शुक्रवार, 1 जून 2018

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-06

हम सब प्यासे हैं आनंद के लिएशांति के लिए। और सच तो यह है कि जीवन भर जो हम दौड़ते हैं धन केपद केप्रतिष्ठा के पीछेउस दौड़ में भी भाव यही रहता है कि शायद शांतिशायद संतृप्ति मिल जाए। वासनाओं में भी जो हम दौड़ते हैंउस दौड़ में भी यही पीछे आकांक्षा होती है कि शायद जीवन की संतृप्ति उसमें मिल जाएशायद जीवन आनंद को उपलब्ध हो जाएशायद भीतर एक सौंदर्य और शांति और आनंद के लोक का उदघाटन हो जाए।
लेकिन एक ही निरंतर इच्छा में दौड़ने के बाद भी वह गंतव्य दूर रहता हैनिरंतर वासनाओं के पीछे चल कर भी वह परम संतृप्ति उपलब्ध नहीं होती है!
लोग हैंधार्मिक कहे जाने वाले लोग हैंजो कहेंगेवासनाएं बुरी हैंजो कहेंगेवासनाएं त्याज्य हैंजो कहेंगेसमस्त वासनाओं को छोड़ देना हैजो कहेंगेवासनाएं अधार्मिक हैं। मैं आपसे कहूंकोई वासना अधार्मिक नहीं हैअगर हम उसे देख सकेंसमझ सकें। समस्त वासनाओं के भीतर अंततः प्रभु को पाने की वासना छिपी है। एक व्यक्ति को धन देते चले जाएं और उससे कहें कि कितने धन पर वह तृप्त होगाहम कितना भी धन देंउसकी आकांक्षा तृप्त न होगी। कितना ही धन देंसारे जगत का धन उसे दे दें...

सिकंदर भारत की तरफ आता था। किसी ने उससे पूछा कि तुम अगर पूरी जमीन जीत लोगे तो फिर क्या करोगे?उसने कहामैं दूसरी जमीन की तलाश करूंगा। और अगर हम पूछेंदूसरी जमीन भी जीत लोगे तो फिर क्या करोगे?वह कहेगामैं तीसरी जमीन की तलाश करूंगा। और हम कहेंतुम सारी जमीनें जीत लोगे तो फिर क्या करोगे?
असल में वासना अनंत को पाने के लिए हैइसलिए किसी भी जमीन को पाकर तृप्त नहीं होगी। कितना ही धन दे देंवासना तृप्त न होगीक्योंकि वासना अनंत धन को पाने के लिए है। कितना ही बड़ा पद दे देंआकांक्षा तृप्त न होगीक्योंकि आकांक्षा परम पद को पाने के लिए है। कितना ही जीवन में उपलब्ध हो जाएजीवन संतृप्त न होगातृप्त न होगाक्योंकि परम जीवनपरम प्रभुता को पाए बिना मनुष्य के भीतर तृप्ति असंभव है।
प्रभु को पाए बिना तृप्ति असंभव है। असल में समस्त वासनाएं नदियों की तरह प्रभु की अंतिम वासना में..सागर की ओर दौड़ रही हैं। प्रत्येक वासना समझे जाने पर प्रभु की ओर इशारा करेगीपरम सत्ता की ओर इशारा करेगी।
इसलिए वासनाएं बुरी नहीं हैं। वासनाओं को क्षुद्र से तृप्त करने की चेष्टा अज्ञान है। वासना को विराट देना होगा। क्षुद्र की तरफ जो वासनाएं दौड़ रही हैंउन्हें विराट पर केंद्रित करना होगाउन्हें विराट की ओर उन्मुख करना होगा।
लोग कहते हैं कि मन चंचल हैलोग कहते हैं कि मन की चंचलता नहीं मिटतीलोग कहते हैं कि हम मन को ठहराने की,रोकने की कोशिश करते हैंशांत होने की कोशिश करते हैंलेकिन मन कहीं भागता चला जाता है!
असल में मन चंचल नहीं होता तो मनुष्य कभी धार्मिक नहीं हो सकता था।
मैं फिर से कहूंमन अगर चंचल नहीं हुआ होता तो मनुष्य कभी धार्मिक न हो सकता थाक्योंकि हमने कुछ क्षुद्र रूप से उसे पकड़ा दिया होता और मन वहीं ठहर जाता। हमने कुछ व्यर्थ उसको पकड़ा दिया होता और मन वहीं थिर हो जाता।
हम कुछ भी पकड़ाएंमन वहां ठहरता नहीं और आगे के लिए अभीप्सा से भर जाता है। असल में जब तक प्रभु को न पाएतब तक ठहरेगा नहीं। मन की चंचलता और विचलितता इसलिए है कि मन प्रभु को पाने को उत्सुक है। उसके पूर्व कोई निधिकोई संपत्ति उसे तृप्त नहीं कर सकती है।
सौभाग्य है कि मन चंचल है। सौभाग्य है कि मन चंचल है..चंचल हैइसलिए शायद कभी परम सत्ता तक पहुंचना संभव हो सकता है। सौभाग्य है कि मन वासनाग्रस्त हैइसलिए शायद कोई दिन परम वासना को उपलब्ध हो जाए।
मैंने सुना हैवहां इजिप्त में एक फकीर हुआ। फकीर अपने झोपड़े के पीछे अपने खेत में काम करने गया। फकीर की एक शिष्या बादशाह को झोपड़े के बाहर मिली। उसने बादशाह को कहाआप थोड़ा खेत की मेड़ पर बैठ जाएंमैं फकीर को बुला लाती हूं। बादशाह बोलातुम बुला लाओमैं टहलता हूं। उसने सोचा कि शायद बादशाह बाहर बैठने में संकोच कर रहा है। वह उसे भीतर ले गई झोपड़े के और उसने बादशाह को कहायहां एक चटाई पड़ी हैउस पर बैठ जाएंमैं फकीर को बुला लाती हूं। बादशाह ने कहा,बुला लाओमैं थोड़ा टहलता हूं। वह बहुत हैरान हुई। उसने जाकर पीछे फकीर को कहायह बादशाह कुछ अजीब सा आदमी मालूम हो रहा है। मैंने बहुत कहा कि बैठ जाओ। वह बोलता हैमैं टहलता हूंतुम बुला लाओ। फकीर ने कहाअसल में वह बैठ सके,उसके योग्य स्थान हमारे पास कहां हैफकीर ने कहावह बैठ सके उसके योग्य बैठने का स्थान हमारे पास कहां हैइसलिए टहलता है।
मैं इस कहानी को पढ़ता था और मुझे एक अदभुत बात दिखाई पड़ीमन इसलिए चंचल है कि वह जहां बैठ सकेवह स्थान तुमने अब तक दिया नहीं। मन इसलिए चंचल हैइसलिए विचलित है कि जहां वह थिर हो सकेजहां वह तल्लीन हो सकेजहां वह विलीन हो सकेजहां वह विसर्जित हो सकेहमने वह स्थान उसे आज तक दिया नहीं। हमने कहीं खेत की मेड़ें बताई हैंकहीं साधारण सी पतली चटाइयां बताई हैं। हमने क्षुद्र का प्रलोभन दिया हैवह विराट का प्यासा है। इसलिए चंचल है। जब तक हम विराटजब तक हम अनंतजब तक हम पूर्णजब तक हम परम के सान्निध्य में उसे न ले जाएंतब तक मन चंचल होगामन विचलित होगामन भागेगा और दौड़ेगा। मन दुखी होगामन संताप से भरा रहेगा। एक एंग्विशएक पीड़ा निरंतर पकड़े ही रहेगी।
