शनिवार, 7 जुलाई 2018

आठ पहर यूं झूमते-प्रवचन-07

एक फकीर के पास तीन युवक आए और उन्होंने कहा कि हम अपने को जानना चाहते हैं। उस फकीर ने कहा कि इसके पहले कि तुम अपने को जानने की यात्रा पर निकलो, एक छोटा सा काम कर लाओ। उसने एक-एक कबूतर उन तीनों युवकों को दे दिया और कहा, ऐसी जगह में जाकर कबूतर की गर्दन मरोड़ डालना जहां कोई देखने वाला न हो।
पहला युवक रास्ते पर गया--दोपहर थी, रास्ता सुनसान था, लोग अपने घरों में सोये थे--देखा कोई भी नहीं है, गर्दन मरोड़ कर, भीतर आकर गुरु के सामने रख दिया। कोई भी नहीं था, उसने कहा, रास्ता सुनसान है, लोग घरों में सोये हैं, किसी ने देखा नहीं, कोई देखने वाला नहीं था।

दूसरे युवक ने सोचा कि अगर रास्ते पर गर्दन मरोडूंगा, पता नहीं कोई बीच में निकल आए, कोई खिड़की से झांक ले। वह एक गली में गया। लेकिन अभी दिन था, उसने सोचा रात तक रुक जाऊं, पता नहीं कोई एकदम से गली में आ जाए, जहां मैं आ सका हूं वहां कोई दूसरा भी आ सकता है। उसने रात तक प्रतीक्षा की, जब अंधेरा हो गया तो उसने गर्दन मरोड़ी और गुरु के पास जाकर दे दिया।

