शुक्रवार, 1 जून 2018

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-10

अहिंसा एक अनुभव हैसिद्धांत नहीं। और अनुभव के रास्ते बहुत भिन्न हैं,सिद्धांत को समझने के रास्ते बहुत भिन्न हैं..अक्सर विपरीत। सिद्धांत को समझना हो तो शास्त्र में चले जाएंशब्द की यात्रा करेंतर्क का प्रयोग करें। अनुभव में गुजरना हो तो शब्द सेतर्क सेशास्त्र से क्या प्रयोजन हैसिद्धांत को शब्द के बिना नहीं जाना जा सकता और अनुभूति शब्द से कभी नहीं पाई गई। अनुभूति पाई जाती है निःशब्द में और सिद्धांत है शब्द में। दोनों के बीच विरोध है। जैसे ही अहिंसा सिद्धांत बन गई वैसे ही मर गई। फिर अहिंसा के अनुभव का क्या रास्ता हो सकता है?
अब महावीर जैसा या बुद्ध जैसा कोई व्यक्ति है तो उसके चारों तरफ जीवन में हमें बहुत कुछ दिखाई पड़ता है। जो हमें दिखाई पड़ता हैउसे हम पकड़ लेते हैंमहावीर कैसे चलते हैंकैसे खाते हैंक्या पहनते हैं,किस बात को हिंसा मानते हैंकिस बात को अहिंसा। महावीर के आचरण को देख कर हम निर्णय करते हैं और सोचते हैं कि वैसा आचरण अगर हम भी बना लें तो शायद जो अनुभव है वह मिल जाए। 

लेकिन यहां भी बड़ी भूल हो जाती है। अनुभव मिले तो आचरण आता है, लेकिन आचरण बना लेने से अनुभव नहीं आता। अनुभव हो भीतर तो आचरण बदलता हैरूपांतरित होता है। लेकिन आचरण को कोई बदल ले तो अभिनय से ज्यादा नहीं हो पाता। महावीर नग्न खड़े हैं तो हम भी नग्न खड़े हो सकते हैं। महावीर की नग्नता किसी निर्दोष तल पर नितांत सरल हो जाने से आई है। हमारी नग्नता हिसाब सेगणित सेचालाकी से आएगी। हम सोचेंगे नग्न हुए बिना मोक्ष नहीं मिल सकता। तो फिर एक-एक वस्त्र को उतारते चले जाएंगे। हम नग्नता का अभ्यास करेंगे। 
अभ्यास से कभी कोई सत्य आया हैअभ्यास से अभिनय आता है।

एक गांव के पास से मैं गुजर रहा था। एक मित्र संन्यासी हो गए हैं। उनका झोपड़ा पड़ता था पासतो मैं देखने गया। जंगल में,एकांत में झोपड़ा है। पास पहुंच कर देखा मैंने कि अपने कमरे में वह नग्न टहल रहे हैं। दरवाजा खटखटाया तो देखा वह चादर लपेट कर आए हैं। मैंने उनसे पूछाभूलता नहीं हूंखिड़की से मुझे लगा कि आप नंगे टहल रहे थेफिर चादर क्यों पहन ली हैउन्होंने कहानग्नता का अभ्यास कर रहा हूं। धीरे-धीरे एक-एक वस्त्र छोड़ता गया हूं। अब अपने कमरे में नग्न रहता हूं। फिर धीरे-धीरे मित्रों मेंप्रियजनों मेंफिर गांव मेंफिर राजधानी में नग्न रहने का इरादा है। धीरे-धीरे नग्नता का अभ्यास कर रहा हूंक्योंकि नग्न हुए बिना मोक्ष नहीं है।

यह व्यक्ति भी नग्न खड़े हो जाएंगे। महावीर की नग्नता से इनकी नग्नता का क्या संबंध होगामैंने उनसे कहा कि संन्यासी होने के बजाय सरकस में भर्ती हो जाओ तो अच्छा है। ऐसे भी संन्यासियों में अधिकतम सरकस में भर्ती होने की योग्यता रखते हैं। अभ्यास से साधी हुई नग्नता का क्या मूल्य हैभीतर निर्दोषता का कोई अनुभव होकोई फूल खिले सरलता का और बाहर वस्त्र गिर जाएं और पता न चले तो यह समझ में आ सकता है। लेकिन हमें तो दिखाई पड़ता है आचरणअनुभव तो दिखाई नहीं पड़ता।

महावीर को हमने देखा तो दिखाई पड़ा आचरण। अनुभव तो दिखाई नहीं पड़ सकतालेकिन महावीर का आचरण सबको दिखाई पड़ सकता है। फिर हम उस आचरण को पकड़ कर नियम बनाते हैंसंयम का शास्त्र बनाते हैंअहिंसा की व्यवस्था बनाते हैं और फिर उसे साधना शुरू कर देते हैं। फिर क्या खानाक्या पीनाकब उठनाकब सोनाक्या करनाक्या नहीं करना..उस सबको व्यवस्थित कर लेते हैंउसका एक अनुशासन थोप लेते हैं।