मनुष्य के जीवन का दुख एक ही केंद्र पर है। मनुष्यजिस बात को पाने से प्यास उसकी तृप्त होगीवह हम उसे नहीं दे रहे हैं,हम कुछ और दे रहे हैं। हम कुछ और दे रहे हैंजो तृप्ति न देगाऔर हम उससे वंचित किए हैंजो तृप्ति बन सकता हैऔर अगर यह तृप्ति न हो तो हम लाख उपाय करेंलाख अर्जित करेंलाख व्यवस्थासमृद्धि जमा लेंहम शांति कोआनंद को नहीं पा सकते हैं।
धर्म त्याग करने से नहीं होता है। धर्म छोड़ने से नहीं मिलता है। धर्म जीवन से पलायन करने वाले को नहीं मिलता है। धर्म तो पाने पर मिलता हैपरिपूर्ण को पाने पर मिलता है। धर्म तो परिपूर्ण को उपलब्ध करने को कहता है।
गलत होंगेजो समझते हैंधर्म परार्थ है। धर्म से ज्यादा स्वार्थ इस जगत में कुछ भी नहीं है। भ्रांत होंगे वेजो समझते हैंधर्म परार्थ है। धर्म से अधिक स्वार्थ इस जगत में कुछ भी नहीं है। महावीर और बुद्ध से ज्यादा स्वार्थ को उत्पन्न इस जगत में दूसरे नहीं हैं।
स्वार्थ का अर्थ हैस्व को परिपूर्ण जहां अर्थ उपलब्ध होता है।
स्वार्थ का अर्थ हैजहां मेरी सत्ता पूरे प्रयोजन कोपूरी अर्थवत्ता को उपलब्ध हो जाएजहां मैं अपने को उपलब्ध हो जाऊं।
हम एक अर्थ में स्वार्थी नहीं हैं। हमें स्व की कोई चिंता भी नहीं हैहमें स्व से कोई प्रयोजन नहीं हैहम उन चीजों के पीछे दौड़ रहे हैंजिन्हें मृत्यु छीन लेगी और समाप्त कर देगी। हम अत्यंत निःस्वार्थी लोग हैं। हम उन चीजों पर जीवन को व्यय कर रहे हैं,जो हमारी सत्ता का अंग नहीं बन सकतींजो हमारे स्वरूप का उदघाटन नहीं हो सकतीं। महावीर और बुद्ध और ईसा और कृष्ण उसको पाने में संलग्न हैंजिसे मृत्यु भी जला नहीं सकेगी। वे शायद उस संपत्ति को उपलब्ध कर रहे हैं। हम जिसे संपत्ति कह रहे हैं,वह संपत्ति नहीं है।
नानक लाहौर के पास एक गांव में ठहरे थे। एक व्यक्ति ने उनसे कहामैं कुछ आपकी सेवा करना चाहता हूं। बहुत संपत्ति मेरे पास है। आपके उपयोग में आ जाए तो अनुग्रह होगा। नानक कई बार उसे टालते गए। एक बार रात्रि को उसने दोबारा अपनी प्रार्थना दोहराईतो उस व्यक्ति को एक कपड़े सीने की सुई दे दी। कपड़े सीने की सुई देकर कहाइसे रख लो और जब हम दोनों मर जाएं तो इसे वापस लौटा देना। वह आदमी कुछ चैंका होगाक्या नानक का दिमाग कुछ खराब हैचैंका होगा कि इतने लोगों के सामने असंगत और व्यर्थ की बात कहते हैंइस सुई को मृत्यु के बाद कैसे लौटाया जा सकेगालेकिन सबके सामने कुछ कहना संभव नहीं हुआ। फिर उसी ने तो बार-बार उनसे आकांक्षा की थी कि कोई सेवाऔर सेवा जो दी हैउसे एकदम अस्वीकार करते नहीं बन पड़ा।
वह गयारात भर सोचता रहाविचार करता रहा। कोई मार्ग उसे दिखाई न पड़ा कि सुई मृत्यु के पार कैसे जा सकेगी। वह पांच बजेचार बजे सुबह ही नानक के पैरों पर गिर पड़ा और कहा कि यह सुईअभी जिंदा हूंवापस ले लेंमरने पर लौटाना मेरी सामथ्र्य में नहीं है। मैंने बहुत चेष्टा कीबहुत उपाय किएबहुत सोचा..अपनी सारी संपत्ति भी लगा दूंतो जिस मुट्ठी में यह सुई होगीवह इसी पार रह जाएगी। मैं पता नहीं किस लोक मेंकिस अज्ञात में विलीन हो जाऊंगा। यहां तो मैं रहूंगा नहीं। मैं इस सुई को पार नहीं ले जा सकता हूं।
नानक ने कहाफिर मैं तुझसे एक बात पूछूं?तेरे पास क्या है जिसे तू पार ले जा सकता हैउस व्यक्ति ने कहामैंने तो कभी विचारा नहीं। लेकिन अब देखता हूं तो दिखाई नहीं पड़ता कि मेरे पास कुछ हैजिसे मैं पार ले जा सकता हूं। नानक ने कहाजो मृत्यु के पार न जा सकेवह संपत्ति नहीं है।
जो मृत्यु के इस पार रह जाएवह विपत्ति हो सकती हैसंपत्ति नहीं हो सकती।
समस्त धार्मिक जाग्रत पुरुष भी संपत्ति को कमाए हैं। हम भी संपत्ति को कमाते हैं। हम उस संपत्ति को कमाते हैंजो मृत्यु के इस पार होगी। वे उस संपत्ति को कमाते हैंजिसे मृत्यु की लपटें भी नष्ट न कर सकेंगीजो मृत्यु की लपटों के पार भी निकल जाएगी। शायद वे ही स्वार्थी हैंशायद वे ही परम स्वार्थ को पूरा कर लेते हैं। और शायद न मालूम कौन है कि जो उनको कहता है कि वे त्यागी हैंन मालूम कौन है जो कहता है उन्होंने सब छोड़ान मालूम कौन है जो कहता है उन्होंने समृद्धि छोड़ीन मालूम कौन है जो उनके त्याग और तपश्चर्या की बात करता हैमुझे वैसी कोई बात दिखाई नहीं पड़ती। समृद्धि हम छोड़े हुए हैंसंपत्ति हम छोड़े हुए हैंआनंद हम छोड़े हुए हैंउन्होंने केवल दुख छोड़ा हैउन्होंने केवल अज्ञान छोड़ा हैउन्होंने केवल पीड़ा छोड़ी है। और अगर पीड़ा को और दुख को और अज्ञान को छोड़ना त्याग है तो फिर बात अलग है। फिर भोग क्या होगा?
इस जगत में केवल संन्यासी ही भोगी है। इस जगत में केवल विरक्त हीवीतराग ही आनंद कोशांति को उपलब्ध रहता है। हम सब त्यागी हो सकते हैं।
महावीर ने अपनी समृद्धि कोराज्य कोव्यवस्था को छोड़ दियालात मार दी। हम प्रसन्नता से भरे हैं कि उन्होंने बहुत बड़ा काम कियाअसल में हम संपत्ति को बहुत आदर देते हैंइसलिए महावीर के त्याग को भी बहुत आदर देते हैं। हमारी दृष्टि में महावीर का मूल्य नहीं हैमहावीर ने वह जो संपत्ति को लात मारीउसका मूल्य हैअगर किसी व्यक्ति को कचरा बहुत प्रिय हो और किसी को घर के बाहर कचरे को फेंकता देखेतो शायद आदर से नमस्कार करे कि अदभुत त्याग कर रहा हैसुबह-सुबह सारा घर का कचरा फेंक रहा है!
