शुक्रवार, 1 जून 2018

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-07

मेरे प्रिय आत्मन्,
एक छोटी सी घटना से मैं अपनी आज की बात को शुरू करना चाहूंगा।
एक फकीरएक संन्यासी प्रभु की खोज में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा था। वह किसी मार्गदर्शक की तलाश में था..कोई उसकी प्रेरणा बन सकेकोई उसे जीवन के रास्ते की दिशा बता सके। और आखिर उसे एक वृद्ध संन्यासी मिल गया राह पर हीऔर वह उस वृद्ध संन्यासी के साथ सहयात्री हो गया।
लेकिन उस वृद्ध संन्यासी ने कहा कि मेरी एक शर्त है यदि मेरे साथ चलना हो तो। और वह शर्त यह है कि मैं जो कुछ भी करूंतुम उसके संबंध में धैर्य रखोगे और प्रश्न नहीं उठा सकोगे। मैं जो कुछ भी करूंउस संबंध में मैं ही न बताऊंतब तक तुम पूछ नहीं सकोगे। अगर इतना धैर्य और संयम रख सको तो मेरे साथ चल सकते हो।

उस युवक ने यह शर्त स्वीकार कर ली और वे दोनों संन्यासी यात्रा पर निकले। पहली ही रात वे एक नदी के किनारे सोए और सुबह ही उस नदी पर बंधी हुई नाव में बैठ कर उन्होंने नदी पार की। मल्लाह ने उन्हें संन्यासी समझ कर मुफ्त नदी के पार पहुंचा दिया। नदी के पार पहुंचते-पहुंचते युवा संन्यासी ने देखा कि बूढ़ा संन्यासी चोरी-छिपे नाव में छेद कर रहा हैनाव का मल्लाह तो नदी के उस तरफ ले जा रहा हैऔर बूढ़ा संन्यासी नाव में छेद कर रहा हैवह युवा संन्यासी बहुत हैरान हुआयह उपकार का बदलामुफ्त में उन्हें नदी पार करवाई जा रही हैउस गरीब मल्लाह की नाव में किया जा रहा यह छेद?
भूल गया शर्त को। कल रात ही शर्त तय की थी। नदी से उतर कर वे दो कदम भी आगे नहीं बढ़े होंगे कि उस युवा संन्यासी ने पूछा कि सुनिएयह तो आश्चर्य की बात है। एक संन्यासी होकरजिस मल्लाह ने प्रेम से नदी पार करवाईमुफ्त सेवा की सुबह-सुबहउसकी नाव में छेद करने की बात मेरी समझ में नहीं आतीकि उसकी नाव में आप छेद करेंयह कौन सा बदला हुआ..नेकी के लिए बदी सेभलाई का बुराई से?
उस बूढ़े संन्यासी ने कहाशर्त तोड़ दी तुमने। सांझ को ही हमने तय किया था कि तुम पूछोगे नहीं। मेरे से विदा हो जाओ। अगर विदा होते हो तो मैं कारण बताए देता हूं। और अगर साथ चलना है तो आगे ध्यान रहेदुबारा पूछा कि फिर साथ टूट जाएगा।
युवा संन्यासी को ख्याल आया। उसने क्षमा मांगी। उसे हैरानी हुई कि वह इतना भी संयम नहीं रख सकाइतना भी धैर्य नहीं रख सका!
लेकिन दूसरे दिन ही फिर संयम टूटने की बात आ गई। वे एक जंगल से गुजर रहे थेऔर उस जंगल में उस देश का सम्राट शिकार खेलने आया था। उसने संन्यासियों को देख कर बहुत आदर दियाउन्हें अपने घोड़ों पर सवार किया और वे सब राजधानी की तरफ वापस लौटने लगे। वृद्ध संन्यासी के पास राजा ने अपने एकमात्र पुत्र युवा राजकुमार को घोड़े पर बिठा दिया। घोड़े दौड़ने लगे राजधानी की तरफ। राजा के घोड़े आगे निकल गएदोनों संन्यासियों के घोड़े पीछे रह गए। बूढ़े संन्यासी के साथ राजा का बच्चा भी बैठा हुआ हैवह एकमात्र बेटा है उसका। जब वे दोनों अकेले रह गएउस बूढ़े संन्यासी ने उस युवा राजकुमार को नीचे उतारा और उसके हाथ को मरोड़ कर तोड़ दिया। और झाड़ी में धक्का देकर अपने संन्यासी साथी से कहाभागो जल्दी।
यह तो बरदाश्त के बाहर था। फिर भूल गई शर्त। उसने कहाहैरानी की बात है यहजिस राजा ने हमारा स्वागत कियाघोड़ों पर सवारी दीमहलों में ठहरने का निमंत्रण दियाजिसने इतना विश्वास किया कि अपने बेटे के घोड़े पर तुम्हें बिठायाउसके एकमात्र बेटे का हाथ मरोड़ कर तुम जंगल में छोड़ आए हो। यह क्या हैयह मेरी समझ के बाहर हैमैं इसका उत्तर चाहता हूं?
बूढ़े ने कहातुमने फिर शर्त तोड़ दी। और मैंने कहा था दूसरी बार शर्त तोड़ोगेतो विदा हो जाएंगे। अब हम विदा हो जाते हैं,और दोनों बातों का उत्तर मैं तुम्हें दिए देता हूं। जाओ लौट कर पता लगाओ तो तुम्हें ज्ञात होगा कि वह नाव वह मल्लाह इसी किनारे पर रात छोड़ गयाऔर रात उस गांव पर डाका डालने वाले लोग उसी नाव पर सवार होकर डाका डालेंगे। मैं उसमें छेद कर आया हूं। उस गांव में डाका बच जाएगा। और राजा के लड़के को मैंने हाथ मरोड़ कर छोड़ दिया है जंगल में। तुम पता लगानायह राजा तो अत्यंत दुष्ट और क्रूर और आततायी हैइसका लड़का उससे भी क्रूर और आततायी होने को है। लेकिन उस राज्य का एक नियम है कि गद्दी पर वही बैठ सकता हैजिसके सब अंग ठीक हों। मैंने उसके हाथ को मरोड़ दिया हैवह अपंग हो गयाअब वह गद्दी पर बैठने का अधिकारी नहीं रहा। सैकड़ों वर्षों से इस देश की प्रजा पीड़ित हैवह पीड़ित परंपरा से मुक्त हो सकेगी।
अब तुम विदा हो जाओ। मैं क्षमा चाहता हूं। तुम्हें जो प्रकट दिखाई पड़ता हैवही दिखाई पड़ता हैजो अप्रकट हैजो अदृश्य है,वह दिखाई नहीं पड़ता। और जो आदमी प्रकट पर ही ठहर जाता हैदि अॅाबियसवह जो सामने दिखाई पड़ता हैउसी पर रुक जाता हैवह कभी सत्य की खोज नहीं कर सकता है। मैं तुमसे क्षमा चाहता हूंहमारे रास्ते अलग जाते हैं।
मुझे पता नहीं यह कहानी कहां तक सच हैमुझे यह भी पता नहीं कि उस नाव से डाकू हमला करते या न करतेमुझे यह भी पता नहीं कि वह राजकुमार बड़ा होकर आततायी होता या नहीं होतालेकिन यह कहानी मैंने किसी दूसरे ही अर्थ से कहनी चाही है। और वह यह है कि जिंदगी में एक तो प्रकट अर्थ होता है और एक अप्रकट अर्थ होता है। जीवन के समस्त तथ्यों के पीछे एक तो वह अर्थ होता हैजो ऊपर से दिखाई पड़ता हैऔर एक वह अर्थ होता हैजो अदृश्य होता है। जो ऊपर के ही अर्थ को देखते हैंवे धार्मिक नहीं हैंजो भीतर के अदृश्य अर्थ को देख पाते हैंवे धार्मिक हैं।
इससे इसलिए शुरू करना चाहता हूं कि महावीर का एक जीवन तो वह हैजो किताबों में लिखा हुआ हैशास्त्रों में लिखा हुआ है,महावीर के पूजने वाले जिसको मानते हैंऔर एक महावीर का जीवन वह हैजो प्रकट नहीं है, जो अदृश्य हैऔर जिसे देखने के लिए बहुत धैर्य की और संयम की आंखें चाहिए। किताबों में उसे नहीं लिखा जा सकताजो अप्रकट हैशब्दों में उसे नहीं बांधा जा सकताजो अदृश्य है। उसके तो संकेत और इशारे हो सकते हैं।
लेकिन लोग संकेत को पकड़ लेते हैंइशारे को पकड़ लेते हैंऔर पीछे जो अप्रकट हैउसे छोड़ देते हैंसारी दुनिया में सारे महापुरुषों के साथ यह अन्याय हुआ हैवह महावीर के साथ भी हुआ है।
अभी एक भाई ने प्रार्थना की कि उनके जीवन पर मैं कुछ कहूं।
किस चीज को जीवन समझते हैं आप महावीर का?किस घर में पैदा हुएइस बात को?तो पागल हैं आप। किस बाप के बेटे थे,इस बात को?तो पागल हैं आप। राजा के घर में पैदा हुएइस बात को?शादी की कि नहीं की?कि लड़की पैदा हुई कि नहीं हुई?कि कपड़े पहनते थे कि नहीं पहनते थे?कि कितनी उम्र तक जिंदा रहेकि किस सन में पैदा हुए और किस सन में मर गएइसको जिंदगी समझते हैं महावीर की?