अनुशासन पूरा हो जाएगा और अहिंसा की कोई खबर न मिलेगी। अनुशासन से अहिंसा का क्या संबंधसच तो यह है कि ऊपर से थोपा गया अनुशासन भीतर की आत्मा को उघाड़ता कम हैढांकता ज्यादा है। जितना बुद्धिहीन आदमी हो उतना अनुशासन को सरलता से थोप सकता है। जितना बुद्धिमान आदमी हो उतना मुश्किल होगाउतना वह उस स्रोत की खोज में होगा जहां से आचरण आया है छाया की भांति।
इसलिए पहली बात मैंने कहीः अहिंसा अनुभव है। दूसरी बात आपसे कहता हूं कि अहिंसा आचरण नहीं है। आचरण अहिंसा बनता हैलेकिन अहिंसा स्वयं आचरण नहीं है। इस घर में हम दीए को जलाएं तो खिड़कियों के बाहर भी रोशनी दिखाई पड़ती है। लेकिन दीया खिड़की के बाहर दिखाई पड़ती रोशनी का ही नाम नहीं है। दीया जलेगा तो खिड़की से रोशनी भी दिखाई पड़ेगी। वह उसके पीछे आने वाली घटना है जो अपने आप घट जाती है।
एक आदमी गेहूं बोता है तो गेहूं के साथ भूसा अपने आप पैदा हो जाता हैउसे पैदा नहीं करना पड़ता। लेकिन किसी को भूसा पैदा करने का ख्याल हो और वह भूसा बोने लगे तो फिर कठिनाई शुरू हो जाएगी। बोया गया भूसा भी सड़ जाएगानष्ट हो जाएगा। उससे भूसा तो पैदा होने वाला ही नहीं। गेहूं बोया जाता हैभूसा पीछे से अपने आप साथ-साथ आता है।
अहिंसा वह अनुभव हैवह आचरण है जो पीछे से अपने आप आता हैलाना नहीं पड़ता। जिस आचरण को लाना पड़े वह आचरण सच्चा नहीं है। जो आचरण आएउतरेप्रकट होफैलेपता भी न चलेसहजवही आचरण सत्य है।
तो दूसरी बात यह है कि आचरण को साध कर हम अहिंसा को उपलब्ध न हो सकेंगे। अहिंसा आए तो आचरण भी आ सकता है। फिर अहिंसा कैसे आएहमें सीधा-सरल यही दिखाई देता है कि जीवन को एक व्यवस्था देने से अहिंसा पैदा हो जाएगी। लेकिन असल में जीवन को व्यवस्था देने से अहिंसा पैदा नहीं होती। चित्त के रूपांतरण से अहिंसा पैदा होती है। और यह रूपांतरण कैसे आए,इसे समझने के लिए दो-तीन बातें समझनी उपयोगी होंगी।
पहला तो यह शब्द अहिंसा बहुत अदभुत है। यह शब्द बिल्कुल नकारात्मक है। महावीर प्रेम शब्द का भी प्रयोग कर सकते थे,नहीं किया। जीसस तो प्रेम शब्द का प्रयोग करते हैं। शायद प्रेम शब्द का प्रयोग करने के कारण ही जीसस जल्दी समझ में आते हैं बजाय महावीर के। महावीर निषेधात्मक शब्द का प्रयोग करते हैं। अहिंसा में वे कहना चाहते हैं: ‘हिंसा नहीं है।’ वे और कुछ भी नहीं कहना चाहते। हिंसा न हो जाए तो जो शेष रह जाएगावह अहिंसा होगी। अहिंसा को लाने का सवाल ही नहीं है। वह उस शब्द में ही छिपा है। अहिंसा को विधायक रूप से लाने का कोई सवाल ही नहीं हैकोई उपाय ही नहीं है।
इसे और एक तरह से देखना जरूरी है। हिंसा और अहिंसा विरोधी नहीं हैंप्रकाश और अंधकार विरोधी नहीं हैं। अगर प्रकाश और अंधकार विरोधी हों तो हम अंधकार को लाकर दीए के ऊपर डाल सकते हैंदीए को बुझना पड़ेगा। नहींअंधकार विरोधी नहीं है प्रकाश काअंधकार अभाव है प्रकाश का। अभाव और विरोध में कुछ फर्क है। विरोधी का अस्तित्व होता हैअभाव का अस्तित्व नहीं होता। अंधेरे का कोई अस्तित्व नहीं होताप्रकाश का अस्तित्व है। अगर अंधेरे के साथ कुछ करना हो तो सीधा अंधेरे के साथ कुछ नहीं किया जा सकता। न तो अंधेरा लाया जा सकता हैन निकाला जा सकता है। नहीं तो दुश्मन के घर में हम अंधेरा फेंक आएं। कुछ भी करना हो अंधेरे के साथ तो प्रकाश के साथ करना पड़ेगा। अंधेरा लाना हो तो प्रकाश बुझाना पड़ेगा। अंधेरा हटाना हो तो प्रकाश जलाना पड़ेगा।
इसलिए जब यहां अंधेरा मिटता है तो प्रकाश हो जाता है। हम कहते हैंअंधेरा मिट गयाइससे ऐसा लगता है जैसे अंधेरा था। लेकिन अंधेरा है सिर्फ प्रकाश का अभाव। प्रकाश आ गया..इतना सार्थक है। और प्रकाश आ गया तो अंधेरा कैसे रह सकता हैवह अब नहीं है। न वह कभी था।
महावीर निषेधात्मक अहिंसा शब्द का प्रयोग करते हैं। वे कहते हैं कि हिंसा हैहिंसा में हम खड़े हुए हैं। हिंसा न हो जाए तो जो शेष रह जाएगा उसका नाम अहिंसा है। लेकिन अगर किसी ने अहिंसा को विधायक बनाया तो वह हिंसक रहते हुए अहिंसा साधने की कोशिश करेगा। हिंसक रहेगा और अहिंसा साधेगा। हिंसक के द्वारा अहिंसा कभी नहीं साधी जा सकती। और अगर साध भी लेगा तो उसकी अहिंसा में हिंसा के सब तत्व मौजूद रहेंगे। वह अहिंसा से भी सताने का काम शुरू कर देगा।
इसलिए मैं गांधी जी की अहिंसा को अहिंसा नहीं मानता हूं। गांधी जी की अहिंसा उस अर्थ में अहिंसा नहीं है जिस अर्थ में महावीर की अहिंसा है। गांधी जी की अहिंसा में भी दूसरे को दबानेदूसरे को बदलनेदूसरे को भिन्न करने का आग्रह है। उसमें हिंसा है। अगर हम ठीक से कहें तो गांधी जी की अहिंसा अहिंसात्मक हिंसा है।
मैं आपकी छाती पर छुरी लेकर खड़ा हो जाऊं और कहूं कि जो मैं कहता हूं वह ठीक हैआप उसे मानेंतो यह हिंसा है। और मैं अपनी छाती पर छुरी लेकर खड़ा हो जाऊं और कहूं कि जो ठीक है वह मानें नहीं तो मैं छुरी मार लूंगायह अहिंसा कैसे हो जाएगी?
अनशन कैसे अहिंसा हो सकता है?सत्याग्रह कैसे अहिंसा हो सकता हैउसमें दूसरे पर दबाव डालने का भाव पूरी तरह उपस्थित है। सिर्फ दबाव डालने का ढंग बदल गया है। एक आदमी कहता है कि मैं भूखा मर जाऊंगा अगर तुम नहीं बदले...
अंबेडकर के विरोध में गांधी जी ने अनशन किया। अंबेडकर झुक गया। लेकिन बाद में अंबेडकर ने कहा कि गांधी जी इस भूल में न पड़ें कि मेरा हृदय बदल गया है। मैं सिर्फ यह सोच कर कि मेरे कारण गांधी जी जैसा आदमी न मर जाएपीछे हट गया हूं। और गांधी जी अपने पूरे जीवन में एक आदमी का भी हृदय परिवर्तन नहीं कर पाए।
असल मेंहिंसा से हृदय परिवर्तन हो ही नहीं सकता। हिंसा दमन हैदबाव हैजबरदस्ती है। हांजबरदस्ती दो ढंग की हो सकती है। मैं आपको मारने की धमकी दूंतब भी जबरदस्ती हैऔर मैं अपने को मारने की धमकी दूंतब भी जबरदस्ती है। और मेरी दृष्टि में दूसरी जबरदस्ती ज्यादा खतरनाक है। पहली जबरदस्ती में आपके पास उपाय भी है सीधा सिर खड़ा करके लड़ने का। दूसरी जबरदस्ती में मैं आपको निःशस्त्र कर रहा हूंआपका नैतिक बल भी छीन रहा हूंआपको दबा भी रहा हूं।
अहिंसा अगर हिंसा के भीतर रहते साधी जाएगी तो ऊपर अहिंसा हो जाएगीभीतर हिंसा मौजूद रहेगी। क्योंकि अहिंसा और हिंसा विरोधी चीजें नहीं हैं। गांधी जी के ख्याल में अहिंसा और हिंसा विरोधी चीजें हैं। अहिंसा को साधो तो हिंसा खत्म हो जाएगी। लेकिन कौन साधेगा अहिंसा कोहिंसक आदमी साधेगा तो अहिंसा भी साधन बनेगी उसकी हिंसा का। वह फिर अहिंसा से वही उपयोग लेना शुरू कर देगा जो उसने तलवार से लिया होगा।
पूछा जा सकता है कि महावीर ने जिंदगी भर सत्याग्रह क्यों नहीं किया?पूछा जा सकता है कि महावीर ने किसी को बदलने का आग्रह क्यों नहीं किया?
सच तो यह है कि सत्याग्रह शब्द ही बेहूदा है। सत्य का कोई आग्रह नहीं हो सकता। क्योंकि जहां आग्रह हैवहां सत्य कैसे टिकेगा?आग्रह असत्य का ही होता है। सब सत्याग्रह असत्य-आग्रह है। कैसे सत्य का आग्रह हो सकता है?
महावीर कहते हैं कि सत्य का आग्रह भी किया तो हिंसा शुरू हो गई। क्योंकि अगर मैंने यह कहा कि जो मैं कहता हूं वही सत्य है तो मैंने हिंसा करनी शुरू कर दीमैंने दूसरे व्यक्ति को चोट पहुंचानी शुरू कर दी। इसलिए महावीर सत्य का आग्रह भी नहीं करते। इसी से उनके स्यात की कल्पना हैइसी से उनके अनेकांत की धारणा का जन्म हुआ है।
एक छोटी सी कहानी से समझाना चाहूंगा। एक गांव में एक क्रोधी आदमी है जिसके क्रोध ने चरम स्थिति ले ली है। उसने अपने बच्चे को कुएं में धक्का देकर मार डाला। उसने अपनी पत्नी को मकान के भीतर करके आग लगा दी। फिर पछताया हैदुखी हुआ है। गांव में एक मुनि आए हुए हैं। वह उनके पास गया और उनसे कहा कि मैं अपने क्रोध को किस प्रकार मिटाऊंमुझे कुछ रास्ता बताएं कि मैं इस क्रोध से मुक्त हो जाऊं। मुनि ने कहा कि सब त्याग कर दोसंन्यासी हो जाओसब छोड़ दोतभी क्रोध जाएगा।
मुनि नग्न थे। उस व्यक्ति ने भी कपड़े फेंक दिए। वह वहीं नग्न खड़ा हो गया। मुनि ने कहाअब तक मैंने बहुत लोग देखे संन्यास मांगने वालेलेकिन तुम जैसा तेजस्वी कोई भी नहीं दिखा। इतनी तीव्रता से तुमने वस्त्र फेंक दिएलेकिन मुनि भी न समझ पाए कि जितनी तीव्रता से कुएं में धक्का दे सकता है वहउतनी ही तीव्रता से वस्त्र भी फेंक सकता है। वह क्रोध का ही रूप है। असल में क्रोध बहुत रूपों में प्रकट होता है। क्रोध संन्यास भी लेता है। इसलिए संन्यासियों में निन्यानबे प्रतिशत क्रोधी इकट्ठे मिल जाते हैं। उसके कारण हैं।
उसने वस्त्र फेंक दिए हैंवह नग्न हो गया हैवह संन्यासी हो गया है। दूसरे साधक पीछे पड़ गए हैं। उससे साधना में कोई आगे नहीं निकल सकता। क्रोध किसी को भी आगे नहीं निकलने देता। क्रोध ही इसी बात का है कि कोई मुझ से आगे न हो जाए। वह साधना में भी उतना ही क्रोधी है। लेकिन साधना की खबर फैलने लगी। जब दूसरे छाया में बैठे रहते हैंवह धूप में खड़ा रहता है। जब दूसरे भोजन करते हैंवह उपवास करता है। जब दूसरे शीत से बचते हैंवह शीत झेलता है। उसके महातपस्वी होने की खबर गांव-गांव में फैल गई है। उसके क्रोध ने बहुत अदभुत रूप ले लिया है। कोई नहीं पहचानतावह खुद भी नहीं पहचानता कि यह क्रोध ही है जो नए-नए रूप ले रहा है।
फिर वह देश की राजधानी में आया। दूर-दूर से लोग उसे देखने आते हैं। देश की राजधानी में उसका एक मित्र है बचपन का। वह बड़ा हैरान है कि वह क्रोधी व्यक्ति संन्यासी कैसे हो गयाहालांकि नियम यही है। वह देखने गया उसे। संन्यासी मंच पर बैठा है। वह मित्र सामने बैठ गया। संन्यासी की आंखों से मित्र को लगा है कि वह पहचान तो गया। लेकिन मंच पर कोई भी बैठ जाए फिर वह नीचे मंच वाले को कैसे पहचानेपहचानना बहुत मुश्किल है। फिर वह मंच कोई भी होचाहे वह राजनीतिक होचाहे गुरु की हो। मित्र ने पूछाआपका नाम?संन्यासी ने कहाशांतिनाथ। फिर परमात्मा की बात करते रहे। मित्र ने संन्यासी से फिर वही प्रश्न किया। संन्यासी का हाथ डंडे पर गया। उसने कहाबहरे तो नहीं हो?बुद्धिहीन तो नहीं होकितनी बार कहूं कि मेरा नाम है शांतिनाथमित्र थोड़ी देर चुप रहा। कुछ और बात चलती रही आत्मा-परमात्मा की। फिर उसने पूछा कि क्षमा करिएआपका नाम क्या है?फिर आप सोच सकते हैं क्या हुआ। वह डंडा उस मित्र के सिर पर पड़ा। उसने कहा कि तुझे समझ नहीं पड़ता कि मेरा नाम क्या हैमित्र ने कहा कि अब मैं पूरी तरह समझ गया। यह पता लगाने के लिए ही तीन बार नाम पूछा है कि आदमी भीतर बदला है या नहीं बदला है।
अहिंसा कांटों पर लेट सकती हैभूख सह सकती हैशीर्षासन कर सकती हैआत्म-पीड़ा बन सकती है..अगर भीतर हिंसा मौजूद हो। दूसरों को भी दुख और पीड़ा का उपदेश दे सकती है। हिंसा भीतर होगी तो वह इस तरह के रूप लेगीखुद को सताएगीदूसरों को सताएगी और इस तरह के ढंग खोजेगी कि ढंग अहिंसक मालूम होंगे लेकिन भीतर सताने की प्रवृत्ति परिपूर्ण होगी।
असल में अगर एक व्यक्ति अपने अनुयायी इकट्ठा करता फिरता हो तो उसके अनुयायी इकट्ठा करने में और हिटलर के लाखों लोगों को गोली मार देने में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। असल में गुरु भी मांग करता है अनुयायी से कि तुम पूरी तरह मिट जाओ,तुम बिल्कुल न रहोतुम्हारा कोई व्यक्तित्व न बचेसमर्पित हो जाओ पूरे। अनुयायी की मांग करने वाला गुरु भी व्यक्तित्व को मिटाता है सूक्ष्म ढंगों सेपोंछ देता है व्यक्तियों को। फिर सैनिक रह जाते हैं जिनके भीतर आत्मा समाप्त कर दी गई है। हिटलर जैसा आदमी सीधा गोली मार कर शरीर को मार देता है।
पूछना जरूरी है कि शरीर को मिटा देने वाले ज्यादा हिंसक होंगे या फिर आत्मा कोव्यक्तित्व को मिटा देने वाले ज्यादा हिंसक होते हैंकहना मुश्किल है। लेकिन दिखाई तो यही पड़ता है कि किसी के शरीर को मारा जा सकता है और हो सकता है कि व्यक्ति बच जाएतब आपने कुछ भी नहीं माराऔर यह भी हो सकता है कि शरीर बच जाए और व्यक्ति भीतर मार डाला जाएतो आपने सब मार डाला। अगर भीतर हिंसा होऊपर अहिंसा होतो दूसरों को मारने कीदबाने की नई-नई तरकीबें खोजी जाएंगी।
और तरकीबें खोजी जाती हैं। यह भी हो सकता है कि आदमी सिर्फ इसीलिए एक तरह का चरित्र बनाने में लग जाए कि उस चरित्र के माध्यम से वह किसी को दबा सकता हैगला घोंट सकता हैऔर मैं पवित्र हूंमैं संत हूंमैं साधु हूं..इसकी भावना से दूसरे की छाती पर बैठ सकता हैइस अहंकार को दूसरे की फांसी बना सकता हैइसकी पूरी संभावना है।
इसलिए महावीर अहिंसा की विधायक साधना का कोई प्रश्न ही नहीं उठाते। बात बिल्कुल दूसरी है उनके हिसाब से। उनके हिसाब से बात यह है कि मैं हिंसक हूंदूसरे को दुख देने में मुझे सुख मालूम होता हैदूसरे के सुख से भी दुख मालूम होता है। यह हमारी स्थिति हैयहां हम खड़े हैं। अब क्या किया जा सकता हैऐसे आचरण को क्षीण किया जाए जो दूसरे का अहित करता हो और ऐसे आचरण को प्रस्तावित किया जाए जो दूसरे का मंगल करता होएक रास्ता यह है। इस रास्ते को मैं नैतिक कहता हूं। और नैतिक व्यक्ति कभी पूरे अर्थों में अहिंसक नहीं हो सकता।
गांधी जी को मैं नैतिक महापुरुष कहता हूंधार्मिक महापुरुष नहीं। शायद उन जैसा नैतिक व्यक्ति हुआ भी नहीं। लेकिन वह नैतिक ही हैं। उनकी अहिंसा नैतिक तल पर है।
महावीर नैतिक व्यक्ति नहीं हैं। महावीर धार्मिक व्यक्ति हैं। और धार्मिक व्यक्ति से मेरा क्या प्रयोजन हैधार्मिक व्यक्ति से मेरा प्रयोजन है ऐसा व्यक्ति जिसने अपनी हिंसा को जाना-पहचाना और जिसने अपनी हिंसा के साथ कुछ भी नहीं कियाजो अपनी हिंसा के प्रति पूरी तरह ध्यानस्थ हुआजाग्रत हुआजिसने अपनी हिंसा की कुरूपता को पूरा-पूरा देखा और कुछ भी नहीं किया।
तो मेरी दृष्टि ऐसी है कि अगर कोई व्यक्ति अपने भीतर की हिंसा को पूरी तरह देखने में समर्थ हो जाए और उसे पूरा पहचान लेउसके अणु-परमाणुओं को पकड़ लेउठने-बैठनेचलने मेंमुद्रा में जो हिंसा है उस सबको पहचान लेजान लेसाक्षी हो जाए,विवेक से भर जाएतो वह व्यक्ति अचानक पाएगा कि जहां-जहां विवेक का प्रकाश पड़ता है हिंसा परवहां-वहां हिंसा विदा हो जाती हैउसे विदा नहीं करना होता। वह वहां से क्षीण हो जाती हैसमाप्त हो जाती है। न उसे दबाना पड़ता हैन उसे बदलना पड़ता है। सिर्फ चेतना के समक्ष आते वह वैसे ही विदा हो जाती है जैसे सुबह सूरज निकले और ओस विदा होने लगे। वे ओस-कण विदा होते हैं सूरज के निकलते हीउन्हें विदा करना नहीं होता। उतने ताप को वे झेलने में असमर्थ हैं।
