सोमवार, 10 सितंबर 2018

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-10

दिनांक 10 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! मैं चकित हूं यह देख कर कि आपके तीर्थ में किस भांति देश-देश से दूर-दूर की यात्राएं करके लोग आ रहे हैं। और आप हैं कि कभी अपने कक्ष से भी बाहर नहीं जाते! यह चमत्कार क्या है? समझावें।

प्रेम कीर्ति! चमत्कार इसमें जरा भी नहीं। एस धम्मो सनंतनो! ऐसा ही सनातन नियम है। दीया जलेगा, तो परवाने दूर-दूर से खोजते चले आएंगे। दीये को उन्हें ढूंढ़ने नहीं जाना पड़ता। दीया अपनी जगह होता है; परवाने आते हैं। और परवाने मिटने आते हैं, दीये के साथ जल कर एक हो जाने आते हैं!

शिष्य अपनी मृत्यु खोज रहा है। अपनी मृत्यु अर्थात अहंकार की मृत्यु। शिष्य बोझिल है अपने होने से। बहुत ढो चुका भार। खींच चुका हिमालय को बहुत अपने सिर पर। निर्भार होना चाहता है। कोई चरण चाहता है, जहां अपना सारा भार उतार कर रख सके। कोई सान्निध्य चाहता है, जहां बोध जगे, होश जगे, कि अब तक जो कांटे बोए हैं, आगे उनका बोना बंद हो जाए। क्योंकि जो हम बोते हैं, वही हम काटते हैं। कांटे बोते हैं, कांटे काटते हैं। बोते तो कांटे हैं, आशा करते हैं फूलों की। इससे निराशा हाथ लगती है।
शिष्य खोज रहा है कोई स्थल, कोई विद्यापीठ, कोई सत्संग--जहां फूलों के बीज कैसे बोए जाएं, फूल कैसे उगाए जाएं--इसकी कला सीख सके। और इस कला का पहला कदम है--अपने को मिटा देना, अपने को समर्पित कर देना। समर्पण से बड़ा सौभाग्य इस जगत में दूसरा नहीं है।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-09

दिनांक 09 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! आप कहते हैं कि भावी मनुष्य, नया मनुष्य--जिसके निर्माण में आप संलग्न हैं--एक साथ विज्ञानी, कवि और संत तीनों होगा। इस दृष्टि को विस्तार से समझाने की अनुकंपा करें।

आनंद मैत्रेय! मैं अखंड मनुष्य को स्वीकार करता हूं। खंडित मनुष्य सुविधापूर्ण हो सकता है, लेकिन न तो शांत होगा, न आनंदित होगा। खंडित मनुष्य उपयोगी हो सकता है, लेकिन उल्लासपूर्ण नहीं। और अतीत में मनुष्य के खंडों को ही स्वीकार किया गया है।
मनुष्य बहु-आयामी है। हम उसके एक आयाम को स्वीकार कर सकते हैं और दूसरे आयामों को इनकार कर सकते हैं। सच तो यह है कि यह तर्क के अनुकूल पड़ता है, क्योंकि उसके खंड एक-दूसरे के विपरीत मालूम होते हैं। जैसे मस्तिष्क है, वह तर्क से जीता है; और हृदय है, वह भाव से। जिन्होंने मस्तिष्क को स्वीकार किया उन्हें अनिवार्यरूपेण, उनके ही तर्क की निष्पत्ति के अनुसार, भाव को अस्वीकार कर देना पड़ा।
लेकिन मनुष्य अगर मस्तिष्क ही रह जाए, जिसमें भाव के फूल न खिलते हों, केवल गणित और तर्क और हिसाब ही लगता हो, तो वैसा मनुष्य यंत्रवत होगा। वैसे मनुष्य के जीवन में नृत्य नहीं हो सकता, काव्य नहीं हो सकता, संगीत नहीं हो सकता। वैसा मनुष्य धन कमाएगा, पद-प्रतिष्ठा कमाएगा, बहुत कुशल होगा; क्योंकि भाव से उसकी कुशलता में जो बाधा पड़ सकती थी, वह बाधा भी नहीं पड़ेगी। लेकिन उसकी आंखें सूखी होंगी; उसकी आंखों में कभी आह्लाद का या विषाद का कोई आर्द्र भाव प्रकट नहीं होगा। और उसका हृदय एक मरुस्थल होगा, जिसमें हरियाली नहीं होगी और जिसमें पक्षी गीत नहीं गाएंगे।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-08

दिनांक 08 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! आपको देखा तो लगा कि मेरा जीवन व्यर्थ ही चला गया है। अब मैं क्या करूं, क्या न करूं?

हरीश! जीवन तो साधारणतः व्यर्थ ही जाता है। लाखों में एकाध व्यक्ति का जीवन सार्थक होता है; जब कि सभी का सार्थक हो सकता था; जब कि सभी सार्थक होने की संभावना लेकर जन्मे थे।
प्रत्येक व्यक्ति बीज है परमात्मा का। लेकिन बीज फूल नहीं है; फूल हो सकता है। बीज संभावना है--सत्य नहीं। और संभावनाओं को सत्य में परिणत करने का नाम ही साधना है।

बीज को जमीन देनी होगी, खाद देनी होगी, जल देना होगा; सूरज की रोशनी उस तक पहुंच सके, इसका आयोजन करना होगा। सूरज और उसके बीच की बाधाएं हटानी होंगी। और फिर प्रार्थनापूर्ण हृदय से प्रतीक्षा करनी होगी। जब आएगी ठीक-ठीक ऋतु बीज के टूटने की, तो अंकुरण होगा। फिर अंकुर की रक्षा करनी होगी। अंकुर नाजुक होता है--महत जीवन से भरा, पर बहुत कोमल। एक पत्थर गिर जाए उस पर, और सब नष्ट हो जाए। फिर बागुड़ लगानी होगी। पौधा जब तक इस योग्य न हो जाए कि अपने ही पैरों पर खड़ा हो सके; जड़ें जब तक इतनी मजबूत न हो जाएं कि आकाश में उड़ती हुई आंधियों और अंधड़ों को वृक्ष सह सके--आनंद से, उल्लास से, उमंग से; नाच सके अंधड़ में, तूफानों में; बादल गरजें और बिजलियां कड़कें, और वृक्ष पुलकित हो, रस-विभोर हो; उस घड़ी के आने तक सतत साधना है।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-07

दिनांक 07 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! यह परमात्मा की खोज क्या है? लोगों को इस खोज में लगे देखता हूं तो चकित होता हूं। मैं स्वयं तो ऐसी कोई आकांक्षा या अभीप्सा अपने भीतर नहीं पाता हूं!

सुरेंद्रनाथ! परमात्मा की खोज तो एक ऐसा मधुर रोग है कि जिसे लगे, वही जाने। यह तो स्वाद है। और स्वाद शब्दों में व्यक्त नहीं होते। यह तो अंतर्तम में उठी एक अभीप्सा है, जिसके लिए कोई कारण दिया नहीं जा सकता।
उठे तो उठे; न उठे तो न उठे। इसलिए संतों ने कहा है कि परमात्मा को वे ही खोजते हैं, जिन्हें परमात्मा खोजता है। इसके पहले कि तुम उसकी अभीप्सा करो, वह तुम्हें पुकारे, तो ही अभीप्सा पैदा हो सकती है।
और तुम्हारा प्रश्न सम्यक है, क्योंकि जिसको प्यास न लगी हो, वह प्यास से तड़पते आदमी की मुसीबत क्या समझे! जो मरुस्थल में हो और प्यास से तड़फा जा रहा हो, मछली की तरह तड़फता हो, और जिसका रोआं-रोआं एक ही बात, एक ही चाह करता हो--एक घूंट पानी मिल जाए; उसकी परिस्थिति, उसकी मनःस्थिति--जो मरुस्थल में कभी प्यासा नहीं हुआ है, उसे समझ में भी आए तो कैसे समझ में आए! वह तो हंसेगा। वह तो समझेगा, कोई नाटक है, कोई अभिनय है। वह तो सोचेगा, कोई विक्षिप्तता है।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-06

दिनांक 06 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! क्या प्रार्थना पश्चात्ताप ही नहीं है?

नरेश! प्रार्थना और पश्चात्ताप का कोई भी नाता नहीं; दूर का भी नाता नहीं। पश्चात्ताप अहंकार की ही प्रक्रिया है; अहंकार ही अपने को सजाने-संवारने में लगा है; जो भूलें-चूकें हुई हैं, उन्हें लीपने-पोतने का प्रयास कर रहा है। पश्चात्ताप अतीत-उन्मुख होता है, और प्रार्थना वर्तमान के क्षण में समग्ररूप से डूब जाने का नाम है। प्रार्थना का न तो कोई अतीत है, न कोई भविष्य। न तो पश्चात्ताप है प्रार्थना, और न कोई आयोजन। न तो मांग है प्रार्थना में--यह मिले, वह मिले; और न इस बात की स्वीकृति है कि मुझसे यह भूल हुई, वह भूल हुई। भूलों की याद, भूलों के लिए क्षमा-प्रार्थना--यह भी अहंकार है।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-05

दिनांक 05 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! लूं तो कैसे लूं संन्यास? मन में सेर् ईष्या, अहंकार, क्रोध, कुछ भी तो नहीं निकाल पाती। और आप जो बार-बार रात-दिन स्वप्न में सामने रहते हैं! क्या करूं?

मधुरी! मैं रुका था तेरे प्रश्न का उत्तर देने को; जानता था कि संन्यास होगा ही। अब तेरा संन्यास हो गया है, इसलिए उत्तर देता हूं।
प्रश्न तो मधुरी ने पूछा था संन्यास के पूर्व; उत्तर दे रहा हूं संन्यास के बाद। क्योंकि मधुरी कोई अकेली मधुरी तो नहीं। और भी बहुत मधुरियां हैं, जो ऐसी ही दुविधा में, ऐसी ही झिझक, ऐसी ही हिचक में अटकी हैं। न कदम आगे बढ़ाए बढ़ता है, न पीछे लौटने का उपाय है।
पीछे लौटा नहीं जा सकता, क्योंकि सिवाय दुख के वहां और कुछ भी नहीं; गहरी अमावस की रात है। आगे बढ़ने में डर लगता है--अज्ञात का भय, अनजान-अपरिचित मार्ग। पीछे भीड़ है। भीड़ का साथ है। भीड़ की सुरक्षा है। कोई हिंदू, कोई मुसलमान, कोई ईसाई। भीड़ में एक तरह का आश्वासन है कि इतने लोग गलत तो नहीं हो सकते।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-04

दिनांक 04 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! धर्म क्या है?

रामनारायण! धर्म प्रेम की अंतिम पराकाष्ठा है। प्रेम जैसे फूल है, धर्म प्रेम के फूल की सुवास है। काम है बीज; प्रेम है फूल; धर्म है फूल से उड़ गई सुगंध। इसलिए धर्म अदृश्य है।
दृश्य तो होते हैं बुद्ध, कृष्ण, कबीर, नानक। ये फूल हैं।
इनके आस-पास सुगंध की तरह जो व्याप्त होता है, वह धर्म है। जो बुद्धि से सोचने चलते हैं, उन्हें वह दिखाई नहीं पड़ता। वह दिखाई पड़ने वाली बात नहीं, मुट्ठी में आ जाए ऐसा तथ्य नहीं, शब्दों में समा जाए ऐसा अनुभव नहीं। लेकिन जो हृदय को खोल देते हैं--किसी सदगुरु के समक्ष, किसी सत्संग में--जो पीने को राजी हो जाते हैं; जो डुबकी मारने को, गोता लगाने को राजी हो जाते हैं; बुद्धि के हिसाब-किताब को तट पर रख कर जो निकल पड़ते हैं तूफानों में, अनंत की यात्रा पर--वे जान पाते हैं कि धर्म क्या है।
और हमारे नासापुट खराब हो गए हैं। हमें आदत दुर्गंध की पड़ गई है। हम दुर्गंध को ही सुगंध समझने लगे हैं। इसलिए सुगंध जब पहली दफा हमारे नासापुटों को छूती है, तो या तो हमें उसका अनुभव ही नहीं होता; उसकी उपस्थिति भी प्रतीत नहीं होती; या और भी बड़ा दुर्भाग्य कि हमें लगता है वह दुर्गंध है!
एक मछलियां बेचने वाला मछलियां बेच कर लौटता है। और बीच सड़क पर--भयंकर लू चल रही है, गर्मी के उत्तप्त दिन हैं, आकाश से आग बरस रही है--वह गश खाकर गिर पड़ता है। भूखा; गर्मी; लंबी यात्रा। जिस रास्ते पर गिर पड़ता है, वह गंधियों का रास्ता है, जिनका धंधा ही सुगंध बेचना है। पास की ही दुकान का जो गंधी है, वह अपनी श्रेष्ठतम गंध को लेकर आता है। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अगर श्रेष्ठ गंध बेहोश आदमी को सुंघाई जाए, तो वह होश में आ जाता है।

रविवार, 9 सितंबर 2018

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-03

दिनांक 03 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! आप कहते हैं--प्रेम करो; तुम्हारे सभी प्रेम का निचोड़ ही प्रार्थना बनेगी। परंतु मैं तो प्रेम करने में बहुत ही कतराता हूं!

 योग भरत! कौन नहीं कतराता? प्रेम की लोग बातें करते हैं; बातें करना प्रेम से बचने का एक उपाय है। प्रेम की बात तो प्रेम नहीं। प्रेम की बात तो प्रेम के अभाव को ढंकने की कला है। हां, लोग प्रेम के गीत गाते हैं--वे भी उधार; वे भी अपने निज अनुभव के नहीं। लोग प्रेम की प्रशंसा भी करते हैं, स्तुति करते हैं; प्रेम का समादर करते हैं। लेकिन इस समादर में अनुभव नहीं है, प्रामाणिकता नहीं है। यह समादर मन का भुलावा है।
प्रेम से कौन नहीं कतराता? कतराना ही होगा। क्योंकि प्रेम है जोखिम का काम। प्रेम से बड़ी जोखिम कोई और नहीं। प्रेम मांगता है दुस्साहस, क्योंकि प्रेम है अभियान, अज्ञात की यात्रा। और मुफ्त नहीं होती यह यात्रा। बड़ी कीमत चुकानी होती है। बड़ी से बड़ी कीमत चुकानी होती है। स्वयं को ही जो अर्पित कर सकता है, वही प्रेम का स्वाद लेने में समर्थ होगा। अहंकार का विसर्जन है प्रेम।
प्रेम का ठीक अर्थ समझ लो, तो कठिनाई समझ में आ जाएगी। अहंकार का विसर्जन है प्रेम का अर्थ। जब किसी के भी संदर्भ में तुम मैं-भाव को छोड़ देते हो, वहीं प्रेम की अविरल धारा बह उठती है। फिर वह स्त्री हो, पुरुष हो, गुरु हो, परमात्मा हो--कोई भी हो; संगीत हो, काव्य हो, मूर्तिकला हो; तुम किसी भी संदर्भ में जहां अपने मैं-भाव को विसर्जित कर देते हो, जहां तुम नहीं होते; नृत्य हो, गीत हो, उत्सव हो। जब नर्तक शून्य हो जाता है और नर्तन ही शेष रह जाता है--नर्तकरहित नर्तन--बस प्रेम का आविर्भाव हुआ। जहां गायक मिट जाता है और गीत ही बचता है; वादक मिट जाता है और वादन ही बचता है--बस वहीं प्रेम का आविर्भाव है।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-02

दिनांक 02 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! संन्यास, ध्यान और प्रेम को आप छलांग कहते हैं। छलांग से आपका क्या आशय है?

नरेंद्र! जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है--ध्यान हो, प्रेम हो, या संन्यास हो--उसकी उपलब्धि गणित की भांति नहीं होती; उसकी उपलब्धि की प्रक्रिया नहीं होती, सीढ़ियां नहीं होतीं। उसमें कोई क्रमिक गति नहीं होती। विस्फोट होता है। एक क्षण में सब घट जाता है। सोच-विचार नहीं--एक हार्दिक दशा है, एक भाव की दशा है। अचानक! जैसे दीया जलाओ, तो अंधेरा क्रमशः दूर नहीं होता--कि पहले थोड़ा हटा, फिर और थोड़ा हटा, फिर और थोड़ा हटा। इधर दीया जला, उधर अंधेरा नहीं हुआ--एक क्षण में, युगपत।

दीये के जलने और अंधेरे के मिट जाने को मैं छलांग कहता हूं। अगर धीरे-धीरे जाता, क्रम से जाता, मात्रा में जाता, जाते-जाते जाता--तो क्रम होता।
ऐसा ही संन्यास कोई क्रम नहीं है। किसी बोध की घड़ी में अचानक जीवन की व्यर्थता दिखाई पड़ जाती है। ऐसी प्रगाढ़ता से दिखाई पड़ती है कि छोड़ना नहीं पड़ता कुछ, पकड़ने को ही कुछ नहीं रह जाता, पकड़ने योग्य कुछ नहीं रह जाता।
छोड़ना पड़े तो संन्यास सच्चा नहीं। छोड़ना पड़े तो फिर प्रक्रिया होगी, क्रमिक होगी। आज छोड़ोगे कुछ; कल छोड़ोगे कुछ; परसों छोड़ोगे कुछ। छोड़ते-छोड़ते जनम-जनम लग जाएंगे। बोध की प्रगाढ़ता में, जैसे भभक उठे ज्योति भीतर, दिखाई पड़ जाए कि जगत व्यर्थ है। यह सोच-विचार की निष्पत्ति नहीं, यह जागृति का अनुभव हो।
इसलिए संन्यास सत्संग में ही घट सकता है। जहां और-और दीये जले हों। जले दीये के पास बैठ कर घट सकता है।

मृत्योर्मा अमृतं गमय - प्रवचन-01

दिनांक 01 अगस्त सन् 1979

पहला प्रश्न: भगवान! इस भारत-भूमि पर कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक तथा ऐसी ही महान आत्माओं की किरणों का प्रकाश तो मैं प्रत्यक्ष आप में देख रहा हूं। क्या भारत-भूमि ही धार्मिकता की दृष्टि से अग्रणी रहेगी या इसमें भी विदेशी साधक अग्रणी हो जाएंगे? क्योंकि विदेशी वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाक्टर, विचारक, द्रष्टा इस प्रकार पूना भागे आ रहे हैं कि पूरे विश्व की संपदा यह आश्रम है। आपके सान्निध्य में ध्यान तथा प्रवचनों में जो सत्य, अहिंसा, करुणा, प्रेम, समर्पण का भाव इन विदेशियों ने सीखा है, आत्मसात किया है, यह आश्रम की गतिविधियों से स्पष्ट नजर आता है। भगवान, क्या आपकी संपदा से फिर भारत-भूमि वंचित रह जाएगी? क्या ढोंगी सत्य साईंबाबा जैसे ही लोग घड़ियां निकाल कर तथा राख गिरा कर भारत को राख में ही नहीं मिला देंगे? या आगे भी ऐसे ही महान पुरुषों का अवतार भारत-भूमि पर होता रहेगा? कृपया समझाने की कृपा करें।

श्रवण! भारत और अभारत, देश और विदेश की भाषा अधार्मिक है। यह मौलिक रूप से राजनीति, कूटनीति, हिंसा, प्रतिहिंसा, वैमनस्य, इस सबको तो परिलक्षित करती है--धर्म को नहीं, ध्यान को नहीं, समाधि को नहीं।
ध्यान क्या देशी और क्या विदेशी? प्रेम क्या देशी और क्या विदेशी? रंग लोगों के अलग होंगे, चेहरे-मोहरे भिन्न होंगे; आत्माएं तो भिन्न नहीं! देह थोड़ी-बहुत भिन्न हो सकती है; फिर भी देह का जो शास्त्र है, वह तो एक है। और आत्मा, जो कि बिलकुल एक है, उसके क्या अनेक शास्त्र होंगे? आत्मा को भी देशों के खंडों में बांटोगे?
इस बांटने के कारण ही कितना अहित हुआ है! इस बांटने के कारण ही पृथ्वी स्वर्ग नहीं बन पाई, पृथ्वी नर्क बन गई है। क्योंकि खंडित जहां भी लोग हो जाएंगे, प्रतिस्पर्धा से भर जाएंगे, अहंकार पकड़ लेगा--वहीं नर्क है।
यह अहंकार की भाषा है श्रवण। तुम सोचते हो, तुमने बहुत धार्मिक प्रश्न पूछा है। तुम्हारा प्रश्न बिलकुल अधार्मिक है। किसको तुम देश का हिस्सा मानते हो, किसको विदेश का हिस्सा मानते हो? बस नक्शे पर लकीरें खिंच जाती हैं, और तुम सोचते हो भूमि बंट जाती है?
लाहौर कल तक भारत था, अब भारत नहीं है! ढाका कल तक भारत था, अब भारत नहीं है! जब तुम भारत-भूमि शब्द का उपयोग करोगे तो करांची, ढाका, लाहौर उसमें आते हैं या नहीं? कल तक तो आते थे; उन्नीस सौ सैंतालीस के पहले तक तो आते थे; अब नहीं आते। कल देश और भी सिकुड़ सकता है। कल हो सकता है दक्षिण उत्तर से अलग हो जाए। तो फिर भारत देश उत्तर में ही समाहित हो जाएगा; फिर गंगा का कछार ही भारत रह जाएगा; फिर दक्षिण भारत नहीं रहेगा! अभी भी तुमने जिनके नाम गिनाए, वे सब उत्तर के हैं--कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक। उनमें एक भी दक्षिण का व्यक्ति नहीं है। दक्षिण की तो याद ही आती है तो तत्क्षण रावण की याद आती है!

