गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-05

सत्य की खोज

मेरे प्रिय आत्मन्!
सत्य की खोज के संबंध में थोड़ी सी बात आपसे कहना चाहूंगा।
सत्य की क्या परिभाषा हैआज तक कोई परिभाषा नहीं हो सकी है। भविष्य में भी नहीं हो सकेगी। सत्य को जाना तो जा सकता हैलेकिन कहा नहीं जा सकता। परिभाषाएं शब्दों में होती हैं और सत्य शब्दों में कभी भी नहीं होता।
लाओत्से ने आज से कोई तीन हजार वर्ष पहले एक छोटी सी किताब लिखी। उस किताब का नाम है ताओ तेह किंग। उस किताब की पहली पंक्ति में उसने लिखा है: मैं सत्य कहने के लिए उत्सुक हुआ हूंलेकिन सत्य नहीं कहा जा सकता है। और जो भी कहा जा सकता हैवह सत्य नहीं होगा। फिर भी मैं लिख रहा हूंलेकिन जो भी मेरी इस किताब को पढ़ेवह पहले यह बात ध्यान में रख ले कि जो भी लिखापढ़ाकहा जा सकता हैवह सत्य नहीं हो सकता।

बहुत अजीब सी बात से यह किताब शुरू होती है। और सत्य की दिशा में लिखी गई किताब होऔर पहली बात यह कहे कि जो भी लिखा जा सकता है वह सत्य नहीं होगाजो भी कहा जा सकता है वह सत्य नहीं होगाफिर लिखा क्यों जाएफिर कहा क्यों जाएजो हम भी कहेंगे वह अगर सत्य नहीं होना हैतो हम कहें क्यों?
लेकिन जिंदगी के रहस्यों में से एक बात यह है कि अगर मैं अपनी अंगुली उठाऊं और कहूं--वह रहा चांद! तो मेरी अंगुली चांद नहीं हो जाती हैलेकिन चांद की तरफ इशारा बन सकती है। अंगुली चांद नहीं हैलेकिन फिर भी चांद की तरफ इशारा बन सकती है। लेकिन कोई अगर मेरी अंगुली पकड़ ले और कहे कि मिल गया चांदतो भूल हो जाएगी। अंगुली चांद नहीं हैलेकिन चांद की तरफ इशारा बन सकती हैऔर उनके लिए ही इशारा बन सकती है जो अंगुली को छोड़ दें और चांद को देखें। अंगुली को पकड़ लेंतो अंगुली इशारा न बनेगीबाधा बन जाएगी।
शब्द सत्य नहीं हैन हो सकता है। लेकिन शब्द इशारा बन सकता है। लेकिन उन लोगों के लिएजो शब्द को पकड़ न लें। जो शब्द को पकड़ लेंउनके लिए शब्द इशारा नहीं बनतासत्य और स्वयं के बीच दीवाल बन जाता है। और हम सारे लोगों को शब्द दीवाल बन गए हैंहमने जितने शब्द पकड़ रखे हैं वे सभी दीवाल बन गए हैं। शब्द के पास कुछ भी नहीं है। जो भी मैं कहूंगाअगर मेरे शब्द ही सुनेतो कुछ भी नहीं पहुंचेगा आप तक। लेकिन अगर शब्द इशारा बन जाएं और उस तरफ आंख उठ जाए जिस तरफ शब्द इंगित करते हैं...। और जिस तरफ शब्द इंगित करते हैंवह बहुत दूर है। शब्द पृथ्वी के हैं और जिस तरफ इशारा करते हैं वह आकाश में हैफासला बहुत है। शब्द और सत्य के बीच बहुत फासला है।
लेकिन कोई व्यक्ति गीता पढ़ता है और गीता के शब्दों को कंठस्थ कर लेता है और सोचता है: मिल गया धर्मजान लिया धर्म। कोई आदमी कुरान पढ़ता है और आयतें कंठस्थ कर लेता है और सोचता है: जान लिया सत्य। सब शास्त्र हमारे हाथों में आकरसत्य और हमारे बीच दीवाल बन गए। सब महापुरुष पकड़ लिए जाने के कारण इशारा नहीं रहेपत्थर बन गए हैं। और ऐसी हालत हो गई है कि जिनसे हमने यात्रा की होतीउन्हें हमने रुकावट बना लिया है।
बुद्ध कहते थेकुछ मित्र एक बार नदी पार किए एक नाव में बैठ कर। फिर जब वे नदी पार कर गएतो वे सोचने लगे कि जिस नाव में हमने नदी पार की हैउस नाव को हम छोड़ कैसे देंइस नाव का तो हम पर बड़ा उपकार है। अगर यह नाव न होती तो हम नदी पार न कर पाते। तो उन्होंने नाव को अपने सिरों पर उठा लिया और बाजार में चले। लोग उनसे पूछने लगेयह क्या कर रहे होहमने कभी लोगों को सिर पर नाव उठाए नहीं देखा।
तो उन लोगों ने कहाइस नाव के द्वारा हम नदी पार हुए। अब हम नाव के प्रति इतने अकृतज्ञ नहीं हो सकते हैं कि उसे नदी में ही छोड़ दें नाव को! हम नाव को अपने सिर पर ले जाएंगे। अब हम इस नाव को सदा अपने सिर पर रखेंगे। क्योंकि इस नाव ने हमें नदी पार करवा दी।
लोग कहने लगेतुम पागल हो गए हो! नाव नदी पार करने के लिए है और फिर छोड़ देने के लिए है। और जो पागल नाव को सिर पर लेकर घूमेगाउससे तो अच्छा था कि वह नदी ही पार न करताकम से कम नाव की झंझट से तो बचता।
शास्त्र और शब्द भी इशारे हैं--किसी तरफ पार हो जाने के लिए। लेकिन उन इशारों को लोग सिर पर ले लेते हैंफिर जिंदगी भर उन्हीं के नीचे दबते हैं और मर जाते हैं। और उसका कोई पता नहीं चलताजिसके लिए इशारे थे।
इसीलिए दुनिया में हिंदू हो गए हैंमुसलमान हो गए हैंईसाई हो गए हैंजैन हो गए हैंलेकिन सत्य के खोजी नहीं। हिंदू का क्या मतलबहिंदू का मतलब है कि कुछ शास्त्रों को एक आदमी ने अपने सिर पर पकड़ रखा है और वह कहता हैयही सत्य है। मुसलमान का क्या मतलब हैमुसलमान का मतलब है: किन्हीं दूसरे शास्त्रों कोकिन्हीं दूसरे इशारों को उसने अपने सिर पर रख लिया है और वह कहता हैयही सत्य है। और सारी दुनिया में सारे लोग शास्त्रों को सिर पर लिए हुए खड़े हैं। अन्यथा आदमी आदमी हैन कोई हिंदू हैन कोई मुसलमान है। हिंदू और मुसलमान बनाने वाला शास्त्र है।
हिंदू और मुसलमान के बीच फासला क्या हैशब्दों का फासला है। उसने एक तरह के शब्द सीखे हैं और मैंने दूसरे तरह के शब्द सीखे हैंतो मैं हिंदू हूंवह मुसलमान हैतीसरा आदमी ईसाई है। फर्क क्या है तीन आदमियों के बीचतीन तरह के शब्दों की परंपराओं के अतिरिक्त और कोई फर्क नहीं है। एक आदमी ने अल्लाह सीखा है तो वह मुसलमान हैएक ने राम सीखा है तो वह हिंदू है। फर्क क्या है दोनों के बीचदो शब्दों का! और अल्लाह भी एक इशारा है और राम भी एक इशारा है। मजे की बात यह है! और जिसकी तरफ इशारा हैवह न अल्लाह हैन राम है। मोहम्मद भी एक अंगुली बता कर कहता हैवह रहा सत्य। इसकी अंगुली को जिसने पकड़ लिया हैवह मुसलमान है। और कृष्ण भी अंगुली उठा कर कहता हैवह रहा सत्य। इसकी अंगुली को जिसने पकड़ लियावह हिंदू है। और जिस तरफ ये अंगुलियां उठती हैं--अंगुलियां हजार हो सकती हैंचांद एक है। लेकिन फिर अंगुलियों को पकड़ने वाले लोग लड़ते हैं।
दुनिया में सिर्फ आदमी हैन कोई हिंदून कोई मुसलमान। शास्त्रों का फासला है। और शास्त्र इशारे हैं। शास्त्र पकड़ने के लिए नहींछोड़ देने के लिए हैं। नाव सिर पर ढोने के लिए नहींयात्रा में सहयोगी बनने के लिए है। सब शब्द सहयोगी की तरह शुरू होते हैं और दुश्मन की तरह छाती पर बैठ जाते हैं। कोई सोचे कि हमारे बीच शब्दों के अतिरिक्त और कोई फासला हैदुनिया में जितने झगड़े हैंशब्दों के अतिरिक्त झगड़े का और कोई कारण हैजितनी आइडियोलॉजीज हैंये क्या हैं?
