शनिवार, 31 अगस्त 2019

योग- अस्पर्श भाव!

'मैं जगत में हूं और जगत में नहीं भी हूं' - ऐसा जब कोई अनुभव कर पाता है, तभी जीवन का रहस्य उसे ज्ञात होता है। जगत में दिखाई पड़ना एक बात है, जगत में होना बिलकुल दूसरी। जगत में दिखलाई पड़ना शारीरिक घटना है, जगत में होना आत्मिक दुर्घटना। जब-तक जीवन है, तब तक शरीर जगत में होगा ही। लेकिन, जिसे 'उस' जीवन को जानना हो- जिसका कि कोई अंत नहीं आता है- उसे स्वयं को जगत के बाहर लेना होता है।
एक संन्यासी ने सुना कि देश का सम्राट परम ज्ञान को उपलब्ध हो गया है। उस संन्यासी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। क्या यह संभव है कि जिसने कुछ भी नहीं त्यागा है, वह परमात्मा को पा सके? वह संन्यासी राजधानी पहुंचा और राजा का अतिथि बना। उसने राजा को बहुमूल्य वस्त्र पहने देखा, स्वर्ण पात्रों में स्वादिष्ट भोजन करते देखा- रात्रि में संगीत और नृत्य का आनंद लेते हुए भी। उसका संदेह अनंत होता जा रहा था। वह तो सर्वथा स्तब्ध ही हो गया था।
रात्रि किसी भांति बीती। संन्यासी संदेह और चिंता से सो भी नहीं सका। सुबह ही राजा ने नदी पर स्नान करने के लिए उसे आमंत्रित किया। राजा और संन्यासी नदी में उतरे। वे स्नान करते ही थे कि अचानक उस शांत, निस्तब्ध वातावरण को एक तीव्र कोलाहल ने भर दिया- आग, आग, आग! नदी तट पर खड़ा राजमहल धू-धूकर जल रहा था और उसकी लपटें तेजी से घाट की ओर बढ़ रही थीं। अपना कौपीन बचाने के लिए संन्यासी ने स्वयं को सीढि़यों की ओर भागते हुए पाया। उसे स्मरण ही न रहा कि साथ में सम्राट भी है। लेकिन लौटकर देखा, तो पाया कि राजा जल में ही खड़े हैं और कह रहे हैं : ''हे मुनि, यदि समस्त राज्य भी जल जावे, तो भी मेरा कुछ भी नहीं जलता है।'' सम्राट थे जनक और मुनि थे शुकदेव।
लोग मुझ से पूछते हैं : योग क्या है? मैं उनसे कहता हूं : अस्पर्श भाव। ऐसे जीओ कि जैसे तुम जहां हो, वहां नहीं हो। चेतना बाह्य अस्पर्शिता हो, तो स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाती है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

सम्यक-जागरण ही जीवन विजय

दोपहर तप गई है। पलाश के वृक्षों पर फूल अंगारों की तरह चमक रहे हैं।
एक सुनसान रास्ते से गुजरता हूँ। बांसों का झुरमुट है और उनकी छाया भली लगती है।
कोई परिचित चिड़िया गीत गाती है। उसके निमंत्रण को मान वहीं रुक जाता हूँ।
एक व्यक्ति साथ है। पूछ रहे हैं, 'क्रोध को कैसे जीतें, काम को कैसे जीते?' यह बात तो अब रोज-रोज पूछी जाती है। इसके पूछने में ही भूल है, यही उनसे कहता हूँ।
समस्या जीतने की है ही नहीं। समस्या मात्र जानने की है। हम न क्रोध को जानते हैं और न काम को जानते हैं। यह अज्ञान ही हमारी पराजय है।

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-10

दिनांक 10 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
पिय को खोजन मैं चली, पिया मिलन कैसे हो?

