गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-06

परमात्मा की अनुभूति

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक मित्र ने पूछा है कि क्या मैंने कभी परमात्मा को देखा है?

परमात्मा के संबंध में हम इस भांति सोचते हैंजैसे उसे भी देखा जा सकता हो। जो देखा जा सकता हैवह संसार ही रहेगा। परमात्मा कभी भी देखा नहीं जा सकताजो देख रहा है वह परमात्मा है।
इस बात को थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
जो भी दिखाई पड़ता है उसका नाम ही संसार है और जिसको दिखाई पड़ता है उसका नाम परमात्मा है। इसलिए परमात्मा कभी दिखाई नहीं पड़ सकता है।

लेकिन कोई कहता है कि मैंने परमात्मा को देखा। बड़ी भूल कर रहा है। एक तो परमात्मा दिखाई नहीं पड़ सकतावह खुद परमात्मा है जिसको दिखाई पड़ता है। दूसरी बातजहां परमात्मा का अनुभव होता है--दिखाई तो वह पड़ता नहींक्योंकि मैं वही हूंआप वही हैं--लेकिन जब इस स्वयं का अनुभव होता हैतब मैं भी वहां शेष नहीं रह जाता हैवहां मैं भी गिर जाता है।
तो जो कहता हैमैंने परमात्मा को देखावह दोहरी भूल कर रहा है। एक तो वह यह कहता है कि परमात्मा कोई चीज है मुझसे अलगजो दिखाई पड़ गई। यह झूठ है। दूसरी भूल वह यह कर रहा है कि वह कह रहा हैमैंने देखा। मैं तो बचता नहीं वहांजहां परमात्मा का अनुभव होता है। इसलिए इससे ज्यादा असत्य कोई बात नहीं हो सकती कि कोई कहेमैं परमात्मा को देखा हूं।
लेकिन राम और कृष्ण देखे जा सकते हैंबुद्ध और महावीर देखे जा सकते हैं। सच में ही बुद्ध और महावीर नहीं देखे जाएंगेन राम और कृष्ण। लेकिन मनुष्य की कल्पना बहुत समर्थ है। कल्पना इतनी समर्थ है कि जो नहीं हैवह भी देखा जा सकता है। अगर कोई ठीक से कल्पना करेतो प्रतीतियां हो सकती हैं स्वप्नवतऔर उसी को लोग ईश्वर का साक्षात्कार समझ लेते हैं।
अगर कोई निरंतर धारणा करेनिरंतर कामना करेनिरंतर कल्पना करेनिरंतर पुकारे और चिल्लाए और रोएऔर चौबीस घंटा स्मरण करे--कृष्ण काकृष्ण काकृष्ण कातो चित्त में एक छवि बननी शुरू हो जाएगी। उस छवि को इतना प्रगाढ़ रूप मिल सकता है कि वह छवि बाहर भी दिखाई पड़ने लगे। वह प्रोजेक्शन होगावह प्रक्षेपण होगा। वहां कोई होगा नहींलेकिन दिखाई पड़ सकता है। और अगर किसी के पास कवि का हृदय होतब तो बहुत आसान है।
टाल्सटाय का नाम सुना होगा आपने। गांधी जी अपने गुरुओं में एक टाल्सटाय की गिनती भी करते थे। वह बहुत अनूठा आदमी था। कवि हृदयकल्पनाशील। एक रात उसे मास्को के एक ब्रिज के ऊपरपुल के ऊपर पकड़ा गया। आधी रातअंधेरे में खड़ा था पुल के ऊपर। पुलिसवाला जो वहां पहरे पर थाउसने पूछा कि महाशय ऐसे कैसे खड़े हैं यहां?
वह ब्रिज ऐसा था कि वहां अक्सर लोग आत्महत्या करते थे। तो एक सिपाही तैनात था इसीलिए कि वहां कोई आत्महत्या न कर सके। तो रात दो बजे टाल्सटाय को वहां देख कर उस सिपाही ने पकड़ा और कहाआप यहां कैसे आए?
टाल्सटाय की आंखों से आंसू बह रहे हैं। टाल्सटाय ने कहा कि अब तुम देर करके आएजिसे आत्महत्या करनी थी उसने कर ली है। मैं तो सिर्फ उसके लिए खड़ा होकर रो रहा हूं। वह सिपाही तो घबड़ा गयावह था डयूटी पर तैनात। कौन गिर गयाकब गिर गयाउसने टाल्सटाय से पूछा। लेकिन टाल्सटाय रोए चला जा रहा है। वह टाल्सटाय को पकड़ कर थाने ले गया कि पूरी रिपोर्ट आप लिखवा दें--कौन थाक्या थारास्ते में टाल्सटाय से उसने पूछाकौन थातो टाल्सटाय ने कहाएक स्त्री थी। नाम बतायाउसकी मां का नामउसके पिता का नामसब जरूरी सब बताया।
थाने में पहुंचा। थाने में जो इंसपेक्टर था वह पहचानता था। उसने कहाटाल्सटाय को ले आए! और टाल्सटाय शाही घराने के लोगों में से एक था। उसने टाल्सटाय को पूछा कि क्या कहते हैं आपकौन मर गया?
थाने में पहुंच कर होश आकर टाल्सटाय ने कहाक्षमा करनाभूल हो गई। मैं एक उपन्यास लिख रहा हूं। उस उपन्यास में एक पात्रा है। वह पात्राआज की रात कहानी वहां पहुंचती है कि वह जाकर वोल्गा में कूद कर आत्महत्या कर लेती है। मैं भूल गयाकिताब बंद करके मैं वहां पहुंच गया जहां कहानी में वह आत्महत्या करती है। मैं वहीं खड़ा उसके लिए रोता था कि इस आदमी ने पकड़ लिया।
पर वह सिपाही कहने लगातुमने कहा उसके पिता का नाममां का नाम।
उसने कहावह सब ठीक हैकहानी में वही उसके पिता का नाम हैवही उसकी मां का नाम है।
लेकिन वे सब कहने लगे कि आप आदमी कैसे हैंआप इतना धोखा खा गए?
टाल्सटाय ने कहाबहुत बार ऐसा हो चुका है। कल्पना के चित्र इतने सजीव मालूम पड़ते हैं मुझे कि मैं कई बार भूल जाता हूं। बल्कि सच तो यह है कि असली आदमी इतने सजीव नहीं मालूम पड़तेजितनी मेरी कल्पना के।
टाल्सटाय ने अपना पैर बतायाजिसमें बड़ी चोट थीनिशान था। और उसने कहा कि एक बार मैं लाइब्रेरी की सीढ़ियां चढ़ रहा था। और मेरे साथ एक स्त्री चढ़ रही थी। वह भी मेरी पात्र थी किसी कहानी कीथी नहीं। लेकिन वह उससे बातचीत करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था। संकरी जगह थीऔर ऊपर से एक सज्जन उतर रहे थे। मैंने सोचा कहीं स्त्री को धक्का न लग जाएतो मैं बचा। बचने की कोशिश में उन सीढ़ियों से नीचे गिर गया। जब सीढ़ियों से नीचे गिर गयाउन सज्जन ने मुझसे आकर कहापागल हो गए होक्यों बचे तुमदो के लायक काफी जगह थी!
