रविवार, 1 अक्टूबर 2017

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-04

दिनांक 10 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।

बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की एक कहानी कही है। पिछले जन्म की कहानी है। तब वे बुद्धपुरुष नहीं थे। और उस जन्म मेंजो उस जमाने में एक बुद्धपुरुष थेवे उनके दर्शन करने गए थे। तो जब उन्होंने उन बुद्धपुरुष के पैर छुएपैर छूकर वे उठ ही पाए थे कि वे बुद्धपुरुष भी झुके और इनके पैर छू लिए! ये बहुत हैरान हो गए। इन्होंने कहा कि मैं आपके पैर छुऊं,नमस्कार करूंयह तो ठीक है। आप मेरे पैर छुएं और नमस्कार करेंयह तो मेरी समझ के बाहर हो गया! तो उस बुद्धपुरुष ने कहा कि यह तुम्हारी समझ के बाहर है। क्योंकि मुझमें जो वास्तविक हो गया हैवह तुममें संभावना है। और आज नहीं कल तुममें भी वास्तविक हो जाएगा। वास्तविक हो जाएगा तुममें भीजो आज बीज है वह कल वृक्ष हो जाएगा। मैं उस संभावना को नमस्कार करता हूं। और इसलिए कर रहा हूं ताकि तुम्हें याद दिला सकूं कि तुममें भी वह संभावना है।




आपको पहली बार सुना थातब से यह प्रश्न मन में है कि जैसे अशांत व्यक्ति का गुस्सा होता हैक्रोध होता है--अपने लिए। वैसे ही क्या शांत व्यक्ति का भी क्रोध होता हैगुस्सा होता है--दूसरों के लिएसमाज के लिए?

हां-हांबिलकुल होगा गुस्सा। बिलकुल ही शांत आदमी का गुस्सा भी होता हैयुद्ध भी होता है उसकासंघर्ष भी है उसका। लेकिन अपने लिए नहीं हैइतना ही फर्क है। अशांत व्यक्ति भी लड़ता हैलेकिन वह अपने लिए लड़ता है। शांत व्यक्ति दूसरे के लिए लड़ेगा भीक्रोध से भी भरेगालेकिन अपने लिए अब उसका कोई क्रोध नहीं है। क्रोध का उसका कोई अब भीतरी कारण नहीं है।
तो मैं जो कहता हूंव्यक्ति शांत होना चाहिए और समाज में एक क्रांति आनी चाहिए। मेरा मानना है कि शांत व्यक्ति ही क्रांति ला सकता हैक्योंकि अशांत व्यक्ति बेचारा कहां से क्रांति लाएगा! क्रांति लाने के लिए जो शांत चित्तता चाहिएवही उसके पास नहीं है।
लेकिन शांत व्यक्ति अब तक--यह रहा है अब तक--कि अब तक जो शांत व्यक्ति रहे हैंउन्होंने कोई क्रांति नहीं लाई है। और उसका कारण यह था कि उनकी शांति भी मुर्दा थीवह शांति जिंदा नहीं थी। तो एक आदमी ऐसे भी शांत हो सकता है कि बिलकुल मुर्दा हो जाएनिष्क्रिय हो जाएतो भी शांत हो जाता है। निष्क्रिय नहीं चाहता हूं आदमी कोमेरा कहना है कि शांति सक्रिय होनी चाहिएनहीं तो शांति बेमानी है। और शांति जीवित होनी चाहिए। और शांत व्यक्ति दूसरे के लिए बहुत पीड़ित होगा। लेकिन वह पीड़ा उसकी नहीं हैअपने लिए तो बात समाप्त हो गई हैअब पीड़ा दूसरे के लिए है। और दूसरे की पीड़ा को मिटाने की वह चेष्टा करेगा।
यह बात सच है कि व्यक्ति ही क्रांति लाएंगे। लेकिन अशांत व्यक्ति जो क्रांति लाते हैंवह उनकी अशांति से जन्मती हैवह उनकी करुणा से नहीं जन्मती है। और अशांति से जन्मी हुई क्रांति आग तो लगा देती हैजला तो देती हैमिटा तो देती है,बना नहीं पाती। तो क्रांतियां बहुत हुई हैं दुनिया में। और ऐसा हुआ अब तक दुर्भाग्य कि शांत आदमी क्रांति नहीं करता और क्रांति करने वाला आदमी शांत नहीं होताऐसा हुआ आज तक। और इसलिए शांति भी हुई है और क्रांति भी हुई हैलेकिन क्रांति से हित नहीं हुआ और शांत आदमी समाज के जीवन और जगत के जीवन में एक कोने में सिमट कर समाप्त हो गया। इनका किसी तरफ जोड़ होना चाहिए।
मैं सब तरह के विरोधों को जोड़ने के लिए चेष्टा करता हूं। सब तरह के विरोध जुड़ जाने चाहिए। विज्ञान और धर्म जुड़ जाने चाहिए। भौतिकवाद और अध्यात्म जुड़ जाने चाहिए। शांति और क्रांति जुड़ जानी चाहिए। ये सब जुड़ जाने चाहिए। और तभी हम अच्छा समाज निर्माण कर सकेंगेनहीं तो नहीं कर सकेंगे।
वह तो धीरे-धीरे जब मेरी पूरी बातमैं सारे समाज को बदलने की पूरी दृष्टि मेरी साफ कर सकूंगाऔर व्यक्ति की भी शांति का मेरा क्या खयाल हैवह साफ होगातो कठिनाई नहीं होगी देखने में कि ये दोनों एक ही व्यक्ति की संभावनाएं हैं। अब तक ऐसा हुआ नहीं है। और इसलिए शांत व्यक्ति एक तरह का पलायनवादी हो जाता हैभागा हुआ हो जाता है। और क्रांतिकारी जो हैवह इतना क्रुद्ध रहता है कि क्रोध तो उसमें बहुत हैलेकिन अकेले क्रोध से कुछ होता हैसृजनात्मक नहीं हो पाता अकेला क्रोध।
मेरा कहना है कि शांत आदमी को भी क्रुद्ध होना पड़ेगा।
यह उलटा दिखता है--कि शांत आदमी और क्रुद्ध होगा! लेकिन जब तक शांत आदमी क्रुद्ध नहीं होगातब तक समाज बदलेगा नहीं। क्योंकि समाज का यह सब चल रहा हैइतनी कुरूपता चल रही है और शांत आदमी बैठा हुआ देखता रहता हैइसलिए सब चल रहा है। उसे क्रुद्ध होना पड़ेगा।

उन लोगों का कहना क्या है कि वह जो विस्फोट न होउसके लिए सूक्ष्म दृष्टि से भीतर जो लोग खोज करते हैं...

मेरा कहना यह है कि जितना दमन किया हैउतनी ही स्थूल दृष्टि हो जाएगीएक। दमन जो हैदृष्टि की सूक्ष्मता को कम करेगा। दूसराभीतर जाने की हिम्मत कम हो जाएगी। और भीतर जाने की हिम्मत तभी बढ़ेगीजब कि आप दमन को मुक्त छोड़ दें फिर से। और वह इतना घबड़ाने वाला होगाक्योंकि इतना ज्यादा आपने अगर इकट्ठा कर लिया है दमन कि वह आपको पागल करने वाला होगा।
ये तथाकथित ब्रह्मचारी और साधु और संन्यासीअगर इनको दस-पंद्रह साल की साधना के बाद इनको कहा जाए कि चित्त को तुम मुक्त छोड़ दोतो सिवाय पागल होने के ये कुछ भी नहीं हो सकते! इसी वक्त पागल हो जाएंगे--इसी वक्त! क्योंकि इनके पास तो भारी उबलता हुआ लावा इकट्ठा है। वह तो किसी तरह से सम्हाले बैठे हुए हैं!
तो इनकान तो ये सूक्ष्म हो सकते हैंन यह अंतर्दृष्टि इनकी भीतर प्रवेश कर सकती है। क्योंकि प्रवेश कहां करोगेअंतर्दृष्टि पैदा कैसे करोगेअंतर्दृष्टि पैदा करने का मतलब यह है कि जीवन में एक सरलता होदमन न हो। और जीवन के बीच खंड-खंड टुकड़े न होंकि एक खंड टुकड़ा दूसरे खंड टुकड़े की छाती पर चढ़ जाए। वह जिस टुकड़े के ऊपर चढ़ गया हैवह टुकड़ा उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहा है। और जो चढ़ गया हैअब उसने एक प्रतिष्ठा बना ली हैअब वह हट नहीं सकता वहां से। हटे तो उसे लगेगासब अस्तव्यस्त हो गया।
मनुष्य के भीतर इतने खंड जो हैं व्यक्तित्व केअगर इनमें एक इनर-कांफ्लिक्ट हैतो न तो आप सूक्ष्म हो सकते हैं और न भीतर आप प्रवेश कर सकते हैं। आप सदा के लिए भयभीत हो जाएंगेजितना ही आप दमन करेंगे। मेरा कहना है कि वह तो जितना जीवन को सरलता की स्वीकृति जिसकी है--जैसा जीवन हैजो भीतर हैउसके लिए सरल चित्त से स्वीकार है। जैसे हमारी आंख हैहाथ हैवैसा सेक्स हैवैसा क्रोध है। और हम नहीं जानते कि क्यों है! इसलिए हम झगड़े में पड़ते नहीं। हम सिर्फ जानना चाहते हैं कि क्या है। हम यह मान कर चलते भी नहीं कि जानने से सेक्स विलीन हो जाता है। क्योंकि विलीन हो जाने की जो कामना हैवह मूलतः दमन का ही सूक्ष्म रूप है। हमें यह पता नहीं कि वह विलीन होगा कि और बढ़ जाएगा। और हमारा कोई पक्ष भी नहीं है कि वह विलीन होकि बढ़ेकि न बढ़ेकि घटेहमें कोई प्रयोजन नहीं है।
हम इतना ही करना चाहते हैं कि जो भी हमारे भीतर हैवह सचेत और जागरूक हो जाए। अगर क्रोध भी हमारे भीतर होतो क्रोध सचेत और जागरूक हो जाए। और उसकी पूरी शक्ति और महत्ता से मैं परिचित हो जाऊं। और उसकी पूरी जो इनर वघकग हैउसको मैं जान लूं। सिर्फ इसे हमें जानने जाना है।
ऐसा व्यक्ति ऐसे सरल भाव से...इसको मैं सरल भाव कहूंगा। दमन करने वाला तो सरल कभी होता ही नहीं। उससे ज्यादा जटिल आदमी नहीं। वह चाहे कितना ही सरल दिखाई पड़ेवह लंगोटी लगाए हुए खड़ा हैऔर आप जाते हैं तो झुक कर वह नमस्कार करता हैलेकिन वह सरल कभी नहीं हो सकता। वह जटिलता उसके भीतर खड़ी हुई है। तो जितना चित्त जटिल होगा,उतना भीतर प्रवेश नहीं होता है।

एक्सट्रीम में क्या होता है?

एक्सट्रीम में जो होने वाला हैअगर दमन कोई करता ही चला जाए...

एक्सट्रीम पर रिवर्स  होता है न! जैसे टाल्सटाय काही एनज्वायड कंप्लीटली एंड देन ही वेंट बैक। इट वाज़ ए रिएक्शन!

