बुधवार, 27 नवंबर 2019

ईश्वर बाह्य सत्य नहीं!

सत्य की खोज में स्वयं को बदलना होगा। वह खोज कम, आत्म-परिवर्तन ही ज्यादा है। जो उसके लिए पूर्णरूपेण तैयार हो जाता है, सत्य स्वयं उन्हें खोजता आ जाता है।
मैंने सुना है कि फकीर इब्राहिम उनके जीवन में घटी एक घटना कहा करते थे। साधु होने के पूर्व वे बल्ख के राजा थे। एक बार जब वे आधी रात को अपने पलंग पर सोये हुए थे, तो उन्होंने सुना कि महल के छप्पर पर कोई चल रहा है। वे हैरान हुए और उन्होंने जोर से पूछा कि ऊपर कौन है? उत्तर आया कि कोई शत्रु नहीं। दुबारा उन्होंने पूछा कि वहां क्या कर रहे हो? उत्तर आया कि ऊंट खो गया है, उसे खोजता हूं। इब्राहिम को बहुत आश्चर्य हुआ और अज्ञात व्यक्ति की मूर्खता पर हंसी भी आई। वे बोले, ''अट्टालिका के छप्पर पर ऊंट खो जाने और खोजने की बात तो बड़ी ही विचित्र है। मित्र, तुम्हारा मस्तिष्क तो ठीक है?'' उत्तर में वह अज्ञात व्यक्ति भी बहुत हंसने लगा और बोला, ''हे निर्बोध, तू जिस चित्त दशा में ईश्वर को खोज रहा है, क्या वह अट्टालिका के छप्पर पर ऊंट खोजने से भी ज्यादा विचित्र नहीं है?''
रोज ऐसे लोगों को जानने का मुझे अवसर मिलता है, जो स्वयं को बदले बिना ईश्वर को पाना चाहते हैं। ऐसा होना बिलकुल ही असंभव है। ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है। वह तो स्वयं के ही परिष्कार की अंतिम चेतना-अवस्था है। उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

स्वप्न की उपेक्षा नहीं!

एक गांव गया था। किसी ने पूछा कि आप क्या सिखाते हैं? मैंने कहा, ''मैं स्वप्न सिखाता हूं।'' जो मनुष्य सागर के दूसरे तट के स्वप्न नहीं देखता है, वह कभी इस तट से अपनी नौका को छोड़ने में समर्थ नहीं होगा। स्वप्न ही अनंत सागर में जाने का साहस देते हैं।
कुछ युवक आये थे। मैंने उनसे कहा, ''आजीविका ही नहीं, जीवन के लिए भी सोचो। सामयिक ही नहीं, शाश्वत भी कुछ है। उसे जो नहीं देखता है, वह असार में ही जीवन को खो देता है।'' वे कहने लगे, ''ऐसी बातों के लिए पास में समय कहां है? फिर, ये सब- सत्य और शाश्वत की बातें स्वप्न ही तो मालूम होती हैं?'' मैंने सुना और कहा, ''मित्रों, आज के स्वप्न ही कल के सत्य बन जाते हैं। स्वप्नों से डरो मत और स्वप्न कहकर कभी उनकी उपेक्षा मत करना। क्योंकि ऐसा कोई भी सत्य नहीं है, जिसका जन्म कभी न कभी स्वप्न की भांति न हुआ हो। स्वप्न के रूप में ही सत्य पैदा होता है। और वे लोग धन्य हैं, जो कि घाटियों में रहकर पर्वत शिखरों के स्वप्न देख पाते हैं, क्योंकि वे स्वप्न ही उन्हें आकांक्षा देंगे और वे स्वप्न। ही उन्हें ऊंचाइयां छूने के संकल्प और शक्ति से भरेंगे। इस बात पर मनन करना है। किसी एकांत क्षण में रुक कर इस पर विमर्श करना। और यह भी देखना कि आज ही केवल हमारे हाथों में है- अभी के क्षण पर केवल हमारा अधिकार है। और समझना कि जीवन का प्रत्येक क्षण बहुत संभावनाओं से गर्भित है और यह कभी पुन: वापस नहीं लौटता है। यह कहना कि स्वप्नों के लिए हमारे पास कोई समय नहीं है, बहुत आत्मघातक है। क्योंकि इसके कारण तुम व्यर्थ ही अपने पैरों को अपने हाथों ही बांध लोगे। इस भाव से तुम्हारा चित्त एक सीमा में बंध जावेगा और तुम उस अद्भुत स्वतंत्रता को खो दोगे, जो कि स्वप्न देखने में अंतर्निहित होती है। और, यह भी तो सोचो कि तुम्हारे समय का कितना अधिक हिस्सा ऐसे प्रयासों में व्यय हो रहा है, जो कि बिलकुल ही व्यर्थ हैं और जिनसे कोई भी परिणाम आने को नहीं है? क्षुद्रतम बातों पर लड़ने, अहंकार से उत्पन्न वाद-विवादों को करने, निंदाओं और आलोचनाओं में - कितना समय तुम नहीं खो रहे हो? और, शक्ति और समय अपव्यय के ऐसे बहुत से मार्ग हैं। यह बहुमूल्य समय ही जीवन-शिक्षण-चिंतन, मनन और निदिध्यासन में परिणत किया जा सकता है। इससे ही वे फूल उगाये जा सकते हैं, जिनकी सुगंध अलौकिक होती है और उस संगीत को सुना जा सकता है, जो कि इस जगत का नहीं है।''
अपने स्वप्नों का निरीक्षण करो और उनका विश्लेषण करो। क्योंकि, कल तुम जो बनोगे और होओगे, उस सबकी भविष्यवाणी अवश्य ही उनमें छिपी होगी।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