चेतना का एक ताप है। महावीर जिसे तप कहते हैं वह चेतना का ताप है। अगर चेतना पूरी की पूरी व्यक्तित्व के प्रति जागरूक हो जाए तो व्यक्तित्व में जो भी कुरूप है वह रूपांतरित होना शुरू हो जाएगा। उसे रूपांतरित करना नहीं होगा।
कुछ दिन पहले एक घटना घटी। मेरे एक मुसलमान मित्र हैं। हाई कोर्ट के वकील हैं। जिस गांव का मैं हूं वह उसी गांव के हैं। मेरे पास आए कोई साल भर हुआ। उन्होंने कहा कि बहुत वर्षों से सोचता हूं कि आपसे जाकर बात करूं। लेकिन नहीं आयाक्योंकि जब भी मैं आप जैसे लोगों के पास जाता हूं तो वे कहते हैं कि यह छोड़ोवह छोड़ो। न मुझसे जुआ छूटतान शराब छूटतीन मांस छूटता। बात वहीं अटक जाती है। कुछ भी नहीं छूटता। फिर मैं वहीं का वहीं रह जाता हूं। फिर मैंने उनसे पूछाआज आप कैसे आ गएउन्होंने कहा कि किसी के घर भोजन पर गया था और उन्होंने कहा कि आप तो कुछ छोड़ने को कहते नहीं। तो मैं सीधा यहीं चला आया हूं। मैंने उनसे कहा कि मैं छोड़ने को क्यों कहूंगाछोड़ने से मुझे कोई संबंध नहीं है। आप छोड़ो मतजागो। आप कुछ देखने की कोशिश करो भीतरकुछ निरीक्षण करोकुछ होश से भरोकुछ मूच्र्छा को तोड़ो। उन्होंने कहाक्या किया जा सकता है?क्या मुझे जुआ नहीं छोड़ना पड़ेगा?शराब नहीं छोड़नी पड़ेगी?
मैंने उनसे कहा कि आप जिस चेतना की स्थिति में हैं उसमें शराब अनिवार्य है। अगर एक शराब छोड़ेंगे दूसरी शराब पकड़ेंगे,दूसरी शराब छोड़ेंगे तीसरी शराब पकड़ेंगे। और इतनी किस्म-किस्म की शराबें हैं जिनका कोई हिसाब नहीं। अधार्मिक शराबें हैंधार्मिक शराबें भी हैं। एक आदमी भजन-कीर्तन कर रहा है दो घंटे से और मूच्र्छित हो गया है। वह उतना ही रस ले रहा है भजन-कीर्तन में,वही रस मूच्र्छा का जो एक शराबी ले रहा है। मंदिर में भी शराबी इकट्ठे होते हैं। वहां भी मूच्र्छित होने की तरकीबें खोजते हैं। एक आदमी नाच रहा हैढोल-मंजीरा पीट रहा है। उस नाच मेंढोल-मंजीरा पीटने में मूच्र्छित हो गया। अब वह शराब का ही मजा ले रहा है। बहुत किस्म की शराबें हैं।
मैंने उनसे कहालेकिन चेतना अगर शराब पीने वाली है तो आप शराब बदल सकते हैंशराब नहीं छूट सकती। चेतना बदले तो कुछ हो सकता है। मैंने उन्हें महावीर का एक छोटा सा सूत्र कहा। महावीर कहते हैंउठो तो विवेक सेचलो तो विवेक सेबैठो तो विवेक सेसोओ तो विवेक से। विवेक का मतलब है कि चलते समय पूरी चेतना हो कि मैं चल रहा हूंबैठते समय पूरी चेतना हो कि मैं बैठ रहा हूंउठते समय पूरी चेतना हो कि मैं उठ रहा हूं। बेहोशी में कोई कृत्य न हो पाएसोए-सोए कोई कृत्य न हो पाए। होशपूर्वक जीना हो तो धीरे-धीरे भीतर के समस्त चित्त के प्रति जागना है।
और जागते ही रूपांतरण शुरू हो जाता है। जाग कर रूपांतरण करना नहीं पड़ता है। बुद्ध जिसे सम्यक स्मृति कहते हैंमहावीर उसे विवेक कहते हैंजीसस ने उसे अवेयरनेस कहा हैगुरजिएफ ने उसे सेल्फ रिमेंबरिंग कहा है। कुछ भी नाम दिया जा सकता है,लेकिन एक ही बात है। हम सोए-सोए जीते हैं।
मैंने सुना है कि बुद्ध एक गांव से गुजर रहे हैं। एक मित्र से बात कर रहे हैं। एक मक्खी कंधे पर आकर बैठ गई है। बुद्ध ने बात करते हुए मक्खी उड़ा दी है। बात जारी रखी है और मक्खी उड़ा दी है। फिर रुक गए। मक्खी तो उड़ गई हैफिर रुक गए हैं। फिर दुबारा हाथ ले गए वहां जहां मक्खी थीअब वह वहां नहीं है। साथी मित्र ने पूछाआप क्या कर रहे हैंबुद्ध ने कहा कि मैं तुमसे बातचीत करने में लीन था और मैंने मक्खी को बिल्कुल मूच्र्छित भाव से उड़ा दिया जैसे कोई बेहोश उड़ाता हो। अब मैं होशपूर्वक उड़ा रहा हूं जैसा कि मुझे उड़ाना चाहिए था।
तो मैंने अपने मित्र को कहा कि जीवन की क्रियाओं में होशपूर्वक जीने का प्रयोग करो।
छह महीने बाद वह मेरे पास आए और मुझे कहा कि आपने मुझे धोखा दिया है। शराब पीनी मुश्किल होती चली जाती है,क्योंकि दो बातें एक साथ चलनी असंभव हैं। अगर मुझे होशपूर्वक जीना है तो मैं शराब नहीं पी सकता हूं। और अगर होशपूर्वक नहीं जीना है तो मैं शराब पी सकता हूं। लेकिन अब होशपूर्वक जीने में जो आनंद की अनुभूति शुरू हुई है वह शराब पीने से कभी नहीं मिली।
एक और बात उन्होंने मुझे कही कि एक अदभुत अनुभव मुझे हुआ है कि जब मैं दुखी था तो शराब दुख को भुला देती थी। इधर अभी महीनों निरंतर जागने की कोशिश से सुख की एक धार भीतर बहनी शुरू हुई हैएक झरना भीतर फूटना शुरू हुआ है। शराब पीता हूं तो मैं भूल जाता हूं। शराब सिर्फ भुलाती है। सुखी आदमी को सुख भुला देती हैदुखी आदमी को दुख भुला देती है। और दुखी आदमी शराब खोजेसमझ में आता है। सुखी आदमी शराब कैसे खोज सकता हैतो उन्होंने कहा कि मुश्किल हो गया।
मैंने कहामुश्किल हो जाए बात अलगलेकिन मुझसे उसकी बात मत करना। आप जागने काध्यान का प्रयोग जारी रखें।
मेरी दृष्टि में महावीर ने अहिंसा का उपदेश ही नहीं दिया। महावीर ने तो ध्यान का एक उपदेश दिया। उस ध्यान से जो भी गुजरावह अहिंसक हो गया। उस ध्यान से गुजरने वाले को अहिंसक हो जाना पड़ा। उस ध्यान से जो गुजरेगा वह अहिंसक हो ही जाएगा। अहिंसा की अलग से शिक्षा देने की कोई जरूरत नहीं है।
लेकिन अब महावीर के पीछे चलने वाले लोग हैं। वे अहिंसा परमो धर्मः’ की तख्तियां लगाए हुए बैठे हैं। वे बैठे रहेंगे तख्तियां लगाए हुए और हिंसा चलती रहेगी। और वे अपने बच्चों को अहिंसा का उपदेश दे रहे हैं। वे सारी दुनिया में शोरगुल मचा रहे हैं कि अहिंसक हो जाना चाहिए सब को। और उन्हें शायद मूल सूत्र का पता ही नहीं है कि अहिंसक कोई होगा कैसेभीतर चित्त जागे तो जागे चित्त से हिंसा विसर्जित होती है। जागे हुए चित्त में हिंसा नहीं रह जाती। जागा हुआ चित्त हिंसा से मुक्त हो जाता हैहिंसा से मुक्त होना नहीं पड़ता। और तब जो शेष रह जाता हैवह अहिंसा है।
अहिंसा शब्द नकारात्मक है। हिंसा चली जाती है तो जो शेष रह जाती है वह अहिंसा है। ब्रह्मचर्यसत्य विधायक शब्द हैं। अहिंसाअपरिग्रहअचैर्य नकारात्मक शब्द हैं। यह सोचने जैसा है। असल में परिग्रह की वृत्ति विदा हो जाती है तो जो शेष रह जाता है वह अपरिग्रह है। अपरिग्रह को सीधा नहीं साधा जा सकता है। और कोई अगर अपरिग्रह को सीधा साधेगा तो वह परिग्रही हो जाएगाअपरिग्रही नहीं। अगर कोई धन छोड़ेगा तो जितनी पकड़ उसकी धन के साथ थीउतनी अब धन छोड़ा इस बात के साथ शुरू हो जाएगी।
मैं एक संन्यासी के पास ठहरा था। वह दिन में दो-तीन बार मुझसे कहे कि मैंने लाखों रुपयों पर लात मार दी है। चलते वक्त सांझ को मैंने कहालात आपने कब मारी?उन्होंने कहाकोई तीस साल हुए। तो मैंने कहा कि जाते वक्त एक बात कह जाऊंवह लात ठीक से लग नहीं पाई। नहीं तो तीस साल तक याद रखने की क्या जरूरत हैलात लग ही नहीं पाईबिल्कुल चूक गई। लाखों रुपए मेरे पास थेयह भी अहंकार था। लाखों रुपए मैंने छोड़ेयह भी अहंकार है। और पुराने अहंकार से यह ज्यादा सूक्ष्मज्यादा जटिल और ज्यादा खतरनाक है। अगर कोई परिग्रह छोड़ेगा तो त्याग को पकड़ेगा।
मैं महावीर को त्यागी नहीं कहता हूं। महावीर ने कोई परिग्रह नहीं छोड़ाइसलिए त्यागी का कोई सवाल नहीं है। महावीर का परिग्रह विदा हो गया है। जो शेष रह गया है वह अपरिग्रह है। कोई चोरी छोड़ेगा तो सिर्फ छोड़ा हुआ चोर होगा। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं हो सकता। भीतर चोरी जारी रहेगी। हाथ-पांव बांध लेगारोक लेगा अपने को छाती पर पत्थर रख कर कि चोरी नहीं करनी,लेकिन भीतर चोर होगा। कोई चोरी करने से थोड़े ही चोर होता है। लेकिन अगर कोई जागेगा और चोरी विदा हो जाएगी तो अचैर्य शेष रह जाएगा। अहिंसाअचैर्यअपरिग्रह नकारात्मक हैं। क्योंकि कुछ विदा होगा तो कुछ शेष रह जाएगा।
और यह बड़े मजे की बात है कि अगर हिंसा विदा हो जाएपरिग्रह विदा हो जाएचोरी विदा हो जाए..अगर ये तीनों विदा हो जाएं तो अहिंसाअचैर्य और अपरिग्रह की जो चित्त-दशा होगीउसमें सत्य का उदय होगा। इन तीन के विदा होने पर सत्य का अनुभव होगा। ये द्वार बन जाएंगे और सत्य दिखाई पड़ेगा। सत्य को कोई खोज नहीं सकता। हमें पता ही नहीं कि वह कहां है। हम उस स्थिति में आ जाएं जहां द्वार खुल जाए तो सत्य दिखाई पड़ेगा।
सत्य होगा इन तीन के द्वार से उपलब्ध अनुभव और ब्रह्मचर्य होगा उसकी अभिव्यक्ति। वह जो सत्य मिल गया वह जीवन के सब हिस्सों में प्रकट होने लगेगा। ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म जैसी चर्याईश्वर जैसा आचरण। ये तीन बनेंगे द्वार और तीन में अहिंसा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि जिस आदमी की हिंसा विदा हो गई हैवह चोरी कैसे करेगाक्योंकि चोरी करने में हिंसा है। और जिस आदमी की हिंसा विदा हो गई हैवह कैसे संग्रह करेगाक्योंकि सब संग्रह के भीतर चोरी है। इसलिए अगर हम बाकी दो को विदा भी कर दें तो तीन बातें रह जाती हैंअहिंसासत्यब्रह्मचर्य। अहिंसा के दो हिस्से हैंअचैर्यअपरिग्रह।
अहिंसक चित्त में सत्य का अनुभव होगा और ब्रह्मचर्य उसका आचरण होगा। लेकिन यह अहिंसा समाधि सेध्यान से उपलब्ध होती है। आप कह सकते हैं कि बहुत से ध्यानी लोग हुए हैं जो अहिंसक नहीं हैं। जैसे रामकृष्ण जैसा व्यक्ति भी मांसाहारी है। रामकृष्ण मछली खाते हैं और विवेकानंद भी। तो विचार होता है कि रामकृष्ण जैसा व्यक्ति भी अगर ध्यान कोसमाधि को उपलब्ध होकर मछलियों से मुक्त नहीं होता है तो मामला क्या है?
मेरी दृष्टि में महावीर का जो ध्यान हैउस ध्यान से गुजरने पर ही अहिंसा की उपलब्धि हो सकती है। वह जागने का ध्यान है। और रामकृष्ण का जो ध्यान हैवह जागने का नहींसो जाने कामूच्र्छित हो जाने का ध्यान है। रामकृष्ण का ध्यान ठीक से समझा जाए तो वह सिर्फ मूच्र्छा है। इसलिए रामकृष्ण तीन-तीनचार-चार दिन बेहोश पड़े रहते हैं। मुख से फेन गिर रहा हैआंखें बंद हैं,हाथ-पैर अकड़ गए हैं। मेरी दृष्टि में उनकी चेतना भी खो गई है। वह उसी हालत में हैं जिस हालत में कोई हिस्टीरिया में हो। और इसलिए उनके व्यक्तित्व में कोई अंतर नहीं होगा। हिंसा जारी रहेगी।
महावीर और बुद्ध की इस जगत को जो सबसे बड़ी देन है वह इस भांति के ध्यान के प्रयोग हैंजिस प्रयोग का अनिवार्य परिणाम अहिंसा होती है। और जिस ध्यान के प्रयोग का अनिवार्य परिणाम अहिंसा न होती होउस ध्यान के प्रयोग का अंतिम परिणाम ब्रह्मचर्य भी नहीं हो सकता हैक्योंकि कामवासना भी बहुत गहरे में हिंसा का ही एक रूप है।
जिसके भीतर गाली उठती है वह गाली देता हैक्रोध आता है तो क्रोध करता हैवह आदमी स्पष्ट हैसहज हैजैसा है वैसा है। उसके बाहर और भीतर में कोई फर्क नहीं है। परम ज्ञानी के भी बाहर और भीतर में फर्क नहीं होता। परम ज्ञानी जैसा भीतर होता है वैसा ही बाहर होता है। अज्ञानी जैसा बाहर होता है वैसा ही भीतर होता है। बीच में एक पाखंडी व्यक्ति है जो भीतर कुछ होता है,बाहर कुछ होता है। पाखंडी व्यक्ति बाहर ज्ञानी जैसा होता हैभीतर अज्ञानी जैसा होता है। पाखंडी का मतलब है भीतर अज्ञानी जैसा। उसके भीतर भी गाली उठती हैक्रोध उठता हैहिंसा उठती है। और बाहर वह ज्ञानी जैसा होता हैअहिंसक होता है, ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की तख्ती लगा कर बैठता हैसच्चरित्रवान दिखाई पड़ता हैसब नियम पालन करता हैअनुशासनबद्ध होता है। बाहर उसका कोई व्यक्तित्व नहीं।
कोई अहिंसा का अनुयायी नहीं हो सकता। कोई उपाय नहीं है। अहिंसा को आचरण से साधने कोई जाएगा तो अभिनयपाखंड में पड़ जाएगा। सामने के द्वार से अहिंसक होगापीछे के द्वार से हिंसा जारी रहेगी। मिथ्या अहिंसा और भी खतरनाक हैक्योंकि वह अहिंसा मालूम पड़ती है और अहिंसा नहीं है। फिर उपाय क्या हैफिर उपाय सिर्फ एक हैक्योंकि अहिंसा है एक नकारात्मक स्थिति,हिंसा जहां नहीं है ऐसी स्थिति। और हिंसा में हम खड़े हैं। हम क्या करेंदो ही उपाय हैं। या तो हम हिंसा से लड़ें या अहिंसक होने की कोशिश करें। कोशिश से साधी गई अहिंसा कभी भी अहिंसा नहीं हो सकती। क्योंकि कोशिश करने वाला हिंसक है। और हिंसक ने जो कोशिश की है उसमें हिंसा मौजूद है। और हिंसक ने जो भी कोशिश की हैउसमें हिंसा प्रविष्ट हो जाएगी। फिर क्या करें?
एक ही उपाय हैअपनी हिंसा के साक्षी बन जाने का। कुछ भी न करेंकरने की बात ही छोड़ दें। मैं जैसा हूं..हिंसकक्रोधी,अत्याचारीअनाचारीदुराचारी..जैसा भी मैं हूंमैं उसके प्रति जागा हुआ रह जाऊं और इस स्थिति में रहने की कोशिश करूं कि मैं जानूं जो भी हूंबदलने की फिक्र ही न करूंसिर्फ जानूं। बदलने की फिक्र में जान भी नहीं पाते हैं और अगर कोई जान ले तो बदल पाता है। ज्ञान ही रूपांतरण हैज्ञान ही क्रांति है। अपनी हिंसा को जान लेना अहिंसा को उपलब्ध हो जाना है।
इससे यह मतलब मत समझ लेना कि आपको अहिंसा का जो अनुभव होगावह नकारात्मक होगा। एक अर्थ में अहिंसा की स्थिति नकारात्मक है। हिंसा चली जाएगी तो जो शेष रह जाएगा वह अहिंसा है। इस अर्थ में वह नकारात्मक है। लेकिन जब अहिंसा प्रकट होगी और सारे जीवन से उसकी किरणें फूट पड़ेंगीउससे ज्यादा कोई विधायक अनुभूति नहीं है।
इसलिए महावीर ने परमात्मा की बात ही बंद कर दी है। क्योंकि अहिंसा का अनुभव हो जाए तो परमात्मा का अनुभव हो गया। कोई जरूरत न समझी उस बात की। अहिंसा का पूर्ण अनुभव परमात्मा का अनुभव है।
हिंसा विदा हो सकती हैविदा की नहीं जा सकती। दीया जल जाए तो अंधेरा विदा हो जाता है। ध्यान जग जाए तो हिंसा विदा हो जाती है।
ये थोड़ी सी बातें मैंने कहीं। मैं कोई पंडित नहीं हूंन होना चाहता हूं। भगवान की कृपा से उस झंझट मेंभूल में पड़ने का कोई मौका नहीं आया। सौभाग्य है कि आप सब विद्वज्जनों ने शांति और प्रेम से मेरी बातें सुनीं। उसके लिए मैं बहुत अनुगृहीत हूं और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरा प्रणाम स्वीकार करें।

