गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-04

सत्य की छाया है शांति

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक मित्र ने पूछा है कि क्या मैं साम्यवादी हूंकम्युनिस्ट हूं?

बहुत मजेदार बात पूछी है। अगर परमात्मा कम्युनिस्ट है तो मैं भी कम्युनिस्ट हूं। और परमात्मा जरूर कम्युनिस्ट होना चाहिएक्योंकि उसकी नजर में कोई भी असमान नहीं हैसभी समान हैं। और जिसकी नजर में सभी समान हैंवह चाहता भी होगा कि सभी समान अगर न हों दूसरों की नजरों मेंतो धीरे-धीरे समान हो जाएं।
महावीर कम्युनिस्ट रहे होंगेऔर बुद्ध भीऔर जीसस भी। हालांकि किसी ने उनसे कभी पूछा नहीं। और गांधी तो निश्चित ही कम्युनिस्ट रहे होंगे। गांधी से तो किसी ने पूछा भीतो गांधी ने कहा कि मैं किसी भी कम्युनिस्ट से ज्यादा कम्युनिस्ट हूं।

अगर सर्व मंगल की कामनाअगर सबके उदय की कामनाअगर सबका हित हो यह आकांक्षा कम्युनिज्म हैतो कोई भी धार्मिक आदमी बिना कम्युनिस्ट हुए कैसे रह सकता है?
लेकिन दूसरे अर्थों में मैं कम्युनिस्ट बिलकुल भी नहीं हूं।
सच बात तो यह है कि मैं किसी वाद मेंकिसी संप्रदाय मेंकिसी शास्त्र में विश्वास नहीं करता हूं। कम्युनिज्म भी एक वाद हैएक शास्त्र हैएक विश्वास हैएक मत हैएक संप्रदाय है। वह दुनिया में पैदा हुआ नये से नया धर्म है। उसके भी पुरोहित हैंउसके भी मंदिर हैंउसका भी मक्काकाबाकाशी सब है। वह जो क्रेमलिन हैवह कम्युनिस्ट के लिए वही हैजो मुसलमान के लिए मक्का और हिंदू के लिए काशी। माक्र्स की किताब कैपिटल उसके लिए वही हैजो किसी के लिए गीता और किसी के लिए बाइबिल और किसी के लिए कुरान।
उस अर्थ में मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं। मैं किसी वाद में विश्वास नहीं करता। न मैं कम्युनिस्ट हूंन सोशलिस्टन फासिस्टन गांधी-इस्ट। और न मैं चाहता हूं कि कोई आदमी किसी वाद में अपने को कभी बांटे। आदमी वाद में बंधा कि गुलाम हुआ। वाद गुलामी का लक्षण है। जो आदमी वाद में बंधाउसके चित्त की स्वतंत्रता समाप्त हुई। जिस आदमी ने ऐसा समझा कि मेरा यह मत हैउस आदमी का सत्य से संबंध टूटना उसी क्षण शुरू हो जाता है। या तो आप सत्य के हो सकते हैं या मत के। या तो आप धर्म के हो सकते हैं या संप्रदाय के। और संप्रदाय चाहे धार्मिक हों और चाहे राजनैतिकसब संप्रदाय मनुष्य के चित्त को गुलाम करने में सहयोगी होते हैं।
तो किसी वाद से मेरा कोई भी संबंध नहीं है। अगर ठीक से कहूं और वाद शब्द ही पूछना होतो मैं अराजकवादी हूंअनार्किस्ट हूं। हालांकि अनार्किज्म शब्द बड़ा गलत हैक्योंकि अराजकवाद का कोई वाद नहीं होता। अराजकवाद का अर्थ होता है: जिसका कोई वाद नहीं।
लेकिन मेरी बातों से बहुत बार भ्रांति पैदा होती है। मेरी बातों से इसी तरह भ्रांति पैदा होती हैजैसे मुझे बुद्ध के जीवन में एक घटना याद आती है उससे मैं समझाऊं।
बुद्ध एक दिन सुबह एक गांव से निकले। साथ में उनका भिक्षु आनंद था। रास्ते पर एक आदमी मिला और उसने कहा कि मैं आस्तिक हूंमैं ईश्वर को मानता हूंआप भी ईश्वर को मानते हैं या नहीं?
बुद्ध ने कहाईश्वरईश्वर है ही नहींमानने का सवाल क्या!
वह आदमी बहुत चौंकाउसने मन में समझा: यह बुद्ध नास्तिक मालूम पड़ता है। आनंद जो उनके साथ थावह भी चौंका कि बुद्ध ने एकदम से कह दिया कि ईश्वर है ही नहींमानने का सवाल नहीं! लेकिन वह चुप रहा।
दोपहर को एक दूसरा आदमी आया उस गांव में और बुद्ध से कहने लगा कि मैं नास्तिक हूंईश्वर को नहीं मानता हूंआपका क्या खयाल है--ईश्वर है?
बुद्ध ने कहाईश्वर ही हैऔर कुछ भी नहीं है!
उस आदमी ने समझा: यह बुद्ध आस्तिक है। और आनंद बड़ी मुश्किल में पड़ गया। क्योंकि आनंद ने दोनों उत्तर सुन लिए थे। पहला आदमी भी निश्चिंत होकर चला गया कि यह नास्तिक हैदूसरा आदमी समझ लिया आस्तिक हैलेकिन आनंद क्या समझेफिर भी वह चुप रहा कि रात एकांत में पूछ लूंगा।
सांझ को एक और घटना घट गई! एक तीसरे आदमी ने आकर पूछा कि मुझे कुछ भी पता नहीं है कि ईश्वर है या नहींआपका क्या खयाल है?
बुद्ध चुप रह गए और कोई भी उत्तर न दिया।
रात आनंद ने कहामेरी नींद हराम कर दी हैमैं सो नहीं पा रहा हूं। यह मामला क्या हैसुबह यह कहादोपहर यह कहासांझ चुप रह गए। इन तीनों उत्तरों में बड़ा विरोध है!
बुद्ध ने कहामैंने तुझे कोई भी उत्तर नहीं दिया थातूने सुना क्योंउत्तर मैंने दूसरों को दिए थे।
पर आनंद कहने लगामैं मजबूर हूंमैं साथ थामुझे तीनों उत्तर सुनाई पड़ गए। वे तीनों तो निश्चिंत गएलेकिन मेरी बड़ी मुसीबत हो गई है। आप हैं क्या?
बुद्ध ने कहामैं बस मैं हूं।
पर आपने तीन उत्तर क्यों दिए?
बुद्ध ने कहाअगर तू समझेगा तो समझ आ सकता है। जो आदमी मेरे पास आकर कहता है--ईश्वर नहीं हैआपका क्या खयाल हैवह अपनी नास्तिकता में मेरा समर्थन चाहता हैताकि लौट कर निश्चिंत हो जाए। जो मानता हैउसको और जोर से मान ले। मैं तो हर एक की मान्यता तोड़ना चाहता हूं। तो मैंने उससे कह दिया--ईश्वरईश्वर है! मैं उसकी मान्यता तोड़ना चाहता हूं,क्योंकि जिसकी मान्यता है वह आदमी गुलाम हैवह सत्य को कभी नहीं जान सकेगावह मान्यता चाहे कुछ भी हो! वह जो दूसरा आदमी आयावह कहता है--ईश्वर हैआप मानते हैंवह भी अपनी मान्यता के लिए मुझसे समर्थन लेने आया है। मैंने कहा--ईश्वरईश्वर बिलकुल नहीं हैमानने का सवाल क्या है! मैं उसकी भी मान्यता को हिलाता हूंताकि वह मान्यता से मुक्त हो जाए और सत्य की खोज कर सके। और तीसरा जो आदमी आया उसकी कोई भी मान्यता नहीं थी। उसने कहा--मुझे पता नहीं है कि ईश्वर है या नहींआप क्या कहते हैंतो मैंने कहा--यह बहुत अच्छा है कि पता नहीं है। अब तुम चुप रह जाओतो पता हो सकता है। इसलिए मैं चुप रह गया।
आज तक भी तय नहीं हो पाया है कि बुद्ध आस्तिक थे कि नास्तिक। पंडित अभी भी विचार करते हैं। और यह कभी तय नहीं हो पाएगाक्योंकि बुद्ध न आस्तिक हैंन नास्तिक। बुद्ध का कोई मत नहीं है। बुद्ध चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक मत से मुक्त हो जाए। क्योंकि जो मत से मुक्त हो जाता हैवह सत्य को उपलब्ध हो जाता है।
इसी तरह की झंझट मेरे साथ भी सुबह से लेकर सांझ तक हो जाती है। एक बात आप सुन लेते हैं और फिर परेशान हो जाते हैं कि जरूर यह आदमी इससे उलटा होगा। अगर पूंजीवाद के खिलाफ में बोला हैतो फिर कम्युनिस्ट होना चाहिए।
लेकिन मैं पूंजीवाद के भी खिलाफ हूं और साम्यवाद के भी खिलाफ हूं। मैं वाद मात्र के खिलाफ हूं। मैं एक ऐसा समाज चाहता हूं जो वाद से घिरा हुआ समाज न हो। वाद मात्र के मैं विरोध में हूंसंप्रदाय मात्र के मैं विरोध में हूं। मेरा कोई संप्रदाय नहीं है। इसलिए मैं एक झंझट में भी पड़ गया हूं कि जिनके भी संप्रदाय हैंवे सब मुझे अपना दुश्मन समझ लेते हैं। और ऐसा आदमी कोई भी नहीं है जिसका संप्रदाय न हो। इसलिए मुझसे दोस्ती बनानी ही मुश्किल होती चली जाती है।
नहींमैं न कम्युनिस्ट हूंन कोई और हूं। आंखें खुली रखता हूंदेखता हूंजो मुझे ठीक लगता है वह कहता हूं। वह ठीक चाहे किसी का हो। और जो मुझे गलत लगता हैकहता हूं वह गलत है। चाहे वह गलत किसी का भी हो। और यही मैं चाहता हूं कि आप भी किसी वाद में कभी न बंधें।