बुधवार, 13 नवंबर 2019

अहंकार!

अहंकार एकमात्र जटिलता है। जिन्हें सरल होना है, उन्हें इस सत्य का अनुभव करना होगा। उसकी अनुभूति होते ही सरलता वैसे ही आती है, जैसे कि हमारे पीछे हमारी छाया।
एक संन्यासी का आगमन हुआ था। वे मुझे मिलने आये थे, तो कहते थे कि उन्होंने अपनी सब आवश्यकताएं कम कर ली हैं। और उन्हें और भी कम करने में लगे हैं। जब उन्होंने यह कहा, तो उनकी आंखों में उपलब्धि का- कुछ पाने का, कुछ होने का वही भाव देखा जो कि कुछ दिन पहले एक युवक की आंखों में किसी पद पर पहुंच जाने से देखा था। उसी भाव को धनलोलुप धन पाने पर स्वयं में पाता है। वासना का कोई भी रूप परितृप्ति को निकट जान आंखों में उस चमक को डाल देता है। यह चमक अहंकार ही है। और, स्मरण रहे कि ऊपर से आवश्यकताएं कम कर लेना ही सरल जीवन को पाने के लिए पर्याप्त नहीं है। भीतर अहंकार कम हो, तो ही सरल जीवन के आधार रखे जाते हैं। वस्तुत: अहंकार जितना शून्य हो, आवश्यकताएं अपने आप ही सरल हो जाती हैं। जो इसके विपरीत करता है, वह आवश्यकताएं तो कम कर लेगा, लेकिन उसका अहंकार बढ़ जाएगा और परिणाम में सरलता नहीं और भी आंतरिक जटिलता उसमें पैदा होगी। उस भांति जटिलता मिटती नहीं है, केवल एक नया रूप और वेश ले लेती है। अहंकार कुछ भी पाने की दौड़ से तृप्त होता है। 'और अधिक' की उपलब्धि ही उसका प्राणरस है। जो वस्तुओं के संग्रह में लगे हैं, वे भी 'और अधिक' से पीडि़त होते हैं और जो उन्हें छोड़ने में लगते हें, वे भी उसी 'और अधिक' की दासता करते हैं। अंतत: ये दोनों ही दुख और विषाद को उपलब्ध होते हैं, क्योंकि अहंकार अत्यंत रिक्तता है। उसे तो किसी भी भांति भरा नहीं जा सकता। इस सत्य को जानकर, जो उसे भरना ही छोड़ देते हैं, वे ही वास्तविक सरलता और अपरिग्रह को पाते हैं।
अपरिग्रह को ऊपर से साधना घातक है। अहंकार भीतर न हो, तो बाहर, परिग्रह नहीं रह जाता है। लेकिन, इस भूल में कोई न पड़े कि बाहर परिग्रह न हो, तो भीतर अहंकार न रहेगा। परिग्रह अहंकार का नहीं- अहंकार ही परिग्रह का मूल कारण है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

ध्यान- मैं यह नहीं हूं!

