बुधवार, 12 दिसंबर 2018

'मैं' का बंधन!

'मैं' को भूल जाना और 'मैं' से ऊपर उठ जाना सबसे बड़ी कला है। उसके अतिक्रमण से ही मनुष्य मनुष्यता को पार कर द्वियता से संबंधित हो जाता है। जो 'मैं' से घिरे रहते हैं, वे भगवान को नहीं जान पाते। उस घेरे के अतिरिक्त मनुष्यता और भगवत्ता के बीच और कोई बाधा नहीं है।
च्वांग-त्सु किसी बढ़ई की एक कथा कहता था। वह बढ़ई अलौकिक रूप से कुशल था। उसके द्वारा निर्मित वस्तुएं इतनी सुंदर होती थीं कि लोग कहते थे कि जैसे उन्हें किसी मनुष्य ने नहीं, वरन देवताओं ने बनाया हो। किसी राज ने उस बढ़ई से पूछा, ''तुम्हारी कला में यह क्या माया है?'' वह बढ़ई बोला, ''कोई माया-वाया नहीं है, महाराज! बहुत छोटी सी बात है। वह यही है कि जो भी मैं बनाता हूं, उसे बनाते समय अपने 'मैं' को मिटा देता हूं। सबसे पहले मैं अपनी प्राण-शक्ति के अपव्यय को रोकता हूं और चित्त को पूर्णत: शांत बनाता हूं। तीन दिन इस स्थिति में रहने पर, उस वस्तु से होने वाले मुनाफे, कमाई आदि की बात मुझे भूल जाती है। फिर, पांच दिनों बाद उससे मिलने वाले यश का भी ख्याल नहीं रहता। सात दिन और, और मुझे अपनी काया का विस्मरण हो जाता है- सभी बाह्य-अंतर विघ्न और विकल्प तिरोहित हो जाते हैं। फिर, जो मैं बनाता हूं, उससे परे और कुछ भी नहीं रहता। 'मैं' भी नहीं रहता हूं। और, इसलिए वे कृतियां दिव्य प्रतीत होने लगती हैं।''
जीवन में दिव्यता को उतारने का रहस्य सूत्र यही है। मैं को विसर्जित कर दो- और चित्त को किसी सृजन में तल्लीन। अपनी सृष्टिं में ऐसे मिट जाओ और एक हो जाओ जैसे कि परमात्मा उसकी सृष्टिं में हो गया है।
कल कोई पूछता था, ''मैं क्या करूं?'' मैंने कहा, ''क्या करते हो, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि कैसे करते हो! स्वयं को खोकर कुछ करो, तो उससे ही स्वयं को पाने का मार्ग मिल जाता है।''
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-08

आध्यात्मिक साम्यवाद


चार दिनों की चर्चाओं के संबंध में बहुत सारे प्रश्न इकट्ठे हो गए हैं। आज ज्यादा से ज्यादा प्रश्नों पर चर्चा कर सकूं ऐसी कोशिश करूंगा। और इसलिए बहुत थोड़े में उत्तर देना चाहूंगा।
एक मित्र ने पूछा है: क्या आप प्रच्छन्न साम्यवादी हैं?
प्रच्छन्न होने की कोई जरूरत नहीं है, मैं स्पष्ट ही साम्यवादी हूं। किसने कहा कि प्रच्छन्न साम्यवादी हूं? मेरी दृष्टि में जो भी आदमी धार्मिक है वह साम्यवादी हुए बिना नहीं रह सकता। सिर्फ अधार्मिक आदमी साम्यवादी हुए बिना रह सकता है। जिस व्यक्ति को भी यह ख्याल है कि सबके भीतर एक ही परमात्मा का वास है, वह यह मानने को राजी नहीं हो सकता कि समाज में अर्थ की इतनी असमानताएं हों, इतनी गरीबी, इतनी अमीरी, इतने फासले हों। वह यह भी मानने को राजी नहीं हो सकता कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति को विकास का समान अवसर न मिल सके।
साम्यवाद का एक ही अर्थ है कि हम प्रत्येक मनुष्य को बराबर मूल्य देना चाहते हैं और उसके जीवन की जो छुपी संभावनाएं हैं, उनके विकास का बराबर अवसर देना चाहते हैं। बुद्ध या महावीर या क्राइस्ट और लाओत्सु, उन्होंने कभी साम्यवादी शब्द सुना भी नहीं होगा, लेकिन मेरी दृष्टि में वे सभी कम्युनिस्ट थे।