मेरा वाद भी हो सकता हैमेरे वाद में भी बंध सकते हैं। कुछ मित्रों को यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मेरे अनुयायी हैं। वे बड़ी गलती में हैं। मेरा अनुयायी कोई भी नहीं है। और न मैं चाहता हूं कि कोई मेरा अनुयायी हो। क्योंकि वह फिर एक वाद है। फिर वह मुझसे बंध जाना है।
मैं चाहता हूं आदमी सबसे छूट जाए। आदमी हमेशा बंधा रहा है आज तक। किसी न किसी से बंधा हुआ है। खूंटी का नाम क्या हैइससे मुझे प्रयोजन नहींमुझे प्रयोजन है: क्या आप खूंटी से बंधे हैंचाहे वह खूंटी गांधी की होचाहे वह खूंटी माक्र्स की होचाहे वह खूंटी मेरी हो। खूंटी से बंधा हुआ आदमी ठीक आदमी नहीं है। और मैं खूंटी से मुक्त आदमी चाहता हूं। तो जिस खूंटी के खिलाफ बोलता हूंउस खूंटी वाला समझता है कि ठीकयह आदमी किसी उलटी खूंटी के पक्ष में होगा! यहां से छोड़ कर वहां बांधने की कोशिश में लगा है।
मैं आपको कहीं बांधने की किसी कोशिश में नहीं लगा हुआ हूं। मैं चाहता हूंछूट जाए मन। जो मन सबसे छूट जाता हैवह परमात्मा को उपलब्ध हो जाता है। एक अनक्लिंगिंग चाहिएएक मुक्त-चित्तता चाहिए।
तो मैं किसी वाद में नहीं हूं। न मेरा कोई संबंध किसी वाद से कभी हैन हो सकता है। मैं वाद मात्र के विरोध में हूं। मैं किसी वाद के भी विरोध में नहीं हूं--वाद मात्र के विरोध में हूं। और जहां भी वाद हैवहीं मुझे दासता की दुर्गंध आनी शुरू हो जाती है। चाहे वह गांधीवाद होचाहे वह साम्यवाद होचाहे उसका नाम कुछ और हो--हिंदूवाद होइस्लामवाद हो कि जैनवाद हो--इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
मेरी बात आप समझ लें। मन जब भी किसी वाद को पकड़ता हैतभी उसकी अनंत की यात्रा बंद हो जाती है। बस पत्थर पड़ गया उसके ऊपरअब वह उड़ नहीं सकेगाअब उसके पंख कट गए। अगर चाहते हैं कि आपकी चेतना में पंख होंतो कभी बंधना मतकिसी से भी मत बंधना। और इसीलिए मैं दुनिया के महापुरुषों के संबंध में भी कभी कुछ खिलाफ कह देता हूं तो आपको बड़ी बेचैनी होती है। आप समझते हैं मैं महापुरुषों का विरोधी हूं।
मैं अगर महापुरुषों का विरोधी हूंतो महापुरुषों को प्रेम करने वाला आदमी खोजना बहुत मुश्किल हो जाएगा। महापुरुषों का मैं विरोधी नहीं हूं। मैं तो गोडसे तक का विरोधी नहीं हूंतो गांधी का विरोधी कैसे हो सकता हूंलेकिन जब मैं विरोध करता हूं किसी महापुरुष कातो महापुरुष का विरोध नहीं कर रहा हूंवह जो आपकी खूंटी हैजिससे आप बंधे हैंउसको हिलाने की कोशिश कर रहा हूंआप छूट जाएं इसलिए। और आप खूंटी की इतनी प्रशंसा करते हैं कि वही प्रशंसा आपके बंधने का कारण हो जाती है। इसलिए आपकी प्रशंसा को भी तोड़ने की कोशिश करता हूं। भूल कर यह मत समझ लेना कि मेरी कोई दुश्मनी है।
लेकिन हमारी समझ इतनी कम हैइतनी कम है समझ...और समझ कम होती है उस आदमी की जो कहीं बंधा होता हैप्रिज्युडिस्ड होता है। जिसका कोई मत हैउसकी कोई समझ नहीं होती। जिसका कोई सिद्धांत हैउसकी कोई अंडरस्टैंडिंग नहीं होती। क्योंकि वह पहले से बंधा है। और उस बंधी दुनिया की तरफ से हीउसी चश्मे से देखना शुरू करता है। उसे कठिनाई शुरू हो जाती है। वह समझ ही नहीं पाता कि बात क्या है। उसे खयाल ही नहीं आ पाता कि मतलब क्या हैप्रयोजन क्या हैइशारा क्या है।
इशारा कुल इतना है कि सबसे छूट जाएंताकि अपने में आ सकें। कहीं बाहर बंधे न रहेंताकि वह फूल खिल जाए जो अपना है और भीतर है।
बाहर जो बंधा हैवह भीतर नहीं पहुंच पाता है। और जो कहीं भी बंधा हैवह बंधा है। और बंधन परमात्मा तक पहुंचने में बाधा है। उस खुले आकाश में जो प्रभु का हैउस खुले आकाश में जो सत्य का हैउस खुले आकाश में जो ज्ञान का है--केवल वे ही उड़ते हैंजिनके पासजिनकी छातियों पर मत केसिद्धांत केशास्त्र के पत्थर नहीं हैं।
इसलिए एकबारगी यह ठीक से समझ लें कि किसी वाद से मेरा कोई भी संबंध नहीं है। और अच्छी दुनिया अगर बनानी हैतो एक निर्विवाद दुनिया बनानी पड़ेगीजहां वाद का कोई आग्रह न हो।
मुझे तो निरंतर ऐसा मालूम पड़ता है कि वाद का आग्रहीजीवन के तथ्यों को समझने में असमर्थ ही हो जाता है। उसकी पूरी चेष्टा यह होती है कि मेरा जो वाद हैवह वाद जीवन के तथ्यों से सही सिद्ध होना चाहिए। उसे वाद ज्यादा महत्वपूर्ण हैजीवन के तथ्य ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं। जीवन के तथ्य गौण हैंवाद प्रमुख है। तथ्यों को सिद्ध करना चाहिए वाद को।
लेकिन स्थिति उलटी है। कोई वाद प्रमुख नहीं हैजीवन के तथ्य प्रमुख हैं। जीवन के तथ्यों को देख कर चलना हैवादों को देख कर नहीं।
हजारों साल से आदमी वादों को देख कर चल रहा है। पुराने किस्म के वाद अब जरा पुराने और बासे पड़ गए हैंतो नये किस्म के वाद आ गए हैं। पुरानी जंजीरें थोड़ी जंग खा गई हैंतो हमने नई चमकदार जंजीरें बना ली हैं। और हम सोचते हैं कि पुरानी जंजीरें तोड़ दो और झट से नई जंजीर बांध लो और अकड़ से निकल जाओ कि मैं जंजीर से मुक्त हो गया हूं।
अगर हिंदू होने से बचे और कम्युनिस्ट हो गएतो मामला वही हैसिर्फ जंजीर का नाम बदल गयाऔर कोई फर्क नहीं हुआ। इधर जैन होने से बचे और उधर जाकर गांधीवादी हो गएतो अपने हाथ से बुद्धू बन गए। एक वाद छूटादूसरे वाद में घुस गए। बच नहीं पाएवाद से नहीं बच पाएआत्मा मुक्त नहीं रह सकीस्वतंत्र नहीं रह सकी। व्यक्ति नहीं बचता वाद मेंवाद में बचता है संप्रदायव्यक्ति का अंत हो जाता है।
और मैं चाहता हूं: एक-एक व्यक्ति एक खिला हुआ मुक्त फूल हो। अपनी हैसियत से खिला हुआ फूल हो। इसलिए मेरा किसी वाद से कोई भी संबंध नहीं है। कोई दूर का संबंध नहीं है।
एक अच्छी दुनिया के निर्माण मेंस्वतंत्र और मुक्त चेतना की जरूरत है।
एक और मित्र ने पूछा है कि आप सबको छोड़ करसिर्फ गांधी के विरोध में क्यों बोलते हैं?

क्योंकि गांधी से महत्वपूर्ण आदमी मुझे कोई भी नहीं मालूम पड़ता है। और इसलिए भी कि मैं सोचता था कि गांधी के विरोध में कुछ बात बोलने से देश में चिंतन पैदा होगा। लेकिन मैं निराश हो गया। चिंतन पैदा नहीं हुआसिर्फ गाली-गलौज पैदा हुई। और मैं बहुत चकित हो गया! मैंने सोचा था कि गांधी को मानने वाले अहिंसक लोग हैं। वह मेरी भ्रांति सिद्ध हुई। मैंने सोचा था कि गांधी के ऊपर आलोचना शुरू करूंगातो गांधीवादी मुझे कहेंगे कि आप आएंहमसे बात करेंहमें समझाएंहमसे चर्चा करें। क्या सही हैक्या गलत हैहम विचार करें। एक गांधीवादी ने मुझसे यह नहीं कहा। बल्कि गांधीवादी कभी-कभी मुझे सुनने भी दिखाई पड़ता थावह एकदम नदारद हो गया। उसका कहीं पता नहीं चलता कि वह कहां चला गया।
यह मुझे आशा नहीं थी कि गांधी ने तीस-चालीस वर्ष श्रम करके भारत में जो विचार की प्रक्रिया को जगाने की कोशिश की थीवह इस भांति एकदम समाप्त हो गई होगी। लेकिन हमारी समझ इतनी कम है कि मैं जो गांधी की आलोचना भी कियाजो समझदार हैं वे जानते हैं कि मैंने गांधी के काम को ही आगे बढ़ाया है। लेकिन नासमझों का कोई क्या हिसाब रख सकता है!
