मंगलवार, 15 जनवरी 2019

परम निधि की खोज!

आदर्श को चुनने में कभी कंजूसी मत करना। वह तो ऊंचे से ऊंचा होना चाहिए। वस्तुत: तो परमात्मा से नीचे जो है, वह आदर्श ही नहीं है। आदर्श उसकी भविष्यवाणी है, जो कि अंतत: तुम करके दिखा दोगे। वह तुम्हारे स्वरूप की परम अभिव्यक्ति की घोषणा है।
सुबह से सांझ तक बहुत लोग मेरे पास आते हैं। उनसे मैं पूछता हूं कि तुम्हारे प्राण कहां हैं? एकाएक वे समझ नहीं पाते। फिर, मैं उनसे कहता हूं कि प्रत्येक प्राण उसके जीवन दर्शन में होते हैं वह जो होना चाहता है, जो पाना चाहता है, उसमें ही उसके प्राण होते हैं। और जो कुछ भी नहीं होना चाहता है, कुछ भी नहीं पाना चाहता है, वही निष्प्राण है। यह हमारे हाथों में है कि हम अपने प्राण कहां रखें। जो जितनी ऊंचाइयों या निचाइयों पर उन्हें रखता है, उतनी ही ऊ‌र्ध्वगामी या अधोगामी उसकी जीवनधारा हो जाती है और श्वास-प्रश्वास में स्मृति उसी ओर दौड़ती रहती है। और, स्मृति जिस दिशा में दौड़ती है, क्रमश: विचार उसी पथ पर बीजारोपित होने लगते हैं। विचार आचार के बीज हैं। आज जो विचार हैं, कल वे ही अनुकूल अवसर पाकर अंकुरित हो, आचार बन जाते हैं। इसलिए जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है- अपने प्राणों को रखने के लिए सम्यक स्थल चुनना। जो इस चुनाव के बिना चलते हैं, वे उन नावों की भांति हैं, जो सागर में छोड़ दी गई हैं, लेकिन जिन्हें गंतव्य को कोई बोध नहीं। ऐसी नावें निकलने के पहले ही डूबी समझनी चाहिए। जो अविवेक और प्रमाद में बहते रहते हैं, उनके प्राण उनकी दैहिक वासनाओं में ही केंद्रित हो जाते हैं। ऐसे मनुष्य, शरीर के ऊपर और किसी सत्य से परिचित नहीं हो पाते। वे उस परम निधि से वंचित रह जाते हैं, जोकि उनके भीतर छिपी हुई थी।
अविवेक और प्रमाद से जागकर आंखें खोलो और उन हिमाच्छादित जीवन शिखरों को देखो, जो कि सूर्य के प्रकाश में चमक रहे हैं और तुम्हें अपनी ओर बुला रहे हैं। यदि तुम अपने हृदय में उन तक पहुंचने की आकांक्षा को जन्म दे सको, तो वे जरा भी दूर नहीं हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 24

’जब किसी व्‍यक्‍ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव उठे तो उसे उस व्‍यक्‍ति पर मत आरोपित करे।‘’

      अगर हमें किसी के विरूद्ध घृणा अनुभव हो या किसी के लिए प्रेम अनुभव हो तो हम क्‍या करते है? हम उस घृणा या प्रेम को उस व्‍यक्‍ति पर आरोपित कर देते है। अगर तुम मेरे प्रति घृणा अनुभव करते हो तो उस घृणा के ही कारण तुम अपने को बिलकुल भूल जाते हो। और मैं तुम्‍हारा एक मात्र लक्ष्‍य या विषय बन जाता हूं। वैसे ही जब तुम मुझे प्रेम करते हो तो भी तुम अपने को बिलकुल ही भूल जाते हो। और मुझे अपना एक मात्र विषय बना लेते हो। तुम अपनी घृणा को प्रेम को या जो भी भाव हो, उसे मुझे पर प्रक्षेपित कर देते हो। उस दशा में तुम आंतरिक केंद्र को भूल जाते हो। और दूसरे को अपना केंद्र बना लेते हो।

      यह सूत्र कहता है। कि जब किसी के प्रति घृणा, प्रेम या  कोई और भाव पक्ष या विपक्ष में पैदा हो तो उसको, उस भाव को उस व्‍यक्‍ति पर आरोपित मत करो। बल्‍कि स्‍मरण रखो कि उस भाव का स्‍त्रोत तुम स्‍वयं हो।
      मैं तुम्‍हें प्रेम करता हूं। इसमें सामान्‍य भाव यह है कि तुम मेरे प्रेम के स्‍त्रोत हो। लेकिन यह हकीकत नहीं है। मैं ही स्‍त्रोत हूं, तुम तो महज वह पर्दा हो जिस पर मैं अपने प्रेम को प्रक्षेपित करता हूं। तुम मात्र पर्दा हो। मैं अपना प्रेम तुम पर प्रक्षेपित करता हूं। और मैं कहता हूं कि तुम मेरे प्रेम के स्‍त्रोत हो। लेकिन यह तथ्‍य नहीं है। यह झूठ है। यह मेरी ही प्रेम की ऊर्जा है जिसे मैं तुम पर प्रक्षेपित कर रहा हूं।
इस प्रेम की ऊर्जा की प्रभा में पड़ कर तुम सुंदर हो जाते हो। हो सकता है। किसी के लिए तुम सुंदर न होओ। हो सकता है कि किसी के लिए तुम बिलकुल कुरूप और विकर्षण से भरे होओ। ऐसा क्‍यों? अगर तुम ही प्रेम के स्‍त्रोत हो तो प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को तुम्‍हारे प्रति प्रेमपूर्ण होना चाहिए।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 23

‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो। इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की अनुपस्‍थिति को अनुभव करो। फिर विषय-भाव और अनुपस्‍थिति भाव को भी छोड़कर आत्‍मोपलब्‍ध होओ।‘’

      ‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो।‘’
            कोई भी विषय, उदाहरण के लिए एक गुलाब का फूल है—कोई भी चीज चलेगी।
      ‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो....’’
      देखने से काम नहीं चलेगा, अनुभव करना है। तुम गुलाब के फूल को देखते हो, लेकिन उससे तुम्‍हारा ह्रदय आंदोलित नहीं होता है। तब तुम गुलाब को अनुभव नहीं करते हो। अन्‍यथा तुम रोते और चीखते, अन्‍यथा तुम हंसते और नाचते। तुम गुलाब को महसूस नहीं कर रहे हो, तुम सिर्फ गुलाब को देख रहे हो।