आइडियोलॉजीज हजार हो सकती हैंलाख हो सकती हैंकरोड़ हो सकती हैं। एक-एक आदमी की एक-एक आइडियोलॉजी हो सकती है। जितने आदमी हैंउतने विचार हो सकते हैं। लेकिन सत्य तो एक है। सत्य का अर्थ है: जो है।
लेकिन जो हैदैट व्हिच इज़उसको अगर जानना हैतो मुझे सारे शब्द छोड़ देने पड़ेंगे। तो उसे मैं बिना शब्दों को छोड़े कभी नहीं जान सकता हूं। सत्य को जानने की दिशा में पहला जो बड़ा काम हैवह शब्दों कोशास्त्रों कोसंप्रदायों कोसिद्धांतों को छोड़ देना है। जो इन्हें जितने जोर से पकड़ेगाउतना ही मुश्किल हो जाएगा उसे जाननाजो है।
सत्य की इसलिए कोई परिभाषा नहीं हो सकतीक्योंकि सभी परिभाषाएं शब्दों में होती हैं। हम नहीं होंगेतो भी सत्य होगापृथ्वी पर मनुष्य नहीं थातो भी सत्य थाशब्द नहीं था लेकिन तबसत्य था। कल यह हो सकता है कि सारे मनुष्य खो जाएंन होंतो भी सत्य होगा। चांद थाजब इशारे करने वाले नहीं थेतब भीऔर इशारे करने वाले नहीं रह जाएंगेतो भी चांद होगा। इशारों से चांद के होने का कोई भी अनिवार्य संबंध नहीं है। हांचांद न हो तो इशारे नहीं किए जा सकते। लेकिन इशारे न हों तो चांद हो सकता है। सत्य थासत्य हैसत्य रहेगाहम होंन होंइससे कोई भेद नहीं पड़ता। जो हैवह हमारे शब्दों से रूपांतरित नहीं हो जाता।
लेकिन हम अपने शब्दों के चश्मों से ही उसे देखना चाहते हैं। तब कठिनाई शुरू हो जाती है। हम सदा अपनी दृष्टि से देखना चाहते हैं। और तब हमारी दृष्टि सत्य को वैसा नहीं दिखने देती जैसा वह हैवैसा बना देती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यह हमारे खयाल में नहीं है कि जब तक हमारी कोई दृष्टि...और दृष्टि का मतलब: हमारे सीखे हुए शब्द। दृष्टि का और कोई मतलब नहीं है। दृष्टि का मतलब है: हमारे सीखे हुए शब्दहमारा सीखा हुआ ज्ञानलघनगवह जो हमने जान लिया हैजो हमने सुन लिया हैजो हमने पढ़ लिया हैवह हमारी दृष्टि को बनाता है। उस दृष्टि के माध्यम से जब हम देखने चलते हैंतो सत्य सत्य नहीं रह जाताबीच में एक परदा है और वह परदा विकृत कर देता है।
मैंने सुना हैएक गरीब आदमी एक गाय खरीद लाया था। लेकिन गाय थी एक सम्राट के घर की। गरीब आदमी की बड़े दिनों से इच्छा थी कि वह गाय खरीदेऔर कोई बहुत बढ़िया गाय खरीदे। बहुत मुश्किल से रुपये इकट्ठे करके गाय खरीदी। लेकिन उसे पता नहीं था कि राजा के घर की गाय गरीब आदमी के घर में कैसे रह सकती हैगाय तो ले आयालेकिन गाय ने उस गरीब के घर का सूखा भूसासूखा घास खाने से इनकार कर दिया। वह हरी घास खाने की आदी थीवह कीमती घास खाने की आदी थी। वह गरीब बहुत परेशान हुआ। बहुत मनायासमझाया। कहामाता! सब तरह से उसके हाथ-पैर जोड़े। लेकिन गाय कहीं सुनती हैघबड़ा गया।
गांव में एक बूढ़ा आदमी था जानकार पशुओं के बाबत। उसके पास गया और कहामैं क्या करूंमैं तो गरीब आदमी हूंसूखा घास है मेरे पास। हरी घास मैं कहां से ला सकता हूं बेमौसम में! राजा के घर की गाय लेकर मुश्किल में पड़ गया। दो दिन से भूखी खड़ी है।
उस बूढ़े आदमी ने कहातू बाजार जा और एक हरे रंग का चश्मा खरीद लाऔर चश्मा गाय की आंख पर चढ़ा दे। चीजें हरी हों या न होंहरी दिख सकती हैं। फिर उसने कहागाय को क्या पता चलेगा कि घास हरी है या नहीं! सवाल गाय को हरी दिखनी चाहिएबात खतम हो गई।
वह गरीब आदमी एक चश्मा खरीद लाया और उसने गाय की आंख पर चश्मा लगा दिया। गाय वह सूखे घास को खाने लगी,क्योंकि घास अब हरा दिखाई पड़ रहा था।
हम सारे लोग भी चश्मे चढ़ाए हुए हैं और चीजों को वैसा देख रहे हैं जैसी वे नहीं हैं। जरा सा चश्मा बदल लेंऔर चीजें दूसरी दिखाई पड़ने लगती हैं। लेकिन एक बात ध्यान रहेजब तक चश्मा हैतब तक चीजें वैसी नहीं दिखाई पड़ सकतीं जैसी वे हैं। क्योंकि चश्मा कुछ न कुछ करेगा। और सब चश्मे रंगीन हैं। सब चश्मे रंगीन हैंक्योंकि सब चश्मे किन्हीं व्यक्तियोंकिन्हीं परंपराओं के द्वारा निर्मित हुए हैं। परंपराएं रंग देती हैं।
जब एक आदमी कहता हैमैं भारतीय! तो वह यह कहता है कि मैं एक खास तरह के देखने का मेरा ढंग हैजो और दूसरों का नहीं है। चीन के रहने वाले का नहीं हैजापान के रहने वाले का नहीं है। मैं भारतीय हूंमेरा एक खास तरह का देखने का ढंग है। भारतीय होने का क्या मतलब हैजब एक आदमी कहता हैहिंदूईसाईबौद्धतो वह यह कहता है कि मेरा एक खास ढंग है चीजों को देखने का--बौद्ध। उस परंपरा के चश्मे से मैं देखता हूं चीजों को। जब एक आदमी कहता हैइस्लामतो वह कहता हैमैं इस्लाम के चश्मे से देखता हूं चीजों को। लेकिन कोई आदमी चीजों को देखने को राजी नहीं हैचश्मों को स्थापित करने को राजी है। तो फिर सत्य को कभी भी नहीं जान सकता। इस्लाम से जो देखा जाएगावह वही होगा जो इस्लाम से देखा जा सकता हैवह वह नहीं होगा जो है।
