शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

सूर्य पर ध्यान दो!

''मनुष्य शुभ है या अशुभ?'' मैंने कहा स्वरूपत: शुभ। और, इस आशा व अपेक्षा को सबल होने दो। क्योंकि जीवन उ‌र्ध्वगमन के लिए इससे अधिक महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है।''
एक राजा की कथा है, जिसने कि अपने तीन दरबारियों को एक ही अपराध के लिए तीन प्रकार की सजाएं दी थीं। पहले को उसने कुछ वर्षो का कारावास दिया, दूसरे को देश निकाला और तीसरे से मात्र इतना कहा : ''मुझे आश्चर्य है- ऐसे कार्य की तुमसे मैंने कभी भी अपेक्षा नहीं की थी!''
और जानते हैं कि इन भिन्न सजाओं का परिणाम क्या हुआ?
पहला व्यक्ति दुखी हुआ और दूसरा व्यक्ति भी तीसरा व्यक्ति भी। लेकिन उनके दुख के कारण भिन्न थे। तीनों ही व्यक्ति अपमान और असम्मान के कारण दुखी थे। लेकिन पहले और दूसरे व्यक्ति का अपमान दूसरों के समक्ष था, तीसरे का अपमान स्वयं के। और, यह भेद बहुत बड़ा है। पहले व्यक्ति ने थोड़े ही दिनों में कारागृह के लोगों से मैत्री कर ली और वहीं आनंद से रहने लगा। दूसरे व्यक्ति ने भी देश से बाहर जाकर बहुत बड़ा व्यापार कर लिया और धन कमाने लगा। लेकिन, तीसरा व्यक्ति क्या करता? उसका पश्चाताप गहरा था, क्योंकि वह स्वयं के समक्ष था। उससे शुभ की अपेक्षा की गई थी। उसे शुभ माना गया था। और, यही बात उसे कांटे की भांति गड़ने लगी और यही चुभन उसे ऊपर भी उठाने लगी। उसका परिवर्तन प्रारंभ हो गया, क्योंकि जो उससे चाहा था, वह स्वयं भी उसकी चाह से भर गया था।
शुभ या अशुभ, शुभ के जन्म का प्रारंभ है।
सत्य पर विश्वास, उसके अंकुरण के लिए वर्षा है।
और, सौंदर्य पर निष्ठा, सोये सौंदर्य को जगाने के लिए सूर्योदय है।
स्मरण रहे कि तुम्हारी आंखें किसी में अशुभ को स्वरूपत: स्वीकार न करें। क्योंकि, उस स्वीकृति से बड़ी अशुभ और कोई बात नहीं। क्योंकि वह स्वीकृति ही उसमें अशुभ को थिर करने का कारण बन जाएगी। अशुभ किसी का स्वभाव नहीं है, वह दुर्घटना है। और, इसलिए ही उसे देखकर व्यक्ति स्वयं के समक्ष ही अपमानित भी होता है। सूर्य बदलियों में छिप जाने से स्वयं बदलियां नहीं हो जाता है। बदलियों पर विश्वास न करना- किसी भी स्थिति में नहीं है। सूर्य पर ध्यान हो, तो उसके उदय में शीघ्रता होती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

बुधवार, 22 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-10

मेरे प्रिय आत्मन्!

तीन मुक्ति-सूत्रों के संबंध में सुबह मैंने आपसे बात की। सत्य को जानने की दिशा में, या आनंद की उपलब्धि में, या स्वतंत्रता की खोज में मनुष्य का चित्त सीखे हुए ज्ञान से, अनुकरण से और वृत्तियों के प्रति मरूच्छा से मुक्त होना चाहिए, यह मैंने कहा।

इस संबंध में बहुत से प्रश्न आए हैं। उन पर हम विचार करेंगे।

बहुत से मित्रों ने पूछा है कि यदि शास्त्रों पर श्रद्धा न हो, महापुरुषों पर विश्वास न हो, तब तो हम भटक जाएंगे, फिर तो कैसे ज्ञान उपलब्ध होगा?

ऐसा प्रश्न स्वाभाविक है। मन को यह खयाल आता है कि यदि महापुरुषों पर, शास्त्रों पर श्रद्धा न करेंगे तो भटक जाएंगे। मगर बड़े आश्चर्य की बात है, हम यह नहीं सोचते कि श्रद्धा करते हुए भी हम भटकने से कहां बच सके हैं। विश्वास करते हुए भी क्या हम भटक नहीं रहे हैं? भटक नहीं गए हैं? विश्वास हमें कहां ले जा सका है। विश्वास कहीं ले जा भी नहीं सकता। क्यों?  

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-09

मेरे प्रिय आत्मन्!

एक संध्या एक पहाड़ी सराय में एक नया अतिथि आकर ठहरा। सूरज ढलने को था, पहाड़ उदास और अंधेरे में छिपने को तैयार हो गए थे। पक्षी अपने निबिड़ में वापस लौट आए थे। तभी उस पहाड़ी सराय में वह नया अतिथि पहुंचा। सराय में पहुंचते ही उसे एक बड़ी मार्मिक और दुख भरी आवाज सुनाई पड़ी। पता नहीं कौन चिल्ला रहा था? पहाड़ की सारी घाटियां उस आवाज से...लग गई थीं। कोई बहुत जोर से चिल्ला रहा था--स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता।

वह अतिथि सोचता हुआ आया, किन प्राणों से यह आवाज उठ रही है? कौन प्यासा है स्वतंत्रता को? कौन गुलामी के बंधनों को तोड़ देना चाहता है? कौनसी आत्मा यह पुकार कर रही? प्रार्थना कर रही?

और जब वह सराय के पास पहुंचा, तो उसे पता चला, यह किसी मनुष्य की आवाज नहीं थी, सराय के द्वार पर लटका हुआ एक तोता स्वतंत्रता की आवाज लगा रहा था।

वह अतिथि भी स्वतंत्रता की खोज में जीवन भर भटका था। उसके मन को भी उस तोते की आवाज ने छू लिया।


सोमवार, 20 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-08

मेरे प्रिय आत्मन्!

सत्य की यात्रा पर मनुष्य का सीखा हुआ ज्ञान ही बाधा बन जाता है, यह पहले दिन की चर्चा में मैंने कहा। सीखा हुआ ज्ञान दो कौड़ी का भी नहीं। और जो सीखे हुए, पढ़े हुए ज्ञान के आधार पर सोचता हो कि जीवन के प्रश्न को हल कर लेगा, वह नासमझ ही नहीं, पागल है। जीवन के ज्ञान को तो स्वयं ही पाना होता है किसी और से उसे नहीं सीखा जा सकता।

दूसरे दिन की चर्चा में मैंने आपसे कहा कि जिसका अहंकार जितना प्रबल है वह स्वयं के और परमात्मा के बीच उतनी ही बड़ी दीवाल खड़ी कर लेता है। मैं हूं, यही भाव, जो सबमें छिपा है उससे नहीं मिलने देता। अहंकार की बूंद जब परमात्मा के सागर में स्वयं को खोने को तैयार हो जाती है तभी उसे जाना जा सकता है जो सत्य है और सबमें है। यह मैंने दूसरे दिन आपसे कहा।

और आज सुबह तीसरी बात मैंने कही कि हम सोए हुए हैं, मर्ूच्छित हैं। और जब तक हम सोए हुए हैं तब तक हमें सत्य का कोई अनुभव नहीं हो सकेगा।

ये तीन बातें मैंने कहीं। ज्ञान को, सीखे हुए ज्ञान को छोड़ना होगा। अहंकार को, कल्पित अहंकार को छोड़ना होगा। और निद्रा को, वास्तविक निद्रा को छोड़ना होगा। इन तीन सीढ़ियों को जो पार करता है, वह परमात्मा के मंदिर में प्रविष्ट हो जाता है।

रविवार, 19 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-07

मेरे प्रिय आत्मन्!