हम जब यह कहते हैं कि महावीर बहुत बड़े त्यागी हैंअसल में हम संपत्ति के प्रति अपने आदर को सूचित करते हैंमहावीर के प्रति नहीं। अगर हम महावीर को समझेंगे तो हमें दिखाई पड़ेगामहावीर ने वह छोड़ दिया जो व्यर्थ था। छोड़ना भी कहना शायद गलत हैक्योंकि व्यर्थ को छोड़ा नहीं जाताव्यर्थ दिख जाए तो छूट जाता है। मैं पुनः दोहराऊंछोड़ना भी कहना शायद गलत है। व्यर्थ को छोड़ा नहीं जाताउसकी व्यर्थता दिख जाए तो छूट जाता है।
इस जगत में अज्ञानियों ने त्याग किया होगाज्ञानियों ने त्याग नहीं किया है। उनसे चीजें छूट गई हैंजैसे पके पत्ते वृक्ष से गिर जाते हैंवैसे ही जैसे हम कचरे को बाहर फेंक आते हैं और पुनः उसकी याद नहीं करते।
मैं एक गांव में गया था। एक साधु का प्रवचन सुना था। दो दिन सुनादो दिन उन्होंने निरंतर कहा। उनसे मिलने गयातब भी उन्होंने मुझसे कहामैंने लाखों रुपयों पर लात मार दी। मैंने उनसे पूछायह लात कब मारी थीवह मुझे कहे कि कोई बीस वर्ष हुए। और तब मैंने उनसे कहा कि लात मारी नहीं जा सकी होगीअन्यथा बीस वर्ष उसे याद रखने की कोई जरूरत न थी। वह लात मारी नहीं जा सकी। बीस वर्ष पहले लाखों रुपए मेरे पास थेयह अहंकार तृप्ति देता रहा होगा। बीस वर्ष से यह अहंकार परिपुष्ट हो रहा है कि मैंने लाखों रुपयों पर लात मार दी हैबात वहीं की वहीं है।
संपत्ति छोड़ी नहीं जातीएक दिन दिखता हैवहां संपत्ति है ही नहीं। एक दिन दिखता है कि वहां संपत्ति है ही नहींवहां संपत्ति का अभाव है। मुट्ठी खुल जाती हैकुछ छोड़ना नहीं पड़ता है। शायद उस दिन कोई मजबूर करे कि मुट्ठी बांधे रखो तो बड़ी तपश्चर्या हो। उस व्यर्थ के बोझ को ढोने में तपश्चर्या हो सकती है। व्यर्थ के बोझ को छोड़ आने में कौन सी तपश्चर्या हो सकती है!
त्याग नहींकेवल ज्ञान ही पर्याप्त है। छोड़ना नहीं होताकेवल जानना होता है। जानना क्रांति है। जान लें ठीक सेक्या है जो सार्थक हैक्या है जो व्यर्थ है..क्रांति घटित हो जाती है। ज्ञान का परिणाम शील बन जाता हैआचरण बन जाता है।
लेकिन क्या सार्थक हैक्या व्यर्थ है..यह वे कैसे जानेंगे जो स्वयं को भी नहीं जानते?जो स्वयं को नहीं जानते हैं वे सार्थक को कैसे जानेंगेसार्थक वही होगाजो स्वरूप के अनुकूल हो। सार्थक वही होगाजो स्वरूप के प्रति संगतिपूर्ण हो। व्यर्थ वह होगाजो स्वरूप के प्रतिकूल हो। व्यर्थ वह होगाजो स्वरूप के प्रति विरोध से भरा हो। व्यर्थ वह होगाजो स्वरूप को गलत ले जाता हो।
असल में दुख का और कोई अर्थ नहीं है। स्वरूप के प्रति जो प्रतिकूलता हैवही दुख है। स्वरूप के प्रति जो अनुकूलता हैवही आनंद है। जिस क्षण मैं अपने को स्वरूप के अनुकूल पाता हूंआनंदित हो जाता हूं। जिस क्षण स्वरूप के प्रतिकूल पाता हूंदुखी हो जाता हूं। दुख का अर्थ है कि कुछ प्रतिकूल हैजो मैं नहीं चाहता कि होऔर हो रहा है। आनंद का अर्थ है कि कुछ हो रहा हैजो मैं चाहता हूं कि होजो मेरे अनुकूल है।
प्रतिकूलता दुख हैअनुकूलता सुख है।
अगर मुझे स्वरूप का पता न हो तो क्या सार्थक हैक्या व्यर्थ हैयह दिखाई नहीं पड़ सकता। स्वरूप-बोध जीवन में सार्थकता का और व्यर्थता का इंगित स्पष्ट कर जाता है। यह जानना धर्म की बुनियादीकेंद्रीय बात है कि मैं कौन हूं।
विज्ञान पदार्थ को जानता हैपदार्थ क्या है। विज्ञान पदार्थ के रहस्य को खोदता है कि उसके क्या नियम हैंक्या रहस्यक्या राज हैं। धर्म चैतन्य को खोजता हैस्व को खोजता है..उसका क्या रहस्य है। पदार्थ के अंतिम विश्लेषण पर अणु उपलब्ध हुआ है। और अणु की उपलब्धि घातक हो गई हैविस्फोटक हो गई है। हो सकता है सारे मनुष्य को ले डूबे। चैतन्य का विश्लेषण आत्मा को उपलब्ध किया है। पदार्थ के विश्लेषण से अणु उपलब्ध हुआ हैचैतन्य के विश्लेषण से आत्मा उपलब्ध हुई है।
अणु संभव है घातक हो जाए। आत्मा का उपलब्ध होना शायद जगत के बचाने का मार्ग बन जाए। इस जगत मेंजो अत्यंत पीड़ा और परेशानी से घिरा हैपुनः आत्म-जागरण के उदघोष की जरूरत है।
लेकिन आत्मा के संबंध में हम बहुत बातें जानते हों भलाआत्मा को नहीं जानते हैं। आत्मा के संबंध में बहुत से सिद्धांत मंडित होंलेकिन आत्मा से कोई परिचय नहीं है। बहुत-बहुत आश्चर्य हैं जगत मेंलेकिन सबसे बड़ा एक ही है..जो मैं हूंउसे छोड़ कर मैं सब जान सकता हूंस्वयं से अपरिचित रह जाता हूंसारे जगत को जाना जा सकता है और केवल वहीजो जानता हैवही रह जाता हैसारे जगत में दौड़ कर ज्ञान के संग्रह का आभास हो सकता हैलेकिन यह संग्रह अज्ञान ही हैक्योंकि वह स्व को उदघाटित नहीं कर पाता।
महावीर ने कहा हैसब कुछ जान लोलेकिन जो स्वयं को न जान ले तो वह जानना जानना नहीं है। सब कुछ जीत लो,लेकिन अगर स्वयं को न जीतातो वह जीत विजय नहीं है। सब कुछ पा लोलेकिन स्वयं को न पाया तो वह पाना उपलब्धि नहीं है।
स्वरूप पाने से हम च्युत रह जाते हैंऔर सब पा लेते हैं!