जब तक हम चश्मों पर जोर देते हैंदृष्टियों पर जोर देते हैंसिद्धांतों पर जोर देते हैंपरंपराओं पर जोर देते हैंतब तक हमारी सत्य की खोज शुरू नहीं हुई है। तब तक हम यह कहते हैंसत्य को ऐसा होना चाहिए। यह हम पहले तय करते हैं सत्य को बिना जाने। यह हम पहले तय करते हैं कि सत्य को कैसा होना चाहिए और वह तय करके फिर हम सत्य के पास जाते हैं--सत्य वैसा ही हो जाता हैक्योंकि हमारा चश्मा जिस रंग का है वैसा हमें दिखाई पड़ने लगता है।
इसलिए दुनिया में कोई तीन सौ धर्म हैंऔर तीन सौ ही धर्म के मानने वालों को सत्य वैसा दिखाई पड़ता है जैसा उनकी किताब में लिखा है। वह दिखाई पड़ेगा हीइसमें सत्य का कोई कसूर नहीं है। इसमें अपनी आंख पर चढ़ा हुआ चश्मा है। जो आदमी यहां हरे रंग का चश्मा लगा कर खड़ा होगाउसको सारी चीजें हरी दिखाई पड़ेंगी। और वह कहेगा कि मुझे दिखाई पड़ रही हैंइसलिए मैं कैसे कहूं कि असत्य हैंसत्य हैं! मुझे दिखाई पड़ रहा है वही सत्य है।
इसलिए ध्यान रहेजो आदमी यह कहता है कि जो मुझे दिखाई पड़ता है वही सत्य हैवह सत्य से भी ज्यादा अपनी दृष्टि की कीमत बता रहा है।
और सत्य उसे दिखाई पड़ सकता हैजो अपनी दृष्टि को छोड़ने को राजी है। जो कहता हैजो मुझे दिखाई पड़ता है वह नहींजो हैउसकी मुझे फिकर है।
तो सत्य की खोज की पहली शर्त है: अपनी दृष्टि को छोड़ने की सामर्थ्य। अपने सीखे हुए शब्दों को छोड़ने की हिम्मत। अपने शास्त्र कोअपने पंथ कोअपने संप्रदाय को एक तरफ हटाने की हिम्मत। इसके लिए जो आदमी तैयार हो जाता हैवह आदमी सीधा देख सकता है कि क्या है। हम सीधे कभी भी नहीं देखतेहमारा देखना सब बंधा हुआ देखना है।
एक पत्थर रखा हुआ है। एक बच्चे को बचपन से सिखाया गया है--यह भगवान है। दूसरे बच्चे को बचपन से सिखाया गया है कि यह कुफ्र है। यह भगवान नहीं हैयह पाप है इसको भगवान मानना। ये दोनों बच्चे उस पत्थर के सामने से निकलते हैं। एक हाथ जोड़ कर नमस्कार करता हैदूसरा मौका मिलते ही उस पत्थर को लात मार कर तोड़ डालना चाहता है। ये दोनों ही उस पत्थर को नहीं देख रहे हैं जो है! एक देख रहा है--भगवानजो उसने सीखा है। और एक देख रहा है--पापजो उसने सीखा है। इन दोनों की भूल एक है। ये दोनों अलग-अलग तरह के लोग नहीं हैं। हम कहेंगेदोनों उलटे हैं। एक मारता है लातएक करता है पूजादोनों उलटे हैं।
दोनों उलटे नहीं हैंदोनों बिलकुल एक जैसे हैं। एक ने यह सीखा हैदूसरे ने वह सीखा है। दोनों अपने सीखने को मानते हैं। पत्थर को कोई देखने को राजी नहीं है कि वह क्या है।
पत्थर न तो पाप है और न भगवान हैपत्थर सिर्फ पत्थर है। लेकिन उस पत्थर की सीधी सच्चाई को देखने के लिए अपनी दृष्टि से छुटकारा बहुत जरूरी है। नहीं तो एक पत्थर को तोड़ने में जान गंवा देगा और दूसरा पत्थर को बचाने में जान गंवा देगाऔर दोनों में से कोई उसको नहीं देखेंगे जो था। जो थाउसे देखतेतो शायद दोनों हंसते और कहते कि हम दोनों पागल हैं! पत्थर पत्थर हैन तो वह भगवान है और न ही वह पाप है कि तोड़ा जाएन वह पूजने योग्य हैन तोड़ने योग्य है।
यह कभी आपने सोचा कि पूजा करने वाला और तोड़ने वालादोनों पत्थर नहीं देख रहे हैंदोनों कुछ और देख रहे हैं! मूर्तिभंजक और मूर्तिपूजकदोनों ही पत्थर नहीं देखते। एक मूर्ति देखता है भगवान कीदूसरा मूर्ति देखता है शैतान की कि तोड़ देने योग्य हैमिटा देने से पुण्य होगा। एक को पूजने से पुण्य होता है। लेकिन बेचारे पत्थर को कोई भी नहीं देखता। मूर्तिपूजक मर जाएगामूर्तिभंजक मर जाएगाऔर तब भी वह पत्थर इस दुनिया में होगा। लेकिन तब वह क्या होगाभगवान होगा कि कुफ्र होगातब वह सिर्फ पत्थर होगा। वह अभी भी वही है। उस पत्थर को पता भी नहीं है कि कोई मेरी पूजा करता है या कोई मुझे तोड़ने आता है। अगर पत्थर को पता होगा तो बहुत हंसता होगा हिंदू परबहुत हंसता होगा मुसलमान पर कि कैसे पागल हो! मैं सिर्फ पत्थर हूंमैं जो हूं वह हूं।
लेकिन हमजो हैउसे कभी देखते ही नहीं। हम तो जो देखने के लिए तैयार किए गए हैंवही देखते हैं।
उन्नीस सौ बावन मेंहिमालय की तराई में नीलगाय नाम का जानवर होता हैउसने खेतों में बहुत उत्पात कर रखा था। बहुत नुकसान कर रहा था। उसकी संख्या बहुत बढ़ गई थी। तो संसद में सवाल उठा कि नीलगाय को गोली मारनी जरूरी हो गई हैलेकिन गाय शब्द उसमें जुड़ा हैउसको गोली कैसे मारी जाए?