      और तुम्‍हारा देखना भी पूरा नहीं है। अधूरा है। तुम कभी किसी चीज को पूरा नहीं देखते अतीत हमेशा बीच में आता है। गुलाब को देखते ही अतीत-स्‍मृति कहती है कि यह गुलाब है। और यह कहकर तुम आगे बढ़ जाते हो। लेकिन तब तुमने सच में गुलाब को नहीं देखा। जब मन कहता है कि यह गुलाब है तो उसका अर्थ हुआ कि तुम इसके बारे में सब कुछ जानते हो, क्‍योंकि तुमने बहुत गुलाब देखे है। मन कहता है कि अब और क्‍या जानना है। आगे बढ़ो। और आगे बढ़ जाते हो।
      यह देखना अधूरा है। यह देखना-देखना नहीं है। गुलाब के फूल के साथ रहो। उसे देखो और फिर उसे महसूस करो। उसे अनुभव करो। अनुभव करने के लिए क्‍या करना है? उसे स्‍पर्श करो, उसे सूंघो; उसे गहरा शारीरिक अनुभव बनने दो। पहले अपनी आंखों को बंद करो और गुलाब को अपने पूरे चेहरे को छूने दो। इस स्‍पर्श को महसूस करो। फिर गुलाब को आँख से स्‍पर्श करो। फिर गुलाब को नाक से सूंधो। फिर गुलाब के पास ह्रदय को ले जाओ और उसके साथ मौन हो जाओ। गुलाब को अपना भाव अर्पित करो। सब कुछ भूल जाओ। सारी दूनिया को भूल जाओ। गुलाब के साथ समग्रत: रहो।
      ‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो। इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की अनुपस्‍थिति को अनुभव करो।
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 22

‘’अपने अवधान को ऐसी जगह रखो, जहां अतीत की किसी घटना को देख रहे हो और अपने शरीर को भी। रूप के वर्तमान लक्षण खो जायेगे, और तुम रूपांतरित हो जाओगे।‘’

      तुम अपने अतीत को याद कर रहे हो। चाहे वह कोई भी घटना हो; तुम्‍हारा बचपन, तुम्‍हारा प्रेम, पिता या माता की मृत्‍यु, कुछ भी हो सकता है। उसे देखो। लेकिन उससे एकात्‍म मत होओ। उसे ऐसे देखो जैसे वह किसी और जीवन में घटा है। उसे ऐसे देखो जैसे वह घटना पर्दे पर फिर घट रही हो, फिल्‍माई जा रही हो, और तुम उसे देख रहे हो—उससे अलग, तटस्‍थ साक्षी की तरह।
      उस फिल्‍म में, कथा में तुम्‍हारा बीता हुआ रूप फिर उभर जाएगा। यदि तुम अपनी कोई प्रेम-कथा स्‍मरण कर रहे हो, अपने प्रेम की पहली घटना, तो तुम अपनी प्रेमिका के साथ स्‍मृति के पर्दे पर प्रकट होओगे और तुम्‍हारा अतीत का रूप प्रेमिका के साथ उभर आएगा। अन्‍यथा तुम उसे याद न कर सकोगे।
अपने इस अतीत के रूप से भी तादात्‍म्‍य हटा लो। पूरी घटना को ऐसे देखो मानो कोई दूसरा पुरूष किसी दूसरी स्‍त्री को प्रेम कर रहा हो। मानो पूरी कथा से तुम्‍हारा कुछ लेना-देना नहीं है। तुम महज दृष्‍टा हो।
      यह विधि बहुत-बहुत बुनियादी है। इसे बहुत प्रयोग में लाया गया—विशेषकर बुद्ध के द्वारा। और इस विधि के अनेक प्रकार है। इस विधि के प्रयोग का अपना ढंग तुम खुद खाज ले सकते हो। उदाहरण के लिए, रात में जब तुम सोने लगो, गहरी नींद में उतरने लगो तो पूरे दिन के अपने जीवन को याद करो। इस याद की दिशा उलटी होगी, यानी उसे सुबह से न शुरू कर वहां से शुरू करो जहां तुम हो। अभी तुम बिस्‍तरे में पड़े हो तो बिस्‍तर में लेटने से शुरू कर पीछे लोटों। और इस प्रकार कदम-कदम पीछे चलकर सुबह की उस पहली घटना पर पहु्ंचो जब तुम नींद से जागे थे अतीत स्‍मरण के इस क्रम में सतत याद रखो कि पूरी घटना से तुम पृथक हो, अछूते हो।
      उदाहरण के लिए, पिछले पहर तुम्‍हारा किसी ने अपमान किया था; तुम अपने रूप को अपमानित होते देखो, लेकिन द्रष्‍टा बने रहो। तुम्‍हें उस घटना में फिर नहीं उलझना है, फिर क्रोध नहीं करना है। अगर तुमने क्रोध किया तो  तादात्‍म्‍य पैदा हो गया। तब ध्‍यान का बिंदु तुम्‍हारे हाथ से छूट गया।
      इसलिए क्रोध मत करो। वह अभी तुम्‍हें अपमानित नहीं कर रहा है। वह तुम्‍हारे पिछले पहर के रूप को अपमानित कर रहा है। वह रूप अब नहीं है। तुम तो एक बहती नदी की तरह हो जिसमें तुम्‍हारे रूप भी बह रहे है। बचपन में तुम्‍हारा एक रूप था, अब वह नहीं रहा। वह जा चुका। नदी की भांति तुम निरंतर बदलते जा रहे हो।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 21

‘’अपने अमृत भरे शरीर के किसी अंग को सुई से भेदो, और भद्रता के साथ उस भेदन में प्रवेश करो, और आंतरिक शुद्धि को उपलब्‍ध होओ।‘’

      यह सूत्र कहता है: ‘’अपने अमृत भरे शरीर के किसी अंग को सुई से भेदों.....।‘’
      तुम्‍हारा शरीर मात्र शरीर नहीं है, वह तुमसे भरा है, और यह तुम अमृत हो। अपने शरीर को भेदों, उसमें छेद करो। जब तुम अपने शरीर को छेदते, सिर्फ शरीर छिदता है। लेकिन तुम्‍हें लगता है कि तुम ही छिद गए। इसी से तुम्‍हें पीड़ा अनुभव होती है। और अगर तुम्‍हें यह बोध हो कि सिर्फ शरीर छिदा है, मैं नहीं छिदा हूं, तो पीड़ा के स्‍थान पर आनंद अनुभव करोगे।