गांधी का काम गांधी के मरने के साथ ही ठप्प हो गया। सच तो यह है कि गांधी के मरने के पहले ही ठप्प हो गया। और गांधी की पूरी आकांक्षा हो गई थी कि मैं कब मर जाऊंकब मर जाऊं। वह बात ही खतम हो गई।
उस बात को फिर से गति देनी जरूरी है कि हम फिर सोचें! तो मैंने सोचा था कि एक शॉक उपयोगी होगामुल्क चिंतन करेगा। लेकिन मैंने पाया कि मुर्दों को शॉक देने से कोई फायदा नहींकोई फायदा नहीं। इधर दोत्तीन महीने में मुझे जो अनुभव आयावह बहुत रिवीलिंग हैउससे बड़ा उदघाटन हुआ मेरे सामने--कि इस देश ने चिंतन की क्षमता ही खो दी है। हमने विचार करना ही बंद कर दिया है।
और फिर मेरे जैसे आदमी के साथ तो विचार करना बहुत सरल हैक्योंकि मैं कभी कहता नहीं कि जो मैं कहता हूं वही सत्य है। तो मुझसे तो झगड़े का बहुत कम उपाय हैक्योंकि मैं यह कहता हूं कि जो मैं कहता हूं वह मैं कहता हूंवह सच हो भी सकता हैगलत भी हो सकता है। बातचीत की जा सकती हैनिर्णय लिए जा सकते हैं। सोच-विचारएक डायलाग पैदा हो जाए मुल्क में चिंतन कावह मैं चाहता हूं।
लेकिन वह पैदा नहीं होता। मैं कुछ अगर आलोचना करता हूंतो दूसरी तरफ से गाली-गलौज शुरू हो जाती है। बजाय इसके कि जो मैंने कहा है उस पर विचार चले और तय किया जाए कि क्या सही हैवह तो बात ही एक तरफ छोड़ दी जाती हैकुछ दूसरी ही बातें शुरू हो जाती हैं।
यह इतना दुखद है और भारत के भविष्य के लिए इतना चिंतनीय हैजिसका बहुत हिसाब लगाना कठिन है। लेकिन आज नहीं कल हमें यह सोचना ही पड़ेगा।
मेरा गांधी से बहुत प्रेम हैशत्रुता का तो कोई सवाल ही नहीं है। तो मित्र पूछते हैं कि आप उनके शत्रु हैंशत्रु तो मैं किसी का भी नहीं हूंशत्रु तो होने में असमर्थ हूं। और शत्रु नहीं हो सकता हूं इसलिए खुली-सीधी बात कर लेता हूं जो मुझे ठीक लगती है। कम से कम अपनों के बाबत तो खुली और सीधी बात की जा सकती है।
लेकिन हम कुछ ऐसे भयभीत हो गए हैं कि अपनों के संबंध में खुली और सीधी बात भी नहीं कर सकते। वह बात नहीं चल सकी। चली बहुत बातजोर से चलीन मालूम क्या-क्या लिखा और पढ़ा और बोला गया। लेकिन विचार जो पैदा होना चाहिए थावह पैदा नहीं हो सका। भारत के पास विचार खो गया है। लोग समझे कि शायद मैं गांधी की प्रतिमा को अलग करके अपनी प्रतिमा बिठालना चाहता हूं।
मैं जो प्रतिमा-विरोधी हूंवह अपनी प्रतिमा किसलिए बिठालना चाहूंगाऔर किसी की प्रतिमा मिटाने की जरूरत होती है बैठ जाने के लिएइतनी दुनिया में जगह पड़ी है कि अपनी मढ़िया अलग बना लोकहीं भी अपनी प्रतिमा खड़ी कर लो। किसी की दूसरे की प्रतिमा गिराने की क्या जरूरत हैऔर इतने पागल पड़े हैं दुनिया में कि किसी एक के पूजने वाले से कोई पूजने वालों की कमी पड़ जाती हैदूसरे पूजने वाले मिल जाएंगे।
इतने भगवान पूजे जाते हैंकोई कमी हैदुनिया में कोई तीन सौ धर्म हैंऔर एक-एक धर्म के न मालूम कितने देवी-देवता और भगवान हैं। हिंदुस्तान में तो तैंतीस करोड़ देवी-देवता हैं। एक-एक आदमी का एक-एक है। यहां कोई दिक्कत है अपनी प्रतिमा पुजवाने के लिएयहां किसी की प्रतिमा गिराने की जरूरत हैगिराने में और झंझट हो जाती है। क्योंकि देवी-देवता नाराज हो जाएंतो आपकी प्रतिमा का जमाना बहुत मुश्किल हो जाए। यहां तो उचित यह है कि सब देवी-देवताओं की प्रशंसा करो और छोटी सी जगह अपने लिए भी बना लोतो बहुत आसानी पड़ती है।
लेकिन मुझे कोई जगह नहीं बनानीमुझे कोई पंथ नहीं बनानाकोई संप्रदाय नहीं बनानामुझे कोई पूजा नहीं चाहिए। चाहता कुल इतना हूं कि देश में चिंतन जग जाएदेश में विचार जग जाए। लोग सोचने लगेंलोग विचार करने लगेंलोग देखना शुरू कर देंअंधे न रह जाएं।
लेकिन अंधे रहने की मालूम होता है हमने कसम खा रखी है। और अगर कोई आकर हमारी आंखें खोलने की कोशिश करेतो हम उस पर नाराज होते हैं--कि हमारी नींद तोड़ते हो! हम आराम से सो रहे हैंसुंदर सपना देख रहे हैं और तुम हमारी नींद खराब करते हो!
ऐसा ही मुझे अनुभव हो रहा है निरंतर कि किसी को भी सोचने के लिए कहनादुश्मनी मोल लेनी मालूम पड़ती है। वह आदमी नाराज होता है। क्योंकि बिना सोचे एक सुविधा हैसोचते ही असुविधा शुरू होती है। क्योंकि जैसे ही सोचना शुरू किया कि जिंदगी गलत दिखाई पड़ने लगती है और बदलाहट जरूरी हो जाती है। अगर कोई भीतर के संबंध में सोचेगा तो स्वयं को बदलना पड़ेगा! और अगर कोई बाहर के संबंध में सोचेगा तो समाज को बदलना पड़ेगा! चिंतन क्रांति की प्रक्रिया है। चिंतन शुरू हुआ कि बदलाहट अनिवार्य है।
इसलिए बदलाहट की झंझट से बचना हो तो पहला काम जरूरी है--सोचना कभी मत! इसको मूलमंत्र मान लेना--सोचना कभी मत! इससे बड़ी सुविधा रहती है। इससे नींद गहरी आती है और आदमी को जीने की कठिनाई नहीं उठानी पड़तीमरा-मरा जी लेता है और मर जाता है।
यह हमारी हजारों साल की प्रक्रिया रही है। यह हमारी आधारशिला रही है कि सोचो मत! इसलिए कोई भी बात जो सोचने को मजबूर करेवह हमें क्रोध से भर देती हैआनंद से नहींअहोभाव से नहींधन्यवाद से नहीं--कि कोई व्यक्ति सोचने के लिए धक्के देता है तो हम धन्यवाद दें कि उसने सोचने को हमें मजबूर किया।
जो आदमी हमें सोने की सुविधा देता हैहम उसको धन्यवाद देते हैं। जो आकर अफीम की गोली दे देता है कि यह ले लो और मजे से सो जाओ! हम कहते हैं कि तुमने बड़ी कृपा कीअफीम की गोली ला दीअब हम मजे से सो सकते हैं। अफीम की गोलियों को धन्यवाद दिया जा रहा है।

एक मित्र ने मुझसे और एक बात पूछी हैजो मैं सोचता था कि छोड़ दूंलेकिन शायद इस संदर्भ में छोड़नी उचित नहीं है। उन्होंने पूछा है कि आपका गांधी से कभी कोई संबंध रहा?

