शुक्रवार, 1 जून 2018

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-03

मेरे प्रिय आत्मन् ,
भगवान महावीर के इस स्मृति दिवस पर थोड़ी सी बातें उनके जीवन के संबंध में कहूंउससे मुझे आनंद होगा।
भगवान महावीरजैसा हम उन्हें समझते हैं और जानते हैंजो चित्र हमारी आंखों में और हमारे हृदय में उनका बन गया हैजिस भांति हम उनकी पूजा करते और आराधना करते हैंजिस भांति हमने उन्हें भगवान के पद पर प्रतिष्ठित कर लिया हैउस चित्र में मुझे थोड़ी भूल दिखाई पड़ती है और महावीर के प्रति थोड़ा अन्याय दिखाई पड़ता है।
महावीर का पूरा उदघोषउनके जीवन का संदेश एक बात में निहित है कि इस जगत में कोई भगवान नहीं है। उनका उदघोष इस बात में निहित है कि किसी की पूजा और किसी की प्रार्थना आनंद का और मुक्ति का मार्ग नहीं है। कोई आराधनाकोई प्रार्थनाकोई पूजा सत्य तक और आत्मा तक नहीं ले जाती है।

महावीर को समझना है तो प्रार्थना कोआराधना को नहींध्यान को और समाधि को समझना होगा। प्रार्थना और आराधना भगवान से की जाती हैकिसी ईश्वर से। ध्यान किसी ईश्वर से नहीं किया जाता। प्रार्थनाआराधना किसी भगवान के लिए हैं। ध्यानजो भीतर सोया हुआ हैउसे जगाने के लिए है।
महावीर किसी भगवान के आराधक नहीं हैंकिसी भगवान केजो आकाश में होउसके पूजक नहीं हैंकिसी भगवान के लिए उनकी प्रार्थना-उपासना नहीं है। उनका मानना है कि कुछ हमारे भीतर प्रसुप्त हैसोया हुआ हैउसको जगाना है। ईश्वर कहीं और दूसरी जगह विराजमान नहींप्रत्येक चैतन्य के भीतर सोई हुई शक्ति का नाम है। उसे उठानाउसे आविर्भाव करनाउसे उत्तिष्ठित और जाग्रत करना है। इसलिए किसी की प्रार्थना नहीं करनीक्योंकि प्रार्थना कौन करेगाभगवान अगर भीतर मौजूद हैतो प्रार्थना कौन करेगा और किसकी करेगाजो प्रार्थना कर रहा हैवही अगर भगवान हैतो प्रार्थना किसकी होगीप्रार्थना नहीं हो सकती। लेकिन जो भीतर हैउसे जगाने और उठाने और उसे उत्तिष्ठित करने के प्रयास हो सकते हैं।
महावीर का मार्ग भक्ति का मार्ग न होकरज्ञान का मार्ग है। उनका मार्ग भगवान के लिए प्रार्थना का न होकरवह जो परमात्म-शक्ति प्रत्येक के भीतर प्रसुप्त हैउसे जगानेउसे जाग्रत करने का मार्ग है।
इस सत्य को प्राथमिक रूप से मैं इसलिए कह रहा हूं कि उसे समझे बिना महावीर की परिपूर्ण, उनके व्यक्तित्व का पूरा रूप,उनका पूरा जीवन स्पष्ट नहीं होता है।
हमने उन्हें भी ईश्वर में परिणत कर दिया है। हमने उनके भी मंदिर बनाएउनकी भी मूर्तियां बनाईं और हमने उनकी पूजा और प्रार्थना प्रारंभ कर दी है! और हम इस भ्रांति में हैंऔर अनेक लोग इस भ्रांति के समर्थक हैंकि उनकी पूजा और प्रार्थना से,उनकी आराधना से कल्याण होगा! अनेक-अनेक लोग इस समर्थन में प्रतीत होंगे कि उनकी पूजा और प्रार्थना से कल्याण होगा! जब कि महावीर की उदघोषणा यह है कि किसी की पूजा और किसी की प्रार्थना कल्याण नहीं ला सकती है। कल्याण तो आत्म-जागरण से होगाकिसी के नाम-स्मरण से नहीं। महावीर-महावीर या अरिहंत-अरिहंत कहने से नहींबल्कि उस स्थिति में उतरने सेजहां सब कहना बंद हो जाता है। किसी नाम के उदघोष से नहींबल्कि उस चैतन्य में प्रवेश करने सेजहां सब नाम छूट जाते हैं। किसी विचार का बार-बार आवर्तन करने से नहींबल्कि उस निर्विचार दशा मेंजहां समस्त विचार विसर्जित हो जाते हैंवहां उसका दर्शन होगाउसकी अनुभूति होगीउसका जागरण होगाजो प्रभु है।
तो महावीर को भगवान मान कर जो हम चल पड़ते हैंउसमें महावीर की प्रतिष्ठा और सम्मान नहींउसमें हमारा अज्ञान और नासमझी है। उसमें उनका सम्मान नहींहमारा अज्ञान और हमारी कमजोरी और हमारी असहायअपनी हीनता की धारणा है। प्रत्येक व्यक्ति इतना हीन अनुभव करता है कि बिना किसी के कल्याण किए मेरा कल्याण कैसे होगा! सारे जगत मेंसारे लोगों में ईश्वर की जो सहायक की तरह धारणा विकसित हुईउसके पीछे मनुष्य के मन में छिपी हुई हीनता और दुर्बलता है। हमें लगता हैहम इतने कमजोर! हम इतने हीन! हम अपने से कैसे आनंद कोमोक्ष कोज्ञान को उपलब्ध हो सकते हैं! कोई सहारा चाहिएकोई पथ-द्रष्टा चाहिएकोई हाथ चाहिए जो हमें आगे बढ़ाए। महावीर की क्रांति इसी बात में है कि वे कहते हैं कोई हाथ ऐसा नहीं है जो तुम्हें आगे बढ़ाए। और किसी काल्पनिक हाथ की प्रतीक्षा में जीवन को व्यय मत कर देना। कोई सहारा नहीं है सिवाय उसकेजो तुम्हारे भीतर है और तुम हो। कोई और सुरक्षा नहीं हैकोई और हाथ नहीं है जो तुम्हें उठा लेगासिवाय उस शक्ति के जो तुम्हारे भीतर हैअगर तुम उसे उठा लो। महावीर ने समस्त सहारे तोड़ दिए। महावीर ने समस्त सहारों की धारणा तोड़ दी। और व्यक्ति को पहली दफा उसकी परम गरिमा में और महिमा में स्थापित किया है। और यह मान लिया है कि व्यक्ति अपने ही भीतर इतना समर्थ हैइतना शक्तिवान है कि यदि अपनी समस्त बिखरी हुई शक्तियों को इकट्ठा करे और अपने समस्त सोए हुए चैतन्य को जगाएतो अपनी परिपूर्ण चेतन और जागरण की अवस्था में वह स्वयं परमात्मा हो जाता है।
व्यक्ति के भीतर हीनताअसहाय अवस्था के बोध का विसर्जन महावीर को समझने का पहला चरण है। वे कोई सहाराकोई काल्पनिक सहारा नहीं देना चाहते हैं।
मुझे स्मरण आता हैउनका निकटतम शिष्य था गौतम। गौतम के पीछे जो लोग आएवे मुक्ति कोसमाधि को उपलब्ध हो गएलेकिन गौतम नहीं हुआ। महावीर ने बार-बार गौतम को कहा कि तुझे बहुत देर हुईबहुत ज्ञान को सुनते-विचारते समय बीताअब तक तुझे स्वयं प्रज्ञा उत्पन्न क्यों नहीं हो रही। तू थोड़ा समझ!
गौतम कहता हैमैं सब समझने की चेष्टा कर रहा हूं। न मालूम कौन सी बाधा है जो मुझे रोकती है।
और फिर महावीर का महापरिनिर्वाण भी हो गया। गौतम अमुक्त थाअमुक्त ही रहा। जिस दिन महावीर ने देह त्यागीगौतम पास के गांव में गया था। वह जब लौटता थाराहगीरों ने खबर दी कि महावीर देह को त्याग दिए हैं।
गौतम वहीं रोने लगा। और उसने कहामेरा क्या होगाउन भगवान के रहते भी मैं समाधि को और सत्य को उपलब्ध नहीं हुआ। उन भगवान की छाया में रह कर भी मैंने उस अंतः-शक्ति के जागरण को अभी अनुभव नहीं किया। उन भगवान की मौजूदगी में भी मैं अभी आत्म-साक्षात नहीं कर सका हूं। मेरा क्या होगा! मैं तो डूब गया! मुझे भी क्या उन भगवान ने अंतिम समय में स्मरण किया थामेरे लिए भी कोई स्वर्ण-सूत्र छोड़ा है?
राहगीरों ने कहामहावीर ने कहा है गौतम को कह देना--और वह बात मैं आज समस्त उन लोगों से कह देना चाहता हूं जो महावीर को प्रेम करतेआदर करतेभगवान की तरह पूजते हैं--महावीर ने कहा है कि गौतम को कह देनातू पूरी नदी पार कर गया अब किनारे को पकड़ कर क्यों रुका हैतू सब कुछ पा चुका अब महावीर को पकड़ कर क्यों रुका हुआ हैइनको भी छोड़ दे!