शनिवार, 8 सितंबर 2018

आंखों देखी सांच-(प्रवचन-07)

प्रवचन-सातवां-(जीवन और धर्म)

इधर सोचता था- अभी बैठे-बैठे मुझे यह ख्याल आया, और जहां भी धर्म के उत्सव होते हों, जहां भी धर्म की आराधना होती हो, जहां भी धर्म के लिए लोग इकट्ठे हुए हों, वहां निरंतर मुझे यही ख्याल आता है- यह ख्याल आता है कि धर्म से हमारा कोई भी संबंध नहीं है। फिर यह धर्म की स्मृति में हम इकट्ठे क्यों होते हैं? धर्म से हमारा कौन-सा संबंध है? हमारे जीवन का, हमारे प्राणों का कौन-सा नाता है? हमारी जड़ें तो धर्म से बहुत दिन हुए टूट गयी हैं, लेकिन फिर भी हम पत्तों को सम्हालने चले जाते हैं।
नीत्शे का नाम सुना होगा। एक चर्च के पास से निकलता था। रविवार का दिन था और चर्च की घंटियां बज रही थीं। साथ में चलते एक मित्र को उसने कहा कि मुझे बहुत हैरानी होती है कि दो हजार साल पहले जिस क्राइस्ट को सूली पर लटका दिया गया, उसके लिए लोग अभी भी उसकी स्मृति में घंटियां क्यों बजाते हैं? मुझे हैरानी होती है कि महावीर को हुए ढाई हजार वर्ष हुए, क्राइस्ट को हुए दो हजार वर्ष हुए, कृष्ण को हुए शायद पांच हजार वर्ष हुए, फिर राम को भी बहुत समय बीता। लेकिन हम उनकी स्मृति में इकट्ठे क्यों होते हैं?
उनकी याद में उनके सम्मान में हम क्यों अपनी श्रद्धाएं अर्पित करते हैं? आश्चर्य मुझे न होता यदि हमारे जीवन, यदि हमारे प्राण उस सत्य से संबंधित हों जिस सत्य की इन व्यक्तियों ने गवाहियां दी हैं। लेकिन हमारे जीवन की दिशा तो बिल्कुल विरोधी है। हम भगवान के मंदिर में पूजा चढ़ाते हैं और शैतान के मंदिर में निवास करते हैं। तो फिर इस स्मृति का क्या प्रयोजन है? कहीं यह स्मृति आत्मघाती तो नहीं, आत्मवंचक तो नहीं है, यह सेल्फ डिसेपिटव तो नहीं है? और मुझे लगा है, यह है।
जीवन जब बहुत पास से भर जाता है, जीवन जब बहुत पाप से ग्रस्त हो जाता है तो हम धर्म की स्मृति में उस पाप को छिपा लेना चाहते हैं। जीवन में जब बहुत अंधकार हो जाता है तब हम प्रकाश की बातें करके उस अंधकार को भुलाने में लग जाते हैं। जीवन में जब बिल्कुल गलत हो जाता है तो हम अच्छी-अच्छी बातों में, अच्छे-अच्छे नारों से खुद को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हम गलत नहीं है। ये सब आत्मविश्वास खोजने के तरीके हैं। लेकिन इसको मैंने कहा, यह आत्मघाती प्रवृत्ति हैं, यह स्वीसाइडल है। क्योंकि जो व्यक्ति अपनी बीमारियों को नहीं जानेगा और उन्हें स्वास्थ्य की चर्चाओं में छिपाएगा, बीमारी बढ़ती जाएगी, और उसके प्राण ले लेंगी।
अधर्म को हम छिपाते हैं धर्म की बातों में। अधर्म बढ़ता जाता है, धर्म की बातें काम नहीं दे सकती हैं। ये सारे मंदिर हमारे पापों को छिपाने की तरकीबें हैं और ये सारी धर्म की चर्चाएं हमारे भीतर जो गलत हो गया है, इस धर्म की चर्चा के शोर गुल में उसको भुला देने के उपाय हैं। लेकिन यह आत्मघाती है वह बात। यह हमारी पूजाएं, हमारी प्रार्थनाएं, हमारे मंदिर घातक हैं। घातक इसलिए हैं कि इसमें जिसे हम छिपा रहे हैं वह हमारे प्राण ले लेगा। अधर्म हमारे प्राण ले लेगा। अधर्म हमारे प्राण ले रहा है। रोज-रोज हमारे जीवन की शांति, जीवन का आनंद, जीवन का संगीत सब छिनता जा रहा है। भीतर से हम नष्ट होते जा रहे हैं, भीतर मनुष्य एक खोखली लाश की भांति हो जा रहा है। लेकिन इसकी बातें सुनें, इसके शास्त्रों को देखें और उसके मंदिरों को देखें तो लगता है कि बहुत धर्म होगा। जमीन पर कितने मंदिर हैं, कितने धर्म हैं, कितना संप्रदाय, कितने साधु, कितने संन्यासी, कितने पंडित, कितने समझाने वाले लोग, कितने समझने वाले लोग! लेकिन धर्म कहां है?
यह विरोधाभास क्या आपको दिखायी नहीं पड़ता? यह हमारे जीवन में आ गयी असंगति क्या हमें दिखायी नहीं पड़ती? और यह असंगति जिसे दिखायी नहीं पड़ती, वह बहुत बड़े धोखे में है। और वह धोखा किसी और को नहीं दे रहा है, खुद को दे रहा है।
मुझे स्मरण आता है, कोई सौ वर्ष पहले की बात है, इंगलैंड में उन दिनों भले लोग नाटक नहीं देखते थे। नाटक देखना भले लोगों के लिए वर्जित था। शेक्सपीयर का एक नाटक इंग्लैंड के एक बड़े नगर में चलता था। उस नगर का जो बड़ा पुरोहित था, बड़ा पादरी था, जो आर्चबिशप था, उसके मन में भी लालसा थी कि उस नाटक को कैसे देखे, लेकिन नाटक को कैसे देखे? उसने थियेटर के मैनेजर को खबर भेजी कि मेरी नाटक देखने में रुचि है- क्या तुम्हारे थियेटर में पीछे कोई दरवाजा है, जिससे चुपचाप मैं आ सकूं?
मैनेजर ने बड़े पादरी आर्चबिशप को जवाब भेजा- हमारे थियेटर के पीछे दरवाजा है, उससे आप भीतर आ सकते हैं, लोग आपको नहीं देख सकेंगे। लेकिन एक बात स्मरण रखें, हमारे थियेटर में ऐसा कोई भी दरवाजा नहीं है, जिसे परमात्मा न देखता हो। फिर आपकी मर्जी। लोगों से तो बचाया जा सकता है, लेकिन परमात्मा से कैसे बचाइएगा?
हम भी जीवन में पीछे के दरवाजे खोलते हैं। सामने के दरवाजे पर धर्म होता है, पीछे के दरवाजे से जिंदगी चलती है। और जिस व्यक्ति के जीवन में दो दरवाजे हों, उसका जीवन नर्क बन जाता है। बन जाना स्वाभाविक है। वह दो विरोधी दिशाओं में एक साथ जीता है। जैसे एक बैलगाड़ी में हमने दोनों तरफ बैल जोत दिए हों, फिर क्या होगा? बैलगाड़ी के प्राणांत हो सकते हैं। और हम में से अधिक लोगों के जीवन में दोनों तरफ बैल जुते हुए हैं। हमारे सारे प्राण अधर्म की तरफ चलते हैं, हमारे सारे विचार धर्म की तरफ। और तब जीवन एक अत्यंत अंतःसंघर्ष में एक कांफ्लिक्ट में पड़ जाता है। और जिस व्यक्ति के भीतर द्वंद्व है, अतः संघर्ष है, जिस व्यक्ति के भीतर निरंतर विरोध चल रहा है, उस विरोध में ही उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है; उस विरोध में ही उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है। अपने से ही लड़ने में उसकी सारी ऊर्जा, सारा सामथ्र्य टूट जाता है। आखिर में वह एक रीते घड़े की भांति समाप्त हो जाता है, जिसमें कुछ भी न हो। और जिसके पास भीतर शक्ति न बचे, तो वह व्यक्ति सत्य को कैसे पा सकेगा? और जिस शक्ति के भीतर इंटीग्रेशन न हो, एकता न हो जिसके व्यक्तित्व में, विरोध में हो, अंतर्विरोध हो, वह व्यक्ति परमात्मा के दर्शन कैसे कर सकेगा? जो व्यक्ति भीतर संगीतपूर्ण नहीं है सत्य का भाग्य नहीं बन सकता। सत्य केवल उन्हें उपलब्ध हो सकता है जिनके हृदय संगीत से भरे हों। और संगीत वहां होता है, जहां द्वंद्व न हो, जहां भीतर विरोध न हो।
अच्छा हो कि आप सब नास्तिक हो जाए और किसी मंदिर में न जाएं; क्योंकि कम से कम तब आपके भीतर द्वंद्व तो न होगा! और जिसके भीतर द्वंद्व न होगा। वह बहुत दिन नास्तिक नहीं रह सकता। परमात्मा खुद उसके द्वार पर जाएगा। लेकिन आप सब हैं आस्तिक। आप सबके भीतर द्वंद्व है। परमात्मा की बात है, परमात्मा का जीवन नहीं है। तब- तब परमात्मा आपके द्वार पर कभी नहीं आ सकता। कोई रास्ता नहीं है आपके द्वार पर परमात्मा के आने का! सत्य आपके लिए कभी उदघाटित नहीं हो सकता है, क्योंकि द्वंद्वग्रस्त मन अपने में ही लड़ता और टूटता और नष्ट हो जाता है। उसे फुरसत भी नहीं मिलती है कि वह अपने बाहर आंख उठाकर देख सके। हम सब भीतर कलह से घिरे हैं और इसलिए मेरा ख्याल है कि मैं अंत कलह के संबंध में थोड़ी बात आपसे करूं, इससे मुक्त होने के उपाय के संबंध में थोड़ी बात आपसे करूं। इन दो दिनों में इसकी ही बात करूंगा।
अंतर्कला क्यों है? यह सारा अंत द्वंद्व क्यों पैदा होता है? कौन-से कारण हैं जिनसे हम निरंतर अपने भीतर विभाजित, खंडित हैं। अपने से ही लड़ रहे हैं। जैसे मैं अपने दोनों हाथों को लड़ाऊं, तो कौन जीतेगा? कोई भी नहीं जीतेगा, दोनों हाथ मेरे हैं। दोनों ओर से शक्ति लगेगी। कोई भी नहीं जीतेगा। दोनों हाथ लड़ेंगे, और उनकी लड़ाई में मैं मरूंगा। क्योंकि उनकी लड़ाई में मेरी शक्ति नष्ट होगी। बहुत जानना जरूरी है कि हम मन में, इस द्वंद्व में क्यों पड़े हैं? और यह द्वंद्व ही तो हमें तोड़ता है, डिटोरिएट करता है। धीरे-धीरे द्वंद्व और कलह हमारे जीवन को नष्ट कर देते हैं। मनुष्य का शरीर तो बूढ़ा होना स्वाभाविक है, लेकिन मन इसलिए बूढ़ा हो जाता है कि द्वंद्व से घिर जाता है। अन्यथा जिनके मन द्वंद्व से नहीं घिरते, उनका मन सदा युवा होगा। आत्मा के बूढ़े होने का कोई भी कारण नहीं है। शरीर के बूढ़े होने का कारण है। कारण, शरीर बूढ़ा होगा। लेकिन जिसका मन द्वंद्व से घिरा है, उसकी आत्मा भी बूढ़ी होती जाती है। और परमात्मा और सत्य को जानने के लिए युवा मन चाहिए, सतेज, सजग, स्वस्थ और स्वच्छ चेतना चाहिए। हमारी चेतना अस्वच्छ हो जाती है, द्वंद्वग्रस्त हो जाती है। और हम देखें, यह मैं आपसे कह रहा हूं, किसी सिद्धांत की बात नहीं कह रहा हूं, न किसी शास्त्र की बात कह रहा हूं। जो मन में होता है निरंतर, उन तथ्यों की बात कह रहा हूं। मैं जो कह रहा हूं, उसे मानने की जरूरत नहीं है। अपने मन को देखें। किसी शास्त्र में खोजने की जरूरत नहीं है, किसी की गवाही लेने की जरूरत नहीं है। बैठें थोड़ा एकांत में, अपने मन को देखें, क्या आपका मन द्वंद्वग्रस्त है और यदि द्वंद्वग्रस्त है तो आप अपने मन के दुश्मन है और आपका मन धीरे-धीरे बूढ़ा होता जाएगा, शक्तिशाली होता जाएगा, टूटता जाएगा। फिर ऐसे मन को लेकर परमात्मा के द्वार पर कैसे जाइएगा? यह मन तो आपको बहुत नीचे रखेगा। यह क्यों है स्थिति मन की? यह द्वंद्व का कारण क्या है? इस द्वंद्व के पीछे बुनियादी आधार क्या है? क्या कारण है कि हम द्वंद्व में ही पैदा होते हैं और द्वंद्व में ही समाप्त हो जाते हैं? कुछ कारण है।
पहली बात- और इन कारणों को हम ठीक से देखें। आज तो मैं इन कारणों की ही चर्चा करूंगा और कल इनसे मुक्त होने की। कौन-से कारण हमें घेरे हुए हैं? पहला जो मुझे दिखायी पड़ता है, वह यह है कि हम जीवन में अपने अनुभव से, अपने जीवन के निरंतर विकास से तथ्यों को देखते नहीं, वरन परंपरा से तथ्यों को और सिद्धांतों को स्वीकार कर लेते हैं। तब परंपरा हमें कुछ बातें बताती है। इन दोनों के बीच कलह उपस्थित हो जानी बिल्कुल स्वाभाविक है। इन दोनों के बीच विरोध उपस्थित हो जाना स्वाभाविक है। हम जीवन की सीधी समस्या को खुद कभी नहीं देखते। हमारी आंखें हमेशा परंपरा के पर्दे से चीजों को देखती हैं। एक छोटी-सी कहानी कहूं तो समझ में आए।
एक राजा का वजीर मर गया तो उसे अपने सारे राज्य में एक बुद्धिमान आदमी खोजना था जो वजीर की जगह नियुक्त किया जा सके। बड़ा राज्य था, बहुत बुद्धिमान थे और सबसे बड़े बुद्धिमान की खोज करनी थी। उसने बहुत-सी परीक्षाओं की व्य वस्था की। अंततः बहुत-सी परीक्षाओं को पार करते-करते तीन व्यक्ति चुने गए थे। अब उन तीनों व्यक्तियों में अंतिम निर्णायक परीक्षा होनी थी और एक चुना जाएगा और वह राजा का वजीर हो जाएगा। वह उस राज्य का सबसे बड़ा सम्मान था। वे तीनों व्यक्ति अपनी चेष्टा में लगे होंगे। जिस दिन अंतिम परीक्षा होनी थी उसके एक दिन पहले सारे नगर में अफवाह उड़ गयी कि कल राजा उनको एक ऐसे भवन में बंद कर देगा जिसमें एक ही दरवाजा है और उस दरवाजे पर एक ऐसा ताला लगाया गया हैं- उस समय की जो इंजीनियरिंग थी, उस समय की जो यंत्र विद्या थी, उस समय के जो गणितज्ञ थे, उन्होंने बड़ी कोशिश करके उस ताले को बनाया है। वह ताला गणित की एक पहेली की भांति है। जो व्यक्ति गणित में प्रभावशाली होगा, वही व्यक्ति उस ताले को खोलने की तरकीब खोज करेगा। जो उस ताले को खोलकर बाहर आ जाएगा, वही वजीर हो जाएगा।
स्वभावतः था, सारे नगर में अफवाह फैली। उन तीनों व्यक्तियों ने भी सुनी। उनमें से दो फौरन गए, उन्होंने इंजीनियरिंग की किताबें खरीदी, गणित की किताबें खरीदी। तालों के संबंध में जो कुछ भी लिखा हुआ था उनको इकट्ठा किया रातभर। वे उनको पढ़ते रहे और पहेलियां सुलझाते रहे। और दोनों हैरान रहे, वह जो तीसरा आदमी था, रात-भर आराम से सोया रहा। समझा कि यह पागल है। उन दोनों ने समझा कि पागल है। कल यह क्या करेगा? सोचा कि इसने समझा हो कि यह अफवाह है, लेकिन यह कहीं अगर सत्य हुआ तब? अपने हाथ से मौका खो रहा है। सुबह वे तीनों राजमहल गए। दो तो इन गणित से भर गए थे, रातभर जागकर उन्होंने गणित किया था। उनसे अगर कोई कहता, दो और दो कितने होते है तो वे घबड़ा जाते। गणित इतना ज्यादा दिमाग में हो तो दो और दो जोड़ना भी कठिन हो जाता है। स्वाभाविक है, गणित अगर दिमाग में कम हो तो दो और दो जोड़े जा सकते हैं। गणित अगर बहुत ज्यादा हो तो दो और दो को जोड़ना कठिन हो जाता है।
उनके पैर भी ठीक नहीं पड़ते थे, आंखें नींद से भरी थीं। रातभर की बेचैनी, घबराहट। राजमहल पहुंचे। पर तीसरा आदमी मौज से गीत गाता हुआ राजमहल पहुंचा। स्वभावतः जो रात भर सोया हो वह सुबह गीत गा सकता है। महल पहुंचे। राजा ने तो निश्चिंत ही- अफवाह सच थी, उनको एक महल में बंद कर दिया गया और उस पर एक ताला लगा हुआ था। उस ताले पर गणित के अंक बने हुए थे। तब तो वे दोनों प्रसन्न हुए कि इस तीसरे को अब पता चलेगा कि रात-भर शांति से सोने का क्या मतलब होता है। लेकिन वह अजीब था। वे दोनों तो कुछ किताबें भी अपने खीसों में, कपड़ों में छिपाकर ले गए थे कि वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ जाए तो वे उनसे देख लेंगे। उन्होंने तो जल्दी से अपनी किताबें निकाली। उनको खबर कर दी गयी, राजा ने कहलवा दिया कि ताला खोलकर जो बाहर निकल जाएगा, वही वजीर बन जाएगा। वे दोनों तो जल्दी अपनी किताबें खोलकर कागज पर हिसाब लगाने में लग गए, ताले के अंकों को देखने में लग गए। वह तीसरा आदमी आंख बंद करके फिर बैठे गया। निश्चित ही वह हार गया था, क्योंकि अब उसको क्या खोलने को है? तो उन दोनों ने सोचा कि शायद उसने प्रतियोगिता ही छोड़ दी है। वह कुछ सोच भी नहीं रहा था, कुछ हिसाब भी नहीं लगा रहा था, वह सिर्फ आंख बंद किए बैठा था। उसके चेहरे से भी मालूम नहीं पड़ता था कि वह कुछ सोच रहा है। वे दोनों तो तल्लीन हो गए। ठंडी सुबह थी, खिड़कियों से ठंडी हवाएं आती थीं, लेकिन उनके तो माथें से पसीना चू रहा था, वे तो अपने गणित में लगे हुए थे। वह आदमी धीरे से अचानक उठा। बाहर गया। दरवाजे पर गया। हैंडिल पर उसने हाथ घुमाया, हैरान हो गया, दरवाजा खुला हुआ था। दरवाजा लगा हुआ नहीं था। उसने हैंडिल को घुमाया और दरवाजा हटाया, दरवाजात खुला हुआ था। वह चुपचाप बाहर निकल गया। वे जो दोनों बैठे थे उन्हें पता भी नहीं चला कि अब कमरे में तीन नहीं हैं, दो ही बचे हैं। एक आदमी बाहर निकल गया, उनको पता तब चला जब राजा को लेकर वह आदमी वापस लौटा। और राजा ने कहा, अपना हिसाब बंद करो, अपनी किताबें बंद करो। जिसको निकलना था, वह बाहर निकल चुका है। तुमने पहली बात ही नहीं सोची कि समस्या है भी या नहीं? तुमने पहली बात ही नहीं विचारी कि ताला लगा हुआ है या नहीं लगा हुआ है और तुम ताले के संबंध में खोजबीन करने में संलग्न हो गए।
जिंदगी की पहली समस्या यह है कि हम समस्या को देखें कि वह है या नहीं? लेकिन इसके पहले कि हम समस्या को देखें, समाधान हमारे मन में परंपरा बिठाल देती है। हम उनके ऊहापोह में पड़ जाते हैं। हम ताले खोलने का विचार करने लगते हैं, कैसे खोलें? और शास्त्र अध्ययन करने लगते हैं कि कैसे ताला खोला जाए? और पच्चीस शास्त्र हैं और पच्चीस संप्रदाय हैं और पच्चीस विरोधी लोग हैं और उनके ऊहापोह में हमारा सारा मस्तिष्क जराजीर्ण हो जाता है। जीवन में समस्या क्या है, और है भी या नहीं, इसे देखने का साहस करने वाले बहुत थोड़े से लोग होते हैं। और जो लोग उठकर जीवन की समस्या को सीधा देखते हैं, बीच में शास्त्रों को, परंपराओं को, सिद्धांतों को नहीं लेते, उन्होंने अक्सर पाया है कि जीवन की समस्याएं वे नहीं हैं, जो शास्त्र की समस्याएं हैं। जीवन की पहेलियां वे नहीं हैं, जो गणित की पहेलियां हैं। जीवन बहुत सरल है, अगर चित्त शास्त्रों में भारग्रस्त हो; अगर चित्त परंपरा और ट्रेडीशंस से भरा हुआ न हो। जिंदगी बहुत सरल है। शायद उस पर कोई ताला नहीं लगा हुआ है। शायद द्वार अटका है और धक्का देने से खुल जाएगा।
पहली बात जरूरी है कि हम जीवन की समस्याओं को सीधा लें, बजाए इसके कि हम शास्त्रों को पकड़ लें। एक व्यक्ति मेरे पास आता है, वह कहता है, मुझे शांति चाहिए। क्या मैं राम-राम जपूं, तो शांति मिलेगी? वह ताला खोलने में लग गया। उसने मान लिया कि राम-राम न जपने से अशांति पैदा हुई है। राम-राम जपने से ताली लग जाएगी और ताला खुल जाएगा। उसने यह फिकर नहीं की कि अशांति है कहां? है तो क्या है? अशांति की फीकर नहीं की, शांति कैसे आए, ताला कैसे खुले, इसकी कोशिश में लग गया। एक आदमी दुखी है, पीड़ित है, वह पूछता है, मैं ईश्वर को कैसे पाऊं? उसे ईश्वर से कोई प्रयोजन नहीं है। शास्त्र कहते हैं जो ईश्वर को पा लेता है, उसे शांति मिलती है, दुख विलीन हो जाता है। वह दुखी है इसलिए वह सोचता है कि मैं ईश्वर को कैसे पाऊं? वह शास्त्रों में खोजने चला जाता है। जब कि सचाई यह है कि ईश्वर के मिलने से किसी को शांति नहीं मिलती। जिसे शांति मिल जाती है, उसे ईश्वर जरूर मिल जाता है। जब कि सच्चाई यह है कि किसी के भीतर अशांति हो तो वह ईश्वर का लाख नाम जपे, शांति नहीं मिल सकती। लेकिन जो अपनी अशांति को समझकर उससे मुक्त हो जाता है, उसे ईश्वर जरूर मिल जाता है। आखिर ईश्वर को पाने के लिए शांत मन की भूमि चाहिए। अशांत मन कैसे ईश्वर को पा सकेगा? लेकिन हम- अशांत मन होता है तो ईश्वर को खोजने चले जाते है। समस्या को नहीं देखते, समाधान की कोशिश शुरू कर देते हैं।
जीवन की बुनियादी भूलों में एक है जो मन को द्वंद्व में डाल देती है- समस्या को खोजें, समाधान को नहीं। समस्या ही महत्वपूर्ण है, समाधान महत्वपूर्ण नहीं है। और अगर दुनिया के लोग समस्याएं खोजें तो समस्याएं हल हो सकती हैं। लेकिन दुनिया के लोग समाधान खोजने हैं, फिर समाधान पकड़ लेते हैं। फिर ये समाधान नयी समस्याएं ले आते हैं, पुरानी समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। हर समाधान नयी समस्या पैदा कर देता है। कोई हिंदू है, कोई जैन है, कोई मुसलमान है, कोई बौद्ध है- इन सारे लोगों ने समाधान पकड़ लिए हैं। अगर ये समस्याएं खोजते- दुनिया में आदमी होते- न कोई हिंदू होता, न कोई जैन होता, न कोई मुसलमान होता। ये समस्याओं को पकड़ लिए हुए लोग हैं। तो जब एक समय समाधान को पकड़ लेते हैं तो ये दूसरे से लड़ते हैं कि तुम्हारा समाधान गलत है, मेरा समाधान सही है। इसलिए नहीं कि इनको दूसरे के समाधान गलत होने से कोई प्रयोजन है। इन्हें हर भांति अपने को विश्वास दिलाना है कि मेरा समाधान सही है। और ये विश्वास तभी दिला सकते हैं जब ये दूसरों के, सबके भीतर समाधानों के गलत कहने का जोर-शोर से प्रचार करें। तब इन्हें विश्वास आएगा कि हमारा समाधान सही है। इनका समाधान नयी समस्याएं खड़ी कर देता है।
दुनिया के धर्मों ने कोई समस्याएं समाप्त नहीं की, नयी समस्याएं खड़ी कर दी हैं। अगर दुनिया से धर्म समाप्त हो जाए, मनुष्य की पचास प्रतिशत समस्याएं उनके साथ चली जाएगी। उसकी लड़ाइयां, उसके विरोध, उसके संघर्ष, उसकी दीवालें, उसके मंदिर और मस्जिद, उसके शास्त्र, उसके पंडित, उसके साधु, यह सारा उपद्रव विलीन हो जाएगा। लेकिन बुनियादी बात कहां है? बुनियादी बात वहां है कि क्या हम समाधान खोजते हैं, या समस्या खोजते हैं? अगर हम समाधान खोजते हैं तो हम समस्या से पलायन खोज रहे हैं, एस्केप खोज रहे हैं। एक आदमी के भीतर हिंसा होती है तो वायलेंस होती है, चित्त में क्रोध होता है। हिंसा होती है तो वह उससे पीड़ित होता है, परेशान होता है, क्योंकि हिंसा किसी को सुख नहीं दे सकती है। क्रोध किसी को शांति नहीं दे सकता, द्वेष किसी के मन में संगीत नहीं ला सकता। इससे परेशान होता है। परेशान होता है। तो वह समाधान खोजने जाता है। कोई कहता है, अहिंसक हो जाओ तो समाधान हो जाएगा। यह वैसे ही है जैसे एक बीमार आदमी कहीं जाए और कहे कि मैं बीमारी से बहुत परेशान हूं और एक डाक्टर उससे कहे कि तुम स्वस्थ हो जाओ तो ठीक हो जाएगा। तो यह कितना पागलपन मालूम होगा! डाक्टर किसी बीमार को कहे जाओ, स्वस्थ हो जाओ, सब ठीक हो जाएगा। नहीं, डाक्टर यह नहीं कहता। लेकिन धर्म के डाक्टर यही कहते हैं। अगर हिंसा है, अहिंसक हो जाओ, सब ठीक हो जाएगा। अगर बीमार है तो स्वस्थ हो जाओ।
डाक्टर बीमारी को खोजता हैं; स्वस्थ हो जाओ यह नहीं कहता। बीमारी क्या है, कहां है, क्यों है, उस बीमारी को खोजता है और उस बीमारी को, बीमारी के भीतर उसके दूर करने के उपाय खोजता है। अब बीमारी नहीं रह जाती तो स्वास्थ्य उपलब्ध हो जाता है। बीमार के विरोध में स्वास्थ्य नहीं मिलता है, बीमारी के अभाव में स्वास्थ्य उपलब्ध होता है। हिंसा के विरोध में कोई आदमी अहिंसक हो सकता। जब हिंसा नहीं रह जाती तो अहिंसा अपने-आप उपलब्ध होती है। लेकिन हमारे भीतर हिंसा होती है, हम अहिंसा में उपाय खोजते हैं। हमारे भीतर क्रोध होता है, हम क्षमा में उपाय खोजते हैं। और क्रोध आदमी की क्षमा का क्या मूल्य है? हमारे भीतर लोभ होता है तो हम त्याग में उपाय खोजते है। लेकिन लोभी आदमी के त्याग का क्या मूल्य है? जो आदमी लोभी है, उसके त्याग के पीछे कोई न कोई लोभ काम करता है- स्वर्ग पाने का लोभ, मोक्ष पाने का लोभ, परमात्मा को पाने का लोभ। लेकिन लोभी आदमी के न्याय के पीछे लोभ मौजूद होगा; क्योंकि लोभी त्याग कैसे कर सकता है? वह तो जो भी करेगा, उसके पीछे लोभ होगा, कुछ पाने की आकांक्षा होगी। इसलिए दुनिया में बहुत-से लोभी त्यागी हो जाते हैं। देखते हैं कि इस जगत में लोभ काफी नहीं है। उनका लोभ विस्तीर्ण है, और बड़ा है, दूर आकाश तक जाता है, मोक्ष तक जाता है, स्वर्गों तक जाता है तो सब छोड़ने को राजी हो जाता हैं।