जब वे जिंदा थे तब बहुत ज्यादा संबंध नहीं रहा। लेकिन जब से मर गए हैं तब से बहुत संबंध है। जब वे जिंदा थे तब मैं छोटा था। सिर्फ एक बार छोटा सा संबंध हुआ थाथोड़ा सा मिलना हुआ थालेकिन उस मिलने का कोई हिसाब रखना उचित नहीं है। लेकिन मर जाने के बाद उनसे मेरा निरंतर संबंध है। सिर्फ विचार में ही संबंध नहीं है कि मैं उनके बाबत सोचता हूंऔर भी गहरे अर्थों में संबंध है। सोचता था इस बात को छोड़ दूंक्योंकि यह समझ के परे हो जाएगी बात। लेकिन पूछी है इसलिए मैं कहना चाहता हूं। मानने की उसे कोई जरूरत नहीं है।
हम आमतौर से सोचते हैं कि जिनके शरीर हैंउनसे ही हमारे संबंध हो सकते हैं। हम यह भी सोचते हैं कि जो सामने मौजूद हैंउन्हीं से संबंध हो सकते हैं। ये बातें बुनियादी रूप से गलत और अवैज्ञानिक हैं। संबंध बहुत लंबी बात है। दो दूर पर मौजूद लोगों के बीच हजारों मील का फासला होऔर संबंध हो सकता हैवैसे ही जैसे दो आदमी आस-पास बैठे हों तब हो सकता है।
और अब तो विज्ञान ने इसको प्रमाणित किया। पहले तो यह सिर्फ उन लोगों की बात थीइजोटेरिकजो भीतर की दुनिया में काम करते थे। वे जानते थे कि हजारों मील का फासला कोई फासला नहीं है। अगर भीतर से संबंधित होने की कला का पता होतो आदमी हजारों मील के फासले से संबंधित हो सकता है। और हजारों वर्ष से लोग संबंधित होते रहे थे। लेकिन अबअब तो विज्ञान ने भी स्वीकृति दे दी है कि यह संभावना नहीं हैसत्य है! और इस जगह से स्वीकृति मिली है जहां से आप आशा भी नहीं करेंगे। सबसे पहले रूस से स्वीकृति मिली है इस बात की कि हजारों मील का फासला कोई फासला नहीं हैटेलीपैथिकविचार के अंतर्संबंध हो सकते हैं।
फयादेव नाम के एक वैज्ञानिक ने डेढ़ हजार मील दूर के फासले पर संबंध स्थापित करने के प्रयोग में सफलता पाई। मास्को में बैठ कर दूर तिफलिस में एक बगीचे में बैठे आदमी को संदेश भेजने में वह सफल हुआ।
हजार मील दूर आदमी तिफलिस के बगीचे में एक बेंच पर बैठा हुआ है। उसका निरीक्षण किया जा रहा है। अजनबी आदमीसड़क पर चलता हुआबेंच पर विश्राम करने को बैठा है। समझ लें ग्यारह नंबर की बेंच पर बैठा है। और मास्को से फयादेव और उसके साथी उस बगीचे में फोन से बात कर रहे हैं कि एक आदमी आकर बैठा हैइतना बजा हैतुम वहां से संदेश दो कि वह आदमी इसी वक्त सो जाए। और फयादेव ने वहां से अंतर-संदेश दिया--मन में ही--उस आदमी को सुझाव दियाउसका ध्यान करके कि सो जाओसो जाओसो जाओ...। डेढ़ हजार मील दूर और वह आदमी थोड़ी देर में आंख बंद करके लेट गया।
लेकिन यह भी हो सकता है कि वह आदमी थका-मांदा हो और सो गया हो। तो मित्रों ने कहावह सो तो गयाइस वक्त इतना बजा हैअब तुम उसे इसी वक्त उठा दो। तब हमें पक्का लगे। नहीं तो हो सकता है ऐसे ही सो गया हो। और फयादेव ने वहां से सुझाव दिए कि उठ जाओ! और उस आदमी ने आंख खोली और उठ गया।
उन मित्रों ने उससे पूछा कि आपको कुछ भिन्नता तो नहीं मालूम हुई?
उसने कहाभिन्नता मुझे जरूर मालूम हुई। जब मैं सोया तब मुझे कुछ ऐसा लगा कि जैसे कोई कहता है--सो जाओ। लेकिन मैंने सोचा कि मैं ही थका-मांदा हूंइसलिए खुद का मन कहता होगा। मैं सो गया। लेकिन उठते वक्त भी मुझे ऐसा सुनाई पड़ा कि जैसे कोई कहता है--उठ जाओ।
फिर तो फयादेव ने और भी प्रयोग किए। वे असल में प्रयोग कर रहे हैं इसलिए ताकि अंतरिक्ष यानों से संबंध टेलीपैथी के द्वाराविचार के द्वारा तय किया जा सके। क्योंकि अंतरिक्ष यानों में यंत्रों के कभी भी बिगड़ जाने की संभावना हैऔर तब सारे संबंध टूट जाएंगे। अगर एक बार यंत्र बिगड़ गया तो अंतरिक्ष में जो गया यात्री हैउससे हमारा कोई संबंध नहीं रह गया। वह कहां भटक जाएगाकहां खो जाएगा अनंत मेंउसका पता लगाना भी मुश्किल हो जाएगा। तो जरूरी है कि यंत्र के बिगड़ जाने पर भीतर के यंत्र से काम लिया जाए। अन्यथा अंतरिक्ष की यात्रा बहुत कठिन हो जाएगी। उसके लिए वे काम कर रहे हैं।
लेकिन एक ही समय में दूर पर व्यक्तियों से तो संबंध स्थापित किए ही जाते हैंजो मर जाते हैं उनसे भी संबंध स्थापित करने के उपाय हैं। लेकिन वह हमें और भी कठिन मालूम पड़ेगा।
यह जान कर आपको हैरानी होगी कि महावीर के मर जाने के पांच सौ वर्ष बाद तकमहावीर अपने प्रेमियों सेकुछ लोगों से संबंध स्थापित किए रहे। और इसीलिए पांच सौ वर्ष बाद महावीर के ग्रंथ लिखे गए। और तब लिखे गए ग्रंथजब इसकी संभावना खतम हो गई कि अब कोई आदमी इस योग्य नहीं है जिससे अंतर्संबंध रखे जा सकें। और वाणी खो जाएगीइसलिए लिख ली जाए।
हजारों साल तक ग्रंथ लिखे ही नहीं गए। और वे इसीलिए नहीं लिखे गए कि जब तक इस बात की संभावना थी कि मरे हुए व्यक्ति और मरे हुए ज्ञानी से भी संबंध स्थापित रखा जा सकता हैतब तक किताब लिखने की कोई जरूरत न थी। यह जान कर आप हैरान होंगे कि किताब लिखना सिर्फ विकास ही नहीं हैएक लिहाज से पतन भी है। हजारों साल तक वेद लिखा नहीं गया था। हजारों वर्ष तक कोई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे नहीं गए थे। ग्रंथ लिखे गए मजबूरी में! महावीर के मरने के पांच सौ साल तक किताब लिखने की जरूरत नहीं पड़ी। क्योंकि महावीर से पूछा जा सकता था। लेकिन जब उस योग्यता के व्यक्ति खो गए,फिर उन ग्रंथों को लिख लेना जरूरी हो गया।
बुद्ध के मरने के डेढ़ सौ वर्ष बाद ग्रंथ लिखे गए। और जीसस के संबंध में तो बात और भी अदभुत है। और यह भी मैं कहना चाहता हूं कि आज महावीर से संबंध स्थापित करने वाला महावीर के साधुओं में एक भी आदमी नहीं है। लेकिन बुद्ध से संबंध स्थापित करने वाले साधु आज भी मौजूद हैं। और जीसस से संबंध स्थापित करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। और जिस धर्म के मूलस्रोत से संबंध स्थापित करने की संभावना रहती हैवह धर्म तब तक जीवित मालूम पड़ता है। और जैसे ही संबंध नष्ट हो जाता हैवह जीवित संबंध नष्ट हो जाता है।
यह भी मैं आपसे कहना चाहता हूं कि गांधी जिंदगी भर मेहनत किएलेकिन उन्होंने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया कि उनके पास एक भी आदमी नहीं हैजिससे मर जाने के बाद वे संबंध स्थापित कर सकें।
लेकिन ऐसा नहीं है कि यह महावीर-बुद्ध ने ही कियाआज भी जारी है। ब्लावट्स्की के मर जाने के बाद एनीबीसेंट से ब्लावट्स्की के संबंध जारी रहे। एनीबीसेंट के मर जाने के बाद भी जे. कृष्णमूर्ति से एनीबीसेंट के संबंध आंतरिक जारी हैं। लेकिन कृष्णमूर्ति थियोसॉफी के बाहर पड़ गए। और थियोसॉफी का मूवमेंट मर गयाक्योंकि थियोसॉफी के भीतर किसी आदमी से एनीबीसेंट केब्लावट्स्की के संबंध आज जारी नहीं हैं।
मरे हुए व्यक्तियों से भी संबंध जारी रखे जा सकते हैं। बल्कि जिंदा व्यक्तियों से संबंध रखने में बहुत अड़चन होती हैक्योंकि शरीर हमेशा बाधा की तरह खड़ा हो जाता है। पूछ ही लिया हैइसलिए मैं कहता हूं कि जिंदा में गांधी से मेरे कोई संबंध नहीं थे। लेकिन मरने के बादइधर मैंने संबंध जारी रखने की पूरी कोशिश की है। और यह भी मैं आपसे कह देना चाहता हूं कि थोड़ा सा प्रयोग करें तो किसी भी व्यक्ति से संबंध जारी रखे जा सकते हैं।
और यह भी मैं आपको बताना चाहता हूं कि गांधी का अभी कोई जन्म नहीं हो गया है। और जन्म होना बहुत मुश्किल है। क्योंकि कोई गर्भ इस योग्य नहीं कि उस व्यक्ति को जन्म दे सके। बहुत लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।
लेकिन ये दूसरी बातें हैं। और इसलिए इनकी बात कभी नहीं करता हूंक्योंकि इन बातों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकताकुछ भी नहीं सोचा जा सकता और इन बातों के संबंध में कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता है। इसलिए इनको छोड़ देता हूं। लेकिन पूछ लिया गया इसलिए मैंने कहा। और यह मैं कह देना चाहता हूं कि मैंने गांधी की आलोचनागांधी से बिना पूछताछ के नहीं की है। अन्यथा मैं कभी नहीं करताउसकी बात भी नहीं उठाता। और जब मुझे यह पक्का मालूम हो गया कि आलोचना की जानी चाहिए और गांधी की सहमति हो सकती हैतभी उस पर बात की।
लेकिन इधर मुझे ऐसा लगता है कि बेकार है मेहनत करनी! गांधी के साथ मेहनत करनी बेकार मालूम पड़ती है! उनके शिष्यों ने उस आदमी को बिलकुल मरा हुआ समझ लिया है। इसलिए अब मरे हुए आदमी की बात करनी शायद उचित नहीं है। क्योंकि वे बार-बार मुझे लिखते हैं कि जो आदमी मर गयाउसकी आप बात क्यों उठाते हैं?