एक अत्यंत वीरानी पहाड़ी सराय में मुझे ठहरने का मौका मिला था। संध्या सूरज के ढलते समय जब मैं उस सराय के पास पहुंच रहा था, तो उस वीरान घाटी में एक मार्मिक आवाज सुनाई पड़ रही थी। आवाज ऐसी मालूम पड़ती थी जैसे किसी बहुत पीड़ा भरे हृदय से निकलती हो। कोई बहुत ही हार्दिक स्वर में,बहुत दुख भरे स्वर में चिल्ला रहा था: स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। और जब मैं सराय के निकट पहुंचा,तो मुझे ज्ञात हुआ, वह कोई मनुष्य न था, वह सराय के मालिक का तोता था, जो यह आवाज कर रहा था।

मुझे हैरानी हुई। क्योंकि मैंने तो ऐसा मनुष्य भी नहीं देखा जो स्वतंत्रता के लिए इतने प्यास से भरा हो। इस तोते को स्वतंत्र होने की ऐसी कैसी प्यास भर गई? निश्चित ही वह तोता कैद में था, पिंजड़े में बंद था। और उसके प्राणों में शायद मुक्त हो जाने की आकांक्षा अंकुरित हो गई थी।


उसके पिंजड़े का द्वार बंद था। मेरे मन में हुआ उसका द्वार खोल दूं और उसे उड़ा दूं, लेकिन उस समय सराय का मालिक मौजूद था, और उसके कैदी को मुक्त होना शायद वह पसंद न करता। इसलिए मैं रात की प्रतीक्षा करता रहा। रात आने तक उस तोते ने कई बार वही आवाज स्वतंत्रता की, वही पुकार लगाई। जैसे ही रात हो गई और सराय का मालिक सो गया, मैं उठा,और मैंने जाकर उस तोते के पिंजड़े के द्वार खोल दिए। सोचा था मैंने, द्वार खोलते ही वह उड़ जाएगा खुले आकाश में, लेकिन नहीं, द्वार खुला रहा और वह तोता अपने पिंजड़े के सींकचों को पकड़े हुए चिल्लाता रहा: स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। तब मेरी कुछ समझ में बात नहीं आई, क्या उसे खुला हुआ द्वार दिखाई नहीं पड़ रहा है? सोचा, शायद बहुत दिन की आदत के कारण खुले आकाश से वह भयभीत होता हो। तो मैंने हाथ डाला और उस तोते को बाहर खींचने की कोशिश की। लेकिन नहीं, उसने मेरे हाथ पर हमले किए, चिल्लाता वह यही रहा: स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। लेकिन अपने पिंजड़ों के सींकचों को पकड़े रहा और छोड़ने को राजी न हुआ। बहुत कठिनाई से उसे बाहर मैंने निकाल कर उड़ा दिया और यह सोच कर कि एक आत्मा मुक्त हुई, एक पिंजड़ा टूटा,एक कारागृह मिटा। मैं निश्चिंत होकर सो गया।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-06

मेरे प्रिय आत्मन्!

एक छोटी सी घटना से मैं अपनी चर्चा शुरू करना चाहूंगा।

एक राजा शिकार को निकला था। जंगल में रास्ता भटक गया, रात हो गई, अपने साथियों से बिछुड़ गया। दूर थोड़ा सा प्रकाश दिखाई पड़ा, उस ओर गया, पाया कि जंगल के बीच ही एक छोटी सी सराय थी। वह उसमें ठहरा। सुबह उसने उस सराय के मालिक को कहा, क्या कुछ अंडे मिल सकेंगे? अंडे उपलब्ध थे। उसने सुबह अंडे लिए, दूध लिया और पीछे पूछा कि क्या दाम हुआ? उस सराय के बूढ़े मालिक ने कहा, सौ रुपये। वह राजा हैरान हो गया। उसने बड़ी महंगी चीजें जीवन में खरीदी थीं लेकिन दो अंडों के दाम सौ रुपये होंगे इसकी उसे कल्पना भी नहीं थी। उसने उस सराय के मालिक को कहा, आर एग्स सो रेयर हियर?क्या अंडे इतनी मुश्किल से यहां मिलते हैं कि सौ रुपये उनके दाम हो जाएं? वह बूढ़ा मालिक हंसा और उसने कहा, एग्स आर नॉट रेयर सर, बट किंग्स आर। उसने कहा, अंडे तो मुश्किल से नहीं मिलते, लेकिन राजा बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।

उस राजा ने सौ रुपये निकाले और दे दिए। उस बूढ़े सराय के मालिक की पत्नी बहुत हैरान हुई। राजा के जाते ही उसने पूछा कि हद हो गई, तुम सौ रुपये निकाल सके उस राजा के खीसे से दो अंडों के लिए? कौनसी तरकीब उपयोग में लाई? कौनसा रहस्य है इसका? 

वह बूढ़ा आदमी बोला, मैं आदमी की कमजोरी जानता हूं।

उसकी औरत ने पूछा, यह आदमी की कमजोरी क्या है? क्या है यह आदमी की कमजोरी?

वह बूढ़ा बोला, तुझे मैं एक और घटना सुनाता हूं, उससे शायद तुझे आदमी की कमजोरी समझ में आ जाए।


शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-05

मेरे प्रिय आत्मन्!

बहुत से प्रश्न मेरे पास आए हैं। अनेक प्रश्न एक जैसे हैं, इसलिए कुछ थोड़े से प्रश्नों में सभी प्रश्नों को बांट कर आपसे चर्चा करूंगा तो आसानी होगी।

मैंने कल कहा: विश्वास धर्म नहीं है, वरन विचार और विवेक धर्म है। श्रद्धा अंधी है। और जो अंधा है वह सत्य को नहीं जान सकेगा।

इस संबंध में बहुत से प्रश्न पूछे गए हैं और उनमें पूछा गया है कि यदि हम श्रद्धा न रखेंगे, यदि हम विश्वास न रखेंगे, तब तो हमारा मार्ग भटक जाएगा।

यह वैसा ही है जैसे एक अंधे आदमी को हम कहें कि तुम अपने हाथ में जो लकड़ी लिए घूमता है, अपनी आंखों का इलाज करवा ले और इस लकड़ी को फेंक दे, तो वह अंधा आदमी कहे, माना मैंने कि आंखों का इलाज तो मुझे करवा लेना है लेकिन लकड़ी को अगर मैं फेंक दूंगा तो भटक जाऊंगा। बिना लकड़ी के तो मैं चल ही नहीं पाता हूं। निश्चित ही अंधा आदमी बिना लकड़ी के नहीं चल पाता है लेकिन आंख वाले आदमी को लकड़ी की कोई भी जरूरत नहीं है।

और जो अंधा आदमी यह आग्रह करेगा कि मैं तो लकड़ी के बिना चलूंगा ही नहीं, वह इस बात को भूल ही जाएगा कि आंख की जगह लकड़ी कोई सब्स्टीटयूट नहीं है, कोई परिपूर्ति नहीं है। लेकिन यह सीधी सी बात भी हमें दिखाई नहीं पड़ती है। 

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-04

मेरे प्रिय आत्मन्!