नहींकहीं वेंट बैक हुआ नहीं टाल्सटाय का बेचारे का!

उसका रिएक्शन ही हुआ न कंप्लीटली भोग में उतरने का...

वह कुछ मामला नहीं हैबस वह सब मेंटल मामला हैइससे ज्यादा नहीं है गहरा कुछ टाल्सटाय का। वह हम बात करेंगे!
यह जो अगर कोई दमन करता ही चला जाए और दमन सफल हो जाए--सफल होना बहुत मुश्किल मामला है--तो स्प्लिट पर्सनैलिटी हो जाएगी। दो हिस्सों में टूट जाएगाअगर सफल हो जाए। सफल होना बहुत मुश्किल मामला है। दमन सफल होता नहींक्योंकि प्रकृति के बिलकुल ही प्रतिकूल है आपका कार्य जो है। शीर्षासन करने जैसा है। दस-पांच मिनट आप खड़े हो जाते हैंफिर चौबीस घंटे पैर पर ही खड़े रहते हैं।
मगर यदि कोई आदमी चौबीस घंटे सिर पर खड़े रहने के लिए तैयार हो जाएतो दमन की अगर पूरी सफलता मिल जाएतो व्यक्तित्व दो हिस्सों में टूट जाएगा और उन दो हिस्सों को एक-दूसरे का कोई पता नहीं रह जाएगा। अगर पूर्ण सफल हो दमन में। दो आदमी हो जाएंगे इसके भीतरयह एक आदमी रह ही नहीं जाएगा। और इसके बीच के जो सेतु हैंवे सब टूट जाएंगे। इसका आखिरी परिणाम पागलपन हो सकता है। विस्फोट होगा और इतना होगा कि सारा का सारा एक्सप्लोजन हो जाएयह आदमी बिलकुल ही पागल हो जाए।
दमन पागल करता है और दमन करने वाली सभ्यता पागल करती है। और करीब-करीब हर आदमी को हमने उस हालत में पहुंचा दिया है इन पांच हजार वर्षों के सभ्यता के इतिहास में कि वह विस्फोट हो जाए। अगर वह नहीं हो रहा हैतो उसका कारण यह है कि दमन सफल नहीं हो पाया है। यानी निकास के रास्ते निकल आते हैं। यानी वह ब्रह्मचर्य वगैरह थोपता है,लेकिन गैर-ब्रह्मचर्य का कोई न कोई रास्ता खोज लेता है। और इसलिए ब्रह्मचर्य भी चलता है। इसीलिए ब्रह्मचर्य चलता है,नहीं तो वह इसी वक्त खतम हो जाए। अंततः विस्फोट ही हो सकता है पूरे व्यक्तित्व का और पागलपनविक्षिप्तता के सिवाय कहीं कोई ले जा नहीं सकता।
इसलिए मेरा कहना यह है कि इस विक्षिप्तता के बाद कुछ काम हो सकता हैक्योंकि वह फिर उस हालत में आ जाएगा जहां चीजें सरल हो गईं। लेकिन यह बहुत उपद्रव का मामला हैइससे कोई मतलब नहीं है। यह ऐसे उपद्रव का मामला है कि हो सकता है उस विक्षिप्तता में वह टूट ही जाएव्यक्तित्व ही टूट जाएशरीर ही टूट जाए। यह जिंदगी तो कम से कम खराब हो जाए।
अभी वे अमेरिका में एक छोटा सा प्रयोग करते हैं। अभी वे कहते हैं कि जो पागलपन हैजैसा कल तक हम सोचते थे कि गरीबी व्यक्ति का जिम्मा हैऐसा आज उसमें एक वर्ग है मनोवैज्ञानिकों काजो कहता हैपागलपन भी व्यक्ति का जिम्मा नहीं है। पागलपन भी उसके आस-पास के सारे अंतर्संबंधों का दबाव है। और इसलिए पागल का सीधा अकेला इलाज करना बिलकुल व्यर्थ है। वह हो नहीं सकता। क्योंकि वह उसका मामला ही नहीं है। तो वे कहते हैं कि उसका इलाज करने के लिए तो पूरी एक कम्युनिटी होनी चाहिए। और कम्युनिटी कुछ डेवलप करते हैंदो-चार प्रयोग कर रहे हैं कि वह पूरी कम्युनिटी जो है,वह उस व्यक्ति के पूरे अंतर्संबंध बदल दे।
जैसे कि कल उसने सड़क पर किसी स्त्री को जाते देखा था और उसका मन हुआ था कि वह उसको गले लगा ले। गले लगाता हैतो पिटता हैतो जाता है जेलखाने! नहीं गले लगाता हैतो वह गले लगाने वाला चित्त उसका चक्कर मारता है और वह उसे पागल बनाता है। तो अब एक कम्युनिटी होनी चाहिएजहां जो दस-पांच स्त्रियां रह रही हैंउनको यह समझाया गया है कि अगर कोई गले लगा ले तो यह कोई बहुत उपद्रव और तूल बनाने की जरूरत नहीं है। उससे गले लग करनमस्कार करके,रास्ते पर चले जाना है। ताकि वह जो गले लगाने वाला पागल हैवह अगर किसी को गले लगा लेऔर कुछ उपद्रव न हो कहीं भीऔर ये चीजें ऐसी ही हो जाएं जैसे हवा का झोंका आया और गयातो उसका पागलपन मिट सकता है। नहीं तो नहीं मिट सकता है।
और उसके बड़े अच्छे परिणाम हुए हैं। आज जिसको हम पागल कहते थेवह आदमी पागल था ही नहीं। वह सिर्फ कम्युनिटी के प्रेशर ऐसे थे कि उसको सप्रेसिव बनाया उसने। और वह सप्रेसिव होने से बेचारा पागल हो गया था। अगर ये विलेज कम्युनिटीज इस तरह की सफल होती हैंतो आज नहीं कल आपको बड़े पैमाने पर सोचना पड़ेगा कि बजाय अलग कम्युनिटी बनाने के आप एक ऐसी सोसाइटी क्यों न बनाएं जो इस तरह की बेवकूफियों से आदमी को बचाती हो। हमारी पूरी सोसाइटी इस तरह की बेवकूफियां सिखाती हैबचाती नहीं है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

रेशनली देखता हैअगर रेशनली देखता हैऔर हम कहते हैं कि अपने से बाहर जाता हैअलग खड़ा होता हैतो इसमें स्प्लिट पर्सनैलिटी शुरू होगी और टेंशन शुरू होगाऔर वह भी पागल कर सकती है।
इसलिए मेरा कहना है कि यह जो देखने का मामला हैइट शुड नॉट बिकम एन एफर्ट। और अपने से बाहर जाने का कोई सवाल नहीं है। यह तो बहुत एफर्टलेसजो हो रहा हैउसकी जस्ट अवेयरनेस है। यह ऑब्जर्वेशन नहीं है ऐसा कि जैसे मैं आपको देख रहा हूंऐसा ही मैं अपने को देखूंतब तो पागलपन पैदा करने वाला है। वह तो बिलकुल ही पागलपन लाने वाला है। इसलिए हमारे साधु-संन्यासी जो इस तरह का ऑब्जर्वेशन करने की कोशिश करते हैंवे पागल होंगे। वह तो फिर उन्होंने दो हिस्सों में तोड़ लिया अपने को। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस काम के लिए दो हिस्सों में तोड़ते हैं। किसी काम के लिए दो हिस्सों में तोड़ें--चाहे सप्रेशन के लिएचाहे ऑब्जर्वेशन के लिए--आपने एक गल्फ पैदा कर ली। और गल्फ के जो परिणाम होने वाले हैंवे होंगे। वे आपको दो हिस्सों में तोड़ देंगे।
इसलिए मैं कहता हूं कि यह जो सेल्फ-ऑब्जर्वेशनजिसकी मैं बात करता हूंवह वैसा सेल्फ-ऑब्जर्वेशन नहीं है कि आप अपने से बाहर खड़े होकर और अकड़ कर खड़े हो गए हैं और अपने ही चित्त की वृत्तियों को दूर से देखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी कोई दूरी नहीं हैआप ही चित्त हो और आप खड़े हो नहीं सकते। यह खड़ा होना बिलकुल ही अस्वाभाविकझूठा और काल्पनिक है। और यह जो इमेजिनरी आप आउटसाइड गए होयह गए-वए नहीं हो कहींयह सिर्फ खयाल में चले गए हो।
दिस लीड्स टु मॉरल हिपोक्रेसी।

