
और हम सब जैसे जीते हैं उसमें प्रेम का कोई स्वर नहीं होताघृणा का ही विस्तार होता है। वस्तुत: तो जिसे हम प्रेम कहते हैंवह भी हमारी घृणा का ही एक रूप होता है। हम प्रेम में भी दूसरे को साधन बना लेते हैं। और जब भी कोई दूसरे को साधन बनाता हैतभी घृणा शुरू हो जाती है। हम प्रेम में भी अपने लिए जीते हैं। और अगर दूसरे के लिए कुछ करते हुए मालूम पड़ते हैंतो सिर्फ इसलिए कि उससे हमें कुछ मिलने को है। दूसरे के लिए हम कुछ करते हैं तभीजब उससे कुछ मिलने की आशाफल की आकांक्षा होती है। अन्यथा हम नहीं करते हैं।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--04

वह अतिक्रमण है


ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोsन्‍यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।। 4।।
वह आत्मतत्व अपने स्वरूप से विचलित न होने वाला तथा मन से भी तीव्र गति वाला है। इसे इंद्रियां प्राप्त नहीं कर सकींक्योंकि यह उन सबसे आगे गया हुआ है। वह स्थिर होते हुए भी अन्य सभी गतिशीलों को अतिक्रमण कर जाता है। उसके रहते हुए ही वायु समस्त प्राणियों के प्रवृत्तिरूप कर्मों का विभाग करता है।। 4।।

त्मतत्व स्थिर होते हुए भी गतिमान से भी ज्यादा गतिमान है। आत्मतत्व इंद्रियों और मन की दौड़ के परे है,क्योंकि इंद्रियों और मन दोनों के पूर्व हैदोनों के पहले हैदोनों के पार है। इस सूत्र को साधक के लिए समझना बहुत जरूरी और उपयोगी है।


पहली बात तो कि आत्मतत्व जिससे हम अपरिचित हैंजिसका हमें कोई पता नहींजो हम हैं और फिर भी जिसकी हमें कोई पहचान नहीं है। हमारी चेतना की जो अंतिम गहराई हैजो अल्टीमेट डेप्थ हैजो आखिरी गहराई हैजहां से हमारा होना जन्मता है और विकसित होता है...।
अगर हम एक वृक्ष की तरह सोचेंतो वृक्ष में पत्ते भी हैं ऊपर आकाश में फैले हुएपत्तों के पीछे छिपी हुई शाखाएं भी हैं,शाखाओं के पीछे वृक्ष की पीड़ भी है। और उन सबके नीचे वृक्ष कीअंधेरे में पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुईजड़ें भी हैं। कोई वृक्ष अगर अपने को पत्ता ही मान ले... और ऐसा मानने में बहुत कठिनाई नहीं हैक्योंकि जड़ें प्रगट नहीं हैंदूर अंतर—गर्भ में छिपी हैं। तो हो सकता हैवृक्ष समझ ले कि मैं पत्तों का समूह हूं। और भूल जाए यह कि जड़ें भी हैं। उसके मूलने से अंतर नहीं पड़ता। पत्ते क्षणभर भी जी न सकेंगे जड़ों के बिना। जड़ें फिर भी अंधेरे में काम करती रहेंगी। और यह मजे की बात है कि पत्ते तो जड़ों के बिना नहीं हो सकतेलेकिन जड़ें पत्तों के बिना हो सकती हैं। अगर हम पूरे वृक्ष को भी काट डाले तो भी जड़ें सक्रिय रहेंगी और नये वृक्ष को अंकुरित कर जाएंगी। लेकिन हम पूरी जड़ो को काट डाले तो पत्ते सिर्फ कुम्‍हलाएंगे, सूखेंगे, मरेंगेनए पत्तों को जन्म न दे पाएगे। वह जो अंधेरे में गहरे में छिपी हुई है जड़े, वही प्राण है।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--03

वह निमित्त है



ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू राजस्‍थान।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं शता:।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। 2।।

इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। इस प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए इसके सिवाय और कोई मार्ग नहीं हैजिससे तुझे कर्म का लेप न हो।। 2।।


