गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-01

शांति की खोज

मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्यता क्या हैमनुष्य क्या हैएक प्यासएक पुकारएक अभीप्सा!
जीवन ही एक पुकार है। जीवन ही एक अभीप्सा है। जीवन ही एक आकांक्षा है।
लेकिन आकांक्षा नरक की भी हो सकती है और स्वर्ग की भी। पुकार अंधकार की भी हो सकती है और प्रकाश की भी। अभीप्सा सत्य की भी हो सकती है और असत्य की भी।
चाहे हमें ज्ञात हो और चाहे हमें ज्ञात न होअगर हमने अंधकार को पुकारा होगातो हम अशांत होते चले जाएंगे। अगर हमने असत्य को चाहा होगातो हम अशांत होते चले जाएंगे। अगर हमने गलत को चाहा होगातो शांत होना असंभव है। शांति छाया है--ठीक की चाह से पैदा होती है। सम्यक चाह से शांति पैदा होती है।

एक बीज अंकुरित होना चाहता है। अंकुरित हो जाए तो आनंद से भर जाएगाअंकुरित न हो पाए तो अशांत और पीड़ा अनुभव करेगा। सरिता सागर होना चाहती है। सागर तक पहुंच जाएअसीम से मिल जाएतो शांत हो जाएगी। न पहुंच पाएभटक जाए मरुस्थलों मेंतो अशांत हो जाएगीदुखी हो जाएगीपीड़ित हो जाएगी।

किसी ऋषि ने गाया है: हे परमात्मा! अंधकार से आलोक की तरफ ले चल! मृत्यु से अमृत की तरफ! असत्य से सत्य की तरफ! वही सारी मनुष्यता के प्राणों की आकांक्षा भी है, वही पुकार है। और अगर हम जीवन में शांत होते चले जा रहे हों, तो समझना चाहिए कि हम उस पुकार की तरफ चल रहे हैं जो जीवन के गहरे से गहरे प्राणों में छिपी है। और अगर हम अशांत हो रहे हों, तो जानना चाहिए कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं, उलटी दिशा में जा रहे हैं।
अशांति और शांति लक्ष्य नहीं हैंकेवल सूचक हैंकेवल लक्षण हैं। शांत मन खबर देता है इस बात की कि हम जिस दिशा में चल रहे हैं वही दिशा जीवन की दिशा है। अशांत मन खबर देता है इस बात की कि हम जहां चल रहे हैं वह जगह चलने की नहीं। हम जिस ओर जा रहे हैं वह जाने की मंजिल नहीं। हम जहां पहुंच रहे हैं वहां पहुंचने के लिए पैदा नहीं हुए।
अशांति और शांति लक्षण हैं--हमारे जीवन के विकास को सम्यक दिशा मिली है या असम्यक दिशा मिल गई है। शांति लक्ष्य नहीं है। और जो लोग शांति को सीधा ही लक्ष्य बना लेते हैं वे कभी भी शांत नहीं हो पाते। अशांति को भी मिटाना सीधा संभव नहीं है। जो आदमी अशांति को ही मिटाने में लग जाता है वह और भी अशांत होता चला जाता है। अशांति सूचना है--जीवन उस दिशा में जा रहा है जहां जाने के लिए वह पैदा नहीं हुआ है। और शांति खबर है इस बात की कि हम चल पड़े उस मंदिर की तरफ जो कि जीवन का लक्ष्य है।
एक आदमी को बुखार हैशरीर उत्तप्त हैगरम है। शरीर की गर्मी बीमारी नहीं हैशरीर की गर्मी केवल खबर है कि शरीर के भीतर कोई बीमारी है। शरीर गर्म नहीं है तो खबर मिलती है कि शरीर के भीतर कोई बीमारी नहीं है। गर्मी खुद बीमारी नहीं हैकेवल बीमारी की खबर है। गर्मी का न होना भी स्वास्थ्य नहीं हैसिर्फ खबर है कि भीतर जीवन स्वस्थ दिशा में चल रहा है। और अगर कोई आदमी अपने शरीर के बुखार को जबरदस्ती ठंडा करने की कोशिश में लग जाएतो इससे बीमारी से मुक्त नहीं होगामर सकता है।
नहींशरीर का बुखार नहीं दूर करना पड़ता है। बुखार मित्र हैखबर देता है कि भीतर बीमारी हैबीमारी की खबर लाता है। अगर शरीर उत्तप्त न हो और भीतर बीमारी बनी रहेतो आदमी को पता ही नहीं चलेगा--कब बीमार हुआकब समाप्त हो गया।
अशांति ज्वर हैबुखार हैगर्मी हैजो चित्त पर घिर जाती है और खबर देती है कि तुम प्राणों को वहां ले जा रहे होजहां नहीं ले जाना है। शांति--बुखार का चला जाना है और खबर है कि प्राण उस दिशा में चलने लगेजहां चलने के लिए पैदा हुए हैं। यह बात प्राथमिक रूप से समझ लेना जरूरी हैतो आने वाले चार दिनों की "शांति की खोजकी यात्रा पूरी-पूरी स्पष्ट हो सकती है।
शांति को मत चाहिए और अशांति को दूर करने की कोशिश मत करिए। अशांति को समझिए और जीवन को बदलिए। जीवन की बदलाहट शांति का अपने आप आगमन बन जाती है।
जैसे कोई आदमी किसी बगीचे की तरफ घूमने निकलेवह जैसे-जैसे बगीचे के पास पहुंचने लगता हैवैसे ही ठंडी हवाएं उसे घेरने लगती हैंवैसे ही फूलों की सुगंध उसके आस-पास मंडराने लगती हैपक्षियों के गीत सुनाई पड़ने लगते हैं। उसे विश्वास हो जाता है कि मैं बगीचे के पास पहुंच रहा हूं। पक्षियों के गीत आने लगेठंडी हवाएं आने लगींफूलों की सुगंध आने लगी।
शांति परमात्मा के पास पहुंचने की खबर है। वह परमात्मा के बगीचे के पास उड़ने वाले फूलों की सुगंध है। और अशांति परमात्मा की तरफ पीठ करके चलने की खबर है। इसलिए मौलिक रूप से आदमी जिन कारणों को समझता है कि इनके कारण मैं अशांत हूंवे कारण अशांति के कारण नहीं हैं।
अगर कोई आदमी समझता हो कि मैं इसलिए अशांत हूं कि मेरे पास धन नहीं हैतो वह गलती में है। धन मिल जाएगा और अशांति कायम रहेगी। कोई आदमी समझता हो कि मेरे पास बहुत बड़ा मकान नहीं है इसलिए अशांत हूं। मकान मिल जाएगा और अशांति कायम रहेगीबल्कि अशांति थोड़ी बढ़ जाएगी। क्योंकि मकान नहीं थाधन नहीं थातब तक कम से कम एक राहत थी कि मैं इसलिए अशांत हूं कि मकान नहीं हैधन नहीं है। मकान और धन के हो जाने के बाद वह राहत भी छिन जाएगी। मकान भी मिल जाएगाधन भी मिल जाएगा और अशांति अपनी जगह खड़ी रहेगी। और तब प्राण और भी बेचैन हो जाते हैं।
इसलिए दरिद्र की बेचैनी उतनी कभी नहीं होती जितनी समृद्ध की बेचैनी होती है। अमीर आदमी की तकलीफ को गरीब आदमी कभी भी नहीं पहचान पाता। बिना अमीर हुए पहचान पाना मुश्किल है। क्योंकि अमीर के पास गरीब का संतोष भी नहीं रह जाता कि मैं गरीब हूंइसलिए अशांत हूं। कम से कम एक कारण तो पता रहता है कि मैं इसलिए अशांत हूं। किसी दिन गरीबी मिट जाएगी और शांति आ जाएगी।
लेकिन आज तक कोई आदमी गरीबी मिटाने से शांत नहीं हुआ है। गरीबी मिट जाती हैशांति तो नहीं आतीअशांति और बढ़ जाती है। क्योंकि पहली दफा यह पता चलता है कि धन के मिलने से अशांति के टूटने का कोई संबंध नहीं है। तब एक आशा भी टूट जाती है कि धन के मिलने से मैं शांत हो जाऊंगा।
इसीलिए जितना समाज धनिक होता चला जाता हैउतना ही समाज ज्यादा अशांत होता चला जाता है। आज अमेरिका से ज्यादा अशांत शायद दुनिया में कोई दूसरा समाज नहीं है। और अमेरिका के पास जैसी समृद्धि है वैसी मनुष्य के इतिहास में कभी किसी समाजकिसी देश के पास नहीं थी। बड़ी हैरानी होती है कि इतना सब तुम्हारे पास हैफिर तुम अशांत क्यों होहम अगर अशांत हैं तो समझ में आती है बात कि हमारे पास कुछ भी नहीं है।
लेकिन कुछ होने और न होने से शांति और अशांति का कोई संबंध नहीं है।
मनुष्य के जीवन में शरीर हैमन हैआत्मा है। शरीर की जरूरतें हैं। अगर वे पूरी न होंतो जीवन कष्टपूर्ण हो जाता है। शरीर की जरूरतें हैं--रोटी हैकपड़ा हैमकान है--अगर शरीर को न मिलेंतो जीवन एक कष्ट की यात्रा बन जाएगा। शरीर पूरे वक्त खबर देगा कि मैं भूखा हूंमैं नंगा हूंदवा नहीं हैप्यास लगी हैपानी नहीं हैरोटी नहीं है। शरीर पूरे वक्त अभाव की खबर देगा। और अभाव की खबर जीवन को कष्ट से भर देती है। खयाल रहे: अशांति से नहींकष्ट से!