गांधी जैसे आदमी मर नहीं जाते! लेकिन समझ में नहीं आता लोगों को कि ऐसे लोगों को भी मरा हुआ मान लेते हैं। और उसका कारण हैक्योंकि कोई भी उनके साथ जीवित संपर्क स्थापित नहीं कर सकता हैतो लगता है कि वे मर गए।
इधर मेरी पूरी चेष्टा है कि कुछ लोग तैयार होंतो जो मैं कह रहा हूंउनको प्रायोगिक प्रमाण उसके दिलवाए जा सकेंउनके संबंध स्थापित करवाए जा सकें। लेकिन तैयारी तो बहुत दूर की बात हैबहुत दूर की बात हैमेरे पास आने में ही हजार बाधाएं खड़ी करने की कोशिश की जाएगी। तो बहुत गहरे तल पर जो इजोटेरिक वर्क हो सकता हैजो बहुत गहरे तल पर नये संवेदना के स्रोत खोले जा सकते हैंउनसे कोई संबंध ही स्थापित नहीं हो पाता है।
यह पृथ्वी रोज-रोज दरिद्र होती चली जाती हैक्योंकि इस पृथ्वी के पास अपनी ही श्रेष्ठतम आत्माओं सेजो अब भी मौजूद हैं,संबंध के सारे स्रोत शिथिल हो गए हैं। वे संबंध के स्रोत पुनरुज्जीवित किए जाने जरूरी हैं। लेकिन हमें तो सब ऊपर से दिखाई पड़ता हैभीतर से हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि भीतर की हमारी कोई दुनिया ही नहीं है। वहां देखने का कोई सवाल नहीं है।
अब जो बात मैंने कहीवह बात वैसी है जैसे हम अंधे के पास जाकर कहें कि मुझे रोशनी दिखाई पड़ती हैसूरज से मेरा संबंध है। वह कहेगाकैसा सूरजकैसी रोशनीआप पागल हो गए! कहां है सूरजकहां है रोशनी?
वह अंधा यह नहीं मानेगा कि मेरे पास आंख नहीं है। कोई आदमी यह मानने को राजी नहीं होता कि मेरे पास कोई अभाव हैकोई कमी है। वह कहेगा कि सूरज वगैरह कुछ भी नहीं हैआप गलतफहमी में पड़ गए हैं।
इसलिए कई बार यह होता है कि अंधे के सामने वे बातें ही मत करो जो आंख वालों की हैंक्योंकि आंख वालों की बात वह समझ नहीं सकेगा और मुश्किल में पड़ जाएगा। मेरी तो इतनी कठिनाई है कि जो मैं आपसे कहना चाहता हूंनहीं कह पाता हूं। जो कहता हूं वह मुझे लगता है अधूरा है। क्योंकि किससे बात कही जाएऔर बात का क्या मतलब लिया जाएगायह और भी मजे की बात है। और क्या उसके अर्थ निकाले जाएंगेयह और भी मजे की बात है। तब मुझे धीरे-धीरे लगता है कि जो लोग चुप रह गए होंगे जान करउनके चुप रह जाने में आप ही कारण रहे होंगे। क्योंकि कब तक दीवाल के साथ सिर फोड़ा जा सकता है!
एक बोधिधर्म भिक्षु था भारत में। और दुनिया के कुछ अदभुत लोगों में से एक! वह कभी भी लोगों के सामने मुंह करके नहीं बोलता था। आप अगर उससे मिलने जाते--पहली तो बात यह है कि आप मिलने जाते ही नहींऔर बोधिधर्म बंबई आता नहींऔर आप जाते नहीं मिलने--अगर जाते तो आप हैरान हो जाते कि वह आपकी तरफ पीठ रखता और दीवाल की तरफ मुंह रखता। कई लोगों ने उससे कहा कि यह आपने कौन सी तजवीज निकाली है कि दीवाल की तरफ मुंह किए बैठे हैं! हम आपसे कुछ पूछने आए हैं।
बोधिधर्म कहताइसी में सुविधा रहती है।
लोग उससे पूछतेलेकिन इसका मतलब क्या है?
तो बोधिधर्म कहताइसका मतलब यह है कि तुम्हारी तरफ देख कर जब बोलता हूं तब भी मुझे ऐसा लगता है कि दीवाल के साथ सिर फोड़ रहे हैं। मगर दीवाल की तरफ देखने से कम से कम एक भरोसा रहता है कि दीवाल सुनेगी नहींयह तो पक्का हैलेकिन गलत नहीं समझेगीयह भी पक्का है। यह आदमी की तरफ देख कर बोलने से बड़ी मुश्किल है। दीवाल तो पक्की है वहां भीलेकिन दीवाल खतरनाक हैवह गलत भी समझती है।
बोधिधर्म ने कहा कि जब कोई आदमी आएगा जो दीवाल नहीं होगातो मैं जरूर उसकी तरफ मुंह कर लूंगा।
नौ साल तक वह आदमी दीवाल की तरफ ही मुंह किए रहा! बड़ी हिम्मत का आदमी रहा होगा! क्योंकि आदमी की तरफ से मुंह फेरने में बड़ी कठिनाई हैबड़ी कठिनाई है। आदमी पर दया भी आती है कि उससे कुछ कह दो जो कहने जैसा है। और फिर परेशानी भी होती हैकहने के बाद पता चलता है--वह तो सुना ही नहीं गयाउसने कुछ और सुन लिया हैजो कभी नहीं कहा गया था वह उसने सुन लिया है।
नौ वर्ष तक वह दीवाल की तरफ ही देखता रहा। नौवें वर्ष में...हिंदुस्तान में तो नहीं यह घटना घट सकी। दीवाल की तरफ ही देखता रहा। हिंदुस्तान से चला गया पीछे वह चीन। चीन में एक आदमी आया और उस आदमी ने आकर कहा कि सिर इस तरफ घुमाते हो कि मैं अपना सिर काट दूंवह एकदम बोधिधर्म लौट कर बैठ गया और उसने कहाआ गया क्या वह आदमी!
सिर काट देगा जो आदमीवह सुन सकता है। क्योंकि सच बात यह है कि सत्य को सुनने मेंआपके पुराने सिर के कट जाने की पूरी संभावना और उम्मीद है। वह जो पुराना सिर हैवह जो पुराना अहंकार हैवह जो पुरानी धारणा है--कि मैं जानता हूंमेरा मतमेरा शास्त्रमेरा यहमेरा वहमैं--उसके गिर जाने की संभावना है।
बोधिधर्म ने कहाआ गया वह आदमी जो सिर काट सकता हैउससे अब सीधा मुंह करके बात करनी पड़ेगी।
लेकिन आदमी खोते चले गए हैं। जिंदा आदमी की बात ही सुनने वाला कोई नहीं हैतो मरे हुए आदमियों से क्या संबंध स्थापित किया जा सकता है?
यह दुनिया इतनी ही नहीं है जितनी आपको दिखाई पड़ती है। यह दुनिया इतनी ही नहीं है जितनी आंख-कान से दिखाई और सुनाई पड़ती है। आंख-कान से भी दुनिया बहुत बड़ी हैबहुत कुछ है दुनिया में। आपके चारों तरफ बहुत से और प्राण और आत्माएं भी हैंजो निकट आपके मौजूद हैं। लेकिन आपको दिखाई भी नहीं पड़ सकतेआपका संबंध भी नहीं हो सकता। आपको पता भी नहीं चल सकता कि चारों तरफ और भी कोई मौजूद है।
अगर कभी महावीर की जिंदगी की घटना पढ़ी होतो महावीर की घटनाओं में एक अदभुत बात आती है। ऐतिहासिक बड़े चौंक जाते हैं कि यह बात सरासर झूठ होगी। क्योंकि इतिहास तो उसी को अंकित करता है जो आंख से देखा जाता है। और आंख से भी उसको ही अंकित करता है जो हजार आदमियों की आंख से हजार तरह देखा जाता है। इतिहास का कोई भरोसा है!
