बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

आत्म-गहराई!

सुबह कुछ लोग आए थे। उनसे मैंने कहा, ''सदा स्वयं के भीतर गहरे से गहरे होने का प्रयास करते रहो। भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिसकी गहराई है, अगोचर उसकी ऊंचाई हो जाती है।''
जीवन जितना ही ऊंचा हो जाता है, जितना कि गहरा हो। जो ऊंचा तो होना चाहते हैं, लेकिन गहरे नहीं, उनकी असफलता सुनिश्चित है। गहराई के आधार पर ही ऊंचाई के शिखर संभलते हैं। दूसरा और कोई रास्ता नहीं। गहराई असली चीज है। उसे जो पा लेता है, उन्हें ऊंचाई तो अनायास ही मिल जाती है। सागर से जो स्वयं में गहरे होते हैं, हिम शिखरों की ऊंचाई केवल उन्हें ही मिलती है। गहराई मूल्य है, जो ऊंचा होने के लिए चुकाना ही पड़ता है। और, स्मरण रहे कि जीवन में बिना मूल्य कुछ भी नहीं मिलता है।
स्वामी राम कहा करते थे कि उन्होंने जापान में तीन-तीन सौ, चार-चार सौ साल के चीड़ और देवदार के दरख्त देखे, जो केवल एक-एक बालिश्त के बराबर ऊंचे थे! आप ख्याल करें कि देवदार के दरख्त कितने बड़े होते हैं! मगर कौन और कैसे इन दरख्तों को बढ़ाने से रोक देता है? जब उन्होंने दर्याफ्त किया, तो लोगों ने कहा हम इन दरख्तों के पत्तों और टहनियों को बिलकुल नहीं छेड़ते, बल्कि जड़ें काटते रहते हैं, नीचे बढ़ने नहीं देते। और, कायदा है कि जब जड़ें नीचे नहीं जाएंगी, तो वृक्ष ऊपर नहीं बढ़ेगा। ऊपर और नीचे दोनों में इस किस्म का संबंध है कि जो लोग ऊपर बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अपनी आत्मा में जड़े बढ़ानी चाहिए। भीतर जड़े नहीं बढ़ेंगी, तो जीवन कभी ऊपर नहीं उठ सकता है।
लेकिन, हम इस सूत्र को भूल गए हैं और परिणाम में जो जीवन देवदार के दरख्तों की भांति ऊंचे हो सकते थे, वे जमीन से बालिश्त भर ऊंचे नहीं उठ पाते हैं! मनुष्य छोटे से छोटा होता जा रहा है, क्योंकि स्वयं की आत्मा में उसकी जड़ें कम से कम गहरी होती जाती हैं।
शरीर सतह है, आत्मा गहराई। शरीर में जो जीता है, वह गहरा कैसे हो सकेगा? शरीर में नहीं, आत्मा में जीओ। सदैव यह स्मरण रखो कि मैं जो भी सोचूं, बोलूं और करूं, उसकी परिसमाप्ति शरीर पर ही न हो जावे। शरीर से भिन्न और ऊपर भी कुछ सोचो, बोलो और करो। उससे ही क्रमश: आत्मा में जड़े मिलती हैं और गहराई उपलब्ध होती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

हम ही स्वर्ग, हम ही नरक!