यह हो सकता हैएक आदमी कष्ट में हो और अशांत न हो। और यह भी हो सकता हैएक आदमी बिलकुल कष्ट में न हो और अशांत हो। बल्कि अक्सर यही होता है। जो आदमी कष्ट में होता है उसे अशांति का पता ही नहीं चलता। कष्ट ही इतना उलझा लेता है कि अशांति पर ध्यान देने की सुविधा और फुरसत नहीं मिलती। जब सब कष्ट समाप्त हो जाते हैंतब पहली दफा ध्यान आता है कि अशांति भी भीतर है।
गरीब आदमी कष्ट में होता है। समृद्ध आदमी अशांति में होता है।
शरीर में कष्ट होते हैंऔर अगर शरीर की जरूरतें पूरी हो जाएं तो शरीर में कष्ट का अभाव हो जाता है। लेकिन शरीर के तल पर सुख का कभी कोई अनुभव नहीं होता। यह भी समझ लेना जरूरी है। शरीर में कष्ट हो सकते हैंसुख शरीर में कभी नहीं होता। हांकष्ट का अभाव हो जाएकष्ट न होंतो उसी को हम सुख समझ लेते हैं।
अगर पैर में कांटा गड़ा है तो तकलीफ होती है और पैर में कांटा न गड़ा हो तो कोई आनंद नहीं होता। कि हम जाकर मोहल्ले में खबर करें कि आज मेरे पैर में कांटा नहीं गड़ामैं बहुत आनंद में हूं। कि आज मेरे सिर में दर्द नहीं हो रहा इसलिए आज मैं बड़ा सुखी हूं। सिर में दर्द होता है तो हम कष्ट में होते हैंलेकिन सिर में दर्द न हो तो हम सुख में नहीं होते। यह शरीर के साथ समझ लेना बहुत उपयोगी है कि शरीर के तल पर सुख जैसी कोई चीज कभी होती ही नहींदुख होता है और दुख का अभाव होता है। दुख के अभाव को ही लोग सुख समझ लेते हैं। शरीर दुख दे सकता हैदुख नहीं दे सकता हैलेकिन सुख कभी भी नहीं दे सकता है।
इसलिए जो शरीर के तल पर ही जीते हैं उन्हें सुख का कभी कोई पता नहीं चलता। दुख का पता चलता हैदुख से बचने का पता चलता है। भूख लगी है तो कष्ट मालूम होता हैभूख मिट गई तो कष्ट मिट गया। बस शरीर यहीं ठहर जाता है।
शरीर के बादशरीर के भीतर मन है। मन की हालत उलटी है। मन की भी जरूरतें हैंमन की भी मांगें हैंमन की भी भूख और प्यास है। साहित्य हैकला हैदर्शन हैसंगीत है--वे सब मन की आकांक्षाएं हैंमन की भूख और प्यास हैं। वह मन का भोजन है। लेकिन अगर किसी आदमी ने कालिदास का काव्य न पढ़ा होतो इसके कारण कोई कष्ट नहीं होता। या किसी आदमी ने अगर किसी बड़े कलाकार का सितार न सुना होतो इस कारण कोई कष्ट नहीं होता। नहीं तो आदमी एकदम मर जाए कष्ट से। क्योंकि इतनी चीजें हैं मन की दुनिया में जिनका हमें कोई पता ही नहीं।
मन की दुनिया मेंजिस चीज का आपको पता नहीं हैअनुभव नहीं हैउसका कोई कष्ट नहीं होतालेकिन पता चले तो सुख जरूर होता है। अगर आपको सितार सुनने मिल जाए तो सुख होता है। नहीं सुना था तब तक कोई कष्ट नहीं था। अगर आप काव्य नहीं समझते हैंनहीं सुना हैनहीं समझा हैतो कोई कष्ट नहीं है। लेकिन सुनने मिल जाए तो सुख जरूर होता है।
मन के तल पर सुख है। एक बार सुख का अनुभव शुरू हो जाए और फिर सुख न मिलेतो सुख का अभाव मालूम पड़ता हैलोग उसी को मन का कष्ट समझ लेते हैं। शरीर के तल पर सुख नहीं होतासिर्फ दुख का अभाव होता है। मन के तल पर सुख होता है और सुख का अभाव होता हैकष्ट जैसी कोई चीज नहीं होती।
लेकिन मन की एक और खूबी है। मन के तल पर जो सुख होते हैंवे क्षण भर के लिए होते हैंउससे ज्यादा कभी नहीं हो पाते। क्योंकि मन को जो सुख एक बार मिलाउसकी पुनरुक्ति से उसे सुख नहीं मिलता।
अगर आज आपने किसी वीणावादक से वीणा सुनी और कल फिर वही वीणा सुनाएतो आज जितना सुख हुआ था उतना कल नहीं होगा। और परसों फिर सुनाएतो और भी कम होगा। और अगर दस-पांच दिन सुननी पड़ेतो जिससे पहले दिन सुख हुआ था उसी से दुख की प्रतीति शुरू हो जाएगी। और अगर दो-चार महीने सुनना पड़ेतो आप अपना सिर फोड़ लेंगे और भागना चाहेंगे कि अब मैं इसे नहीं सुनना चाहता हूं।
मन के तल पर मन प्रति बार नये सुख की आकांक्षा करता है। शरीर हमेशा पुराने ही सुख की आकांक्षा करता हैनये सुख की कभी नहीं। शरीर को अगर आप नया-नया रोज-रोज मौका देंतो शरीर तकलीफ में पड़ जाता है। शरीर अगर रोज दस बजे रात सोता हैतो रोज दस बजे रात ही सो जाना चाहता है। और अगर ग्यारह बजे सुबह भोजन करता हैतो ठीक ग्यारह बजे ही भोजन कर लेना चाहता है। शरीर एक यंत्र की भांति हैवह रोज पुनरुक्ति चाहता हैरिपीटीशन चाहता है और उसमें जरा भी हेर-फेर नहीं चाहता। जिस आदमी के शरीर को रोज बदलाहट करनी पड़ती हैउस आदमी का शरीर बहुत तकलीफ में पड़ जाता है।
आधुनिक सभ्यता ने शरीर को इसीलिए नुकसान पहुंचाया है कि आधुनिक सभ्यता रोज शरीर को नया होने के लिए आग्रह करती है। और शरीर बेचारा पुराना ही रहना चाहता है। इसलिए गांवों के लोग जितने स्वस्थ दिखाई पड़ते हैंउतना शहर का आदमी स्वस्थ नहीं दिखाई पड़ता। उसके शरीर को रोज नई जरूरतनई व्यवस्थानये नियम का पालन करना पड़ता है। शरीर मुश्किल में पड़ जाता है। शरीर के पास समझ नहीं है कि वह रोज अपने को नया करने के लिए तैयार हो जाए। वह पुराने की ही मांग करता है।
मनमन रोज नये की मांग करता हैवह पुराने से जरा भी राजी नहीं होना चाहता। जरा पुरानी पड़ी चीज और मन इनकार करने लगता है कि बस हो गया। उसे रोज नया मकान चाहिएरोज नई कार चाहिए। और उसका वश चले तो रोज नई पत्नी चाहिएरोज नया पति चाहिए। इसलिए जिन सभ्यताओं ने धीरे-धीरे मन के आधार पर निर्माण शुरू किया हैवहां तलाक की संख्या बढ़ती जानी अनिवार्य है। क्योंकि मन के आधार पर जीने वाली कोई भी सभ्यता स्थायी नहीं हो सकती। पुराने पूरब के देश शरीर के आधार पर जी रहे हैं। नये पश्चिम के देशों ने मन के आधार पर जीना शुरू किया है। मन रोज नई बात मांगता है।
मैंने सुना हैअमेरिका में एक अभिनेत्री ने अपने जीवन में बत्तीस विवाह किए। हमारी कल्पना के बाहर है! हमारे देश की पत्नी प्रार्थना करती है भगवान से कि आने वाले जन्म में भी यही पति उपलब्ध हो। अगर अमेरिका की पत्नी कोई प्रार्थना करेगी--हालांकि वह प्रार्थना ही नहीं करेगी--अगर वह प्रार्थना करेगी तो यही कि कम से कम इतना ध्यान रखना कि यही आदमी दुबारा न मिल जाए! अगले जन्म की बात का भरोसा भी नहीं हैइसलिए पत्नी होशियार हैवह इसी जन्म में उसे बदल लेना चाहती है।
जिस अभिनेत्री की मैंने बात कीजिसने बत्तीस विवाह किएउसने इकतीसवां जो विवाह कियापंद्रह दिन बाद पता चला कि यह आदमी एक बार पहले और उसका पति रह चुका है। क्योंकि इतनी जल्दी बदलाहट की दस-पंद्रह दिन में कि कहां फुरसत रही पहचानने की कि किसको पहचानूं!
हमारे मुल्क की पत्नी दस-पांच जन्मों के बाद भी आदमी को पकड़ लेगी हाथ कि आप भूल गएवह जन्मों-जन्मों तक पहचान रखेगी।
मन की आकांक्षा नित्य प्रतिपल नये की है। इसलिए मन पुराने से ऊब जाता है और घबड़ा जाता है। अगर कोई प्रियजन आपको मिल जाए और आप उसे छाती से लगा लेंतो पहले क्षण बहुत आनंद की पुलक मालूम होगी। लेकिन वे मित्र अगर बहुत ही प्रेमी हों और छाती छोड़ने को राजी न होंतो दोत्तीन-चार मिनट के बाद घबड़ाहट शुरू हो जाएगी। वह आनंद की पुलक खो गई। और अगर वह आदमी बिलकुल पागल हो--जैसा कि प्रेमी पागल होते हैं--और आधा घंटे तक आपको पकड़े ही रहेतो आप अपनी या उसकी गर्दन दबा देने को उत्सुक हो जाएंगे। लेकिन क्या हुआयह आदमी आकर हृदय से लग गया थाबहुत सुखद मालूम पड़ा थाअब तकलीफ क्या हो गईयह घबड़ाहट क्या हो गईमन ऊब गया। शरीर कभी नहीं ऊबता हैमन सदा ऊब जाता है।
इसलिए आप जान कर हैरान होंगे कि बोर्डम जैसी चीज मनुष्य को छोड़ कर दुनिया के किसी और पशु में नहीं होती! आपने किसी भैंस को कभी बोर होते नहीं देखा होगा। या किसी कौवे कोया किसी कुत्ते को आप ऐसी हालत में नहीं देखे होंगे कि यह बोर हो गयाउदास हो गयाऊब गया। नहींमनुष्य को छोड़ कर ऊबने वाला कोई प्राणी नहीं है। ऊब ही नहीं सकता कोई प्राणीक्योंकि प्राणी सब शरीर के तल पर जीते हैं। शरीर के तल पर कोई ऊब नहीं होतीऊब होती है मन के तल पर। और मन जितना विकसित होने लगता हैऊब उतनी ही बढ़ने लगती है।
इसलिए पूरब के मुल्क इतने ऊबे हुए नहीं हैंजितने पश्चिम के मुल्क ऊबे हुए हैं। और जब ऊब ज्यादा पैदा हो जाती है तो रोज नया सेंसेशन खोजना जरूरी हो जाता हैताकि ऊब तोड़ी जा सके।
यह भी आपको जान कर हैरानी होगी कि आदमी अकेला ही प्राणी है जो ऊबता है और आदमी अकेला ही प्राणी है जो हंसता है। आदमी को छोड़ कर दुनिया में और कोई जानवर हंसता नहीं! अगर रास्ते पर आप जा रहे हों और एक गधा हंसने लगेतो फिर आप जिंदगी भर सो नहीं सकेंगेइतने घबड़ा जाएंगे। क्योंकि हम अपेक्षा नहीं करते कि कोई जानवर हंसेगा। जो ऊबता नहीं हैवह हंसता भी नहीं है। हंसी ऊब को मिटाने की तरकीब है।
इसलिए जब आप ऊबे हुए होते हैंतब चाहते हैं कि कोई मित्र मिल जाएदो हंसी की बातें हो जाएंथोड़ी ऊब कट जाए। आदमी को इतने मनोरंजन के साधनों की जरूरत इसलिए है कि आदमी इतना ऊब जाता है दिन भर में कि उसे कुछ मनोरंजन चाहिए। फिर मनोरंजन भी उबाने लगते हैंतो नये ढंग के मनोरंजन चाहिए। फिर सब तरफ ऊब पैदा हो जाती हैतो युद्ध चाहिए। युद्ध से थोड़ी ऊब टूटती है।
आपने देखा होगा कि हिंदुस्तान और चीन का युद्ध हुआया हिंदुस्तान और पाकिस्तान कातो कितनी चमक आ गई थी लोगों के चेहरों पर! आंखें कितनी रोशन मालूम पड़ती थीं! आदमी कितने ताजे और जिंदा मालूम पड़ते थे!
क्योंजिंदगी इतनी ऊबी हुई है कि थोड़ी चहल-पहल हो जाती हैकुछ उपद्रव होने लगेकहीं कोई दंगा-फसाद हो जाएतो जिंदगी में थोड़ी रौनक आ जाती हैथोड़ी चमक आ जाती हैनींद थोड़ी टूट जाती हैलगता है कि अभी भी कुछ होने जैसा हैदेखने जैसा है। अन्यथा सब देखा हुआ हैसब हो चुका हैवही दोहर रहा हैतो मन ऊब जाता है और मन घबड़ा जाता है।
यह आपको इसी के साथ--न कोई जानवर ऊबता हैन कोई जानवर हंसता है--और आपको ध्यान रहेकोई जानवर स्युसाइड भी नहीं करताआत्महत्या भी नहीं करतासिर्फ आदमी को छोड़ कर। आदमी जिंदगी से इतना भी ऊब सकता है कि जिंदगी को खतम कर ले। और खतम करने में भी एक नयापन हो सकता है। खतम करना भी एक पुलकएक सेंसेशन हो सकता है।
एक आदमी पर स्वीडन में एक मुकदमा चला। उसने समुद्र्र के तट पर बैठे हुए एक अपरिचित आदमी की पीठ में जाकर छुरा भोंक दिया। अदालत में उससे पूछा गया कि तुम्हारा इस आदमी से कोई झगड़ा था?
उसने कहाझगड़े का सवाल नहींमैंने इस आदमी को कभी देखा ही नहीं! और छुरा मारने के पहले मैंने इसकी शक्ल ही नहीं देखी है! क्योंकि मैंने छुरा पीछे से मारा हैपीठ की तरफ से मारा है।
वह जज ने पूछा कि बड़े पागल हो! फिर किसलिए तुमने छुरा मारा?
उसने कहामैं इतना ऊब गया था कि जिंदगी में कुछ होना चाहिए। और मैं अपने बचाव में कुछ नहीं चाहता हूं। अगर मुझे फांसी हो सकती हैतो खुशी से मैं फांसी को देखने को तैयार हूं। क्योंकि जिंदगी में अब देखने लायक मुझे कुछ भी नहीं बचा है। सब देखा हुआ है। सब देखा जा चुका है। मौत भर एक नई चीज है। और हत्या मैंने कभी नहीं की थीवह भी जरा देखने जैसी थी कि क्या होता है!