      सुई से भी छेद करने की जरूरत नहीं है। रोज ऐसी अनेक चीजें घटित होती है। जिन्‍हें तुम ध्‍यान के लिए उपयोग में ला सकते हो। या कोई ऐसी स्‍थिति निर्मित भी कर सकते हो।
      तुम्‍हारे भीतर कहीं कोई पीड़ा हो रही है। एक काम करो। शेष शरीर को भूल जाओ, केवल उस भाग पर मन को एकाग्र करो जिसमे पीड़ा है। और तब एक अजीब बात अनुभव में आएगी। जब तुम पीड़ा वाले भाग पर मन को एकाग्र करोगे तो देखोगें कि वह भाग सिकुड़ रहा है, छोटा हो रहा है। पहले तुमने समझा था कि पूरे पाँव में पीड़ा है, लेकिन जब एकाग्र होकर उसे देखोगें तो मालूम होगा कि दर्द पाँव में नहीं है। वह तो अतिशयोक्‍ति है, दर्द सिर्फ घुटने में है।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 20

‘’किसी चलते वाहन में लयवद्ध झुलने के द्वारा, अनुभव को प्राप्‍त हो। या किसी अचल वाहन में अपने को मंद से मंदतर होते अदृश्‍य वर्तृलोंमें झुलने देने से भी।‘’

      दूसरे ढंग से यह वही है। ‘’किसी चलते वाहन में..........।‘’
      तुम रेलगाड़ी या बैलगाड़ी से यात्रा कर रहे हो। जब यह विधि विकसित हुई थी तब बैलगाड़ी ही थी। तो तुम एक हिंदुस्तानी सड़क पर—आज भी सडकें वैसी ही है—बैलगाड़ी में यात्रा कर रहे हो। लेकिन चलते हुए अगर तुम्‍हारा सारा शरीर हिल रहा है तो बात व्‍यर्थ हो गई।

      ‘’किसी चलते वाहन में लयवद्ध झुलने के कारण........।‘’
      लयवद्ध ढंग से झूलों। इस बात को समझो, बहुत बारीक बात है। जब भी तुम किसी बैलगाड़ी या किसी वाहन में चलते हो तो तुम प्रतिरोध करते होते हो। बैलगाड़ी बाई तरफ झुकती है, लेकिन तुम उसका प्रतिरोध करते हो, तुम संतुलन रखने के लिए दाई तरफ झुक जाते हो। अन्‍यथा तुम गिर जाओगे। इसलिए तुम निरंतर प्रतिरोध कर रहे हो। बैल गाड़ी में बैठे-बैठे तुम बैलगाड़ी के हिलने-डुलते से लड़ रहे हो। वह इधर जाती है तो तुम उधर जाते हो। यही वजह है कि रेलगाड़ी में बैठे-बैठे तुम थक जाते हो। तुम कुछ करते नहीं हो तो थक क्‍यों जाते हो। अन्‍यथा ही तुम बहुत कुछ कर रहे हो। तुम निरंतर रेलगाड़ी से लड़ रहे हो, प्रतिरोध कर रहे हो।
      प्रतिरोध मत करो, यह पहली बात है। अगर तुम इस विधि को प्रयोग में लाना चाहते हो तो प्रतिरोध छोड़ दो। बल्‍कि गाड़ी की गति के साथ-साथ गति करो, उसकी गति के साथ-साथ झूलों। बैलगाड़ी का अंग बन जाओ, प्रतिरोध मत करो। रास्‍ते पर बैलगाड़ी जो भी करे, तुम उसके अंग बनकर रहो। इसी कारण यात्रा में बच्‍चे कभी नहीं थकते है।
      पूनम हाल ही में लंदन से अपने दो बच्‍चों के साथ आई है। चलते समय वह भयभीत थी कि इतनी लंबी यात्रा के कारण बच्‍चें थ जाएंगे। बीमार हो जाएंगे। वह थक गई और वे हंसते हुए यहां पहुँचे। वह जब यहां पहुंची तो थक कर चूर-चूर हो गई थी। जब वह मेरे कमरे में प्रविष्‍ट हुई, वह थकावट से टूट रही थी। और दोनों बच्‍चें वहीं तुरंत खेलने लग गये। लंदन से बंबई अठारह घंटे की यात्रा है। लेकिन वे जरा भी थके नहीं। क्‍यों? क्‍योंकि अभी वे प्रतिरोध करना नहीं जानते है।
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 19

‘’पाँवों या हाथों को सहारा दिए बिना सिर्फ नितंबों पर बैठो। अचानक केंद्रित हो जाओगे।‘’

चीन में ताओ वादियों ने सदियों से इस विधि को प्रयोग किया है। यह एक अद्भुत विधि है और बहुत सरल भी।
      इसे प्रयोग करो: ‘’पाँवों या हाथों को सहारा दिए बिना सिर्फ नितंबों पर बैठो। अचानक केंद्रित हो जाओगे।‘’

      इसमें करना क्‍या है? इसके लिए दो चीजें जरूरी है। एक तो बहुत संवेदनशील शरीर चाहिए, जो कि तुम्‍हारे पास नहीं है। तुम्‍हारा शरीर मुर्दा है। वह एक बोझ है। संवेदनशील बिलकुल नहीं है। इसलिए पहले तो उसे संवेदनशील बनाना होगा, अन्‍यथा यह विधि काम नहीं करेगी। मैं पहले तुम्‍हें बताऊंगा कि शरीर को संवेदनशील कैसे बनाया जाए—खासकर नितंब को।
      तुम्‍हारी जो नितंब है वह तुम्‍हारे शरीर का सब से संवेदनशील अंग है। उसे संवेदनहीन होना पड़ता है। क्‍योंकि तुम सारा दिन नितंब पर ही बैठे रहते हो। अगर वह बहुत संवेदनशील हो तो अड़चन होगी। तुम्‍हारे नितंब को संवेदनहीन होना जरूरी है। पाँव के तलवे जैसी उसकी दशा है। निरंतर उन पर बैठे-बैठे पता नहीं चलता कि तुम नितंबों पर बैठे हो। इसके पहले क्‍या कभी तुमने उन्‍हें महसूस किया है? अब कर सकते हो, लेकिन पहले कभी नहीं किया। और तुम पूरी जिंदगी उन पर ही बैठते हो—बिना जाने। उनका काम ही ऐसा है कि वे बहुत संवेदनशील नहीं हो सकते।
      तो पहले तो उन्‍हें संवेदनशील बनाना होगा। एक बहुत सरल उपाय काम में लाओ। यह उपाय शरीर के किसी भी अंग के लिए काम आ सकता है। तब शरीर संवेदनशील हो जाएगा। एक कुर्सी पर विश्राम पूर्वक, शिथिल होकर बैठो। आंखे बंद कर लो और शिथिल होकर कुर्सी पर बैठो। और बाएं हाथ को दाहिने हाथ पर महसूस करो। कोई भी चलेगा। बाएं हाथ को महसूस करो। शेष शरीर को भूल जाओ। और बांए हाथ को महसूस करो।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 18

किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो; दूसरे विषय पर मत जाओ। यहीं विषय के मध्‍य में—आनंद।

मैं फिर दोहराता हूं: ‘’किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो, दूसरे विषय पर मत जाओ, किसी दूसरे विषय पर ध्‍यान मत ले जाओ, यही विषय के माध्‍य में—आनंद।
      ‘’किसी विषय को प्रेम पूर्ण देखो........।‘’
      प्रेमपूर्वक में कुंजी है। क्‍या तुमने कभी किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखा है? तुम हां कह सकते हो, क्‍योंकि तुम नहीं जानते कि किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखने का क्‍या अर्थ है। तुमने किसी चीज को लालसा-भरी आंखों से देखा होगा। कामना पूर्वक देखा होगा। वह दूसरी बात है। वह बिलकुल भिन्‍न विपरीत बात है। पहले इस भेद को समझो।

      तुम एक सुंदर चेहरे को, सुंदर शरीर को देखते हो और तुम सोचते हो कि तुम उसे प्रेमपूर्वक देख रहे हो। लेकिन तुम उसे क्‍यों देख रहे हो? क्‍या तुम उससे कुछ पाना चाहते हो? तब वह वासना है, कामना है, प्रेम नहीं है। क्‍या तुम उसका शोषण करना चाहते हो? तब वह वासना है, प्रेम नहीं। तब तुम सच में यह चाहते हो कि मैं कैसे इस शरीर को उपयोग में लाऊं, कैसे इसका मालिक बनूं। कैसे इसे अपने सुख का साधन बना लूं।
      वासना का अर्थ है कि कैसे किसी चीज को अपने सुख के लिए उपयोग में लाऊं। प्रेम का अर्थ है कि उससे मेरे सुख का कुछ लेना देना नहीं है। सच तो यह है कि वासना कुछ लेना चाहती है। और प्रेम कुछ देना चाहता है। वे दोनों सर्वथा एक दूसरे के प्रतिकूल है।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 17

‘’मन को भूलकर मध्‍य में रहो—जब तक।‘’

      यह सूत्र इतना ही है। किसी भी वैज्ञानिक सूत्र की तरह यह छोटा है, लेकिन ये थोड़ से शब्‍द भी तुम्‍हारे जीवन को समग्ररतः: बदल सकते है।
          ‘’मन को भूल कर मध्‍य में रहो—जब तक।‘’
      ‘’मध्‍य में रहो।‘’—बुद्ध ने अपने ध्‍यान की विधि इसी सूत्र के आधार पर विकसित की। उनका मार्ग मज्झम निकाय या मध्‍य मार्ग कहलाता है। बुद्ध कहते है, सदा मध्‍य में रहो, प्रत्‍येक चीज में।

      एक बार राजकुमार श्रोण दीक्षित हुआ, बुद्ध ने उसे सन्‍यास में दीक्षित किया। वह राजकुमार अद्भुत व्‍यक्‍ति था। और जब वह संन्‍यास में दीक्षित हुआ तो सारा राज्‍य चकित रह गया। लोगों को यकीन नहीं हुआ कि राजकुमार श्रोण संन्‍यासी  हो गया। किसी ने स्‍वप्‍न में भी नहीं सोचा था। क्‍योंकि श्रोण पूरा सांसारिक था। भोग-विलास में सर्वथा लिप्‍त रहता था। सारा दिन सूरा और सुंदरी ही उसका संसार थी।
      तभी अचानक एक दिन बुद्ध उसके नगर में आए। राजकुमार श्रोण उनके दर्शन को गया। वह बुद्ध के चरणों में गिरा और बोला कि मुझे दीक्षित कर लें, मैं संसार छोड़ दूँगा।
      जो लोग उसके साथ आए थे उन्‍हें भी इसकी खबर नहीं थी। ऐसी अचानक घटना थी यह। उन्‍होंने बुद्ध से पूछा कि यह क्‍या हो रहा है। यह तो चमत्‍कार है। श्रोण उस कोटि का व्‍यक्‍ति नहीं है। वह तो भोग विलास में रहा है। यह तो चमत्‍कार है। हमने तो कल्‍पना भी नहीं की थी कि श्रोण संन्‍यासी होगा। यह क्‍या हो रहा है।  आपने कुछ कर दिया है।
      बुद्ध ने कहा कि मैंने कुछ नहीं किया है। मन एक अति से दूसरी अति पर जा सकता है। वह मन का ढंग है। एक अति से दूसरी अति पर जाना। श्रोण कुछ नया नहीं  कर रहा है। यह होना ही था। क्‍योंकि तुम मन के नियम नहीं जानते, इसलिए तुम चकित हो रहे हो।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 16

‘’हे भगवती, जब इंद्रियाँ ह्रदय में विलीन हों, कमल के केंद्र पर पहुँचों।‘’

      प्रत्‍येक विधि किसी मन-विशेष के लिए उपयोगी है। जि विधि की अभी हम चर्चा कर रहे थे—तीसरी विधि, सिर के द्वारों को बंद करने वाली विधि—उसका उपयोग अनेक लोग कर सकते है। वह बहुत सरल है और बहुत खतरनाक नहीं है। उसे तुम आसानी से काम में ला सकते हो।
      यह भी जरूरी नहीं है कि द्वारों को हाथ से बंद करो; बंद करना भी जरूरी है। इसलिए कानों के लिए डाट और आंखों के लिए पट्टी से काम चल जाएगा असली बात यह कि कुछ क्षणों के लिए ये कुछ सेंकेंड के लिए सिर के द्वारों को पूरी तरह से बंद कर लो।

