रविवार, 1 अक्टूबर 2017

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-01

दिनांक 07 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात कहूंगा।
एक बहुत पुराना गांव था। और उस गांव से भी ज्यादा पुराना एक चर्च था उस गांव में। उस चर्च की सारी दीवालें गिरने के करीब हो गई थीं। न तो कोई उपासक उस चर्च के भीतर प्रार्थना करने जाता थान कोई कभी उस चर्च के भीतर...चर्च के भीतर जाना तो दूरउसके पास से निकलने में भी लोग डरते थे। वह चर्च कभी भी गिर सकता था। हवाएं चलती थींतो गांव के लोग सोचते थेआज चर्च गिर जाएगा। आकाश में बादल गरजते थेतो गांव के लोग बाहर निकल कर देखते थेचर्च गिर तो नहीं गया! बिजली चमकती थीतो डर होता थाचर्च गिर जाएगा। ऐसे चर्च में कौन प्रार्थना करने जाताचर्च बिलकुल मरा हुआ थालेकिन फिर भी खड़ा हुआ था।

कुछ मरी हुई चीजें भी खड़ी रह जाती हैं। और जब मरी हुई चीजें खड़ी रह जाती हैंतो अत्यंत खतरनाक हो जाती हैं। मरे का मर जाना ही जरूरी है। मरे का खड़ा रहना बहुत खतरनाक है।
अगर हम सारे मुर्दों को खड़ा कर लें और कब्रों में न गड़ाएं और मरघटों में न जलाएंतो दुनिया में जीने वाले लोगों की जो कठिनाई होगीउसकी कल्पना करनी मुश्किल है। अगर सारे मुर्दे जो इस जमीन पर कभी रहे हैं और मर गएअगर जगह-जगह खड़े कर दिए जाएंतो जिंदा आदमी उनको देख कर ही पागल हो जाएंगे। उनको गड़ा देना और जला देना जरूरी है।
मरे का मर जाना ही जरूरी हैलेकिन वह चर्च मर गया था और खड़ा था। फिर चर्च के संरक्षककमेटी मिलीट्रस्टी मिले और उन्होंने कहाहम क्या करें कि लोग चर्च में आ सकेंक्योंकि ट्रस्टियों का हित इसी में था कि उस मरे चर्च में भी लोग आते ही रहें। उस चर्च से ही उनकी आजीविका चलती थी। चर्च का पादरी घर-घर जाकर समझाता था कि चर्च की तरफ आओ। हालांकि चर्च का पादरी भी चर्च से दूर-दूर ही रहता थाक्योंकि वह कभी भी गिर सकता था। अंततः चर्च की कमेटी मिली। कमेटी भी चर्च के भीतर नहीं मिलीवह भी चर्च से दूर उन्होंने बैठक कीऔर उन्होंने चार प्रस्ताव स्वीकार किए।
उन्होंने पहला प्रस्ताव स्वीकार किया कि हम बहुत दुख से यह स्वीकार करते हैं कि पुराने चर्च को गिरा दिया जाना चाहिए। और तत्काल दूसरा प्रस्ताव स्वीकार करते हैं कि पुराने चर्च की जगह हम एक नया चर्च बनाएं। और उन्होंने तीसरा प्रस्ताव यह भी किया कि पुराने चर्च की ईंटें ही नये चर्च में लगाएंगे। पुराने चर्च के द्वार-दरवाजे ही नये चर्च में लगाएंगे। पुराने चर्च की नींव पर ही नये चर्च को उठाएंगे। पुराना चर्च जैसा ही नया चर्च होगा। यह भी उन्होंने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।
तीन प्रस्ताव पास किए। एककि पुराने चर्च को गिरा देना है। दोकि एक नया चर्च बनाना है। और तीसराकि पुराने चर्च की बुनियाद पर ही नये चर्च की नींव रखनी है। पुराने चर्च की ईंटों का ही नये चर्च में उपयोग करना है। पुराने द्वार-दरवाजे ही लगाने हैं। नये चर्च में कोई नई चीज नहीं लगानी हैसब पुराना लगाना है।
यहां तक भी गनीमत थी। उन्होंने चौथा एक प्रस्ताव और स्वीकार कियाकि जब तक नया चर्च न बन जाएतब तक पुराने को गिराना नहीं है।
वह चर्च अब भी खड़ा होगा और नया चर्च कभी नहीं बनेगा।
इस देश की हालत भी ऐसी ही है। इस देश का मंदिर बहुत पुराना हो गया है। वह इतना पुराना हो गया है कि उसका पीछे का पूरा इतिहास खोजना भी बहुत मुश्किल है। उसकी सब दीवालें सड़ गई हैं। उसकी सब बुनियादें खराब हो गई हैं। उसका सब कुछ अतीत में नष्ट-भ्रष्टजरा-जीर्ण हो गया है। और हम उसमें ही रहे चले जा रहे हैं! और इस देश के विचारशील लोग समझाते हैं कि हमारा बड़ा सौभाग्य हैक्योंकि हमारे पास सबसे ज्यादा पुराना समाज है।
यह दुर्भाग्य हैसौभाग्य नहीं। समाज नया होना चाहिए निरंतर। और जो समाज नये होने की क्षमता खो देता हैउस समाज से रौनक भी चली जाती हैखुशी भी चली जाती हैआनंद भी चला जाता है--जीवन का सब रस चला जाता है।
हिंदुस्तान की पूरी सामाजिक व्यवस्थासारा ढांचा इतना पुराना हो गया है कि अब उसके भीतर न तो जीना संभव हैन मरना संभव है। उसके भीतर सिर्फ दुखी होनापीड़ित होना और परेशान होना संभव है। और इसीलिए हम इतने आदी हो गए हैं दुख के कि दुख को मिटाने की कोई कल्पना भी हम में पैदा नहीं होती। न तो कोई देश इतनी गरीबी झेल सकता है जितनी हम झेलते हैंन कोई देश इतनी बीमारी झेल सकता है जितनी हम झेलते हैंन कोई देश इतनी बेईमानी झेल सकता है जितनी हम झेलते हैं। और झेलने का कुल एक कारण है कि हम इतने हजारों वर्षों से यह सब झेल रहे हैं कि हम धीरे-धीरे उसके आदी हो गए हैं। और हमें यह खयाल ही नहीं आता कि इसमें कुछ गलत हो रहा है। यही होता रहा हैयही जीवन है--यह हमारी धारणा हो गई है।
मैंने सुना हैएक गांव में एक मछुआ मछलियां बेचने आया था। वह मछलियां बेच कर जब लौटने लगातो सोचा कि राजधानी हैदेख लूं घूम कर। वह गांव की बड़ी-बड़ी सड़कों पर गया। वह उस सड़क पर भी गया जहां सुगंधियों की दुकानें थींपरफ्यूम्स की दुकानें थीं। लेकिन मछुआ एक ही सुगंध जानता थामछली कीऔर कोई सुगंध नहीं जानता था। उसे जब वहां सुगंधियों की दुकानों से सुगंधियां उड़ती हुई हवा में आने लगींतो उसने सोचाइस गांव के लोग बड़े पागल हैं! ये दुर्गंध की दुकानें किसलिए खोल रखी हैंउसने अपना रूमाल अपनी नाक पर लगा लिया।
लेकिन जैसे-जैसे भीतर घुसाऔर बड़ी दुकानें थीं। वह भागने लगा। और भागा तो और भीतर और बड़ी दुकानें थींवह दुनिया का सबसे बड़ा सुगंधियों का बाजार थासुगंध के कारण वह बेहोश होकर गिर पड़ा।
सुना है कभीकोई सुगंध के कारण बेहोश होकर गिर पड़ेलेकिन वह एक सुगंध जानता था--मछली की। और बाकी सब दुर्गंध थीं। वह बेहोश होकर गिर पड़ातो बड़ी सुगंधियों के दुकानदार अपनी तिजोरियां खोल कर वे बहुमूल्य सुगंधियां उसे सुंघाने लाए जिनसे आदमी होश में आ जाता है। लेकिन वे उसे सुगंध सुंघाने लगेवह बेहोशी में हाथ-पैर तड़फड़ाने लगाहाथ-पैर पटकने लगा। भीड़ इकट्ठी हो गई। सुगंधि के दुकानदार बड़े हैरान हुए कि इन सुगंधियों से तो कोई भी बेहोश आदमी होश में आ जाए,यह हो क्या रहा है! उन्हें क्या पता कि जिसे वे सुगंध समझते हैंउसे वह बेहोश आदमी दुर्गंध समझता है! क्योंकि वह बेहोश आदमी दुर्गंध को सुगंध समझने का आदी हो चुका है।
इस भीड़ में एक दूसरे मछुए ने यह हालत देखीउसने कहाठहरो! तुम जान ले लोगे। सेवकोतुम रुक जाओ।
सेवक अक्सर जान लेने वाले सिद्ध होते हैं! अगर उन्हें पता न हो कि बीमारी क्या हैतो सेवक जान लेने वाले सिद्ध होते हैं। और इस देश में तो हम जानते हैं अच्छी तरह से कि सेवक किस तरह से जान ले रहे हैं। देश की बीमारी का उन्हें कोई पता नहीं है।
उस मछुए ने कहादूर हटो! वह मर जाएगा आदमी। जहां तक मैं समझता हूंतुम ही उसको बेहोश करने के कारण हो। उसने सुगंधियों को दूर फिंकवा दिया। और उस गिरे हुए मछुए की टोकरी पड़ी थीगंदा कपड़ा पड़ा थाहाथ से गिर गया थाजिसमें वह मछलियां लाया थाउस दूसरे मछुए ने उस पर पानी छिड़का और वह गंदी टोकरी उसके मुंह पर रख दी। उस बेहोश मछुए ने गहरी श्वास ली और कहादिस इज़ रियल परफ्यूम! यह है असली सुगंध! ये दुष्ट मेरी जान लिए लेते थे। ये कहां-कहां की दुर्गंधें इकट्ठी किए हुए हैं!
अगर कोई आदमी दुर्गंध में रहा होतो दुर्गंध का आदी हो जाता है।
यह देश बीमारी का आदी हो गया हैगरीबी का आदी हो गया हैबेईमानी का आदी हो गया हैसब चीजों का आदी हो गया है। और यह आदत इतनी पुरानी हो गई है कि इसे हम खून में लेकर पैदा होते हैं। सड़क पर चलते वक्त अगर कोई भीख मांगता हमें दिखाई पड़ता हैतो हमें कोई बेचैनी नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि दो पैसे दे दो। लेकिन यह कोई बेचैनी नहीं है। यह सिर्फ बेचैनी से बचने की तरकीब है। यह दो पैसे देकर जैसे हम झंझट से छुटकारा पा गए! लेकिन गांव में कोई भीख मांगता हैयह पूरे गांव का अपराध हैदेश में कोई भूखा मरता हैयह पूरे देश का अपराध हैयह हमारे खयाल में नहीं आता। यह हमारे खयाल में ही नहीं आता कि बच्चे पैदा होते हैं और मर जाते हैंहमारी उम्र बहुत कमहमारा शरीर कृश,हमारा सारा जीवन बीमारी से भरा हुआ।
हम कहते हैंयह सब भाग्य है! हमने हर चीज की व्याख्या खोज ली है। इसलिए नहीं कि हम बदल दें जिंदगी को। हमने हर चीज की ऐसी व्याख्या खोजी है कि जिंदगी जैसी है वैसी ही सही साबित हो जाए और हमें कोई तकलीफ न मालूम पड़े।
अगर कोई गरीब हैतो हम कहते हैंपिछले जन्मों के पाप के कारण वह गरीब है। बात खतम हो गई। एक्सप्लेनेशन मिल गयाव्याख्या मिल गई। अब कुछ करने की जरूरत नहीं। क्योंकि पिछले जन्म के साथ कुछ किया भी तो नहीं जा सकता! जो हो गया है वह हो गया है। और हम कहते हैं कि वह गरीब है तो अपने पापों के कारण गरीब है। जब कि सच्चाई उलटी है,अगर कोई गरीब है तो हम सबके पापों के कारण गरीब है। लेकिन हम एक व्यक्ति पर थोप करएक व्याख्या लेकर बैठ गए हैं। और ये व्याख्याएं इतनी पुरानी हो गई हैं कि जब तक हमें पुराने पर शक न हो जाएतब तक इन व्याख्याओं से मुक्ति नहीं हो सकती।
एक फकीर एक मस्जिद के नीचे से गुजर रहा था। मस्जिद के ऊपर अजान देने कोई चढ़ा होगावह गिर पड़ा। फकीर की गर्दन पर गिराफकीर की गर्दन टूट गई। उस आदमी को तो कोई चोट न पहुंचीक्योंकि फकीर की गर्दन पर वह सम्हल गया था। फकीर की गर्दन टूट गईवह अस्पताल में भर्ती हुआ। फकीर के शिष्यों को पता था कि वह फकीर हर चीज में से कुछ न कुछ रहस्य और राज खोज लेता है। उन्होंने सोचा कि अब हम जाकर पूछें कि क्या हालत हैइस गर्दन टूट जाने में कौन सा रहस्य है?
वे गए उस फकीर के पास। उस फकीर से पूछाइससे तुमने क्या सीखा?
उसने कहाइससे मैंने एक बात सीखी कि वह सिद्धांत गलत है कि जो गिरे उसी की गर्दन टूटे। गिरे कोई औरगर्दन किसी और की भी टूट सकती है। वह सिद्धांत गलत है। क्योंकि हम न गिरेन हमें गिरने से कोई मतलब थान हम मीनार पर चढ़े। चढ़ा कोई औरगिरा कोई औरवह तो बच गयागर्दन हमारी टूट गई!
जिंदगी एक अंतर्संबंध हैएक इंटर-रिलेशनशिप है। उसमें कोई गिरेकोई की गर्दन टूट सकती है। लेकिन इस मुल्क ने एक व्याख्या खोजी हुई है कि अगर तुम्हारी गर्दन टूटी हैतो तुम्हीं गिरे होओगे। और कभी गिरे होओगे पिछले जन्मों मेंइसलिए अब गर्दन टूटी है। अब उसका पता लगाना मुश्किल है कि किस पिछले जन्म में आप गिरे थे! गिरे थे भी या नहीं गिरे थे! पिछला जन्म था भी या नहीं था!
लेकिन उन सारी व्याख्याओं के आधार पर आपकी गरीबी को समझा दिया गया है। अब गरीबी को बदलने की कोई भी जरूरत न रही। अब गरीबी स्वीकार करनी पड़ेगीभिखमंगापन स्वीकार करना पड़ेगाबीमारी स्वीकार करनी पड़ेगी।
हमने एक जीवन-दर्शन विकसित किया हैजिसमें हम सब कुछ जैसा भी है--गंदाबेहूदाकुरूपरुग्णविक्षिप्त--सबको स्वीकार कर लेते हैं। और यह स्वीकृति इतनी पुरानी हो गई है कि हमें पता भी नहीं कि कब हमने यह स्वीकृति दी थी! यह बहुत लंबा समय बीत गयातब से हम स्वीकार करते चले आ रहे हैं। और जब तक हमें पुराने पर शक न हो जाएतब तक इस स्वीकृति से भी नहीं छूटा जा सकता। और जब तक ये स्वीकृति की जड़ें नहीं टूट जाती हैंतब तक एक नये समाज का जन्म भी असंभव है। और नये समाज का जन्म न होतो हम इसको ही समाज कहते रहेंगे--यह जो करीब-करीब एक पागलखाना हो गया है। करीब-करीब देश एक पागलखाना है।
मैंने सुना है कि जब हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटेतो हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सीमा पर एक पागलखाना था। और पागलखाने का भी सवाल उठा कि पागलखाना कहां जाएहिंदुस्तान में जाए कि पाकिस्तान में जाएऔर पागलखाने को लेने को कोई भी राजी नहीं था। किसी को फिक्र भी नहीं थी कि पागलखाना कहां जाए। तो पागलखाने के अधिकारियों ने सोचापागलों से ही पूछ लें कि तुम जाना कहां चाहते होतो उन पागलों से पूछा कि तुम्हें कहां जाना हैहालांकि तुम कहीं जाओगे नहींरहोगे यहीं! लेकिन फिर भी तुम हिंदुस्तान में जाना चाहते हो कि पाकिस्तान में?
उन पागलों ने कहाबड़ी अजीब बात है! हम तो समझते थे हम पागल ही अजीब बातें करते हैंआप भी अजीब बातें करते हैं! जब जाएंगे कहीं भी नहींरहेंगे यहींतो हिंदुस्तान या पाकिस्तान में जाने का सवाल कहां उठता हैआप भी बड़े मजे की बात करते हैं। रहेंगे यहींऔर फिर पूछते हैंजाना कहां है?
फिर भी उन लोगों ने कहातुम समझोगे नहींये जरा बहुत टेढ़ी राजनीति की बातें हैं। तुम तो साफ-साफ यह कहोतुम कहां जाना चाहते हो?
उन्होंने कहाहम कहीं नहीं जाना चाहतेहम यहीं अच्छे हैं।
उन्होंने कहायह सवाल ही नहीं हैरहोगे तुम यहीं।
उन पागलों ने कहाजब हम यहीं अच्छे हैंहम कहीं क्यों जाएं?
बड़ी मुश्किल हो गई। फिर सोचा कि पूछ लो कौन हिंदू हैकौन मुसलमान। जो हिंदू हो उसको हिंदुस्तान भेज दोजो मुसलमान हो उसको पाकिस्तान भेज दो। उनसे पूछातुममें हिंदू कौन हैमुसलमान कौन है?
उन्होंने कहाहमें कुछ पता नहींहम सिर्फ आदमी हैं। हिंदू-मुसलमानहमें तो इतना ही पता है कि हम सिर्फ आदमी हैं।
उन पागलों ने कहा कि हमें सिर्फ इतना पता है कि हम आदमी हैं। और पागलखाने के बाहर जो घूम रहे हैंउनसे पूछो। उनमें से कोई न कहेगा हम आदमी हैं। कोई कहेगाहम हिंदू हैंकोई कहेगाहम मुसलमान हैंकोई कहेगाहम ईसाई हैं। और अगर भगवान की दुनिया में कहीं कोई हिसाब होता होगातो उस दिन लिख लिया गया होगा कि इस पागलखाने में ऐसे आदमी रहते हैं जो पागल नहीं हैंऔर पागलखाने के बाहर ऐसे आदमी रहते हैं जो पागल हैं।
लेकिन कौन सुनता था उनकी! उन्होंने बहुत कहा कि हम सिर्फ आदमी हैं।
अधिकारियों ने कहाबंद करो यह बकवास! साफ-साफ बताओ कि तुम हिंदू हो कि मुसलमानहमें आदमी से कोई मतलब नहीं हैहम हिंदू-मुसलमान जानना चाहते हैं।
उन पागलों ने कहायह तो बड़ी मुश्किल हो गईहम कैसे पता लगाएंज्यादा से ज्यादा हम यह कह सकते हैं कि हम पागल हैं। अगर आप आदमी नहीं मानतेतो हम पागल हैं। मगर हिंदू-मुसलमानहमें कुछ पता नहीं है।
लेकिन अधिकारी न माने। उन्होंने फिर एक रास्ता खोजा--कि बीच से एक दीवाल डाल दीउस तरफ पड़ जाए कमरा जिसका वह पाकिस्तान में चला जाएइस तरफ पड़ जाए वह हिंदुस्तान में चला जाए।
पागल बंट गए। आधे पागल हिंदुस्तान में आ गएआधे पागल पाकिस्तान में चले गए। अब वे पागल दीवाल पर चढ़ कर एक-दूसरे को गालियां देते हैं। कुछ उनमें होशियार भी हैंसमझदार भी हैं। वे पूछते हैं कि बड़ी अजीब बात है! बड़ी अजीब बात है,हम वहीं के वहीं हैंसिर्फ बीच में एक दीवाल हो गईतुम हमारे दुश्मन हो गएहम तुम्हारे दुश्मन हो गए! और कल तक हम साथ थे और कोई किसी का दुश्मन नहीं था। यह क्या हो गया है?
लेकिन पागलों को कौन समझाए! क्योंकि जब समझाने वाले ही सब पागल होंतो फिर पागलों को समझाने के लिए कौन मिल सकता है?
यह देश सारे मसलों के संबंध में एक पागलखाना हो गया है! किसी चीज के संबंध में सूझ-बूझ का कोई सवाल नहीं है--किसी चीज के संबंध में! और क्यों नहीं हैउसके कुछ कारण हैं। सबसे बड़ा कारण मैं आपसे कहना चाहता हूंवह यह है कि हमने जब से यह मान लिया है कि सूझ-बूझ के ठेकेदार पहले हो चुकेअब हमको कोई सूझ-बूझ की जरूरत नहीं हैतब से हमने सूझ-बूझ को छुट्टी दे दी है। सब ऋषि-मुनिजो भी जानने योग्य थाजान गए और लिख गए। और सब सत्य जो जाने जा सकते थेवे हमारी गीता मेंहमारे वेद मेंहमारे उपनिषदों में लिखे हैं। जब से हमने यह माना कि हमारी किताबें पूर्ण हो गईं;जब से हमने यह माना कि हमारे ज्ञानी सर्वज्ञ हैंजब से हमने यह माना कि जानने योग्य सब जाना जा चुका है--उसी दिन से हिंदुस्तान ने अपनी प्रतिभा नष्ट कर दी। उसी दिन से हिंदुस्तान में बुद्धि का विकास रुक गया।
जो बेटे अपने बाप पर शक नहीं करतेवे बेटे नालायक हैंवे कभी आगे नहीं बढ़ते। जो बेटे अपने बाप को पकड़ कर अंधे की तरह खड़े हो जाते हैंवे वहीं ठहर जाते हैं जहां बाप ठहर गया। निश्चित ही बाप से आगे जाना जरूरी हैनहीं तो कोई भी समाज रुक जाता है।
हिंदुस्तान रुक गया है। हम कंटेम्प्रेरी नहीं हैंहम दुनिया के समसामयिक नहीं हैं। यह भूल कर मत कहना कि हम बीसवीं सदी में रहते हैं। हिंदुस्तान में मुश्किल से एकाधदो-चार आदमी मिलेंगेजो बीसवीं सदी में रहते हैं। हिंदुस्तान में कोई ईसा से दो हजार साल पहले रहता हैकोई तीन हजार साल पहले रहता है। हिंदुस्तान में कई सदियों के लोग एक साथ रह रहे हैं। हिंदुस्तान का मस्तिष्क पुराना हो गया है। और पुराना हो जाने का बुनियादी कारण यह है कि हमने यह मान लिया कि अब मस्तिष्क के विकास की कोई जरूरत नहीं हैविकास हो चुका है। हमने यह स्वीकार कर लिया कि सब जो जाना जा सकता था,वह जाना जा चुका है। हमारी किताबों में सब लिखा है। और इसलिए कोई मुसीबत आएतो अपनी पुरानी किताब खोलो और उसमें से समाधान निकालो।
समस्याएं नई हैं और समाधान पुराने हैंदेश पागल न होगा तो और क्या होगा! समस्याएं जब नई होंतो नये समाधान चाहिए। और समस्याएं रोज नई हो जाती हैंपुरानी समस्या कभी लौट कर आती ही नहीं। समस्या रोज नई है। और हमहम पीछे खोजते हैं कि पुराना समाधान क्या हैऔर तब एक मुसीबत खड़ी हो जाती है।
मैंने एक छोटी सी कहानी सुनी है। आपने भी सुनी होगीलेकिन आधी सुनी होगीक्योंकि कुछ बेईमान लोग सब अच्छे सत्यों को आधा करके बांट-बांट कर बता रहे हैं! और आधा सत्य जो है वह असत्य से भी खतरनाक होता है। असत्य तो दिखाई पड़ता है कि असत्य हैआधे सत्य में भ्रम होता है कि सत्य है। और आधा सत्य जैसा कोई सत्य हो ही नहीं सकता। सत्य या तो होता है तो पूरा या नहीं होता।
एक आधी कहानी आपने भी सुनी होगीस्कूल में पढ़ी होगीबचपन से ही पढ़ाते हैं। एक सौदागर है। टोपियां बेचता है। वह टोपियां बेचने गया है एक मेले में। एक वृक्ष के नीचे रुका हैथक गया हैसो गया है। बंदर उतरेउसकी टोपियां लगा कर ऊपर चढ़ गए। सौदागर की आंख खुलीवह हंसा। उसने सोचा कि अच्छाबंदर बहुत अकड़ रहे हैं टोपियां लगा कर! बंदर हमेशा टोपियां लगा कर अकड़ते हैं। और टोपियां अगर खादी की होंतब तो फिर कहना ही क्या! फिर तो अकड़ बहुत बढ़ जाती है। एक तो बंदरऔर फिर खादी की टोपी! फिर बहुत मुश्किल हो जाती है। लेकिन सौदागर ने कहा कि बंदर ही तो ठहरेइनसे टोपी छीनने में कोई कठिनाई हैउसने अपनी टोपी निकाल कर फेंक दी। बंदरों ने भी अपनी टोपियां निकाल कर फेंक दीं। सौदागर ने टोपियां इकट्ठी कीं और घर चला गया। इतनी कहानी सुनी होगी। यह आधी कहानी है।
सौदागर का बेटा बड़ा हुआ और सौदागर के बेटे ने भी टोपियां बेचनी शुरू कीं। क्योंकि जो बाप करता हैवही बेटे को करना चाहिएऐसा नियम है। और जब बाप ने टोपियां बेचींतो बेटा भी टोपी बेचेगा। बेटा भी उसी झाड़ के नीचे रुका जब मेले में बेचने गयाजहां बाप रुका था। क्योंकि नियम यह है: बाप जहां रुकेवहीं बेटे को रुकना चाहिए। उसी जगह उसने टोपियों की टोकरी रखीजहां बाप ने रखी थी। ऊपर बंदर थेवही बंदर तो नहीं थेउनके बेटे थेवे बैठे थे। सौदागर का बेटा सो गया। बंदर उतरे और टोपियां लगा कर ऊपर चढ़ गए।
बंदर हमेशा तलाश में रहते हैं कि कहीं टोपी मिल जाएतो लगाएं और चढ़ जाएं। बंदर इसी तलाश में रहते हैं कि कहीं टोपी भर मिल जाएऔर लगा लें और चढ़ जाएं और बैठ जाएं ऊपर वृक्ष के। वह वृक्ष चाहे दिल्ली का हो और चाहे अहमदाबाद का होइससे कोई फर्क नहीं। छोटे वृक्ष हैंबड़े वृक्ष हैंकई तरह के वृक्ष हैं। अहमदाबाद के वृक्ष हैंदिल्ली के वृक्ष हैं। मगर टोपी मिल जाए तो कोई चढ़ जाए। वे बंदर चढ़ गए टोपी लगा कर।
सौदागर का बेटा उठाउसने कहाअरे! पर उसे खयाल आया कि बाप ने कहानी बताई थी। और बाप ने कहा थाटोपी फेंक देना। उसने कहाठीक है बंदरोतुम मत समझोहमको पता है रास्ता तुमसे टोपी छीनने का। उसने टोपी निकाल कर फेंक दी। लेकिन एक चमत्कार हुआकोई बंदर ने टोपी न फेंकीएक बंदर पर टोपी नहीं थीवह भी उतरा और नीचे की टोपी ले गया।
यह कहानी पूरी हुई। वह टोपी भी जो थी सौदागर के बेटे कीवह भी बंदर ले गया। बंदर अब तक सीख चुके थेलेकिन वह सौदागर का बेटा अब तक नहीं सीखा। बंदर सीख गए थेपुरानी तरकीब समझ गए थे। और उन्होंने कहाअब धोखा नहीं दे सकते! लेकिन सौदागर का बेटा सोच रहा थापुराना समाधान काम आ जाएगा।
बंदरों के साथ भी पुराना समाधान काम नहीं आ सकता हैतो जिंदगी के साथ तो कैसे आएगाजिंदगी रोज बदल जाती है। वही जिंदगी नहीं है जो कल थीवही जिंदगी नहीं है जो परसों थीजिंदगी रोज बदल जाती है। जो हम आज तय करेंगेवह कल बेमानी हो जाएगा।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि समाधान चाहिए। सवाल यह है कि समाधान करने वाला चित्त चाहिए। बंधे हुए समाधान का सवाल नहीं है। एक ऐसा चित्त चाहिए मुल्क के पास कि उसके सामने कैसी भी समस्या होवह उसको एनकाउंटर कर सके,मुकाबला कर सके और समाधान खोज सके।
हमारी क्या आदत हैहम कहते हैंसमाधान रेडीमेड तैयार रखो। और रेडीमेड समाधान जो आदमी सीख जाता हैउसको हम ज्ञानी कहते हैं।
उससे ज्यादा अज्ञानी खोजना मुश्किल हैजिसके पास रेडीमेड समाधान हो। जो कहता है कि ऐसा हुआ थातो फौरन उठा कर देखो कि गांधी जी ने इसके उत्तर में क्या किया थाबस वही हम करेंगे! गांधी जी ने जो कियावह उनकासमस्या के सामने उनका मुकाबला था। कृष्ण ने क्या कियाउठा कर देखो जल्दी से गीता मेंहम भी वही करेंगे! कृष्ण ने जो कियावह उनकी समस्या का मुकाबला था। लेकिन तुम्हारी समस्या का मुकाबला तुम करो। और जो कौम गुरुओं से बंध जाती हैवादों से बंध जाती हैसिद्धांतों से बंध जाती हैशास्त्रों से बंध जाती हैउसकी जिद यह होती है कि हम न सोचेंगे। सोचने का काम तो कोई और कर चुके हैं। हम तो बस रेडीमेड हमारे पास जवाब तैयार हैंहम उन्हीं को दोहरा देंगे और उन्हीं से हल कर लेंगे।
हिंदुस्तान इसलिए रोज सड़ता जाता है। बीस साल आजाद हुए मुल्क को हुएबीस-बाईस सालों में मुल्क ने जरा भी प्रतिभा नहीं दिखलाईटैलेंट नहीं दिखलाईजरा भी जीनियस का कोई पता नहीं चला। ऐसा नहीं चला कि इन बाईस सालों में हमने जिंदगी को जीने का और मुकाबला करने का कोई भी प्रतिभापूर्ण रास्ता खोजा हो। हम सिर्फ बंधी-बंधाई लीकों को दोहरा रहे हैं। हम एकदम उधार कौम हैंजिसके पास अपना कोई दिमाग ही नहीं। चाहे उधारी पीछे से आती होऔर चाहे अमेरिका से आएचाहे रूस से आएचाहे चीन से आएइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारा दिमाग उधार है।
हमारा दिमाग उधार हैहिंदुस्तान का कम्युनिस्ट तक भी उधार दिमाग का होता है! वह भी खोजेगा फौरन माक्र्स की किताब खोल कर! वह जैसा कृष्ण की किताब का खोलने वाला हैगांधी की किताब खोलने वाला हैवैसा ही वह माक्र्स की किताब खोलने वाला है। लेकिन वह जो दिमाग हैवह दिमाग यह है कि कहीं समाधान तैयार हैहम उसे निकाल लें। लेकिन हम समाधान को पैदा करेंहम समस्या से जूझेंहम समस्या को जीएं और पहचानें और खोजें कि क्या समाधान हो सकता है--वह हमारी दृष्टि नहीं रह गई हैवह हमारे मन का ढांचा नहीं रह गया है।
इसलिए देश कोई भी हल नहीं कर पाता। उलझनें नई होती चली जाती हैंसुलझाव पुराने। एक तरफ सुलझाव इकट्ठे होते हैं,एक तरफ उलझनें इकट्ठी होती हैं और हम बेचैन होते चले जाते हैं। कुछ भी हल नहीं होता। कुछ भी हल होने की क्षमता ही हमने खो दी हैऐसा मालूम पड़ता है।
मैंने सुना हैएक गांव में सम्राट आने वाला था। और गांव के लोगों ने कहा कि गांव के जितने भी समझदार लोग हैंसम्राट से मिलेंसम्राट का स्वागत करें। गांव में एक संन्यासी भी थाएक फकीर भी था। गांव के लोगों ने कहाहमारे मंडल का प्रमुख वही होगा। लेकिन राजा के अधिकारियों ने कहा कि फकीर का कोई भरोसा नहींउसकी बातचीत का कुछ ठिकाना नहींकुछ भी कह दे। तो हम उसको तैयार उत्तर सिखाएंगे। वह उत्तर तैयार रखे। वही उत्तर देराजा जब पूछे। उसकी बात का कोई ठीक नहीं है। राजा पूछे कि तुम्हारी उम्र कितनी हैऔर वह कहे कि मैं अनादि-अनंत आत्मा हूं। तो जरा भद्द हो जाएगी और अजीब बातें हो जाएंगी। सीधी बात! जब राजा पूछेउम्र कितनी हैतो कहो कि साठ वर्ष उम्र है। राजा पूछेआप कब से साधना कर रहे होतो कहो कि तीस वर्ष से साधना कर रहा हूं। ऐसा नहीं कि जन्मों-जन्मों से साधना चल रही है।
फकीर ने कहातो फिर आप बता दें। जो आप कहेंगेवही मैं कह दूंगा।
फकीर ने रट लिया कि साठ वर्ष मेरी उम्र हैऔर तीस वर्ष से मैं साधना कर रहा हूं। इस तरह के उत्तर। राजा आयाफकीर सामने गया। राजा को भी कह दिया गया था कि फकीर से यही पूछनाकुछ और मत पूछ लेना। लेकिन राजा भूल गया। उसने यह सोचा भी न था कि मामला इतना गड़बड़ होगा। उसने कहाआप कब से साधना कर रहे हैं?
फकीर ने कहासाठ वर्ष से।
उत्तर तो तैयार था। फकीर एक क्षण तो सोचा कि यह तो बड़ी गड़बड़ हुई जा रही है। लेकिन जब उत्तर तय है और बदलना अपने हाथ में नहीं हैतो उसने कहासाठ वर्ष से।
राजा ने कहाआश्चर्य! आपकी उम्र कितनी है?
क्योंकि वह साठ वर्ष का तो मालूम ही पड़ता था।
फकीर ने कहातीस वर्ष।
राजा ने कहाया तो मैं पागल हूं या आप!
फकीर ने कहादोनों पागल हैं। क्योंकि आप भी सीखे हुए प्रश्न पूछ रहे हैं और मैं भी सीखे हुए जवाब दे रहा हूं। दोनों पागल हैं! और जब आप गलत सवाल पूछ रहे हैंतो हम गलत जवाब देंगे हीक्योंकि हम तो जवाब देने को स्वतंत्र हैं ही नहीं। हमें तो सिखा दिया हैवही हम जवाब दे रहे हैं।
इस देश की जिंदगी में ऐसा बहुत जोर से हो रहा है। सब जवाब सीखे हुए हैं। और सब सवाल नये हैं। उनके बीच कोई तालमेल नहीं बैठता। और हम इतने डरे हुए लोग हैं कि कहीं पुराने जवाब छूट न जाएंइसलिए हम कहते हैंचाहे सवाल कोई भी हो,हम तो पुराना जवाब ही देंगे। सीखते भी नहींजिंदगी से कोई पाठ भी नहीं सीखते!
हिंदुस्तान एक हजार साल गुलाम रहा। हमने कोई पाठ नहीं सीखा। हमने क्या पाठ सीखा कि हिंदुस्तान क्यों गुलाम रहा?हिंदुस्तान से पूछो कि तुमने एक हजार साल की गुलामी से पाठ क्या सीखातो आप हैरान होंगेजो पाठ सीखना था वह हिंदुस्तान ने सीखा ही नहीं। क्योंकि वह जो बातें कर रहा हैवे बताती हैं कि वह उन्हीं बातों को फिर दोहरा रहा है जिनकी वजह से वह एक हजार साल गुलाम रहा।
हिंदुस्तान एक हजार साल क्यों गुलाम रहाहिंदुस्तान कमजोर थाहिंदुस्तान कम संख्या थीहिंदुस्तान में जो दुश्मन आएवे बहुत बड़ी तादाद में थेहिंदुस्तान की जमीन पर आकर दुश्मनों ने हराया। हम तो कहीं लड़ने नहीं गए। तो हमारे पास तो बड़ी संख्या थीदुश्मन कितना आ सकता था! लेकिन बात क्या थी?
एक बात थी कि हिंदुस्तान टेक्नॉलॉजी में हमेशा पीछे रहा। इसके सिवाय हिंदुस्तान की गुलामी का कोई भी कारण नहीं। अगर कोई कहे तो बेईमान है।
जब हिंदुस्तान पर सिकंदर ने हमला कियातो सिकंदर तो घोड़ों पर सवार आया और पोरस हाथियों पर लड़ने गया। पोरस सिकंदर से जरा भी कमजोर आदमी नहीं था। बल्कि अगर दोनों अकेले सामने मैदान में लड़तेतो सिकंदर दो कौड़ी का साबित होता। पोरस बहुत अदभुत आदमी था। लेकिन टेक्नॉलॉजी गलत थी और पिछड़ी हुई थी। हाथी शादी-विवाह मेंबारात वगैरह में ठीक है। बारात निकालनी होबड़ा अच्छा है। किसी साधु महाराज का जुलूस निकालना होबहुत अच्छा है। लेकिन हाथी युद्ध के मैदान पर बेमानी है। हाथीहारना हो तो युद्ध के मैदान पर ठीक है। और घोड़ों के सामने! घोड़ा तेज है। टेक्नॉलॉजिकली,युद्ध में घोड़ा ज्यादा सबल और सक्षम है। थोड़ी जगह घेरता हैतेजी से भागता हैजल्दी रुख बदलता हैकहीं भी निकल कर,बच कर भाग सकता है। हाथी बहुत सुस्त है एक अर्थों में। हाथी पर लड़ा पोरस--ताकत ज्यादा थी। घोड़ों पर लड़ा सिकंदर--ताकत उतनी न थी। लेकिन सिकंदर जीता और पोरस हारा।
फिर आए मुसलमान। और मुसलमान बारूद लेकर आए। और हिंदुस्तान में बारूद की कोई ईजाद न थी। और हिंदुस्तान अपना वही तीरत्तरकस और तलवार लिए खड़ा रहा। बारूद के सामने तीरत्तरकस नहीं जीतते। मुसलमान नहीं जीतेहिंदुस्तान नहीं हारा;तीरत्तरकस हारेबारूद जीती। टेक्नॉलॉजी जीतती है। विकसित टेक्नॉलॉजी हमेशा अविकसित टेक्नॉलॉजी से जीत जाती है।
फिर अंग्रेज आए। वे और बढ़िया तोपें लेकर आए थे। और हम वही पुरानाजैसे चिड़िएं वगैरह भगाने का सामान हो खेत मेंउस तरह की चीजें लिए बैठे थे। अंग्रेज कितनी थोड़ी ताकत लेकर आया थालेकिन उसके पास तोपें थीं। और तोपों ने हमें मुश्किल में डाल दिया। हमारी समझ के बाहर हो गयाहम क्या करें।
हिंदुस्तान एक हजार साल गुलाम रहाक्योंकि हिंदुस्तान वैज्ञानिक रूप से कम विकसित रहा। और कोई कारण नहीं है। हिंदुस्तान अब भी वैज्ञानिक रूप से कम विकसित है और कम विकसित ही रहेगा। क्योंकि हिंदुस्तान के समझाने वाले लोग हिंदुस्तान को एंटी-टेक्नॉलॉजिकल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं और एंटी-साइंटिफिक बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। वे कहते हैंविज्ञान की क्या जरूरत हैतकनीक की क्या जरूरत हैहम तो चर्खात्तकली कात लेंगे और हमारा काम हो जाएगा।
तुम कातो चर्खात्तकलीलेकिन दुनिया इसकी फिक्र नहीं करती कि आप चर्खात्तकली कात रहे हैंइसलिए आपको बड़ा आदर दिया जाएकि आपको स्वतंत्र रखा जाए! यह सब नहीं होने वाला है।
और इस मुल्क का मस्तिष्क जो हैवह इस तरह ढाला गया है पांच-छह हजार सालों में कि जब भी हमें कुछ विकसित बात कही जाएतो हमारी समझ के बाहर होती हैअविकसित बात कही जाएतो हमारी समझ में एकदम से आती है। अगर कोई एलोपैथी की बात कहेतो हम कहेंगे यह...। अगर कोई आयुर्वेद की बात कहेतो हम कहेंगेयह बिलकुल ठीक हैऋषि-मुनियों का विज्ञान है। सवाल एलोपैथी और आयुर्वेद का नहीं हैसवाल आधुनिक और पुरातन का है। नया जीतेगापुराना हारेगा। और जो पुराने को पकड़े रहेगाउसके साथ वह भी हारेगावह बच नहीं सकता।
इस जगत में निरंतर नये की जीत है। और नये की जीत स्वाभाविक है। क्योंकि नये का अनुभव पुराने से ज्यादा है। नये का प्रयोग ज्यादा है। नये की प्रक्रिया और भी अनुभवों में से गुजर चुकी है। नया जीतता हैपुराना हारता है।
भारत सदा से पुराना हैइसलिए हारता रहा है। अब भी भारत पुराना है। अब भी भारत के पास नया क्या हैअगर रूस में जाओ और बच्चों से पूछोतो वे सपने देख रहे हैं चांद पर मकान बनाने के। अमेरिका में जाओतो वे मंगल की यात्राओं के ख्वाबों से भरे हैं। और हिंदुस्तान के बच्चों के पास जाओवे अभी भी रामलीला देख रहे हैं।
रामलीला देखना इतना बुरा नहीं हैऐसे रामलीला बहुत बढ़िया चीज हैलेकिन कभी-कभी देखने के लायक है। उसको ही देखते रहना बहुत खतरनाक सिद्ध हो सकता है।
हिंदुस्तान का दिमाग पुराने से ग्रसित है। नये का न कोई आमंत्रण हैन कोई स्वीकृति है। और मजे की बात यह है कि अगर हम किसी तरह नये को स्वीकार भी करते हैंतो वह ऐसे बेमन से करते हैंवह ऐसी मजबूरी में करते हैंवह हमारे लिए नेसेसरी ईविल की तरह मालूम पड़ता हैएक जरूरी बुराई की तरह स्वीकार करते हैं कि ठीक हैअब कोई रास्ता नहीं हैतो चलोइसको स्वीकार कर लेते हैं।
लेकिन जब कोई बेमन से स्वीकार करता है नये कोतो नया ऊपर रह जाता हैपुराना भीतर रह जाता है। इसलिए हम ऊपर से नये को स्वीकार भी कर लेंतो हमारे वस्त्रों से ज्यादा कुछ भी नया नहीं हो पा रहा है। हांनेकटाई हैवह कंठ-लंगोटवह नया हो गया है! जूते नये हो गए हैंकपड़े नये हो गए हैंलेकिन भीतर जो आदमी खड़ा हुआ हैएकदम पुराना है!
अब लड़का हैटाई लगाए हुए खड़ा हैउसने बढ़िया नैरोकट कपड़े पहन रखे हैंलेकिन हनुमान जी के सामने हाथ जोड़े खड़े हैं कि परीक्षा में पास करवा देना तो नारियल चढ़ाएंगे। अब यह हद हो गई! अगर हनुमान जी का भी वश चले तो ऐसा चांटा मारें वे! लेकिन वह ऊपर से कपड़े भर नये हो गए हैंदिमाग तो वही का वही है। एम.एससी. लड़कों को मैं देखता हूं कि जाकर मढ़िया में प्रसाद चढ़ा रहे हैं! एम.एससी. पढ़ रहे हैं!
कलकत्ते में एक घर में मैं मेहमान था एक डाक्टर के घर। एफ.आर.सी.एस. हैंबड़े भारी फिजीशियन हैं कलकत्ते के। सांझ को मुझे लेकर मीटिंग में जाने को थेगाड़ी में जा ही रहे थेचढ़ ही रहे थे कि उनकी लड़की को छींक आ गई। मुझसे बोलेएक मिनट रुक जाइए।
मैंने कहापागल हो गए होडाक्टर होतुम भलीभांति जानते हो कि छींक क्यों आती है। और तुम्हारी लड़की को छींक किसी भी वजह से आएमेरे रुकने का क्या संबंध हैमेरा क्या कसूर हैऔर तुम्हारी लड़की को छींक आ गई तो अब सारी दुनिया रुक जाए क्यामामला क्या हैतुम्हारी लड़की की छींक में ऐसी विशेषता क्या है?
उन्होंने कहानहींयह कोई बात नहीं। आप कहां ले गए! मगर क्या हर्जा हैमैं जानता हूं कि छींक में कुछ नहीं होतालेकिन एक मिनट रुकने में हर्जा क्या है?
मैंने उनसे कहाहर्जा बहुत भारी है। एक मिनट रुकने का सवाल नहीं है। यह बताता है कि तुम डाक्टरी ऊपर से सीख आए हो,भीतर वह जो ग्रामीण भारतीय है वह बैठा हुआ हैवह कहीं गया नहीं है। और हर्जा भारी है। क्योंकि आत्मा पुरानी हो और शरीर नया हो जाएतो इतना तनाव पैदा होगा देश के भीतरजिसका कोई हिसाब नहीं। क्योंकि असली गति आत्मा से आती है,शरीर से नहीं आती। शरीर तो बोझ बन जाएगा। अगर आत्मा पुरानी है और शरीर नया हैतो शरीर बोझ बन जाएगाक्योंकि आत्मा रोकेगी पीछे की तरफ। और शरीर की क्या ताकत है?
अभी मैं जालंधर था। एक इंजीनियर मित्र हैंउन्होंने एक बड़ा मकान बनाया। पंजाब के बड़े इंजीनियर हैं। जर्मनी में शिक्षा ली है। मुझसे कहने लगेउदघाटन कर दें। मैंने कहामैं चलूंगा। उदघाटन करने गयाउनके मकान का फीता काट रहा हूंदेखता हूं--सामने एक हंडी लटकी हुई है। हंडी पर बाल लगाए हुए हैंआदमी का चेहरा बना हुआ है। मैंने पूछायह क्या हैउन्होंने कहा कि नजर न लग जाएइसलिए इसे यहां लटकाया हुआ है। मैंने उनसे कहामेरा वश चले तो चोरों-बदमाशों को कारागृह से छोड़ दूं और तुम जैसे लोगों को कारागृह में बंद कर दूं।
एक इंजीनियर भी सोचता है कि मकान को नजर लगती है! तो फिर इस मुल्क का सौभाग्य उदय नहीं हो सकता। यह इंजीनियर ऊपर से होकर आ गयाभीतर वही पुराना आदमी बैठा हुआ हैजो हटता नहीं। वह बैठा है मजबूती से बांध कर। हांअगर और दूसरी बातचीत करनी होठीक। लेकिन अपना मकान बनाना होतो वह भीतर का आदमी कहेगाक्या हर्जा हैहंडी लटका दो! कोई हर्जा तो है ही नहीं। अगर फायदा हुआ तो हो जाएगानहीं तो चार पैसे की हंडी में हर्जा क्या हैवह भीतर का आदमी ये दलीलें देता हैऔर हंडी लटका दी जाती है।
भारत बेमन से स्वीकार कर रहा है नये को। और नये की अस्वीकृति के लिए उसने खूब दलीलें निकाली हुई हैं। एक दलील तो उसने यह निकाली हुई है कि सब नई चीज को वह कहता है कि यह पश्चिम की है।
यह बात झूठ है। पश्चिम का कहने से मामला हल नहीं होगा। नये का अर्थ है आधुनिकमॉडर्न--वेस्टर्न नहीं। नये का अर्थ है आधुनिक। लेकिन भारत के मन में पुराने की पकड़ तेज है। और अभी हम पश्चिम के गुलाम थेतो पश्चिम के प्रति घृणा भी तेज है। तो भारत का पुराणपंथी कहता है कि देखोसब पश्चिमी हुए जा रहे हैं!
सवाल पश्चिमी होने का नहीं हैसवाल आधुनिक होने का है। और चूंकि पश्चिम में नये का जन्म हो रहा हैइसलिए अनिवार्य हो गया है कि वह जो नया है वह स्वीकार किया जाए या फिर नये को जन्म दिया जाए। लेकिन अगर हमने यह डर रखा कि कहीं पश्चिमी प्रभाव में न आ जाएंतो हम आधुनिक होने से बच जाएंगे।
और हम आधुनिक होने से बचे तो एक सौ वर्षों के भीतर हमारी वह हालत होगीजो हमारे मुकाबले आदिवासियों की हैउससे भी बदतर हो सकती हैपश्चिम के मुकाबले। आज भी हो गई है। आज भी कल्पना के बाहर है कि हमारे और पश्चिम के बीच कितना फासला हो गया है! आज अमेरिका और हमारे बीच कैसा फासला हैयह कल्पना के बाहर हैएकदम कल्पना के बाहर है! और यह सौ वर्षों में इतनी तेज गति हो जाने वाली है कि अगर हमने चर्खेत्तकली की बातें जारी रखींऔर कोई भी बहाने खोज कर हमने शोरगुल मचायातो हम जो अंतिम नुकसान पहुंचा सकते हैं मुल्क को वह यह कि अगर पचास वर्षों तक हिंदुस्तान में तकनीक ने इतना विकास नहीं किया कि हम पश्चिम के साथ खड़े हो जाएंतो हमारे और पश्चिम के बीच ऐसी दरार हो जाएगी कि उस दरार को भरना फिर असंभव हो जाएगा।
आने वाले पचास वर्षों में भारत के युवकों को पांच हजार वर्ष का फासला पूरा करना है। अन्यथा फिर हम पिछड़ेंगे और हम पूरा नहीं कर पाएंगे। बहुत मुश्किल हो जाएगा। लेकिन बड़ा डर लगता है कि युवक कैसे पूरा करेगाक्योंकि वह युवक भी एक अर्थ में युवक नहीं हैउसके भीतर भी पुराना आदमी बैठा हुआ है। वह भी बूढ़ा है। हिंदुस्तान में जवान आदमी खोजना बहुत मुश्किल है।
आप कहेंगेइतने जवान आदमी घूम रहे हैं!
वे सब घूम रहे हैंबस वे ऊपर से जवान हैंभीतर उनके बूढ़ा आदमी बैठा है। कितने हिंदुस्तान के लड़के पहाड़ पर चढ़ते हैं?कितने हिंदुस्तान के लड़के समुद्र्र लांघते हैंकितने हिंदुस्तान के लड़के नये की खोज पर निकलते हैंकितने हिंदुस्तान के लड़के अज्ञात में प्रवेश करने की चेष्टा करते हैंकितने हिंदुस्तान के लड़के यह कहते हैं कि पुरानी लीक पर चलने से हम इनकार करते हैं?
जवानी का लक्षण यह है कि वह कहे कि हम पुरानी लीक पर नहीं चलेंगेहम कुछ नया रास्ता बनाएंगे। हमें भी जिंदगी मिली हैहम भी कुछ नई जिंदगी जीएंगे।
और ध्यान रहेजिंदगी का रस केवल वे ही लोग उपलब्ध कर पाते हैंजो नये होने की और नई तरफ जाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन हमारे मुल्क में लोग समझाएंगे--नयानया कभी हुआ हैआकाश के नीचे सब पुराना है। नया कभी हुआ ही नहीं। वही सूरज हैवही चांद हैवही वृक्ष हैंवही मौसम हैं--सब वही हैनया है क्या?
यह मुल्क समझाता हैनया कुछ भी नहीं हैसब पुराना है।
और मैं आपसे कहना चाहता हूंपुराना कभी भी कुछ नहीं हैसब नया है। कल जो सूरज निकला थावह आज नहीं निकला है;आज दूसरा सूरज निकला है। आप एक घंटे मुझे सुन कर जाएंगेतो इस खयाल में मत रहना कि आप वही आदमी जा रहे हैं जो आए थे। इस एक घंटे में बहुत गंगा का पानी बह जाएगा। आपके भीतर भी बहुत पानी बह जाएगा। आप दूसरे आदमी ही जाने वाले हैं। आप वही आदमी नहीं हैं फिर यहां से जाते समय जो आए थे। इस एक घंटे में कुछ तो हुआ। आप मरे हुए तो नहीं हैं। मुर्दा अगर हम लाते इस कमरे मेंतो घंटे भर के बाद भी वह वही होता। जिंदा आदमी--हांकुछ मुर्दे भी आ गए होंगे,तो वे वही होंगे--जिंदा आदमी तो बदलेगा। जिंदगी का मतलब बदलाहट है। और जिंदगी प्रतिपल बदल रही है। और जितनी तेजी से बदलती है जिंदगीजितनी डायनेमिक होती हैउतनी जिंदगी है।
लेकिन हिंदुस्तान में कुछ नहीं बदलता। और हिंदुस्तान का मन ऐसा पकड़ लिया है कि सब पुराना हैसब वही हैसब सदा से वही है।
मैंने सुनी है एक कहानीआपने भी सुनी होगीकि चूहों ने एक दफा सभा की और बिल्ली के लिए सोचा--क्या करेंक्या न करें! तो उन्होंने कहाअपनी पुरानी किताब खोलो। पुरानी किताब खोली--बिल्लियों के संबंध में क्या लिखा है पुराने चूहों नेपुराने चूहों ने लिखा है कि एक दफा और सभा हुई थीकई दफे सभा हो चुकी है। बिल्ली के गले में घंटी बांधी जाएयह ऋषियों ने कहा है--चूहों के ऋषियों ने--कि बिल्ली के गले में घंटी बांधी जाए। अगर घंटी बंध जाएतो फिर बिल्ली का कोई डर नहीं है। यह तो समाधान साफ है। लेकिन फिर किसी बूढ़े चूहे ने कहालेकिन घंटी बंधेगी कैसेफिर लोगों ने कहायह बात तो सच है,सिद्धांत तो सही हैलेकिन इसका व्यवहार क्या होगाघंटी बंधे कैसेघंटी बांधे कौनफिर बात वहीं अटक गई। सिद्धांत बिलकुल सही हैलेकिन घंटी बांधे कौनदो नये चूहों नेकालेज में पढ़ते होंगेउन्होंने कहा कि छोड़ो फिक्रहम कल बिल्ली के गले में घंटी बांध देंगे।
लेकिन बुङ्ढों ने कहायह कभी हुआ ही नहीं। यह कभी हुआ ही नहींकभी हो भी नहीं सकता। क्या तुम पागल हो गए हो?नये छोकरे होदिमाग खराब हो गया है!
उन्होंने कहाआप बातचीत मत करिएजब घंटी बंध जाए कल तब मुलाकात करिए।
बूढ़े खूब हंसे बैठ कर कि लड़कों का दिमाग खराब हो गया! लड़के हमेशा इस तरह की बातें करते हैं। कहीं घंटी बंधी है?
लेकिन दूसरे दिन बिल्ली के गले में घंटी बंध गई। बूढ़े बड़ी मुश्किल में पड़ गए कि यह क्या हुआकैसे घंटी बंधीउन लड़कों से पूछा।
उन्होंने कहाइसमें कोई बात ही नहीं हैइतनी साधारण सी बात है। उन दोनों छोकरों का--चूहों के छोकरों का--एक दवाई की दुकान में आना-जाना था। एक नींद की गोली ले आएबस इतना ही राज था। और जहां बिल्ली दूध पीती थी वहां डाल दी। बिल्ली बेहोश हो गई। उन्होंने घंटी बांध दी।
लेकिन हजारों साल से चूहे सोचते थे कि घंटी कैसे बांधी जाएऔर बूढ़े चूहे कहते थेघंटी बांधी ही नहीं जा सकती।
ऐसी कोई घंटी नहीं है जो न बांधी जा सकती हो। और ऐसा कुछ भी नहीं है जो न बदला जा सकता हो। और ऐसा कुछ भी नहीं है जो न हो सकता हो। लेकिन जिस देश के प्राणों ने ऐसा तय कर रखा हो कि पुराने के सिवाय नया कुछ होता ही नहींउस देश की पूरी आत्मा सिकुड़ जाती है। और उस देश की पूरी आत्मा शक्ति खो देती हैसामर्थ्य खो देती हैसपना खो देती है। और फिर धीरे-धीरे हम आदी हो जाते हैं--जो हैवही हैइससे अन्यथा कुछ भी नहीं हो सकता। यह इतने जोर से बैठ गया है हमारे मन में कि अगर यह न तोड़ दिया जाएतो इस देश में कोई भी गति संभव नहीं होगी।
इसे तोड़ा जाना जरूरी है। इसे सब तरफ से तोड़ा जाना जरूरी है। और जितनी कोशिश की जा सके इसे तोड़ने के लिएजितने तर्क दिए जा सकेंजितना विचार किया जा सकेउतना ही सौभाग्य का सिद्ध होगा।
दोत्तीन बातें इस संबंध में कहूंगा और अपनी बात पूरी करूंगा।
एक बात जो पुराना निरंतर कहता है पुराने के पक्ष मेंउसे समझ लेना चाहिए। वह यह कहता है कि अतीत में हो चुका है स्वर्णयुग। गोल्डन एज जो हैवह हो चुकी। स्वर्णयुग हो चुका पहलेअब तो हम पतन कर रहे हैं। पंचम-काल चल रहा है,कलियुग चल रहा है। न मालूम और कितनी बातें वह कहता है। वह कहता है: आगेआगे तो पतन हैअंधकार हैमहाप्रलय है। पीछेपीछे सतयुग बीत चुका। राम-राज्य बीत चुका। पीछे हो चुका जो होना था श्रेष्ठ। ऊंचाइयां हमने छू लींअब आगे तो पतन के गङ्ढे ही हैं।
हिंदुस्तान हजारों साल से यह बात कह रहा है। हिंदुस्तान के मन ने यह अंगीकार कर लिया। और जब कोई यह अंगीकार कर ले कि आगे अंधेरा हैगङ्ढा हैप्रलय हैतो फिर धीरे-धीरे-धीरे-धीरे गङ्ढा पैदा हो जाएगाअंधकार भी हो जाएगाअंधेरा भी हो जाएगा। और जब अंधेरा आएगागङ्ढा आएगातो वह आदमी कहेगा कि देखोऋषि-मुनियों ने जो कहा थाकितना ठीक कहा था!
वह ऋषि-मुनियों के कहने की वजह सेउनकी भविष्यवाणी की वजह से नहीं आ रहा है अंधकार। भविष्यवाणी को स्वीकार किया गयाइससे आ रहा है। और वह आता चला जा रहा है। सारी दुनिया के लोग सोचते हैं--भविष्य में है स्वर्णयुग। आएगाआगे उटोपिया है। और हम सोचते हैंपीछे हो गया।
लेकिन वे पीछे का सोचने वाले बताते क्या हैं?
वे कहते हैंपीछे हो गया। देखोराम का जमाना कितना अदभुत था! बुद्ध का जमाना कितना अदभुत था! कृष्ण का जमाना कितना अदभुत था!
उनकी दलील बड़ी कमजोर हैबिलकुल लचर हैउसमें कोई बुनियाद नहीं है।
अभी हम हैं सारे लोग। अभी हमारे बीच अदभुत आदमी थे गांधी। दो हजार साल बाद न मुझे कोई याद रखेगान आपको,लेकिन गांधी दो हजार साल बाद याद रहेंगे। और दो हजार साल बाद लोग कहेंगे कि गांधी के जमाने के लोग कितने अच्छे रहे होंगे! गांधी जिस जमाने में पैदा हुआउस जमाने के लोग कितने अच्छे रहे होंगे!
और उनकी बात बिलकुल झूठ होगी। क्योंकि गांधी हमारे सबूत नहीं हैंन हमारे प्रमाण हैंन हमारे साक्षी हैं। वे हमारे विटनेस नहीं हैं। गांधी हमसे बिलकुल उलटे हैं। गांधी अपवाद हैंएक्सेप्शन हैंवे नियम नहीं हैं। हम उनसे बिलकुल उलटे हैं। लेकिन हम तो भूल जाएंगेइतिहास के पन्नों पर कोई हमारे बाबत कुछ न लिखेगा। और गांधी बच रहेंगे। और गांधी की तस्वीर बड़ी होती चली जाएगीबड़ी होती चली जाएगी। और एक दिन लोग गांधी का युग कहेंगे हमारे युग को। और कहेंगे कि कितने अच्छे लोग रहे होंगे!
यही कहानी बार-बार होती रही है। राम याद रह गए हैं। राम के जमाने का न मैं याद हूंन आप याद हैं। राम के जमाने के आम आदमी का कुछ भी पता नहीं। राम रह गए हैं। राम की तस्वीर बड़ी होती चली गई है। अब हम कहते हैंराम का युग! अब हम कहते हैंबुद्ध जब पैदा हुए! महावीर जहां हुए!
लेकिन ये बातें बेमानी हैं। ये सारे लोग अपवाद हैं। ये असली आदमी नहीं हैं। यह जो आदमी फिरता हैजीता हैये वह नहीं हैं। ये मूर्तियां हैं। ये वे कुछ लोग हैंजो जीवन भर चेष्टा करके ऊंचे उठते हैं। लेकिन ये सबके सबूत नहीं हैं।
और मेरा मानना है कि अगर इसी तरह के बहुत लोग होते गांधी जैसेतो गांधी को कोई याद भी नहीं रखे। अगर राम जैसे बहुत लोग रहे होंसारा युग अच्छा रहा होतो राम कभी याद नहीं रखे जा सकते। राम याद रहते इसलिए हैं कि चारों तरफ राम से ठीक उलटे लोग घेरे हुए हैंनहीं तो राम याद नहीं रहेंगे। एक स्कूल का मास्टर हैवह भी इतनी सी बात जानता है। वह सफेद दीवाल पर नहीं लिखता सफेद खड़िया से। लिखे तो लिख जाएगालेकिन पढ़ा नहीं जा सकता। काले ब्लैक-बोर्ड पर लिखता है। क्योंकाले ब्लैक-बोर्ड पर सफेद खड़िया उभर कर दिखाई पड़ती हैपढ़ा जाता है।
जब समाज का ब्लैक-बोर्ड होता है पूरातभी महापुरुष दिखाई पड़ते हैंनहीं तो दिखाई नहीं पड़ते। जिस दिन सारा समाज अच्छा होगाउस दिन महापुरुष तो पैदा होंगेलेकिन दिखाई नहीं पड़ेंगे। जिस देश का समाज जितना बुरा होता हैउस देश में उतने ही ज्यादा महापुरुष दिखाई पड़ते हैं। इस फिक्र में मत पड़ना कि सारे भगवान यहीं क्यों अवतार लेते हैंऔर कोई कारण नहीं है। और सारे महापुरुष और संत यहीं क्यों पैदा होते हैंऔर कोई कारण नहीं है। वे दिखाई पड़ते हैं। सारे समाज का ब्लैक-बोर्ड बहुत काला है। उस पर एक आदमी भी सफेद हो जाता है तो बहुत चमकता है। हजारों साल तक चमकता रहता है।
नहींपीछे कुछ स्वर्णयुग नहीं हो गए हैं। कुछ अच्छे आदमी हुए हैं। स्वर्णयुग तो उस दिन होगाजिस दिन सारे लोग इतने अच्छे आदमी होंगे। वह भविष्य में हो सकता है। वह पीछे नहीं हैवह पीछे नहीं हुआ है।
फिर उनकी शिक्षाएं भी उठा कर देखें। पुरानी से पुरानी किताब देखें। तो वह किताब भी यह नहीं कहती है कि आजकल के लोग अच्छे हैं। वह किताब कहती हैपहले के लोग अच्छे थे। पुरानी से पुरानी किताब यह कहती हैपहले के लोग अच्छे थे। छह हजार वर्ष पुरानी किताब भी यही कहती है कि पहले के लोग अच्छे थे। तब जरा शक होता है कि ये पहले के लोग कब थेये थे भी कभीया कुछ अच्छे लोगों की याद के आधार पर हमेशा पहले के लोग अच्छे दिखाई पड़ते हैं?
और भी कारण मालूम होते हैं। अगर हम महावीर की शिक्षाएं उठा कर देखेंतो महावीर क्या समझाते हैं सुबह से सांझ तक?सुबह से सांझ तक समझाते हैं: चोरी मत करोबेईमानी मत करोदूसरे की स्त्री को मत भगाओहिंसा मत करो। अगर लोग अच्छे थेतो महावीर का दिमाग खराब थायह किसको समझा रहे हैंबुद्ध भी यही समझाते हैं। क्राइस्ट भी यही समझाते हैं। दुनिया के सारे महापुरुष सुबह से शाम तक लेकर एक ही काम करते हैं--चोरी मत करोहिंसा मत करोबेईमानी मत करो,व्यभिचार मत करो। किसको समझाते हैं ये चौबीस घंटे ये बातेंअगर लोग अच्छे थेतो समझाने की कोई जरूरत न थी। लेकिन लोग उलटे रहे होंगे। चोरों को ही समझाना पड़ता है--चोरी मत करो। बेईमानों को समझाना पड़ता है--बेईमानी मत करो। नहीं तो किसको समझाना पड़ेगाहत्यारों को समझाना पड़ता है--हिंसा बुरी हैअहिंसा परम धर्म है। यह सिर्फ हिंसकों को समझाना पड़ता है कि अहिंसा परम धर्म है। ये सारी शिक्षाएं बताती हैं कि समाज कैसे लोगों से गठित था! कैसे लोग थे!
वह जो लोग कहते हैं कि ताले नहीं लगते थे हमारे देश मेंतो चोरी होती ही नहीं होगी। शक की बात है। क्योंकि जब ताले नहीं लगते हैंतभी महावीर दिन-रात समझा रहे हैंबुद्ध समझा रहे हैं कि चोरी मत करो। तो इससे यह पता चलता है कि ताले बनाना न आता होगा। और यह भी हो सकता है कि ताला बनाना भी आता होतो ताले में रखने योग्य कुछ न रहा होगा। यही दो बातें हो सकती हैंतीसरी बात नहीं हो सकती। आखिर ताले में रखने को भी तो कुछ चाहिए न! ताला काहे पर लगाइएगा?ताला लगाने के लिए कुछ चाहिए न! देश इतना गरीब रहा है कि कहां ताला लगाओगेकिस चीज पर ताला लगाओगेआज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास ताला लगाने को कुछ भी तो नहीं है। तो उनके घर पर ताला न लगेतो यह मत समझ लेना कि चोरी नहीं होती। चोरी के लिए भी तो कुछ चाहिए! चोरी किसकी होगीलेकिन महावीर और बुद्ध की शिक्षाएं बताती हैं कि चोरी बराबर होती रही होगी। और या फिर यह भी हो सकता है कि ताला चोरी चला गया हो। आपने लगाया हो और कोई चोर ही ले गया हो। पीछे आने वाले आदमी ने देखा हो कि अरे ताला नहीं हैइस गांव में चोरी नहीं होती।
लेकिन आदमी का सबूत मिलता है इस बात से कि जो शिक्षाएं उसे दी गई हैं। हमारी सारी शिक्षाएं बताती हैं कि समाज अच्छा नहीं रहा है।
लेकिन समाज अच्छा हो सकता है। और तब होगा अच्छाजब हम यह भ्रम छोड़ दें कि समाज अच्छा था। समाज अच्छा हो सकता है। लेकिन समाज अच्छा अपने आप नहीं हो जाता है। समाज अगर बुरा हैतो हमारे कारण है। और समाज अगर अच्छा होगा तो हमारे कारण होगा। हम कुछ करेंगे तो होगा।
लेकिन भारत मानता है कि हमारे किए तो कुछ होता नहींसब भगवान करता है। इस बात ने जितना हमें नुकसान पहुंचाया,जितनी पायज़नस है यह बात कि सब भगवान करता हैउतनी जहरीली और कोई बात नहीं हो सकती। अच्छा था कि हिंदुस्तान की नस-नस में जहर का टीका लगा दो और सब मर जाएंमगर इस तरह की बकवास मत सिखाओ कि सब भगवान करता है। सबको जहर दे दोवह अच्छा हैलेकिन इस तरह का मानसिक जहर मत दो। क्योंकि जिस आदमी कोजिस समाज को यह खयाल हो जाता है--सब भगवान करता हैवह समाज सब कुछ करना बंद कर देता है।
और ध्यान रहेजीवन की जो विकृति हैउसको करने के लिए कुछ नहीं करना पड़तावह अपने आप आ जाती है। नीचे उतरना होतो आदमी अपने आप चला जाता है। ऊपर जाना होतो कुछ करना पड़ता है। और जो समाज यह मान ले कि सब भगवान करता हैवह नीचे से नीचे चला जाएगा। क्योंकि नीचे जाने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता। ऊपर जाने के लिए खुद कुछ करना पड़ता है। अगर यह भी हम मान लें कि सब भगवान करता है और हमारा नीचे जाना रुक जाएतो भी ठीक है। लेकिन नीचे जाना नहीं रुकता। नीचे जाना एकदम अपने आप होता चला जाता है। एक ग्रेविटेशन है नीचे का। एक पत्थर को हम ऊपर की तरफ फेंकें। फेंकने के लिए ताकत लगानी पड़ती है। पत्थर को लौटने के लिए कोई ताकत नहीं लगतीजमीन खींच लेती है।
जिंदगी का नीचे की तरफ एक गुरुत्वाकर्षण है। तो जो समाज यह मान लेता है कि सब भगवान करता हैवह ऊपर उठना बंद कर देता है। ऊपर उठने के लिए कुछ करना जरूरी था। और नीचे गिरना जारी रहता है। और जब कोई समाज ऊपर नहीं उठता,तो नीचे गिरता ही चला जाता है। और जितना नीचे गिरता चला जाता हैउतना वह काहिलपन कीनपुंसकता कीइंपोटेंस की बातें पकड़ने लगता है--कि ठीक हैयह तो भाग्य हैयह तो कर्म हैयह तो यह हैयह तो वह है--और नीचे गिरता चला जाता है।
सारा मुल्क एक अंधेरे घर की तरह हो गया हैएक पागलखाने की तरह! इसको बदलना है या नहीं बदलना हैइसे नया करना है कि नहीं करना हैऔर कौन और कैसे इसे नया करेतो मैंने तीन-चार बातें कहींउन पर सोचना।
एक: पुराने का मोह जब तक हैतब तक नये का जन्म नहीं हो सकता। पुराने को गिराना पड़ेगाअगर नये को बनाना है। विध्वंस की हिम्मत चाहिएअगर सृजन करना हो। केवल वे ही निर्माण करते हैं जो मिटाने की ताकत भी जुटा लेते हैं।
और मैंने यह कहा कि सोचना होगा कि हम अतीत में ही मानते चले जाएं अपने स्वर्णयुग को या भविष्य में बनाएं स्वर्णयुग कोअतीत में स्वर्णयुग को मानने वाली कौम पतन के रास्ते पर जाती है। भविष्य में स्वर्णयुग को मानने वाली कौम विकास करना शुरू करती है।
और तीसरी बात मैंने कही कि क्या हम टेक्नॉलॉजी और विज्ञान के विकास में आगे बढ़ेंगेया दकियानूसी और पुराणपंथी बातों में पड़ कर देश के भाग्य को उन्हीं हाथों में छोड़ देंगे अंधेरेजिनमें देश हजारों साल से रहा है?
और चौथी बात मैंने कही कि अगर विज्ञान को लाना हैतो आधुनिकमॉडर्न होने की हिम्मत जुटानी पड़ेगी। पश्चिम-वश्चिम की बात छोड़ देनी पड़ेगी। न कोई पूरब हैन कोई पश्चिम है। नया है और पुराना है। यह डिवीजन गलत है पूरब और पश्चिम का। असली डिवीजन है पुराने और नये का। पुराने के खिलाफ नये की लड़ाई है।
लेकिन पुराना चालाक है। और वह यह कहता है कि नयाअच्छा तो तुम पश्चिमी होना चाहते होपश्चिमी नहीं होना है,हमको अपना भारतीय रहना है।
भारतीय तुम बहुत दिन से होबहुत दुख उठा रहे हो। और भारतीय होने का मतलब पुराना होना नहीं होतामरा हुआ होना नहीं होता। हम नये होकर भी भारतीय हो सकते हैं। सच तो यह है कि नये होकर ही हो सकते हैं। क्योंकि पुराना होकर सिर्फ एक दीनता की लंबी कहानी हैदुख और दारिद्रय की।
और अंतिम बात: यह जो मैंने कहाये जो बातें मैंने कहींमेरा कोई आग्रह नहीं है कभी भी कि जो मैं कहूं उसे मान लेना। क्योंकि यही तो पुरानी उपद्रव की जड़ रही है अब तक--कि आदमी कहता हैमैं जो कहता हूं वह मान लो। क्योंक्योंकि मैं तीर्थंकर हूंमैं महात्मा हूंमैं गुरु हूं। ऐसा ऊपर से चाहे न भी कहेलेकिन सारा आयोजन ऐसा करता है कि मान लो कि मैं जानता हूं।
यही खतरनाक सिद्ध हुआ है। अब किसी की मत मानना। अब इस मुल्क को गुरु की जरूरत नहीं है। अब यह मुल्क गुरु-वुरु की बकवास से मुक्त होना चाहिए। अब तो एक-एक आदमी को सोचना पड़ेगा। जब पूरा मुल्क सोचेगातब वह प्रतिभा प्रकट होगीवह शक्ति प्रकट होगीजो जीवन की समस्याओं को हल कर सकेगी।
यहां कुछ लोग सोचते हैंसारे लोग चुपचाप मानते हैं। इसीलिए लिथार्जीआलस्य पैदा हो गया हैतमस पैदा हो गया है। हम पत्थरों की तरह पड़े रह गए हैं। अंकुरों की तरह ऊपर नहीं बढ़ते हैं।
तो मैंने जो कहासोचना। इससे ज्यादा मेरा कोई आग्रह नहीं है। इसलिए मुझे बड़ी हैरानी होती है! जब मुझे चारों तरफ से गालियां पड़नी शुरू होती हैंतो मुझे हैरानी होती है। क्योंकि मैंने किसी से कहा नहीं कि मेरी बात मान लो। मैंने यह भी नहीं कहा कि मेरी बात कोई सत्यचरम सत्य हैकि उससे भिन्न कुछ नहीं हो सकता। मैंने तो सिर्फ इतना निवेदन किया कि मेरी बात सोचना। अगर ठीक लगेठीकगैर-ठीक लगेफेंक देना। और अगर अपने सोचने से ठीक लग जाए मेरी बाततो फिर वह मेरी नहीं रह गईवह आपकी हो गई। जो खुद के विचार से निकलता है वह स्वयं का हो जाता है। और स्वयं का सत्य ही एकमात्र सत्य है। और स्वयं का सत्य ही व्यक्ति को स्वतंत्र करता है।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुनाइस तकलीफ में और मुसीबत मेंउससे बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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