लेकिन तीसरे युवक को पंद्रह दिन हो गए। वह अभी भी नहीं लौटा, अभी भी नहीं लौटा...। दोनों युवकों को खोजने भेजा। वे कहीं से उसे पकड़ कर लाए। वह बड़ी मुश्किल में था। वह अंधेरी रात में भी गया था। अंधेरी रात, गहरे से गहरे अंधेरे में भी बहुत कुछ था जो उसे देख रहा था। चांदत्तारे देख रहे थे। तो उसने सोचा कि नीचे एक तलघर में चला जाऊं। वह एक तलघर में गया। वहां चांदत्तारे तो न थे, लेकिन जब गहरे अंधेरे में जाकर उसने कबूतर की गर्दन पर हाथ रखा, तो कबूतर देख रहा था, उसकी दो आंखें चमक रही थीं। तो उसने फिर कबूतर की आंखें बांध दीं, ताकि कबूतर न देख सके। और जब वह उसकी गर्दन को मरोड़ रहा था, तब उसे खयाल आया--गहन अंधकार था, कोई भी न था, कबूतर की आंखें बंद थीं--लेकिन उसे खयाल आया कि मैं तो देख ही रहा हूं, और गुरु ने कहा था: कोई भी न देखता हो। तब वह मुश्किल में पड़ गया। और जब उसके साथी उसे पकड़ कर लाए तो उसने कबूतर वापस लौटा दिया। और उसने कहा, यह न हो सकेगा। क्योंकि मैं कितने ही अंधकार में चला जाऊं, कोई न देखे, कम से कम मैं तो देखूंगा! और आपने कहा था, जहां कोई भी न देखता हो।
तो उस गुरु ने दो युवकों को तो विदा कर दिया कि तुम जाओ, तुम बहुत गहरी खोज न कर सकोगे। तीसरे युवक को रोक लिया, क्योंकि एक बहुत गहरे अनुभव पर वह पहुंचा था--कि गहनतम अंधकार में भी मैं तो शेष रह ही जाता हूं देखने वाला।
समाधि का भी पहला चरण गहन अंधकार है। क्योंकि जब सब तरफ अंधेरा हो जाता है तो चेतना को बाहर जाने का उपाय नहीं रहता, चेतना अपने पर वापस लौट आती है। इसीलिए तो रात हम सोते हैं, अगर प्रकाश हो तो नींद में बाधा पड़ती है, क्योंकि चेतना को बाहर जाने के लिए मार्ग होता है। अंधकार हो तो चेतना अपने पर वापस लौट आती है। अंधकार में मार्ग नहीं है किसी और को देखने का, इसलिए अपने को ही देखने की एकमात्र शेष संभावना रह जाती है।
पर अंधकार के प्रति हमारा भय है। इसलिए हम अंधेरे में कभी भी नहीं जीते। अंधेरा हुआ कि हम फिर सो जाएंगे। उजाला हो तो हम जी सकते हैं। इसलिए पुरानी दुनिया सांझ होते सो जाती थी, क्योंकि उजाला न था। अब नई दुनिया के पास उजाला है कि वह रात को भी दिन बना ले, तो अब दो बजे तक दिन चलेगा। बहुत संभावना है कि धीरे-धीरे रात खतम ही हो जाए, क्योंकि हम प्रकाश पूरा कर लें। अंधेरे में फिर हमें सोने के सिवाय कुछ भी नहीं सूझता, क्योंकि कहीं जाने का रास्ता नहीं रह जाता। लेकिन काश हम अंधेरे में जाग सकें, तो हम समाधि में प्रवेश कर सकते हैं।
तो पहले पांच मिनट हम गहन अंधकार में डूबेंगे। एक ही भाव रह जाए मन में कि अंधकार है, अंधकार है, चारों तरफ अंधकार है। सब तरफ अंधकार घिर गया और हम उस अंधकार में डूब गए, डूब गए, डूब गए। पूर्ण अंधकार रह गया है और हम हैं, और अंधकार है। तो पांच मिनट पहले इस अंधकार के प्रयोग को करेंगे। फिर मैं दूसरा प्रयोग समझाऊंगा। फिर तीसरा। और अंत में तीनों को जोड़ कर फिर हम ध्यान के लिए, समाधि के लिए बैठेंगे।
तो सबसे पहले तो एक-दूसरे से थोड़ा-थोड़ा फासले पर हट जाएं। चिंता न करें बिछावन की, अगर नीचे भी बैठ जाएंगे तो उतना हर्ज नहीं है जितना कोई छूता हो। क्योंकि कोई छूता हो तो कोई मौजूद रह जाएगा, अंधेरा पूरा न हो पाएगा। तो बिलकुल कोई न छूता हो। और इसका भी खयाल न रखें कि दूसरा हट जाए। दूसरा कभी नहीं हटेगा; स्वयं को ही हटना पड़ेगा। तो हट जाएं, चाहे जमीन पर चले जाएं, चाहे पीछे हट जाएं। लेकिन कोई किसी को किसी भी हालत में छूता हुआ न हो। और इतने धीरे न हटें, जमीन पर बैठ गए तो क्या हर्जा हुआ जाता है! बिलकुल सहजता से हट जाएं। एक भी व्यक्ति छूता हुआ न हो।
मैं मान लूं कि आप हट गए हैं, कोई किसी को नहीं छू रहा है। अगर अब भी कोई छू रहा हो तो उठ कर बाहर आ जाए और अलग बैठ जाए।
अब आंख बंद कर लें। आंख बंद कर लें। आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। शरीर ढीला छोड़ दिया है, आंख बंद कर ली है। और देखें भीतर, अनुभव करें--अंधकार, महा अंधकार है...विराट अंधकार फैल गया है...चारों तरफ सिवाय अंधकार के और कुछ भी नहीं। अंधकार है...अंधकार है...। बस एकदम अंधकार ही अंधकार है। जहां तक खयाल जाता है, अंधकार...अंधकार...अंधकार...। पांच मिनट के लिए इस अंधकार में डूबते जाएं। बस अंधकार ही शेष रह जाए। छोड़ दें अपने को अंधकार में। और पांच मिनट के अंधकार का अनुभव मन को बहुत शांत कर जाएगा। समाधि की पहली सीढ़ी खयाल में आ जाएगी। मृत्यु की भी पहली सीढ़ी खयाल में आ जाएगी।
अनुभव करें अंधकार का, बस अंधकार ही अंधकार है चारों ओर, सब तरफ मन को घेरे हुए अंधकार है, दूर-दूर तक घनघोर अंधकार है। कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता, कुछ भी नहीं सूझता, हम हैं और अंधकार है। पांच मिनट के लिए मैं चुप हो जाता हूं। आप गहरे अंधकार को अनुभव करते हुए, करते हुए अंधकार में डूब जाएं...
बस अंधकार शेष रह गया है...अंधकार और अंधकार, महा अंधकार, सब अंधेरा हो गया है...कुछ भी नहीं सूझता, अंधकार है, जैसे अंधेरी रात ने चारों ओर से घेर लिया...मैं हूं और अंधकार है...
अंधकार ही अंधकार है...डूब जाएं...छोड़ दें...बिलकुल अंधेरे में डूब जाएं। अंधकार ही अंधकार शेष रह गया...अंधकार है, बस अंधकार है, अंधकार ही अंधकार है...अनुभव करते-करते मन बिलकुल शांत हो जाएगा...अंधकार ही अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...मन शांत होता जा रहा है। मन बिलकुल शांत हो जाएगा। अंधकार ही अंधकार है...छोड़ दें अपने को, अंधकार में बिलकुल छोड़ दें...अंधकार ही अंधकार है...बस अंधकार ही अंधकार है...छोड़ दें अंधकार में, महान अंधकार चारों ओर रह गया। मैं हूं और अंधकार है। न कुछ दिखाई पड़ता, कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, बस अंधकार ही अंधकार मालूम होता है...डरें नहीं, छोड़ दें, बिलकुल छोड़ दें। अंधकार ही अंधकार शेष रह गया है। और मन एकदम शांत हो जाएगा। अंधकार परम शांतिदायी है। मन का कण-कण शांत हो जाएगा। मस्तिष्क का कोना-कोना शांत हो जाएगा।
अंधकार में डूब जाएं, अंधकार ही अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...मन बिलकुल शांत हो गया है, मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया है...अंधकार ही अंधकार है...चारों ओर अंधकार है...मैं हूं और अंधकार है...कुछ भी नहीं सूझता, कोई और दिखाई नहीं पड़ता, अंधकार है...अंधकार है...। मन शांत हो गया है, मन बिलकुल शांत हो गया है...
अब धीरे-धीरे आंखें खोलें...बाहर भी बहुत शांति मालूम पड़ेगी। धीरे-धीरे आंखें खोलें...फिर दूसरा प्रयोग समझें, और उसे पांच मिनट के लिए करें। समाधि की पहली सीढ़ी है अंधकार का बोध। धीरे-धीरे आंख खोलें...बाहर भी बहुत शांति मालूम पड़ेगी।
अब दूसरा चरण समझ लें। फिर पांच मिनट उसे हम करेंगे। जब कोई मरता है तो गहन अंधकार में चारों ओर से घिर जाता है। मृत्यु के पहले चरण पर अंधकार घेर लेता है। वह सारा जगत जो दिखाई पड़ता था, खो जाता है। वे सब प्रियजन, मित्र, अपने, पराये, वे जो चारों तरफ थे, सब खो जाते हैं और एक अंधकार का पर्दा चारों तरफ से घेर लेता है। लेकिन हम अंधकार से इतना डरते हैं कि उस डर के कारण बेहोश हो जाते हैं। काश हम अंधकार को भी प्रेम कर पाएं, तो फिर मृत्यु में बेहोश होने की जरूरत न रह जाए। और समाधि में जिन्हें जाना है उन्हें अंधकार को प्रेम करना सीखना पड़े, अंधकार को आलिंगन करना सीखना पड़े, अंधकार में डूबने की तैयारी दिखानी पड़े। इसलिए पहले चरण में पांच मिनट अंधकार को अपने चारों ओर घिरा हमने देखा। अब दूसरी बात समझ लेनी चाहिए। मृत्यु का या समाधि का दूसरा चरण है: एकाकीपन का बोध, मैं अकेला हूं। मृत्यु के दूसरे चरण में अंधकार के घिरते ही पता चलता है कि मैं अकेला हूं। कोई भी मेरा नहीं, कोई भी संगी नहीं, कोई भी साथी नहीं। लेकिन जीवन भर हम इसी ढंग से जीते हैं कि लगता है--सब हैं मेरे--मित्र हैं, प्रियजन हैं, अपने हैं। अकेला हूं, इसका कभी खयाल भी नहीं आता। अगर खयाल आए भी तो जल्दी किसी को अपना बनाने निकल पड़ता हूं, ताकि अकेलेपन का खयाल न आए। बहुत कम लोग, बहुत कम क्षणों पर, अकेले होने का अनुभव कर पाते हैं। और जो मनुष्य अकेले होने का अनुभव नहीं कर पाता, वह अपना अनुभव भी नहीं कर पाएगा। जो व्यक्ति निरंतर ऐसा ही सोचता है कि दूसरों से जुड़ा हूं, दूसरों से जुड़ा हूं--दूसरे हैं, संगी हैं, साथी हैं--उसकी नजर कभी अपने पर नहीं जा पाती है।
मृत्यु का भी दूसरा अनुभव जो है वह अकेले का अनुभव है। इसलिए मृत्यु हमें बहुत डराती है। क्योंकि जिंदगी भर हम अकेले न थे, और मृत्यु अकेला कर देगी। असल में मृत्यु का डर नहीं है, डर है अकेले होने का।
अभी भी अकेले होकर हम डरते हैं। कोई साथ हो तो डर नहीं है। और मजा यह है कि दो आदमी साथ हैं, वे दोनों अकेले में डरते हैं, दोनों मिल जाएंगे तो डर दुगुना होगा कि आधा होगा? दो आदमी, दोनों अकेले में डरते हैं, लेकिन दोनों मिल कर सोचते हैं कि दूसरा है, डर नहीं है। दूसरा भी सोचता है: दूसरा है, डर नहीं है।
डर सिर्फ दुगुना हो गया है। लेकिन एक-दूसरे के साथ हम सोच लेते हैं। आदमी अंधेरी गली में से निकलता है तो डरता है, तो जोर से गीत गाने लगता है, भगवान का नाम लेने लगता है। अपनी ही आवाज सुन कर भी ऐसा लगता है कोई है। अकेले का भय है। लेकिन जो अकेले होने को राजी नहीं,टोटलीअलोन, वह समाधि में नहीं जा सकता। क्योंकि समाधि में कौन साथ देगा? पत्नी कैसे समाधि में साथ देगी? बेटा कैसे साथ जाएगा?पति कैसे साथ जाएगा? गुरु कैसे साथ जाएगा? दोस्त कैसे साथ जाएगा? समाधि में तो कोई भी नहीं जाएगा। समाधि में तो बिलकुल अकेले जाना होगा।
इसलिए जो जितना एक्सट्रोवर्ट है, जो अपने से बाहर के लोगों से जितना जोड़े रखता है अपने को, कभी अकेला नहीं होता, वह आदमी समाधि में पहुंचने में उतनी ही मुश्किल अनुभव करता है। अगर कभी हम अकेले छूट भी जाएं सौभाग्य से, तो जल्दी से अपने को भर लेते हैं। रेडियो खोल लेंगे, अखबार पढ़ने लगेंगे--कुछ न कुछ करने लगेंगे--सिगरेट पीने लगेंगे। ये सिर्फ अकेलेपन से बचने के उपाय हैं। यहां तक कि लोग अकेले हैं, बैठ कर ताश खेलने लगेंगे, अकेला ही आदमी दोनों तरफ से बाजियां चलने लगेगा, दूसरे को कल्पित कर लेगा कि कोई है।
अकेले होने से हम इतने भयभीत हैं, तो फिर हम समाधि में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। और अकेले होने का सौंदर्य अदभुत है। मेरा मतलब यह नहीं है कि कोई समाज से भाग जाए। समाज से जो लोग भाग जाते हैं, वे भी अकेले नहीं हैं। क्योंकि जिसे वे छोड़ कर भागते हैं, वह उनके मन में साथ चला जाता है। वे जंगल-पहाड़ पर बैठ कर आपकी ही याद कर रहे हैं। क्योंकि अगर आपको वे भूल सकते, तो यहीं भूल सकते थे जंगल-पहाड़ जाने की कोई भी जरूरत न थी।
अकेले होने का मतलब भाग जाना नहीं है। अकेले होने का मतलब इस सत्य को जानना कि मैं अकेला हूं, अकेला आता हूं, अकेला हूं, अकेला जाऊंगा। साथी हैं, संगी हैं--रास्ते पर राहगीर की तरह मिले हुए मित्र हैं, साथ थोड़ी देर हम हैं, और विदा हो जाएंगे। साथ होना बुरा नहीं है। लेकिन इतना साथ हो जाना कि अपने होने का बोध ही मिट जाए, महंगा है। साथ जरूर हों--पत्नी हों, पति हों, बेटे हों, मित्र हों, समाज हो--यह सवाल नहीं है; लेकिन सबके बीच निरंतर अपने को अकेला जाना जा सके, पहचाना जा सके, तो फिर भीड़ में भी अकेले हो सकते हैं। और अगर अकेले होने की कला मालूम न हो, तो जंगल में भी अकेले नहीं हो सकते हैं, वहां भी भीड़ मौजूद रहेगी। तो दूसरा प्रयोग है अकेले होने का। जैसा अभी हमने अंधकार का भाव किया। तो पहले हम अंधकार का भाव करेंगे एक मिनट। जब अंधकार घिर जाएगा, तब हम दूसरा भाव करेंगे कि मैं बिलकुल अकेला हूं, अकेला हूं, एकदम अकेला हूं। कोई भी साथी नहीं, कोई संगी नहीं, कोई मित्र नहीं, कोई है ही नहीं, मैं बिलकुल अकेला हूं। यह अकेले होने का भाव जितना गहरा होगा उतना मैं अपने निकट आऊंगा। जब तक मैं दूसरे को खोज रहा हूं तब तक अपने से दूर जा रहा हूं। तो समाधि का दूसरा चरण, मृत्यु का भी दूसरा चरण है--अकेलेपन का बोध।
अब हम आंख बंद करें, दूसरे प्रयोग के लिए शरीर को ढीला छोड़ कर बैठें। आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। आंख बंद हो गई, शरीर ढीला छोड़ दिया। घने अंधकार को चारों तरफ घिरा हुआ अनुभव करें। अंधकार है...अंधकार है...चारों तरफ अंधकार है...कोई दिखाई नहीं पड़ता, कुछ सूझता नहीं, बस अंधकार ही अंधकार है...छोड़ दें अंधकार में अपने को...
अंधकार ही अंधकार है और मैं अकेला हूं। दूसरा भाव करें: मैं अकेला हूं। प्राण के कोने-कोने में यह खबर पहुंच जाए: मैं अकेला हूं। श्वास-श्वास तक यह खबर पहुंच जाए: मैं अकेला हूं। मन के कण-कण तक यह खबर पहुंच जाए: मैं अकेला हूं। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं बिलकुल अकेला हूं। अकेला आता हूं, अकेला जाता हूं, मैं अकेला हूं। पांच मिनट के लिए इस भाव में गहरे से गहरे उतर जाएं। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं बिलकुल अकेला हूं, कोई भी तो नहीं, मैं बिलकुल अकेला हूं, मैं अकेला हूं, कोई भी तो नहीं; संगी, साथी, प्रियजन, कोई भी तो नहीं। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं बिलकुल अकेला हूं...
पांच मिनट के लिए एक ही भाव में डूब जाएं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। और विराट शांति उतर आएगी। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। चारों तरफ घनघोर अंधकार है, और मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। जैसे ही बिलकुल अकेले रह जाएंगे, सब शांत हो जाएगा। ऐसा शांत जैसा कभी नहीं हुआ। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं बिलकुल अकेला हूं, चारों तरफ अंधकार और मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, चारों तरफ अंधकार, और मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। मन शांत हो जाएगा, मन बिलकुल शांत हो जाएगा। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। कोई नहीं, कोई नहीं, बस अंधकार है और मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, चारों ओर अंधकार, अंधकार, अंधकार और मैं अकेला हूं, मैं बिलकुल अकेला हूं। अकेला हूं, अकेला हूं, अकेला हूं, चारों ओर अंधकार, और मैं अकेला हूं। मन बिलकुल शांत हो जाएगा। सब अशांति दूसरे के साथ है, सब अशांति दूसरे के साथ है। मैं अकेला हूं तो कैसी अशांति! मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। सब शांत हो जाएगा। अकेला हूं, अकेला हूं, अकेला हूं, अंधकार है, अंधकार है, और मैं अकेला हूं। मन शांत हो गया है।
समाधि की दूसरी सीढ़ी है--अकेले होने का भाव। इस भाव को ठीक से पहचान लें। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। फिर धीरे-धीरे आंख खोलें, चारों तरफ लोग दिखाई पड़ेंगे, फिर भी लगेगा मैं अकेला हूं। लोग हैं चारों तरफ, लेकिन मैं अकेला हूं। धीरे-धीरे आंख खोलें, चारों तरफ बड़ा संसार है, लेकिन मैं अकेला हूं।
फिर तीसरा प्रयोग समझें और पांच मिनट के लिए तीसरे प्रयोग को करें।
अंधकार मृत्यु का पहला अनुभव है। अकेले होने का, निपट अकेले होने का अनुभव मृत्यु का दूसरा अनुभव है। और तीसरा अनुभव है उस आदमी के मिट जाने का जिसे मैंने अब तक जाना था कि मैं हूं, जिसे मैंने समझा था कि मैं हूं। नाम था जिसका, मकान था जिसका, इज्जत थी, पता-ठिकाना था जिसका, मृत्यु का तीसरा अनुभव है उस आदमी का मिट जाना जिसे मैंने जाना था कि मैं हूं। जरूर, जिसे हम जानते हैं मैं हूं, उसके पीछे भी कोई है जो कभी नहीं मिटता। लेकिन उसे हम नहीं जान पाएंगे, नहीं पहचान पाएंगे, जब तक यह पर्त न मिट जाए जिसे हम जानते हैं अपना होना।
इसलिए तीसरा प्रयोग है इस बात के अनुभव का कि मिट गया मैं--वह जो था, जिसे मैं जानता था; जिसका चेहरा था, शक्ल थी, पहचान थी, नाम था, ठिकाना था--मिट गया, मिट गया। मैं मिट गया हूं, क्योंकि मैं अपने को जैसा जानता हूं वह मृत्यु में मिट जाएगा। समाधि में इस तीसरे अनुभव को तीव्रता से उतारना है कि मैं मिट गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं मर गया हूं। तीसरा अनुभव मिटने का अनुभव है। जब अंधकार पूरा हो जाएगा और मैं बिलकुल अकेला रह जाऊंगा, तब मिटना बहुत आसान होगा। और जब मैं मिट भी जाऊंगा, तब जो शेष रह जाएगा, वही है,दिरिमेनिंग, वह जो पीछे बच जाता है। जिसे अंधकार डुबा नहीं पाता, जिसे अकेले होने से कुछ टूटता नहीं, और जिसके मर जाने से भी कुछ मिटता नहीं, फिर जो पीछे रह जाता है वह है। तीसरा प्रयोग है मिटने का। और जब आप मिट जाएं, मिट गए हों, तो आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं, आपके करने का कुछ बाकी नहीं रह जाता है। फिर आप रह जाते हैं। जो रह जाएगा, रह जाएगा; जो खो जाएगा वह खो जाएगा। तो इस तीसरे प्रयोग को सर्वाधिक केंद्र पर समझना चाहिए समाधि के, मिट जाने का।
एक फकीर लोगों को समाधि के संबंध में समझाता था। लेकिन वह कहता था, जो थोड़ा जानता हो वही मेरे पास आए। एक युवक उसके पास गया है। उस युवक ने कहा, मुझे सीखनी है समाधि। उसने कहा, कुछ थोड़ा जानते हो तो आओ। लेकिन वह युवक कुछ भी न जानता था। तो उस फकीर ने उसे द्वार के बाहर करके द्वार बंद कर लिए। उस युवक ने सोचा कि मैं कैसे बताऊं कि मैं कुछ जानता हूं? मैं कुछ जानता नहीं। उसने पास-पड़ोस में जाकर लोगों से पूछा कि क्या कहने से फकीर मुझे स्वीकार कर लेगा? तो उन लोगों ने कहा कि जहां तक हमें पता है, फकीर सिखाता है कि समाधि यानी मर जाना। तो तुम जाकर, जब फकीर कहे, कुछ जानते हो? तो गिर पड़ना और मर जाना। तो उसने कहा, ऐसे कैसे मरूंगा? गिर पड़ सकता हूं, लेकिन मरूंगा कैसे? तो उन्होंने कहा, तुम तो आंख बंद करके पड़ जाना। तो फकीर समझेगा कि थोड़ा तो जानते हो।
वह युवक गया। सीख कर आया था। सीखा हुआ सदा झूठा होता है। दूसरे से सीखा हुआ कैसे काम पड़े? जैसे ही उस गुरु ने पूछा, कुछ जानते हो? वह तत्काल गिरा और मर गया। मर गया यानी आंख बंद करके, हाथ-पैर ढीले छोड़ कर पड़ा रह गया। गुरु ने कहा, बिलकुल ठीक! बिलकुल ठीक! लेकिन कम से कम एक आंख तो खोलो! तो उस युवक ने सोचा: शायद यह जरूरी होगा समाधि में एक आंख खोलना। पर एक आंख खुलती नहीं, एक खोली तो दोनों आंखें खुल गईं। उस गुरु ने कहा, उठो और बाहर निकल जाओ! किससे सीख कर आए हो? कहीं मुर्दा आदमी आंख खोलता है! अगर मर ही गए थे तो मर ही जाना था। आंख क्यों खोली? मरा हुआ आदमी कुछ भी नहीं करता है!
तीसरा जो प्रयोग है कि मर ही गए, तो उसका मतलब है कि फिर पांच मिनट आपको कुछ नहीं करना है। अगर शरीर गिरे तो गिर जाए, झुके तो झुक जाए, जो हो हो। अगर बाहर कोई आवाज आ रही है, सड़क से कार निकल रही है, सुनाई पड़ रही है, सुनते रहें। मरा हुआ आदमी कुछ नहीं कर सकता, यह भी तो नहीं कह सकता कि यह कार आवाज नहीं करनी चाहिए। कर रही है, मरा हुआ आदमी क्या करेगा? मरा हुआ आदमी पड़ा हुआ रहेगा। जो सुनाई पड़ रहा है, सुनाई पड़ेगा; नहीं सुनाई पड़ रहा है, नहीं सुनाई पड़ रहा है। चीजें जैसी हैं वैसी ही स्वीकार कर लेगा। मरा हुआ आदमी कुछ भी तो नहीं कर सकता।
एक और फकीर के संबंध में मैंने सुना है कि वह फकीर सदा दूसरों से पूछा करता था। उसने एक दिन गांव में एक ज्ञानी आया और उससे पूछा कि किसी दिन मैं मर जाऊं तो मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं मर गया? तो मुझे कोई तरकीब बता दें जिससे मैं जांच कर लूं कि मैं मर तो नहीं गया हूं! तो उस ज्ञानी ने कहा, यह भी कोई जांच करने की बात है, जब मरोगे तो हाथ-पैर बिलकुल ठंडे हो जाएंगे।
ठंड के दिन थे, बर्फ पड़ रही थी। वह फकीर जंगल में घास काटने गया था, कुछ लकड़ी काटने गया था। हाथ ठंडे हो गए। उसने हाथ छुआ, उसने देखा, मालूम होता है मौत आ रही है। उसने कुल्हाड़ी नीचे पटक दी और एक वृक्ष पर लेट गया, क्योंकि मरे हुए आदमी को लेट जाना चाहिए। नियमानुसार वह लेट गया। हाथ ठंडे होते गए, लेट जाने से और जल्दी ठंडा हो गया, कुल्हाड़ी चलाता था तो थोड़ी गर्मी भी थी। जब बिलकुल ठंडा हो गया तो उसने कहा कि अब तो मर ही गए। पड़ोस से कुछ लोग निकलते थे रास्ते से, उन्होंने देखा, बेचारा कोई मर गया। तो वे उसकी अरथी बना कर, परदेशी लोग थे, मरघट ले जाने लगे।
अब उस फकीर ने कहा, हम क्या करें! जब मर ही गए हैं, तो मरघट तो ले जाए ही जाएंगे। तो वह कुछ भी न बोला। वह अरथी पर सवार हो गया। अरथी चली, लेकिन अजनबी लोग थे, परदेशी लोग थे, उन्हें पता न था मरघट का रास्ता कौन सा है। चौरस्ते पर आकर वे सोचने लगे, कोई यात्री निकले तो हम पूछ लें मरघट का रास्ता कौन सा है। फकीर को तो पता था कि रास्ता कौन सा है, लेकिन उसने कहा कि पता नहीं मुर्दे बताते हैं या नहीं बताते। मगर यह वह ज्ञानी से पूछना भूल गया था कि मुर्दे, अगर कोई ऐसा अवसर आ जाए, तो कुछ बता सकते हैं कि नहीं। लेकिन बड़ी देर हो गई, कोई नहीं आया, तो वे चारों बड़े परेशान हो गए जो उठा कर ले गए थे। उन्होंने कहा, बड़ी देर हुई जाती है। तो फिर इसको अपन यहीं छोड़ दें और अपने-अपने रास्ते पर जाएं, कोई दूसरा पहुंचा देगा। फकीर ने कहा, घबड़ाओ मत! रास्ता मुझे मालूम है। जब मैं जिंदा हुआ करता था, तो बाएं तरफ के रास्ते से लोग मरघट जाते थे। जब मैं जिंदा हुआ करता था, तब बाएं तरफ के रास्ते से लोग मरघट जाते थे। तब तो वे चारों घबड़ा कर भाग खड़े हुए--कि यह क्या हो गया है! उस फकीर ने कहा, तुम बिलकुल पक्का मानो, मैं मरा हुआ आदमी हूं। सिर्फ यह ज्ञानी से पूछना भूल गया था कि मरा हुआ आदमी कुछ बता सकता है कि नहीं बता सकता है। इतनी भर भूल है।
मरे हुए होने का पांच मिनट जो हम अनुभव करेंगे, उसमें कुछ भी नहीं करना है, जो हो जाए उसे होने देना है। रास्ता भी नहीं बताना है। रास्ते से कोई गुजरता हुआ हो हार्न, तो यह भी नहीं सोचना है कि लोग शोर क्यों कर रहे हैं। कोई आपके ऊपर गिर भी जाए, तो भी नहीं सोचना है कि यह क्यों गिर गया। मुर्दे को स्वीकार कर लेना चाहिए--जो हो रहा है, हो रहा है। पांच मिनट के लिए मुर्दा होने का प्रयोग करें। फिर हम ध्यान के लिए बैठेंगे।
शरीर को ढीला छोड़ें और आंख बंद कर लें। शरीर को ढीला छोड़ दें, आंख बंद कर लें। आंख बंद कर लें, शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें। अभी छोड़ सकते हैं, अभी मर नहीं गए। मर गए, फिर कुछ भी न कर सकेंगे। बिलकुल ढीला छोड़ दें। शरीर ढीला छोड़ दिया है, आंख बंद कर ली है। एक मिनट के लिए अंधकार को लौटा लें। चारों ओर अंधकार ही अंधकार है...चारों ओर अंधकार ही अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...फिर दूसरा भाव कर लें: मैं अकेला हूं, कोई संगी-साथी नहीं, मैं बिलकुल अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं बिलकुल अकेला हूं। और तीसरा अनुभव करें: मैं मर रहा हूं, मैं खो रहा हूं, मैं मिट रहा हूं, मैं मिटा जा रहा हूं, मैं मर रहा हूं, मैं समाप्त हो रहा हूं, मैं मर रहा हूं, मैं मिट रहा हूं, मैं समाप्त हो रहा हूं। पांच मिनट के लिए मैं मर रहा हूं, मैं मिट रहा हूं, मैं समाप्त हो रहा हूं...
मिट जाएं, बिलकुल मिट जाएं, जैसे हैं ही नहीं। मर जाएं, जैसे बचे ही नहीं। फिर जो बचेगा, बच रहेगा। वह आप नहीं हैं, वह जो बचा है वह परमात्मा है। वह जो बचेगा वह आप नहीं हैं, वह जो बचा है वह आत्मा है। मिट जाएं, बिलकुल मर जाएं, मैं हूं ही नहीं। मैं मर गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं मर गया हूं। बिलकुल मिट जाएं। शरीर गिरे, गिर जाए...शरीर आगे झुके, झुक जाए...अब मरा हुआ आदमी कुछ भी नहीं कर सकता, जो हो रहा, हो रहा है। मैं मर गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं बिलकुल मिट गया हूं। मर ही जाएं, मिट ही जाएं, कुछ भी नहीं बचा।
पांच मिनट के लिए खो जाएं, समाप्त हो जाएं। मैं मर गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं हूं ही नहीं। मैं मिट गया हूं, मैं समाप्त हो गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं मिट गया हूं, मैं समाप्त हो गया हूं, मैं मिट गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं हूं ही नहीं। छोड़ दें, बिलकुल मिट जाएं, अपने को छोड़ दें, हूं ही नहीं, मिट गया हूं, समाप्त हो गया हूं। और एक अपूर्व शांति प्राणों पर छा जाएगी। एक अलौकिक शांति मन पर छा जाएगी।
मैं मर गया हूं, मैं मिट गया हूं। अब कुछ भी नहीं कर सकता हूं। हूं ही नहीं। छोड़ दें, छोड़ दें, बिलकुल मिट जाएं। मैं मर गया हूं, मैं मिट गया हूं, मैं हूं ही नहीं, मैं हूं ही नहीं। जो है वह है, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं। जो है वह है, मैं नहीं हूं, मैं मिट गया हूं। और देखें कैसी शांति,कैसी शांति सब तरफ से उतर आती है। मैं मर गया हूं, मैं मिट गया हूं, मैं हूं ही नहीं, मैं बिलकुल मिट गया हूं। मैं मिट गया हूं, मैं मिट गया हूं, मैं हूं ही नहीं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं बिलकुल नहीं हूं। मन शांत हो गया है, मन बिलकुल शांत हो गया है। मैं मिट गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं हूं ही नहीं। मैं बिलकुल मिट गया हूं, मैं मर गया हूं। इस भाव को ठीक से पहचान लें, यह समाधि का केंद्र है। इस भाव को ठीक से पहचान लें, मैं मिट गया हूं, मैं समाप्त हो गया हूं, मैं हूं ही नहीं। और मन बिलकुल शांत हो गया।
अब धीरे-धीरे आंखें खोलें...। भीतर सब कुछ मिट गया है। धीरे-धीरे आंखें खोलें...। अब जो आंखों से देख रहा है, वह मैं नहीं हूं।
ये तीन सूत्र हैं समाधि के लिए।
पहला: अंधकार। दूसरा: अकेला होना। तीसरा: समाप्त हो जाना।
अब हम अंतिम दस मिनट के लिए इन तीनों प्रयोगों को एक साथ, ये तीन मैंने समझाने के लिए अलग-अलग आपको प्रयोग कराए कि आपके खयाल में आ जाएं, अब इन तीनों का सम्मिलित प्रयोग दस मिनट के लिए हम करेंगे। उस समय बिलकुल ही अपने को छोड़ देना है, जैसे खो ही गए, बचे ही नहीं। आवाज आती रहेगी, बाहर मशीन चलती है, कोई सड़क से गुजरेगा, कहीं कोई पक्षी आवाज करेगा, उसे चुपचाप सुनते रहना है। जो हो रहा है, हो रहा है, और हम समाप्त हो गए हैं।
अब अंतिम प्रयोग के लिए बैठें। आंख बंद कर लें और शरीर को ढीला छोड़ दें। आंख बंद कर लें और शरीर को ढीला छोड़ दें। चारों ओर अंधकार है, चारों ओर अंधकार है, मैं बिलकुल अकेला हूं, कोई संगी नहीं, साथी नहीं। ढीला छोड़ दें बिलकुल, मिटने की तैयारी करनी है, बिलकुल ढीला छोड़ दें। अनुभव करें: शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर बिलकुल शिथिल होता जा रहा है। अंधकार है घना, चारों ओर अंधकार ही अंधकार है, मैं बिलकुल अकेला हूं, कोई संगी नहीं, साथी नहीं। और मर रहा हूं, मिट रहा हूं, समाप्त हुआ जा रहा हूं। जैसे कोई बूंद किसी सागर में मिट जाती है। उस मिटने के लिए तैयार हो जाएं। शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें, अनुभव करें शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर शिथिल हो रहा है। बिलकुल ढीला छोड़ते जाएं, मिटना ही है, बिलकुल ढीला छोड़ दें, शरीर शिथिल हो रहा है। गिरे, गिर जाए; झुके, झुक जाए; जो हो, हो। शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर शिथिल हो रहा है। चारों ओर अंधकार ही अंधकार है, मैं बिलकुल अकेला हूं, एकदम अकेला हूं। शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर शिथिल हो रहा है। श्वास शांत होती जा रही है, श्वास शांत होती जा रही है। मन शांत होता जा रहा है, मन शांत होता जा रहा है। अब दस मिनट के लिए बिलकुल मिट जाएं, जैसे हैं ही नहीं। मैं मर गया हूं, मैं नहीं हूं, मैं मर गया हूं, मैं नहीं हूं। आवाज सुनाई पड़ती रहेगी, सुनते रहें। मरा हुआ आदमी कुछ भी नहीं कर सकता। जो हो रहा है उसे जान लेता है, स्वीकार कर लेता है। दस मिनट के लिए बिलकुल मिट जाएं। और इस मिटने से एक बिलकुल नई शांति, नया आनंद, और एक नया अनुभव जन्मेगा। मिट जाएं, मैं मर रहा हूं, मैं मर रहा हूं, मैं बिलकुल मिट गया हूं...
अंधकार ही अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...और मैं बिलकुल मिट गया हूं, मैं हूं ही नहीं। सब शांत हो जाएगा। भीतर एक अनूठा आनंद उठने लगेगा। मैं मर गया हूं, मैं मर गया हूं, मैं बिलकुल मिट गया हूं।
छोड़ दें...छोड़ दें...बिलकुल छोड़ दें...। मैं मिट गया हूं, मैं मिट गया हूं, मैं बिलकुल मिट गया हूं, मैं हूं ही नहीं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं हूं ही नहीं, मैं हूं ही नहीं, मैं हूं ही नहीं। सब शांत हो गया है। और एक गहरे आनंद की लहर भीतर उठने लगेगी। सब शांत हो गया है। मैं नहीं हूं...