टाल्सटाय ने कहावह तो अब मुझे भी समझ में आ गया कि दो थेपैर टूटने से बुद्धि आई। लेकिन जब तक मैं चढ़ रहा था,मुझे खयाल था हम तीन हैंएक औरत मेरे साथ है। और उसको धक्का न लग जाएइसलिए मैंने बचने की कोशिश की।
अब ऐसे व्यक्तियों को भगवान का साक्षात्कार करना कितना सरल हो सकता है। कवि हृदय चाहिएकल्पनाशील मन चाहिए। और फिर ऐसी तरकीबें हैं कि कल्पनाशील मन को और कल्पनाशील बनाया जा सकता है। जैसे उपवास करके! अगर लंबा उपवास किया जाएतो मन और भी कल्पना-प्रवीणइमेजिनेटिव हो जाता है। कभी आपको अगर बुखार में लंघन करनी पड़ी हो तो आपको पता होगा कि अगर लंबी लंघन करनी पड़ी होभूखा रहना पड़ा हो बुखार मेंकमजोरी बढ़ गई होभूख से रहना पड़ा हो--तो कभी खाट आकाश में उड़ती हुई मालूम पड़ेगीकभी देवी-देवता दिखेंगेकभी भूत-प्रेतवे सब साथ दिखाई पड़ेंगे।
वह कमजोर चित्त को बहुत आसान है। इसीलिए लोग लंबे उपवास करके चित्त को कमजोर करते हैं कि जो भी कल्पना करना चाहें वे कर सकें। लंबे उपवासों के द्वारा और कुछ भी नहीं होतासिवाय इसके कि चित्त कमजोर होता है। और कमजोर चित्त तर्क करने में असमर्थ हो जाता है। कमजोर चित्त जांचने में कमजोर हो जाता है कि क्या सही हैक्या झूठ है। कमजोर चित्त सपना देखने में सरल हो जाता है। और फिर जो भी आपकी कल्पना हो वह देखा जा सकता है।
उपवास करिए और एकांत में चले जाइए। एकांत में जाना भी कल्पना के लिए बड़ा सहयोगी है। कभी खयाल किया हैअकेले जंगल में गुजर रहे हों तो पत्ता भी खड़कता है तो लगता है कौन आ गया! अंधेरी रात में अकेले हों तो जरा सी चोटआवाज होती हैऔर लगता है कि कोई आ गया! भूत-प्रेत दिखाई पड़ने शुरू हो जाते हैं। जिस ढंग से भूत-प्रेत दिखते हैंउसी ढंग से भगवान भी देखे जाते हैंफर्क ज्यादा नहीं है। एकांत में चित्त संवेदनशील हो जाता है। भीड़ में चित्त उतना संवेदनशील नहीं होताक्योंकि चारों तरफ लोग हैं और उनकी मौजूदगी आपके चित्त को ज्यादा संवेदनशील नहीं होने देती। लेकिन एकांत में चले जाइएजंगल में चले जाइएहिमालय पर चले जाइए। फिर वहां जो भी कल्पना करनी हो वह आप कर सकते हैं।
और फिर तीसरी विधि है कि खुद को आत्म-सम्मोहित करिए। रखिए कृष्ण की मूर्ति सामने और उसको ही देखिएउसके साथ ही जागिएउसके साथ ही सोइएउससे बातें करिएहाथ जोड़िएप्रार्थना करिए। ऐसा वर्षों तक करते रहिएकरते रहिए। मन उस मूर्ति को पकड़ लेगा। फिर जो मन मूर्ति को पकड़ लेता हैफिर वह उस मूर्ति को बाहर प्रोजेक्ट भी करता हैवह उसको बाहर निर्मित भी करता है। उसी का दर्शन हो जाएगा। उसको चाहें तो भगवान का दर्शन कह लें। लेकिन इसे मैं भगवान का दर्शन नहीं कहता हूं।
मेरी समझ में भगवान कोई व्यक्ति नहीं है कि जिसका दर्शन हो सके। भगवान है जीवन की समग्र शक्ति का नाम। भगवान है अस्तित्व का नाम। भगवान है होने का नाम। जो भी है वही है। लेकिन उसे जानने का जो मार्ग है वह देखना नहीं हैउसे जानने का मार्ग अनुभव करना है। देखते हम उसे हैं जो अन्य हैअनुभव हम उसे करते हैं जो हम स्वयं हैं। अन्य को देखा जा सकता है। लेकिन अन्य के और स्वयं के बीच में सदा फासला हैदूरी है।
मैं आपको देख रहा हूंतो आपके और मेरे बीच एक दूरी है। देखने में सदा दूरी है। देखने में कभी भी निकटता नहीं होती। चाहे हम कितने ही निकट खड़े हो जाएंदेखने में दूरी हैदर्शन में फासला हैडिस्टेंस है। और परमात्मा को दूरी से नहीं जाना जा सकतापरमात्मा को तो उसके साथ एक होकर ही जाना जा सकता है।
इसलिए परमात्मा का दर्शन नहीं होताअनुभूति होती है। और अनुभूति का मतलबआपने कभी दर्द का दर्शन किया हैपैर में चोट लगी हैउसका आपने कभी दर्शन किया हैनहींउसकी अनुभूति की हैदर्शन कभी नहीं किया। आपने कभी प्रेम का दर्शन किया हैप्रेम की अनुभूति की हैदर्शन कभी नहीं किया। जितने गहरे में कोई बात होगीजितने निकट होगीउसका हम अनुभव करते हैं। और परमात्मा सर्वाधिक निकट हैहम परमात्मा में ही हैंपरमात्मा ही हैं। इसलिए परमात्मा का कोई दर्शन नहीं होताअनुभूति होती है।
और अनुभूति तभी होती है जब मेरा यह खयाल मिट जाए कि मैं हूं। क्योंकि यह मैं अनुभूति में सबसे बड़ी बाधा है। जब यह मैं मिट जाता है और परम शांति होती है भीतर...क्योंकि जब तक मैं हैतब तक शांति नहीं। मैं के अतिरिक्त और कोई अशांति नहीं हैमैं ही अशांति का सूत्र है। जितने जोर से मैंऔर मैंऔर मैं चल रहा हैउतना ही चित्त अशांत है। जिस दिन मैं शांत हो जाता हैउस दिन हम उसे जान पाते हैं जो भीतर छिपा है। इस भीतर जो छिपा हैउसे जानना ही परमात्मा का अनुभव है। निश्चित हीजो अपने भीतर इसे जान लेता हैवह यह भी जान लेता है कि वही फैला है सब में। लेकिन वह भी दर्शन नहीं हैवह भी भीतर से ही अनुभव है।
जैसे कोई वृक्ष का एक पत्ता हवा में हिल रहा है। शायद वह पत्ता समझता हो कि मैं हूं। और शायद वह पत्ता यह भी सोचता हो कि उसके निकट के पत्ते अन्य हैंभिन्न हैंदूसरे हैं। क्योंकि उस पत्ते को वे पत्ते दिखाई पड़ रहे हैं। सोचता होगा ये अन्य हैंदूसरे हैंइनके और मेरे बीच फासला है। निश्चित ही एक पत्ते में और उसी वृक्ष के दूसरे पत्ते में फासला है। वह पत्ता कहता होगामैं मैं हूंतू तू है।
लेकिन पत्ता अगर अपने भीतर प्रवेश करे थोड़ातो अपने भीतर प्रवेश करने से वह शाखा में प्रवेश कर जाएगाजिसमें सारे पत्ते जुड़े हैं। और तब वह जानेगाअरेमैं सोचता था मैं मैं हूं! मैं मैं नहीं हूंयह पूरी शाखा मैं हूंये सारे पत्ते मैं हूं। और अगर और भीतर प्रवेश करेतो पता चलेगानीचे की जड़ पर सारी शाखाएं भी जुड़ी हैं! तब वह समझेगा कि न केवल मैंमैं और पत्तेऔर शाखादूसरी शाखाएं भी मैं हूं। और अगर वह और नीचे प्रवेश करेतो पाएगा कि जड़ें पृथ्वी से जुड़ी हैं। और पृथ्वी के बिना जड़ें नहीं हो सकती हैं। तब शायद वह समझे कि पृथ्वी भी मैं हूं। और जिस पृथ्वी से मेरा वृक्ष जुड़ा हैउसी से दूसरे वृक्ष भी जुड़े हैं। तब वह शायद समझे कि सारे वृक्ष मैं हूं। और अगर वह गहरे से गहरा प्रवेश करता जाएतो शायद उसे पता चले: सूरज अगर डूब जाएअस्त हो जाए सदा के लिएतो वृक्ष भी नष्ट हो जाएगा। सूरज की किरणों से बंधा है वृक्ष। तब शायद वह जाने कि सूरज भी मैं हूं। और अगर वह इस तरह प्रवेश करता ही चला जाएकरता ही चला जाएतो एक पत्ता यह जानेगा कि ब्रह्मांड मैं हूं। क्योंकि इस पूरे जगत मेंउस पत्ते के होने के लिए सारे जगत की जरूरत है। अगर यह सारे जगत में कुछ भी कमी हो तो वह पत्ता नहीं हो सकेगा। एक पत्ता हैक्योंकि पूरा ब्रह्मांड है।
लेकिन यह पत्ता जितने भीतर प्रवेश करेउतना ही पता चलेगा। बाहर देखे तो यह कभी पता नहीं चलेगा। पता चलेगा: दूसरे पत्ते दूसरे हैंदूसरे वृक्ष दूसरे हैं। कहां चांदत्तारे! कहां सूरज! यह सब फासला है। बाहर से देखने पर फासला हैभीतर से देखने पर फासला मिट जाता है। क्योंकि भीतर से सब जुड़ा है।
अपने भीतर उतर कर स्वयं को जान लेने से ही परमात्मा के जानने का द्वार खुलता है। इसलिए यह मत पूछिए कि मैंने कभी परमात्मा को देखा या नहीं देखा। किसी ने कभी नहीं देखा। हांजाना है। और जान कोई भी सकता है। क्योंकि हम वही हैं। जानने के लिए कहीं दूर नहीं जाना है--किसी तीर्थ नहींकिसी मंदिर नहींकिसी हिमालय पर नहीं। जानने के लिए जाना है अपने ही भीतर।
एक छोटी सी कहानीफिर मैं दूसरा प्रश्न लूं।
मैंने सुना है कि जब सृष्टि बनी और ईश्वर ने सारी चीजें बनाईंबड़ी अदभुत कहानी है। और जब उसने आदमी बनायातो वह अपने देवताओं से पूछने लगा कि यह आदमी मुझे बड़ा शिकायती मालूम पड़ता है। यह बन तो गयालेकिन यह छोटी-छोटी शिकायत लेकर मेरे द्वार पर खड़ा हो जाएगा। मैंने वृक्ष बनाएवृक्ष कभी शिकायत लेकर नहीं आएन वृक्षों ने कभी प्रार्थना की और न शिकायत की। मैंने पशु बनाएपशु कभी मेरे द्वार पर नहीं आए। पक्षी बनाएकभी पक्षी मेरे द्वार पर नहीं आए। चांदत्तारे बनाए। लेकिन यह आदमी मुसीबत का घर है। यह सुबह-शाम चौबीस घंटे द्वार पर दस्तक देगाकहेगा कि यह करोयह करोयह होना चाहिएवह नहीं होना चाहिए। इस आदमी से बचने का मुझे कोई उपाय चाहिए। मैं कहां छिप जाऊं?
