शुक्रवार, 1 जून 2018

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-02

अगर हम खाली आकाश को भी थोड़ी देर तक बैठ कर देखते रहेंतो खाली आकाश आपको खाली कर देगा। अगर आप फूलों के पास बैठ कर फूलों को थोड़ी देर देखते रहेंतो थोड़ी देर में फूलों की गंध और फूलों की बास आपके भीतर भर जाएगी। और अगर आप सूरज को थोड़ी देर तक बैठ कर देखते रहेंतो आप पाएंगेसूरज का प्रकाश आपके भीतर भी प्रविष्ट हो गया है। और अगर आप सागर की लहरों के पास बैठ कर उन्हें बहुत देर तक अनुभव करते रहेंतो आप पाएंगेसागर आपके भीतर लहरें लेने लगा है।
ऐसे ही जब कोई परम पुरुषों की स्मृति में डूबता हैऐसे ही जब कोई परम पावन प्रतीक पुरुषों के स्मरण से भरता हैतो उसके भीतर कुछ परिवर्तित होने लगता हैकुछ बदलने लगता हैकुछ नई बात का उसके भीतर प्रारंभ हो जाता है। तो मैं इस आशा में महावीर पर थोड़ी सी चर्चा करूंगा कि इस थोड़ी सी देर के सान्निध्य मेंइस थोड़ी सी देर के उनके स्मरण मेंआपके भीतर कोई परिवर्तन प्रभावित होआपके भीतर कोई आंदोलन उठेआपके भीतर कोई आकांक्षा सजग हो जाएआपके भीतर कोई बीज अंकुरित होने लगे और आपके भीतर नए जीवन कोवास्तविक जीवन को पाने की आकांक्षा उत्पन्न हो जाए।


यह हो सकता है। यह प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है। प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर उन्हीं संभावनाओं को लिए हुए हैजो महावीर में हम परिपूर्णता पर पहुंचा हुआ अनुभव करते हैं। जो महावीर के लिए विकसित हो गया हैवह हमारे भीतर बीज की भांति मौजूद है।
इसलिए कोई अपने दुर्भाग्य को न कोसे और कोई यह न समझे कि हम असमर्थ हैं उतनी ऊंचाइयों में उठने में। और कोई यह न सोचे कि हमारा काम एक है कि हम महावीर की पूजा करें। महावीर की पूजा करना किसी का भी काम नहीं है। काम तो यह है कि हर एक महावीर बनने की तरफ विकसित हो। और महावीर की पूजा भी अगर सार्थक है तो इसी अर्थों में कि हम क्रमशः उस पूजा के माध्यम से भी महावीर की तरफमहावीर की भांति ऊंचे उठने में समर्थ हो जाएं।
इसे स्मरण रखेंकोई मनुष्य केवल पूजा करने को पैदा नहीं हुआ है। और अगर कोई मनुष्य केवल पूजा करने को पैदा होतो इससे बड़ा मनुष्य का अपमान क्या होगाहर मनुष्य महावीर बनने को पैदा हुआ है। कोई मनुष्य केवल पूजा करने को पैदा नहीं हुआ। हर मनुष्य इसलिए पैदा हुआ है कि जो एक के जीवन में विकसित हो सका हैवह प्रत्येक के जीवन में विकसित हो जाए।
तो मैं तो ऐसे ही देखता हूंयहां इतने लोग इकट्ठे हैंये सब कभी न कभी महावीर हो जाएंगे। मैं ऐसे ही देखता हूं कि जितने लोग जमीन पर हैंवे कभी न कभी सब महावीर हो जाएंगे। अगर उनमें से एक भी महावीर बनने से चूक गया--यह कैसे संभव हो सकता हैअनंत काल लग सकते हैंअनंत समय लग सकता हैलेकिन यह असंभव है कि हममें से कोई भी महावीर बनने से चूक जाए। यह असंभव है कि जो बीज हमारे भीतर है परमात्मा कावह एक दिन तक परमात्मा न हो जाए। वह एक दिन परमात्मा होगा।
यह हो सकता है कि महावीर में और आपके महावीर बनने में हजारों वर्ष का फासला हो जाए। यह हो सकता है कि महावीर के महावीर बनने में और आपके महावीर बनने में अनंत जन्मों का फासला हो जाए। लेकिन इससे कोई बहुत अंतर नहीं पड़ता है। इससे कोई बहुत भेद नहीं पड़ता है। अनंत यह काल हैइसमें हजारों वर्षों से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। अनंत यह काल हैइसमें अनंत जन्मों से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है।
तो महावीर का स्मरण मुझे इसलिए आनंद से भर देता है कि वह हमारे भीतर जो महावीर की संभावना हैउसका स्मरण है। महावीर का विचार करना इसीलिए सार्थक हैउपयोगी है कि उसके माध्यम से हम उस संभावना के प्रति सजग होंगेजो हमारे भीतर सोई हुई है और कभी जाग सकती है। अगर आपके भीतर उनका विचार उनके जैसे बनने का भाव पैदा न करता होतो उनका विचार व्यर्थ हो जाता है। तो आज की सुबह मैं आपको यह कहना चाहूंगामहावीर की पूजा ही न करेंमहावीर बनने की आकांक्षा के बीज अपने भीतर बोएं और यह संकल्प अपने भीतर पैदा करें कि मैं उन जैसा बन सकूं। और इसमेंइस आकांक्षा मेंइस संकल्प में जो भी सहयोगी होजो भी उसकी भूमिका बनाने में समर्थ होउस भूमिका कोउस आचरण कोउस विचार कोउस जीवन-चर्या को अंगीकार करें।
मैं ऐसा ही देखता हूंदुनिया में दो तरह के महापुरुष हुए हैं। एक महापुरुष वे हैंजिन्होंने बहुत बड?-बड़े विचार दिए हैं। दूसरे महापुरुष वे हैंजिन्होंने बहुत बड़ा आचरण दिया हैबहुत बड़ी चर्या दी है। महावीर पहले तरह के महापुरुष नहीं हैं। महावीर दूसरे तरह के महापुरुष हैंजिन्होंने एक बहुत महान चर्या दी है। एक बहुत बड़ा आचरण दिया हैएक जीवन दिया है। निश्चित हीबड़े विचार देना उतना मूल्य का नहीं हैजितना बड़ा जीवन देना है। निश्चय हीबहुत बड़े चिंतन को जन्म दे देना उतना मूल्य का नहीं हैजितना महान चर्या को जन्म दे देना है। विचार तो स्वप्न की भांति हैं। विचार का कोई मूल्य नहीं हैवे तो पानी पर खींची गई रेखाओं के समान हैं। चर्या का मूल्य है। चर्या पत्थर पर खींची गई रेखा है। महावीर काजो हमारे स्मरण से विलीन नहीं होते हैं वेउसका कारण है। हमारे हृदयों पर उनकी चर्या ने एक लकीर खींच दी है--उनके आचरण नेउनके जीवन ने।