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-07

ज्योति का स्पर्श


सम्राट बूढ़ा हो गया था, और जैसे-जैसे मृत्यु की पगध्वनि सुनाई पड़ने लगी और जैसे-जैसे मृत्यु की छाया गहरी होने लगी उसे स्मरण आया कि मैं जी तो लिया लेकिन जीवन को अभी जान नहीं पाया हूं। शायद बहुत अधिक लोगों को मृत्यु के आने पर ही पहली बार बोध होता है कि जीवन अपरिचित, अनजाना छूट गया है। मौत करीब आने लगी, मौत की छाया घिरने लगी, तो उसे लगा जीवन तो हाथ से निकल गया और मैं जीवन को जान नहीं पाया।
जो बाहर ही जीते हैं वे जीवन को जान भी नहीं पा सकते हैं; क्योंकि जीना तो बाहर है, जीवन भीतर है। और बहुत लोग जीने मात्र को ही जीवन समझ लेते हैं, तो बड़ी भूल हो जाती है।
उस सम्राट ने तत्काल ही अपनी राजधानी के बुद्धिमान लोगों को बुलाया और उनसे पूछा कि जीवन क्या है? यह मुझे बताओ।

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-06

फूल खिलने का क्षण

मेरे प्रिय आत्मन्!
पिछली चर्चाओं के संबंध में एक मित्र ने बहुत अजीब प्रश्न पूछा है। अजीब इसलिए कि पहली अजीब बात तो यह है कि वह प्रश्न ही नहीं है। उन्होंने पूछा है, प्रश्न भी पूछा है, साथ लिखा है, अगर आपको पता न हो, तो मैं इसका उत्तर आपको आकर दे सकता हूं।
उन्हें उत्तर पहले से पता है तो व्यर्थ पूछने की परेशानी नहीं करनी चाहिए। और अक्सर ऐसा होता है कि हम पूछते हैं लेकिन उत्तर हमें पता है तो हमारा पूछना झूठा हो जाता है, अॅाथेंटिक नहीं रह जाता। अगर पता ही है, तो बात खत्म हो गई। अगर पता नहीं है, तो ही पूछने में रस है, अर्थ है, खोज का आनंद है। लेकिन हम सभी को...
(बीच में प्रश्नकर्ता द्वारा कुछ हस्तक्षेप)
....मैं उत्तर दे रहा हूं, पूरा कर लेने दें। बड़ी कृपा की कि आप पता भी चल गए कि कौन हैं। उत्तर दे रहा हूं। उत्तर मैं देता हूं।
मैंने सोचा था, नाम उनका न लूंगा कि वे पता न चल जाएं, लेकिन वे मानते नहीं, ठीक है।

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-05

जीवन का सम्मान


मेरे प्रिय आत्मन्!
बाहर एक जगत है पदार्थ का, उससे हम परिचित हैं। भीतर एक जगत है परमात्मा का, उससे हम अपरिचित हैं। पदार्थ दिखाई पड़ता है, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता है। पदार्थ छुआ जा सकता है, परमात्मा के स्पर्श का कोई उपाय नहीं है। शायद इसीलिए पदार्थ सब कुछ हो गया और परमात्मा कुछ भी नहीं।
कैसे इस भीतर के परमात्मा से संबंध हो सके? कैसे हम बाहर पकड़ गए हैं और रुक गए हैं? किसने हमें पदार्थ के पास बांध रखा है? पदार्थ ने? पदार्थ तो किसी को कैसे बांध सकेगा। हम ही बंध गए होंगे। बंधने की कड़ियां कुछ और होंगी, जो हमने ही निर्मित की होंगी।
एक बड़े मकान के सामने मैं खड़ा था। आग लग गई है। मकान का मालिक रो रहा है, चिल्ला रहा है। उसका मकान जल गया है। पास से दौड़ कर किसी ने उस आदमी को कहा: मत रोओ, व्यर्थ परेशान हो रहे हो। कल तुम्हारे बेटे ने मकान बेच दिया है, रुपये मिल गए हैं।