तो किसी देवता ने कहाहिमालय पर छिप जाइए।
तो उसने कहातुम्हें पता नहीं हैबहुत जल्द वह वक्त आएगा कि हिलेरी और तेनसिंग हिमालय पर चढ़ जाएंगे।
तो किसी ने कहापैसिफिक महासागर में छिप जाइए।
तो उसने कहावह भी कुछ काम नहीं चलेगा। जल्दी ही अमेरिकी वैज्ञानिक वहां भी उतर जाएंगे।
किसी ने कहाचांदत्तारे पर बैठ जाइए।
उसने कहाउससे भी कुछ होने वाला नहीं है। जरा ही समय बीतेगा और चांदत्तारों पर आदमी पहुंच जाएगा।
तब एक बूढ़े देवता ने उसके कान में कहाएक ही रास्ता हैआप आदमी के भीतर छिप जाइए। वहां आदमी कभी नहीं जाएगा।
और ईश्वर ने बात मान ली और आदमी के भीतर छिप गया। और आदमी हिमालय पर भी पहुंच गयाचांदत्तारों पर भी पहुंच जाएगापैसिफिक में भी पहुंच गया। एक जगह भर छूट गई है जहां आदमी नहीं पहुंचतावह खुद के भीतर।
और धार्मिक आदमी भी कहता हैईश्वर कहां हैयह सवाल ही अधार्मिक है। और धार्मिक आदमी भी कहता हैईश्वर के दर्शन कैसे करूंयह सवाल ही नास्तिक का है। आस्तिक यह पूछता ही नहीं। आस्तिक यह पूछता हैमैं कौन हूंऔर जिस दिन जान लेता हैउस दिन जान लेता है कि मैं नहीं हूंपरमात्मा है।
लेकिन नास्तिक भी आस्तिकों की शक्लों में बैठे हुए हैं। मंदिर में मूर्ति बनाते हैं। ये सारी मूर्तियां नास्तिकों ने बनाई हैं। कोई आस्तिक कभी परमात्मा की मूर्ति नहीं बना सकता। क्योंकि आस्तिक जानता है कि उसकी मूर्ति बन ही नहीं सकती। कोई आस्तिक कभी परमात्मा की न मूर्ति बना सकता है और न कोई आस्तिक परमात्मा की मूर्ति कभी तोड़ सकता है। क्योंकि वे दोनों नासमझियां हैं।
लेकिन दो तरह के आस्तिक हैं दुनिया में: एक मूर्ति बनाने वालेएक मूर्ति तोड़ने वाले। लेकिन दोनों मूर्ति को मानते बहुत हैं। एक पूजने के लिए मानता हैएक तोड़ने के लिए मानता है। लेकिन दोनों मूर्ति से बेचैन बहुत होते हैं। ये सब नास्तिकों की कतारें हैंजो भूल से अपने को आस्तिक समझ रहे हैं।
आस्तिक वह है जो कहता हैसभी मूर्तियां उसकी हैं। इसलिए उसकी मूर्ति बनाने की और क्या जरूरत हैइतनी मूर्तियों में वह नहीं दिखाई पड़तातुम और एक बना कर पत्थर की बिठा कर उसको देखोगे। सब कुछ वही है। तो आस्तिक मंदिर नहीं बना सकताक्योंकि मंदिर नास्तिकता का सबूत है। नास्तिक मंदिर बनाएगावह कहेगायहां भगवान है। यहां भगवान का मतलब होता हैऔर शेष सब जगह नहीं है। जो आस्तिक है वह कहता हैजो भी है मंदिर है। जो आस्तिक है वह कहता हैकण-कण तीर्थ है। जो आस्तिक है वह कहता हैवही हैउसके सिवाय कुछ भी नहीं है।
और लेकिन यह कहने वाले का मतलब यह नहीं है कि कहीं अंधेरे में भगवान से उसका मिलना हो गया है। कहीं नमस्कारजोड़ कर हाथ नमस्कार हो रही है। ऐसा कुछ भी नहीं है। इसका कुल मतलब इतना है कि वह अपने भीतर उतरा हैऔर मैं मिट गया हैऔर वह द्वार खुल गया है जहां से संपूर्ण अस्तित्व का साक्षात्कार हो जाता है।
परमात्मा का अर्थ है: अस्तित्व का साक्षात्कार। परमात्मा का साक्षात्कार नहींअस्तित्व का! और अस्तित्व का साक्षात्कार दर्शन नहीं हैअस्तित्व का साक्षात्कार अनुभूति है।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि आजकल समाज नीचे गिरता जा रहा हैअनैतिक होता चला जा रहा हैअनाचार बढ़ रहा हैभ्रष्टाचार बढ़ रहा है। तो इस समाज को ऊंचा उठाने के लिए क्या किया जाए?

इसमें दोत्तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली तो बात: यह गलत है कहना कि आजकल समाज नीचे गिरता जा रहा है। इससे ऐसा भ्रम पैदा होता है कि पहले समाज ऊंचा था। समाज ऊंचा कभी नहीं था। कभी नहीं रहा। और यह ध्यान रहेऊंचाई से नीचे की तरफ जाना होता ही नहीं है। ऊंचाई से नीचे की तरफ जाने जैसी घटना घटती ही नहीं है। हांधोखे की ऊंचाई होतो हो जाता है। कोई मनुष्य कभी भी ऊंचाई से नीचाई की तरफ नहीं जाता है। हांधोखे की ऊंचाई होतो हो सकता है। और जब कोई नीचे चला जाए तो समझ लेना चाहिए--जिसे हमने ऊंचाई समझी थी वह ऊंचाई नहीं थीसिर्फ धोखा था।
तो पहली तो बात यह कि मनुष्य का समाज कभी भी ऊंचा नहीं रहा। कुछ मनुष्य ऊंचे रहे हैंसमाज कभी ऊंचा नहीं रहा। कुछ मनुष्यों की ऊंचाई के कारण हमें यह भ्रम पैदा हुआ कि सारा समाज ऊंचा हो गया।
इस भ्रम का टूट जाना उचित हैतो ही हम समाज को ऊंचा करने का रास्ता खोज सकते हैं। और अगर हम यह मानते रहें कि पहले समाज ऊंचा थाअब नीचे हो गयातो चूंकि यह मानना ही बुनियादी रूप से गलत हैइसके आधार पर हम जो भी करेंगेवह गलत होगा।
होता क्या हैइतिहास में बड़ी भूलें हो जाती हैं। और बुनियादी भूलें हो जाती हैंजिनका फिर पता भी नहीं चलता। जैसे अभीइन पचास सालों में हिंदुस्तान में जितने लोग पैदा हुएइनमें से गांधी का नाम हजारों साल तक याद रहेगा। पांच हजार साल भी गांधी का नाम शेष रहेगा। न मुझे कोई याद करेगान आपकोन इन पचास वर्षों में जितने लोग पैदा हुए किसी की याद रह जाएगी। लेकिन गांधी का नाम टिकेगाबचेगा। पांच हजार साल बाद लोग कहेंगे कि गांधी जैसा आदमी जिस जमाने में पैदा हुआवह जमाना कितना ऊंचा था! कितने ऊंचे लोग थे! गांधी के आधार पर हम सब के संबंध में वे सोचेंगे और कहेंगेकितने ऊंचे लोग थे! हम तो मिट जाएंगेधूल हो जाएंगे। गांधी का नाम रह जाएगागांधी मापदंड बन जाएंगे।
और गांधी और हममें कोई भी संबंध नहींहम बिलकुल उलटे आदमी हैं। गांधी से हमारा क्या लेना-देना! लेकिन गांधी हमारे प्रतिनिधि नहीं हैंवे हमारे रिप्रेजेंटेटिव भी नहीं हैं। सच तो बात यह है कि गांधी हमारे बिलकुल ही उलटे प्रतिनिधि हैंजैसे हम नहीं हैं वैसे वे हैं। लेकिन वे हमारे प्रतिनिधि बन कर इतिहास में याद रह जाएंगे। हम तो भूल जाएंगेवे याद रह जाएंगे। और पांच हजार साल बाद लोग कहेंगेगांधी का युग कितना अदभुत था! गांधी को देख कर वे सोचेंगे हमारे बाबत। वह सोचना बिलकुल झूठा होगा।
ऐसे ही राम की याद रह गई हैबुद्ध की याद रह गई हैमहावीर की याद रह गई है। उस जमाने के लोग भूल गए हैं। राम को देख कर हम कहते हैंआह! कैसे अदभुत लोग थे! राम का युगराम-राज्य!