तो संसद में एक समझदार आदमी ने कहा कि इस बात को मत उठाइएपहले उसका नाम नीलघोड़ा कर दीजिएफिर गोली मारना आसान हो जाएगा। संसद ने तय किया कि उसका नाम नीलगाय नहीं हैनीलघोड़ा है। और उसके बाद उसको गोली मारी गईधड़ाधड़ नीलगाय मारी गईलेकिन किसी हिंदू ने एतराज नहीं उठाया। क्योंकि नीलघोड़ा के मरने से हिंदू को क्या मतलबनीलगाय मरती तो झगड़ा होता। क्योंकि वह जो गाय का चश्मा थावह दिक्कत ला देतावह खड़ी कर देता फौरन झंझट। लेकिन कोई झंझट नहीं हुई। बड़े होशियार लोग! जरा...और वह नीलगाय बेचारी जो थी वही हैचाहे नीलघोड़ा कहोचाहे नीलगाय। उसे पता भी नहीं चला होगा कि संसद ने हमारा नाम बदल कर मरने की तैयारी कर दी। उसको कोई पता नहीं चला होगा कि आदमी कैसे खेल खेलता है।
लेकिन उसी गांव में अगर वह नीलगाय होती तो झगड़ा खड़ा होतानीलघोड़ा हो गई तो झगड़ा खड़ा नहीं होगा। क्योंकि हम उसे तो देखते ही नहीं जो हैहम तो वह देखते हैं जो हम चश्मा लगा लेते हैं। नीलगाय थी तो वह हमारे धर्म का प्रतीक थी। नीलघोड़ा हो गई तो बात खतम हो गई।
अगर हिंदू-मुस्लिम दंगा होतो आपकी टोपी उठा कर चोटी देखी जाएगी। अगर चोटी है तो मुसलमान मार डालेगाअगर चोटी नहीं है तो हिंदू मार डालेगा। आपसे किसी को मतलब नहीं हैअपने प्रतीक से मतलब है। वह चोटीवह जनेऊअपने प्रतीक से मतलब है। उस आदमी को कोई नहीं देख रहा कि जो वहां खड़ा है। उस आदमी से किसी का कोई संबंध नहीं है।
अपनी इमेज हम आदमी पर आरोपित करते हैं और उसके माध्यम से देखते हैं। हम कभी भी सत्य को नहीं जान सकते हैं। जो आदमी एक प्रतिमा के माध्यम से जीवन को देखता हैवह सत्य को कभी नहीं जान सकता।
अगर किसी आदमी ने कह दिया कि मैं--यह आदमी मुसलमान है। बसआपने मुसलमान की एक धारणा बना रखी हैअब आप उसी धारणा से मुझे देखेंगे। अब जो मैं हूंवह आप कभी देखने वाले नहीं हैं। अब मैं दिखूंगा ही नहीं आपको।
और यह ध्यान रहे कि मुसलमान नंबर एकमुसलमान नंबर दोएक से आदमी नहीं हैंमुसलमान नंबर तीनतीसरे तरह का आदमी हैमुसलमान नंबर चारचौथे तरह का आदमी है। मुसलमान जैसा कोई भी आदमी नहीं हैएक-एक आदमी इंडिविजुअल है। लेकिन जैसे ही हमने कह दिया मुसलमानइंडिविजुअल खत्म हो गया। व्यक्ति के अपने मूल्य हैंएक टाइपएक इमेज खड़ा हो गया कि मुसलमान यानी क्या। और मुसलमान यानी क्याजो आपने सीखा है मुसलमान के बाबत वह। और अब यह आदमी आपको वैसा ही दिखाई पड़ेगा। वह वैसा ही दिखाई पड़ेगा। और इस आदमी के साथ आप जो व्यवहार करेंगेवह इस आदमी के साथ नहीं हैवह उस आदमी के साथ है जिसको आप सोच रहे हैं कि यह है।
इसलिए दुनिया में हम आदमियों से भी नहीं मिल पातेसत्य से मिलना तो बहुत दूर है। व्यक्ति और व्यक्ति के बीच भी मिलन नहीं हो पाताहर आदमी अपनी इमेज से मिल रहा है। हर आदमी इमेजिनेशन से घिरा हुआ हैकल्पना से घिरा हुआ है। दुनिया सत्य की बहुत दूसरी है।
एक आदमी गेरुआ वस्त्र पहने खड़ा हुआ हैआप फौरन झुक कर उसके पैर छू लेंगे। यही आदमी गेरुआ वस्त्र पहने हुए नहीं खड़ा हैऔर आप भूल कर पैर छूने वाले नहीं हैं। आपने किसके पैर छुएइस आदमी के जो यह हैया आपकी गेरुआ वस्त्र के प्रति एक धारणा हैउस धारणा के आप पैर छू रहे हैंआदमियों से किसी को कोई मतलब नहीं है।
ठक्कर बापा के जीवन में मैं पढ़ता थाकि वे अहमदाबाद आ रहे हैं किसी मीटिंग में बोलने के लिए। एक थर्ड क्लास के डिब्बे में चढ़े हुए हैं। एक आदमी--पूरे डिब्बे में भीड़ है भारी--और एक आदमी पूरी बेंच पर कब्जा जमाए हुए लेटा हुआ हैआराम से अखबार पढ़ रहा है। ठक्कर बापा ने उससे कहा कि मेरे भाईमैं बूढ़ा आदमी हूंअगर मुझे थोड़ा बैठ जाने दो!
चुप रहो! बात मत करना बैठने-वैठने की। दूसरे डिब्बे में चले जाओ! उसने लौट कर भी नहीं देखा कि कौन है। अखबार पढ़ रहा है और बगल में बैठे हुए आदमी से थोड़ी देर में कहता हैठक्कर बापा का भाषण है अहमदाबाद में। बड़ा अच्छा आदमी हैबड़ा अदभुत आदमी हैइसको सुनने मुझे भी जाना हैतुम भी चलोगेऔर ठक्कर बापा पीछे खड़े हैंजिनसे वह कहता हैबुङ्ढे बकवास मत करचुपचाप खड़ा रह!
यह किस ठक्कर बापा से मिलने की बात कर रहा हैकिस ठक्कर बापा को देखने जा रहा हैऔर यह जाएगा। और पैर भी छू सकता है। और वहां प्रभावित होकर लौटेगा कि गजब का आदमी था। और वह आदमी बगल में खड़ा थाजिसको बैठने भी नहीं दे रहा है।
जो हैउसकी तरफ हमारी कोई नजर नहीं है। हमारी नजर वहां अटकी है जो हमने सोच रखा है। हम सब अपने चश्मों से बंधे हुए लोग हैं। जिंदगी के सब पहलुओं पर हमारे चश्मे महत्वपूर्ण हैंसत्य महत्वपूर्ण नहीं है। और ध्यान रहेजिसके लिए चश्मा महत्वपूर्ण हैवह सत्य को कभी भी नहीं जान सकता। सत्य की खोज में पहला त्याग है--चश्मे का त्याग।
बहुत मुश्किल है। क्योंकि दृष्टि का त्याग सबसे कठिन बात है। क्यों कठिन बात हैक्योंकि दृष्टि को हमने इतनी प्रगाढ़ता से सीखा है कि हम में और दृष्टि में कोई फर्क ही नहीं रह गया है। अगर आपसे आपकी दृष्टि छीन ली जाएतो आप कहोगे कि मैं तो मिट गयामैं तो बचा ही नहींफिर मैं क्या रहा! आप और आपकी दृष्टि बिलकुल एक हो गए हैं। तो दृष्टि को छोड़ना करीब-करीब मरने जैसा लगेगा। और इसलिए यह समझ लेना कि सत्य की दिशा में वही बढ़ते हैं जो अपने को छोड़ने और मरने के लिए तैयार हैं। जो कहते हैं कि हम तो वही जानेंगे जो है।
बड़ा कठिन है यह। कल एक मुसलमान ने आपको धोखा दे दिया था। फिर आज एक मुसलमान मिलता हैतो आपका मन करता है मानने का कि यह भी धोखा देगाक्योंकि मुसलमान ने धोखा दिया था। लेकिन यह दूसरा आदमी हैयह दूसरा हिंदू हैदूसरा ईसाई हैदूसरा जैन हैयह वही आदमी नहीं है। इसका मतलब यह है कि कल जो आपने सीखा थाउसको बीच में मत लाइएउसको हटाइए। क्योंकि यह बिलकुल दूसरा आदमी है। इससे उस आदमी का कोई संबंध नहीं जिसको आपने कल जाना था। उससे इसके बाबत कोई नतीजा नहीं लिया जा सकता।
बड़ी कठिन है दुनिया। दूसरा था वह आदमीयह तो ठीक हैमैं आपसे कल मिला थाआज मिल रहा हूंआज मैं दूसरा आदमी हूंवही नहींचौबीस घंटे में बहुत कुछ बदल गया हैगंगा बहुत बह गई है।
बुद्ध के पास एक आदमी आया और उसने उनके ऊपर थूक दिया। बहुत गुस्से में था। बुद्ध ने अपनी चादर से थूक पोंछ लिया और उस आदमी से कहाकुछ और कहना है?