नारी और क्रांति - प्रवचन-06

नारी: अपने अस्तित्व की घोषणा

और नाराजगी में देवताओं ने उस आदमी को अभिशाप दिया कि आज से तेरी छाया खो जाएगी। धूप में भी चलेगा तो तेरी छाया नहीं बनेगी। वह आदमी अपने मन में बहुत हंसा कि छाया से मेरा क्या बिगड़ जाएगा। और देवता कैसे नासमझ हैं, अभिशाप भी दे रहे हैं तो छाया के खोने का दे रहे हैं। वह समझ ही न सका कि छाया के खोने से क्या नुकसान हो सकता है? आप भी नहीं समझ सकेंगे कि छाया के खोने से क्या नुकसान है? लेकिन जैसे ही वह आदमी अपने गांव में आया उसे पता चला कि बहुत नुकसान हो गया, जिस आदमी ने भी देखा कि धूप में उसकी छाया नहीं बन रही है वही आदमी उससे भयभीत हो गया।
गांव में खबर फैल गई कि वह आदमी कुछ गड़बड़ हो गया है, उसकी छाया नहीं बनती, ऐसा कभी भी नहीं हुआ था कि किसी आदमी की छाया न बने। उसके घर के लोगों ने द्वार बंद कर लिए, उसके मित्रों ने मुंह मोड़ लिया। उसकी पत्नी ने उसे पति मानने से इनकार कर दिया, उसके बच्चे भी उसे इनकार करने लगे। गांव में उसका जीना मुश्किल हो गया। और गांव के लोगों ने कहा कि तुम गांव के बाहर निकल जाओ। ऐसी बीमारी कभी किसी को नहीं हुई है आज तक कि उसकी छाया खो जाए। पता नहीं तुम कैसे अभाग्य के लक्षण हो। उस आदमी को वह गांव छोड़ देना पड़ा।

नारी और क्रांति - प्रवचन-05

नारी: पुरुष की दासता से मुक्ति

मेरे प्रिय आत्मन्!
"नारी और क्रांति' इस संबंध में बोलने का सोचता हूं, तो पहले यही खयाल आता है कि नारी कहां है?नारी का कोई अस्तित्व ही नहीं है, मां का अस्तित्व है, बहन का अस्तित्व है, बेटी का अस्तित्व है, पत्नी का अस्तित्व है, नारी का कोई भी अस्तित्व नहीं है। नारी जैसा कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। नारी की अपनी कोई अलग पहचान नहीं है। नारी का अस्तित्व उतना ही है जिस मात्रा में वह पुरुष से संबंधित होती है। पुरुष का संबंध ही उसका अस्तित्व है उसकी अपनी कोई आत्मा नहीं है।
यह बहुत आश्चर्यजनक है, लेकिन यह कड़वा सत्य है कि नारी का अस्तित्व उसी मात्रा और उसी अनुपात में होता है, जिस अनुपात में वह पुरुष से संबंधित होती है। पुरुष से संबंधित नहीं हो, तो ऐसी नारी का कोई अस्तित्व नहीं है। और नारी का अस्तित्व ही न हो, तो क्रांति की क्या बात करनी है?

इसलिए पहली बात यह समझ लेनी जरूरी है कि नारी अब तक अपने अस्तित्व को भी, अपने अस्तित्व को स्थापित नहीं कर पाई है। उसका अस्तित्व पुरुष के अस्तित्व में लीन है। पुरुष का एक हिस्सा है उसका अस्तित्व।
बर्नार्ड शा ने एक छोटी सी किताब लिखी। उस किताब का नाम बहुत अजीब है और जब पहली दफे वह किताब प्रकाशित हुई तो सारे लोग हैरान हुए। उस किताब का नाम है: इंटेलिजेंट वीमेन्स गाइड टु सोशलिज्म। बुद्धिमान स्त्री के लिए समाजवाद की पथ-प्रदर्शिका।

नारी और क्रांति - प्रवचन-04

नारी: नई सभ्यता का केंद्र

एक आश्चर्यजनक भूल हो गई है। मनुष्य की पूरी सभ्यता, संस्कृति, उसी भूल के ऊपर खड़ी है। और इसीलिए हजारों साल के श्रम के बाद भी न तो एक ऐसा समाज बन पाया जो सुख और शांति के केंद्र पर निर्मित हो और न हम ऐसे मनुष्य को जन्म दे पाए जो कि जीवन की धन्यता को और आनंद को अनुभव कर सके। एक अत्यंत उदास, हारा हुआ, दुखी मनुष्य पैदा हुआ है और एक ऐसा समाज पैदा हुआ है जो प्रतिपल युद्धों से, संघर्षों से और विनाश से गुजरता रहा है। कोई तीन हजार वर्ष के इतिहास में आदमी ने पंद्रह हजार युद्ध लड़े। तीन हजार वर्षों में पंद्रह हजार युद्ध! प्रतिवर्ष पांच युद्धों का संघर्ष चलता रहा है!
अगर मनुष्य के सारे इतिहास का जोड़ किया जाए तो पंद्रह वर्षों में एक वर्ष शांति का होता है, चौदह वर्ष युद्धों के होते हैं। थोड़ा विचारने जैसा है कि आदमी इतने युद्धों से क्यों गुजरा? जरूर मनुष्य के निर्माण में कोई बुनियादी भूल हो गई है। इतनी हिंसा से आदमी को क्यों निरंतर गुजरना पड़ा? पिछले दो महायुद्ध तो हम सबके सामने उनकी स्मृति अभी भूल भी नहीं पाई। पहले महायुद्ध में पांच करोड़ लोगों की हत्या हुई, दूसरे महायुद्ध में दस करोड़ लोगों की हत्या हुई। इतना बड़ा विनाश हुआ कि दूसरे महायुद्ध के बाद लोग सोचते थे कि अब कभी कोई युद्ध नहीं होगा। लेकिन फिर तीसरे युद्ध की तैयारी शुरू हो गई है। और तीसरे युद्ध में जो होगा वह कहना बहुत कठिन है।

नारी और क्रांति - प्रवचन-03

नारी: जीवन का आनंद

प्रिय बहनों!
मैं अत्यंत आनंदित हूं। अपने हृदय की थोड़ी सी बातें आपसे कह सकूंगा। जीवन में बहुत लोग इतनी नासमझी, इतने अज्ञान, इतने भूल भरे ढंग से जीते हैं कि न तो उन्हें जीवन के आनंद का अनुभव हो पाता और न वे उस संगीत से परिचित हो पाते हैं जो उनकी हृदय की वीणा पर बज सकता था; और न वे उन फूलों की सुगंध को ही उपलब्ध होते हैं जो कि उनके प्राणों को सुभाषित कर सकती थी। बहुत कम लोग, बहुत थोड़े से लोग, करोड़ों और अरबों लोगों में कोई एकाध जीवन के अर्थ और अभिप्राय को उपलब्ध होता है।
आज की इस चर्चा में तुम सबसे मैं इस संबंध में थोड़ी बात कहूं कि तुम्हारा जीवन कैसे उस कला को, उस आर्ट को सीख सके कि तुम्हारे जीवन में वैसा दुर्भाग्य फलित न हो जो कि अधिक लोगों का भाग्य बनता है। अभी तुम्हारे जीवन का प्रारंभ और शुरुआत है। कोई ठीक-ठीक बीज, कोई ठीक दिशा तुम्हारे जीवन को मिले तो संभव है कि जो सबके साथ होता है वह तुम्हारे साथ न हो। और तुम्हारे भीतर जीवन अपनी परिपूर्णता में, अपने पूरे संगीत में विकसित हो सके। इसके पहले कि मैं कुछ उस संबंध में तुमसे कहूं, एक छोटी सी घटना कहूंगा ताकि उससे बात शुरू हो सके।

नारी और क्रांति - प्रवचन-02

नारी: प्रेम की पवित्रता

मैं थोड़े विचार में पड़ गया हूं, क्योंकि मुझे कहा गया कि विशेष रूप से स्त्रियों के जीवन के संबंध में कुछ कहूं।
जैसा मैं देखता हूं, स्त्री और पुरुष का आधारभूत जीवन भिन्न-भिन्न नहीं है। मनुष्य के जीवन की जो समस्याएं हैं, वे पुरुष और स्त्री की दोनों की समस्याएं हैं। और जब हम इस भांति सोचने लगते हैं कि स्त्रियों के जीवन के लिए कुछ विशिष्ट दिशा होगी, तभी भूल शुरू हो जाती है।
जीवन की जो मौलिक समस्या है अशांति की, दुख की, पीड़ा की, वह स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग नहीं है। पहले तो मैं उस मौलिक समस्या के संबंध में थोड़ी सी बात आपसे कहूं जो सभी की है। और फिर कुछ प्रश्न पूछे हुए हैं जो शायद स्त्रियों के लिए ही विशेष अर्थ के होंगे, उनकी भी बात करूंगा।
मनुष्य के जीवन में इतनी घनीभूत अशांति है, इतनी पीड़ा है, इतना दुख है कि जो लोग भी विचार करते हैं उन्हें यह अनुभव होगा, जीवन की व्यर्थता का अनुभव होगा। ज्ञात होगा कि जैसे जीवन में कोई अर्थ नहीं। हम जीते हैं, हम जीते हैं केवल इसलिए कि मरने में समर्थ नहीं हैं। जीए जाते हैं और मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं।

नारी और क्रांति - प्रवचन-01

नारीः दीनता से विद्रोह

मेरे प्रिय आत्मन्!
इस देश की जिंदगी में बहुत से दुर्भाग्य गुजरे हैं। और बड़े से बड़े जिस दुर्भाग्य का हम विचार करना चाहें वह यह है कि हम हजारों वर्षों से विश्वास करने वाले लोग हैं। हमने कभी सोचा नहीं है, हमने कभी विचारा नहीं है, हम अंधे की तरह मानते रहे हैं। और हमारा अंधे की तरह मानना ही हमारे जीवन का सूर्यास्त बन गया। हमें समझाया ही यही गया है कि जो मान लेता है वह जान लेता है।
इससे ज्यादा कोई झूठी बात नहीं हो सकती। मानने से कोई कभी जानने तक नहीं पहुंचता। और जिसे जानना हो उसे न मानने से शुरू करना पड़ता है। संदेह के अतिरिक्त सत्य की कोई खोज नहीं है। संदेह मिटता है, लेकिन सत्य को पाकर मिटता है। और जो पहले से ही संदेह करना बंद कर देते हैं वे अंधे ही रह जाते हैं, वे सत्य तक कभी भी नहीं पहुंचते हैं।

लेकिन हमें समझाया गया है विश्वास, बिलीफ, फेथ। हमें कभी नहीं समझाया गया डाउट, हमें कभी नहीं समझाया गया संदेह। इसलिए देश का मन ठहर गया और रुक गया है और गुलाम बन गया है।

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

आठ पहर यूं झूमते-प्रवचन-06

फूल किसी से पूछते नहीं--कैसे खिलें। तारे किसी से पूछते नहीं--कैसे जलें। आदमी को पूछना पड़ता है कि कैसे वह वही हो जाए, जो होने को पैदा हुआ है। सहज तो होना चाहिए परमात्मा में होना। लेकिन आदमी कुछ अदभुत है, जिसमें होना चाहिए उससे चूक जाता है और जहां नहीं होना चाहिए वहां हो जाता है। कहीं कोई भूल है। और भूल भी बहुत सीधी है: आदमी होने को स्वतंत्र है, इसलिए भटकने को भी स्वतंत्र है। शायद यह भी हो सकता है कि बिना भटके पता ही न चले। बिना भटके पता ही न चले कि क्या है हमारे भीतर। शायद भटकना भी मनुष्य की प्रौढ़ता का हिस्सा हो।
मैं एक छोटी सी कहानी से समझाऊं। फिर हम समाधि के प्रयोग के लिए बैठें।

एक आदमी था, बहुत धन था उसके पास, लेकिन शांति न थी। जैसा कि अक्सर होता है। धन की तलाश करता है आदमी कि शांति मिलेगी। धन तो मिल जाता है, पर शांति जितनी दूर थी, शायद उससे भी ज्यादा दूर हो जाती है। सब पा लिया था, लेकिन आनंद की कोई खबर न मिली थी। अब वह बूढ़ा होने आ गया था। तो उसने बहुत से लाखों-करोड़ों के हीरे-जवाहरात अपने घोड़े पर ले लिए और खोजने निकल पड़ा। खोजने नहीं, कहना चाहिए, आनंद को खरीदने निकल पड़ा। जो आनंद दे दे उसे ही वे सारे हीरे-जवाहरात दे देना चाहता था।