      इसका प्रयोग करो, अभ्‍यास करो। अचानक करने से ही यह कारगर है, अचानक में ही राज छिपा है। बिस्‍तर में पड़े-पड़े अचानक सभी द्वारों को कुछ सेकेंड के लिए बंद कर लो। और तब भीतर देखो क्‍या होता है।
      जब तुम्‍हारा दम घुटने लगे, क्‍योंकि श्‍वास भी बंद हो जाएगी, तब भी इसे जारी रखे और तब तक जारी रखो जब तक कि असह्य न हो जाये। और जब असह्य हो जाएगा, तब तुम द्वारों को ज्‍यादा देर बंद नहीं रख सकोगे, इसलिए उसकी फिक्र छोड़ दो। तब आंतरिक शक्‍ति सभी द्वारों के खुद खोल देगी। लेकिन जहां तक तुम्‍हारा संबंध है, तुम बंद रखो। जब दम घुटने लगे, तब वह क्षण आता है, निर्णायक क्षण, क्‍योंकि घुटन पुराने एसोसिएशन तोड़ डालती है। इसलिए कुछ और क्षण जारी रख सको तो अच्‍छा।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 15

‘’सिर के सात द्वारों को अपने हाथों से बंद करने पर आंखों के बीच का स्‍थान सर्वग्राही हो जाता है।‘’

यह एक पुरानी से पुरानी विधि है और इसका प्रयोग भी बहुत हुआ है। यह सरलतम विधियों में एक है। सिर के सभी  द्वारों को, आँख, कान, नाक, मुंह, सबको बंद कर दो। जब सिर के सब द्वार दरवाजे बंद हो जाते है तो तुम्‍हारी चेतना तो सतत बहार बह रही है। एकाएक रूक जाती है। ठहर जाती है। वह अब बाहर नहीं जा सकती।

      तुमने ख्‍याल नहीं किया कि अगर तुम क्षण भर के लिए श्‍वास लेना बंद कर दो तो तुम्‍हारा मन भी ठहर जाता है। क्‍यों? क्‍योंकि श्‍वास के साथ मन चलता है। वह मन का एक संस्‍कार है। तुम्‍हें समझना चाहिए कि यह संस्‍कार क्‍या है। तभी इस सूत्र को समझना आसान होगा।
      रूस के अति प्रसिद्ध मानस्‍विद पावलफ ने संस्‍कारजनित प्रतिक्रिया को, कंडीशंड रिफ्लेक्‍स को दुनियाभर में आम बोलचाल में शामिल करा दिया है। जो व्‍यक्‍ति भी मनोविज्ञान से जरा भी परिचित है, इस शब्‍द को जानता है। विचार की दो श्रृंखलाएं कोई भी दो श्रृंखलाएं इस तरह एक दूसरे से जुड़ सी जाती है। कि अगर तुम उनमें से एक को चलाओ तो दूसरी अपने आप शुरू हो जाती है।
      पावलफ ने एक कुत्‍ते पर प्रयोग किया। उसने देखा कि तुम अगर कुत्‍ते के सामने खाना रख दो वक  उसकी जीभ से लार बहने लगती है। जीभ बहार निकल आती है। और वह भोजन के लिए तैयार हो जाता है। कुत्‍ता जब भोजन देखता है या उसकी कल्‍पना करता है तो लार बहने लगती है। लेकिन पावलफ ने इस प्रक्रिया के साथ दूसरी बात जोड़ दी। जब भी भोजन रखा जाए और कुत्‍ते की लार टपकने लगे। वह दूसरी चीज करता; उदाहरण के लिए, वह एक घंटी बजाता और कुत्‍ता उस घंटी को सुनता।
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 14

दूसरे सूत्र के साथ भी यही तरकीब, वही वैज्ञानिक आधार, यही प्रक्रिया काम करती है:
     अपने पूरे अवधान को अपने मेरुदंड के मध्‍य में कमल-तंतु सी कोमल स्‍नायु में स्‍थित करो। और इसमे रूपांतरित हो जाओ।
     इस सूत्र के लिए, ध्‍यान की इस विधि के लिए तुम्‍हें अपनी आंखे बंद कर लेनी चाहिए। और अपने मेरुदंड को, अपनी रीढ़ की हड्डी को देखना चाहिए, देखने का भाव करना चाहिए। अच्‍छा हो कि किसी शरीर शास्‍त्र की पुस्‍तक में या किसी चिकित्‍सालय या मेडिकल कालेज में जाकर शरीर की संरचना को देखो-समझ लो, तब आंखे बंद करो और मेरुदंड पर अवधान लगाओ। उसे भीतर की आँखो से देखो और ठीक उसके मध्‍य से जाते हुए कमल तंतु जैसे कोमल स्‍नायु का भाव करो।
      ‘’और इसमे रूपांतरित हो जाओ।‘’

      अगर संभव हो तो इस मेरुदंड पर अवधान को एकाग्र करो और तब भीतर से, मध्‍य से जाते हुए कमल तंतु जैसे स्‍नायु पर एकाग्र होओ। और यही एकाग्रता तुम्‍हें तुम्‍हारे केंद्र पर आरूढ़ कर देगी। क्‍यों?
      मेरुदंड तुम्‍हारी समूची शरीर-संरचना का आधार है। सब कुछ उससे संयुक्‍त है, जुड़ा हुआ है। सच तो यह है कि तुम्‍हारा मस्‍तिष्‍क इसी मेरुदंड का एक छोर है। शरीर शास्‍त्री कहते है कि मस्‍तिष्‍क मेरुदंड का ही विस्‍तार है। तुम्‍हारा मस्‍तिष्‍क मेरुदंड को विकास है। और तुम्‍हारी रीढ़ तुम्‍हारे सारे शरीर से संबंधित है, सब कुछ उससे संबंधित है। यही कारण है कि उसे रीढ़ कहते है। आधार कहते है।
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 13

