मंगलवार, 26 जून 2018

सेवा प्रेम का सहज प्रस्फुटन है!

जैसा आप चाहते हो कि दूसरे हों, वैसा अपने को बनावें। उनको बदलने के लिए स्वयं को बदलना आवश्यक है। अपनी बदल से ही आप उनकी बदलाहट का प्रारंभ कर सकते हैं।
जो स्वयं जाग्रत है, वही केवल अन्य का सहायक हो सकता है। जो स्वयं निद्रित है, वह दूसरों को कैसे जगाएगा? और, जिसके भीतर स्वयं ही अंधकार का आवास है, वह दूसरों के लिए प्रकाश का स्रोत कैसे हो सकता है? निश्चय ही दूसरों की सेवा स्वयं के सृजन से ही प्रारंभ हो सकती है। पर-हित स्व-हित के पूर्व असंभव है। कोई मुझसे पूछता था, ''मैं सेवा करना चाहता हूं।'' मैंने उससे कहा, ''पहले साधना तब सेवा। क्योंकि, जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे तुम किसी को कैसे दोगे? साधना से पाओ, तभी सेवा से बांटना हो सकता है।'' सेवा की इच्छा बहुतों में है, पर स्व-साधना और आत्म-सृजन की नहीं। यह तो वैसा ही है कि जैसे कोई बीज तो न बोना चाहे, लेकिन फसल काटना चाहे! ऐसे कुछ भी नहीं हो सकता है। किसी अत्यंत दुर्बल और दरिद्र व्यक्ति ने बुद्ध से कहा, ''प्रभु, मैं मानवता की सहायता के लिए क्या करूं?'' वह दुर्बल शरीर से नहीं, आत्मा से था और दरिद्र धन से नहीं, जीवन से था। बुद्ध ने एक क्षण प्रगाढ़ करुणा से उसे देखा। उनकी आंखें दया‌र्द्र हो आई। वे बोले- केवल एक छोटा-सा वचन, पर कितनी करुणा और कितना अर्थ उसमें था! उन्होंने कहा, ''क्या कर सकोगे तुम?'' 'क्या कर सकोगे तुम?' इसे हम अपने मन में दुहरावें। वह हमसे ही कहा गया है। सब करना स्वयं पर और स्वयं से ही प्रारंभ होता है। स्वयं के पूर्व जो दूसरों के लिए कुछ करना चाहता है, वह भूल में है। स्वयं को जो निर्मित कर लेता है, स्वयं जो स्वस्थ हो जाता है, उसका वैसा होना ही सेवा है।
सेवा की नहीं जाती। वह तो प्रेम से सहज ही निकलती है। और, प्रेम? प्रेम आनंद का स्फुरण है। अंतस में जो आनंद है, आचरण में वही प्रेम बन जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

सोमवार, 11 जून 2018

जीवन और आदर्श

आदर्श-विहीन जीवन कैसा है? उस नाव की भांति जिसमें मल्लाह न हो या कि हो तो सोया हो। और यह स्मरण रहे कि जीवन के सागर पर तूफान सदा ही बने रहते हैं। आदर्श न हो तो जीवन की नौका को डूबने के सिवाय और कोई विकल्प ही नहीं रह जाता है।
श्वाइत्जर ने कहा है, ''आदर्शो की ताकत मापी नहीं जा सकती। पानी की बूंद में हमें कुछ भी ताकत दिखाई नहीं देती। लेकिन उसे किसी चट्टान की दरार में जम कर बर्फ बन जाने दीजिए, तो वह चट्टान को फोड़ देगी। इस जरा से परिवर्तन से बूंद को कुछ हो जाता है और उसमें प्रसुप्त शक्ति सक्रिय और परिणामकारी हो उठती है। ठीक यही बात आदर्शो की है। जब तक वे विचार रूप बने रहते हैं, उनकी शक्ति परिणामकारी नहीं होती। लेकिन जब वे किसी के व्यक्तित्व और आचरण में ठोस रूप लेते हैं, तब उनसे विराट शक्ति और महत परिणाम उत्पन्न होते हैं।''
आदर्श-अंधकार से सूर्य की ओर उठने की आकांक्षा है। जो उस आकांक्षा से पीडि़त नहीं होता है, वह अंधकार में पड़ा रह जाता है। लेकिन आदर्श आकांक्षा मात्र ही नहीं हैं। वह संकल्प भी है। क्योंकि, जिन आकांक्षाओं के पीछे संकल्प का बल नहीं, उनका होना या न होना बराबर ही है। और, आदर्श संकल्प मात्र भी नहीं है, वरन उसके लिए सतत श्रम भी है। क्योंकि , सतत श्रम के अभाव में कोई बीज कभी वृक्ष नहीं बनता है।
मैंने सुना है, ''जिस आदर्श में व्यवहार का प्रयत्न न हो, वह फिजूल है और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो वह भयंकर है।''
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शुक्रवार, 8 जून 2018

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-12

मेरे प्रिय आत्मन्!

एक छोटी सी घटना से मैं आज की चर्चा शुरू करना चाहूंगा। एक काल्पनिक घटना ही मालूम होती है, एक सपने जैसी झूठी, एक किसी कवि ने सपना देखा हो ऐसा ही।
लेकिन जिंदगी भी बहुत सपना है और जिंदगी भी बहुत कल्पना है और जिंदगी भी बहुत झूठ है।
एक बहुत बड़ा मूर्तिकार था। उसकी मूर्तियों की इतनी प्रशंसा थी सारी पृथ्वी पर कि लोग कहते थे कि वह जिस व्यक्ति की मूर्ति बनाता है, अगर उस व्यक्ति को मूर्ति के पास ही श्वास बंद करके खड़ा कर दिया जाए, तो पहचानना मुश्किल है कि कौन मूल है कौन मूर्ति है, कौन असली है कौन नकल है।

उस मूर्तिकार की मृत्यु निकट आई। वह मूर्तिकार बहुत चिंतित हो उठा। मौत करीब थी वह बहुत भयभीत हो उठा। लेकिन फिर उसे खयाल आया, क्यों न मैं अपनी ही मूर्तियां बना कर मौत को धोखा दे दूं। उसने अपनी ही बारह मूर्तियां बनाईं।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-11

मेरे प्रिय आत्मन्!