तो आपमें संयम नहीं है और धैर्य नहीं है। महावीर को आप नहीं जान सकते। ये कोई भीमहावीर की जिंदगी का इन बातों से कोई संबंध नहीं। ये नॅान-एसेंशिअल हैंये बातें बिल्कुल ही सारहीन हैं। लेकिन इन्हीं बातों को जीवन समझा जाता है..न केवल महावीर काक्राइस्ट काराम काकृष्ण काकिसी का भीजो बिल्कुल व्यर्थ हैजिसका कोई भी मूल्य नहीं है कि कौन आदमी कहां पैदा होता हैकिस घर में पैदा होता हैराजा के घर में पैदा होता है कि दरिद्र के घर में पैदा होता हैकि क्षत्रिय के घर में पैदा होता है कि ब्राह्मण के घर में पैदा होता हैकि शूद्र के घर में पैदा होता है कि ऊंचे कुल में पैदा होता है..कहां पैदा होता है इसका कोई मूल्य नहीं हैयह शरीर की कथा हैइससे महावीर का कोई संबंध नहीं है। यह तो हर आदमी कहीं न कहीं पैदा होता है। कितने दिन जिंदा रहता हैकिस सन में पैदा होता है और किस सन में समाप्त हो जाता हैइसका भी कोई मूल्य नहीं।
मैं एक गांव में बोल रहा थाएक बड़ी नगरी में। एक व्यक्ति ने खड़े होकर पूछा कि मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। महावीर और बुद्ध समसामयिक थेकंटेंपरेरी थे। उन दोनों में किसकी उम्र ज्यादा थीदोनों में कौन बड़ा थाकौन उम्र में छोटा था?उन सज्जन ने कहा कि मैं तीन वर्ष से इस बात पर खोज-बीन कर रहा हूंलेकिन अभी तक निर्णय नहीं कर पाया हूं कि पहले कौन पैदा हुआ।
तो मैंने उनसे कहाकोई भी पहले पैदा हुआ होकिसी की उम्र कम और ज्यादा रही होवे तो गौण बातें हैं। लेकिन इस खोज में आपकी तीन साल की उम्र व्यर्थ हो गईयह निश्चित है। एक बात तय है कि आपने तीन साल की उम्र गंवा दी है। कोई भी..महावीर उम्र में ज्यादा रहे हों कि बुद्धइससे क्या फर्क पड़ता है?और कोई पहले पैदा हुआ हो कि पीछे पैदा हुआ होइससे क्या फर्क पड़ता है?इससे जिंदगी को समझने मेंइससे जीवन के अर्थ को खोज लेने में कौन सी बुनियादी बात प्रकट होती हैवे कभी पैदा भी न हुए हों तो कोई फर्क नहीं पड़ता। पैदा होना और न पैदा होना उतना महत्वपूर्ण नहीं है..महावीर की अंतर-दशामहावीर का अंतस-जीवनमहावीर की आत्मा क्या है?
लेकिन मैं देखता हूंजगह-जगह गुणगान हो रहे हैंपंडित कथाएं बता रहे हैं कि कब पैदा हुएकैसे पैदा हुएकितने हाथी-घोड़े थे उनके घरकितना धन थाकिस तरह त्याग कियाकितना धनकितनी कोटि धन बांट दियाबड़े महान त्यागी थेक्योंकि इतना धन छोड़ा। अगर इतना धन उनके पास न होता तो ये पंडित एक भी पूछने नहीं आतेक्योंकि छोड़ते क्याअगर गरीब के घर पैदा होते महावीर तो उनका तीर्थंकर बनना कठिन था इन सारे लोगों की आंखों मेंजो उनको तीर्थंकर माने हुए हैं।
आपको पता हैजैनों के चैबीस तीर्थंकर राजाओं के पुत्र हैंएक भी गरीब का बेटा नहींहिंदुओं के सब भगवान के अवतार राजाओं के पुत्र हैंएक भी गरीब का बेटा नहींबौद्धों के सब बुद्ध-अवतार राजाओं के पुत्र हैंएक भी गरीब का बेटा नहींहिंदुस्तान में आज तक एक गरीब के लड़के को ईश्वर होने का हक नहीं मिल सकाक्यों?क्या अमीर के घर में ही पैदा होता है ईश्वर?भगवान ने कोई ठेका ले रखा है अमीर के घर में पैदा होने का?
नहींयह बात नहीं है। भगवान तो हजार घरों में पैदा होता हैलेकिन हमारी अंधी आंखें केवल उस भगवान को पहचान पाती हैं,जो धन का त्याग करता है। धन से हम भगवान को नापते हैंगरीब भगवान हमें दिखाई नहीं पड़ सकता। हमारी नाप-जोख धन की है। हम कहते तो धर्म की बातें हैंऔर हम समझते भी यह हैं कि हम त्याग की प्रशंसा कर रहे हैं। झूठी है यह बात। महावीर की प्रशंसा करते वक्त जब कोई यह गिनती गिनाता है कि कितने सोने के रथकितना राज्यकितना धनकितने हीरे-माणिक उनके पास थेउनको ठुकरा करत्याग कर गएतो याद रखना उसकी आंखों में त्याग का कोई मूल्य नहीं हैवह जो संख्या गिना रहा है धन कीउसका मूल्य है। और चूंकि उस मूल्यवान धन को वे छोड़ कर चले गएइसलिए उनका भी मूल्य मालूम पड़ता है।
मैं जयपुर में था। एक मित्र ने मुझे आकर कहा कि एक बहुत बड़े मुनि हैं यहांआप उनके दर्शन नहीं करेंगे?मैंने कहावे बड़े मुनि हैंयह तुम्हें कैसे पता चला?इसके बांट-बटखरे कहां हैंइसके तौलने का तराजू कहां है कि कौन बड़ा मुनि है और कौन छोटा मुनि है?कौन मुनि है और कौन मुनि नहीं हैकैसे तुमने जाना?
उन्होंने कहायह भी कोई बात है पूछने कीखुद जयपुर-नरेश उनके चरण छूते हैं!
समझ गए आपमापदंड क्या है नापने काजयपुर-नरेश अगर पैर नहीं छूते हैं मुनि केमुनि छोटे हो गएतो मैंने कहाइसमें जयपुर-नरेश बड़े सिद्ध होते हैं कि मुनि बड़े सिद्ध होते हैं?कौन बड़ा सिद्ध होता हैइसमें जयपुर-नरेश बड़े सिद्ध होते हैंइसमें मुनि बड़े सिद्ध नहीं होते।
जब कोई गिनती बताता हैइतना धन छोड़ाइसलिए बड़े त्यागी हैंइसमें त्याग बड़ा सिद्ध नहीं होताधन बड़ा सिद्ध होता है;क्योंकि धन मापदंड हैधन क्राइटेरिअन है। इस सबकी कथा कि महावीर ने कितना धन छोड़ादो कौड़ी की है। जब महावीर को कोई मूल्य नहीं है उस धन कातो महावीर के जीवन को समझने में भी उस धन का कोई मूल्य नहीं रह जाता। जब महावीर को मूल्य नहीं है उस धन कातो महावीर की जिंदगी में उसकी गणना क्यों की जाती हैकौन कर रहा है यह गणनाये महावीर को समझने वाले लोग नहीं हैं।
महावीर कहते हैंआत्मा का न जन्म होतान मृत्यु होतीतो फिर महावीर के जीवन की कथा में जन्म और मृत्यु की बात बकवास है। क्योंकि महावीर कहते हैं जन्म भी गौणमृत्यु भी गौणआत्मा तो अमर हैजन्म और मृत्यु का कोई हिसाब रखने की जरूरत नहीं। जब महावीर यह कहते हैं तो महावीर की जीवन-चर्या की बात करने वाले लोग अगर महावीर के जन्म और मृत्यु की चर्चा करते होंतो दुश्मन हैं महावीर केअनुयायी नहीं हैं। समझे ही नहीं कि महावीर क्या कह रहे हैंक्या उनका जीवन है!
तो किस जीवन की बात पूछना चाहते हैं आपकुछ ऐसे ढंग से पूछी गई है बात कि उनके जीवन पर कहेंजैसे मैं कहीं किसी और चीज पर न कह दूं!
जीवन क्या हैजीवन कोई ऐसी चीज नहीं है कि आप घटनाओं में उसके आंकड़े बिठा लें; जीवन जो अॅाबियस हैजो दिखाई पड़ता हैप्रकटवह नहीं है। और महावीर का जीवन तो वह बिल्कुल नहीं है। वह व्यक्ति उतना ही महान हैजिस व्यक्ति के भीतर ऐसा जीवन हैजो बाहर से दिखाई पड़ना मुश्किल है।
लेकिन हमारी आंखें तो केवल बाहर से देखती हैं। और इस बाहर से देखने के कारण हमने सारे महापुरुषों के साथ जो अनाचार किया है..पूजा के नाम परप्रार्थना के नाम परअनुयायी होने के नाम पर हमने महापुरुषों की जो विकृत स्थिति पैदा कर दी है,किसी दिन उसका हिसाब लगेगा तो हम परमात्मा की अदालत में कैसे अपराधी सिद्ध होंगेइसका हिसाब लगाना बहुत मुश्किल है। हमारा क्या निर्णय होगाकहना कठिन है।
हमारे देखने के ढंगहमारी पहचानने की आंख इतनी बेमानी है कि हम जिन चीजों को आंकते और पहचानते हैंउनका कोई मूल्य नहीं रह जाता। हम कुछ व्यर्थ को खोजने में इतने सफल हैं..जैसेथोड़ा समझें तो हमें दिखाई पड़े कि बाहरी जीवन क्या है और अंतस-जीवन क्या हैऔर महावीर के अंतस-जीवन में थोड़ी झांकी मिल जाएतो हमारे खुद के अंतस-जीवन में भी झांकी मिलने के लिए कुछ रास्ता सिद्ध और साफ हो सकता है।
मुझे कोई प्रयोजन नहीं इस बात से कि महावीर की प्रशंसा में कुछ बातें कही जाएं कि न कही जाएंमहावीर की प्रशंसा में कहने से महावीर को तो जरा भी चिंता नहीं थी। जब वे जीवित थेतब चिंता नहीं थीअब तो चिंता का कोई कारण नहीं है। लेकिन उनके पीछे चलने वाले जो लोग हैंउनको बड़ा आनंद आता है कि कोई महावीर स्वामीभगवान महावीरउनकी प्रशंसा में कुछ बातें कहे!क्योंउनको क्यों मजा आता है?
महावीर को तो कोई मजा नहीं आता। महावीर तो प्रशंसा के भूखे नहीं हैंआदर के भूखे नहीं हैं। महावीर को तो यश की कोई कामना नहीं है। महावीर को तो पता भी नहीं है कि कौन उनके बाबत क्या सोचता है और क्या कहता हैऔर न इसका वे कोई मूल्य मानते हैं। लेकिन महावीर के पीछे चलने वाले के मन को क्यों गुदगुदी छूटती हैक्यों ऐसा अच्छा लगता है कि कोई महावीर की प्रशंसा करे?बात क्या है?
बीमारी अनुयायी के भीतर होगीमहावीर में तो बीमारी का कोई पता नहीं चलता। बीमारी यह है कि जब जोर से अनुयायी चिल्लाता हैबोल महावीर स्वामी की जयतो वह महावीर स्वामी की जय नहीं बोल रहा हैवह अपनी जय बोल रहा है। मेरे भगवान जो हैंवे बहुत बड़े भगवान हैंउनकी आड़ में मैं भी बड़ा हो जाता हूं। अन्यथा मुझे उनसे क्या लेना-देना?भगवान से मुझे क्या प्रयोजन?उनकी जय से मुझे क्या प्रयोजन?