’या कल्‍पना करो कि मयूर पूंछ के पंचरंगे वर्तुल निस्‍सीम अंतरिक्ष में तुम्‍हारी पाँच इंद्रियाँ है। अब उनके सौंदर्य को भीतर ही घुलने दो। उसी प्रकार शून्य में या दीवार पर किसी बिंदु के साथ कल्‍पना करो, जब तक कि वह बिंदु विलीन न हो जाए। तब दूसरे के लिए तुम्‍हारी कामना सच हो जाती है।‘’
     ये सारे सूत्र, भीतर के केंद्र को कैसे पाया जाए, उससे संबंधित है। उसके लिए जो बुनियादी तरकीब, जो बुनियादी विधि काम में लायी गयी है, वह यह है कि तुम अगर बाहर कहीं भी, मन में, ह्रदय में या बाहर की किसी दीवार में एक केंद्र बना सके और उस पर समग्रता से अपने अवधान को केंद्रित कर सके और उस बीच समूचे संसारा को भूल सके और एक वहीं बिंदू तुम्‍हारी चेतना में रह जाए। तो तुम अचानक अपने आंतरिक केंद्र पर फेंक दिए जाओगे। यह कैसे काम करता है, इसे समझो। तुम्हारा मन एक भगोड़ा है, एक भाग दौड़ ही है। वह कभी एक बिंदु पर नहीं टिकता है। वह निरंतर कहीं जा रहा है। गति कर रहा है। पहूंच रहा है। लेकिन वह कभी एक बिंदू पर नहीं टिकता है। वह एक विचार से दूसरे विचार की और, अ से ब की और यात्रा करता रहता है। लेकिन कभी वह अ पर नहीं टिकता है, कभी वह ब पर नहीं टिकता है। वह निरंतर गतिमान है।
      यह याद रहे कि मन सदा चलायमान है। वह कहीं पहुंचने की आशा तो करता है, लेकिन कहीं पहुंचता नहीं है। वह पहुंच नहीं सकता। मन की संरचना ही गीतिमय है। मन केवल गति करता है। वह मन का अंतर्भूत स्‍वभाव है। गति ही उसकी प्रक्रिया है। अ से ब को, ब से अ को, वह चलता ही जाता है।
      अगर तुम अ या ब या किसी बिंदु पर ठहर गए, तो मन तुमसे संघर्ष करेगा। वह कहेगा कि आगे चलो। क्‍योंकि अगर तुम रूक गए, मन तुरंत मर जायेगा। वह गति में रहकर ही जीता है। मन का अर्थ ही प्रक्रिया है। अगर तुमने गति नहीं की तुम रूक गये तो मन अचानक समाप्‍त हो जायेगा। वह नहीं बचेगा। केवल चेतना बचेगी।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 12

जब किसी बिस्‍तर या आसमान पर हो तो अपने को वजनशून्‍य हो जाने दो—मन के पार।
     तुम यहां बैठे हो; बस भाव करो कि तुम वजनशून्‍य हो गए हो। तुम्‍हारा वज़न न रहा। तुम्‍हें पहले लगेगा कि कहीं यहां वज़न है। वजनशून्‍य होने का भाव जारी रखो। वह आता है। एक क्षण आता है। जब तुम समझोगे कि तुम वज़न शून्‍य हो। वज़न नहीं है। और जब वज़न शून्‍य नहीं रहा तो तुम शरीर नहीं रहे। क्‍योंकि वज़न शरीर का है; तुम्‍हारा नहीं, तुम तो वज़न शून्‍य हो।
      इस संबंध में बहुत प्रयोग किए गये है। कोई मरता है तो संसार भर में अनेक वैज्ञानिकों ने मरते हुए व्‍यक्‍ति का वज़न लेने की कोशिश की है। अगर कुछ फर्क हुआ, अगर कुछ चीज शरीर के बहार निकली है, कोई आत्‍मा या कुछ अब वहां नहीं है। क्‍योंकि विज्ञान के लिए कुछ भी बिना वज़न के नहीं है।
      सब पदार्थ के लिए वज़न बुनियादी है। सूर्य की किरणों का भी वज़न है। वह अत्‍यंत कम है, न्‍यून है, उसको मापना भी कठिन है; लेकिन वैज्ञानिकों ने उसे भी मापा है। अगर तुम पाँच वर्ग मील के क्षेत्र पर फैली सब सूर्य किरणों को इकट्ठा कर सको तो उनका वज़न एक बाल के वज़न के बराबर होगा। सूर्य किरणों का भी वज़न है। वे तौली जा सकती है। विज्ञान के लिए कुछ भी वज़न के बिना नहीं है। और अगर कोई चीज वज़न के बिना है तो वह पदार्थ नहीं, उप पदार्थ। और विज्ञान पिछले बीस पच्‍चीस वर्षो तक विश्‍वास करता था कि पदार्थ के अतिरिक्‍त कुछ नहीं है। इसलिए जब कोई मरता है और कोई चीज शरीर से निकलती है तो वज़न में फर्क पड़ना चाहिए।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 11

जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वार बंद कर दो। तब।
      यह बहुत सरल दिखता है। लेकिन उतना सरल है नहीं। मैं इसे फिर से पढ़ता हूं, ‘’ जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वार बंद कर दो। तब।‘’ यक एक उदाहरण मात्र है। किसी भी चीज से काम चलेगा। इंद्रियों के द्वार बंद कर दो जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो। और तब—तब घटना घट जाएगी। शिव कह क्‍या रहे है?

      तुम्‍हारे पाँव में कांटा गड़ा है। वह दर्द देता है, तुम तकलीफ में हो। या तुम्‍हारे पाँव पर एक चींटी रेंग रही है। तुम्‍हें उसका रेंगना महसूस होता है। और तुम अचानक उसे हटाना चाहते हो। किसी भी अनुभव को ले सकते है। तुम्‍हें धाव है जो दुखता है। तुम्‍हारे सिर में दर्द है, या कहीं शरीर में दर्द है। विषय के रूप में किसी से भी काम चलेगा। चींटी का रेंगना उदाहरण भर है।
      शिव कहते है: ‘’जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वारा बंद कर दो।‘’
      जो भी अनुभव हो, इंद्रियों के सब द्वार बंद कर दो करना क्‍या है? आंखें बंद कर लो और सोचो कि मैं अंधा हूं और देख नहीं सकता। अपने कान बंद कर लो और सोचो कि मैं सुन नहीं सकता। पाँच इंद्रियाँ है, उन सब को बंद कर लो। लेकिन उन्‍हें बंद कैसे करोगे।
      यह आसान नहीं है। क्षण भर के लिए श्‍वास लेना बंद कर दो, और तुम्‍हारी सब इंद्रियाँ बंद हो जायेगी। और जब श्‍वास रुकी है और इंद्रियाँ बंद है, तो रेंगना कहां है? चींटी कहां है? अचानक तुम दूर, बहुत दूर हो जाते हो।
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 10

प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्‍य जीवन हो।
      
शिव प्रेम से शुरू करते है। पहली विधि प्रेम से संबंधित है। क्‍योंकि तुम्‍हारे शिथिल होने के अनुभव में प्रेम का अनुभव निकटतम है। अगर तुम प्रेम नहीं कर सकते हो तो तुम शिथिल भी नहीं हो सकते हो। और अगर तुम शिथिल हो सके तो तुम्‍हारा जीवन प्रेमपूर्ण हो जाएगा।