एक मुसलमान खलीफा हुआ, बहुत क्रोधी था, बहुत दुष्ट था, बहुत हिंसक वृत्ति का था। एक दिन उसने अपने कुछ मित्रों को अपने जन्म दिन पर भोजन के लिए बुलाया। उसके गुलाम से, भूल से उसके गुलाम के हाथ से गर्म थाली उसके पैर पर गिर पड़ी परोसते वक्त। सब मेहमान समझ गए कि अब सिवाय इसकी मृत्यु के और कुछ होने वाला नहीं है। उस खलीफा ने भी तलवार खींच ली। गुलाम भी समझ गया कि मरने के सिवाय अब कोई उपाय नहीं है। वह थरथर कांपने लगा। यही सजा हो सकती थी इस आदमी की कि इसकी गर्दन अलग कर दे, इसने भूल से थाली ऊपर गिरा दी। इनता ही क्रोधी था। लेकिन मरता क्या न करता! उस गुलाम ने कुरान की एक आयत कही। उसने कहा कि धन्य हैं वे, जो क्रोध नहीं करते। उस खलीफा ने अपनी तलवार भीतर कर ली। उसने कहा, मुझे क्रोध नहीं है। हालांकि जब उस ने कहा कि मुझे क्रोध नहीं है, तो उसके वचनों में भी भारी क्रोध था। उसके मित्र हैरान हुए। यह आश्चर्यजनक बात थी। उन सबके दिल प्रशंसा से भर गए। खलीफा ने चारों तरफ देखा, वह भी खुश हुआ। गुलाम ने आयत का दूसरा हिस्सा पढ़ा और उसने कहा, धन्य हैं वे, जो क्षमा कर देते हैं। उस खलीफा ने कहा, जाओ मैंने तुम्हें क्षमा किया। उस गुलाम ने आयत का अंतिम हिस्सा कहा। उसने कहा कि धन्य हैं वे, परमात्मा उन्हीं को उपलब्ध होगा, जिनके हृदय प्रेम से परिपूर्ण हैं। उस खलीफा ने कहा, न मैंने केवल तुम्हें क्षमा किया, ये हजार रुपए भी लो, मैंने तुम्हें गुलामी से मुक्त किया। सारे मित्रों ने जोर से तालियां बजायी। और कहा कि आप इतने अलौकिक धार्मिक व्यक्ति हैं, जिसका हमें पता नहीं था।
यह आदमी सस्ते में स्वर्ग पा गया है- एक गुलाम को छुटकारा देने से। एक हजार रुपया छोड़ देने में यह मोक्ष का मालिक हो गया। वह क्रोधी है, अगर क्षमा करने से स्वर्ग मिलता है तो यह क्षमा करने को राजी है। यह लोभी है, अगर हजार रुपए और गुलाम को छोड़ देने से, प्रेम प्रकट करने से परमात्मा का प्यारा हो सकता है तो उसके लिए तैयार है। हमारा मन इसकी प्रशंसा करेगा, लेकिन यह आदमी वही का वही है, इसमें कोई फर्क नहीं हुआ। यह वही का वही आदमी है। क्रोधी क्षमा करेगा, उसके क्षमा के भीतर भी कुछ क्रोध मौजूद होगा। लोभी त्याग करेगा, उसके त्याग के भीतर भी लोभ मौजूद होगा, क्योंकि जो हमारा मन है, हम उस मन से ही तो कुछ करेंगे? वह मन जो करेगा उससे मौजूद रहेगा। एक अहंकारी व्यक्ति विनीत हो जाए, कहने लगे, मैं ना कुछ हूं तो उसके ना कुछ होने में भी उसका अहंकार मौजूद रहेगा। एक अहंकारी व्यक्ति नग्न हो जाए, सारे वस्त्र त्याग दे, उसकी नग्नता में भी उसका अहंकार मौजूद रहेगा। साधु-संन्यासी अकारण ही क्रोधी नहीं होते हैं, साधु-संन्यासी अकारण ही अहंकार ग्रस्त नहीं होते हैं। वह सब अहंकारग्रत्स मन की ही प्रक्रियाएं हैं और इसलिए कोई अंतर नहीं पड़ता है। बुनियादी यह हमारी समस्या को छोड़कर समाधान खोजने की कोशिश है यह खतरनाक है। यह स्वयं को धो खा देने की तरकीब है।
सवाल समाधान का नहीं है, सवाल समस्या का है। मेरी समस्या क्या है? मेरी जिंदगी की समस्या क्या है? और आप सोचते होंगे कि समस्याएं तो सब लिखी हुए हैं शास्त्रों में, वही समस्याएं हैं। वे भी हो सकती हैं, आपकी समस्याएं न हों। क्या सच में ईश्वर को खोजना आपकी समस्या है? क्या सच में आत्मा को खोजना आपकी समस्या है?
क्या सच में मोक्ष पाना आपकी समस्या है? हो सकता है यह कोई भी आपकी समस्याएं न हों। और मैं नहीं समझता कि ये आपकी समस्याएं हैं। आपकी समस्याएं होंगी कि मन में क्रोध है, दुख है, घृणा है, हिंसा है, ईष्र्या है, प्रतियोगिता है, जलन है। ये हमारी समस्याएं हैं। कोई आध्यात्मिक समस्या किसी मनुष्य की नहीं है, सभी मनुष्य की समस्या मानसिक हैं, साइकोलाजिकल हैं। स्प्रीच्युअल किसी को कोई समस्या कभी नहीं होती है। स्प्रीच्युअल समाधान होते हैं, समस्याएं हमेशा साइकोलाजिकल होती है। समस्याएं हमेशा मानसिक होती हैं, समाधान हमेशा आत्मिक होते हैं। और जो मानसिक समस्याओं को सुलझा लेते हैं उन्हें आत्मिक समाधान उपलब्ध हो जाते हैं। आध्यात्मिक समस्या किसी भी मनुष्य की न कभी हुई हैं और न होती हैं।
लेकिन अगर हम शास्त्रों को पढ़ने में जाएंगे तो हमें ज्ञात होगा कि समस्याएं ये हैं कि ईश्वर है या नहीं? समस्या यह है कि आत्मा है या नहीं? समस्या यह है कि पुनर्जनम होते हैं या नहीं? समस्या यह है कि स्रष्टा ने कभी सृष्टि बनायी या नहीं? समस्या यह है कि भगवान के कितने चेहरे होते हैं? समस्या यह है कि भगवान आकार वाला है कि निराकार वाला है? ये समस्याएं हैं। ये समस्याएं थोथी समस्याएं हैं, जो आपकी समस्याएं नहीं हैं। ये किसी पंडित की समस्याएं होंगी, किसी फिलोसफर की समस्याएं होंगी। जिसे जीवन खराब करने की सुविधा हो, उसके लिए समस्याएं होंगी। जीवन की ये समस्याएं नहीं हैं। लेकिन अगर इन समस्याओं को हम पकड़ लें तो हमारी मूल समस्याएं एक तरफ पड़ी रह जाती हैं, हमारी मूल बीमारियां एक तरफ पड़ी रह जाती हैं और हम झूठी और थोथी बीमारियां के उलझाव में पड़ जाते हैं। हम ताले को खोलने की कोशिश करने लगते हैं वहां, जहां कि ताला लगा हुआ नहीं है।
तो मैं अपसे निवेदन करना चाहूंगा कि मन इसलिए द्वंद्व से भरा है कि उसने अपनी बुनियादी समस्या आग को एक तरफ रख छोड़ा है और ऐसी थोथी और झूठी और मीनिंगलेस समस्याओं को पकड़ लिया है जो कि वस्तुतः किसी मनुष्य की समस्याएं न कभी रही हैं, न हैं, और न हो सकती है। आप खुद ही सोचें। आपकी समस्या ईश्वर को पाना कहां है? आपके प्राणों में कहां ईश्वर का कोई सवाल है? कहां आपकी यह समस्या है कि ईश्वर ने दुनिया कब बनायी? कहां आपका यह सवाल है कि आत्मा का पुनर्जनम होता है या नहीं? नहीं, आपकी ये समस्याएं नहीं हैं। आपकी समस्याएं दूसरी हैं और इन समस्याओं के पीछे भी आपकी वे ही बुनियादी समस्याएं खड़ी हैं।
एक आदमी आता है और पूछता है, आत्मा अमर है या नहीं? दिखायी पड़ता है कि उसकी समस्या यही है कि वह आत्मा की अमरता के संबंध में पूछना चाहता है। लेकिन यह उसकी असली समस्या नहीं है। असली समस्या उसकी यह है कि मरने से डरता है। असली समस्या उसकी यह है कि फियर, मरने का भय उसकी समस्या है। हालांकि वह ऐसा नहीं पूछता कि मैं मरने से डरता हूं। वह पूछता है, क्या आत्मा अमर है? फर्क समझिए दोनों में। अगर वह यह पूछे कि मुझे मृत्यु से भय मालूम होता है, मैं क्या करूं? यह असली समस्या होगी, इसका कोई हल हो सकता है। लेकिन वह पूछता है, क्या आत्मा अमर है? यह नकली समस्या है। इसका कोई हल नहीं हो सकता। कोई कहेगा, आत्मा अमर है। कोई कहेगा, आत्मा अमर नहीं है। कोई कहेगा कि आत्मा होती ही नहीं है। कोई कहेगा, आत्मा के संबंध में यह। आत्मा के संबंध में पच्चीस शास्त्र हैं। वह ऊहापोह में पड़ जाएगा। और उसको जो भय था मरने का, वह भीतर मौजूद बना रहेगा, वह कहां जाएगा? आप किसी भी शास्त्र को मान लें, आत्मा अमर कहने वाले शास्त्र को मान लें, आत्मा न अमर कहने वाले शास्त्र को मान लें, लेकिन मृत्यु का भय कहां जाएगा? वह तो भीतर बैठा रहेगा। समस्या एक तरफ बैठी रहेगी, समाधान दूसरी तरफ इकट्ठे होते चले जाएंगे। तब जीवन में द्वंद्व पैदा हो जाएगा। समाधान कुछ कहेंगे, समस्या कुद कहेंगी।
एक आदमी पूछता है, साकार है ईश्वर या निराकार है? लगता है कि बड़ी ऊंची, मैटाफिजिकल समस्या है। उसकी बड़ी ऊंची समस्या है। वह भी समझता है कि मेरी कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है। उसकी समस्या असल में मैटाफिजिकल नहीं है। उसकी समस्या कुछ और है। उसकी समस्या यह है कि ईश्वर से मेरा कोई संबंध हो सकता है या नहीं? ईश्वर को मैं प्रेम कर सकता हूं या नहीं? ईश्वर अगर साकार हो तो मैं प्रेम कर सकता हूं। ईश्वर मेरी सुनेगा या नहीं? अगर वह साकार है तो मेरी सुन सकेगा, मेरी प्रार्थना सुन सकेगा, मेरी कामनाओं की पूर्ति कर सकेगा या नहीं? और अंदर घुसें तो ज्ञात होगा, उसके जीवन में प्रफस्ट्रेशन है। उसके जीवन में जो उसने चाहा, वह पूरा नहीं हो सका। जो उसने मांगा वह नहीं मिला। इसलिए वह पूछता है, क्या कोई ईश्वर है? जिससे मैं मांगूं तो मिल सके; जिससे मैं प्रार्थना करूं तो मुझे प्राप्त हो सके? मैंने सफल होना चाहा था, असफल हो गया। मैंने बड़े पद पर होना चाहा था, बड़ा पद मुझे नहीं मिल सका। मैंने बहुत धन कमाना चाहा था, वह धन मुझे नहीं आ सका। क्या कोई ईश्वर है जो मेरी सहायता कर सकेगा? मैं दुखी हूं, मैं पीड़ित हूं। क्या कोई ईश्वर है जो मेरा छुटकारा इस सारे दुख और पीड़ा से करा सकता है?
वह किसी ईश्वर की तलाश में है, क्योंकि भीतर वह बहुत घबड़ा गया है। अकेला है, वह कोई सहारा चाहता है। उसकी समस्या है, मैं अकेला हूं, मुझे कोई सहारा चाहिए। फिर वह सहारा अनेक रूपों में खोजता है। हो सकता है, वह ईश्वर को मान ले और उसे सहारा मिल जाए। हो सकता है, वह ईश्वर को न माने, वह कम्युनिज्म को मान ले और उसे सहारा मिल जाए। हो सकता है वह, कमयुनिज्म को न माने तो शराब पीने में लगे और उसे सहारा मिल जाए। हो सकता है, वह कोई पच्चीस रास्ते निकाल सकता है, जहां वह अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने की कोशिश करेगा। अकेला हूं, बेसहारा हूं, इसे भुलना है, इस स्थिति को अपने से दूर हटाना है। इसकी किसी तरह स्मृति के बाहर कर देना है। उसकी समस्या क्या है? उसकी समस्या है, वह अकेला है और अकेले होने में डर रहा है। इसलिए वह किसी का सहारा चाहता है। किसी का सहारा चाहता है, किसी सर्वशक्तिशाली का सहार चाहता है।
तो है ईश्वर या नहीं, यह उसकी समस्या नहीं है। उसकी समस्या है, वह अकेला है। और बिना सहारे के रहने में बड़ी असुविधा मालूम पड़ रही है। यह हमारी जिंदगी में मैटाफिजिकल्स प्राबलमस ने, आध्यात्मिक समस्याओं ने मनुष्य के भीतर द्वंद्व पैदा किया है। मनुष्य की समस्याएं मनोवैज्ञानिक हैं, साइकोलाजिकल हैं। उसकी समस्याएं बहुत और हैं। और जब समस्या कुछ हो और हम समस्या को कुछ और समझते हों तो स्वाभाविक है कि हमारे भीतर फूट पैदा हो जाए, हमारा व्यक्ति धीरे-धीरे खंडित हो जाए।
तो पहला तो निवेदन मैं आपसे यह करना चाहता हूं कि किसी मनुष्य की कोई आध्यात्मिक समस्या नहीं है। इसीलिए जिन आध्यात्मिक समस्याओं को आपने पकड़ लिया है उनसे कोई समस्या हल नहीं हुई है। पांच हजार साल में दुनिया में बहुत धर्म हैं, कौन-सी समस्या हल हो गयी है? मनुष्य कम दुखी हो गया है, ज्यादा आनंदित हो गया है? नहीं, कोई अंतर नहीं पड़ा। मंदिर एक हो गांव में कि मंदिर पांच हों गांव में पांव के चित्त-स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। एक शास्त्र हो कि हजार शास्त्र हों, मन जैसा है, वैसा ही बना रहेगा, उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मन की यह समस्या नहीं है। लेकिन हम इस पर लड़ते हैं, इस पर हत्याएं करते हैं। उन समाधानों पर हम लड़ते हैं, जो हमारी समस्याः नहीं हैं। अगर एक मुसलमान की मस्जिद गिरा दी जाए तो मुसलमान लड़ने को तैयार है। अगर एक हिंदू का मंदिर टूट जाए तो हिंदू लड़ने को तैयार है। उन समाधानों के लिए वह जान देने को तैयार है, जो उसकी समस्याएं नहीं हैं।
अगर दुनिया में मनुष्य को स्पष्ट बोध हो जाए कि मेरी समस्या क्या है तो ये धर्म और इनके विभाजन और इनमे शास्त्र और इनकी लड़ाइयां अपने-आप विलीन हो सकती हैं और ये विलीन होनी चाहिए। बड़ा मजा है यह। क्या एक मुसलमान की समस्या एक हिंदू की समस्या से अलग हो सकती है? क्या एक जैन की समस्या एक ईसाई कि समस्या से अलग हो सकती है? मनुष्य की समस्याएं। सारे मनुष्य की समस्याएं भिन्न हैं, सारी दुनिया में एक है। मनुष्य मनुष्य की समस्याएं लेकिन मैटाफिजिकल समस्याएं अलग-अलग हैं। जैन कुछ और सोचता है। उसके लिए कोई ईश्वर नहीं है। वह उसकी समस्या नहीं। हिंदू के लिए यह समस्या है कि ईश्वर है या नहीं? जैन पुनर्जन्म को मानता है, उसके लिए पुनर्जन्म की समस्या नहीं है। एक मुसलमान के लिए समस्या है कि पुनर्जन्म है या नहीं है? नहीं है। लेकिन एक हिंदू के मन को पकड़े, एक मुसलमान के मन को पकड़ें, एक जैन के मन को पकड़ें। क्या इनकी समस्याएं अलग हैं? मनुष्य की समस्याएं अलग नहीं हैं, लेकिन धर्मों की समस्याएं अलग हैं। निश्चित ही धर्मों की समस्याएं झूठ होंगी। सारे मनुष्य की- चाहे वह हिंदुस्तान में हो या चाहे चीन में, चाहे जापान में, चाहे कहीं और अप्रफीका में; मनुष्य की बुनियादी समस्याएं एक हैं। वह मानसिक है, वह आध्यात्मिक नहीं है। जब तक यह तथ्य हमें स्पष्ट न हों, जब तक हम अपने बाबत इस सच्चाई को साफ-साफ न समझ लें कि हमारी समस्या क्या है, तब हम जो भी करेंगे, हम जो भी करेंगे, हमें और कनफ्यूजिन में ले जाएगा और उपद्रव में ले जाएगा। उससे कोई हल उससे कोई मुक्ति असंभव है। पहली बात है तो यह मैं आपसे कहूं।
दूसरी बात मैं आपसे यह कहूं, समस्याएं इन आध्यात्मिक समाधानों ने पैदा कीं, और दूसरी बात, आदर्श परंराओं ने स्थापित कर लिए हैं, उसने हमारी ये समस्याएं पैदा कर दीं। आदर्श क्या हैं? महावीर आदर्श हैं, राम आदर्श हैं, कृष्ण आदर्श हैं, बुद्ध आदर्श हैं। आदर्श का मतलब यह है कि परंपरा हमसे कहती है कि तुम इनके जैसे होने की कोशिश करना। ये आदर्श हैं। इनके जैसे बनना। इनके जैसे बनना। ये जैसे हैं वैसे तुम बनना। इससे सारी दुनिया में एक नकल, एक अभिनय, एक पाखंड पैदा हुआ। जब भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्य क्ति जैसा बनना चाहेगा, अनिवार्य रूप से पाखंडी हो जाएगा। अनिवार्य रूप से। इसलिए पाखंडी हो जाएगा कि एक मनुष्य, एक व्यक्ति वस्तुतः ठीक दूसरे जैसा कभी न बना है और न कभी बन सकता है। हर व्यक्ति की अपनी यूनिक, अपनी बेजोड़ सत्ता है।
क्या आपको पता है, ढाई हजार वर्षों में महावीर जैसा व्यक्ति दूसरा व्यक्ति क्यों नहीं बन पाया? दो हजार वर्ष हो गए क्राइस्प को मरे, दो हजार वर्ष से लाखों लोग उनके जैसे बनने की कोशिश करते हैं, दूसरा आदमी क्राइस्ट क्यों नहीं बना? राम कोई दूसरा क्यों नहीं बना? रामलीला के रामों को छोड़ दें। राम कोई दूसरा व्यक्ति क्यों नहीं बन सका? कृष्ण कोई दूसरा व्यक्ति क्यों नहीं बन सका? कृष्णलीला की बात अलग है। रामलीला में जो बन जाते हैं कृष्ण, उनको छोड़ दें। लेकिन सच यह है कि कभी कोई मनुष्य दूसरे मनुष्य जैसा ठीक नहीं बन सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अद्वितीय क्षमता है, अपनी अद्वितीय प्रतिभा है। अपना अद्वितीय व्यक्तित्व है। एक पत्थर भी अगर मैं आपको दे दूं और कहूं कि जाएं दूसरा पत्थर इस जैसा खोज लाएं। इस बड़ी जमीन पर उस जैसा दूसरा पत्थर नहीं खोजा जा सकता। असंभव है। एक जैसे दो पत्थर के जब टुकड़े भी नहीं होते तो एक जैसी दो चेतनाएं एक जड़ वस्तु भी एक नहीं होती तो चैतन्य जैसा जीवंत प्रवाह एक जैसा नहीं हो सकता है। लेकिन हमें सिखाया जा सकता है कि हम किसी दूसरे जैसे हो जाएं। गांधी जैसे हो जाओ, महावीर जैसे हो जाओ, फलां जैसे हो जाओ।
क्यों हो जाएं? कोई व्यक्ति किसी दूसरे जैसा क्यों होना चाहे? क्या यह घातक नहीं है? और जब यह दूसरे जैसा होना चाहेगा तो क्या होगा? होगा यह, अपने को दबाएगा, दूसरे को ओढ़ेगा। महावीर को ओढ़ेगा, बुद्ध को ओढ़ेगा। किसी को ओढ़ेगा अपने ऊपर। अपने को दबाएगा। अपने से घृणा करेगा, दूसरे को प्रेम करेगा। अपने को मिटाएगा, दूसरे को लाएगा। वह अपना दुश्मन हो जाएगा। जो भी व्यक्ति किसी को आदर्श मानता है वह अपना शत्रु हो जाता है। और अपना शत्रु होने से द्वंद्व पैदा होगा। क्योंकि असलियत में, मैं तो मैं हूं। न मैं महावीर हूं, न मैं बुद्ध हूं, न हो सकता हूं। न होने की कोई जरूरत है। लेकिन जब मैं महावीर होना चाहूंगा तो मैं द्वंद्व में पड़ जाऊंगा। मेरे सामने दो चीजें हो जाएंगी- जो मैं हूं और जो महावीर हैं। उन जैसा होना है और अपने जैसा मिटना है। अपने को तोड़ना है, हटाना है, उनको लाना है। तब तक काल्पनिक आदर्श मेरे प्राण लेने लगेगा। मैं अपने साथ तोड़-फोड़ में लग जाऊंगा, आत्महिंसा में लग जाऊंगा। एक तरह की संघर्ष की और द्वंद्व की स्थिति पैदा होगी जिसमें अपने को मिटाना है, और अपने प्रति घृणा पैदा हो जाएगी, कंडेमनेशन पैदा हो जाएगा। मैं बुरा हूं और महावीर अच्छे हैं।
सवाल यह नहीं है कि कोई किसी दूसरे जैसा हो। सवाल यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को खोजें कि वह क्या है और क्या हो सकता है बिना किसी दूसरे को बीच में लिए। सवाल यह है कि वह अपनी निजता को खोजे अपनी इंडीवीजुलिटी को, और विकसित करे। कोई किसी दूसरे जैसा होने को पैदा नहीं हुआ है।
स्पार्टा में एक बादशाह हुआ। एक आदमी की खबर लायी गयी कि एक आदमी है; जो बुलबुल जैसा गाता है, बुलबुल जैसी जिसकी आवाज है। उसने कहा छोडो। मैं बुलबुलों को सुन चुका हूं। इस आदमी को यहां लाने की जरूरत नहीं है। लेकिन दरबारी नहीं माने। सारे स्पार्टा में उसकी इज्जत थी। उस आदमी को लोग सुनने जाते थे। यह दिन-रात बुलबुल की आवाज बोलते-बोलते धीरे-धीरे आदमी की आवाज बोलना भूल भी गया था। लेकिन जब लोग नहीं माने, उस आदमी को लाया गया। उसने आते ही बुलबुल की आवाज शुरू की। बादशाह ने कहा, बकवास बंद करो। आदमी को बुलबुल जैसा होना शोभा नहीं देता। तुम आदमी होने को पैदा हुए हो। यह तुमसे किसने कहा कि तुम बुलबुल हो जाओ? परमात्मा ने काफी बुलबुलें बनायी हैं, वे गीत गा रही हैं। और मैं बुलबुलों के गीत सुन चुका हूं। तुम तुम होने को पैदा हुए हो। तुम जाओ यहां से। और जिस दिन तुम अपनी भाषा बोलने लगो, जिस दिन तुम अपने व्यक्ति की भाषा और गीत को उपलब्ध हो जाओ, आना। मैं तुम्हारा स्वागत करूंगा।
जैसा इस स्पार्टा के बादशाह ने कहा था, परमात्मा भी यही आपसे कहेगा कि दूसरे की भाषा मत बोलो, बाहर निकलो। राम तो घुस सकते हैं, रामलीला के राम की कोई जरूरत नहीं है। यह ढोंग नहीं चलेगा। आप अपने जैसे होने को पैदा हुए हो, नहीं तो आपके होने की क्या जरूरत है? आपका अपना व्यक्तित्व है, अपनी चेतना है। उसको खोजिए। अपने व्यक्तित्व को खोजना धर्म है। दूसरे के व्यक्तित्व की नकल करना धर्म नहीं है। लेनिक ये सब नकलें प्रचलित हैं। और परंपरा सिखाती है कि किसी दूसरे जैसे हो जाओ। हमेशा सिखाती है। जब आप नहीं हो पाते तो क्या करेंगे?
महावीर नग्न घूमते हैं। आपसे कहा जाता है, आप भी नग्न हो जाओ। आप क्या करेंगे? जब महावीर जैसी चेतना आपकी नहीं हो पाती तो आप वस्त्र तो छोड़ ही सकते हैं। नग्न होना कोई कठिन बात है? थोड़े से अथ्यास की बात है। वस्त्र छोड़े जा सकते हैं। फिर वस्त्र छोड़कर आप नग्न हो जाएंगे। दूसरों को भ्रम होगा, आप भी महावीर हो गए। आपको भी भ्रम होगा, मैं भी महावीर हो गया। लेकिन नंगे होने से कोई महावीर होता है? महावीर के भीतर एक निर्दोष, इनोसेंस की स्थिति पैदा हुई। महावीर शांत होते-होते उस स्थिति में गए जहां चित्त पूरा इनोसेंट हो गया। इतना इनोसेंट, जैसे छोटे बच्चे का होता है। वस्त्र का बोध न रहा। महावीर ने वस्त्र छोड़े नहीं। वस्त्र का अर्थ न रहा। वस्त्र छूट गए। वह तो भीतर एक निर्दोषता की स्थिति आयी इसलिए वस्त्र छूट गया। आप क्या करेंगे? आप तो नग्न होना चाहते हैं। यह बच्चे के चित्त का लक्षण है जो नग्न होना चाहता है। उसके भीतर अंगों के छिपाने का बोध है। नहीं तो वह नग्न हो जाता। होना क्यों चाहता है? जहां इफर्ट है, वहां चित्त निर्दोष नहीं है। आप तो चेष्टा करेंगे, प्रयास करेंगे, कोशिश करेंगे।
मैं एक मित्र को जानता हूं। वे दिगंबर जैन साधु हैं। पहले ब्रह्मचारी थे। जंगलों में रहते थे। वहां मैं उनसे मिलने गया जिस झोपड़ें में थे, उसकी खिड़की से मैंने देखा, वे नग्न टहल रहे थे। तो तब तो वे कपड़े पहनते थे। मैंने सोचा, क्या हुआ, फिर नग्न कब हो गए? मैंने दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खुला तो वे चदर लपेटे हुए थे। मैंने उनसे कहा, आप अभी नग्न थे, आपने चादर लपेट ली? उन्होंने कहा, मैं अभ्यास कर रहा हूं नग्न होने का। अब इसके बाद मुझे मुनि की दीक्षा लेने की तैयारी है मुनि की दीक्षा लेने की तैयारी होती है, प्रिपरेशन होती है? जैसे कोई रंगरूट तैयार होते हैं मिलिट्री में, वैसी तैयारी है?
मुनि-दीक्षा की तैयारी कर रहा हूं। नग्न रहना होगा। अभी धीरे-धीरे अकेले में नग्न रहता हूं, फिर दो-चार मित्रों में नग्न रहूंगा, फिर थोड़ा गांव में निकलूंगा, फिर बड़े शहर में फिर धीरे-धीरे अभ्यास से, तो मैंने उनसे कहा कि सर्कस में भर्ती हो जाइए क्योंकि जो नग्नता चेष्टा से लायी जाए गी वह सर्कस का नंगा आदमी बनाती है, महावीर नहीं बनाती है। जो चेष्टा से लायी जाएगी वह सर्कस में ले जा सकती है। वह एक आरोपित, कल्टीवेटेड व्यक्तित्व होगा, झूठा व्यक्तित्व होगा। उसके भीतर कोई प्राण नहीं होंगे। वह इनोसेंस कहां से लाइएगा? नग्न होने से कोई इनोसेंट हो सकता है? हां, इनोसेंट होने से कोई नग्न जरूर हो सकता है। लेकिन वह बिल्कुल अलग बात है। बिल्कुल अलग बात है। बिल्कुल ही भिन्न बात है।