और जय बोलने से किसी की जय सिद्ध होती हैमेरे जीवन से जय बोली जानी चाहिए कि मेरा जीवन प्रकट बनेमेरे भीतर वह प्रकट होजिसको मैं आदर दे रहा हूंजो उसके भीतर प्रकट हुआ है। जिस फूल की सुगंध की मैं बातें कर रहा हूंमेरी जिंदगी में भी वह सुगंध होतो जय निकलती है। और नहीं तो थोथे जय-जयकार से पृथ्वी में बहुत शोरगुल मच चुकाउससे कोई परिणाम नहीं होता।
जीसस क्राइस्ट के मानने वाले चिल्लाते रहते हैंजय हो जीसस क्राइस्ट की। राम के मानने वाले राम का जय-जयकार करते हैं,महावीर के मानने वाले महावीर का जय-जयकार करते हैं। और जय-जयकार में एक-दूसरे को हरा दें इसकी कोशिश करते हैंकि हमारा जय-जयकार दूसरे के शोरगुल से बड़ा हो जाए।
इससे अगर महावीर और कृष्ण और क्राइस्ट अगर कहीं भी होंगेतो कान पर हाथ रख लेते होंगे कि ये पागल बड़ा शोरगुल मचाते हैंशांति से बैठने नहीं देते। काहे के लिए चिल्ला रहे हैं?किसके लिए चिल्ला रहे हैं?यह क्यों इतनी उत्सुकता और आतुरता क्यों है कि कोई प्रशंसा करे?क्यों यह प्रशंसा में हम अपना रसअपने अहंकार की तृप्ति देखना चाहते हैं?
जब कोई कहता हैराम बहुत बड़े हैंतो राम का मानने वाला भी बड़ा हो जाता है आड़ मेंओट में कि मैं कोई छोटे का मानने वाला नहीं हूंबहुत बड़े का मानने वाला हूं। जब कोई कहता हैजीसस क्राइस्ट ईश्वर के पुत्र हैंतो जीसस क्राइस्ट का मानने वाला बड़ा हो जाता हैकि हो गए फीके रामकृष्णमहावीरबुद्ध, सब। जीसस क्राइस्ट ईश्वर के पुत्र हैं और मैं उनका मानने वाला हूं। जब महावीर की प्रशंसा होती है तो महावीर का मानने वाला सिर हिलाने लगता है कि बड़ी अच्छी बातें कही जा रही हैं!
कुछ अच्छी बातें नहीं कही जा रही हैंआपके अहंकार को गुदगुदाया जा रहा हैआपको मजा आ रहा हैआप बड़े होते मालूम हो रहे हैं। लेकिन ध्यान रहेधर्म अहंकार का शत्रु है। और महावीर की तो सारी की सारी साधना अहंकार को मिटा देने की साधना है। तो ये कुछ महावीर की जयंती पर करने वाली बातें नहीं हैं। इसको सोचना जरूरी हैविचारना जरूरी है। हमारे मोटिव्स क्या हैं?हमारी अंतस-इच्छा क्या है जो हम जय-जयकार बोलते हैंया प्रशंसा के लिए आतुर हो उठते हैं कि कोई प्रशंसा करे?क्यों?
लेकिन इन्हीं गलत हमारी इच्छाओं ने हमारे सारे महापुरुषों के अदभुत जीवन को एकदम विकृत कर दिया। हमारे देखने के ढंग,हमारे सोचने के ढंग हम जैसे बंद हैंहमारे जैसे संकीर्ण हैं। और हमारी संकीर्ण वृत्ति और बुद्धि के कारणजिस महापुरुष को हम देखने जाते हैं अपनी संकीर्ण खिड़की सेउसकी तस्वीर भी छोटी हो जाती हो तो आश्चर्य नहीं है।
जैनी मिल-जुल कर महावीर को छोटा करते हैं। ईसाई मिल कर जीसस को छोटा करते हैं। हिंदू मिल कर राम को छोटा करते हैं। मुसलमान मिल कर मोहम्मद को छोटा करते हैं। ये लोग इतने बड़े थे कि इस सारी पृथ्वी के हो सकते थे। लेकिन इनके अनुयायियों ने घेरे बना लिए और इनको छोटा कर दिया। ये थोड़े से लोगों की संपदा हो गए हैंतीस लाख मुश्किल से जैन होंगे हिंदुस्तान में;महावीर तीस लाख जैनियों की संपदा हो गएऔर वे इतने जोर से शोरगुल मचाते हैं कि दूसरा आदमी शंकित हो जाता है कि ये इनके भगवान हैंये इनके आदमी हैंहमें क्या लेना-देनामहावीर से वंचित हो जाती है सारी मनुष्यता।
इसी भांति सारे महापुरुषों से सारी मनुष्यता वंचित हो गई। जो सब की संपदा होने चाहिएवे कुछ लोगों की संपदा हो गए हैं और वे कुछ लोग बड़ी अकड़ से चिल्लाते हैंवह अकड़ उनकी अपनी हैउसका महावीर से क्या लेना-देनाइसलिए मैं उनकी प्रशंसा में कुछ नहीं कहूंगाक्योंकि आपकी प्रशंसा में कहने की कोई भी जरूरत नहींकोई भी हित नहींकोई भी फायदा नहीं। मैं तो कुछ बात जरूर कहना चाहूंगाजिसमें आपकी प्रशंसा न होबल्कि महावीर की अंतस-चेतना को समझें तो आप सेल्फ-कंडेम्ड हो जाएं,आपको अपनी निंदा मालूम पड़े। क्योंकि जब किसी महापुरुष के पास किसी व्यक्ति को आत्म-निंदा अनुभव होती हैतो उस व्यक्ति के जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है।
महापुरुष की प्रशंसा में अपनी प्रशंसा से तो कोई क्रांति शुरू नहीं होतीहम और जड़ हो जाते हैं। लेकिन महापुरुष के सान्निध्य मेंउसके स्मरण मेंउसके चित्र के सामने अगर हमारा चित्र बिल्कुल छोटादयनीयदीन-हीन दिखाई पड़ने लगेऐसा प्रतीत हो कि मैं तो कुछ भी नहीं हूं और मनुष्य इतना बड़ा भी हो सकता हैअगर एक मनुष्य के भीतर इतनी महानता घट सकती है तो मैं बैठा-बैठा कहां जीवन गंवा रहा हूंमेरे भीतर भी तो यह घटना घट सकती थी। महावीर एक-एक व्यक्ति के भीतर भी तो पैदा हो सकते हैं।
एक बीज वृक्ष बन सकता हैतो हर बीज के लिए चुनौती हो गई कि वह वृक्ष बन कर दिखा दे। और अगर कोई बीज वृक्ष नहीं बन सकतातो वृक्ष के सामने खड़ा होकर अपनी आत्म-निंदा अनुभव करे। अनुभव करे इस बात को कि मैं व्यर्थ खो रहा हूंमैं भी वृक्ष हो सकता था और मेरे नीचे भी हजारों लोगों को छाया मिल सकती थीमैं भी एक फलों से लदी हुई छाया काविश्राम का स्थल बन सकता थालेकिन मैं नहीं बन सका हूं।
क्या महावीर के निकट पहुंच कर आपको ऐसा लगता है कि जो महावीर के भीतर हो सकावह आपके भीतर नहीं हो पा रहा है?क्या आपको आत्म-ग्लानि अनुभव होती है?अगर होती है तो महावीर के जीवन से कुछमहावीर की साधना सेमहावीर की अंतस-चेतना से आपको कुछ किरणें मिल सकती हैं जो मार्गदर्शक हो जाएं। लेकिन नहींइसकी हमें फुर्सत कहां हैहम जय-जयकार में,महावीर के जय-जयकार में अपनी आत्म-ग्लानि को छिपा लेते हैंभुला देते हैंभूल जाते हैं कि यह प्रश्न आत्म-चिंतन का थायह महावीर के समक्ष स्वयं को रख कर रिलेटिवसापेक्ष रूप से सोचने का था कि मैं कहां और यह व्यक्ति कहां!
लेकिन नहींहम बहुत होशियार हैंआदमी की जात बहुत चालाक है। वह इतनी होशियारी से काम करती है कि बजाए इसके कि महापुरुष कोमहावीर कोया किसी और को सामने रख कर अपने और उनके बीच तुलना कर सकेयह नहींअपने को तो भुला देती है उनकी प्रशंसा मेंजय-जयकार मेंऔर फिर उन पर वे गुण आरोपित कर लेती हैजो उनके गुण नहीं होतेबल्कि हमारे भीतर के कुछ कारण होते हैं।
जैसेजो आदमी भोजन करने का अति लोभी होगाजो आदमी भोजन में बहुत लोलुप होगाग्रीडी होगावह आदमी हमेशा उपवास करने वाले आदमी का आदर करेगा। जब कोई आदमी उपवास करने वाले व्यक्ति का आदर करता हो तो समझ लेना कि यह उपवास करने वाले व्यक्ति के आदर का इससे बहुत संबंध नहीं हैइससे बहुत संबंध उस आदमी का हैजो भोजन करने में बहुत लोभी और लालची है। उसके भोजन करने की जो अति वासना हैउसके कारण उपवासी आदमी उसको आदरणीय मालूम पड़ता है।
जो आदमी बहुत कामुक हैकामी हैउस आदमी को ब्रह्मचारी का जीवन बहुत आदृत मालूम पड़ेगाजो आदमी हिंसक हैजो आदमी अत्यंत दुष्ट और क्रूर और कठोर हैउस आदमी को अहिंसक का जीवन बहुत प्रभावित करता हुआ मालूम पड़ेगायह बड़ी अजीब बात है। यह बहुत अजीब बात है। जो आदमी धन का बहुत पागल लोभी हैउसको त्यागी का जीवन बहुत प्रभावित करता हुआ मालूम पड़ेगालेकिन यह मनोवैज्ञानिक है। इसके पीछे कारण हैं। जो हम नहीं कर सकतेजब कोई उसे करता हैतो हम चकित हो जाते हैं। जो मैं नहीं कर सकताजब कोई और करता हैतो मैं चकित हो जाऊंयह स्वाभाविक है।
महावीर से जो लोग चकित हो गए हैंवे महावीर से ठीक विपरीत लोग हैं। बुद्ध से जो आदमी चकित हो गया हैवह बुद्ध से ठीक विपरीत आदमी है। क्राइस्ट से जो आदमी प्रभावित हो गया हैवह क्राइस्ट से ठीक विपरीत आदमी है। इसीलिए तो महापुरुष एक तरफअनुयायी बिल्कुल उलटे..बिल्कुल उलटे सिद्ध होते हैं।