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-04

जीवन की भाषा


मेरे प्रिय आत्मन्!
बीती चर्चाओं के संबंध में और बहुत से नये भी प्रश्न मित्रों ने किए हैं। आज की सांझ मैं उन प्रश्नों पर बात करना चाहूंगा।
एक मित्र ने पूछा है कि पंद्रहवी अगस्त या इस तरह के और त्यौहार मनाना उचित है या नहीं, आप क्या कहते हैं?
सवाल पंद्रह अगस्त का ही नहीं है, सवाल जीवन के सब रिचुअल, सब क्रियाकांडों का है। चाहे क्रियाकांड धार्मिक हो, चाहे राजनैतिक, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। मन के अंतरभाव से जो भी उठे, वह ठीक है। और जो भी मनाना पड़े, वह बिल्कुल ठीक नहीं है।
आजादी का एक आनंद अगर अनुभव हो, तो वह प्रकट होगा। स्वतंत्रता का एक बोध अगर अनुभव हो, तो वह प्रकट होगा। लेकिन वह बोध किसी को भी अनुभव नहीं होता। फिर एक मरा हुआ त्यौहार हाथ में रह जाता है। फिर हर वर्ष उसे हम दोहराए चले जाते हैं। झंडे फहरा देते हैं, मन की कोई ऊंचाई उसके साथ नहीं फैलती। गीत गा लेते हैं, मन कोई गीत नहीं गाता। उत्सव, रंग-बिरंगे फूल लगा लेते हैं, लेकिन भीतर कोई फूल नहीं लगते। हमारा सारा जीवन ही जैसे झूठ पर खड़ा है। और हम सब कुछ झूठ कर लेते हैं।

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-03

अपना जीवन, अपना सत्य


अंधेरे से प्रकाश की ओर जाना तो दूर हम अंधेरे से और गहरे अंधेरे में उतरते चले जाते हैं। उपनिषद के किसी ऋषि ने कहा है: अज्ञान तो अंधकार में ले जाता है, ज्ञान महा अंधकार में ले जाता है। बहुत ही उलझी हुई और विरोधाभासी बात कही है। अज्ञान तो अंधकार में ले जाता है, ज्ञान और महा अंधकार में।
साधारणतः तो हमने यही सुना है कि ज्ञान प्रकाश में ले जाता है। निश्चित ही जो ज्ञान अंधकार में ले जाता होगा वह ज्ञान और ही तरह का ज्ञान होगा। और हम रोज-रोज गहरे से गहरे अंधकार में चले जाते हैं, तो निश्चय ही जिसे हम ज्ञान कहते हैं वह ऐसा ही ज्ञान होगा।
हमारा ज्ञान हमें और अंधकार में ले ही जाता है। क्योंकि हमारा ज्ञान हमारे भीतर से नहीं आता, हमारे बाहर से इकट्ठा होता है, और सिर्फ हमारे अहंकार को मजबूत कर जाता है। मैं जानता हूं, यह अहंकार जिसके भीतर भी घनीभूत हो गया, वह फिर प्रकाश की यात्राएं नहीं कर पाता है। प्रकाश की यात्रा के लिए अहंकार साथी नहीं हो सकता, वहां तो चाहिए, विनम्रता, अति विनम्र भाव, अति निर-अहंकार भाव, ईगोलेसनेस चाहिए।