महावीर को विचारक न कहें। महावीर विचारक नहीं हैं। महावीर एक साधक और सिद्ध हैं। साधक और विचारक में यही अंतर है। विचारक सोचता हैसत्य क्या हैसाधक जीता है।
विचारक सत्य के संबंध में सोचता हैसाधक सत्य को जीता है।
हमने अपने इस देश में विचारकों की बहुत कीमत नहीं मानी। बहुत बड़े-बड़े विचारक हुए हैंजिन्होंने बड़ी दूर की बातें कही हैं--सृष्टि कीसृष्टि के बनने कीपरमात्मा कीस्वर्ग कीनरक कीबड़ी-बड़ी विचार की बातें कही हैं। महावीर इन विचारकों में से नहीं हैं। महावीर बहुत सुदृढ़ भूमि पर खड़े हुए हैं। वे अपनी सारी चर्या को बदल रहे हैं। और यहां इस बात को भी मैं आपसे कह दूंजो व्यक्ति मात्र विचार करता हैवह सत्य के संबंध में विचार करता है। और जो व्यक्ति जीवन में सत्य को उतारता है और आचरण करता हैवह सत्य के संबंध में विचार नहीं करतावह आनंद के संबंध में साधना करता है।
महावीर सत्य के खोजी नहीं हैंमहावीर आनंद के खोजी हैं।
सत्य का खोजी एक दार्शनिक होता हैएक तत्व-चिंतक होता है। आनंद का खोजी एक योगी होता है। महावीर आनंद की खोज कर रहे हैं। और इसलिए यह हो सकता है कि कोई विचार कभी गलत हो जाएयह कभी नहीं हो सकता कि आनंद गलत हो जाए।
इस जमीन पर विचार की दृष्टि से हम भिन्न-भिन्न हो सकते हैंआपका विचार दूसरा हो सकता हैमेरा विचार दूसरा हो सकता है। लेकिन आनंद की तलाश में हम भिन्न-भिन्न नहीं हो सकते। सब की तलाश आनंद की है।
इसलिए महावीर का धर्म सार्वजनीनसार्वलौकिक धर्म है। इस जगत में जो भी आनंद को खोजना चाहेगाउसे महावीर के सिवाय कोई रास्ता नहीं है।
महावीर अगर विचारक होते तो कुछ थोड़े से लोगों के मतलब की उनकी बात होतीजो उनके विचार से सहमत होते। जो उनके विचार के विरोध में होतेउनके लिए कोई मतलब न रह जाता। इसलिए विचारकों के पंथ होते हैंयोगियों का कोई पंथ नहीं होता। विचारकों के संप्रदाय होते हैंआनंद के खोजियों के कोई संप्रदाय नहीं होते। क्योंकि आनंद के लिए तो सारा जगत खोज कर रहा है। उस संबंध में कोई मतभेद नहीं है। एक छोटे से कीटाणु से लेकर मनुष्य तक सभी आनंद की तलाश कर रहे हैं। आनंद के संबंध में दो मत नहीं हैंकोई विरोध नहीं है। इसलिए विचार ऊपरी बात हैआनंद की खोज बहुत गहरी बात है।
अगर मैं आपसे यह कहूं कि आपके सामने दो विकल्प हैं--क्या आप परिपूर्ण आनंद उपलब्ध करना चाहते हैं या कि परिपूर्ण विचार उपलब्ध करना चाहते हैंअगर आपके सामने दो विकल्प होंअगर आपके सामने दो विकल्प खड़े हो जाएं कि क्या आप जानना चाहते हैं कि जगत-सत्य क्या हैया कि आप होना चाहते हैं कि परिपूर्ण आनंद क्या हैतो मैं नहीं समझता कि आपके हृदय सत्य को जानने की गवाही देंगे। आपके हृदय कहेंगेहम पूर्ण आनंद को उपलब्ध होना चाहते हैं।
सत्य को भी इसीलिए खोजा जाता है कि पूर्ण आनंद की तलाश में वह सहयोगी हो जाए। सत्य का अपने में क्या मूल्य हैसत्य का अपने में कोई मूल्य नहीं है सिवाय इसके कि सत्य की उपलब्धि से हम सोचते हैं कि पूर्ण आनंद के आधार रखे जा सकेंगे।
सत्य भी आनंद की तलाश का साधन मात्र है।
इसलिए महावीर के संबंध में पहली बात जो मुझे आज कहने का मन हैवह यह है कि उन्हें सत्य के खोजी की तरह न देखेंउन्हें आनंद के खोजी की तरह देखें। वे आनंद की खोज करने वाले साधक हैं। और इसीलिए उनकी सारी चर्याउनका सारा विचारउनका सारा जीवन मोक्ष पर केंद्रित है। आनंद और मोक्ष एक ही चीज के दो नाम हैं।
दुख क्या है?
दुख सीमा हैदुख परतंत्रता हैदुख बंधन है।
और आनंद?
आनंद स्वतंत्रता होगीबंधन-मुक्ति होगीसीमाओं का टूट जाना होगा। परिपूर्ण आनंद ही परिपूर्ण मुक्ति की अवस्था होगी। मोक्ष में और पूर्ण आनंद में कोई भेद नहीं होगा। जो पूर्ण आनंद को उपलब्ध हैवह मुक्त होगा। जो मुक्त हैवह पूर्ण आनंद को उपलब्ध होगा।
इसलिए पश्चिम के मुल्क के विचारक सोचते हैंसत्य क्या हैभारत के साधक सोचते हैंमुक्ति क्या हैमोक्ष क्या हैमोक्ष का उपाय क्या हैदर्शन और धर्म में यहीं भेद है। दार्शनिक सोचता हैसत्य क्या हैधार्मिक सोचता हैमोक्ष क्या है?
अगर आप पश्चिम के विचारकों को पढ़ेंगे तो आप पाएंगेमोक्ष का कोई विचार ही नहीं करते हैंमोक्ष का कोई खयाल नहीं करते। उनके ग्रंथों में मोक्ष के संबंध में कोई चर्चा नहीं मिलेगी। और अगर आप भारत के ग्रंथों को खोजेंगे और देखेंगे तो पाएंगे कि सिवाय मोक्ष के हम कुछ भी नहीं खोज रहे हैं।
बुद्ध एक गांव से निकलते थेऔर एक व्यक्ति वहां गिर पड़ा था। जंगल में वह जाता था और किसी का तीर उसे लग गया। बुद्ध उसके करीब से निकले और उन्होंने उस आदमी को कहाइस तीर को निकाल लेने दें। उस व्यक्ति ने कहापहले मुझे यह बताएंतीर किसने मारा हैपहले मुझे यह बताएं कि यह तीर विष-बुझा था या गैर-विष का थापहले मुझे यह बताएं कि मारने वाला मित्र थाकि शत्रु थाकि अनजान में उसने मार दिया?