पश्चिम में हत्याएं बढ़ रही हैंस्युसाइड बढ़ रहा हैआत्महत्या बढ़ रही हैअपराध बढ़ रहे हैं। उसका कारण यह नहीं है कि पश्चिम अपराधी हो रहा है। उसका कुल कारण यह है कि पश्चिम के जीवन में इतनी उदासी और ऊब है कि बिना अपराध किए उस ऊब को तोड़ने का और कोई उपाय नहीं सूझता है।
अभी मैंने सुना कि अमेरिका में उन्होंने एक नया खेल निकाला है। वह खेल बहुत खतरनाक है। और जब सभ्यताएं बहुत ऊब जाती हैंतब इस तरह के खेल ईजाद करती हैं। वह खेल है कि दो कारों को पूरी शक्ति और तेजी से दौड़ाते हैं और दोनों के चाक रास्ते के बीच पर जो निशान बना होता है उस पर रखते हैं। एक इस तरफ सेदूसरा दूसरी तरफ से। पूरी शक्ति से दौड़ती हुई कारों को कौन पहले हटा लेता है एक्सीडेंट के डर सेवह हार जाता हैजो पहले नहीं हटातावह जीत जाता है।
अब अगर सौ या एक सौ बीस मील की रफ्तार से दो गाड़ियां आ रही हैं और दोनों के चाक एक ही लकीर पर हैंतो प्राणों को बड़ा संकट है। कौन पहले हटेगा नीचे! जो हटेगा वह हार जाएगा। यह सभ्यता बहुत ऊब पर पहुंच गई है। अब जिंदगी को दांव पर लगाए बिना कोई रस मालूम नहीं पड़ता है।
इसीलिए सभ्यता जब ऊबने लगती हैतो जुआ पैदा होता हैशराब पैदा होती हैदांव पैदा होते हैं। जब कोई समाज बहुत जुआ खेलने लगे तो समझना चाहिए कि समाज बहुत ऊब गया है। अब बिना दांव पर लगाएखतरे में पड़ेउसे कोई रास्ता नहीं मालूम पड़ता जिससे कुछ नई बात होने की संभावना पैदा हो जाए।
मन की दुनिया में चीजें रोज ऊब जाती हैं। और मन एक क्षण से ज्यादा किसी सुख को अनुभव नहीं कर पाता। एक क्षण बीता और सुख दुख हो जाता है। शरीर के तल पर कोई दुख नहीं हैकोई सुख नहीं हैकष्ट का अभाव है। मन के तल पर सुख होते हैंलेकिन बिलकुल क्षणिक होते हैं और एक क्षण में ही डूब जाते हैं और समाप्त हो जाते हैं। इसीलिए तो जिस चीज को पाने के लिए हम बिलकुल पागल होते हैं कि सब कुछ लगा देंगेवह मुट्ठी में आ जाएहम एकदम उदास हो जाएंगे।
आप एक बहुत बढ़िया मकान खरीदना चाहते हैं। खरीद लेंऔर फिर अचानक पाएंगे कि सब खत्म हो गई बात। वह पुलकवह दौड़वह तेजीवह खुशी जो पाने की खोज में थी वह गईमिलते ही गई। जो भी आप पाना चाहते हैंपाते ही निराश हो जाएंगे। क्योंकि पाने में एक क्षण तो खुशी होगीऔर एक क्षण के बाद सब पुराना पड़ जाएगा और सब बात वहीं खड़ी हो जाएगी।
मन के तल पर सुख हैंलेकिन क्षणिक हैं। और जो आदमी शरीर और मन के बीच ही जीता है वह आदमी हमेशा अशांति में जीएगा। क्योंकि जिस आदमी को शाश्वत सुख की झलक नहीं मिलीवह आदमी शांत कैसे हो सकता हैऔर मन और शरीरदोनों तलों पर कोई शाश्वत सुख की झलक उपलब्ध नहीं हो सकती।
लेकिन फिर भी शरीर के तल पर जीने वाले एक अर्थों में शांत मालूम पड़ेंगे--मरे हुए शांत।
शांति दो तरह की होती है: एक जीवंतजीतीएक मुर्दामरी हुई। मरघट पर जाएंवहां भी एक शांति है। लेकिन वह कब्रों की शांति है। वह शांति इसलिए है कि वहां कोई है ही नहीं जो अशांत हो सके।
बुद्ध एक गांव के बाहर ठहरे थे दस हजार भिक्षुओं को लेकर। उस गांव के राजा को उसके मित्रों ने कहा कि बुद्ध का आगमन हुआ हैआप भी चलें! दस हजार भिक्षु साथ में आए हुए हैं।
वह राजा बुद्ध के दर्शन करने गया। सांझ हो गई हैरास्ते में अंधेरा घिरने लगा है। वे पास पहुंच गए आम्रवन केजहां बुद्ध ठहरे हैंउनके दस हजार भिक्षु ठहरे हैं। अचानक उस राजा ने अपनी तलवार निकाल ली और अपने मित्रों को कहा कि मालूम होता है तुम मुझे धोखा देना चाहते हो! जहां दस हजार लोग ठहरे होंहम इतने पास पहुंच गएवहां कोई आवाज नहीं है! वहां इतनी शांति मालूम होती है! तुम कोई धोखा तो नहीं देना चाहते होवे मित्र कहने लगे कि आप बुद्ध और उनके मित्रों से परिचित नहीं हैं। आपने मरघट की शांति देखी हैआप जीवित शांति देखिए। दस हजार लोग उस बगीचे में हैंआप चलेंअविश्वास न करें।
लेकिन वह राजा पग-पग पर डरने लगा--कहीं अंधेरे में वे धोखे में तो नहीं ले जा रहे हैं! लेकिन वे मित्र कहने लगेआप न घबड़ाएंआप आएंसच में ही वहां दस हजार लोग हैं। दस हजार लोग और वहां ऐसा सन्नाटा कि जैसे कोई न हो!
वह बुद्ध के पास जब गया तो उनके चरणों में सिर रख कर वह कहने लगामैं हैरान हूंदस हजार लोग! दस हजार लोग बैठे हैं वहां वृक्षों के नीचे और वहां परिपूर्ण सन्नाटा है जैसे कोई न हो!
तो बुद्ध ने कहातू सिर्फ मरघट की शांति ही पहचानता है मालूम होता है। जीवित शांति भी एक शांति है।
जो लोग शरीर के तल पर जीते हैंएक अर्थ में शांत हैं। पशु शांत हैंपशु अशांत नहीं हैं। कुछ मनुष्य भी शरीर के तल पर जीकर शांत होंगे। खाना खा लेंगेकपड़े पहन लेंगेसो जाएंगेफिर खाना खा लेंगेफिर कपड़े पहन लेंगेफिर सो जाएंगे। लेकिन ऐसा संतोष शांति नहीं हैऐसा संतोष सिर्फ चेतना का अभाव है। होश नहीं है। भीतर जैसे एक मुर्दा की हालत हैएक मरे हुए आदमी की स्थिति है।
सुकरात से किसी ने कहा कि तू इतना अशांत है सुकरातइससे तो अच्छा होता एक सुअर हो जाता। सुकरात होने से क्या फायदासुअर गांव के किनारे घूमते हैं और कितने शांत हैं! डबरों में पड़े रहते हैंकुछ भी खा-पी लेते हैं और कितने प्रसन्न और शांत मालूम पड़ते हैं!
सुकरात ने कहा कि मैं एक असंतुष्ट सुकरात होना पसंद करूंगा बजाय एक संतुष्ट सुअर के। सुअर संतुष्ट जरूर हैलेकिन इसलिए संतुष्ट है कि शरीर के ऊपर की कोई प्यासकोई पुकार उसके जीवन में नहीं है। वह है ही नहीं एक अर्थों में। मैं असंतुष्ट जरूर हूंक्योंकि एक पुकार मुझे खींच रही है। और ऊपर एक शांति हैउसे पुकार रहा हूं मैंइसलिए असंतुष्ट हूं। और जब तक उसे नहीं पा लूंगाअसंतुष्ट रहूंगा। लेकिन मैं इस असंतोष को ही लेना चाहता हूं। इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं।
हममें से जो लोग शरीर के तल पर ही संतुष्ट हो जाते हैंउनकी स्थिति पशुओं से बहुत भिन्न नहीं हो सकती।
पशु का अर्थ है: शरीर के तल पर ही संतुष्ट हो जानाशांत हो जाना।
मनुष्य का अर्थ है: मन के तल पर अशांत होना। और देवता का अर्थ है: आत्मा के तल पर शांत हो जाना।
शरीर और आत्मा के बीच में मन है। मन की दुनिया में क्षण भर को सुख की झलक मिलती है। वह झलक क्षण भर की कहां से आती हैवह क्षण भर की झलक भी आत्मा से ही आती है। मन क्षण भर को अगर मौन हो जाता है तो आत्मा से क्षण भर को आनंद की झलक नीचे उतर आती है। उस मौन में वह शांति झलक जाती है। जैसे अंधेरी रात में कोई बिजली चमक जाएतो एक क्षण को उजाला हो जाता हैफिर घुप्प अंधेरा हो जाता है। मन तो अंधकार हैलेकिन किन्हीं भी क्षणों में अगर एक क्षण को मन चुप हो जाएतो पीछे छिपी आत्मा की रोशनी उतर आती है।
एक प्रियजन आपको मिलाएक क्षण को हृदय की धड़कन रुक गईएक क्षण को मन के विचार रुक गएआपने उसे गले से लगा लिया। एक क्षण को सब रुक गया और आत्मा की झलक भीतर प्रवेश कर गई। पर एक ही क्षण को। फिर मन काम शुरू कर दियाफिर मन ने दौड़ शुरू कर दीफिर विचार आ गएफिर सब दुनिया शुरू हो गई। फिर आप वहीं खड़े हो गए। फिर वह आदमी जो गले से लगा हुआ हैउबाने वाला हो गयाहटने का मन होने लगा कि हट जाऊं। वह जो प्रियजन के मिलने पर शांति की और आनंद की थोड़ी सी झलक मिली थीवह प्रियजन से नहीं मिली थीप्रियजन केवल अवसर बना थामिली आपके ही भीतर से थी।
संगीत सुन कर जो क्षण भर को मन शांत हो जाएतो झलक भीतर से उतरनी शुरू हो जाती है। और आप सोचते होंगे कि सितार के बजने से मिल रही है वह शांतितो आप गलती में हैं। सितार के बजने से केवल एक अवसर उपस्थित हुआ है और मन मुक्त हो गया और चुप हो गया है। मन के चुप होते ही भीतर की शांति उतर आई है। शांति सदा भीतर से उतरती हैआनंद सदा भीतर से उतरता है। लेकिन मन के लिए अगर बाहर से अवसर मिल जाए क्षण भर कोतो वह मौन हो सकता है। इस मौन होने की हालत में वह उतार भीतर से शुरू हो जाता है। मन चुप हुआ और भीतर से कुछ उतर आता है। इसीलिए मन क्षण भर को ही चुप होता है और क्षण भर को ही उतर पाता हैफिर सब खो जाता है।
लेकिन मन के पीछे आत्मा भी है। और इस आत्मा की जो दिशा हैइस आत्मा को उपलब्ध कर लेने का जो मार्ग हैइस आत्मा में प्रवेश हो जाने की जो चित्त-दशा हैवही चित्त-दशा आनंद कोशांति कोआलोक को उपलब्ध कराती है।
कैसे हम इस दिशा में प्रविष्ट हो जाएं?