मन कचरा है! ऐसा नहीं है कि आपके पास कचरा है और दूसरों के पास नहीं है। मन ही कचरा है। और अगर आप कचरा बाहर भी फेंकते रहें, तो जितना चाहे फेंकते रह सकते हैं, लेकिन यह कभी खतम होने वाला नहीं है। यह खुद ही बढ़ने वाला कचरा है। यह मुर्दा नहीं है, यह सक्रिय है। यह बढ़ता रहता है और इसका अपना जीवन है, तो अगर हम इसे काटें तो इसमें नई पत्तियां प्रस्फुटित होने लगती हैं।
तो इसे बाहर निकालने का मतलब यह नहीं है कि हम खाली हो जाएंगे। इससे केवल इतना बोध होगा कि यह मन, जिसे हमने अपना होना समझ रखा था, जिससे हमने अब तक तक तादात्म्य बना रखा था, यह हम ही हैं। इस कचरे को बाहर निकालने से हम प्रथकता के प्रति सजग होंगे, एक खाई के प्रति, जो हमारे और इसके बीच है। कचरा रहेगा, लेकिन उसके साथ हमारा तादात्म्य नहीं रहेगा, बस। हम अलग हो जाएंगे, हम जानेंगे कि हम अलग हैं।
तो हमें सिर्फ एक चीज करनी है- न तो कचरे से लड़ने की कोशिश करें और न उसे बदलने की कोशिश करें- सिर्फ देखें! और, स्मरण रखें, 'मैं यह नहीं हूं।' इसे मंत्र बना लें : 'मैं यह नहीं हूं।' इसका स्मरण रखें और सजग रहें और देखें कि क्या होता है।
तत्क्षण एक बदलाहट होती है। कचरा अपनी जगह रहेगा, लेकिन अब वह हमारा हिस्सा नहीं रह जाता। यह स्मरण ही उसका छूटना हो जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

संभोग से समाधि की ओर - 20

समाधि : संभोग-उर्जा का अध्‍यात्‍मिक नियोजन—5

     यहां से मैं भारतीय विद्या भवन से बोल कर जबलपुर वापस लौटा और तीसरे दिन मुझे एक पत्र मिला कि अगर आप इस तरह की बातें कहना बंद नहीं कर देते है तो आपको गोली क्‍यों ने मार दि जाये? मैंने उत्‍तर देना चाहा था, लेकिन वह गोली मारने वाले सज्‍जन बहुत कायर मालूम पड़े। न उन्‍होंने नाम लिखा था, न पता लिखा था। शायद वे डरे होंगे कि मैं पुलिस को न दे दू्ं। लेकिन अगर वह यहां कहीं हों—अगर होंगे तो जरूर किसी झाड़ के पीछे या किसी दीवाल के पीछे छिप कर सून रहे होंगे। अगर वह यहां कहीं हों तो मैं उनको कहना चाहता हूं। कि पुलिस को देने की कोई भी जरूरत नहीं है। वह अपना नाम और पता मुझे भेज दें। ताकि में उनको उत्‍तर दें सकूँ। लेकिन अगर उनकी हिम्‍मत न हो तो मैं उत्‍तर यहीं दिये देता हूं। ताकि वह सुन ले।
      पहली तो बात यह है कि इतनी जल्‍दी गोली मारने की मत करना, क्‍योंकि गोली मारते ही जो बात मैं कह रहा हूं। वह परम सत्‍य हो जायेगी। इसका उनको पता होना चाहिए। जीसस क्राइस्‍ट को दुनिया कभी की भूल गयी होती। अगर उसको सूली न मिली होती। सूली देने वाले ने बड़ी कृपा की।
      और मैंने तो यहां तक सूना है जो इनर सर्किलस में जो जीवन की गहराईयों की खोज करते है। उनसे मुझे यह भी ज्ञात हुआ है की जीसस ने खुद अपनी सूली लगवाने की योजना और षड़यंत्र किया था। जीसस ने चाहा था कि मुझे सूली लगा दी जाये। क्‍योंकि सूली लगते ही जो जीसस ने कहा है वह करोड़ों-करोड़ों वर्ष के लिए अमर हो जायेगा। और हजारों लोगों के, लाखों लोगो के काम आ सकेगा।
      इस बात की बहुत संभावना है, क्‍योंकि जूदास। जिसने ईसा को तीस रूपये में बेचा था। वह ईसा के प्‍यारे से प्‍यारे शिष्‍यों में से एक था। और यह संभव नहीं है कि जो वर्षों से ईसा के पास रहा हो, वह सिर्फ तीस रूपये में ईसा को बेच दे। सिवाय इसके कि ईसा ने उसको कहा हो कि तू कोशिश कर, दुश्‍मन से मिल जा और किसी तरह मुझे उलझादे और सूली लगवा दे, ताकि मैं जो कह रहा हूं, वह अमृत का स्‍थान ले-ले और करोड़ों लोगों का उद्धार बन जाये।