बुद्ध ने कहाये बातें बाद में पूछ लेना। पहले तीर को निकाल लेने दो। कहीं ऐसा न हो कि हम बातें करते रहें और तुम्हारे प्राण समाप्त हो जाएं! बुद्ध ने कहातीर को पहले निकाल लेने दोफिर बाद में हम विचार कर लेंगे कि तीर किसने मारा। कहीं ऐसा न हो कि हम विचार करते रहें और तुम्हारे प्राण समाप्त हो जाएं!
महावीरबुद्धकृष्ण या क्राइस्ट यही कह रहे हैंहमारे हृदय में जो तीर लगा है दुख काउसे हम पहले निकाल लेंफिर बाद में हम सत्य के संबंध में विचार करते रहेंगे। कहीं ऐसा न हो कि हम सत्य के संबंध में विचार करते रहें और प्राण समाप्त हो जाएं! इसलिए भारत की पूरी खोज सत्य के लिए नहीं हैमोक्ष के लिए है। भारत की खोज तीर किसने मारा हैइसको जानने के लिए नहीं हैभारत की खोज इसके लिए है कि तीर कैसे निकल जाए।
तो महावीर को आनंद की खोजमोक्ष की खोज केंद्रीय है। सत्य क्या हैइसकी खोज केंद्रीय नहीं हैगौण है। जो लोग उन्हें एक तत्व-चिंतक की भांति ले लेंगेवे भूल में पड़ जाएंगे। और हमने महावीर को तत्व-चिंतक की भांति ले लिया है। वह हमने भूल कर ली है। यह बात प्राथमिक रूप से आपसे कहूं। और इसलिए यह बात कहना चाहता हूंताकि आपको समझ में आ सके कि महावीर का कोई संप्रदाय नहीं हो सकता है। कोई समाज नहीं हो सकताकोई पंथ नहीं हो सकता। जो भी आनंद को खोजता हैवह सब महावीर के संप्रदाय में हैसब महावीर के पंथ में है।
अभी मैं एक जगह था। किसी ने मुझसे कहा--एक जैन साधु ने मुझसे कहा--कि जैन धर्म के अतिरिक्तजैन होने के सिवाय मोक्ष होने का कोई रास्ता नहीं है। मैंने उनसे कहाऐसा मत कहें। मैंने उनसे कहाऐसा मत कहें कि जैन धर्म के अतिरिक्त मोक्ष जाने का कोई रास्ता नहीं है। बल्कि ऐसा कहें कि जो भी कहीं से भी मोक्ष चला जाएवह जैन है। मैंने उनसे कहाऐसा कहेंजो कहीं भी मोक्ष चला जाएवह जैन है। यह मत कहें कि जो जैन हैवही मोक्ष जा सकता है। यह कहें कि जो भी मोक्ष चला जाता हैवह जैन है।
और अगर दूसरी बात मेरी आपको ठीक लगे तो इस जमीन पर जितने लोग मोक्ष को उपलब्ध हुए होंवे सब महावीर के पंथ में हैंमहावीर के साथ हैं। और तब महावीर एक विराट पुरुष की तरह दिखाई पड़ेंगेएक सीमित दायरे के भीतर बंधे हुए नहीं।
एक ही मेरी आकांक्षा है कि महावीर जैनियों से मुक्त हो सकेंताकि उनका संदेशऔर उनका खयालऔर उनकी जीवन-चर्या सबके काम में आ सके। जिन कुओं पर किन्हीं का कब्जा हो जाता हैउनका जल सबके पीने के मतलब का नहीं रह जाता। और जिन कुओं पर किन्हीं का कब्जा हो जाता हैउन कुओं का पानी सबकी प्यास को बुझा नहीं पाता। कुओं को तोड़ दें और दीवालों को हटा लें और महावीर को बांधें नहींतो आप हैरान हो जाएंगे कि उनकी जो अंतर्दृष्टि हैवह सारे मनुष्य के स्वास्थ्य का मूल चिकित्सा बन सकती है। महावीर की जो अंतर्दृष्टि हैबहुत गहरीबहुत पैनी है। और मनुष्य के जो भी रोग हैंउनको दूर करने में समर्थ है। उस पैनी अंतर्दृष्टि के क्या बुनियादी आधार हैंवह मैं आपसे कहूं।
महावीर की जो अंतर्दृष्टि है मनुष्य की समस्त रुग्णता के भीतरमनुष्य की समस्त विक्षिप्तता के भीतरमनुष्य के सारे जितने भी जीवन के दुखपीड़ाएंसंताप हैंउनके भीतर महावीर की जो अंतर्दृष्टि हैवह एक बात पर खड़ी हुई है। और वह बात यह है कि हम जिन्हें दुख मानते हैंजिन्हें पीड़ाएं मानते हैंजिन्हें कष्ट मानते हैंउन्हें दूर करने का उपाय करते हैं। हर मनुष्य अपने कष्ट कोअपनी पीड़ा कोअपने दुख को दूर करने का उपाय कर रहा है। हर मनुष्य कर रहा है--चाहे वह धन खोजता होयश खोजता होपद खोजता होप्रतिष्ठा खोजता हो--वह अपने दुख को दूर करने का उपाय कर रहा है। महावीर की अंतर्दृष्टि यह है कि जो दुख को दूर करने का उपाय कर रहा है बिना यह जाने कि दुख क्या हैनासमझ हैवह दुख को कभी दूर नहीं कर पाएगा। जो दुख को दूर करने का उपाय कर रहा है बिना यह समझे कि दुख क्या है और किसे हैवह नासमझ है और दुख को कभी दूर नहीं कर पाएगा। एक दुख को दूर करेगादूसरा दुख घेर लेगाक्योंकि मूल कारण मौजूद रहेगा। मेरे पैर में दर्द होमैं उसको दूर करूंगापैर ठीक हो जाएगा। फिर कल मेरे सिर में दर्द होगाउसे दूर करूंगा और सिर ठीक हो जाएगा। दुख तो दूर होते जाएंगेलेकिन दुख दूर नहीं होगादुख पीछे लगा रहेगा। एक दुख दूर होगादूसरे दुख मौजूद होंगेक्योंकि मूल कारण विलीन नहीं होगा।
महावीर यह कहते हैं कि अगर मनुष्य के मूल दुख को हम समझें और दूर करना चाहें तो एक-एक दुख को दूर करने की जरूरत नहीं हैयह बात जानने की जरूरत है कि दुख क्या है और किसे है। जब मेरे पैर में दर्द हो रहा हो या मेरे सिर में दर्द हो रहा होतब मुझे यह जानने की जरूरत है कि दुख और पीड़ा क्या है और दुख और पीड़ा किसे हो रही है। अगर मुझे यह दिखाई पड़ सके--जो दुख कोपीड़ा कोसंताप को...।
मनुष्य के जीवन में दुख हैंबहुत दुख हैं। एक दुख को हम दूर करते हैंदूसरा दुख घेर लेता हैदूसरे को दूर करते हैंतीसरा घेर लेता है। जो दुख को दूर करने में इस भांति लगा हैवह गृहस्थ है--जो एक-एक दुख को दूर करने में लगा है। जो समस्त दुखों के मूल कारण को दूर करने में लगा हैवह संन्यासी है। जो फुटकर बीमारियों को दूर करने में लगा हैवह गृहस्थ है। जो बीमारी मात्र को दूर करने में लगा हैवह संन्यासी है।
महावीर की जो अंतर्दृष्टि है मनुष्य की रुग्णता में और दुख में और पीड़ा मेंवह यह है कि हमें यह जानना जरूरी है कि जब हमें दुख होता हैतो हमें दुख होता है या हमें दुख होने का भ्रम होता हैक्या मुझे दुख होता है या मेरे आस-पास दुख होता है और मैं समझ लेता हूं कि मुझे दुख हो रहा है?