बहुत लोगों के पास गया, जहां-जहां खबर सुनी वहां-वहां गया, लेकिन किसी को आनंद की कोई खबर न थी। लोगों ने आनंद की बातें तो कीं। लेकिन उसने कहा, बात नहीं, मुझे आनंद चाहिए। और मैं सब कुछ देने को तैयार हूं। लेकिन कई जगह उसे लोगों ने खबर दी कि तुम कुछ ऐसा काम करने निकले हो कि सिर्फ एक फकीर है फलां-फलां गांव में, अगर वह कर दे तो कर दे, और कोई न कर पाए।
फिर आखिर वह उस गांव में भी पहुंच गया। सांझ का समय था, अमावस की रात थी, सूरज ढल गया था। गांव के बाहर ही एक वृक्ष के नीचे वह फकीर मिल गया। उस अमीर आदमी ने घोड़े से उतर कर वह थैली उस फकीर के पैरों के पास पटक दी और कहा, करोड़ों रुपये के हीरे-जवाहरात हैं, मुझे आनंद चाहिए! एक झलक मिल जाए, मैं सब देने को राजी हूं!
उस फकीर ने कहा, पक्का इरादा करके आए हो?
उस आदमी ने कहा, पक्का? महीनों से घूम रहा हूं, और उदास हो गया हूं, तुम पर ही आशा टिकी है!
उस फकीर ने कहा, सच में ही आनंद चाहिए? बहुत दुखी हो?
उस आदमी ने कहा, दुख का कोई हिसाब नहीं, आनंद की कोई किरण ही नहीं मिलती।
यह बात ही चलती थी कि अचानक उस अमीर ने देखा कि यह क्या हुआ! उस फकीर ने वह झोली उठाई और भाग खड़ा हुआ! एक क्षण तो अमीर सकते में आ गया। अमीर सिर्फ उन फकीरों पर विश्वास करता है जो पैसे न छुएं। इसलिए अमीर उनकी पूजा करता है जो पैसे से बिलकुल दूर रहें। क्योंकि अमीर उनसे आश्वस्त रहता है। इनसे कोई खतरा नहीं है। यह फकीर कैसा कि झोले को लेकर ही भाग गया? एक क्षण तो उसकी समझ में भी न आया। फिर वह चिल्लाया कि मैं लुट गया! मैं मर गया! मेरी सारी जिंदगी की कमाई लिए जा रहे हो! तुम चोर हो। तुम कैसे ज्ञानी हो? और पीछे भागा। क्योंकि अंधेरी रात थी, और सन्नाटा था, और गांव के बाहर थे। लेकिन फकीर खुद ही गांव में चला गया भागता हुआ। और अमीर पीछे गया। गली-गली में फकीर भागने लगा और अमीर पीछे चिल्लाने लगा कि पकड़ो! चोर है, बेईमान है! और मैं समझा था कि ज्ञानी है। मैं लुट गया, मैं मर गया। मैं बहुत दुखी हो गया हूं, मेरा सब छिन गया। गांव के लोग भी सम्मिलित हो लिए। गांव के लोग भी भागने लगे। लेकिन फकीर के रास्ते जाने-माने थे और अमीर रास्ते जानता न था। पराया गांव था। इसलिए फकीर ने बहुत चक्कर दिए। फिर आखिर फकीर उसी झाड़ के पास वापस लौट आया। झोले को पटक दिया जहां से उठाया था वहीं और झाड़ के पीछे अंधेरे में खड़ा हो गया। अमीर आया पीछे हांफता हुआ, भागता हुआ, चिल्लाता हुआ--लुट गया! मर गया! हे भगवान, मेरा सब छिन गया! झोले को देखा, उठा लिया, छाती से लगा लिया। उस अमीर की आंखों में उस समय आनंद की झलक थी। फकीर बाहर निकला और उसने कहा, मिला कुछ आनंद? यह भी एक तरकीब है आनंद को पाने की। उस अमीर ने कहा, बड़ी शांति मिली, बड़ा आनंद! इतना सुखी मैं कभी भी न था।
लेकिन यह थैली इसके पास पहले भी थी। पर यह कहता है, इतना सुखी मैं पहले कभी न था। और कहता है, बड़ी शांति मिली। और यह थैली पूरी की पूरी इसके पास थी घड़ी भर पहले भी। इस घड़ी भर में क्या हो गया?
इस घड़ी भर में इसने खोया। जब तक हम खो न दें उसे जो हमारे पास है, हम उसे पा नहीं सकते हैं। जब तक हम खो न दें उसे जो हमारे भीतर है, तब तक हम उसे पहचान नहीं सकते हैं। शायद इसीलिए मनुष्य को खोना पड़ता है स्वयं को, ताकि वह पा सके। हम सबने खो दिया है। हम उस फकीर और उस अमीर की कहानी में उस जगह हैं, जहां थैली फकीर ले भागा है। भला फकीर था, थैली पटक गया। हमारा मन भी ले भागा है सब कुछ। पता नहीं पटकेगा, नहीं पटकेगा। लेकिन पटक सकता है। थोड़ी तैयारी हमें दिखानी पड़े।
उस फकीर ने थैली कब पटकी? जब अमीर और दौड़ने की हिम्मत छोड़ दिया। जब अमीर बिलकुल थक गया, तब उस फकीर ने झोली पटक दी। अगर हम भी बिलकुल थक गए हों, तो वह हमारा मन झोली पटक सकता है। और हम उसे उपलब्ध हो सकते हैं, जो संपदा है, समाधि है; जो सत्य है, जो परमात्मा है। और जिस दिन हम उसे पा लेंगे, उस दिन कहेंगे, बहुत आनंद मिला। और साथ ही यह भी कहेंगे, बड़ी आश्चर्य की बात है, लेकिन जो मिला है यह सदा से मेरा ही था। लेकिन मुझे कभी पता न था।
समाधि उसकी खोज है जो हमें मिला ही हुआ है। समाधि पुनर्स्मरण है,रिमेंबरिंग है। याद है उसकी जो हमारा ही है। लेकिन यह खो देना भी जरूरी है। क्या करें इस समाधि को लाने के लिए? बहुत कुछ नहीं किया जा सकता, इतना ही कर सकते हैं कि अपने को रिसेप्टिव बना लें, ग्राहक बना लें, अपने को खुला छोड़ दें। और अगर आता हो सत्य तो आ जाए, और परमात्मा अगर आता हो तो आ जाए। इतना ही करें।
मैंने सुना है कि एक आदमी एक रात एक झोपड़े में बैठ कर, छोटे से दीये को जला कर कोई शास्त्र पढ़ता रहा था। फिर आधी रात गए थक गया, फूंक मार कर दीया बुझा दिया। और तब बड़ा हैरान हो गया! जब तक दीया जल रहा था, पूर्णिमा का चांद बाहर ही खड़ा रहा, भीतर न आया। जब दीया बुझ गया, उसकी धीमी सी टिमटिमाती लौ खो गई, तो चांद की किरणें भीतर भर आईं। द्वार-द्वार, खिड़की-खिड़की,रंध्र-रंध्र से चांद भीतर नाचने लगा। वह आदमी बहुत हैरान हो गया! उसने कहा कि एक छोटा सा दीया, इतने बड़े चांद को बाहर रोके रहा?
हम भी बहुत छोटे-छोटे दीये जलाए हैं अपने अहंकार के, मैं के, उनकी वजह से परमात्मा का चांद बाहर ही खड़ा रह जाता है। समाधि का अर्थ है: फूंको और बुझा दो इस दीये को, हो जाने दो अंधेरा। मिटा दो यह ज्योति जिसे समझा है मैं, और तत्काल चारों तरफ से वह आ जाता है, सब तरफ से आ जाता है, जो हमारे इस छोटे से अहंकार ने, मैं ने रोक रखा है।
इसलिए समाधि के तीन चरण मैंने आपसे कहे--अंधकार, अकेला होना, और मिट जाना। बुझ जाए दीया, प्रकाश परमात्मा का तत्काल मिल जाता है।
पहला चरण है: अंधकार।
अगर कोई पहले चरण को ही पूरा कर ले, तो सब बात हो जाए। अगर कोई पूरे अंधकार में ही डूब जाए पूरी तरह, तो खुद भी मिट जाए, अंधेरा ही रह जाए। पहला चरण भी पूरा हो जाए, तो सब बात हो जाए। लेकिन वह पूरा नहीं हो पाता, इसलिए दूसरा करना पड़ता है। दूसरा भी पूरा हो जाए कि सच में ही मुझे ज्ञात हो जाए कि मैं बिलकुल अकेला हूं, तो वह हमें मिल जाएगा जो सदा से अकेला ही है। लेकिन वह भी नहीं हो पाता, इसलिए तीसरा चरण उठाना पड़ता है--मिट गया हूं। अगर मिट जाऊं पूरा तो अभी मिल जाए, वह जिसकी तलाश है। वह खुशी जो मुझे कभी न मिली, क्योंकि मैं ही तो दुख का कारण था। मुझे खुशी मिलेगी भी नहीं। वह रोशनी जो मुझे कभी दिखाई न पड़ी, क्योंकि मैं ही तो टिमटिमाता दीया था, जिसने कि बड़े सूरज को रोक दिया। वह स्वर, वह संगीत जो मुझे कभी सुनाई न पड़ा, अभी सुनाई पड़ जाए। लेकिन मेरे मैं की धुन बहुत मजबूत है, और उसी में हम लीन हैं। वहां हम भीतर मैं और मैं और मैं कहे चले जा रहे हैं।
कबीर ने कहा है कि देखा था एक बकरा जो मैं-मैं-मैं-मैं किए जाता था। फिर मर गया वह बकरा। उसकी चमड़ी से किसी ने तानपूरे के तार बना लिए। और मैं उस रास्ते से गुजरता था। और मैंने उस तानपूरे पर ऐसा गीत सुना जो मैंने कभी न सुना। तो मैंने रोका उस आदमी को और कहा कि कहां से पाए ये तानपूरे? उसने कहा, देखा नहीं, एक बकरा था यहां जो मैं-मैं-मैं किए जाता था। यह वही है। मर गया मैं करने वाला। अब तानपूरे का तार हो गया। अब बड़ा संगीत पैदा हो रहा है।
लेकिन जब तक मैं-मैं पैदा होती थी, तब तक वह संगीत पैदा नहीं होता था। वह मैं-मैं भीतर हम भी कहे जा रहे हैं, तो हम वीणा नहीं बन पाते परमात्मा की कि उसमें वह संगीत पैदा हो जाए। लेकिन हो सकता है।
कबीर खूब हंसने लगे कि यह तो खूब रही, जिंदा बकरा संगीत न गा सका, सिर्फ मैं-मैं करता रहा, और मरा बकरा संगीत पैदा कर रहा है!
कबीर ने लौट कर अपने साथियों से कहा, क्या अच्छा न हो कि हम भी मर जाएं! छोड़ दें मैं-मैं, मर जाएं! अभी मैं देख कर आ रहा हूं चमत्कार! एक जिंदा बकरा कभी गीत न गा सका, मर कर गीत गा रहा है। तो हम भी मर जाएं न!
वही मैं कह रहा हूं कि मिट जाएं! तो फिर रह जाए संगीत। हमारे मिटते ही रह जाता है।
मिटने के तीन चरण हम उठाएंगे। पहले चरण में पांच मिनट तक परिपूर्ण अंधकार का भाव करेंगे। ध्यान रखें, कोई किसी को छू न रहा हो, अगर छू रहा हो तो थोड़ा हट कर बैठ जाएंगे। कोई भी किसी को छूता हुआ नहीं हो।
आंख बंद कर लें, शरीर ढीला छोड़ दें। शरीर ढीला छोड़ दें, आंख बंद कर लें। और देखें, अंधकार ही अंधकार है...चारों ओर अंधकार ही अंधकार है...अनंत अंधकार है...सब ओर, सब दिशाओं में अंधकार ही अंधकार है...भाव करें, देखें, अनुभव करें, अंधकार ही अंधकार है...सब मिट गया, बस अंधकार ही अंधकार रह गया। चारों ओर घुप्प अंधकार है। इस अंधकार को पांच मिनट तक अनुभव करते रहें, अंधकार ही अंधकार है...। न कुछ सूझता, न कुछ दिखाई पड़ता, बस अंधकार ही अंधकार है...। और जैसे-जैसे अंधकार गाढ़ा होगा, और जैसे-जैसे अंधकार घना होगा, और जैसे-जैसे अंधकार ही अंधकार रह जाएगा, वैसे-वैसे एक अपूर्व शांति सब तरफ से उतरने लगेगी। रोएं-रोएं में, हृदय की धड़कन-धड़कन में, श्वास-श्वास में शांति उतर आएगी।
देखें, अनुभव करें, अंधकार ही अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...एक पांच मिनट के लिए बस अंधकार को ही देखते रहें, और देखते-देखते ही मन शांत होता जाएगा। अंधकार ही अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...अनंत अंधकार है...सब ओर अंधकार है...अंधकार ही अंधकार है...। और मन शांत होता जा रहा है, मन शांत हो रहा है, मन शांत हो रहा है, मन शांत हो रहा है, मन बिलकुल शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया...अंधकार ही अंधकार है...अनंत अंधकार है...चारों ओर अंधकार है...अंधकार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया है। अंधकार ही अंधकार है...बस केवल अंधकार है...और मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया...मन शांत हो गया है, मन बिलकुल शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया। अंधकार ही अंधकार है...चारों ओर अंधकार है...अनंत अंधकार है...। और मन, और मन बिलकुल शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया। इस अंधकार को ठीक से पहचान लें। समाधि का पहला चरण है: परिपूर्ण अंधकार, जहां कुछ देखने को नहीं, जहां कुछ खोजने को नहीं, अंधकार, केवल अंधकार है। और मन शांत हो गया।
अब धीरे-धीरे आंखें खोल लें...जैसी शांति भीतर है वैसी ही बाहर भी दिखाई पड़ेगी। धीरे-धीरे आंख खोलें...बाहर भी सब शांत है, धीरे-धीरे आंख खोल लें...
फिर दूसरा चरण समझें, और उसके लिए तैयार हों।
समाधि का दूसरा चरण है: अकेले होने का बोध।
अकेले होने से ज्यादा सुंदर कुछ भी नहीं है।
मैंने सुना है कि किसी देश में, किसी गरीब माली के घर में, बहुत से सुंदर फूल खिले थे। सम्राट तक खबर पहुंच गई थी। सम्राट भी प्रेमी था फूलों का। उसने कहा, मैं भी आऊंगा। कल सुबह जब सूरज ऊगेगा, तो तेरी बगिया में फूल देखने मुझे भी आना है।
माली ने कहा, स्वागत है आपका।
दूसरे दिन सुबह सम्राट पहुंचा। वजीरों ने कहा था, मित्रों ने कहा था, हजारों फूल खिले हैं। लेकिन जब सम्राट पहुंचा तो बहुत चकित रह गया--सारे बगीचे में बस एक डंठल पर एक ही फूल था! सम्राट ने माली से कहा, मैंने तो सुना था बहुत फूल खिले हैं। वे सब फूल कहां हैं?
तो वह माली हंसने लगा, उसने कहा, भीड़ में सौंदर्य कहां! एक को ही बचा लिया है। क्योंकि सुना है जानने वालों से कि अकेले के अतिरिक्त और सौंदर्य कहीं भी नहीं।
पता नहीं वह सम्राट समझा या नहीं समझा, लेकिन निश्चित ही वह माली केवल फूलों का माली न रहा होगा, वह आदमियों का भी माली रहा होगा। जीवन में जो भी सुंदर है वह अकेले में ही खिलता है, फूलता है, सुगंधित होता है। जीवन में जो भी श्रेष्ठ है वह सब अकेले में पैदा हुआ है। भीड़ ने कुछ भी महान को जन्म नहीं दिया--न कोई गीत, न कोई सौंदर्य, न कोई सत्य, न कोई समाधि। नहीं, भीड़ में कुछ भी पैदा नहीं हुआ। जो भी जन्मा है, एकांत में, अकेले में जन्मा है।
लेकिन हम अकेले होते ही नहीं। हम सदा भीड़ में घिरे हैं। या तो बाहर की भीड़ से घिरे हैं या भीतर की भी भीड़ से घिरे हैं। भीड़ से हम छूटते ही नहीं। क्षण भर को अकेले नहीं होते। इसलिए जो भी महत्वपूर्ण है जीवन में, वह चूक जाता है।
समाधि में तो केवल वे ही जा सकते हैं, जो बाहर की ही भीड़ से नहीं, भीतर की भीड़ से भी मुक्त हो जाते हैं, बस अकेले रह जाते हैं। निपट अकेले,टोटलीअलोन, कुछ है ही नहीं, बस अकेला हूं, अकेला हूं, अकेला हूं। सत्य भी यही है। अकेले ही जन्मते हैं, अकेले ही मरते हैं, अकेले ही होते हैं, लेकिन भीड़ का भ्रम पैदा कर लेते हैं कि चारों तरफ भीड़ है। उस भीड़ के बीच इस भांति खो जाते हैं कि कभी पता ही नहीं चलता कि मैं कौन हूं।
तो दूसरा चरण है: अकेले हो जाने का भाव। पांच मिनट तक हम अकेले हो जाने का भाव करेंगे।
आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। एक मिनट तक अंधकार का भाव करें, चारों ओर अंधकार ही अंधकार है, अनंत अंधकार है, अंधकार, अंधकार, अंधकार। न कुछ दिखाई पड़ता, न कुछ सूझता, बस अंधकार ही अंधकार है। कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता--लेकिन मैं हूं, अंधकार है और मैं हूं, और मैं बिलकुल अकेला हूं। न कोई संगी है, न कोई साथी है। अकेला हूं, बिलकुल अकेला हूं। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। श्वास-श्वास में, शरीर के रोएं-रोएं में, मन के कोने-कोने में, बस एक ही भाव बैठ जाने दें: मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। और जैसे-जैसे यह भाव गहरा होगा, वैसे-वैसे अपूर्व शांति जन्मने लगेगी, भीतर सब शांत हो जाएगा।
मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। न कोई संगी, न कोई साथी, रास्ता सूना है, निर्जन है, अंधकार है और मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं...पांच मिनट के लिए बिलकुल अकेले हो जाएं...मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं...
मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं...मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं...मन बिलकुल शांत हो गया है, मन बिलकुल शीतल और शांत हो गया है...मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं...
मन शांत हो गया है, मन बिलकुल शांत हो गया है, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया। मैं अकेला हूं। डूब जाएं, बिलकुल डूब जाएं, अंधेरा है, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। कोई नहीं, कोई नहीं, कोई संगी नहीं, साथी नहीं, मैं अकेला हूं। और अकेले होते-होते सब शांत हो जाता है...
मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया, मन बिलकुल शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। और जैसे-जैसे अकेले हो जाएंगे, वैसे-वैसे ही शांत हो जाएंगे। श्वास-श्वास शांत हो गई है,रोआं-रोआं शांत हो गया है, मन शांत हो गया है। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। देखें, भीतर देखें, सब कैसा शांत हो गया, सब कैसा शांत हो गया। इस अकेले होने को ठीक से पहचान लें, समाधि का दूसरा चरण है। ठीक से पहचान लें, यह अकेला होना क्या है, यह अकेले होने की शांति क्या है। मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। और मन शांत हो गया, मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया है।
अब धीरे-धीरे आंख खोलें...जैसी शांति भीतर है, वैसी ही शांति बाहर है। और जो भीतर अकेला होना पहचान ले, वह फिर बाहर की भीड़ में भी अकेला है। देखें...आंख खोलें...बाहर देखें...कितने लोग हैं चारों ओर, लेकिन फिर भी मैं तो अकेला हूं। धीरे-धीरे आंख खोलें...देखें...कितने लोग हैं चारों ओर, फिर भी मैं तो अकेला हूं।
अब तीसरे प्रयोग को समझ लें, फिर उसे करें।
तीसरा प्रयोग है: मरने का, मिटने का, ना-कुछ हो जाने का।
जाता था कोई बुद्ध के पास, पूछता था, ज्ञान कहां पाएं? बुद्ध कहते, चले जाओ मरघट में। चौंकता वह आदमी! सोचता, सुनने में भूल हो गई। फिर पूछता, समझा नहीं। आनंद पाना है, सत्य पाना है। कहां जाऊं? कैसे पाऊं? बुद्ध कहते, मरघट में। तब भूल की गुंजाइश न रहती। सोचता, शायद मजाक करते होंगे। लेकिन बुद्ध हंसते और कहते, मजाक नहीं करता, जाओ महीने, दो महीने, चार महीने मरघट में ही रह जाओ। अनेक भिक्षुओं को मरघट में रहने भेज देते।
सोचें, तीन-चार महीने मरघट में रहना पड़े आपको, सुबह से सांझ, सांझ से सुबह। सूरज भी वहीं निकले, सूरज वहीं ढले, रात वहीं आए, दिन वहीं आए, सांझ वहीं, सुबह वहीं, अंधेरा वहीं घिरे, प्रकाश वहां फैले। और दिन भर कोई आए, रोते हुए लोग आएं, लाशें आएं,अरथियां आएं, आग पर चढ़ें, चिता में जलें, और दिन भर यही चले, और आप देखते रहें, देखते रहें। क्या यह असंभव है कि कुछ दिन में किसी क्षण आपको यह खयाल आ जाए कि यह और कोई नहीं जल रहा, मैं ही जल रहा हूं, समय का थोड़ा फासला है। आज जो जल रहा है, कल मैं जलूंगा।
क्या मुश्किल है कि मरघट पर खयाल न आ जाए? और जिसे यह खयाल आ जाए कि मैं भी मरूंगा, उसकी जिंदगी में बड़ा फर्क हो जाता है। तब फिर वह वैसा ही नहीं जीता जैसा कल तक जीता था। और जिसे यह खयाल आ जाए मैं मरूंगा ही, उसे यह भी पता चल जाता है कि जो मरेगा ही वह मरा हुआ होगा ही, अन्यथा मरेगा कैसे? और जिसे यह खयाल आ जाए कि कुछ है मेरे भीतर जो मरेगा ही, उसकी यह खोज भी शुरू हो जाएगी कि होगा जरूर कुछ--शायद हो या न हो, पता तो लगाएं--जो नहीं मरेगा। लेकिन इसका पता तो बिना मरे कैसे लगे? मरें तो ही पता लगे कि कुछ बचता है या नहीं बचता है?
तो समाधि का गहरा से गहरा जो चरण है, वह है मर जाने की प्रतीति--मर गया हूं मैं, समाप्त हो गया हूं मैं। और जैसे ही कोई देख ले अपने को ही मरा हुआ, पड़ा हुआ, वैसे ही उसे उसकी पहचान भी हो जाती है जो देख रहा है। खुद को ही मरा हुआ जो देख रहा है वह मैं नहीं हूं, वह वही है जो है। या ऐसा कहें कि वही मैं हूं जो असली मेरा मैं है--जो देखता है, जो जानता है, जो मरते समय यह भी देखेगा कि मैं मर रहा हूं।
सुकरात मरा, जहर दिया था उसे, लेट गया था जहर पीकर। मित्र रो रहे थे चारों तरफ, और सुकरात कहता था, रोओ मत, देखो मैं मर रहा हूं। लेकिन उन्हें कहां फुर्सत थी देखने की! सुकरात कहता था, देखो मेरे पैर तक मैं मर गया हूं, घुटने तक मर गया हूं, अब घुटने तक का मुझे पता नहीं चलता कि शरीर है। लेकिन बड़ा आश्चर्य है, घुटने तक मैं मर गया हूं, लेकिन मैं तो जितना था उतना ही अब भी मालूम हो रहा हूं! फिर सुकरात कहने लगा, कमर तक मर गया हूं, अब कमर तक मुझे पता नहीं चलता। लेकिन सुनो, आश्चर्य, कि मैं तो उतना ही हूं जितना था! फिर सुकरात कहने लगा, हाथ भी शिथिल हो गए है, हाथ भी मर गए हैं, अब हाथ हिला नहीं सकता। लेकिन मैं तो अब भी हूं! जो हाथ को हिलाता था वह अब भी है! तब सुकरात कहने लगा, जल्दी ही हृदय की धड़कन भी बंद हो जाएगी। शायद मैं तुमसे कहने को न बचूं कि अब भी हूं। लेकिन जब पैर के मरने पर मैं न मरा; जब हाथ के मरने पर मैं न मरा; जब कमर तक सब समाप्त हो गया, मैं न मरा; और जब मेरी आंखें नहीं खुल रहीं और मैं हूं; तो शायद जब मेरा हृदय भी बंद हो जाएगा, तब भी मैं होऊंगा। लेकिन मैं शायद बचूं न कहने को।
ध्यान की, समाधि की गहरी प्रतीति में ऐसा ही होगा। लगेगा: यह रहा शरीर, मर गया। यह पड़ा है शरीर, यह धड़कन चल रही है--दूर हमसे, मीलों फासले पर। यह श्वास भी चल रही है, लेकिन जैसे कोई और लेता हो। और यह रहा मैं, और देखता हूं, जानता हूं, साक्षी हूं। मैं कुछ और हूं और जिसे मैंने समझा था कि मैं हूं वह मैं नहीं हूं। लेकिन तीसरा प्रयोग गहरे में उतरे बिना खयाल में नहीं आ सकता है। इसलिए अब हम तीसरा प्रयोग करें। फिर चौथे प्रयोग में तीनों प्रयोगों को इकट्ठा करेंगे।
आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। एक मिनट देखें: अंधकार ही अंधकार है, चारों ओर अंधकार ही अंधकार है। चारों ओर अंधकार ही अंधकार है...अनंत अंधकार है...। फिर एक मिनट जानें--मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं। और अब तीसरा प्रयोग करें, मैं मर रहा हूं। भाव करें, मर रहा हूं। यह शरीर, यह श्वास, यह प्राण, यह धड़कन, यह सब जा रही, सब जा रही। मैं मर रहा हूं, मैं मर रहा हूं, मैं मिटता जा रहा हूं, मैं मर रहा हूं, मैं मिट रहा हूं, मैं समाप्त हो रहा हूं। मैं मर गया हूं, मैं हूं ही नहीं। मैं मिट गया हूं, मैं हूं ही नहीं। पांच मिनट के लिए इस न होने में डूब जाएं। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं। और जैसे-जैसे डूबेंगे, वैसे ही अपूर्व शांति सब तरफ से घेर लेगी। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं हूं ही नहीं। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं। और मन बिलकुल शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं। मन शांत हो गया, मन बिलकुल शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया है, मन शांत हो गया है, मन बिलकुल शांत हो गया है। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं बिलकुल नहीं हूं। मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया, मन शांत हो गया। मैं नहीं हूं, वही रह गया जो सदा है। मैं नहीं हूं, वही बच रहा जो सदा है। मैं नहीं हूं, लहर खो गई, सागर ही रह गया, लहर खो गई, सागर ही रह गया। इस भाव को ठीक से पहचान लें, समाधि का तीसरा चरण, इसे ठीक से प्राणों में सम्हाल लें। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, वही रह गया है वही रह गया है जो है, जो सदा है, जो सब में है।
फिर धीरे-धीरे आंख खोलें...देखें...सदा देखा है, मैं था, ऐसे...आंख खोलें, ऐसे देखें जैसे मैं नहीं हूं, तब भीतर से वही देखता है, जो बाहर भी दिखाई पड़ रहा है। धीरे-धीरे आंख खोलें...देखें...ऐसे जैसे मैं नहीं हूं, तब वही है भीतर और वही है बाहर, वही है देखने वाला, वही है जो दिखाई पड़ रहा है। धीरे-धीरे आंख खोलें...।
ये तीन चरण हैं। समाधि इन तीनों का इकट्ठा प्रतिफलन, इकट्ठा जोड़ है। एक ही साथ अंधेरा--अकेला होना और फिर मिट जाना--इन तीनों को इकट्ठा करेंगे। और जब तीनों को इकट्ठा करें, तो परिपूर्ण भाव से करना है। पूरे भाव से छोड़ ही देना है अपने को। कुछ बचाना ही नहीं, छोड़ ही देना, छोड़ देना, सब छोड़ देना, ताकि वही रह जाए जिसे हम छोड़ना भी चाहें तो नहीं छोड़ सकते हैं।
आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें और समाधि में प्रवेश करने की तैयारी करें। शरीर को ढीला छोड़ दें, आंख बंद कर लें। शरीर गिरे तो गिर जाए,चिंता न करें; झुके तो झुक जाए,चिंता न करें; ढीला छोड़ दें, आंख बंद कर लें।
पहला चरण: अंधकार ही अंधकार है, बस अंधकार ही अंधकार है, चारों ओर अंधकार ही अंधकार है...। छोड़ दें, बिलकुल अंधेरे में छोड़ दें, चारों ओर अंधकार ही अंधकार है, अंधकार ही अंधकार है...। शरीर शिथिल होता जाएगा, छोड़ दें...शरीर शिथिल हो रहा, शरीर शिथिल हो रहा, सब शिथिल हो जाएगा। बस अंधकार ही अंधकार है...और सब शांत हो गया। श्वास भी धीमी और शांत हो जाएगी, उसे भी छोड़ दें। श्वास भी शांत होती जा रही है। मैं अकेला हूं, मैं बिलकुल अकेला हूं, कोई संगी नहीं, कोई साथी नहीं, मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं...
और मैं भी खोता जा रहा हूं, जैसे बूंद सागर में गिरे और खो जाए, मैं भी खो रहा हूं, मैं भी मिट रहा हूं, मैं भी मर रहा हूं। सब समाप्त होता जा रहा है। मैं मर रहा हूं, मैं मर रहा हूं, मैं मिट रहा हूं। न यह शरीर हूं मैं, न यह श्वास हूं मैं, न यह मन हूं मैं, यह सब मिट रहा है, यह सब समाप्त हो रहा है, यह सब मर रहा है...
मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं। छोड़ दें, अपने को बिलकुल छोड़ दें, मिट जाएं। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं। और भीतर, और भीतर, और गहरे में छोड़ दें अपने को, कहीं कोई पकड़ न रखें, मिट ही जाएं। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं। सब शांत, सब मौन हो गया है। सब शांत, सब मौन हो गया है। सब शून्य हो गया है।
इसी शून्य में जागता है, इसी शून्य में उठता है आनंद। सब तरफ से घेर लेगा। शांति और आनंद सब तरफ बरसने लगेंगे। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं मिट गया हूं, मैं समाप्त हो गया हूं। एक अपूर्व शांति, एक अपूर्व आनंद की लहर दौड़ने लगेगी। मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं...वही रह गया जो सदा है...वही रह गया जो मेरे पहले था और मेरे बाद भी होगा...मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं, मैं नहीं हूं...मन शांत हो गया, प्राण शांत हो गए, सब शांत हो गया। आत्मा की झील पर कोई लहर नहीं, सब शांत हो गया। आत्मा के सागर पर एक भी लहर नहीं, सब शांत हो गया। और पहचानें, देखें--भीतर कैसा आनंद! पहचानें--भीतर कौन है यह जो जान रहा, देख रहा? कौन है यह साक्षी, जो स्वयं को ही मरा हुआ देख रहा? कौन है? भीतर, और भीतर, और भीतर देखें--कौन है जो जान रहा? कौन है जो ज्ञाता है? कौन है जो द्रष्टा है? यही है, यही है सत्य। आत्मा आनंद से भर गई है।
अब धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्वास लें। प्रत्येक श्वास आनंद से, शांति से भरी हुई रहेगी। धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्वास लें, धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्वास लें। प्रत्येक श्वास शांति और आनंद से भर गई है। फिर धीरे-धीरे आंख खोलें। जो भीतर है वही बाहर भी है।
इस प्रयोग को रात सोते समय करें, और करते-करते ही सो जाएं। और ऐसा न समझें कि मेरे साथ दो-चार दिन कर लिया तो हो गया, उसे रोज करते रहें रात सोते वक्त। धीरे-धीरे गहरे से गहरा उतर जाएगा, और आप कब दूसरे आदमी हो गए, यह आपको पता भी नहीं चलेगा। कब कली फूल बन गई, कहां पता चलता है! कब पक्षी उड़ गया और पंख फैला दिए आकाश में, कब पता चलता है! लेकिन जब फैल जाते हैं आकाश में पंख, तो सब बदल जाता है। एक जिंदगी है जमीन पर सरकने की, और एक जिंदगी है मुक्त आकाश में उड़ने की। और जब खिल जाती है कली--शोर नहीं होता, आवाज नहीं होती, किसी को पता नहीं चलता, कहीं खटका नहीं होता--लेकिन सुगंध बिखर जाती है चारों ओर, और धन्य हो जाता है फूल खिल कर पूरा, आनंद से विभोर, वह प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाता है। धीरे-धीरे रोज करते रहें रात सोते समय, कभी भी, कभी भी घटना घट सकती है।
और कल के लिए एक सूचना। तीन रात हमने ध्यान किया, हम समझ गए कि क्या करना है। कल एक चौथा अलग ही प्रयोग करेंगे। लेकिन कल सिर्फ वे ही लोग आएंगे जो तीन दिन आए हैं, किन्हीं नये मित्रों को न ले आएं। कल होगा मौन पूरे घंटे भर। साइलेंटकम्युनिकेशन। शब्द से बहुत कुछ कहता हूं, लेकिन जो कहने योग्य है वह शब्द से नहीं कहा जा सकता है। तीन दिन हम चुप बैठे हैं यहां, कल घंटे भर मेरे पास चुप बैठेंगे। न मैं बोलूंगा कुछ, न आप बोलेंगे कुछ। लेकिन फिर भी मैं बोलूंगा--उसी मौन से! और फिर भी आप सुनेंगे--उसी मौन से! चुपचाप बैठ कर सुनने की प्रतीक्षा भर करना, शांत हो जाना, जैसे हम ध्यान करते हैं, ऐसा ही चुपचाप घंटे भर कल बैठेंगे। मैं मौजूद रहूंगा, किसी के मन में अचानक लगे कि मेरे पास आना है, तो वह चुपचाप मेरे पास आ जाएगा, दो मिनट मेरे पास बैठेगा, फिर अपनी जगह लौट जाएगा। लेकिन कोई आ रहा है दूसरा, यह देख कर कोई न आए। किसी को आने जैसा लग जाए, आ जाए। और किसी को आने जैसा लगे, तो संकोच में रुके भी न, आ ही जाए।
 आज इतना ही  