एक छोटी सी कहानी से मैं संध्या की इस बातचीत को शुरू करूंगा।

एक राजदरबार में एक बहुत अनूठे आदमी का आना हुआ। उस आदमी का अनूठापन इस बात में था कि उसने उस सम्राट को कहा, तुम इतनी बड़े पृथ्वी के अकेले मालिक हो, तुमसे बड़ा सम्राट कभी हुआ नहीं,तो यह शोभा नहीं देता है कि तुम मनुष्यों जैसे वस्त्र पहनो। मैं तुम्हारे लिए देवताओं के वस्त्र लाकर दे सकता हूं।

देवताओं के वस्त्र न तो कभी देखे गए थे और न सुने गए थे। राजा के अहंकार को प्रेरणा मिली और उसने कहा, कितना भी खर्च करना पड़े, कोई भी व्यवस्था करनी पड़े, मैं तैयार हूं, लेकिन देवताओं के वस्त्र मुझे चाहिए। वह व्यक्ति राजी हो गया कि छह महीने के भीतर मैं वस्त्र लाकर दे दूंगा, लेकिन जो भी खर्च उठाना पड़ेगा; कितना ही खर्च हो उसकी कोई गिनती न रखी जाए, छह महीने के बाद मैं वस्त्र ला दूंगा। राजा राजी हो गया। उसके दरबारियों ने समझा कि यह निरा धोखा है। देवताओं के वस्त्र कहां से लाए जा सकते हैं? यह सिर्फ राजा को लूटने का उपाय है।

...इसलिए दरबारी कुछ कर भी न सके। हजारों रुपये प्रतिदिन वह आदमी ले जाने लगा। देवताओं तक पहुंचने की व्यवस्था करनी थी। फिर देवताओं के द्वारपालों को रिश्वत देने की व्यवस्था करनी थी। फिर वस्त्रों के मूल्य चुकाने थे। और ऐसे रोज-रोज काम निकलने लगे।

बुधवार, 15 अगस्त 2018

पद घूंघरू बांध - प्रवचन-04

मृत्यु का वरण: अमृत का स्वाद

पहला प्रश्न: प्रवचन सुनते समय भीतर ऐसी खलबली मच जाती है कि जिसका हिसाब नहीं। कुछ समझ में नहीं आता है। आंसू बहते ही चले जाते हैं। क्या प्राण लेकर ही रहेंगे?

उससे कम में कभी काम चला नहीं। उससे कम में काम चलाने की सोचना भी नहीं। उससे कम में काम चल जाता तो परमात्मा सस्ता होता। उससे कम में काम नहीं चलता, इसलिए तो इतने लोग वंचित हैं परमात्मा से। स्वयं को दिए बिना उसे पाने का कोई उपाय नहीं।
लेकिन स्वयं में ऐसा मूल्यवान क्या है, जिसको बचाने की इतनी आतुरता? संपदा क्या है तुम्हारे पास? जिसको तुम अपना प्राण कहते हो, उसमें भी क्या है? लेकिन शायद हम इस तरह सोचते ही नहीं कि हमारे होने में क्या है! अगर इसे गंवाना पड़े तो क्या गंवाओगे?
अर्थहीन है यह अस्तित्व; इसमें अर्थ तो परमात्मा के आने से ही आता है। यह वीणा तो ऐसी ही पड़ी है; जब तक उसके हाथ न छुएं, इसमें कोई संगीत पैदा होता नहीं। और अगर वीणा के टूटने से ही संगीत पैदा होना है, तो टूटने की तैयारी रखो। क्योंकि असली लक्ष्य संगीत है, वीणा नहीं है।
जिन्होंने अपने को गंवाया, उन्होंने परम धन पाया--राम रतन पाया। जो अपने को बचाते रहे, वे अपने को नाहक गंवाते रहे: खाली आए, खाली गए।

पद घूंघरू बांध - प्रवचन-03

मैं तो गिरधर के घर जाऊं

मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं भोर भये उठि आऊं।
रैन-दिना बाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।

मीरा मगन भई हरि के गुण गाए।
सांप पिटारा राणा भेज्यो, मीरा हाथ दियो जाए।
न्हाय-धोए जब देखन लागी सालिगराम गई पाए।
जहर का प्याला राणा भेज्यो, अमृत दीन्ह बनाए।
न्हाय-धोए जब पीवन लागी, हो अमर अंचाए।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाए।
सांझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाए।
मीरा के प्रभु सदा सहाई, राखे बिघन घटाए।
भजन भाव में मस्त डोलती, गिरधर पै बलि जाए।

मनुष्य की खोज क्या है? मनुष्य की खोज है: अपने घर की खोज। यहां परदेश है। यहां सब वीराना है। अपना यहां कुछ भी नहीं। और यहां से जाना है। और जो थोड़ा-बहुत अपना मान लोगे, वह भी मौत छीन लेती है। यहां घर तो कोई कभी बना नहीं पाया। यहां तो घर उजड़ने को ही बनते हैं। यहां तो घर बन भी नहीं पाते कि उजड़ जाते हैं। यहां हम ही नहीं टिक पाते, तो हमारे बनाए घर कैसे टिकेंगे? यहां की गई मेहनत तो अकारथ जाती है।
आदमी की खोज उस घर की खोज है, जो मिले तो सदा के लिए मिल जाए।
आदमी की खोज उस घर की खोज है जो सच में घर हो, सराय न हो। यहां तो सब सरायें हैं, धर्मशालाएं हैं--बस रैनबसेरा है। सुबह हुई, चल पड़ना होगा। बहुत मोह मत लगा लेना। सराय से बहुत ममता बिठा लेना। यह छूट ही जाना है। यह छूटा ही हुआ है। तुमसे पहले बहुत लोग यहां ठहरे और गए; तुम भी उसी कतार में हो।
इसलिए चाहे यहां कितना ही धन हो, कितना ही पद हो, प्रतिष्ठा हो; फिर भी तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति यहां मिलती ही नहीं। तृप्ति का संसार से कोई संबंध ही नहीं है।

पद घूंघरू बांध - प्रवचन-02

समाधि की अभिव्यक्तियां

पहला प्रश्न: आज फिर वही प्रश्न मन उठा रहा है--यह कि न जाने वाली मस्ती और आने-जाने वाली मस्ती क्या दो अलग-अलग अवस्थाएं हैं? आपने कहा कि पच्चीस वर्षों से मैं एक ही मस्ती में हूं जो कि कभी जाती नहीं। और आपने यह भी कहा कि मंसूर को जब मस्ती पकड़ती थी तो वह और ही आदमी हो जाता था। इन दो वक्तव्यों में विरोध नहीं है, तो विरोध का आभास तो है ही। कृपापूर्वक इस विरोधाभास को दूर करें।