सिकंदर जब भारत से वापस लौटता थातो उसने चाहा एक साधु को वह अपने साथ यूनान ले जाए। जब वह यूनान से आता थाउसके मित्रों ने कहा थाभारत से कुछ चीजें लानाएक साधु भी ले आना। साधुओं की चर्चा रही है भारत के बाहर--भारत के साधुओं की। और सिकंदर भारत को जीत कर लौटेगा तो उसके मित्रों ने कहा थाऔर सब चीजें लाओएक साधु भी लाना। साधु देखना चाहेंगे।
सिकंदर जब लौटने लगा तो उसने--भारत की सीमा के पास उसे खयाल आया--उसने कहाहम किसी साधु को ले जाना चाहते हैं। उसने किसी विचारशील व्यक्ति से सलाह ली। उस विचारशील व्यक्ति ने कहाजो चला जाए वह साधु नहीं होगाऔर जो साधु है उसका जाना मुश्किल है। सिकंदर ने कहाक्या बात करते हैं! जिसके सामने पहाड़ हट जाएं और जो पहाड़ों को भी बांध कर यूनान ले जाना चाहेतो ले जाए। जो चाहे तो पूरे मुल्क को यूनान पहुंचा दे। एक साधु नहीं जा सकेगा! तो सिकंदर की तलवार किस काम आएगीउस विचारशील आदमी ने कहाजिसके सामने तलवार बेकार होवही तो साधु है। जो तलवार के भय से चला जाएसमझना कि उसे बेकार ले आए होवह सामान्य आदमी हैवह साधु नहीं है। फिर भी कोशिश कर लें।
सिकंदर बहुत हैरान हुआ और बहुत उत्सुक हो गया। उसने डेरा रोक दिया और उसने कहाएक साधु को खोज कर ही जाएंगे। यह सच में ही अजीब चीज हैअगर साधु ऐसा आदमी है। एक साधु की खबर लगीवह वहीं नदी के किनारेपहाड़ की तलहटी मेंएक घाटी के पास रहता था। सिकंदर ने अपने सेनापति वहां भेजे। उन सेनापतियों ने जाकर कहा कि महान सिकंदर की आज्ञा है कि आप हमारे साथ चलें! बहुत सम्मान हम आपको देंगेबहुत इज्जत देंगेयूनान आपको ले चलना चाहते हैं। उस साधु ने कहाअपने सिकंदर को कहना कि जिसने सिवाय अपने और सबकी आज्ञाएं माननी छोड़ दी हैंजिसने सिवाय अपने और सबकी आज्ञाएं माननी छोड़ दी हैंवही साधु है। सिकंदर को कहनाहम सिवाय अपनी आज्ञा के और किसी की आज्ञा से नहीं चलते। उसके सेनापतियों ने कहायह आप भूल कर रहे हैं। सिकंदर ने यह भी संदेश कहलवाया है कि यह भी कह देना कि अगर इनकार हुआ तो हम तलवार के बल भी ले जा सकते हैं। उस साधु ने कहाअपने सिकंदर को कहना कि जिसे तुम तलवार के बल ले जा सकते होउसे बहुत समय हुआ हम छोड़ चुके हैं। जिसे तुम तलवार के बल ले जा सकते होबहुत समय हुआ हम उसे छोड़ चुके हैं।
सिकंदर खुद गयाऔर वह नंगी तलवार लेकर गया। वह जब नंगी तलवार लेकर गया तो साधु ने कहातलवार म्यान के भीतर कर लो। क्योंकि सामने जो हैउसके लिए तलवार बेकार हैऔर तुम बहुत बच्चे मालूम पड़ रहे हो नंगी तलवार हाथ में लिए हुए! और तुम पर बहुत हंसी आएगी हमकोइसलिए तलवार म्यान के भीतर कर लो। सिकंदर ने कहाआपको चलना है! अन्यथा हम आपको समाप्त कर देंगे। उस साधु ने कहाजिसे तुम समाप्त करोगेउसे हम भी समाप्त होते हुए देखेंगे। उस साधु ने कहाजिसे तुम समाप्त करोगेउसे हम भी समाप्त होते हुए देखेंगे। हम भी साक्षी होंगे। समाप्त तुम करो। उसने कहाजब तुम मुझे काटोगे तो जिस भांति तुम मुझे देखोगे कटता हुआउसी भांति मैं भी कटते हुए देखूंगा। क्योंकि जिसको तुम काटोगेवह मैं नहीं हूं। मैं अलग हूंमैं पीछे हूं।
जिस पर चोट पड़ती हैहमारा होना उसके पीछे है। जिसको पीड़ा और दुख आता हैहमारा होना उसके पीछे है। जिस शरीर के पीछे हम सारे दुख और पीड़ाओं को दूर करने में लगे रहते हैंवह शरीर हम नहीं हैं। एक-एक दुख को जो दूर करेगावह शरीर से बंधा रहेगा। जो सारे दुखों के मूल में झांकेगावह पाएगाहम शरीर से अलग हैं।
महावीर कहते हैंसमस्त दुख का मूल क्या हैदुख का मूल है तादात्म्ययह आइडेंटिटी कि मैं शरीर हूं। सारे दुख का मूल यह है कि मैं शरीर हूं। और सारे आनंद का मूल यह बनेगा कि मैं जान लूं कि मैं शरीर नहीं हूं।
जब तक मैं जानता हूं कि मैं शरीर हूंतब तक मैं संसार में हूं।
और जिस क्षण मैं जान लूंगा कि मैं शरीर नहीं हूंमेरा मोक्ष में प्रवेश हो जाएगा।
मोक्ष का अर्थ है यह बोध कि मैं शरीर नहीं हूं।
और संसार का अर्थ है यह बोध कि मैं शरीर हूं।
तो अगर आपको यह लगता हो कि मैं शरीर हूंतो चाहे आप साधु हों और चाहे आप गृहस्थ होंआप संसार में हैं। और अगर आपको लगता हो कि मैं शरीर नहीं हूंतो चाहे आप साधु होंचाहे आप गृहस्थ होंआप संसार में नहीं हैं।
मैं एक साध्वी से मिलता था। हवा जोर से चलती थी और मेरा कपड़ा उनको छूता था। वह बहुत घबड़ा गईं। कोई मित्र मेरे पास थेउन्होंने मुझे रोका और कहा कि पुरुष का कपड़ा उनको छू रहा है। मैंने कहाहैरानी हो गई। कपड़ा भी पुरुष हो सकता है! और अगर कपड़ा पुरुष हो सकता हैतो पुरुष छू लेगा तो क्या हालत होगी?