योग नीलम!
पिया दूर नहीं है। इतना भी दूर नहीं कि मिलन की भी जरूरत हो। सिर्फ विस्मरण हुआ है, विछोह नहीं। विछोह हो ही नहीं सकता। पिया तो भीतर विराजमान है। वही तो हमारी श्वासों की श्वास है। वही तो हमारे हृदय की धड़कन है। उसके बिना तो हमारा कोई होना नहीं है। वह है तो हम हैं। जैसे सागर है तो लहरें हैं। सागर तो बिना लहरों के हो सकता है, मगर लहरें बिना सागर के नहीं हो सकतीं।
लेकिन लहर को एक भ्रांति हो सकती है--इस बात की भ्रांति कि मैं सागर से पृथक हूं। बस उसी भ्रांति में विस्मरण हो जाता है। विस्मरण ही होता है, विछोह तो हो सकता नहीं।
उस प्यारे की सारी खोज स्मरण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है--पुनर्स्मरण। इसलिए संतों ने उसकी खोज का नाम दिया: सुरति।
सुरति का अर्थ होता है स्मरण, स्मृति। सुरति शब्द स्मृति का ही लोक-प्रचलित रूप है। बुद्ध ने जिसे स्मृति कहा है, वही आते-आते कबीर और नानक तक, सुरति हो गया। प्यारा हो गया, स्मृति से भी प्यारा हो गया। लोगों के हाथों में शब्द सौंदर्य ले लेते हैं। उनका इरछा-तिरछापन चला जाता है। उनकी व्याकरण खो जाती है। उनका काव्य प्रकट हो जाता है। स्मृति में व्याकरण है, भाषा की शुद्धि है; लेकिन वह गोलाई नहीं, वह सौंदर्य नहीं, जो सुरति में है। स्मृति में थोड़ी परुषता है, थोड़ी कठोरता है। सुरति में कोमलता है। लेकिन अर्थ वही है। उसका स्मरण भर करना है।
स्मरण में कौन सी चीज बाधा बन रही है?

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-09

दिनांक 09 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
बेइरादा नजर तुमसे टकरा गई,
जिंदगी में अचानक बहार आ गई।
मौत क्या है जमाने को समझाऊं क्या,
एक मुसाफिर को रस्ते में नींद आ गई।
रुख से परदा उठा, चांद शरमा गया,
जुल्फ बिखरी तो काली घटा छा गई।
दिल में पहले सी अब वो हलचल नहीं,
अब मुहब्बत में मिटने की घड़ी आ गई।

आनंद मोहम्मद!
मनुष्य के इरादे कभी भी परमात्मा तक नहीं पहुंच पाते--नहीं पहुंच सकते हैं। मनुष्य के इरादे मनुष्य की वासनाओं, इच्छाओं का ही विस्तार हैं। मनुष्य तो परमात्मा को भी चाहेगा, तो परमात्मा को चाहने के लिए नहीं, कुछ और चाहने के लिए--धन के लिए, पद के लिए, प्रतिष्ठा के लिए।
मंदिर हैं, मस्जिद हैं, गिरजे हैं, गुरुद्वारे हैं। इतनी पूजा है, इतनी प्रार्थना, इतनी आराधना--और सब झूठी। इरादे ही नेक नहीं हैं, बुनियाद में ही भूल है। लोग प्रार्थनाएं कर रहे हैं, लेकिन प्रार्थनाएं दबी हुई वासनाओं के ही रूप हैं--कुछ मांग है।
और जहां मांग है, वहां कैसी प्रार्थना! प्रार्थना धन्यवाद है, अनुग्रह का भाव है। प्रार्थना इस बात का अहोभाव है कि इतना दिया है जिसके कि मैं योग्य नहीं था! मेरा पात्र छोटा है, मेरी गागर को सागर से भर दिया है! और चाहूं भी तो क्या चाहूं! और मांगूं भी तो क्या मांगूं! न मेरी योग्यता है, न मेरा कुछ अर्जन--फिर भी मुझ पर आकाश बरसा है! जीवन दिया है, जीवन को सौंदर्य दिया है, अनुभव की क्षमता दी है, चैतन्य दिया है, चैतन्य में संभावना दी है मुक्ति की--और कौन से मोती मांगने हैं!

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-08

दिनांक 08 जून सन् 1980, 
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
मीरा मेरी प्रेरणा-स्रोत रही है और कृष्ण मेरे इष्टदेव। शांत क्षणों में मैंने भी मीरा जैसे भक्ति-भाव की कल्पना तथा चाह की है और उसी के अनुरूप कुछ प्रयास भी किया। मगर प्राणों में उतनी पुलक नहीं उठी कि मैं नाच सकूं। फिर मैं आपके संपर्क में आया; आपका शिष्य हुआ। मैं तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा। मगर कृष्ण से अब कुछ लगाव नहीं रहा। अब तो उस छवि के पास आते और आंखें मिलाते भी संकोच लगता है, जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी अर्चना की। यह क्या है भगवान?