बिलकुल ही ले जाएगाबिलकुल ही। ले ही जा रहा है। सारे तरफ से पाखंड पैदा करेगा। और पाखंड पैदा कर देइससे कोई हर्जा नहीं है। आपको खंड-खंड करेगा। यानी पाखंड तो ठीक है। पाखंड तो यह भी हो सकता है कि सिर्फसोसाइटी चूंकि बहुत कनिंग हैगलत हैइसलिए आपको पाखंडी होकर रास्ता निकालना पड़ता है। उस हालत में पाखंड शायद आपके लिए नुकसान भी नहीं पहुंचा रहा है। या आप पागल हो जाओगेअगर आप पाखंडी नहीं होते। सोसाइटी ने विकल्प ऐसे छोड़े हुए हैं कि या तो आप पाखंडी हो जाओ और या फिर जीना मुश्किल हैपागल हो जाओ। तो समझदार आदमी पाखंडी हो जाएगा। वहां कोई रास्ता नहीं है उसको निकालने का और।
आप खंड-खंड हो जाओगे! जो कि भारी खतरा है। और खंड-खंड होना शुरू हो गयाजैसे ही आपने अपने साथ कुछ करना शुरू कियायानी ऑब्जर्वेशन या कुछ भीआपने कुछ करना शुरू किया अपने साथ कि आपने दो टुकड़े मान लिए--एक मैं करने वाला और एक होने वाला।
मैं जो कह रहा हूं वह यह कह रहा हूं कि आप इकट्ठे एक ही हैं। जब क्रोध हैतो आप क्रोध ही हैं। ऐसा नहीं है कि आप आउटसाइड क्रोध के खड़े हो गए हैं और देख लेंगे। आप क्रोध ही हैं। इस क्रोध को जो समझना हैवह समझना भी कोई आप अलग हैंऐसा नहीं है। अपने ही क्रोध को उसके साथ एक रह कर उसे जाननासमझना है। न कोई लड़ाई लेनी है उससेन जानने-समझने में कोई स्ट्रेन पैदा करना है। लेकिन जैसे मैं अपने हाथ को समझता हूंजैसे मेरे पैर में तकलीफ है तो मैं पैर को समझता हूंजैसे मेरे सिर में दर्द है तो मैं सिर को समझता हूंऐसे ही जो भी मेरे भीतर हैमैं उसे समझने की कोशिश करता हूं। यह जो कोशिश हैदो हिस्सों में तोड़ने वाली नहीं है। और न मेरी आकांक्षा है कि इसको मैं बदल दूंन मेरी आकांक्षा है कि यह कुछ और हो जाएन यह कोई कामना है कि यह बदल जाए। कामना कुल इतनी है कि जो भी मैं हूं...इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अच्छा है या बुरायह बेमानी है। अच्छा और बुरा दूसरों का वैल्युएशन है। मैं तो जो भी हूंवही हूं। वह जो फैक्ट है मेराउसे मैं जान लूं और उसे जीने की पूरी कोशिश करूं।
इस कोशिश सेआउट ऑफ दिसकुछ होना शुरू होता हैवह स्प्लिट में नहीं ले जाता आपको। बल्कि वह आपको मोर इंटीग्रेटेड और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे वहां ले जाता हैजहां आपके भीतर विरोधी स्वर होता ही नहीं। आप जो होते हैंटोटल होते हैं। क्रोध में भीप्रेम में भीसेक्स में भीजो भी आप होते हैंटोटल होते हैं। जो बच रहता हैवह आपको टोटेलिटी दे जाता है। और मेरा मानना हैऐसे व्यक्ति का सेक्स भी और हैऐसे व्यक्ति के क्रोध का आनंद भी और है। ऐसे व्यक्ति काजो भी उसके जीवन में हैवह समग्र हो गया हैइकट्ठा हो गया है। और ऐसी स्थिति को तो मैं कहता हूं कि विमुक्ति की स्थिति बन सकती है। लेकिन वे तो स्थितियां सब विक्षिप्त बनने की स्थितियां हैं।
यह जो इस भांति सहजसरल और जैसे हम हैं उसके स्वीकार से चलने वाला जो जानना हैयह तो आपको सूक्ष्मतम दृष्टि दे सकता है। लेकिन असहजकठिनाई सेदबाने वालातोड़ने वाला उसको खंड-खंड मेंकोई आपको सूक्ष्म दृष्टि नहीं दे सकता है।
इसलिए कई दफे इतनी हैरानी होती है कि जिनको आप बड़ी सूक्ष्म दृष्टि के लोग कहते हैंवे अत्यंत स्थूल दृष्टि के लोग होते हैंजिनमें सूक्ष्म जैसी कोई चीज ही नहीं होतीहो ही नहीं सकती। हमारे बड़े-बड़े महात्माजिनका हम भारी शोरगुल मचाए रखते हैंअत्यंत स्थूल दृष्टि के लोग होते हैं। वे बातें भी जो करते हैं बड़ी-बड़ीवे बातें भी अत्यंत स्थूल होती हैंउनमें कुछ मामला नहीं होता। यानी उसमें कोई गहरा जानना नहीं है। क्योंकि जानने से तो वे बच ही गए हैं। और बच गए हैं...जानना तभी हो सकता हैजब मेरा कोई आग्रह न हो। इस कमरे में मैं आऊं और जो भी है उसे जानने की मेरी तैयारी होमेरा कोई आग्रह ही न हो। मैं आऊं और जान लूं जो भी है। न मेरा यह खयाल हो कि यह कुर्सी यहां से वहां होनी चाहिएन मेरा यह खयाल हो कि दीवाल का रंग यह नहीं होना चाहिएवह होना चाहिए। ये सब आग्रह लेकर मैं इस कमरे में आयातो इस कमरे में और मेरे भीतर जो कांफ्लिक्ट होने वाली हैवह स्थूल करेगीवह सूक्ष्म नहीं करती है।
और दो नहीं हैं वहां कोई। यह जो भ्रांति हजारों साल में हमको पैदा की गई है कि क्रोध कुछ अलग हैघृणा कुछ अलग है,सेक्स कुछ अलग है और हम कुछ अलग ही हैं। यह बड़ी खतरनाक है! लेकिन वह खड़ी है। ये सब अद्वैत की बातें करने वाले लोग हैंलेकिन बुनियादी रूप से द्वैत पर खड़े हुए हैं--यह शरीर तुम नहीं होतुम शरीर से अलग हो।
नहीं क्रोध भी मैं हूं। जो कुछ भी हैमैं हूं। और इसलिए लड़ाई किससे लेनी हैऔर लड़ाई लेगा कौनयह कोई सवाल नहीं है। इतना ही हो सकता है कि मैं जो हूंउसे मैं पूरा नहीं जानता हूंबहुत सा हिस्सा अंधेरे मेंछाया में दबा पड़ा हैवह भी मैं हूंउसे मुझे जानना चाहिए। उसे मैं पूरा जानूंतो शायद जीना ज्यादा सुंदरज्यादा सरलसहज और आनंदपूर्ण हो जाए। तो सिर्फ उसे पूरा जान लूं। जानने में ही जो विलीन हो जाएगावह बात अलग। जानने में जो बच जाएगावह पूरा हो जाएगाबात अलग।
लेकिन पुरानी सारी साधना आज तक कीसारी दुनिया कीद्वंद्व को लेकर चलती हैवहीं से वह शुरू होती है। वह लड़ाई को मान कर चलती है। और लड़ाई को मान कर चली हुई कोई भी साधना अंततः और गहरी लड़ाई में ही ले जाएगीऔर कहीं पहुंचा नहीं सकती। और जितना कष्ट और जितनी पीड़ा इस द्वंद्व ने पैदा की है जगत मेंउतनी किसी और बात ने पैदा नहीं की है। बहुत कष्ट और पीड़ा पैदा की है। इतनी आत्मग्लानि और इतनी आत्महीनता पैदा की है! और वह तरकीब ऐसी हैजैसे हमने कुत्ते को उसकी पूंछ पकड़ने की धुन पकड़ा दी हो--कि जब तक तू अपनी पूंछ नहीं पकड़ लेगातेरा जीवन व्यर्थ है। अब वह कुत्ता अपनी पूंछ पकड़ने के लिए उछलकूद मचा रहा है। झपटता हैतो लगता है कि आई पकड़ में। लेकिन वह जितना झपटता हैउतनी पूंछ पीछे फिर फिंक जाती है। अब वह पागल होने के रास्ते पर पड़ा हैकुत्ता पागल होगा। या तो पागल होगाया पाखंडी हो जाएगा। पूंछ रखे रहेगाकहेगा: हांमैंने पकड़ ली। मैंने पकड़ ली! मैंने पूंछ पकड़ ली! और वह जानता है कि पूंछ तो पकड़ी नहीं है। अब वह धोखा देगा। और या फिर यह होगा कि वह पागल हो जाएगातब यह झंझट छूटेगी।
पागल होना भी हमारे व्यक्तित्व की आखिरी कोशिश है हमें उससे मुक्त करने की जो हमने जबरदस्ती थोप लिया है। इट इज़ लास्ट सॉल्युशन। यानी जब कुछ नहीं कर पाता है हमारा चित्ततो फिर यही है रास्ता कि ठीक है भईइस आदमी को पागल कर दोताकि यह झंझट से छूट जाए। वह आखिरी कोशिश है।
तो पागलपनयह बड़ी कृपा है ऐसे प्रकृति की। अगर वह भी न होतब हम कहां पहुंचेंगेकहना मुश्किल है। हम कहां पहुंच जाएंबहुत मुश्किल है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

अगर हमने एफर्ट बनाया है जाग्रत रहनातब तो वह बार-बार खो सकता है। क्योंकि कोई भी एफर्ट जो हैवह सतत नहीं हो सकता है। एफर्ट कोई भी सतत नहीं हो सकता है। श्रम कोई भी सतत नहीं हो सकता हैविश्राम करना पड़ेगा। यानी अगर मैं मिट्टी खोदता हूं आठ घंटेतो आठ घंटे खोद लूंगाफिर मुझे दस घंटे सोना पड़ेगा। तब मैं फिर इस योग्य होऊंगा कि मिट्टी खोदूं। मिट्टी खोदना चौबीस घंटे नहीं चल सकता। कोई भी श्रम चौबीस घंटे नहीं चल सकता। क्योंकि जैसे ही वह श्रम बना,उससे विश्राम की जरूरत पड़ जाएगी।
इसलिए जो भी संत संतत्व को श्रम बना लेते हैंउनको फिर छुट्टी लेनी पड़ेगी संतत्व से। और वह छुट्टी लेनी हमको पाखंड मालूम पड़ेगा--कि वह आदमी सबके सामने तो कहता था सिगरेट पीना बुरा हैऔर दरवाजा बंद करके सिगरेट पी रहा था! तो वह हमको पाखंडी लगता है। वह बेचारा सिर्फ छुट्टी ले रहा है। सिगरेट न पीना एक श्रम था उसको। अब वह श्रम शिथिल होगा। एक जगह जाकर आएगा कि वह कहेगा कि अब विश्राम करो। तो उसको सिगरेट पीनी पड़ेगी।
हांजो मैंने यह कहा कि जो सहज-सहज जागते चले जाना है। यह जागरण जैसे ही आ जाता हैइसके लौटने का कोई सवाल ही नहीं है। क्योंकि इसको आप लाए नहीं हैंयह आया है। और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जागरण और आप दो चीजें नहीं रह गए हैं,आप ही जागरण हो गए हैं। आपने क्रोध तक को दूसरा नहीं मानातो जागरण को दूसरा मानने का क्या सवाल है! वह धीरे-धीरे आप ही हो गए हैंआप ही हैं। उसके लौटने का कोई प्रश्न नहीं हैउसके लौटने का कोई सवाल नहीं है।
जो भी हमने जान लिया है--जान लिया है--उससे पीछे लौटने का सवाल नहीं है। उसको फिर अनजाना नहीं किया जा सकता। उसे अनजाना करना मुश्किल है। हांजो हमने न जाना होऐसे ही सीख लिया हो जबरदस्तीवह कल फिर डांवाडोल हो सकता है। लेकिन जो मैंने जान लिया है--जैसे एक बच्चे ने प्रेम जान लियानहीं जाना था अब तकअब उसने प्रेम जान लिया। अब वह प्रेम को अनजाना नहीं कर सकता। उसका अनजाना होना अब असंभव है। जानना जो हैचूंकि वह हमारा हिस्सा ही हो जाता हैवह हमसे कहीं अब छूट सकता नहीं। हांजानना ऐसा हो सकता है कि उसने प्रेम की चार किताबें पढ़ ली हों और प्रेम के संबंध में कुछ जानना सीख लिया होवह अनजाना कल हो सकता है।
जागरण के प्रयोग से धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जो भी हममें होता हैतो जागरण कोई ऐसी क्वालिटी नहीं है जो बाहर से आकर आपसे जुड़ जाती हैबल्कि आपका ही इनर बीइंग है जो धीरे-धीरे प्रकट हो जाता है। यह कोई ऐसी चीज होती कि आपके खीसे में रख दी गईतो गिर सकती थीखो सकती थीजा सकती थी। यह आप ही थे जो रि-डिस्कवर हो गए। यह आप ही थे जो आपने उघाड़ लिया अपने को। अबअब कोई सवाल नहीं रहा।

मगर बाह्य परिस्थिति कुछ उलटी-सुलटी होतो उसमें फिर उसके रिएक्शंस में कुछ फर्क नहीं पड़ता?