जिनको कपड़ा पुरुष हो सकता हैवे जानते होंगे कि वे शरीर हैं। उनकी तो हद शारीरिक दृष्टि है। ये सब भौतिकवादी लोग हैंये सब मैटीरियलिस्ट हैं। ये अध्यात्मवादी नहीं हैं। जिनको मेरा कपड़ा छू रहा है और जो घबड़ाए हुए हैं कि पुरुष का कपड़ा छू रहा हैइनसे ज्यादा भौतिकवादीइनसे ज्यादा देहवादी और कौन होगा?
एक साधु वह हैजो कहता है तुम तलवारें मेरे भीतर डालो तो हम खड़े होकर देखेंगे! उसे शरीर भी स्वयं का हिस्सा नहीं है। इन्हें कपड़ा भी स्वयं का हिस्सा है! तो दुनिया में ऐसे गृहस्थ हैंजो आध्यात्मिक हो सकते हैंऔर ऐसे साधु हैंजो एकदम भौतिकवादीएकदम शरीरवादी होते हैं।
महावीर की अंतर्दृष्टि यह है कि आपकी चेतना आपके शरीर से मुक्त हो जाए। लेकिन उनके पीछे चलने वाले लाखों साधु शरीर से इतने ज्यादा बंधे हुए हैं कि वे शरीर से मुक्त कैसे होंगेमहावीर की दृष्टि यह है कि आपकी अंतस-चेतना में यह पता चल जाए कि देह बाहर की खोल हैवस्त्र की भांति हैजिसे हमने पहना हैजिसे हमने पहना हैऔर हम चाहें तो उसी क्षण उतार सकते हैं। हमारी वासनाओं को जरूरत है कि हम उसे पहनें। जिस दिन हमारी वासनाएं क्षीण हो जाएंगीहमें कोई जरूरत न होगी कि हम उसे पहनें।
शरीर वस्त्र की भांति हैजो हम अपनी वासनाओं की तृप्ति के लिए पहनते हैं। बार-बार पहनते हैंबार-बार छोड़ देते हैं। लेकिन जो पहनता है इस शरीर कोवह शरीर से अलग है। जो जन्म के समय इस शरीर में प्रविष्ट होता हैवह शरीर से अलग है। और जो मृत्यु के समय इस शरीर को छोड़ता हैवह शरीर से अलग है। और जो जीवन भर इस शरीर में रहता हैवह शरीर से अलग है।
जिस दिन ऐसा बोध होने लगे कि मैं जिस घर में रह रहा हूंवह घर मैं ही हूंउस आदमी के दुख का क्या हिसाब होगा! जब छप्पर उसका टूटेगावह चिल्लाने लगेगा कि मैं टूटा। जब उसके मकान की दीवाल का पलस्तर गिरने लगेगातो वह कहेगामैं मरामेरा पलस्तर गिरा जा रहा है। अगर उसके मकान को आग लग जाएतो वह चिल्लाएगा कि मैं जल गया। लेकिन जो जानते हैंवे उससे कहेंगे कि पागल! न तुम जल रहे होन तुम टूट रहे होतुम केवल इस मकान में रहने वाले हो। जो हो रहा हैमकान पर हो रहा हैतुम पर कुछ भी नहीं हो रहा है। जो भी इस जगत में घटना घट रही हैसब मकान पर घट रही हैमकान के भीतर वाले पर कोई घटना नहीं घट रही है। आज तक यह असंभव हुआ है कि वह भीतर जो बैठा हैउस पर कुछ भी घटा हो। सब जो बाहर घिरा हैउस पर घटा है। और दुख का कारण यह है कि हम समझ रहे हैं कि वह हम पर घट रहा है!
जीवन में कुछ भी नहीं है जो आत्मा पर घटित हो सके। जो भी घट रहा है शरीर पर घट रहा है। इस जगत की कोई शक्ति आत्मा को नहीं छूती हैन छू सकती है। जो भी छूता हैशरीर को छूता है। लेकिन एक भ्रांति कि मैं शरीर हूंपीड़ा और दुख का कारण बन जाती है।
महावीर के धर्म की मूल शिक्षा एक बात में है कि व्यक्ति यह जाने कि वह शरीर नहीं है। इसे जानने का उनका जो मार्ग हैवही तपश्चर्या है। महावीर कहते हैंप्रति घड़ी--दुख मेंसुख मेंपीड़ा मेंअपीड़ा में--निरंतर यह जानो कि तुम शरीर नहीं हो। उठते-बैठतेसोते-जागते तुम यह जानो कि शरीर नहीं हो। भोजन करतेउपवास करतेकपड़ा पहनते या नग्न होते जानो कि तुम शरीर नहीं हो।
अगर चौबीस घंटे इसका सतत अनुस्मरण चले कि मैं शरीर नहीं हूं। जब रास्ते पर चलेंतो पता हो कि शरीर चलता हैमैं नहीं चलता। जब भोजन करें तो बोध हो कि भोजन शरीर करता हैमैं नहीं करता। जब कोई चोट आप पर करे तो जानें कि चोट शरीर पर की गई हैमुझ पर नहीं की गई। अगर यह सतत अनुस्मरण चले--यही अनुस्मरण और इस अनुस्मरण के साथ वैसी ही जीवन-चर्या का नाम तप है।
बहुत दुख झेलना होगा। अगर मुझे अभी आप यहां मारेंतो मुझे जानना होगा कि मुझे नहीं मारा गया। और जब मुझे नहीं मारा गया तो मैं आपको उत्तर क्या दूंगाउत्तर का कोई प्रश्न नहीं है। दूसरे को आप मारें तो हम उत्तर आपको क्या देंगेदुख आए तो जानना कि दुख जिस पर आया हैवह मेरा घर हैमैं नहीं। ऐसा दुख में जाननाऐसा सुख में जानना कि जो आया हैवह मेरे घर पर आया हैमुझ पर नहीं। सुख में अनुद्विग्न होनादुख में अनुद्विग्न होना और दोनों में समता रखनी महावीर की मूल शिक्षा है। इसे वे सम्यकत्व कहते हैं। इसे वे समता का भाव कहते हैं। यह समता का भाव तभी फलित होगाजब मैं यह स्मरण रख सकूं--सारी स्थितियों में यह स्मरण रख सकूं।
ऐसा व्यक्ति जो सुबह से सांझ तकसांझ से सुबह तक सब करते हुए यह जानता रहता होइस बात का बोध उससे छूटता न होयह स्मृति उससे विलीन न होती हो कि यह सब जो भी घटित हो रहा है यह मेरी अंतस-चेतना पर घटित नहीं हो रहा हैउसे एक अनुभव होगा। क्रमशः इसमें गति करते-करते एक दिन उसे पता चलेगावह बिलकुल अलग है और शरीर बिलकुल अलग है। यह बोध इतना स्पष्ट होगाजितना स्पष्ट कोई बोध नहीं होता। आकाश और जमीन के बीच इतनी दूरी नहीं हैजितनी दूरी मेरी आत्मा और मेरे शरीर के बीच है। आकाश और जमीन मिलाए जा सकते हैंमेरी आत्मा और मेरा शरीर मिलाया नहीं जा सकता। फासला बना ही रहेगा। इतने निकट उपस्थित है मेरा शरीर मेरी आत्मा केलेकिन अनंत फासला है जो मिटाया नहीं जा सकता।