बीती चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न हैं।

एक मित्र रोज ही पूछ रहे हैं कि व्यवहार के संबंध में कुछ बोलिए। शायद उन्हें प्रतीत होता होगा कि जो मैं बोल रहा हूं वह व्यवहार के संबंध में नहीं है। व्यवहार से लोग न मालूम किस बात को सोचते और समझते हैं। शायद वे सोचते हैं: किस भांति के कपड़े पहने जाएं, किस भांति का खाना खाया जाए, कब सोया जाए, कब उठा जाए, सच बोला जाए या झूठ बोला जाए, ईमानदारी की जाए या बेईमानी की जाए। आचरण की और सारी बातों को वे व्यवहार समझते होंगे। इसलिए मैं रोज बोल रहा हूं लेकिन उनका प्रश्न रोज लौट आता है। वे द्वार पर ही मुझे मिल जाते हैं कि वह व्यवहार के संबंध में आपने अब तक कुछ भी नहीं कहा। तो आज पहले उनके संबंध में ही बात कर लेनी उचित होगी।

व्यवहार का कोई भी मूल्य नहीं है, आचरण का दो कौड़ी भी मूल्य नहीं है। मूल्य है आत्मा का, मूल्य है चेतना का, मूल्य है विचार का, मूल्य है विवेक का, आचरण तो भीतर जैसी चेतना होती है उसकी सुगंध है, उसकी लक्षणा है, सूचना है, उससे ज्यादा नहीं है।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-10

प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपने आज की बात शुरू करना चाहूंगा।
एक नया मंदिर निर्मित हो रहा था, सैकड़ों मजदूर उसे बनाने में लगे थे। नये पत्थर तोड़े जा रहे थे, नई मूर्तियां बनाई जा रही थीं। एक कवि भी भूला-भटका हुआ उस मंदिर के पास से गुजर गया। उसने एक पत्थर तोड़ते मजदूर से पूछा कि मेरे मित्र, क्या कर रहे हो? उस मजदूर ने क्रोध से भरी हुई आंखें ऊपर उठाई, तो उसकी आंखों में जैसे आग जलती हो और उतने ही क्रोध से उसने कहा, क्या तुम अंधे हो? तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता कि मैं क्या कर रहा हूं? मैं पत्थर तोड़ रहा हूं। और वापस उसने पत्थर तोड़ना शुरू कर दिया। वह जैसे पत्थर न तोड़ता हो पूरे जीवन से बदला ले रहा हो, वह जैसे पत्थर न तोड़ता हो किसी प्रतिशोध में हो।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-09

बीते दो दिनों की चर्चाओं के संबंध में मित्रों ने बहुत से प्रश्न पूछे हैं। उनमें से कुछ पर अभी विचार हो सकेगा।
किसी ने पूछा है: कल मैंने कहा कि आश्चर्य, विस्मय और रहस्य की भावना जितनी तीव्र और गहरी होगी मनुष्य के जीवन में ईश्वर का संपर्क उतना ही ज्यादा हो सकता है। उन्होंने पूछा है, विस्मय का यह भाव कैसे गहरा हो? कैसे तीव्र हो? आश्चर्य की यह दृष्टि कैसे मिले? हम कैसे जीवन को रहस्य की भांति देख सकें?

दो तीन बातें इस संबंध में समझ लेनी उपयोगी होंगी। 
पहली बात, जीवन तो रहस्य है। यह मत पूछिए कि हम जीवन के रहस्य को कैसे देख सकें? यह पूछिए कि हमने जीवन के रहस्य को कैसे देखना बंद कर दिया है।

एक आदमी आंख बंद किए हुए खड़ा है और पूछता है मैं प्रकाश को कैसे देख सकूं? पूछना चाहिए यह कि मैंने प्रकाश को देखना किस भांति बंद कर दिया है। प्रकाश तो है, आंख भी है। प्रकाश को कहीं से लाना नहीं है, आंख को भी कहीं से लाना नहीं है, लेकिन हम आंख बंद किए खड़े हैं। हम आंख बंद किए हुए हैं। हम कैसे आंख बंद किए हुए हैं, हमने किस भांति आंख बंद कर ली है। अगर हम यह समझ लें, तो आंख कैसे खुल सकती है, इसे समझने में कोई कठिनाई नहीं रह जाएगी।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-08

मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्य-जाति के, मनुष्य-चेतना के भंडार से कौन सा रत्न खो गया है, अगर मैं यह अपने से पूछता हूं तो मुझे ऐसा नहीं मालूम होता कि नीति खो गई हो, धर्म खो गया हो, दर्शन या फिलासफी खो गई हो। न तो मनुष्य के जीवन से नीति खो गई है, आचरण खो गया है, न धर्म खो गया है, न दर्शन खो गया है। क्योंकि आज से हजारों वर्ष पहले मनुष्य के चित्त की जैसी अनैतिक दशा थी, ठीक वैसी ही दशा आज भी है। लोग सोचते हैं कि शायद पहले के लोग बहुत नैतिक और बहुत आचारवान थे, तो एकदम सौ प्रतिशत गलत सोचते होंगे। अगर बुद्ध और महावीर के समय के लोग नीतिवान और आचारवान रहे हों, तो बुद्ध और महावीर की शिक्षाओं की कोई भी जरूरत नहीं हो सकती थी।

बुद्ध लोगों को समझा रहे हैं कि चोरी मत करो, झूठ मत बोलो, बेईमानी मत करो। ये बातें किन लोगों को समझाई जा रही हैं? महावीर लोगों को समझा रहे हैं कि हिंसा मत करो, दूसरों को दुख मत दो, दूसरों को सताओ मत, ये बातें किन लोगों को समझाई जा रही हैं?

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-07

मेरे प्रिय आत्मन्!
कल संध्या, सत्य की खोज में साधक के मन की पात्रता कैसी चाहिए, उस संबंध में थोड़ी सी बातें मैंने कही हैं। उन बातों पर कुछ प्रश्न पूछे गए हैं, उनकी हम चर्चा करेंगे।
एक मित्र ने पूछा है कि अतीत को छोड़ देने पर, परंपरा को छोड़ देने के लिए, मेरा इतना आग्रह क्यों है?