व्यक्तित्व भीतर से बाहर की तरफ आता है, स्मरण रखिए। बाहर से भीतर की तरफ नहीं आता। और जो चीज भी भीतर से बाहर की तरफ से लायी जाती है वह कारागृह बन जाती है, वह इंटरमेंट (दफनाया हुआ) होता है। और हमारे सब आदर्श बाहर से भीतर की तरफ ही जा सकते हैं। आदर्श कभी भीतर से बाहर की तरफ नहीं आ सकता, आदर्श हमेशा भीतर से बाहर की तरफ आएगा। बाहर हैं महावीर, बाहर हैं बुद्ध, बाहर हैं कृष्ण, उनको हम देखते हैं, उनसे प्रभावित होते हैं। प्रभावित होकर उन जैसे होने की कोशिश में लग जाते हैं। उनके जैसे कपड़े पहनते हैं, उनके जैसा खाना खाते हैं। वे जब उठते हैं तो उठते हैं, वे जब सोते हैं तो सोते हैं। वे जैसा करते हैं वैसा ही हम करते हैं। यह तो इडियाटिक माइंड का लक्षण है। यह जड़बुद्धि का लक्षण है। जो दूसरे की नकल करता है वह जड़बुद्धि है। उसके चेतना नहीं है। नकल करना- लेकिन आदर्श और क्या है? और जब यह नकल चलेगी, जो जितना जड़बुद्धि होगा वह उतनी जल्दी नकल में परिपक्व हो जाता है। सचेतन व्यक्ति द्रोह कर उठेगा। तब उसे लगेगा कि यह मैं क्या सोच रहा हूं अपने ऊपर? यह क्या मूर्खताएं मैं थोपे जा रहा हूं जिसका मेरे प्राणों से कोई संबंध नहीं? उन बातों को मैं कैसे अपने पर लादे जा रहा हूं?
एक मित्र मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे कहा कि मैं मांसाहारी हूं। शराब भी पीता हूं- बड़े वकील हैं- आपके पास आना चाहता था लेकिन यह सोचकर नहीं आया, शायद कहते होंगे कि पहले शराब छोड़ो, मांसाहार छोड़ो। मैंने कहा, वे कोई और नासमझ होंगे जो कहते हैं। आप गलती में थे, व्यर्थ आप रुके रहे। उन्होंने कहा, यही तो हुआ। कल एक मित्र ने कहा कि वे तो कुछ छोड़ने को नहीं कहते, इसलिए मैं हिम्मत करके आया हूं। मैंने उनसे कहा, मैं तो नहीं कहता कि आप मांसाहार छोड़ें। मैं तो नहीं कहता, आप शराब छोड़ो, क्योंकि यह सवाल नहीं है। सवाल यह है कि आप शराब क्यों पीते हैं? सवाल यह थोड़े ही है कि शराब आप छोड़ो, सवाल यह है कि आप शराब क्यों पीते हैं? चित्त अशांत होगा, दुखी होगा, खुद को भुलना चाहता होगा, इसलिए शराब पीते हैं। सवाल शराब का बिल्कुल नहीं है। सवाल उस चित्त का है, जो भूलना चाहता है। मैं उसके बाबत आपके कुछ चर्चा करूं कि चित्त क्यों आपने को भूलना चाहता है क्यों दुखी है, क्यों द्वंद्व में है? उनसे मैं बात करता था। धीरे-धीरे इन बातों को उन्होंने प्रयोग किया। दो-तीन महीने बाद में आए और उन्होंने मुझसे कहा, आपने मुझे धोखा दे दिया। शराब तो गयी। आपने मुझे धोखा दिया। आपने मुझे पहले क्यों नहीं कहा? शराब तो गयी। मैंने आपके शराब के बाबत कभी कुछ नहीं कहा। मैं तो मन की उस स्थिति के बाबत आपसे विचार करता था, जिसकी वजन से आदमी दुखी होता है और अपने को भूलना चाहता है। वह स्थिति चली गयी, शराब तो अपने-आप चली जाएगी।
लेकिन आदर्श क्या सिखाता है? आदर्श सिखाता है शराब मत पियो। आदर्श भर नहीं है। धर्म कहता है, शराब पीते हो तो पहचानो, क्यों पीते हो? खोजो कि द्वंद्व कहां है मन में, जिसे भूलना चाहते हो? कौन-सा एंग्झाइटी है जो बेहोश होने के लिए कहती है? उस एंग्झाइटी को समझो, उसको जाने दो। शराब तो उसके पीछे है, उस के साथ ही चली जाएगी।
जीवन में जो परिवर्तन है, वह आचरण से शुरू नहीं होता, वह अंतस से शुरू होता है। अंतस बदलता है, आचरण बदलता है। लेकिन जो लोग अंतस को बिना बदले आचरण को बदलने में लग जाते हैं उनके भीतर द्वंद्व पैदा हो जाता है। उनके भीतर कांफ्लिक्ट पैदा हो जाती है। वे दो आदमियों में बंट जाते हैं। एक आचरण वाला आदमी है- यही तो पाखंड है। पाखंड और क्या है? धोखा और क्या है? धोखा यह है कि मैं दो तरह के आदमी बन जाऊं। मेरा एक दरवाजा पीछे को, एक आगे को। एक तरफ का आदमी दिखाने के लिए, दूसरी तरह का आदमी जीने के लिए। तो फिर धोखा पैदा हो जाएगा। और वह धोखा, सारे तलों पर प्रविष्ट होता जाता है। धीरे-धीरे। आदर्श द्वंद्व पैदा करने के कारण बने। जरूरत है कि मनुष्य का मन आदर्श से मुक्त हो जाए। वह स्पष्ट स्मरण कर ले कि मैं आप जैसा होने को पैदा हुआ। मुझे खोजना है कि मैं कौन हूं, क्या हूं? मुझे खोजना है कि मैं क्या हो सकता हूं, मेरी क्या संभावना है? और वह दूसरे की नकल छोड़ दे। दूसरे की नकल में विचार करें, ईष्र्या है। दूसरे की नकल में कंपीटीशन है। आप कंपटीटिव हैं, ईष्र्यालु हैं। आप के भीतर जलन है। आप महावीर जैसे क्यों होना चाहते हैं? इसलिए कि महावीर आनंद में मालूम पड़ते हैं, शांति में मालूम पड़ते हैं। इसलिए मैं भी सांत्वना चाहता हूं, मैं भी आनंदित होना चाहता हूं। मैं भी माहवीर जैसा बनूंगा।
छोटे-छोटे बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं। लड़का होशियार है, वह पहले आता है। शिक्षक उससे कहते हैं, इस जैसे बनो। यह जो पहले आया है। तुम भी पहले आओ। प्रतियोगिता पैदा करता है, ईष्र्या पैदा करता है। दौड़ पैदा करता है, ईष्र्या का ज्वर पैदा करता है। उस ज्वर में बच्चे दौड़ते हैं। लेकिन बच्चे ही नहीं, बूढ़े भी ज्वर में दौड़ते रहते हैं। महावीर के पास शांति है तो हम भी महावीर जैसे हो जाएं। महावीर के पास शांति नहीं है, जिसके पास शांति है वह महावीर है। महावीर के पास शांति नहीं है, जिसके पास शांति है वह महावीर है। इसलिए महावीर जैसे होने की फिकर छोड़ दें। शांत हो सकते हैं, इसका विचार करें। जो दूसरे जैसा होना चाहेगा, वह तो हमेशा अशांत रहेगा। क्योंकि पूरे-पूरे अर्थों में कोई मनुष्य महावीर जैसा कोई नहीं हो सकता है। और जब नहीं हो पाएगा तो अशांति पैदा होगी। बेचैनी पैदा होगी, क्या करूं क्या न करूं! जीवन व्यर्थ जाता मालूम होगा।
मैं साधुओं को मिलता हूं। साधु दुनिया में सर्वाधिक नकल पसंद लोग हैं। सबसे ज्यादा ट्रू कापी बनने की चेष्टा में संलग्न रहते हैं। सबसे ज्यादा बुद्धि की जड़ता वहां प्रविष्ट हुई है। उनसे मैं निरंतर मिलता हूं, उनसे मैं पूछता हूं, चित्त शांत है? वे कहते हैं, चित शांत नहीं है। चित्त शांत होगा कैसे? जो आदमी दूसरे जैसा होने की कोशिश में लगा है वह कैसे शांत होगा? शांत होता है व्यक्ति, जब उसके खुद के व्यक्तित्व की सारी संभावनाएं वास्तविक बन जाती है। जब उसके भीतर के सारे बीज वृक्ष बन जाते हैं और उसमें फूल लग जाते हैं तो शांति आती है, आनंद आता है। लेकिन एक आम का वृक्ष है, गुलाब का वृक्ष बनने में लग जाए, एक गुलाब का वृक्ष चमेली का पौधा बनने में लग जाए, एक चमेली का पौधा जुही का पौधा होने में लग जाए तो पौधों की दुनिया में कितनी अशांति नहीं व्यापत हो जाएगी! और क्या होगा? होगा यह कि गुलाब का पौधा तो चमेली बन नहीं सकता- नहीं बन सकता। लेकिन हां, अगर चमेली बनने की दौड़ में पड़ जाए तो यह हो सकता है कि गुलाब न बन पाए, यह हो सकता है। यह हो सकता है कि दौड़ उसे गुलाब तो न होने दे, चमेली तो वह कभी न हो सकेगा।
व्यक्ति स्वयं को छोड़कर अन्य कभी नहीं हो सकता। हां, यह हो सकता है, अन्य होने की कोशिश में वह स्वयं होने से वंचित हो जाए। हम सारे लोग स्वयं होने से वंचित हो गए हैं। हमने अपनी आत्मा खो दी है आदर्शों के कारण, अनुसरण के कारण। यह फालोइंग जो है, जहर है। किसी मनुष्य का किसी दूसरे का अनुयायी होना अनुगमन करना, किसी के पीछे चलना, किसी के जैसे होने की कोशिश करना, इसने सारे मनुष्य को, सारी दुनिया के मनुष्य को पतित किया है। जड़ग्रस्त किया है, इसने रोगग्रस्त कर दिया है। हम सब भी उस रोग से भरे हुए हैं। आप शांत नहीं हो सकते, निद्र्वंद्व नहीं हो सकते जब तक आदर्श आपसे हट न जाए। हटा लें आदर्श को, हटायें सबको। वह कितने ही बड़े महापुरुष हों, उनके महापुरुष होने से इससे बाधा नहीं पड़ती।
मैं उनको विरोध नहीं कर रहा हूं, आपकी फलोइंग का विरोध कर रहा हूं। महावीर का विरोध नहीं कर रहा, बुद्ध का विरोध नहीं कर रहा हूं, क्राइस्ट का विरोध नहीं कर रहा। मैं तो उन्हीं की बात कह रहा हूं। आपका विरोध कर रहा हूं, आप उनके पीछे न जाए। कृपा कर कोई किसी के पीछे न जाए। सबको अपने भीतर जाना है, किसी के पीछे नहीं जाना है। जो किसी के पीछे जाता है, आपने भीतर नहीं जा सकता है। कैसे जाएगा? किसी के पीछे जाने के लिए बाहर जाना पड़ता है और भीतर जाने के लिए बाहर की सब दौड़ छोड़नी पड़ती है। ये सब बाहर की दौड़ें हैं। यह आइडियालिज्म जो है, आदर्शवाद जो है, यह बाहर ले जाता है। दूसरा तत्व है, यह आदर्श- यह आत्मघाती होता है।
तीसरा तत्व है उधार ज्ञान। और तीसरे तत्व की और चर्चा करूं- उधार ज्ञान। आप क्या जानते हैं? अगर आपसे पूछा जाए, पुनर्जनम है? तो आप कहेंगे, है। या कोई कहेगा, नहीं है। क्या आप जानते हैं? आपसे पूछा जाए, आत्मा है? कोई कहेगा, है, कोई कहेगा, नहीं है। क्या आप जानते हैं? क्या सच में आप जानते हैं कि आत्मा है? या कि आपने सुनी हुई बातों को, उधार बातों को इकट्ठा कर लिया है? एकमुलेट कर लिया है और उसी के ऊपर ज्ञानी बन बैठे हैं। यह ज्ञान, अगर इस भांति इकट्ठा किया हुआ ज्ञान आपके ऊपर भारी पड़ जाएगा, भार बन जाएगा, सिर पर पत्थर की भांति बैठे जाएगा। फिर यह आपको खोजने नहीं देगा, सचाइयों को नहीं जानने देगा। सच तो यह है कि मनुष्य कुछ भी नहीं जानता है। कुछ भी नहीं जानता है। इस कुछ नहीं में मेरा मतलब यह नहीं है कि इंजीनियरिंग नहीं जानता है या दुकान का काम नहीं जानता है। कुछ भी नहीं जानने से मेरा मतलब है कि सत्य के संबंध में कुछ भी नहीं जानता। सत्य बिल्कुल अननोन है, अज्ञात है। आप कुछ भी नहीं जानते। और जो आप समझते हैं, जानते हैं, वह जाना हुआ नहीं है, सुना हुआ है। किताबों से पढ़ा हुआ है। वह ज्ञान नहीं है, इनफर्मेशन है, जानकारी है, सूचना है। वह सूचना को जो जान समझ लेता है वह कष्ट में पड़ जाता है। वह पत्थर को हीरे समझ लिया, वह पीतल को सोना समझ लिया है। जो ज्ञान स्वयं की अनुभूति से उत्पन्न होता है उसके अतिरिक्त सब ज्ञान बंधन है। जो ज्ञान स्वयं की अनुभूति से आता है, उसके अतिरिक्त सब ज्ञान बंधन है और सब पत्थर की भांति सिर पर बैठ जाता है। उस भार के नीचे फिर यात्रा नहीं हो पाती। क्योंकि यात्रा समाप्त हो गयी। जब हम स्वीकार कर लेते हैं, आत्मा है, तो खोज बंद हो जाती है। जब एक आदमी स्वीकार कर लेता है, आत्मा नहीं है तो भी खोज बंद हो जाती है।
खोज कब होती है? खोज तब होती है जहां न स्वीकृति हो, न अस्वीकृति हो। न किसी बात को स्वीकार करने की तैयारी हो, न अस्वीकार करने की तैयारी हो। बीच में आदमी ठहरे तो खोज शुरू होती है। उस बीच की स्थिति में ज्ञान का जन्म हो सकता है। वह बीच की स्थिति है अज्ञान का बोध। होना चाहिए अज्ञान को बोध। ज्ञान का भार नहीं। और सब ज्ञान सिखाया हुआ है। सब ज्ञान सिखाया हुआ है। सब ज्ञान लर्निंग है हमारी। सीख लिया है बचपन से, सीखते जा रहे हैं, रोज-रोज। उसी को दोहराए चले जाते हैं। कम्यूनिस्ट मुल्क होता है तो वे सिखाते हैं? ईश्वर नहीं है, आत्मा नहीं है। बच्चे वही सीख लेते हैं। बौद्ध मुल्क होता है जो वे सिखाते हैं, वे सीख लेते हैं। हिंदू मुल्क है, वे जो सिखाते है, वह सीख लेते हैं। जैन मुल्क है तो जो वे सिखाते हैं, वह सीख लेते हैं। ये सब सीखे हुए लोग हैं। यह सिखावट खतरनाक है, क्योंकि सिखावट आपको रोकेगी और आगे नहीं जाने देगी। आगे जाने के लिए सच में जाने के लिए सारे सीखे हुऐ भार को अलग कर देना होगा। निर्भार हो जाना जरूरी है। चित्त जितना निर्भार होग, जितना वेटलेस होग उतना ऊध्र्वगामी होता है। चित्त जितना भारग्रसत होता है उतना नीचे दब जाता है।
एक बार ऐसा हुआ, पहाड़ पर एक मंदिर था। स्वर्ण का मंदिर था, महुमूल्य हीरे-ज्वाहरात और खजाने उस मंदिर के पास थे। उसका वृद्ध पुजारी मरने को हुआ। उस ने नीचे मैदान में खबर भिजवायी कि नए पुजारी को चुनना है। जो व्यक्ति सर्वाधिक शक्तिशाली होगा- वह शक्ति का मंदिर था- जो व्यक्ति सर्वाधिक शक्तिशाली होगा उसकी नियुक्ति हो जाएगी। कौन सर्वाधिक शक्तिशाली है? तो पुजारी ने खबर करवायी, निश्चित तिथि पर, जो लोग अपने को शक्तिशाली समझते हों वे पहाड़ की चढ़ाइ शुरू करें। जो व्यक्ति सबसे पहले चढ़ाई पर ऊपर पहुंच जाएगा वही पुजारी हो जाएगा। उस राज्य में दूसरे-दूसरे तक जहां-जहां तक खबर हो सकती, सैकड़ों लोगों के मन में उत्कंठा हुई। उतना बड़ा मंदिर स्वर्ण का मंदिर, अरबों-खरबों की संपत्ति का मालिक था मंदिर उसका पुजारी ही सब कुछ था। कौन नहीं होना चाहेगा? जितने भी शक्तिशाली युवा थे, जिनके मन में भी आकांक्षा थी, एमबीशन थी, वे सारे लोग इकट्ठे हो गए। कोई दो सौ जवान जो अपनी-अपनी तरह सब तरह के शक्तिशाली थे, निश्चित तिथि पर उस पहाड़ पर चढ़ने लगे तो हर जवान ने एक बड़ा पत्थार अपने-अपने कंधे पर ले लिया। वह उनके पौरुष का प्रतीक कि कौन कितने बड़े पत्थर को लेकर चढ़ा सकता है। जो जितना शक्तिशाली था उसने उतना ही बड़ा पत्थर अपने कंधे पर ले लिया। पहाड़ की चढ़ाई थी दुरूह, पत्थर थे भारी, उनके प्राण घुटे जाते थे लेकिन अहंकार सब कष्ट सहने को तैयार हो जाता है। अहंकार बड़ा तपस्वी, बड़ी तपश्चर्या है अहंकार की। वह राजी था। पत्थरों के नीचे दबे जाते थे। वे भूखे-प्यासे .... एक सप्ताह की चढ़ाई की। पत्थरों को घसीटने, रोकने की भी फुर्सत न थी, खाने-पीने की भी फुर्सत न थी, क्योंकि कौन पहले पहुंच जाए! कुछ तो उन पत्थरों के नीचे डूब गए और मर गए, लेकिन पत्थर उन्होंने नहीं छोड़े। मरते दम तक वे पत्थर अपने सिर पर रखे हुए थे। वे उनके पौरुष के प्रतीक थे, वे चिन्ह थे उनकी शक्ति के। कुछ खड्डों में गिर गए, कुछ बीमार पड़ गए, किसी के हाथ-पैर टूट गए गिरने से। लेकिन लोग बढ़े जाते थे। किसको फुर्सत थी, जो गिर गया था उसे देखने की। जो गिर गया, वह गया। हम आगे बढ़े चले जाते हैं। सब पहाड़ पर चढ़े चले जाते हैं और अपना-अपना पत्थर लिए हुए हैं।
लेकिन आखिरी दिन, साततां दिन करीब आ गया, सांझ होने लगी। वे लोग करीब- करीब पहुंचने को हैं। तभी उन्होंने देखा, बड़ी हैरानी की बात है, जो सबसे पीछे रह गया वह आदमी एकदम आगे निकला जा रहा है। दुबला-पतला, कमजोर आदमी- वह सबसे पीछे था, वह एकदम आगे निकला जा रहा है। सब हैरान हो गए, लेकिन सब हंसने लगे। उन्होंने सोचा, इस पागल के पहुंचने का प्रयोजन भी क्या? उसने पत्थर फेंक दिया था, बिना पत्थर भागा जा रहा था। अब बिना पत्थर के तो किसी की भी गति गढ़ जाएगी। उन्होंने उससे कहा भी कि तुम नासमझ हो। तुम कहां भागे जाते हो? आखिर तुम्हारे पहुंचने का फायदा भी क्या? तुम पहुंच भी गए तो तुमहें कौन मानेगा? पौरुष का प्रतीक कहां है? लेकिन उसने तो सुना नहीं, वह भागे चला गया। वे सब हंसते रहे कि पागल है, नासमझ है। इसके पहुंचने से कोई फल भी नहीं होने वाला है। लेकिन जब सांझ को वे वहां पहुंचे और सारे पर्वतारोहियों की सभा हुई और उस पुजारी ने घोषणा की कि वह युवक ही सबसे पहले आ गया है और उसको मैंने पुजारी बना दिया तो सब चिल्लाए कि कैसा अन्याय है, कैसा अंधेर है! उस पूजारी ने कहा, अंधेर भी नहीं है, अन्याय भी नहीं है। परमात्मा के पुजारी होने का हक केवल उन्हीं को है जो अपने अहंकार के भार को छोड़ देते हैं। इस युवक ने अदभुत साहस का परिचय दिया है। तुम सब भारग्रस्त लोगों के बीच यह अपने भार को फेंक सका, निर्बल हो सका, अपने पौरुष-प्रतीक से छुटकारा पा सका, अपने अहंकार के भार से मुक्त हो सका, निर्भार होकर गति कर सका। यह अदभुत साहस की बात है। यह सर्वाधिक बली है और इसलिए हमने इसे पुजारी का पद दिया हैं।
यह तो कथा, प्रतीक कथा है, लेकिन जीवन में भी यही सत्य है। जो लोग भी सत्य की और परमात्मा की यात्रा में हैं वे स्मरण रखें कि जो भार उन्होंने अपने ऊपर ले रखे हैं वे सब उनको रोक रहे हैं। और ज्ञान का भार सबसे बड़ा भार है। ज्ञान का भार सबसे बड़ा भार है। क्योंकि ज्ञान का बोझ सबसे बड़ा अहंकार है। यह आप क्यों कहते हैं कि ईश्वर है? क्यों कहते हैं कि आत्मा है? क्योंकि इस भांति कहने से आप ज्ञानी मालूम पड़ते हैं। हालांकि आपको पता कुछ भी नहीं है कि आत्मा है या ईश्वर। कुछ भी पता नहीं है। लेकिन इस भांति कहने से आपके अहंकार की तृप्ति होती है कि मैं भी जानता हूं। मैं भी जानता हूं। मैं कोई अज्ञानी नहीं हूं। इसलिए अगर कोई आपकी बात का खंडन करे तो आप तलवार निकाल लेते हैं, क्योंकि आपकी बात का खंडन नहीं है, आपके अहंकार का खंडन हो जाता है।
यह दुनिया भर के धर्म लड़ते हैं, पंडित लड़ते हैं, सुबह मुझसे कोई कह रहा था कि दुनिया में महात्मा और पंडित इकट्ठे होकर क्यों नहीं बैठे सकते हैं? वे कभी नहीं बैठ सकते हैं। कैसे बैठ सकते हैं? अब अपनी तलवारें खींच लेंगे क्योंकि सबका ज्ञान, सबका अहंकार है। और जहां अहंकार है वहां मिलना कैसे हो सकेगा? दुनिया में बुरे लोग मिलते रहे, भले लोग नहीं मिल सके। दुनिया में पापी मिलते रहे हैं, पुण्यात्मा नहीं मिल सके। दुनिया में महात्मा इकट्ठे हो सकते हैं, साधु-संन्यासी इकट्ठे नहीं हो सकते हैं। कैसे होंगे? अहंकार सबसे बड़ी तोड़ने वाली चीजें है और अहंकार वहां सबसे ज्यादा गहरा है, सबसे ज्यादा प्रगाढ़ है। दो पंडित नहीं बैठ सकते। असंभव है। जो कुत्तों की आदत है, वह पंडितों की भी आदत है। दो कुत्ते भी साथ नहीं बैठ सकते हैं, दो पंडित भी साथ नहीं बैठे सकते। नहीं बैठ, सकते इसलिए कि वह अहंकार गुर्राता है। अहंकार दूसरे को बर्दांत नहीं करता। यह ज्ञान का जितना हम बोझ इकट्ठे किए हुए हैं, यह हमारे अहंकार की खुराक है।
स्मरण करें, देखें अपने भीतर, जो मैं कह रहा हूं, वह कोई आपको किसी फिलोसफी में या किसी संप्रदाय में भर्ती करने की कोशिश नहीं। कह मैं यह रहा हूं, अपने मन को देखें, आप कुछ जानते हैं? अगर नहीं जानते तो कृपा करें और अपने व्यर्थ के अहंकार का पोषण न करें कि मैं जानता हूं, ईश्वर है। मैं जानता हूं, आत्मा है। मैं जानता हूं, लोक है, परलोक हैं- छोड़ें- अच्छा है, उस अज्ञान को जानें। जानें कि मैं नहीं जानता हूं। और जो व्यक्ति इस स्थिति में हो जाता है कि मैं नहीं जानता हूं वह निर्भार हो जाता है। और निर्भार होते ही उसकी गति शुरू हो जाती है। जो व्यक्ति इस स्थिति में हो जाता है कि सतत इस बोध में कि मैं नहीं जानता, वह अदभुत सरलता को उपलब्ध हो जाता है, उसमें ह्यूमिलिटी पैदा होती है, उसमें बोध पैदा होता है अपने अज्ञान का और वह सरल होता है, सहज होता है। उसके सारे झगड़े विलीन हो जाते हैं। और जब चित्त सरल होता है, भार शून्य होता है तो ऊध्र्वगामी होता है।
ये तीन बातें मैंने आपसे कहीं, इन तीन बातों पर थोड़ा विचार करना। इन तीनों बातों ने हमें द्वंद्वग्रस्त किया है। इन तीन बातों ने हमारे मन को कांफ्लिक्ट से भर दिया है। इन तीन बातों ने हमारे चित्त को खंड-खंड कर दिया है। इन तीन बातों ने हमारे मन की एकता को तोड़ दिया है। इन तीन बातों ने मन को भारी कर दिया है और वह पत्थर की भांति हो गया, है, पक्षी की भांति नहीं, कि वह यात्रा कर सके। आकाश में उड़ सके, ऐसी उसकी स्थिति नहीं। पत्थर की भांति है, नीचे पड़ा है। और हम उस पर रोज भार लादते रहे हैं, रोज भार लादते जाते हैं। कोई गीता पढ़ रहा है, कोई कुरान पढ़ रहा है, कोई बाइबिल पढ़ रहा है और याद कर रहा है, कंठस्थ कर रहा है, और भरता जा रहा है, भरता जा रहा है। जब शास्त्र बहुत हो जाते हैं तो सत्य के आने की कोई संभावना नहीं रह जाती। जब ज्ञान का भार बहुत हो जाता है तो फिर ज्ञान के जन्म की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती, ज्ञान उस हृदय में पैदा होता है जो सब भांति, सब भांति ज्ञान से मुक्त हो जाते हैं। ज्ञान उन मनों में पैदा होता है जो सब भांति अहंकार से शून्य और रिक्त हो जाते हैं। ज्ञान उन मनों में पैदा होता है जो परंपरा से, अनुकरण से किसी से पीछा छुड़ा लेते हैं, अपने को छुड़ा लेते हैं। इस विद्रोह की स्थिति में, इस क्रांति की स्थिति में ज्ञान पैदा होता है।
ये तीन तत्व मैंने कहे, इन तीन तत्वों को जो ठीक से समझेगा और जिसके जीवन में धीरे-धीरे इन तीन तत्वों की अभिव्यक्ति होगी, वह इस क्रांति से गुजर जाएगा। उसके जीवन में एक रिव्योलूशन हो जाएगी। रिव्योलूशन का नाम धर्म है, उसी क्रांति का नाम धर्म है। धर्म जगत में सबसे बड़ी अग्नि है। उससे बड़ी कोई अग्नि नहीं है। लेकिन इस अग्नि से गुजरने के लिए, इस क्रांति से गुजरने के लिए कुछ बातें विचारणीय हैं। अपने जीवन में, अपने मन में उन बातों को समझ लेना जरूरी है। उन्होंने समझें, देखें, पहचानें और उनकी पहचान ही धीरे-धीरे आपको भीतर एक नए वयक्ति को जन्म दे देगी। आपका पुराना व्यक्तित्व जाएगा। वह जाना चाहिए। आपका पुराना व्यक्त्त्वि दुनिया में बहुत कष्ट पैदा कर रहा है। वह जाना चाहिए। वह सड़ी-गली, पूरी संस्कृति जानी चाहिए जो हमने पैदा की है। यह आदर्श के अनुकूल, परंपरा के अनुकूल, अनुकरण के आधार पर जो खड़ी हुई संस्कृति है, वह जानी चाहिए। उसने कोई सुख नहीं दिया, उसने मनुष्य के जीवन में केई सत्य नहीं लाया, मनुष्य के जीवन में कोई शांति नहीं लायी। एक अभिनव संकृति का जन्म निश्चित होना चाहिए तो ही मनुष्य शांति को, आनंद को उपलब्ध हो सकता है। और उस संस्कृति के जन्म कि लिए प्रत्येक को क्रांति से गुजरना जरूरी है।
उस क्रांति की तीन बातें मैंने आपसे कहीं, ये तो निशेधात्मक थीं, ये तो डिस्ट्रेक्टिव थीं। स्मरण रखें, जिन व्यक्ति को भी नयी दुनिया बनानी है उसे पुरानी दुनिया को मिटाने के लिए राजी होना पड़ता है। जिस व्यक्ति को भी स्वयं को नया करना है, उसे अपने पुराने के मर जाने की सुविधा जुटानी पड़ती है। इसके पहले कि नए भवन खड़े हों, पुराने भवन गिरा देने जरूरी हैं। इसके पहले कि नए का जन्म हो, पुराने का विनाश आवश्यक है। पुराने की राख पर ही नये के अंकुर अंकुरित होते हैं।
तो मैंने विनाश की थोड़ी-सी बातें आपसे कहीं। की थोड़ी-सी कहूंगा बात आपसे क्रिएटिव हो पाता है, विनाशात्मक रूप से रचनात्मक हो पाता है वही व्यक्ति सत्य को और शांति को आनंद को उपलब्ध हो सकता है। परमात्मा करे, ऐसी क्रांति सबके भीतर हो।
इन बातों को इतने प्रेम से सुना है उससे बहुत आनंदित हूं।
अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं।
मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
फर्गुसन कालेज, पूना, दिनांक 15 सितम्बर, 1966, सुबह