यह अदभुत क्रांति की बात है। यह अदभुत क्रांति की बात है कि महावीर कहते हैंमुझे भी पकड़ो मतमैं भी तुमसे बाहर हूंमैं भी तुमसे अन्य हूंमैं भी तुम्हारी आत्मा नहीं हूं। संसार भी बाहर हैतीर्थंकर भी बाहर हैं। पकड़ो मत बाहर कुछ। बाहर सारी पकड़ छोड़ दो। जब बाहर की कोई भी पकड़ न होगी तो भीतर उसका जागरण होगाउसका दर्शन होगाजो बाहर चीजों के पकड़ लेने के कारण दिखाई नहीं पड़ता है। जो बाहर की चीजों से छिप जाताआवृत हो जाता हैउसकी अनुभूति होगी।
यह अदभुत क्रांति की बात है कि कोई शास्ताकोई गुरु यह कहेमुझे भी छोड़ दो!
आमतौर से गुरु कहेगामुझे पकड़ो! मेरा अनुसरण करो! मैं हूं मार्ग! मेरी शरण में आओमैं हूं सब कुछ! मैं तुम्हें पार कर दूंगा! मैं तुम्हें द्वार दिखा दूंगा सत्य का! मैं तुम्हें परमात्मा तक पहुंचा दूंगा! आमतौर से गुरु कहेगामैं सब कुछ हूंमुझे स्वीकार करो। तुम नहीं स्वीकार करते होवही कमजोरी है। पूरी तरह स्वीकार करो।
महावीर बड़े उलटे व्यक्ति मालूम होते हैं। वे कहते हैंमुझे भी छोड़ दो! दुनिया में वैसा गुरु खोजना कठिन हैजो कहे मुझे भी छोड़ दो। मेरा अनुकरण मत करोक्योंकि मैं भी बाहर हूं। अपनी ही आत्मा का अनुसरण करो।
जो फर्क मैं समझाना चाह रहा हूं...अगर मैं आपसे कहूंमेरा अनुगमन करोतो मेरे पीछे आप चलेंगे। यह चलना बाहर चलना है। क्योंकि किसी अन्य का अनुगमन कर रहे हैं। महावीर कहते हैंबाहर किसी का अनुगमन नहीं करना है। बाहर के सब रास्ते संसार में ले जाते हैं। किसी का अनुगमन नहीं करनाअपनी ही आत्मा का अनुसरण करना है। किसी की शरण में नहीं जानाआत्म-शरण बनना है।
महावीर की साधना अ-शरण की साधना है। किसी की शरण नहीं जानाअपनी ही शरण में आना है। इस मौलिक क्रांतिकारी बिंदु को समझ लेना जरूरी है। इसको समझ करफिर महावीर की साधना की क्रांति समझ में आ सकती है।
तो मैं पहली बात आपसे कहूंमहावीर को भगवान के रूप में स्थापित करके हम महावीर के साथ अन्याय कर रहे हैं। महावीर नहीं चाहते कि उन्हें भगवान की तरह स्थापित करो। महावीर चाहते हैं कि तुम अनुभव करो कि तुम भगवान हो। महावीर चाहते हैंउन्हें परमात्मा की तरह नहींतुम अनुभव करो कि तुम्हारे भीतर परमात्मा मौजूद है। मनुष्य की अंतरात्मा ही परिशुद्ध होकर परमात्मा हो जाती हैयह उनका संदेश है।
और इस बात को...यदि ठीक से दिखाई पड़े कि हमारे भीतर कौन है जिसे हम परमात्मा कह सकेंजिस देह को हम जानते हैं,उस देह में तो कोई परमात्मा जैसा नहीं है। जिस मन को हम जानते हैंउसमें तो कोई परमात्मा जैसा नहीं है। देह तो बिलकुल पशु है। देह में क्या है जो परमात्मा होदेह में तो सब कुछ है जो पशु है। एक मनुष्य की देह में और पशु की देह में कोई भेद नहीं है। देह के नियम वही हैंजो पशु की देह के नियम हैं। देह की दृष्टि से आप पशु से या कोई भी पशु से भिन्न नहीं है। अगर हम अकेले देह ही मात्र हैंअगर शरीर मात्र हैंतो पशु ही हैं। तो देह में तो कोई परमात्मा नहीं हो सकता। मन में शायद परमात्मा हो!
मन को थोड़ा झांकें तो वहां भी पाएंगेवहां तो पशु से भी बदतर कोई मौजूद है। अगर मन को देखेंगे तो पाएंगेवहां तो पशु से भी बदतर कोई मौजूद है। इस जगत में कोई पशु इतना बदतर नहीं हैजितना मनुष्य का मन है। कितना पापकितनी घृणाकितना द्वेषकितनी हिंसा उसके मन में परिव्याप्त है! एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक ने कहाअगर प्रत्येक व्यक्ति के मन का सारा लेखा-जोखा इकट्ठा किया जा सकेतो ऐसा आदमी पाना कठिन होगाजो अपनी जिंदगी में अनेक लोगों की हत्या के विचार नहीं करता है। ऐसा आदमी पाना कठिन होगाजो बड़े-बड़े डाके अपने मन में नहीं डालता है। ऐसा व्यक्ति पाना कठिन होगाजो अनेक-अनेक रूपों में व्यभिचार की कल्पना और योजना नहीं करता है। वहां मन में एक-दो पापी नहींअनेक पापी जैसे इकट्ठा हैं। मन भी परमात्मा नहीं हो सकता।
यह महावीर कहते हैं कि तुम्हारे भीतर परमात्मा है। वह कहां होगायह देह तो पशु है। इसके भीतर जो मन हैवह और भी पशु से बदतर है। इस देह और मनदोनों में परमात्मा नहीं हो सकता।
लेकिन हमारा जाननाहमारा पहचाननाहमारा बोध हमारे शरीर और मन के बाहर नहीं है। हम अपने शरीर को जानते हैं और अपने मन को जानते हैं। इनके पीछे तुम्हें किसी का कोई अंतर्दर्शन नहीं होता है। उस अंतर्दर्शन को उपलब्ध हुए बिनाजो शरीर और मन के पीछे हैकोई व्यक्ति इस सत्य को नहीं समझ सकेगा कि हमारे भीतर परमात्मा है। मैं किसी से कहूंतुम्हारे भीतर परमात्मा हैतो बड़ी हैरानी भर होती है। ऐसा हमारा जानना नहीं है।
जोड नेपश्चिम के एक बहुत बड़े विचारक ने लिखा हैमैं सुनता हूं कि पूरब के लोग कहते हैंप्रत्येक के भीतर परमात्मा है! मैं अपने भीतर झांकता हूं तो सिवाय पशु के किसी को भी नहीं पाता हूं।
फ्रायड ने भी वही अनुभव लिए हैंवही निष्कर्ष लिए हैं कि मनुष्य के भीतर पशु के सिवाय और कोई भी नहीं है। अभी जितना काम हो रहा है मन के ऊपरउसका अनुभव यह है कि आप बहुत धोखे में हैंमन में कोई परमात्मा जैसी चीज नहीं है। वहां परमात्मा की झलक भी नहीं है। अगर आप आधा घंटा अपने चित्त में चलते हुए चेतन-अचेतन विचारों की पर्तों को निरखेंउनका निरीक्षण करेंउनका आब्जर्वेशन करेंतो बहुत घबड़ा जाएंगेबहुत तिलमिला जाएंगेबहुत डर मालूम पड़ेगाबहुत नरक मालूम पड़ेगा कि यह मेरे भीतर क्या है! यही मैं हूं! यही मेरा होना है! यही मेरी सत्ता है! बहुत घबड़ाहट मालूम होगी और उसी घबड़ाहट के कारण हममें से कोई भीतर जाना नहीं चाहता है। लाख कोई कहेअपने को जानो! अपने को हम जानना नहीं चाहतेहम अपने को जानने से बचना चाहते हैं। हम चौबीस घंटे ऐसे उपाय कर रहे हैं कि अपने से कहीं मिलना न हो जाएकहीं एनकाउंटर न हो जाएमुलाकात न हो जाए। हम उसको भुलाने के हर उपाय कर रहे हैं। हमारे मनोरंजनहमारी हंसी-खुशीहमारे आमोद-प्रमोद उसको भुलाने के हैं। हमारे नशे उसको भुलाने के हैं। संगीत मेंसेक्स मेंशराब में हम उसको भुलाने की कोशिश कर रहे हैंकि कहीं उस भीतर में देखना न पड़े कि वहां कौन है। जब तक जागते हैंभुलाए रखते हैं। फिर सो जाते हैंफिर उठते हैंफिर लग जाते हैं! खाली अगर आपको छोड़ देंआप बहुत तिलमिलाएंगेबहुत घबड़ाएंगे। यह बड़ी अजीब सी बात है। अगर एक महीने आपको कोई पलायन काएस्केप का अपने से मौका न दिया जाएआप पागल हो जाएंगे।
एक ऐसी घटना हुई। इजिप्त में एक बादशाह हुआ। एक फकीर ने उस बादशाह से कहा कि तुम सोचते हो कि तुम बहुत समझदार हो! तुम बड़े अज्ञानी हो। तुम सोचते हो कि आत्म-ज्ञान की बातें करते हो! तुम अपने भीतर जाने से डरते हो। उस फकीर ने कहाअगर एक महीना हम तुम्हें बंद कर दें--जो मैंने आपसे कहा--आप एक महीने में पागल हो जाओगे। अगर आपको मौका न दें अपने से बाहर भागने काकिन्हीं कामों में अपने को आक्यूपाइड कर लेने काव्यस्त कर लेने काउलझा लेने काऔर आपको बार-बार अपने ही अपने को देखना पड़ेआप विक्षिप्त हो जाओगे।
बादशाह बोलाअजीब सी बात है। मैं प्रयोग करके देखूंगा।