उस परम मस्ती के प्रकट होने के ढंग दो हैं। मस्ती एक ही है; उसके प्रकट होने के ढंग दो हैं। कहीं तो बाह्य अभिव्यक्ति बनती है और कहीं केवल अंतर्धारा। कहीं तो भीतर-भीतर स्वाद चलता है और कहीं-कहीं स्वाद बह कर संगीत बन जाता है।
अंग्रेजी में दो शब्द हैं, महत्वपूर्ण हैं। एक शब्द है: इक्सटेसी। इक्सटेसी का अर्थ होता है: ऐसी आनंद की अनुभूति जो बाहर प्रकट हो। फुल खिलें, गीत झरें, सुगंध उड़े--बाह्य अभिव्यक्ति हो। और दूसरा शब्द है अंग्रेजी में: इन्सटेसी। उसका अर्थ होता है: अंतर्धारा बहे। किसी को कानोंकान पता भी न चले। जैसे नील नदी सैकड़ों मील तक जमीन के नीचे बहती है, फिर जमीन पर प्रकट होती है--ऐसी ही धारा अंतर में भी बह सकती है और बाहर भी प्रकट हो सकती है।
जो धारा बाहर प्रकट होगी वह सतत नहीं हो सकती। मीरा कितना ही नाचे, चौबीस घंटे नहीं नाच सकती। क्योंकि जिन उपकरणों का सहारा लेना पड़ता है--शरीर का--वह तो थकेगा। मीरा का हो तो भी थकेगा। शरीर तो थकेगा। तो नृत्य चौबीस घंटे नहीं चल सकता। कभी चलेगा, कभी नहीं चलेगा। इसलिए मीरा की अभिव्यक्ति आती-जाती मालूम पड़ेगी। इससे यह मत समझ लेना कि समाधि आती-जाती है। समाधि तो बहती है भीतर; कभी प्रकट होती, कभी प्रकट नहीं होती। प्रकटन में बीच-बीच में अंतराल आ जाएंगे।

पद घूंघरू बांध - प्रवचन-01

प्रेम की झील में नौका-विहार

बसौ मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरत सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल।
मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, अरुण तिलक शोभे भाल।
अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंति माल।
छुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बच्छल गोपाल।

हरि मोरे जीवन प्राण आधार।
और आसिरो नाहिं तुम बिन, तीनूं लोक मंझार।
आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरखौ सब संसार।
मीरा कहै मैं दास रावरी, दीज्यौ मति विसार।


मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।
छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई।
संतन ढिंग बैठि बैठि लोकलाज खोई।
अंसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेलि फैल गई, आनंद फल होई।
भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर, तारो अब मोहि।

आओ, प्रेम की एक झील में नौका-विहार करें। और ऐसी झील मनुष्य के इतिहास में दूसरी नहीं है, जैसी झील मीरा है। मानसरोवर भी उतना स्वच्छ नहीं।
और हंसों की ही गति हो सकेगी मीरा की इस झील में। हंस बनो, तो ही उतर सकोगे इस झील में। हंस न बने तो न उतर पाओगे।

अंतर की खोज-प्रवचन-03

एक छोटी सी कहानी से मैं आने वाली इन तीन दिनों की चर्चाओं को शुरू करूंगा।

एक राजधानी में एक संध्या बहुत स्वागत की तैयारियां हो रही थीं। सारा नगर दीयों से सजाया गया था। रास्तों पर बड़ी भीड़ थी और देश का सम्राट खुद गांव के बाहर एक संन्यासी की प्रतीक्षा में खड़ा था। एक संन्यासी का आगमन हो रहा था। और जो संन्यासी आने को था नगर में, सम्राट के बचपन के मित्रों में से था। उस संन्यासी की दूर-दूर तक सुगंध पहुंच गई थी। उसके यश की खबरें दूर-दूर के राष्ट्रों तक पहुंच गई थीं। और वह अपने ही गांव में वापस लौटता था, तो स्वाभाविक था कि गांव के लोग उसका स्वागत करें। और सम्राट भी बड़ी उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा में नगर के द्वार पर खड़ा था।

संन्यासी आया, उसका स्वागत हुआ, संन्यासी को राजमहल में लेकर सम्राट ने प्रवेश किया। उसकी कुशलक्षेम पूछी। वह सारी पृथ्वी का चक्कर लगा कर लौटा था। राजा ने अपने मित्र उस संन्यासी से कहा, सारी पृथ्वी घूम कर लौटे हो, मेरे लिए क्या ले आए हो? मेरे लिए कोई भेंट?


मंगलवार, 14 अगस्त 2018

अंतर की खोज-प्रवचन-02

मनुष्य के मन पर शब्दों का भार है; और शब्दों का भार ही उसकी मानसिक गुलामी भी है। और जब तक शब्दों की दीवालों को तोड़ने में कोई समर्थ न हो, तब तक वह सत्य को भी न जान सकेगा, न आनंद को, न आत्मा को। इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं।

सत्य की खोज में--और सत्य की खोज ही जीवन की खोज है--स्वतंत्रता सबसे पहली शर्त है। जिसका मन गुलाम है, वह और कहीं भला पहुंच जाए, परमात्मा तक पहुंचने की उसकी कोई संभावना नहीं है। जिन्होंने अपने चित्त को सारे बंधनों से स्वतंत्र किया है, केवल वे ही आत्माएं स्वयं को, सत्य को और सर्वात्मा को जानने में समर्थ हो पाती हैं।


ये थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। उस संबंध में बहुत से प्रश्न मेरे पास आए हैं।

सबसे पहले एक मित्र ने पूछा है कि यदि हम शब्दों से मौन हो जाएं, मन हमारा शून्य हो जाए, तो फिर जीवन का, संसार का व्यवहार कैसे चलेगा?

सोमवार, 13 अगस्त 2018

फिर अमरित की बूंद पड़ी - प्रवचन-05

जीवन बहती गंगा है
दिनांक 6 अगस्त, सन् 1986;
प्रात: सुमिला, जुहू, बंबई।

मेरे प्रणाम  को आप स्वीकार करें। मेरा प्रश्न ज्योतिष के संबंध में है। ज्योतिष के संबंध में आपके विचार क्या है? क्या इसमें कोई सत्यांश है? क्या आप इसमें विश्वास करते है? क्या यह सच है कि एक ज्योतिषी ने आपके पिताजी से यह भविष्यवाणी की थी कि आप सात साल से अधिक जीवित नहीं रहेंगे और यदि जीवित रहे तो आप बुद्ध हो जाएंगे?
मैं जीवित रहा, यह पर्याप्त सबूत है कि ज्योतिष में कोई सत्यांश नहीं है। ज्योतिष मनुष्य की कमजोरी है। मनुष्य की कमजोरी है, क्योंकि वह भविष्य के झांक नहीं सकता और वह देखना चाहता है। वह पथभ्रष्ट होने से सदा भयभीत रहता है। वह आश्वस्त होना चाहता है कि वह ठीक रास्ते पर है। और भविष्य बिलकुल ही अज्ञात है,
इसके बारे में कुछ अनुमान नहीं लगाया जा सकता। लेकिन ऐसे लोग हैं जो मनुष्य की कमजोरियां का फायदा उठाने को सदा तत्पर हैं।

जीवन में सिर्फ एक बात निश्चित है, और वह है मृत्यु। सब कुछ अनिश्चित है, संयोगिक है। मनुष्य तो यही चाहेगा कि मृत्यु अनिश्चित हो और बाकी सब सुनिश्चित हो। ज्योतिष जीवन को सुनिश्चित बनाने का मनुष्य का एक प्रयास है।

 