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-02

जीवन का नियम


मेरे प्रिय आत्मन्!
एक युवा संन्यासी किसी आश्रम में मेहमान था। आश्रम के वृद्ध फकीर से उसने आत्मा के संबंध में कुछ बातें पूछीं। लेकिन वह वृद्ध फकीर दिन भर हंसता रहा और कोई जवाब न दिया।
जो भी जानते हैं, उन्हें जवाब देना बहुत मुश्किल है। जो नहीं जानते हैं, उन्हें जवाब देना बहुत ही आसान है।
सांझ हो गई, अंधेरा घिरने लगा, वह युवक खोजी वापस लौटने को हुआ। द्वार पर आया, अमावस की रात है, सूरज ढल गया, अंधेरा घिर गया, जंगल का रास्ता है। सीढ़ियां उतरते समय वृद्ध फकीर से वह कहने लगा, बहुत अंधेरा है, कैसे जाऊं?
उस बूढ़े फकीर ने कहा: जो अंधेरे में नहीं जा सकता, वह जा ही नहीं सकता है। सारे जीवन में ही अंधेरा है, अंधेरे में ही जाना पड़ेगा।
फिर भी वह युवक डरा हुआ मालूम पड़ा, अनजान रास्ता है, जंगल है, भटक जाने का डर है। उसने कहा: कोई दीया न दे सकेंगे?

वह वृद्ध फकीर फिर हंसने लगा। एक दीया जला कर लाया, उस जवान के हाथ में दिया। और जब जवान दीये को लेकर उतरता था सीढ़ियां, तब उस बूढ़े फकीर ने फूंक मार दी और दीया बुझा दिया। और उस युवक को कहा: बाहर के रास्तों पर तो मैं तुम्हें दीया दे दूंगा, लेकिन भीतर के रास्तों पर कौन तुम्हें दीया देगा? और बाहर के रास्तों पर कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन भीतर के रास्ते पर बाहर से प्रकाश का कोई आयोजन संभव नहीं है। और अगर भीतर जाना हो, तो अंधेरे से जाना ही पड़ेगा। जिस आत्मा की तुम बात पूछते थे, अंधेरे से गुजरे बिना कोई उस आत्मा को कभी नहीं पा सका। आत्मा तो प्रकाश है, लेकिन अंधेरे से गुजर जाना जरूरी शर्त है।

तमसो मा ज्योतिर्गमय - प्रवचन-01

 परम का विज्ञान

सुबह सूरज उगता है और हम मान लेते हैं कि रात मिट गई। वह मानना बड़ा झूठा है। एक रात तो बाहर है जो मिट जाती है, लेकिन एक रात भीतर भी है जो किसी सूरज के उगने से कभी नहीं मिटती। रात के अंधेरे में भी हम दीया जला लेते हैं और सोचते हैं प्रकाश हो गया, लेकिन एक अंधेरा ऐसा भी है जहां हम कभी कोई दीया नहीं जलाते और जहां कभी कोई प्रकाश नहीं पहुंचता। लेकिन शायद उस अंधेरे का ही हमें कोई पता नहीं है। और जब तक उस अंधेरे का पता न हो, तब तक प्रकाश की आकांक्षा भी कैसे पैदा हो सकती है?
उपनिषदों के किसी ऋषि ने गाया है, परमात्मा से प्रार्थना की है: मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चल, अंधेरे से प्रकाश की ओर ले चल। यह प्रार्थना हमने सुनी है और यह भी हो सकता है कि यह प्रार्थना किन्हीं क्षणों में हमने भी की हो। लेकिन जिन्हें यह भी पता नहीं कि किस अंधेरे को मिटाना है, उनकी प्रकाश के लिए की गई प्रार्थना का क्या अर्थ हो सकता है?