प्रश्नः आपने जो अहिंसा के संबंध में महात्मा गांधी और महावीर की दृष्टि को प्रस्तुत किया हैआप स्वयं हिंसक हैं या अहिंसक..अपनी सम्मति कहें।

मेरे कहने का क्या फर्क पड़ेगामैं तो यही कहूंगा कि मैं हिंसक हूं। क्योंकि यह कहना भी कि मैं अहिंसक हूं हिंसा हो जाएगी। तो यही समझें कि मैं हिंसक हूं। और मेरे कहने से क्या पता चलेगा कि मैं क्या हूंक्या नहीं हूं। इसे बातचीत के बाहर छोड़ा जा सकता है सहज ही। और जितना बातचीत के बाहर छोड़ दें उतना आसान होगा। मुझे नहीं समझना है आपकोअहिंसा को समझना है। और अहिंसा को समझना हो तो मैं’ को बिल्कुल ही बाहर छोड़ देना चाहिए। न तो मैं’ समझा जा सकता हैन समझाया जा सकेगा। क्योंकि मैं’ तो बड़ी हिंसा हो जाएगी।
अभी-अभी दोपहर में मैं कह रहा था। एक व्यक्ति ने जाकर पूछा एक झेन फकीर से कि क्या आपको ईश्वर की उपलब्धि हो गई हैतो उस फकीर ने कहा कि अगर मैं कहूं कि उपलब्धि हो गई है तो जो जानते हैं वे मुझ पर हंसेंगेक्योंकि जिसे कभी खोया ही नहीं था उसकी उपलब्धि कैसीअगर मैं कहूं कि मुझे उपलब्धि नहीं हुई तो तुम बिना कुछ जाने-समझे लौट जाओगे। और तब भी नुकसान होगा।
इससे क्या फर्क पड़ता है कि मुझे उपलब्धि हुई है या नहीं हुई है। यह निपट मेरा मामला है। इससे क्या लेना-देना है। लेकिन अहिंसा के संबंध में मैं जो कुछ कह रहा हूं उस संबंध में कुछ पूछेंगे तो अच्छा होगा। अगर मेरे संबंध में कुछ पूछना हो तो मैं दुबारा आऊं तब फिर मैं अपने संबंध में बोलूं तो ठीक होगा।