कृष्ण चैतन्य!
कल्पना और सत्य में बड़ा भेद है। मीरा के लिए कृष्ण कल्पना नहीं हैं, कृष्ण बाहर भी नहीं हैं। मीरा के लिए कृष्ण उसके अंतर्तम में विराजमान हैं। वह जिस कृष्ण की बात कर रही है, कृष्ण की मूर्ति में तुम उस कृष्ण को नहीं पाओगे। उस कृष्ण का कोई रूप नहीं है, कोई आकार नहीं है। तुमने कल्पना की, वहीं चूक हो गई, वहीं भेद पड़ गया।
मीरा के लिए कृष्ण एक आंतरिक सत्य हैं और तुम्हारे लिए केवल कल्पना की बात। कल्पना से कैसे तुम तरंगित होते, कैसे नाच उठता, कैसे पुलक जगती? यूं समझो कि जैसे भोजन की कोई कल्पना करे, उससे कैसे पेट भरे? प्यास लगी हो और पानी की कोई कल्पना करे, उससे कैसे तृप्ति हो? पानी चाहिए।
लेकिन यह तुम्हारी ही भ्रांति नहीं थी, यह करोड़ों-करोड़ों लोगों की भ्रांति है। कल्पना सस्ती होती है, सत्य मंहगा--सत्य बहुत मंहगा--प्राणों से दाम चुकाने पड़ते हैं। कल्पना के लिए तो कुछ करना ही नहीं होता, जब चाहो तब कर लो, मन की मौज है।

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-07

दिनांक 07 जून सन् 1980, 
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
आप सत्य को जैसा है वैसा ही कह देते हैं--दो टूक। इसीलिए आपके शत्रु पैदा हो जाते हैं। जैसे आपने कल दयानंद के संबंध में कहा। बात सच है, पर चुभती है। क्या आप ऐसे संबंधों में चुप ही रहें तो ठीक न हो?

सत्यानंद!
सत्यानंद तुम्हें नाम दिया मैंने और तुम मुझे असत्य में आनंद लेने की सलाह दे रहे हो! थोड़ा तो सोचा होता। मौनं सम्मति लक्षणम्--चुप रह जाना भी सम्मति का लक्षण है। फिर मैं कोई राजनेता नहीं हूं कि वह कहूं जो लोगों को पसंद पड़े; कि वह कहूं जो लोगों को भाए। मैं तो वही कह सकता हूं जैसा है, फिर चाहे जो परिणाम हो। मित्र बनें, शत्रु बनें--वह बात गौण है।
जीसस के कितने मित्र थे? बहुत ज्यादा नहीं। ज्यादा होते तो जीसस को सूली देनी आसान न होती। सुकरात के कितने मित्र थे? ज्यादा नहीं।
लोग तो असत्य में जीते हैं, इसलिए जब भी सत्य कहा जाएगा--चुभन होगी, पीड़ा होगी, बौखलाहट होगी। यह स्वाभाविक है। इसमें उनका कुछ कसूर भी नहीं। लेकिन मेरा भी कुछ कसूर नहीं है। मैं वही कह सकता हूं जैसा मुझे दिखाई पड़ता है।

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-06

दिनांक 06 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
प्रवचन में फल के बारे में आपने कहा कि मैं चुप रह गया और कुछ नहीं बोला। भगवान, इतने सालों से आपने इतने फल खिलाए हैं कि अब न तो कुछ बोलने को रहा है, न कुछ पूछने को। सब कुछ मिल गया है। अब तो बस आपकी अनुकंपा मात्र रह गई है। आपका लाखों, करोड़ों, अरबों बार अनुग्रह, उपकार!