एक छोटी सी घटना से मैं समझाने की कोशिश करूं।
मैं एक छोटे से गांव में पैदा हुआ। वह गांव तो बहुत छोटा है। उस गांव के पास ही बहती हुई एक छोटी नदी भी है। वह नदी ऐसे तो साधारण हैलेकिन वर्षा में बहुत जानदार हो जाती है। वर्षा मेंपहाड़ी नदी हैबहुत पानी उसमें आता हैउसका फैलाव कोई एक मील का हो जाता है। और बड़ी गर्जन से बहती है वर्षा में वह नदी। उस वर्षा की नदी को पार करना बड़ा मुश्किल है। लेकिन मुझे बचपन से ही उस नदी से प्रेम रहा है और वर्षा में भी पार करने का हमेशा शौक रहा है।
कोई पंद्रह या सोलह वर्ष का थामित्रों के साथ तो कई बार वर्षा में उस नदी को पार किया थालेकिन एक बार खयाल आया कि रात अंधेरे में अकेले उसको पार किया जाए। बड़ी खतरनाक है! बड़ी तेज धार होती है! रात की अंधेरी रात में मैं दो बजे उसे पार करने को गया। जितना खतरा हो उतना आकर्षण भी होता है। अंधेरी रात थी। मैं उसमें उतरा। कितना श्रम किया उस पार पहुंचने के लिएकोई दो मील बहता हुआचेष्टासारी चेष्टा की। लेकिन ऐसा लगने लगा कि जैसे दूसरा किनारा है ही नहीं। अंधेरे में किनारा दिखाई भी नहीं पड़े।
फिर थक गया। और ऐसा लगा कि आज बचना मुश्किल है। आखिरी चेष्टा कीआखिरी कोशिश की। जोर के थपेड़े हैंअंधेरी रात है। दूसरा किनारा दिखाई नहीं पड़ता। और अब पहला किनारा भी बहुत पीछे छूट गया। अब लौटने का भी कोई अर्थ नहीं है। हो सकता है दूसरा किनारा ही पास हो और पिछला किनारा तो और भी दूर हो गया हो। और नदी जोर से बहाए ले जा रही है--कोई दो मीलतीन मील नीचे बह गया हूं। आखिरी कोशिश की। जितनी कोशिश की उतना ही लगा कि पहुंचना मुश्किल है। और फिर एक क्षण को ऐसा लगा कि मौत आ गई हैहाथ-पैर ने जवाब दे दियाआंख बंद हो गईलगा कि मर गया हूंऔर समझ लिया कि बात खत्म हो गई है।
कोई दो घंटे बाद आंख खुली तो किनारे पर पड़ा थाउस पार। लेकिन इस दो घंटे में कुछ हो गया--वह मैं कहना चाहता हूं। जैसे पुनर्जीवन हुआ। जैसे मरा और फिर वापस लौटा। जैसे ही मुझे यह लगा कि मर रहा हूं और मौत आ गईतो फिर मैंने सोचा कि जब मौत आ ही गई तो उसे शांति से देख लेना चाहिए कि वह क्या है।
आंख बंद करके मैंने हाथ-पैर छोड़ दिए। जैसे कोई--घुप्प अंधेरा तो था ही बाहर--जैसे भीतर भी कोई बहुत घुप्प अंधेरी गुहा में प्रवेश कर गया हूं। इतना गहरा अंधेरा पहले कभी नहीं देखा था!
बाहर अंधेरा हैलेकिन पूर्ण अंधेरा बाहर नहीं है। बाहर प्रकाश भी हैलेकिन बाहर पूर्ण प्रकाश नहीं है। बाहर का अंधेरा भी फीका हैबाहर का प्रकाश भी फीका है। अंधेरा पहली दफा दिखाई पड़ा कि कौन सा अंधेरा है जिसके लिए ऋषियों ने कहा होगा कि हे परमात्माअंधेरे से प्रकाश की तरफ ले चलो! तब तक मैं सोचता था यही अंधेरा जो बाहर घिर जाता हैइसी के लिए ऋषियों ने प्रार्थना की होगी कि परमात्माइस अंधेरे से प्रकाश की तरफ ले चलो!
लेकिन मैं कई दफे सोचा कि इस अंधेरे को तो बिजली जला कर मिटाया जा सकता है। इसके लिए परमात्मा को कष्ट देने की क्या जरूरतमैं बहुत बार हैरान हुआ था कि ऋषि बड़े नासमझ रहे होंगे। यह तो एक दीया जलाने से काम हो जातापरमात्मा को पुकारने की क्या जरूरत थीअवैज्ञानिक रहे होंगे। बुद्धि न रही होगी। नहीं तो दीया जला लेते और अपना काम कर लेते। अंधेरे को मिटाने कीपरमात्मा से प्रार्थना करने की क्या जरूरत थी?
लेकिन उस दिन पहली दफा पता चला कि एक ऐसा अंधेरा हैजिसे दीये से नहीं मिटाया जा सकताजहां तक दीया ले जाया नहीं जा सकता। पहली बारकिस अंधेरे के लिए आदमी के प्राणों की प्रार्थना रही हैवह समझ में आया। लेकिन उस अंधेरे को उसके पहले कभी जाना नहीं था। इतना घनघोर अंधेरा हो सकता हैइसकी कल्पना भी करनी मुश्किल है। चित्रकारों के पास इतना अंधेरा कोई रंग नहीं है। बाहर कुछ तो रोशनी हमेशा है। अगर चांद न होगातो तारे होंगे। अगर सूरज ढल गया होगाआकाश में बादल छाए होंगेतो भी सूरज की किरणें बादलों को पार करती होंगी। सच तो यह है कि बाहर का सब अंधेरा रिलेटिव हैसापेक्ष हैपूर्ण नहीं हैएब्सोल्यूट नहीं है। एब्सोल्यूटपूर्ण अंधेरा क्या हैपूरी रात क्या हैवह पहली दफा खयाल आया।
इतनी घबड़ाहट उस अंधेरे में मालूम हुई!
और तब मुझे समझ में आया कि बाहर का अंधेरा आदमी को इतना क्यों घबड़ाता है। बाहर के अंधेरे में कोई खतरा तो नहीं है। अंधेरी रात इतना क्यों घबड़ा देती हैऔर आदमी हजारों साल से अग्नि की पूजा क्यों करता हैतब मुझे लगा कि शायद बाहर का अंधेरा भीतर के अंधेरे की कोई धुंधली स्मृति दिलाता होगा। अन्यथा बाहर के अंधेरे में डर का कोई भी तो कारण नहीं है। और शायद बाहर जो दीये को जला कर और आग को जला कर और अग्नि की पूजा चल पड़ी होगीवह भी किसी भीतर की अग्नि की तलाश का हिस्सा होगी।
अंधेरा पहली दफा देखा। और इतने जोर से उस अंधेरे में मैं चल रहा हूं--वह अंधेरा और घना होता चला जा रहा हैऔर घना होता चला जा रहा है--और सारे प्राण तड़फड़ा रहे हैं। एक क्षण में हो गया होगाबहुत देर नहीं लगी होगी। क्योंकि समय के भी स्केलसमय की भी धारणासमय की भी तौल अलग-अलग है।
जब आप जागते हैंतो घड़ी में जो कांटे चलते हैंउनसे तौल चलती है। वह तौल भी बहुत पक्की तौल नहीं है। अगर आप सुख की हालत में होंतो घड़ी के कांटे बहुत जल्दी घूम जाते हैं। और अगर दुख में होंतो बहुत धीरे-धीरे घूमते हैं। अगर घर में कोई आदमी मर रहा है और आप उसकी खाट के पास बैठे हैंतब देखिए कि घड़ी कैसी मरी हुई चलती है! चलती ही नहींऐसा लगता है कि कांटे ठहर गए हैंवहीं के वहीं हैं। रात लंबाती मालूम पड़ती हैरात बहुत लंबी हो जाती हैऐसा कि जैसे अब इस रात का कोई अंत नहीं होगा!
घड़ी तो अपनी ही चाल से चलती होगी। घड़ी को क्या मतलब है कि आपके घर में कोई मरता है! लेकिन घड़ी लंबी मालूम होती है।
कोई प्रियजन मिल जाए बहुत दिन का बिछुड़ा हुआघड़ी एकदम छलांग लगाने लगती हैएक-एक सेकेंड नहीं चलतीएक-एक घंटे कूदने लगती है। रात ऐसे गुजर जाती है कि अभी तो सांझ हुई थीअभी सुबह हो गईइतने जल्दीयह कैसे हो गयाऔर ऐसा लगता है कि घड़ी भी बहुत बाधा दे रही है प्रेम में। सारी दुनिया तो बाधा देती ही हैघड़ी भी बाधा दे रही है। इतने जल्दी गुजर जाती है रात।
बाहर भी सुख और दुख में घड़ी की चाल भिन्न हो जाती है। दुख जितना बड़ा होघड़ी की चाल उतनी लंबी हो जाती है। सुख जितना बड़ा होघड़ी की चाल उतनी धीमी हो जाती है। दुख अगर पूर्ण होतो घड़ी के कांटे खड़े हो जाएंगेकभी नहीं चलेंगे! सुख अगर पूर्ण होतो भी घड़ी के कांटे एकदम घूम जाएंगेपता ही नहीं चलेगा। कब घूम गएवहीं दिखाई पड़ेंगे जहां पहले दिखाई पड़े थे।
फिर बाहर और भीतर भी टाइमसमय में फर्क पड़ता है। आप चौबीस घंटे गुजारते हैं। कभी एक क्षण को झपकी लग जाती है और एक सपना देखते हैं--कि आपका विवाह हो रहा हैबच्चे हो गएलड़की बड़ी हो गईउसकी शादी के लिए लड़का खोजने चल पड़ेलड़का खोज लिया हैलड़की का विवाह हो रहा हैऔर अचानक नींद टूट जाती है। घड़ी में देखते हैं कि सोए हुए अभी मुश्किल से एक मिनट हुआ था! झपकी एक मिनट लगी! एक मिनट में इतनी बड़ी प्रक्रिया कैसे हो गईकि आपका विवाह हुआलड़की पैदा हुईबड़ी हुईउसका आप विवाह कर रहे हैंउसको लड़का खोज लिया हैउसकी शादी-विवाह हो रही थीबैंड-बाजे बज रहे थे। और अचानक नींद टूट गई! एक मिनट गुजरा बाहर और भीतर इतनी लंबी यात्रा कैसे हो गई?
सपने में टाइम का मेजरमेंटसपने में समय की गति भिन्न हैजागने में भिन्न है। यह उस दिन पता चला। इतनी तेजी से भीतर जाना शुरू हुआ और इतनी शीघ्रता से हो रहा है कि शायद समय ही नहीं लग रहा होगा। और प्राण तड़फड़ा रहे हैं कि कैसे इस अंधेरे के बाहर हो जाया जाएकैसे इस अंधेरे के बाहरकैसे अंधेरे के बाहर हो जाऊंउस दिन पहली दफा पूरी प्यास मन में पकड़ी कि हे परमात्माअंधेरे के बाहर ले चल!
भीतर के अंधेरे का साक्षात न होतब तक यह प्यास पकड़ती भी नहीं। इन आने वाले दिनों में भीतर के अंधेरे के साक्षात के लिए हम कुछ कोशिश करेंगे। जिसे भीतर के अंधेरे का पता नहीं हैवह भीतर के प्रकाश के लिए कभी रोएगा नहींचिल्लाएगा नहींपुकारेगा नहीं।
वह कितनी देर उस अंधेरे में प्रवेश रहा। फिर जाकर एक द्वार पर सिर पीटने लगा हूं। आज तो कहता हूं तो बहुत लंबा मालूम पड़ता है। बहुत जोर से सिर पीट रहा हूं: दरवाजा खोलो! दरवाजा खोलो! कोई कह नहीं रहा हूंभीतर कोई शब्द नहीं हैंलेकिन प्राण पुकार रहे हैं। कुछ भीतर पुकार नहीं रहा हूं कि द्वार खोलोऐसा कुछ शब्द नहीं है भीतर। लेकिन सारे प्राणरोआं-रोआं कह रहा है कि द्वार खोलोमुझे बाहर निकल जाने दो!