अगर आत्मा और शरीर का फासला मिट जाए तो फिर मोक्ष असंभव हो जाएगा। इसलिए पापी से पापी और बुरे से बुरे व्यक्ति की आत्मा और शरीर में उतनी ही दूरी हैजितनी पुण्यात्मा और जितनी श्रेष्ठतम व्यक्ति की आत्मा और शरीर में होती है। शरीर और आत्मा की दूरी उतनी ही हैजितनी आपकी है और जितनी महावीर के केवल-ज्ञान के बाद थी। शरीर और आत्मा की दूरी महावीर की कम नहीं होतीआपकी ज्यादा नहीं हो सकतीफर्क केवल बोध का पड़ता है। महावीर को दिखता है कि दूरी हैआपको दिखता नहीं कि दूरी है। जहां महावीर खड़े हैंवहीं आप खड़े हैं। महावीर को दिख रहा है कहां खड़े हैंआपको दिख नहीं रहा कि कहां खड़े हैं। इससे ज्यादा अंतर नहीं है।
अज्ञान से ज्यादा और कोई अंतर नहीं है।
और वह अज्ञान एक ही है। बुनियादी अज्ञान एक ही हैयह भ्रम कि मैं शरीर हूं। हम इस भ्रम को पालते हैं और पोसते हैं। हम इस भ्रम को पालते हैं और पोसते हैंअनेक-अनेक रूपों में इसका हम पोषण करते हैंइसे सम्हालते हैं। इस भ्रम को सम्हालते हैं। दुर्जन भी सम्हालता हैसज्जन भी सम्हालता है। गृहस्थ भी सम्हालता हैसाधु भी सम्हालता है। दोनों ही इसको सम्हाले रहते हैं! दोनों इस भ्रम को पोषण देते रहते हैं। और तब यह भ्रम घना होता चला जाता है और यही भ्रम जन्म-जन्मांतरों का कारण बन जाता है।
दो दिशाएं हैं मनुष्य के सामने--एक है भ्रम-विसर्जन की और एक है भ्रम-पोषण की। जो महावीर के मार्ग में उत्सुक होंउन्हें भ्रम-विसर्जन पर ध्यान देना होगा। उन्हें ध्यान रखना होगा कि वे जो भी करेंजो भी बोलेंजो भी सोचेंउसमें यह ध्यान रखना होगा: उनकी क्रियाउनका विचारउनकी वाणी इस भ्रम को बढ़ाने में सहयोगी तो नहीं हो रही है! वे जो बोल रहे हैंजो सोच रहे हैंजो कर रहे हैंउससे कहीं उनका यह अज्ञान घना तो नहीं हो रहा है कि मैं शरीर हूं! अगर यह घना हो रहा हैतो उनके कर्म और उनके विचार पाप हैं। अगर यह क्षीण हो रहा हैतो उनके कर्म और उनके विचार पुण्य हैं।
पुण्य और पाप की इसके सिवाय और कोई मैं परिभाषा नहीं देखता हूं। जो आपके भीतर इस भ्रम को तोड़ दे कि मैं शरीर हूंवैसी क्रियावैसा विचार पुण्य हैसदकर्म है। और वैसी क्रियावैसा विचारजो इस भ्रम को घना कर दे कि मैं शरीर हूंपाप है।
कैसे स्मरण रखेंगेकैसे यह तप चलेगाकैसे हम भूलेंगे यह बात कि हम शरीर हैं और जानेंगे यह सत्य कि हम आत्मा हैंमैंने कहासतत अनुस्मरण से। इसे महावीर ने विवेक कहा है। महावीर ने कहा हैसाधु को विवेक से चलना चाहिए। तो कोई होंगे जो समझते होंगे कि विवेक का इतना ही अर्थ है कि उसको देख कर चलना चाहिए कि पैर के नीचे कीड़े-मकोड़े तो नहीं आ गए! महावीर ने कहा हैसाधु को विवेक से लेटना चाहिए। तो कुछ होंगे जो सोचेंगे कि करवट बदलते वक्त ध्यान रखना चाहिए कि नीचे कोई कीड़ा-मकोड़ा तो नहीं आ गया! महावीर ने कहा हैसाधु को विवेक से भोजन करना चाहिए। तो कुछ होंगे जो सोचेंगे कि पानी छना हुआ है या गैर-छना हुआ है! ये विवेक के अत्यंत क्षुद्र अर्थ हैं। विवेक का गहरा और महत्वपूर्ण अर्थ दूसरा हैवास्तविक सारभूत अर्थ दूसरा है।
विवेक का अर्थ हैचलते वक्त साधु को जानना चाहिएमैं नहीं चल रहा हूं। क्षण भर को भी स्खलन न हो इस वृत्ति मेंक्षण भर को भी यह भ्रम न आ जाए कि मैं चल रहा हूं। स्मरण होना चाहिएदेह चलती हैमैं देखता हूं। वासना चलती हैमैं देखता हूं। मैं साक्षी हूं। मन चलता हैमैं द्रष्टा हूं। शरीर चलता हैमन चलता हैमैं नहीं चलतामैं थिर हूं। सारे चलन के बीचसारे परिवर्तन के बीचसारी गति के बीचवह जो थिर बिंदु है हमारे भीतरवह जिसे गीता में कृष्ण ने स्थितप्रज्ञ कहावह जो प्रज्ञा है हमारे भीतर ठहरी हुईउसका बोध रहना चाहिए कि मैं रुका हूं। चलते समय जिसे पता होगा कि मैं रुका हूंभोजन करते वक्त जिसे पता होगा कि मैंने कभी भोजन नहीं लियावस्त्र पहनते वक्त जिसे पता है कि मुझे कोई वस्त्र ढांक नहीं सकतेजब दुख उस पर आएगाउसे पता होगाये दुख मुझ पर नहीं आए। जब सुख उस पर आएगाउसे पता होगाये सुख मुझ पर नहीं आए। जब मृत्यु उसके द्वार-दरवाजा खटखटाएगीतब वह जानेगायह मृत्यु मेरी नहीं हैयह बुलावा मेरा नहीं है।
ऐसे विवेक को जीवन की प्रत्येक क्रिया में पिरो देनाजीवन की प्रत्येक क्रिया मेंछोटी और बड़ी क्रिया में विवेक को गूंथ देनाइसे महावीर ने साधक का आधारभूत कर्तव्य कहा है। जो इसे करता होवह पहली सीढ़ी पर कदम रखता है।
और स्मरण रखेंएक बार में एक ही सीढ़ी चढ़नी होती हैबहुत सीढ़ियां कोई नहीं चढ़ता। एक सीढ़ी आप चढ़ जाएंदूसरी सीढ़ी आपके सामने आ जाती है। अगर विवेक की सीढ़ी कोई चढ़ जाएतो अपने आप दूसरी सीढ़ियां उसके सामने उदघाटित होती चली जाती हैं। मनुष्य को सीखने जैसा विवेक हैऔर कुछ भी सीखने जैसा नहीं है।
लेकिन हम विवेक नहीं सीखतेहम विचार सीख लेते हैं! विवेक और विचार में भेद है। हम विवेक तो नहीं सीखते महावीर सेमहावीर के विचार सीख लेते हैं! महावीर के विचार पर खड़े हुए शास्त्र हैंउनको सीख लेते हैं! महावीर के विचार पर चलते हुए प्रवचन और पांडित्य की बातें हैंउनको सीख लेते हैं!