एक भला-चंगा आदमीजो उसके द्वार से रोज निकलता था खुश सांझ को काम करके। भरा-पूरा परिवार थापत्नी थीबच्चे थेखुश नजर आता था। सुबह दफ्तर जानासांझ लौट आना। तो उसने एक सांझ को उस खुश लौटते आदमी को मार्ग से पकड़वा कर बुलवा लिया। उससे कहा कि तुम्हें महीने भर हम बंद करते हैं। कोई कसूर नहीं हैएक प्रयोग के लिए बंद करते हैं। उसके घर खबर पहुंचा दी कि हमने आपके पति को--उसकी पत्नी को कहलाया--बंद कर दिया हैघबड़ाना मतसब खर्च मिलेगा राज्य से और महीने भर बाद उसे छोड़ देंगे। उस आदमी को महीने भर बंद रखा।
वह एक-दो दिन चिल्लाता रहा कि मुझे क्यों बंद कर रहे हैंमतलब क्या है आपकामैंने कौन सा कसूर कियाकोई उत्तर उसे दिए नहीं गए। उसे खाना दिया गयाउसने खाना फेंक दिया। उसे पानी दिया गयाउसने पानी नहीं लिया। वह चिल्लाता रहादो दिनढाई दिनफिर थक गयाफिर पानी पी लिया। फिर और थक गयाफिर खाना खा लिया। फिर और थक गयाफिर चिल्लाना भी बंद कर दिया। फिर वह बैठा रहता था उस कमरे में और उसका निरीक्षण वह बादशाह करता था खिड़की से। दिन पर दिन बीतते चले गए। वह फिर अकेले बैठे-बैठे अपने से बातें करने लगाजोर से बातें करने लगा! तो वह बातें करने लगाअपनी पत्नी से भी बातें करने लगाअपने बच्चों से खेलने लगा वहां! उस कमरे में न पत्नी हैन बच्चे हैं। महीना पूरा हुआउसकी जांच की गईवह आदमी पागल हो चुका था।
उसे अच्छा खाना दिया जाता थाकपड़े दिए जाते थेपहनने को दिया जाता थापानी दिया जाता थासब सुविधा थीअसुविधा कोई भी न थीलेकिन अपने से भागने का कोई उपाय नहीं दिया गया। नंगी दीवारें थींन कोई किताब थीन कोई अखबार थान कोई रेडियोन कोई सिनेमान कोई मित्रन कोई और रास्ते जहां वह अपने को भुलाए रखे। चौबीस घंटे उसे अपने को देखना था। वहां सिवाय पशु के और कोई भी नहीं था। वहां सिवाय गलतव्यर्थ के विचारों के और कोई भी नहीं था। वह विक्षिप्त हो गया।
अगर आप अपने मन को देखेंतो सिवाय पागल होने के और कुछ भी नहीं होंगेवहां पागल मौजूद है।
तो महावीर कहते हैंवहां परमात्मा है। तो फिर कहां होगाशरीर में परमात्मा हो नहीं सकता। यह मन हैइसमें परमात्मा नहीं है। महावीर कहते हैंवह परमात्मा जरूर है। लेकिन शरीर को भीउस तक पहुंचने के लिएपार करना होता है। और मन को भीउस तक पहुंचने के लिएपार करना होता है। शरीर की पर्त के पीछे हटोमन हैमन की पर्त के पीछे भी हट जाओ तो वह हैजिसे परमात्मा उन्होंने कहा है।
हम अपने मकान केजिसके तीन खंड हैं--मेरी आत्मामेरा मनमेरा शरीर--हम दो ही खंडों में जीवन गुजार देते हैंतीसरे खंड से अपरिचित रह जाते हैं! हम उसकी दहलान में ही घूम-घूम कर जीवन व्यतीत कर देते हैंउस आंतरिक कक्ष से अपरिचित रह जाते हैंजहां हमारा वास्तविक होना है! और उससे अपरिचित व्यक्ति निश्चित दुख में पड़ा रह जाता हैनिश्चित पीड़ा में पड़ा रह जाता हैनिश्चित सारे जीवन दुख को मिटाने की कोशिश करता हैलेकिन दुख को नहीं मिटा सकता। जीवन भर सुख को पाने की चेष्टा करता हैलेकिन सुख को नहीं पा सकता। क्योंकि दुख एक ही बात के कारण है और वह यह कि वह अपने केंद्र से च्युत है। अपने केंद्र पर नहीं हैयही उसका दुख है। वह सोचता है कि वस्तुओं के न होने से वह जो दुख है। वह दुख नहीं हैक्योंकि कितनी ही वस्तुएं मिल जाएंसुख नहीं आता।
इस जमीन पर ऐसे लोग हुए हैंजिनके पास सब था। खुद महावीर के पास सब थालेकिन उस सब ने उन्हें सुख नहीं दिया। आज तक एक भी आदमी मनुष्य के इतिहास में नहीं हुआजिसने यह कहा हो कि मैंने सब पा लिया और मुझे सुख मिल गया हो। सब पा लियातब भी दुख उतना ही थाजब कि सब नहीं पाया था। दुख में अंतर नहीं पड़ता है। जो पा लियाउससे दुख में अंतर नहीं पड़ता है। तो फिर कुछ बुनियादी बात दूसरी होगी। दुख का संबंध कुछ पाने से नहीं है। दुख का संबंधवह आंतरिक केंद्रउस सेंटर खो देने से है।
हम अपने केंद्र पर नहीं हैंयह हमारी पीड़ा है। हम अपने केंद्र पर आ जाएंयह हमारा आनंद हो जाएगा। महावीर की समस्त साधना केंद्र-च्युत मनुष्य को वापस केंद्र कैसे दिया जाएइसकी साधना है।
हमारा दुख और पाप और कुछ नहीं है--एक ही दुखएक ही पापएक ही पीड़ा है कि हम अपने केंद्र पर नहीं हैं। जो हमारा वास्तविक होना हैजो हमारा आथेंटिक बीइंग हैजो हमारी प्रामाणिक सत्ता हैउससे हम संबंधित नहीं हैं। हम बाहर कहीं घूम रहे हैं। हम अपने बाहर कहीं चक्कर काट रहे हैं। हम अपने से अजनबी और स्ट्रेंजर हो गए हैं। मनुष्य के जीवन में एक ही पीड़ा हैवह अपने से अजनबी हो सकता है। यह अजनबीपनयह अपने को न जाननायह अपने से परिचित न होना--समस्त धर्म इस परिचय की ओर ले जाने के मार्ग के सिवाय और कुछ भी नहीं है। कभी इस पर विचार करेंकभी इसको अनुभव करेंकभी इस सत्य को निरीक्षण करें--इस सत्य को निरीक्षण करें कि मैं अपने को जानता हूं?
महावीर को वही पीड़ा पकड़ी। सब उनके पास है। सब उनके पास था--सारी सुविधासारी व्यवस्थासारी समृद्धि। एक ही पीड़ा थी--खुद अपने पास नहीं थे। सब उनके पास थास्वयं अपने पास नहीं थे। सब उन्हें उपलब्ध थास्वयं की सत्ता अनुपलब्ध थी। सब उनकी जीत हो गई थीलेकिन स्वयं अनजीता था। सब उन्होंने जान लिया थाएक केंद्र अनजाना और अपरिचित था। जब सबको जान कर भी सुख न मिलाजब सबको पाकर भी सुख न मिलाजब सबको जीत कर भी शांति न मिलीतो स्वाभाविक था कि यह विचार उठे कि वह जो अनजीता एक बिंदु हैशायद आनंद और शांति का केंद्र वही हो।
अगर मैं इस घर में सारे कोने-कोने को तलाश लूं और मुझे प्रकाश न मिलेतो शायद मैं सोचूं कि जो कोना अनजानाअपरिचित रह गयाउसे और खोज लें। जो सब पा लियाउसे अनुभव हुआ कि सब पाने में आनंद नहीं मिला। शायद जो मैं स्वयं अपने को अनपाया छोड़ दियाउसे पाने में आनंद हो! और जिन लोगों ने उस स्वयं को जानने की कोशिश कीउन्हें अनुभव हुआआनंद वहां था। आनंद पाना नहीं थाआनंद वहां मौजूद थाकेवल उदघाटन करना था। आनंद खोजना नहीं थाआनंद स्वभाव था। केवल वस्त्रआवरण अलग करने थे।
मैं एक कुएं को खुदते देखता था। मिट्टी की पर्तें अलग की गईं और नीचे से पानी के झरने आ गए। पानी वहां मौजूद था। मिट्टी से आवृत था। पानी लाया नहीं गयाकेवल ऊपर के आवरण अलग किए गएनीचे झरने फूट पड़े। वे झरने फूट पड़ने को बहुत उत्सुक थे। मिट्टी हटी नहीं कि उन्होंने फूटना शुरू कर दिया। वे बह पड़ने को बड़ी आकांक्षा से भरे थे। मिट्टी हटी नहीं और वे बहने लगे। वैसा ही हमारे भीतर आनंद उपस्थित है। केवल आवृत मिट्टी के थोड़े से अलग करने हैं। थोड़े से ऊपर जो आवरण हैंउनको अलग करने हैं।
और यह जो मैं कहता हूं--या यह जो महावीर ने कहाबुद्ध ने कहाक्राइस्ट नेकृष्ण ने कहा--यह जो कहा कि भीतर वहां ज्ञानअनंत ज्ञानअनंत शक्तिअनंत आनंद मौजूद हैसच्चिदानंद वहां मौजूद हैकेवल आवरण अलग करने हैं। यह कोई सिद्धांत नहीं हैयह कोई विचार मात्र नहीं हैयह अनुभूति है। इसे करोड़-करोड़ लोगों ने जाना है। इस भांति अपने आवरण उघाड़ कर उस सच्चिदानंद को अनुभव किया है। उसकी अनुभूति को दूसरे लोग न भी देख सके होंतो भी अनुभूति से फैली हुई सुगंध को दूसरे लोगों ने भी अनुभव किया है।