फिर अमरित की बूंद पड़ी - प्रवचन-04

मेरी दृष्टि सृजनात्मक है
दिनांक 4 अगस्त, सन् 1986;
प्रात: सुमिला, जुहू, बंबई।

मोरारजी सरकार से लेकर राजीव सरकार तक के आप केवल आलोचक ही बने रहे है। किंतु इस देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए आपके पास कोई विशेष दृष्टिकोण या उत्तर है?
इस देश की समस्याएं इस देश से बड़ी है। और आलोचना नकारात्मक नहीं है। वह समस्याओं को सुलझाने का विधायक रूप है। जैसे कि कोई सर्जन किसी के कैंसर का आपरेशन करे, तो क्या तुम उस आपरेशन को नकारात्मक कहोगे? दिखता तो नकारात्मक है, लेकिन वस्तुतः विधायक है। और इसके पहले कि कोई पुरानी इमारत गिरानी हो, नई इमारत खड़ी करनी हो, तो लोगों को सजग करना जरूरी है कि अब पुरानी इमारत के नीचे रहना खतरनाक है। वह जीवन को नष्ट कर सकती है।
मैंने अपने जीवन में किसी को कोई आलोचना नहीं की। लेकिन मजबूरी नहीं हूं। मेरी दृष्टि सृजनात्मक है। लेकिन बनाने के पहले मिटाना पड़ेगा ही। और हजारों वर्षों की सड़ी गली परंपराएं, अंध विश्वास, जो हमारी छाती पर सवार हैं और इस देश को आगे नहीं बढ़ने देते, जब तक हम उन्हें अलग नहीं कर देते तब तक देश में कोई विधायक, कोई सृजनात्मक, कोई निर्माण नहीं हो सकता।
समस्याएं इतनी है कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल है। मूल समस्याओं पर मैं चर्चा करूंगा। लेकिन ध्यान रहे, वह आलोचना नहीं है, नकारात्मक नहीं है। नहीं में मेरा विश्वास नहीं है। मैं तो हां को आस्तिकता कहता हूं।

फिर अमरित की बूंद पड़ी - प्रवचन-03

एक नया ध्रुवतारा
दिनांक 4 अगस्त, सन् 1986;
सुमिला, जुहू, बंबई।

मैं अभी—अभी आपके प्रश्नों को देख रहा था। यह जानकर दुखा होता है कि भारत की प्रतिभा ऐसी कीचड़ में गिरी है कि प्रश्न भी नहीं पूछ सकती। और जो प्रश्न पूछती भी है, वे सड़े—गले हैं, उनसे दुर्गंध उठती है। यदि तुम चाहते हो तो मैं जवाब दूंगा, लेकिन छाती पर हाथ रख लो, चोट पड़े तो परेशान मत होना। और जो मैं कहूं उसमें से एक भी शब्द काटा न जाए और जो मैं कहूं उसमें एक भी शब्द जोड़ा न जाए। ताकि तुम्हारी तस्वीर न केवल भारत के सामने बल्कि दुनिया के सामने स्पष्ट हो सके। प्रश्न भी पूछना मुश्किल है तो उत्तर तो तुम क्या समझ पाओगे। लेकिन मैं कोशिश करूंगा। शुरू करो।


दुनिया का सबसे अच्छा राष्ट्र कौन—सा है? और सबसे खराब राष्ट्र आप किसे मानते हैं?

भारत दोनों है, क्योंकि यहां मैं भी हूं और तुम भी हो। और भारत ने इस संसार में चेतना की ऊंचाइयां छुई हैं और अब मैं तुम्हें नालियों में पड़ा हुआ भी देख रहा हूं। और नालियों के तुम इतने आदी हो गए हो, तुमने उन्हें मंदिर बना लिया है। तुम उनसे निकलना भी नहीं चाहते!

फिर अमरित की बूंद पड़ी - प्रवचन-02

मैं जीवन सिखाता हूं
दिनांक 1 अगस्त 1986;
      प्रात: सुमिला, जुहू बंबई।

मैंने आज के लिए भेजे गए प्रश्न देखे; और उन्हें देखकर मुझे बड़ी शर्म आई। शर्म इस बात की कि भारत की प्रतिभा इतने नीचे गिर गई है कि यह कोई अर्थपूर्ण प्रश्न भी नहीं पूछ सकती। फिर अर्थपूर्ण उत्तरों की खोज करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। जो भी प्रश्न मुझे दिखाए गए वे सब सड़े गले हैं। पीली पत्रकारिता, जो तीसरे दर्जे की मनुष्यता की जरूरत पूरी करती है। उसमें मुझे कोई रस नहीं है।
यह अत्यंत प्रतिभा का देश है। मनुष्यता के इतिहास में यह देश उत्तुंग शिखर पर पहुंचा है—चेतना के हिमालय के शिखर। और अब लगता है कि हम इतने नीचे गिर गए हैं कि जब तक कोई प्रश्न किसी अमानवीय, कुरूप तत्व से संबंधित नहीं होता, तब तक किसी का उत्तर में रस नहीं होता।
मैं कोई राजनैतिक नहीं हूं। इसलिए जब कोई मुझसे प्रश्न पूछने की हिम्मत करे, तो ख्याल रखे कि मैं यहां कोई तुम्हें सांत्वना देने के लिए, या तुम्हारे मनचाहे उत्तर देने के लिए नहीं हूं। 

फिर अमरित की बूंद पड़ी - प्रवचन-01

मैं स्वतंत्र आदमी हूं
31 जुलाई 1986 प्रातः सुमिला, जुहू बंबई

बड़े दुख भरे हृदय से मुझे आपको बताना है कि आज हमारे पास जो आदमी है, वह इस योग्य नहीं है कि उसके लिए लड़ा जाए।
टूटे हुए सपनों, ध्वस्त कल्पनाओं और बिखरी हुई आशाओं के साथ मैं वापस लौटा हूं। जो मैंने देखा वह एक वास्तविकता है, और अपने पूरे जीवन भर जो कुछ मैं मनुष्य के विषय में सोचता रहा, वह केवल उसका मुखौटा था। मैं आपको थोड़े से उदाहरण दूंगा, क्योंकि यदि मैं अपनी पूरी विश्व यात्रा का वर्णन सुनाने लगूं तो इसमें करीब-करीब एक माह लग जाएगा। इसलिए कुछ महत्वपूर्ण बातें ही आपसे कहूंगा, जो कुछ संकेत दे सकें।

मुझसे पहले, पूरब से विवेकानंद, रामतीर्थ, कृष्णमूर्ति तथा सैकड़ों अन्य लोग दुनिया भर में गए हैं लेकिन उनमें से एक भी व्यक्ति पूरे विश्व द्वारा इस भांति निंदित नहीं किया गया जिस भांति मैं निंदित किया गया हूं; क्योंकि उन सभी ने राजनीतिज्ञों जैसा व्यवहार किया। जब वे किसी ईसाई देश में होते तो ईसाइयत की प्रशंसा करते और मुस्लिम देश में वे इस्लाम की प्रशंसा करते। स्वभावतः किसी ईसाई देश में यदि पूरब का कोई आदमी, जो कि ईसाई नहीं है, ईसा मसीह की गौतम बुद्ध की तरह प्रशंसा करता है तो ईसाई प्रसन्न होते हैं, अत्यंत प्रसन्न होते हैं। और इनमें से एक भी व्यक्ति ने पश्चिम के एक भी ईसाई को पूरब के जीवन दर्शन में, पूरब की जीवन-शैली में नहीं बदला। इसी दौरान पश्चिम से ईसाई मिशनरी यहां आते रहे और लाखों लोगों को ईसाई बनाते रहे।

फिर अमरित की बूंद पड़ी - भूमिका

(ओशो द्वारा मनाली ओर मुम्बई में दिये गये आठ अमृत प्रवचनो का संग्रह। जिसमें उन्होंने अमरीकी सरकार द्वारा दिये गये अत्याचारों की चर्चा है)

दुनिया में आज घोर निराशा की स्थिति है। एक ओर खाड़ी में बमों की बौछार हो रही है जिसे कोई नहीं रोक पा रहा है। दूसरी ओर पूरे विश्व में आतंकवाद इतना आम है कि रोजमर्रा की घटना हो गया है। ऐसे माहौल में अमृत की चर्चा अमृत की बूंदों की वर्षा इस दुनिया की बात नहीं लगती है। नहीं लगता कि यह दुनिया रूपांतरित हो सकती है या इसे कोई बदल कर अमृत-पथ की ओर ले जा सकता है।

एक मित्र ने ओशो से पूछा. विवेकानंद ने कहा था कि अगर उनके पास अपने दो सौ व्यक्ति हों तो वे सारे जगत को रूपांतरित कर देंगे। आपने इस विषय में कहा था कि विवेकानंद की मृत्यु निराशा में हुई। लेकिन आपकी पहुंच चारों ओर है आप झांक सकते हैं आंखों में और खींच सकते हैं उन सूक्ष्म आत्माओं को जो प्रकाश-किरण बन सकती हैं। आपको इसमें कहा तक सफलता मिली है?

अंतर की खोज-प्रवचन-01

एक छोटी सी घटना से मैं आज की चर्चा शुरू करूंगा।

एक गांव में एक अपरिचित फकीर का आगमन हुआ था। उस गांव के लोगों ने शुक्रवार के दिन, जो उनके धर्म का दिन था, उस फकीर को मस्जिद में बोलने के लिए आमंत्रित किया। वह फकीर बड़ी खुशी से राजी हो गया। लेकिन मस्जिद में जाने के बाद, जहां कि गांव के बहुत से लोग इकट्ठा हुए थे, उस फकीर ने मंच पर बैठ कर कहा: मेरे मित्रो, मैं जो बोलने को हूं, जिस संबंध में मैं बोलने वाला हूं, क्या तुम्हें पता है वह क्या है? बहुत से लोगों ने एक साथ कहा: नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं है। वह फकीर मंच से नीचे उतर आया और उसने कहा: ऐसे अज्ञानियों के बीच बोलना मैं पसंद न करूंगा, जो कुछ भी नहीं जानते। जो कुछ भी नहीं जानते हैं उस विषय के संबंध में जिस पर मुझे बोलना है, उनके साथ कहां से बात शुरू की जाए?इसलिए मैं बात शुरू ही नहीं करूंगा। वह उतरा और वापस चला गया।



वह सभा, वे लोग बड़े हैरान रह गए। ऐसा बोलने वाला उन्होंने कभी देखा न था। लेकिन फिर दूसरा शुक्रवार आया और उन्होंने जाकर उस फकीर से फिर से प्रार्थना की कि आप चलिए बोलने। वह फकीर फिर से राजी हो गया और मंच पर बैठ कर उसने फिर पूछा, मेरे मित्रो, मैं जिस संबंध में बोलने को हूं, क्या तुम्हें पता है वह क्या है? उन सारे लोगों ने कहा: हां, हमें पता है। क्योंकि नहीं कह कर वे पिछली दफा भूल कर चुके थे। उस फकीर ने कहा: तब फिर मैं नहीं बोलूंगा, क्योंकि जब तुम्हें पता है तो मेरे बोलने का कोई प्रयोजन नहीं। जब तुम्हें ज्ञात ही है तो ज्ञानियों के बीच बोलना फिजूल है। वह उतरा और वापस चला गया।


रविवार, 12 अगस्त 2018

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 11

भगवान, गौतम बुद्ध के साथ धर्म ने एक बहुत बड़ी छलांग, ‘क्वांटम लीप’ ली; परमात्मा निरर्थक हो गया, ध्यान सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। अब बुद्ध के पश्चात, पच्चीस सदियों के बाद, धर्म पुनः एक बार आपकी उपस्थिति में वैसी ही छलांग ले रहा है, और धार्मिकता बन रहा है।   इस घटना को समझाने की अनुकंपा करें।
धर्म की छलांग, यह ‘क्वांटम लीप’ गौतम बुद्ध से भी पच्चीस सदियों पहले एक बार लगी थी, और उसका श्रेय आदिनाथ को मिलता है। उन्होंने पहली बार अनीश्वरवादी धर्म की देशना दी। यह एक बहुत बड़ी क्रंाति थी क्योंकि पूरे जगत में इसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी कि ईश्वर के बिना भी धर्म हो सकता है। ईश्वर सभी धर्मों का आवश्यक अंग, एक केंद्रीय तत्व रहा है- ईसाइयत, यहूदी धर्म, इस्लाम सभी का।  लेकिन ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाने से मनुष्य सिर्फ एक परिधि हो जाता है। ईश्वर को यदि इस सृष्टि का स्रष्टा माना जाए तो मनुष्य सिर्फ एक कठपुतली हो जाता है। इसलिए हिबू्र भाषा में, जो कि यहूदी धर्म की भाषा है, मनुष्य को आदम कहा जाता है। अदम यानी कीचड़। इस्लाम धर्म की जो अरेबिक भाषा है, उसमें मनुष्य को आदमी कहा जाता है, जो कि आदम शब्द से बना है। उसका अर्थ फिर कीचड़ होता है। अंगरेजी में जो कि ईसाई धर्म की भाषा बनी, जो शब्द है ‘ह्यूमन’ वह ह्यूमस से आता है; और ह्यूमस यानी मिट्टी।  स्वभावतः परमात्मा अगर स्रष्टा है, तो उसे कुछ तो बनाना चाहिए। जैसे मूर्ति बनाते हैं वैसे उसे मनुष्य को बनाना चाहिए।

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 10

भगवान, ओरेगान के कम्यून के निर्माण-काल में आपने मौन व्रत लिया हुआ था; फिर कम्यून के निर्माण कार्य में आप सहभागी कैसे हुए? और इस किस्म का कम्यून किसकी जरूरत है- आपकी, आपके शिष्यों की, या बृहत समाज की? 
पहली बात, मैं उसमें किसी भी तरह भागीदार नहीं था। इसे समझाना जरा कठिन होगा कि बिना भाग लिए भी चीजें संभव हैं।  उदाहरण के लिए, सुबह सूरज उगता है, पक्षी गीत गाने लगते हैं- सूरज उसमें सहभागी नहीं है। वह किसी भांति कोई कृत्य नहीं कर रहा है, पक्षियों को गाने के लिए प्रवृत्ति नहीं कर रहा है। फूल खिलते हैं- सूरज सहभागी नहीं है।  तो मैं कहूंगा कि मैं जरा भी सहभागी नहीं था, वह समक्रमिकता थी। मैं वहां उपस्थित था। और मेरे मौन में तो यह उपस्थिति और भी सघन थी। और मेरी उपस्थिति ने कम्यून निर्मित करने में मेरे लोगों की मदद की।  कम्यून के बारे में मैं वर्षों चर्चा करता रहा हूं। उसको मैंने पूरी दृष्टि दी है, लेकिन जब वह निर्मित हो रहा था तब मैं उसमें कोई सक्रिय भाग नहीं लिया। मैं सिर्फ एक उपस्थिति था।  तो मैं सहभागिता शब्द का उपयोग नहीं कर सकता, लेकिन मैं समक्रमिकता शब्द का उपयोग कर सकता हूं।