एक आदमी हाथ में कंकड़-पत्थर लिए हुए चल रहा हो, उसके हाथ कंकड़-पत्थरों से भरे हों और हमें पता हो कि उसी रास्ते पर तो हीरे-जवाहरात भी मिल सकते हैं और उस आदमी से हम कहें कि तुम अपने हाथ खाली कर लो, कंकड़-पत्थर छोड़ दो।
वह आदमी पूछने लगे कि आप मेरे हाथों के कंकड़-पत्थर छुड़ाने के लिए इतना आग्रह क्यों करते हैं? कंकड़-पत्थरों से मुझे कोई भी आग्रह नहीं है। लेकिन कंकड़-पत्थर से जो हाथ भरे हैं, वे हीरे-जवाहरातों से नहीं भर सकते हैं। हीरे-जवाहरातों से भर जाएं, इसके लिए मेरा आग्रह जरूर है, लेकिन उसके लिए खाली हाथ चाहिए।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-06

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक सुबह, अभी सूरज निकला ही था; एक बड़ी राजधानी में उस देश के सम्राट का, नगर के बाहर से आगमन हो रहा था। वह अपने घोड़े पर सवार था। रास्ते में उसने देखा--एक गरीब बूढ़ा मजदूर पत्थर की एक बड़ी चट्टान अपने कंधे पर उठाए हुए जा रहा है। सुबह की ठंडी हवाओं में भी उसके माथे से पसीने की बूंदें टपक रही हैं। वह इतना बूढ़ा और कमजोर है कि उसके हाथ कंप रहे हैं, उसके पैर कंप रहे हैं। पत्थर बहुत वजनी है। उस सम्राट ने चिल्ला कर कहा, मजदूर, पत्थर को नीचे गिरा दो! वह पत्थर नीचे गिरा दिया गया।

उस सम्राट का नाम महमूद था और वह राजधानी गजनी थी। फिर सम्राट अपने महल में चला गया। वह पत्थर वहीं पड़ा रहा, रास्ते पर चलने वालों को बहुत कठिनाई हो गई। वाहन निकलने मुश्किल हो गए। वह बीच रास्ते पर बड़ा पत्थर पड़ा रहा।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-05

जीवन क्या है?

मेरे प्रिय आत्मन्!
जीसस से कोई पूछ रहा था कि आपका जन्म कब हुआ? तो जीसस ने जो उत्तर दिया वह बहुत हैरानी का है। यहूदियों का एक बहुत पुराना पैगंबर हुआ है इब्राहिम, जीसस से कोई दो हजार साल पहले। इब्राहिम यहूदियों के इतिहास में पुराने से पुराना नाम है। जीसस ने कहा कि इब्राहिम था, उसके भी पहले मैं था। विश्वास नहीं हुआ होगा सुनने वाले को। क्योंकि विश्वास हमें केवल उसी बात का होता है, जिसका हमें अनुभव हो। बात पहेली ही मालूम पड़ी होगी, क्योंकि इब्राहिम के पहले जीसस के होने की कोई संभावना नहीं मालूम होती। शरीर तो हो ही नहीं सकता, लेकिन जीसस जैसा आदमी व्यर्थ ही झूठ बोले यह भी संभव नहीं है।

लाओत्से से किसी ने एक दिन पूछा कि तुम्हारा जन्म कब हुआ? तुम्हारे जन्म की तिथि कौन सी है? तो लाओत्से ने कहा, जहां तक मैं जानता हूं, मेरा जन्म कभी नहीं हुआ और मेरे जन्म के संबंध में अगर दूसरे कहें, तो उनका भरोसा मत करना, क्योंकि अपने जन्म के संबंध में जितना मैं जानता हूं, उतना कोई दूसरा नहीं जान सकता।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-04

मेरे प्रिय आत्मन्!
बीती चर्चाओं में जो बहुत सी बातें मैंने आपसे कहीं, उनके संबंध में अनेक प्रश्न आए हैं। कुछ थोड़े से प्रश्नों पर आज की अंतिम रात हम और बात कर सकेंगे।

एक प्रश्न जो बहुत से मित्रों ने पूछा है, बहुत-बहुत रूपों में पूछा है, उसे मैं सबसे पहले ले लूं: उन्होंने पूछा है कि मैं शब्दों, सिद्धांतों और शास्त्रों के विरोध में मालूम पड़ता हूं। क्या परमात्मा की खोज में सिद्धांत और शास्त्र सहयोगी नहीं हैं? क्या वे हमारे और प्रभु के बीच में बाधा बनते हैं?

प्रभु और मनुष्य के बीच में ही नहीं, जीवन के सभी अनुभवों के बीच में शास्त्र और शब्द बाधा बनते हैं। जीवन के किसी भी अनुभव के बीच में, जो हमने सीख रखा है, वह बाधा बनता है। एक फूल के पास आप खड़े हैं। उस फूल के संबंध में आप जो भी जानते हैं--वह किस जाति का फूल है,
छोटा है या बड़ा, सुंदर है या असुंदर, पहले देखे गए फूलों जैसा है या नहीं--ये जितनी बातें आप जानते हैं, उस फूल के संबंध में, ये आपके और फूल के बीच में खड़ी हो जाती हैं। वह जो फूल सामने है, वह ओझल हो जाता है। फूल के संबंध में जो आप पीछे से जानते हैं, वह आंख के आगे आ जाता है। उस जानकारी के कारण फूल का सीधा साक्षात, सीधा एनकाउंटर नहीं हो पाता। उससे सीधी मुलाकात नहीं हो पाती, सीधा मिलन नहीं हो पाता।
मैंने कल आपके संबंध में जो समझ लिया था, अगर आज आप मुझे मिलें और कल का स्मरण बीच में आ जाए, तो मैं आपको नहीं देख सकूंगा, जो आप आज हैं। वह कल की ही बात मेरे सामने खड़ी हो जाएगी।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-03

जिज्ञासा और खोज

बहुत से प्रश्न मेरे सामने आए हैं। सबसे पहले, सुबह मैंने कहा, जो हम नहीं जानते हैं, भलीभांति जानना चाहिए कि हम नहीं जानते हैं। इस संबंध में पूछा है कि हम अपने बच्चों को न बताएं कि ईश्वर है? क्या धर्म के संबंध में उन्हें कुछ भी न कहें? आत्मा के लिए कोई उन्हें विश्वास न दें? ऐसे कुछ प्रश्न पूछे हैं।