प्रश्नः क्या महावीर से पहले इतने ऋषि-महर्षि हुएउन्होंने अहिंसा को नहीं समझा?

मुझे पता नहीं। ऋषि-महर्षि कहीं मिल जाएं तो उनसे पूछना चाहिए। समझा होगाबहुत लोगों ने समझा होगाक्योंकि महावीर कोई शुरुआत नहीं हैं जगत की और न महावीर कोई अंत हैं। बहुत लोग उस दिशा में गए होंगे। असल में जो भी कभी गया होगा वह अहिंसा से गया होगा। लेकिन शायद हमारे पास ऐतिहासिक रूप से जो निकटतम आदमी हैवह महावीर हैंजिनके बाबत ज्यादा से ज्यादा हमें पता है। महावीर के पहले भी अहिंसा को अनुभव करने वाले लोग रहे होंगेलेकिन महावीर सबसे बड़े स्पष्ट व्याख्याता हैं।
फिर यह भी होता है कई बार कि कोई आदमी जान ले तो जरूरी नहीं है कि बता सके। मैं जाऊं और चांदनी रात देखूंतारे देखूं,और लौट कर आऊं और आप मुझसे कहें कि एक चित्र बना कर बता दें जो सौंदर्य आपने देखा है। हो सकता है कि मैं न बना सकूं,क्योंकि रात की चांदनी देखना एक बात है और चित्र बनाने की कला अलग बात है। बहुत लोगों ने अहिंसा देखी होलेकिन महावीर ने जिस ढंग से बताई हैशायद किसी शिक्षक ने नहीं बताई है।

प्रश्नः आपने बताया कि जब भी अहिंसा को शब्द देते हैं वह वाद या सिद्धांत का रूप धारण कर लेती हैवह अहिंसा हिंसा के रूप में परिणत हो जाती है। और आपने कहा कि विवेक द्वारा ही हम अपनी अनुभूति को जगा सकते हैं और कार्य का संपादन कर सकते हैं। तो मेरा प्रश्न यह है कि इस विवेक का स्फुरण कैसे होऔर जब आप बताएंगे कि विवेक के स्फुरण करने में यह पद्धति होगीतो वह पद्धति शास्त्र का रूप धारण कर लेगी!