      एक तनावग्रस्‍त आदमी प्रेम नहीं कर सकता। क्‍यों? क्‍योंकि तनावग्रस्‍त आदमी सदा उद्देश्‍य से, प्रयोजन से जीता है। वह धन कमा सकता है। लेकिन प्रेम नहीं कर सकता। क्‍योंकि प्रेम प्रयोजन-रहित है। प्रेम कोई वस्‍तु नहीं है। तुम उसे संग्रहीत नहीं कर सकते, तुम उसे बैंक खाते में नहीं डाल सकते। तुम उससे अपने अहंकार की पुष्‍टि नहीं कर सकते। सच तो यह है कि प्रेम सब से अर्थहीन काम है; उससे आगे उसका कोई अर्थ नहीं है। उससे आगे उसका कोई प्रयोजन नहीं है। प्रेम अपने आप में जीता है। किसी अन्‍य चीज के लिए नहीं।
      तुम धन कमाते हो—किसी प्रयोजन से। वह एक साधन नहीं है। तुम मकान बनाते हो—किसी के रहने के लिए। वह भी एक साधन है। प्रेम साधन नहीं है। तुम क्‍यों प्रेम करते हो? किस लिए प्रेम करते हो?
      प्रेम अपना लक्ष्‍य आप है। यही कारण है कि हिसाब किताब रखने वाला मन, तार्किक मन, प्रयोजन की भाषा में सोचने वाला मन प्रेम नहीं कर सकता। और जो मन प्रयोजन की भाषा में सोचता है। वह तनावग्रस्‍त होगा। क्‍योंकि प्रयोजन भविष्‍य में ही पूरा किया जा सकता है। यहां और अभी नहीं।
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 09

मृतवत लेटे रहो। क्रोध में क्षुब्‍ध होकर उसमे ठहरे रहो। या पुतलियों को घुमाएं बिना एकटक घूरते रहो। या कुछ चुसो और चूसना बन जाओ।
      
‘’मृतवत लेटे रहो।‘’
      प्रयोग करो कि तुम एकाएक मर गए हो। शरीर को छोड़ दो, क्‍योंकि तुम मर गए हो। बस कल्‍पना करो कि मृत हूं, मैं शरीर नहीं हूं, शरीर को नहीं हिला सकता। आँख भी नहीं हिला सकता। मैं चीख-चिल्‍ला भी नहीं सकता। न ही मैं रो सकता हूं, कुछ भी नहीं कर सकता। क्‍योंकि मैं मरा हुआ हूं। और तब देखो तुम्‍हें कैसा लगता है। लेकिन अपने को धोखा मत दो। तुम शरीर को थोड़ा हिला सकते हो, नहीं, हिलाओ नहीं। लेकिन मच्‍छर भी आ जाये, तो भी शरीर को मृत समझो। यह सबसे अधिक उपयोग की गई विधि है।

      रमण महर्षि इसी विधि से ज्ञान को उपलब्‍ध हुए थे। लेकिन यह उनके इस जन्‍म की विधि नहीं थी। इस जन्‍म में तो अचानक सहज ही यह उन्‍हें घटित हो गई। लेकिन जरूर उन्‍होंने किसी पिछले जन्‍म में इसकी सतत सधाना की होगी। अन्‍यथा सहज कुछ भी घटित नहीं होता। प्रत्‍येक चीज का कार्य-कारण संबंध रहता है।
      जो जब वे केवल चौदह या पंद्रह वर्ष के थे, एक रात अचानक रमण को लगा कि मैं मरने वाला हूं, उनके मन में यक बात बैठ गई कि मृत्‍यु आ गई है। वे अपना शरीर भी नहीं हिला सकते थे। उन्‍हें लगा कि मुझे लकवा मार गया है। फिर उन्‍हें अचानक घुटन महसूस हुई और वे जान गए कि उनकी ह्रदय-गति बंद होने वाली है। और वे चिल्‍ला भी नहीं सके, बोल भी नहीं सके कि मैं मर रहा हूं।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 08

आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।
     इन विधियों के बीच जरा-जरा से है, तो भी तुम्‍हारे लिए वे भेद बहुत हो सकते है। एक अकेला शब्‍द बहुत फर्क पैदा करता है।
      ‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर.....।‘’
      भीतर आने वाली श्‍वास को एक संधि स्‍थल है। जहां वह मुड़ती है। इन दो संधि-स्‍थलों—जिसकी चर्चा हम कर चुके है—के साथ यहां जरा सा भेद किया गया है। हालांकि यह भेद विधि में तो जरा सा ही है, लेकिन साधक के लिए बड़ा भेद हो सकता है। केवल एक शर्त जोड़ दी गई है—‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक’’, और पूरी विधि बदल गयी।

      इसके प्रथम रूप में भक्‍ति का सवाल नहीं था। वह मात्र वैज्ञानिक विधि थी। तुम प्रयोग करो और वह काम करेगी। लेकिन लोग है जो ऐसी शुष्‍क वैज्ञानिक विधियों पर काम नहीं करेंगे। इसलिए जो ह्रदय की और झुके है। जो भक्‍ति  के जगत के है, उनके लिए जरा सा भेद किया गया है: आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।‘’
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 07

ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ। जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।

तुम अधिकारिक गहरी पर्तों में प्रवेश कर रहे हो।
‘’ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ।‘’
      अगर तुम तीसरी आँख को जान गए हो तो तुम ललाट के मध्‍य में स्‍थिर सूक्ष्‍म श्‍वास को, अदृश्‍य प्राण को जान गए, और तुम यह भी जान गए कि वह उर्जा, वह प्रकाश बरसता है।
      ‘’जब वह सोन के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा—जब वह वर्षा तुम्‍हारे ह्रदय तक पहुँचेगी—‘’तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’

      इस विधि को तीन हिस्‍सों में लो। एक, श्‍वास के भीतर जो प्राण है, जो उसका सूक्ष्‍म, अदृष्‍य, अपार्थिव अंश है, उसे तुमको अनुभव करना होगा। यह तब होता है, जब तुम भृकुटियों के बीच अवधान को थिर रखते हो। तब यह आसानी से घटित होता है। अगर तुम अवधान को अंतराल में टिकाते हो, तो भी घटित होता है, मगर उतनी आसानी से नहीं। यदि तुम नाभि केंद्र के प्रति सजग हो, जहां श्‍वास आती है। और छूकर चली जाती है। तो भी यह घटित होता है, पर कम आसानी से। उस सूक्ष्‍म प्राण को जानने का सबसे सुगम मार्ग है, तीसरी आँख में थिर होना। वैसे तुम जहां भी केंद्रित होगें। वह घटित होगा। तुम प्राण को प्रभावित होते अनुभव करोगे।