जिसे हम नहीं जानते हैं, उसे हम देना भी चाहेंगे, तो क्या दे सकेंगे? और जो हमें ही ज्ञात नहीं है, क्या उस बात की शिक्षा, हमारे संबंध में बच्चे के मन में आदर पैदा करेगी? क्या यह असत्य की शुरुआत न होगी? और क्या असत्य पर भी ईश्वर का ज्ञान कभी खड़ा हो सकता है?
और क्या असत्य के ऊपर हम सोच सकते हैं कि बच्चा कभी धार्मिक हो जाएगा? यह दुनिया अधार्मिक इसी तरह हो गई है। यह दुनिया धार्मिक हो सकती थी। लेकिन जिन लोगों ने स्वयं बिना जाने शिक्षाएं दी हैं, उन्होंने इस दुनिया को अधर्म के अंधकार में भेज दिया है।

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-02

अहंकार है दूरी

मेरे प्रिय आत्मन्!
कल रात्रि, प्रभु उपलब्धि सरल है, इस संबंध में थोड़ी सी बातें मैंने आपसे कहीं। मनुष्य को परमात्मा से रोक लेने वाली धारणाओं में पहली धारणा यही रही है कि परमात्मा को पाना कठिन है, बहुत कठिन है। मनुष्य के चित्त पर यह दीवाल की भांति खड़ी हो गई--यह धारणा। इस धारणा ने ही जीवन की सरिता को प्रभु के सागर की ओर बहने से रोक लिया। लेकिन यह अकेली ही धारणा नहीं। इस भांति की दीवाल बन जाने में और धारणाएं भी हैं। आज दूसरी धारणा पर आपसे मैं बात करूंगा।
दूसरी बात, दूसरा सूत्र, दूसरी कठिनाई, प्रभु दूर है, इस धारणा से पैदा हुई है। परमात्मा बहुत दूर है--किसी पहाड़ पर, आकाश में, आकाश के पार, मृत्यु के बाद; कोई निराकार, कोई अरूप, कोई अनंत दूरी है हमारे और उसके बीच! 
मनुष्य की सामर्थ्य बहुत छोटी और प्रभु की दूरी अनंत! कैसे इसे पार किया जा सकेगा? हमारे पैर बहुत छोटे। एक कदम से ज्यादा हम एक बार में चल ही नहीं सकते। एक कदम पार कर पाते हैं, इतनी हमारी सामर्थ्य है--और अनंत है दूरी। यह दूरी कैसे पूरी होगी? कैसे पार होगी?

माटी कहै कुम्हार सूं - प्रवचन-01

परमात्मा सरल है
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक आश्चर्यजनक दुर्भाग्य मनुष्य-जाति के ऊपर रोज-रोज अपनी काली छाया बढ़ाता गया है। अब तो शायद हमें उस दुर्भाग्य का कोई पता भी नहीं चलता है। जैसे कोई जन्म से ही बीमार पैदा हो तो उसे स्वास्थ्य का कभी कोई पता नहीं चलता। जैसे कोई जन्म से ही अंधा पैदा हो, तो जगत में कहीं प्रकाश भी है, इसका उसे कोई पता नहीं चलता। ऐसे ही हम एक अदभुत अनुभव से जन्म के साथ ही जैसे वंचित हो गए हैं। धीरे-धीरे मनुष्य-जाति को यह खयाल भी भूलता गया है कि वैसा कोई अनुभव है भी। उस अनुभव को इंगित करने वाले सब शब्द झूठे और थोथे मालूम पड़ने लगे हैं।

ईश्वर से ज्यादा आज कोई शब्द थोथा और व्यर्थ है? धर्म से ज्यादा थोथा और व्यर्थ आज कोई शब्द है? मंदिरों से ज्यादा अनावश्यक, प्रार्थनाओं से ज्यादा व्यर्थ आज कोई और भाव दशा है? मनुष्य के जीवन से सारा संबंध जैसे परमात्मा का समाप्त हो गया!

मंगलवार, 5 जून 2018

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-10

सत्संग का संगीत

पहला प्रश्न :
संत कबीर पर बोलते हुए आपने भक्ति को बहुत-बहुत महिमा दी। लेकिन कबीर की भक्ति तो जगह-जगह प्रार्थना करती मालूम होती है। यथा--"आपै ही बहि जाएंगे जो नहिं पकरौ बांहि।" और आपने प्रार्थना को भी ध्यान बना दिया है। आपकी भक्ति-साधना में प्रार्थना का क्या स्थान होगा?


ध्यान और प्रार्थना मार्ग की दृष्टि से तो बड़े भिन्न-भिन्न हैं; विपरीत भी। मंजिल की दृष्टि से एक हैं। प्रस्थान के बिंदु पर तो बड़ा भेद है, लेकिन पहुंचने की जगह बिलकुल एक है।
ध्यान की यात्रा शुरू होती है विचार को निर्विचार करने से। उसका केंद्र मस्तिष्क है, मन है।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-09

सुरति करौ मेरे सांइयां

सुरति करौ मेरे सांइयां, हम हैं भवजल मांहि।
आपे ही बहि जाएंगे, जे नहिं पकरौ बाहिं।।
अवगुण मेरे बापजी, बकस गरीब निवाज।
जे मैं पूत कपूत हों, तउ पिता को लाज।।
मन परतीत न प्रेम रस, ना कछु तन में ढंग।
ना जानौ उस पीव सो, क्यों कर रहसी रंग।।
मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कछु है सो तोर।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर।। 

अहंकार है सारी पीड़ाओं का स्रोत, नरक का द्वार। लेकिन तुमने समझ रखा है, कि वही स्वर्ग की कुंजी है। और अहंकार को सिर पर लेकर तुम लाख उपाय करो, सुख की कोई संभावना नहीं है, न शांति का कोई उफाय है, न स्वर्ग का द्वार खुल सकता है। अहंकार के लिए द्वार बंद है, द्वार के कारण नहीं, अहंकार के कारण ही बंद है।

और अहंकार बिलकुल अंधा है। उसे दिखाई भी नहीं पड़ता। और उस अंधेपन में जिसे मिटाना है, उसे तुम बचाते हो। जिसे छोड़ना है, उसे तुम पकड़ते हो। जिसे फेंकना है, उसे तुम सम्हालते हो।
हीरे-मोती तो फेंक देते हो, कूड़ा-करकट बचा लेते हो। जो असार है, उसे तो सम्हाल कर रखते हो, जो सार है उसकी खबर भूल जाती है।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-08

गंगा एक घाट अनेक

पहला प्रश्न - इक्कीस मार्च को आपका पूना में इस जगह आगमन हुआ, तब यहां कुछ तोते थे; लेकिन एक साल में न जाने यहां कितने प्रकार के पक्षी आ गए हैं और हर रोज अपनी सुरीली आवाज में गाए चले जा रहे हैं। प्रश्न उठते हैं कि क्या ये आपके कारण आ गये हैं? क्या यहां आने से इनकी भी कोई आध्यात्मिक तरक्की संभव है? आपकी कौन-सी अभिव्यक्ति इन्हें सुहावनी लगती है--मौन या मुखर? क्या हमारी तरह आपने गत जन्म में उन्हें भी वायदा किया था जो अब पूरा हो रहा है?