थोड़ा सोचें। महावीर तो कहते हैं अपरिग्रहमहावीर तो सारा स्वामित्व छोड़ देते हैं। नहीं मानते कि मेरा कोई धन है। लेकिन महावीर के अनुयायियों ने भारत में जितना धन इकट्ठा कियाकिसी और ने इकट्ठा कियायह तो अजीब बात है! लेकिन यह अजीब नहीं हैबहुत साइकोलाजिकल है। बहुत कुछ कारण हैं इसके पीछे। इसके पीछे महावीर की कोई भूल नहीं है। महावीर के सर्व-धन-त्याग के कारणजितने लोग धन के प्रति अति लोभी थेवे सब महावीर के प्रति आकर्षित हो गए। वे जो नहीं कर सकते थे,महावीर वही कर रहे हैं।
जीसस क्राइस्ट कहते हैंप्रेम। सबको प्रेम। शत्रु को भी प्रेम। जो तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारेदूसरा गाल भी उसके सामने कर देना। और जो तुम्हारा कोट छीनेउसको कमीज भी दे देनाकहीं उसे कमीज की भी जरूरत न हो। जो आदमी तुम्हें एक मील तक कहे मेरा बोझा ढोकर ले चलोदो मील तक ढोकर ले जाना। जीसस क्राइस्ट तो यह कहते हैं। लेकिन क्रिश्चियंस ने जितने जनता के गालों पर चांटे मारे हैंऔर आदमियत के साथ जितनी हत्या और हिंसा कीधर्म के नाम पर जितने युद्ध लड़ेजितने निहत्थे लोगों को समाप्त कियाजितने लोगों को आग में जलाया..लाखों की संख्या मेंबड़ी हैरानी की बात है।
जीसस क्राइस्ट कहते हैं कि एक गाल पर मारे कोई चांटा तो दूसरा कर देनाशत्रु को भी प्रेम करना। और अनुयायीअनुयायी सिवाय हत्या करने के दूसरा काम नहीं करतेबात क्या हैयह प्रेम के संदेश देने वाले के आस-पास वे लोग इकट्ठे हो गएजिनके जीवन में प्रेम बिल्कुल नहीं था। वे आकर्षित हो गए। जो वे नहीं कर सकते थेउस चीज के प्रति चकित हो गए। यह बहुत अदभुत बात हैयह बहुत कंट्राडिक्टरी बात है। लेकिन सारी दुनिया में यह हुआ।
अगर महापुरुष का जीवन आप देखें और उसके आस-पास अनुयायी देखेंतो आप ठीक उलटे अनुयायी उसके आस-पास इकट्ठे पाएंगे। और ये उलटे अनुयायी उस महापुरुष में उन्हीं बातों की प्रशंसा करेंगेजिन बातों की उनमें कमी है। उस प्रशंसा को बड़ी करते जाएंगेबड़ी करते जाएंगे। आखिर वहां पहुंचा देंगेएक्सट्रीम पर पहुंचा देंगेमहापुरुष झूठा मालूम पड़ने लगेगा उस सीमा तक बातों को खींच कर ले जाएंगेइसमें महापुरुष का कसूर नहीं हैइसमें अनुयायी...। और अनुयायी अपनी कमियों को सब्स्टीट्यूट कर रहा है,पूर्ण कर रहा हैमहापुरुष से अपने भीतर जोड़ रहा है। थोड़ा सोचें तो दिखाई पड़ेगा।
हिंदुस्तान में महावीर कीबुद्ध की शिक्षा त्याग की शिक्षा हैअपदार्थ की शिक्षा है..भौतिकता से मोह छोड़ना हैपदार्थ से ऊपर उठना हैमैटीरियलिज्म से ऊपर उठना है। लेकिन अनुयायी जितने मैटीरियलिस्ट हैंदेख कर हैरानी होती है। जितने पदार्थ को जोर से पकड़े हुए हैंदेख कर हैरानी होती है। उन्होंने महावीर के मंदिर भी बनाए हैं तो सोने की मूर्तियां बना दी हैंउस महावीर कीजो बेचारा जीवन भर कह रहा है कि सोना मिट्टी है। उन्होंने महावीर पर धन की तिजोरियां इकट्ठी कर दी हैं। उस महावीर परजो कह रहा है धन राख हैधन छोड़ दोधन का कोई मूल्य नहीं। महावीर के उस मंदिर परजो महावीर हाथ में एक लकड़ी भी नहीं रखता,जो कहता है कि हाथ में लकड़ी भी रखनी हिंसक होने का सबूत हैसंभावित शत्रु की तैयारी हैहाथ में लकड़ी रखनी कायरता का सबूत हैक्योंकि जो भयभीत हैवह शस्त्र रखता है..जो महावीर हाथ में लकड़ी भी नहीं रखताउसके मंदिर के सामने बंदूकधारी पहरेदार खड़ा हुआ हैआश्चर्य की बातें हैंमिरेकल हैचमत्कार हैयह क्या हो रहा हैऔर यही लोग महावीर की प्रशंसा कर रहे हैं,गुणगान कर रहे हैंतो हो गई महावीर की जिंदगी ठीक। ये जो जिंदगी खड़ी करेंगेवह जिंदगी झूठी होगीफाल्स होगीबिल्कुल झूठ होगीक्योंकि इनके द्वारा खड़ी होगी।
दुनिया भर के महापुरुषों के साथ ऐसा हुआ। एक के साथ हुआ होताऐसी बात नहीं। इसलिए कोई यह न सोचे कि महावीर के साथ जो हुआ हैवह दूसरों के साथ नहीं हुआवह सबके साथ हुआ है। जो मैं महावीर के लिए कह रहा हूंवह केवल प्रतीक है। वह सबके साथ हुआ है।
तो हम जो जिंदगी खड़ी कर लेते हैंवह हमारी देखी गई जिंदगी हैमहावीर की जिंदगी नहीं है। महावीर को जैसा हम देखते हैं!हम कैसा देखते हैंहम उसी शक्ल में देखते हैंजिसकी हमारे भीतर कमी है। हम देखते हैं कि मैं तो स्त्री को छोड़ कर नहीं जा सकतामहावीर स्त्री को छोड़ कर जा रहे हैंमैं धन नहीं छोड़ सकतामहावीर धन छोड़ रहे हैंमैं मकान नहीं छोड़ सकतामहावीर मकान छोड़ रहे हैंमैं भूखा नहीं रह सकतामहावीर उपवास कर रहे हैंहम एकदम चकित हो जाते हैं और हम कहते हैंधन्य है भगवानतुम बड़े तपस्वी हो। तुम दुख को अंगीकार कर लेते हो। तुम सुख के त्यागी हो। तुम दुख को वरण करते हो। तुम तपस्वी होतुम तपश्चर्या में जाते होहम भोगी हैंहम दीन-हीन हैंहम पापी हैंतुम पुण्यात्मा हो।
लेकिन चीज बदल गई हमारे देखने से। महावीर न तो त्यागी हैंन तपस्वी हैंन धन को छोड़ रहे हैंन कुछ और छोड़ रहे हैं। महावीर के भीतर कुछ और घटित हो रहा हैउस और घटित को हम इस भांति देख रहे हैंयह हमारा एटिट्यूड हैयह महावीर के जीवन की घटना नहीं। महावीर त्यागी नहीं हैंमहावीर ज्ञानी हैं।
इसको थोड़ा समझ लेंतो उनकी जिंदगी के भीतर घुसना आसान हो जाएगा। ऐसे तीन सूत्रों पर मैं आपसे बात करना चाहूंगा,जो उनके अंतस-जीवन में प्रवेश करवा दें।
महावीर त्यागी नहींज्ञानी हैं। लेकिन हम कहते हैंमहावीर त्यागी हैं। और हम जय-जयकार करते हैं कि महावीर जैसा त्यागी नहीं हुआशायद आपको पता ही नहीं हैत्याग सिर्फ अज्ञानी करते हैंज्ञानी कभी त्याग नहीं करता। क्यों ऐसा मैं कह रहा हूं?घबड़ाहट होगी आपकोबेचैनी होगीमैं क्यों ऐसा कह रहा हूंमैं इसलिए ऐसा कह रहा हूं कि ज्ञानी को तो व्यर्थ दिखाई पड़ जाता है संसार। जो व्यर्थ हैउसे छोड़ना नहीं पड़तावह छूट जाता है। अज्ञानी को छोड़ना पड़ता हैउसे व्यर्थ दिखाई नहीं पड़तावह कोशिश कर-करके छोड़ता है।
महावीर छोड़ते नहींछूट जाता है।
ज्ञान में त्याग अपने आप आ जाता है छाया की तरहअज्ञान में त्याग लाना पड़ता है। अज्ञान के जीवन में त्याग है झाड़ से कच्चे पत्ते तोड़ने जैसाजबरदस्ती पत्ते तोड़े जाते हैं। पत्ता पीड़ित होता हैशाखा पीड़ित होती हैघाव छूट जाता है पीछेवृक्ष के प्राण पर चोट लगती है। और त्याग ज्ञानी का..छूटने वालाछोड़ने वाला नहीं..वह सूखे पत्ते की भांति वृक्ष से गिर जाता हैन वृक्ष को खबर लगती कि कब पत्ता गिर गयान पत्ते को पता चलता कि कहीं से टूट गया हूंन कहीं दुनिया में कोई खबर आतीचुपचापमौन,कोई हवा का एक झोंका और पत्ता चुपचाप नीचे बैठ जाता है।
महावीर ज्ञानी हैंलेकिन हमें त्यागी दिखाई पड़ते हैंक्योंकि हम भोगी हैं। वह जो हमारा भोग हैउस भोग के कारण हमें त्याग दिखाई पड़ता हैमहावीर का ज्ञान दिखाई नहीं पड़ता। महावीर छोड़ नहीं रहे हैंमहावीर को चीजें व्यर्थ दिखाई पड़ गईं। और जब व्यर्थ दिखाई पड़ जाती हैउसको छोड़ना पड़ता है?
एक रात एक जंगल से दो संन्यासी निकल रहे हैं। एक वृद्ध संन्यासी हैयुवा संन्यासी उसके साथ पीछे है। वृद्ध एक झोला लटकाए हुए है कंधे सेछाती से दबा कर पकड़े हुए है झोले को। रात पड़ने लगीअंधेरा उतरने लगा। तो उसने पूछा युवा संन्यासी सेकोई भय तो नहीं हैजंगल खतरनाक मालूम होता हैरास्ता बीहड़ मालूम होता है। कोई खतरा तो नहीं है?
युवा संन्यासी बहुत हैरान हुआक्योंकि संन्यासी को खतरा कैसाखतरा होता है उनकोजो संन्यासी नहीं हैं। संन्यासी को खतरा कैसासंन्यासी को भय कैसासंन्यासी के पास क्या हैजिसे कोई छीन लेगासंन्यासी के पास क्या हैजिसे कोई मिटा देगा!संन्यासी के पास क्या हैजिसके लिए वह चिंतित होअसुरक्षित अनुभव करेवह कुछ चिंतित हुआहैरान हुआ। फिर आज तक यह बूढ़ा संन्यासी कभी नहीं पूछाबड़े घने जंगलों में से निकलना पड़ाअंधेरी रातों में रुकना पड़ाबीहड़ रास्ते थेनिर्जन मार्ग थेइसने कभी नहीं पूछा कि खतरा तो नहीं है कोईआज क्या हो गया?
थोड़ी दूर औरफिर उस वृद्ध संन्यासी ने पूछा कि रात बढ़ती जाती हैगांव पता नहीं कितनी दूर हैदीए भी दिखाई नहीं पड़ते..कोई खतरा तो नहीं है?