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

संभोग से समाधि की ओर - 19

समाधि : संभोग-उर्जा का अध्‍यात्‍मिक नियोजन—5


      एक मित्र ने इस संबंध में और एक बात पूछी है। उन्‍होंने पूछा है कि आपको हम सेक्‍स पर कोई आथोरिटी कोई प्रामाणिक व्‍यक्‍ति नहीं मान सकते है। हम तो आपसे ईश्‍वर के संबंध में पूछने आये थे। और आप सेक्‍स के संबंध में बताने लगे। हम तो सुनने आये थे ईश्‍वर के संबंध में तो आप हमें ईश्‍वर के संबंध में बताइए।
      उन्‍हें शायद पता नहीं कि जिस व्‍यक्‍ति को हम सेक्‍स के संबंध में भी आथोरिटी नहीं मान सकते। उससे ईश्‍वर के संबंध में पूछना फिजूल है। क्‍योंकि जो पहली सीढ़ी के संबंध में भी कुछ नहीं जानता। उससे आप अंतिम सीढ़ी के संबंध में पूछना चाहते हो? अगर सेक्‍स के संबंध में जो मैंने कहा वह स्‍वीकार्य नहीं है। तो फिर तो भूलकर ईश्‍वर के संबंध में मुझसे पूछने कभी मत आना, क्‍योंकि वह बात ही  खत्‍म हो गयी पहल कक्षा के योग्‍य भी मैं सिद्ध नहीं हुआ। तो अंतिम कक्षा के योग्‍य कैसे सिद्ध हो सकता हूं। लेकिन उनके पूछने का कारण है।
      अब तक काम और राम को दुश्‍मन की तरह देखा गया है। अब तक ऐसा समझा जाता रहा है कि जो राम की खोज करते है, उनको काम से कोई संबंध नहीं है। और जो लोग काम की यात्रा करते है। उनको अध्‍यात्‍म से कोई संबंध नहीं है। ये दोनों बातें बेवकूफी की है।
      आदमी काम की यात्रा भी राम की खोज के लिए ही करता है। वह काम का इतना तीव्र आकर्षण, राम की ही खोज है और इसीलिए काम में कभी तृप्‍ति नहीं मिलती। कभी ऐसा नहीं लगता कि सब पूरा हो गया है। वह जब तक राम न मिल जाये। तब तक लग भी नहीं सकता।