झूठी हैं ये बातें। आदमी नहीं था बड़ाकुछ आदमी बड़े हुए हैं इतिहास मेंसमाज बड़ा नहीं हो पाया। और कुछ आदमी चमकते हुए सितारों की तरह दिखाई पड़ते हैं पीछे और हम उनके आधार पर पूरे जमाने को चमकता हुआ मान लेते हैं। यहां बिलकुल भूल हो जाती है। बल्कि सच्चाई तो यह है कि अगर समाज बहुत बड़ा हो तो महापुरुष पैदा ही नहीं हो सकते हैंमहापुरुष हमेशा छोटे समाज में पैदा होते हैं।
जैसे स्कूल का शिक्षक होता हैवह काले बोर्ड पर सफेद खड़िया से लिखता हैसफेद दीवाल पर नहीं लिखता। क्योंकि सफेद दीवाल पर लिख तो सकते होलेकिन दिखाई नहीं पड़ेगा। सफेद दीवाल है तो सफेद खड़िया का लिखा हुआ दिखाई कैसे पड़ेगासफेद खड़िया चमक कर दिखाई पड़ती है काले बोर्ड पर।
समाज जितना काला होता हैमहापुरुष उतने ही चमकते हुए दिखाई पड़ते हैं। अगर समाज महान हो तो महापुरुष का पता लगाना मुश्किल है। असंभव है। बिलकुल असंभव है। अगर गांधी जैसे सौदो सौ लोग भी मौजूद होंतो मोहनदास करमचंद गांधी कहां पैदा हुएकोई फिकर करेगा पोरबंदर कीखो जाएंगे। लेकिन नहीं खोते हैंक्योंकि पूरा समाज हीन है। और उस हीन काले तख्ते पर जरा सी भी चमकती हुई लकीर हजारों वर्ष तक दिखाई पड़ती रहेगी।
अगर हम पीछे लौट कर देखेंदस-बीस नाम याद आते हैं। वह क्योंक्योंकि समाज बिलकुल काले तख्ते की तरह साबित हुआ है। उसमें वे चमकते हुए नाम दिखाई पड़ते रहते हैं। और फिर उन चमकते हुए नामों के अनुसार हम पूरे समाज का निर्णय लेते हैंजो कि बिलकुल ही इल्लाजिकल हैबिलकुल तर्कशून्य है। महापुरुष पैदा हुए हैंमहान समाज पैदा नहीं हुआ। और यह भी ध्यान रहेजिस दिन महान समाज पैदा होगाउस दिन महापुरुष इतनी आसानी से नहीं पहचाने जा सकेंगे।
दूसरी बात: अतीतबीता हुआजो हो चुकाउसके दुखद स्मरण तो भूल जाते हैंसुखद स्मरण शेष रह जाते हैं। अगर आप अपनी जिंदगी में लौट कर देखेंतो आपको दुखद बातें तो भूल गईं--भूल क्या गईंआपने कोशिश करके उनको भुलाया भी है--सुखद बातें याद रह गईं।
यह बहुत मजेदार बात है मनुष्य के चित्त की कि जब दुख बीतता है तो दुख बहुत गहरा होकर दिखाई पड़ता हैऔर जब सुख बीतता है तो सुख का पता भी नहीं चलता। सुख मौजूद जब होता है तो पता नहीं चलतादुख जब मौजूद होता है तो पता चलता है। और जब दुख बीत जाता है तो भूल जाता हैऔर जब सुख बीत जाता है तो याद रह जाता है। सुख को हम संजो कर रख लेते हैं अपने मन में कि ये-ये सुख की बातें घटी हैं जिंदगी में। और उन्हीं की याद करते रहते हैं। दुख को विस्मरण कर देते हैंसुख को याद करते हैं। इसलिए पीछे लौट कर देखने पर ऐसा लगता है कि जिंदगी बड़ी सुखद थी। जब गुजरे थे उसी वक्त से तो इतना सुखद नहीं था
एक छोटे से बच्चे से पूछो कि बचपन कितना सुखद हैबच्चे बहुत जल्दी जवान हो जाना चाहते हैंबचपन से छुटकारा चाहते हैं। लेकिन बूढ़े कहते हैंबचपन बड़ा सुखद था। बच्चे बहुत जल्दी में रहते हैं कि कब जवान हो जाएं। क्योंकि जवान आदमी शानदार दिखाई पड़ता है। बच्चों को कोई भी सुख नहीं है। स्कूल में शिक्षक डांटता हैघर में मां पीछे पड़ी हैबाप पीछे पड़ा हैजिंदगी एक मुसीबत हैपरीक्षा हैयह हैवह हैसब है। कोई सुख नहीं है बच्चे को। लेकिन बूढ़े आदमी को बचपन के सुख याद आते हैं। बच्चे को बिलकुल नहीं मालूम पड़ते कि कोई सुख हैं। कोई बच्चा नहीं कहेगा कि मैं सुखी हूं। लेकिन सब बूढ़े कहते हैं कि जब मैं बच्चा था तो बहुत सुखी था।
यह तथ्यगत नहीं हैयह फैक्चुअल नहीं हैयह सच्चाई नहीं है। जब जिंदगी गुजरती है तो दुखपूर्ण मालूम पड़ती हैजब बीत जाते हैं दिन तो सुख की सौरभ बाकी रह जाती हैदुख भूल जाते हैं। बस सुख की कथा याद रह जाती है। और जो व्यक्ति के साथ होता है वही समाज के साथ होता है। अतीत स्वर्णयुग मालूम पड़ता है। बहुत सुंदर था जो बीत गयाजो है वह दुखद मालूम पड़ता है। हर पीढ़ी यह कहती है कि अब जमाना बिगड़ गयापहले जमाना अच्छा था। पिछली पीढ़ी भी यही कहती थी। उससे पिछली पीढ़ी भी यही कहती थी। लौटते चले जाओ पीछेहमेशा हर पीढ़ी ने यह कहा है कि वह जमाना और था जो हमने देखा हैअब सब बिगड़ गया।
और आप हैरान होंगेदुनिया में एक भी किताब ऐसी नहीं है जिसमें यह लिखा हो कि आजकल का जमाना ठीक है। हर किताब में यह लिखा है कि पहले का जमाना ठीक था। पुरानी से पुरानी किताब में भी यही लिखा हुआ है। चीन में छह हजार वर्ष पुरानी किताब मिली है। उस किताब की भूमिका में लिखा है कि धन्य हैं वे लोग जो पहले हुएअब तो जमाना बिगड़ गया।
छह हजार साल पुरानी किताब भी यही कहती है कि पहले सब अच्छा थाअब बिगड़ गया! यह पहले कब थायह था भी कि यह साइकोलाजिकल इल्यूजन हैयह कोई मानसिक धोखा है कि कभी था पहले का युगप्राचीन से प्राचीन ग्रंथ भी और पहले की बात करते हैंकि और पहले सब ठीक था।
नहींइसमें मानसिक भ्रम है। याददाश्त गुजरते-गुजरते सुखद बाकी रह जाती हैदुखद भूल जाता है। फिर उस सुख को ही संजो कर हम बैठ जाते हैंवह हमारी धरोहर बन जाती है। बस वह हमारे चित्त की संपत्ति हो जाती हैफिर उसी को हम संजोते रहते हैं। और फिर यह जो भाव बन जाए भीतरतो फिर जो भी मौजूद है वह बुरा दिखाई पड़ने लगता है। वह उतना बुरा नहीं होता जितना दिखाई पड़ता है। वह जो स्मृति का हमने सुख बना रखा हैउसकी तुलना में बुरा दिखाई पड़ने लगता है।
तो पहली तो बात यह समझ लेनी जरूरी है कि दुनिया कभी अच्छी थीसमाज अच्छा थायह भ्रम है। और यह समझ लेना इसलिए जरूरी है कि अगर समाज को अच्छा बनाना है तो पुरानी कोई तरकीबें काम नहीं करेंगीक्योंकि वे तरकीबें काम में लाई जा चुकीं और समाज अच्छा नहीं हो सका।
जैसा गांधी जी कहते हैं कि राम-राज्य ले आओ। यह पीछे लौट चलने की दलील है। पीछे लौट चलने से कोई हित नहीं है। अगर राम-राज्य अच्छा होता तो हम आगे आते ही नहींहम वहीं रुक जाते। वह अच्छा नहीं थाउसे छोड़ना पड़ा। वह छूटाउससे हम पार हो गए। आगे जा सकते हैं हमपीछे नहीं लौट सकते। आगे ही जाने का उपाय हैपीछे लौटने का उपाय भी नहीं है। लेकिन जो लोग यह मान लेते हैं कि पहले अच्छा थाबस फिर वे निश्चिंतता से पहले के गुणगान करने लगते हैं। और कहते हैं कि पहले जैसा समाज बनाओवर्ण बनाओआश्रम बनाओ। पहले जैसा ब्राह्मण को आदर दोपहले जैसे मां-बाप की पूजा करोअतिथि को देवता समझोपहले जैसा सब करो। तो फिर समाज अच्छा हो जाएगा।
जब वह सब किया जाता थातब भी समाज अच्छा नहीं था। समाज अच्छा था ही नहीं आज तक! क्योंकि समाज कैसे अच्छा होइसके सूत्र ही नहीं खोजे जा सके। लेकिन आगे समाज अच्छा हो सकता है। मेरी दृष्टि पीछे की तरफ नहींआगे की तरफ है। मैं आप से यह कहता हूंआगे समाज अच्छा हो सकता है। लेकिन उसके लिए हमें बुनियादी चिंतन करना पड़ेगा।
हमारे चिंतन की प्रक्रिया ही झूठी और असत्य पर खड़ी है।
जैसे: हम कहते हैंचोरी हैऔर हम चोरी को गाली देते हैं और चोरी बढ़ती जा रही है। लेकिन कोई भी यह नहीं कहता कि चोरी समाज में क्यों हैऔर ऐसा कोई जमाना था जब चोरी नहीं थी?
कोई जमाना ऐसा नहीं था। क्योंकि अगर ऐसा कोई जमाना होता तो पुराने से पुराने शिक्षक और तीर्थंकर और अवतार लोगों को समझाते हैं कि चोरी करना पाप हैचोरी मत करना। किसको समझाते हैंबुद्ध यही समझाते हैंमहावीर यही समझाते हैंजीसस यही समझाते हैं--चोरी मत करनाचोरी पाप है। क्या उन लोगों को समझाते हैं जो चोरी करते ही नहीं थेइनका दिमाग खराब थायह चोरों को ही समझाने वाली बात है कि चोरी मत करना। और जब सुबह से शाम तक यही-यही समझाते हैंतो इसका मतलब साफ है कि चोर काफी रहे होंगे। नहीं तो एकाध दफे कहतेमामला खतम हो जाता।
अगर बुद्ध के वचन उठा कर देखेंतो एक दिन ऐसा नहीं जिस दिन वे न समझाते हों कि चोरी मत करोहिंसा मत करोदूसरी स्त्री की तरफ बुरी नजर से मत देखो। ये सारी की सारी बातें रोज--झूठ मत बोलोबेईमानी मत करोभ्रष्टाचार मत करो--ये ही सब समझा रहे हैं बुद्ध सुबह से लेकर शाम तक। किसको समझा रहे हैं?