जीवन एक गहन प्रयोजन है। और वह प्रयोजन मनुष्य तक ही सीमित नहीं है, सीमित हो भी नहीं सकता। या तो प्रयोजन है तो पूरे अस्तित्व में है, या प्रयोजन कहीं भी नहीं है।
मनुष्य अलग-थलग नहीं है; मनुष्य एक है। अगर पत्थर व्यर्थ ही हैं तो मनुष्य भी व्यर्थ है और अगर मनुष्य के जीवन में कोई सार्थकता है, तो पत्थरों के जीवन में भी सार्थकता होनी ही चाहिए।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-07

उनमनि चढ़ा गगन-रस पीवै

अवधू मेरा मन मतिवारा।
उनमनि चढ़ा गगन-रस पीवै, त्रिभुवन भया उजियारा।। 
गुड़ करि ग्यान ध्यान करि महुआ, व भाठी करि भारा। 
सुखमन नारी सहज समानी, पीवै पीवन हारा।। 
दोउ पुड़ जोड़ि चिंगाई भाठी, चुया महारस भारी। 
काम क्रोध दोइ किया बलीता, छूटि गई संसारी।। 
सुंनि मंडल में मंदला बाजै, तहि मेरा मन नाचै। 
गुरु प्रसादि अमृत फल पाया, सहजि सुषमना काछै।।
पूरा मिल्या तबै सुख उपज्यौ, तन की तपनि बुझानी। 
कहै कबीर भव-बंधन छूटै, जोतिहिं जोति समानी।।

उपनिषदों में एक वचन है : "उत्तिष्ठ, जाग्रत, प्राप्यवरान्निबोधत।" उठो, जागो और जो मिला ही हुआ है, उसे पा लो।
--जो मिला ही हुआ है। जिसे तुम खोजते हो, उसे अगर तुमने खो दिया होता तो उसे पाने का कोई उपाय न था। इस विराट अस्तित्व में खोए को खोज लेने का कोई उपाय नहीं।
तुम खुद इतने छोटे हो, और तुमने अगर अपना आनंद खो दिया, आत्मा खो दी तो तुम इस विराट अस्तित्व में उसे कहां खोजोगे? असंभव। तुम अपने को खोज ही न पाओगे, अगर खो चुके हो। फिर खोजेगा कौन? अगर तुम खो ही चुके हो, तो खोजने वाला भी तो बचेगा नहीं।
इसलिए उपनिषद कहते हैं, उसे पा लो, जो पाया ही हुआ है। तुम सिर्फ भूल गए हो। विस्मरण से ज्यादा और कोई बड़ी दुर्घटना नहीं घट गई है। खोया नहीं है, स्मृति खो गई है। है मौजूद, सो गए हो। नींद लग गई है। आंख झपक गई है।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-06

सुरति का दीया

पहला प्रश्न - सुना है, कभी-कभी ज्ञानी साथ-साथ रोता है और हंसता है। वह क्या देखकर रोता है और क्या देखकर हंसता है?

कभी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी सरलता से उपलब्ध है। रोता है यह देखकर, कि करोड़ों-करोड़ों लोग व्यर्थ ही निर्धन बने हैं।

हंसता है यह देखकर कि सम्राट होना बिलकुल सुगम था और रोता है यह देखकर कि फिर क्यों अरबों लोग भिखारी बने हैं?
जिसे तुम पाकर ही पैदा हुए हो, जिसे तुमने कभी खोया नहीं, जिसे तुम चाहो तो भी खो न सकोगे, जिसे खोने का उपाय ही नहीं है, उसे तुमने खो दिया है यह देखकर रोता है।
यह देखकर हंसता है, कि जो मुझे मिल गया है, उससे मिलाने के लिए कुछ भी करने की कभी कोई जरूरत न थी। कहीं जाने की, किसी यात्रा की कोई जरूरत न थी। यह देखकर हंसता है कि सभी मेरे भीतर था और मैं कैसे चूकता रहा!
और अचानक एक क्षण में आती है आंधी और सब कूड़ा-करकट उड़ जाता है। और भीतर परमात्मा विराजमान है। तुम उसके मंदिर हो।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-05

आई ज्ञान की आंधी

संतों भाई आई ज्ञान की आंधी रे।
भ्रम की टाटी सबै उड़ानी, माया रहै न बांधी।।
हिति-चत की द्वै थूनी गिरानी, मोह बलींदा तूटा।
त्रिस्ना छानि परी घर ऊपरि, कुबुधि का भांडा फूटा।।
जोग जुगति करि संतौ बांधी निरचू चुवै न पानी।
कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जानी।।
आंधी पीछे जो जल बूढ़ा, प्रेम हरी जन भीना।
कहै कबीर भान के प्रकटे उदित भया तम खीना।।

और ज्ञान में बड़ा फर्क है। एक तो ज्ञान है पंडित का और एक ज्ञान है प्रज्ञावान का। इन दोनों का भेद साफ न हो जाए तो अज्ञान के पार उठना कठिन है।और भेद बारीक है। भेद बहुत सूक्ष्म और नाजुक है। दोनों एक जैसे दिखाई पड़ते हैं। जुड़वां भाई जैसे मालूम होते हैं, लेकिन दोनों न केवल भिन्न हैं, बल्कि विपरीत भी हैं। दोनों का गुणधर्म शत्रुता का है।अज्ञान से भी ज्यादा दूरी प्रज्ञावान के ज्ञान की, पंडित के ज्ञान से है।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-04