लगभग ऐसा मुझे स्मरण आता हैस्वामी रामतीर्थएक भारतीय साधु जापान में थे। एक भवन के पास से निकलते थेभवन में आग लग गई थी। लोग सामान निकाल रहे थे। भवनपति बाहर खड़ा था। होश खो दिया था उसने। उसे कुछ दिख नहीं रहा था,लेकिन देख तो जरूर रहा था। लपटें पकड़ रही थीं मकान को। लोग सामान बाहर ला रहे थे। और थोड़ी देर में सब भूमिसात हो जाएगासब राख हो जाएगा। रामतीर्थ भी उस राह से निकले थेकिनारे खड़े होकर देखने लगे थे। लोगों ने अंतिम बार आकर पूछा,भवन में कुछ और तो नहीं रह गयाउस भवनपति ने कहामुझे कुछ याद नहीं पड़ता। मुझे कुछ भी स्मरण नहीं आतामैं दिग्मूढ़ सा खड़ा रह गया हूं। तुम्हीं एक बार जाकर और देख लो। जो बचा होउसे भी बचा लो।
भवन अंतिम लपटों को पकड़ने के करीब था। लोग भीतर गए। वे बाहर आए तो रोते हुए बाहर आए। कहीं एकांत में भवनपति का एकमात्र लड़का थावे उसकी राख को लेकर लौटे थे। वे लोग मकान का सामान बचाने में लग गए थे और मकान का एकमात्र मालिक भीतर जल कर समाप्त हो गया थारामतीर्थ ने अपनी डायरी में लिखा हैउस दिन मुझे लगा कि यह घटना प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में घटती है। हम सामान को बचाने में लग जाते हैंसामान का मालिक धीरे-धीरे मर जाता है।
हम उसको बचाने में लग जाते हैं जो बाहर है और जो आंतरिक हैजो मैं स्वयं हूंउसको भूल ही जाते हैंयह अति व्यस्तता आत्मघातक हैस्युसाइडल है। पदार्थ सेवस्तु से इतना व्यस्त होना कि स्वरूप भूल जाएसामान्य सामग्री में इतना आक्युपाइड हो जानाइतना व्यस्त हो जाना कि स्व की सत्ता का विस्मरण हो जाएआत्मघातक है।
शायद जिसे हम आत्महत्या कहते हैंवह केवल देह-हत्या है। आत्महत्या इसे कहना चाहिए..आत्महत्या इसे कहना चाहिए कि जिसे स्व का विस्मरण हो जाए और जिसका सामग्री पर सारा जीवन केंद्रित हो जाए। जिसके लिए हम खोज कर रहे हैंवह गौण हो जाएऔर जिसके लिए वे चीजें खोज करने गए थेवे चीजें प्रमुख हो जाएं। उसे भूल जाएंजिसकी शांति के लिए हम चले थेऔर सामग्री के आयोजन में ही जीवन व्यय हो जाएइसे आत्महत्या कहना चाहिए। शरीर की हत्या को आत्महत्या नहीं कहना चाहिए।
यह आत्महत्या प्रत्येक के भीतर घटित होती है। इससे बचने काइससे ऊपर उठने का एक ही उपाय है कि हमारा जो चित्त,हमारा जो मन दूसरे में अति व्यस्त हैथोड़ा सा समय निकाल कर स्वयं को जानने के प्रति भी उन्मुख हो। जिस ज्ञान की शक्ति से हम सारे जगत को जानने निकल पड़े थेवह ज्ञान की धारा अंतः-प्रवाहित होभीतर की तरफ उन्मुख हो। हम उसको भी जान सकें,जो सबको जान रहा है।
और जिन्होंने उसे जाना हैउनका आश्वासन है कि जिस आनंद को बाहर खोज-खोज कर जन्मों-जन्मों में नहीं पाया जा सकता हैक्षण में उसे भीतर मुड़ते ही उपलब्ध कर लिया जाता है। यह आश्वासन एकाध व्यक्ति का होतो पागल कह कर टाल सकते हैं,बकवास कह कर टाल सकते हैं। जितने लोगों ने इस जमीन परजमीन के इतिहास में आनंद को उपलब्ध किया हैउनमें से एक ने भी उसे बाहर उपलब्ध नहीं किया है। जितने लोगों ने उपलब्ध किया हैउनकी सामूहिक साक्षी और गवाही आंतरिक के लिए है। इसलिए सत्य वैज्ञानिक हो जाता हैयह सत्य अंधविश्वास नहीं रह जाता है। यह अपवाद नहीं हैनिरपवाद रूप से जिन लोगों ने आनंद अनुभव किया हैउन्होंने आत्यंतिक आंतरिक से उसका उदघाटन किया है।
वह आंतरिक प्रत्येक में उपस्थित हैप्रत्येक घड़ी उपस्थित हैहम उसे जानते हों या न जानते हों। क्योंकि वह हमारा होना है,वह हमारी बीइंग हैवह हमारी सत्ता हैवह हमारा अस्तित्व है। हम लाख उपाय करके उसको खो नहीं सकते हैं। कोई मनुष्य अपनी आत्मा को नहीं खो सकताकितना ही पाप करेकितने ही पाप का उपाय करे। इस जगत में एक बात असंभव है..स्वयं को खो देना असंभव है।
स्वयं को तो खो नहीं सकतेलेकिन फिर सारे लोग तो कहते हैंआत्मा को पा लोजिस स्वयं को खो नहीं सकतेउसे पाने का क्या मानी होगा? आत्मा को खोया नहीं जाताकेवल विस्मरण हो जाता है। और ठीक से मेरी बात समझें तो विस्मरण भी नहीं होताहम दूसरे के स्मरण से इतने भर जाते हैं कि स्व का स्मरण नीचे दब जाता है।
अगर हम पर के स्मरण को थोड़ी देर को छोड़ सकेंअगर हमारा चित्त पर के स्मरण से थोड़ी देर को शून्य हो जाएअगर हमारे चित्त में पर का प्रतिबिंब और पर के विचार और पर के इमेजेज थोड़ी देर को विलीन हो जाएंतो स्व-स्मरण जो नीचे दबा है,उदघाटित हो जाएगा। कुछ खोया नहीं हैकेवल कुछ आच्छादित है। कुछ भूला नहीं हैकेवल कुछ आवरण मेंवस्त्रों में छिप गया है। थोड़े से वस्त्र उघाड़ने कीथोड़ा सा आंतरिक जगत में नग्न होने की बात है..और स्व का साक्षात हो सकता है।
स्व के साक्षात के बाद ही सार्थक की अनुभूति होती है। स्व के साक्षात के बाद ही निरर्थक छूटता है और सार्थक की दिशा में जीवन की गति होती है। उसके पूर्वस्व-साक्षात के पूर्वजो सार्थक की तलाश करेगावह केवल दमन कर सकता हैवह केवल संघर्ष कर सकता है अपने सेवह केवल छोड़ने में लग सकता है। उससे छूटेगा नहींक्योंकि उसे ज्ञात ही नहीं है कि छोड़ने का प्रश्न ही नहीं है।
एक साधु हुआ। वह गृही था। उसका नियम था लकड़ी काट लेनीबेच देनीउससे जो भोजन मिलेकर लेनाऔर जो सांझ बच जाएउसे बांट देना। उसकी पत्नी थी। एक बार सात दिन तक लगातार वर्षा हुई। लकड़ियां काटने जाना जरूरी था। सात दिन उपवास के बिताने पर भी भिक्षा मांगने का उसका नियम न था। सात दिन के बाद भूखा सपत्नीक लकड़ियां काटने वन को गया। लकड़ियां काटीं। भूख से पीड़ित सात दिन केलकड़ियों के बोझ को ढोते हुए वे पति-पत्नी वापस लौटते थे। पति आगे थापत्नी थोड़ा पीछे फासले पर थी। एक अदभुत घटना घटीजो स्मरण करने जैसी है। वह यदि मन में बैठ जाएमन के किसी प्रकाशित कोने में स्थापित हो जाएतो जीवन में दिशा-परिवर्तन हो सकता है।
वह आगे-आगे था लकड़ियों के बोझ को लिए। राह के किनारे उसे दिखा कि किसी राहगीर की थैली गिर गई हैस्वर्ण अशर्फियां उसमें हैं। यह सोच कर कि सात दिन की भूख और परेशानी के कारण पत्नी का मन कहीं मोह से न भर जाएकहीं लोभ से न भर जाएकहीं उसके मन में ऐसा न हो कि अशर्फियां उठा लूंनाहक उसके चित्त में विकार न आएउसने गड्ढे में उसे सरका कर थैली पर मिट्टी डाल दी। अपने तईं सोचा कि मैं तो स्वर्ण का विजेता हो गया हूंमैंने तो जीत लियामैं तो स्वर्ण के मोह को छोड़ सकता हूंलेकिन पत्नी कहीं मोहग्रस्त न हो जाए। वह मिट्टी डाल कर उठता ही था कि पत्नी आ गई।
उसने पूछाक्या कर रहे होनियम था उस साधु का असत्य न बोलने काइसलिए सत्य बोलना पड़ा। उसने कहायह सोच कर कि मैंने तो परिग्रह से छुट्टी पा लीमैं तो सब त्याग कर चुका हूंलेकिन तेरे मन में कहीं मोह न आ जाएएक स्वर्ण अशर्फियों की थैली पड़ी थीउसे मैंने मिट्टी से ढंक दिया है।
उस पत्नी ने कहा थातुम्हें मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए शर्म नहीं आई?तुम्हें स्वर्ण अभी दिखाई पड़ता है?