महावीर को देख कर लाखों लोगों को अनुभव होता है: कुछ हो गया है इस आदमी मेंजो हममें नहीं हुआ है। कोई आनंद इसमें प्रकीर्ण हो गया हैकोई शांति इसमें घनीभूत हो गई है। यह किसी दूसरे तल परकिसी दूसरे डायमेंशन मेंकिसी दूसरे आयाम मेंकिसी दूसरे आकाश का प्राणी हो गया है। उसकी सुगंधउसका संगीतउसके जीवन से फैलती हुई किरणें अनेक को अनुभव हुई हैं। उसके सत्य को तो नहीं अनुभव किया जा सकतालेकिन उसकी सुगंध को अनुभव किया गया है।
इस जमीन पर अब तक जब भी किसी ने आनंद पाया हैअपने से बाहर नहींभीतर पाया है। मैं एक छोटी सी कहानी पढ़ता थाएक बड़ी मीठी कहानी पढ़ता था।
एक सूफी फकीर स्त्री हुई। वह अपने घर के भीतर कपड़े सीती थी। उसकी सुई गिर गई। सांझ थीअंधेरा घना हो गयाघर में प्रकाश न थागरीब थी। वह सुई को खोजती हुई बाहर दहलान में आ गई। वहां थोड़ा-थोड़ा प्रकाश पड़ता था। सूरज आखिरी डूब रहा था। वहां खोजालेकिन तब तक सूरज डूब गया। तो वह बाहर सड़क पर आ गई। वहां अब भी थोड़ी रोशनी थी। करीब के पड़ोसियों ने पूछाक्या गुम गया हैउसने कहामेरी सुई गुम गई है। उन्होंने पूछायह पता चले कि वह कहां गुम गई हैतो हम उसे ढूंढें।
तो उस बूढ़ी स्त्री ने कहायह मत पूछोमेरे दुख को मत छेड़ोमेरे घाव को मत छुओ। यह मत पूछो कहां गुमी है। खोजोमिल जाए तो ठीक। वे लोग बोलेयह बड़ा कठिन हैसुई है छोटीऔर यह पता न हो कि कहां गुमी है तो कहां खोजा जा सकता है?उस स्त्री ने कहाबड़ी तकलीफ है। सुई जहां गुमी हैवहां प्रकाश नहीं हैऔर जहां प्रकाश हैवहां सुई नहीं गुमी है। मेरी सुई भीतर गुमी हैलेकिन वहां प्रकाश नहीं है। यहां प्रकाश हैइसलिए यहां खोजती हूंक्योंकि प्रकाश में खोजा जा सकता है।
मनुष्य के साथ भी वही घटना हैवही दुर्घटना है। हमारी आंखें बाहर खुलती हैं। हमारे हाथ बाहर फैलते हैं। हमारे कान बाहर सुनते हैं। हमारी समस्त इंद्रियों का प्रकाश बाहर पड़ता है। इसलिए हम बाहर खोज रहे हैं। लेकिन कभी यह पूछा कि गुमा कहां हैकिसको खोज रहे हैंउनको अज्ञानी नहीं कहेंगे अगर वे खोज रहे हैं बिना पूछे कि गुमा कहां है!
हम सारे लोग आनंद को खोज रहे हैं बिना यह पूछे कि गुमा कहां है! हम सारे लोग आनंद को खोज रहे हैं! इस जगत में और कोई कुछ भी नहीं खोज रहा है। कोई कुछ भी खोज रहा होमूलतः आनंद को खोज रहा है। लेकिन बिना यह पूछे कि यह आनंद गुमा कहां हैजिसकी तलाश है उसे खोया कहां हैनिश्चित हीअगर उसे खोया न हो तो तलाश नहीं हो सकतीक्योंकि उससे परिचय ही नहीं हो सकता।
मैं आपको कहूंहम आनंद की तलाश कर रहे हैंयह इस बात की सूचना है कि हम आनंद को खोए हैं। क्योंकि जिसको खोया न होउसकी तलाश नहीं हो सकती। जिससे परिचय न होजिसकी कहीं स्मृति न होउसको खोजा नहीं जा सकता। सारे लोग आनंद को खोज रहे हैं बिना इस बात को पूछे कि खोया कहां है! और जब तक हम यह न पूछें कि खोया कहां हैतब तक खोज सार्थक नहीं हो सकती हैमिलना नहीं हो सकता है।
यह पूछ लें कि खोया कहां है। और इसके पहले कि दूसरे के घर में खोजने जाइएबेहतर है अपने घर में खोज लें। इसके पहले कि दूसरे से पूछने जाइएइसके पहले कि इस विस्तृत जमीन पर खोजने निकलिएक्या यह योग्य और उचित नहीं है कि अपने घर में पहले तलाश कर लें! वहां न मिले तो फिर दुनिया में खोजने जाएं।
हम अजीब लोग हैंहम दुनिया में खोजेंगेऔर जब दुनिया में नहीं मिलेगा तो अपने में खोजेंगे! दुनिया बहुत बड़ी है और जीवन बहुत छोटा है। अनंत-अनंत जीवन भी बाहर खोज करदुनिया का अंत नहीं होगा। हमारे अनंत जीवन नष्ट हो जाएंगे। क्या यह बात सीधी सी गणित की नहीं है कि इसके पहले कि मैं इस विराट दुनिया में खोजने जाऊंइस छोटे से अपने घर में खोज लूं! अगर वहां न मिलेतो फिर खोजने निकल जाऊंगा।
महावीर इसी चिंतन से अपने भीतर खोजने गए। नहीं दुनिया में खोजा। सोचा पहले अपने भीतर जान लेंअगर वहां हो तो ठीक,नहीं तो फिर और कहीं चले जाएंगे। और जिन लोगों ने भी इस चिंतन का उपयोग किया और अपने भीतर खोजाउनमें से कोई फिर बाहर खोजने नहीं गया। आज तक ऐसा नहीं हुआकिसी ने भीतर खोजा हो और फिर बाहर खोजने गया हो। ऐसा आज तक हमेशा हुआ कि जिन्होंने बाहर खोजावे एक न एक दिन भीतर खोजने गए। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि जिसने भीतर खोजा होवह फिर बाहर भी खोजने गया हो। मैं फिर से कहूंऐसा हमेशा हुआ है कि जिन्होंने बाहर बहुत खोजाएक दिन उन्हें भीतर खोजने जाना पड़ा। ऐसा आज तक नहीं हुआ कि जिन्होंने भीतर खोजा होवे फिर कभी बाहर खोजने गए हों। निरपवाद रूप से जिन्होंने भीतर झांकाउन्होंने पा लिया।
भीतर कुछ है। भीतर कुछ अदभुत विराजमान है। भीतर कुछ हमारा स्वरूप है। और मैं आपको कहूंसच तो यह हैसच यह है कि कभी अपने जीवन को भी विचार करेंतो सत्य के प्रति अंतर-झलकें मिलनी शुरू हो जाएंगी।
मैं आपसे पूछूंआप दुख चाहते क्यों नहीं हैंआप आनंद क्यों चाहते हैंएक सीधा प्रश्न पूछूंआप दुख क्यों नहीं चाहते हैंइस जमीन पर कोई भी दुख क्यों नहीं चाहता हैमहावीर ने कहा हैकोई भी दुख नहीं चाहता। क्यों नहीं चाहता लेकिनकभी यह पूछाहम भी दुख नहीं चाहतेमैं भी दुख नहीं चाहतालेकिन क्यों दुख नहीं चाहताबड़ी अजीब बात हैहम जीवन भर दुख नहीं चाहतेलेकिन यह नहीं पूछते कि हम क्यों दुख नहीं चाहतेअगर यह पूछें तो एक अदभुत उत्तर आपको ज्ञात होगा।
अगर आप दुख नहीं चाहते हैं तो इसका अर्थ हुआ कि दुख विजातीय हैदुख फारेन है। आपके स्वरूप के विपरीत हैइसलिए नहीं चाहते हैं। यानी स्वरूप कहीं न कहीं आनंद होगाइसलिए दुख को नहीं चाहते हैं। अन्यथा दुख को "न-चाहपैदा नहीं होती। दुख को न चाहने का अर्थ है भीतर कहीं आपका स्वरूप आनंद हैइसलिए दुख को नहीं चाहते हैं। सच तो यह हैअगर आपका स्वरूप दुख होतातो दुख का आपको पता भी नहीं चल सकता था। अगर मेरा स्वरूप दुख होता तो मुझे दुख का पता नहीं चल सकता था। बल्कि जब दुख आतातो मैं तो और प्रेम से उसे ग्रहण कर लेता। वह तो मेरे स्वरूप को और समृद्ध करता। लेकिन कोई दुख को ग्रहण नहीं करता है। यह इस बात की सूचना है कि दुख स्वरूप को समृद्ध नहीं करता हैदुख स्वरूप को बढ़ाता नहीं हैदुख स्वरूप के विपरीत हैअनुकूल नहीं है।
अगर दुख स्वरूप के विपरीत हैतो स्वरूप आनंद होगा। हम आनंद को चाहते हैंक्योंकि हमारा स्वरूप आनंद है। हममें से कोई मृत्यु को नहीं चाहताक्योंकि हमारा स्वरूप अमृत है। हममें से कोई अंधेरे को नहीं चाहताक्योंकि हमारा स्वरूप प्रकाश है। हममें से कोई भय को नहीं चाहताक्योंकि हमारा स्वरूप अभय है। हममें से कोई दीनऱ्हीन नहीं होना चाहताक्योंकि हमारा स्वरूप प्रभु है। अगर इस बात को समझें तो जो-जो हम नहीं चाहते हैंवह हमारे स्वरूप की ओर संकेत हैवह हमारे स्वरूप की ओर इशारा है। जो-जो हम नहीं चाहतेउससे भिन्न हमारा स्वरूप होगा। यह चिंतन जिसमें जन्म पाएजिसका अंतस्तल इस मंथनइस आंदोलन से ग्रसित हो जाएयह पीड़ा और व्यथा पकड़ लेयह सोच-विचार पकड़ लेयह एक-एक जीवन के सत्य को पकड़ कर चिंतना शुरू हो जाएमैं दुख क्यों नहीं चाहता! यह चिंतन हो जाएमैं आनंद को खोज रहा हूंलेकिन मैंने आनंद को खोया कहां है!
यह चिंतन शुरू हो जाएतो व्यक्ति के जीवन में इस सारे चिंतन के परिणाम से एक अदभुत प्यास पैदा होनी शुरू हो जाएगी। उसकी जो वृत्ति बिना पूछे बाहर खोजती थीपूछने की वजह से छिटक जाएगीबाहर खोजने में रुकावट आ जाएगी और आंतरिक की तरफभीतर की तरफ झुकाव प्रारंभ हो जाएगा। चिंतनइस सत्य का चिंतन कि जो जीवन हमें मिला हैवह क्या हैजिस जीवन की हमारी जो अनुभूतियां हैंवे क्यों हैंहम क्यों खोज रहे हैं आनंद कोक्या खोज रहे हैंकहां खोज रहे हैं?
ये प्रश्न अगर जीवंत होकरअगर ये प्रज्वलित होकर आपके सामने खड़े हो जाएं तो आपमें पहली दफा धर्म के प्रति जिज्ञासा शुरू होगी।
धर्म की जिज्ञासा का संबंधपरमात्मा है या नहींइससे नहीं है। धर्म की जिज्ञासा का संबंधजगत को किसने बनाया या नहीं बनायाइससे भी नहीं है। धर्म की जिज्ञासा का संबंधआत्मा एक है या अनेकइससे भी नहीं है। धर्म की मूल जिज्ञासा का संबंध इस सत्य से है कि जो दुख हैउसे मैं क्यों नहीं चाहता हूंमैं दुख से सहमत क्यों नहीं हूंऔर मेरी प्यास आनंद के लिए क्यों हैये बाकी जो बातें हैंग्रंथ में होंगीकिताब में होंगीजिंदगी से इनका कोई संबंध नहीं है। धर्म की जिज्ञासा जीवन के विश्लेषण और निरीक्षण से शुरू होती है।
महावीर के जीवन-दर्शन और साधना में सबसे महत्वपूर्ण जो मुझे बात प्रतीत होती हैवह यह है कि महावीर का चिंतन ग्रंथों से शुरू नहीं हो रहाजीवन से शुरू हो रहा है। हमारा चिंतन ग्रंथों से शुरू होता हैजीवन से शुरू नहीं होता।
इस सत्य को बहुत विचार कर लेना जरूरी है।
मेरे पास लोग आते हैं। मुझ से कोई ईसाई आता है तो वह पूछता हैक्या वह मरियमजिनसे ईसा का जन्म हुआकुंआरी थीमैं उससे पूछता हूंइससे क्या फर्क पड़ेगा जानने सेयद्यपि ईसाई के सिवाय यह प्रश्न मुझसे कोई दूसरा नहीं पूछता है। कोई जैन नहीं पूछता। जैन मुझसे पूछते हैंनिगोद क्या हैकोई ईसाई नहीं पूछेगा यहक्योंकि उसको निगोद का पता ही नहीं है। एक मुसलमान मुझसे पूछता हैकुरान उतरी मोहम्मद के ऊपरतो वह किताब की किताब उतरी या किस तरह उतरीयह कोई दूसरा हिंदू या बौद्ध नहीं पूछता! क्यों?
ये प्रश्न जिंदगी के नहींकिताबों के हैं। जो जिंदगी का प्रश्न हैवह हिंदू कामुसलमान काईसाई काजैन का एक ही होगा। क्योंकि जिंदगी तो एक ही प्रश्न उठाती हैकिताबें अलग-अलग प्रश्न उठाती हैं। और जो किताबों से प्रश्न पूछेंगेवे पंडित भले हो जाएंप्रज्ञा को उपलब्ध नहीं होंगे। वे बहुत सी बातेंइनफर्मेशन इकट्ठी कर लेंकिताबें लिख डालेंभाषण करेंदूसरों को समझाने के योग्य अपने में दंभ पैदा कर लेंतो उससे कोई हल नहीं होगा। जो प्रश्न किताबों से उठते हैंवे मुर्दा हैं। जो प्रश्न जिंदगी से उठते हैंवे जीवित हैं। और जो प्रश्न जिंदगी से उठते हैंवे ही जिंदगी को बदलने में समर्थ हो पाते हैंग्रंथों से उठे हुए प्रश्न जिंदगी को नहीं बदलते हैं।
महावीर के लिए प्रश्न जिंदगी से उठे। और जिंदगी से उठेयह पहली बात। और दूसरी बातउन्होंने किसी के उत्तर स्वीकार नहीं किएखुद उत्तर पाने की चेष्टा शुरू की। पहली बात प्रश्न जिंदगी से उठेऔर दूसरी बात अपने ही जीवन में तलाश शुरू कीकहीं किसी से जाकर शिक्षा लेने का उपाय नहीं किया। जो प्रश्न किताब से उठेंगेउनके उत्तर किताबों में मिल जाएंगे। जो प्रश्न जिंदगी से उठेंगेउनके उत्तर साधना में मिलेंगे। यह समझ लेना जरूरी है।
महावीर को जिंदगी से प्रश्न उठे। दुखअमुक्तिबंधनएकमात्र प्रश्न है जो महावीर के चित्त में है। एकमात्र प्रश्न है कि दुख क्यों हैदुख का बंधन क्यों हैऔर जब यह प्रश्न हैतो एक ही साधना है कि क्या दुख के बाहर हुआ जा सकता हैक्या दुख के बंधन के ऊपर उठा जा सकता हैइसका कोई किताब उत्तर नहीं दे सकती। कोई रेडीमेडकिसी के उत्तर काम के नहीं हो सकते। इसे तो अनुभूति से जानना होगा।
जीवन से प्रश्न उठेमहावीर साधना में गए। किस साधना में गए?
लोग देखते हैंउन्होंने घर-बार छोड़ दियाराज्य-संपत्ति छोड़ दी। तो लोग सोचते हैंयही साधना थी। यह साधना नहीं है। जो बाहर दिखता हैउससे साधना का कोई संबंध नहीं है। साधना तो आंतरिक है। मकान बाहर से छोड़ कर निकल जाना आसान है। सवाल मकान से निकल जाने का नहीं हैसवाल मेरी खोपड़ी से मकान निकल जाए उसका है।
एक साधु के बाबत मैं पढ़ता था। एक बादशाह उसे इतना प्रेम करने लगा कि अपने महल में उस साधु को रख लिया। इतना प्रेम करने लगा कि बाद में एक महल उसके लिए बना दिया। वर्ष पर वर्ष बीते। बारह वर्ष बीते। एक दिन उस बादशाह को हुआ,अब इस साधु में और मुझमें अंतर क्या हैयह तो फिजूल में ही साधु कहलाता है। हम भी बादशाह हैं और यह भी अब बादशाह की तरह रहता है। हमारी तो कुछ मुसीबतें हैंइसकी वे मुसीबतें भी नहीं हैं। यह तो मजे सेमौज से रहता है।
उसने सुबह बगीचे में टहलते हुए उस साधु को कहा कि मित्रएक प्रश्न रात्रि से मेरे मन में है। मैं पूछना चाहता हूंमुझमें और आपमें अब अंतर क्या हैवह फकीर सुन कर हंसने लगा और बोलासच में जानना चाहते होतो थोड़े दूर मेरे साथ गांव के बाहर चलो। जरा एकांत आ जाएगा तो उत्तर दूंगा। बादशाह बोलाठीक है। वे दोनों गांव के बाहर निकलेनदी जो सीमा थीपार हो गई। बादशाह ने कहाअब उत्तर तो दो। उसने कहाथोड़ा आगे चलो। धूप तेज होने लगी। बादशाह ने कहाउत्तर दे दो। अब तो एकांत जंगल भी आ गयाअब तो कोई सुनने वाला भी नहीं है। वह फकीर बोलासुनो! उस फकीर ने कहाअब मेरा लौटने का मन नहीं हैमैं जाता हूं। बादशाह बोलाकहां जाते हैंतो वह फकीर बोलाअब मैं जाता हूं। तुम भी मेरे साथ चलते होबादशाह बोलाकैसी आप बात करते हैं! मेरा महल पीछे है। मुझे वहां लौटना है। और वह फकीर बोला, मेरा कोई महल पीछे नहीं हैमेरा कोई लौटना नहीं है। हम वहां महल में थेमहल हममें नहीं था। फर्क अगर दिखे तो दिख सकता है।
महावीर ने महल छोड़ायह मूल्यवान नहीं है। महावीर के भीतर से महल छूट गयायह सवाल है। महावीर ने धन छोड़ायह मूल्यवान नहीं है। महावीर के भीतर से धन छूट गयायह मूल्यवान है। महावीर जो छोड़ कर गएवह मूल्यवान नहीं है। जो उनके भीतर से विसर्जित हो गयावह मूल्यवान है।