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 06

सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीचटिकाओ। इस अभ्‍यास से थोड़े ही दिन में नया जन्‍म होगा।
     ‘’सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीचटिकाओ...।‘’
      श्‍वासों को भूल जाओं और उनके बीच में अवधान को लगाओ। एक श्‍वास भी तर आती है। इसके पहले कि वह लौट जाए, उसे बाहर छोड़ा जाए, वहां एक अंतराल होता है।
      ‘’सांसारिक कामों में लगे हुए।‘’ यह छठी विधि निरंतर करने की है। इसलिए कहा गया है, ‘’सांसारिक कामों में लगे हुए....’’ जो भी तुम कर रहे हो, उसमे अवधान को दो श्‍वासों के अंतराल में थिर रखो। लेकिन काम-काज में लगे हुए ही इसे साधना है।

 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 05

भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास-तत्‍व से, प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।

यह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस इसे लेकर यूनान वापस गए। और वह पश्‍चिम के समस्‍त रहस्‍यवाद के आधार बन गए। पश्‍चिम में अध्‍यात्‍मवाद के वे पिता है। यह विधि बहुत गहरी विधियों में ऐ एक है। इसे समझने की कोशिश करो।
      ‘’भृकुटियों के बीच  अवधान को स्‍थिर करो।‘’

      आधुनिक शरीर-शस्‍त्र कहता है, वैज्ञानिक शोध कहती है कि दो भृकुटियों के बीच में ग्रंथि है वह शरीर का सबसे रहस्‍यपूर्ण भाग है। जिसका नाम पाइनियल ग्रंथि है। यही तिब्‍बतियों की तीसरी आँख है। और यही है शिव का नेत्र। तंत्र के शिव का त्रिनेत्र। दो आंखों के बीच एक तीसरी आँख भी है। लेकिन यह सक्रिय नहीं है। यह है, और यह किसी भी समय सक्रिय हो सकती है। निसर्गत: यह सक्रिय नहीं है। इसको सक्रिय करने के लिए संबंध में तुम को कुछ करना पड़ेगा। यह अंधी नहीं है, सिर्फ बंद है। यह विधि तीसरी आँख को खोलने की विधि है।
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 04

या जब श्‍वास पूरी तरह बाहर गई है और स्‍वय: ठहरी है, या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है—ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्‍यक्‍ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है। केवल अशुद्ध के लिए यह कठिन है। 
    लेकिन तब तो यह विधि सब के लिए कठिन है, क्‍योंकि शिव कहते है कि ‘’केवल अशुद्ध के लिए कठिन है।‘’
      लेकिन कौन शुद्ध हैतुम्‍हारे लिए यह कठिन है; तुम इसका अभ्‍यास नहीं कर सकते। लेकिन कभी अचानक इसका अनुभव तुम्‍हें हो सकता है। तुम कार चला रहे हो और अचानक तुम्‍हें लगता है कि दुर्धटना होने जा रही है। श्‍वास बंद हो जाएगी। अगर वह बाहर है तो बाहर ही रह जाएगी। और भी अगर वह भीतर है तो वह भीतर ही रह जायेगी। ऐसे संकट काल में तुम श्‍वास नहीं ले सकते: तुम्‍हारे बस में नहीं है। सब कुछ ठहर जाता है। विदा हो जाता है।

      ‘’या जब श्‍वास पूरी तरह बाहर गई है और स्‍वत: ठहरी है, या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है—ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्‍यक्‍ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है।‘’
 

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-1- विधि 03

या जब कभी अंत: श्वास और बहिर्श्‍वास एक दूसरे में  विलीन होती है, उस क्षण में ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित केंद्र को स्‍पर्श करो। 

    हम केंद्र और परिधि में विभाजित है। शरीर परिधि है। हम शरीर को, परिधि को जानते है। लेकिन हम यह नहीं जानते कि कहां केंद्र है। जब बहिर्श्‍वास अंत:श्‍वास में विलीन होती है। जब वे एक हो जाती है। जब तुम यह नहीं कह सकते कि यह अंत:श्वास है कि बहिर्श्‍वास, जब यह बताना कठिन हो कि श्‍वास भीतर जा रही है कि बाहर जा रही है। जब श्‍वास भी तर प्रवेश कि बाहर की तरफ मुड़ने लगती है, तभी विलय का क्षण है। तब श्‍वास जाती है और न भीतर आती है। श्‍वास गतिहीन है। जब वह बहार जाती है, गतिमान है, जब वह भीतर आती है, गतिमान है। और जब वह दोनों में कुछ भी नहीं करती है। तब वह मौन है, अचल है। और तब तुम केंद्र के निकट हो। आने वाली और जाने वाली श्‍वासों का यह विलय विंदु तुम्‍हारा केंद्र है।

      इसे इस तरह देखो। जब श्‍वास भीतर जाती है तो कहां जाती है? वह तुम्‍हारे केंद्र को जाती है। और जब वह बाहर जाती है तो कहां जाती है? केंद्र से बाहर जाती है। इसी केंद्र को स्‍पर्श करना है। यही कारण हे कि ताओ वादी संत और झेन संत कहते है कि सिर तुम्‍हारा केंद्र नहीं है, नाभि तुम्‍हारा केंद्र है। श्‍वास नाभि-केंद्र को जाती है, फिर वहां से लौटती है, फिर उसकी यात्रा करती है।
      जैसा मैंने कहा, श्‍वास तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच सेतु है। तुम शरीर को तो जानते हो, लेकिन यह नहीं जानते कि केंद्र कहां है। श्‍वास निरंतर केंद्र को जा रही है। और वहां से लौट रही है। लेकिन हम पर्याप्‍त श्‍वास नहीं लेते है। इस कारण से साधारण: वह केंद्र तक नहीं पहुंच पाती है। खासकर आधुनिक समय में तो वह केंद्र तक नहीं जाती। और नतीजा यह है कि हरेक व्‍यक्‍ति विकेंद्रित अनुभव करता है। अपने को केंद्र से च्‍यूत महसूस करता है। पूरे आधुनिक संसार में जो लोग भी थोड़ा सोच-विचार करते है। वे महसूस करते है कि उनका केंद्र खो गया है।