अगर स्वर्ण दिखाई पड़ता हैतो स्वर्ण से त्याग नहीं हुआ। अगर स्वर्ण दिखाई पड़ता हैतो स्वर्ण से मुक्ति नहीं हुई। अगर स्वर्ण मूल्यवान मालूम होता हैतो स्वर्ण के साथ आसक्ति शेष है। स्वर्ण के साथ दो तरह के संबंध हो सकते हैं..आसक्ति के और विरक्ति के। लेकिन दोनों ही संबंध हैं। स्वर्ण के साथ दो तरह के संबंध हो सकते हैं कि मैं स्वर्ण को पाने को उत्सुक हो जाऊं या मैं स्वर्ण को छोड़ने को उत्सुक हो जाऊं। लेकिन दोनों ही संबंध हैं।
वस्तुतः जो स्वयं को जानेगावह स्वर्ण को न छोड़ता हैन पकड़ता है। वह अचानक जान पाता है कि वहां तो कोई अर्थ ही नहीं है। स्वर्ण में कोई अर्थ ही नहीं है। इतना भी अर्थ नहीं है कि उसे छोड़ने के लिए उत्सुक हुआ जाए या उसे पकड़ने के लिए उत्सुक हुआ जाए। इस स्थिति को हमने वीतरागता कहा है।
एक स्थिति है राग की..राग स्वर्ण के प्रति आसक्ति है।
एक स्थिति है वैराग्य की..वैराग्य स्वर्ण के प्रति विरक्ति है।
लेकिन वे दोनों संबंध हैं। उन दोनों में स्वर्ण का मीनिंग हैस्वर्ण का अर्थ है। एक तीसरी बात हैवीतरागता की। राग से और विराग सेदोनों से अलग। वहां स्वर्ण के प्रति कोई संबंध नहीं है। वहां जगत के प्रतिसंसार के प्रति कोई संबंध नहीं है।
इस सत्य का उदघाटन कि मेरी सत्ता असंग हैमेरी सत्ता नितांत भिन्न और पृथक हैजीवन में त्याग को फलित कर देती है। त्याग ज्ञान का फल है। कोई त्याग करके ज्ञान तक नहीं पहुंचताज्ञान के उत्पन्न होने से त्याग फलित होता है।
सम्यक दर्शन प्राथमिक हैसम्यक आचरण उसका परिणाम है।
आचरण नहीं पालना होता हैज्ञान उपलब्ध करना होता है। जो आचरण से प्रारंभ करेंगेउन्होंने गलत मार्ग से प्रारंभ किया। उन्होंने एक छोर से प्रारंभ किया। अज्ञान में आचरण आरोपित होगाकल्टीवेटेड होगा। ज्ञान में आचरण सहज होता है। अज्ञान में क्रोध को दबा कर क्षमा करनी पड़ेगीज्ञान में क्रोध ही उत्पन्न नहीं होता है।
जिन लोगों ने महावीर को कहा है कि बहुत क्षमावान थेउन लोगों ने महावीर के प्रति बहुत असत्य कहा है। महावीर को क्षमावान कहने का अर्थ है कि महावीर में क्रोध उठता था। महावीर क्षमावान नहीं थेअसल में महावीर में क्रोध ही नहीं उठता। जिसमें क्रोध का अभाव हैउसमें क्षमा काअक्षमा का प्रश्न नहीं उठता। क्षमावान क्रोधी हो सकते हैंअक्रोधी के क्षमावान होने का प्रश्न नहीं उठता। चित्त में भीतर स्वयं के साक्षात से जो ज्ञान उत्पन्न होता हैवह आश्चर्यजनक और स्वर्णिम प्रकाश से भर जाता है।
जीवन में मुक्ति का मार्ग आचरण से नहींप्रज्ञा के जागरण से प्रारंभ होता है।
यह प्रज्ञा-जागरणयह स्व का साक्षात कैसे होगा?किस विधि से मैं अपने भीतर जा सकता हूं?किस विधि से मैं स्वयं के आमने-सामने आ सकता हूं?किस विधि सेजो सबको देख रहा हैउस सत्ता के साथ मेरा तादात्म्य हो सकता है?
अगर उस विधि को समझना हैतो समझना होगाकिस विधि से मैं अपने से बाहर हो गया हूं। किस विधि से मैं अपने से बाहर हो गया हूंअगर मैं यह समझ लूं कि मैं किस विधि से अपने से बाहर गयातो उसी पर पीछे वापस लौटने से मैं स्वयं में पहुंच जाऊंगा। जिस मार्ग से मैं बाहर आया हूंवही मार्ग भीतर ले जाने का भी होगा..केवल विपरीत चलना पड़ेगा। जो मार्ग मुझे बंधन में लाया हैवही मार्ग मेरी मुक्ति का भी होगा..केवल विपरीत चलना पड़ेगा। जो मार्ग मुझे संसार से जोड़े हुए हैवही मार्ग मुझे परमात्मा से जोड़ेगा..केवल विपरीत चलना होगा।
यह हमारा चित्तयह हमारा मनयह हमारा विचार हमें जगत से जोड़ता है। एक क्षण को कल्पना करें अभी कि चित्त में कोई विचार नहीं हैकोई तरंग नहीं है..चित्त निस्तरंग हो गया हैनिर्विचार हो गया है..उस क्षण आप जगत से संबंधित होंगे क्या?उस क्षण क्या कोई भी संबंध शेष रह जाएगा?उस क्षण जो बाहर जीता हैउससे क्या कोई नाताकोई संबंध शेष रह जाएगाकोई भी धागे बंधे हुए रह जाएंगे?
कल्पना भी करेंगे तो दिख पड़ेगा..अगर चित्त बिल्कुल निस्तरंग है और शून्य हैअगर चित्त में कोई भी क्रिया नहीं चल रही है,विचार कीवासना कीकल्पना कीस्मृति की कोई भी क्रिया नहीं हैसब शून्य है..उस शून्य में आप जगत से टूटे हुए होंगेपृथक होंगे। चित्त विचार से भरा हैतो हम जगत से संयुक्त हैंशरीर से संयुक्त हैंअन्य सेपर से संयुक्त हैं। हमारा बंधन..अगर हम बहुत ठीक से समझें..संसार नहीं हैहमारा बंधन विचार है।
संसार से मुक्त नहीं होना हैविचार से मुक्त होना है।
महावीर मुक्त होने के बाद भी संसार में हैंसंसार में जीए चालीस वर्ष तक। बुद्ध मुक्त होने के बाद संसार में जीए तीस वर्ष तक। संसार में तो थे। फिर हो क्या गया था उनमें?
वे तो संसार में थेलेकिन संसार उनमें नहीं था।
वे तो संसार में थेलेकिन संसार उनमें नहीं था। हमारे भीतर संसार के होने का स्थान विचार है। हमारे भीतर संसार की प्रतिछवि विचार में बनती है। हमारे भीतर विचार है गृह संसार का। इसलिए विचार के गृह को तोड़ देना संन्यास है। विचार के गृह में बंद होकर रहना गृहस्थ होना है। भीतर विचार की दीवाल हमें घेरे हुए है। चैबीस घंटे उठते-बैठते सोते-जागते विचार का सतत प्रवाह हमें घेरे हुए है। वही विचार हमारी अशांति हैवही विचार हमारी उत्तेजना हैवही विचार हमारी उद्विग्न स्थिति हैवही विचार हमारी ज्वरग्रस्त स्थिति है। इस विचार के विसर्जन सेइस विचार के शांत होने सेइस विचार के ऊहापोह और तरंगों के विलीन होने से भीतर एक शांति का दर्पणभीतर एक शांत चैतन्य की स्थिति उत्पन्न होती है। उसी शांति मेंउसी अनुद्विग्न स्थिति में स्वयं का साक्षात होता है।
मैंने कहाहम पर के साथ इतने व्यस्त हैं कि स्व का स्मरण ही भूल गए हैं। अगर हम पर के साथ अव्यस्त हो जाएंअगर पर थोड़ी देर को हमारे भीतर से अनुपस्थित हो जाएतो स्व का उदघाटन हो जाएगा।
इस हॅाल में हम सारे लोग बैठे हुए हैं। हमनेहॅाल में जो रिक्त स्थान हैउसको भर दिया है। वह रिक्त स्थान कहीं गया नहीं हैकहीं बाहर नहीं निकल गया है। आप जब भीतर आए तो हॅाल का रिक्त स्थान बाहर नहीं निकल गया। अगर उस रिक्त स्थान को वापस उपलब्ध करना होतो कहीं बाहर से लाना नहीं पड़ेगा। अगर हम बाहर हो जाएं तो हॅाल वापस रिक्त हो जाएगा। अगर हम बाहर हो जाएं तो रिक्त स्थान मौजूद है। वह हमसे दब गया हैवह हमसे भर गया हैहमारे निकलते ही वापस रिक्तता को उपलब्ध हो जाएगा।
स्व का स्मरण पर के चिंतन से दब गया हैभर गया है।
अगर पर का चिंतन विसर्जित हो जाएतो स्व उदघाटित हो जाएगा।
स्व कहीं गया नहींस्व निरंतर उपस्थित है..केवल पर से आच्छादित है। पर के आच्छादन को तोड़ने का मार्ग समाधि हैपर के आच्छादन को विच्छिन्न करने का मार्ग ज्ञान है। इसलिए चाहे धर्म कोई हो..जैनों काबौद्धों काहिंदुओं काईसाइयों का..धर्म के चाहे कोई भी रूप होंलेकिन धर्म के भीतर की प्रक्रिया एक ही हैआच्छादन को विच्छेद कर देने कीवह जो हम पर छा गया है,उसे विसर्जित कर देने कीजो हम पर घिर गया हैउस बदली को तोड़ देने कीताकि भीतर से प्रकाश वाले सूरज का उदय हो। एक ही छोटे से सूत्र में समस्त धर्मों का सार संगृहीत है। हम शून्य हो जाएं तो पूर्ण के हमें दर्शन हो जाएंगे। हम शून्य हो जाएं तो हम समाधि में पहुंच गए।
कैसे शून्य हो जाएं?एक छोटा सा विचार भी तो छोड़ा नहीं जातासमस्त विचार की प्रक्रिया कैसे छूटेगी?स्वाभाविक है कि स्वयं से आप पूछें कि एक छोटा सा विचार-कण तो मन से निकलता नहींपूरे विचार की प्रक्रिया कैसे निकलेगी?