गुरु-शिष्य दो किनारे

पहला प्रश्न - सबके इतने सारे प्रश्न पाकर क्या आप धर्म-संकट में नहीं पड़ते कि इसका जवाब दूं, या उसका, या किसका?प्रश्न तीन तरह के पूछे जाते हैं।एक तो, तुम्हारी मूढ़ता से जन्मते हैं।
उनका मैं कभी उत्तर नहीं देता। क्योंकि तुम्हारी मूढ़ता को उतना सहारा देना भी नुकसान, तुम्हें हानि पहुंचाएगा। तुम्हारी मूढ़ता को उतनी स्वीकृति भी देना--कि मूढ़ता से उठे प्रश्न का भी कोई अर्थ होता है, घातक है।मूढ़ता से उठे प्रश्न इस भांति पूछे जाते हैं कि जैसे पूछने वाला मुझ पर कोई पूछ कर एहसान कर रहा हो। 
उसका स्वर साफ होता है। मूढ़ता से भरे प्रश्न असंबंधित होते हैं। न कबीर से कोई नाता, न मुझ से कोई नाता, न तुमसे कोई नाता।जैसे आज ही एक प्रश्न है, कि यदि कम्यूनिज्म आ जाए, तो आपके संन्यासी तो काम कर लेंगे; आपका क्या होगा?अब इसका न तो कबीर से कुछ लेना-देना है, न तुमसे कुछ लेना-देना है, न मुझसे कुछ लेना-देना है। "यदि" भी कोई प्रश्न होता है? "यदि" से कहीं कोई प्रश्न शुरू होता है?फिर मेरी सारी शिक्षा यही है, कि "अभी और यहां" जीयो। कल क्या होगा? कल तुम रहोगे, कल मैं रहूंगा। कल जो होगा, उसे हम सामना करेंगे।फिर कम्यूनिज्म कल आ जाए, इससे तुम्हारा क्या संबंध है? और मैं किसी मुसीबत में भी पड़ूंगा, तो वह तुम्हारी समस्या नहीं है। तुम्हारे पास अपनी समस्याएं काफी हैं, तुम उन्हें हल कर लो। या कि तुम्हारी समस्याएं चुक गईं, अब तुम मेरी समस्याएं हल करने की कोशिश में लगे हो?तुम ऐसे ही परेशान हो। मूढ़ता का अर्थ ही यह है, कि उसे पता ही नहीं है, कि उसके जीवन की समस्याएं हैं, जो हल करनी हैं, कि जीवन उलझन में है, उसे सुलझाना है; कि जीवन अटका है, यात्रा करनी है। वह जमाने भर के प्रश्न पूछेगा, जिनमें कोई तुक नहीं है, जिनमें कोई अर्थ नहीं।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-03

पिया मिलन की आस

आंखरिया झांई पड़ी, पंथ निहार निहार।
जीभड़िया छाला पड़ा, राम पुकारि पुकारि।।
इस तन का दीवा करौं, बाती मैल्यूं जीव। .
लोही सीचौं तेल ज्यूं, कब मुख देख्यौं पीव।।
सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।
नैन तो झरि लाइया, रहंट बहै निसुवार।
पपिहा ज्यों पिउ फिउ रटै, पिया मिलन की आस।।
कबीरा वैद बुलाइया, पकरि के देखो बांहि।
वैद न वेदन जानई, करक कलेजे मांहि।।

प्रभु की खोज बड़ी अनूठी है। क्योंकि जिसे हम खोजते हैं उसका कोई पता नहीं, कोई ठिकाना नहीं। वह है भी, यह भी पक्का नहीं। कोई मंजिल है, तब तो मार्ग पर चलना आसान हो जाता है। लेकिन मंजिल दिखाई भी नहीं पड़ती, होगी इसका भी संदेह बना रहता है,

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-02

गुरु मृत्यु है


पहला प्रश्नः आप जब किन्हीं सूत्रों पर बोलते हैं, तो उससे भी ज्यादा अच्छा लगता है, जब आप हमारे प्रश्नों के उत्तर देते हैं। ऐसा क्यों?

स्वाभाविक है। अर्जुन का प्रश्न हो, कृष्ण का उत्तर हो, तुम्हारा उससे क्या लेना-देना? बड़ा फासला है। जिज्ञासा हो सकती है, आत्मीयता नहीं हो सकती। वह प्रश्नोत्तर शास्त्रीय हो गया, जीवंत न रहा। जब तुम पूछते हो, तो तुम्हारे प्रश्न में तुम्हारा हृदय धड़कता है। तुम उसमें मौजूद होते हो। वह तुम्हारी जरूरत है। तुम्हारी भूख, तुम्हारी प्यास उसमें छिपी है।
स्वभावतः तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तुम्हें एक तृप्ति देता है। वैसी ही तृप्ति अर्जुन को भी हुई होगी कृष्ण के उत्तर से। तुम्हारा प्रश्न होता और कृष्ण उत्तर देते तो अर्जुन की भी तृप्ति न होती।
अपना प्रश्न खोज लेना बहुत जरूरी है।
मुझे कोई भेद नहीं पड़ता। क्योंकि मैं देखता हूं कि अर्जुन का जो प्रश्न है, वह कभी न कभी तुम्हारा भी बन जाएगा। इसीलिए सूत्रों पर भी बोलता हूं, अन्यथा बोलूं ही नहीं। आज तुम्हें भी पता न हो, कि कल तुम्हारा प्रश्न क्या बन जाने वाला है। लेकिन शास्त्रों का निर्माण ही इसलिए किया गया है। वे बड़ी गहन खोज-बीन से निर्मित हुए हैं। वह खोज-बीन यह है, कि जो व्यक्ति भी मार्ग पर चला है सत्य को खोजने, आज नहीं कल अर्जुन के प्रश्न उसके मन में उठेंगे ही।

मेरा मुझमें कुछ नहीं-कबीर - प्रवचन-01

करो सत्संग गुरुदेव से

गुरुदेव बिन जीव की कल्पना ना मिटै।
गुरुदेव बिन जीव की भला नाहिं।।
गुरुदेव बिन जीव का तिमिर नासै नहिं।
समझि विचार लै मन माहि।।
रहा बारीक गुरुदेव तें पाइये।
जनम अनेक की अटक खोलै।।
कहै कबीर गुरुदेव पूरन मिलै।
जीव और सीव तब एक तोलै।।
करो सतसंग गुरुदेव से चरन गहि।
जासु के दरस तें भर्म भागै।।
सील औ सांच संतोष आवै दया।
काल की चोट फिर नाहिं लागै।।
काल के जाल में सकल जीव बांधिया।
बिन ज्ञान गुरुदेव घट अंधियारा।।
कहै कबीर बिन जन जनम आवै नहीं।
पारस परस पद होय न्यारा।।