ठीक कहते हैंबिल्कुल ठीक कहते हैं। आपने दो-तीन बातें पूछीं जो कि महत्वपूर्ण हैं। पहली बात यह कि मैंने कहा कि अहिंसा को संगठित नहीं किया जा सकता। असल में सिर्फ घृणा के लिए संगठित होने की जरूरत हैशत्रुता के लिए संगठित होने की जरूरत है। प्रेम के लिए संगठित होने की जरूरत ही नहीं है। प्रेम अकेले ही काफी है। घृणा अकेले काफी नहीं हैइसलिए घृणा संगठन बनाती है। दुनिया के सब संगठन घृणा के ही संगठन हैंहिंसा के ही संगठन हैं। और इसलिए जब घृणा का मौका आ जाता है तो लोग संगठित हो जाते हैं। जैसे भारत पर चीन का हमला हुआ तो लोग ज्यादा संगठित हो जाएंगे। हमला चला जाएगासंगठन कम हो जाएगा। क्योंकि हमला घृणा को पैदा करेगाहिंसा को पैदा करेगा।
असल में जो व्यक्ति प्रेम को उपलब्ध है वह अकेला ही काफी है। वह दूसरे को इकट्ठा करने नहीं जाता। दूसरे को इकट्ठा करने की कोई जरूरत ही नहीं। दूसरे को हम इकट्ठा तब करते हैं जब कुछ ऐसा करना हो जिसे अकेला करना कठिन हो जाए। प्रेम अकेले ही किया जा सकता हैअकेले ही बांटा जा सकता है। लेकिन संगठन की जरूरत हैक्योंकि हमें बड़ी हिंसाएं करनी हैंबड़ी हत्याएं करनी हैं..राष्ट्रों के नाम परसंप्रदायों के नाम परधर्मों के नाम पर।
तो जब भी संगठन होगाउसके केंद्र में हिंसा होगीघृणा होगीचाहे वह संगठन किसी का भी हो। हो सकता है कि अहिंसकों का हो हिंसकों के खिलाफ। तो भी वह हिंसा ही होगी। संगठन मात्र हिंसात्मक होंगे। अहिंसात्मक संगठन का कोई अर्थ नहीं होता। अहिंसात्मक व्यक्ति अकेला ही काफी है। दस अहिंसात्मक व्यक्ति भी मिल कर बैठ सकते हैंलेकिन वे एक-एक ही होंगे। संगठन का कोई अर्थ नहीं हैयह मैंने कहा।
दूसरी बात आपने बहुत बढ़िया पूछीवह यह कि स्फुरण कैसे हो विवेक काऔर साथ में यह भी पूछा कि मैं बताऊंगा तो फिर वह शास्त्र हो जाएगा!
बिल्कुल ठीक है। अगर मेरे बताने के कारण आप उस पर चलेंगे तो आप शास्त्र पर चले। लेकिन अपने विवेक के कारण अगर आप उस पर चले तो शास्त्र यहीं पड़ा रह गया। जैसे मुझसे कोई पूछे कि तैरना कैसेक्या उपाय हैतो मैं कहूंगा कि तैरने का कोई उपाय नहीं होता सिवाय तैरने के। लेकिन एक आदमी अगर कहे कि मैं नदी में तभी उतरूंगा जब मैं तैरना सीख जाऊंगाक्योंकि बिना तैरना सीखे कैसे उतरूंतो वह तर्कयुक्त बात कह रहा है। बिना तैरना सीखे उसे नदी में उतरना खतरे से भरा है। लेकिन सिखाने वाला कहेगा कि जब तक उतरोगे नहीं तब तक तैर भी नहीं सकोगे। तैरना भी सीखना हो तो पानी में उतरना होगा।
लेकिन पहली बार पानी में उतरना तड़फड़ाना ही होगातैरना नहीं हो सकता। असल में तैरना क्या हैतड़फड़ाने का व्यवस्थित रूप है। पहले तड़फड़ाएंगेफिर तड़फड़ाने में तकलीफ होगी तो व्यवस्थित हो जाएंगे। धीरे-धीरे आप पाएंगे कि तैरना आ गया,तड़फड़ाना चला गया। तैरना तड़फड़ाने का ही व्यवस्थित रूप है। आदमी पहले दिन पानी में पटकने से ही तैरता है। फिर बाद में जो विकास होता हैवह उसके अपने तैरने के अनुभव से होता है।
तो मैं आपको क्या कहूं कि विवेक कैसे जगे? विवेक को जगाना हो तो विवेक करना होगातैरना सीखना है तो तैरना शुरू करना होगा। और कोई उपाय नहीं है। रास्ते पर चलतेखाना खातेबात करतेसुनतेउठतेबैठते विवेकपूर्ण होना होगा।
लेकिन ठीक आप पूछते हैं कि जो मैं कह रहा हूं और मेरी बात जब मैंने समझाई तो शास्त्र हो गई। मगर यह ध्यान में रखना जरूरी है कि बात समझाने से शास्त्र नहीं होतीबात आपके समझने से शास्त्र होती है। अगर मैंने कहा कि बात किसी तीर्थंकर ने कही हैकिसी सर्वज्ञ ने कही हैऔर आपने कहा कि ऐसे व्यक्ति ने कही है जो जानता है और भूल नहीं करताफिर वह शास्त्र बन जाती हैनहीं तो किताब ही रह जाती है।
किताब और शास्त्र में फर्क है। जो किताब पागल हो जाती है वह शास्त्र है। जो किताब दावा करने लगती है वह शास्त्र बन जाती है। मैं किताबों का दुश्मन नहीं हूंशास्त्र का दुश्मन हूं। किताबें तो रहनी चाहिएबड़ी अदभुत हैंबड़ी जरूरी हैं। किताबों के बिना नुकसान हो जाएगा। लेकिन शास्त्र बड़े खतरनाक हैं। जब कोई किताब दावा करती है कि मैं परम सत्य हूं और जो मेरे रास्ते से चलेगा वही पहुंचेगाऔर जो मैंने कहा हैऐसा ही करेगा तो पहुंचेगाअन्यथा नरक हैअन्यथा नरक की अग्नि में सड़ना पड़ेगातब किताब शास्त्र हो गई। और जब कोई इसे इस तरह मान लेता है तो वह बाधक हो जाती है।
मैं जो कह रहा हूं वह कोई शास्त्र नहीं है। मैं कोई प्रमाण नहीं हूं। कोई आप्त-वचन नहीं है मेरा। मैं कोई तीर्थंकर नहीं हूं। मैं कोई सर्वज्ञ नहीं हूं। मैं एक अति सामान्य व्यक्ति हूं। जो मुझे दिखता है वह आपसे निवेदन कर रहा हूं। यह सिर्फ संवाद है। आपने सुन लियाबड़ी कृपा है। मानने का कोई आग्रह ही नहीं है।
लेकिन सुनते वक्त अगर आपने विवेक से सुनाअगर जागे हुए सुनाऔर कोई चीज उस जागरण में आपको दिखाई पड़ गई,तो वह चीज आपकी हैवह मेरी नहीं है। कल मैं उस पर दावा नहीं कर सकता कि वह मेरी है। अगर आपने होशपूर्वक सुना,विचारपूर्वक सुनासमझासोचाखोजा और कोई बात आपको मिल गईतो वह आपकी है।
इसलिए सत्य कभी किसी को दिया नहीं जा सकता। मैं आपको कोई सत्य नहीं दे सकता। लेकिन मैं जो कह रहा हूंमैं जो बात कर रहा हूंउस बात करने के वक्त आप इतने जागे हुए हो सकते हैंविवेक से भरे हुए हो सकते हैं कि कोई सत्य आपको दिखाई पड़ जाए। कई बार ऐसा भी होता है कि अज्ञानियों से भी सत्य मिल जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि ज्ञानी भी सत्य नहीं दे पाता।
मैंने सुना है कि बंगाल में एक फकीर हुआराजा बाबू उनका नाम था। वह हाई कोर्ट के मजिस्ट्रेट थेजस्टिस थे। रिटायर्ड हुए थेसाठ साल के थे। सुबह के वक्त घूमने निकले हैं एक लकड़ी लेकररोज की आदत के अनुसार। एक मकान के सामने से निकले हैं। दरवाजा बंद है। घर के भीतर कोई मांकोई भाभीकिसी बेटे कोकिसी देवर को उठा रही है। उसे पता भी नहीं कि कोई बाहर राजा बाबू नाम का बूढ़ा आदमी जा रहा है। उसने भीतर अपने बेटे को कहाराजा बाबूउठोअब बहुत देर हो गईसुबह हो गई,सूरज निकल आयाकब तक सोए रहोगेऔर बाहर राजा बाबू चले जा रहे हैंउन्हें एकदम सुनाई पड़ाराजा बाबूउठोसुबह हो गईसूरज निकल आया हैकब तक सोए रहोगे?
वह छड़ी उन्होंने वहीं फेंक दीदरवाजे पर नमस्कार किया..उस स्त्री के लिए जिसको कि पता भी नहीं होगाक्योंकि वह तो घर के भीतर थी..घर वापस लौट आए। आकर कहा कि अब मैं जा रहा हूं। तो घर के लोगों ने कहा कि कहां जाते होतो उन्होंने कहा,राजा बाबूउठोसुबह हो गईसूरज निकल आयाकब तक सोए रहोगेउन लोगों ने कहापागल हो गए हैंक्या बातें कर रहे हैं?तो उन्होंने कहा कि आज कुछ सुनाई पड़ गयाकुछ मिल गया। अब मैं जाता हूं।
मैंने यह भी सुना है कि एक फकीर अपने गुरु के निवास पर बीस वर्षों तक रहा। उसे कुछ भी न मिला। सब समझाना व्यर्थ हो गया। फिर गुरु ने कहा कि अब तू समझना भी छोड़क्योंकि समझने से बीस साल में नहीं मिला तो अब तू समझना छोड़ दे। अब तेरा मन हो तो तू बैठ जान मन हो तो उठ जा। समझना हो तो समझन समझना हो तो न समझसोना हो तो सो जा। जो तुझे करना हो कर। अब तू समझना छोड़ दे। क्योंकि समझना भी एक दिक्कत दे रहा हैक्योंकि समझना भी तो एक तनाव ले आता है।
किसी का नाम भूल गया होखोजते हैंखो जाता है। फिर छोड़ देते हैंफिर चाय पीने लगते हैंगड्ढा खोदने लगते हैं बगीचे में..और अचानक ही वह नाम याद आ जाता है। समझना भी तनाव पैदा कर देता है।
उसने कहाठीक हैअब मैं समझना भी छोड़ता हूं। उसी दिन वह दरवाजे के बाहर निकलाबाहर पीपल का वृक्ष है। सूखे पत्ते गिर रहे हैं। पतझड़ है। वह खड़ा हो गयापत्ते गिर रहे हैं सूखे। वह वापस लौट कर पहुंचागुरु के पैर पकड़ लिए और कहा कि मैं समझ गया।
गुरु ने कहा कि मैं तो थक गया समझा-समझा करतू अब तक नहीं समझा।
उसने कहाआज मैं समझने का ख्याल छोड़ कर बाहर द्वार पर जाकर खड़ा हुआ। पीपल के पत्ते गिर रहे हैं। पत्ते सूख गए हैं और गिर रहे हैं। मुझे वह सब दिख गया जो आपने बहुत बार समझाया। मुझे मृत्यु दिख गई और मैं मर गया उन पत्तों के साथ। अब मैं वह आदमी नहीं हूं जो रोज आया करता था। अब मैं एक सूखा पत्ता हूं। गुरु ने कहा कि अब तुझे मेरे पास आने की जरूरत भी नहीं है। अब बात खत्म हो गई है। पीपल ही तेरा गुरु हैउसी को नमस्कार कर और विदा हो जा।
अब पीपल को पता भी नहीं होगा। कैसे पता होगामैं समझाऊं तो उससे आप नहीं समझ जाएंगे। आप खुद समझेंगे तो ही समझेंगे। और वह समझ सदा आपकी अपनी होगीवह मेरी नहीं हो सकती। हांमैं एक मौकाएक अवसर पैदा कर सकता हूं समझाने की कोशिश का। हो सकता है कोई उस वक्त जागा हुआ होउसे सुनाई पड़ जाए कि राजा बाबूउठोकब तक सोए रहोगे?लेकिन यह शास्त्र नहीं बनता।
महावीर की वाणी शास्त्र नहीं बनती अगर हम महावीर को सर्वज्ञ और तीर्थंकर न बनाते। बुद्ध की वाणी शास्त्र न बनती अगर हम बुद्ध को भगवान न बनाते। कृष्ण की वाणी शास्त्र न बनती अगर हम उन्हें भगवान न बनाते। लेकिन हम बिना भगवान बनाए रुक नहीं सकतेक्योंकि बिना भगवान बनाए हमें समझना पड़ेगा। भगवान बनाने से झंझट उनकी तरफ हो जाती हैहमें समझने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है।
हम शास्त्र को पकड़ लेते हैंऔर पक्का कर लेना चाहते हैं कि महावीर आप्त हैंउपलब्ध हैंउनको ज्ञान मिल गया हैवे सर्वज्ञ हैं। अगर संदिग्ध हों तो हम फिर किसी और को खोजें। जीसस भगवान के बेटे हैंमोहम्मद पैगंबर हैंइस तरह हम पक्का विश्वास जुटा लेना चाहते हैं ताकि झंझट मिट जाए। फिर हम पकड़ लें। वह हमारा विवेक न जगाना पड़े। विवेक से बचने के लिए हम शास्त्र को पकड़ते हैं।
विवेक को जगाना हो तो पीपल के पत्ते भी जगा सकते हैंजगत की कोई घटना भी जगा सकती हैकिताब भी जगा सकती है,किसी आदमी का बोलना भी जगा सकता हैकिसी आदमी का चुप होना भी जगा सकता है। समझना हो तो चुप भी समझ में आती हैन समझना हो तो बोला हुआ सत्य भी समझ में नहीं आता।
मैं कोई पद्धति की बात नहीं कर रहा हूं। विवेक कोई पद्धति नहीं हो सकती। विवेक का स्मरण आ सकता है। फिर आपको कूदना पड़ेगातैरना पड़ेगातड़फड़ाना पड़ेगा। धीरे-धीरे आ जाएगा विवेक।
जिस दिन आ जाएगा उस दिन आपको लगेगा कि किसी का दिया हुआ नहीं आयाकिसी गुरु का दिया हुआ नहींकिसी शास्त्र का दिया हुआ नहीं। उस दिन आपको लगेगा कि मेरे ही भीतर सोया था जग गया हैमेरे भीतर सोया था जग गया हैजो उपलब्ध था वही पा लिया हैजिसे कभी नहीं खोया था वही मिल गया है।