एडमंड बर्क एक किताब लिख रहा था दुनिया के इतिहास पर। आधी किताब पूरी कर ली थी। कोई डेढ़ हजार पृष्ठ लिख चुका था। इतना बड़ा इतिहास शायद पहले किसी आदमी ने कोशिश नहीं की थी। दिन-रात लगा था लिखने मेंतीस साल खराब किए थे। बैठ कर लिख रहा था कि एकदम पीछे से भगदड़ हुईपड़ोस की गली से कुछ लोग दौड़ते हुए दिखाई पड़े। बर्क बाहर आया और उसने पूछा कि क्या हो गयाउन्होंने कहाआपके मकान के पीछे हत्या हो गई।
बर्क भागा गया। लाश पड़ी थीहत्यारा पकड़ लिया गया थाभीड़ लगी थी। एक आदमी से पूछा कि क्या हुआउसने एक बात कही। दूसरे आदमी से पूछाउसने दूसरी बात कही। तीसरे आदमी से पूछाउसने तीसरी बात कही। वे सब चश्मदीद गवाह थेसबकी आंखों की देखी बात थी। बर्क कहने लगातुम्हारी आंख के सामने ही हुआ हैकोई दो आदमी का मत एक नहीं है! मेरे घर के पीछे हुआलाश पड़ी हैखून बह रहा हैहत्यारा पकड़ लिया गया हैभीड़ मौजूद हैलेकिन दो आदमियों का मंतव्य एक नहीं है! हर आदमी कहता हैऐसे हुआयह हुआ।
बर्क अंदर गयाउसने अपनी तीस साल की मेहनत पर आग लगा दी किताब पर। उसने कहा कि मैं दो हजार साल पहले क्या हुआउसका हिसाब लगा रहा हूं। मेरे घर के पीछे क्या हुआऔर आंख से देखने वाले लोग नहीं कह सकते कि क्या हुआ! बेकार है इतिहासकुछ सार नहीं! उसमें उसने आग लगा दी।
समझदार आदमी था। और इतिहासज्ञों को भी अकल आ जाए तो वे भी आग लगा देंउसमें कुछ मतलब नहीं है।
महावीर की जिंदगी में यह बात बार-बार कही गई है: इतने हजार लोग सुन रहे थेइतने हजार देवता सुन रहे थे। अब वे देवता तो किसी को दिखाई नहीं पड़ेंगेवे कहां सुन रहे थेऐतिहासिक कहेगा: हम भी मौजूद थेआदमी तो कुछ दिखाई पड़ते थेदेवता कोई दिखाई नहीं पड़ता था वहां। कैसे दिखाई पड़ेगा! लेकिन यह बात सच है कि आदमी से ऊपर की योनियां हैं। और महावीर जैसा आदमी जब बोलता है तो सिर्फ आदमी नहीं सुनतेदेवताओं को भी सुनना पड़ता है।
लेकिन वह जिनको दिखाई पड़ता हैउनकी बात है। अंधों के लिए वह बात करने का कोई अर्थ नहीं है। बहुत सी बातें छोड़ देनी पड़ती हैं कि उनकी बात नहीं की जा सकती। लेकिन मैं चाहता हूं कि कभी वे सब बातें की जा सकें। और उसके लिए चाहता हूं कि लोग तैयार हो जाएंतो शायद वे बातें की जा सकें।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे भी ऐसा लगता है कि जिस मामले में बहुत लोग असफल हुएवही मेहनत मैं भी कर रहा हूं। वह असफलता बहुत पुरानी है।
लेकिन बार-बार हिम्मत ऐसी होती है कि कोशिश फिर एक करनी चाहिए। जानता हूं कि जीसस को लोग सूली पर लटका देते हैंगांधी को गोली से मार देते हैं। वे अपनी पुरानी आदत जारी रखेंगे। कोई मेरे संबंध में अपवाद नहीं हो सकते। लेकिन फिर भी मन होता है कि चलो एक कोशिश और सहीहर्ज भी क्या हैजो चीज मिट ही जानी हैउसकोऐसे ही मिटती है कि कोई मिटा देता हैइससे फर्क क्या पड़ता है! इसलिए एक कोशिश में लगा हूं।
गांधी से मेरा क्या विरोध हो सकता हैउन जैसे प्यारे आदमियों से किसी का भी क्या विरोध हो सकता हैलेकिन यह कोशिश और ही तरह की हैवह शायद किसी दिन आपको समझ में आ सके। मैं तो कोशिशहैमर करता ही रहूंगा आपकी खोपड़ी को कि कहीं से शायद किसी को कुछ बुद्धि थोड़ी मालूम हो और खयाल आ जाए कि हांकुछ बात हो सकती है। लक्ष्य मेरा सिर्फ एक है।
वह किसी मित्र ने पूछा है कि आपका लक्ष्य क्या है इस सारी बातचीत का?

लक्ष्य मेरा सिर्फ एक है कि वह जो सोई धारा है चिंतन कीवह प्रबुद्ध हो जाए और जग जाए। और उसके सिवाय किसी का भी लक्ष्य कभी दूसरा नहीं रहा है। जिन लोगों ने भी चेष्टा की है मनुष्य के साथउनका एक ही लक्ष्य है कि वह जो सोया हुआ व्यक्तित्व हैवह जो सोई हुई आत्मा हैजग जाए। हजार कोशिशों से उसे जगाने की कोशिश करते हैं वे। उनकी कोशिश में विरोध दिखाई पड़ सकता है। विरोध बिलकुल नहीं है।
महावीर और बुद्ध एक ही बिहार मेंएक ही समय में घूमते रहे। और अगर आपने सुना होता या जिन लोगों ने उन्हें सुना था...और आप में भी बहुत लोग होंगे जिन्होंने सुना होगा। क्योंकि हम पहली बार यह जमीन पर नहीं हैंहम बहुत बार जमीन पर हुए हैंबहुत बार होते रहे हैंबहुत बार होते रहेंगे। बहुत लोग होंगे जिन्होंने बुद्ध और महावीर को सुना होगा। यहां भी होंगेलेकिन उनको कुछ पता नहीं हो सकता है।
एक ही बिहार में बुद्ध और महावीर घूमते रहे और एक-दूसरे के खिलाफ बोलते रहे। बड़े चौंके होंगे लोग कि बड़ी अजीब बात है--बुद्ध और महावीर एक-दूसरे के खिलाफ बोलें! इनको क्या जरूरत है एक-दूसरे के खिलाफ बोलने कीऔर सख्त बातें कहते रहे। यह मत सोचना कि कुछ नरम-नरम बातें कहींबड़ी सख्त बातें कहीं। बड़ा मजाक बुद्ध ने उड़ाया महावीर का।
बुद्ध ने कहा है कि एक है निगंथनाथ पुत्त महावीर। लोग कहते हैं वह सर्वज्ञ हैऔर मुझे पक्का पता है कि वह भिक्षा मांगने में ऐसे द्वार पर खड़ा हो जाता हैजिसके घर में कोई है ही नहीं भीख देने वाला। बाद में पता चलता है आवाज देने से कि घर में कोई रहता ही नहीं है। और उसके शिष्य कहते हैं कि वह सर्वज्ञ हैसब कुछ जानता हैतीन काल जानता है।
और एक-दूसरे के खिलाफ और इस तरह की बातें कहीं कि हैरानी होगी।
महावीर कहते हैं कि आत्मा ही ज्ञान हैआत्मा ही सत्य हैआत्मा ही धर्म हैआत्मा ही परमात्मा हैआत्मा ही सब कुछ है।
और बुद्ध क्या कहते हैंबुद्ध कहते हैंआत्मा अज्ञान है। जो आत्मा को मानता हैभटक जाएगा। जिसने आत्मा को माना वह डूबा। आत्मा से बड़ा मानना अज्ञान का और कुछ भी नहीं है।
बड़ी अजीब बात है! एक कहता हैआत्मा ही ज्ञान। एक कहता हैआत्मा अज्ञान। अब हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे कि बड़ी मुश्किल हो गई। लेकिन जो जानते हैंवे जानते हैं कि मुश्किल नहीं हो गई। बुद्ध की एक डिवाइस हैबुद्ध का एक ढंग है आपके चिंतन को जगाने का। महावीर का ढंग दूसरा है आपके चिंतन को जगाने का। दोनों का इरादा एक हैरास्ते अलग हैं।
महावीर कहते हैं कि आत्मा ही ज्ञान हैआत्मा ही सब कुछ है। साथ में कहते हैंलेकिन आत्मा का पता कब चलेगाकहते हैंजब अहंकार गिर जाएगा तब पता चलेगा। अहंकार गिर जाएगा तब पता चलेगा कि आत्मा क्या है। और बुद्ध कहते हैंआत्मा अज्ञान हैक्योंकि आत्मा ही अहंकार है। जब आत्मा मिट जाएगीतब पता चलेगा कि क्या है। अब इसमें कोई फर्क नहीं है।
इधर हिंदुस्तान के सारे शिक्षक चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि अनंत-अनंत जन्म हैं। अनंत-अनंत जन्मों से तुम भटक रहे होभटक रहे होसड़ रहे होबार-बार उसी चक्कर में घूम रहे हो। कब तक घूमते रहोगेअब जागो! उधर जीसस और मोहम्मद कहते हैंअनंत जन्म वगैरह नहीं हैंएक ही जन्म है! एक ही मौका हैअगर जाग गए तो जाग गएनहीं जागे तो खो गए हमेशा के लिए। इसलिए जाग जाओ!
अब यह बड़े मजे की बात है। इधर हमारा शिक्षक कहता है कि अनंत-अनंत जन्मों से भटक रहे होरिपीटेडली एक ही चक्कर में घूम रहे हो। कब तक घूमते रहोगेऊब नहीं गएऊब जाओ अब और जाग जाओ! उधर जीसस और मोहम्मद कहते हैंकोई अनंत जन्म वगैरह नहीं हैंएक ही जन्म है। अगर चूक गए तो सदा के लिए चूक गएफिर कोई उपाय नहीं है। इसलिए जागना है तो जाग जाओ! अब ये दोनों बातें बड़ी उलटी मालूम पड़ती हैं। लेकिन जो जानते हैं उनके लिए उलटी नहीं हैं। वे कहेंगेआदमी को जगाने की दोनों कोशिश हैं।
दुनिया के सारे शिक्षकों के शब्दों में विरोध हैरहेगा। लेकिन दुनिया के किसी शिक्षक के मन और मंशा में कोई भी विरोध नहीं है। नहीं हो सकता है। लेकिन आदमी की समझ बहुत कम हैशब्द पकड़ता है और परेशान हो जाता है। भीतर तक प्रवेश नहीं हैदेख सके तथ्य को कि तथ्य क्या है!

एक मित्र ने पूछा है कि मैं मना करता हूं कि मेरे पैर मत छुएं! लेकिन मैं क्यों मना करता हूं?