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

आठ पहर यूं झूमते-प्रवचन-05

मेरे प्रिय आत्मन्!
बोलते समय, बोलने के पहले मुझे यह सोच उठता है हमेशा, किसान सोच लेता है कि जिस जमीन पर हम बीज फेंक रहे हैं उस जमीन पर बीज अंकुरित होंगे या नहीं? बोलने के पहले मुझे भी लगता है, जिनसे कह रहा हूं वे सुन भी सकेंगे या नहीं? उनके हृदय तक बात पहुंचेगी या नहीं पहुंचेगी? उनके भीतर कोई बीज अंकुरित हो सकेगा या नहीं हो सकेगा? और जब इस तरह सोचता हूं तो बहुत निराशा मालूम होती है। निराशा इसलिए मालूम होती है कि विचार केवल उनके हृदय में बीज बन पाते हैं जिनके पास प्यास हो और केवल उनके हृदय सुनने में समर्थ हो पाते हैं जिनके भीतर गहरी अभीप्सा हो। अन्यथा हम सुनते हुए मालूम होते हैं, लेकिन सुन नहीं पाते। अन्यथा हमारे हृदय पर विचार जाते हुए मालूम पड़ते हैं, लेकिन पहुंच नहीं पाते और उनमें कभी अंकुरण नहीं होता है।