वह उलटी-सुलटी हो तो रिएक्शंस में फर्क पड़ेगाअगर यह जागरण आपने साधा हो। तो साधने के लिए अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियां फर्क ला देंगी। क्योंकि वह जो साधा थातो साधने के लिए अनुकूल परिस्थिति चाहिए थी।
एक आदमी मौन हो गया जंगल में बैठ कर। तो जंगल की स्थिति में मौन रह सकता है वहबाजार में लाओ तो झंझट में पड़ जाएगा। क्योंकि वह मौन जो है एक कंडीशनिंग है। वह जंगल की एक खास परिस्थिति में उसने मौन को संस्कारित कर लिया है। अब उसको आप बाजार में ले आओतो मुश्किल पड़ गई। लेकिन एक आदमी है जो बाजार मेंजंगल मेंसब में घूमते-डोलते हुए मौन हो गया है। बाजार में भी आया हैजंगल में भी गया हैगांव में भी हैशहर में भी हैलड़ भी रहा हैझगड़ भी रहा हैऔर मौन हो गया है। वह सारी परिस्थिति मेंउसने कोई विशेष परिस्थिति की मांग नहीं की है साधने के लिए। तो कोई विशेष परिस्थिति उसकी साधना को तोड़ नहीं सकती।
यानी हमने जो साधते वक्त मांगा होतो फिर झंझट होगी। हमने अगर कहा हो कि भई मैं तो पत्नी से दूर रह कर ही ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो सकता हूं। तो फिर यह ब्रह्मचर्य मुश्किल में पड़ जाएगाकल अगर पत्नी पास आ गई। तो फिर दिक्कत की बात है। क्योंकि उसकी तो कंडीशनिंग थीवह शिथिल होते ही से बहुत मुश्किल में पड़ जाएगा।
स्वामी राम अमेरिका से लौटेतो उनकी पत्नी उनसे मिलने गई। ऐसा आते देखा पत्नी कोसरदार पूर्ण सिंह उनके पास रहते थेउनसे कहादरवाजा लगा दो!
तो सरदार पूर्ण सिंह ने कहाहैरानी की बात है! आपको मैंने हजारों स्त्रियों से मिलते देखाआप कभी भयभीत नहीं हुए। इस गरीब औरत ने क्या बिगाड़ा हैक्या यह अभी भी आपकी पत्नी हैऔर आप तो कहते हैं कि छोड़-छाड़ कर चले गए! बात खतम हो गई। अब यह एक सामान्य स्त्री हैजैसी और स्त्रियां हैं।
पूर्ण सिंह ने कहाअगर आप अपनी पत्नी से नहीं मिलोगेतो मैं भी आपको नमस्कार करता हूं। क्योंकि यह मेरी समझ के बाहर है। अभी तक आप कहते हैंसब में ब्रह्म है। आज अचानक इस स्त्री में ब्रह्म नहीं रहादरवाजा बंद करवाते हैंइसके लिए खास इंतजाम करते हैं! यह कुछ खास है?
और खास है वह। क्योंकि वह जो साधा हैइसको छोड़ कर साधा है। इसके आने से वह डांवाडोल हो सकता है। यानी इस स्त्री को विशेष स्वीकृति मन की हैक्योंकि इसकी तरफ पीठ करके कुछ साधा गया है। मुंह करने से वह डोल सकता हैगिर सकता हैखंडित हो सकता है।
तो अगर आपने कोई अनुकूल परिस्थिति मांगी है साधना मेंतो कल प्रतिकूल परिस्थिति होने पर आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। इसीलिए मेरा कहना हैकोई विशेष परिस्थिति मत मांगो। जो परिस्थितियां आती हैंजिनमें जीना ही पड़ता हैउनमें ही जीओ और जानते रहो। इस सबसे तोड़ कर अपने को मत ले जाओ। नहीं तो कल फिर झंझट हैफिर वापस लौटना हो सकता है।
साधु पतित होते हैंक्योंकि वे साधु ही नहीं होते। और पतित होने का कुल कारण इतना होता है कि एक विशेष घेरा बना कर उसमें किसी तरह खड़े होकर अपने को साध लेते हैं। वह घेरा कल टूटता है। टूटेगाफिर मुश्किल हो जाएगीफिर कठिनाई हो जाएगी। फिर थोड़ा सा भी उसमें फर्कऔर सब डांवाडोल हो जाएगा। असल में इसीलिए मैं कहता हूं कि वह कोई जानना-वानना नहीं था। एक कवायद थीजो सीख ली थी। वह काम दे गई कवायद के वक्तफिर बेकार हो गई।

यह तो मानसिक से ही होगा यह सारा इंटीग्रेटेडहोल ऑफ दि बॉडी।

असल में यह भी हमारा जो खयाल है--मानसिकशारीरिकआत्मिक--यह सब बचकाना है। यह सब कामचलाऊ डिवीजन है। ऐसा कोई डिवीजन कहीं है नहीं।

नहींमगर समझ लीजिए कि ऐसी परिस्थिति में आ गएतो मानसिक तो इंटीग्रेटेड हो गए। तो बॉडी का भी जो हैविल नॉट दैट बी आल्सो कंप्लीटली फ्री फ्रॉम डिजीजेज ऑर एनीथिंग लाइक दैट?

जरूरी नहीं है। बहुत दूर तक काम करेगा यह। बहुत दूर तक काम करेगा। अगर माइंड बहुत इंटीग्रेटेड हैतो बॉडी पर माइंड के डिसइंटीग्रेशन से जो-जो नुकसान होते थेवे नहीं होंगे। लेकिन बॉडी पर और चीजों से जो नुकसान होने वाले हैंवे होंगे।
कोई गोली चला कर मार देगा आपकोतो आपका इंटीग्रेटेड माइंड कुछ भी नहीं कर लेगा। गोली तो छेदेगी और शरीर कट जाएगा। मतलब अगर हम ठीक से देखेंतो शरीर हमारा बाहर के जगत से प्रतिपल जुड़ा हुआ है।
सच बात तो यह है कि हम अपने शरीर को कहां खतम करेंयह कहना बहुत मुश्किल है। यानी यह जो चमड़ी की सीमा आ जाती हैयह मेरे शरीर की सीमा हैयह कहना बिलकुल नासमझी है। बिलकुल नासमझी है। क्योंकि यह पूरी हवा का जो चारों तरफ फैलाव हैयह मेरे शरीर का हिस्सा है। अगर यह सारी हवा यहां से अलग कर ली जाएतो मैं एक सेकेंड नहीं जी सकूंगा। वह जो दूर सूरज है दस करोड़ मील दूर परवह मेरे शरीर का हिस्सा है। अगर वह वहां ठंडा हो जाएतो मैं यहां ठंडा हो जाऊंगा। वह सारा उत्ताप तो उससे मुझे आ रहा है।
तो मेरा शरीर क्या हैअगर बहुत गौर से हम देखेंऔर अगर मैं को हम केंद्र मान लेंतो सारा का सारा यूनिवर्स मेरा शरीर है। कहां हम उसको खतम करेंकिस जगह पर जाकर?

इंटर-डिपेंडेंस है।

हां। तो यह जो सारा का सारा इंपैक्ट हैयह तो कोई आपके इंटीग्रेशनडिसइंटीग्रेशन से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह फर्क पड़ेगा उतना कि शरीर पर करीब-करीब सौ में से पचास मौकों पर बीमारियां भीतर की तरफ से आ रही हैं। ये भीतर की तरफ से आनी वाली बीमारियां तो विलीन हो जाएंगी। माइंड की कांफ्लिक्ट से शरीर पर जो असर पड़ रहा हैवह तो विलीन हो जाएगा। लेकिन बाहर के जगत के संघर्षण से जो असर पड़ रहा हैवह विलीन होने वाला नहीं है।
इसलिए महावीर भी मरेंगेबुद्ध भी मरेंगे। और अरविंद जैसे लोग पागलपन की बातें सोचेंगे कि हम फिजिकली इम्मार्टल हो गएऔर फिर मर जाएंगे! अब इस तरह के लोगों को सिर्फ एक ही फायदा है कि जिंदा-जिंदा तो आप उनसे कोई झगड़ा नहीं कर सकतेक्योंकि वे कहते हैं हम फिजिकली इम्मार्टल हैं। और मर जाते हैंतब झगड़ा करने को कोई बचता नहीं है। तो कोई भी दावा कर सकता है कि मैं फिजिकली इम्मार्टल हूं। इसमें कोई झंझट ही नहीं है। क्योंकि मैं भी दावा कर दूं कि मैं शरीर से अमर हूंतो आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं। क्योंकि जब तक मैं हूंतब तक तो दावा मेरा सही है। और जब मैं मर गयातो आप किससे झगड़िएगा?
तो शरीर जो हैवह तो अगर हम गौर से देखें तो उसमें दो तरह के प्रभाव आ रहे हैं। एक भीतर की तरफ से आने वाले। लेकिन ऐसा मत सोचें कि भीतर की तरफ कोई दूसरी एनटाइटी बैठी है। सिर्फ भीतर की तरफ--जैसे मैंने श्वास लीएक श्वास वह है जो बाहर से भीतर की तरफ गईएक श्वास वह है जो भीतर से बाहर की तरफ गई। वे एक ही श्वास के दो प्रवाह हैं,जैसे लहर आई और गई। तो एक तो भीतर से बाहर की तरफ आने वाले प्रभाव हैंउनको हम मानसिक कह दें। बाहर से भीतर की तरफ आने वाले प्रभाव हैंउनको हम शारीरिक कह दें।
तो जितने मानसिक प्रभाव हैं द्वंद्व केजो शरीर को तोड़ते हैंवे विलीन हो जाएंगे। तो शरीर मानसिक रोगग्रस्त तो नहीं होगा। फिर बाहर से आने वाले प्रभाव हैंवे जारी रहेंगे। उनसे अगर बचना हैतो विज्ञान से सलाह लेनी पड़ेगी।

तो फिर उसके लिए  विज्ञान के हिसाब से प्लानिंग करनी पड़ेगी।

बिलकुल हीबिलकुल ही करनी पड़ेगी।

इतना लक्ष्य तो रखना ही पड़ेगा।

हांबिलकुल ही रखना पड़ेगा।

नहीं रखने से आत्महिंसा की स्थिति हो जाएगी।

हो ही रही है। साधु-संन्यासी जितनी हिंसा कर रहे हैं शरीर के साथशायद ही कोई कर रहा हो! एकदमजिसको मैसोचिस्ट कहें,वे हैं पूरे के पूरे। और ये सब बातें भी बड़ी खतरनाक हैंअगर खयाल में बैठ जाएं। असल मतलब यह है कि हमने चीजों को तोड़त्तोड़ कर ऐसे कंपार्टमेंट बना लिए हैंजो कि वस्तुतः नहीं हैं। बाहर और भीतर कामचलाऊ बातें हैं। यानी एक डिवीजन करने में उपयोगी हैं। लेकिन बाहर यानी क्या हैऔर भीतर यानी क्या हैएक ही चीज के बाहर-भीतर होते आंदोलन हैं। और चूंकि मैं अपनी तरफ से खड़े होकर देखता हूंइसलिए जो मुझे भीतर दिखाई पड़ता है वह आपके लिए बाहर है और जो आपके लिए भीतर दिखाई पड़ता है वह मेरे लिए बाहर है। तो वे बिलकुल ही रिलेटिव कंसेप्शंस हैंएक ही चीज है।
अगर यह बहुत साफ हो जाएतो विज्ञान और धर्म दो चीजें नहीं रह जाते। अगर बाहर और भीतर एक हो जाता हैतो हम जानते हैं कि बाहर जाता हुआ जो प्रवाह हैउसके संबंध में जाननासमझनाखोजना धर्म हैभीतर की तरफ आता हुआ बाहर से जो प्रवाह हैउसे जाननासमझनाखोजना विज्ञान है। और किसी दिन जब कि यह शरीर और आत्मा का द्वैतपदार्थ और परमात्मा का द्वैतदोनों विलीन हो जाएंगेतो धर्म और विज्ञान जैसी दो चीजें नहीं होंगीएक ही चीज होगी। एक ही चीज होगी। और जिस दिन यह होगाउसी दिन हम पूरी तरह से उस जगह खड़े होंगेजहां चीजें साफ-साफ जानी गईं। नहीं तो नहीं जानेंगे।

धर्म को पाने के बाद भी विज्ञान की दृष्टि अगर कम होतो उसके जो परिणाम शरीर पर होने चाहिएवे तो होंगे।

बराबर होने वाले हैं। उससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं।

तो उसके लिए भी खुद की जागरूकता होनी चाहिए।

होनी ही चाहिए। जरूर होनी चाहिए।

यह मैं खास पर्टिकुलर इसलिए पूछता हूं कि मैंने भी सफरिंग किया है बॉडी को निग्लेक्ट करने के कारण। तो साधना के योग के अंदर शरीर के प्रति कुछ ध्यान देना चाहिए कि नहीं?