संसार में कोई ऐसा दूसरा मार्ग नहीं है जिससे चलकर कर्म का लेप न हो। जिस मार्ग ईशावास्य ने चर्चा की है वह मार्ग है — सब प्रभु को अर्पित करके जीना। सब उसके ही चरणों में छोड़ देना। सब उसको ही समर्पित कर देना। स्वयं के कर्ता का समस्तछोड्कर कर्मों से जो गुजरने को राजी हैउसे इस संसार में कर्म का कोई लेप नहीं होता एक ही मार्ग हैदूसरा कोई मार्ग नहीं है।
दो—तीन बातें समझ लेनी उपयोगी हैं।
एक तो संसार में जीना और कर्म से लिप्त न होना बड़ी ही कीमियाबड़ी बुद्धिमत्‍ता बड़ी विज़डम की बात है। करीब—करीब ऐसे ही हैजैसे कोई काजल की कोठरी से निकले और उसे काजल न लगे। फिर घड़ी दो घड़ी की बात नहीं हैअगर एक जीवन को भी पूरा लेंतो कम से कम सौ वर्ष। और अगर अनेक जीवन को स्मरण करेंतो अनेक सौ वर्ष। लाखों वर्ष की यात्रा है।
एक ही जीवन की बात की है इस सूत्र में कि जहां कम से कम सौ वर्ष जीवन हैसौ वर्ष काजल की कोठरी से कोई गुजरे निरंतर — जागेसोएउठेबैठेंजीए — और काजल से अछूता रह जाएबड़ी ही बुद्धिमत्ताबड़े योग की बात है। अन्यथा यही आसान और सहज है कि काजल पकड़ ले। इतना ही नहीं कि काजल ही छू जाएबल्कि व्यक्ति काजल हो जाएयही साधारणत: संभव है। छूना तो स्वाभाविक मालूम होता हैलेकिन सौ वर्ष काजल के साथ रहना पड़ेतो कठिन लगती है यह बात कि व्यक्ति ही काजल न हो काला न हो जाए।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--02

वह परम भोग है

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

हरि ओम,
            ईशावास्‍यमिदं सर्वं यत्किज्व जगत्या जगत्।
            तेन त्यक्तेन पुज्जीथा: मा गृध: कस्यस्विद्धनमू।। 1।।


      जगत में जो कुछ स्थावर—जंगम संसार हैवह सब ईश्वर के द्वारा
      आच्छादनीय है। उसके त्याग— भाव से तू अपना पालन करकिसी
                  के धन की इच्छा न कर।। 1।।

शावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा : सब कुछ परमात्मा का है। इसीलिए ईशावास्य नाम है — ईश्वर का है सब कुछ।
मन करता है मानने का कि हमारा है। पूरे जीवन इसी भ्रांति में हम जीते हैं। कुछ हमारा है — मालकियतस्वामित्व — मेरा है। ईश्वर का है सब कुछतो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती।

ध्यान रहेअहंकार भी निर्मित होने के लिए आधार चाहता है। मैं को भी खड़ा होने के लिए मेरे का सहारा चाहिए। मेरे का सहारा न हो तो मैं को निर्मित करना असंभव है।
साधारणत: देखने पर लगता है कि मैं पहले हैमेरा बाद में है। असलियत उलटी है। मेरा पहले निर्मित करना होता है,तब उसके बीच में मैं का भवन निर्मित होता है।

उपनिषद -ईशावास्‍य-प्रवचन--01

वह पूर्ण है

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

ओम पूर्णमद: पूर्णमिद पूर्णात्पूर्णमुदव्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
 ओम शांति: शांति: शांति:।

ओम वह पूर्ण है और यह भी पूर्ण हैक्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बच रहता है।
                  ओम शांतिशांतिशांति।

 ह महावाक्य कई अर्थों में अनूठा है। एक तो इस अर्थ में कि ईशावास्य उपनिषद इस महावाक्य पर शुरू भी होता है और पूरा भी। जो भी कहा जाने वाला हैजो भी कहा जा सकता हैवह इस सूत्र में पूरा आ गया है। जो समझ सकते हैंउनके लिए ईशावास्य आगे पढ़ने की कोई भी जरूरत नहीं है। जो नहीं समझ सकते हैंशेष पुस्तक उनके लिए ही कही गई है।



इसीलिए साधारणत: ओम शांति: शांति: शांति: का पाठजो कि पुस्तक के अंत में होता हैइस पहले वचन के ही अंत में है। जो जानते हैंउनके हिसाब से बात पूरी हो गई है। जो नहीं जानते हैंउनके लिए सिर्फ शुरू होती है।
इसलिए भी यह महावाक्य बहुत अदभुत है कि पूरब और पश्चिम के सोचने के ढंग का भेद इस महावाक्य से स्पष्ट होता है। दो तरह के तर्कदो तरह की लाजिक सिस्टम्स विकसित हुई हैं दुनिया में—एक यूनान मेंएक भारत में।