जीसस का एक वचन सुना है: नॉकएंड दि डोर शैल बी ओपन। खटखटाओऔर द्वार खुल जाएंगे।
मैं सोचता थाइतनी सस्ती होगी बात क्याकि खटखटाओऔर द्वार खुल जाएंगेऔर परमात्मा के द्वार के लिए बात है यह! तो थपकी दोऔर द्वार खुल जाएंगेअगर ऐसी ही बात होती तो कौन आदमी राह चलते थपकी न दे देता! लेकिन उस दिन पता चला कि नॉक का मतलब क्या है।
सारे प्राणसारी श्वाससारा रोआं-रोआं चिल्लाने लगे। शब्दों में नहींभावों में! सारी आत्मा ठोंकने लगे द्वार कोतो द्वार जरूर खुल जाते हैं। द्वार खुल गएऔर एक बिलकुल दूसराज्यादा बृहत्तर...अभी तो जैसे कोई एक टनलएक गुफासंकरी गुफा थीजिससे निकल जाने को प्राण तड़फड़ाते थे। अब कुछ बड़ी गुफा हैजहां धीमा प्रकाश है। मन को थोड़ी राहत मिली है।
लेकिन आंख खोल कर उस धीमे प्रकाश को गौर से देखने पर--उस प्रकाश में बड़ी चहल-पहल हैभारी चहल-पहल है। रंग-बिरंगे बहुत से आकार घूम रहे हैंभाग रहे हैंदौड़ रहे हैं। और जैसे-जैसे उसमें आगे बढ़ा हूं--जैसे एक बहुत बाजार हैजहां बहुत भीड़-भाड़ हैजहां बहुत तरह के लोग हैंइतनी चीजें घूम रही हैं। लेकिन चीजें बहुत अनूठी हैंऐसी चीजें पहले कभी नहीं देखीं।
सुना है कि प्लेटो यूनान में यह कहता था कि चीजें बाहर हैंऔर चीजों के रूप भीतर हैंफर्ॉम्स भीतर हैं। सुना था कि मन की दुनिया में सारी चीजों के रूप हैं।
आप मुझे बाहर दिखाई पड़ रहे हैं। मैं आंख बंद कर लूंफिर भी आप दिखाई पड़ते हैं। आप तो बंद हो गएआप तो बाहर रह गए। फिर कौन दिखाई पड़ता है भीतरआपका कोई रूप भीतर रह गयाकोई थाट फॉर्मकोई विचार-आकृति भीतर रह गई।
बहुत विचार-आकृतियां हैंजिनका मेला भरा हुआ हैजो दौड़ रहे हैंभाग रहे हैंचारों तरफ से घेर रहे हैं। इतना कोलाहल है! पहले तल पर घनघोर अंधकार थाकोई कोलाहल नहीं था। दूसरे तल पर धीमी रोशनी हैलेकिन भयंकर कोलाहल है। कान फटने लगे हैंइतनी तेज आवाजें हैं। इतनी तेज आवाजें हैं कि उनसे भी बच जाना जरूरी हैनहीं तो आदमी पागल हो जाएगा।
बाद में यह खयाल आया कि पहला अंधकार का तल शरीर का तल रहा होगा। दूसरा तल मन का तल रहा होगा। शरीर के तल पर घनघोर अंधकार है। मन के तल पर घनघोर आवाजें हैं। शरीर एक टनलएक छोटी गुफा है। मन एक विस्तार है। लेकिन विस्तार में बहुत भीड़ हैबहुत रंग हैंबहुत ध्वनियां हैंबहुत सुगंधें हैं। जो भी जाना होजो भी जीया होवह सब वहां मौजूद हैवहां कुछ मरता नहीं। अनंत-अनंत जन्मों में भी जो जाना होगाजो जीया होगावह सब वहां मौजूद है। मन एक अदभुत संग्रह है सारे जन्मों का। वे सारे लोग जो मित्र रहे होंगेवे सारे लोग जो शत्रु रहे होंगेवे सारी बातें जो सुनी होंगीवे सारी बातें जो कही होंगीजो घटनाएं गुजरी होंगीजीवन में जो-जो हुआ होगा--वह सब वहां जैसे इकट्ठा है। एक बहुत बड़े विस्तार में बहुत बड़ी भीड़ है और वह सब आवाज से भरी हुईसब ध्वनियों से भरी हुई। वह भी घबड़ाने वाली और पागल करने वाली है।
क्या यही है असत--यह जो चारों तरफ से घेर रहा है और विक्षिप्त किए दे रहा हैऔर फिर वही पुकार है कि और आगेऔर आगेऔर आगे! दौड़ जारी है। फिर द्वार हैफिर सिर पटकना हैफिर चिल्लाना हैफिर द्वार का खुल जाना है।
और एक तीसरी दुनिया--जहां कोई सीमा नहींजहां कोई अंधकार नहींजहां कोई ध्वनि नहींजहां कोई प्रकाश नहीं। जहां न अंधकार हैजहां न प्रकाश है। क्योंकि जिस प्रकाश को हम जानते हैं वह भी अंधकार का रूप है और जिस अंधकार को हम जानते हैं वह भी प्रकाश का रूप है। यहां कुछ है जिसे प्रकाश कहते भी मन डरता हैक्योंकि प्रकाश उसके सामने कुछ भी नहीं है।
लेकिन एक क्षण कोऔर एक आनंद की लहर सारे प्राणों में छा गईऔर फिर वापसी और मैंने आंख खोली तो मैं किनारे पर पड़ा हूं। एक क्षण को लगा कि जैसे कोई सपना देखा। विश्वास नहीं आया कि जो हुआवह हुआ। बहुत सोचालेकिन हाथ में तो कुछ भी न थासपना ही रहा होगा। लेकिन वह सपना फिर पीछा करने लगा। फिर बहुत उपाय करके उस सपने की खोज जारी रही। और धीरे-धीरे उस दिन जो अचानक मृत्यु की घड़ी में घटित हो गया थावह फिर सहज होना शुरू हो गया।
इन आने वाले तीन दिनों में उसी यात्रा पर आपको भी ले चलना चाहता हूं।
पहली यात्रा--शरीर के तल पर।
दूसरी यात्रा--मन के तल पर।
और तीसरा प्रवेशतीसरी यात्रा--आत्मा के तल पर।
उसकी एक किरण की झलक भी मिल जाए--एक बार भी--फिर वह कभी भूलती नहीं। वही न्यूक्लिअस बन जाता हैफिर उसी के आस-पास सारा जीवन परिवर्तित होने लगता है। एक बार वहां की एक किरण उतर आएऔर जीवन दूसरा हो जाता हैनया जन्म हो जाता है। और उसकी एक किरण उतर जाए तो सारे जीवन में शांति छा जाती है। फिर चाहे जीवन पर कितने ही उत्पात घटें--चाहे कोई छुरा लेकर छाती में भोंक देचाहे कोई गर्दन काट देचाहे कोई आग में जला देचाहे कोई अपमान करेचाहे कोई सम्मान करेचाहे कोई गालियां देचाहे कोई फूलों के हार डाले--फिर इस सब में कुछ फर्क नहीं रह जाता। जैसे सपने में सारी बातें हो रही हैंहोती हैं। भीतर शांति के उस तल पर कोई खबर नहीं पहुंचती। वहां शांतिवहां आनंदवहां जो है वह अखंडितअविचलितअकंप बना रह जाता है। वहां पहुंचने का जो अनुभव जीवन में छा जाता हैउस अनुभव का नाम शांति है।
शांति मानसिक घटना नहीं है।
पश्चिम के सारे मनोवैज्ञानिक इस दृष्टि से बुनियादी रूप से भूल में हैं। पश्चिम के मनोवैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं आदमी को शांत करने की उसके मन के द्वारा। वे कभी भी सफल नहीं हो सकेंगे। शांति मानसिक घटना नहीं है। मन के तल पर ज्यादा से ज्यादा एडजेस्टमेंट हो सकता हैसमायोजन हो सकता है। शांति कभी नहीं। शांति आध्यात्मिक घटना हैआध्यात्मिक उपलब्धि की छाया है।
इसलिए पश्चिम को शांति का कोई भी पता नहीं है कि शांति क्या है। और आज लाख चेष्टा चलती है मन को समझने की,उसकी बीमारियों को समझने कीउसके विचारों को समझने कीवृत्तियों को समझने कीमन की सारी की सारी स्थिति को समझने की और मन को समझाने कीसुव्यवस्थित करने की। लेकिन वह चेष्टा शांति में ले जाने वाली नहीं होगी। शांति तो मन के ट्रांसेंडेंस सेमन के पार होने सेमन के अतीत होने से उपलब्ध होती है।
मन के तल पर कोई शांति नहीं। इसलिए मन की चाहे कितनी ही सुव्यवस्था की जाएज्यादा से ज्यादा इतना हो सकता है कि आदमी अशांति को सहने योग्य बन जाएलेकिन शांत कभी नहीं बन सकता। अशांति को सहने योग्य बनना एक बात हैशांत हो जाना बिलकुल दूसरी बात है। स्वस्थ होना एक बात हैबीमारी को सहने योग्य बन जाना बिलकुल दूसरी बात है।
आज जितना मनसशास्त्रजितना मनोविज्ञान चेष्टा कर रहा हैवह सारी की सारी चेष्टा मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा सहने योग्य--अशांति को सहने योग्य बनाने में समर्थ कर सकती हैलेकिन शांत नहीं बना सकती। शांत तो मनुष्य बनता है तीसरे तल परआत्मा के तल पर। और क्यों आदमी शांत हो जाता है आत्मा के तल पर?