संसार बाहर नहीं है। संसार बिलकुल बाहर नहीं है। संसार बड़ी मानसिक घटना हैबड़ी मेंटल चीज है। ये जो दीवालें और मकान और रास्ते दिखाई पड़ रहे हैंये संसार नहीं हैंक्योंकि महावीर मुक्त होकर भी इन्हीं दीवालों और सड़कों पर से निकलेंगे। ये संसार नहीं हैंक्योंकि जब महावीर ज्ञान को उपलब्ध हो जाएंगेतब भी रास्तों पर से निकलेंगेतब भी संसार में होंगेलेकिन आप उनको फिर सांसारिक नहीं कहते हैं! संसार में होंगेलेकिन सांसारिक क्यों नहीं कहतेये संसार नहीं हैं। संसार कुछ और है।
संसार मानसिक हैसंसार भौतिक नहीं है। वह जो हमारे भीतर एक संसार बन गया हैवह जो मैंने अपनी चेतना के इर्द-गिर्द एक दुनिया चित्रों की और विचारों की आबाद कर ली है। वह जो इमेजेज और कल्पनाएं और स्वप्न वहां इकट्ठे हो गए हैंवह मेरा संसार है।
संसार मेरे स्वप्नों का हैवस्तुओं का नहीं है।
इसलिए जो वस्तुओं को छोड़ने में लगा हैनासमझ है। जो स्वप्नों को छोड़ने में लगा हैसमझदार है। वस्तुएं नहीं बांधती हैंवस्तुओं के प्रति देखे गए स्वप्न बांधते हैं। वस्तुएं नहीं बांधती हैंवस्तुओं के प्रति की गई कामनाएं बांधती हैं। वस्तुएं नहीं बांधती हैंवस्तुओं के प्रति जगाई गई आसक्ति बांधती है। वह सब मानसिक है।
क्रांति संसार को छोड़ने की नहींक्रांति मन को परिवर्तित करने की है।
अन्यथा घर-द्वार छोड़ कर भाग जाएंपाएंगे कि घर-द्वार पीछे चले आ रहे हैं। स्त्री को छोड़ कर पुरुष भाग जाएपुरुष को छोड़ कर स्त्री भाग जाएतो लौट कर पाएंगे कि जिनको छोड़ कर आए हैंवे साथ ही चले आए हैं। वे पीछे छूटे नहीं हैं। वे जरूर छूट गए होंगे--जो भौतिक पुरुष थावह छूट गया होगा। लेकिन वह जो कल्पना का पुरुष और स्त्री हैसाथ चली आई है। पीड़ावह जो शरीर है स्त्री या पुरुष कावह थोड़े ही दे रहा है। पीड़ा तो वह जो कल्पनावह स्वप्न जो है भीतरवह दे रहा है। बांध तो उसका हैबंधन तो उसका हैपकड़ तो उसकी है। वह जो भीतर विराजमान हैपकड़ उसकी है। उसे विसर्जित करना संसार को विसर्जित करना है। उससे मुक्त हो जाना संन्यस्त हो जाना है।
मैं एक स्मरण करता हूंएक कथा कोरिया में घटी। वह चित्र महावीर को समझाएगा। वह एक अंतर्दृष्टि देगा और एक बहुत सड़ी-गली जो धारणा महावीर की साधना के पीछे बन गई है परंपरा मेंउससे मुक्त होने में सहयोगी होगा।
एक युवक भिक्षु और एक वृद्ध भिक्षु एक नदी के किनारे से निकलते थेनदी पार करते थे। एक युवती भी नदी पार करने को ठहरी थी। लेकिन पहाड़ी नाला और तेज धार और उसका साहस नहीं था कि नदी को पार करे। उस वृद्ध भिक्षु ने सोचाहाथ का सहारा दे दूं और नदी पार करा दूं।
लेकिन जैसे ही खयाल आयाहाथ का सहारा दे दूंभीतर की सोई हुई स्त्री के प्रति जो वासना और कामना हैवह जग गई। हाथ के स्पर्श की कल्पना से भीतर के सोए बहुत से स्वप्न सजग हो गए। बहुत सा दमितबहुत सा सप्रेस्ड जो था स्त्री के प्रतिवह सब फिर से साकार होकर उठ आया। वह घबड़ाया बहुत। वर्षों से स्त्री के प्रति विचार नहीं उठा था। अपने को झिड़का कि मैंने भी कहां की नासमझी की बात सोची! मुझे प्रयोजनलोग नदी पार होंगेहोते रहेंगेमुझे क्या करना हैमैं क्यों अपना जीवन इसको नदी पार कराने के कारण बिगाडूं?
वह आंख झुका कर नदी पार करने लगा। उसने उस लड़की को सहारा नहीं दिया। लड़की को सहारा इसलिए नहीं दियाइसलिए नहीं कि लड़की कोई सहारा देने में दिक्कत देती। सहारा इसलिए नहीं दिया कि सहारे की कल्पना ने हीभीतर जो स्त्री का रूप थाउसे सजग कर दिया। वह आंख झुका ली उसने।
लेकिन आंख झुकाने से कोई रूप समाप्त होते हैंआंख झुकाने से तो वे और रम्यऔर सुंदर हो जाते हैं। आंख बंद कर लेने से कोई रूप नष्ट होते हैंआंख बंद कर लेने से तो वे और स्वर्णिमऔर स्वर्गीय हो जाते हैं। वह आंख बंद करके घबड़ायाऔर भगवान का स्मरण करता हुआ नदी पार होने लगा।
पीछे उसका एक युवक भिक्षु भी आता था। नदी पार करके उसे खयाल हुआकहीं वह पागल लड़कावह भी इसी सेवा और सहायता की भूल में न पड़ जाए। तो उसने लौट कर देखावह लड़का उसको कंधे पर बिठा कर नदी पार कर रहा है! उसको तो सारे बदन में आग लग गई। वह तो कल्पना भी नहीं कर सका कि मैं वृद्ध हुआ हूंऔर यह तो युवा है और युवती को कंधे पर बिठा कर पार कर रहा है! उसे कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे और क्या न करे। गुस्से में बहुत देर तक बोला नहीं। जब दोनों आश्रम में प्रवेश करते थेसीढ़ियों पर रुक कर उसने उस युवक से कहा कि सुनोजाकर गुरु को कहूंगाऔर उसका तुम्हें प्रायश्चित्त और दंड भोगना पड़ेगा। वह लड़का बोलाकौन सी भूल हुईउसने कहाउस लड़की को तुमने कंधे पर क्यों उठायाउस युवक ने कहामैं उसे नदी के किनारे ही कंधे से उतार दिया थाआप तो उसे अभी भी लिए हुए हैं!
यह जो आदमी उसे कंधे पर लिए हुए हैयह किस कंधे पर लिए हुए हैऔर क्या हम अपने संसार को कंधे पर नहीं लिए हुए हैंक्या संसार कहीं बाहर हैक्या उन मकानों में और उन बच्चों में और उन वृत्तियों में संसार है जो बाहर हैंया कि संसार को हम कहीं किसी काल्पनिक कंधे पर लिए हुए हैं?
संसार को छोड़ कर नहीं भागनासंसार को कंधे से उतारना है।
तो महावीर जो छोड़े बाहरवह मूल्यवान नहीं है। जो भीतर छोड़ाजो कंधे से उतारावह मूल्यवान है। वह कैसे कंधे से उतारावही उनकी साधनावही बारह वर्ष की तपश्चर्या में वे कर रहे हैं। मैं सुनता हूं उनकी तपश्चर्या के बाबत प्रवचनग्रंथ देखता हूंतो मुझे बड़ी हैरानी होती है। उस तपश्चर्या में लोग वर्णन करते हैंउन्होंने कितने धूपत्ताप सहेउन्होंने कितने दिन भूखे रहेउन्होंने किस-किस तरह वस्त्र त्याग कर नग्न रहे। उनको किस-किस तरह की पीड़ा और परेशानी आई! किस-किस तरह लोगों ने सताया और वे कुछ नहीं बोलेइसका लोग वर्णन करते हैं! इसका साधना से कोई संबंध नहीं है। यह नहीं है असली बात।
असली बात यह नहीं कि महावीर के बाहर क्या नाटक घटित हो रहा हैअसली बात यह है कि महावीर के भीतर क्या हो रहा है। इन बारह वर्षों में--महावीर धूप में खड़े हैं या सर्दी मेंयह तो शरीर खड़ा है। यह सवाल नहीं हैसवाल यह है कि महावीर का चित्त कहां है! महावीर जब धूप में खड़े हैं या भूखे खड़े हैं या उपवासे खड़े हैंयह सवाल नहीं है--महावीर का चित्त कहां है! अगर महावीर उपवासे खड़े हैं और चित्त भोजन में होतो सब उपवास तो व्यर्थ हो जाएगा। अगर महावीर धूप में खड़े हैं और चित्त छाया में कहीं होतो धूप में खड़ा होना तो व्यर्थ हो जाएगा। महावीर कहां खड़े हैंयह सवाल नहीं है--महावीर का चित्त कहां है! महावीर क्या कर रहे हैंयह सवाल नहीं है--महावीर का चित्त क्या कर रहा है!