प्रश्नः पहला प्रश्न यह है कि समाज का अहिंसा से क्या संबंध है?दूसरा प्रश्न यह है कि महावीर ने अहिंसा या सत्य की दो-ढाई हजार वर्ष पहले बात कहीउसका आज क्या मतलब हो सकता हैतीसरा प्रश्न यह है कि जो आप कहते हैं कि नैतिक अहिंसा अलग है और धार्मिक अहिंसा अलग हैअगर आप दोनों में से अहिंसा को हटा दें तो इसका मतलब यह है कि जब आप धर्म की बात पर आ जाते हैं तो नीति नष्ट हो जाती है!

जो प्रश्न आपने पूछे हैं उनका समाधान मैं करूंगा तो नहीं होगा। समाधान आप खोजेंगे तो मिल जाएगा। मैं कोशिश कर सकता हूं।
पहली बात आप पूछते हैं कि आज के समाज के साथ अहिंसा का क्या संबंध है?
समाज का अहिंसा से कभी संबंध नहीं था। समाज तो हिंसक है और हिंसा पर ही खड़ा है। अहिंसा का संबंध व्यक्तियों से है। अभी वह दिन दूर है जब कि सभी व्यक्ति अहिंसक हो जाएंगे और जो समाज होगा वह अहिंसक होगा। समाज का संबंध अभी अहिंसा से नहीं हैन अब तक कभी था। आगे संभावना है। कभी होगायह पक्का नहीं कहा जा सकता। व्यक्ति अहिंसा को उपलब्ध हो सकते हैं।
लेकिन अगर व्यक्ति अहिंसा को उपलब्ध होते चले जाएं तो समाज उनसे निर्मित होगावह धीरे-धीरे अहिंसक होता चला जाएगा। अभी तक अहिंसक व्यक्ति पैदा हुए हैंअहिंसक समाज पैदा नहीं हुआ है। महावीर अहिंसक होंगेजैन थोड़े ही अहिंसक हैंबुद्ध अहिंसक होंगे, बौद्ध थोड़े ही अहिंसक हैंअहिंसक व्यक्ति पैदा हुए हैं अब तकअहिंसक समाज नहीं पैदा हुआ। व्यक्ति बढ़ते चले जाएंगे और किसी दिन अहिंसक व्यक्तियों का पलड़ा भारी हो जाएगा। अहिंसक व्यक्तियों से एक अहिंसक समाज की संभावना भी प्रकट होगी। अभी कोई आशा नहीं है जल्दी।
दूसरी बात आप पूछते हैं कि ढाई हजार साल पहले महावीर ने अहिंसा की जो बात कही उसका आज क्या मतलब हो सकता है?कहां बैलगाड़ी का जमाना और कहां जेट का जमानाकहां महावीर को बिहार के बाहर जाना मुश्किल और कहां आदमी का चांद पर चला जाना!
बिल्कुल ठीक पूछते हैं आप। लेकिन इस बात का ख्याल नहीं है कि कुछ चीजें हैं जो न बैलगाड़ी पर यात्रा करती हैं और न जेट पर। कुछ चीजें हैं जिनका जेट से और बैलगाड़ी से कोई संबंध नहीं है। अंतर्यात्रा के लिए न तो बैलगाड़ी की जरूरत है और न जेट की। अगर अंतर्यात्रा में बैलगाड़ी की जरूरत होती तो महावीर की बात गलत हो जाती। अंतर्यात्रा तो आज भी वैसी ही होगी जैसी ढाई हजार साल पहले होती थी और करोड़ वर्ष बाद भी जब कोई भीतर जाएगा तो वही विधि है बाहर को छोड़ने की और भीतर जाने की।
भीतर जाने में कभी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। और जो भीतर है उसमें भी समय से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह समय के बाहर है। वह कालातीत है। इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। धर्म इसी अर्थ में सनातन है। धर्म का अनुभव सनातन हैसामयिक नहीं है। उसका काल से कोई संबंध नहीं है। जब भी कोई व्यक्ति सत्य को उपलब्ध होगावह उसी सत्य को उपलब्ध होगा जिस सत्य को कभी कोई उपलब्ध हुआ या कोई कभी उपलब्ध होगा।
दो सत्य नहीं हैं। सत्य न नया हैन पुराना है। सत्य चिरंतन हैवही है। उसे पाने के लिए हमारा मन बड़े अधैर्य में है। हम चाहते हैं कोई सस्ती तरकीबकोई ऐसी तरकीब कि एक गोली खा लें और आत्मज्ञान उपलब्ध हो जाए। कोई ऐसी तरकीब कि एक बटन दबाएं और आत्मा उपलब्ध हो जाए। हम इस फिराक में हैं। क्योंकि असल में शायद हमें आत्मा को उपलब्ध करने की कोई अभीप्सा ही नहीं है। सारी दुनिया में आदमी चाहता है कि सब कुछ अभी बन जाएएकदम अभी हो जाए।
लेकिन कुछ चीजें ऐसी हैंकुछ बातें ऐसी हैंजो अभी अगर करना चाहेंगे तो कभी न होंगीक्योंकि अभी करने वाला चित्त इतना तनावग्रस्त होता है कि अभी नहीं कर सकता।
एक छोटी सी कहानी समझाऊं। कोरिया में भिक्षुओं की एक कहानी है। एक वृद्ध भिक्षु ने अपने जवान भिक्षु के साथ एक नदी को पार किया है। नाव से उतरे हैंदोनों के ऊपर ग्रंथों का बोझ हैजैसा भिक्षुओं के ऊपर होता है। बोझ को लेकर उतरे हैंजल्दी से केवट से पूछा है कि गांव कितनी दूर हैक्योंकि हमने सुना है कि सूरज ढलने पर गांव के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सूरज ढलने के करीब है। हम पहुंच पाएंगे या नहींरात तो न हो जाएगीजंगल हैअंधेरा हैखतरा है। केवट ने नाव को बांधते हुए धीरज से कहा कि अगर धीरे-धीरे गए तो पहुंच भी सकते हो। लेकिन अगर जल्दी गए तो कोई पक्का नहीं है।
उन दोनों ने जब यह बात सुनी तो कहा कि यह तो पागल आदमी हैइसकी बातों में पड़ना तो झंझट का काम हैभागो। क्योंकि यह कह रहा है कि धीरे-धीरे गए तो पहुंच भी सकते होजल्दी गए तो कोई पक्का नहीं है। इस आदमी से क्या पूछनादोनों भागे।
सूरज ढलने लगा है और वे भाग रहे हैं। अंधेरा होने लगा हैअंधेरा रास्ता हैपहाड़ी रास्ता हैअनजान है। बूढ़ा आदमी जो है,वह गिर पड़ा हैघुटने टूट गए हैं। वह केवट नाव बांध कर पीछे आया है और कह रहा है कि मैंने कहा थामेरा बहुत बार का अनुभव हैजो धीरे गए हैं वे पहुंच गए हैंजो जल्दी गए हैं वे जल्दी के कारण नहीं पहुंच पाए हैं।
एक चित्त की अवस्था हैजल्दीअभीयह विक्षिप्त चित्त की अवस्था है। पश्चिमी देशों में चित्त जल्दी में हैइतनी जल्दी में कि वह भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। भीतर प्रवेश के लिए चाहिए अत्यंत शांत धैर्य। वह अभी भी हो सकता हैऐसा भी नहीं है कि जन्मों के बाद ही होगा। अगर जन्मों के बाद की प्रतीक्षा हो तो अभी हो सकता है। और अभी करना हो तो जन्मों तक प्रतीक्षा भी करनी पड़ सकती है।
आखिरी बात आपने यह पूछी है कि नैतिक अहिंसा मिथ्या अहिंसा हैसच्ची अहिंसा नहीं है। नैतिक अहिंसा के पीछे हिंसा मौजूद रहेगी। और एक धार्मिक अहिंसा है जो अहिंसा है इस अर्थ में कि वहां से हिंसा विदा हो गई है। तो आपने कहा कि इसका मतलब तो यह हुआ कि धर्म अनैतिक है!
हांएक अर्थ में यही मतलब हुआ। अनैतिक के दो रूप हैंएक तो नीति से नीचे और एक नीति से ऊपर। दोनों अनैतिक हैं। जो नीति से ऊपर उठते हैं वही धर्म को उपलब्ध होते हैं। नीचे भी उतरते हैं लोग। उनको हम अनैतिक कहते हैं।
अनैतिक शब्द ठीक नहीं मालूम पड़ता। इसलिए कहना चाहिए अतिनैतिक। धर्म अतिनैतिक हैवह नैतिक नहीं है।
पापी भी अनैतिक हैवह नीति से नीचे उतर आयाउसने खुल कर हिंसा करनी शुरू कर दी। वह पापी है। नैतिक वह है जिसने हिंसा भीतर दबा ली और अहिंसा का बाना पहन लिया। यह सज्जन हैयह नैतिक है। धार्मिक वह है जिसकी हिंसा विदा हो गई है और अहिंसा ही शेष रह गई है। यह अतिनैतिक हैयह भी अनैतिक है। यह भी नीति के पार चला गया। इसको भी नैतिक नहीं कहा जा सकता।
महावीर कीबुद्ध की या कृष्ण की वाणी नैतिक नहीं हैअतिनैतिक है। और इसलिए जब पश्चिम में पहली बार भारतीय ग्रंथों का अनुवाद शुरू हुआ तो पश्चिम के विचारकों को तकलीफ मालूम पड़ी कि इनमें नीति का तो कोई उपदेश ही नहीं हैउपनिषदों के पूरे अनुवाद हो गएलेकिन उन्हें मालूम हुआ कि कहीं कोई नीति का उपदेश ही नहीं है!
ऐसा होना ही चाहिए। धर्म तो नीति से बहुत ऊपर की बात है। संत सज्जन से बहुत भिन्न बात है। सज्जन थोपा हुआ दुर्जन है। भीतर मौजूद है दुर्जनता। ऊपर सज्जनता है। संत वह है जिसके सज्जन-दुर्जन दोनों विदा हो गए हैं। वहां कोई भी नहीं है। न नीति हैन अनीति है। वहां सब शांति है।