बुद्ध के पास बैठे भिक्षुओं को तो आग लग गई। उन्होंने कहापागल हो गए हैं आप! वह आदमी थूक रहा है और आप उससे पूछ रहे हैंऔर कुछ कहना है।
बुद्ध ने कहा कि जहां तक मैं समझता हूंयह आदमी कुछ कहना चाहता हैलेकिन इतने तीव्र भाव हैं इसके कि शब्दों से नहीं कह पाता हैइसलिए थूक कर कहता है। मैं समझ गया हूं इसकी बात। इस आदमी को देखोयह आदमी इतने जोर से भरा हुआ है किसी बात से कि बेचारा शब्दों से नहीं कह सकताइसलिए थूक कर कह रहा है। मैं इसे देख रहा हूं।
अब यह आदमी जैसे बिना चश्मे के देख रहा है। जैसे सीधा देख रहा है। लेकिन बुद्ध का शिष्य आनंद बोला कि हमारे बरदाश्त के बाहर है।
वह आदमी तो हैरान हो गया जिसने थूका था। वह चला गया। रात भर सो नहीं सका। दूसरे दिन क्षमा मांगने आया। उसने बुद्ध के पैर पकड़ लिएरोने लगाआंसू टपकाने लगा। बुद्ध ने कहादेखो-देखो! यह वही आदमी है जिस पर कल तुम नाराज हुए। गंगा में कितना पानी बह गया! कल यह थूकने आया थाआज यह पैर पकड़ कर आंसू गिरा रहा है। और मैं तुमसे कहता हूंआनंदआज भी इसका मन इतने भाव से भरा है कि यह कह नहीं पा रहा हैयह कुछ कहना चाहता हैआंसू टपका रहा है।
वह आदमी कहने लगामुझे माफ कर दें!
बुद्ध ने कहापागलकिसको कौन माफ करेचौबीस घंटे में मैं भी बदल गयातू भी बदल गया। अब वे दोनों घटनाएं जा चुकी हैं। अब वह कोई भी नहीं है इस दुनिया मेंकौन किसको माफ करे! अब मैं वह नहीं हूं जो चौबीस घंटे पहले तू आया था तब था। अगर मैं अब भी वही हूंतो मैं मरा हुआ आदमी हूं। सिर्फ मरा हुआ नहीं बदलता हैजिंदा तो बदल जाता है। जिंदगी का मतलब है बदल जाना। जिंदगी का मतलब है परिवर्तन। और तू भी अब वही नहीं है। सोच! लौट कर देख! तू अब वह कहां है जो थूक गया था मेरे ऊपरतू बिलकुल दूसरा आदमी है। इसलिए छोड़ो। वे दोनों अब नहीं हैंवे जा चुके। पानी पर खींची हुई लकीरों की तरह मिट गए। मैं तुझे देखूंतू मुझे देखज्यादा उचित है। अब उनकोजो अब नहीं रहेबीच में लाने की कोई भी जरूरत नहीं है।
लेकिन वह आदमी कहता हैनहींमुझे माफ कर दो!
तो बुद्ध अपने भिक्षुओं से कहते हैंदेखते होयह आदमी कल ही रुका हुआ है। यह मुझे नहीं देख रहा हैयह चौबीस घंटे पहले उस आदमी को देख रहा है जिसके ऊपर थूक गया था। यह अपने को भी नहीं जान रहा है जो यह अभी है। यह अपने को वहीं जान रहा हैचौबीस घंटे पहलेजब थूक गया था। यह दूसरा आदमी हो गया। तुझे मैं कैसे माफ करूंतू वह है ही नहीं जो थूक गया था। क्योंकि थूक जो गया थावह रो नहीं सकता हैवह आंसू नहीं बहा सकता हैवह पैर नहीं पकड़ सकता है। जिसने क्रोध किया थावही क्षमा मांगने नहीं आया है। क्योंकि क्षमा मांगने का व्यक्तित्व ही दूसरा हैक्रोध का व्यक्तित्व ही दूसरा है।
एक आदमी और दूसरे आदमी में तो भेद है हीएक आदमी में भी एक क्षण के बाद भेद है। लेकिन हम हमेशा वही देखते हैं जो हमने कल देखा थाजो हमने परसों देखा था। जो बीत गयावह चश्मा हमारी आंखों पर लग जाता हैहम उसी से जिंदगी को देखते चले जाते हैं।
आप जिस पत्नी को विवाह करके ले आए थे बीस साल पहलेया जो पत्नी बीस साल पहले आपको पति बना कर ले आई थी,शायद ही आपने बीस साल में उसे गौर से देखा हो--कि वह औरत अब कहां है जो आप लाए थेवह आदमी अब कहां है जो आप लाए थेवे सब बह गए। लेकिन धारणा वहीं रुकी हैचीजें वहीं अटकी हैं। और हम उसी से तौल रहे हैंऔर उसी के पास जी रहे हैं। वह सब जा चुका हैसिवाय स्मृति के और कहीं भी नहीं रह गया है। रोज सब बदल जाता हैरोज सब बदल जाता हैकोई भी ठहरा हुआ नहीं है। जिंदगी एक बहाव है।
सत्य को वे जान सकते हैंजो बहाव के साथ खड़े हो जाते हैं और पिछली दृष्टि को बह जाने देते हैंरुकने नहीं देते।
लेकिन हमारी सारी दृष्टियां अटकी हुई हैं। जीवन के सत्य को जानने के लिएइतना निर्मल होने की जरूरतइतना इनोसेंटजैसे दर्पण। आपने फर्क देखा हैफोटोग्राफ और दर्पण में कुछ फर्क दिखता है?
फोटोग्राफ पकड़ लेता है जो भी उसे दिखाई पड़ता हैफिर उसे छोड़ता नहीं। फोटोग्राफ की दृष्टि होती हैइमेज होता है। फोटोग्राफ बहुत सेंसिटिव हैजो चीज दिख गई वह उसको एकदम पकड़ लेता हैफिर उसको छोड़ता नहीं। फिर वह उसको ही पकड़े जीता है। फिर जिंदगी भर अब वह इसी को पकड़े रहेगा। बहुत चित्र निकलेंगे फिर इसके सामने से--सूरज उगेंगेऔर चांद निकलेगाऔर पक्षी उड़ेंगे--लेकिन नहींअब वह नहीं पकड़ेगा। उसने जो पकड़ लिया वह पकड़ लिया। इसलिए फोटोग्राफ मर जाता है।
दर्पण मरता नहीं है। वह भी देखता हैफोटोग्राफ से भी ज्यादा साफ देखता हैलेकिन पकड़ता नहीं। चित्र सामने से बीत जाते हैंदर्पण खाली हो जाता है। फिर नये चित्र आते हैंउनको देखता हैफिर दर्पण खाली हो जाता है। दर्पण रोज खाली हो जाता हैप्रतिपल खाली हो जाता हैइसलिए रोज फिर से पकड़ने के लिए ताजा हो जाता है। दर्पण रोज दर्शन करता हैक्योंकि दर्पण दृष्टि नहीं बांधतादर्पण पकड़ नहीं लेता।
हम सब फोटोग्राफ जैसे लोग हैं। हमारा जो माइंड हैवह जो पकड़ लेता है तो पकड़ ही लेता हैफिर उससे छूटता नहीं। और इसलिए हमें सत्य का कभी पता नहीं चलताजो हमने पकड़ रखा है उसी के माध्यम से हम जिंदगी को देखते रहते हैं।
सत्य को जान सकते हैं वेजो फोटोग्राफ की तरह व्यवहार नहीं करते खोपड़ी सेजो खोपड़ी से दर्पण की तरह का व्यवहार लेते हैं। जिनकी आंखें पकड़ती नहींखाली हैं। जिनकी आंखें मिरर लाइक हैंचीजें बदल जाती हैं और आंखें खाली हो जाती हैं।
लेकिन नहींयह मुश्किल है बहुत। हम सब अटक जाते हैं। बूढ़ा आदमी बचपन की याद करता रहता है। कहता हैवे दिन! वह बूढ़ा हो गयालेकिन स्मृति में वह बच्चा बना रहता है। वह बूढ़ा हो गयालेकिन स्मृति में जवान बना रहता है। और उन जगह अटका रहता है जहां वह कभी था। अब वहां नहीं हैअब सब बदल चुका हैसब जा चुका हैसब खो चुका है।
नेपोलियन हार गयातो उसे सेंट हेलेना के एक छोटे से द्वीप पर कैद कर दिया गया। सम्राट थातो हाथ में जंजीरें नहीं डाली गईंद्वीप पर कैद कर दिया। द्वीप के बाहर कहीं जा नहीं सकता थाद्वीप पर पहरा था पूरे पर। लेकिन द्वीप के भीतर घूम सकता थाफिर सकता थाजो भी करना हो कर सकता था। संगी-साथी दिए थेडाक्टर दिया थासब इंतजाम किया था।
दूसरे दिन ही सुबहआज रात बंद किया गयादूसरे दिन सुबह अपने डाक्टर को साथ लिए घूमने निकला है नेपोलियन। एक छोटी सी पगडंडी पर एक घासवाली औरत घास का गट्ठा लिए चली आती है। रास्ता संकरा हैडाक्टर चिल्ला कर कहता हैओ घसियारिनहट जा वहां से! देखती नहींकौन आ रहा है--नेपोलियन!