जैसे मैंने कहाशरीर की भूख है कि रोटी चाहिए। मन की भूख है: सुख चाहिए। वैसे ही आत्मा की भूख है: परमात्मा चाहिए। परमात्मा आत्मा का भोजन है। और जिस दिन तीसरे तल पर प्रवेश होता हैउसी दिन वह मिल जाता है जिसे परमात्मा कहते हैं। उसके मिलते ही सारे जीवन में एक अपूर्व शांति छा जाती है उसके मिलन की। और उसका मिलन कुछ ऐसा नहीं है कि फिर खो सके। सच तो यह हैवह अभी भी खोया हुआ नहीं हैसिर्फ हमें पता नहीं है कि वह खोया हुआ नहीं है। उसे कभी खोया नहीं जा सकता। वह सदा है। भीतर है।
जैसे किसी के घर में खजाना रखा हो और वह घर के बाहर घूमता होऔर घूमता होऔर घूमता रहे। और जितना ज्यादा घूमे उतना ही भूल जाए भीतर जाने का रास्ता। और घूमने की आदत मजबूत होती चली जाए और बाहर का रास्ता लीक बन जाए। और वही रास्ता दिखाई पड़े और वह उस पर ही घूमता रहेघूमता रहेघूमता रहे। और धीरे-धीरे इतनी विस्मृति हो जाए कि भीतर कोई खजाना थायह खयाल ही भूल जाए। और बाहर घूमने की वजह से वह पूछता फिरे सारी दुनिया में कि खजाना कहां हैमैं क्या खोज रहा हूंमैं क्या खोजना चाहता हूंमुझे कुछ पता नहीं! और उसी खजाने के आस-पास घूमता चला जाए। आदमी करीब-करीब ऐसी हालत में है और इसीलिए अशांत है। जो उसका हैवही उसे नहीं मिल पाता है। जो उसको उपलब्ध हैउसको भी नहीं जान पाता है। जो वह हैउसकी भी खबर नहीं मिल पाती। और बाहर ही घूम कर जीवन नष्ट हो जाता है।
अशांति का अर्थ है: बाहर घूमना।
शांति का अर्थ है: भीतर प्रवेश।
लेकिन यह भीतर प्रवेश कैसे हो सकता हैयह भीतर प्रवेश बड़ी सरलता से हो सकता है। लेकिन सरलता का मतलब सस्ता नहीं होता! सरलता का मतलब यह नहीं होता कि सस्ता हो सकता है। सच तो यह है कि सरलता से ज्यादा कठिन और कोई चीज जगत में दूसरी नहीं है। सरल होने से ज्यादा आरडुअसकठिन और कुछ भी नहीं है। कठिन होना आसान हैसरल होना ही मुश्किल हो जाता है। क्योंकि सरल होने में अहंकार को कोई तृप्ति नहीं मिलतीकठिन होने में अहंकार को बड़ी तृप्ति मिलती है। सरल होने में अहंकार मर जाता हैकोई तृप्ति नहीं मिलती।
मैंने सुना हैइकहार्ट ने कहीं कहा हैकहीं कहा है कि टु बी आर्डिनरी इज़ दि मोस्ट आरडुअस थिंग। साधारण होना सबसे कठिन बात है। और इकहार्ट जब मरा तो किसी ने कहा कि वह बहुत एक्सट्रा आर्डिनरी आदमी थावह बहुत असाधारण आदमी था। कोई पूछने लगाक्योंतो उसने कहा कि वह बहुत साधारण था। इतना असाधारण आदमी इसीलिए था कि बिलकुल साधारण था। इतना साधारण होना बहुत ही कठिन है। अजीब लगती है यह बात कि किसी आदमी को हम कहें कि वह बहुत असाधारण हैक्योंकि बिलकुल साधारण है।
और ऐसे ही असाधारण और कठिन यह बात लगेगी कि बहुत सरल है। लेकिन सरल से यह मत समझ लेना आप कि सस्ता है। सरल तो बहुत हैक्योंकि जो स्वभाव है उसको पाना कठिन नहीं हो सकता। जो हमारे भीतर ही हैउसे पाना कठिन नहीं हो सकता। जो हम ही हैंउसे पाना कठिन नहीं हो सकता।
लेकिन बहुत कठिन हो गया है। क्योंकि बहुत जन्मों से हम एक ऐसे रास्ते पर चल रहे हैंजिस रास्ते का उससे कोई संबंध नहीं है। और वह यात्रा इतनी मजबूत होती चली गई है जन्म-जन्मवह आदत इतनी मजबूत होती चली गई है कि अपनी तरफ गर्दन मोड़ना ही मुश्किल हो गया हैपैरालिसिस हो गई है जैसे गर्दन में। जैसे किसी आदमी की गर्दन पैरालाइज्ड हो जाएऔर उससे हम कहें--पीछे मुड़ कर देखो! वह कहेबहुत कठिन है। हम कहें कि यह क्या कठिन बात हैपीछे गर्दन करो और देखो! वह कहेवह आप कहते हैंठीक हैलेकिन मेरी गर्दन कुछ जड़ हो गई हैपीछे लौटती ही नहीं। जब तक कि मैं पूरा न लौट जाऊंतब तक गर्दन नहीं लौटतीअकेली गर्दन नहीं लौटती। और आदमी अकेली गर्दन लौटा कर पीछे देखना चाहता हैइसलिए कभी भी पीछे नहीं लौट पातापूरे आदमी को लौटना पड़ता हैटोटल आदमी को लौटना होता हैतब लौटना होता है।
इसलिए धर्म समग्र जीवन का रूपांतरण है। धर्म कोई गर्दन को मोड़ लेना नहीं है। वह जैसा कवियों ने कहा है कि जब जरा गर्दन झुकाई और देख ली! ऐसी कोई तसवीर नहीं है वहां भीतर कि आपने गर्दन झुकाई और देख ली। गर्दन नहीं झुकतीपूरे ही आदमी को झुक जाना पड़ता है। वह पूरा टघनग हैवह पूरा कनवर्शन है। उसमें सिर्फ गर्दन नहीं झुकतीकोई एक हाथ-पैर नहीं झुकतापूरा आदमी मुड़ जाता है। और पूरे आदमी का मुड़ना कैसे हो सकता हैवह मैं बात करूंगा।
लेकिन उसके पहलेक्योंकि हम रोज रात यहां ध्यान के लिए बैठेंगे। आज भी ध्यान के लिए पंद्र्रह मिनट हम पीछे बैठेंगेतो थोड़ा मैं ध्यान के लिए समझा दूं। और फिर कल से वह यात्रा कैसे हो सकती है एक-एक कदमउस यात्रा को समझाने की कोशिश करूंगा। लेकिन समझाना उतना महत्वपूर्ण नहीं हैजितना कि जो मैं कहूं उस पर थोड़ा प्रयोग करना है। वह प्रयोग हम अभी करेंगेवह प्रयोग मैं आपको समझाऊं।
अभी हम ध्यान का एक प्रयोग शुरू करेंगे। वह प्रयोग ऐसे बहुत सरल है। वह प्रयोगस्वयं के भीतर जो सोए हुए हिस्से हैं उनको जगाने का प्रयोग है। स्वभावतःअगर कोई सोया आदमी हो तो हम उसे पुकारते हैं। लेकिन हमें नाम मालूम हो तो हम नाम लेकर पुकार सकते हैं। और नाम अगर पता न हो तो हम क्या करेंगेऔर हमें तो भीतर जो सोया है उसका कुछ भी पता नहीं हैकौन हैउसके नाम का कुछ पता नहीं। तो हम तो एक ही काम कर सकते हैं कि अपने प्राणपण से यह पूछें कि मैं कौन हूंऔर अगर पूरी शक्ति से यह पूछा जाए कि मैं कौन हूंतो धीरे-धीरे भीतर जो सोए हुए तल हैंवे जागने लगेंगे। और जिस दिन भीतर तक यह प्रश्न पहुंच जाता हैअंतस तक--उस तीसरे द्वार तक--कि मैं कौन हूंतो वहां जो बैठा हैवहां से उत्तर आना शुरू हो जाता है कि कौन हैं आप।
वह जिन लोगों ने कहा हैअहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं! वह किसी पुस्तकालय में बैठ कर किसी किताब में से उतार कर नहीं कह दिया है। पूछा है अपने से कि मैं कौन हूंमैं कौन हूंपूछते ही चले गए हैंसारे प्राण को डुबा दिया है इस पूछने मेंइस इंक्वायरी में कि मैं कौन हूंकिसी दिन यह तीर घुसता चला गया भीतर और वहां से उत्तर आया कि मैं कौन हूं।
लेकिन हम सब बहुत होशियार लोग हैं। हम कहते हैंहम क्यों मेहनत करेंकिताब में लिखा हुआ है कि हम ब्रह्म हैं! उसी को याद कर लेंगेझंझट में हम क्यों पड़ेंउसको कंठस्थ कर लेंगे। अगर सवाल उठेगा तो कह देंगे कि मैं ब्रह्म हूं! मैं आत्मा हूं! ये झूठे उत्तर...झूठे इसलिए नहीं कि जिन्होंने उत्तर दिए वे झूठे थे। झूठे इसलिए कि उत्तर आपके नहीं हैं! आपका जो उत्तर नहीं है वह झूठा है! किताबों से यह सीख लिया है कि मैं कौन हूं। और हमें कुछ भी पता नहीं है!
नहींपरमात्मा के लिए खुद से ही पूछना होगा और खुद ही खोजना पड़ेगा। और जिस दिन अपना उत्तर आता हैवही उत्तर है। उस उत्तर के आते ही सब कुछ और हो जाता हैसब कुछ और हो जाता है। जैसे अंधे आदमी को अपनी आंख मिल जाएयह एक बात है। और अंधा आदमी दूसरे लोगों से सुन ले कि प्रकाश है और दोहराने लगे कि प्रकाश हैयह बात ही और हैइससे कोई संबंध ही नहीं है।
तो हम इधर पूछेंगे। और पूछना मुर्दा पूछना नहीं हो सकताकि मरे-मरे पूछ रहे हैं कि मैं कौन हूंऐसे नहीं होगा। क्योंकि बहुत गहरी पर्तें हैं जहां आवाज पहुंचानी है।
अगर जंगल में आप भटक जाएंअंधेरी रात होकोई साथी-संगी न होतो ऐसा पूछेंगे किसी झाड़ के नीचेकोई हैयहां कोई हैऐसा फिर नहीं पूछेंगे। फिर तो सारे प्राण लगा कर पूछेंगे कि कोई है यहांमैं रास्ता भूल गया हूं! कि जंगल का एक-एक पौधा कांपने लगेएक-एक पहाड़ी गूंजने लगेएक-एक घाटी पूछने लगे कि कोई है यहांआप पूरी ताकत लगा देंगे।
उससे भी बड़ी भटकन है--जो जंगल में हो जाती है। क्योंकि जंगल में भटका आदमी कितनी देर भटका रह सकता हैसुबह घर लौट आएगा। न पूछे तो भी लौट आएगा। सूरज निकलेगा ही आखिर। लेकिन हम जिस जंगल में भटके हुए हैं वह बहुत जन्मों का है। न मालूम कितने जन्मों से भटके हैं। लेकिन इतने धीरे-धीरे पूछते हैं कि कहीं कोई रास्ता हैकि पूछने से ऐसा लगता है कि हमें कोई प्रयोजन नहीं है।
नहींयह पूछना टोटल हो सकता है। पार्शियल नहींखंड-खंड नहींछोटा-छोटा नहींपूर्ण हो सकता है। और यह आश्वासन है कि जो आदमी पूरी शक्ति से पूछेआज और इसी वक्त भी उत्तर मिल सकता हैकल की क्या जरूरत हैलेकिन हमने कभी पूछा ही नहीं है! हमने कभी खोजा नहीं है! हम इसी खयाल में हैं कि कहीं से उधारकहीं से बारोड कुछ मिल जाए।
नहींसत्य की दिशा में कुछ भी उधार नहीं मिलता हैआनंद की दिशा में किसी दूसरे से कुछ भी नहीं मिलता है। अपना ही श्रमऔर अपना ही संकल्पऔर अपनी ही शक्ति! वही कसौटी भी है इस बात की कि हमारी मांग आथेंटिक हैहमने जो मांगा है वह हम सच में मांगने के हकदार हैं। एक ही पात्रता है इस खोज मेंऔर वह यह है: अपने को पूरी तरह खोज के साथ खड़ा कर देना। इस ध्यान की एक ही शर्त है और वह शर्त यह है कि धीरे-धीरे नहींआहिस्ता-आहिस्ता नहींऐसे ही कामचलाऊ ढंग से नहींपूर्णतयाजैसे यह हमारे प्राणों का प्रश्न है। हो सकता है एक क्षण बाद हम न बचें! हो सकता है एक क्षण बाद श्वास न लौटे! तो यह कहने को न रह जाए कि हम अपने को बिना जाने फिर वापस लौट आए। ऐसी ही स्थिति है।
महावीर ने कहा हैजैसे घास के एक पत्ते पर सुबह ओस की बूंद होती है। कब गिर जाएगी हवा के झोंके मेंकुछ पता नहीं। ऐसा ही आदमी का जीवन है। घास के पत्ते पर ओस की बूंद! हवा का जरा सा झोंका और गिर जाएगी। ऐसा ही आदमी का जीवन है! इतनी ही इनसिक्योरिटी मेंइतनी ही असुरक्षा मेंइतने ही खतरे मेंइतने ही डेंजर में। एक-एक पल का वहां कोई  भरोसा नहीं है। और वहां जब आदमी अपनी खोज में जाता है तो इतने धीमेऐसे जैसे कोई जल्दी नहीं है।
नहींऐसे नहीं चल सकता है। इन तीन दिनों में हम जो ध्यान यहां करेंगेउसमें यह आशा लेकर मैं चलूंगा कि वह परिपूर्णतया,आपने पूरा अपने कोपूरा कमिटमेंटश्वास काहृदय की धड़कन काशरीर कामन कापूरा--जितने पूरे आप उसमें कूदेंगे उतने ही गहरे आप प्रवेश पा जाएंगे। जितनी पूर्णता से कूदेंगे उतने भीतर चले जाएंगे। और करना क्या होगाकरना कुछ बहुत नहीं हैछोटी सी ही बात है।
अभी हम सब बैठेंगेतो सबको आराम से बैठ जाना हैऔर हाथों की सारी अंगुलियां एक-दूसरे में डाल लेनी हैंताकि पूरी ताकत से पूछना हो सके। और जितना हाथ पर दबाव बढ़ेगाउतना पता चलेगा कि मैं कितनी शक्ति से पूछ रहा हूं। हाथ पत्थर हो जाएंगे। ये दसों अंगुलियों को एक-दूसरे के भीतर डाल लेना हैइनको अपनी गोद में रख लेना हैआराम से बैठ जाना है। इसके बाद हम आंख बंद करेंगे। और आंख बंद करने के बादध्यान जो रहेवह दोनों आंखों के बीच में रहे। वह क्यों बीच में रहेवह आने वाले कल के दिनों में मैं समझाने की कोशिश करूंगा कि उसका अर्थ क्या हैक्या परिणाम हैं उसके। आंख दोनों बंद रहेंगी,लेकिन इस तरह रहेंगी कि जैसे हम बंद आंख से दोनों आंखों के बीच में भीतर देख रहे हों। हाथ बंद रहेंगे। रीढ़ सीधी रहेगी। और शरीर ढीला रहेगा।
पहले ऐसे बैठ जाएं। हाथ बंद कर लेंरीढ़ सीधी हो। रीढ़ इसलिए सीधी जरूरी है कि जितनी रीढ़ सीधी होगी उतने ही जोर से आप पूछ सकेंगे।
आपने खयाल किया होगा कि जब भी जोश आ जाएगा तो रीढ़ अपने आप सीधी हो जाती है। लड़ाई-झगड़े में आपने देखा होगा कि कोई आदमी रीढ़ झुका कर लड़ाई-झगड़ा नहीं करता है। रीढ़ अपने आप सीधी हो जाएगी। जब पूरे प्राणों की पुकार होगी तो रीढ़ सीधी हो जाएगी।
तो रीढ़ सीधी। हाथ बंद। और वे हाथ आपके लिए मापदंड का काम करेंगे कि कितने जोर से आप पूछ रहे हैंउतने ही जोर से हाथ जड़ होते चले जाएंगे। उनको खोलना ही मुश्किल हो जाएगा। वे बिलकुल बंद हो जाएंगेजैसे उनमें खुलने की ताकत भी नहीं रही। और आंख दोनों बंद रहेंगीऔर ध्यान दोनों पलकों के बीच मेंमध्य मेंनाक जहां से शुरू होती है दोनों आंखों के बीच मेंनासाग्र जहां से हिस्सा शुरू होता है वहां अंदर आंखें दोनों रहेंगी।