ये उपदेश बताते हैं कि चोरों का समाज थाझूठ बोलने वालों का समाज थाबेईमानों का समाज था। बुद्ध उसी के बीच भ्रमण कर रहे हैंउसी को समझाते फिर रहे हैं। नहीं तो कोई भी कह देता कि महाराजहम करते ही नहींआप यह क्यों बकवास जारी किए हुए हैंयह बंद करिए! चालीस साल बुद्ध सुबह से सांझ तक यही समझा रहे हैं। उपदेश बताते हैं कि समाज कैसा था। उपदेश बताते हैं कि समाज कैसा था।
अगर किसी गांव में बहुत डाक्टर होंतो वे बताते हैं कि उस गांव में उसी अनुपात में मरीज होंगे। डाक्टरों का पता लगा कर गांव की बीमारी का पता चल सकता हैबीमारों को नापने की कोई जरूरत नहीं। जिस गांव में कोई भी डाक्टर न होशक होता है कि उस गांव में लोग स्वस्थ होंगे। नहीं तो डाक्टर पैदा हो जाताबीमार डाक्टर को पैदा कर ही लेते।
पापी हमेशा उपदेशक को पैदा कर लेते हैं। उपदेशक उपदेश नहीं देतापापी उपदेश करवाते हैं। जब चोरी बढ़ती है तो कोई न कोई कहने लगता हैचोरी बुरी है। समाज हमेशा ऐसा ही रहा है। और ऐसा ही रहेगाअगर हम बुनियादी बातों को नहीं समझते।
लाओत्से चीन में हुआ एक अदभुत आदमीकोई ढाई हजार साल पहले। वह एक राज्य का कानून मंत्री बना दिया गया। पहले ही दिन मुकदमा आयाएक आदमी ने चोरी की थी। चोरी पकड़ गई थी और आदमी ने स्वीकार कर लिया कि मैंने चोरी की हैअब लाओत्से को फैसला देना था सजा का। उसने छह महीने की सजा चोर को दे दी और छह महीने की उस साहूकार को जिसके घर चोरी हुई थी।
साहूकार ने कहाआपका दिमाग दुरुस्त है! कभी सुना है किसी कानून में कि जिसके घर चोरी हो उसको ही सजा मिले। तब तो हद हो गई!
लाओत्से ने कहा कि जब तक साहूकार को भी सजा नहीं मिलतीतब तक दुनिया से चोरी बंद नहीं हो सकती। एक आदमी के पास गांव की सारी संपत्ति इकट्ठी हो गई हैचोरी नहीं होगी तो क्या होगा?
अगर एक आदमी के पास गांव की सारी संपत्ति इकट्ठी हो जाए--ऐसा समाज हो कि एक तरफ संपत्ति इकट्ठी हो जाएएक तरफ भूख इकट्ठी हो जाए--तो चोरी नहीं होगी तो क्या होगालेकिन हम कहते हैंचोरी नहीं होनी चाहिए। और संपत्ति एक तरफ इकट्ठी होती चली जाएइसकी कोई फिकर नहीं है। चोरी होगीचोरी होती रहेगीचोरी नहीं रुक सकती। अदालत बनाओकानून बनाओनरक बनाओभगवान को कांस्टेबल बना कर बिठाल दोचोरी जारी रहेगीचोरी नहीं मिटने वाली। और चोरी रोज बढ़ती जाएगीक्योंकि संपत्ति एक तरफ इकट्ठी होती चली जाएगी।
चोरी व्यक्तिगत संपत्ति के साथ जुड़ी है। इसलिए अगर चोरी को कम करना हैतो संपत्ति उस वर्ग तक भी पहुंचनी चाहिए जहां भूख हैजहां दीनता हैजहां दरिद्रता है। जब तक वहां भी संपत्ति नहीं पहुंच जातीतब तक चोरी नहीं रुकेगी। अगर चोरी रोकनी है तो धन बढ़ाओ और निर्धन को कम करो। जब तक निर्धनता हैचोरी रहेगी। कितना ही समझाओकितना ही सुझाओइससे कुछ होने वाला नहीं है।
लेकिन हम बुनियादों को पकड़ना नहीं चाहते। हम एक-एक चोर को सुधारने की कोशिश करते हैंऔर पूरे समाज की व्यवस्था चोरी करवाने वाली है। वह पूरी समाज की व्यवस्था नहीं बदलतीतो कुछ लोग हिम्मत करके चोरी न करेंयह हो सकता है। लेकिन कितने लोग हिम्मत जुटाएंगेकितनी देर तक हिम्मत जुटाएंगेचोरी जारी हो जाएगी। एक नहीं करेगादूसरा करेगा;दूसरा नहींतीसरा करेगा।
चोरी खत्म होनी चाहिएजरूर खत्म होनी चाहिए। लेकिन चोरी है क्योंचोरी इसलिए है कि संपत्ति कम है। और कम संपत्ति भी कुछ हाथों में केंद्रित हो जाती है और शेष लोग निर्धन छूट जाते हैं।
जीवन के सारे उपद्रव इसी तरह विकसित होते हैं। लेकिन किसी उपद्रव को मिटाने में समाज आज तक समर्थ नहीं हो सका। और नहीं होने का कारण यह है कि हमने उनकी मूल  भित्ति को ही चोट नहीं पहुंचाई। हम ऊपर-ऊपर टीम-टाम करते रहे।
लाओत्से को कानून मंत्री का पद छोड़ देना पड़ा। क्योंकि सम्राट ने कहातुम्हारा दिमाग खराब है। सारे गांव में चर्चा हुई कि यह आदमी पागल है।
लेकिन मैं आपसे कहता हूंलाओत्से पागल नहीं थापूरा गांव पागल था। लाओत्से ने जो कहा थाबुनियादी रूप से सच था। और जिस दिन दुनिया में लाओत्से की बात स्वीकृत हो जाएगीउसी दिन चोरी खतम हो जाएगी। उसके पहले चोरी खतम नहीं हो सकती।
हांएक चोर बदला जा सकता है कि दूसरा पैदा हो जाएइससे कोई अंतर नहीं होता। व्यक्तिगत रूप से एक आदमी इस समाज में भी चोरी से बच सकता है। लेकिन समाज चोरी से नहीं बच सकता।
तो हमें बुनियादी चिंतन करना जरूरी है कि जीवन के ढांचे को हम फिर से सोच लें कि हजारों साल से यह ढांचा चल रहा हैलेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा है। हम आदमी को जो भी समझाते हैंउस समझाने के पीछे यह ढांचा बदलता है या ढांचा जारी रहता है?
गरीब को हम हजारों साल से समझा रहे हैं कि तुम्हारे पिछले जन्मों के पापों के कारण तुम गरीब हो।
यह सरासर झूठी बात है। कोई आदमी किसी पिछले जन्म के पाप के कारण गरीब नहीं है। गरीब समाज की व्यवस्था के कारण है। और कोई आदमी अमीर नहीं है पिछले जन्मों के पुण्यों के कारण। समाज की व्यवस्था के कारण अमीर है।
लेकिन हम यह समझा रहे हैं हजारों साल से। और इसकी वजह से न गरीबी मिटती हैन धन पैदा होता है। क्योंकि निर्धन अपनी निर्धनता में तृप्त हो जाता हैसंतुष्ट हो जाता है कि ठीक है। अब पिछले जन्मों के कर्मों को तो बदला नहीं जा सकताअब अगले जन्म में जो कुछ कर सकेंगेकर रहे हैंवह अगले जन्म में मिलेगाइस जन्म में मिलने वाला नहीं। निर्धन अपनी निर्धनता को स्वीकार कर लेता हैधनी अपने धन को स्वीकार कर लेता है। समाज के ढांचे में कोई रूपांतरण नहीं होताचोरी जारी रहती हैझूठ जारी रहता हैबेईमानी जारी रहती है।
दूसरी बातहमने मनुष्य के सहज स्वभाव को आज तक स्वीकार नहीं किया। और जब तक मनुष्य का सहज स्वभाव स्वीकार नहीं होतातब तक दुनिया अच्छी नहीं हो सकती। हम उलटी बातें आदमी को सिखाते हैं। उसमें आदमी बेईमान होता हैईमानदार नहीं होता। हम आदमी को क्या सिखा रहे हैंहम उसे उलटी बातें सिखा रहे हैंजो स्वभाव के प्रतिकूल हैंजो स्वभाव के अनुकूल नहीं हैं।
जैसे हम कहते हैं कि कितनी कामुकता बढ़ गई! संयम होना चाहिए! एक मित्र ने प्रश्न भी पूछा है इस संबंध में। वह भी इस संदर्भ में आपको याद दिला दूं।

किसी मित्र ने पूछा है कि गांधी जी संयम पर जोर देते हैंब्रह्मचर्य पर जोर देते हैं। वे कहते हैंसंयम ही जीवन है। आप क्या कहते हैं?