नेपोलियन डाक्टर को कहता हैपागलतू कल के नेपोलियन का खयाल कर रहा है। अब नेपोलियन को देख कर कोई भी नहीं हटेगा। हटने की कोई जरूरत भी नहीं है। वह वक्त गयाजब मैं पहाड़ को कहता कि हट जाओ! तो पहाड़ हट जाता। अब हमें हट जाना चाहिए।
नेपोलियन पगडंडी से उतर कर नीचे खड़ा हो जाता है। वह डाक्टर कहता हैक्या कहते हो तुमक्योंकि डाक्टर को पता नहीं हैसब कुछ बदल गया। लेकिन नेपोलियन का माइंड ज्यादा मिरर लाइक मालूम होता है। वह कहता हैवह बात गई। अब घासवाली के लिए मुझे हट जाना चाहिए। वह वक्त गयाजब मैं सम्राटों को कहता कि हट जाओ! यह दिमागयह चित्त की बातजैसे पीछे सब पुंछ गया। अब नहीं है कुछ। अब हम चीजों को फिर सीधा-साफ देख सकते हैं।
सत्य कोई ऐसी चीज नहीं है कि कहीं रखी है और आप चले जाएंगे और देख लेंगे। इस भूल में मत पड़ना। सत्य है पूरे जीवन का सतत अनुभव। सत्य कोई ऐसी चीज नहीं है कि कहीं हम गएउठाया परदा और दर्शन कर लिया सत्य का। सत्य का अर्थ है: पूरे जीवन का सार-संक्षेप। सत्य का अर्थ है: पूरे जीवन की अनुभूति की उपलब्धि। और पूरे जीवन की अनुभूति की उपलब्धि बहुत डायनेमिक हैस्टेटिक नहीं है। रोज-रोज जानना पड़ता हैरोज-रोज भूल जाना पड़ता है। रोज-रोज जानते-जानते एक क्षण ऐसा आता है कि जीवन के प्रत्यय का बोध हो जाता है कि क्या है जीवन। लेकिन उस जीवन के प्रत्यय के बोध के लिए जरूरी है कि हम जीवन के साथ हों। हम हमेशा जीवन से पीछे होते हैं। हम स्मृति में होते हैंजीवन सदा आगे होता है।
सुकरात मरने के करीब थाउसको जहर दिया जा रहा था। अब जिस आदमी को जहर मिल रहा हैअगर आपको जहर मिल रहा होता तो आप क्या सोचतेक्या करतेआप पड़े हुए हैं खाट पर और जहर तैयार किया जा रहा है। बस आधी घड़ी में जहर आपको दे दिया जाएगा। आप क्या सोचते उस वक्तसोचते बचपन कीसोचते जवानी कीसोचते मित्रों कीसोचते उस सब की जो था। बहुत घबड़ाते कि सब छूट जाएगासब छूट जाएगा! गया मैंमरा मैंअब जिंदगी हाथ से गई!
लेकिन सुकरातमित्र रो रहे हैं उसके पास बैठ करउनकी आंखों से आंसू बंद नहीं होते। तो सुकरात कहता हैकिसके लिए रोते होकिसके लिए रोते होतो वे कहते हैं कि तुम्हारे लिए। सुकरात ने कहा कि जो मैं थाजिसके लिए तुम रोते होवह तो कभी का जा चुकावह अब मरेगा नहींवह तो मर ही चुकावह तो अब है ही नहीं। तुम्हारी जो स्मृतियां हैं मेरे संबंध मेंवह तो कभी का खो चुका आदमी।
और सुकरात उठ कर बाहर जाता है और जहर पीसने वाले से पूछता हैकितनी देर और?
तो जहर वाला कहता हैपागल हो गए होमैं तुम्हारी वजह से धीरे-धीरे पीस रहा हूं। कि इतना अच्छा आदमीथोड़ी देर और जी ले! तुम क्यों बार-बार पूछते होतुम्हारा मतलब क्या है?
तो सुकरात कहता है कि मैं तो जानने को आतुर हूं कि यह मौत क्या हैमैं बिलकुल तैयार हूंतुम जहर ले आओ! मैं इस मौत को जानना चाहता हूंयह मौत क्या हैमेरा मन बिलकुल तैयार है। मेरा मन बिलकुल खाली है। मेरे मन में कुछ भी नहीं है जो हो चुकाजो जा चुका। जो हो रहा हैउसको मैं जानना चाहता हूं। तुम जल्दी जहर ले आओ। मैं जान लूं कि यह मौत क्या है?
अब ऐसा आदमी कभी मर नहीं सकताजो मौत के सत्य को जानने के लिए भी इतनी तैयारी दिखलाता है। लेकिन अधिक लोग मौत को बिना जाने मर जाते हैं। इसीलिए बार-बार जन्मते हैं और बार-बार मरते हैं। अधिक लोग मौत को बिना जाने मर जाते हैंक्योंकि अधिक लोग जीवन को ही बिना जाने मर जाते हैं। मौत को जानना तो मुश्किल हैजो जीवन को ही नहीं जान पाता है।
जीवन को ही हम नहीं जान पाते हैंक्योंकि हमारे माइंड का फोकस अतीत में लगा रहता है और जिंदगी हमेशा वर्तमान में है। लोग हमेशा पीछे देखते रहते हैंऔर जिंदगी अभी है--हियर एंड नाउ! अभी और यहीं! इसी वक्त! हांजब बीत जाएगा यह क्षणतब हम फिर इस पर फोकस लगा लेंगे।
अभी आप मुझे सुन रहे हैंतब आप और बातें सोच रहे होंगे। और मैं बोल कर गया कि मैंने जो बोला हैवह आप सोचना शुरू कर देंगे। यह अजीब सा मामला है। तब आपजब मैं बोल रहा थातब कुछ और सोच रहे थे। सोच रहे थे कि यह आदमी जो बोल रहा हैगीता से मेल खाता है कि नहींयह आदमी जो बोल रहा हैहिंदू धर्म के पक्ष में है कि विपक्ष मेंयह आदमी जो बोल रहा हैयह ठीक है कि गलतयह सब आप सोच रहे थे। तब आप चूक गए उससे जो मैं बोल रहा था। और मैं बोल कर यहां से गया तो फिर आप सोचेंगे: इस आदमी ने यह कहाइस आदमी ने वह कहाइस आदमी ने यह कहा। तब फिर माइंड पीछे लगा है।
और तब जिंदगी जहां से आती है वहीं से हमारा संपर्क नहीं हो पाता। हम अतीत में अटके रह जाते हैं और जिंदगी अभी है। ऐसा जीवन भर चलता हैहम जीवन भर चूक जाते हैं और नहीं जान पाते कि सत्य क्या है। फिर किताबों में पढ़ते हैंफिर शास्त्रों से शब्द सीख लेते हैं और उन्हीं शब्दों को सत्य मान लेते हैं।
जीवन से जिन्हें सत्य नहीं मिलाउन्हें शास्त्रों से कैसे मिल सकता हैऔर जिन्हें जीवन से मिल जाता हैउन्हें शास्त्रों के सत्य की जरूरत क्या हैइतना विराट जीवन हमें सत्य नहीं दिखा पातातो किताबें आदमी की हमें सत्य दिखा देंगी?