फिर अपने भीतर...ओंठ बंद हैं और जीभ तालू से सट जाएगीजब ओंठ बंद रहेंगे तो जीभ ऊपर तालू से सट जाएगीअर्थात मुंह बिलकुल बंद हो गया। मुंह से नहीं पुकारना है अब हमेंभीतर प्राणों से पुकारना है। और भीतर पूछना है कि मैं कौन हूंइतनी तेजी से कि दो "मैं कौन हूं?' के बीच में कोई जगह न रह जाए। मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंइस भांति सतत और पूरी शक्ति से कि भीतर कोई शक्ति शेष न रह जाए।
यह हो सकता है कि शरीर कंपने लगे। यह हो सकता है कि आंख से आंसू बहने लगें। यह हो सकता है कि रोना आ जाए। अब जब शरीर पूरी ताकत से लगेगा तो यह सब हो सकता है। कुछ भी रोकना नहीं है। जो भी होहोने देना है। एक ही ध्यान रखना है कि मैं तो पूछता ही चला जाऊंपूछता ही चला जाऊं। मेरा तो पूरा जीवन दांव पर हैमैं पूछूंगा और जानना चाहता हूं कि भीतर क्या हैयह हम पंद्र्रह मिनट के लिए प्रयोग करेंगे। और इस प्रयोग के बाद हमारी बैठक समाप्त होगी।

तो अब आप बैठ जाएं। जो लोगमित्र ऊपर खड़े हैंवे अपनी जगह बैठ जाएं तो बड़ी कृपा होगी। बैठ जाएंकुछ हर्ज नहीं हो जाएगाथोड़े कपड़े खराब हुए तो कुछ हर्ज नहीं होगाबैठ जाएं। क्योंकि कोई भी खड़ा रहेगा वह बाधा देगाबैठ जाएं। चुपचाप अपनी जगह बैठ जाएं। और कोई बातचीत नहीं करेगा। और ध्यान रखेंगे आप कि आपके कारण किसी दूसरे को जरा भी बाधा न पड़े।
ठीक हैरीढ़ सीधी कर लें। हाथ बांध लें। आंख बंद कर लें। ध्यान दोनों आंखों के बीचआंख बंद करनी हैध्यान दोनों आंखों के बीच में ले जाएंजैसे हम बंद आंखों से दोनों आंखों के बीच की तरफ देख रहे हैं। ठीक! ओंठ बंद हैं। अब भीतर पूरी शक्ति से शुरू करेंपूछें: मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...तेजी सेगति सेतीव्रता से और पूरी शक्ति से। पूछते चले जाएंपूरी शक्ति लग जाएबढ़ाते जाएं...मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...धीरे-धीरे नहींपूरी शक्ति से। और जितनी शक्ति से पूछेंगेभीतर उतरना शुरू हो जाएगा।...
मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...पूछें तीव्रता सेशक्ति सेपूरी शक्ति से...हृदय की धड़कन-धड़कन पूछने लगेश्वास-श्वास पूछने लगे। हाथ बंधते चले जाएंगेरीढ़ सीधी होती चली जाएगीशरीर कंप सकता हैआंख से आंसू बह सकते हैंपर पूरी शक्ति लगा दें...और जैसे-जैसे शक्ति बढ़ेगीवैसे-वैसे शांति बढ़ेगी। भीतर एक गहरी शांति पैदा होती चली जाएगी।...मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...
नहींधीरे-धीरे नहींपूरी शक्ति से...मैं कौन हूंमैं कौन हूं?...फिर मुझसे कहना नहीं चाहिए आकर कि नहीं कुछ हुआ। पूरी शक्ति से...मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं हूं कौन?...पूछेंपूछें...गहरेगहरे...जैसे तीर की तरह आवाज पूछने लगे--भीतरभीतरभीतर...मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...पूरा शरीर कंपने लगे--मैं कौन हूंपूरी शक्ति लग जाए--मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...
एक गहरी शांति उतरनी शुरू हो जाएगी।...मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...पूरी शक्ति सेपूरी शक्ति से...एक तूफान आ जाए...यह पूरा वातावरण पूछने लगे--मैं कौन हूंइतनी आत्माएं इकट्ठी पूछें और परिणाम न हो!...मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...पूरी शक्ति से...जो हो हो।...
मैं कौन हूं?...किसी दूसरे की कोई चिंता न करेंअपना--मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...श्वास-श्वासहृदय की धड़कन-धड़कनकुछ याद न रह जाएबस एक प्रश्न रह जाए--मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?... और भीतरऔर भीतर...एक गहरी शांति छाती चली जाएगी। जितने जोर से पूछेंगेपीछे उतनी ही शांति मालूम पड़ेगी। जितनी गहराई से पूछेंगेपीछे मन उतना ही गहरी शांति अनुभव करेगा।...
मैं कौन हूं?...हिला डालेंअपने पूरे व्यक्तित्व को हिला दें...पूरे प्राण हिल जाएं--मैं कौन हूं?...जैसे कोई किसी वृक्ष को हिलाता होउसकी जड़ें तक हिल जाएं--मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...जानना ही हैपहचानना ही हैपहुंचना ही है--मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...पूछेंपूछेंपूछें...एक प्रश्न ही रह जाएएक प्रश्न ही रह जाए--मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...खो गए हैं अंधकार मेंमैं कौन हूं पूछते हैं। रास्ता खो गया हैअपना ही पता नहीं।...
मैं कौन हूंखोजना हैखोजना है...मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...पांच मिनट और पूरी शक्ति से--मैं कौन हूंमैं कौन हूं?...पूरी ताकत लगा दें...मैं कौन हूं?...पीछे कुछ बच न जाएऐसा न लगे कि मैं अधूरा-अधूरा कर रहा हूं। मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...एक चोट द्वार पर--मैं कौन हूंमैं कौन हूं?...जैसे किसी बंद द्वार पर चोट--मैं कौन हूंमैं कौन हूंमैं कौन हूं?...गहरा अंधेरा है... मैं कौन हूंमैं कौन हूं?...
जितनी तीव्रता से पूछेंगेमन शांत होता चला जाएगा...मैं कौन हूं?...एक ही गूंज--मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...आखिरी दो मिनटपूरी शक्ति से...पूरी शक्ति से...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...
आखिरी मिनट...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...
मन शांत होता चला जाएगाएक गहरी शांति भीतर छा जाएगी। जैसे तूफान के बाद सब शांत हो जाता है।...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...आखिरी बार--मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...आखिरी ऊंचाई पर ले जाकर छोड़ना है--मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...मैं कौन हूं?...
छोड़ दें...बिलकुल छोड़ दें...शांत हो जाएं...छोड़ दें। धीरे-धीरे आंख खोलें...मौन बैठे रहें थोड़ी देर...धीरे-धीरे आंख खोलें...फिर धीरे-धीरे हाथ खोलें...धीरे-धीरे आंख खोलें...

तीन छोटी-छोटी सूचनाएं मुझे देनी हैंवे मैं सूचनाएं दे दूंफिर हम उठ जाएंगे।
पहली सूचना तो यह मुझे देनी है कि मेरे आते-जाते कोई भी व्यक्ति मेरे पैर न छुए। मैं किसी का गुरु नहीं हूं और न मानता हूं कि कोई किसी का गुरु हो या कोई किसी का शिष्य हो। तो मेरे कोई पैर न छुए। मैं कोई साधु-संतकोई  महात्मा भी नहीं हूं। साधु-संत और महात्मा होने की कोशिश मुझे बहुत बचकानी मालूम पड़ती है। तो मुझे कोई आदरसमादरसम्मान देने की जरा भी जरूरत नहीं है। इतना ही सम्मान मेरे लिए बहुत है कि मैं जो कहता हूं उसे आप सुन लें। उसे मानने की भी जरूरत नहीं है। सोचेंप्रयोग करें। हो सकता है ठीक होतो रुक जाएगागलत होगा तो छूट जाएगा।
दूसरी बात यह मुझे सूचना देनी है कि मैं--मेरे पास कोई आए तो मेरा स्वभाव है उसे प्रेम देना। जिन्हें प्रेम से भय हो उन्हें मेरे पास नहीं आना चाहिए। मेरी हालत करीब-करीब वैसी हैजैसा प्लोटिनस बूढ़ा हो गया थाजिंदगी भर प्रेम को ही उसने प्रार्थना समझा। बुढ़ापे में उसके शरीर पर कोढ़ आ गया। तो भी लोग उसके पास आते तो उन्हें गले लगा लेता। लोग बहुत डरतेक्योंकि कोढ़ी शरीर से कौन गले लगना चाहे! लोगों ने आना-जाना बंद कर दिया। प्लोटिनस लोगों से पूछता कि लोग अब आते नहींसंकोच में कौन उसे कहे! कुछ मित्रों ने बहुत हिम्मत करके कहा कि तुम्हारे शरीर में कोढ़ हो गया। तुम लोगों के हाथ हाथ में ले लेते होउन्हें गले से लगा लेते होकिसी का माथा चूम लेते हो। लोग डरने लगे तुम्हारे पास आने से। वह प्लोटिनस कहने लगाअरे हांयह तो मैं भूल ही जाता हूं कि मैं शरीर भी हूं। यह मुझे खयाल ही नहीं रहता कि शरीर में कोढ़ भी है।
मेरे पास भी कम आएंक्योंकि मुझे कुछ पता नहीं कि मैं शरीर भी हूंशरीर पुरुष का भी हैकिसका हैमुझे कुछ पता नहीं। तो पुरुष आ जाते हैं पास तब तो बहुत झंझट नहीं होतीस्त्रियां पास आ जाएं तो बहुत झंझट हो जाती है। तो पूरा खयाल रखें कि मेरे पास ही न आएं। मैं अपने स्वभाव को बदलूंयह मुश्किल मालूम पड़ता है। लेकिन आप मुझ पर दया कर सकते हैंमुझसे थोड़ा दूर-दूर रहें।
अभी यहां आया तो पता चला। एक संसद-सदस्य हैं बड़ौदा केउन्होंने कुछ वक्तव्य दिया। उन्होंने वक्तव्य दिया तो मुझे पता चला कि वे ठीक कहते हैं। एक बहन दिल्ली आई हुई थी। वह संसद-सदस्य से कम बुद्धिमान नहींकिसी युनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। वह आई और मेरे पास रुकी और उसने मुझसे बहुत ही आग्रहपूर्ण निवेदन किया कि यह मेरा बड़ा सौभाग्य होगा कि मैं आपके साथ ही रुक जाऊं। मैं वर्षों से यह प्रतीक्षा करती हूं कि कभी दो दिन आपके साथ रहने मिल जाए।
मैंने कहातू पागल हैतू कभी भी आ सकती थी।
वह मेरे साथ रुक गई। मुझे पता नहीं कि उसका साथ रुकना बहुत अड़चन और कठिनाई की बात हो जाएगी। मुझे अगर किसी ने आकर कहा होता कि इसका साथ रुकना हमें बहुत अड़चन और कठिनाई की बात हैतो मैं उनको कष्ट भी नहीं देता। या उनसे कहता कि तुम भी आ जाओ और तुम भी यहीं सो जाओतुम भी यहीं रुक जाओ। उन्होंने मुझे तो कुछ कहा नहीं। मैं तो मीटिंग में गया। दूसरे दिन उन्होंने इस बहन का सब सामान निकाल कर बाहर कर दिया।
मैं आया तो वह खड़ी हुई रो रही है और उसने मुझे कहा कि मेरा बहुत अपमान किया गयामुझसे बहुत अभद्र बातें कही गईं। मैंने कहायह तो बड़े आश्चर्य की बात है! तो उन मित्रों ने कहा कि जब आप आए तो यह बहन आपसे गले मिली। और यह तो बड़ा अनाचार है कि कोई बहन आपसे गले मिल जाए। तो मैंने उनसे कहा कि मुझे कह देना था तो अच्छा होताउसका सामान निकालना या उससे कुछ बातें कहनी बहुत गलत बात हैअभद्र है।
फिर अभी इधर आया तो पता चलाउन्होंने वक्तव्य दिया है अखबारों में। तो मुझे खयाल आया कि वह भी निवेदन आप से कर दूं। मेरे पास कौन आता हैस्त्री-पुरुष हैमैं कोई हिसाब नहीं रखता हूं। इसलिए सम्हल कर ही मेरे पास आना चाहिएवह अच्छा है। आगे भी मैं  हिसाब रख सकता हूंयह बड़ा मुश्किल है। तो मुझसे थोड़ा दूर ही रहना चाहिएवह अच्छा है। संसद-सदस्यों को तकलीफ देना अच्छा नहीं होता। और संसद-सदस्य बेचारे देश का आचरण ठीक रखने की कोशिश करते हैं। उन्हीं के कारण देश का इतना अच्छा आचरण भी हैनहीं तो कभी का बिगड़ गया होता। देश इतना चरित्रवान और आचरणवान उन्हीं के कारण है। और मेरे जैसे लोग तो हमेशा से आचरण बिगाड़ने वाले रहे हैं। तो ऐसे लोगों से थोड़ा दूर रहना चाहिए।
तो दूसरा निवेदन यह है कि मेरे पास थोड़े फासले से ही नमस्कार किया तो बहुत अच्छा। मुझसे व्यक्तिगत रूप से भी मिलने सोच-समझ कर आना चाहिए। एक तो आना ही नहीं चाहिए। क्योंकि जो मुझे कहना हैवह मैं यहां कह देता हूंमुझसे अलग और पूछने की कोई बात नहीं।
लेकिन मैं जानता हूंकुछ बातें हो सकती हैं जो अलग पूछने की हों। लेकिन संसद-सदस्यों की इच्छा नहीं है कि मुझसे कोई अलग बात कर सके। सिर्फ पुरुषों तक बात चल जाएतब तो ठीक है। स्त्रियां अलग आकर बात करने की कोशिश करेंतो बड़ी कठिनाई हो जाती है। तो स्त्रियों को तो कतई मुझसे अलग बात करने नहीं आना चाहिए। अब इसमें मेरा कसूर नहीं हैउनका स्त्री होना कसूर है या भारत में पैदा होना कसूर हैयह वे समझें।
और अगर कोई मुझसे एकांत में मिलने आएतो उसे सोच-समझ कर आना चाहिए कि चरित्र जिसका ठीक नहींएक ऐसे आदमी के पास जा रहे हैं। तो सोच-समझ करविचार करके आना चाहिए। क्योंकि कठिनाई हो लोगों कोतकलीफ हो लोगों कोपरेशानी हो...