प्यास के बिना कोई भी सुनना संभव नहीं है। इसलिए जरूरी नहीं है कि जितने लोग बैठे हैं वे सभी सुनेंगे। यह भी जरूरी नहीं है कि उन तक मेरी बात पहुंचेगी। लेकिन इस आशा में कि शायद किसी के पास पहुंच जाएगी, तो भी ठीक है। अगर एक के पास भी बात पहुंच जाए तो परिणाम, तो परिणाम होगा, निश्चित होगा।
पर मैं आशा करूं कि सबके पास पहुंच सकेगी और यह विश्वास करूं कि सब प्यास लेकर इकट्ठे हुए होंगे। हुआ ऐसा है कि दुनिया में प्यास सत्य के लिए, परमात्मा के लिए कम होती जा रही है। सत्य के लिए हमारी अभीप्सा कम होती जा रही है। यह मैं क्यों कह रहा हूं? यह मैं इसलिए कह रहा हूं, धर्म के लिए हमारी प्यास कम होती जा रही है। यह मैं क्यों कह रहा हूं? यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि अगर आपकी धर्म के लिए प्यास हो, तो आप किसी धर्म के सदस्य नहीं हो सकते हैं। अगर आपकी धर्म के लिए प्यास हो, तो आप हिंदू, जैन, मुसलमान और ईसाई नहीं हो सकते हैं।
जिसके भीतर प्यास होगी, वह खोज करेगा, वह साहस करेगा, अनुसंधान करेगा, वह साधना करेगा और सत्य तक पहुंचने के लिए संघर्ष करेगा। जिनके भीतर प्यास नहीं होती, वे मां-बाप जो विचार दे देते हैं, उन्हें स्वीकार कर लेते हैं और उनको ढोते रहते हैं। जिनका धर्म जन्म से निश्चित होता है, जानना चाहिए उन्हें धर्म की कोई प्यास नहीं है। अन्यथा हम दूसरों के दिए भोजन से तृप्त नहीं होते और हम दूसरों के पहने हुए कपड़े पहनने को राजी नहीं होते। लेकिन हम, दूसरों के उधार विचार स्वीकार कर लेते हैं और हम परंपरा से सहमत हो जाते हैं। और जन्म का आकस्मिक संयोग हमें जिस घर में पैदा कर देता है हम उस धर्म को अंगीकार कर लेते हैं। ये हमारे भीतर बुझी हुई प्यास के लक्षण हैं।
जिनके भीतर परंपरा के प्रति संदेह नहीं उठता, जिनके प्रति प्रचलित धारणाओं और मान्यताओं के प्रति जिज्ञासा और प्रश्न खड़े नहीं होते हैं, उनके भीतर कोई प्यास नहीं है। अगर उनके भीतर प्यास हो, तो प्यास की अग्नि उन्हें विद्रोह में ले जाएगी।
धर्म बुनियादी रूप से या सत्य या धर्म और सत्य की खोज एक विद्रोह है। वह एसेंसियलीरिबेलियस है। तो आपके भीतर अगर विद्रोह पैदा नहीं होता है और आप चुपचाप सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं, जो परंपरा ने और अतीत ने आपको दिया है, आप कभी धार्मिक नहीं हो सकते हैं। महावीर ने वह स्वीकार नहीं किया जो उन्हें दिया गया था और न बुद्ध ने स्वीकार किया और न क्राइस्ट ने स्वीकार किया। दुनिया में जो भी लोग सत्य को उपलब्ध हुए हैं, उन्होंने परंपरा से दिए गए सत्यों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहाः हम खोजेंगे, हम जानेंगे, हम पहचानेंगे, हम अनुभूति करेंगे तो स्वीकार करेंगे। अनुभूति के पहले जो स्वीकार करने को तैयार है, उसकी प्यास झूठी है। और भी प्यास इसलिए झूठी मालूम होती है, अगर कोई आदमी कहे कि मुझे बहुत प्यास लगी है और पानी शब्द से ही तृप्त हो जाए, तो हम क्या कहेंगे? हम कहेंगे, प्यास नहीं है। हम आत्मा, परमात्मा और इन सारे शब्दों से तृप्त हो जाते हैं। इसका अर्थ है, हमारे भीतर कोई जलती हुई प्यास नहीं है, अन्यथा प्यास हो तो पानी चाहिए।
पानी शब्द से कोई कैसे तृप्त होगा? लेकिन मैं देखता हूं, जो धार्मिक दिखाई पड़ते हैं, वे शास्त्रों को पढ़ते हैं और तृप्त हो जाते हैं। यह प्यास जरूर झूठी है। शास्त्र जिसकी प्यास को बुझा देते हों वह प्यास सच्ची नहीं हो सकती, क्योंकि शास्त्र में सिवाय शब्दों के और क्या है? शास्त्र में सिवाय शब्दों के और कुछ भी नहीं है। सत्य तो मेरे और आपके भीतर है। सत्य तो जगतसत्ता के भीतर है। जो अपने भीतर और जगतसत्ता के भीतर प्रवेश नहीं करेगा, वह सत्य को उपलब्ध नहीं हो सकता। इसलिए जिसकी प्यास गहरी होती है, इसलिए जिसकी अभीप्सा तीव्र होती है, वह सहमत नहीं होता। वह किसी मान्यता से बंधता नहीं, सारी मान्यताओं को तोड़ देता है। और जब कोई मनुष्य सारी मान्यताओं को, सारी धारणाओं को तोड़ देता है, तो उसके भीतर एक इतनी घबड़ाहट, इतनी बेचैनी, इतनी अशांति, इतने असंतोष का जन्म होता है कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। और जब वैसा असंतोष भीतर पैदा हो जाए और भीतर लपटें जलने लगें खोज के लिए, जीवन के लिए, तभी कोई व्यक्ति सामान्य जीवन चेतना से ऊपर उठ कर परम जीवन चेतना से संबंधित हो पाता है।
इसलिए अगर किसी ने कहा हो कि धर्म संतोष है, तो मैं कहना चाहता हूं, गलत है वह बात। धर्म बहुत गहरा असंतोष है। इसलिए अगर कोई सिखाता हो कि धार्मिक आदमी वह है जो संतुष्ट है, तो मैं कहूंगा, बिलकुल ही, बिलकुल ही गलत बात है। धार्मिक आदमी वह है जो सबसे असंतुष्ट है, जिसे कुछ भी संतुष्ट नहीं कर पाता है। और जब असंतोष तीव्र होता है, तो उस तीव्र असंतोष की ज्वाला में ही उसकी चेतना ऊपर उठनी शुरू होती है।
आरोहण गहरे असंतोष से शुरू होता है। पता नहीं आपके भीतर ऐसी प्यास और ऐसा असंतोष है या नहीं। लेकिन ईश्वर से मैं कामना करूंगा कि ऐसी प्यास पैदा हो। और अपने जन्म की बातों और विचारों से मुक्त हो जाएं। क्योंकि जो उनसे ही सहमत रहेगा, वह उनसे ही सहमत मर जाएगा; उसकी अपनी कोई अनुभूति नहीं हो सकती है। कृपा करें, परंपरा को दूर हटा दें। जो दूसरों ने दिया है उसे अलग रख दें और पूछें अपने से कि मेरी उपलब्धि क्या है? अनुभूति के जगत में आपकी अपनी उपलब्धि क्या है?
मैंने सुना है, एक संन्यासी बहुत दिन तक अपने गुरु के आश्रम पर था। बहुत दिन उसने अपने गुरु की बातें सुनीं। लेकिन उसकी बातें सुन कर उसे ऐसा लगने लगा यह तो वही-वही बातें रोज-रोज दोहरा देता है। कहीं और जाऊं और खोजूं। और जब उसके मन में यह संकल्प घना हो रहा था कि मैं कहीं और जाऊं और खोजूं, तभी एक और संन्यासी का आगमन उस आश्रम में हुआ। उस संन्यासी ने आते से ही इतनी सूक्ष्म और बारीक बातें कीं, इतनी तत्वचिंतन, इतने तत्व की गहरी-गहरी बातों का ऊहापोह किया कि उस युवा संन्यासी, जो आश्रम छोड़ने को था, उसके मन में हुआ कि अगर कोई गुरु हो तो ऐसा होना चाहिए। और उसके मन में हुआ कि मेरा जो बूढ़ा गुरु है, वह ये बातें सुन कर कैसा संकोच, कैसी हीनता और कैसी दीनता नहीं अनुभव करता होगा?
कोई दो घंटे तक आगंतुक संन्यासी ने अपनी बातें समझाईं और जब वह अपनी बातें समझा चुका, तो उसने अभिमान से सबकी तरफ देखा कि कैसा लगा? लोगों को कैसा लग रहा है? उसने उस बूढ़े संन्यासी की तरफ देखा, जिसका कि आश्रम था। वह बूढ़ा संन्यासी हंसने लगा, और उसने जो कहा वह मन में रख लेने जैसा है। उसने कहाः मेरे मित्र, मैं दो घंटे तक संपूर्ण हृदय से तल्लीन होकर सुनता रहा कि तुम कुछ बोलो, लेकिन तुम तो कुछ बोलते नहीं। वह संन्यासी हैरान हुआ। उसने कहाः आप पागल हैं, मैं दो घंटे तक बोलता ही था और क्या करता था। उस बूढ़े संन्यासी ने कहा कि तुम बोले, यह मैं सुनता रहा, लेकिन तुम नहीं बोलते, तुम्हारे भीतर से दूसरे बोल रहे हैं--शास्त्र बोले रहे हैं, संस्कार बोल रहे हैं, परंपरा बोल रही है, समाज बोल रहा है, लेकिन तुम नहीं बोल रहे।
और निश्चित ही अपने भीतर खोजें कि जो भी आपको प्रतीत होती हैं बातें, जो आपको सत्य मालूम होती हैं अनुभूतियां, वे आपकी हैं या दूसरे लोग बोल रहे हैं? और उस आदमी से दरिद्र आदमी इस जमीन पर कोई भी नहीं है जिसके भीतर अपना कोई स्वर न हो, सब स्वर पराए हों। और उस आदमी से कमजोर और दीन-हीन आदमी कोई भी नहीं है, जिसके पास अपनी कोई अनुभूति न हो, सब अनुभूतियां दूसरों की हों। ऐसा आदमी केवल एक प्रतिध्वनि मात्र है जिसमें दूसरों की आवाजें गूंज रही हैं और प्रतिध्वनित हो रही हैं।
इस पर मैं बोल रहा हूं, इस यंत्र पर मैं बोल रहा हूं, यह मेरी आवाज को प्रतिध्वनित कर रहा है। क्या आपको खयाल नहीं आता कि आपके भीतर भी महावीर, बुद्ध, कृष्ण, क्राइस्ट और मोहम्मद की आवाजें प्रतिध्वनित हो रही हैं? क्या आपकी अपनी कोई आवाज है? क्या आपकी अपनी कोई ध्वनि है? अगर सब प्रतिध्वनियां हैं, तो आप कोरे हैं और खाली हैं और आप मुर्दा हैं और आप जीवित नहीं हैं। आपकी अपनी कोई अनुभूति ही आपको जीवन दे सकेगी। न कोई शास्त्र जीवन देता है, न कोई गुरु जीवन देता है, अपनी अनुभूति ही जीवन देती है। और जिसके पास जितनी ज्यादा अनुभूतियां हों, वह उतना ही समृद्ध, वह उतना ही धनी, वह उतना ही संपदाशाली हो जाता है। लेकिन हम किसी ऐसी संपदा की तलाश में नहीं हैं, हम तो उस संपदा की तलाश में हैं जिससे बड़े मकान बनते हैं, बड़ा यश बनता है, बड़े भवन बनते हैं, बड़े पद उपलब्ध होते हैं, हम उस संपदा की तलाश में हैं। हम क्षुद्र संपदा को तो खुद खोजते हैं, लेकिन विराट संपदा को दूसरों की मान लेते हैं। क्या यह इस बात की सूचना नहीं है कि विराट संपदा की हमें प्यास ही नहीं है?
हम यह नहीं मानते कि महावीर और बुद्ध के पास बहुत संपत्ति थी, तो हमें क्या करना है संपत्ति से? हम अपनी संपत्ति खोजते हैं। लेकिन जब सत्य का सवाल उठता है, तो हम कहते हैं, महावीर, बुद्ध; गीता और कुरान और बाइबिल; और हम कहते हैं, सत्य उनमें है। जब सत्य का सवाल उठता है, तो हम दूसरों के सत्य को मान लेते हैं और जब संपत्ति का सवाल उठता है, तो हम अपनी संपत्ति खोजते हैं। इससे ज्यादा बेईमानी और कोई मनुष्य अपने साथ दूसरी नहीं कर सकता है। अगर संपत्ति अपनी खोजनी है, क्षुद्र संपत्ति अपनी खोजनी है, तो विराट और सत्य की संपत्ति भी अपनी ही खोजनी होगी। और यह खोज शुरू हो सके, इसके पहले यह समझना होगा कि मेरे पास कुछ है।
मैं देश के कोने-कोने में घूमा। न मालूम कितने-कितने तत्वज्ञानियों को देखा और सुना और मैंने पाया, उन सबसे शास्त्र बोल रहे हैं, उनके पास अपना कुछ नहीं है। उनसे बड़ी-बड़ी तात्विक बातें निकल रहीं हैं, लेकिन सब झूठी हैं, क्योंकि जो दूसरे से ली गई हैं उनकी सच्चाई उस दूसरे आदमी के साथ रही होगी, वह आपके साथ नहीं है। जिसकी आप प्रतिधुन कर रहे हैं, जिसे आप केवल प्रतिध्वनित कर रहे हैं, वह सत्य आपके लिए सत्य नहीं हो सकता। सत्य तभी सत्य होता है वह जब मेरी अनुभूति हो, जब वह दूसरे की अनुभूति हो तो असत्य हो जाता है। और यही वजह है कि सारे धर्म, जब उन्हें जन्म मिलता है तो जीवित होते हैं। वे उस आदमी के साथ जीवित रहते हैं जिसके पास सत्य था और उसके हटते ही मुर्दा होने शुरू हो जाते हैं, और फिर लाशें रह जाती हैं। और फिर लकीरें रह जाती हैं मुर्दा, जिन्हें हम पीटते रहते हैं। दुनिया इस तरह के मुर्दा धर्मों से परेशान हो गई है। ये सब मरे हुए धर्म हैं। ये मरे हुए इसलिए हैं कि इनको मानने वाले के पास अपना सत्य नहीं है।
अपना सत्य सबसे बड़ी बात है। और मैं आपको कहूं, वही सबसे बड़ी संपत्ति भी है। और जो ऐसे किसी सत्य को स्वयं उपलब्ध नहीं होता है वह आज नहीं कल पछताएगा। और तब उसे दिखाई पड़ेगा कि उसकी खोज किए गए पद, उसकी इकट्ठी की गई संपदाएं, सब व्यर्थ हो गई हैं। मृत्यु सब छीन लेती है, केवल सत्य को छोड़ कर। मृत्यु सब छीन लेती है, केवल सत्य को छोड़ कर। और हम ऐसे पागल हैं कि जीवन भर में हम शेष सब खोजते हैं, केवल सत्य को छोड़ कर।
मैंने सुना है, और मुझे प्रीतिकर रहा, और मैंने जगह-जगह लोगों को कहा। नानक एक गांव से निकले थे और उस गांव में एक रात वे रुके। उस गांव में जो बहुत समृद्ध और धनी-मानी व्यक्ति था, उसने आकर उनके चरणों कहा कि मेरी संपत्ति ले लें, और इस सारी संपत्ति को किसी अच्छे काम में लगा दें, आपसे अच्छा आदमी और कौन मिलेगा? आप इशारा करें और मैं करूं। जो आज्ञा देंगे वह पूरा कर दूंगा। नानक ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा और नानक नीचे ही देखते रहे गए, उस आदमी ने पूछा, आप कहते क्यों नहीं? नानक ने कहाः मुझे तुम्हारे पास कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। तुम बिलकुल दरिद्र आदमी मालूम होते हो। उस आदमी ने कहाः मेरे कपड़ों को देख कर भूल में न पड़ें, मैं सीधा-सादा आदमी हूं इसलिए मेरी संपत्ति का पता नहीं चलता, अन्यथा इस इलाके में मेरे से ज्यादा संपत्ति और किसी के पास नहीं है। नानक ने कहाः मुझे तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता कि तुम्हारे पास कुछ भी हो। मुझे बहुत दरिद्र लोग मिले हैं, लेकिन तुम दरिद्रतम हो। फिर तुम नहीं मानते तो एक छोटा सा काम कर दो। अगर वह काम कर सके तो फिर और बड़े काम बताऊंगा, परीक्षा हो लेगी। और उसने कहा, आज्ञा दें और मैं कर दूंगा, चाहे मेरी समग्र संपत्ति क्यों न लग जाए।
नानक ने अपने कपड़े से एक सुई निकाली। कपड़े सीने की सुई और उस आदमी को कहाः इसे रख लो और जब हम और तुम दोनों मर जाएं तो इसे वापस लौटा देना। उस आदमी ने देखाकि जरूर आदमी पागल है। मैं गलत आदमी के पास आ गया। पहले तो उसने कहा कि दरिद्र हो तुम। और अब वह कह रहा कि यह सुई जब हम दोनों मर जाएं तो वापस लौटा देना। फिर भी एकदम से अभी वापस करूं, अभी मैंने कहा था जो कहेंगे कर दूंगा, ठीक नहीं मालूम होगा, वह सुई लेकर वापस चला गया। उसने मित्रों से सलाह ली। उसने रात भर सोचा। उसकी कुछ समझ नहीं पड़ा, कोई रास्ता नहीं मिला। उसने सब तरह से मुट्ठी बांधने की कोशिश की उस सुई के ऊपर, लेकिन सब मुट्ठियां इसी पार रह जाती हैं। उसने सब भांति सुई को ले जाने के विचार किए, लेकिन विचार यहीं रह जाते हैं। कोई पकड़ मृत्यु के भीतर नहीं जा सकती।