रवींद्रनाथ ने एक संस्मरण लिखा है। लिखा है कि एक पूर्णिमा की रात मैं एक बजरे परएक नाव में एक किताब पढ़ता था। सौंदर्य-शास्त्र परएस्थेटिक्स पर एक शास्त्र पढ़ता था।
अब देखें मजा! पूरे चांद की रात हैझील हैसन्नाटा हैनाव हैअकेले हैं। बजाय इसके कि देखें कि सौंदर्य क्या हैपढ़ते हैं सौंदर्य-शास्त्र पर एक किताब! सौंदर्य चारों तरफ बरस रहा है। सौंदर्य पूरे वक्त झर रहा है। लेकिन बजरे में बंद करके द्वार-दरवाजा मोमबत्ती जला कर पढ़ रहे हैं सौंदर्य-शास्त्र की एक किताब। पढ़ रहे हैं सौंदर्य-शास्त्र की किताब में कि सौंदर्य क्या है,डेफिनीशन क्या है सौंदर्य की। और सौंदर्य बरस रहा है बाहर और बुला रहा है कि आओ-आओचिल्ला रहा है। लेकिन वे नहीं सुन रहे हैं। क्योंकि किताब पढ़ने वाला जिंदगी को कभी नहीं सुनता। इधर आंख गड़ाए हुए उस मद्दी सी रोशनी मेंपीली सी रोशनी मेंधुआं उठती मोमबत्ती में पढ़ रहे हैं--सौंदर्य क्या है?
दो बजे रातथक गई हैं आंखेंकिताब बंद कर दी हैफूंक मार कर मोमबत्ती बुझा दी है--और रवींद्रनाथ ने लिखा अपनी डायरी में कि दंग रह गया मैं! जैसे ही मोमबत्ती बुझी--रंध्र-रंध्र सेबजरे के द्वार-द्वारखिड़की-खिड़की सेचांद की रोशनी भीतर भर आई। नाचने लगी चांद की रोशनी भीतर। मैं हैरान हुआ कि मोमबत्ती की रोशनी की वजह से चांद की रोशनी भीतर नहीं आ पाती! मोमबत्ती बुझी तो चांद भीतर आ गया। जरा-जरा से छेद से भी रोशनी आ गई भीतर। और रवींद्रनाथ ने लिखा है कि मैं भागा हुआ बाहर आयाक्योंकि वह जो छोटी सी रोशनी भीतर आई थीउसने निमंत्रण दिया कि बाहर न मालूम और क्या होगा!
बाहर आकर देखा तो पूरा चांद सिर पर खड़ा है। सारे आकाश में मौन सन्नाटा हैसारी झील दर्पण बन गई हैसारी झील पर चांद बिखरा हुआ है। सौंदर्य था यहां! रवींद्रनाथ कहने लगेमैंने अपना सिर ठोंक लिया कि मैं पागलएक किताब खोल कर मोमबत्ती में पढ़ता था कि सौंदर्य क्या है!
फिर लिखा है कि उस दिन से सौंदर्य की किताब नहीं खोलीक्योंकि सौंदर्य की किताब खुल गई। फिर नहीं पढ़ने गया किताब में कि सौंदर्य कहां हैक्या है। फिर जी लिया सौंदर्य कोऔर देख लिया सौंदर्य कोऔर जान लिया सौंदर्य को। फिर नहीं उठाई किताब जो अधूरी रह गई थीउसे अधूरा ही छोड़ दिया।
जिंदगी है सत्य। सत्य किन्हीं किताबों में नहीं है। सत्य किन्हीं गुरुओं के पास नहीं है। सत्य किन्हीं दुकानों में नहीं है। और सत्य किन्हीं मंदिरों और मस्जिदों में नहीं है। सत्य है जिंदगी में। जीवन ही सत्य है।
लेकिन उसे देखने में वे ही समर्थ हो पाते हैं जो किसी भी तरह का चश्माकोई धारणाकोई कंसेप्टकोई अतीत की याददाश्त लेकर जिंदगी के पास नहीं जाते। जो जिंदगी के पास ऐसे जाते हैं जैसे कोरा दर्पणऔर खड़े हो जाते हैं जिंदगी के सामने और जिंदगी के प्रतिफलन को बनने देते हैं अपने भीतर। और पकड़ते नहीं कोई प्रतिफलनजो बीत जाता हैबीत जाता है। जो आ जाता है उसका स्वागत हैजो चला जाता है उसकी विस्मृति है। और जिनका मन ऐसे दर्पण की तरह जिंदगी को देखता हुआ गुजरता हैप्रतिपल--दुख मेंसुख मेंप्रेम मेंघृणा मेंक्रोध मेंशांति मेंअशांति मेंतनाव मेंजिंदगी मेंमृत्यु में--जो प्रतिपल दर्पण की तरह गुजरते चले जाते हैं और जीवन की पूरी शृंखला को अनुभव करते हैंवे जान लेते हैं कि सत्य क्या है।
सिवाय इसके कभी कोई सत्य नहीं जाना गया है। सत्य को जानने का अर्थ है: स्वयं को दर्पण की तरह बना लेना। और दर्पण की कोई दृष्टि नहीं है। दर्पण यह नहीं कहता कि ऐसे हो जाओ। दर्पण कहता हैजैसे हो हम वैसे ही देख लेंगेहम नहीं कोई आग्रह करते। दर्पण का कोई आग्रह नहीं है।
इसलिए मैं कहता हूंसत्याग्रह शब्द बड़ा झूठा शब्द है। सत्य का कोई आग्रह नहीं होताअनाग्रह वृत्ति में ही सत्य का अनुभव होता है। सत्याग्रह शब्द बड़ा गलत शब्द हैबड़ा उलटा शब्द है। सत्य का आग्रह! सत्य का आग्रह होता ही नहीं। जहां आग्रह हैवहां सत्य नहीं होता। क्योंकि आग्रह का मतलब है कि मैं कहता हूं ऐसा।
सत्य है अनाग्रह। अनाग्रह चित्तपक्षपातशून्यअनप्रिज्युडिस्डजिसका अपना कोई मत नहींकोई पक्ष नहींकोई धारणा नहींजो कहता हैमैं एक खाली दर्पण हूंउसके जीवन में उपलब्धि होती है सत्य की।
इस दर्पण की जो मैंने बात कहीइस दर्पण को ही समाधि कहते हैं। इस दर्पण जैसे चित्त का नाम समाधिस्थ चित्त है। और इस समाधिस्थ चित्त के द्वार से जो उपलब्ध हो जाता हैउसका नाम सत्य है।
यह प्रत्येक को अपना ही खोजना पड़ता हैयह उधार नहीं मिलता। यह ट्रांसफरेबल नहीं हैयह कमोडिटी ऐसी नहीं है कि कोई किसी को दे दे। प्रत्येक को स्वयं ही जानना पड़ता है। असत्य दूसरे से मिल सकता हैसत्य स्वयं से ही खोजना पड़ता है। बल्कि सच तो यह है कि दूसरे से जो मिलता हैवह दूसरे से मिलने के कारण असत्य हो जाता है। वह उसके पास सत्य रहा होयह हो सकता है। कृष्ण ने जो जाना वह सत्य होआपको जैसे ही मिलेगाअसत्य हो जाएगा। वह जो हस्तांतरण हैउसकी प्रक्रिया में ही वह नष्ट हो जाता है। इतना सूक्ष्म हैइतना तरल हैइतना जीवंत है कि देते-देते ही मर जाता है। दिया नहीं जा सकतासिर्फ लिया जा सकता है। खुद व्यक्ति बने दर्पण की तरह तो जान सकता हैनहीं तो नहीं जान सकता है।
ऐसे ही जैसे कि हम किसी अंधे को प्रकाश के बाबत कुछ कहें। तो हम कह सकते हैंलेकिन अंधे तक कुछ भी नहीं पहुंचता कि आपने क्या कहा। अंधे की समझ में कुछ भी नहीं आता कि प्रकाश यानी क्याकैसे आ सकता है! आंख का अनुभव आंख ही देख सकती है। अंधी आंख को आंख का अनुभव नहीं समझाया जा सकता। तो हम इतना कर सकते हैं कि अंधे की आंख के इलाज का उपाय करें। यह तो हो सकता है। आंख वाले अंधे के लिए सहयोगी हो सकते हैंइलाज की दिशा में। लेकिन प्रकाश का ज्ञान देने की दिशा में सहयोगी नहीं हो सकते।