हम एक ही अंधेरे से परिचित हैं, जिसे मिटाने के लिए किसी परमात्मा की कोई जरूरत नहीं, आदमी काफी है। वह अंधेरा हमारे पास है। हमारे भीतर भी कोई अंधेरा है, इसका हमें पता ही नहीं। और जिस दिन भीतर के अंधेरे का पता चल जाए, उस दिन रोआं-रोआं, श्वास-श्वास एक ही प्रार्थना करने लगती है कि कैसे अंधेरे के बाहर जाऊं? जैसे हम किसी को पानी में डुबा दें...

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-07

जागरण के तीन सूत्र

मेरे प्रिय आत्मन्!
जो बाहर हैवह एक स्वप्न से ज्यादा नहीं है। और जो सत्य हैवह भीतर है। जो दृश्य हैवह परिवर्तन है। और जो द्रष्टा हैवह सनातन है।
सत्य की खोज में विज्ञान बाहर देखता हैधर्म भीतर देखता है। विज्ञान परिवर्तन की खोज हैधर्म शाश्वत की। और सत्य शाश्वत ही हो सकता है। इस शाश्वत सत्य की दिशा में तीसरा सूत्र साक्षीभाव है। द्रष्टा को खोजना हैतो द्रष्टा बने बिना और कोई रास्ता नहीं है।

लेकिन हम सब हैं सोए हुए लोग। हम सब करीब-करीब सोए-सोए जीते हैंसोए-सोए ही जागते हैं।
बुद्ध एक सुबह प्रवचन करते थे। कोई दस हजार लोग इकट्ठे थे। सामने ही बैठ कर एक भिक्षु पैर का अंगूठा हिलाता था। बुद्ध ने बोलना बंद कर दिया और उस भिक्षु को पूछा कि यह पैर का अंगूठा तुम्हारा क्यों हिल रहा हैजैसे ही बुद्ध ने यह कहापैर का अंगूठा हिलना बंद हो गया। उस भिक्षु ने कहाआप भी कहां की फिजूल बातों में पड़ते हैं! आप अपनी बात जारी रखिए। बुद्ध ने कहानहींमैं यह पूछे बिना आगे नहीं बढूंगा कि तुम पैर का अंगूठा क्यों हिला रहे थेउस भिक्षु ने कहामैं हिला नहीं रहा थामुझे याद भी नहीं थामुझे पता भी नहीं था।

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-06

परमात्मा की अनुभूति

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक मित्र ने पूछा है कि क्या मैंने कभी परमात्मा को देखा है?

परमात्मा के संबंध में हम इस भांति सोचते हैंजैसे उसे भी देखा जा सकता हो। जो देखा जा सकता हैवह संसार ही रहेगा। परमात्मा कभी भी देखा नहीं जा सकताजो देख रहा है वह परमात्मा है।
इस बात को थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
जो भी दिखाई पड़ता है उसका नाम ही संसार है और जिसको दिखाई पड़ता है उसका नाम परमात्मा है। इसलिए परमात्मा कभी दिखाई नहीं पड़ सकता है।

लेकिन कोई कहता है कि मैंने परमात्मा को देखा। बड़ी भूल कर रहा है। एक तो परमात्मा दिखाई नहीं पड़ सकतावह खुद परमात्मा है जिसको दिखाई पड़ता है। दूसरी बातजहां परमात्मा का अनुभव होता है--दिखाई तो वह पड़ता नहींक्योंकि मैं वही हूंआप वही हैं--लेकिन जब इस स्वयं का अनुभव होता हैतब मैं भी वहां शेष नहीं रह जाता हैवहां मैं भी गिर जाता है।