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

संभोग से समाधि की ओर - 18

समाधि : संभोग-उर्जा का अध्‍यात्‍मिक नियोजन—5
      लेकिन मैं जिस सेक्‍स की बात कर रहा हूं, वह तीसरा तल है। वह न आज तक पूरब में पैदा हुआ है, न पश्‍चिम में। वह तीसरा तल है स्‍प्रिचुअल, वह तीसरा तल है, अध्‍यात्‍मिक। शरीर के तल पर भी एक स्‍थिरता है। क्‍योंकि शरीर जड़ है। और आत्‍मा के तल पर भी स्‍थिरता है, क्‍योंकि आत्‍मा के तल पर कोई परिवर्तन कभी होता ही नहीं। वहां सब शांत है, वहां सब सनातन है। बीच में एक तल है मन का जहां पारे की तरह तरल है मन। जरा में बदल जाता है।
      पश्‍चिम मन के साथ प्रयोग कर रहा है इसलिए विवाह टूट रहा है। परिवार नष्‍ट हो रहा है। मन के साथ विवाह और परिवार खड़े नहीं रह सकते। अभी दो वर्ष में तलाक है, कल दो घंटे में तलाक हो सकता है। मन तो घंटे भर में बदल जाता है। तो पश्‍चिम का सारा समाज अस्‍त-व्‍यस्‍त हो गया है। पूरब का समाज व्‍यवस्‍थित था। लेकिन सेक्‍स की जो गहरी अनुभूति थी, वह पूरब को अपलब्‍ध नहीं हो सकी।
      एक और स्‍थिरता है, एक और घड़ी है अध्‍यात्‍म की। उस तल पर जो पति-पत्‍नी एक बार मिल जाते है या दो व्‍यक्‍ति एक बार मिल जाते है। उन्‍हें तो ऐसा लगता है कि वे अनंत जन्‍मों के लिए एक हो गये। वहां फिर कोई परिवर्तन नहीं है। उस तल पर चाहिए स्‍थिरता। उस तल पर चाहिए अनुभव।
      तो मैं जिस अनुभव की बात कर रहा हूं,जिस सेक्‍स की बात कहर रहा हूं। वह स्‍प्रिचुअल सेक्‍स हे। अध्‍यात्‍मिक अर्थ नियोजन करना चाहता हूं काम की वासना में। और अगर मेरी यह बात समझेंगे तो आपको पता चल जायेगा। कि मां का बेटे के प्रति जो प्रेम है, वह आध्‍यात्‍मिक काम है। वह स्प्रिचुअल सेक्‍स का हिस्‍सा है। आप कहेंगे यह तो बहुत उलटी बात है...मां को बेटे के प्रति काम का क्‍या संबंध?
      लेकिन जैसा मैंने कहा कि पुरूष और स्‍त्री पति और पत्‍नी एक क्षण के लिए मिलते है, एक क्षण के लिए दोनों की आत्‍माएं एक हो जाती है। और उस घड़ी में जो उन्‍हें आनंद का अनुभव होता है। वही उनको बांधने वाला हो जाता है।

सोमवार, 4 नवंबर 2019

संभोग से समाधि की ओर - 17

समाधि : संभोग-उर्जा का अध्‍यात्‍मिक नियोजन—5

     मेरे प्रिय आत्‍मजन,

मित्रों ने बहुत से प्रश्‍न पूछे है। सबसे पहले एक मित्र ने पूछा है कि मैंने बोलने के लिए सेक्‍स या काम का विषय क्‍यों चूना?
      इसकी थोड़ी सी कहानी है। एक बड़ा बाजार है। उस बड़े बाजार को कुछ लोग बंबई कहते है। उस बड़े बाजार में एक सभा थी और उस सभा में एक पंडितजी कबीर क्‍या कहते है, इस संबंध में बोलते थे। उन्‍होंने कबीर की एक पंक्‍ति कहीं और उसका अर्थ समझाया। उन्‍होंने कहा, ‘’कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर बारे अपना चले हमारे साथ।’’ उन्‍होंने यह कहा कि कबीर बाजार में खड़ा था और चिल्‍लाकर लोगों से कहने लगा कि लकड़ी उठाकर बुलाता हूं उन्‍हें जो अपने घर को जलाने की हिम्‍मत रखते हों वे हमारे साथ आ जायें।
      उस सभा में मैंने देखा कि लोग यह बात सुनकर बहुत खुश हुए। मुझे बड़ी हैरानी हुई—मुझे हैरानी यह हुई कि वह जो लोग खुश हो रहे थे। उनमें से कोई भी आपने घर को जलाने को कभी तैयार नहीं था। लेकिन उन्‍हें प्रसन्‍न देखकर मैंने समझा कि बेचारा कबीर आज होता तो कितना खुश न होता। जब तीन सौ साल पहले वह था और किसी बाजार में उसने चिल्‍लाकर कहा होगा तो एक भी आदमी खुश नहीं हुआ होगा।
      आदमी की जात बड़ी अद्भुत है। जो मर जाते है उनकी बातें सुनकर लोग खुश होते है जो जिंदा होते है, उन्‍हें मार डालने की धमकी देते है।
      मैंने सोचा कि आज कबीर होते, इस बंबई के बड़े बाजार में तो कितने खुश होते कि लोग कितने प्रसन्‍न हो रहे है। कबीर जी क्‍या कहते है, इसको सुनकर लोग प्रसन्‍न हो रहे हे। कबीर जी को सुनकर वे कभी भी प्रसन्‍न नहीं हुए थे। लेकिन लोगों को प्रसन्‍न देखकर ऐसा लगा कि जो लोग अपने घर को जलाने के लिए भी हिम्‍मत रखते है और खुश होते है, उनसे कुछ दिल की बातें आज कही जायें। तो मैं भी उसी धोखे में आ गया। जिसमें कबीर और क्राइस्‍ट और सारे लोग हमेशा आत रहे है।