अंधेरा नया नहीं, अति प्राचीन है। और ऐसा भी नहीं है कि प्रकाश तुमने खोजा न हो। वह खोज भी उतनी ही पुरानी है, जितना अंधेरा। क्योंकि यह असंभव ही है कि कोई अंधेरे में हो और प्रकाश की आकांक्षा न जगे। जैसे कोई भूखा हो और भोजन की आकांक्षा पैदा न हो। नहीं, यह संभव नहीं है।

शुक्रवार, 1 जून 2018

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-11

प्रिय चिदात्मन्,
मैं आपकी आंखों में झांकता हूं। एक पीड़ाएक घना दुखएक गहरा संतापएंग्विश वहां मुझे दिखाई देते हैं। जीवन के प्रकाश और उत्फुल्लता को नहींवहां मैं जीवन-विरोधी अंधेरे और निराशा को घिरता हुआ अनुभव करता हूं। व्यक्तित्व के संगीत का नहींस्वरों की एक विषाद भरी अराजकता का वहां दर्शन होता है। सब सौंदर्यसब लययुक्ततासब अनुपात खंडित हो गए हैं। हम अपने को व्यक्तिइंडिविजुअल कहेंशायद यह भी ठीक नहीं है। व्यक्ति होने के लिए एक केंद्र चाहिएएक सुनिश्चित संगठनक्रिस्टलाइजेशन चाहिए,वह नहीं है। उस व्यक्तित्व संगठन और केंद्रितताइंडिविजुएशन के अभाव में हम केवल अराजकताएनार्की में हैं।
मनुष्य टूट गया है। उसके भीतर कुछ बहुमूल्यएसेंशियल खो गया और खंडित हो गया है। हम किसी एकतायूनिटी के जैसे खंडहर और अवशेष हैं। वह एकता महावीर मेंबुद्ध मेंक्राइस्ट में परिलक्षित होती है। वे व्यक्ति हैंक्योंकि वे स्वरों की अराजक भीड़ नहींसंगीत हैंक्योंकि वे स्व-विरोध से भरी अंधी दौड़ नहींएक सुनिश्चित गति और दिशा हैं।

जीवन अपने केंद्र और दिशा को पाकर आनंद में परिणत हो जाता है। व्यक्तित्व को और उसमें अंतर्निहित समस्वरताहार्मनी को उपलब्ध कर लेना वास्तविक जीवन के द्वार खोलना है। उसके पूर्व जीवन एक वास्तविकताएक्चुअलिटी नहींकेवल एक संभावना है,एक भविष्यपोटेंशियलिटी है।
मनुष्य के व्यक्तित्व विघटन की यह दुर्घटना सारे जगत में घटी है। हम अपने ही से विच्छिन्न और पृथक हो गए हैं। हम एक ऐसे वृत्त हैंजिसका केंद्र खो गया है और केवल परिधि ही शेष रह गई है। जीवन की परिधि पर दौड़ रहे हैंदौड़ते रहेंगे और फिर गिर जाएंगे और एक क्षण को भी उसे नहीं जानेंगे जिसे विश्रांति कहते हैं। तेलघानी में कोल्हू के बैलों जैसी हमारी गति हो गई है।
जीवन परिधि ही नहीं हैकेंद्र भी हैयह जाने बिना सब प्रयाससब गति अंततः व्यर्थ और निस्सार हो जाती है। इसके ज्ञान के अभाव में श्रम की सब धाराएं दुख के सागर में ले जाती हैं। जीवन की परिधि पर तो केवल क्रियाएंबिकमिंग हैंसत्ताबीइंग तो वहां नहीं है। मैंमेरा अस्तित्वमेरा होनाएक्झिस्टेंस तो वहां नहीं है। मैं अपनी प्रामाणिक सत्ताआथेंटिकनेस में तो उस तल पर अनुपस्थित हूं। क्रियाबिकमिंग के तल पर मुझे नहीं पाया जा सकता है। उससे कहीं और गहरे और गहराइयोंडेप्थ्स में उसे पाया जा सकता है जो मैं हूं।

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-10

अहिंसा एक अनुभव हैसिद्धांत नहीं। और अनुभव के रास्ते बहुत भिन्न हैं,सिद्धांत को समझने के रास्ते बहुत भिन्न हैं..अक्सर विपरीत। सिद्धांत को समझना हो तो शास्त्र में चले जाएंशब्द की यात्रा करेंतर्क का प्रयोग करें। अनुभव में गुजरना हो तो शब्द सेतर्क सेशास्त्र से क्या प्रयोजन हैसिद्धांत को शब्द के बिना नहीं जाना जा सकता और अनुभूति शब्द से कभी नहीं पाई गई। अनुभूति पाई जाती है निःशब्द में और सिद्धांत है शब्द में। दोनों के बीच विरोध है। जैसे ही अहिंसा सिद्धांत बन गई वैसे ही मर गई। फिर अहिंसा के अनुभव का क्या रास्ता हो सकता है?
अब महावीर जैसा या बुद्ध जैसा कोई व्यक्ति है तो उसके चारों तरफ जीवन में हमें बहुत कुछ दिखाई पड़ता है। जो हमें दिखाई पड़ता हैउसे हम पकड़ लेते हैंमहावीर कैसे चलते हैंकैसे खाते हैंक्या पहनते हैं,किस बात को हिंसा मानते हैंकिस बात को अहिंसा। महावीर के आचरण को देख कर हम निर्णय करते हैं और सोचते हैं कि वैसा आचरण अगर हम भी बना लें तो शायद जो अनुभव है वह मिल जाए। 

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-09

मेरे प्रिय आत्मन्,
भगवान महावीर की पुण्य-स्मृति में थोड़े से शब्द आपसे कहूंगा तो मुझे आनंद होगा। सोचता थाक्या आपसे इस संबंध में कहूं! महावीर के संबंध में इतना कहा जाता हैइतना आप जानते होंगेइतना लिखा गया हैइतना पढ़ा जाता है। लेकिन फिर भी कुछ दुर्भाग्य की बात हैजो ऐसे व्यक्ति पैदा होते हैं जिन्हें हमें जानना चाहिएउन्हें हम करीब-करीब जानने से वंचित रह जाते हैं। उनसे हम परिचित नहीं हो पाते। और उनके अंतस्तल को भी हम नहीं देख पाते। पूजा करना एक बात है। आदर देना एक बात है। श्रद्धा से स्मरण करना एक बात है। लेकिन ज्ञान सेसमझ सेविवेक से जान लेनापहचान लेना बड़ी दूसरी बात है। महावीर की पूजा का कोई मूल्य नहीं है। मूल्य है महावीर को समझने का।
लेकिन दुनिया पूजा करती है और समझने की कोई चिंता नहीं करती। यह हमारी तरकीब है अपने आप को धोखा देने की। समझने से बचना चाहते हैंइसलिए पूजा करके निपट जाते हैं। आदर देकर बच जाते हैंनहीं तो अपने को बदलने की तैयारी करनी पड़ेगी। जो अपने को नहीं बदलना चाहता वह पैर छूकर झंझट छुड़ा लेता है।
और दुनिया में सारे लोगों ने इस तरह की मानसिक तरकीबें, आत्म-वंचनाएं विकसित कर ली हैं जिनके द्वारा हम पूजा भी करते जाते हैंयाद भी करते जाते हैंऔर ठीक उन्हीं के विपरीत जीवन भी जीते चले जाते हैं।