किसी ने पूछा : ''स्वर्ग और नरक क्या हैं?'' मैंने कहा, ''हम स्वयं!''
एक बार किसी शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, ''मैं जानना चाहता हूं कि स्वर्ग और नरक कैसे हैं?'' उसके गुरु ने कहा, ''आंखें बंद करो और देखो।'' उसने आंखें बंद की और शांत शून्यता में चला गया। फिर, उसके गुरु ने कहा, ''अब स्वर्ग देखो।'' और थोड़ी देर बाद कहा, ''अब नरक!'' जब उस शिष्य ने आंखें खोली थीं, तो वे आश्चर्य से भरी हुई थीं। उसके गुरु ने पूछा, ''क्या देखा?'' वह बोला, ''स्वर्ग में मैंने वह कुछ भी नहीं देखा, जिसकी कि लोग चर्चा करते हैं। न ही अमृत की नदियां थीं और न ही स्वर्ण के भवन थे- वहां तो कुछ भी नहीं था और नरक में भी कुछ नहीं था। न ही अग्नि की ज्वालाएं थी और न ही पीडि़तों के रुदन। इसका कारण क्या है? क्या मैंने स्वर्ग नरक देखें या कि नहीं देखे।'' उसका गुरु हंसने लगा और बोला, ''निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नरक देखें हैं, लेकिन अमृत की नदियां और स्वर्ण के भवन या कि अग्नि की ज्वाला और पीड़ा का रुदन तुम्हें स्वयं ही वहां ले जाने होते हैं। वे वहां नहीं मिलते। जो हम अपने साथ ले जाते हैं, वही वहां हमें उपलब्ध हो जाते हैं। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नरक हैं।''
व्यक्ति जो अपने अंतस में होता है, उसे ही अपने बाहर भी पाता है। बाह्य, आंतरिक का प्रक्षेपण है। भीतर स्वर्ग हो, तो बाहर स्वर्ग है। और, भीतर नरक हो, तो बाहर नरक। स्वयं में ही सब कुछ छिपा है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-06

दिनांक 13 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।


प्रश्न यह है कि चित्रों मेंपोस्टर्स वगैरह में अश्लील चीजें पेश की जाती हैं। तो लोग अश्लील हैं,यानी पोस्टर्स सेइनसे नहीं बदले हैंमगर वे खुद अश्लील हैं ही। इसलिए वे जो चित्र वगैरह में ले आते हैं। तो मेरा सवाल यह है कि यह जो कार्य-कारण संबंध है वह एकमार्गी नहीं है,द्विमार्गी है। हो सकता है कि लोग थोड़े अश्लील होंअश्लील चीजें पसंद करते हों। मगर ये चित्रये पोस्टर्सये फिल्म वगैरह उस अश्लीलता को और ज्यादा बढ़ाएंकुछ ऐसा पेश करते हैं। तो इसलिए सिर्फ लोगों की अश्लीलता यही कारण हैमगर दूसरी तरफ से वह कार्य-कारण संबंध जो हैद्विमार्गी चलता है। इसलिए अगर कोई कहे कि फिल्म और पोस्टर बढ़ा रहे होंगे या अश्लीलता कम की जानी चाहिए...
वे मित्र पूछ रहे हैं कि ऐसा मैंने कहा कि लोग अश्लील हैंउनके मन की मांग अश्लीलता की हैइसीलिए अश्लील चित्रफिल्में,गीत उन्हें पसंद पड़ते हैं। मित्र पूछ रहे हैं कि यह संबंध दोहरा हो सकता है। यह हो सकता है कि अश्लील चित्रोंफिल्मों और गीतों को सुन कर उनमें अश्लीलता भी पैदा होती हो।

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-05

दिनांक 11 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।


कोई भी काम टेंशन पैदा कर रहा हैकोई भी काम ऊब पैदा कर रहा है। काम सवाल ही नहीं है। हम कैसे काम को लेते हैं--यह सवाल है। हमारा एटिटयूड क्या है। काम तो सब बोरिंग हैं। रोज रिपिटीटिव हैं। वही तुम्हें फिर करना पड़ेगा--चाहे दफ्तर जाओचाहे पढ़ाने जाओचाहे फैक्ट्री में जाओचाहे मजदूरी करो। रोज वही काम करना पड़ेगा। और एक बंधे हुए घेरे में रोज घूमना पड़ेगा। वह उबाने वाला हो ही जाएगा। पुनरुक्ति ऊबाती हैरिपीटीशन बोर्डम है। इसलिए यह तो सवाल ही नहीं है।
और रोज काम बदलोगे तो जिंदगी मुश्किल में पड़ जाएगी। और रोज-रोज काम बदलातो बदलना भी रिपिटीटिव हो जाएगावह भी उबाने लगेगा। जो भी चीज दोहरने लगेगीवह उबाने वाली हो जाएगी।