इसलिए बुद्ध ने एक अदभुत बात कही है। बुद्ध ने कहामैं कोई उपदेशक नहीं हूंएक उपचारक हूंएक वैद्य हूं। इसलिए बुद्ध से कोई पूछने आता कि सत्य क्या हैतो वे कहतेयह मत पूछो। क्योंकि यह तो कहा नहीं जा सकताऔर कहा भी जाए तो समझा नहीं जा सकताऔर समझ भी लिया जाए तो हमेशा गलत समझ लिया जाता है। तुम यह मत पूछो कि सत्य क्या है। तुम तो यह पूछो कि आंख क्या हैजिससे सत्य जाना जाता है।
इसलिए जब मुझे आज कहा कि सत्य की खोज पर कुछ कहूं। तो सत्य की कोई खोज नहीं होतीआंख की खोज होती है। प्रकाश की कोई खोज नहीं होतीआंख की खोज होती है। आंख है तो प्रकाश हैआंख नहीं है तो प्रकाश नहीं है। होगा प्रकाश। लेकिन जिसके पास आंख नहीं हैउसके लिए प्रकाश का क्या मतलब है! सारी दुनिया कहे कि प्रकाश हैऔर मेरे पास आंख नहीं हैसुनूंगालेकिन कोई अर्थ नहीं रखती वह बात। इतनी कठिनाई है अंधे आदमी को जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकतेक्योंकि हम अंधे नहीं हैं।
अंधे आदमी को प्रकाश तो बहुत दूरअंधेरा भी दिखाई नहीं पड़ता है। अंधेरा देखने के लिए भी आंख चाहिए। अंधेरा भी आंख का अनुभव है। अंधे आदमी को अंधेरा भी नहीं दिखता। आप यह मत सोचना कि अंधा आदमी अंधेरे में रहता है। अंधेरा भी प्रकाश का ही अनुभव है। जिसको प्रकाश दिखता हैउसी को अंधेरा भी दिखता है। अंधे आदमी को अंधेरे का भी कोई पता नहीं है। क्योंकि पता होने के लिए आंख चाहिए। अंधेरे के पता होने के लिए भी आंख चाहिए।
तो जिसे अंधेरे का भी पता नहीं हैउसे प्रकाश का क्या हम ज्ञान दे सकते हैंअगर हम उससे यह कहें कि अंधेरे से उलटातो भी कोई मतलब नहीं है। क्योंकि उसे अंधेरे का ही पता नहीं है कि अंधेरा क्या है।
तो जब हम सुनते हैं उन लोगों की बातेंजो कहते हैं कि परमात्मा असीम हैहमें सीमा का ही अनुभव नहीं हैअसीम का क्या अनुभव होगावे कहते हैंपरमात्मा ज्योतिर्मय हैपरमात्मा परम चैतन्य है। हमें पदार्थ का ही अनुभव नहीं हैहमें परम चैतन्य का क्या अनुभव होगावे कहते हैंपरमात्मा परम जीवन है। हमें मृत्यु का तक पता नहीं हैपरम जीवन का हमें क्या पता होगा?
शब्द रह जाते हैं थोथे। चली हुई कारतूस जैसे होती हैकोई जान नहींबस दिखती है कारतूस। वैसे शब्द हमारे हाथ में रह जाते हैं थोथेबेमानी। उन्हीं शब्दों को लेकर हम लड़ते-झगड़ते रहते हैंऔर सोचते हैं कुछ निर्णय हो जाएगा। कितने ही अंधे आपस में लड़ें और तय करेंप्रकाश का कोई निर्णय नहीं होता है। आंख खुलनी चाहिए। और आंख--मिरर लाइक माइंडएक दर्पण जैसा चित्तवह है आंख सत्य के लिए। और जिसकी आंख खुल जाती है वह जान लेता है। और जानते ही जीवन दूसरा हो जाता है। सत्य को जानते ही जीवन सत्य हो जाता है। सत्य को बिना जाने जीवन असत्य ही रहता हैचाहे हम कितने ही उपाय करें।
इसलिए मैं कहता हूं कि सत्य को पाने के लिए आपका जीवन बदलना व्यर्थ हैआप जीवन बदल ही नहीं सकते सत्य को पाए बिना। सत्य को पाने से जीवन बदलता है। जीवन की बदलाहट से सत्य नहीं मिलतासत्य के मिलने से जीवन बदलता है। और जो आदमी सत्य को बिना पाए जीवन को बदलने की कोशिश में लगता हैवह कितना ही जीवन को बदलेवह जीवन भी असत्य जीवन ही होता है।
अगर वह प्रेम भी प्रकट करे तो असत्य होगा। अगर वह अहिंसक भी बन जाए तो भीतर हिंसा होगी। अगर वह प्रेमी भी बन जाए तो पीछे वासना होगीअगर वह ब्रह्मचर्य भी साधे तो चित्त में सेक्स ही चलता रहेगा। सत्य को जाने बिना सारा का सारा जीवन ही असत्य होता हैचाहे हम कुछ भी करें। अंधा आदमी कुछ भी करेटकराएगा। चाहे बाएं टकराए और चाहे दाएं टकराएइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। चाहे आगे टकराएचाहे पीछे टकराएइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अंधा आदमी टकराएगा ही। टकराहट बिलकुल स्वाभाविक है। आंख वाला आदमी नहीं टकराएगा। नहीं टकराना आंख वाले के लिए उतना ही स्वाभाविक हैजितना अंधे के लिए टकराना।
सत्य की उपलब्धि जीवन का रूपांतरण हैवह जीवन को सत्य कर जाती है। और जीवन जब तक सत्य नहीं हैतब तक आनंद भी नहीं है। असत्य के साथ कोई आनंद नहीं हैअंधेपन के साथ कोई आनंद नहीं है। अंधापन ही दुख हैअसत्य ही दुख है।
लेकिन क्या करें फिर सत्य की खोज में?
जीवन को बदलने की बात मैं नहीं करता। जीवन को देखने की दृष्टि बदलने की बात है। और वह दृष्टि जितनी ताजीसाफपक्षपातरहितदृष्टिमुक्त दृष्टिशास्त्र-शब्द से मुक्तअतीत से मुक्तअभी और यहां जो है उसे देखने की जितनी निर्मलता हम साधते चले जाएंउतनी ही वह आंख खुलेगी। वह आंख खुलेगी और हम उसे जान लेंगे जो है। जो हैउसी का नाम सत्य है।
ये थोड़ी सी बातें मैंने कहींफिर कल और आज कुछ और इस दिशा में बातें हो सकेंगी।
नहींमेरी बातों से लेकिन समझ में नहीं आ जाएगा। मेरी बातें किसी काम की नहीं हैं बहुत। हांकुछ इशारे बन सकती हैं। और इशारे छोड़ देने के लिए होते हैंउन्हें पकड़ा कि वे बेकार हो जाते हैं।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुनाउससे बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूंमेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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