मैं इसलिए मना करता हूं कि आप किसी के भी पैर छुएंगेतो उसके पैर छूने से वंचित रह जाएंगे जो सबमें है। और भी पैर हैंजो सब जगह हैं और कहीं भी नहीं हैं। नजर उन पैरों की तरफ उठनी चाहिए। चांदत्तारों में भी उन पैरों की पगध्वनियां हैं। फूल-तितलियों में भी उन पैरों की पगध्वनियां हैं। आदमी में भीपत्थरों में भी उन पैरों की पगध्वनियां हैं। हाथ जुड़ने चाहिए उन पैरों की तरफ जो अनंत में विस्तीर्ण हैं। किसी एक आदमी के पैरों की तरफ हाथ झुकाने की कोई भी जरूरत नहीं।
क्योंइसलिए नहीं कि झुकना बुरा है। झुकना बहुत अदभुत है। जो झुकना नहीं जानता वह दो कौड़ी का आदमी हैउसकी कोई कीमत नहीं है। लेकिन जब झुकना ही है तो ऐसे चरणों में झुको जिनसे फिर उठना न पड़े। अब मेरे चरण में झुकोगे भीएक मिनट बाद फिर उठना पड़ेगामामला खतम हो गया। झुके भीबेकार मेहनत हुईफिर उठ गए। इसमें कोई सार न हुआइसमें कोई अर्थ न हुआ।
रामकृष्ण के पास एक आदमी गया। रामकृष्ण से कहने लगागंगा-स्नान को जा रहा हूं। सुना है मैंनेपरमहंसदेवकि वहां नहाने से पाप बह जाते हैं।
परमहंस ने कहाबिलकुल बह जाते हैं। लेकिन गंगा से बाहर मत निकलना! निकले कि फिर चढ़ जाते हैं। वे जो झाड़ देखे हैं न किनारे पर खड़े हुएजब तक तुम डुबकी लगाते होगंगा तो पवित्र हैजब तुम डुबकी लगाओगेवे झाड़ पर बैठ जाएंगे। वे बड़े-बड़े झाड़ इसीलिए हैं गंगा के किनारेपता है आपकोवे उस पर बैठे रहेंगे कि बेटाकब निकलते हो! और आखिर बेटा कब तक डूबा रहेगाथोड़ी-बहुत देर में निकलेगा कि निकल गए पापवे फिर उतर कर सवार हो जाएंगे।
तो रामकृष्ण ने कहाऐसी गंगा में डूबो जहां से निकलना न पड़े। ऐसी भी गंगा है परमात्मा कीजहां डूबो तो निकलना न पड़े। निकलने को जगह ही नहीं है फिर वहांडूबे तो डूबे हीवही-वही है। फिर निकलना भी चाहो तो कहीं भागने का उपाय नहीं हैक्योंकि वही-वही है।
तो मैं भी कहता हूं कि चरण ऐसे भी हैं कि जहां झुको तो झुक ही जाओफिर उठना न पड़े। उन्हीं चरणों में झुकने का अर्थ है। जिन चरणों में झुको और उठोतो बेकार की कवायद हो जाती हैकोई मतलब नहीं होता।
इसलिए कहता हूंकोई झुकने की जरूरत नहीं है। झुको जरूर! यह मत सोच लेना...क्योंकि यह बड़ा डेलीकेटबहुत नाजुक बात है। क्योंकि जब मैं कहता हूं कि मेरे चरणों में मत झुकोतो कुछ हैं जो बड़े खुश होंगे कि बहुत बढ़िया बात कही। इसलिए नहीं कि वे किन्हीं और चरणों में झुकेंगे परमात्मा केबल्कि इसलिए कि झुकने में उनको बड़ी बेचैनी मालूम पड़ती हैझुक नहीं सकते कहीं भी। वे कहेंगेबिलकुल दुरुस्तएकदम ठीक बात कही। जहां भी भीतर अहंकार मजबूत हैवे कहेंगे कि बिलकुल ठीक बात कही। झुकना नहीं चाहिए!
लेकिन मैंने झुकने को मना नहीं किया हैमैंने मेरे चरणों में झुकने को मना किया है। इस भूल में मत पड़ जाना कि मैंने झुकने को मना किया है। मैंने तो बेकार झुकने को मना किया है। यह बिलकुल बेकार झुकना है। एक आदमी के चरणों में झुकने का क्या मतलब हैकोई भी मतलब नहीं है। यह शरीर बिलकुल मिट्टी है। इस मिट्टी में झुकने का कोई मतलब नहीं है। यह मिट्टी की पूजा है। फिर यहीं से आदतें बिगड़नी शुरू हो जाती हैं। फिर यह आदमी खत्म हो जाए तो एक पत्थर की मूर्ति बना कर उसमें झुकना शुरू हो जाता है। वह झुकने की गलत आदत हो गई।
नहींएक चिन्मय जीवन है चारों तरफउसके चरण चारों तरफ हैंउसके चरणों में झुकने के लिए हाथ-पैर बांध कर सिर नहीं झुकाना पड़ताउसके चरणों में झुकना एक आंतरिक लोचएक आंतरिक समर्पणएक भीतरी समर्पण है। झुक गया आदमी!
और यह बड़े मजे की बात है कि जो झुक जाता है उसके चरणों मेंउसका फिर झुकना बंद हो जाता हैफिर और झुकने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। जो झुक जाता है उसके चरणों मेंउससे ऊंचा कोई नहीं रह जातावह सबसे ऊंचा हो जाता है। वे चरण इतने ऊंचे हैं कि उनमें झुकने में आप नीचे नहीं हो जातेउनमें झुक कर आप ऊंचे हो जाते हैंवे चरण इतने ऊंचे हैं।
लाओत्से कहता था: धन्य हैं वे जो झुके हुए हैंक्योंकि उनको झुकना नहीं पड़ेगा।
इसे मैं फिर दोहरा दूंयह आदमी बहुत अदभुत बात कहता है। वह कहता हैधन्य हैं वे जो झुके हुए हैंक्योंकि फिर उनको कोई झुका नहीं सकता। अब झुके आदमी को कैसे झुकाइएगा?
लाओत्से कहता हैधन्य हैं वे जो हारे हुए हैंक्योंकि उनको कोई हरा नहीं सकता। अब हारे हुए आदमी को कैसे हराइएगाजीते हुए आदमी को हमेशा हार का डर होता है। इसलिए जीता हुआ आदमी पूरा जीता हुआ कभी नहीं हैक्योंकि हार का डर मौजूद है।
लाओत्से कहता हैधन्य हैं वे जो हारे हुए हैं--वे पहले से ही हारे हुए हैं--क्योंकि उनको अब कोई हरा नहीं सकता। धन्य हैं वे जो पीछे खड़े हैंक्योंकि अब और पीछे हटाने का कोई उपाय नहीं है।
लेकिन ये किससे पीछे खड़े हैंकिससे हारे हुए हैंकिससे झुके हुए हैंजो अनंत के प्रति झुके हुए हैं--वे उठ गएउठा लिए गए। जो अनंत के प्रति हारे हुए हैं--वे जीत गएजीत गएअब हार की कोई संभावना न रही।
जरूर मैं कहता हूं कि मेरे चरणों में मत झुकना। क्योंकि ये मेरे और तेरे के जो चरण हैंयह मेरे और तेरे का जो भाव हैयही भाव झुकने में बाधा है। जहां मेरात्तेरा नहीं रह जातावहीं झुकना शुरू हो जाता हैवहीं झुकना आ जाता है।
तो नाराज मत हो जाना। कुछ मित्रों ने मुझसे कहा कि हम बहुत...ऐसी बात आपने कह दीहम तो छुएंगे पैर!
हमारे मुल्क में आदतें भी तो बड़ी अजीब हैं न। अगर कोई आदमी कहेमेरे पैर मत छुओ! यह पैर छुलाने की अच्छी तरकीब भी है। यह बहुत बढ़िया तरकीब है। अगर लोगों से कहोपैर मत छुओ! तो लोग पैर छूने और भी आ जाएंगे। लोगों से कहोदूर रहो! तो वे और पास आएंगे। अगर लोगों को गाली दोतो वे समझेंगे कि परमहंस है यह आदमी। यह हमारी गलत आदत हजारों वर्ष की है। और होशियार और चालाक लोग इसका फायदा भी उठा रहे हैं। क्योंकि लगता है कि जो आदमी कहता हैमेरे चरण मत छुओ! बड़ा महापुरुष है। इसके तो चरण जरूर छूने चाहिए।
इसलिए नहीं कहा है मैंने। कहा है मैंने इसलिए कि जरूर झुको कहींलेकिन गलत जगह मत झुक जाना। झुको जरूरझुको जरूरझुकना ही कला है धर्म कीटूट जाओमिट जाओबिखर जाओबह जाओ। लेकिन कहांअनंत के लिए। सर्व के लिए। सबके लिए। वह जो व्यापक हैवह जो विराट हैवह जो फैला हैउसके लिए। सीमित के लिएक्षुद्र के लिएक्षण के लिएजो आज है और कल नहीं होगाउसके लिए मत झुको।
लेकिन ध्यान रहेझुकने के मैं विरोध में नहीं हूं। झुकना ही तो राज हैमिट जाना ही तो राज है। जब तक हम अपने को मजबूती से पकड़े हुए हैं और झुक नहीं सकतेटूट नहीं सकतेतब तक हम पहुंच नहीं सकते वहां जहां पहुंचना है। मिट जाना ही पा लेने का सूत्र है। खो जाना ही पा लेने का मार्ग है। झुक जाना ही उठ जाने की कला है।
लेकिन ध्यान रहेकहां?
बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की एक कहानी कही है। कहा है कि पिछले जन्म मेंजब मैं बुद्ध नहीं थाजब ज्ञान नहीं थाजब नहीं जाना था और अंधेरे में जीता थाउस समय एक बुद्ध थेएक बुद्ध पुरुष थे। मैं उन बुद्ध पुरुष के पास गया। मैंने उनके चरण छुएसिर रख दिया चरणों पर। जब मैं उठा तो मैं चौंक कर रह गया! मैं उठ भी नहीं पाया था कि वे मेरे चरणों में झुके और मेरे चरणों में उन्होंने सिर रख दिया। मैं तो बहुत घबड़ा गया! मैंने उनसे कहायह आपने कैसा कियायह तो मुझे पाप लगेगा। मैं आपके चरणों में झुकूंयह तो ठीक हैक्योंकि मैं अज्ञानी! आप मेरे चरणों में झुकें--आपजो कि जानते हैंआपजो कि पा गएआपजो कि पहुंच गए--यह तो मुझको पाप हो गया! यह क्या पागलपन किया आपने?
वे बुद्ध हंसने लगेवह बुद्ध पुरुष हंसने लगा और उसने गौतम बुद्ध को उस पिछले जन्म में कहातू समझता है कि तू अज्ञानी हैजब से मुझे ज्ञान हुआतब से सभी मुझे ज्ञानी दिखाई पड़ते हैं! तू समझता है कि तू कुछ नहीं हैजब से मैंने जानातब से सब जगह मुझे वही-वही हो गया है! तूने मेरे पैर पड़ेअगर मैं तेरे पैर न पडूंतो बड़ी हंसी होगी मेरी उन लोगों में जो मुझे जानते हैं। वे कहेंगेपरमात्मा से पैर पड़वा लिए और खुद परमात्मा के पैर न पड़े!
और फिर वह बुद्ध ने कहा कि यह आज तू समझता हैलेकिन आज नहीं कल तू भी जाग जाएगा और तू भी पहुंच जाएगा वहीं। देर समय की हैसपने की हैदेर ज्यादा नहीं है।
फिर बुद्ध कोदूसरे जन्म में बुद्ध ने कहाआज मैं जानता हूं कि कैसी बात कही थी उन्होंने। जब से मैं जागातब से मुझे कोई सोया हुआ नहीं दिखाई पड़ रहा है। जब से मैंने जानातब से हर आदमी मुझे वही दिखाई पड़ रहा है।
आप पूछते हैं कि मैं क्यों मना करता हूं?
अब एक ही रास्ता है--एक ही रास्ता है कि आपको मना न करूं--वह यह कि आप मेरे पैर छुएं और मैं आपके पैर छुऊं। अब यह इतना उपद्रव हो जाएगायह इतनी परेशानी होगी और इतना समय लेगाजिसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि यह बड़ी अशोभन बात है कि आप हाथ जोड़ कर मुझे नमस्कार करें और मैं हाथ न जोड़ सकूं। अगर हाथ जोड़ कर आप नमस्कार करें और मैं हाथ न जो॰सकूंतो बड़ी अशोभन बात है।
हालांकि हमारे मुल्क के साधु किसी को हाथ नहीं जोड़तेपता है आपकोआप हाथ जोड़िएवे ऐसे आशीर्वाद देंगे। और एक कैमरा मैन को पास रखेंगेजो तत्काल फोटो निकाल लेगा। फिर कैलेंडर छपवा कर बैठेंगे कि फलां ऋषिफलां आचार्यफलां महात्मा पंडित नेहरू को आशीर्वाद दे रहे हैं। और गलती कुल इतनी हो गई कि वह बेचारे पंडित नेहरू ने भद्रता से हाथ जोड़ा है और उन्होंने हाथ ऊपर उठा दियाउन्होंने भद्रता से हाथ भी नहीं जोड़े।
हाथ आप जोड़ें और मैं हाथ न जोड़ सकूंतो कैसी अभद्रता है यहकैसी असाधुता! ठीक यही बात हैआप मेरे पैर पड़ें और मैं आपके पैर न पडूंयह भी तो अभद्रता है। यह भी तो अभद्रता हैउत्तर मेरी तरफ से भी चाहिए। तो अब दो ही उपाय हैंया तो आप राजी हो जाएंया फिर मुझसे भी मेहनत करवाएं।
कोई अर्थ नहीं है उसमें। व्यक्तियों की पूजा नहीं करनी है। व्यक्तियों की पूजा नहीं करनी हैनहीं होने देनी है। व्यक्तियों की पूजा बहुत हो चुकी। उसके कारण सत्य की पूजा नहीं हो पाती है। व्यक्तियों से बचें। एक व्यक्ति से छूटते हैंदूसरा पकड़ जाता है। व्यक्तियों से बचेंव्यक्तियों को जाने दें। व्यक्ति का कोई भी मूल्य नहीं हैमूल्य है सत्य का।
मैं चांद को इशारा करके बताऊं कि वह चांद है ऊपर। आप मेरा हाथ पकड़ लें कि यह हाथ बड़ा अदभुत हैइसकी पूजा करनी चाहिए। हो गया पागलपन! हम दिखाए थे चांद कोआपने पकड़ लिया हाथ को। चांद एक तरफ रह गयाहाथ की पूजा शुरू हो गई।
महावीर इशारा करते हैं कि वह रहा सत्य! जीसस चिल्लाते हैंवह रहा दरवाजा! मोहम्मद कहते हैंवह रहा मार्गवह रहा रास्ता! आओ!
हाथ पकड़े है मुसलमानहाथ पकड़े है जैनहाथ पकड़े है हिंदूहाथ पकड़े है ईसाई। हाथ की पूजा किए चला जा रहा हैदीये जला रहा हैधूप जला रहा हैफूलमाला चढ़ा रहा है कि धन्य हैं आप!
रोते होंगे बेचारेसब रोते हैं! बुद्धमहावीरकृष्णसब रोते हैं! उधर मिलते हैं ऊपरतो बैठ करबड़ी बैठक जमा कर रोते हैं इकट्ठे! सिर फोड़ते हैं अपना कि जिनको हम समझा आए थे वे क्या कर रहे हैं!
इसको खत्म करेंइसको मिटा देंअब इसकी कोई जरूरत नहीं। किसी व्यक्ति को पूजा देने की जरूरत नहीं। इशारों को छोड़ेंचांद को देखने का सवाल है। और जो चांद को देखना चाहता हैउसे इशारा छोड़ ही देना पड़ेगाक्योंकि या तो मेरे हाथ को देखेंऔर या फिर आंखों को चांद की तरफ उठाएं। आंख चांद की तरफ उठेंगीहाथ छूट ही जाएगा।
परमात्मा की तरफ जो जाएगा--महावीर भी छूट जाएंगेबुद्ध भी छूट जाएंगेकृष्ण भी छूट जाएंगेराम भी छूट जाएंगे--सब छूट जाएंगे। ये तो इशारे थे। रास्ते के किनारे लगे हुए इशारे थे कि यह जा रहा है रास्ता। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं--बुद्धिमान लोग--वे उसी पत्थर परजिस पर लिखा है कि यह रहा बंबई का रास्ताउस पत्थर को छाती से लगा कर बैठ जाते हैंकि प्यारे तुम बहुत अच्छे होतुमने पहुंचा दिया बंबई।
वह बेचारा सिर्फ रास्ता थाजो इशारा करता था कि वह रही बंबई। आगे बढ़ जाना मुझे छोड़ कर कि पहुंच जाओ वहां जहां इशारा है। वे बैठे हैं पत्थर को छाती से लगाए। और अगर कोई उनको कहे कि भाईजान उठो! तो वे कहेंगेहमारे धर्म में बाधा डाल रहे हो! हम प्रार्थना कर रहे हैंहम पूजा कर रहे हैं।
नहींव्यक्ति को जाने देंताकि सत्य आ सके। छोड़ दें सबताकि उस तरफ आंख उठ सकेजो सिर्फ उन्हीं आंखों में दिखाई पड़ता है जो सब छोड़ कर उठती हैं। जिस आंख से व्यक्तियों काशब्दों काशास्त्रों का धुआं हट जाता हैजिस आंख से रोकने वाले आंसू उड़ जाते हैंजिस आंख से पर्दे गिर जाते हैंवही आंख निर्दोष होकर उसे देखने में समर्थ हो जाती है जो सत्य है।
और उस सत्य की उपलब्धिउस सत्य की उपलब्धि की छाया का नाम शांति है। जो उस सत्य को पा लेता है वह शांत हो जाता है। सत्य का परिणाम है शांति। सत्य मिलाशांति छाया की तरह पीछे चली आती है। सत्य की छाया है शांति।
इसलिए शांति को सीधा मत खोजना कभी भी। अगर मैं आपके घर आऊंगातो मेरी छाया बिना निमंत्रण दिए आपके घर आ जाएगीअलग से निमंत्रण देने की जरूरत नहीं है। और अगर मेरी छाया को निमंत्रण दे गएतो आप जानेंआपका काम जाने। मैं तो आऊंगा नहींछाया आने वाली नहीं है।
जो लोग शांति को निमंत्रण देते हैंशांति कभी नहीं आती। शांति सत्य की छाया है। सत्य आता हैशांति पीछे छाया की तरह चली आती है।

इन चार दिनों में उस सत्य की खोज के लिए मैंने कुछ कहाताकि शांति की खोज हो सके। मेरी बातों को इतने प्रेम और इतनी शांति से सुनाउससे बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूंमेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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