मैं कहता हूंसंयम पाप हैजीवन नहीं। और मैं कहता हूं कि ब्रह्मचर्य की बातें करना इतना खतरनाक है जिसका कोई हिसाब नहीं। लेकिन इसको समझ लेना पूरातब कोई निर्णय लेना।
संयम बिलकुल नहीं चाहिएचाहिए समझसंयम नहीं। जितनी समझ होगीसंयम अपने आप आएगालाना नहीं पड़ेगा। जो संयम अपने आप आता हैवह तो हितकर है। और जो लाना पड़ता हैवह बिलकुल जहर है और खतरनाक है।
लेकिन अब तक यही सिखाया गया है कि संयम साधो! साधा हुआ संयम पाप है। साधे हुए संयम का क्या मतलब होता हैसाधे हुए संयम का मतलब होता है: भीतर कुछ हैऊपर से कुछ पकड़ लो। भीतर कामवासना हैऊपर से ब्रह्मचर्य का पाठ रखो। भीतर काम चलेगासेक्स चलेगाऊपर ब्रह्मचर्य की बातें चलेंगी। ब्रह्मचर्य ऊपर रहेगाभीतर ब्रह्मचर्य से बिलकुल उलटी आत्मा रहेगी। अगर ब्रह्मचारियों की खोपड़ी खोली जा सकेतो उनके अंदर ब्रह्मचर्य बिलकुल नहीं मिलेगा। मिल ही नहीं सकता। वहां भीतर वही मिलेगा जो उन्होंने सप्रेस किया हैदबाया है। अगर ब्रह्मचारियों के सपने जाने जा सकें...।
और अब जानने का उपाय हो गया हैइसलिए ब्रह्मचारियों को अब सावधान हो जाना चाहिए। अब उन्होंने व्यवस्था कर ली है कि सपने पकड़े जा सकते हैं। अब रात मशीन लगा कर सपने टेप किए जा सकते हैं कि सपने में क्या हो रहा है! उसके सब सिंबल्स पकड़े जा सकते हैं। क्योंकि मस्तिष्क पूरे वक्त चलता है। और चलने से पता चल गया है कि जब सेक्स का मन में विचार चलता हैतो धमनियां किस तरह धड़कती हैं। वह धमनियों की धड़कन कागज पर आ जाती है और पता चल जाता है कि भीतर क्या चल रहा है। अब बहुत दिन यह धोखा नहीं चल सकता कि भीतर कुछ चलता रहे और ऊपर आप कुछ चलाते रहें।
ब्रह्मचर्य आता है। वह बात दूसरी है। उसके लिए कभी नहीं कोई संयम साधना पड़ता। वह आता है सेक्स की अंडरस्टैंडिंग सेदमन से नहीं। जो आदमी अपनी कामवासना को जितना समझ लेता हैउतना ही मुक्त हो जाता है। लेकिन ब्रह्मचर्य लाना नहीं पड़तालानी पड़ती है सेक्स की समझ। जितनी सेक्स की वृत्ति की समझ बढ़ती हैबोध बढ़ता हैज्ञान बढ़ता हैउतना ही ब्रह्मचर्य फलित होता है। ब्रह्मचर्य लाना नहीं पड़ताआता है। जैसे आदमी चलता है और पीछे छाया आती हैऐसे ही जितना आंतरिक जीवन का ज्ञान और बोध बढ़ता हैउतना ही ब्रह्मचर्य आता है।
लेकिन वह बात अलग हैआया हुआ संयम बात अलग है। हमें जो सिखाया गया है हजारों साल से वह लाया हुआ संयम है। वे कहते हैं कि दबाओ हिंसा कोऔर अहिंसक बनो। वे कहते हैंदबाओ वासना कोवासना पाप है। इच्छा को दबाओपरिग्रह को दबाओधन को दबाओलोभ को दबाओक्रोध को दबाओसबको दबा लो।
जिसको दबाओगे वह भीतर बैठ जाएगा। ऊपर कपड़े सफेद होंगेभीतर आदमी काला बैठ जाएगा। और वह काला आदमी प्राण लेगावह पूरे वक्त सताएगा। और इसीलिए अक्सर यह होता है--आपने देखा होगाधार्मिक आदमी को अगर गौर से देखें तो उसके व्यक्तित्व में पाखंड दिखाई पड़ेगाउसके व्यक्तित्व में हिपोक्रेसी दिखाई पड़ेगी। ऊपर से कुछ होगाभीतर से बिलकुल दूसरा आदमी होगा। उसके व्यक्तित्व में द्वैत मालूम पड़ेगा। एक उसका व्यक्तित्व होगाजैसा वह दिखाई पड़ता हैएक उसका व्यक्तित्व होगाजैसा वह है। और वह भी जानता है। लेकिन फिर वह उलटे रास्ते अख्तियार करेगा। वह पीछे के रास्ते अख्तियार करेगा। और उन पीछे के रास्तों पर उसकी गति चलेगी।
यहां वह कहेगा कि लोभलोभ पाप हैलोभ ठीक नहीं है। लेकिन अगर उसके चित्त की दशा समझेंतो लोभी की होगी। वह दिन-रात चिंता करेगा कि स्वर्ग कैसे मिल जाएमोक्ष कैसे मिल जाएये भी लोभ के ही रूप हैं। क्या चाहते हो स्वर्ग मेंक्या जरूरत है स्वर्ग के पाने कीयह ग्रीड यहां दबा लीवहां निकलनी शुरू हो गई। यहां वह कहेगा कि स्त्रियों से दूर रहना! और स्वर्ग में इंतजाम करेगा अप्सराओं का। ये स्वर्ग की अप्सराओं की जरूरत क्या हैये किस दिमाग से निकलती हैं स्वर्ग की अप्सराएं?
और आपको पता नहीं होगा शायदयहां जमीन पर जो स्त्रियां हैंवे तो बेचारी जवान भी होती हैं और बूढ़ी भी हो जाती हैं। स्वर्ग की अप्सराएं कभी बूढ़ी नहीं होतींसोलह साल पर उनकी उम्र रुक जाती हैउसके आगे नहीं जाती। सोलह के ऊपर अगर किसी स्त्री की चाहना-वाहना होस्वर्ग मत जाना। वहां सोलह के ऊपर कोई स्त्री होती नहींबस सोलह पर ठहर जाती है।
ये कौन लोग शास्त्र लिख रहे हैं स्वर्गों काइनके दिमाग में क्या हैये किस बात की सबूत हैं इनकी कल्पनाएंवहां कल्पवृक्ष बनाए हैंजिनके नीचे बैठ जाइए और जो भी कामना करिए पूरी हो जाती है। और यहां वे कहते हैंकामना छोड़िएकामना छोड़ने से स्वर्ग मिलेगा। स्वर्ग में कल्पवृक्ष हैंजिनके नीचे बैठने से सब कामनाएं पूरी हो जाती हैं। यह क्या सर्किल हैयह क्या चक्कर हैयह दिमाग कैसा हैयह धोखा किसको दिया जा रहा है?
दिमाग यहां जिसको दबाता हैआगे पाने का इंतजाम कर रहा है। जो-जो यहां छोड़ता हैवहां पाने का इंतजाम कर रहा है। लेकिन उसी पाने के लिए छोड़ रहा है। और हम समझते हैं कि बहुत त्याग किया जा रहा है। लोभ छोड़ा जा रहा है।
कोई लोभ नहीं छोड़ा जा रहा है। जिस आदमी का लोभ छूट जाता हैउसके मन में स्वर्ग की कामना भी उसी क्षण छूट जाती है। क्योंकि जब लोभ नहीं हैस्वर्ग की जरूरत क्या हैस्वर्ग लोभ का ही विस्तार है। जिस आदमी का लोभ छूट जाता हैउसे मोक्ष की कामना भी छूट जाती है। क्योंकि मोक्ष भी लोभ का विस्तार है। परम आनंद की आकांक्षा भी तो लोभ का विस्तार है।
लेकिन नहींवह हमें दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि हमने एक डिसेप्टिव पर्सनैलिटीएक धोखा देने वाला व्यक्तित्व विकसित किया है। और उसने ही सारे समाज को रुग्ण किया हैबीमार किया हैभ्रष्ट किया है। सबसे बड़ी भ्रष्टता एक है कि एक-एक आदमी दो-दो हिस्सों में खंडित हो जाए। हम कहते कुछ और हैंजीते कुछ और हैंकामना कुछ और करते हैं।
मेरी अपनी समझ यह है कि अगर मनुष्य को ऊंचा उठाना हैतो पहली तो बात यह हैमनुष्य को पाखंडी मत बनने देना। क्योंकि पाखंडी मनुष्य से गिरा हुआ कोई आदमी नहीं होता। और अगर मनुष्य को पाखंडी नहीं बनने देना हैतो पहली बात है,मनुष्य के जीवन में जो भी हो उसकी निंदा मत करनाक्योंकि निंदा से पाखंड शुरू होता है। जो भी मनुष्य के जीवन में हैउसको स्वीकार करना और समझनाऔर उसको रूपांतरित करनादमन मत करना।
अब जैसे क्रोध है। मनुष्य के भीतर क्रोध है। और प्रकृति ने बहुत जान कर क्रोध रखा है। और अगर किसी बच्चे में क्रोध न होतो वह बच्चा विकसित ही नहीं हो सकेगा। आप जरा सोचें कि एक बच्चा पैदा हो जिसमें क्रोध है ही नहींआप उस बच्चे की कल्पना करें जिसमें क्रोध है नहीं। वह बच्चा विकसित नहीं हो सकेगा। क्योंकि शिक्षक उसको चांटा मारेगावह बैठा हुआ देखता रहेगा। उसे क्रोध ही नहीं आएगा कि वह शिक्षक के चांटे से सोचे कि मैं जो आज नहीं करके लाया हूंवह करके लाऊं। उसको क्रोध ही नहीं आता। उसका बाप कहेगास्कूल जाओडंडा उठा लेगा। वह बैठा रहेगाक्योंकि उसे क्रोध नहीं आता।
क्रोध तो गति हैताकत है। वह जरूरी है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि वह सदा बना रहे। इसका यह मतलब है कि वह एक तल पर जरूरी है और एक तल पर वह सारी की सारी शक्ति रूपांतरित होनी चाहिए। जैसे कोई आदमी सीढ़ी पर चढ़ता है। तो पहले सीढ़ी पर चढ़ना जरूरी हैअगर ऊपर जाना है। लेकिन फिर ऊपर जाकर सीढ़ी छोड़नी भी पड़ेगी। और नहीं तो वह कहे कि जब हम सीढ़ी पर चढ़ गएतो अब हम छोड़ नहीं सकते। क्योंकि हम चढ़े क्योंऔर अगर उतरना था तो हम चढ़ते ही नहींपहले आप बता देते।
ऊपर जाने के लिए सीढ़ी पर चढ़ना भी जरूरी है और ऊपर जाने के लिए सीढ़ी को छोड़ना भी जरूरी है। नहीं तो सीढ़ी पर ही अटक जाइएगा।
क्रोध से गुजरना जरूरी है। क्रोध होना भी जरूरी है और एक सीमा पर जाकर क्रोध से मुक्त हो जाना भी जरूरी है।
लेकिन क्रोध की निंदा यह सिखाती है कि नहींक्रोध पाप हैछोड़ो! और छोड़ेंगे कैसे आप क्रोध कोवे कहते हैंक्षमा का भाव धारण करो।
लेकिन जिस आदमी में क्रोध हैवह क्षमा का भाव धारण कैसे कर सकता हैवह अगर किसी से यह भी कहेगा कि जाओमैंने क्षमा कर दिया। तो उसमें भी क्रोध होगा। क्रोधी आदमी की क्षमा भी क्रोध ही होगी। और वह उसमें भी मजा लेगा कि देखो मैंने क्षमा कर दियामैं कोई साधारण आदमी नहीं! क्रोध से भरा हुआ व्यक्तिजो भी करेगाउसमें क्रोध होगा।
इसलिए मैं कहता हूंक्रोध को दबाना मतसमझना। हांक्रोध जितना समझ लिया जाएगाउतना ही विलीन हो जाता है। और जहां क्रोध नहीं हैवहां क्षमा का जन्म होता है। इस बात को समझ लें ठीक से! क्षमा क्रोध की उलटी नहीं हैकि आप क्षमा को ले आएं और क्रोध खत्म हो जाए। क्षमा क्रोध का अभाव हैएब्सेंस है। क्रोध चला जाए तो जो रह जाता है उसका नाम क्षमा है।
हिंसा का अभाव है अहिंसाहिंसा का विरोध नहीं।
वासना का अभाव है ब्रह्मचर्यवासना का दमन नहीं।
लेकिन हमें जो समझाया गया हैवह यह है कि वासना का दमन है ब्रह्मचर्यआत्मदमन है ब्रह्मचर्यसंयम है ब्रह्मचर्य।
नहींसंयम ब्रह्मचर्य नहीं है। संयम का मतलब ही यह होता है कि वासना मौजूद है और तुम सम्हाल रहे हो। संयम का क्या मतलब होता हैसंयम का मतलब होता है कि जिसका हम संयम कर रहे हैं वह मौजूद हैऔर हम उसको सम्हाले हुए हैं। लेकिन जिसको आप सम्हाले हुए हैं वह मौजूद हैऔर सारे प्राणों में भटक रहा है और घूम रहा है।
ब्रह्मचर्य संयम नहीं है। ब्रह्मचर्य कामवासना की समझ से आया छुटकारा है। समझ से! सिर्फ ज्ञान के अतिरिक्त और किसी चीज से छुटकारा नहीं होता।
इसलिए मैं गांधी जी से सहमत नहीं हूं। मैं उन किन्हीं भी लोगों से सहमत नहीं हूं जो कहते हैं कि हमें संयम साधना चाहिए। और वही दिक्कत गांधी जी को अंतिम क्षण तक रही। जीवन भर उन्होंने संयम और ब्रह्मचर्य साधालेकिन आखिरी क्षणों में उन्हें खुद शक आ गया कि पता नहीं यह संयम सध पाया कि नहींक्योंकि संयम कितना ही साधोपीछे वह मौजूद रहता है जिसको आपने दबाया है। और जीवन अंत होने से पहले एक स्त्री को नग्न लेकर बिस्तर पर सोना शुरू कियायह जांच के लिए कि संयम पूरा हुआ है कि नहीं। जीवन भर के ब्रह्मचर्य की साधना के बाद भी भीतर यह खयाल हैयह डाउट हैयह संदेह है कि जो मैंने साधा है वह सध पाया है कि नहीं सध पाया!