रविवार, 3 नवंबर 2019

संभोग से समाधि की ओर - 16


समाधि : अहं-शून्‍यता समय शून्‍यता का अनुभव—4 

      और अब तो हम उस जगह पहुंच गये है कि शायद और पतन  की गुंजाइश नहीं है। करीब-करीब सारी दुनिया एक मेड हाऊस एक पागलखाना हो गयी है।
      अमरीका के मनोवैज्ञानिकों ने हिसाब लगया है न्‍यूयार्क जैसे नगर में केवल 18 प्रतिशत लोग मानसिक रूप से स्‍वस्‍थ कहे जा सकते है। 18 प्रतिशत, 18 प्रतिशत लोग मानसिक रूप से स्‍वास्‍थ है। तो 82 प्रतिशत लोग करीब-करीब विक्षिप्‍त होने की हालत में है।
      आप कभी अपने संबंध में कोने में बैठकर विचार करना, तो आपको पता चलेगा कि पागलपन कितना है भीतर। किसी तरह दबाये है पागलपन को, किसी तरह संभलकर चले जा रहे है। वह बात दूसरी है। जरा सा कोई धक्‍का दे-दे और कोई भी आदमी पागल हो सकता है।
      यह संभावना है कि सौ वर्ष के भीतर सारी मनुष्‍यता एक पागलखाना बन जाये। सारे लोग करीब-करीब पागल हो जाये। फिर हमें एक फायदा होगा कि पागलों के इलाज की कोई जरूरत नहीं रहेगी। एक फायदा ओर होगा कि पागलों के चिकित्‍सक नहीं होंगे। एक फायदा होगा कि कोई अनुभव नहीं करेगा कि कोई पागल है। क्‍योंकि पागल का पहला लक्षण यह है कि वह कभी नहीं मानता कि मैं पागल हूं। इतना ही फायदा होगा।
      लेकिन यह रूग्णता बढ़ती चली जाती है। यह रोग, यह अस्वस्थता, यह मानसिक चिंता और मानसिक अंधकार बढ़ता चला जाता है। क्‍या मैं आपसे कहूं कि सेक्‍स को ‘स्‍प्रीच्‍युअलाइज’ किये बिना, संभोग को आध्‍यात्‍मिक बनाये बिना कोई नयी मनुष्‍यता पैदा नहीं हो सकती है?
      इन तीन दिनों में थोड़ी सी बातें आपसे कहीं। निश्‍चित ही एक नये मनुष्‍य को जन्‍म देना है। मनुष्‍य के प्राण आतुर है उंचाईयों को छूने के लिए, आकाश में उठ जाने के लिए, चाँद तारों जैसे रोशन होने के लिए, फूलों जैसे खिल जाने के लिए, नृत्‍य के लिए, संगीत के लिए, आदमी की आत्‍मा रोती है। और प्‍यासी है। और आदमी कोल्‍हू के बैल की तरह चक्‍कर में घूमता है और उसी में समाप्‍त हो जाता है। चक्‍कर के बहार नहीं उठ पाता है। क्‍या कारण है?