फिर वे एक कुएं पर रुके। और वृद्ध संन्यासी ने झोला दिया युवा संन्यासी को और कहामैं हाथ-मुंह धो लूंझोला संभाल कर रखनातब युवा संन्यासी को लगा कि खतरा जरूर झोले के भीतर होना चाहिए। उसने झोले के भीतर हाथ डाला..बूढ़ा तो पानी खींचने लगा कुएं से..उसने झोले के भीतर हाथ डाला तो देखा सोने की एक ईंट है। समझ गया खतरा कहां है। उसने वह ईंट निकाल कर बाहर फेंक दीएक पत्थर की ईंट उठा कर झोले के भीतर रख दी। बूढ़े संन्यासी ने जल्दी से पानी-वानी पीयाजल्दी से आकर झोला लिया..ठीक से पानी भी नहीं पी पाया बेचारा!
कब कौन पी पाता है जिनके पास सोने की ईंटें होती हैं?कोई पी पाता है पानी ठीक सेऔर अगर किसी को ठीक से पानी पीते देख लेंतो वे कहेंगेमहान अदभुत आदमी हैयह बड़ा महापुरुष हैशांति से पानी पी रहा हैशांति से खाना खा रहा हैशांति से सो रहा हैये साधारण सी बातें महापुरुष जैसी मालूम होने लगती हैं जो कि हर एक आदमी में होनी चाहिएक्योंकि हम बिल्कुल विक्षिप्त और पागल हैं। उस पागलपन की वजह से थोड़ी सी भी शांति बहुत मालूम होती है।
उसने जल्दी से झोला लियाकंधे पर टांग लियाफिर छाती से लगा लियाफिर चलने लगा। उस बेचारे को पता भी नहीं है कि अब वह जो छाती से लगाए हुए हैवह पत्थर की एक ईंट हैकिसको पता है कि आप जिसको छाती से लगाए हुए हैंवह सोने की है या पत्थर की हैजो जानते हैंवे कहते हैं पत्थर कीजो नहीं जानते हैंवे कहते हैं सोने की।
फिर वह आगे बढ़ गया। फिर पूछने लगा। रात और बढ़ गई हैखतरा और बढ़ गया। उसने पूछा कि कोई खतरा तो नहीं है?उस युवा ने कहाआप बेफिकर हो जाएंखतरे को मैं पीछे फेंक आया हूं। वह तो घबड़ा गया। जल्दी से झोले में हाथ डालाईंट निकालीपत्थर की ईंट थीएक क्षण तो सन्नाटा हो गया उस जंगल में। फिर वह वृद्ध हंसने लगा। ईंट निकाल कर उसने बाहर फेंक दी। फिर कहने लगाअब यहीं सो जाएंअब गांव तक जाने की क्या जरूरतफिर वे वहीं सो गए। फिर सुबह जब वे उठे तो उस युवा ने पूछाआप महान त्यागी हैंआपने ईंट निकाल कर झोले से बिल्कुल बाहर फेंक दीआपने महान त्याग कियावह बूढ़ा कहने लगात्याग कहां पागलजब ईंट दिखाई पड़ गई कि पत्थर हैतो त्याग क्याछूट गईव्यर्थ हो गई। त्याग तो उसका करना होता हैजो स्वर्ण की मालूम पड़ती है।
महावीर ने जो छोड़ा हैवह मिट्टी दिखाई पड़ने लगा है। उसका कोई त्याग नहीं किया गया है..छूट गयाजैसे मिट्टी छूट जाती है। लेकिन भक्तगण चिल्ला रहे हैं कि हे महात्यागीहे दीर्घ तपस्वीहे महापुरुषतुम धन्य होतुमने कितना-कितना छोड़ाऔर महावीर हंसते होंगे कि यह क्या पागलपन हैमैंने कुछ छोड़ा नहींऔर ढाई हजार साल से ये चिल्ला रहे हैं कि हे महान तपस्वीहे त्यागीहे महापुरुषतुमने कितना छोड़ा!
यह भोगियों की वृत्ति हैयह महावीर का जीवन नहीं। महावीर का अंतस-जीवन ज्ञान का हैलेकिन बाहर से जो जीवन हमें दिखाई पड़ता हैवह त्याग का दिखाई पड़ता है। और त्याग और ज्ञान में जमीन-आसमान का भेद है। और इसका परिणाम क्या होता है!
इसका परिणाम केवल महावीर की जिंदगी गलत हम लिखते तो क्या हर्जा थालिख लेते गलत। खतरा यह होता है कि गलत जिंदगी का अनुकरण करने वाले लोग पैदा हो जाते हैं। वे त्याग करना शुरू कर देते हैं और जिंदगी उनकी नष्ट हो जाती है।
जिंदगी का आधार है ज्ञानऔर ज्ञान से जो त्याग आ जाएवह है सहज फल। लेकिन इस गलत कथा और जीवन के नाम पर पढ़ने वाले त्याग शुरू कर देते हैंऔर त्याग से जो शुरू करता हैवह ज्ञान पर तो कभी पहुंचता नहींजीवन भर दुख में और पीड़ा में जीता हैक्योंकि सोने की ईंट छोड़ता है। सोच सकते हैं आपसोने की ईंटसम्हालना भी खतरा हैदुख हैपीड़ा हैऔर छोड़ना भी दुख और पीड़ा हैक्योंकि सोना दिखाई पड़ता रहता है। सोना छोड़ दिया मैंने..कहीं भूल तो नहीं हो गईकहीं हैरानी तो नहीं हो गई।
मुझे संन्यासी मिलते हैं। सबके सामने तो आत्मा-परमात्मा की बात करते हैंऔर जब एकांत में मिलते हैंतो कहते हैंबड़ा भय मालूम होता हैबड़ी शंका मालूम होती है..कहीं हमने सब छोड़ कर गलती तो नहीं कर लीहम बिल्कुल अंधेरे में जा रहे हैं। पता नहींकहीं ऐसा न हो कि जो भोग रहे हैंवे ही ठीक हैं।
एकांत में उनके मन में यह संदेहयह डाउट खड़ा रहता है हमेशा कि हम छोड़ आए हैंसारा जगत भोग रहा हैहम छोड़ आए हैं। कहीं हमने भूल तो नहीं कर लीहम तो बिल्कुल अंधेरे रास्ते पर चल रहे हैं। हाथ की रोटी छोड़ रहे हैंमोक्ष की रोटी का विचार कर रहे हैंपता होन हो!
लेकिन महावीर को ऐसी शंका नहीं है उनके प्राणों में। वे किसी रोटी के लिए नहीं छोड़ रहे हैं। वे किसी चीज को इसलिए नहीं छोड़ रहे हैं कि कुछ मिल जाएगा। वे किसी चीज को इसलिए छोड़ रहे हैं कि कुछ मिल गया है।
इस फर्क को ठीक से समझ लेना।
एक आदमी छोड़ता है कोई चीज..अपने हाथ के पत्थर छोड़ देता है इस आशा में कि कल हीरे मिलेंगे तो हाथ भर लूंगा। इसकी पीड़ा आप नहीं समझ सकते। हीरे अभी मिले नहीं हैं और जो पास में था..रंगीन पत्थर सहीअभी हीरे मालूम होते थेलेकिन लोग कहते थे रंगीन पत्थर हैंशास्त्र कहते थे रंगीन पत्थर हैंगुरु-संन्यासी समझाते थे कि रंगीन पत्थर हैंछोड़ दो..समझ-बूझ करलोगों की बात सुन कर इसने छोड़ दिए रंगीन पत्थरजो इसको हीरे मालूम होते थेइस आशा में कि हीरे मिलेंगे। और अभी हीरे मिले नहींहाथ खाली हो गए हैंप्राण छटपटा रहे हैं। खाली हाथ में प्राण बहुत छटपटाते हैंपत्थर भी रखे रहें तो भी राहत मिलती है..कुछ तो हैपास कुछ तो है।
महावीर ने कुछ पाने के लिए नहीं छोड़ा। महावीर की हालत उस आदमी की हालत हैजिसके सामने हीरों की खदान आ गई है और अब पत्थर इसलिए छोड़ रहा है कि अब पत्थर रखने का कोई प्रयोजन नहीं रह गया हैअब हीरे रखने का मौका सामने आ गया है। हीरे मिल गए हैंइसलिए पत्थर छोड़े जा रहे हैं। जिस आदमी को हीरे मिल जाएंअगर वह घर में से पत्थर निकाल कर बाहर फेंक दे और हीरों से कोठरी भर लेआप उसको त्यागी कहेंगेकहेंगे त्यागी उसको?
मेरे घर में बहुत कबाड़ भरा हैफर्नीचर हैफलां हैढिकां हैसब इकट्ठा है। कल मुझे हीरे की एक खदान मिल जाए। सब फर्नीचर-वर्नीचरकबाड़सब बाहर निकाल दूंगाहीरे भर लूंगाआप सब मिल कर मुझे महा-तपस्वी कहेंगेकि ये महान तपस्वी हैं,इन्होंने घर का कूड़ा-कचरा सब बाहर त्याग कर दियाकोई मुझे महा-तपस्वी नहीं कहेगा।
महावीर को भी महा-तपस्वी मत कहिएमहा-ज्ञानी कहिए। ज्ञान से तपस्वी हैं।
ज्ञान से त्याग फलित होता है। ज्ञान का त्याग सहज फल हैलेकिन त्याग से ज्ञान कभी नहीं मिलता। ज्ञान से त्याग मिल जाता हैलेकिन त्याग से ज्ञान कभी नहीं मिलता।
पच्चीस सौ साल से महावीर के पीछे चलने वाला इसी मुसीबत में उलझा हैवह त्याग करके ज्ञान पाने की कोशिश कर रहा है!और महावीर के जीवन में जो घटना घटी हैवह ज्ञान से त्याग की है। ये बिल्कुल रिवर्सबिल्कुल उलटी वैल्यूज पकड़ जाती हैंऔर तब सारी की सारी दृष्टि भ्रांत हो जाती है। फिर हमारे हाथ में एक ही गुणगान रह जाता है करने को। जब हम त्याग भी करते हैं और आनंद नहीं मिलताज्ञान नहीं मिलतातो हम सोचते हैं पिछले जन्मों का कोई कर्म बाधा दे रहा हैया हमारा त्याग पूरा नहीं हैया हमारे मन में वासना शेष रह गई है। और फिर यह कोई एक-दो दिन का काम तो नहीं हैयह तो जिंदगी-जिंदगी लगती हैं,अनेक जन्म लगते हैंतब कहीं यह हो पाएगा। यह कोई छोटी बात थोड़े ही हैफिर हम ऐसा कंसोलेशनऐसी बातें ढूंढ-ढूंढ कर मन को समझाते हैंसांत्वना देते हैं। लेकिन ये सांत्वनाएं खतरनाक हैं। सचाई उलटी है। ज्ञान को खोजिएज्ञान मिल सकता हैक्योंकि ज्ञान आपके प्राणों में छिपा हुआ दीया हैजिसे कहीं लेने नहीं जाना।
महावीर का यही अनुभवमहावीर का यही केंद्रीय अनुभव है कि ज्ञान मनुष्य का स्वभाव हैज्ञान मनुष्य की आत्मा का धर्म है,ज्ञान मनुष्य की आत्मा ही है। इसलिए ज्ञान को खोजने कहीं जाना नहीं हैज्ञान भीतर है। भीतर की तरफ मुड़ते हीशांत होते ही,शून्य होते हीमौन होते ही उस ज्ञान की किरणें मिलनी शुरू हो जाती हैं।
लेकिन भीतर दो तरह के आदमी नहीं मुड़ पाते। एक तो वे नहीं मुड़ पातेजो बाहर की दुनिया में धन इकट्ठा करते हैंबाहर की दुनिया में मकान बनाते हैंबाहर की दुनिया में यश कमाते हैं। वे लोग भीतर की तरफ कैसे मुड़ेंउनका मन बाहर की तरफ लगा है। दूसरे वे लोग नहीं मुड़ पाते..और इसे ठीक से सुन लेनाक्योंकि पहली बात सुनी हुई होगीदूसरी बात विचारणीय है..दूसरे वे लोग नहीं मुड़ पातेजो बाहर के त्याग में पड़े रहते हैं। धन छोड़ोमकान छोड़ोस्त्री छोड़ोयह छोड़ोवह छोड़ो..इनकी दृष्टि भी बाहर है। इकट्ठा करने वाले की दृष्टि भी बाहर हैछोड़ने वाले की दृष्टि भी बाहर हैक्योंकि दोनों का आब्जेक्ट बाहर है।
तो न तो भोगी भीतर जा पातान त्यागी भीतर जा पाता। भोगी भी बाहर भटकता हैत्यागी भी बाहर भटकता है। भोगी सुख को खोजता हैत्यागी दुख को खोजता है। त्यागी कोशिश करता है कि जितना दुख...
भोगी एक तख्त खरीद लाता है। फिर कहता हैतख्त बहुत गड़बड़ हैगड़ता हैरात सोते नहीं बनता। अच्छी गद्दी खरीद लाता है। फिर एक और गद्दीफिर एक और गद्दी..गद्दी पर गद्दी बढ़ाता जाता है। यह भोगी की दिशा है।
त्यागी एक गद्दी कम कर देता है। सोचता हैएक गद्दी कम करने से मोक्ष मिलेगाफिर दूसरी गद्दी कम कर देता हैफिर तीसरी गद्दी कम कर देता है। फिर सोचता हैतख्त अकेला ठीक हैइससे जरूर मोक्ष मिलेगाफिर तख्त भी अलग कर देता है। फिर सोचता हैफर्श पर सो जाना सबसे ठीक हैइससे तो मोक्ष बिल्कुल निश्चित है!
दोनों पागल हैं। न तो गद्दी इकट्ठी करने से मोक्ष मिलता हैन गद्दी छोड़ने से मोक्ष मिलता है। गद्दी से मोक्ष का क्या संबंधइररिलेवेंट हैकोई संबंध ही नहीं है। और अगर भगवान के पास पहुंचे और कहेमैंने तीन गद्दियां छोड़ींइसलिए मोक्ष का दरवाजा खोलिएतो वह भी कहेगा कि तुम पागल हो गए होतीन गद्दियां छोड़ने से सिनेमा का दरवाजा भी नहीं खुलता हैमोक्ष का दरवाजा खुलवा लेना बहुत मुश्किल है। इतना आसान नहीं हैइतना सस्ता नहीं है कि आपने तीन गद्दियां छोड़ दींआपने घी लगाना रोटी पर छोड़ दियाआप सिर घुटाने लगेआप नंगे खड़े हो गए। आप जो भी कर रहे हैंइस करने का सारा आब्जेक्ट बाहर हैसारी दृष्टि बाहर है। भीतर वह पहुंचता हैजो बाहर छोड़ने और पकड़ने दोनों से मुक्त हो जाता है।
इसलिए महावीर को त्यागी मत कहें। महावीर रागी नहीं हैंमहावीर त्यागी नहीं हैंमहावीर वीतराग हैं। वीतराग का मतलब दोनों से भिन्न है..न त्यागन राग। न रागन विरागन तो बाहर की पकड़न छोड़ने का आग्रह। एक तीसरा कोणवीतराग। न मैं बाहर पकड़ता हूंन मैं बाहर छोड़ता हूंक्योंकि मैं हूं भीतर। और जो भीतर हैमैं उसे जानने चलता हूंबाहर की तरफ से आंख हटाता हूं। इसलिए महावीर हैं वीतराग। मत कहें विरागीमत कहें त्यागी।
वीतरागता में ज्ञान फलित होता है।
भीतर जो जाता हैवह ज्ञान के दर्शन को उपलब्ध होता है।
यह तो उनके अंतस-जीवन की कथा है। महावीर का असली जीवनउनकी आत्मा के जीवन का पहला सूत्र कि महावीर ज्ञान के खोजी हैंत्याग के नहीं।
दूसरा सूत्र।
हमें यही दिखाई पड़ता हैजैसा मैंने कहाभोगी सुख खोजता हैत्यागी दुख खोजता है। और त्यागियों ने ऐसे-ऐसे दुख खोजे कि अगर हिसाब लगाएंगे आपतो आप पाएंगे कि वे भोगियों से ज्यादा इन्वेंटिवज्यादा आविष्कारक हैं। भोगियों ने इतने आविष्कार नहीं किए। त्यागियों ने ऐसे-ऐसे आविष्कार किए हैं कि अगर उनकी सारी कथा बताई जाए तो प्राण रोमांचित हो जाएं कि यह क्या कियाआंखें फोड़ने वाले त्यागी हुए हैंक्योंकि वे कहते हैंआंखों से वासना का जन्म हो जाता हैपागल हो गए हैंजैसे अंधे को वासना का जन्म न होता होआंख से क्या मतलब हैलेकिन वे कहते हैंआंख से दिखाई पड़ते हैं रूप और चित्त आकर्षित होता है। जैसे कि सपनों में रूप नहीं देखे जा सकते। आंख बंद करके रूप नहीं देखे जा सकते। आंखें फोड़ लींहाथ-पैर काट डाले हैंजननेंद्रियां काट डाली हैंपैरों में खीले ठोंक लिए हैंकमर में खीले ठोंक लिए हैंरेत परजलती रेत पर पड़े रहे हैंकांटे बिछा कर लेटे रहे हैं;शरीर को कोड़े मारते रहे हैं!
कोड़े मारने वालों का एक संप्रदाय ही था पूरे यूरोप में। वह कोड़े मारने वालों का ही संप्रदाय कहलाता। उसका साधु यही करता था कि सुबह से उठ कर कोड़े मारना शुरू करता था नंगी देह परलहूलुहान हो जाता। जो साधु जितने ज्यादा कोड़े मार लेतावह साधु गुरु हो जाताबाकी साधु चेले हो जाते। जैसे कि जो साधु ज्यादा उपवास कर लेवह आचार्य हो जाता हैबाकी चेले हो जाते हैं!अखबार में खबर छापते हैं कि फलां साधु ने इतने उपवास किएइतने उपवास किएइतने उपवास किएवैसे ही उनके अखबारों में खबर छपती थी कि फलाने साधु ने अब तक क्लाइमेक्स पा ली हैअब तक आखिरी कोटि पा ली हैइतने कोड़े मार लेता है। सुबह से लहूलुहान कर लेते शरीर। लोग दर्शन करने आते और कहते कि महा-तपस्वी हैं। इन्वेंटिव थे बहुतखूब खोजी हैं तरकीबें दुख पाने की!
लेकिन महावीर दुखवादी नहीं हैं। महावीर दुख की खोज में नहीं हैं। और इस सीक्रेट कोइस रहस्य को थोड़ा ठीक से समझ लेना जरूरी हैक्योंकि हमें ऐसा दिखाई पड़ता है कि महावीर दुख खोज रहे हैं। क्योंकि हम सुख के खोजी हैंजो मैंने आपसे पहले कहा। सुख के खोजी को दिखाई पड़ता हैहम तो गद्दी ला रहे हैं घर की तरफ और एक आदमी गद्दी छोड़ कर बाहर जा रहा हैहमको लगता हैयह बेचारा बड़ा दुख खोज रहा है। लेकिन यह भी हो सकता है कि एक स्वस्थ शरीर को गद्दी सुख न दे। गद्दी के लिए बीमार शरीर चाहिए सुख पाने के लिए गद्दी में। स्वस्थ शरीर के लिए गद्दी जैसी चीज सुख देने का कोई कारण नहीं रह जाती। स्वस्थ शरीर के लिए सुख मिलता है गहरी निद्रा सेगहरे वस्त्रों से नहीं। गहरे वस्त्रों का सुख वह खोजता हैजिसने गहरी निद्रा खो दी है। जब गहरी निद्रा नहीं रह जातीतो सब्स्टीट्यूट खोजना पड़ता है। तो गहरे वस्त्र खोजते हैं हमबड़ी गद्दी करते चले जाते हैं।
स्वस्थ आदमी को भूख से आनंद मिलता हैबीमार आदमी को भोजन से। इन दोनों में फर्क समझ लेना। स्वस्थ आदमी को भूख लगती हैआनंद मिलता है भूख के कारण। जो भी खाता हैरसपूर्ण हो जाता हैस्वादपूर्ण हो जाता है। बीमार आदमी को भूख तो होती नहींस्वाद तो भोजन में आ नहीं सकतातो फिर नमक-मिर्च-मसाले खोजता है। और उनके द्वारा स्वाद पैदा करने की कोशिश करता है। तो जब कोई स्वस्थ आदमी रूखी रोटी खाकर आनंदित दिखता हैतो वह नमक-मिर्च वाला आदमी बेचारा सोचता हैकितना दुख झेल रहा है। उसे पता नहीं कि मूर्खदुख तू झेल रहा है। वह आदमी सुखपूरा सुख उठा रहा है। हमारी सारी दृष्टि...
महावीर त्याग रहे हैं ज्ञान के कारण। और महावीर जो जीवन जी रहे हैंउसमें उन्हें कोई दुख नहीं है। महावीर इतने नासमझ नहीं हैं कि दुख का जीवन जीएंवे परम आनंद का जीवन जी रहे हैं। उन्हें नग्न खड़े होने में आनंद आ रहा होगा।
और आप जानते हैं कि अगर बच्चों की आदतें न बिगाड़ी जाएं तो बच्चे बामुश्किल कपड़े पहनने को राजी होते हैं। कपड़े पहनना फोस्र्ड हैबिट हैआदमी के ऊपर जबरदस्ती थोपी गई आदत है। नग्न होने का अपना आनंद है और मजा है। छोटे बच्चे इनकार करते हैं कि कपड़े मत पहनाओभागते हैंलेकिन मां-बाप बड़े प्रेमवश उनको कपड़े पहनाते हैं कि जल्दी पहनो कपड़ेदुनिया अगर अच्छी आएगी तो नग्नता सहज स्वीकृत हो जाएगी। लोगों को जरूरत होगी तो कभी कपड़े पहन लेंगे। कोई बहुत सर्दी हैतो कपड़े डाल लेगा। वर्षा पड़ रही हैतो कपड़े पहन लेगा। ऐसे नग्न रहेगा। नग्न रहने के लिए आदमी पैदा हुआ है। नग्नता के लिए उसका शरीर बना है।
महावीर किसी आनंद के अनुभव में नग्न हो गए हैं। भक्तगण कह रहे हैं कि महान त्याग कियाबड़ा दुख झेल रहे हैं!
पागल हैं हम। महावीर नग्न होकर दुख नहीं झेल रहे हैं। कोई ज्ञानी कभी दुख झेलता नहींदुख झेलना अज्ञान का लक्षण है। ज्ञानी निरंतर आनंद से आनंद में प्रतिष्ठित होता चला जाता है। महावीर की चर्या आनंद की चर्या हैदुख की नहीं।
लेकिन हजारों साल से यह गुणगाथा कही जा रही है कि महावीर दुख झेल रहे हैंदुख झेल रहे हैंदुख झेल रहे हैंक्योंक्योंकि हम सुख के खोजी हैंइसलिए हमको दुख दिखाई पड़ता है। हमें पता ही नहीं कि महावीर किस आनंद में प्रतिष्ठित हो रहे हैंवे कहां जा रहे हैंउन्हें क्या मिल गया है!
महावीर की सारी चर्या सहज है। उसमें कोई त्याग-व्याग नहीं हैउसमें कोई दुख नहीं हैउसमें आनंद ही आनंद है। यह तो उनका अंतस-सूत्र है। बाहर से जो दुख दिखाई पड़ता हैवह भीतर उनका आनंद है।
एक पहाड़ पर एक संन्यासी चला जा रहा है। घनी धूप है। तेज सूरज आग बरसाता है। पसीने से लथपथ है संन्यासी। कंधे पर बोझा रखे हुए है..अपनी किताबेंअपने कपड़े-लत्तेअपना बिस्तर। माथे से पसीना पोंछता है। दूर है मार्ग अभीथक गया है बहुत। और तभी रास्ते पर एक पहाड़ी लड़की भी चढ़ रही है। चैदह-पंद्रह साल की लड़की है। अपने कंधे पर एक मोटे-ताजे बच्चे को लिए है। पसीने से लथपथ हैहांफ रही है। संन्यासी को दया आ गई।
हालांकि संन्यासियों को दया जरा मुश्किल से आती है। क्योंकि जो अपने प्रति ही दयापूर्ण नहीं हैंवे किसके प्रति दयापूर्ण हो सकेंगे?जो खुद को ही दुख देने की कोशिश में लगे हैंवे किसके दुख से प्रभावित होंगेलेकिन कुछ जरा गड़बड़ संन्यासी रहा होगा। कभी-कभी गड़बड़ संन्यासी पैदा हो जाते हैं..जैसे महावीर। ये बोनाफाइड संन्यासी नहीं हैं। ये ठीक रजिस्टर्ड संन्यासी नहीं हैं महावीर। ये असली संन्यासीजिसको हम जानते हैं संन्यासीवैसे नहीं हैं। ये कुछ गड़बड़ हैंस्ट्रेंजर हैंअजनबी हैं इस संन्यास की दुनिया में। वैसा ही कोई अजनबी संन्यासी वह भी रहा होगा। उसको दया आ गई। उसने उस लड़की के कंधे पर हाथ रखा और कहाबेटाबहुत बोझ मालूम पड़ रहा होगा तुझे?उस लड़की ने नीचे से ऊपर तक संन्यासी को गौर से देखा आश्चर्य से और कहाक्या कहते हैं आप?स्वामी जीबोझ आप लिए हुए हैंयह तो मेरा छोटा भाई है।
उस लड़की ने कहाबोझ आप लिए हुए हैंयह तो मेरा छोटा भाई है। आप कहते क्या हैंसंन्यासी सोच रहा थामैं कष्ट उठा रहा हूं बोझ ढोकरवह लड़की भी कष्ट उठा रही होगी। उसे पता नहीं कि वह अपने छोटे भाई को लिए हुए है। जहां प्रेम हैवहां कष्ट कहांवहां आनंद है। छोटे भाई को ढो रही हैयह उसका आनंद हैयह ढोना नहीं है। यह प्रेम का कृत्य हैयह एक्ट अॅाफ लव है।
महावीर जो कुछ कर रहे हैंउसमें दुख नहीं हैवे सब आनंद के कृत्य हैं। यह सारा जीवन अपना है। यह सब अपना है। इस सारे जीवन परइस सारे जीवन की पीड़ाइस सारे जीवन के दुख को दूर करने के लिए वे आतुर हैं। उनके प्राणों की प्यास हैएक करुणा है। वे कोई दुख नहीं झेल रहे हैं। यह उनका आनंद है। यह उनकी खुशी है। यह उनके जीवन का गीत है। यह उनका संगीत है।
लेकिन नहींहम ऐसा नहीं समझ पातेयह हमें दिखाई नहीं पड़ताहम तो अपनी कैटेगरीज मेंहमारे अपने तौलने के ढांचे,अपने तराजू हैंउन्हीं तराजू को लेकर पहुंच जाते हैं महावीर को तौलनेयह सोचते नहीं कि यह दुकान पर तौलने का तराजू महावीर को तौलने के काम नहीं आ सकता। और इसी तरह तौल-तौल कर हमने जीवन लिख लिया है। वह जीवन सब झूठा और फाल्स है। उसका कोई मूल्य नहीं है। मूल्य है महावीर की अंतस-घटना काआनंद कादुख का नहीं। आनंद घटित हुआ है महावीर के जीवन में।
लेकिन आप जरा देखें। आप जरा सोचें। हमने अपने सब महापुरुषों की तस्वीरेंआंखेंचेहरे ऐसे बनाए हैं कि उनमें कहीं आनंद का भाव नहीं मालूम पड़ताआपने कभी ख्याल कियाक्रिश्चियन कहते हैंजीसस क्राइस्ट नेवर लाफ्डईसाई कहते हैंजीसस क्राइस्ट कभी हंसे ही नहींसोच सकते हैं कभीअगर जीसस क्राइस्ट नहीं हंसे तो दुनिया में कौन हंसा होगाकौन बचा होगा दुनिया मेंअगर जीसस क्राइस्ट नहीं हंसेलेकिन क्योंक्रिश्चियंस ऐसा क्यों कहते हैं?क्या बात हैवे सोचते हैं कि जो हंसता हैवह महापुरुष नहीं रह जातासामान्य आदमी हो जाता है। सामान्य आदमी हंसते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि सामान्य आदमी की हंसी औरमहापुरुष की हंसी और। और सच में सामान्य आदमी झूठा हंसता है। उसकी हंसी झूठी है। भीतर रोता रहता हैबाहर हंसता है।
आप कभी सच में हंसे हैंअगर जिंदगी में एक बार आपने सच में हंस लिया होआपको धर्म का रहस्य पता चल जाएगा। बड़ी अजीब बात कह रहा हूं आपसे। अगर आपने जिंदगी में एक बार सच में हंस लिया होतो आपको सामायिक का अनुभव हो जाएगा,ध्यान का अनुभव हो जाएगा। लेकिन हम कभी हंसे ही नहीं..भीतर रोते हैंबाहर हंसते हैंक्यों हंसते हैं बाहरताकि भीतर के रोने को छिपाए रखेंकिसी को पता न चल जाए।
जितना दुखी आदमी होता हैउतना ही हंसता मालूम होता है।
दुख को छिपाने की तरकीब है। आमोद-प्रमोद में कौन जाता है?मनोरंजन करने कौन जाता है गांव के बाहर?सिनेमा में,मनोरंजनगृह में कौन प्रवेश करता हैजो दुखी है। दुनिया जितनी दुखी होती जाती हैउतने ही मनोरंजन के साधन ईजाद करने पड़ रहे हैंक्योंकि दुखी आदमी को भुलाने की जरूरत है कि कहीं भूले। एक आदमी दुखी होता है। लोग कहते हैंचलो ताश खेलें भाई;चलो गपशप करेंरेडियो सुनेंकुछ गपशप करेंकुछ हंसें। कुछ बातचीत करते हैंताकि वह हंसी में भूल जाए दुख को।
हमारी हंसी एस्केप हैभुलाती है।
लेकिन इस डर से कि कहीं हमारी हंसी के कारण महापुरुष छोटा न हो जाएतो महापुरुष में हंसी ही पोंछ देते हैंमिटा देते हैं,समाप्त कर देते हैं। महापुरुष हंसता ही नहींउसकी मूर्ति बना देते हैं गुरु-गंभीर। वह बच्चे जैसा सहज नहीं मालूम पड़तावह बनावटीबैठा हुआ ढोंगी मालूम पड़ने लगता है।
महावीर रहे होंगे बच्चे जैसे सहजक्योंकि इतने जीवन के सत्य को जानने वाला बच्चे जैसा सरल हो जाता है। लेकिन क्या हमारी बनाई हुई तस्वीर से वे बच्चों जैसे सरल मालूम होते हैंनहींहमारी तस्वीर में तो वे बड़े जटिलबड़े सधे हुए मालूम होते हैं। हमारी मूर्ति में तो..वह हमारी बनाई हुई मूर्ति है..बिल्कुल सधे हुए मालूम पड़ते हैंबिल्कुल तैयार मालूम पड़ते हैं। सरलता नहीं दिखाई पड़तीवह बच्चे जैसा भाव नहीं दिखाई पड़तावे बच्चे जैसे हंसते हुए नहीं मालूम पड़ते। हंसे होंगे जरूरक्योंकि अगर महावीर बच्चों जैसे नहीं हंस सकते तो कौन हंसेगाअगर उतनी इनोसेंसअगर उतना निर्दोष उस आदमी में नहीं आ सकताऔर मैं मानता हूं कि जरूर आया होगाक्योंकि महावीर नग्न हो गए बच्चों जैसेखड़े हो गए सरलसहजस्पांटेनिअस। हंसे होंगेखूब हंसे होंगे। लेकिन हमारा भय..हमारा भय...