लेकिन ऐसा संदेह महावीर और बुद्ध को नहीं है। तो मेरा मानना है कि गांधी और महावीर और बुद्ध के बीच बुनियादी अंतर है। गांधी संयम साध रहे हैंबुद्ध असंयम को समझ रहे हैं। महावीर हिंसा को समझ कर हिंसा से मुक्त हो गए हैंतो जो शेष रह गया है वह अहिंसा है। गांधी जी हिंसा को दबा कर अहिंसक होने की चेष्टा कर रहे हैं। यह चेष्टा नैतिक चेष्टा है।
इसलिए मैं गांधी जी को एक नैतिक महापुरुष कहता हूंधार्मिक व्यक्ति नहीं। बुद्ध और महावीर को धार्मिक कहता हूं। और धार्मिक और नैतिक व्यक्ति में फर्क करता हूं। नैतिक व्यक्ति वह हैजो क्रोध को बुरा मान कर क्षमा की साधना करता हैजो सेक्स को बुरा मान कर ब्रह्मचर्य की साधना करता हैजो परिग्रह को बुरा मान कर अपरिग्रह की साधना करता है। और धार्मिक व्यक्ति वह हैजो परिग्रह को समझ कर अपरिग्रह को उपलब्ध होता हैजो वासना को समझ कर ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होता हैजो हिंसा को जान करहिंसा को पहचान कर हिंसा से छुटकारा पा जाता है और व्यक्तित्व में अहिंसा शेष रह जाती है।
धार्मिक और नैतिक व्यक्ति में बुनियादी अंतर है।
मुझे क्रोध आता है। मैं दो काम कर सकता हूं। क्रोध को दबा लूंऔर रोज दबाता चला जाऊं। और इतना दबा लूं कि अंततः मुझे भी पता न चले कि मुझमें क्रोध रह गया है। लेकिन फिर भी क्रोध होगा। बहुत गहरे में सरक गया होगा। आदमी के मन में बहुत गहराइयां हैं। जिस मन को हम जानते हैंवह बहुत थोड़ा है। उससे दस गुना बड़ा मन नीचे छिपा हैअंधेरे मेंअनकांशसअचेतन। वहां सरक जाएगा क्रोध। और वहां सरक कर नये-नये अनूठे रास्तों से प्रयोग शुरू करेगा। हमें पता भी नहीं चलेगा कि यह क्रोध क्या करवा रहा है।
वहां हिंसा सरक जाएगीऔर नये रूपों में शुरू हो जाएगी। हिंसा का मतलब होता हैदूसरे को दबाना। अगर मैं अपने भीतर हिंसा को दबा कर अहिंसक हो जाऊंतो मैं दूसरों को दबाने की नई-नई तरकीबें निकालूंगा। मैं उनसे कहूंगा कि जो मैं कह रहा हूं वह सत्य है। जो मैं कह रहा हूं वह भगवान की आवाज है। उसे मानना पड़ेगा। और उसे अगर नहीं मानते हो तो मैं अनशन करके मर जाऊंगा।
यह भी हिंसा है। अगर दूसरे आदमी को मैं धमकी देता हूं कि मैं अनशन करके मर जाऊंगातो मैं हिंसा कर रहा हूं। हिंसा का मतलब क्या हैहिंसा का मतलब है दूसरे पर दबावप्रेशर। हिंसा का मतलब है दबाना।
मैं एक छुरा लेकर आपके घर पर आ जाऊं और कहूं कि मैं छुरा मार दूंगाअगर मेरी बात नहीं मानतेइसमें और मैं आपके घर आ जाऊं और लेट जाऊं और कहूं कि मैं भूखा अनशन करता हूं आमरणमर जाऊंगाअगर मेरी बात नहीं मानते--इन दोनों बातों में बुनियादी भेद नहीं है। एक में हिंसा प्रकट हैदूसरे में हिंसा अप्रकट है। एक में हिंसा ऊपर हैदूसरे में हिंसा भीतर चली गई। दूसरे में अहिंसा ऊपर हैहिंसा भीतर।
अहिंसक आदमी अनशन भी नहीं कर सकता किसी को दबाने के लिए। क्योंकि अहिंसक व्यक्ति का कहना यह हैमानना यह है कि मैं कौन हूं जो दूसरे को दबाऊंमेरा हक क्या हैमेरा दबाव क्या हैमैं हूं कौन जो दूसरे को दबाऊं?
लेकिन अगर हमने हिंसा को भीतर दबा लियातो हिंसा नये मार्ग खोजेगी अपना कार्य जारी रखने के लिए। और वे अहिंसक मार्ग हो जाएंगे। और हिंसा जब अहिंसा की शक्ल में आती है तो और खतरनाक हो जाती है। क्योंकि हम उसे पहचान भी नहीं पाते कि उसने कौन से रास्ते ले लिए हैं।
मेरी दृष्टि मेंसंयम थोपना नहीं हैब्रह्मचर्य साधना नहीं हैऊपर से आरोपण नहीं करना हैभीतर चित्त की जो स्वाभाविक दशा हैउसको समझना है। लेकिन अब तक संस्कृति नेसभ्यता ने मनुष्य के स्वाभाविक चित्त को स्वीकार नहीं किया है। वह उसकी निंदा करती है। निंदा करने के कारण प्रत्येक व्यक्ति पाखंडी हो जाता है।
मनुष्य की निंदा बंद करोअगर मनुष्य को बदलना हो। मनुष्य जैसा हैउसे स्वीकार करो। और वह जैसा है उसकी खोज करो कि वह वैसा क्यों हैऔर उसके चित्त कोउसकी चेतना कोउसके ध्यान को विकसित करो कि वह अपने क्रोध को समझ सके।
कभी आप एक छोटा प्रयोग करके देखेंऔर आपको समझ में आ जाएगा कि मैं क्या कह रहा हूं। कभी आप जानते हुए क्रोध करने की कोशिश करें। जब क्रोध आ जाएतब आप पूरी तरह होश से भर जाएं कि मुझे क्रोध आ गया हैअब मैं क्रोध करता हूं। और अगर आप क्रोध कर लेंतो आपने एक चमत्कार कर दिया दुनिया मेंजो अब तक नहीं हो सका है। जानते हुए कोई आदमी क्रोध नहीं कर सकता। जैसे ही आपने जाना कि मैं क्रोध से भर गया हूंक्रोध विलीन हो जाएगा। क्रोध सिर्फ मूर्च्छा में होता हैअज्ञान में होता हैबेहोशी में होता है।
एक मेरे मित्र थे। भारी क्रोध की आदत थी। उन्हें बहुत कहा। उन्होंने कहामेरी कुछ समझ में नहीं पड़ताजब क्रोध मुझे पकड़ता है तो मुझे याद ही कहां रहता है कि मैं होश रखूं। वह तो हो ही जाता हैजब मैं गाली-वाली बक चुकता हूंतब मुझे खयाल आता है। जब मैं मार-पीट कर चुकता हूंतब मुझे पता चलता है कि हो गयाफिर हो गया। मुझे याद ही नहीं रहतामैं याद कैसे करूं?