और परेशानी वही होती है--जैसा हमारा चित्त होता हैवैसी ही परेशानी शुरू हो जाती है। जिनके चित्त में कामवासना अति हैउन्हें सिवाय कामवासना के और कुछ भी सारी दुनिया में दिखाई नहीं पड़ता है। दिखाई नहीं पड़ सकता है।
डाक्टर राममनोहर लोहिया ने एक किताब लिखी है। और उसमें पूछा है किताब में एक प्रश्न--कि बुद्ध जब वैशाली गएतो वैशाली की जो नगरवधू थीवेश्या थीआम्रपालीवह आकर बुद्ध के चरणों में पड़ गई और उसने कहा कि मुझे दीक्षा दे दो। तो डाक्टर राममनोहर लोहिया ने एक प्रश्न उठाया है कि मैं सोचता हूं कि उस वक्त उस सुंदर स्त्री को देख कर बुद्ध के मन में कैसी कंपनकैसी लहर उठी होगी?
बड़े मजे की बात है! बुद्ध के मन में कैसी कंपन और कैसी लहर उठी होगीयह डाक्टर लोहिया को खयाल आता है। लेकिन डाक्टर लोहिया भी संसद-सदस्य थे और संसद-सदस्यों को फिकर करनी चाहिए। बिलकुल फिकर करनी चाहिए। देश का चरित्र उन्हीं सबके ऊपर निर्भर है।
विवेकानंद हिंदुस्तान आएसिस्टर निवेदिता का आना बंगाल में एक मुसीबत का कारण हो गया। संन्यासी के साथ और स्त्री! और उन्हें पता ही नहीं कि संन्यासी का अर्थ ही यह होता है कि जिसे स्त्री और पुरुष अब नहीं रहे। लेकिन वह कठिनाई हो गईवह अड़चन हो गईवह मुश्किल हो गई।
जीसस क्राइस्ट के पास मेग्दालिन एक औरत आई और उनके चरणों को पकड़ कर आंसुओं से धो डाला। बस सब गड़बड़ हो गई। ईसा उसी दिन से गड़बड़ शुरू हो गए। एक वेश्या को उन्होंने पैर क्यों छूने दिए!
अब जीसस के लिए भी कोई वेश्या हैऔर जीसस के लिए भी कोई स्त्री और पुरुष हैलेकिन जीसस गलती में हैंसंसद-सदस्य ज्यादा ठीक जानते और समझते हैं। और उन दिनों के संसद-सदस्य जो थेउन्होंने जीसस को सूली पर लटकवा दिया।
सुकरात के ऊपर चरित्रहीनता का आरोप था कि यह लड़कों को बिगाड़ता है।
रामकृष्ण परमहंस के पास विवेकानंद गएतो विवेकानंद तो एक सुंदर युवक थे। तो अफवाह उड़ाई गई कि रामकृष्ण सुंदर लड़कों को प्रेम करते हैं। वह तो यह कहो कोई संसद-सदस्य नहीं था वहां दक्षिणेश्वर मेंनहीं तो रामकृष्ण को पता चलता कि क्या मुसीबत हो सकती है।
तो उचित यही हैउनकी कोई गलती नहीं हैउन्होंने तो अच्छा ही कियाउन्होंने तो बात अच्छी ही कहीउनका कोई कसूर भी नहीं हैउनको ये बातें कहनी चाहिए। मैंने तो उनसे वहीं कहा था कि मैं जाहिर में बात कर लूं। तो वे कहने लगेनहींजाहिर में बात करना ठीक नहीं है। लेकिन अब उन्हें खुद लगा कि जाहिर में बात होनी चाहिए। मैं तो जाऊंगा उनके इलेक्शन के वक्त वहां बड़ौदा और लोगों से कहूंगा कि इनको जरूर वोट देनानहीं तो देश का चरित्र खराब हो जाएगा। इनको वोट देते ही रहनानहीं तो देश के चरित्र की कोई संभावना नहीं है।
सारे देश के चित्त को कामुक बनाया हुआ है और चरित्र की सारी बातें चलती हैं। और कामुकता इतनी गहरी घुस गई है कि असंभव हो गया है स्त्री-पुरुष को क्षण भर को भूलना कि कौन स्त्री हैकौन पुरुष है। भूलना ही असंभव हो गया है। लेकिन वे दूसरी बातें हैंमुझ जैसे गलत लोग करते हैंअच्छे लोग ऐसी बातें नहीं करते। लेकिन लोगों को सावधान होना चाहिए। क्योंमेरे पास आने की जरूरत क्या हैकोई जरूरत नहीं है। मुझे पत्र लिखने की भी जरूरत नहीं हैक्योंकि मैं बड़े गड़बड़ पत्र लिखता हूं।
तो तीसरी प्रार्थना आपसे यह करनी है कि मुझे पत्र मत लिखा करें। और स्त्रियों के साथ बड़ी मुसीबत है। अगर उनके पत्र का उत्तर न दोतो ठीक पीछे से लगे हुए दूसरे पत्र पहुंच जाते हैं। पत्र का उत्तर दो तो कठिनाई शुरू होती है। तो मुझे पत्र न लिखा करें। मुझसे तो जो बात पूछनी होवह यहां पूछ ली।
और या फिर अगर किसी को मिलना ही होपुरुषों को तो उतनी तकलीफ नहीं हैस्त्रियों को अगर मिलना ही होतो अगर वे कम उम्र हों तो अपने बाप को साथ लाना चाहिएवह रक्षक रहता है। ज्यादा उम्र होअपने पति को साथ लाना चाहिएवह रक्षक रहता है। और ही ज्यादा उम्र होतो अपने बेटे को साथ लाना चाहिएवह रक्षक रहता है। लेकिन अकेले कभी नहीं आना चाहिए। अकेले आना बिलकुल ठीक नहीं। क्योंकि मैं प्रेमपूर्ण ही हो सकता हूं।
अब यहां हिम्मतभाई जोशी हैंवे यहां बैठे होंगे कहीं। उनकी पत्नी मेरे साथ गईजसु मेरे साथ इंदौर गई। उसे मेरे बगल के कमरे में ठहराया। वह शाम को आई और कहने लगी कि मैं तो यहीं सोऊंगी आपके कमरे में। मैंने कहाकमरा बहुत बड़ा हैतू सो जा। अब मुझे खयाल नहीं रहा कि इस स्त्री को सोने के लिए कह रहा हूंकोई संसद-सदस्य आस-पास इंदौर में भी तो होंगे। वह तो इंदौर का संसद-सदस्य सोया हुआ आदमी मालूम पड़ता हैउसे चरित्र का कोई खयाल नहीं है। और इसलिए इंदौर के लोगों को उसे वोट नहीं देना चाहिए--कि तुम गलत आदमी हो! तुमको पता लगाना चाहिएकौन कहां सोता हैकौन क्या करता है! और फिर मेरे जैसे गड़बड़ आदमी के साथ कौन सो गयाक्या हो गया। तो उसको ही जब...मैंने कहाठीक है। वह सो गई। वह बड़ी आनंदित रही होगी। वह तो भाग्य कहो किसी संसद-सदस्य को पता नहीं चलाऔर नहीं तो मुश्किल हो जाती।
ये जो लोग...कई बार चीलें आकाश में उड़ती हैंइससे यह मत सोच लेना कि चीलें आकाश में हैं। चीलें उड़ती आकाश में हैंउनकी नजर जमीन के घूरों पर पड़े हुए गंदे मांस के लोथड़ों में लगी रहती है। आकाश में उड़ान होती हैनजर मांस के लोथड़ों में लगी होती है। आकाश में उड़ने भर से मत समझ लेना कि चीलें आकाश में हैंचीलों की नजर जमीन पर होती है और गंदे स्थानों पर होती है।
आपकी नजर कहां हैवहीं आप होते हैं। संसदों में होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। नजर कहां हैलेकिन उनका कसूर नहीं है कोईवे तो बेचारे जनहित के लिए सब कुछ किए। वह करना ही चाहिए जनहित में ऐसा। लेकिन आपको यह निवेदन करता हूं कि मेरे पास आने-जाने की कोई जरूरत नहीं है। और मुझसे किसी तरह के प्रेम-संबंध बनाने की भी जरूरत नहीं है। और मुझसे किसी के भी प्रेम-संबंध बन जाते हैं। वह गलती बात है। प्रेम ही गलती बात है।
तो यह तीसरा निवेदन आपसे करना है। और इन तीन दिनों के संबंध में या पीछे और जो बातचीत चली है उस संबंध में जो भी प्रश्न होंवे आप लिखित दे देंगेताकि अंतिम दिन की बैठक में मैं उन सारे प्रश्नों पर चर्चा कर सकूं।

मेरी बातों को इतनी शांति और प्रेम से सुनाउसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें