शुक्रवार, 1 जून 2018

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-11

प्रिय चिदात्मन्,
मैं आपकी आंखों में झांकता हूं। एक पीड़ाएक घना दुखएक गहरा संतापएंग्विश वहां मुझे दिखाई देते हैं। जीवन के प्रकाश और उत्फुल्लता को नहींवहां मैं जीवन-विरोधी अंधेरे और निराशा को घिरता हुआ अनुभव करता हूं। व्यक्तित्व के संगीत का नहींस्वरों की एक विषाद भरी अराजकता का वहां दर्शन होता है। सब सौंदर्यसब लययुक्ततासब अनुपात खंडित हो गए हैं। हम अपने को व्यक्तिइंडिविजुअल कहेंशायद यह भी ठीक नहीं है। व्यक्ति होने के लिए एक केंद्र चाहिएएक सुनिश्चित संगठनक्रिस्टलाइजेशन चाहिए,वह नहीं है। उस व्यक्तित्व संगठन और केंद्रितताइंडिविजुएशन के अभाव में हम केवल अराजकताएनार्की में हैं।
मनुष्य टूट गया है। उसके भीतर कुछ बहुमूल्यएसेंशियल खो गया और खंडित हो गया है। हम किसी एकतायूनिटी के जैसे खंडहर और अवशेष हैं। वह एकता महावीर मेंबुद्ध मेंक्राइस्ट में परिलक्षित होती है। वे व्यक्ति हैंक्योंकि वे स्वरों की अराजक भीड़ नहींसंगीत हैंक्योंकि वे स्व-विरोध से भरी अंधी दौड़ नहींएक सुनिश्चित गति और दिशा हैं।

जीवन अपने केंद्र और दिशा को पाकर आनंद में परिणत हो जाता है। व्यक्तित्व को और उसमें अंतर्निहित समस्वरताहार्मनी को उपलब्ध कर लेना वास्तविक जीवन के द्वार खोलना है। उसके पूर्व जीवन एक वास्तविकताएक्चुअलिटी नहींकेवल एक संभावना है,एक भविष्यपोटेंशियलिटी है।
मनुष्य के व्यक्तित्व विघटन की यह दुर्घटना सारे जगत में घटी है। हम अपने ही से विच्छिन्न और पृथक हो गए हैं। हम एक ऐसे वृत्त हैंजिसका केंद्र खो गया है और केवल परिधि ही शेष रह गई है। जीवन की परिधि पर दौड़ रहे हैंदौड़ते रहेंगे और फिर गिर जाएंगे और एक क्षण को भी उसे नहीं जानेंगे जिसे विश्रांति कहते हैं। तेलघानी में कोल्हू के बैलों जैसी हमारी गति हो गई है।
जीवन परिधि ही नहीं हैकेंद्र भी हैयह जाने बिना सब प्रयाससब गति अंततः व्यर्थ और निस्सार हो जाती है। इसके ज्ञान के अभाव में श्रम की सब धाराएं दुख के सागर में ले जाती हैं। जीवन की परिधि पर तो केवल क्रियाएंबिकमिंग हैंसत्ताबीइंग तो वहां नहीं है। मैंमेरा अस्तित्वमेरा होनाएक्झिस्टेंस तो वहां नहीं है। मैं अपनी प्रामाणिक सत्ताआथेंटिकनेस में तो उस तल पर अनुपस्थित हूं। क्रियाबिकमिंग के तल पर मुझे नहीं पाया जा सकता है। उससे कहीं और गहरे और गहराइयोंडेप्थ्स में उसे पाया जा सकता है जो मैं हूं।
इस गहराई को जाने बिनाइस आत्यंतिक रूप से आंतरिक से संबंधित हुए बिना जीवन एक भटकाव हैएक बोझिल यात्रा है। इस स्व सेइस सत्ता से संबंधित हुए बिना जीवन एक आनंद यात्रा में परिणत नहीं होता है।
मैं एक उखड़े हुए वृक्ष का स्मरण करता हूं। जब भी मनुष्य के संबंध में सोचता हूंयह अनायास ही स्मृति में उभर आता है। न जाने क्यों मैं मनुष्य को वृक्ष से भिन्न नहीं समझ पाता हूं। शायद जड़ोंरूट्स के कारण ही यह समता चित्त में धर गई है। व्यक्ति अपने सत्ता केंद्र से टूट जाए तो उखड़े वृक्ष की भांति हो जाता है। स्वरूप से जो वियुक्त हैवह सत्ता से जड़ें खो रहा है। कैसा आश्चर्य है कि हम स्वयं से ही अपरिचित होते जा रहे हैंजैसे वह दिशा जानने की ही नहीं हैजैसे वह कोई दिशाडायरेक्शन ही नहीं है!यदि भूल-चूक से कोई अपने से मिल जाएयदि अनायास कहीं स्वयं से साक्षातएनकाउंटर हो जाएतो जिससे मिलन हुआ हैउसे देख अवाक हो रह जाना पड़ेगापहचानना तो किसी भी तरह संभव नहीं है।
स्व सेस्वभाव से हमारी जड़ें उखड़ गई हैं। हम हैंपर स्वयं में नहीं। सबसे परिचित हैंपर स्वयं से अनजान और अजनबी,स्ट्रेंजर हो गए हैं। बाहर ज्ञान बढ़ा हैभीतर अज्ञान घना हो गया है। दीए के तले अंधेरा होने की बात बहुत सच हो गई है। शक्ति आई हैशांति विलीन हो गई है। विस्तार हुआ हैगहराई नहीं आई है। असंतुलन और पक्षाघात से घिर गए हैंजैसे कोई वृक्ष बाहर विस्तृत होपर भीतर उसकी जड़ें सड़ने लगी होंऐसा ही मनुष्य के साथ हुआ है। इससे दुखविषाद और संताप पैदा हुआ हैनिराशा और आसन्न मृत्यु की कालिमा बनी हुई हैजैसी किसी भी वृक्ष की भूमि से जड़ें ढीली होने पर होती है।
मनुष्य की भी जड़ें हैं और उसकी भी भूमि है। इस सत्य को पुर्नउदघोषित करने की आवश्यकता है। यह अत्यंत आधारित सत्य विस्मृत हो गया है। इस विस्मृति के कारण हम क्रमशअपनी जड़ें अपने हाथों खो रहे हैं। एक सतत आत्मघातस्युसाइड में हम लगे हैं। यह जड़ों को खोनाअपरूटेडनेस हमें निरंतर गहरे से गहरे दुखविषाद और मृत्यु में ले जा रहा है।
व्यक्ति-व्यक्ति को मैं दुख से घिरा देखता हूं। और यह स्मरणीय है कि जब एक व्यक्ति दुखी होता हैतो वह अनेकों के दुख का कारण बन जाता है। मैं यदि दुखी हूंतो अनिवार्यतः दूसरों के दुख का कारण बन जाऊंगा। जो मैं हूंवही मेरे संबंधों में व्याप्त हो जाता है।
यह स्वाभाविक ही है। क्योंकि अपने संबंधों में मैं स्वयं को ही तो डालता और उंडेलता हूंअन्यथा संभव नहीं है। मेरे संबंध मेरे ही प्रतिरूप और मेरे ही स्वर हैं। उनमें मैं ही प्रतिबिंबित और प्रतिध्वनित हूं। मैं ही उनमें उपस्थित हूं। इससे यदि मैं दुखी हूंदुख हूं,तो दुख ही मुझ से प्रवाहित और प्रसारित होगा। सरोवर में जैसे लहर-वृत्त एक छोटे से केंद्र पर उठ कर दूर-दूर व्यापी हो जाते हैंऐसे ही मेरे व्यक्ति केंद्र पर जो संवृत्त जाग जाते हैंवे मुझ तक ही सीमित नहीं रहते हैंउनकी प्रतिध्वनियां दूर दिगंत तक सुनी जाती हैं। व्यक्ति में जो घटित होता हैवह बहुत शीघ्र अनंत में परिव्याप्त हो जाता है। व्यक्ति और विराट के बीच वस्तुतः सीमाएं नहीं हैं। वे अनंत मार्गों से संबंधित और अंतः-संवादित हैं।
मैं दुखी हूंतो मैं दुख देने वाला हूं। न चाहूंतब भी प्रतिक्षण मुझसे वह प्रवाहित हो रहा है। वह विवशता है। क्योंकि जो मेरे पास हैवही तो मैं दे सकता हूंजो मेरे स्वयं के ही पास नहीं हैउसे चाह कर भी तो नहीं दिया जा सकता है। संबंधों में हम आकांक्षाओं को नहींअपने को ही देते हैं। शुभ आकांक्षाएं ही नहींमेरा शुभ होना आवश्यक है। मंगल कामनाएं ही नहींमेरा मंगल होना आवश्यक है। स्वप्न नहींसत्ता ली-दी जाती है।
इससे कितने ही लोग चाह कर भी न किसी को आनंदन शांतिन प्रेम ही दे पाते हैं। उनकी शुभाकांक्षाएं असंदिग्ध हैंपर उतना ही पर्याप्त नहीं है। उनके स्वप्न सच ही सुंदर हैंपर सत्ता के जगत में उनका प्रभाव पानी पर खींची गई रेखाओं से ज्यादा नहीं है। उनसे काव्य तो बन सकता हैपर जीवन अस्पर्शित रह जाता है। हम देना चाहते हैं आनंद..और कौन नहीं देना चाहता है..पर दे पाते हैं दुख और विषाद। देना चाहते हैं प्रेम और जो दे पाते हैंउसमें कहीं दूर भी प्रेम की ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती है।
और तब कैसी एक रिक्तताएम्पटीनेसकैसी एक असफलताफ्रूटलेसनेसकैसी एक व्यर्थता अनुभव होती हैकैसा सब हारा हुआ और पराजित लगता हैपराजय के इन क्षणों में सब दिशा-सूत्र खो जाते हैंसब प्रयोजनवत्ता खो जाती हैसब अर्थ खो जाता है। शेष रह जाता है एक अवसाद और अकेलापन, लोनलीनेसजैसे हम जगत में अकेले ही छूट गए हों। इन क्षणों में अपनी असमर्थता,इम्पोटेंस और असहायावस्था दिखती है।
शुभाकांक्षाओं केस्वप्नों के अनुकूल परिणाम नहीं आते हैंक्योंकि सत्ता उनके प्रतिकूल होती है। इससे जीवन-सरिता सार्थकता और कृतार्थता के सागर तक पहुंचती ही नहींव्यर्थता और अतृप्तिफ्रस्ट्रेशन के मरुस्थल में विलीन और अपशोषित होती मालूम होती है। अर्थहीनता-बोध की इस मनःस्थिति में यदि थोड़ी सी भी अमूच्र्छाअवेयरनेस होतो एक अत्यंत बद्धमूल भ्रम भंग हो सकता है। और उस भ्रम-भंगता के आलोकडिसइल्यूजनमेंट में व्यक्ति जीवन के एक आधारभूत सत्य के प्रति जाग सकता है। उस विद्युत आलोक में दिख सकता है कि जीवन की अंतस-सत्ता से अर्थहीनता पैदा नहीं होती है। अर्थहीनता पैदा होती है इस भ्रांत धारणा से कि जो स्वयं के पास ही नहीं हैउसे भी किसी को दिया जा सकता हैइस अज्ञान से कि जो सुगंध मुझ में ही नहीं हैवह भी संप्रेषित की जा सकती है। यह अज्ञान बहुत मूलव्यापी है। प्रेमशून्य प्रेम देना चाहते हैंआनंदरिक्त आनंद वितरित करना चाहते हैं;दरिद्र समृद्धि दान करने के स्वप्नों से पीड़ित और आंदोलित होते हैं।
मैं देखता हूं कि जो स्वयं के पास नहीं हैउसे दिया भी नहीं जा सकता है। इसे सिद्ध करने को किसी तर्क और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यह तो सूरज की भांति साफ और स्पष्ट है। शायद सूरज से भी ज्यादा स्पष्ट हैक्योंकि आंखें न हों तब भी तो इसे देखा जा सकता है। किंतु यह सिक्के का एक ही पहलू है। एक दूसरा पहलू भी है। वह तो और भी आंखों से ओझल हो गया है।
कभी-कभी कितना आश्चर्य होता है कि जो इतना निकट और इतना सहज जानने योग्य हैवह भी हमें विस्मृत हो जाता है। शायद जो बहुत स्पष्ट और बहुत निकट होता हैवह निकटता की अति के कारण ही दिखना बंद हो जाता है।
वह दूसरा पहलू यह है कि जो स्वयं के पास नहीं हैउसे किसी से लिया भी नहीं जा सकता है। जो स्वयं में नहीं हैउसे देना तो संभव है ही नहींलेना भी संभव नहीं है। जो भी अन्य से पाया जा सकता हैवह पाने के पूर्व स्वयं में उपस्थित होना चाहिएतो ही उसके प्रति संवेदनशीलतासेंसिटिविटी और ग्रहणशीलतारिसेप्टिविटी होती है। मैं जो हूं उसे ही स्वीकार कर पाता हूंउसके ही मुझ में द्वारओपनिंग और उसे आकर्षित करने की क्षमता होती है।
हम देखते हैं कि एक ही भूमि से कैसे भिन्न-भिन्न पौधे भिन्न-भिन्न रूपरंग और गंध आकर्षित कर लेते हैं। उनमें जो हैवही उनमें चला भी आता है। वे जो हैंवही वे पा भी लेते हैं। यही नियम हैयही शाश्वत व्यवस्था है।
प्रेम पाने को प्रेम से भरे होना आवश्यक है। जो घृणा से भरा हैवह घृणा को ही आमंत्रित करता है। विष से जिसने अपने को भर रखा हैसारे जगत का विष उसकी ओर प्रवाहमान हो जाता है। समान समान कोसजातीय सजातीय को पुकारता और उसका प्यासा होता है। अमृत को जो चाहता हो उसे अमृत से भर जाना होता है। प्रभु को जो चाहता हैउसे अपने प्रभु को जगा लेना होता है। जो चाहते होवही हो जाओ। जिससे मिलना चाहते होवही बन जाओ। आनंद को पकड़ने के लिए आनंद में होना आवश्यक है,आनंद ही होना आवश्यक है। आनंद ही आनंद का स्वागत और स्वीकार कर पाता है।
क्या देखते नहीं हैं कि दुखी चित्त ऐसी जगह भी दुख खोज लेता है जहां दुख है ही नहींपीड़ित पीड़ा खोज लेता हैउदास उदासी खोज लेता है। वस्तुतः वे जिसके प्रति संवेदनशील हैंउसका ही चयन कर लेते हैं। जो भीतर हैउसका चयन भी होता हैऔर उसी का प्रक्षेपणप्रोजेक्शनआरोपण भी होता है। हम जो हैंउसी को खोज भी लेते हैं। जगतजगत की स्थितियां दर्पण हैंजिसमें हम अनेक कोणों सेअनेक रूपों में अपने ही दर्शन कर लेते हैं।
मैं जो देता हूंवह भी मैं ही हूं। मैं जो लेता हूंवह भी मैं ही हूं। मैं के अतिरिक्त मेरी कोई सत्ताकोई अनुभूति नहीं है। उसके बाहर जाना संभव नहीं है। वही संसार हैवही मोक्ष है। वही दुख हैवही आनंद है। वही हिंसा हैवही अहिंसा है। वही विष हैवही अमृत है।
एक मंदिर के द्वार पर हुए विवाद का स्मरण आता है। सुबह की हवाओं में मंदिर की पताका लहरा रही थी। सूरज के स्वर्ण-प्रकाश में आंदोलित उस पताका को देख कर दो भिक्षुओं में विवाद हो गया था कि आंदोलनमूवमेंट पताका में हो रहा था कि हवाओं में हो रहा थाकिसी निकट से निकलते हुए तीसरे भिक्षु ने कहा थामित्रआंदोलन मनमाइंड में हो रहा है।
सच हीसब आंदोलन मन में हो रहा है और मन का हो रहा है।
मैं यदि भूलता नहीं हूंतो महावीर ने कहा हैयह आत्मा ही शत्रु हैयह आत्मा ही मित्र है।
आत्मा की शुद्ध परिणति अहिंसा हैआत्मा की अशुद्ध परिणति हिंसा है। वह व्यवहार की ही नहींमूलतः सत्व की सूचना है।
व्यवहार-शुद्धि का बहुत विचार चलता है। मैं जैसा देखता हूंवह पकड़ और पहुंच उलटी है। व्यवहार नहींसत्व-शुद्धि करनी होती है। व्यवहार तो अपने से बदल जाता है। वह तो सत्व का अनुगामी है। ज्ञान परिवर्तित हो तो आचार परिवर्तित हो जाता है। ज्ञान ही आधार और केंद्रीय है। व्यवहार उसी का प्रकाशन है। वह प्राण हैआचार उसका स्पंदन है।
साक्रेटीज का वचन हैज्ञान ही चरित्र है..नालेज इ.ज वच्र्यू।
ज्ञान से अर्थ जानकारीइनफर्मेशन और पांडित्य का नहीं है। ज्ञान से अर्थ है प्रज्ञा कासत्वसत्ता के साक्षात से उत्पन्न बोध,कांशसनेस का। यह बोधयह जागरूकतायह प्रज्ञा ही क्रांतिट्रांसफार्मेशन है। तथाकथित विचार-संग्रह से उत्पन्न ज्ञान इस क्रांति को लाने में असमर्थ होता हैक्योंकि वस्तुतः वह ज्ञान ही नहीं है। वह नगद और स्वयं का नहीं है। वह है उधारवह है अन्य की अनुभूति से निष्पन्न और इस कारण मृत और निष्प्राण है।
आत्मानुभूति हस्तांतरित होने में मृत हो जाती है। उसे जीवित और सप्राण हस्तांतरित करने का कोई उपाय नहीं है। सत्य नहीं,केवल शब्द ही पहुंच पाते हैं। इन शब्दों पर ही आधारित जो ज्ञान हैवह बोझ तो बढ़ा सकता हैमुक्ति उससे नहीं आती है।
मैं जिस ज्ञान को क्रांति कह रहा हूंवह पर से संगृहीत नहींस्व से जाग्रत होता है। उसे लाना नहींजगाना है। उसका स्वयं में आविष्कार करना है। उसके जागरण पर आचार साधना नहीं होता हैवह आता हैजैसे हमारे पीछे हमारी छाया आती है। आगम इसी ज्ञान को ध्यान में रख कर कहते हैंपढमं नाणं तओ दया। पहले ज्ञान हैतब अहिंसा हैतब आचरण है।
यह केंद्र के परिवर्तन से परिधि को परिवर्तित करने की विधि है। यही सम्यक विधि है। इसके विपरीत जो चलता हैवह बहुत मौलिक भूल में है। वह निष्प्राण से प्राण को परिवर्तित करने चला हैवह क्षुद्र से महत को परिवर्तित करने चला हैवह शाखाओं से मूल को परिवर्तित करने चला है। वैसे व्यक्ति ने अपनी असफलता के बीज प्रारंभ से ही बो लिए हैं।
यह स्वर्ण-सूत्र स्मरण रहे कि आचार से सत्ता परिवर्तित नहीं होती हैसत्ता से ही आचार परिवर्तित होता है। सम्यक ज्ञान सम्यक आचार का मूलाधार है। इससे ही हरिभद्र यह कह सके हैंआत्मा अहिंसा है और आत्मा ही हिंसाक्योंकि आत्मा की अप्रमत्तता से ही अहिंसा फलित होती है और प्रमत्तता से हिंसा।
  आया चेव अहिंसाआया हिंसति निच्छओ अेस।
  जो होई अप्पमत्तो अहिंसओहिंसओ इयरो।।
मैं यदि आत्म-जाग्रतअप्रमत्तअमूच्र्छित हूंतो मेरा जो व्यवहार हैवह अहिंसा है।
मैं यदि स्वस्थित हूंस्थितप्रज्ञ हूंब्रह्मनिमज्जित हूंतो जीवन-परिधि पर मेरा जो परिणमन हैवह अहिंसा है।
अहिंसा प्रबुद्ध चेतना की जगत तल पर अभिव्यंजना है। अहिंसा आनंद में प्रतिष्ठित चैतन्य का आनंद प्रकाशन है। दीए से जैसे प्रकाश झरता हैऐसे ही आनंद को उपलब्ध चेतना से अहिंसा प्रकीर्णित होती है। वह प्रकाशन किसी के निमित्त नहीं हैकिसी के लिए नहीं है। वह सहज है और स्वयं है। वह आनंद का स्वभाव है।
एक साधु के जीवन में मैंने पढ़ा है। किसी ने उससे कहा थाशैतान को घृणा करनी चाहिए। तो उसने कहा थायह तो बहुत कठिन हैक्योंकि घृणा तो अब मेरे भीतर है ही नहीं। अब तो केवल प्रेम हैचाहे शैतान हो और चाहे ईश्वरउसके सिवाय देने को अब मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं तो उन दोनों में शायद अंतर भी नहीं कर पाऊंगाक्योंकि प्रेम की आंख कब अंतर कर पाई है?
यह जब मैं सुनता हूं कि दूसरों पर दया करना अहिंसा हैतो सच ही मुझे बहुत हैरानी होती है। अहंकार कैसे-कैसे मार्ग अपनी तृप्ति के निकाल लेता हैउसकी आविष्कार क्षमता अदभुत है। अहिंसा का वस्तुतः किसी से कोई संबंध नहीं हैवह आत्म-उदभूत प्रकाश है। जिन पर वह पड़ता है उन्हें जरूर प्रेम और करुणा का अनुभव हो सकता हैलेकिन उस दृष्टि से वह चेष्टित नहीं है। यह भी सुनता हूं कि अहिंसा करनी चाहिएजैसे वह भी कोई क्रिया हैजो कि की और न की जाती है। कभी-कभी सुंदर दिखने वाले उपदेश कितने व्यर्थ और अज्ञानपूर्ण हो सकते हैंऐसी बातें सुन कर उनका पता चलता है। प्रेम क्रियाएक्टिविटी नहीं हैवह सत्ता की एक स्थितिस्टेट अॅाफ बीइंग है। प्रेम किया नहीं जाता हैप्रेम में हुआ जाता है। वह संबंध नहींसदभाव है।
यह बोध भी हो कि मैं प्रेम कर रहा हूंतो वह प्रेम नहीं है। प्रेम या आनंद जब स्वभाव होते हैंतो उनकी उपस्थिति का अनुभव कि मैं प्रेम कर रहा हूंक्रिया और सत्ता में भेद का सूचक है। वह भेद यदि उपस्थित हैतो प्रेम चेष्टित हैसत्ता निष्पन्न नहीं है। और वैसा प्रेम प्रेम नहीं है। प्रेम जब संपूर्ण सत्ता सेसंपूर्ण व्यक्तित्वटोटल पर्सनैलिटी से आविर्भूत होता हैतो उसके पीछे उसे जानने वाला कोई नहीं रह जाता है। कोई प्रेम करने वाला नहीं होता हैकेवल प्रेम ही होता है।
मैं अहिंसा से प्रेम का अर्थ लेता हूं। वह प्रेम की शुद्ध और पूर्ण अनुभूति है। प्रेम में जो किसी से संबंधित होने का भाव हैउस भाव के दूर करने के हेतु ही अहिंसा के नकारात्मक शब्द का प्रयोग होता रहा है। उस नकारात्मकता में प्रेम का निषेध नहीं हैनिषेध है केवल प्रेम के एक संबंधरिलेशनशिप होने का। प्रेम संबंध नहींस्थितिस्टेट अॅाफ कांशसनेस हैइस सत्य पर जोर देने के लिए अहिंसा शब्द का प्रयोग हुआ है। पर जो उसे प्रेम का ही अभाव समझ लेते हैंवे बहुत बड़ी भूल कर देते हैं। वह प्रेम का अभाव नहीं हैकेवल उनका अभाव हैजो प्रेम को परिपूर्ण और परिशुद्ध नहीं होने देते हैं। वह उन तत्वों का अभाव अवश्य हैजो उसे संबंध की स्थिति से सत्ता की स्थिति तक नहीं उठने देते हैं। वह रागविरागआसक्तिविरक्ति का अभाव है। इन बंधनों से ऊपर उठ कर प्रेम वीतराग हो जाता है।
मैं वीतराग प्रेम को ही अहिंसा कहता हूं। अहिंसा प्रेम हैऔर इसलिए वह नकारात्मक नहीं है। अहिंसा शब्द नकारात्मक हैपर अहिंसा नकारात्मक नहीं है। वह भावस्थिति अत्यंत विधायकपाजिटिव है। उससे अधिक विधायक और कुछ भी नहीं हो सकता है। प्रेम से अधिक जीवंत और विधायक और हो भी क्या सकता है?
प्रेम-अभाव हिंसा ही नकारात्मकनिगेटिव हैक्योंकि वह स्वभाव-विरोध है। मैं अपने प्रति अप्रेमहिंसा नहीं चाहता हूंऔर कोई भी नहीं चाहता है। प्रत्येक प्रेम का प्यासा क्यों हैअप्रेम की प्यास क्यों किसी को नहीं है?
मैं अनुभव करता हूं कि हम केवल स्वरूप को ही चाहते और चाह सकते हैं। और यदि हम अपनी चाह को समझ लेंतो उस चाह में ही हम स्वरूप की ओर छिपे इंगित पा सकते हैं।
मैं प्रेम चाहता हूंअर्थात मेरा स्वरूप प्रेम है।
मैं आनंद चाहता हूंअर्थात मेरा स्वरूप आनंद है।
मैं अमृतत्व चाहता हूंअर्थात मेरा स्वरूप अमृत है।
मैं प्रभुत्व चाहता हूंअर्थात मेरा स्वरूप प्रभु है।
और स्मरण रखना है कि जो मैं चाहता हूंवही प्रत्येक चाहता है। हमारी चाहें कितनी समान हैंऔर तब क्या हमारी समान चाहें हमारे समान स्वरूप की उदघोषणा नहीं हैं?
मैं’ और न मैं’ में जो बैठा हैवह भिन्न नहीं है। इस अभिन्न चेतना की आकांक्षा अप्रेमहिंसा के लिए नहीं है। इसलिए मैंने कहा कि हिंसा नकारात्मक हैक्योंकि वह स्वभाव-विरोध है। और जो नकारात्मकनिगेटिव होता हैवह विध्वंसात्मकडिस्ट्रक्टिव होता है। अप्रेम विध्वंस शक्ति है। वह मृत्यु की सेविका है। उस दिशा से चलने वाला निरंतर गहरे से गहरे विध्वंस और मृत्यु और अंधेरे में उतरता जाता है। वह मृत्यु हैक्योंकि वह स्वरूप-विपरीत आयामडायमेंशन है।
अहिंसा जीवन की घोषणा है। प्रेम ही जीवन है।
अहिंसा शब्द में हिंसा की निषेधात्मकता का निषेधनिगेशन अॅाफ निगेशन है। और मैंने सुना है कि निषेध के निषेध से विधायकतापाजिटिविटी फलित होती है। शायद अहिंसा शब्द में उसी विधायकता की ओर संकेत है। फिरशब्द की खोल तो निस्सार है। शब्द की राख के पीछे जो जीवित आग छिपी हैउसे ही जानना है। वह आग प्रेम की है। और प्रेम सृजन है। अप्रेम को मैंने विध्वंस कहा हैप्रेम को सृजन कहता हूं। जीवन में प्रेम ही सृजन का स्रोत है। विधायकता और सृजनात्मकता के चरम स्रोत और अभिव्यक्ति के कारण ही क्राइस्ट प्रेम को परमात्मा या परमात्मा को प्रेम कह सके हैं। सच ही सृजनात्मकताक्रिएटिविटी के लिए प्रेम से अधिक श्रेष्ठ और ज्यादा अभिव्यंजक अभिव्यक्ति खोजनी कठिन है।
मैं देखता हूं कि यदि अहिंसा की यह विधायकता और स्वसत्ता दृष्टि में न होतो वह केवल हिंसा का निषेध होकर रह जाती है। हिंसा न करना ही अहिंसा नहीं हैअहिंसा उससे बहुत ज्यादा है। शत्रुता का न होना ही प्रेम नहीं हैप्रेम उससे बहुत ज्यादा है। यह भेद स्मरण न रहे तो अहिंसा-उपलब्धि केवल हिंसा-निषेध और हिंसा-त्याग में परिणत हो जाती है।
इसके परिणाम घातक होते हैं। नकार और निषेध की दृष्टि जीवन को विस्तार नहींसंकोच देती है। उससे विकास और मुक्ति नहींकुंठा और बंधन फलित होते हैं। व्यक्ति फैलता नहींसिकुड़ने लगता है। वह विराट जीवन ब्रह्म में विस्तृत नहींक्षुद्र में और अहं में सीमित होने लगता है। वह सरिता बन कर सागर तक पहुंच जातालेकिन सरोवर बन सूखने लगता है। अहिंसा को जगाना सरिता बनना हैकेवल हिंसा-त्याग में उलझ जाना सरोवर बन जाना है। नकार की साधना श्री और सौंदर्य और पूर्णता में नहीं,कुरूपता और विकृति में ले जाती है। वह मार्ग छोड़ने का हैपाने का और मर जाने का नहीं। जैसे कोई स्वास्थ्य का साधक मात्र बीमारियों से बचने को ही स्वास्थ्य-साधना समझ लेऐसी ही भूल वह भी है।
स्वास्थ्य बीमारी का अभाव ही नहींप्राणशक्तिवाइटल फोर्स का जागरण है। वह प्राण की प्रसुप्त और बीज-शक्ति का जागना और वास्तविक बनना है। बीमारी से बचाव तो मुर्दों का भी हो सकता हैलेकिन उन्हें स्वास्थ्य नहीं दिया जा सकता है। बीमारियों से बच-बच कर कोई अपने को जिलाए रख सकता हैलेकिन स्वास्थ्य और जीवन को पाना बहुत दूसरी बात है।
धर्म-साधना में भी स्वास्थ्य-साधना के इस विज्ञान को याद रखना अत्यधिक उपादेय है।
एक साधु आश्रम में अतिथि था। उसके स्वागत में एक समारोह आयोजित था। उस आश्रम के कुलपति ने अपने आश्रम और आश्रम के अंतेवासियों के परिचय में कहा थाहम हिंसा नहीं करते हैंहम मादक द्रव्यों का उपयोग नहीं करते हैंहम परिग्रह नहीं करते हैं। इसी स्वर में उसने और बहुत सी बातें बताई थींजो कि साधु नहीं करते थे। वह अतिथि देर तक यह सब सुनता रहा था और अंत में उसने पूछा थामैं यह तो समझ गया कि आप क्या नहीं करते हैंअब कृपया यह और बताएं कि आप करते क्या हैं!
निश्चय हीयही मैं भी पूछना चाहता हूं, ‘न करने’ और करने’ के इस बहुमूल्य भेद की मैं भी याद दिलाना चाहता हूं।
अहिंसा कोया उस दृष्टि से धर्म को ही जिसने ‘न करने’ की भाषा में समझा और पकड़ा हैवह बहुत आधारभूत भूल में पड़ गया है। शवीत्जर ने जिसे जीवन-निषेधलाइफ निगेशन कहा हैवही उसकी चर्या हो जाती है। जीवन-विधेयविधायकतालाइफ एफर्मेशन के लक्ष्य से उसके संबंध-सूत्र विच्छिन्न हो जाते हैं। वह उपलब्धि के आरोहण को खो देता हैऔर केवल खोने और न होने में लग जाता है।
और सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि खोने की इस सतत चेष्टा और आग्रह के बावजूद भी जिन्हें वह खोना चाहता हैउन्हें नहीं खो पाता है। संघर्ष से जिन्हें वह दूर करता हैवे किसी रहस्यमय ढंग से उसके निकट ही बने रहते हैं। वह विश्राम भी नहीं कर पाता है कि पाता है कि जिन्हें वह दूर छोड़ आया थावे सब पुनः वापस लौट आए हैं। जिन्हें वह दमन करता हैवे वेग न मालूम क्यों और वेग पकड़ते प्रतीत होते हैं। जिन वासनाओं से वह युद्धरत हैजिनके सिरों को वह धड़ों से अलग कर फेंक देता हैवह अवाक रह जाता है कि वे सब पुनः-पुनः हजार-हजार सिर रख कर फिर उसे घेर कर कैसे खड़ी हो जाती हैं?
हिंसाक्रोध या कामसेक्स कोई भी केवल दमन से विलीन नहीं होता है। नकार और विरोध मात्र से ये वेग समाप्त नहीं होते हैं। उस भांति वे और सूक्ष्म होकर चित्त की और भी गहरी पर्तों पर सक्रिय हो जाते हैं। फ्रायड ने जिसे अचेतन मनअनकांशस कहा हैवही दमन से उनका कार्य क्षेत्र बन जाता है। इस दमनसप्रेशन और विरोध की दिशा से चल कर व्यक्ति विमुक्त तो नहीं,विक्षिप्त अवश्य हो सकता है।
वस्तुतःजीवनानुभूतियों के जगत में निषेध के मार्ग से न कभी कुछ पाया गयान कभी कुछ पाया जा सकता हैन कभी कुछ छोड़ा गया हैन कभी छोड़ा जा सकता है। वह दिशा ही पाने और छोड़ने की नहीं है। असल मेंसब छोड़ने के पूर्व पाना होता है। श्रेष्ठ का मिलना ही अश्रेष्ठ का छूटना बनता है। हीरों के मिलने पर कंकड़ों पर मुट्ठी खोलनी नहीं पड़ती हैवह खुल जाती है।
मैं समस्त त्याग को इसी रूप में देख पाता हूं। वह श्रेष्ठ की उपलब्धि पर उसके लिए स्थान बनाने से ज्यादा नहीं है। वह ज्ञान का अग्रगामी नहींअनुगामी है। जैसे गाड़ी के पीछे उसके चाकों के निशान बिना बनाए बनते जाते हैंऐसा ही आगमन उसका भी होता है। वह ज्ञान की सहज छाया है।
मैं हिंसा कोअधर्म कोअज्ञान को नकारात्मक कहता हूंवैसे ही जैसे अंधेरा नकारात्मक है। अंधेरे की अपनी कोई सत्ता नहीं है,उसका कोई स्व अस्तित्वसेल्फ एक्झिस्टेंस नहीं है। वह सत्ता नहींअभाव है। वह स्वयं का होना नहींप्रकाश का न होना है। वह प्रकाश की अनुपस्थिति है। यदि इस कक्ष में अंधेरा व्याप्त हो और हम उसे दूर करना चाहते होंतो क्या करना होगाक्या उसे संघर्ष सेधक्के देकर बाहर किया जा सकता है?क्या अंधेरे से किए गए सीधे युद्ध के परिणाम में उसकी मृत्यु हो सकती है?
मित्रयह कभी नहीं होगाउस मार्ग से चलने पर अंधेरा तो नहींमिटाने वाले अवश्य मिट सकते हैं। अंधेरे को मिटाने का उपाय अंधेरे को मिटाना नहींप्रकाश को जलाना है। जिसकी अपनी स्व सत्ता नहींउसे निषेध से मिटाना असंभव है। अभाव को न तो लाया जा सकतान हटाया जा सकता है। अंधेरे को कहीं ले जाना भी संभव नहीं है। सत्ता ही लाई और सत्ता ही हटाई जा सकती है। अभाव के साथ सीधी कोई भी क्रिया नहीं होती है। उसके साथ सब व्यवहार अप्रत्यक्ष होता है। उसके साथ समस्त व्यवहार उसके माध्यम से होता हैजिसका कि वह अभाव है।
अहिंसाप्रेमआनंदपरमात्मा भावात्मक हैंपाजिटिव हैं। उनकी सत्ता है। वे किसी के अभावअनुपस्थिति मात्र ही नहीं हैं। उनका स्वयं में होना है। इसलिए किसी के अभाव से उनका होना नहीं होता है। यद्यपि उनके अभ्युदय से हिंसादुखअज्ञान आदि अंधेरे की भांति तिरोहित हो जाते हैं। शायद अंधेरा विलीन हो जाता हैयह कहना भी ठीक नहीं हैक्योंकि वह तो था ही नहीं। वस्तुतः प्रकाशागमन पर इस सत्य का दर्शन होता है कि वह न तो थान है।
यह अब कहा जा सकता है कि अहिंसा हिंसा-त्याग नहींआत्म-जागरण है। वह दुख-मुक्ति नहींआनंद-प्रतिष्ठा है। वह त्याग नहींउपलब्धि है। यद्यपि उसके आविर्भाव से हिंसा विलीन हो जाती हैदुख निरोध हो जाता है और परम त्याग फलित होता है।
अहिंसा को पाना हैतो आत्मा को पाना होगा। अहिंसा उसी साक्षात का परिणामकांसीक्वेंस है। उसे साधा नहीं जा सकता है। कृष्णमूर्ति ने पूछा हैक्या प्रेम भी साधाकल्टीवेट किया जा सकता हैऔर उस प्रश्न में ही उत्तर भी दे दिया है। निश्चय ही साधा हुआ प्रेम प्रेम नहीं हो सकता है। वह या तो होता है या नहीं होता है। कोई तीसरा विकल्प नहीं है। वह सहज प्रवाहित हो तो ठीक,अन्यथा वह अभिनय और मिथ्या प्रदर्शन है। साधी हुई अहिंसा अहिंसा नहींअभिनय है। विचार और चेष्टा से जो आरोपित हैवह मिथ्या है।
सम्यक अहिंसा प्रज्ञा से प्रवाहित होती हैवैसे ही जैसे अग्नि से उत्ताप बहता है। आरोपण से आचरण में दिखता हैवह अंतस में नहीं होता हैनहीं हो सकता है। आचरण और अंतस की विपरीतता एक सतत अंतद्र्वंद्व बन जाता है। जिसे जीता हैउसे बार-बार जीतना पड़ता है। पर जीत कभी पूरी नहीं होती है। वह हो भी नहीं सकती है।
वस्तुतः परिधि कभी केंद्र को नहीं जीत सकती हैआचरण कभी अंतस को नहीं जीत सकता है। परिवर्तन का प्रवाह विपरीत होता है। वह परिधि से केंद्र की ओर नहींकेंद्र से परिधि की ओर होता है। अंतस क्रांति से गुजरता है और आचरण में परिवर्तन होता है।
चेष्टा से लाया हुआ आचरण कभी भी सहज नहीं हो सकता है। वह आदतहैबिट से ज्यादा नहीं है। मूल्य भी उसका उससे ज्यादा नहीं है। वह स्वभाव तो कभी बन ही नहीं सकता है। आदत कभी भी स्वभाव नहीं है। स्वभाव है ही वहजिसे बनाने का कोई प्रश्न नहीं है। आदत सृष्ट हैस्वभाव असृष्ट है। एक को निर्माण और एक को अनावरण करना होता है।
मित्रस्वभाव की उत्पत्ति नहीं होतीवह तो है। केवल उसे जानना हैकेवल उसे उघाड़ना है। जैसे कोई सोता हो और उसे उठाना पड़ेऐसा ही उसके साथ भी करना होता है।
मैं एक कुआं खुदता देखता थातब मुझे स्मरण आया था कि स्वभाव को भी ऐसे ही खोदना होता है। जल-स्रोत तो मौजूद थे,पर आवृत थे। वे बहने और फूट पड़ने को भी उत्सुक थेपर अवरुद्ध थे। और जब अवरोध देने वाली मिट्टी की परतें दूर हो गई थीं,तो वे कैसे स्फुरित हो उठे थेस्वभाव के साथ भी कुछ ऐसा ही है। बहनेविकसित और पुष्पित होने की वहां भी चिर प्रतीक्षा है। थोड़ा सा खोदना हैऔर जीवन एक बिल्कुल नए आयाम पर गतिमय हो जाता है। कल तक जो साध कर भी साध्य नहीं थावह सहज हो जाता है। कल तक जो छोड़े-छोड़े भी नहीं छूटता थावह अब खोज कर भी मिलता नहीं है।
जीवन-आयाम बदलने की इस कीमियाअल्केमी को जानना ही धर्म है। अल्केमिस्ट इसकी ही खोज में थे। वे एक ऐसे रसायन की तलाश में थेजिससे लोहा स्वर्ण में बदल सके। जीवन जैसा पाया जाता हैवह लोहा हैजीवन जैसा हो सकता हैवह स्वर्ण है। और यदि बहुत ठीक से देखेंतो लोहा केवल आवरण हैवस्त्र हैस्वर्ण नित्य भीतर उपस्थित है। सद-आचारअहिंसा स्वभाव का उदघाटन हैस्वरूप का अनावरण है।
महावीर ने उसे इसी अर्थ में लिया है। जो स्वयं में स्थित हैवही अहिंसा को उपलब्ध है। जो आचार केवल आचरण हैस्वभाव की सहज स्फुरणास्पांटेनियस एक्सप्रेशन नहींवह ब्रह्म में नहीं और गहन अहं में ले जाता है। उससे अहंकारईगो और परिपुष्ट होता है। वह उस दिशा से भी भरता और बलिष्ठ होता है। तथाकथित साधु और संन्यासी में जो प्रगाढ़ दंभ परिलक्षित होता हैवह अनायास ही नहीं है। उसके मूल में अतिचेष्टा से आरोपित आचरण और प्रयत्न साध्य चरित्र है। यह कमाया हुआ चरित्र वैसे ही अहंकार-पूर्ति का साधन बन जाता हैजैसे कमाया हुआ धन बन जाता है। चरित्र भी परिग्रह और संपत्ति का रूप ले लेता है।
असल में जो भी कमाया और अर्जित किया जाता हैवह मैं को भरता हैक्योंकि अर्जन उसकी ही विजय का रूप ले लेता है। कैसा आश्चर्य है कि अर्जित त्याग भी परिग्रह हो जाता है और अर्जित विनय में भी अहंकार उपस्थित होता हैक्या तथाकथित विनय में झुके सिर के पीछे अक्सर दंभ में उठे सिर के दर्शन नहीं हो जाते हैं?