और विचार को धक्के दें तो उलटा विचार और प्रभावी हो जाता है। एक विचार को निकालना चाहें तो वह और चार यजमानों को साथ लेकर वापस लौट आता है।
विचार को निकालने का उपाय अगर कभी किए हों..अगर कभी मंदिर मेंमस्जिद मेंदेवालय में बैठ कर प्रभु का स्मरण करने की कोशिश की होतो पता होगाजो विचार सामान्य जीवन में नहीं आते हैंउस मंदिर के घेरे के भीतर बैठ कर आने शुरू हो जाते हैंजब-जब चित्त के साथ चेष्टा की हो कि चित्त शून्य हो जाएशांत हो जाएमौन हो जाएतभी पाया होगा कि मौन करने के प्रयास में तो चित्त के भीतर छिपे हुए न मालूम कितने तरह के विचार के धुएंन मालूम तरह-तरह के विचारों की पर्तेंन मालूम कण-कण से विचारों की लहरें आनी शुरू हो जाती हैंजो वैसे शांत प्रतीत होता थावह शांत होने की चेष्टा में और भी उद्विग्नऔर भी उत्तेजित हो जाता हैऔर उद्वेलित हो जाता है। कभी भी थोड़ा सा प्रयोग करेंगे तो पाएंगे प्रत्येक प्रयोगप्रत्येक प्रयास मन को और भी अशांत कर जाता है। इसलिए साधारणतया वे लोगजो मंदिर में जाते हैंजीवन में ज्यादा अशांत होंगे। वे लोगजो चेष्टा में रत होते हैं चित्त को शांत करने कीजीवन में ज्यादा उद्विग्न होंगे।
उन ऋषियों के बाबत सुना होगा जो अभिशाप देते हैंजो क्रोध में क्या-क्या कह देते हैं। बहुत तरह से लोग अनुभव करते हैं कि चित्त से लड़ने वाले लोग क्रोधी होते हैं। चित्त के साथ दमन करने वाले लोग अत्यंत क्रोध से भरेअत्यंत ज्वरग्रस्त मालूम होंगे। उनकी शांति के नीचे कहीं ज्वालामुखी छिपा हुआ है। असल में मन के साथ दमनमन के साथ संघर्ष मन को जीतने का उपाय नहीं है। मन से जो लड़ेगावह मन को जीतेगा नहीं। मन को जीतने का राज कुछ दूसरा है। इसलिए एक क्षुद्र विचार को भी इस संघर्ष से दूर नहीं किया जा सकता है।
तिब्बत में एक साधु हुआ है। उसके पास एक युवक गया था। तीन-चार वर्ष तक उस युवक ने उस साधु की सेवा की थी। और चाहा था कि कोई सिद्धि मिल जाए। वह साधु टालता रहाटालता रहा। उसने कहामेरे पास तो कोई सिद्धि नहीं। लेकिन युवक माना नहींपीछे पड़ा ही रहा। साधु ने आखिर एक दिन उसे कागज पर एक मंत्र लिख कर दिया और कहायह ले जापांच बार एकांत क्षण में रात्रि को बैठ कर इसे स्मरण कर लेना और तब तू जो चाहेगा चमत्कार और सिद्धि तुझे उपलब्ध हो जाएगी। अब तू भाग जा।
वह युवक भागा। उसी के लिए तो वह तीन वर्ष से रुका थाउमंग से सीढ़ियां उतर रहा था। आखिरी सीढ़ी उतरने को थातो उस साधु ने चिल्ला कर कहा कि सुनो मित्रएक बात तो बताना भूल गया। शर्त अधूरी रह गई। जब पांच बार इस मंत्र को पढ़ो तो याद रखनाबंदर का स्मरण न आए। उस युवक ने कहापागल हुए होजिंदगी भर किसी बंदर का स्मरण नहीं आयापांच बार स्मरण करने में क्यों आएगालेकिन वह पूरी सीढ़ियां भी उतर नहीं पाया था और बंदर ने उसे घेर लिया। वह राह पर चला और बंदर का बिंब उसके भीतर उठने लगा। वह हटाने लगा बंदरतो एक नहीं अनेक झांकने लगे। सारा चित्त जैसे बंदरों की भीड़ से भर गया। वह घर तक पहुंचा तो बंदरों की भीड़ में उसका सारा मनस घिर गया। वह बहुत हैरान हुआ कि साधु जरूर अज्ञानी और नासमझ है। अगर बंदर का स्मरण मंत्र में बाधा देता हैतो उस अज्ञानीउस नासमझ को कहना ही नहीं था। उसने कह कर तो मुसीबत कर दी।
उसने स्नान कियाउसने पवित्र नामों का स्मरण कियावह एकांत गांव के बाहर जाकर बैठाउसने सब उपाय किएलेकिन बंदर साथ थेबंदर से अलग होना संभव नहीं रहा। जितने भी उपाय किए..बंदर ही बंदर थे। आंख खोलता तो उनके प्रतिबिंबआंख बंद करता तो उनके प्रतिबिंबवह सुबह तक तो विक्षिप्त होने लगाबंदर ही बंदर घेरे हुए थेऔर कोई भी विचार नहीं रहा चित्त में,सारे विचार विलीन थेजिन्होंने रोज परेशान किया थावे विचार अब न थेअब केवल एक ही विचार थाक्योंकि एक ही धारणा थी गलत करने की।
सुबह-सुबह उसने साधु को जाकर क्षमा मांगीमंत्र वापस लौटा दिया। साधु ने पूछाक्या दिक्कत हुईउसने कहाअब उसकी बात मत छेड़ो। जो दिक्कत हुईअब उससे मैं पार नहीं पा सकता। अगर यही शर्त है कि बंदर का स्मरण न आएतो इस जिंदगी में यह मन से तोड़ना संभव नहीं है।
जो उसके साथ हुआवह प्रत्येक के साथ होगा। होने के पीछे वैज्ञानिकता है। गलत नहीं हुआठीक हुआ। संघर्ष का परिणाम है यहदमन का परिणाम है यह। उन चीजों का दमन नहीं किया जा सकताजिनकी कोई पाजिटिव सत्ताजिनकी कोई पाजिटिव एक्झिस्टेंसजिनकी कोई विधायक सत्ता नहीं है।
जैसे इस कक्ष में अंधेरा हो रहा हो और हम सारे लोग उस अंधेरे को धक्के देकर निकालने लगें तो वह निकलेगावह नहीं निकलेगा। आप कहेंगे कि इतनी ताकत लगाईलेकिन फिर भी नहीं निकलाअसल में ताकत का प्रश्न ही असंगत है। अंधेरा है नहीं,अगर होता तो धक्के देने से निकल सकता है। अंधेरा नकारात्मक हैवह किसी चीज का अभाव है। वह किसी चीज का भाव नहीं है। वह प्रकाश का अभाव है। इसलिए उसे निकाला नहीं जा सकता। प्रकाश को जला लेंवह नहीं पाया जाता।
निकलता नहींस्मरण रखें। प्रकाश को जलाने से अंधेरा निकल कर बाहर नहीं चला जाता। प्रकाश के आने से वह नहीं पाया जाता है। वह केवल प्रकाश का अभाव था। उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं थी। जिन-जिन चीजों की अपनी कोई सत्ता नहीं हैउन्हें धक्के देकर अलग नहीं किया जा सकता। जिनकी अपनी सत्ता हैउन्हें भर अलग किया जा सकता है।
प्रकाश का अभाव अंधेरा हैध्यान का अभाव विचार है। इसलिए विचार को निकालना नहीं होताध्यान को जगाना होता है। ध्यान में जागरण से विचार का विसर्जन होता है। जिस मात्रा में ध्यान जाग्रत होगाउसी मात्रा में विचार शून्य की तरफ विलीन होते चले जाएंगे। जिस क्षण परिपूर्ण ध्यान उदभव में आएगाविचार नकार हो जाते हैंन हो जाते हैं।
विचार से संघर्ष नहीं..ध्यान के आविर्भाव के लिए प्रयासध्यान के आविर्भाव के लिए पुरुषार्थ!