और शह शब्द कई तरह से अर्थपूर्ण है। वह कई नए द्वार खोलता है, कई नए अर्थ प्रकट करता है। यह हो सकता है कि बिना एक शब्द कहे बिना किसी आंख में झांके; और उसने एक शब्द भी न सुना हो, फिर भी बहुत कुछ संक्रमित हो गया हो। न मैंने कुछ कहा, न उसने कुछ सुना, लेकिन फिर भी कुछ घटा।  प्राचीन भारत में हम इसको सत्संग कहते थे। गुरु केवल उपस्थित होगा, लोग उसके निकट बैठेंगे, और उसके भीतर से झरता हुआ मौन उनके हृदय को रूपांतरित करने लगेगा, उनकी आत्मा की पंखुड़ियों को खोलेगा। हमने इसे जाना है। हमने इसका कई प्रकार से उपयोग किया है।  सत्संग जैसा ही शब्द है, दर्शन। कोई गुरु के दर्शन करने जाता है। अब गुरु को देखने का क्या मतलब है? पश्चिम अब तक इसे समझ नहीं सका कि इसका मूल्य क्या है- गौतम बुद्ध को सिर्फ देखने जाना, जब कि वे कुछ बोलते नहीं, कहते नहीं, करते नहीं; जब तक कि किसी प्रकार का संवाद न हो, उन्हें सिर्फ देखने में क्या सार है? तुम उनका चित्र देख सकते हो, उनकी मूर्ति देख सकते हो।

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 9

प्यारे भगवान, रजनीश टाइम्स परिवार तथा रजनीशधाम नव संन्यास कम्यून के प्रत्येक सदस्य की ओर से बधाई। भारत तथा विदेश में बहुत से संन्यासी ऐसे हैं जिन्होंने आपको कभी नहीं देखा परंतु आपके प्रति उनका प्रेम एवं आपकी दृष्टि के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रेरणा दायक है। यह कैसे घटित होता है, इतना प्रेम, इतनी श्रद्धा? 
वस्तुतः यह आसान है अगर तुमने मुझे न देखा हो और फिर भी प्रेम घटित हुआ हो। यह प्रतिबद्धता कहीं ज्यादा शुद्ध, ज्यादा बेशर्त, ज्यादा अवैयक्तिक होगी। मुझे देखना, मेरे साथ होना और फिर भी मुझसे प्रेम करना कठिन बात है।  कारण यह है कि हमारे मन का इस ढंग से पालन-पोष्ण हुआ है कि हम हमेशा आकांक्षाओं से भरे हैं। अगर मैं तुम्हारी आकांक्षाओं की पूर्ति करता हूं। तुम्हारी श्रद्धा डावांडोल होने लगती है। और जहां तक मेरा संबंध है, मैं तुम्हारी आकांक्षाओं के पूरा नहीं कर सकता। यदि मैं तुम्हारी आकांक्षाओं को पूरा करता चलूं, तब मैं तुम्हारे विकास में मदद करने वाला न रहा। कोई द्वार नहीं खुलता। मैं यहां तुम्हारे मन को सहारा देने के लिए नहीं हूं। इसे आत्यंतिक ऊंचाई तक ले चलने के लिए मैं यहां हूं। लेकिन तुम्हारी आकांक्षाएं ही समस्या है।

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 8

रजनीशपुरम के कम्यून के असफल हो जाने के बाद अब कम्यून के भविष्य के संबंध में आपके क्या विचार हैं? 
पहली बात, वह असफल नहीं हुआ। क्या तुम सोचते हो कि सुकरात को जहर देकर मार डालना सुकरात और उसके दर्शन की असफलता थी? वस्तुतः वह तो उस आदमी की परम विजय थी। उसने सिद्ध कर दिया, एक अकेला आदमी और उसका सत्य, समाज और उसकी ताकत, उसकी संपदा, जनसंख्या, फौजें- इन सबसे शक्तिशाली है। वे लोग उस आदमी के साथ सिर्फ एक बात कर सकेः वे उसकी हत्या कर सके। लेकिन मनुष्य की हत्या करने से सत्य की हत्या नहीं होती। वस्तुतः उल्टे सुकरात को मारकर उन्होंने उसके सत्य को अमर कर दिया है।  क्या तुम सोचते हो कि जीसस की सूली उनकी असफलता था? यदि जिस को सूली नहीं दी जाती तो ईसाइयत पैदा ही नहीं होती। उनको दी गई सूली ही, उनकी महिमा को उच्चतम शिखर पर ले जाती है।  तो मैं नहीं मानता कि अमेरिका में कम्यून का नष्ट होना उसकी असफलता है; वह सफल हुआ है। हम कई चीजें सिद्ध करने मग सफल रहे हैं।  हम यह सिद्ध करने में सफल हुए कि विश्व की सब से बड़ी रा य-सत्ता भी एक छोटे से कम्यून से डरती है, जिसके पास प्रेम के अलावा और कोई ताकत नहीं है। इसका मतलब हुआ, प्रेम ताकत से अधिक ताकतवर है।

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 7

भगवान, लंबे अनुभव से यही दिखाई देता है कि ऋषियों का तथा बुद्धपुरुषों का संदेश हमेशा गलत समझा जाता है या उपेक्षित रह जाता है। क्या इसका यह अर्थ है कि अपनी भूलों के कारण मनुष्यता अनंत काल तक दुख झेले, यही उसकी नियति है?

 मैं निराशावादी नहीं हूं। मैं आशा के विपरीत आशा करता हूं। और यह प्रश्न भी कुछ उसी प्रकार का है।  प्रज्ञापुरुष के, बुद्धपुरुष के रास्ते में अपरिसीम कठिनाइयां होती हैं।  पहलीः उसकी अनुभव मन की निर्विचार स्थिति में घटता है। तो जब वह उसे लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करता है, तो मजबूरन उसे शब्दों का उपयोग करना पड़ता है। सौ बुद्धपुरुषों में से निन्यानबे चुप रहे हैं; क्योंकि जैसे ही तुम निःशब्द अनुभव को शब्दों में ढालते हो, तो उसकी आत्मा खो जाती है। फर्क यह है कि तुम एक सुंदर पक्षी को खुले आकाश में उड़ते हुए देखते हो; वह इतना सुंदर दृश्य होता है- उसकी स्वतंत्रता वह खुला आकाश, वह अनंतता! और फिर तुम उस पक्षी को पकड़कर सोने के पिंजरे में रखते हो, जो कि बेशकीमती होता है। एक तरह से वह वही पक्षी है, लेकिन फिर भी वही नहीं है। उसका आकाश कहां गया? उसके पंख कहां है? उसकी स्वतंत्रता कहां गई?

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 6

भगवान श्री, भारत में जनसंख्या के कारण गरीबी बढ़ती जा रही है और गरीबी के कारण जनसंख्या। यदि दोनों एक दूसरे से बढ़कर। मौजूदा हालात में जनसंख्या को कंट्रोल में कैसे लाया जाए, बल्कि परिवार नियोजन को यहां स्वैच्छिक रूप से ही अपनाया जाता है? कृपया अपनी ओर से कुछ सुझाव दें।  
यह इतनी बड़ी समस्या है, जितनी दिखाई पड़ती है। जनसंख्या अपने आप नहीं बढ़ती हैं और गरीबी उसका स्वाभाविक परिणाम होता है।  पहली बात, जो भारत की चेतना में प्रविष्ट हो जानी चाहिए, वह यह है कि जनसंख्या बढ़ती नहीं है, हम बढ़ाते हैं। गरीबी पढ़ती नहीं, हमारी सृष्टि है। और हमने सदियों तक गलत विचारों के अंतर्गत जीना सीखा है। जैसे, हमें बताया गया है कि बच्चे भगवान की देन हैं। यह भी समझाया गया है कि बच्चे प्रत्येक के भाग्य में लिखे हैं। और धर्मगुरु यह भी समझा रहे हैं सदियों से कि बच्चों को रोकना, पैदा होने से, ईश्वर का विरोध है। इन सब बातों का एक ही अर्थ होता है कि जैसे ईश्वर को एक ही काम है, और वह है कि लोग कैसे ज्यादा से ज्यादा गरीब हों। जो कि ईश्वर शब्द के बिल्कुल विपरीत है। ईश्वर शब्द का मूल उदगम ही ऐश्वर्य है।