एक बार एक साधु से मिलना हुआ था। उन्होंने मुझ से कहा थामैंने लाखों की संपत्ति पर लात मार दी है। मैं निश्चय ही सुन कर हैरान हो गया था। फिर उनसे पूछा थायह लात आपने कब मारीवे बहुत गौरव से बोले थेकोई तीस वर्ष हुए।
उनसे मिल कर लौटते समय मैं राह में सोचता आया था कि जो त्याग किया गया होवह अहंकार के बाहर नहीं ले जाता है। एक दिन वे इस अहंकार से भरे रहे होंगे कि उनके पास लाखों हैंआज वे इससे भरे हैं कि उन्होंने लाखों पर लात मार दी है।
त्याग आए तो सम्यककिया जाए तो असम्यक हो जाता है। और यह धर्म की समस्त साधना के संबंध में सत्य है। अहंकार के मार्ग बहुत सूक्ष्म हैं। वह बहुत रहस्यमय है और उन जगहों पर भी वह उपस्थित हो जाता हैजहां उसके होने की कल्पना नहीं होती है और जहां ऊपर से उसके दर्शन बिल्कुल भी नहीं होते हैं। उसके स्थूल रूप तो दिखाई पड़ते हैंइसलिए वे उतने घातक भी नहीं हैं। पर सूक्ष्म रूप बहुत घातक हैंक्योंकि वे साधारणतः दिखाई नहीं पड़ते हैंइसलिए उनसे बहुत आत्मवंचना होती है। धार्मिकत्यागी,ज्ञानीअहिंसक आदि होने का अहंकार वैसा ही है।
नीतिमारेलिटी अध्यात्मस्प्रिचुएलिटी की स्फुरणा है। और जो तथाकथित आरोपित नैतिकता के अहंकार से परितृप्त हो जाते हैं,वे उस अलौकिक अध्यात्म-स्फुरणाजन्य नीति से वंचित रह जाते हैं जहां अहंकार की छाया भी प्रवेश नहीं कर पाती है। सूर्य के प्रकाश में जैसे ओस-कण विलीन हो जाते हैंऐसे ही आत्मानुभूति के प्रकाश में अहंकार वाष्पीभूत हो जाता है। वह अज्ञान और अंधकार का प्रवासी है। उसके प्राणश्वास-प्रश्वास उसी से निर्मित हैं। अज्ञान के अभाव में उसका जीवन संभव नहीं है।
अज्ञान अहंकार है। ज्ञान अहंकार-मुक्ति है। अज्ञान आचरण अहंचर्य है। ज्ञान आचरण ब्रह्मचर्य है। अहंचर्य हिंसा है। ब्रह्मचर्य अहिंसा है।
मैं-भाव हिंसा में ले जाता है। वह भाव आक्रामकएग्रेसिव है। समस्त हिंसा उसके ही केंद्र पर आवर्तित होती है। अज्ञान में सत्ता पर मैं आरोपित हो जाता है। आत्मा मेंजो पतित हो जाती हैवह जो वस्तुतः नहीं है उसकी प्रतीति होने लगती है। यह मैं विश्वसत्ता से पृथक और विरोध में खड़ा हो जाता है। फिर उसे प्रतिक्षण स्वरक्षा में संलग्न होना पड़ता है। मिटने का एक सतत भय उसे घेरे रहता है। एक असुरक्षाइनसिक्योरिटी चैबीस घंटे उसके साथ बनी रहती है। वह कागज की नाव है और किसी भी क्षण उसका डूबना हो सकता है। वह ताशों का घर है और हवा का कोई भी झोंका उसे नष्ट कर सकता है।
यह भयफियर हिंसा का जन्म है। हिंसा अपने मूल मानसिक रूप में भय ही है। यह भय आत्मरक्षा से आक्रमण तक विकसित हो सकता है। वस्तुतः तो आक्रमण भी आत्मरक्षण का ही रूप है। शायद मैक्यावेली ने कहा है कि आक्रमण आत्मरक्षा का सर्वोत्तम उपाय है। भय यदि आत्मरक्षण तक ही सीमित रहेतो अंततः कायरता पैदा हो जाती है। वही भय आक्रामक होकर वीरता जैसा दिखाई पड़ता है। पर कायरता हो या तथाकथित वीरताभय दोनों में ही उपस्थित रहता हैऔर वही दोनों का चालक है। जिनके हाथ में तलवार दिखाई देती है वेऔर वे भी जो पूंछ दबा कर कहीं छिप रहते हैंदोनों ही भय से संचालित हैं।
यह जानना आवश्यक है कि भय क्या हैक्योंकि जो भयग्रस्त हैंकभी अहिंसक नहीं हो सकते हैं। और यदि भयग्रस्त व्यक्ति अहिंसक होने की चेष्टा करेतो वह केवल कायर हो पाता हैअहिंसक नहीं। इतिहास और अनुभव इसके बहुत और सबल प्रमाण देता है। अहिंसा का आधार अभयफियरलेसनेस है। अभय के अभाव में अहिंसा संभव नहीं है। महावीर और बुद्ध ने अभय को अहिंसा की अनिवार्य शर्त माना है।
मैं देखता हूं कि मनुष्य की संपूर्ण चेतना ही भय से घिरी और बनी है। उसके मन के किसी तल पर वह सदा ही मौजूद है। यह भयचाहे उसके प्रकटन के रूप कोई भी होंमूलतः मृत्यु का भय है। जीवन भर मृत्यु घेरे रहती है। वह प्रतिक्षण आसन्न है। किसी भी घड़ी और किसी भी दिशा से उसका आगमन हो सकता है। कभी भी संभावित इस मृत्यु से भय स्वाभाविक ही है। एक तो वह एकदम अपरिचित हैऔर दूसरे मनुष्य उसके सामने पूर्ण विवश है। अपरिचित और अनजान से भय मालूम होता है। जीवन असह्य होतब भी कम से कम परिचित तो है। मृत्यु अज्ञातअननोन में ले जाती है। यह अज्ञात भय देता है। फिर उस पर हमारा कोई वश नहीं है। हम उसके साथ कुछ कर नहीं सकते हैं।
यह विवशता हमारे अहंकार को आमूल खंडित कर देती है। जिस अहंकार के पोषण को हमने जीवन समझा थावह टूटता और नष्ट होता दिखता है। वही तो हमारा होना थावही तो हम थेऔर इससे मृत्यु जीवन का अंत मालूम होती है। हम क्या हैंशरीर और चित्तऔर उन दोनों के जोड़ से फलित अहंकारलेकिन मृत्यु की लपटें तो उन्हें राख करती हुई मालूम होती हैं। उनके पार और अतीत कुछ भी तो शेष बचता नहीं दिखता है। फिर मनुष्य कैसे भयभीत न हो?वह कैसे अपने को सांत्वना दे?