मैंने एक कागज पर लिख कर उनको एक चिट दे दीउसमें लिख दिया कि अब मुझे क्रोध आ रहा है। मैंने कहाइसे सदा खीसे में रखो। जब भी क्रोध आएकृपा करके इसे एक दफे निकाल कर अंदर रख लेना।
उन्होंने कहादेखें यह हो सकता हैइसकी कोशिश करें।
पंद्रह दिन बाद मेरे पास आए और उन्होंने कहायह तो बड़ी अदभुत बात हो गई। हाथ ले जाने की जरूरत नहीं पड़तीयहां हाथ खीसे पर गया और जैसे कोई चीज भीतर टूट जाती है खटके के साथ। और लगता हैफिर वही! और इतना होशकि वह गया जो पकड़ रहा था।
सिर्फ बेहोशी में पकड़ती हैं वासनाएं मनुष्य कोहोश में नहीं। इसलिए दमन करने की जरूरत नहीं हैजागने की जरूरत है। जो वासना पीड़ित कर रही हैउसके प्रति जागिएघबड़ाइए मत। सेक्स पकड़ता हैसेक्स के प्रति जागिए। और देखिए कि जाग कर क्या होता है। जाग कर हैरान हो जाएंगेजिस वासना के प्रति जागेंगेवही क्षीण होने लगेगी। और अगर निरंतर जागने का प्रयोग जारी रहेअवेयरनेस कातो सारी वासनाओं से छुटकारा हो जाता है।
लेकिन यह छुटकारा बहुत दूसरा हैयह संयम नहीं है। क्योंकि इसके बाद संयम करने को कुछ भी नहीं बचता।
महावीर को लोग कहते हैं कि महाक्षमावान थे। मैं कहता हूंझूठ कहते हैं। महावीर ने कभी किसी को क्षमा नहीं किया। क्योंकि क्षमा वही आदमी कर सकता है जो क्रोध करता हो। महावीर ने क्रोध ही नहीं कियातो क्षमा करने का क्या सवाल है! क्रोध हो भीतर तो क्षमा करने की जरूरत पड़ती है। लेकिन जो आदमी क्रोधित ही नहीं हुआवह क्षमा कैसे करेगामहावीर की क्षमा बिलकुल झूठी बात है। क्षमा के लिए पहले क्रोध करना जरूरी है।
अहिंसक होने के लिए पहले हिंसा होनी जरूरी है। लेकिन जिसकी हिंसा विदा हो गई हैउसे यह भी पता नहीं होता कि मैं अहिंसक हूं। उसकी जिंदगी एक सहज जीवन बन जाती है--एक स्पांटेनिटीएक सहजता।
मनुष्य को अब तक गलत उसूलों पर ढाला गया हैइसीलिए समाज ऊंचा नहीं उठ पाया। समाज ऊंचा उठेगा उसी दिनजिस दिन हम मनुष्य की सहजता को स्वीकार लेंगेसरलता कोउसके व्यक्तित्व में जो भी है उसको स्वीकार कर लेंगेउसको समझेंगेउस पर मेडिटेट करेंगेउस पर ध्यान को विकसित करेंगे।
दुनिया में संयम की नहींध्यान की जरूरत है। दुनिया में कंट्रोल की नहींमेडिटेशन की जरूरत है। आदमी को नियंत्रण करना नहीं सिखाना हैआदमी को जागना सिखाना है। और अगर हम जागना सिखा सकेतो एक दूसरी मनुष्यता पैदा हो जाएगीऐसी मनुष्यता जमीन पर कभी भी नहीं थी। लेकिन आज तक जो मनुष्यता हैवह गलत सिद्धांतों के कारण गलत है।
एक छोटी सी कहानीऔर अपनी बात मैं पूरी करूं।
एक राजमहल के पास से एक पंखा बेचने वाला गुजरता था। वह बहुत जोर से चिल्ला रहा था--कि ऐसे अनूठे पंखे कभी भी नहीं बने दुनिया में!
सम्राट के पास दुनिया के कोने-कोने के पंखे थे। उसने झांक कर नीचे देखा कि ऐसे अनूठे पंखे कौन ले आया! नीचे देखा एक साधारण गरीब आदमीरोज पंखे बेचता था वहीसाधारण पंखेदो-दो पैसे के पंखे बेच रहा है। सम्राट ने गौर से सुना। वह फिर से चिल्ला रहा है कि अनूठे पंखे हैं! ऐसे न कभी देखे गए और न कभी बने!
सम्राट ने उस पंखेवाले को ऊपर बुला लिया। और उससे पूछा कि इन पंखों की खूबी क्या हैदिखते तो बिलकुल साधारण हैं।
उस पंखेवाले ने कहामहाराजअसाधारण दिखने वाले अक्सर साधारण होते हैं। यह पंखा बहुत असाधारण हैदिखाई नहीं पड़ताहै।
क्या खूबी है इसकी?
उसने कहायह सौ साल चलता है। इसकी सौ साल की गारंटी है।
सम्राट ने कहाहैरान कर रहे हो! यह पंखा इतना कमजोर दिखता है कि दो घंटे चल जाए तो मुश्किल है।
उस आदमी ने कहामैं तो गारंटी देता हूं।
सम्राट ने कहाइसके दाम कितने हैं?
उस आदमी ने कहासौ रुपये दाम हैंज्यादा दाम भी नहीं हैं।
उस सम्राट ने कहामैंने बहुत पंखे देखेलेकिन दो पैसे के पंखे के दाम सौ रुपये! तुम कहते क्या होधोखा देना चाहते होफांसी लगवा दूंगा!
उस आदमी ने कहाउसकी चिंता मत करिए। रोज आपके महल के नीचे से गुजरता हूं। जिस दिन पंखा टूट जाएमुझे बुला लीजिए। और रुपये चाहें तो अभी मत देंपीछे भी दे सकते हैं। लेकिन मैं गरीब आदमी हूंऔर मेरा कोई भरोसा नहीं कि कब मर जाऊं। आपका भी कोई भरोसा नहीं कब मर जाएं। पंखा सौ साल की गारंटी का है। इसलिए रुपये मैं अभी ले लेता हूं।
(वह पंखा खरीद लिया गया। दो-चार दिन में ही पंखे की डंडी बाहर निकल गई। सातवें दिन तो वह बिलकुल मुर्दा हो गया। सम्राट ने सातवें दिन उस पंखेवाले को बुलवाया। सम्राट ने कहायह पंखा पड़ा है टूटा हुआ। सात दिन में ही यह गति हो गईतुम कहते थे सौ वर्ष चलेगा! उस आदमी ने कहा कि मालूम होता है आपको पंखा झलना नहीं आता है। पंखा तो सौ वर्ष चलता ही। पंखा तो गारंटीड है। सम्राट ने कहाऔर भी सुनो! पंखा कैसे झला जाता हैयह मैं नहीं जानता हूं!)
उस आदमी ने कहाकृपा करके झल कर बताइएउससे मैं समझ जाऊंगा। महाराज ने पंखा झल कर बताया। वह आदमी हंसा और उसने कहाबस गड़बड़ हो गई। यह पंखा झलने का ढंग नहीं है। यह पंखा तो सौ साल चलतालेकिन आपने गलत ढंग से झलाइसलिए टूट गया। (मैं आपसे कहता हूं कि पंखा पकड़िए सामने और सिर को हिलाइए। पंखा सौ वर्ष चलेगा। आप समाप्त हो जाएंगेलेकिन पंखा बचेगा। पंखा गलत नहीं हैआपके झलने का ढंग गलत है।)
(यह आदमी पैदा हुआ है--पांच-छह हजार या दस हजार वर्ष की संस्कृति का यह आदमी फल है। लेकिन संस्कृति गलत नहीं हैयह आदमी गलत है।) हमारी फिर आपको गारंटी भी सही हैआदमी गलत हैआदमी अपना ढंग बदले।
बहुत हो चुकी यह बात। पांच-छह हजार साल से सुनते-सुनते हम परेशान हैंसारी दुनिया परेशान है। अब हमें बदलाहट करनी पड़ेगी। आदमी को करना पड़ेगा स्वीकार और सिद्धांत बदलने पड़ेंगे।
यह दुनिया बदल सकती हैयह समाज बदल सकता है। आदमी गलत नहीं हैसिद्धांत गलत हैं। आदमी के लिए सिद्धांत हैंसिद्धांतों के लिए आदमी नहीं है। अगर सिद्धांत काम नहीं करतेतो हम सिद्धांत बदलेंगे। और बहुत समय हो गया प्रयोग करते हुए। अब एक नया प्रयोग करना चाहिए--आदमी की स्वीकृति का प्रयोग। आदमी की स्वीकृति का प्रयोगआदमी जैसा भी हैवह स्वीकृत है हमें। इस स्वीकृत आदमी को हम मानेंगे। इस स्वीकृति के भीतर आदमी को जगाएंगे और कहेंगेअपने प्रति जागो--क्या-क्या तुम्हारे भीतर है!
और मजे की बात हैजितना ही जागिएजो श्रेष्ठ है वह शेष रह जाता है जागने परजो अश्रेष्ठ है वह विलीन हो जाता है। संयम की कोई जरूरत नहीं पड़ती। संयम धोखा है। संयमी आदमी बेईमान आदमी है। संयमी आदमी अपने साथ लड़ाई कर रहा है। और जो अपने साथ लड़ाई कर रहा हैवह हमेशा पाखंड में गिर जाएगा।
नहींआदमी को आदमी के भीतर लड़ाना नहीं हैजगाना है। और इस जगाने के सूत्र परकल तीसरे सूत्र पर सुबह मैं बात करूंगावह अंतिम सूत्र होगा। दो सूत्रों पर हमने बात की हैकल तीसरे सूत्र पर सुबह बात करूंगा--आदमी कैसे जागे?

मेरी बातों को इतनी शांति और प्रेम से सुनाउससे अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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