हमारा चित्त कुछ न कुछ कर रहा हैकुछ न कुछ कर रहा है! महावीर की साधना इस बात की है कि चित्त ऐसी स्थिति में पहुंचेजहां वह कुछ भी नहीं कर रहा है। क्योंकि चित्त कुछ भी करेगासब करना संसार को खड़ा करना होगा। क्योंकि चित्त कुछ भी करेगातो सिवाय चित्रों के बनाने के और कुछ भी नहीं कर सकता है। चित्त का एक ही काम है। चित्त जो हैचित्रकार है। मेरी समझ जो हैचित्त चित्रकार है। उसका एक ही काम है कि वह चित्र बना सकता है। और कोई काम नहीं कर सकता। और उन्हीं चित्रों के संसार में उलझा सकता है और कोई काम नहीं कर सकता। चित्र और स्वप्न खड़ा करनास्वप्न को सृजन करनाचित्त का काम है। तो चित्त जब तक काम करेगातब तक वह स्वप्न और चित्र खड़े करेगा और उनमें उलझ जाएगा। संसार को बनाएगा।
संसार को भगवान नहीं बनातासंसार को चित्त बनाता है।
स्मरण रखेंसंसार को भगवान नहीं बनातासंसार को चित्त बनाता है।
तो चित्त जब तक सक्रिय हैतब तक संसार है। चित्त निष्क्रिय हो गयासंसार के आप बाहर हो गए। चित्त सक्रिय है तो बंधन हैचित्त निष्क्रिय हो गया तो मोक्ष में हो गए।
तो महावीर चित्त को ऐसी स्थिति में ले जा रहे हैंजहां उसकी सक्रियता क्षीण से क्षीण होकर विलीन हो जाएजहां सक्रियता शिथिल होतेऱ्होतेहोतेऱ्होते शून्य हो जाए।
साधना है चित्त को शिथिल करने की और सिद्धि है चित्त के शून्य हो जाने की। ध्यान है चित्त को शिथिल करनानिष्क्रिय करना। और समाधि है चित्त का निष्क्रिय और शून्य हो जाना। महावीर की साधना चित्त को शिथिल करने की और उपलब्धि चित्त को शून्य करने की है।
चित्त सक्रिय हैतो मैंने कहासंसार बनता है। और उसी संसारउन्हीं प्रतिबिंबों में हम खोए-खोए उसे भूल जाते हैंजो हम हैं। वह जो भीतर हैउसका विस्मरण हो जाता है।
सचआप कभी चित्र देखते होंकभी फिल्म देखते होंकभी नाटक देखते होंएक अदभुत बात अनुभव होगी: फिल्म देखते-देखते आप इतने तल्लीन हो जाएंगे कि आपको यह पता नहीं रहेगा कि आप भी हैं! जब पर्दा वहां खाली होगातब अचानक आपको चौंक कर पता पड़ेगादो घंटे बीत गएहम भी थेइसका पता न रहा! एक चित्र मेंएक कथा में हम भी एक पात्र हो गए थे! क्या कई दफा अनुभव नहीं हुआ कि उन पात्रों के साथ आप रोने लगे हैं और उन पात्रों के साथ आप हंसने लगे हैंक्या पर्दा जब खाली हो गया और लोग उठने लगे तो आपने अनेक बार अपने आंसू नहीं छिपा लिए हैं कि पड़ोस का आदमी न देख ले कि चित्र देख कर रोते थेलेकिन चित्र को देख कर आप रोते थेबड़ी हैरानी की बात है! चित्र इतने प्रभावी हैं कि उनसे आप रोते हैं और हंसते हैंऔर जानते हैं भलीभांति कि वहां पर्दे के सिवाय कुछ भी नहीं है! भलीभांति जानते हैंखुद ही पैसे दिए हैं,भलीभांति पता है कि वहां सफेद पर्दे के सिवाय कुछ भी नहीं है। और पीछे से केवल विद्युत की किरणें फेंक कर चित्रों का भ्रम हो रहा हैचित्र भी वहां नहीं हैं। लेकिन फिर भी रोते हैं और हंस लेते हैं! चित्र का बड़ा प्रभाव है।
चित्र का प्रभाव ही अज्ञान है। चित्र के प्रभाव से मुक्त होना ज्ञान है।
वह रोज-रोज आप फिल्म देखने न जाते होंलेकिन चौबीस घंटे मन के पर्दे पर फिल्में चल रही हैं। आप अपने ही बनाए हुए सिनेमा-गृह में रोज-रोज बैठे हुए हैं--चौबीस घंटे! मजा यह है कि वहां आप ही तो पात्र हैंआप ही देखने वालेआप ही नाटक खड़ा करने वालेआप ही प्रोजेक्टरआप ही पर्दावहां आपके सिवाय कोई भी नहीं है! इसलिए महावीर ने कहाआत्मा ही बंधन हैआत्मा ही मोक्ष है। वह सारा बंधन आपका ही बनाया हुआ है। आपकी ही कल्पना-प्रसूतआपकी ही इमेजिनेशन का खेल है। वह आप सारा बनाए हुए हैं।
महावीर उस पूरी साधना में उन चित्रों को पोंछ कर पर्दे को सफेद करने में लगे हैं कि ऐसी घड़ी आ जाए कि पर्दा सफेद हो जाए। पर्दे के सफेद होते ही एकदम याद आएगाअरे! मैं भी हूं। और मैं चित्रों में भूल गया था। एक दफा चित्त शून्य हो जाएआत्म-ज्ञान शुरू हो जाएगा। वहां चित्त शून्य हुआयहां आत्म-ज्ञान का उदभावनजागरण शुरू हुआ।
महावीर की साधना चित्त को शून्य करकेचित्रों से मुक्त होकरउसको जानने की हैजिसका नाम चैतन्य है। जो चित्रों को जानेगावह चैतन्य को नहीं जानेगा। जो चित्रों को विलीन कर देगावह चैतन्य का अनुभव करता है। उसका ज्ञाता बनता है। उस ज्ञान का उसे बोध होता है। इस बोध काइस आत्म-दर्शन का महावीर की संपूर्ण साधना में केंद्रीय स्थल है।
लोग समझते हैंमहावीर की साधना अहिंसा की है। नहीं! लोग समझते हैंमहावीर की साधना ब्रह्मचर्य की है। नहीं! लोग समझते हैंमहावीर की साधना सत्य की है। नहीं! महावीर की साधना आत्मा की है। और आत्म-अनुभव के परिणाम में सत्यब्रह्मचर्यअहिंसा उपलब्ध होते हैं। यह आत्म-अनुभूति के फूल हैं। जो आत्म को जानता हैवह असत्य से उसी क्षण मुक्त हो जाता है। जो आत्म को जानता हैअब्रह्मचर्य से मुक्त हो जाता है। जो आत्म को जानता हैवह हिंसा से मुक्त हो जाता है। आत्म-ज्ञान का परिणामउसके कांसीक्वेंसेस अहिंसासत्य और ब्रह्मचर्य में फलित होते हैं। लोग सोचते हैंअहिंसाब्रह्मचर्य और सत्य साधन हैंजिनसे आत्मा उपलब्ध होगी! मैं विपरीत सोचता हूं। वे साधन नहीं हैंसाधन तो चित्त-विसर्जन है। साधन तो ध्यान हैसाधन तो समाधि हैसाधन तो योग है। साधन वे नहीं हैंवे तो साधना के परिणाम हैं। वे तो जब आत्म-अनुभव होगा,तो उस अनुभूति के फूल हैं। उनसे पहचाना जाएगा कि ज्ञान उपलब्ध हुआ या नहीं। उनसे ज्ञान पाया नहीं जाता है।
महावीर ने कहा हैअहिंसा ज्ञान का फल है। इस वाक्य को कोई विचार नहीं करता! महावीर कहतेअहिंसा ज्ञान का फल है। अगर ज्ञान का फल है तो ज्ञान पहले होगा कि अहिंसा पहले होगीआगम कहतेपढमं नाणं तओ दया। पहले ज्ञान हैफिर दयाफिर अहिंसा है। महावीर कहते हैंजो ज्ञान को उपलब्ध होवह आचरण को उपलब्ध है। जो ज्ञान को नहीं उपलब्ध हैउसका सब आचरण मिथ्या है। ये स्पष्ट सूत्र हैं। जो अगर थोड़े विचार किए जाएं तो यह दिखाई पड़ेगा कि महावीर की साधना नैतिक साधना नहीं हैआत्मिक साधना है। अहिंसा कोसत्य कोब्रह्मचर्य को साधना नीति है।
आज दुनिया में जो भ्रम पैदा हुआ हैवह यही भ्रम पैदा हुआ है कि नीति को साधोतो धर्म मिल जाएगा। मैं ऐसा नहीं मानता। मैं मानता हूंधर्म को साधो तो नीति मिल जाएगी। जो नीति को साधेगावह धर्म को तो नहीं पा सकता। वह नीति को साध कर केवल एक अहंकार को भर उपलब्ध हो सकता है। मैं सत्यवादी हूंमैं ब्रह्मचारी हूंमैं त्यागी हूंमैं साधु हूंमैं मुनि हूंऐसे किसी दंभ को भला उपलब्ध हो जाएलेकिन उस परम शांति को उपलब्ध नहीं होगा जहां दंभ का कोई निशान भी नहीं पाया जाता है।