सुबह-सुबह जल्दी वह आया और उसने नानक के पैर छुए और कहा कि इससे पहले कि लोग आ जाएं, मैं अपनी दरिद्रता स्वीकार कर लूं, यह सुई आप वापस ले लें। कहीं ऐसा न हो कि मैं मर जाऊं और सुई वापस न कर सकूं, एक ऋण मेरे ऊपर रह जाए। इसे मैं मरने के बाद वापस नहीं लौटा सकूंगा इसलिए जिंदगी में लौटा रहा हूं। नानक ने कहाः जिस चीज को मरने के पीछे न ले जा सको, उसे जिंदगी में इकट्ठा करने की भूल में मत पड़ना। और जिसे जिंदगी में लौटाने का खयाल आता है क्योंकि मृत्यु के बाद नहीं लौटा सकेंगे, उस सबको लौटा दो जिंदगी को, वापस उसे इकट्ठा मत करो। सुई ही मुझे मत लौटाओ, सब लौटा दो जो-जो इकट्ठा हो जो कि मृत्यु के पार न जा सके।
असल में हम समृद्धि के थोथे, झूठे रूप में अपने भीतर की दरिद्रता छिपा लेते हैं। जितना गरीब आदमी होगा, उतनी संपत्ति की उसे आकांक्षा होती है और जितना नीचा आदमी होगा, उतने बड़े पद पर होने की उसकी मंशा होती है। जो बहुत बड़े पद पर होते हैं, वे बहुत साधारणहीन लोग होते हैं। अपनी हीनता भुलाने को बड़े पदों को खोजते हैं। और जो बहुत संपत्ति को खोज लेते हैं, वे बहुत दरिद्र लोग होते हैं। अपनी दरिद्रता छिपाने को संपत्ति का आवरण इकट्ठा कर लेते हैं। इसलिए दुनिया में जो दरिद्र है वह संपत्तिशाली दिखाई पड़ता है और जो बहुत दीन-हीन है वह बड़े पदों पर अनुभव होता है।
क्राइस्ट ने कहा हैः धन्य हैं वे लोग जो अंतिम हो सकते हैं। क्राइस्ट ने कहा हैः धन्य हैं वे लोग जो अंतिम हो सकते हैं; क्योंकि जरूर उनमें प्रथम होने की क्षमता है। धन्य हैं वे लोग जो दरिद्र हो सकते हैं; क्योंकि निश्चय इस बात की उनकी दरिद्रता सूचना है कि वे दरिद्र नहीं हैं, इसलिए उन्हें कोई संपत्ति से अपनी दरिद्रता छिपाने का कोई कारण नहीं है। धन्य हैं वे लोग जो निम्न हो सकते हैं; क्योंकि उन्हें ऊंचे उठने का कोई खयाल पैदा नहीं होता, क्योंकि उनके भीतर कोई नीचा है ही नहीं, जिससे ऊपर उठने का खयाल पैदा होता हो।
इसलिए इस दुनिया में समृद्ध दरिद्र देखे जाते हैं और दरिद्र समृद्ध देखे जाते हैं। और भिखारी हुए हैं जो सम्राट थे और सम्राट हुए हैं जो कि भिखारी थे।
नानक ने उस सुबह उससे कहा, कि फिर सोचो, तुम्हारे पास क्या है? नानक ने उससे कहा, मैं उस चीज को विपत्ति कहता हूं जो मृत्यु के पार न जा सके, उसे संपत्ति कहता हूं जो मृत्यु के पार चली जाए।
मैं भी आपसे यह कहूं, वही संपत्ति है जो मृत्यु के पार चली जाए। और ऐसी संपत्ति केवल सत्य की है और कोई संपत्ति नहीं है। और कोई संपत्ति नहीं है जिसे मृत्यु की लपटें नष्ट न कर देंगी। एक ही संपत्ति है, सत्य की, और वह आपकी उधार है, वह आपकी दूसरों से ली हुई है। वह आपकी महावीर, कृष्ण और क्राइस्ट से मिली हुई है। वह आपने गीता, कुरान और बाइबिल से ली हुई है। वह संपत्ति आपकी नहीं है जो कि संपत्ति है। और जिसे आप संपत्ति समझ रहे हैं, वह बिलकुल आपकी न है और न हो सकती है। उसे आपको छोड़ ही देना होगा। जिसे छोड़ देना होगा उसे इकट्ठा कर रहे हैं और जो साथ हो सकती है उसे अपने से दूर रख रहे हैं और बड़े-बड़े नामों का सहारा ले रहे हैं। स्मरण रखें, सत्य आपका हो तो ही आपका हो सकता है। इसलिए समाज और परंपरा और शिक्षा आपको जो देती है उसे सत्य मत मान लेना।
मैं एक गांव में गया। वहां एक अनाथालय में मुझे दिखाने ले गए। वहां उन्होंने कहा कि हम छोटे-छोटे बच्चों को धर्म की शिक्षा देते हैं। मैं हैरान हुआ। क्योंकि मेरी बुद्धि कुछ गड़बड़ है और मुझे ऐसा लगता है कि धर्म की कोई शिक्षा हो नहीं सकती। और जब भी कोई शिक्षा होगी तो धर्म के नाम पर किसी न किसी गलत चीज की होगी। असल में धर्म की साधना होती है, शिक्षा होती ही नहीं है।
मैंने कहा कि मैं हैरान हूं, धर्म की शिक्षा कैसे होगी? फिर मैं देखूं क्या शिक्षा देते हैं?
उन्होंने कहाः आप इन बच्चों से कुछ भी पूछें, इनको सब उत्तर मालूम हैं।
मैंने कहाः आप ही पूछें तो मैं सुनूं, क्योंकि मुझे यह भी ठीक पता नहीं कि कौन सा प्रश्न है जो धार्मिक है? क्योंकि जितने प्रश्न धर्म की किताबों में लिखा दिखाई पड़ते हैं, वे सब मुझे थोथे मालूम होते हैं, वे कोई भी प्रश्न मुझे धार्मिक नहीं मालूम होते हैं। और उनके उत्तर तो उनसे भी ज्यादा थोथे होते हैं। मैंने कहाः आप ही पूछें। तो उन्होंने पूछा लड़कों से, आत्मा कहां हैं? उन सारे लड़कों ने छाती पर हाथ रखे, उन्होंने कहा--यहां।
मैंने एक लड़के से पूछाः यहां तुम कह रहे हो, क्या मतलब है तुम्हारा?
उसने कहाः हमें बताया गया है कि आत्मा हृदय में है।
और मैंने कहाः हृदय कहां है?
वह लड़का बोलाः यह हमें बताया नहीं गया।
मैंने उनको कहा कि इन बच्चों के साथ दुव्र्यवहार कर रहे हैं, अन्याय कर रहे हैं। इन्हें एक बात सीखा रहे हैं कि आत्मा यहां है, ये सीख लेंगे और जब भी जीवन में इनके सामने प्रश्न खड़ा होगा, आत्मा कहां है? यह हाथ यांत्रिक रूप से छाती पर चला जाएगा और कहेगा, यहां। यह उत्तर बिलकुल झूठा होगा, यह दूसरों ने सिखाया है। इस उत्तर के कारण इनका प्रश्न दब जाएगा और इनके भीतर जिज्ञासा पैदा नहीं हो सकेगी जो कि आत्मा की खोज में ले जाती है। इनके लिए उत्तर दे दिया रेडीमेड, बना-बनाया। ये उसे स्वीकार कर लिए--बालपन में, अबोध चित्त की अवस्था में। जब कुछ सोच-समझ और विवेक जाग्रत नहीं है तभी दुनिया के सारे धार्मिक लोग उन निरीह निर्दोष बच्चों के मन में अपनी शिक्षा को डाल देना चाहते हैं। इससे बड़ा और कोई अनाचार और कोई बड़ा पाप नहीं है, न हो सकता है। क्योंकि उनके दिमाग में जो बातें आपने भर दी हैं, वे जीवन भर उन्हीं को प्रतिध्वनित करते रहेंगे और इस भ्रम में रहेंगे कि उन्हें ज्ञान उपलब्ध हो गया है। जब कि ज्ञान उन्हें उपलब्ध नहीं हुआ। उन्होंने कुछ बातें और कुछ शब्द सीख लिए हैं। आप भी शब्द सीखे हुए होंगे। खयाल करके देखना कि किसी के सिखाए हुए शब्द हैं या यह अपनी अनुभूति है? और अगर ऐसा मालूम पड़े कि दूसरों के सिखाए हुए शब्द हैं, तो कृपा करना उन्हें छोड़ देना और भूल जाना।
इसके पहले कि कोई सत्य को उपलब्ध हो सके, सत्य के संबंध में जो भी सीखा है उसे भूल जाना अत्यंत अपरिहार्य और अनिवार्य है। सत्य के संबंध में जो भी जानते हैं, उसे भूल जाना जरूरी है, अगर सत्य को जानना है। अगर परमात्मा को जानना है, तो परमात्मा के संबंध में जो भी जानते हैं, कृपा करें उसे छोड़ दें। वह कचरे से ज्यादा नहीं है जो आपके मन को घेरे हुए है। और मन अगर सारे कचरे से मुक्त हो जाए जो हमें सिखाया गया है, तो उसका जन्म होगा जो ज्ञान है। ज्ञान सिखाया नहीं जाता, वह हमारा स्वरूप है। जो सिखाया जाता है वह कभी ज्ञान नहीं हो सकता। जो बाहर से भीतर डाला जाता है वह कभी ज्ञान नहीं होता। जो भीतर से बाहर आता है वह ज्ञान होता है।
अगर ज्ञान हमारा स्वरूप है, अगर वह हमारी अंतर्निहित क्षमता है, तो वह बाहर से नहीं डाली जाएगी, वह भीतर से आएगी। और भीतर से आने में वह सब जो बाहर से डाला गया है बाधा हो जाता है।
एक तो हौज में पानी भर देते हैं ऊपर से, वह भी पानी है। पंडित के मस्तिष्क में जो ज्ञान भरा होता है, वह हौज के पानी की तरह है। और एक कुएं में भी पानी के जलस्रोत निकलते हैं, वह भी पानी है। लेकिन ज्ञानी का जो ज्ञान होता है, वह कुएं की भांति होता है। उसमें पानी ऊपर से नहीं डाला जाता, मिट्टी, कंकड़, पत्थर बाहर निकाले जाते हैं और पानी नीचे पाया जाता है। और पंडित का जो ज्ञान होता है, उसमें ऊपर से पानी डाला जाता है, निकाला कुछ भी नहीं जाता। तो जो-जो ज्ञान आपके ऊपर से डाला जाता है, वह हौज की तरह आपके भीतर भर जाएगा, वह कोई वास्तविक बात नहीं है। आपके जलस्रोत नहीं उससे खुलते हैं और भरा हुआ पानी जल्दी ही गंदा हो जाता है। इसलिए पंडित के मस्तिष्क से ज्यादा गंदा मस्तिष्क जमीन पर दूसरा नहीं होता। इसलिए पंडित सारी दुनिया में उपद्रव की जड़, झगड़ों-फसादों की बुनियाद है। दुनिया में पंडितों ने जितना उपद्रव करवाया है उतना बुरे लोगों ने बिलकुल नहीं करवाया। लेकिन बुरे लोग अपराधियों की तरह बंद हैं और पंडित पूजे जा रहे हैं। दुनिया में जितनी खून-खराबी हुई है, मनुष्य के साथ जितने अत्याचार हुए हैं, मनुष्य और मनुष्य के बीच जितनी दीवालें खड़ी की हैं, वह पंडित ने खड़ी की हैं, लेकिन वे अपराधी नहीं हैं, वे पूज्य हैं, वे समाद्रितहो रहे हैं। जरा मनुष्य के इतिहास को उठा कर देखें, उसमें जितने खून के धब्बे हैं, उसमें निन्यानबे पंडित के पास पड़ेंगे, एक प्रतिशत अपराधियों के पास जाएगा।
दुनिया में मनुष्य और मनुष्य के बीच जितनी भी खाइयां और लड़ाइयां और उपद्रव खड़े किए गए हैं, वे पंडित ने खड़े किए हैं। और मैं मानता हूं इसके पीछे कारण हैं, जो भी पानी ऊपर से भर दिया जाता है वह गंदा हो जाता है, उसमें कोई जीवित स्रोत नहीं होते हैं। तो पंडित चाहे वह किसी धर्म का हो, उसके भीतर बाहर से भरा हुआ ज्ञान धीरे-धीरे गंदगी और सड़न पैदा कर देता है और वह सड़न फिर नये-नये रूपों में निकलनी शुरू हो जाती है। घृणा और विद्वेष फैलाने का कारण हो जाती है। मनुष्य को मनुष्य से तोड़ने का कारण हो जाती है। ज्ञान तो वास्तविक भीतर से आता है, बाहर से नहीं आता। और वह तभी आएगा जब बाहर के ज्ञान को हम अलग कर दें, क्योंकि वह कंकड़-पत्थर की तरह भीतर के ज्ञान को दबा लेता है। जो भी हमने बाहर से सीख लिया है, वह हमारे आत्म के जागरण में बाधा है। अगर हम बाहर से सीखे हुए को बाहर वापस लौटा दें, तो वह जाग जाएगा जो हमारे भीतर है और निरंतर मौजूद है। उसकी स्फुरणा हो जाएगी।
सत्य को खोजने कहीं जाना नहीं है, जो-जो असत्य हमने सीख लिया है उसे अलग कर देना है और सत्य हमारे भीतर होगा। परमात्मा को खोजने कहीं जाना नहीं है, जो-जो हमने अपने ऊपर आवरण डाल लिए हैं वे अलग कर देने हैं और परमात्मा उपलब्ध हो जाएगा।
एक रात, एक बहुत सर्द रात को एक पहाड़ के पास एक छोटे से मंदिर में एक आदमी ने जाकर दस्तक दी। आधी रात होने को थी और बहुत ठंडी रात थी, अंदर से पूछा गया, कौन है इतनी रात को? सुबह आओ। उस आदमी ने कहाः मैं बहुत पापी हूं, मैं बहुत बुरा आदमी हूं। मैंने बहुत बार सोचा कि दिन में आपके पास आऊं, लेकिन वहां और बहुत से लोग होते हैं, इसलिए मैं रात को आया हूं। वह मंदिर एक साधु का था। दरवाजा खोला गया। वह साधु अंतिम सोने की तैयारी कर रहा था। उसकी सिगड़ी की आग भी बुझ गई थी और राख ही राख थी। उसने उससे पूछा कि तुमने यह कैसे कहा कि तुम पापी हो? जरूर किसी पंडित ने तुम्हें समझाया होगा कि तुम पापी हो। क्योंकि पंडित का एक ही काम है कि वह दुनिया में लोगों को समझाए की वे पापी हैं। और मेरी दृष्टि में किसी को यह समझा देना कि तुम पापी हो, इससे बड़ा कोई पाप नहीं हो सकता है, क्योंकि उसके पापी होने की बुनियाद रख दी गई है।
ज्ञानी समझाता है, तुम परमात्मा हो। पंडित समझाता है, तुम पापी हो। ज्ञानी कहता है, तुम्हारे भीतर परमात्मा छिपा है और पंडित कहता है, तुम्हारे भीतर पाप ही पाप है। उस साधु ने कहा कि जरूर किसी पंडित से तुम्हारा मिलना हो गया है, किसने तुम्हें कहा कि तुम पापी हो? मैं तो देखता हूं तुम परमात्मा हो। उस आदमी की आंखें नीचे झुकी थीं, उसने ऊपर उठाईं, यह पहली दफा कोई आदमी मिला था जिसने कहा कि तुम परमात्मा हो। उसने कहाः लेकिन मैं चोरी करता हूं। लेकिन मैं दूसरों की संपत्ति पर बुरी नजर डालता हूं। लेकिन मेरे मन में क्रोध आता है और मैं लोगों की हत्या तक के विचार कर लेता हूं।...जलाने से कैसे दूर होगा, जैसा वह पागल है वैसे ही तुम पागल हो कि पाप-पाप की बातें कर रहे हो और परमात्मा की तरफ नहीं देख रहे। देखो और पाप विलीन हो जाएगा। पाप इसलिए है कि परमात्मा की तरफ दृष्टि नहीं है। पाप नहीं होगा, परमात्मा की तरफ दृष्टि भर होने की बात है। उस पापी से कहाः बैठो। तो वह जो आदमी कह रहा था कि मैं पापी हूं, उससे कहाः बैठो। वह आदमी बोलाः लेकिन मुझे तो कोई परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता, मेरे भीतर सब पाप ही पाप दिखाई पड़ता है।
सिगड़ी रखी थी, आग बुझने के करीब थी, सर्द रात थी। उस साधु ने कहाः देखो, रात बहुत ठंडी है, शायद सिगड़ी में एकाध अंगारा हो, जरा उसे कुरेदो। उस आदमी ने देखा, उसने कहाः सब राख ही राख है। वह साधु हंसने लगा, उसने कहाः देखो, तुम्हारे देखने में ही गलती है। उसने फिर राख को कुरेदा, एक छोटे से अंगारे को निकाला, फूंका और जलाया और उसने कहाः देखो, यह अंगारा है और यह उतनी ही आग है जितना सूरज में आग है। यह उतनी ही आग है क्योंकि एक बूंद में पूरा सागर है और अग्नि की एक चिनगारी में सारा सूरज है। ऐसी भूल जैसी तुमने सिगड़ी को खोजने में की, अपने बाबत भी कर रहे हो, राख ही राख अपने को समझ रहे हो, पाप ही पाप अपने को समझ रहे हो। थोड़ा और ठीक से खोजो तो चिनगारी मिल जाएगी जो कि सूरज की है। और इस सिगड़ी की आग तो बुझ भी सकती है, लेकिन मनुष्य के भीतर एक ऐसी आग जल रही है जिसका बुझना असंभव है। कितने ही पाप उसे नहीं बुझा सकते हैं और कितना ही अज्ञान उसे नहीं बुझा सकता। कोई भी रास्ता उसे बुझाने का नहीं है, क्योंकि वह मनुष्य की अंतःसत्ता है, और उसे मिटाने का कोई उपाय नहीं है।