फिर क्या अर्थ हुआ ध्यान काध्यान का अर्थ हैचित्त को जागरूकता सेचित्त को अवेयरनेस सेचित्त को विवेक से भरना।
महावीर ने अपने साधुओं से कहा थाजागो तो विवेक सेसोओ तो विवेक सेचलो तो विवेक सेउठो-बैठो तो विवेक से।
क्या अर्थ है विवेक का?
विवेक का अर्थ है परिपूर्ण जागरूकपूर्ण जागरूकता से भरे हुए। समस्त शरीर की क्रियाओं के प्रति, मन की समस्त क्रियाओं के प्रति होश से भरे हुए। मन के प्रति जागरूक बनोसाक्षी बनो। मन से लड़ो मतविचार के प्रवाह के प्रति द्रष्टा बनो। तटस्थ द्रष्टा बनोकेवल देखते रह जाओ। विचार को विसर्जित नहीं करना हैकेवल विचार को देखते रह जाओ। मात्र द्रष्टा रह जाओकुछ करो नहीं। केवल होश से भर कर विचार के प्रवाह को देखो..अलिप्तअसंग-भाव से। जैसे राह पर लोग निकलते हैंजैसे राह पर राहगीर निकलते हैं और मैं किनारे खड़ा चुपचाप देख रहा हूं।
मन के मार्ग पर चलते हुए विचार की परंपरा कोमन के मार्ग पर चलते हुए विचार की भीड़ को चुपचाप खड़े होकर देखते रहने का प्रयोग करना होता है। लड़ना नहीं होताउनको छेड़ना नहीं होताउनको रोकना नहीं होताउनको धक्के नहीं देने होतेउस पर शुभ और अशुभ के निर्णय नहीं लेने होतेउनका कंडेमनेशन नहीं करना होता..क्योंकि जैसे ही हमने उनके साथ कुछ कियाप्रवाह तीव्र और त्वरित हो जाएगा..केवल देखना होता हैमात्र द्रष्टा का प्रयोग करना होता है। और क्रमशजिस मात्रा में भीतर मूच्र्छा टूटेगी और विचार के प्रवाह के प्रति जागरूकता आएगीउसी मात्रा में विचार विलीन होने लगते हैं।
सी.एम.जोड पश्चिम का एक बड़ा विचारक था। उसने लिखा हैमैं जीवन भर विचारों से भरा रहा। एक दफा एक मनोविश्लेषक के पास गया। उसने पर्दे के पीछे मुझे एक कोच पर लिटा दियापर्दे के दूसरी तरफ खुद खड़ा हो गया और मुझसे बोलाजो भी विचार चित्त में आ रहे होंउन्हें देख कर जोर से बोलते चले जाओ। जोड ने लिखा हैमैंने भीतर देखा कि जो विचार आएंउनको बोलूं। मैं भीतर देखने लगाटटोलने लगालेकिन मैं बहुत हैरान हो गयावहां कोई विचार आ ही नहीं रहा था। वहां कोई विचार आ ही नहीं रहा थाजोड ने लिखामैं चकित हो गया। जीवन में सोते-जागते जिनका प्रवाह नहीं टूटा थाआज मैं खोजने गया था भीतर और वे नदारद थेवे अनुपस्थित थेभीतर आंख पहुंची और विचार नहीं थे!
जैसे प्रकाश अंधेरे को नहीं देख पातावैसे ही जब भीतर आंख पहुंचेगीभीतर देखने का प्रयास पहुंचेगाभीतर जागरूकता पहुंचेगी तो विचार शून्य हो जाएंगेउनकी सांसें टूट जाएंगीउनके प्राण चले जाएंगे।
सतत उठते-बैठतेसोते-जागते विचार के प्रति जो तंद्रा हैउसको तोड़ना ध्यान हैउसके प्रति जागरूक होना ध्यान है।
बुद्ध के जीवन में एक उल्लेख हैवह मैं कहूंउससे मेरी बात समझ में आ सकेगी।
बुद्ध के पास एक राजकुमार दीक्षित हुआ। उसका नाम श्रोण था। दीक्षा के दूसरे दिन बुद्ध ने कहामेरी एक श्राविका हैउसके घर जाकर भिक्षा ले आना। वह श्राविका के घर भिक्षा लेने गया। उसे उसके सारे जीवन की स्मृतियां कौंध गईं आंखों में। कल तक राजकुमार थाआज उसी मार्ग पर भिक्षा का पात्र लिए चलता थास्वाभाविक थापूरा जीवन उसे दोहर जाए। उसे मार्ग में यह भी स्मरण आयाकल तक घर में पत्नी थीमां थीजो कुछ प्रिय था भोजन वह उपलब्ध होता था। आज कोई न जानेगा..न मालूम क्या मिलेगाउसे सारे सुस्वादु भोजनजो कि उसे सदा प्रिय रहेस्मरण आए।
वह श्राविका के घर जाकर भोजन करता था। देख कर हैरानचकित हो गया कि जो भोजन उसे प्रिय थेवे ही उसे परोसे गए थे!उसने सोचाअजीब सा संयोग हैफिर यह मान कर कि शायद यही भोजन बने होंगेवह चुपचाप भोजन करने लगा। भोजन करता था कि उसे स्मरण आयारोज तो भोजन के बाद घर में दो क्षण विश्राम करता थाआज तो भोजन के बाद दो मील दोपहरी में चलना है। वह श्राविका सामने पंखा झलती थी। उसने कहाभंतेभोजन के बाद दो क्षण विश्राम करेंगे तो अत्यंत अनुग्रह होगा। वह थोड़ा चैंकासोचा क्या बात हैफिर याद आयासंयोग ही होगा कि मुझे भी उस वक्त विचार आया और उसे भी विचार आ गया। चटाई डाल दी गईवह भोजन के बाद विश्राम के लिए लेटा। लेटते ही उसे याद आया कि आज अपना न तो कोई साया हैन अपनी कोई शय्या है। वह श्राविका निकट थी। उसने कहाभंतेशय्या भी किसी की नहींसाया भी किसी का नहीं।
अब संयोग होना कठिन था। वह उठ बैठा। उसने कहामैं हैरान हूंक्या मेरे विचार पढ़ लिए जाते हैं?क्या मेरे विचार संक्रमित हो जाते हैंश्राविका ने कहाध्यान कासतत जागरूकता का प्रयोग करते-करते पहले स्वयं के विचार दिखेफिर स्वयं के विचार विसर्जित हो गए। अब तो मैं हैरान हूंदूसरे के विचार भी दिखते हैंवह भिक्षु घबड़ा गया। वह बहुत परेशान हैउसके हाथ-पैर कंप गए। श्राविका ने कहाक्या घबड़ाने की बात है?लेकिन उसके माथे पर पसीने की बूंदें आ गईं। श्राविका ने कहाइसमें परेशान होने की क्या बात है?