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

आंखों देखी सांच-(प्रवचन-06)

छठवां-प्रवचन-(स्वतंत्रता, सरलता, शून्यता)

कल दो दिनों में थोड़ी बातें मैंने आपसे की हैं। पहले दिन..मनुष्य का जीवन असार में, स्वप्न में छाया में नष्ट हो सकता है; अधिक लोगों का नष्ट हो जाता है। उस संबंध में थोड़े से विचार आपसे कहे थे। दूसरे दिन..कौन सा जीवन छाया का और असार जीवन है, वासना का, तृष्णा का, कुछ होने की दौड़ का, उसके संबंध में, उस आधार के संबंध में हमने सोचा। आज मैं आपसे कहना चाहूंगा, किस मार्ग से, किस क्रांति से असार जीवन की तरफ दौड़ती हुई हमारी चेतना धारा सार्थक, सत्य और सारी की ओर उन्मुख हो सकती है। इसके पहले कि मैं उसकी चर्चा करूं, एक छोटी सी कहानी आपसे कहना चाहूंगा।
एक राजा वृद्ध हो गया था। उसकी मृत्यु करीब आ गई। लगा कुछ ही दिन का और मेहमान है। दो उसके पुत्र थे। विचार में पड़ा, किसको राज्य का भार दे जाऊं? दोनों जुड़वां थे, कोई छोटा-बड़ा न था। कोई बड़ा-छोटा होता तो निपटारा कठिन न था। दोनों ही बराबर थे, दोनों ही कुशल थे, दोनों ही योग्य थे, दोनों ही प्रतिभाशाली थे, निर्णय बहुत कठिन था। कैसे निर्णय करें, कि पर जिम्मा छोड़ दे, कौन अंततः सार्थक सिद्ध होगा? तो गांव में, गांव के बाहर झोपड़े में एक फकीर रहता था। जब गांव में मुश्किल में कोई पड़ता तो उससे पूछने जाते थे। राजा भी गया। उसने जाकर उसी फकीर को पूछा, ऐसी-ऐसी उलझन है, क्या करूं? उस फकीर ने कहा, एक काम करो।