बिलकुल पूरा ध्यान देना चाहिएशरीर की पूरी फिक्र करनी चाहिए। असल में हमारी पूरी की पूरी भाषा रोगग्रस्त हो गई है। चूंकि वह द्वैत इस बुरी तरह से बैठ गया है कि जब मैंजिसको कि कोई अंतर नहीं है दोनों मेंवह भी बात करेतो भी मुझे कहना पड़ता है: शरीर की फिक्र करनी चाहिए। और उसमें ऐसा भ्रम पैदा होता है कि आप कोई और हैं फिक्र करने वाले और शरीर कोई और है जिसकी फिक्र करनी है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

वही तो मैं कह रहा था इतनी देर सेवही तो मैं इतनी देर से कह रहा था कि अगर मेरे तीन पीढ़ियों में डायबिटीज चला आ रहा हैतो मेरे माइंड को क्या फर्क पड़ता हैइससे बॉडी को कोई मतलब नहीं है। बॉडी की हेरिडिटी तो बहुत और है और उसका अपना कांस्टीटयूशन है। जैसे मेरे घर में बाल गिर जाते हैं पच्चीस साल के बाद सभी केतो इससे क्या फर्क पड़ने वाला हैवह बाल मेरे गिरने वाले हैं।

मेरे तीन पीढ़ी से बाल गिरते रहे हैं और मेरे बाल गिर जाएंगेइसमें वह जरा थोड़ा सा फर्क कर रहे हैं। विज्ञान अभी इस पर काम कर रहा है कि मेरे बच्चों के बाल नहीं भी गिरें!

वह दूसरी बात हैवह विज्ञान करेगा। वह मैं कह नहीं रहा हूं। कल यह भी हो सकता है कि बाल बिलकुल न गिरें। पर वह विज्ञान करेगा। उससेमेरे माइंड में जो फर्क पड़े हैंउससे कोई संबंध नहीं है। वह विज्ञान करेगावह ठीक है। कल दांत न गिरें,बाल न गिरेंआदमी बूढ़ा न होवह सब विज्ञान कर लेगा। लेकिन विज्ञान कुछ करेगातब वह होगा। समझे न आप?

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

यह जो मैं बात कर रहा हूंयह बात ही नहीं है। मैं जो कह रहा हूंवह यह कह रहा हूंआप यह पूछ रहे हैं कि अगर भीतर मन शांत हो जाएइंटीग्रेटेड हो जाएतो क्या बॉडी परफेक्ट हो जाएगीमैं आपसे कह रहा हूं कि नहीं हो जाएगी। बॉडी को तो परफेक्ट करने के लिएविज्ञान जो करेगाउससे ही कुछ होगा। नहीं तो महावीर न मरेंबुद्ध न मरेंकोई न मरे। और फिर हमें झूठी कहानियां गढ़नी पड़ती हैं।
महावीर को पेचिश हो गई मरते वक्तछह महीने तक। और बड़ा मुश्किल हो गया सवाल जैनियों के सामने कि महावीर को और दस्त लगते हैं! और इतने दस्त लगे कि उससे ही वे मरे! तो फिर कहानियां गढ़नी पड़ीं कि किसी ने जादू चला दिया है और किसी ने यह कर दिया है और किसी ने वह कर दिया है।
अब ये सब फिजूल की बातें हैंइससे कोई मतलब नहीं है। महावीर को क्यों पेचिश नहीं हो सकतीपेचिश होना बिलकुल और मामला है। और वह बिलकुल ही और तल की बात हैउससे महावीर का कोई लेना-देना नहीं है।

व्हेन ए पर्सन इज़ इंटीग्रेटेड एंड होलही शुड बी परफेक्ट इन आल डायमेंशंस। दैट इज़ अवर एजम्पशन।

बिलकुल गलत बात है। और दूसरा मामला यह हैदूसरा मामला यह है कि परफेक्शन के हमारे बड़े डेड कंसेप्ट हैं। वे भी डायनेमिक नहीं हैंवे भी बड़े डेड कंसेप्ट हैं। अब सच बात यह है कि जब महावीर पैदा हुए हैंतो मरेंगे। और मरना इम्परफेक्शन हैयह कौन कहता हैयानी सवाल यह है कि एक आदमी पैदा हुआतो परफेक्शन तो यही है कि एक सर्किल पूरा करेगा और मरेगा।
एक वृक्ष पर पत्ते लगते हैं वसंत मेंतब आप कहते हैं परफेक्ट। और जब पतझड़ में सब पत्ते गिरते हैंतब आप क्या कहते हैं--इम्परफेक्टयह अब भी परफेक्ट है। और परफेक्ट का मतलब यह है कि जिस तरह पूरे पत्ते खिले थे और लगे थेउसी तरह पूरे पत्ते गिर जाएंतो यह भी परफेक्शन है। इसमें इम्परफेक्शन कहां आ गयाअधूरे पत्ते गिर जाएंकच्चे गिर जाएंतो इम्परफेक्शन! नहीं तो यह भी परफेक्शन है। पैदा हुआ था वृक्षयह भी एक यात्रा थी परफेक्शन कीकल मरेगायह भी यात्रा उसी की है।
लेकिन हमारे मोह हैं!
अब जैसे समझ लो कि मेरे शरीर में एक बीमारी हो गई। मेरे शरीर में एक बीमारी हो गई और करोड़ों कीटाणु उस बीमारी में पैदा हुए हैं और वे जी रहे हैं। हमारे लिए बीमारी है। उन करोड़ों कीटाणुओं के लिए नये जीवन का आविर्भाव है। उनका आविर्भाव चल रहा है। हम कहते हैं कि यह बड़ी इम्परफेक्ट बॉडी हो गई।
हो सकता है कि पृथ्वी पर हम सब इसी तरह के कीटाणु होंजो एक बड़ी बॉडी पर अपना पोषण कर रहे हैं। हमारी बॉडी पर भी करोड़ों कीटाणु जी रहे हैं। यह जो बाहर का सारा जगत हैइसमें परफेक्शन भी हमारी डिजायर का परफेक्शन है। यानी हमारी कामना यह है कि शरीर ऐसा हो कि बीमारी न आए। लेकिन क्योंहमारी कामना ऐसी है कि शरीर ऐसा हो कि वृद्ध न हो। लेकिन क्योंहमारी कामना ऐसी है कि शरीर ऐसा हो कि मरे न। लेकिन क्योंवह जो हमारे भीतर के सब भय और सब दुख और पीड़ाएं हैंउन सबसे बचने की हमने यह परफेक्शन की कामना की है। लेकिन क्यों?
वह जितना माइंड इंटीग्रेटेड होगा भीतरतो शरीर परफेक्ट नहीं हो जाएगालेकिन शरीर का जो जैसा हैवह सब स्वीकृत हो जाएगा। एक सहज स्वीकृति उसकी भी हो जाएगी। बुढ़ापा हैतो उसकी एक सहज स्वीकृति होगी। मृत्यु हैतो उसकी एक सहज स्वीकृति होगी। और वैसा आदमी उतने ही आनंद से मरेगाजितने आनंद से जीया था। यह तो समझ में आने वाली बात है। लेकिन मरेगा नहींयह निपट नासमझी की बात है। मरेगा तो ऐसे ही आनंद से मरेगा जैसे जी रहा था--उतने ही आनंद से। बीमारी में भी वह उतना ही शांत जीएगाउसी तरह उठेगा-बैठेगाजैसा वह स्वास्थ्य में था। यह जो भीतर उसका मन हैइसकी अगर एक स्थिति बन जाएतो जीवन की हरेक स्थिति के प्रति एक सहजता की भाव-दशा पैदा होती है।
और शरीर पर जो कुछ होने वाला हैअगर उसमें कोई भी फर्क करना हैतो उसके लिए तो विज्ञान कुछ करेगाउसका धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। हांजितनी बीमारियां मन से पैदा होकर आती हैं--और बहुत बीमारियां आती हैं--वे विलीन हो जाएंगी। यानी इस बात की संभावना बहुत कम है कि उस तरह की बीमारियां आनी शुरू होंजो मन से आती हैं। जैसे एक आदमी भयभीत हैऔर भयभीत होने की वजह से उसके हाथ कंप रहे हैं। अब यह नहीं होगा उसकोक्योंकि भय कहां होने वाला है उसे। वह जानने से ही...
नहीं तो हमारे मुल्क में बड़ी गलत धारणा पैदा हो गई है योग के बाबत। यह धारणा पैदा हो गई है कि वह कुछ...
शरीर की बीमारी के लिए विज्ञान है। तो धर्म किस बीमारी का इलाज हैऔर धर्म क्या है?

मेरा तो कहना ही यह है कि जिस दिन भीतर का विज्ञान पूरा साफ-साफ होगाधर्म विदा हो जाएंगेउनकी कोई जरूरत नहीं रह जाती। धर्म जो है उसी दिशा में अवैज्ञानिक ढंग से अब तक की गई खोज-बीन का नाम है। कल अगर वैज्ञानिक दृष्टि से उस दिशा में खोज-बीन हो जाती हैधर्म वहां-वहां से विदा होता चला जाएगा। जिसे आज आप विज्ञान कह रहे हैंकल धर्म वहां भी दावेदार था। कल वह बताता था कि पानी कब गिरेगाऔर पृथ्वी चलती है कि नहीं चलती है।

आज भी धर्म की मीनिंग क्लियर नहीं  है।

धर्म का हमेशा एक ही मीनिंग है। आज और कल और परसों का सवाल नहीं है। जो मैं अभी कह रहा था कि वह जो हमारा अंतर्जगत हैउस अंतर्जगत के ज्ञान कीउस अंतर्जगत को जानने कीउस अंतर्जगत को उसकी परिपूर्णता में जीने की और होने की पद्धति का नाम धर्म है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

आप मेरी बात नहीं समझे। मेरा कहना यह है कि जितना ज्यादा अज्ञान होगा जगत मेंधर्म का क्षेत्र उतना बड़ा होगा। क्योंकि धर्म तब सब चीजों को छुएगा। फिर जैसे-जैसे जिस-जिस क्षेत्र में ज्ञान बहुत सुनिश्चितव्यवस्थित और वैज्ञानिक होता चला जाएगावहां-वहां से धर्म हटता चला आएगा। कुछ क्षेत्रों से बिलकुल हट गया। हट गयाठीक हैवहां विज्ञान खड़ा हो गया है।
आज नहीं कलहम भीतर भी खोज-बीन करते चले जाते हैंऔर जब भीतर भी चीजें बहुत साफ और स्पष्ट हो जाएंगीतो धर्म की वहां भी कोई जरूरत नहीं रह जाती। या अगर हम उसको धर्म कहेंगेतो कोई फर्क नहीं पड़ता।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

असल में मुश्किल क्या होती है कि वेद बड़ी चीज है। वेद में हजार तरह की चीजें हैं। उसमें उस जमाने का सोशल कोड भी है,कानून भी हैउस जमाने की नीति-व्यवस्था भी हैसब कुछ है। असल बात यह है कि वेद उस जमाने की अकेली किताब है। जो भी थासब उसमें इकट्ठा है। उसमें लोकगीत भी हैलोककथा भी है। उसमें सब इकट्ठा है। उसमें इतिहास भी हैपुराण भी है। सब इकट्ठा है। और स्वाभाविक हैक्योंकि वह प्राथमिक आदमी की चेष्टा है। पहली दफा लिखा जा रहा हैसब लिख लिया,जो भी है।
धीरे-धीरेधीरे-धीरे स्पेशलाइजेशन होता हैचीजें टूटती हैं अलग-अलग। तो नीति अलग चली जाती हैसमाजशास्त्र अलग चला जाता हैविज्ञान अलग चला जाता हैभूगोल अलग चला जाता हैज्योतिष अलग चला जाता है। फिर सब अलग-अलग होते चले जाते हैं। इसमें धर्म की भी अपनी एक यात्रा हैजो अलग चली जाती है।
और वेद के कुछ वचन हैं जो धर्म के वचन हैं। सारा वेद धर्म नहीं है। वे वचन धर्म के हैं जो मनुष्य के अंतस-लोक से कुछ संबंध रखते हैंवहां की जो खोज-बीन करते हैं। वहां के संबंध में उस समय के आदमी का जो अनुभव हैउसको कहते हैं। वे वचन भर धर्म हैं।
तो इंडियन पेनल कोड नहीं है धर्म। इंडियन पेनल कोड समाज की नीति-व्यवस्था हैसमाज की राज-व्यवस्था है। वेद में वह भी है।

वह भी है और उसको धर्म समझा गया था अभी तक। और आज भी समझा जाता है।

वह कठिनाई क्या होती है कि वह धर्म-पुस्तक थी। धर्म-पुस्तक से उस दिन मतलब ही यह था। मैंने कहा कि जितना अज्ञान होगाउतना धर्म सब क्षेत्रों को छुएगा।
जैसे अभी कल तकहम कहते थे--केमिस्ट्री। तो केमिस्ट्री के सब क्षेत्र छूते थे। आज समझिए कि आर्गनिक केमिस्ट्री अलग है और इनआर्गनिक अलग है और कुछ अलग है। आज जिसे हम आर्गनिक केमिस्ट्री कह रहे हैंकल वह दस हिस्सों में टूट सकती है। और ज्ञान जैसे बढ़ता हैवैसे खंड-खंड होते चले जाते हैं। आज भी आप विज्ञान की डाक्टरेट को पीएच.डी. की डिग्री दिए चले जा रहे हैं। वह तीन सौ साल पहले की बात हैजब आप डाक्टर ऑफ फिलॉसफी कहते थे। कोई भी आदमी...क्योंकि फिलॉसफी यानी सब कुछ था। पर अब भी आज एक आदमी केमिस्ट्री में कर रहा है पीएच.डी. और उसको आप कहे चले जा रहे हैं डाक्टर ऑफ फिलॉसफी!

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

हांठीक। तो यह वैसा ही मामला है। वेद जो हैवह प्राथमिक संकलन है। सच तो यह है कि उस समय का विश्वकोशउस समय जो जानकारी थीसब इकट्ठी हो गई है उसमें। उसको पूरे को धर्म कहना आज गलत है। उस दिन तो ठीक रहा होगा,आज गलत हैक्योंकि उसमें से अब बहुत थोड़ा सा ही धर्म बचा। बाकी सब तो अलग हिस्सों ने ले लिया। उन्होंने अलग क्लेम कर लिया अपना-अपना। जिसको मैं धर्म कह रहा हूंवह जो अंतस की खोज की निरंतर चेष्टा है आदमी कीउसको मैं धर्म कह रहा हूं। और मेरा मानना है कि जितना वह अंतस की खोज भी वैज्ञानिक होती चली जाएउतना धर्म को अलग होने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। एक दिन ऐसा आ सकता है कि दो तरह के विज्ञान हों--बाहर की खोज करने वालाभीतर की खोज करने वाला। उसको चाहे विज्ञान कहोचाहे धर्म कहोउससे कोई अंतर नहीं पड़ने का है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

रिलीजन कहें कि साइंस कहेंयह बहुत बेमानी है। यह जो दो शब्दों का जो फासला हैवह भी पिछले अतीत इतिहास की वजह से पैदा हो गया है। हम उसे क्या कहते हैंयह मेरे लिए बहुत मूल्य का नहीं है। हम उसे साइंस कहें कि रिलीजन कहेंकुछ भी कहें। अब तक वे दो रहे हैं। और अब तक दोनों की मेथडोलॉजी में बुनियादी फर्क रहा है। लेकिन जैसे-जैसे साइंस भी आगे बढ़ती हैवैसे-वैसे एक अर्थ में रिलीजन का फील्ड सिकुड़ता चला जाता है। और ठीक हैसिकुड़ जाना चाहिए। क्योंकि उसने सारा सब कुछ घेरा हुआ थाजो उसका था ही नहीं। वह वहां से हट जाएगा। लेकिन कुछ है जो उसका है। और वह 'कुछ हैसे कभी हटने वाला नहीं है। वह जो कुछ हैवह उसका जो अपना हैउससे वह कभी हटने वाला नहीं है।
लेकिन मेरा मानना है कि साइंस जैसे-जैसे विकसित होती हैवह उस 'कुछकी दिशा में भी बहुत कुछ कर सकेगी। और उस हालत मेंउस बिंदु पर जहां रिलीजन का कुछ अपना हैजिसको मैं मेडिटेशन कहूंसमाधि कहूंवह उस तरह के जो सारे के सारे उसकी सब्जेक्टिविटी के जो प्रयोग हैं। साइंस का सारा का सारा प्रयोग ऑब्जेक्टिविटी के लिए है। ऑब्जेक्टिविटी है। और जो धार्मिक लोग उसे इनकार करें और माया कहेंउनको मैं समझता हूं बकवास कर रहे हैं। सब्जेक्टिविटी भी है। और जो वैज्ञानिक उसे इनकार करें और कहें कि नहीं हैमैं कहता हूंवे बकवास कर रहे हैं। और यह बकवास एक ही चीज की रिएक्शन है। एक नेजिसने ऑब्जेक्टिविटी को इनकार किया हैतो ऑब्जेक्टिविटी वाले को लगता है कि सब्जेक्टिविटी वगैरह कुछ भी नहीं है।
वह जो सब्जेक्टिव होना हैवह जो मेरा होना हैवह भी है। मैं जो जान रहा हूंवह भी हैऔर जो जान रहा हैवह भी है। किसी न किसी अर्थ में वह है। अब इस जानने वाले को कैसे जाना जाएनिश्चित ही इसको जानने का मेथड वही नहीं हो सकताजो ऑब्जेक्ट्स को जानने का मेथड होगा। इसके जानने के मेथड में बुनियादी फर्क पड़ेगा। क्योंकि मैं कभी भीकिसी भी स्थिति मेंखुद के लिए तो ऑब्जेक्ट बन ही नहीं सकता। दूसरे के लिए मैं ऑब्जेक्ट बन सकता हूं।
तो अभी साइकोलॉजी जो कर रही हैवह मनुष्य की सब्जेक्टिविटी के साथ भी ऑब्जेक्टिव जैसा प्रयोग कर रही है। क्योंकि वह सारे के सारे मेथड साइंस के प्रयोग कर रही है। साइंस के जितने मेथड हैंवे बेसिकली ऑब्जेक्टिव होने को बाध्य हैं। क्योंकि उसके बिना वे साइंटिफिक नहीं रह जातेहवा में सब खो जाती है बातकुछ पता नहीं चलता कि क्या हुआ। तो साइकोलॉजी अभी जो प्रयोग कर रही हैउसने रिलीजन का तो क्षेत्र लिया हुआ है और साइंस के मेथड लिए हुए हैं!
तो साइंस के मेथड से हम दूसरे व्यक्ति की जो सब्जेक्टिविटी हैउसको बाहर से कितना ऑब्जर्व कर सकते हैंऔर उसका ऑब्जर्वेशन बिहेवियर ही हो सकता हैऔर तो कुछ हो नहीं सकता। बिहेवियर को ही हम ऑब्जेक्टिव बना सकते हैं। लेकिन जिसका बिहेवियर हैवह फिर छूट जाता हैवह बच जाता हैवह कहीं खिसक जाता है।
यह जो निरंतर छूट जाने वाला हैइसे जानने के लिए कुछ और ही रास्ता खोजा है धर्म ने। उसे वे मेडिटेशन कहते हैं। उसे वे यह कहते हैं कि उसे हम तब जान सकते हैंजब कि सारे ऑब्जेक्ट चेतना से विलीन हो जाएं। ऑब्जेक्ट ही न होसिर्फ सब्जेक्टिविटी ही रह जाए। तो वह जो ध्यान हैअटेंशन जो हैचूंकि ऑब्जेक्ट पर अटकी हुई थीअगर सारे ऑब्जेक्ट विलीन हो जाएंतो वह जो अटेंशन हैवह वापस लौट आती है। क्योंकि वह कहां जाएगीउसके लिए कोई ऑब्जेक्ट नहीं मिलतातो वह अपने पर ही वापस लौट आती है। वह जो लौटती हुई चेतना हैवह स्वयं को अनुभव करवाती है। वह स्वयं-संवेद संभव हो पाता है।
यह जो बात हैयह बात अनिवार्य रूप से एंटी-साइंटिफिक नहीं हैनॉन-साइंटिफिक हो सकती है। यह जो बात हैयह अनिवार्य रूप से एंटी-साइंटिफिक होतीतब तो यह होता कि या तो विज्ञान जीतेगा तो फिर यह धर्म विलीन हो जाएगा और या फिर धर्म जीतेगा तो विज्ञान नहीं घुस पाएगा। इसे मैं कहता हूं कि यह नॉन-साइंटिफिक हो सकती हैएंटी-साइंटिफिक नहीं है। इसके एंटी-साइंटिफिक होने की कोई वजह नहीं है। और कल अगर विज्ञान विकास करते-करते उस जगह आता हैजहां वह यह अनुभव करता है कि जिस तरह ऑब्जेक्ट को जानने का ऑब्जेक्टिव ऑब्जर्वेशन रास्ता थाउस तरह सब्जेक्ट को जानने का सब्जेक्टिव इंट्रोस्पेक्शन और मेडिटेशन भी रास्ता हो सकता हैयह अगर विज्ञान को अनुभव होता है--और यह अनुभव होना बहुत कठिन नहीं है--तो फिर जो अनुभव अब तक हम धर्म कहते थेउसे चाहे हम वैज्ञानिक कहने लगेंइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। या धर्म को विज्ञान कहने लगेंकोई फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन मेरा मानना यह है कि चूंकि बुनियादी रूप से एक ही एनटाइटी है--ऐसा शरीर और आत्मा जैसी दो नहीं हैंऐसा पदार्थ और परमात्मा जैसी दो नहीं हैंऐसा क्रिएटर और क्रिएशन जैसी दो नहीं हैं--एक ही हैहम उसे क्या नाम देते हैं और किस तरफ से नाम देना शुरू करते हैंयह बहुत ही औपचारिक बात है।
अगर हम विज्ञान की तरफ से नाम देना शुरू करते हैंतो हम कल उसे कह सकेंगे कि वह विज्ञान हैभीतर का विज्ञान है। कुछ और कहेंगे--सुप्रीम साइंस कहेंइनर साइंस कहेंकुछ और नाम दे देंउससे कोई फर्क नहीं पड़ता। या हो सकता है हम उसे साइकोलॉजी ही कहते चले जाएंवह स्प्रिचुओलॉजी हो जाएकुछ और हो जाए। यह गौण बात है। लेकिन एक बात जो गौण नहीं हैवह यह है कि एसेंशियली कुछ है हमारे भीतरजो ठीक ऑब्जेक्टिव होने को बाध्य नहीं होता है और ऑब्जेक्ट को ट्रांसेंड करता मालूम पड़ता है। अगर वह ऑब्जेक्ट ही हो जाएतब तो रिलीजन की कोई जगह नहीं रह जातीबात खतम हो गई। रिलीजन जैसी चीज गलत थीअज्ञान था। फिर साइंस रह जाती है। लेकिन अगर ऐसी कोई चीज हैव्हिच ट्रांसेंड्स नेसेसरिली दि ऑब्जेक्टिवतो फिर रिलीजन बाकी रहेगा।
नाम बहुत गौण बात हैनाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी पसंद करूंगा कि उसे विज्ञान ही कहा जाएक्योंकि दो-दो नाम रखने की कोई जरूरत नहीं है। हमें जहां तक बने कम से कम कंसेप्ट से और ज्यादा से ज्यादा उपयोग लेना चाहिए। उतनी सुविधा होती है। व्यर्थ का उपद्रव बचता हैव्यर्थ की कांफ्लिक्ट बचती है।
तो इस बात की बहुत संभावना है कि धर्म जैसा शब्द भी खो जाएगा। और इसीलिए संभावना है क्योंकि वह अनावश्यक हो जाएगा। लेकिन धर्म का एसेंशियल जो कंट्रीब्यूशन हैवह खोने वाला नहीं है। बल्कि शायद जब हम पूरी तरह साइंटिफिक ढंग से उस दिशा में इंगित कर पाएंगेतो शायद पहली दफा बुद्ध या महावीर या पतंजलि पहली बार पूरी तरह साफ हो सकेंगे हमारे लिए। क्योंकि जिस टर्मिनालॉजी में वे बोले हैंवह साइंस की नहीं है। क्योंकि साइंस की टर्मिनालॉजी ही नहीं थी। वे जिस टर्मिनालॉजी में बोले हैं वह या तो मेटाफिजिक्स की हैया मेटाफर की हैया पोएट्री की है। आदमी मजबूर हैजो टर्मिनालॉजी उपलब्ध होउसी में बोलना पड़ेगा। अगर मैं हिंदी के सिवाय कोई भाषा नहीं जानता हूंतो मजबूरी है कि मैं जो भी बोलूंगावह हिंदी में बोलूंगा।
आज से दो हजार साल पहले जो भाषा थी हमारे पासकाव्य की थीकहानी की थी। इस तरह की भाषा थी। उसी भाषा में कहने की जरूरत थी। तो मेरा मानना है कि रिलीजस एक्सपीरिएंस जैसे ही हुआउसको पोएट्री की भाषा में ही प्रकट करना पड़ा। वह लैंग्वेज की गड़बड़ हैजो आज कांफ्लिक्ट बढ़ रही है।
और अब जब कि साइंस की भाषा विकसित हो गई--ज्यादा एग्जेक्टज्यादा मैथमेटिकलज्यादा साफ-सुथरी--तो अब पोएट्री की भाषा में रिलीजन को प्रकट करने की कोई जरूरत नहीं रह जाने वाली है। आज नहीं कल हम साइंस की भाषा में ही रिलीजन को प्रकट कर सकेंगे। उस हालत मेंजिसको हम रिलीजन कहते रहे थे आज तकवह सब विदा हो जाएगा। हो जाना चाहिए। लेकिन रिलीजस एक्सपीरिएंस एज सचवह विलीन होने वाला नहीं है।
और इसलिए उसको हम क्या नाम देंगेकोई फर्क नहीं पड़ता। रिलीजन कहेंसाइंस कहेंकोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन वह एक्सपीरिएंस ऑब्जेक्टिव एक्सपीरिएंस से कुछ पृथक अपनी सत्ता रखता हैउसकी अपनी आथेंटिसिटी हैयह मेरा कहना है। और इसलिए वह विदा होने वाला नहीं है। वह एक्सपीरिएंस विदा होने वाला नहीं है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