मैं आपको कहूंमहावीर के विचार को न सीखेंमहावीर के विवेक को सीखें। अगर महावीर को पाना है तो महावीर के विवेक को सीखें। और अगर महावीर की बातें सीख लींतो महावीर को तो नहीं पा सकेंगे। उन बातों से महावीर को नहीं पा सकेंगे। महावीर के विचार का संग्रह न करेंमहावीर के विवेक का जागरण करें अपने भीतर।
और दुनिया के समस्त सदपुरुषों के दो ही जीवन के हिस्से हैं--उनका विचार और उनका विवेक। जो लोग उनके विचार को पकड़ते हैंवे पंडित होकर समाप्त हो जाते हैं। जो उनके विवेक को पकड़ते हैंवे प्रज्ञा और मोक्ष को उपलब्ध होते हैं।
तो आज की सुबहमहावीर के विवेक कोमहावीर के विचार को नहीं। महावीर जो भी कहते हैंवह महत्वपूर्ण नहीं है। महावीर जिस स्थान से कहते हैंउस स्थान पर कैसे पहुंचेंयह महत्वपूर्ण है।
एक साधु हुआ। उससे किसी व्यक्ति ने जाकर पूछा। कोई उसकी उलझन थी। उसने कहायह उलझन मेरी हल कर दें। साधु ने कहायह मैं तुम्हारी उलझन हल कर दूंगातो क्या तुम सोचते हो कि कल तुम्हारी दूसरी उलझन खड़ी नहीं हो जाएगीवह बोला कि कैसे सोच सकता हूं कि नहीं खड़ी हो जाएगी! जीवन तो उलझन है। साधु ने कहाकल तुम फिर आओगेफिर मैंने तुम्हारी उलझन ठीक कर दी। फिर तीसरे दिन क्या होफिर आज मैं हूंकल मैं समाप्त हो जाऊंगातो तुम्हारी उलझन कौन समाप्त करेगातो उस साधु ने कहाअच्छा हो कि तुम उलझन का समाधान मुझसे मत मांगो। तुम मुझसे वह अंतर्दृष्टि मांगोजिससे सारी उलझनें सुलझाने की स्वयं क्षमता मिल जाती है। उस साधु ने कहाअच्छा हो तुम मुझसे समाधान मत मांगोतुम मुझसे वह रास्ता पूछोजिससे कि स्वयं समाधान मिल जाता है और वह अंतर्दृष्टि मिल जाती हैजिससे सारी उलझनें सुलझ जाती हैं।
एक अंधा आदमी आकर मुझसे पूछे कि दरवाजा कहां है इस हाल के बाहर निकलने कामैं उसे बता दूंगा। फिर कल यहां आएगाफिर पूछेगा कि दरवाजा कहां हैदूसरे मकान में जाएगाफिर पूछेगा कि दरवाजा कहां हैजिस मकान में भी जाएगावहीं पूछेगा कि दरवाजा कहां है?
अगर मेरी अनुकंपा उस पर पूरी हो तो मुझे उसे दरवाजा नहीं बताना चाहिएमुझे उसे आंख ठीक करने का उपाय बताना चाहिए। दरवाजा बताने से क्या फायदा होगादरवाजा बताना विचार देना है और आंख ठीक करना विवेक देना है। दरवाजा बताना एक विचार दे दियाउससे एक हल हो जाएगा। लेकिन उससे सब हल नहीं हो जाएगा। असली हल तो तब होता हैजब भीतर अंतर्दृष्टि जागती है और भीतर एक बोधएक विवेक जाग्रत होता है।
तो महावीर ने विचार नहीं सिखायामहावीर ने विवेक सिखाया। और जो आपसे कहता हो कि महावीर ने विचार सिखायावह शत-प्रतिशत असत्य बात कहता होगा। महावीर ने अहिंसा का विचार नहीं सिखायाअपरिग्रह का विचार नहीं सिखायावह अंतर्दृष्टि सिखाईजिसके आने पर अहिंसा आ जाती हैअपरिग्रह आ जाता है।
जिस व्यक्ति को यह दिखने लगे कि मैं शरीर नहीं हूंवह परिग्रही कैसे होगाजिस व्यक्ति को यह दिखने लगे कि मैं शरीर नहीं हूंवह परिग्रही कैसे होगा?
लेकिन मैं आपको कहूं कि वह तथाकथित अपरिग्रही भी नहीं होगाजो आपको दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि जिसको यह दिखाई पड़ने लगे कि मैं शरीर नहीं हूंवह चीजें इकट्ठी करने का मोह भी उसमें नहीं रह जाएगाचीजें छोड़ कर भाग जाने का प्रश्न भी उसे नहीं उठता। वह अस्पर्श को उपलब्ध हो जाएगा। चीजों के बीच हो तो उसे चीजें छुएंगी नहीं। चीजें उसके पास न हों तो चीजों का स्मरण उसे नहीं होगा। वह अस्पर्श को उपलब्ध हो जाएगा।
एक साधु हुआ। एक बादशाह ने उसे बहुत प्रेम किया और अपने घर मेहमान बना लिया। वह साधु उसके घर मेहमान हो गया। मेहमान होने के पहले एक दरख्त के नीचे पड़ा थानंगा फकीर था। मेहमान होने के बाद महल की सारी राज्य-सुविधा उसे उपलब्ध हुई। उस रात वह बहुमूल्य पलंग पर सोया।
राजा को अपने बिस्तर पर सोते वक्त संदेह मन में हुआ कि यह तो अजीब बात हैयह आदमी साधु नहीं मालूम होता। भीख मांगता था दरवाजे परदरख्त के नीचे नंगा पड़ा रहता थाहम इसे आदर दिएहमने कहामहल चलोइसने एक दफे इनकार भी नहीं किया कि नहीं चलते! अगर साधु होता तो इनकार करताऐसा उस राजा ने सोचा। साधु होता वह कहताहमको क्या मतलब राजमहलों से! लेकिन जो कहे कि हमको क्या मतलब राजमहलों सेउसका अभी बहुत मतलब बाकी है। राजा ने कहायह बोला नहीं कुछ भी! हमने कहा चलोयह चला आया! जरूर यह साधु-वाधु नहीं हैयह धोखा है। इसका कोई अपरिग्रह नहीं है। बिस्तर पर सुलायासो गया! अच्छा खाना खिलायाखा लिया!