अपने दोनों लड़कों को थोड़े-थोड़े रुपये दे दो। दोनों लड़कों को, दोनों के, दोनों राजकुमारों के अपने महल थे। और दोनों से कहना कि इन थोड़े से रुपयों में कुछ ऐसी चीज लाओ कि पुरा महल भर जाए, पुरा महल भर जाए। बहुत थोड़े रुपये दिए और कहा कि पूरा महल भर जाए, ऐसी कुछ चीजें लाओ।
अब आपसे ही कोई कहता, मुझसे ही कोई कहता तो हम क्या करते? पूरा महल भर जाए, बड़े महल थे। बहुत चिंता पैदा हुई। बड़े लड़के ने, पहले-पहले ने, सोच विचार के तय कर लिया। वह कुछ चीजें ले आया और सारे महल को भर दिया। रुपये थे थोड़े महल था बड़ा सिवाय कूड़ा-करकट के और कुछ भी लाया नहीं जा सकता था। तो गांव के बाहर से उसने गाड़ियों में जहां कचरा था, वह ढुलवाया। रुपये तो कचरा ढोने में लग गए। कचरा तो मुक्त मिलता है। स्मरण रखें, कचरा मुक्त मिलता है, सिर्फ ढोने में शक्ति व्यय होती है। वह गया, उसने गांव से, बाहर से, जिस कचरे को लोग बाहर फेंक आए थे और बाहर फेंकने में पैसे खर्च किए थे, उसी कचरे को वह पैसा खर्च करके वापस महल में ले आया। सारे घर में कूड़ा-करकट भर दिया। और कोई रास्ता न था। पैसे थे कम, महल था बड़ा भरना था पूरा। सिवाय कूड़े-करकट के और भरने का कोई मार्ग नहीं था। दूर-दूर तक दुर्गंध फैलने लगी। परीक्षा का दिन निकट आएगा तब तक वह कचरे को भरता गया, भरता गया। जमीन से लेकर छप्पर तक उसने सारे महल को कचरे से भर दिया। फिर भी पैसे थोड़े पड़ गए, क्योंकि कचरा ढोना भी कोई आसान बात तो नहीं है। फिर दुर्गंध से वह खुद भी घबड़ा गया। लेकिन परीक्षा के दिन तक तो कम से कम दुर्गंध सहनी ही थी।
दूसरा लड़का भी चिंतित था, विचार में था। परीक्षा का दिन करीब आने लगा, लेकिन उसका महल सूना था। वह कोई निर्णय न ले पाया। उसने बहुत सोचा, कि मैं भी कचरा भर दूं, लेकिन उसने कहा, कचरे से भी भरना कोई भरना है? इससे तो खाली रहना बेहतर है। और कचरे से भरना, अगर भर के जीत भी गया और राज्य भी मिल गया तो भी क्या करेंगे? उससे तो हार जाना बेहतर और खाली रह जाना बेहतर है। कचरे को भरकर जीत जाने में भी कोई सार नहीं है। कचरा भर कर हार जाने में भी सारे है, ऐसे उसे लगा। बहुत चिंता में था। वह भी खोजता-ढूंढता उस फकीर के पास गया जिसने यह सलाह दी थी। सुबह का वक्त था, उसने जाकर फकीर को पूछा, मैं क्या करूं? बहुत उलझन में हूं। पूरा भवन भरना है, पैसे बहुत थोड़े हैं।
फकीर ने कहाः मुझसे क्या पूछते हो? बाहर जाओ, आंख खोल कर देखो, रास्ता मिल जाएगा। दुनिया में जो जानते रहे हैं, उन्होंने सभी ने यही कहा है, आंख खोल कर देखो, रास्त मिल जाएगा। वह बाहर आया, उसने आंख खोल कर देखा, रास्ता मिल गया, वापस लौटा, सांझ को परीक्षा की घड़ी आ गई, तब तक उसका महल खाली था। अमावस की रात उतर आई। महल खाली था।
राजा, राजा के मंत्री निर्णायक सब आए। एक घर में तो इतना कचरा, इतनी गंध थी कि निर्णायक भीतर भी नहीं जा सके। उन्होंने कहाः मान लिया कि भर गया है, लेकिन भीतर कौन जाए? वे सब चिंतित थे, दूसरा महल खाली था अभी भी, अब द्वार बंद थे। पहला राजकुमार भी हैरान था कि दूसरे राजकुमार ने क्या किया? क्या वह प्रतियोगिता से हट गया? क्या उसने प्रतिस्पर्धा छोड़ दी? क्या राज्य लेने का उसका ख्याल नहीं रहा? क्या उसने हार स्वीकार कर ली? क्योंकि न तो कोई सामान लाता हुआ देखा गया, न कोई बैलगाड़ियां आईं, न कोई मजदूर आए, न कोई भीतर आया, न कोई बाहर गया। फिर सारे निर्णायक और राजा उसके द्वार पर पहुंचे। द्वार खोले गए, राजा भी हैरान हुआ, उसने पूछाः यह तो भवन खाली है। राजकुमार ने कहाः आंखें खोलिए और देखिए, भवन भरा हुआ है। और वे सब दूंगा रह गए, भवन जरूर भरा था। राजकुमार ने बहुत से दीये जला दिए थे और प्रकाश से भवन भरा हुआ था। बहुत पैसे बच गए थे, थोड़े में ही काम हो गया था। और कुछ भी न लाना पड़ा था, दीये भी भवन में थे, तेल भी भवन में था, बाती भी भवन में थी। आगे भी भवन में थी। केवल उन सबको जोड़ देना था। अमावस की रात थी, वह भवन प्रकाश से भरा हुआ था। उसका कोना-कोना प्रकाश से भरा हुआ था। और भवन जब प्रकाश से भरता है तो खुद ही नहीं भरता, द्वार, झरोखों से, खिड़कियों से प्रकाश बाहर जाने लगता है। कचरा भरता है तो गंध बाहर पहुंचती है, प्रकाश भरता है तो आलोक बाहर पहुंचता है। वह जीत गया। लेकिन उसने राज्य लेने से इनकार कर दिया। उसने कहा, मेरे दूसरे भाई को दे दें, क्योंकि अब मुझे दिखाई पड़ता है कि राज्य भी एक कचरा है, उससे अपने जीवन को क्यों भरूं? जब प्रकाश में भवन को भरा है तो प्रकाश से स्वयं को भी भरने की प्यास पैदा हो गई है।
दो ही तरह के लोग हैं..कचरे से जीवन को भर लेने वाले और तब उनके जीवन में अगर दुर्गंध फैलने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं है। और प्रकाश से जीवन को भर लेने वाले और तब उनसे दूसरों के दीए भी जल जाए और दूसरे के अंधेरे कक्षों तक भी प्रकाश पहुंच जाए तो भी कोई आश्चर्य नहीं है। और हमेशा यही निर्णय कर लेने का है। जीवन की संपदा है थोड़ी, रुपए मिले हैं, थोड़े, समय है अल्प और पूरे जीवन को भरना है तो जल्दी में कचरा ही दिखाई पड़ता है। जल्दी से उसी से भरने में हम लग जाते हैं। लेकिन थोड़ा ठहरें, थोड़ा विचार करें, कचरे से भर कर जीत भी गए तो वह भी जीत नहीं है। उससे तो बेहतर है, खाली रह कर हार जाना। लेकिन ऐसा भी उपाय है कि भवन भी खाली हो और भर भी जाए। प्रकाश ऐसी ही भरावट है। भवन खाली भी होता है और भर भी जाता हैं। जीवन को भी प्रकाश से भरा जा सकता है।
कैसे? इन दो दिनों में थोड़ी सी मैंने भूमिका की बात की है। आज आपसे कहूं, कैसे जीवन को प्रकाश से भरा जा सकता है? क्या है बाती? क्या है तेल? क्या है दिया और कैसे इसे जलाया जा सकता है? मनुष्य के भीतर सब कुछ मौजूद है। बुद्ध के भीतर जो मौजूद होगा, राम के, या कृष्ण के या क्राइस्ट के या महावीर के भीतर जो मौजूद होगा वह हम सबके भीतर मौजूद है। लेकिन अगर बाती अलग पड़ी रहे, तेल अलग और आग अलग, तो दीया नहीं जलता और प्रकाश नहीं फैलता। इन सबका ठीक संयोग हो जाए तो जीवन आलोक से भर जाता है। इस संयोग का नाम ही धर्म है। सारी शक्तियां हमारे भीतर हैं, उन्हें ठीक संयोग का नाम ही योग है। उनके ठीक से संयोग का नाम ही धर्म है। धर्म जीवन को आलोक से भरने का उपाय है।
यह धर्म कैसे उपलब्ध होगा, उसके तीन सूत्रों पर मैं आपसे चर्चा करना चाहूंगा।
पहली बात है, चित्त की स्वतंत्रता; दूसरी बात है, चित्त की सरलता; तीसरी बात है, चित्त की शून्यता। ये तीन सूत्र यदि जीवन में फलित हों तो दीए से तेल जुड़ता है, तेल से बाती, बाती से आग और जीवन आलोक से भर जाता है।
चित्त की स्वतंत्रता..लेकिन हम सबके चित्त तो परतंत्र हैं। हम तो अपने चित्तों में, हम तो अपने मनों में दूसरों के दास और गुलाम बने हुए हैं। और मन की गुलामी बहुत गहरी है। मन की गुलामी और दासता से और कड़ी कोई गुलामी नहीं है। हम सोचते ही नहीं, सोच ही नहीं सकते, क्योंकि शास्त्रों से, शब्दों से, सिद्धांतों से, संप्रदायों से हमारे मन कैद है, आबद्ध हैं हम जब भी सोचते हैं तो जीवन से हमारा चिंतन शुरू नहीं होता, चिंतन हमारा शब्दों और सिद्धांतों से शुरू होता है। ऐसे सिद्धांतों से, ऐसे शास्त्रों से जिन्हें हम अज्ञान में ज्ञान समझ लिया है, जिन्होंने हमने अज्ञान में ज्ञान समझ लिया है, जिन्हें हम ज्ञान मान कर बैठ गए हैं, जिन्हें पकड़ कर हम रुक गए हैं; जिनके आधार पर हम सोचते हैं, विचार करते हैं। जब भी किसी सोच-विचार में कोई पूर्वपक्ष होता है, कोई प्रिज्युडिस होती है, तभी चिंतन परतंत्र हो जाता है, तब सोच-विचार बंद हो जाता है, विश्वास शुरू हो जाता है। धर्म को लोग विश्वास से, फेथ से जोड़े हुए हैं जब कि वास्तविक धर्म का संबंध विश्वास से, फेथ से रचना मात्र भी नहीं। फेथ से रंचमात्र भी नहीं है। अंधविश्वास का संबंध फेथ से है, विश्वास से है, बिलीफ से है, श्रद्धा से है। वास्तविक धर्म का संबंध विचार से है, विवेक से है, मौलिक चिंतन से है।
कैसे मौलिक चिंतन की ऊर्जा हममें प्रकट हो? कैसे चित्त स्वतंत्र हो, मुक्त हो बंधन से, उन सबसे जो हमारे मन को बांधे हुए हैं? कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई ईसाई है, कोई जैन है। ये सब गुलामियों के नाम हैं, ये सब स्लेबरीज हैं, ये सब दासताएं हैं। और जब तक इनसे हम बंधे हैं, तब तक चिंतन मुक्त नहीं हो सकता। और जो मुक्त नहीं है वह सत्य को पाने में कैसे समर्थ होगा? सत्य को पाने के लिए मुक्त होना आवश्यक है। ये सारी जंजीरें तोड़ देना जरूरी हैं। जो हिंदू और जैन और मुसलमान और ईसाई और बौद्ध इन जंजीरों से मुक्त हो जाता है उसे धर्म की स्वतंत्रता उपलब्ध होती है। और जो इनसे बंधा रहता है वह संप्रदायों के घेरों में मर जाता है, सड़ जाता है, विलीन हो जाता है। लेकिन धर्म का आलोक, धर्म की मुक्ति उसे उपलब्ध नहीं हो पाती। चित्त इन संस्कारों से बहुत गहरा घिरा है। हम सोचें, हम देखें, हम थोड़ा जागें तो हमें ज्ञात होगा, हम बहुत सी बातें माने हुए बैठे हैं, बहुत सी मान्यताएं पकड़े हुए बैठे हैं। हम बहुत से सिद्धांतों को अपने मन में जमाए बैठे हैं। ऐसी परतंत्र स्थिति में, ऐसे अज्ञान में पकड़े गए विश्वासों में विवेक कैसे उठेगा? कैसे विवेक मुक्त होगा, कैसे विवेक को पर मिलेंगे, कैसे वह आकाश में उड़ सकेगा? जैसे हमने किसी पक्षी को पिंजड़े में बंद कर दिया हो, उसके प्राण छटपटाते हों, वैसे ही हम सबके विवेक की शक्ति पिंजड़े में बंद है और छटपटाती है और छूट पाती। और फिर बड़ा मजा है...और यह स्मरण रखे योग्य है कि अगर कोई पक्षी बहुत दिन तक पिंजड़े में बंद रह जाए तो पिंजड़े से प्रेम करना शुरू कर देता है। फिर अगर कोई उसका पिंजड़ा तोड़ने आए तो वह उसे दुश्मन मालूम होता है। अगर मैं आपका पिंजड़ा तोड़ने आऊं तो दुश्मन मालूम होऊंगा।
बैस्तील के किले में फ्रांस की क्रांति के समय बहुत से कैदी बंद थे। पुराने कैदी..लंबी जिनको सजा हुई ऐसे कैदी, आजीवन जिनको कैद हुई ऐसे कैदी..कोई बीस साल से बंद था, कोई तीस साल से। ऐसे कैदी भी थे जो पचास और पचपन साल से अपनी कालकोठिरयों में बंद थे। इन पचास सालों में उनके हाथों में मोटी जंजीरें रही थीं, पैरों में जंजीरें रही थीं, अंधेरा रहा था, आंखें उनकी मंदी हो गई थीं। रोज रोटी मिल जानी और अपनी सीलन भरी कोठरी में पड़े रहना। फ्रांस में क्रांति हुई, क्रांतिकारियों ने सोचा जाए और बैस्तील के किले को तोड़ कर कैदियों को मुक्त कर दें। कितना उन्हें आनंद नहीं होगा! वे गए उन्होंने द्वार तोड़े और कैदियों को कहाः तुम स्वतंत्र हो। लेकिन कैदी बाहर आए, उनकी आंखें रोशनी को देखते ही चैंधिया गईं। वह घबड़ा गए। उनमें से उनके कहने लगे, हमें हमारी कोठरियां में रहने दें, हम पर कृपा करें, हम बहुत मजे में हैं। फिर भी उन्होंने धक्के देकर जबरदस्ती उन्हें बाहर निकाल दिया। लेकिन जबरदस्ती कोई किसी को मुक्त कर सकता है? जबरदस्ती परतंत्र तो कर सकता है, लेकिन स्वतंत्र नहीं कर सकता। जबरदस्ती बांध तो सकता है, लेकिन छुड़ा नहीं सकता। कैदियों को उन्होंने जबरदस्ती धक्के देकर बाहर निकाल दिया। क्या आप कल्पना करेंगे, सांझ होते-होते बहुत से कैदी वापस आ गए और उन्होंने कहाः बड़ी दया होगी, हम कहीं भी नहीं जाना चाहते। अब हम यहीं रहना चाहते हैं। बिना हथकड़ियों के हाथ हाथ ही नहीं मालूम होते। पचास साल तक हथकड़ी पर थी, अब उसके बिना ऐसा लगता है, हाथ हाथ नहीं हैं।
जैसे आप अपने कड़े छोड़ कर नंगे खड़े हो जाए तो आपको लगे कि यह क्या हो गया? यह कपड़ा ही नहीं है, यह शरीर का हिस्सा हो गया है। इसे छोड़ कर आपको ऐसा लगेगा, मैं कुछ अधूरा हूं, कुछ कम हूं। हलका लगेगा, भार अलग हो जाएगा, अपरिचित मालूम होंगे, अपने से ही अपरिचित मालूम होंगे। हथकड़ियां उनके जीवन का हिस्सा हो गई थीं, उनके शरीर का अंग हो गई थे। गुलामी मन का हिस्सा हो जाती है और तब उसे तोड़ना बड़ा कठिन हो जाता है। और हजारों साल तक अगर गुलामी की शिक्षा दी जाए। और लोगों से कहा जाए विश्वास करो शास्त्रों पर, गुरुओं पर धर्मग्रंथों पर, सिद्धांतों पर, संप्रदायों पर। और जो विश्वास नहीं करेगा वह कष्ट पाएगा, दुख पाएगा, पाप होगा। अगर हजारों वर्ष यह बात कही गई हो, यह हमारे मन के बहुत गहरे में जंजीरें बैठ जाती है। इनको लेकर हम पैदा होते हैं और तब फिर इनको तोड़ना बड़ा मुश्किल मालूम होता है। बुत मुश्किल मालूम होता है। ये हमारे खून और हड्डी के हिस्सा हो जाते हैं। लेकिन बिन इन्हें तोड़े, बिना स्वतंत्र हुए, बिना मुक्त हुए कोई मार्ग नहीं है।
तोड़ना ही होगा, चाहे कितनी ही पीड़ा हो। जंजीरें तोड़नी ही होंगी, चाहे कितनी ही पीड़ा हो। क्योंकि यह संभव नहीं है कि मैं जंजीरों को भी बचा लूं और परमात्मा की ओर गति भी कर लूं। यह संभव नहीं है कि नाव किनारे से भी बंधी रहे और सागर की यात्रा भी हो जाए। यह संभव नहीं है, यह कभी संभव नहीं हुआ है, न कभी संभव हो सकता है।
चित्त स्वतंत्र होना चाहिए। हमने परतंत्र किया है, इसलिए हम स्वतंत्र कर सकते हैं। हमारा सहयोग है परतंत्र करने में। इसलिए अगर हम जागें और समझें कि यह हमने बांधा हुआ है इसे तोड़ देना कठिन तो है, असंभव नहीं है। और अगर सम्यक रूप से हम अपने मन के भीतर प्रवेश करें और वहां बैठी हुई जंजीरों को पहचान लें..जो जंजीरों को पहचान लेने में एक खूबी है। अगर जंजीरें दिखाई पड़नी शुरू हो जाए तो उनके साथ जीना कठिन हो जाता है। अगर अनुभव में आना शुरू हो जाए कि मैं बंधा हूं तो छूटने की आकांक्षा शुरू हो जाती है। अनुभव ही हमें नहीं है।
एक जादूगर के संबंध में मैंने सुना है, उसके पास जो भेड़ें थीं, उन सबको हिप्नोटाइज करके, उन सारी भेड़ों को सम्मोहित करके उस जादूगर ने कह रखा था, तुम भेड़ नहीं हो, तुम तो शेर हो, सिंह हो। सारी भेड़ें मानती थीं हम शेर हैं, हम सिंह हैं इसलिए मजे से जीती थीं। दूसरी भेड़ें तो भेड़ें दिखाई पड़ती थीं, खुद सिंह मालूम होती थीं। जब एक भेड़ को काट कर जादूगर खा जाता था तो दूसरी भेड़ें कोई फिकर नहीं करती थीं, क्योंकि उनको तो ख्याल था, हम सिंह है। दूसरी भेड़ें कटती जाती और मरती जातीं और हर भेड़ का नंबर धीरे-धीरे आता जाता। जादूगर से किसी ने पूछा कि तुम्हारी भेड़ें भागती नहीं, हमारी भेड़ें तो भागती हैं। जादूगर ने कहा, इनको हमने समझा दिया है, इनके बहुत गहरे मन में बिठा दिया है कि तुम तो सिंह हो, तुमको कौन मार सकता है? और यह समझ इन्हें हमसे बांधे रहते है।
हम सबको सिखाया गया है, आप तो स्वतंत्र हैं, जब कि आप बहुत गहरे में गुलाम हैं। इसलिए स्वतंत्रता का मजा हम लेते रहते हैं, बगैर इस बात को जाने हुए कि हमारे पूरे प्राण गुलाम हैं। और हम थोथी आजादियां तो खोजते रहते हैं कि एक मुल्क से दूसरा मुल्क आजाद हो जाए, एक जाति से दूसरी जाति आजाद हो जाए; लेकिन बहुत गहरे में हमारा चित्त, हमारा मन, हमारी चेतना मुक्त हो, स्वतंत्र हो, यह न हम खोजते हैं, न हमें ख्याल आता है, क्योंकि हमें सिखलाया ही यह गया है कि मन तो मुक्त है ही, स्वतंत्र है ही। मन तो गुलाम है ही नहीं, मन तो राजा है। झूठी है यह बात। मन बिल्कुल ही गुलाम है। और जब तक यह दिखाई न पड़े..भेड़ को अगर यह अनुभव न आ जाए कि मैं भेड़ हूं, तो फिर उस जादूगर से भयभीत हो जाएगी क्योंकि तब वह हत्यारा दिखाई पड़ेगा। अगर आपको दिखाई पड़ जाए कि जिन मंदिरों में आज सिर झुका रहे हैं, जिन पुजारियों, धर्म पुरोहितों, संन्यासियों के पैर छू रहे हैं, जिन धर्मग्रंथों को सिर पर लेकर घूम रहे हैं, अगर आपको ख्याल आ जाए थक इसी सबमें आपके चित्त का बंधन छिपा हुआ है तो बहुत स्थिति बदल जाएगी। आपको दिखाई पड़ेगा, यह तो कड़ियां हैं, जो मुझे बांधे हुए हैं। और हम इन कड़ियां को चूम रहे हैं और नमस्कार कर रहे हैं। नहीं, जिन लोगों ने भी..महावीर ने या बुद्ध ने या क्राइस्ट ने सत्य को पाया होगा, उन्होंने किन्हीं कड़ियों में बंधे रह कर नहीं पाया है, बल्कि सारी कड़ियां तोड़ कर पाया है। लेकिन हम उनको ही अपनी कड़ी बना लगते हैं। जो स्वतंत्र हुए हैं, वही उनके बंधन होने का कारण बना लेते हैं।