उसको ईच एंड एवरीबडी को प्रूव करने का न सवाल हैन प्रश्न है। वह तो जो प्रूव करना चाहे उसे उतरना पड़ेगा उस दिशा में।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

न-नयह सवाल नहीं है। सवाल हैजो फर्क हैजो डिस्टिंगशन हैवह दूसरा है। साइंटिस्ट आज नहीं कलजीवन क्या हैयह जान लेंगे। लेकिन जीवन को जानने की उनकी जो मेथडोलॉजी हैवह ऑब्जेक्टिव है। वे जीवन को जान लेंगेजैसा जीवन बाहर से देखा जा सकता हैजैसा हम बाहर से ऑब्जर्व कर सकते हैं। वे जीवन को ऐसे जानेंगेजैसा दूसरा जीवन को जानता है। लेकिन जीवन अपने मेंभीतरस्वयं कैसा अनुभव करता हैजीवंत होना कैसा हैवह साइंटिस्ट बाहर से नहीं जान पाता। वह उसकी जो सब्जेक्टिव फीलिंग है...
जैसे मैं कहूं--प्रेम है। एक फिनामिना है। बाहर से हम ऑब्जर्व करते हैं कि प्रेमी क्या करता हैक्या नहीं करता हैउसका बिहेवियर क्या हैप्रेमी के मस्तिष्क पर क्या होता हैप्रेमी के शरीर पर क्या होता हैहम सारा ऑब्जर्व करते हैं। और हमप्रेम क्या हैइसके बाबत कुछ नतीजे लेते हैं। और वे नतीजे भी अर्थ रखते हैं। वे नतीजे ऑब्जेक्टिव हैं। लेकिन प्रेमी प्रेम करने में सब्जेक्टिवली क्या अनुभव करता हैयह हमारे ऑब्जेक्टिव ऑब्जर्वेशन से छूट जाता हैइट इज़ बियांड दैट। और वह जो छूट जाता हैउसको जानने का ऑब्जेक्टिव कोई रास्ता नहीं है। क्योंकि ऑब्जेक्टिव हम जो भी जानेंगेवह सब्जेक्टिव फिर छूट जाएगाबच जाएगा।
तो लाइफ को वैज्ञानिक जान लेगा कि लाइफ क्या हैकैसे बनती हैकैसे आती हैकिन-किन तत्वों से मिल कर प्रकट होती है। लेकिन लिविंग होनाडेड होना और लिविंग होना...
यह तकिया पड़ा है। समझ लें कि अगर डेड हैऔर यह तकिया अगर लिविंग हो जाएतो डेड होने और लिविंग होने के बीच में तकिया क्या अनुभव करता हैवह जो उसका इनर एक्सपीरिएंस है लिविंग होने का वह क्या हैवह हम बाहर से ऑब्जर्व नहीं कर पाते हैं। न उसका कोई उपाय हैन हो सकता है। क्योंकि सब्जेक्टिविटी को ऑब्जेक्टिवली नहीं जाना जा सकता। वह कंट्राडिक्शन इन टर्म्स है।
और इसलिए रिलीजन का...रिलीजन का कहना यह नहीं हैरिलीजन का मतलब भी यह नहीं है कि विज्ञान जीवन को नहीं जान सकेगा। विज्ञान जीवन को जानेगा। लेकिन फिर भी वह जानना वह जानना नहीं है जो धर्म कहता है आत्म-साक्षात्कार। वे दोनों अलग बातें हैं।
बट दिस सब्जेक्टिविटी आल्सो कैन बी ऑब्जर्व्ड!

ऑब्जेक्टिवली ही सब्जेक्टिविटी को अध्ययन करेंगे न! विज्ञान इतना करेगा। यह हो रहा हैसाइकोलॉजी यह कर रही है।

अध्ययन तो सब्जेक्टिविटी का ही होगा न!

नहीं समझे आप। सब्जेक्टिवली! ये दोनों बुनियादी बातों में फर्क हो गया। डीप साइकोलॉजी जो कर रही हैवह यही कर रही है,सब्जेक्टिविटी का ऑब्जेक्टिवली अध्ययन कर रही है। लेकिन दैट स्टडी टू इज़ नॉट सब्जेक्टिवइट इज़ ऑफ दि सब्जेक्टिव एंड ऑब्जेक्टिवली। बट टु अंडरस्टैंड सब्जेक्टिविटी एज ए सब्जेक्ट रिमेंस बियांड साइंस।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मेरा किसी से प्रेम का अनुभव एक बात हैऔर मेरे प्रेम का अध्ययन आप सब मिल कर करेंगेयह बिलकुल दूसरी बात है। प्रेम का दो तरह से अध्ययन किया जा सकता है। एक ऑब्जेक्टिवली--कि प्रेम का फिनामिना क्या हैक्या होता है प्रेम में?फिजियोलॉजिकली क्या होता हैमेंटली क्या होता हैकेमिकली क्या होता हैकिसके लिएयह सवाल नहीं है। प्रेम को दो तरह से अध्ययन कर सकते हैं। ऑब्जेक्टिवली अध्ययन जो हैवह प्रेम की साइंटिफिक स्टडी होगी। लेकिन प्रेम साइंटिफिक स्टडी पर समाप्त नहीं होताशेष रह जाता है। और वह जो कुछ शेष रह जाता हैवह जो सब्जेक्टिव फीलिंग है प्रेम कीवह पकड़ में नहीं आती। और उसको मेडिटेटिवली ही जाना जा सकता हैनहीं तो नहीं जाना जा सकता।
यानी मैं जो कह रहा हूंवह यह कि हमारी साइंस की कितनी ही प्रोग्रेस होऐसा नहीं हो जाता है कि कोई चीज छूट नहीं जाती पीछेकुछ चीज बाकी नहीं रह जाती।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

जो दूसरे के लिए मिलेवही करने योग्य हैऔर अपने लिए मिलेवह करने योग्य नहीं हैअगर यही क्राइटेरियन है कि जो दूसरे के लिए मिले वही करने योग्य है और अपने लिए मिले वह करने योग्य नहीं हैतब तो बात अलग है। तब तो कुछ नहीं मिला। और अगर अपने लिए मिला वह भी करने योग्य है...