शनिवार, 2 नवंबर 2019

संभोग से समाधि की ओर - 15

समाधि: अहं-शून्‍यता, समय शून्‍यता का अनुभव—4 

      लेकिन जो जानते है, वे यह कहेंगे,दो व्‍यक्‍ति अनिवार्यता: दो अलग-अलग व्‍यक्‍ति है। वे जबरदस्‍ती क्षण भी को मिल सकते है। लेकिन सदा के लिए नहीं मिल सकते। यही प्रेमियों की पीड़ा और कष्‍ट है कि निरंतर एक संघर्ष खड़ा हो जाता है। जिसे प्रेम करते है, उसी से संघर्ष करते है, उसी से तनाव, अशांति और द्वेष खड़ा हो जाता है। क्‍योंकि ऐसा प्रतीत होने लगता है। जिससे मैं मिलना चाहता हूं, शायद वह मिलने को तैयार नहीं। इसलिए मिलना पूरा नहीं हो पाता।
      लेकिन इसमें व्‍यक्‍तियों का कसूर नहीं है। दो व्‍यक्‍ति अनंत कालीन तल पर नहीं मिल सकते। हम क्षण के लिए मिल सकते है। क्‍योंकि सीमित है। उनके मिलने का क्षण भी सीमित होगा। अगर अनंत मिलन चाहिए तो वह परमात्‍मा से हो सकता है। वह समस्‍त अस्‍तित्‍व से हो सकता है।
      जो लोग संभोग की गहराई में उतरते हैं, उन्‍हें पता चलता है, एक क्षण मिलन का इतना आनंद है, तो अनंत काल के लिए मिल जाने का कितना आनंद होगा। उसका तो हिसाब लगाना मुश्किल होगा। एक क्षण मिलन की इतनी अद्भुत प्रतीति है तो अनंत से मिल जाने की कितनी प्रतीति होगी,कैसी प्रतीति होगी।
      जैसे एक घर में दीया जल रहा हो और उस दीये से हम हिसाब लगाना चाहें कि सूरज की रोशनी में कितने दीये जल रहे है। हिसाब लगाना बहुत मुशिकल है। एक दिया बहुत छोटी बात है। सूरज बड़ी बात है। सूरज पृथ्‍वी से साठ हजार गुणा बड़ा है। दस करोड़ मील दूर है। तब भी हमें तपाता है। तब भी हमें झुलसा देता है। उतने बड़े सूरज को एक छोटे से दीये से हम तौलने जायें तो कैसे तोल सकेंगे?
      लेकिन नहीं, एक दीये से सूरज को तौला जा सकता है। क्‍योंकि दीया भी सीमित है और सूरज भी सीमित है। दीये में एक कैंडल का लाइट है तो अरबों-खरबों कैंडल का लाइट होगा सूरज में। लेकिन सीमा आंकी जा सकती है, तौली जा सकती है।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

संभोग से समाधि की ओर - 14

समाधि : अहं-शून्‍यता, समय शून्‍यता का अनुभव—4 

     एक बात, पहली बात स्‍पष्‍ट कर लेनी जरूरी है वह हय कि यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि हम पैदा हो गये है, इसलिए हमें पता है—क्‍या है काम, क्‍या है संभोग। नहीं पता नहीं है। और नहीं पता होने के कारण जीवन पूरे समय काम और सेक्‍स में उलझा रहता है और व्‍यतीत होता है।
      मैंने आपसे कहा, पशुओं का बंधा हुआ समय है। उनकी ऋतु है। उनके मौसम है। आदमी का कोई बंधा हुआ समय नहीं है। क्‍यों? पशु शायद मनुष्‍य से ज्‍यादा संभोग की गहराई में उतरने में समर्थ है और मनुष्‍य उतना भी समर्थ नहीं रह गया है।
      जिन लोगों ने जीवन के इन तलों पर बहुत खोज की है और गहराइयों में गये है और  जिन लोगों ने जीवन के बहुत से अनुभव संग्रहीत किये है। उनको यह जानना, यह सुत्र उपलब्‍ध हुआ है कि अगर संभोग एक मिनट तक रुकेगा तो आदमी दूसरे दिन फिर संभोग के लिए लालायित हो जायेगा। अगर तीन मिनट तक रूक सके तो यह सप्‍ताह तक उसे सेक्‍स की वह याद भी नहीं आयेगी। और अगर साम मिनट तक रूक सके तो तीन महीने के लिए सेक्‍स से इस तरह मुक्‍त हो जायेगा कि उसकी कल्‍पना में भी विचार प्रविष्‍ट नहीं होगा। और अगर तीन घंटे तक रूक सके तो जीवन भर के लिए मुक्‍त हो जायेगा। जीवन में उसको कल्‍पना भी नहीं उठेगी।
      लेकिन सामान्‍यत: क्षण भर का अनुभव है मनुष्‍य का। तीन घंटे की कल्‍पना करनी भी मुश्‍किल है। लेकिन मैं आपसे कहता हूं के तीन घंटे अगर संभोग की स्‍थिति में, उस समाधि की दशा में व्‍यक्‍ति रूक जाये तो एक संभोग पूरे जीवन के लिए सेक्‍स से मुक्‍त करने के लिए पर्याप्‍त है। इतनी तृप्‍ति पीछे छोड़ जाता है—इतनी अनुभव,इतनी बोध छोड़ जाता है कि जीवन भर के लिए पर्याप्‍त हो जाता है। एक संभोग के बाद व्‍यक्‍ति ब्रह्मचर्य को अपलब्‍ध हो सकता है।