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-05

सत्य की खोज

मेरे प्रिय आत्मन्!
सत्य की खोज के संबंध में थोड़ी सी बात आपसे कहना चाहूंगा।
सत्य की क्या परिभाषा हैआज तक कोई परिभाषा नहीं हो सकी है। भविष्य में भी नहीं हो सकेगी। सत्य को जाना तो जा सकता हैलेकिन कहा नहीं जा सकता। परिभाषाएं शब्दों में होती हैं और सत्य शब्दों में कभी भी नहीं होता।
लाओत्से ने आज से कोई तीन हजार वर्ष पहले एक छोटी सी किताब लिखी। उस किताब का नाम है ताओ तेह किंग। उस किताब की पहली पंक्ति में उसने लिखा है: मैं सत्य कहने के लिए उत्सुक हुआ हूंलेकिन सत्य नहीं कहा जा सकता है। और जो भी कहा जा सकता हैवह सत्य नहीं होगा। फिर भी मैं लिख रहा हूंलेकिन जो भी मेरी इस किताब को पढ़ेवह पहले यह बात ध्यान में रख ले कि जो भी लिखापढ़ाकहा जा सकता हैवह सत्य नहीं हो सकता।

बहुत अजीब सी बात से यह किताब शुरू होती है। और सत्य की दिशा में लिखी गई किताब होऔर पहली बात यह कहे कि जो भी लिखा जा सकता है वह सत्य नहीं होगाजो भी कहा जा सकता है वह सत्य नहीं होगाफिर लिखा क्यों जाएफिर कहा क्यों जाएजो हम भी कहेंगे वह अगर सत्य नहीं होना हैतो हम कहें क्यों?

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-04

सत्य की छाया है शांति

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक मित्र ने पूछा है कि क्या मैं साम्यवादी हूंकम्युनिस्ट हूं?

बहुत मजेदार बात पूछी है। अगर परमात्मा कम्युनिस्ट है तो मैं भी कम्युनिस्ट हूं। और परमात्मा जरूर कम्युनिस्ट होना चाहिएक्योंकि उसकी नजर में कोई भी असमान नहीं हैसभी समान हैं। और जिसकी नजर में सभी समान हैंवह चाहता भी होगा कि सभी समान अगर न हों दूसरों की नजरों मेंतो धीरे-धीरे समान हो जाएं।
महावीर कम्युनिस्ट रहे होंगेऔर बुद्ध भीऔर जीसस भी। हालांकि किसी ने उनसे कभी पूछा नहीं। और गांधी तो निश्चित ही कम्युनिस्ट रहे होंगे। गांधी से तो किसी ने पूछा भीतो गांधी ने कहा कि मैं किसी भी कम्युनिस्ट से ज्यादा कम्युनिस्ट हूं।

अगर सर्व मंगल की कामनाअगर सबके उदय की कामनाअगर सबका हित हो यह आकांक्षा कम्युनिज्म हैतो कोई भी धार्मिक आदमी बिना कम्युनिस्ट हुए कैसे रह सकता है?
लेकिन दूसरे अर्थों में मैं कम्युनिस्ट बिलकुल भी नहीं हूं।

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-03

संकल्प की कुंजी

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक बगीचे में मैं गया था। एक ही जमीन थी उस बगीचे की। एक ही आसमान था उस बगीचे के ऊपर। एक ही सूरज की किरणें बरसती थीं। एक सी हवाएं बहती थीं। एक ही माली था। एक सा पानी गिरता था। लेकिन उस बगीचे में फूल सब अलग-अलग खिले हुए थे। मैं बहुत सोच में पड़ गया। हो सकता है कभी किसी बगीचे में जाकर आपको भी यह सोच पैदा हुआ हो।
जमीन एक हैआकाश एक हैसूरज की किरणें एक हैंहवाएं एक हैंपानी एक हैमाली एक है। लेकिन गुलाब पर गुलाबी फूल हैंचमेली पर सफेद फूल हैं। सुगंध अलग है। एक ही जमीन और एक ही आकाश से और एक ही सूरज की किरणों से ये अलग-अलग फूलअलग-अलग रंगअलग-अलग सुगंधअलग-अलग ढंग कैसे खींच लेते हैं?