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-04

दिनांक 10 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।

बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की एक कहानी कही है। पिछले जन्म की कहानी है। तब वे बुद्धपुरुष नहीं थे। और उस जन्म मेंजो उस जमाने में एक बुद्धपुरुष थेवे उनके दर्शन करने गए थे। तो जब उन्होंने उन बुद्धपुरुष के पैर छुएपैर छूकर वे उठ ही पाए थे कि वे बुद्धपुरुष भी झुके और इनके पैर छू लिए! ये बहुत हैरान हो गए। इन्होंने कहा कि मैं आपके पैर छुऊं,नमस्कार करूंयह तो ठीक है। आप मेरे पैर छुएं और नमस्कार करेंयह तो मेरी समझ के बाहर हो गया! तो उस बुद्धपुरुष ने कहा कि यह तुम्हारी समझ के बाहर है। क्योंकि मुझमें जो वास्तविक हो गया हैवह तुममें संभावना है। और आज नहीं कल तुममें भी वास्तविक हो जाएगा। वास्तविक हो जाएगा तुममें भीजो आज बीज है वह कल वृक्ष हो जाएगा। मैं उस संभावना को नमस्कार करता हूं। और इसलिए कर रहा हूं ताकि तुम्हें याद दिला सकूं कि तुममें भी वह संभावना है।

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-03

दिनांक 09 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।


पिछले साल साईंबाबा आए थे और हमारे राज्यपाल जीमुख्यमंत्री जीवे भी वहां गए थे। और सुना है कि प्रधानमंत्री की पत्नी को एक ताबीज भी दिया था। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि आध्यात्मिकता और चमत्कारों के बीच कोई नाता है?

आध्यात्मिकता और चमत्कार के बीच एक नाता हैवह नाता विरोध का है। आध्यात्मिक व्यक्ति चमत्कार के लिए राजी नहीं होगायह नाता है। और जो व्यक्ति चमत्कार के लिए राजी होता होउसे मदारी कहना चाहिएआध्यात्मिक नहीं।

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-02

दिनांक 08 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।

आचार्य श्रीआपकी स्पीच सेक्या करना चाहिएऐसा कुछ ज्यादा समझ में आता है। मगर कैसे करना चाहिएऔर खासतौर से इंडिविजुअल बेस पर नहींमगर एज ए कम्युनिटी और एज ए सोसाइटी क्या करना चाहिएवह जरा ज्यादा डिटेल में आप बताएं।

वह तो मैं दुबारा आऊं और दिन या दो दिन रुकूंतो आसान पड़ेगा।
लेकिन अभी तो मुल्क के सामने करने की एक ही बात है कि कुछ भी करने की जल्दी नहीं करनी चाहिए और विचार की एक हवा फैलानी चाहिए। करने की बहुत जल्दी नहीं करनी चाहिए अभी। क्योंकि जब तक मुल्क के पास ठीक विचार न होहम जो भी करने की कोशिश करेंगेउससे गलत और उपद्रव ही होने का डर ज्यादा है। तो मुल्क के पास ठीक-ठीक माइंड नहीं हैइसलिए एक्शन की बहुत जल्दी गङ्ढे में ले जाने वाली है और कहीं नहीं ले जाने वाली है।

चेति सकै तो चेति- प्रवचन-01

दिनांक 07 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबारगुजरात।

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात कहूंगा।
एक बहुत पुराना गांव था। और उस गांव से भी ज्यादा पुराना एक चर्च था उस गांव में। उस चर्च की सारी दीवालें गिरने के करीब हो गई थीं। न तो कोई उपासक उस चर्च के भीतर प्रार्थना करने जाता थान कोई कभी उस चर्च के भीतर...चर्च के भीतर जाना तो दूरउसके पास से निकलने में भी लोग डरते थे। वह चर्च कभी भी गिर सकता था। हवाएं चलती थींतो गांव के लोग सोचते थेआज चर्च गिर जाएगा। आकाश में बादल गरजते थेतो गांव के लोग बाहर निकल कर देखते थेचर्च गिर तो नहीं गया! बिजली चमकती थीतो डर होता थाचर्च गिर जाएगा। ऐसे चर्च में कौन प्रार्थना करने जाताचर्च बिलकुल मरा हुआ थालेकिन फिर भी खड़ा हुआ था।