प्रश्नः आपने कहा कि बाह्य आचरण से सब हिंसक हैं। इसके साथ-साथ आपने कहा कि चूंकि रामकृष्ण परमहंसविवेकानंद मांस खाते थेइसलिए वे अहिंसक नहीं थे। साथ ही साथ आपने कहा कि बुद्ध और महावीर अहिंसक थे। बुद्ध तो मांस खाते थेवे अहिंसक कैसे थे?

यह बात आपने अच्छी पूछी। मेरा मानना है कि आचरण से अहिंसा उपलब्ध नहीं होती। मैंने यह नहीं कहा कि अहिंसा से आचरण उपलब्ध नहीं होता। इसके फर्क को समझ लीजिए आप। हो सकता है कि मैं मछली न खाऊं। लेकिन इससे मैं महावीर नहीं हो जाऊंगा। लेकिन यह असंभव है कि मैं महावीर हो जाऊं और मछली खाऊं। इस फर्क को आप समझ लें। आचरण को साध कर कोई अहिंसक नहीं हो सकतालेकिन अहिंसक हो जाए तो आचरण में अनिवार्य रूपांतरण होगा।
दूसरी बात यह कि मैंने बुद्ध और महावीर को अहिंसक कहालेकिन बुद्ध मांस खाते थे। बुद्ध मरे हुए जानवर का मांस खाते थे। उसमें कोई भी हिंसा नहीं है। लेकिन महावीर ने उसे वर्जित किया किसी संभावना के कारण। जैसा कि आज जापान में है। सब होटलों केदूकानों के ऊपर तख्ती लगी हुई है कि यहां मरे हुए जानवर का मांस मिलता है।
अब इतने मरे हुए जानवर कहां से मिल जाते हैंयह सोचने जैसा है। बुद्ध चूक गएबुद्ध से भूल हो गई। हालांकि मरे हुए जानवर का मांस खाने में हिंसा नहीं हैक्योंकि हिंसा का मतलब है कि मार कर खाना। मारा नहीं है तो हिंसा नहीं है। लेकिन यह कैसे तय होगा कि लोग फिर मरे हुए जानवर के नाम पर मार कर नहीं खाने लगेंगेइसलिए बुद्ध से चूक हो गई है और उसका फल पूरा एशिया भोग रहा है।
बुद्ध की बात तो बिल्कुल ठीक हैलेकिन बात के ठीक होने से कुछ नहीं होताकिन लोगों से कह रहे हैंयह भी सोचना जरूरी है। महावीर की समझ में भी आ सकती है यह बात कि मरे हुए जानवर का मांस खाने में क्या कठिनाई है। जब मर ही गया तो हिंसा का कोई सवाल नहीं है। लेकिन जिन लोगों के बीच हम यह बात कह रहे हैंवे कल पीछे के दरवाजे से मार कर खाने लगेंगे। वे सब सज्जन लोग हैंवे सब नैतिक लोग हैंबड़े खतरनाक लोग हैं। वे रास्ता कोई न कोई निकाल ही लेंगेवे पीछे का कोई दरवाजा खोल ही लेंगे।
मैं बुद्ध और महावीर दोनों को पूर्ण अहिंसक मानता हूं। बुद्ध की अहिंसा में रत्ती भर कमी नहीं है। लेकिन बुद्ध ने जो निर्देश दिया हैउसमें चूक हो गई है। वह चूक समाज के साथ हो गई है। अगर समझदारों की दुनिया हो तो चूक होने का कोई कारण नहीं है।
एक मित्र यह पूछते हैं कि विवेक के लिए विवेक के प्रति जागना क्या अपनी अविवेक बुद्धि के साथ प्रतिहिंसा न होगी?
फिर आप मेरे विवेक का मतलब नहीं समझे। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि विवेक से अविवेक को काटें। अगर काटें तो हिंसा होगी। मैं तो यह कह रहा हूं कि आप सिर्फ विवेक में जागें। कुछ है जो कट जाएगाकट जाएगा इस अर्थ में कि वह था ही नहींआप सोए हुए थे इसलिए थाअन्यथा वह गया। कटेगा भी कुछ नहींअंधेरा कटेगा थोड़े ही दीए के जलाने से। इसलिए अंधेरे के साथ कभी भी हिंसा नहीं हुई है। वह नहीं रहेगा बस। विवेक जगेगा और अविवेक चला जाएगा। इसमें मैं हिंसा नहीं देख पाता हूं जरा भी।
आप यह कहते हैं कि यह तो ठीक दिखाई पड़ता है कि दीए को जलाया और अंधेरा चला गया। इसको हम सच मान सकते हैं,क्योंकि यह हमारा अनुभव है। दूसरे को कैसे सच मानें?
मैं कहता ही नहीं कि मानें। अनुभव हो जाएगा तो मान लेंगे। इसको मैं कहता भी नहीं कि मानें। मैं कहता हूं कि आप प्रयोग करके देखें। यदि संशय सच में ही जगा है तो प्रयोग करवा कर ही रहेगा। तभी संशय सच्चा है। तो प्रयोग करके देख लें। विवेक जग जाए और अगर अहिंसा रह जाए तो समझना कि मैं जो कहता थासत्य नहीं कहता था। लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है और न हो सकता है। 

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