मैं उस माली को पूछने लगा। उसने कहासब एक हैलेकिन खींचने वाले बीज अलग-अलग हैं।
छोटा सा बीज लेकिन क्या खींच लेता होगा?
जरा सा बीजइतने बड़े आकाश और इतनी बड़ी जमीन और इतने बड़े सूरज और इतनी हवाओं कोइन सबको एक तरफ फेंक कर अपनी ही इच्छा का रंग खींच लेता है! इतनी बड़ी दुनिया को एक तरफ हटा कर एक छोटा सा बीज अपनी ही इच्छा की सुगंध खींच लेता है! एक छोटे से बीज का संकल्प इतना बड़ा हैजितना आकाश नहींजितनी पृथ्वी नहीं! और एक बीज वही हो जाता है जो होना चाहता है! एक छोटे से बीज के भीतर ऐसा क्या हो सकता है?

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-02

सात चक्रों की साधना

मेरे प्रिय आत्मन्!
अंतर की यात्रा पर चलने के पूर्व उस मार्ग से थोड़ा परिचित हो लेना जरूरी है जिस पर चलना पड़ता है। उन द्वारों को भी समझ लेना जरूरी है जिन्हें खटखटाना पड़ेगा। उन तालों को भी समझ लेना जरूरी है जिन्हें खोलना पड़ेगा।
जो यात्री यात्रा-पथ के संबंध में बिना जाने चल पड़ेउसके भटक जाने की ही ज्यादा संभावना है बजाय पहुंच जाने के। और बाहर के रास्ते तो दिखाई भी पड़ते हैंभीतर का कोई रास्ता दिखाई भी नहीं पड़ता है। बाहर तो रास्तों के किनारे चिह्न भी लगे हैं कि रास्ते कहां जाते हैंभीतर के रास्ते पर न कोई चिह्न हैंन कोई माइल स्टोन हैंन कोई प्रतीक हैंअनचार्टर्ड! कोई नक्शा नहीं! शायद इसीलिए आदमी भीतर जितना भटकता है उतना बाहर नहीं भटकता।

आज की चर्चा में भीतर के रास्ते पर कुछ जरूरी बातों की पहचान कर लेना उचित है।
सबसे पहली बात तो यह समझ लेना जरूरी है कि जो शरीर हमें दिखाई पड़ता हैवह शरीर बहुत से शरीरों का सबसे ऊपर का हिस्सा है। इस शरीर के भीतर और भी शरीर हैं। यह शरीर ही अकेला शरीर नहीं है। और जैसे ही हम भीतर यात्रा शुरू करते हैंऔर शरीरों के बीच में मार्ग में गुजरने और पार करने की जरूरत पड़ती है। स्वयं तक पहुंचने के पहले इस शरीर के बीच में और स्वयं के बीच में और भी शरीर हैं।

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-01

शांति की खोज

मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्यता क्या हैमनुष्य क्या हैएक प्यासएक पुकारएक अभीप्सा!
जीवन ही एक पुकार है। जीवन ही एक अभीप्सा है। जीवन ही एक आकांक्षा है।
लेकिन आकांक्षा नरक की भी हो सकती है और स्वर्ग की भी। पुकार अंधकार की भी हो सकती है और प्रकाश की भी। अभीप्सा सत्य की भी हो सकती है और असत्य की भी।
चाहे हमें ज्ञात हो और चाहे हमें ज्ञात न होअगर हमने अंधकार को पुकारा होगातो हम अशांत होते चले जाएंगे। अगर हमने असत्य को चाहा होगातो हम अशांत होते चले जाएंगे। अगर हमने गलत को चाहा होगातो शांत होना असंभव है। शांति छाया है--ठीक की चाह से पैदा होती है। सम्यक चाह से शांति पैदा होती है।

एक बीज अंकुरित होना चाहता है। अंकुरित हो जाए तो आनंद से भर जाएगाअंकुरित न हो पाए तो अशांत और पीड़ा अनुभव करेगा। सरिता सागर होना चाहती है। सागर तक पहुंच जाएअसीम से मिल जाएतो शांत हो जाएगी। न पहुंच पाएभटक जाए मरुस्थलों मेंतो अशांत हो जाएगीदुखी हो जाएगीपीड़ित हो जाएगी।