तो मैं आपको कहूं, हरेक के भीतर वह सत्य की अग्नि और वह परमात्मा मौजूद है। उसे अगर जानना है तो जो बाहर से हमने सीख लिया है उस राख को झड़ा देना होगा, तो अंगारा उपलब्ध हो जाएगा। और जब भीतर का अंगारा उपलब्ध होता है तो जीवन एक ज्योति बन जाता है। और जब भीतर की अग्नि उपलब्ध होती है तो जीवन एक प्रेम बन जाता है। और जब भीतर की अग्नि उपलब्ध होती है तो जीवन बिलकुल ही दूसरा जीवन हो जाता है। हम उसी दुनिया में होते हैं लेकिन दूसरे आदमी हो जाते हैं। उन्हीं लोगों के बीच होते हैं लेकिन दूसरे व्यक्ति हो जाते हैं। सारा रुख, सारी पहुंच, सारी समझ, सारी दृष्टि परिवर्तित हो जाती है। और उस नये मनुष्य का जन्म जब तक भीतर न हो जाए तब तक न हमें जीवन का पता होता है, न हमें आनंद का, न सौंदर्य का, न संगीत का। तब तक हम भटकते हैं, जीते नहीं हैं। तब तक हम मूच्र्छित, अर्धनिद्रा में चलते हैं, होश में नहीं होते हैं। तब तक हमारा जीवन एक दुखस्वप्न है, एक नाइटमेयर है, उससे ज्यादा नहीं है। उसके बाद ही हमें पता चलता है कि क्या है जीवन? क्या है धन्यता? क्या है कृतार्थता? और तब जो ग्रेटिट्यूड, तब जो कृतज्ञता का बोध पैदा होता है वह धार्मिक मनुष्य का लक्षण है।
कैसे जो हमारे ऊपर बाहर से इकट्ठा हो गया हम उसे अलग कर दें? कौन सा रास्ता है कि जो हमें सिखाया गया है उसे हम भूल जाएं? कौन सा रास्ता है कि हमारे चित्त पर जो-जो धूल इकट्ठी हो गई हम उसे झाड़ दें और चित्त के दर्पण को स्वच्छ कर लें। रास्ता है। अगर धूल के इकट्ठे होने का रास्ता है तो धूल के अलग होने का रास्ता भी होगा। जिस भांति धूल इकट्ठी होती है अगर हम उसके कारण को समझ लें तो उस कारण पर ही चोट करने से धूल अलग होनी भी शुरू हो जाएगी। धूल कैसे इकट्ठी होती है?
जीवन में धूल इकट्ठे होने के दो कारण हैं। एक तो कारण है, हम होश में नहीं होते हैं। जो भी आता है आ जाने देते हैं। जैसे कोई धर्मशाला हो। आवारा धर्मशाला हो, जिसमें कोई पहरेदार नहीं है। कोई भी आए और ठहरे और कोई भी जाए, कोई रोकने वाला नहीं है, कोई बताने वाला नहीं है, कोई ठहराने वाला नहीं है। हमारे चित्त को हम करीब-करीब ऐसी धर्मशाला, ऐसी सराय बनाए हुए हैं, कोई भी आए और ठहर जाए हमें कोई मतलब नहीं है। कोई कचरा डाल दे हमारे घर में, तो हम नाराज हो जाते हैं और हमारे दिमाग में डाल दे, तो हम धन्यवाद देते हैं कि बहुत अच्छी बातें बताईं। घर में कचरे फेंकने वाले पर हम गुस्सा करते हैं और मस्तिष्क में जो लोग कचरा डालते रहते हैं उन पर हम बिलकुल गुस्सा नहीं करते हैं।
चैबीस घंटे हमारे मस्तिष्क खुले हुए हैं और व्यर्थ के इन प्रशंस को भीतर ले जा रहे हैं। हम भोजन में तो खयाल रखते हैं कि अशुद्ध भीतर न चला जाए, लेकिन मन के भोजन में बिलकुल खयाल नहीं रखते और कुछ भी भीतर चला जा रहा है। सुबह से उठ कर अखबार पढ़ रहे हैं, व्यर्थ की किताबें पढ़ रहे हैं, व्यर्थ की बातें कर रहे हैं, व्यर्थ की बातें सुन रहे हैं। जो कचरा दूसरे हमारे दिमाग में डाल रहे हैं उसका कुछ न कुछ बांट और दान हम दूसरों को भी कर रहे हैं। और सारी दुनिया के मस्तिष्क एक अजीब पागलपन और अजीब कचरे से भर गए हैं और हर आदमी दूसरे के दिमाग में डालता चला जा रहा है। इसके प्रति थोड़ी सजगता की जरूरत है, थोड़े होश की जरूरत है। यह जानने की जरूरत है कि मेरे मस्तिष्क के भीतर व्यर्थ कुछ भी न डाला जाए। अगर इसका होश हो।
मैं अभी यात्रा में था। मेरे साथ एक सज्जन थे, उन्होंने बहुत चाहा कि मुझसे बातचीत करें। लेकिन मुझे बिलकुल चुप देख कर उन्होंने कई उपाय भी किए। मैं हां-हूं करके चुप हो गया। तो वे फिर थोड़ी देर चुप रहे, फिर उपाय किए। उन्हें बहुत बेचैनी थी, उन्हें बहुत परेशानी थी। वे कुछ बोलना चाहते थे। मुझसे उन्हें कोई मतलब न था। उन्हें कुछ निकालना था। जब उनकी बेचैनी बढ़ गई तो मैंने उनसे कहाः अब आप जो कुछ कहना हो, शुरू कर दें। वे थोड़े हैरान हुए क्योंकि कोई बातचीत का सिलसिला नहीं था। मैंने कहाः अब जो भी आपको कुछ कहना हो, शुरू कर दें। वे बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहाः क्या मतलब आपका? मैंने कहाः आप देखें, छिपाएं न। आपके भीतर कोई चीज उबल रही है और आप मेरे ऊपर फेंकना ही चाहते हैं, फेंकें। आपको बिना उसे फेंके राहत नहीं मिलेगी। मैं सुनूंगा, मजबूरी है आपके साथ हूं। वे कुछ हैरान हुए और मुझसे बोले, आपका मतलब क्या है? मैंने कहाःचैबीस घंटे हम फेंक रहे हैं एक-दूसरे पर। न तो फेंकने वाले को होश है कि फेंक रहा है, न लेने वाले को होश है कि वह ले रहा है। इसलिए मस्तिष्क धीरे-धीरे क्षुद्र से क्षुद्र बातों से भरता चला जाता है। उसमें विराट के जन्म की संभावना क्षीण हो जाती है।
मन जितना खाली और शांत और शून्य होगा उतना ही विराट के अवतरण की संभावना पैदा होती है। नहीं तो विराट अवतरित नहीं होता और न विराट का भीतर से आविर्भाव होता है। देखें, यह दुनिया जो है, यह हमारी दुनिया जो है, यह जो बीसवीं सदी जो है, अगर कोई चीज इस सदी के ऊपर लादी जा सकती है तो यह व्यर्थ विचारों की सदी है। इतने व्यर्थ विचार दुनिया में कभी नहीं थे। एक जमाना था, अजीब लोग थे।
मैंने सुना है कि लाओत्सु चीन में एक बहुत बड़ा अदभुत, अदभुत विचारक और अदभुत द्रष्टा हुआ है। वह रोज सुबह अपने एक मित्र के साथ घूमने जाता था। यह वर्षों क्रम चला। कहा जाता है कि जब रास्ते में वे दोनों जाते तो इतनी सी उनकी बातचीत होती थी, उसका मित्र आता और कहता, नमस्कार। कोई आधा घंटे बाद लाओत्सु कहता, नमस्कार। दोनों जब घूमने जाते तो उसका मित्र कहता, नमस्कार। उसके कोई आधा घंटे बाद लाओत्सु कहता, नमस्कार। यह कुल बातचीत थी। एक दिन एक मेहमान उसके मित्र के घर आया, वह उसको भी घुमाने ले आया। घूमने के बाद सांझ को जब मित्र मिला, लाओत्सु ने कहाः देखो, उस आदमी को वापस कल मत ले आना, बहुत बातचीत करने वाला मालूम होता है। उस आदमी ने क्या बातचीत की थी? उसने घंटे, डेढ़ घंटे के घूमने में यह कहा था, आज की सुबह बहुत सुंदर है। लाओत्सु ने कहाः उस आदमी को साथ मत ले आना। बहुत बकवासी मालूम होता है। और उसने बात इतनी की थी डेढ़, दो घंटे के घूमने में कि आज की सुबह बड़ी सुंदर मालूम होती है। ऐसे लोग थे। ऐसे लोगों को अगर सत्य का अनुभव हुआ हो तो आश्चर्य नहीं है। और हम जैसे लोग हैं अगर हमें सत्य का अनुभव न होता हो तो भी कोई आश्चर्य नहीं है।
महावीर बारह वर्षों तक मौन थे। क्राइस्ट बहुत दिनों तक मौन थे। मोहम्मद पहाड़ पर जाकर बहुत दिनों तक चुप थे। दुनिया से मौन खत्म हो गया है। हम चुप रहना भूल गए हैं। और जो मनुष्य चुप रहना और मौन रहना भूल जाएगा, उसके जीवन में जो भी श्रेष्ठ है वह नष्ट हो जाएगा। क्योंकि श्रेष्ठ का जन्म ही मौन में होता है। सौंदर्य का और सत्य का अवतरण मौन में होता है। इसलिए स्मरण रखें कि व्यर्थ के विचारों के प्रति सचेत हों, न तो दूसरों से लें और कृपा करें, न दूसरों को दें। सचेत जितने आप होंगे उतने ही क्रमशः आपको बोध होने लगेगा, ये व्यर्थ के विचार आ रहे हैं, इन्हें नमस्कार कर लें। इन्हें भीतर ले जाने की कोई भी जरूरत नहीं है। इनसे कहें कि कृपा करें और बाहर ठहरें।
अगर परिपूर्ण होश और बोध हो और चैबीस घंटे यह बोध बना रहे तो आप थोड़े ही दिनों में व्यर्थ विचार के आगमन से मुक्त हो जाएंगे। और जब व्यर्थ विचार का आश्रव या आगमन बंद हो जाए तो भीतर बड़ी घनीभूत शांति उत्पन्न होगी। लेकिन कुछ विचार आपने पिछले जीवन में, और-और पिछले जन्मों में इकट्ठे कर लिए हैं, वे इससे बंद नहीं होंगे, वे तो भीतर घूमते ही रहेंगे। उनके लिए कुछ और करना होगा। बाहर से नये विचारों का आगमन, व्यर्थ के विचारों का भीतर संग्रह न हो, इसके लिए सचेत होना पड़ेगा। होश रखना पड़ेगा, सजग होना होगा, पहरेदार बनना होगा और भीतर जो विचार इकट्ठे हो गए हैं उनसे तादात्म्य तोड़ना होगा अपना।
हमारे भीतर जो भी विचार चलते हैं हम उनके साथ एक तरह की आइडेंटिटी, एक तरह का तादात्म्य कर लेते हैं। अगर भीतर आपके क्रोध आए तो आप कहते हैं मुझे क्रोध आ गया। यह तो भूल की बात है, यह तो झूठी बात है। आपको कहना चाहिए मुझ पर क्रोध आ गया। भीतर आपके कोई विचार आएं तो आपको यह नहीं कहना चाहिए कि मैं ऐसा विचार कर रहा हूं, आपको कहना चाहिए, मेरे सामने इस तरह के विचार घूम रहे हैं। वह मैं को जरा अलग करिए। वह जो भीतर विचारों की और भावनाओं की दौड़ है उससे अपने मैं को अलग करिए। वह अलग है। वह सदा द्रष्टा मात्र है। भीतर जो विचारों का प्रवाह घनीभूत है, इकट्ठे हैं, वे आपके पूरे अचेतन में भरे हैं, आपका पूरा अनकांशस उनसे भरा हुआ है। उनके प्रति सचेत हो जाइए और उनके साथ अपनी आइडेंटिटी, अपना संबंध तोड़ लीजिए और समझिए कि आप अलग हैं और वे अलग हैं। और उनको देखिए, उनके द्रष्टा और साक्षी बनिए। जब वे आएं तो चुपचाप अलग खड़े हो जाइए और देखिए। जैसे कोई रास्ते पर जाती हुई भीड़ को देखता हो, या कोई आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को देखता हो, या कोई रात में उग गए तारों को देखता हो, या जैसे कोई फिल्म के पर्दे पर चलती हुई तस्वीरों को देखता हो, ऐसा उनको देखिए और अपने को दूर कर लीजिए। आप केवल देखने वाले रह जाएं और आपके सारे विचार अलग हो जाएं, तो आप हैरान होंगे, जैसे-जैसे विचारों के साथ संबंध क्षीण होगा, जैसे-जैसे विचारों की पृथकता स्पष्ट होगी, वैसे-वैसे विचार भीतर भी मरने शुरू हो जाते हैं। बाहर के विचारों का आगमन बंद हो; भीतर के विचार क्रमशः मृत हो जाएं, एक घड़ी, एक बिंदु पर आप पाएंगे कि आप परिपूर्ण शून्य में खड़े हैं और जिस क्षण आपको शून्य उपलब्ध होगा उसी क्षण आप पूर्ण को अनुभव कर लेंगे। उसी क्षण सत्य का आविर्भाव हो जाएगा। उसी क्षण आप जानेंगे, परमात्मा क्या है? फिर शास्त्रों की जरूरत न होगी। शास्त्रों में जो लिखा है वह सामने आ जाएगा; शास्त्रों में जो कहा है वह प्रत्यक्ष हो जाएगा। महावीर और बुद्ध को जो अनुभव हुआ होगा, वह आपको अनुभव हो जाएगा।
प्रत्येक आदमी हक रखता है। प्रत्येक का अधिकार है उसे अनुभव कर ले। हम अपने हाथ से खोए हुए हैं। अगर हम थोड़े सजग हों, थोड़े जागरूक हों, थोड़े प्रयत्नशील हों, थोड़ी साधना में लगें तो निश्चित ही हम भी उन्हीं सत्यों को, उन्हीं अनुभूतियों को पा सकते हैं जो किसी भी मनुष्य ने कभी भी पाई हों। जो एक बीज हो सकता है वह हरेक बीज हो सकता है और जो एक मनुष्य में संभव हुआ वह हर मनुष्य में संभव हो सकता है। लेकिन विचार बाधा है। व्यर्थ विचारणा बाधा है। सीखी हुई शिक्षा और संस्कार बाधा हैं। उन्हें अलग कर देना होगा और निर्दोष होना होगा और शांत और शून्य और मौन होना होगा। अगर यह हो सके तो आपके भीतर एक अभिनव सौंदर्य का जन्म होगा। एक अभिनव सत्य का संचरण होगा। कोई आपके भीतर एक नई शक्ति और एक नई ऊर्जा अनुभव में आएगी और वह आपका जीवन बन जाएगी। वह आपका सब कुछ बन जाएगी। वह संपत्ति होगी जो मृत्यु के पार जाती है और जिसे कोई भी नहीं मिटा पाता।
और स्मरण रखें, जो मृत्यु के पार जाती है वही जीवन है क्योंकि जीवन अकेला है जिसकी मृत्यु नहीं हो सकती। आपके पास अभी जीवन नहीं है क्योंकि सत्य नहीं है; आपके पास सत्य नहीं है क्योंकि आप शांत और शून्य नहीं हैं। आप शांत और शून्य नहीं हैं क्योंकि आप अपने मन को न तो बाहर से रोक रख रहे हैं कि उसमें कुछ भी भर जाए और न भीतर चलते हुए विचारों से अपने तादात्म्य को तोड़ रहे हैं। अगर ठीक से कोई कारण को समझे; अगर ठीक से पूरे का.ॅजल चेन को समझे कि क्या है जो हमारे मस्तिष्क को बांधता और ग्रसित करता और जमीन पर रखता है और उठने नहीं देता? कौन सी जंजीरें हैं जो हमें बांध लेती हैं संसार के तट पर और सत्य तक नहीं जाने देतीं? तो निश्चित ही उसे कारण दिखाई पड़ जाएंगे। और जिसे कारण दिखाई पड़ जाएं, अगर वह संकल्प करे, उन कारणों के विरोध में चले, तो निश्चित ही वहां पहुंच सकता है जहां पहुंचना जीवन का लक्ष्य है।
शास्त्र जहां नहीं ले जा सकेंगे वहां स्वयं का सत्य ले जाएगा और जब स्वयं का सत्य उपलब्ध होगा तो सब शास्त्र सत्य हो जाएंगे। और जब स्वयं के भीतर अनुभूति जगेगी तो सारे तीर्थंकर और सारे पैगंबर और सारे अवतार और सारे ईश्वर-पुत्र उस अनुभूति में प्रामाणिक हो जाएंगे और तब दिखाई पड़ेगा जो उन्होंने कहा है वह सत्य है। और तब यह नहीं दिखाई पड़ेगा कि क्राइस्ट ने जो कहा है वह सत्य है और महावीर ने जो कहा है वह गलत है। तब यह नहीं दिखाई पड़ेगा कि मोहम्मद ने जो कहा है वह सत्य है और राम ने जो कहा है वह गलत है। जब तक ऐसा दिखाई पड़े तब तक समझना कि शास्त्र बोल रहे हैं, सत्य नहीं बोल रहा है। तब दिखाई पड़ेगा कि महावीर ने जो कहा है, मोहम्मद ने जो कहा है, बुद्ध ने जो कहा है, क्राइस्ट ने, कनफ्यूशियस ने जो कहा है, रामकृष्ण ने जो कहा है, वह सब सत्य है और वह सत्य एक ही है।
जब सत्य उपलब्ध होगा तो सब शास्त्र सत्य हो जाएंगे और जब तक सत्य उपलब्ध नहीं तब तक एक शास्त्र सत्य होगा और शेष शास्त्र असत्य होंगे। और जब तक आपको ऐसा दिखता रहे कि मैं हिंदू हूं तब तक जानना अभी आप धार्मिक नहीं हुए। और जब तक आपको लगता रहे कि मैं जैन हूं तब तक समझना अभी धार्मिक नहीं हुए। क्योंकि धर्म तो एक है। जब सत्य उपलब्ध होगा तो आप सिर्फ धार्मिक होंगे। उस पर कोई विशेषण, कोई शास्त्रीय विशेषण नहीं रह जाता है।
ईश्वर करे, ऐसे सत्य में आपको जगाए जो सबका है। ऐसे सत्य में आपको जगाए जो आपके भीतर मौजूद है लेकिन आप उसकी तरफ आंख फेरे हुए हैं। ईश्वर ऐसी प्यास दे, ऐसा असंतोष दे, यह कामना करता हूं।
मेरी बातों को इतने प्रेम, इतनी शांति से सुना है, उससे बहुत अनुगृहीत हूं, बहुत आनंदित हूं। और अंत में अपना धन्यवाद करता हूं और प्रणाम करता हूं सबके भीतर बैठे परमात्मा को। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।