स्वामी ज्ञान निर्मल उर्फ फली भाई!
मैं जिस फल की बात कर रहा हूं, उस फल के संबंध में न बोलना ही ठीक है। कबीर ने कहा है: हीरा पायो गांठ गठियायो, बाको बार-बार क्यों खोले। हीरा मिल जाए तो गांठ में बांध लेना चाहिए, उसे बार-बार खोलने की कोई जरूरत नहीं है; उसे खोल-खोल कर न देखना है, न दिखाना है; उसके प्रदर्शन का भी कोई अर्थ नहीं है।
यही उचित है कि चुप रह जाओ। यही उचित है कि आनंद से मुस्कुराओ। बोलो कुछ मत, क्योंकि शब्द उस रस को कहना भी चाहें तो कह न सकेंगे। भाषा प्रकट भी करना चाहे तो न कभी कर पाई है, न कभी कर पाएगी। वह तो राज है, जो राज ही रहता है। हृदय में उसकी गूंज होती है, तार छिड़ जाते हैं रोएं-रोएं में, तन-मन-प्राण में उसका नाद गूंजता है। अनुकंपा मालूम होगी, अनुग्रह का भाव उठेगा, आनंद होगा, आंसू झर सकते हैं, नाच घट सकता है, लेकिन कहने को कुछ भी नहीं है।

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-05

दिनांक 05 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
आपको सुनते-सुनते रोना आ जाता है। अब सक्रिय ध्यान के उत्सव के समय पर रोना फूट पड़ता है। यह क्या है? ध्यान के बीच-बीच ऐसा भाव जगता है कि यह शरीर अब रुकावट है; यह कैसे छूटे--ऐसा भाव सघन होता जाता है। यह क्यों? समझाने की अनुकंपा करें।

अक्षय विवेक!
मनुष्य को ऐसे गलत संस्कार दिए गए हैं कि न तो वह जी भर कर कभी रोया है, न जी भर कर कभी हंसा है। जी भर कर जीया ही नहीं है। किसी पहलू से, किसी आयाम में, जी भर कर कोई काम किया ही नहीं, सब अधूरा-अधूरा है! और इसलिए भीतर बहुत सी चीजें त्रिशंकु की भांति लटकी रह जाती हैं।

मैं तो कहता हूं ध्यान उत्सव है, लेकिन यह घटना जो तुम्हें घट रही है, औरों को भी घटती है। उत्सव मनाते-मनाते अचानक रोना न मालूम किस कोने से उभर आता है! दबा पड़ा होगा कहीं; जन्मों से दबा पड़ा होगा। विशेषकर पुरुषों को। क्योंकि बचपन से ही हम सिखाते हैं लड़कों को: रोना मत! रोती हैं लड़कियां। तुम हो मर्द बच्चे, रोना तुम्हारा काम नहीं है।
यह बात झूठ है। यह सरासर झूठ है। प्रकृति ने पुरुष और स्त्री की आंखों में आंसुओं की ग्रंथियां एक जैसी बनाई हैं। पुरुष की आंखों में आंसू की ग्रंथियां छोटी नहीं हैं स्त्रियों से। इसलिए एक बात तो तय है--प्रकृति चाहती थी दोनों बराबर रोएं। लेकिन पुरुष ने एक अहंकार निर्मित किया है कि पुरुष को रोना नहीं है। टूट जाए भला, रोए नहीं। मिट जाए भला, रोए नहीं। रोकर क्या अपनी कमजोरी प्रकट करनी है!

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-04

दिनांक 04 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-चौथा

प्रश्न-सार:

1—आप मेरी सुहागरातों के मालिक हैं। मुझे कभी वैधव्य का दुख देना ही नहीं। बस इतनी ही चाह है--जीओ हजारों साल!

2—मैं नौ वर्षों से आर्यसमाज में पुरोहित था। पांच वर्षों से आपके संपर्क में हूं। मैं पांच जून को संन्यास लेकर जा रहा हूं। मैं आर्यसमाज से घूमने के बहाने पच्चीस दिन की छुट्टी लेकर यहां आया था। अब मैं माला लेकर जाऊंगा। वे लोग मेरे दुश्मन हो जाएंगे, मुझे धक्के देकर वहां से निकाल देंगे। ऐसी अवस्था में मैं क्या करूं?

3—हम कैसे आपसे जुड़ जाएं? कृपया बतलाएं।

4—आप स्त्रियों के प्रति सामान्यतः अत्यंत करुणा भाव से सराहना करके उनको सम्मान देते हैं। मगर जब स्त्री की बात पत्नी के रूप में करते हैं, तब उसे डांटते हैं और बहुत अलग रूप में चित्रित करते हैं। ऐसा क्यों?