महावीर का एक शिष्य था गौतम। बहुत वर्ष तक महावीर के पास था। प्रमुख था, बहुत से शास्त्र महावीर के पीछे जो लिखे गए, उनके गौतम का हाथ है। वह उसी ने लिखवाए, उसी ने लिखे ने उनको याद रखा। लेकिन महावीर के मरते तक उसको सत्य के कोई दर्शन नहीं हुए थे। महावीर को उसने पूछा कि क्या कारण है कि मैं घर छोड़ कर आ गया, पत्नी, बच्चे, धन, संपत्ति सब छोड़ दिए, अब मेरे पास छोड़ने को क्या है? लेकिन सत्य का अनुभव क्यों नहीं होता? महावीर ने कहा, तूने सब छोड़ा, लेकिन मुझे पकड़ लिया है। संसार छोड़ा, बच्चे, पत्नी, घर-द्वार, लेकिन मुझे पकड़ लिया। बच्चे और पत्नी छोड़ देना कठिन नहीं है। वह चित्त की बहुत गहरे में गुलामी नहीं है। चित्त के गहरे में गुलामी और भी ज्यादा दूसरी है। महावीर ने कहा, तूने मुझे पकड़ लिया। मैं तेरी गुलामी हो गया हूं। मुझे भी छोड़। लेकिन महावीर को छोड़ना बड़ा कठिन है। बुद्ध को छोड़ना, मोहम्मद को, क्राइस्ट को, राम को छोड़ना बड़ा कठिन है। इनसे तुम्हारे प्राण बंध गए हैं। वह सब मिलकर भी आपके सामने आकर कहें कि कृपा करो, हमको छोड़ दो तो उनके कहने के बाद आप उनको धन्यवाद दोगे और उनके पैर पड़ोगे कि आपने बहुत अच्छी शिक्षा दी, और सदा-सदा हमको इसी भांति सम्हाले रहना। और आपकी कृपा ही तो भवसागर जरूर पार हो जाएगा।
बुद्ध ने लोगों से कहा कि मेरी मूर्तियां मत बनाना। लेकिन इस समय बुद्ध की जितनी मूर्तियां हैं जमीन पर, और किसी की नहीं हैं। पर्सियन और उर्दू में तो बुत शब्द है। बुत, वह बुद्ध का ही रूपांतर है। बुत का मतलब ही मूर्ति हो गया। इतनी मूर्तियां हैं बुद्ध की, बुद्ध शब्द का अर्थ ही बुत, मूर्ति हो गया। और बुद्ध ने कहा था, मेरी मूर्ति मत बनाना। क्योंकि मूर्ति बांध लेती है और पकड़े लेती है और जकड़ लेती है। लेकिन बुद्ध को जो मानते हैं, उनकी मूर्ति के नीचे सिर रखे बैठे हैं और पूछ रहे हैं कि तुम भगवान हो।
महावीर ने लोगों से कहाः कोई भगवान नहीं है, किसी की पूजा मत करो, अपने को बदलो। लोगों ने कहाः भगवान आ गया, भगवान का अवतार आ गया। महावीर के पैर पकड़ लिए और हजारों साल से उनको भगवान महावीर कहे जा रहे हैं। एक जगह मैं इन महावीर भगवान के पागलों के बीच में बोलने गया था, तो मैंने कहाः महावीर, तो एक ने मुझसे कहाः कृपा करें, कम से कम भगवान तो जोड़ें! अकेला महावीर कह देते है तो हमको बड़ा दुख होता है। तो मैंने कहाः तुम्हें शायद पता भी न हो, महावीर ने कहा है, कोई भगवान नहीं है। जिसकी तुम प्रार्थना करो और पूजा करो, जो तुम्हें मुक्त कर दे। तुम्हीं हो भगवान अगर तुम खोजोगे तो उपलब्ध कर लोगे। लेकिन इस बात को सुन कर तुमने महावीर को भगवान बना लिया, और तुम महावीर को भगवान मान कर पकड़ कर बैठ गए। पुराना भगवान हटा, महावीर का मंदिर खड़ा हो गया। विष्णु की, राम की पूजा हटी तो महावीर का मंदिर खड़ा हो गया। विष्णु की, राम की पूजा हटी तो महावीर की पूजा शुरू हो गई।
हम कुछ ऐसे लोग हैं कि एक दासता छोड़ते हैं, तत्क्षण दूसरी पकड़ लेते हैं। जब दूसरी पकड़ने का रास्ता पूरा तैयार हो जाता है तभी हम पहली छोड़ते हैं। दासताएं बदलती जाती हैं आदमी का मन नहीं बदलता। वह मन वही का वही है। कम्युनिस्ट हैं, उन्होंने सब छोड़ दिया। कहा कि धर्म है अफीम का नशा और यह सब है पाखंड। इसलिए राम को छोड़ो, कृष्ण को छोड़ो, क्राइस्ट को छोड़ो, उन्होंने सब मंदिर खाली करवा दिए, और उन्हें पता भी न रहा कि मंदिर, इधर से उन्होंने मूर्तियां खाली कीं। पीछे से माक्र्स की, एंजिल्स की, लेनिन की, स्टैलिन की मूर्तियां आ गईं। यहां उन्होंने पुरानी कब्रें उखाड़ीं और क्रेमलिन के पास लेनिन की कब्र बना दी और उस पर हर साल पूजा करते हैं और फूल चढ़ाते हैं और सलामी देते हैं। मंदिर बदल जाते हैं, मूर्तियां बदल जाती हैं लेकिन भगवान कायम रहता है क्योंकि हमारी गुलामी नहीं बदलती। तो कम्युनिस्ट राम से छुड़ा देते हैं, कृष्ण से क्राइस्ट से तो फिर लेनिन और माक्र्स। बाइबिल, गीता और कुरान को कह देते हैं। कचरा तो फिर दास कैपिटल को लिए सिर पर घुसते हैं। तो फर्क नहीं पड़ता।
तो फिर अगर बहुत हिम्मत की तो दास कैपिटल को भी जोड़ देते हैं राम, कृष्ण सब छुट जाते हैं तो फिर साइंस का सुपरस्टीशन पैदा होता है। आइंस्टीन जो कहता है, वह सत्य। न्यूटन जो कहता है, वह सत्य। चाहे आइंस्टीन ही चिल्लाकर कहता रहे कि हमें सत्य का कोई पता नहीं, हम तो सत्य के आस-पास थोड़ा बहुत सोचते हैं, विचारते हैं, काम चल जाता है। सत्य का हमें कोई पता नहीं। लेकिन फिर विज्ञान का धर्म पैदा होना शुरू हुआ। पुराने मनीषी और ऋषि हटे तो वैज्ञानिक उनकी जगह बैठने शुरू हो गए। लेकिन हमारा चित्त गुलामी नहीं छोड़ता। मालिक बदल लेता है, लेकिन गुलामी नहीं छोड़ता। मैं आपसे कहना चाहता हूं, मालिक बदलने में अर्थ नहीं है, गुलामी तोड़ देने में अर्थ है। चित्त को मुक्त करिए, सत्य कोई भी आपको नहीं दे सकता। सत्य किसी ग्रंथ से और गुरु से नहीं मिल सकता। और सत्य किसी संप्रदाय की बपौती नहीं है। और परमात्मा किसी मंदिर में कैद नहीं है। जीवन है सत्य, जीवन है, शास्त्र, जीवन है परमात्मा। इस पढ़िए, इसे देखिए; नहीं तो बड़ी भूल हो जाती है। रवींद्रनाथ एक बजरे पर थे रात में और सौंदर्य शास्त्र पर एक ग्रंथ पढ़ते थे, एस्थेटिक्स पर एक ग्रंथ पढ़ते थे। सौंदर्य के प्रेमी थे तो सौंदर्य का ग्रंथ पढ़ते थे। रात देर तक दो बज गए होंगे। जलाए हुए दीये को नाव में अपने बजरे के झोपड़े में बैठे हुए सौंदर्य शास्त्र का ग्रंथ पढ़ते रहे। फिर किताब बंद की, थक गए, दीया बुझाया। दीया बुझाते ही चैंक गए। ग्रंथ पढ़ने में लगे थे, बाहर पूर्णिमा का चांद झोपड़े के बाहर खड़ा था। नदी की लहरों पर उसकी चांदनी बिखर रही थीं। आकाश सन्नाटे और मौन में था। छोटी सी बदलियां आकाश में तैर रही थीं। खिड़की पर जाकर खड़े हुए और माथा ठोक लिया और कहा कि मैं सौंदर्य शास्त्र को पढ़ने में समय गंवाता रहा और सौंदर्य द्वार पर खड़ा हुआ है। सौंदर्य द्वार पर खड़ा हुआ है, हम सौंदर्य शास्त्र पढ़ रहे हैं। परमात्मा भगवान के बाहर दस्तक दे रहा है, हम रामायण पढ़ रहे हैं।
जीवन है छोटे-छोटे पौधों में, पक्षियों में, इस चारों तरफ व्याप्त जगत में सारा रहस्य प्रकट हो रहा है। हम आंखें फोड़ रहे हैं, कंदील जलाकर धुआं ले रहे हैं उसका और किताबें पढ़ रहे हैं।
नहीं, किताबों में नहीं है, न शब्दों में है। सत्य है बहुत विराट। कोई किताब उसे अपने में नहीं छिपा सकती। सत्य है बहुत अनंत। कोई शब्द उसे अपने में नहीं समा सकता। सत्य के बहुत विराट; क्षुद्र वाणी उसे प्रकट नहीं कर सकती। लेकिन प्रकट हो रहा है अनंत-अनंत रूपों में। चारों तरफ आंख खोल कर देखने की बात है। लेकिन अब आपको भगवान का ख्याल आता है तो आप मंदिर में भागे हुए जाते हैं। अब भगवान का ख्याल आए तो दीवालों से बाहर आए, दीवालों के भीतर न जाए क्योंकि दीवालें बांधती हैं, दीवालें रोकती हैं। दीवालें तोड़ दें और मुक्त हों। चित्त पर सारी दीवालें तोड़ देनी जरूरी हैं। और जब चित्त पर कोई दीवाल न रह जाए, किसी ग्रंथ की, किसी शब्द की, किसी सिद्धांत की तो एक अभूतपर्व क्रांति घटित होती है..चित्त स्वतंत्र होता है। चेतना जागती है और मुक्त होती है उसके बंधन और कड़ियां गिरती हैं और उसमें पौरुष और गरिमा जाती है। उसे स्मरण आता है अपने होने का। मैं हूं, उसका बोध जगता है।
लेकिन हम यदि बंध रहें, यह बोध कभी पैदा नहीं होगा। हम अगर जमीन पर घिसटते रहें, तो यह बोध कभी पैदा नहीं होगा। यह बोध पैदा करने के लिए साहस की, विचार की जरूरत है।
इन तीन दिनों में बहुत सी बातें मैंने कहीं हैं, बहुत सी चोटें की हैं, सिर्फ इसी ख्याल से कि यदि आपको अपनी जंजीरें मालूम हों, उन्हें तोड़ने का बोध पैदा हो तो आपको दिखाई पड़ेगा कि चित्त के सारे के संसार, चित्त की सारी कंडीशनिंग, चित्त में बैठे हुए सारे विचार आपको परतंत्र किए हुए हैं। क्या कभी आपने यह ख्याल किया कि जो भी विचार आपके भीतर बैठे हैं, वे आइडियालॉजी, उनमें कोई भी आपकी अपनी नहीं है, किसी और ने आपको दी हैं, उधार हैं, दूसरे से आई हैं? कभी आपने ख्याल किया है कि उनमें से कुछ भी आपसे पैदा नहीं हुआ है? सब दूसरों का है, उधार है, सब संग्रह है, हमने बाहर से इकट्ठा कर लिया है। विचार तैर रहे हैं हवाओं में, हम उन्हें इकट्ठा किए जा रहे हैं। फिर हम कहते हैं, मेरा संप्रदाय, मेरा शास्त्र। आपका इसमें कुछ भी नहीं है। सब आपने औरों का गिन लिया।
बुद्ध कहा करते थे, मेरे गांव में एक ऐसा युवक था, नदी के किनारे बैठ कर दूसरों की गाय-भैंसे बिना करता था। अहीर था, उसके पास कोई गाय-भैंस नहीं थी तो वह दूसरों की गाय-भैंस निकलती थीं, उनकी गिनती किया करता था कि गांव में किसकी कितनी भैंस हैं, किसकी कितनी गाय, किसके कितने बैल! तो लोगों ने उससे कहा कि तू अपना जीव व्यर्थ गंवा रहा है। दूसरों की गाय-भैंस गिनने से क्या होगा? तो अपनी भी कोई गाय-भैंस है?
हमसे कोई पूछे, हमारा अपना कोई अनुभूतिजन्य विचार है? या कि हम दूसरों के विचार गिन रहे हैं, दूसरों की गाय-भैंस गिर रहे हैं? राम ने क्या कहा, बुद्ध ने क्या कहा, महावीर ने क्या कहा, क्राइस्ट ने क्या कहा, इसको गिन रहे हैं कि हमारा भी कोई अपना विचार जन्मा है? अपने विचारों को पकड़ें और परखें, आप पाएंगे सब पराए हैं। और जो पराए का है, वह शक्ति नहीं बन सकता। जो पराए का है, उसकी आपके भीतर जड़ें ही नहीं हैं। वे तो कागज का फूल हैं जो हम बाजार से खरीद लाए हैं और घर में लटका लिए हैं। न इनमें गंध हैं, न इनमें प्राण है। अपने फूल पैदा करने हो तो पौधे लगाने पड़ते हैं, बीज बोने पड़ते हैं, बगीचा सम्हालना पड़ता है। उनकी जड़ों को पानी देना पड़ता है। सुरक्षा करनी पड़ती है, तब अपने पौधे लगते हैं और उनमें बीज अंकुरित होता है, फूल बनता है, सुगंध आती है। वह फिर जीवित फूल होता है। जीवित विचार और बात है। मृत विचारों को संकलित कर लेना, डैड थॉटस को इकट्ठा कर लेना और बात है। चित्र परतंत्र हो जाता है अगर मृत विचार संगृहीत हो जाए। और चित्त मुक्त होता है अगर इन मृत विचारों से छुटकारा पा लें।
पहले तो बहुत दरिद्रता मालूम होगी। लगेगा, मैं तो सब खो बैठा जब कोई भी विचार मेरा नहीं है तो मैं तो अज्ञानी हो गया। लेकिन यह अज्ञान बहुत डिवाइन है। यह अज्ञान बहुत डिवाइन इग्नोरेंस है, यह बहुत दिव्य है, भागवत है। क्योंकि साफ होगी, उधार फूल अलग होंगे, कागज के फूल फेंक दिए जाएंगे। भूमि साफ होगी तो अपने बीज बोए जा सकते हैं।
एक माली बगीचा तैयार करता है। घास को उखाड़ता है, फिजूल झपड़ों को अलग करता है, घास को अलग करता है, जमीन को खोदता है, कंकड़-पत्थर अलग करता है, फिर सुरक्षा करता है, फिर बागुड़ लगता है। फिर बीज बोता है, फिर पानी सींचता है, श्रम करता है। फिर प्रतीक्षा करता है, प्रेम करता है, प्रतीक्षा करता है, तब पौधे जन्मते है। फिर बढ़ते हैं और तब उनमें फूल आते हैं। स्वयं का विचार भी ऐसे ऊपर से नहीं थोपा जाता। वह भी सब घास-पात उखाड़ कर फेंक देनी पड़ती है। यह सब घास-पात है जो हमने बाहर से इकट्ठा कर ली है। इसे लगाना नहीं पड़ता है, इसके बीज हवा में उड़ते रहे हैं। आप अपने घर को थोड़े दिन के लिए खाली छोड़ दें, उसमें घास-झंखाड़ आपने आप पैदा हो जाएगा। उसे लगाना नहीं पड़ता, उसे उखाड़ना पड़ता है। लेकिन अगर सुंदर फूल आपको लगाने हो तो लगाने पड़ते हैं, जमाने पड़ते हैं। अगर अपने विचार को जगाना हो तो लगाना पड़ता है। अगर दूसरों के विचारों से काम चलाना हो तो आप कुछ न करें, वह अपने आप उनके बीज हवाओं में उड़ रहे हैं। वह आपमें बैठ जाएंगे और घास उगा देंगे और आपके भवन को कचरे से भर देंगे। गाड़ियां ले जाकर बाहर से लाना भी नहीं पड़ेगा। लेकिन, प्रकाश का कुछ और रास्ता है। गंध का, फूल का कुछ और रास्ता है।
पहली शर्त है, चित्त स्वतंत्र हो। विचार के जन्म की, विवेक के जन्म की पहली भूमिका है, चित्त मुक्त हो समस्त संप्रदायों से, समस्त शास्त्रों से। सोचते होंगे, मैं बड़ा संप्रदाय और शास्त्र-विरोधी हूं। सोचते होंगे, मैं बड़े धर्म की विरोध की बात कह रहा हूं। नहीं, धर्म का जन्म ही इसी भांति होता है। धर्म का जन्म और किसी भांति होता ही नहीं। जो भी मनुष्य बाहर से इकट्ठा मन में कर लेता है उससे छूट कर ही धर्म की ऊर्जा प्रकट होती है। पहली बात।
दूसरी बात है, चित्त सरल हो, स्वतंत्र हो, सरल हो। सरलता का क्या अर्थ है। क्या अर्थ है कि आप हाथ का कता हुआ कपड़ा पहनने लगें तो आप सरल हो जाएंगे? या एक बार भोजन करने लगें तो सरल हो जाएंगे? या लंगोटी लगा लें तो सरल हो जाएंगे? या साग-सब्जी या घास-पात खाने लगें तो सरल हो जाएंगे? नहीं, सरलता ऐसी सस्ती बात नहीं है। और न सरलता इतनी सरल बात है। ये सब जिसको हम सरलता कहते हैं, यह बहुत कांप्लेक्स और जटिल चित्त का लक्षण है। एक आदमी को सरल होना है, पहले बहुत अच्छे कपड़े पहनता था, उसने एक लंगोटी लगा ली और कहने लगे, कितना सीधा है, कितना सरल, कितना साधु है! सब कपड़े छोड़ दिए, एक लंगोटी लगाता है। पहले बहुत अच्छा खाना खाता था, अब उपवास करने लगा, व्रत रखने लगा। लोग कहने लगे, कैसा परिवर्तन हो गया! कितना सीधा और कितना सरल हो गया। पहले अकड़ कर चलता था। अब जिससे भी मिलता है, झुक कर नमस्कार करता है और कहता है, मैं तो बहुत विनम्र आदमी हूं, मैं कुछ नहीं हूं, मैं तो ना-कुछ हूं। तो हम कहते हैं, कितना विनम्र और कितना सरल आदमी है! बहुत समझेंगे, देखेंगे, इस तरह की विनम्रता के पीछे, अहंकार छिपा बैठा होता है। क्योंकि जो आदमी यह कहता है कि मैं बहुत विनम्र हूं उसे अभी मैं भूला नहीं है। जो कहता है, मैं बहुत विनम्र हूं, उसे अभी मैं भूला नहीं है। जो कहता है, मैं बहुत विनम्र हूं, उसे अभी मैं, ईगो, अहंकार अभी भूला नहीं है। अहंकार ने नई शक्ल ले ली है। अब वह विनम्र हो गया है। अब उसने विनम्रता को ओढ़ लिया है। जो आदमी कहता है कि मैं तो बहुत सीधा-सादा जीवन पसंद करता हूं, खादी पहन ली, रूखा-सुखा खा लिया, इस आदमी का मन सीधा-सादा नहीं है।
बहुत हैरान होंगे आप, एक गांव में ऐसा हुआ, एक फकीर का आगमन हुआ, बड़ा संन्यासी था, दूर तक उसकी ख्याति थी, नग्न रहता था। गांव के राजा ने स्वागत द्वार बनवाए, गांव के राजा ने रास्ते पर कालीन बिछवाए, उस फकीर के स्वागत को रास्ते पर। गांव के बाहर गया, सारा राजदरबार गया। खुद रानी गई। फकीर का बचपन का मित्र था। दोनों एक ही पाठशाला में साथ-साथ पढ़े थे। जब फकीर आया, आने के एक दिन पहले ही लोगों ने उसे खबर दी कि वह जो राजा है, जिसकी राजधानी में तुम जा रहे हो, अपना दंभ दिखलाने के लिए कि मैं कुछ हूं, सारी राजधानी को साफ करवा रहा है, द्वार बनवा रहा है, रास्तों पर बहुमूल्य कालीन बिछवा रहा है, वह तुम्हें हीन करना चाहता है, वह तुम्हें नीचा दिखाना चाहता है। फकीर हंसा। और बहुत से फकीर हंसते है, बहुत से लोग हंसते हैं, और हम सोचते होंगे, हंसने में बड़ी सरलता है, लेकिन हंसने में बड़ा गहरा दंभ हैं। बड़ी चोट, बड़ी हिंसा भी हो सकती है। फकीर हंसा। उसने कहा, देख लेंगे। हम मस्तों को क्या फिकर?
जिस दिन स्वागत हुआ..नंगा फकीर था..जिस दिन वह राजमहल के द्वार पर आया, बहुमूल्य कालीनों पर चला तो सारे लोग दंग हुए। घुटने तक उसके पैर कीचड़ से भरे थे। सब लोग हैरान हुए, वर्षा के दिन न थे, सूखा था, गर्मी के दिन थे, रास्ते सूखे पड़े थे। इतने पैर कीचड़ में कैसे भिड़ गए? राजा ने महल में पहुंचकर निश्चित होने पर जब उसे बहुमूल्य सिंहासन पर बिठाया तो वह अपने कीचड़ भरे पैरों को पालथी मार कर बैठ गया। राजा ने निश्चित हो जाने पर पूछा कि कृपया क्षमा करेंगे, पूछना मुझे नहीं चाहिए, लेकिन मार्ग में कोई कष्ट हुआ क्या? पानी गिरा क्या? कीचड़ थी क्या? ये घुटने तक आपके पैर कीचड़ में कैसे भिड़ गए? मौसम सूखा है, गर्मी के दिन हैं, पानी का पता नहीं है, पानी को लोग तरस रहे हैं, इतनी कीचड़ सड़क पर कैसे मिल गई? उस फकीर ने कहाः तुम क्या समझते हो? तुम अगर बहुमूल्य कालीन बिछा कर अपनी शान-शौकत दिखा सकते हो तो हम भी फकीर हैं, हम कीचड़ भरे पैरों से कालीनों पर चल सकते हैं।
यह विनम्रता और नग्नता के भीतर भी अहंकार बैठा हुआ है। यह खूब नये रूपों में बैठा है, पहचानना कठिन है। एक आदमी मंदिर जाता है, सीधा-सरल आदमी है, रोज मंदिर जाता है। लेकिन वह देखता हुआ जाता है कि कौन-कौन देख रहे हैं कि मैं मंदिर जा रहा हूं। वह मंदिर में पूजा भी करता जाता है, वह पीछे झांक कर देखता जाता है कि जिनको दिखाना था वह आ गए कि नहीं। वह लौटता है, वह मन में दंभ लेकर लौटता है कि मैं धार्मिक हूं।