यह इतनी आश्चर्यजनक घटना है। इससे बड़ा और कोई चमत्कार इस दुनिया में नहीं हो सकता। स्मरण करते हैं महावीर काजीते हैं ऐसा जीवन जो महावीर के बिलकुल विपरीत होगा। और ऐसा भी नहीं है कि यह बहुत सचेतन रूप से जान कर हो रहा हो। अनजाने हम समझने से वंचित रह जाते हैं।

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-08

एक घटना से मैं अपनी बात शुरू करना चाहूंगा। एक संन्यासी किसी अजनबी देश से गुजरता था। वह देश अग्निपूजकों का देश था। संन्यासी जब देश के भीतर प्रविष्ट हुआ तो पहले ही उसे जो गांव मिले--वह देख कर दंग रह गया--उन गांवों में रात अंधेरा था। उन गांवों में घरों में चूल्हे नहीं जलते थे। उन गांवों के लोग आग जलाना भी नहीं जानते थे। वह तो चकित रह गया। उसने सुना थावह अग्निपूजकों का देश है। वहां अग्नि को लोग पूजते जरूर थेलेकिन अग्नि को जलाना नहीं जानते थे।
उसने लोगों से बात की। उन लोगों ने कहाअग्नि अब नहीं जलतीवह सतयुग की बात हैपहले जलती थी। वे दिन बीत गए। यह कलियुग हैअब अग्नि जलने का कोई उपाय नहीं है। और फिर अग्नि सभी तो नहीं जला सकते! कोई महापुरुषकोई तीर्थंकरकोई ईश्वरपुत्रकोई अवतार अग्नि को जलाने में समर्थ होता है। हम साधारणजन अग्नि को कैसे जला सकते हैं! हम तो सिर्फ अग्नि की पूजा करते हैं।

वह संन्यासी बहुत हैरान हुआअग्नि तो कोई भी जला सकता है। और जब उसने यह कहा कि अग्नि तो कोई भी जला सकता हैतो वे गांव के लोग बहुत नाराज हो गए। उन्होंने कहातुम हमारे महापुरुषों का अपमान करते हो! यह सिर्फ अलौकिक महापुरुषों के लिए संभव है कि वे आग जला सकें। हम सिर्फ अग्नि की पूजा कर सकते हैं। और अग्नि की पूजा करने को भी वे अग्नि नहीं जला सकते थे। उनके पास अग्नि के संबंध में लिखे हुए शास्त्र थे। मंदिर में रख कर उनकी ही वे पूजा करते थे।

महावीर या महाविनाश - प्रवचन-07

मेरे प्रिय आत्मन्,
एक छोटी सी घटना से मैं अपनी आज की बात को शुरू करना चाहूंगा।
एक फकीरएक संन्यासी प्रभु की खोज में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा था। वह किसी मार्गदर्शक की तलाश में था..कोई उसकी प्रेरणा बन सकेकोई उसे जीवन के रास्ते की दिशा बता सके। और आखिर उसे एक वृद्ध संन्यासी मिल गया राह पर हीऔर वह उस वृद्ध संन्यासी के साथ सहयात्री हो गया।
लेकिन उस वृद्ध संन्यासी ने कहा कि मेरी एक शर्त है यदि मेरे साथ चलना हो तो। और वह शर्त यह है कि मैं जो कुछ भी करूंतुम उसके संबंध में धैर्य रखोगे और प्रश्न नहीं उठा सकोगे। मैं जो कुछ भी करूंउस संबंध में मैं ही न बताऊंतब तक तुम पूछ नहीं सकोगे। अगर इतना धैर्य और संयम रख सको तो मेरे साथ चल सकते हो।

उस युवक ने यह शर्त स्वीकार कर ली और वे दोनों संन्यासी यात्रा पर निकले। पहली ही रात वे एक नदी के किनारे सोए और सुबह ही उस नदी पर बंधी हुई नाव में बैठ कर उन्होंने नदी पार की। मल्लाह ने उन्हें संन्यासी समझ कर मुफ्त नदी के पार पहुंचा दिया। नदी के पार पहुंचते-पहुंचते युवा संन्यासी ने देखा कि बूढ़ा संन्यासी चोरी-छिपे नाव में छेद कर रहा हैनाव का मल्लाह तो नदी के उस तरफ ले जा रहा हैऔर बूढ़ा संन्यासी नाव में छेद कर रहा हैवह युवा संन्यासी बहुत हैरान हुआयह उपकार का बदलामुफ्त में उन्हें नदी पार करवाई जा रही हैउस गरीब मल्लाह की नाव में किया जा रहा यह छेद?
भूल गया शर्त को। कल रात ही शर्त तय की थी। नदी से उतर कर वे दो कदम भी आगे नहीं बढ़े होंगे कि उस युवा संन्यासी ने पूछा कि सुनिएयह तो आश्चर्य की बात है। एक संन्यासी होकरजिस मल्लाह ने प्रेम से नदी पार करवाईमुफ्त सेवा की सुबह-सुबहउसकी नाव में छेद करने की बात मेरी समझ में नहीं आतीकि उसकी नाव में आप छेद करेंयह कौन सा बदला हुआ..नेकी के लिए बदी सेभलाई का बुराई से?
उस बूढ़े संन्यासी ने कहाशर्त तोड़ दी तुमने। सांझ को ही हमने तय किया था कि तुम पूछोगे नहीं। मेरे से विदा हो जाओ। अगर विदा होते हो तो मैं कारण बताए देता हूं। और अगर साथ चलना है तो आगे ध्यान रहेदुबारा पूछा कि फिर साथ टूट जाएगा।