सुबह होते ही राजा ने कहामुझे एक संदेह होता है। वह साधु हंसने लगा। उसने कहा कि तुम्हें अब होता हैहमें तभी हो गया थाजब तुमने कहा थाऊपर चलो। राजा बोलामतलबवह बोला कि हम उसी वक्त देख लिए थेतुम्हारी श्रद्धा विलीन हो गईसब खतम हो गया। हम तुमसे कहते कि हम फकीर हैंहम कहां राजमहल में जाएंगेहमने लात मार दीतो तुम खुश होते और हमारे पैर पकड़ते और हमारे चरणों में सिर रखते। क्योंक्योंकि तुम्हारी जो वासना हैउसे जो छोड़ता हुआ मालूम पड़ेवह तुम्हें आदर योग्य मालूम होता है।
स्मरण रखनाजब भी आप किसी का आदर करते होवह उसका आदर कम हैआपकी वासना का सबूत ज्यादा है। अगर मैं सारा धन छोड़ कर चला जाऊं और आप मेरे पैर पड़ोतो मैं समझूंगा धन-लोलुप हो। क्योंकि मेरे पैर क्यों पड़ोगेधन-लोलुपता आपकी मेरे पैर पड़ने को कहेगीइसने सारा धन छोड़ दिया और आप धन-लोलुप हो! हद्द त्याग किया हैइसके पैर पड़ो। अगर मैं वस्त्र छोड़ कर नग्न खड़ा हो जाऊंतो आप मुझे नमस्कार करोगेक्योंकि आपकी वस्त्र छोड़ने की हिम्मत नहीं है।
तो जब आप किसी को आदर देते होवह आदर कम हैवह आपका अपमान ज्यादा है और आपके भीतर की असलियत का सबूत ज्यादा है। जो कामी हैवह ब्रह्मचर्य वाले को बहुत आदर देगा। जो भोगी हैवह त्यागी को आदर देगा। जो परिग्रही हैवह अपरिग्रही को आदर देगा। और इसलिए जो धोखेबाज हैंवे अपरिग्रह साध लेंगे और आदर ले लेंगे। जो धोखेबाज हैंवे ब्रह्मचर्य साध लेंगेऔर आदर ले लेंगेऔर अहंकार की तृप्ति कर लेंगे।
उस साधु ने कहामैं उसी वक्त समझ गया था मामला खतम हो गया। लेकिन हमने सोचा तुम्हीं कहोतब बात करेंगे। उस राजा ने कहामुझे तो रात नींद नहीं आई। मैं तो बहुत सोचता रहायह कैसा साधु है! और रात मुझे यह खयाल आता रहा कि अब मुझमें और आपमें क्या फर्क है! आप भी सोए हैं वहींमैं भी वहीं। वही सुविधा मुझे हैवही सुविधा आपको है। वह फकीर बोलामेरे साथ गांव के बाहर चलोउत्तर रास्ते में देंगे।
वे गांव के बाहर गए। और जहां नदी पड़ती थीगांव समाप्त होता थाराजा ने कहाअब बताएं। वह फकीर बोलाथोड़ा और आगे। वह जब भी पूछताबताएं। वह कहताथोड़ा और आगे। दोपहर हो गईराजा ने कहाक्या पागलपन है! उत्तर देना हो दें--और आगे से क्या मतलब हैवह फकीर बोलाऔर आगे ही मेरा उत्तर है। अब हम लौटेंगे नहीं। तुम भी मेरे साथ चलते होवह राजा बोलामैं कैसे जा सकता हूं! मेरा पीछे महलमेरी रानीमेरे बच्चेमेरा राज्य! वह फकीर बोलाअगर फर्क दिखे तो देख लेना। फर्क है--हम जाते हैंतुम नहीं जा सकते। हम जाते हैंहमारा पीछे कुछ भी नहीं है। हम उस बिस्तर पर सोए थेसो लिए! बिस्तर हमारा पीछे नहीं रह गया है कि जिस पर हमें फिर सोना है। कल जब दरख्त के नीचे सोएंगे तो फिर सो लेंगे। और दरख्त से कुछ मोह नहीं बंध जाएगा।
यह है अस्पर्श योग। चीजें छुएं नबस यही जीवन-साधना है।
चीजें छू लेंतो परिग्रह हो जाता है। चीजें न छुएं तो अपरिग्रह हो जाता है। असली अपरिग्रहचीजें न छुएंयह बोध साध लेना है। चीजें छोड़ कर भाग जानान भाग जाना गौण बात है। उसका कोई मूल्य नहीं है।
उनके विवेक को जो अपने भीतर स्थापित करेगावह धीरे-धीरे इस जीवन-स्थिति को उपलब्ध हो जाता है। तब वह जल में--जल में कमल के पत्तों की भांति जीता है।
ईश्वर करेवैसी स्थिति आपको उपलब्ध हो। और अगर आकांक्षा हो वैसी स्थिति कीतो महावीर ने जिसे विवेक कहाउसे साधें। आकांक्षा होतो सतत इस बात का अनुस्मरण साधें कि मैं देह नहीं हूं। तो धीरे-धीरेजैसे एक-एक बूंद गिर कर सागर भर जाता हैजैसे एक-एक बूंद गिर कर सागर भर जाता है और एक-एक किरण गिर कर सारे जगत को आलोक से भर देती हैवैसे ही एक-एक क्षण अनुस्मृति का साधते-साधते एक दिन विवेक के सूर्य का जन्म होता है और मनुष्य परम सत्य कोपरम शांति कोआनंद को उपलब्ध होता है।
प्रभु करेवैसी आकांक्षा आपमें उत्पन्न होवैसा संकल्प उत्पन्न होवैसा श्रम करने का साहस उत्पन्न हो। और जो जीवनजिसको पाने के लिए हैवह पाना आपको संभव हो जाए।
इस कामना के साथ अपनी बात को पूरा करता हूं। मेरी बातों को इतने प्रेम से सुना हैउसके लिए बहुत अनुगृहीत हूं।
आप सबके भीतर जो संभावी महावीर हैउसके लिए मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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