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-03

दिनांक 03 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
बाईस मई को सुबह प्रवचन में एक युवक ने छुरा फेंक कर आपकी हत्या करने का प्रयास किया, जो निष्फल रहा। आश्चर्य की बात है कि इस घटना की आलोचना किसी भी अखबार वाले ने नहीं की, न ही किसी उच्च दर्जे के व्यक्ति ने इसके बारे में कुछ वक्तव्य दिया! आश्रमवासियों ने उस व्यक्ति के साथ जो प्रेमपूर्ण व्यवहार किया, उसकी प्रशंसा भी किसी अखबार या पत्रिका में नहीं छपी।
बुद्धिजीवी और साधारणजन, सबके सब उपेक्षा से क्यों भरे हैं?
भगवान, ऐसे मुर्दा देश में आपका प्रमुख आश्रम है, जब कि यहां तो शाखा होना भी बेकाम दिखता है।

कैलाश गोस्वामी!
मैं जो कह रहा हूं, मैं जो कर रहा हूं, वह किसी देश में किया जाए, किसी जाति में किया जाए, सभी जगह यही व्यवहार होगा। भारत की इसमें कोई विशिष्टता नहीं है। व्यवहार ऐसा न होता, तो विशिष्टता होती।
सुकरात तो भारत में पैदा नहीं हुआ था, दूर यूनान में पैदा हुआ था, और आज भी नहीं, पच्चीस सौ वर्ष पहले--पर व्यवहार क्या हुआ? यही उपेक्षा। यही विरोध। अलहिल्लाज मंसूर तो भारत में पैदा नहीं हुआ था। जीसस क्राइस्ट तो भारत में पैदा नहीं हुए थे।

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-02

दिनांक 02 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
आह कितना आनंद! आह कितनी पीड़ा!

विनोद भारती!
जीवन की झाड़ी में जहां गुलाब के फूल खिलते हैं, वहां कांटे भी खिलते हैं। लेकिन फूल खिलें तो कांटे भी प्रीतिकर हैं, पीड़ा भी मधुर है। कांटे दुखदायी हो जाते हैं जब फूल नहीं खिलते, कांटे ही कांटे बचते हैं। कांटों में दुख नहीं है, फूलों के अभाव में दुख है। फूलों के साथ खिलें--जी भर कर खिलें--तो फूलों के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, फूलों को पृष्ठभूमि देते हैं।

गुलाब की झाड़ी अधूरी होगी बिना कांटों के। दिन अधूरा होगा बिना रात के। लेकिन रात ही रात रह जाए तो नरक हो जाएगा। अधिक लोगों के जीवन में यही हुआ है। बस रात ही रात रह गई है। कंकड़-पत्थर ही कंकड़-पत्थर। व्यर्थ के बोझ से दबे हैं। अर्थ की कोई गरिमा नहीं है।
यह अनूठा अनुभव होता है। जब आनंद के फूल खिलते हैं तब पहली बार यह पता चलता है कि आनंद अपने से विपरीत को भी नये अर्थ दे देता है; अपने से विपरीत को भी नया रस दे देता है। आनंद घटता है तो हीरे-मोती ही नहीं बरसते, अचानक कंकड़-पत्थर भी हीरे-मोती हो जाते हैं। यही आनंद का जादू है। यही उसकी दिव्यता है। यही उसकी भगवत्ता है।

सोमवार, 5 अगस्त 2019

पिया को खोजन मैं चली - प्रवचन-01

दिनांक 01 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान!
नयी प्रवचनमाला का शीर्षक है: पिय को खोजन मैं चली। हमें इसका आशय समझाने की अनुकंपा करें!

आनंद प्रतिभा!
पलटू का प्रसिद्ध वचन है:
पलटू दिवाल कहकहा, मत कोई झांकन जाय।
पिय को खोजन मैं चली, आपुई गई हिराय।।
यह कहानी तुमने सुनी होगी कि चीन की दीवाल के एक खास स्थल पर एक चमत्कारपूर्ण घटना घटती है। कहानी ही है, लेकिन अर्थपूर्ण है। दीवाल के उस खास स्थल पर जो भी चढ़ कर दूसरी तरफ झांकता है, जोर से हंसता है और कूद पड़ता है, फिर लौटता नहीं। बहुत लोग उस दीवाल पर यह कस्त करके झांकने गए कि न तो हम हंसेंगे, न हम कूदेंगे।
मगर कोई भी अपवाद सिद्ध नहीं हुआ। जो भी गया, हंसा भी, कूदा भी, खो भी गया। कोई भी लौट कर बता नहीं पाता--क्या देखा, क्यों हंसे, क्यों कूदे, कहां खो गए!