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

जब भी हम धार्मिक व्यक्ति के वक्तव्यों को ऑब्जेक्टिवली पूछने लगेंगेतो हम करीब-करीब ऐसी भूल कर रहे हैं कि हम दो ऐसी लैंग्वेजेज को मिक्सअप कर रहे हैंजिनका मिक्सअप होना बुनियादी रूप से गलत है--अभी।
जैसे मैं कहूं: एक आदमी कहीं से संगीत सुन कर आया और उसने हमें आकर कहा कि मैंने बहुत अदभुत संगीत सुना। हम उससे पूछते हैंउस संगीत की सुगंध क्या थीवह आदमी कहता हैआप क्या बात कर रहे हैं!
मैंने कभी संगीत नहीं सुनालेकिन फूल मैंने सूंघे हैं और बगीचे का आनंद लिया है। और वह आदमी कहता है कि बहुत आनंद आयासंगीत मैंने सुना। मैं उससे पूछता हूंसंगीत की सुगंध क्या थीवह आदमी कहता हैसुगंधआप बड़ी इररेलेवेंट बात पूछते हैं! मैं उससे कहता हूंथोड़ा सा संगीत तुम ले नहीं आएजरा मैं देख लूं। वह आदमी कहेआप पागल हो गए हैं! संगीत मैं कैसे ला सकता थासंगीत कोई लाने की बात नहीं। तो मैं उससे कहूं कि जिसमें न कोई सुगंध हैन जिसमें कोई स्वाद है,न जिसे लाया ले जाया जा सकता हैउसके होने का मतलब भी क्या है?
मैं उससे कह सकता हूं। और मैं एकदम गलत भी नहीं हूं। लेकिन मेरा जो यह सारा कहना हैएक अर्थ में इररेलेवेंट है। इररेलेवेंट इस अर्थ  में है कि मेरी इन सब बातों के अतिरिक्त भी संगीत हो सकता है और उसके होने का अर्थ हो सकता है।
महावीर को क्या मिला और क्या नहीं मिलाजब हम पूछने लगते हैंतो हम उस टर्मिनालॉजी में उत्तर चाहते हैं जो हम जानते हैं। जैसे कि आइंस्टीन को रिलेटिविटी की थ्योरी मिलीतो वह रिलेटिविटी की थ्योरी क्या हैहम वैसे ही पूछ रहे हैं जैसे आइंस्टीन ने जो एक्सपेरिमेंट कियाउसको जो मिलातो वह क्या हैतो वह किताब लिखी गई है। तो महावीर को जो केवल-ज्ञान मिला वह क्या है?
केवल-ज्ञान के बाबत जो भी कहा जाएगा...केवल-ज्ञान तो एक सब्जेक्टिव अनुभूति हैऔर जो कहा जाएगा वह ऑब्जेक्टिव एक्सप्रेशन है।

आई  वुड  सेकहा ही नहीं जा सकता। और कहा जा ही नहीं सकता है। उसका एक्सप्रेशन ही नहीं हो सकता। दैट इज़ योर ज्ञानदैट इज़ अवर ज्ञानदैट इज़ व्हाट वी विल अचीव आफ्टर मेडिटेशन।

ठीक है नयह तो आपको पता है फिर!

एनी ऑफ माई वर्ड्स रिमेन सब्जेक्ट टु करेक्शन।

न। करेक्शन का नहीं। यह पता है हमें। और जरूर कहा गया है। यह भी कहा जाना है। अगर कोई केवल-ज्ञान के बाबत यह कहे कि उसे नहीं कहा जा सकताही हैज सेड समथिंग। और बड़ी मीनिंगफुल बात कही उसनेकोई गैर-मीनिंगफुल बात नहीं कही। विट्गिंस्टीन ने एक सेंटेंस लिखा हैआप देखे होंगेविट्गिंस्टीन की कोई...तो टैक्टेटस में वह एक सेंटेंस लिखता है: दैट व्हिच कैन नॉट बी सेडमस्ट नॉट बी सेड। लेकिन वह यह नहीं कहता कि दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड इज़ नॉट। और न वह यह कहता है कि दैट व्हिच कैन नॉट बी सेडमस्ट नॉट बी सेडइज़ नॉट ए सेइंग अबाउट इट।
मेरा मतलब आप समझ रहे हैं नजब हम यह कहते हैंअगर हम किसी चीज के बाबत कहते हैं कि वह नहीं कही जा सकती,तो हमने उसके बाबत कुछ कहा। और यह कहना बहुत साधारण नहीं है। इसने कुछ इंडीकेट कियाइसने कुछ बात कहीइसने कुछ इशारा भी किया। अगर हम यह कहते हैं कि केवल-ज्ञान एक अनुभूति हैतो हमने कुछ कहा। अगर हम यह कहते हैं कि वह अनुभूति ऐसी है जो जानी ही जा सकती हैकही नहीं जा सकतीतो भी हमने कहा।
यह बड़ा मजा है! सारे धर्मग्रंथजिस संबंध में कहते हैं कुछ नहीं कहा जा सकताउसी के संबंध में लिखे गए हैं।
लाओत्से अपनी किताब शुरू करता है--ताओ तेह किंग--उसमें वह लिखता है कि मैं वह कहूंगाजो नहीं कहा जा सकता। मैं वह कहूंगा इस किताब मेंजो नहीं कहा जा सकता। और इसलिए कहने से वह अनिवार्यरूपेण गलत हो जाएगाउसके लिए क्षमा करना। कहता है--सारी बात कहता है--और यह क्षमायाचना के साथ।
मेरा कहना है कि यह क्षमायाचना भी कुछ कह रही है। वह जो एक तकलीफ है कहे जाने कीवह उसके बाबत कुछ कह रही है। कहे जाने की इच्छा हैकहा जाना चाहिएकिसी को बताना चाहिएजो जाना है वह कहा जाना चाहिएउसका भी तीव्र प्रवाह है। नहीं कहा जा सकताइसका भी बोध है। और इन दोनों के बीच में जो चेष्टा चल रही हैवह भी कुछ कह रही है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मेरा कहना यही है कि अगर नहीं जा सकते हैं मेडिटेशन करनेतो मेडिटेशन के संबंध में हां और न के कोई जवाब मत पकड़ें। अगर नहीं जा सकते हैंतो बकवास छोड़ें। छोड़ें उस बात कोवह अपना नहीं है काम।
अगर मैं म्युजिक की दुनिया में नहीं जा सकता हूंतो फिजूल मैं बातें न करूं। ठीक हैबात खतम हो गई। मेरी वह दुनिया नहीं हैमुझे नहीं जाना है या जाने की सुविधा नहीं है। फिर मैं हां और न के जवाब न पकडूं। फिर दोनों जवाब खतरनाक हैं। या तो मैं यह कहूं कि केवल-ज्ञान है ही नहीं कुछ। यह भी गलत बात है। या फिर मैं केवल-ज्ञान के संबंध में चुप रहूं।
बट यू कांट से देअर इज़ नथिंग।

नहीं-नहींमेरा कहना यह हैजो नहीं जा सकताजैसे आप अगर केमिस्ट्री के बाबत नहीं गए हैं कुछ अध्ययन करनेतो आप चुप तो रहते हैं कम से कम। आप कुछ कहते तो नहीं हैं। अगर आप गणित के बाबत नहीं गए हैं और हायर मैथमेटिक्स से आपका कुछ संबंध नहीं हैतो आप कम से कम चुप तो हैं। इतनी ईमानदारी भी धर्म के संबंध में नहीं बरती जा रही है।

पर अभी वह चुप रहने का जमाना भी नहीं है। जो सुना हैजो समझ में नहीं आता है उसको मान लेना भी और उसको...

यह कौन कहता हैमैं कहां कहता हूं!

वह तो अनुभव की बात है!

मैं तो दिन-रात यही कह रहा हूंमैं तो दिन-रात यही कह रहा हूं।

समझो कि मैं नहीं जा रहा हूं...

तो चुप रह जाइए आपहां-न मत करिए।

चुप रहने की अब जरूरत नहीं है।

तो क्या करिएगाकुछ न कुछ कहिएगा मेडिटेशन के बाबतबिना जाएमेरा कहना यह है कि अगर मेडिटेशन में नहीं जा सकते हैं तो सीखिए।

आज समझो कि मैं  ड्राइविंग नहीं जानता...

इतना तय है कि ड्राइविंग सीखिएऔर फिर गाड़ी ले लीजिए। तो मेडिटेशन सीखिए और फिर चल पड़िए।

वह तो मैं तभी सीखूं व्हेन आई सी दैट एवरीबडी इज़ ड्राइविंग दि कार एंड इट इज़ सेफर।
समझा मैंसमझा मैं। तो आप देखिए महावीर कोबुद्ध को। खोज करिए कि ये सेफर हैं या नहीं।

मेरा कहना क्या है कि एक भी एग्जाम्पल बताइए कि मेडिटेशन से उसको यह मिला और उसने बताया कि यह हो सकता है...

क्यों परेशान होते हैंएग्जाम्पल तो मैं हूं। पर आप क्यों परेशान होते हैंऔर मैं दूसरा एग्जाम्पल कहां से लाऊंऔर उसका क्या मतलब हैउससे क्या प्रयोजन है?

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

ऐसी स्थिति में जहां कि सब अर्थहीनता हो जाती हैमन बहुत करता है कि कहीं भी पकड़ लोकहीं भी गुजर जाओबाहर निकल जाओपीछे लौट जाओआगे चले जाओ। नहीं जाना है। जम कर ही बैठ जाना है संदेह पर। तो एक ट्रांसेंडेंस आती है,जो अपने से आती हैउसको तो लाने का सवाल ही नहीं है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

तो कुछ है जो इनडुबिटेबल है आपके लिए। और वह आपको ट्रांसेंड नहीं करने देगा।
आखिर ऐसी कोई भी चीज नहीं है जो डाउट के योग्य न हो। ऐसी कोई धारणा ही नहीं है जो डाउट के योग्य न हो। इनडुबिटेबल जैसा कुछ हो ही नहीं सकता। सेल्फ इविडेंट भी कुछ नहीं है। और जैसे ही आपने कुछ मानाकि कहीं न कहीं आपका मीनिंग रूट पकड़े हुए है और कहीं न कहीं आप आस्थावान हैं। आस्था क्या हैयह बहुत सवाल नहीं है।
और मेरा मानना है कि अगर आस्था थोड़ी भी हैतो डाउट के पार आप कभी नहीं हो पाएंगे। क्योंकि वह जो आस्था हैडाउट को कभी भी टोटल नहीं होने देगी। डाउट को टोटल नहीं होने देगी। आपके डाउट में एक कमी रह गई। और वह कमी छोटी कमी नहीं है। यानी एक अर्थ में आप डाउट की परेशानी से गुजर ही नहीं रहे हैं। कुछ हैजहां डाउट नहीं है। और आप निश्चिंत वहां खड़े हुए हैं। डाउट से पूरी तरह गुजरनाकि एक भी ऐसी बात न रह गई जो संदेह के परे है। संदेह भी न रह गया संदेह के परे।
आज इतना ही।

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