मैं एक जगह एक घर में ठहरा हुआ था। घर के लोग मुझसे अपरिचित थे। सांझ हम बैठे थे। घर के दो-चार बच्चे थेपत्नी थी,पति थेगपशप होती थीमैं खूब हंस रहा था। तभी घर के वृद्धजन ने बाहर से आकर कहाहंसिए मतदो-चार लोग आ रहे हैं।
तो मैंने कहाक्या बात है?उन्होंने कहावे क्या कहेंगे कि आप और हंसते हैंवे आपको एक महान संन्यासी समझ कर दर्शन करने आ रहे हैं।
तो मैंने कहाहद हो गई। जब तुम जिंदा आदमी से कह सकते हो कि मत हंसोतो तुमने मर गए तीर्थंकरों और महावीरों के साथ क्या किया होगाकहना बहुत मुश्किल है। क्योंकि अब तो वे बेचारे इनकार भी नहीं कर सकते कि नहींहम हंसेंगे।
हमने ढाल ली है तस्वीर। सरलता को हमने जटिल ढांचे में खड़ा कर दिया है।
महावीर का तीसरा सूत्र और अंतिम बात आपसे कहूं। पहली बात मैंने कहीत्याग नहींज्ञानदुख नहींआनंद। और तीसरी बात आपसे कहना चाहता हूंसधा हुआ साधना का व्यक्तित्व नहींसहजसरलजल की भांति तरल। सधा हुआकल्टीवेटेडएक और तरह का आदमी होता हैजो कल्टीवेट करता हैजो एक-एक चीज को साध लेता है..बोलने कोउठने कोबैठने कोखाने कोकपड़े को..सब चीज को साध कर बैठ जाता है। उसको हम साधक कहते हैंमहावीर साधक नहीं हैंमहावीर सरल हैं।
सरल साधक कैसे हो सकता हैसाधक का मतलब है फोस्र्डजिसने एक-एक चीज को नियंत्रण में लेकर खड़ा हुआ है..सांस रोक कर खड़ा हुआ हैआंख थाम कर खड़ा हुआ हैजिसने हर चीज को नियंत्रण में रखा हुआ है..कंट्रोल्ड। ऐसा आदमी झूठा आदमी होता हैअभिनेता होता है। महावीर तो अत्यंत सरल हैं। उनके जीवन में जो भी हैवह सीधा है और सरलता से निकल रहा है। लेकिन जब दूसरे लोग अनुकरण करने लगते हैं किसी सीधे और सरल आदमी कातब मुश्किल शुरू होती है।
समझ लीजिए कि मैं सरलता से हंस रहा हूंअब मेरा कोई अनुयायी पैदा हो जाएहालांकि ऐसा पाप मैंने अब तक किया नहीं कि किसी को कहूं कि तुम मेरे अनुयायी होया मेरे शिष्य हो। हालांकि कई पागल मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि हमें अपना शिष्य बनाइएहम तो पीछा छोड़ेंगे ही नहीं। हमको शिष्य बनाइएऐसे ही पागलों ने शायद महावीर और बुद्ध और सबका पीछा करके उनको पकड़ लिया होगा कि हम तो शिष्य बनेंगे।
अगर कोई अनुयायी देख ले कि मैं हंस रहा हूं और हंसना चाहिएतो वह भी हंसेगालेकिन उसका हंसना पोज्ड होगासाधक का हंसना होगा। वह भी मुस्कुराएगालेकिन वह मुस्कुराहट झूठी होगीऊपर से थोपी हुई होगी।
महावीर अत्यंत स्पांटेनिअससहज-स्फूर्त व्यक्तित्व हैंजी रहे हैंजैसा उन्हें आनंदपूर्ण मालूम हो रहा है। और हम उनके पीछे पकड़-पकड़ कर नियम खोज रहे हैं कि वे कैसे जी रहे हैंक्या कर रहे हैंक्या कर रहे हैं!
महमूद गजनी में था..सम्राट गजनी का। एक दिन सुबह निकल रहा है गजनी के रास्ते सेएक मजदूर एक बहुत बड़ी पत्थर की चट्टान को लेकर ढो रहा है। महमूद ने देखा कि यह चट्टान ले जा रहा है। उसका पसीना-पसीना चू रहा है। उसकी आंखों में आंसू हैं। बूढ़ा आदमी हैजर-जर देह उसकी कंपती है। न मालूम किस दीनता मेंकिस दुख मेंचट्टान ढोनी पड़ रही है उसे किस मजबूरी में। महमूद अपने घोड़े पर है। उसने चिल्ला कर कहा कि ऐ मजदूरपत्थर को नीचे गिरा। गिरा दे इसी वक्त!
अब सम्राट ने आज्ञा दीमजदूर ने पत्थर नीचे बीच सड़क पर गिरा दिया राजपथ पर। महमूद तो अपने घोड़े पर बैठ कर अपने घर चला गया। अब उस पत्थर को कौन हटाएक्योंकि बादशाह ने पत्थर गिरवायातो बादशाह के वजीरअनुयायीबादशाह के अधिकारी कहने लगे जरूर कोई मतलब होगा। जब पत्थर गिराया तो मतलब होना चाहिएक्योंकि महमूद कोई नासमझ तो नहीं है। जरूर कोई राज है इसमें। पत्थर हटाना मत। पत्थर जहां गिराया गया थावहीं पड़ा रहा।
अब महमूद पत्थर गिरवा कर भूल-भाल गया। वह तो कोई और बात थीइतनी बात थी कि मजदूर इतना थका-मांदा मालूम पड़ता थातो उसने कहागिरा दोवह तो अपने घर चला गयाबात खतम हो गई। अब वह पत्थर वहीं पड़ा रहा। एक साल बीत गया। रास्ते पर ट्रैफिक में दिक्कत होती हैनिकलने में मुसीबत होती हैलेकिन पत्थर को हटाए कौनमहमूद ने गिराया हैमहमूद से कहे कौन?उसकी विजडम परउसकी बुद्धिमत्ता पर शक कौन करेकोई महमूद से कुछ कहता नहींमहमूद को कुछ पता नहीं। महमूद बीस साल जिंदा रहा और वह पत्थर वहीं पड़ा रहा।
महमूद मर गया। उसका लड़का गद्दी पर बैठा। वजीरों ने कहापत्थर के बाबत क्या किया जाएराजधानी में बड़ी तकलीफ है।
उसने कहा कि जिसको पिता ने किया थामैं उसे कैसे इनकार कर सकता हूंकोई राज होगाकोई सीक्रेट होगाकोई बात होगी। इतने बुद्धिमान आदमी थेनहींउनके प्रति सम्मान के कारण पत्थर नहीं हटाया जा सकता। पत्थर वहीं रहेगा।
लड़का भी मर गया। तीसरी पीढ़ी आ गईलेकिन पत्थर वहीं है। आगे का मुझे पता नहीं है। जहां तक सौ में निन्यानबे मौके हैं,पत्थर अभी भी वहीं होगाक्योंकि वह महमूद ने गिरवाया था।
जीवन के सहज कृत्यजिनका उस क्षण में कोई मूल्य होता हैपीछे चलने वाले पागल की तरह पकड़ लेते हैं और फिर उन्हीं के साथ बंधे रह जाते हैंउन्हीं के साथ बंधे रह जाते हैं और उन्हीं को साधना बना लेते हैं।
किसी महापुरुष के जीवन को समझिए जरूरअनुयायी कभी मत बनिए। समझिएउसके जीवन में प्रवेश करिएउसके जीवन के दबे हुए पर्दे उघाड़िएखोलिए राजपहचानिए उसकी आत्मा कोउतरिए शब्दों के भीतरहटाइए सिद्धांतों कोजाइए उसके व्यक्तित्व मेंउसके मनस मेंउसकी साइकोलाजी में। अनुयायी मत बनिएसिर्फ प्रवेश करिए।
और आप हैरान होंगेकिसी भी महापुरुष की आत्मा से एनकाउंटरसाक्षात्कार आपकी आत्मा को बदलने के लिएआपकी अपनी आत्मा में क्रांति लाने के लिए एक अनूठी प्रेरणा बन कर उपस्थित हो जाता है।
अनुयायी बनने की कोई भी जरूरत नहीं है। किसी के पीछे जाने की कोई जरूरत नहीं हैक्योंकि हर आदमी को अपने भीतर जाना हैकिसी के पीछे नहीं जाना है। लेकिन अपने भीतर जाने के लिए जो लोग अपने भीतर गए होंउनके जीवन के रास्ते को ठीक से जानना और पहचानना। और केवल वही पहचान सकता हैजिसे अनुयायी बनने की जल्दी न होक्योंकि अनुयायी बनने की जल्दी में विचार करना संभव नहीं होता।
पक्षपातसंप्रदाय के भाव सेसामथ्र्यसमझ कीसाक्षी बनने कीनहीं होती। फिर तो जल्दी पकड़ कर अनुगमन करने का भाव होता है कि जैसा वे करते हैंवैसा हम करें। उनके सहज कृत्य हमारे लिए साधना बन जाते हैं। सीधी सी बात समझ लेंमहावीर हैं निर्दोषसीधेबच्चे जैसे सरल-तरलऐसा व्यक्तित्व है उनका। साधकमहायोगीयोगीमहान तपस्वीबारह वर्ष तक तपश्चर्या कर रहे हैंभारी पराक्रम कर रहे हैं। इन सारी बातों में हमने उनके व्यक्तित्व की जो सहजताउसको जीर्ण-शीर्ण कर दियाऔर एक ऐसा व्यक्तित्व खड़ा कर लिया जो हमारा देखा हुआ ढांचा तो है लेकिन महावीर की आत्मा नहीं।
ये थोड़ी सी बातें मैंने कहीं। मेरी बातें हो भी सकती हैं सब गलत हों। क्योंकि महावीर से मेरा मिलना नहीं हुआकोई बातचीत नहीं हुई। हो सकता है यह मेरे देखने का ढंग होयह मेरी अपनी दृष्टि हो। लेकिन मैं मजबूर हूं। महावीर को मैं वैसा ही तो देख सकता हूंजैसा मैं देख सकता हूं। तो जो मैंने कहाकोई जरूरी नहीं है कि उसमें सोचने-विचारने जाएं कि शास्त्र में लिखा है कि नहीं लिखा है। यह मेरी अपनी सोचने की दृष्टि हो सकती है। आप से मेरा यह भी आग्रह नहीं है कि मेरी बात को सच मान लें। कोई आग्रह नहीं। मैंने ये बातें कहीं। आपने सुनीं। इतना काफी है।
इनको थोड़ा सोच और लें तो काफी से थोड़ा ज्यादा हो जाएगा। उतनी कृपा बहुत है कि इन पर थोड़ा सोचेंविचार करें। महापुरुष को हम अपने बंधे हुए ढांचों में नहीं बांधेंमुक्त करें। और उस मुक्त चेतना के साथ खुले आकाश में उड़ें।
तो शायद हमारी आत्मा को भी पंख मिल सकते हैं। और हम भी वहां पहुंच सकते हैं जहां कोई भी कभी पहुंचा है।
मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुनाउसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। 

मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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