ऐश्वर्य से ही ईश्वर शब्द बना है। तो ऐश्वर्य से गरीबी बढ़ती हो, ईश्वर गरीबी बढ़ाता हो, यह बात सिर्फ पंडितों-पुरोहितों, धर्मगुरुओं, राजनीतिज्ञों- उन सारे लोगों की गढ़ी हुई बातें हैं, जो गरीबों के शोषण पर ही जी रहे हैं।  जब तक भारत के मानस से हम पर्दा नहीं हटा देते हैं कि परमात्मा का तुम्हारी गरीबी में कोई हाथ नहीं है...। और परमात्मा ही क्या जो तुम्हें गरीब बनाना चाहे। लेकिन, धर्मगुरु, जैसे जीसस चिल्ला-चिल्ला कर लोगों से कह रहे हैं कि धन्यभागी है वे, जो गरीब हैं। इससे गरीब को थोड़ी देर के लिए सांत्वना तो मिल जाती है, जैसे चिंताओं में डूबे हुए आदमी को अफीम खा लेने से थोड़ी देर को राहत मिल जाती हो, लेकिन गरीबी नहीं मिटती, और न ही चिंताएं मिटती हैं। और अगर गरीबी धन्यता है, तो फिर गरीबी को वरण करना चाहिए, विनष्ट करने का तो सवाल ही कहां उठता है? जो गरीब नहीं हैं, उनको भी गरीब बना देना चाहिए, क्योंकि वे बेचारे क्यों धन्यता से अभागे रहें।  महात्मा गांधी गरीबों को कहते दरिद्र नारायण, ये परमात्मा के रूप हैं, ईश्वर की संतान हैं।  इन सारी बातों से गरीबों को थोड़ी देर के लिए राहत मिलती है, अगर उनके जीवन की असली समस्या का कोई हल नहीं होता। और राहत देने वाले, असली समस्या के हल होने में बाधा बनते हैं।

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 5

आज के मनुष्य के लिए आपका क्या संदेश है?  
मनुष्य-जाति का इतिहास हजारों वर्षों का है और मनुष्य ने कुछ गलत विचार, कुछ गलत किस्म की धारणाएं, अंधविश्वास बना लिए हैंः और वही बातें उसकी हड्डी, रक्त मांस-म जा बन गयी हैं।  यह बात बिल्कुल भुला ही दी गयी है कि एक बच्चा न तो हिंदू के रूप में पैदा होता है, न ही मुसलमान के रूप मग पैदा होता है, न ही भारतीय के रूप में और न ही अमेरीकी के रूप में। हम हजारों वर्षों की जानकारियां बच्चों में भर देते हैं, उन्हें उन में संस्कारित कर देते हैं, और नष्ट कर देते हैं उनकी निर्दोष्तिा। और जिस क्षण कोई बच्चा अपनी निर्दोष्तिा खो देता है, वह अर्थहीन जीवन जीने लगता है। वह स्वयं नहीं हो सकता, वह बिल्कुल भूल ही जाता है कि वह कौन है, और वह ऐसी विचारधाराओं द्वारा भर दिया जाता है, जो उसकी अपनी होती ही नहीं।  सह स्कीजोफ्रेनिया, यह खंडित होने की स्थिति ही मनुष्य-जाति की मौलिक समस्या हैः और मेरा मौलिक संदेश यही हो सकता है कि इस स्थिति के स्वरूप को, इसके पूरे वातावरण को मिटा दो। प्रत्येक बच्चे को अपनी निर्दोष्तिा में ही विकसित होने देना है।

फिर पत्तों की पाजेब बजी - 4

सब प्रश्नों का एक उत्तरः ध्यान भगवान, विश्व भर में आपके संन्यासी और प्रेमी आपके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित हैं। अब आप कैसे हैं।  मेरा स्वास्थ्य ठीक है। उन्होंने मुझे नुकसान पहुंचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन्हें इसमें सफलता न मिल सकी। दो कारण से; पहला कारण तो यह रहा कि जिन लोगों को उन्होंने नियुक्त किया था मुझे तकलीफ देने के लिए, छिपे-छिपे ढंग से ऐसी स्थितियां बनाने के लिए जिनके द्वारा मुझे पीड़ित किया जाए, वे लोग जल्दी ही मेरे प्रेम में पड़ गये। वे मुझसे कहने लगे, इस तरह का काम तो हम नहीं कर सकते।  एक जेल में तो खास तौर से ऐसा हुआ, उसे जेल का शेरिफ, उप शेरिफ, डॉक्टर, नर्सें और सारे कैदी व वहां नियुक्त तमाम व्यक्ति- तीन सौ साठ व्यक्ति- वह तो करीब-करीब कम्यून बन गया। छः दिन तक मैं वहां था, और जेल का सारा वातावरण ही बदल गया।  वे शेरिफ वृद्ध था, और वह मुझसे कहने लगा, ‘ऐसा पहली बार हुआ है और शायद अंतिम बार ही होगा कि आप जैसा व्यक्ति इस जेल में आया।

हमने कभी इतनी शंाति महसूस नहीं की; हमारे यहां के अपराधी भी इतने शांत कभी नहीं हुए। हमारे सारे कर्मचारी इस भंाति आपके प्रेम में पड़ गये हैं कि चाहते ही नहीं कि आप यहां से छूट कर चले जाएं। वे चाहते हैं, आप यहीं रहें।  हेड नर्स बोली, ‘कल हम आपको देखना चाहेंगे और फिर हम आपको कितना याद करेंगे।’ व्यक्ति तो व्यक्ति है। बस, यदि तुम में भरपूर प्रेम है, तो तुम उनके हृदय एकदम सहज ही बदल सकते हो। इसलिए एक कारण यह भी था जो वे मुझे नुकसान नहीं पहुंचा सके।  दूसरा कारण था, प्रेस की स्वतंत्रता, असीम स्वतंत्रता। सारी विश्व-प्रेस, सिवाय भारत की प्रेस के, मुझ पर केंद्रित थी। प्रत्येक जेल, जहां भी मैं था, हैरान थे, यह हो क्या गया है! चैबीसों घंटे टेलीफोन बज रहे थे, हजारों तार, विश्व के हर कोने से हजारों फूल पहुंच रहे थे!  यदि इतने लोग इस आदमी के प्रेम में हैं, जरूर कहीं कोई गलती हो गई होगी।  और प्रेस के लोग निरंतर हर जेल के बाहर थे- अपने हैलीकाप्टरों में, अपने कैमरे साथ लिए। फाटकों पर कैमरे टिके थे, वृक्षों में कैमरे लगे थे। उन्होंने बारह दिन में कभी मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ा। और एक जेल से दूसरे जेल तक मुझे जो जाना पड़ा। मुझे कम से कम दरवाजे के बाहर तो आना होता था, उन क्षणों में भी वे मुझसे पूछ लेते, ‘क्या वे आपको बहुत तकलीफ पहुंचा रहे हैं? आपका मात्र एक शब्द और सारा संसार अमेरिका के असली फासिस्ट चेहरे को जान पाएगा।  प्रेस से भयभीत होने के कारण वे बहुत कुछ न कर सके।  तो, मेरा स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है।