ऐसी स्थिति में भय स्वाभाविक हैऔर इस भय से बचाव के लिए व्यक्ति कुछ भी करने को हो जाता है। इस भय से ही हिंसा के अनेक रूपों की उत्पत्ति होती है। इसलिए मैं कहता हूं कि भय ही हिंसा है और अभय अहिंसा है। हिंसा से मुक्त होने के लिए भय से मुक्त होना होता है। भय से मुक्त होने के लिए मृत्यु से मुक्त होना होता है। मृत्यु से मुक्त होने के लिए स्वयं को जानना होता है।
मैं पर को जानता हूंस्व को नहीं जानता हूं। यह कैसा आश्चर्य हैक्या इससे भी ज्यादा आश्चर्य की कोई और बात हो सकती है?
यह कैसा रहस्यपूर्ण है कि मैं बाहर से परिचित और अंतस से अपरिचित हूं!
यह आत्म-अज्ञान ही जीवन के समस्त दुखअनाचार और अमुक्ति का कारण है।
ज्ञान की शक्ति तो मुझ में हैअन्यथा मैं पर कोबाहर को भी कैसे जानतावह तो अविच्छिन्न मुझ में उपस्थित है। मैं जागता हूंतो वह है। मैं सोता हूंतो वह है। मैं स्वप्न में हूंतो वह है। मैं स्वप्नशून्य सुषुप्ति में हूंतो वह है। मैं जागने कोनिद्रा कोस्वप्न कोसुषुप्ति को जानता हूं। मैं उनका द्रष्टा हूंउनका ज्ञान हूं। मैं ज्ञान हूंक्योंकि जो मुझ में अविच्छिन्न हैयह मेरा स्वरूप ही है। ज्ञान के अतिरिक्त मुझ में कुछ भी अविच्छिन्नकांटिन्यूअस नहीं है। वस्तुतः मैं ज्ञान से पृथक नहीं हूं। मैं ज्ञान ही हूं। यह ज्ञान ही मेरी सत्तामेरी आत्मा है।
मैं ज्ञान हूंइसलिए पर को जान रहा हूं। मैं ज्ञान हूंइसलिए स्व को जान सकता हूं।
यह बोध भी कि मैं अपने को नहीं जानता हूंस्व-ज्ञान की ओर बहुत बड़ा चरण है।
मैं पर को देख रहा हूंइसलिए पर को जान रहा हूं। यदि पर को न देखूंयदि पर चैतन्य के सामने से अनुपस्थित होतो जो शेष रहेगावही स्व है।
स्व को देखा तो नहीं जा सकता है। स्व को देखना पर को देखना है। स्व तो द्रष्टा है। वह तो देखने वाला है। वह दृश्य में परिणत नहीं हो सकता है। इसलिए स्व भी नहीं दिखता हैकोई भी दृश्य नहीं हैतब जो हैवही मैं हूं।
शुद्ध चैतन्य का अनुभव आत्मानुभव है।
मैं पर से घिरा हूंइसलिए पूछूंगा कि आत्मानुभव के लिए पर को अनुपस्थित कैसे करूं?वह तो सदा घेरे हुए है?
पर पर’ तो आंख बंद करते ही अनुपस्थित हो जाता हैइसलिए वह कोई समस्या नहीं है। विचार है वास्तविक समस्या। पर के जो प्रतिबिंबजो प्रतिफलन चित्त पर छूट जाते हैं और हमें घेरे रहते हैंवे ही समस्या हैं। उनको ही जानते रहने से हम उसे नहीं जान पाते हैं जो कि उनको भी जान रहा है। विचारथॅाट्स के कारण चेतनाकांशसनेस नहीं ज्ञात हो पाती है। विचार-प्रवाहथॅाट प्रोसेस का जो साक्षी हैउसमें जागना है। साक्षी में जागनासाक्षी को जगाना है। यही ध्यानमेडीटेशन है।
विचार के अमूच्र्छित दर्शनराइट माइंड सेविचार-प्रवाह के प्रति सम्यक जागरण से क्रमशविचार-प्रवाह में जो अंतराल,इंटरवल्स हैं उनका अनुभव होता है। वे रिक्त स्थान क्रमशबड़े होते जाते हैं। विचार को मात्र देखने भर सेकेवल उसका द्रष्टा बनने सेबिना किसी दमन और संघर्ष के वह विसर्जित होता है। विचार-प्रवाह का दर्शनअवेयरनेस विचार-शून्यताथॅाटलेसनेस परऔर विचार के अतीत ले जाता है।
विचार का शून्य हो जाना ध्यान है। विचार-शून्यता में सच्चिदानंद का अनुभव समाधि है। समाधि सत्य-दर्शन है।
समाधि की अनुभूति सत्य है। समाधि का व्यवहार अहिंसा है।
समाधि में दिखता है कि जो हैअमृत है। मृत्यु का भ्रम विसर्जित हो जाता है। मृत्यु के साथ भय चला जाता है और अभय उत्पन्न होता है। अभय से अहिंसा प्रवाहित होती है।
समाधि में स्व से पहुंचा जाता हैपर उसमें पहुंच कर आत्म और अनात्म विलीन हो जाते हैं। वह भेद विचार का था। समाधि भेद और द्वैत के अतीत है। वह अद्वय और अद्वैत है। जैसे बाती दीए के तेल को जला कर स्वयं भी जल जाती हैवैसे ही स्व भी पर से मुक्त करके स्वयं से भी मुक्त कर जाता है। मैं की मुक्तिमैं से भी मुक्ति है।
समाधि ब्रह्म-साक्षात है। ब्रह्मानुभूति से ब्रह्मचर्य स्पंदित होता है। ब्रह्मचर्य का केंद्र सत्य और परिधि अहिंसा है। समाधि में सत्य के फूल लगते और अहिंसा की सुगंध फैलती है। 

समाप्त  

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