लेकिन वह भिक्षु तो वापस विदा लेकर चल पड़ा। उसने बुद्ध से जाकर कहामैं उस द्वार पर भिक्षा लेने नहीं जाऊंगा। बुद्ध ने कहाकोई असम्मान हो गयाउस श्रोण ने कहाअसम्मान नहींपूरा सम्मान हुआबहुत प्रीतिकर सत्कार हुआ। लेकिन अब उस द्वार पर दुबारा नहीं जाऊंगा। वह श्राविका दूसरे के विचार पढ़ लेती है। और आज उस सुंदर युवती को देख कर मेरे मन में तो वासना भी उठी। वह भी पढ़ ली गई होगी। उसने क्या सोचा होगाकल उसी द्वार पर इस चेहरे को कैसे ले जाऊं?किस भांति मैं उसके सामने खड़ा होऊंगा?
बुद्ध ने कहावहीं जाना होगा। जान कर तुझे भेजा है। तेरी साधना का अंग है वहां जाना। लेकिन तू होश से जाना। घबड़ा मत। अपने भीतर देखते हुए जाना कि क्या उठता है। डरना मत। जो भी वासनाएं उठेंदेखते हुए जाना। विचार उठेंदेखते हुए जाना। केवल देखते हुए जानाकुछ मत करना। फिर लौट कर मुझे कहना।
मजबूरी थीश्रोण को वहीं जाना पड़ा। आज वह बहुत नए ढंग से गया। कल खोया हुआ गया था उसी मार्ग पर..तंद्रिल था,मूच्र्छित थाहोश न थाविचार चलते थे मूच्र्छा में। और आज वह आंख गड़ाए हुएजागरूकसाक्षी होकर देखता हुआ गया। एक-एक विचार के प्रति होश से भरा थाअलग था। वह हैरान हो गया। भीतर देखता थातो सन्नाटा हो जाता था। भीतर से तंद्रा गहरी होती थीतो बाहर देखता थाविचार का प्रवाह चलने लगता था। जब बाहर देखताभीतर विचार चलने लगता। जब भीतर देखताविचार शून्य हो जाता। वह सीढ़ियों पर चढ़ा तो उसे श्वास भी पता चलती थीश्वास भी दिखाई पड़ रही थी..भीतर आती-जाती थी। पैर उठाया तो उसका भी होश था। खाना खायाकौर उठायातो उसका भी परिपूर्ण स्मरण थाश्वास की गति का भी स्पंदन ज्ञात हो रहा था!
वह नाचता हुआ वापस लौटा था। वह बुद्ध के पैरों में गिर पड़ा। उसने कहामुझे तो रहस्य का सूत्र मिल गया। बुद्ध ने कहा,क्या हुआउसने कहाजब मैं भीतर जाग कर देखता था तो पाता थाविचार विलीन हैंजब मैं होश में होता थाविचार अनुपस्थित होते थेजब मैं बेहोश होता थाविचार उपस्थित हो जाते थे!
बुद्ध ने कहामूच्र्छा मन हैअमूच्र्छा मन के पार ले जाती है।
महावीर ने भी कहा हैप्रमत्त होना बंधन हैअप्रमत्त होना मुक्ति है।
प्रमत्तता का अर्थ हैमूच्र्छाबेहोशी..मन के प्रतिमन की क्रियाओं के प्रति।
अप्रमत्तता का अर्थ हैजागरूकताअवेयरनेसहोश।
होशजागरूकता के माध्यम से मन विसर्जित हो जाता हैचिंतन विसर्जित हो जाता हैविचार की लहरें खो जाती हैं। उनकी सुप्त स्थिति में उनसे जो आच्छादित थावह उदघाटित हो जाता है। उसका उदघाटन मुक्ति हैउसका उदघाटन बंधन के बाहर पहुंच जाना है। उसके उदघाटन पर जीवन एक नए डायमेंशन मेंएक नए आयाम मेंएक नए क्षितिज में स्थापित हो जाता है। जिन्होंने उस मुक्त जीवन-क्षण को अनुभव किया हैवे अनंत आनंद के मालिक हो गए हैं। जिन्होंने उस मुक्त क्षण का अनुभव किया हैवे अनंत शांति के मालिक हो गए हैं। और उन सारे लोगों का आश्वासन हैजो भी व्यक्ति कभी भी अपने भीतर झांकेगावह प्रभु के इस अदभुत राज्य का मालिक हो सकता है।
यह आश्वासन प्रत्येक को है। कोई भी अपात्र नहीं है। जीवन के और संबंधों में एक की क्षमता कम होगीदूसरे की ज्यादा होगी। आत्मिक जीवन में सबकी क्षमता समान है। कोई भी अपात्र नहीं हो सकता। आत्मिक जीवन में प्रत्येक की क्षमता समान हैकेवल जागरण को पुकारने कीकेवल अपने भीतर होश को जगाने कीकेवल अपने भीतर प्यास को पैदा करने की बात है। जो ठीक से अपने भीतर थोड़े से जागरूकता के प्रयोग करेगावह ठीक संसार के बीच मुक्ति को अनुभव करेगा।
अंततः यह जो मैं कहायह किन्हीं विशिष्ट लोगों के लिए नहीं कहा है। यह हममें से प्रत्येक के लिए कहा है। जो हड्डी और मांस महावीर की देह को बनाते थेवे ही हड्डी और मांस हमारी देह को बनाते हैं। जो चेतना उनकी उस देह के भीतर स्थापित थी,वही चेतना हमारी देह के भीतर भी स्थापित है। एक कण का भी अंतर नहीं है। एक कण का भी अंतर नहीं हो सकता है।
फिर हमें अपमानित होना चाहिए। हम मंदिरों में पूजा करते हैं। हमें असल में महावीरबुद्ध और ईसा को देख कर अपमानित होना चाहिए। हमें आत्म-निंदित होना चाहिए। उनकी श्रद्धा और आदर में कहीं हम अपने अपमान को तो नहीं छिपा लेते हैंउन्हें देख कर हमारे भीतर कहीं अपमान नहीं होताहमें ऐसा भी तो नहीं होता कि इस शरीरइस चैतन्य को वे किस परम प्रभु तक पहुंचा दिए हैंऔर हमहम कहां उसे पशु के घेरे में घुमा रहे हैंक्या हमारे भीतर अपमान नहीं सरकता?
अगर मंदिर और उनमें विराजमान मूर्तियां हमें अपमानित नहीं करती हैंतो मंदिर व्यर्थ हैंवे मूर्तियां व्यर्थ हैं। हम श्रद्धा की गुहार मेंऔर पूजा और अर्चना मेंऔर उनके नाम के स्मरण में अपने आत्म-अपमान को भुला देते हैं!
उस अपमान का मैं स्मरण दिलाना चाहता हूं। और हमारे भीतर कोई प्यास सरक जाए और अपमान पकड़ लेऔर कोई पुरुषार्थ,कोई संकल्प पैदा हो जाए..कि जो किन्हीं लोगों ने कभी उपलब्ध किया हैउसे हम भीमैं भी उपलब्ध करूंगामुझे भी उपलब्ध करना हैमैं भी बिना उपलब्ध किए अपने इस जीवन को व्यर्थ खोने को नहीं हूं। अगर यह संकल्प पकड़ जाए तो जीवन में अदभुत..निश्चित ही अदभुत क्रांति घटित हो सकती है।
प्रभु करेवह क्रांति प्रत्येक के जीवन में घटित हो जाएयही मेरी कामना है। और अंत में सबके भीतर बैठे हुए परम प्रकाशमान प्रभु को मैं प्रणाम करता हूं। 

मेरे प्रणाम स्वीकार करें। 

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