नैतिक साधना अहंकार को परिपुष्ट करती हैआत्मिक साधना अहंकार को विसर्जित करती है। इसीलिए नैतिक लोगों में एक छिपे हुए अहंकार का बोध आपको निरंतर होगा। उस तरह के साधु में एक प्रसुप्त दंभ का बोध आपको निरंतर होगा। उस तरह के साधु में एक छिपे हुए क्रोध का आपको निरंतर बोध होगा। उन ऋषियों को हम जानते हैंजो क्रोध से लोगों को अभिशाप दे दें। वह क्रोध उनमें कहां से हैक्योंकि जो अभिशाप दे सकता हैउसमें अत्यंत प्रज्वलित क्रोध होना चाहिए। वह क्रोध उनमें इसीलिए है कि उनकी साधना आत्मिक नहींकेवल नैतिक है। नैतिक साधना के परिणाम में धर्म नहीं आतायद्यपि धार्मिक साधना के परिणाम में नीति अवश्य आ जाती है।
नैतिक साधना पुण्य की साधना है। धर्म की साधना पुण्य की साधना नहीं हैशुद्धि की साधना है। शुद्धि--पुण्य और पाप से पृथक है। न तो पुण्य पकड़ता हैन पाप जहां पकड़ता हैजहां पुण्य और पाप दोनों पृथक और मैं अनुभव करता हूं कि मैं दोनों से मुक्त और शुद्ध हूंउस अनुभूति में धर्म का जन्म होता है।
धर्म की साधना शुद्धि की साधना है। नीति की साधना पुण्य की साधना है। नीति की साधना केवल नैतिकता तक ले जा सकती है। धर्म की साधना मुक्ति तक ले जाती है। नैतिक धार्मिक नहीं हो पातालेकिन धार्मिक तो अनजानेअनायास नैतिक हो जाता है।
महावीर कोई नैतिक पुरुष नहीं हैं। बड़े से बड़े लोगों को मैं देखता हूंवे लिखते हैं कि महावीर बड़े नैतिक पुरुष हैं! महावीर नैतिक पुरुष नहीं हैंमहावीर आत्मज्ञ हैं। महावीर आत्मा को उपलब्ध पुरुष हैं। नीति तो उसका परिणाम है सहजअपने आप आ जाती हैउसे लाना नहीं पड़ता।
अगर हम महावीर के इस केंद्रीय विचार को समझें--आत्म-उपलब्धि को--इस पर थोड़ा चिंतन करेंइस पर थोड़ा मनन करें और इस बात को समझें कि चित्त हमारा संसार है। और चित्त को धीरे-धीरे विसर्जित करेंचित्त को धीरे-धीरे विलीन करेंचित्त को धीरे-धीरे शून्य की तरफ ले चलें। एक घड़ी आएगीचित्त शून्य हो सकता है।
अगर उसके साथ असहयोग करें--जैसा मैंने सुबह कहानॉन-कोआपरेशन--अगर चित्त के विचारों के साथ नॉन-कोआपरेशन करेंउसके साथ सहयोग न करें। विचार आते होंआने देंआप सहयोग न दें। अपने को दूर खड़ा कर लेंजैसे आप केवल तटस्थ द्रष्टा मात्र हैं। विचार को चलने देंआप चुपचाप देखते रहेंकोई सहयोग न दें। आपका सहयोग ही विचार की शक्ति है।
वह जो फिल्म पर चित्र चलते हैंउन्हें देख कर जो आप रोते हैंचित्र आपको नहीं रुला रहे हैं। आप ही चित्रों से जो अपने को संयुक्त कर रहे हैंउससे रुदन आ रहा है। अगर आप होश में भरे हों और जानें कि पर्दे पर केवल चित्र हैंआपका तादात्म्य उनसे न होआप तटस्थ द्रष्टा मात्र होंभोक्ता न हो जाएंआप उस नाटक के हिस्से न हो जाएंकेवल साक्षी मात्र होंकेवल विटनेस मात्र होंतो आप हैरान होंगेचित्र चले जाएंगे पर्दे पर आकरआप वैसे के वैसे बैठे हैं जैसे बैठे थे। आप में कोई रागकोई द्वेष उदय नहीं हुआ। आपको कोई रुदन और हास्य नहीं पकड़ा। आप मौनतटस्थद्रष्टा मात्र हैं। जो इस भांति विचार को देखेगाअसहयोग सेतटस्थ द्रष्टा मात्र होकरवह क्रमशः विचार-मुक्ति को उपलब्ध होता है। जो विचार-मुक्ति को उपलब्ध होता हैवह आत्म-दर्शन कर सकता है।
महावीर एक ही शब्द हैंएक ही शब्द में उनकी समस्त साधना हैऔर वह शब्द है--आत्म-दर्शन। उस एक शब्द को जो उपलब्ध हो जाएवह उसको अनुभव कर पाएगाकिस महत्वपूर्णकिस वैज्ञानिक सत्य को उन्होंने हमें दिया है। और हम इतना कर रहे हैं कि उनकी रख कर पूजा कर रहे हैं! और उनके ग्रंथों को रख कर सिर पर चल रहे हैं! और उनके शास्त्र-वचनों को दीवालों पर लिख रहे हैं! आश्चर्यजनक है कि हम अपने सदपुरुषों के साथ कैसा अन्याय करते हैं! हम सोचते हैंहम उनका सम्मान कर रहे हैं! हमारा सब सम्मान उनका अपमान है। क्योंकि मूलतः वे जो कह रहे हैंहम सब उसके विपरीत कर रहे हैं।
महावीर का सम्मान एक ही बात में है कि आत्म-ज्ञानी बनो। महावीर का स्मरण नहीं। मत करो स्मरणउससे कोई संबंध नहीं है। अगर आत्म-ज्ञानी बनते होतो स्मरण करो या न करोतुम महावीर के हो गए। और तुम महावीर का लाख स्मरण करो और आत्म-ज्ञानी नहीं बनतेतो तुम महावीर के नहीं हो। जिसको महावीर का होना हैउसे महावीर की फिकर छोड़ देनी चाहिए और उसकी फिकर करनी चाहिएजो भीतर बैठा है। और जिसने उसकी फिकर छोड़ीवह महावीर को कितना ही लिए फिरेवह महावीर का नहीं हो सकता है। इस एक सत्य को हम स्मरण रखें।
जगत में जो लोग भी जाग्रत हुए हैंजिन्होंने अपने को जाना हैउनकी शिक्षा एक छोटी सी बात में हैऔर वह यही है: आनंद भीतर हैभीतर लौटें। भीतर लौटने का उपाय: चित्त को विसर्जित करेंचित्त के प्रति तटस्थ द्रष्टा बनेंदर्शक बनें।
चित्त लीनविलीन होगा--आप अपने को जानेंगेअपना साक्षात करेंगे। और कैसे आनंद की ज्योति वहां अनुभव होगीकैसे प्रकाश से वहां भर जाएंगेकैसी घनीभूत शांति में वहां उतर जाएंगेउसे शब्द में कहने का कोई उपाय नहीं है।
महावीर ने कहा हैउस अनुभूति को कहने के पूर्व शब्द निवृत हो जाते हैं। महावीर ने कहा हैउसे कहने को कोई शब्द नहीं हैं। जिसे निःशब्द में पाया जाता होउसे कहने के शक्य कोई शब्द नहीं होते। जिसे चित्त को खोकर पाया जाता होउसे कहने का चित्त के द्वारा कोई मार्ग नहीं होता है। मैं उस संबंध में कुछ नहीं कहूंआज तक कभी किसी ने कोई कुछ कहा नहीं है। लेकिन उस तरफ इशारे किए गए हैंउस तरफ इंगित किए गए हैं। और महावीर इस जमीन परइतिहास में जो बड़े से बड़े इशारे किए गए हैंउनमें से एक इशारे हैं। उनकी अंगुली उठी है उस सत्य की तरफ। लेकिन हम नासमझ होंगे अगर उस अंगुली की पूजा करने लगें और उस तरफ न देखें जहां के लिए अंगुली उठी है। लोग महावीर की पूजा कर रहे हैं! महावीर केवल एक इशारे हैं उस आत्म-सत्ता की ओरजो सबके भीतर विराजमान है।
वहां जापान में एक मंदिर हैउसकी बात कह कर अपनी चर्चा को पूरा करूंगा।
वहां जापान में एक मंदिर हैउसमें बुद्ध की प्रतिमा नहीं है। उस मंदिर में केवल अंदर एक अंगुली बनी हुई है बुद्ध कीऊपर एक चांद बना हुआ है। लोग जाकर हैरान होते हैं और लोग जाकर पूछते हैंयह क्या हैनीचे बुद्ध का एक वचन खुदा हुआ है। बुद्ध ने कहा हैमैंने अंगुली दिखाई है चांद की तरफलेकिन मैं जानता हूं कि तुम नासमझ होचांद को न देखोगे और मेरी अंगुली की पूजा करोगे।
महावीरबुद्धक्राइस्ट और कृष्ण इशारे हैं। उनकी पूजा नहीं करनीउस तरफ देखना हैजिस तरफ वे इशारे हैं। और उस तरफ कोई और नहींआप हो। उस तरफ कोई और नहींमैं हूं। वह इशारा किसी और की तरफ नहींहमारी अंतरात्मा की ओर है।
अगर महावीर जयंती के इस पवित्र स्मरण दिवस पर एक बात आपके विचार में पैदा हो जाए कि भीतर की तरफ देखना हैतो सारा जीवन सार्थक हो सकता है। उसके पूर्व न कोई सार्थकता हैन कोई आनंद हैन कोई शांति हैन कोई जीवन है। उसके पाने के बाद सारा जीवन अमृत मेंसच्चिदानंद में परिणत हो जाता है।
मेरी बातों को इतनी प्रीति से सुना हैउसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं और सबके भीतर बैठे हुए परमात्मा को प्रणाम करता हूंऔर आशा करता हूं कि आज नहीं कलवह जो प्रसुप्त हैजागेगा और हम आनंद केपरम जीवन के अनुभव को उपलब्ध हो सकेंगे। पुनः-पुनः आपका आभार।

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