मोहम्मद ने कहा है, उनके परिचित का एक लड़का एक दिन सुबह उनके साथ नमाज पढ़ने को मस्जिद में गया। पहले दिन गया। रोज तो सोया रहता था। मोहम्मद कभी उसको कहने नहीं कि चलो। एक दिन सुबह-सुबह जागा हुआ था, मोहम्मद नमाज को जाते थे। उन्होंने कहाः चल, तू भी चल। वह मोहम्मद के साथ गया। नमाज की, लौटा। जब लौट रहा था तो उसने मोहम्मद से कहा कि लोग भी कैसे पापी और अज्ञानी हैं, अभी तक सो रहे हैं। मोहम्मद वहीं रुक गए। उन्होंने परमात्मा से कहा कि हे परमात्मा, मुझसे भूल हो गई जो इसको मस्जिद ले गया। कम से कम रोज सोया रहता था तो यह दंभ तो न था कि मैं मस्जिद गया और दूसरे पापी अभी तक सो रहे हैं।
 धार्मिक आदमी को देखिए थोड़ा वह चारों तरफ अधार्मिक लोगों में बड़ा रस ले रहा है। यह सारी दुनिया अधार्मिक देख कर उसको बड़ा मजा आ रहा है, उसके अहंकार की तृप्ति हो रही है। जहां भी मौका उसे मिल जाए किसी को अधार्मिक सिद्ध करने का, वह चूकेगा नहीं। और तिलक नहीं लगाया है तो वह समझता है कि अधार्मिक है। अगर मंदिर नहीं गए हैं तो समझता है, अधार्मिक हैं। अगर जनेऊ नहीं बांधा है तो वह समझता है, सब संस्कृति और धर्म नष्ट हो गया। कैसी-कैसी मूर्खता की बातें हैं! कोई तिलक लगाने से, कोई मंदिर जाने से, कोई जनेऊ पहनने से कोई धर्म होता है? और अगर इनसे धर्म होता है तो ऐसे धर्म से भगवान जितने जल्दी छुटकारा दिला दें दुनिया का, उतना बेहतर है। धर्म कुछ और बड़ी बात है। धर्म इन क्षुद्रतम बातों में नहीं है। इन क्षुद्रतम बातों में हमारी क्षुद्र बुद्धि प्रकट होती है, धर्म नहीं। इन बातों को हम निर्मित करते हैं..क्षुद्र लोग। और हमारा यह छोटा सा मिडियाकर माइंड, यह छोटा सा दिमाग, यह इन सारी चीजों को निर्मित करता है, बांधना और बनाता है। और फिर इनको घेर कर, इन सबको घेर कर कोई खड़ा हो जाए तो उसे आप सरल आदमी मत समझ लेना। या आप खुद ऐसे हो जाए तो सरल मत समझ लेना आप अपने को। सरलता, ह्युमिलिटी बड़ी और बात है। सिंप्लिसिटी बड़ी और बात है। बहुत और बात है। सीखी नहीं जाती सरलता, थोपी नहीं जाती। भोजन और कपड़ों से उसका संबंध नहीं है। फिर किस बात से संबंध है? संबंध है सरलता का इस बात से..मैं जानूं, कितना मैं जानता हूं। सोचूं, कितना मेरा ज्ञान है।
साक्रेटीज था। उसके गांव में एक आदमी को देवी आती थी। उस देवी से किसी ने पूछा कि इस गांव में, एथेंस में सबसे ज्यादा ज्ञानी कौन है? उस देवी ने कहा साक्रेटीज। तो लोग भागे हुए साक्रेटीज के पास गए और कहाः देवी ने कहा है, तुम्हीं इस गांव में सबसे बड़े ज्ञानी हो। साक्रेटीज ने कहाः जरूर कोई भूल हो गई। मैं जितना जानता हूं इतना ही मुझे ज्ञात होता है कि मैं अज्ञानी हूं। जितना मेरा ज्ञान की खोज बढ़ती है उतना मुझे अपने अज्ञान का पता चलता है। जाओ, कुछ भूल हो गई। मेरे से एथेंस में मुझसे बड़ा अज्ञानी कोई भी नहीं है।
ज्ञान को पहचानें, सरलता पैदा होगी। ज्ञात होगा, मैं कुछ भी नहीं जानता। अपनी शक्ति को पहचानें तो ज्ञात होगा, क्या मेरी शक्ति? सूखे पत्ते की भांति उड़ा जाता हूं और समझता हूं, मैं कुछ हूं।
एक महल के पास कुछ बच्चे खेलते थे। पत्थर का एक ढेर था एक बच्चे ने एक पत्थर उठाया और ऊपर फेंका। जब पत्थर ऊपर उठने लगा, जब उसने देखा, मैं ऊपर उठ रहा हूं, उसने नीचे पड़े पत्थर के ढेर में, बहुत पत्थर पड़े थे, उसने कहाः मित्रो, मैं जरा यात्रा पर जा रहा हूं। पत्थर चैंक गए। निश्चित ही कोई झूठ की तो बात न थी। वह यात्रा को जा ही रहा था, ऊपर उठा जा रहा था। वे चैंके हुए देखते रहे। उनके तो पंख न थे। कैसा शक्तिशाली पत्थर है जो ऊपर जा रहा है! फिर वह महल की खिड़की से जाकर टकराया। कांच चकनाचूर हो गया। उसने कहाः कितनी बार मैंने नहीं कहा कि मेरे रास्ते में कोई न आए, नहीं तो चकनाचूर हो जाएगा। खिड़की फूट गई थी। वह भीतर गया, फर्श पर गिर पड़ा। गिरते ही उसने कहाः काफी लंबी यात्रा हुई, थोड़ा विश्राम कर लें। भवन के नौकरों को पता चला। आवाज हुई, खटका हुआ, भागे गए पत्थर को उठाया और वापस फेंका। जब पत्थर वापस गिरने लगा, उसने कहाः काफी यात्रा की, एक शत्रु का नाश किया, अब आपस लौट चलें। जा के जब अपने ढेर में वापस गिरा तो उसने लोगों से कहा, बहुत लंबी यात्रा करे आया हूं, बहुत थक गया हूं, अब विश्राम करूंगा।
क्या इस पत्थर की जिंदगी में और हमारी जिंदगी में कोई फर्क है? जहां-जहां हम मैं को डालते हैं, वहां-वहां हम इस पत्थर की बुद्धि से ही काम नहीं कर रहे हैं? जो मेरे रास्ते में आएगा, चकनाचूर हो जाएगा..यह इस पत्थर की बुद्धि नहीं है, यह हमारी भी बुद्धि है, हमारी राजनीतिज्ञों की भी बुद्धि है। यह हम सबका दिमाग है। आप पैदा हुए हैं, अगर अपने पैदा होने पर यदि विचार करें तो आपका मन ह्युमिलिटी से भर जाएगा। आप एक दिन मर जाएंगे। जन्म है और मृत्यु है, अगर इस पर विचार करें तो आप एकदम विनम्र हो जाएंगे, एकदम सरल हो जाएंगे। अगर यह आपको दिखाई पड़े। ज्ञात कुछ भी नहीं है, एक अज्ञात, एक बिल्कुल अननोन जगत में हम खड़े हैं। सामथ्र्य कुछ भी नहीं है फिर भी अहंकार को पोषित किए जा रहे हैं कि मैं हूं, और मैं हूं।
एक चक्रवर्ती हुआ..पुराने दिनों में होते थे। कहानियों में लिखा है, पता नहीं होते थे या नहीं होते थे..चक्रवर्ती हुआ, उसने सारे जगत को जीत लिया। कथाएं कहती है कि जो आदमी चक्रवर्ती हो जाता था, मेरु पर्वत पर उसे जाकर हस्ताक्षर करने पड़ते थे। यह सबसे बड़ा गौरव था। यह सिर्फ चक्रवर्तियों को उपलब्ध होता था कि वह जाए और मेरु पर्वत पर हस्ताक्षर कर दें। अडिग चट्टानों पर अपने हस्ताक्षर कर दें। एक राजा चक्रवर्ती हुआ, वह बहुत प्रसन्न हुआ। मेरु पर्वत पर हस्ताक्षर करने की बात थी। इससे बड़ा कोई गौरव नहीं था। वह बड़ी फौज-फांटे को लेकर मेरु पर्वत की ओर चला। गर्व से चूर हुआ जाता था। पैर जमीन पर न पड़ते थे, आंखें आकाश में न टिकती थीं, वैसा गौरव था। कारण भी था। सब जीत कर लौटा था। यह मौका मुश्किल से किसी को मिलता था। हजारों-हजारों वर्षों में कोई चक्रवर्ती होता था। वह चक्रवर्ती हो गए। द्वार पर द्वारपाल ने कहाः और सब तो यहीं रुक जाएंगे, अकेले ही आपको जाना पड़ेगा, क्योंकि सामान्यजन तो मेरु पर्वत के दर्शन भी नहीं कर सकते। अप अकेले जाए, साथ में प्रहरी जाएगा, आपके दस्तखत करवा देगा।
राजा भीतर गया, छैनी-हथौड़ी साथ लेकर प्रहरी गया। बड़ा विशाल पर्वत था। एक छोर से दूसरे छोर तक जाना असंभव था। दिन पर दिन बीतने लगे लेकिन जगह न मिलती थी, जहां राजा हस्ताक्षर करे। पूरा पहाड़ पहले से ही से भरा हुआ था। हस्ताक्षरों पूरा पहाड़ पहले ही से भरा हुआ था। जगह न मिलती थी कहां हस्ताक्षर करे। दिन पर दिन, माह पर माह बीतने लगे। दंभ, अहंकार गिरने लगा। क्षीण होने लगा। सोचा था बड़ा काम करने जा रहा हूं, यहां तो पूरे पहाड़ पर पहले से लोग हस्ताक्षर कर चुके थे, बहुत चक्रवर्ती हो चुके थे। पहरेदार से उसने कहाः कब तक यह चलेगा? जगह तो मिलती नहीं। उस पहरेदार ने कहाः मैंने अपने बाप से सुना है, उन्होंने भी अपने बाप से सुना था और उन्होंने भी, और उन्होंने भी, उनके पहले भी, कि जब भी यहां हस्ताक्षर करने पड़ते हैं तो पुराना हस्ताक्षर मिटाना पड़ता है, नई जगत, फ्रेश जगह मिलती नहीं, कभी मिली ही नहीं। तो राजा ने कहाः हस्ताक्षर करना फिजूल है। उसने सोचा, हस्ताक्षर करने का कोई अर्थ भी न रहा। इस बड़े पहाड़ पर कौन देखेगा, कौन पहचानेगा? मैं किन हस्ताक्षरों को पहचान पा रहा हूं? वह वापस लौटने लगा। पहरेदार ने कहाः मिटा दूं? हस्ताक्षर करते हैं? आप? उसने कहा, क्षमा करें? बहुत अकड़ से गया था। महीनों बीत गए थे, उसकी फौजें बाहर प्रतीक्षा करते घबड़ा गई थीं। लौट तो बिल्कुल विनम्र था। वे पहचान भी न सकीं कि कौन राजा है, कौन पहरेदार है। वह वापस लौटा तो एक दरिद्र आदमी आकर खड़ा हो गया और उसने फौजों से कहाः जाओ, अब मैं कोई राजा नहीं हूं, अब मैं कोई चक्रवर्ती नहीं हूं। वह पागलपन गया।
जीवन को देखें और विचारें, जागें, सरलता पैदा होनी शुरू हो जाएगी। सरलता थोपी नहीं जाती। जीवन के सत्य को देखने से आनी शुरू होती है। और जब चित्त सरल होता है तो चित्त कोमल हो जाता है। और चित्त जटिल होता है तो कठोर हो जाता है। कोमलता में ही, उस विनम्रता में ही सत्य का प्रवेश होता है। कठोर हृदय की भांति, है। उस पर बीज भी पड़ेगा तो नष्ट हो जाएगा। कोमल हृदय भूमि की भांति है, कोमल, उस पर बीज पड़ेगा तो अंकुर बन जाएगा। हृदय को कोमल होने दें। बनाने की कोशिश न करें, बनाने की कोशिश से तो झूठ हो जाता है। जागें और देखें और जीवन की सारी स्थिति को समझें, आपका हृदय कोमल होना शुरू हो जाएगा, चित्त सरल होना शुरू हो जाएगा। एक अपने किस्म की ह्युमिलिटी पैदा होनी शुरू होगी। एक अपने किस्म की विनम्रता, जो थोपी नहीं गई है, जो आई है। जो कल्टीवेट नहीं की गई है, बनाई नहीं गई है, संवारी नहीं गई है, जो जीवन को देखने से पैदा हो गई है। एक पत्ती वृक्ष में हिल रही है, क्या उससे ज्यादा आपका होना है? एक छोटा सा कीड़ा जमीन पर चल रहा है, क्या उससे ज्यादा आपका होना है? देखें जीवन को, देखें दूर तक फैले आकाश को, करोड़-करोड़ सूर्यों को, करोड़-करोड़ सूर्यों के फासले को, देखें इस विराट ब्रह्मांड को, सोचें इस छोटी सी पृथ्वी को, उस पर छोटे से अपने होने को। इसके प्रति जागें। तो क्या पता चलेगा? पता चलेगा कि मैं तो कुछ भी नहीं हूं इस सब होने में, एक सागर में बूंद भी जैसी मेरा होना नहीं है। और तब, तब अहंकार क्षीण होगा और विलीन हो जाएगा। और सरलता पैदा होगी। स्वतंत्र हों, सरल हों और शून्य हो जाए।
शून्य का अर्थ..शून्य का अर्थ है..मन को खाली छोड़ने की सामथ्र्य।
एक व्यक्ति एक मंदिर में किसी दूर देश में हाथ जोड़कर बैठा हुआ है। परदेशी यात्री ने भीतर आकर उससे पूछा, क्या आप प्रार्थना कर रहे हैं? उस व्यक्ति ने कहाः कैसी प्रार्थना, किसकी प्रार्थना? परदेशी हैरान हुआ होगा। पूछा, भगवान की प्रार्थना करते होंगे। उसने कहाः मैं इतना छोटा हूं कि मुझे भगवान का कोई पता नहीं। किसी चीज को मांगने के लिए प्रार्थना करते होंगे? उसने कहाः कितना ही मांगें और कितना ही इकट्ठा करें, मौत सब छीन लेती है, इसलिए मांगने का मोह चला गया। क्या मांगें? जब सब छिन ही जाता है तो मांगने में कोई अर्थ न रहा। उस आदमी ने कहाः फिर भी आप प्रार्थना तो कर ही रहे हैं? उस आदमी ने कहाः कैसे कहूं कि मैं प्रार्थना कर रहा हूं? अब तक बहुत अपने भीतर खोजा, किसी मैं को तो पा ही नहीं सका।
यह जो क्षण है, ऐसा चित्त की दशा का। न कोई परमात्मा का ख्याल है, न कुछ मांगने का, न अपना। यह शून्य, खाली, यह नॉन-बीइंग की अवस्था है, यह नथिंगनेस। जीवन में स्वतंत्रता आए, सरलता आए तो शून्यता आनी कठिन नहीं है। कुछ घड़ी को तो चित्त बिल्कुल मौन ही हो जाना चाहिए। अर्थ यह नहीं है कि आप जबरदस्ती मौन कर दें। जबरदस्ती दबा कर बैठ जाएं अपनी श्वास को रोक कर, तो वैसी शून्यता सच्ची नहीं है। नहीं, आने दें, ग्रोथ होने दें, शून्यता को आने दें।
कैसे आएगी शून्यता? दो तो मैंने बातें कहीं..स्वतंत्र चित्त ही तो बहुत खाली हो जाए, क्योंकि जब भराव दूसरे का है। सरल चित्त हो तो बहुत विगलित हो जाएगा क्योंकि सारी कठोरता भरे हुए है, यह विलीन हो जाएगी। उसके बाद शून्य, जीवन को देखें। क्या मांगने योग्य लगता है? परमात्मा को जानते नहीं है, स्वयं को खोजें, मैं का कोई पता नहीं चलता? फिर क्या होगा? तो फिर मौन रह जाएंगे। मौन, एक साइलेंस, एक सन्नाटा पकड़ना शुरू होगा। यह चेष्टित सन्नाटा न होगा। यह घेर लेगा अचानक। यह किसी अज्ञात क्षण में, किसी बिल्कुल अननोन मूवमेंट में, जब कि हम ख्याल में भी न थे, अचानक पकड़ लेना। अगर स्वतंत्र और सरल होने की विकसित अवस्था बनी तो शून्य का भाव किसी क्षण में अचानक पकड़ लेगा। आपको पता लगेगा कि मैं तो हूं ही नहीं, मैं तो हवा-पानी हो गया, मैं तो कुछ हूं ही नहीं, सुखा पत्ता हो गया। पानी पर बहता हुआ एक लकड़ी का टुकड़ा हो गया। एक पानी पर एक लकड़ी का टुकड़ा बहता हो, एक आदमी तैरता है पानी में। तैरना शून्य नहीं होता है। फिर एक आदमी बहता है पानी में, तैरता नहीं, बहा जाता है सब छोड़ दिया है उसने और बहा जाता है। तैरना भरा होना है और बहे जाना शून्य हो जाना है।
तो जीवन में थोड़ा बहें। तैरने का बहुत ख्याल छोड़ दें। तैरने से ही दंभ पैदा होता है। तैरने से अहंकार पैदा होता है। तैरने का ही भाव कि मैं तैरूंगा और जीतूंगा और पहुंचूंगा, इसमें सबमें मैं खड़ा हुआ है। कठोर मैं नहीं, बहें, छोड़ दें, बह जाए। आप भी एक हिस्से में सारे जगत के अलग नहीं। एक पत्ता है वृक्ष का, अलग थोड़ी है। पीछे जुड़ा है शाखाओं से, पीछे जुड़ा है पेड़ से; और पीछे जुड़ा है जड़ों से। और जड़ें, जुड़ी है सूरज से, समुद्र से, पृथ्वी से, सारे पांच तत्वों से। एक छोटा सा पत्ता सारे जगत से जुड़ा है, अलग नहीं है। कोई अलग नहीं है। देखें जीवन को, पहचानें और प्रवेश करें। आपको पता लगेगा कि मैं तो हूं ही नहीं। शून्यता फलित होनी शुरू हो जाएगी। चित्त धीरे-धीरे मौन होता जाएगा। चित्त बहने लगेगा, तैरना बंद कर देगा। तैरना धार्मिक आदमी का लक्षण है। बहना, बह जाना, सागर में बह जाना धार्मिक चित्त का लक्षण है। वह जो रिलीजस माइंड है, वह तैरता नहीं, बहता है। सब छोड़ देता है और बह जाता है। और जिस वक्त आप सब छोड़ देंगे, सब रिलैक्स कर देंगे और बहने लगेंगे तो आप पाएंगे, आप परमात्मा के साथ एक हो गए हैं। आप पाएंगे, अब आपको अपनी शक्ति खर्च नहीं करनी पड़ती है, नदी की शक्ति आपको बहाए ले जा रही है। अब आपको सागर नहीं पहुंचना है, आप सागर पहुंच गए। अब आपको कहीं खोजने नहीं जाना है, आपने अपने को खो दिया सब पा लिया। क्राइस्ट का वचन है, जो अपने को बचाते हैं वे नष्ट हो जाते हैं और जो अपने को खो देते हैं वे उपलब्ध हो जाते हैं। जो अपने को छोड़ देता है, छोड़ देने का नाम शून्यता है। जो अपने को सब भांति छोड़ देता है वह उसी क्षण परमात्मा को उपलब्ध हो जाता है।
एक छोटी सी घटना और अपनी चर्चा को मैं पूरा करूंगा।
एक रात एक पहाड़ी के किनारे एक अंधेरी रात में एक आदमी यात्रा कर रहा है। अचानक उसने पाया कि वह किसी गड्ढे में गिर गया है। उसने जोर से झाड़ियां पकड़ लीं। पता नहीं, नीचे कितना बड़ा गड्ढा है, कितनी अतल खाई है। क्या होगा, क्या नहीं होगा, सीधी चट्टान मालूम होती है। अब हाथ-पैर हिलाना, ऊपर चढ़ना संभव नहीं मालूम होता। झाड़ियां भी पतली हैं, प्राण कंप रहे हैं। कब टूट जाए, कब टूट जाए, कहना कठिन है। लेकिन वह पकड़े है, पकड़ें है। रात गहरी होने लगी। सर्द रात है, हाथ की मुट्ठियां जड़ होने लगी, शरीर ठंडा होने लगा, साहस टूटने लगा, उसे लगने लगा, अब नहीं, थोड़ी देर में हाथ टूट ही जाएंगे और फिर प्राण की समाप्ति है लेकिन जब तक अपना वश था, पकड़े था, पकड़ रहा। आखिर कौन छोड़ता है अपने हाथ से? अपने वश से कौन छोड़ता है, जब तक मौत ही न छुड़ा ले। अपने हाथ से कौन छोड़ता है, जब तक कि छूट न जाए। पकड़े रहा, पकड़े रहा, सारी जान लगा कर पकड़े रहा। हाथ धीरे-धीरे ठंडे होते गए, रात गहरी होती गई, अंधेरा घना होता गया। सन्नाटा जोर पकड़ता गया, फिर आखिर में हाथों में ताकत न हरी, फिर आखिर में उसका साहस छूट गया। हाथ अपने आप खुल गए और छूट गए और हाथ छूटते ही उसने अपने आप को कहां पाया? अतल गड्ढे में नहीं, केवल छह इंच के फासले पर ही जमीन थी। वह जमीन पर खड़ा था। सारा भय पकड़े था, सारी घबड़ाहट पकड़े था, इससे थी। नीचे खाई न थी।
नीचे खाई नहीं है, परमात्मा है। छोड़ दें। नीचे आधार है। पकड़े रहें, टूट जाएंगे। छोड़ दें, उपलब्ध हो जाएंगे। लोग कहते हैं, जिन खोजा तिन पाइयां; मैं कहता हूं, जिन खोया तिन पाइयां। जो खोजते हैं वे पाते हैं, ऐसा लोग कहते हैं। मैं कहता हूं कि जो खो देते हैं वे पा लेते हैं। इसको शून्य-भाव कहता हूं। शून्य-भाव प्रार्थना है; शून्य-भाव ध्यान है; शून्य-भाव समाधि है।

इन तीन दिनों में थोड़ी सी बातें आपसे कहीं हैं। उसको इतने प्रेम से सुना है, बहुत अनुगृहीत हूं। अंत में सबसे भीतर बैठे परमात्मा के लिए मेरे प्रणाम स्वीकार करें।