रविवार, 15 अप्रैल 2018

कभी, अचानक ऐसे हो जाएं जैसे नहीं हैं!

किसी वृक्ष के नीचे बैठे हुए, अतीत और भविष्य के बारे में न सोचते हुए, सिर्फ अभी और यहीं होते हुए, आप कहां हैं? 'मैं' कहां हूं? आप इस 'मैं' को अनुभव नहीं कर सकते, वह इस क्षण में नहीं है। अहंकार कभी वर्तमान में नहीं पाया जाता। अतीत अब नहीं है, भविष्य अभी आने को है; दोनों नहीं हैं। अतीत जा चुका है, भविष्य अभी आया नहीं- केवल वर्तमान ही है। और, वर्तमान में कभी भी अहंकार जैसी कोई चीज नहीं मिलती।
तिब्बत के कुछ मठों में बहुत ही प्राचीन ध्यान-विधियों में से एक विधि अभी भी प्रयोग की जाती है। यह ध्यान-विधि इसी सत्य पर आधारित है, जो मैं आपसे कह रहा हूं। वे सीखते हैं कि कभी-कभी आप अचानक गायब हो सकते हैं। बगीचे में बैठे हुए बस भाव करें कि आप गायब हो रहे हैं। बस देखें कि जब आप दुनिया से विदा हो जाते हैं, जब आप यहां मौजूद नहीं रहते, जब आप एकदम मिट जाते हैं, तो दुनिया कैसी लगती है। बस एक सेकेंड के लिए न होने का प्रयोग करके देखें।
अपने ही घर में ऐसे हो जाएं जैसे कि नहीं हैं। यह बहुत ही सुंदर ध्यान है। चौबीस घंटे में आप इसे कई बार कर सकते हैं- सिर्फ आधा सेकेंड भी काफी है। आधा सेकेंड के लिए एकदम खो जाएं- आप नहीं हैं और दुनिया चल रही है। जैसे-जैसे हम इस तथ्य के प्रति और-और सजग होते हैं, तो हम अपने अस्तित्व के एक और आयाम के प्रति सजग होते हैं, जो लंबे समय से, जन्मों-जन्मों से उपेक्षित रहा है। और वह आयाम है स्वीकार भाव का। हम चीजों को सहज होने देते हैं, एक द्वार बन जाते हैं। चीजें हमारे बिना भी होती हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

कोंपलें फिर फूट आईं - प्रवचन-05

अपार्थिव तत्व की पहचान

दिनांक: 3 अगस्त, 1986,
3.30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्न:
भगवान, जब कोई छल और दगाबाजी करता है, या जक कोई मुझे वस्तु की तरह उपयोग करता है, ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए? मैं उस व्यक्ति को चोट भी नहीं पहुंचाना चाहती। मन की शांति कैसे मिले? मैं टूट-फूट गई हूं।
जीवन की उलझनों में दूसरे कभी भी उत्तरदायी नहीं होते। सारा उत्तरदायित्व अपना होता है। जैसे तुम कहा कि जब कोई मुझसे छल और दगा करता है तो मेरे दिल को चोट पहुंचती है। थोड़ा सोचो, दिल को चोट किसी के छल और दगा करने से नहीं होती। तुमने चाहा था कि कोई छल और दगा न करे इसलिए चोट होती है। यह तुम्हारी चाह का फल है। और सारी दुनिया तुम्हारी चाह को मानकर चले, यह तुम्हारे हाथ में नहीं। यह किसी के भी हाथ में नहीं। लेकिन हम यूं ही सोचने के आदी हो गए हैं कि हर चीज का दायित्व दूसरे पर थोप दें। इससे आसानी होती है, राहत मिलती है। राहत मिलती है कि मैं जिम्मेवार नहीं हूं। अब कोई छल कर रहा है इसलिए कष्ट हो रहा है।
लेकिन तुमने चाहा ही क्योंकि कोई छल न करे? और यह हमारे हाथ में कहा है कि हम ऐसी दुनिया बना लें जिसमें छल और कपट न हो? छल भी होगा, कपट भी होगा। हम इतना जरूर कर सकते हैं कि हम अपने के ऐसा बना लें कि दूसरे के छल और कपट को भी स्वीकार कर सकें कर्म उसका है, फल उसका होगा। तुम्हें परेशानी क्यों हो? और तुम्हारी परेशानी उसके छल और कपट को नहीं रोक पाएगी। हां, तुम अगर गैर-परेशान रह जाओ, तुम्हारी शांति में अगर कोई विघ्न और कोई बाधा न पड़े, तुम्हारा हृदय अगर निष्कंप रह जाए, कोई कलुष, कोई शिकायत, कोई शिकवा न उठे तो शायद तुम उस दूसरे व्यक्ति को बदलने में समर्थ भी हो जाओ। यह बहुत मुश्किल है उस आदमी को धोखा देना, जो तुमसे धोखा खाने को चुपचाप राजी है; लेकिन शिकायत है न शिकवा है। इतना गिरा हुआ आदमी जमीन पर पैदा ही नहीं हुआ। और न पैदा हो सकता है। लेकिन तुम्हारा दुख, तुम्हारी पीड़ा उसकी विजय है। और जब उसे छल से और छलावे से विजय मिलती हो तो विजय को छोड़ना बहुत मुश्किल है।
मुझे बहुत प्रीतिकर रही है एक फकीर की कहानी। एक पूर्णिमा की रात, और एक चोर उसके झोपड़े में घुस आया। फकीर के घर में कुछ भी नहीं है। सिर्फ एक कंबल है जिसे ओढ़कर वह बरामदे में लेटा हुआ रात के पूरे चांद को देख रहा है। उसने चोर को भीतर आते देखा और उसकी आंखों में आंसू आ गए। आंसू इस बात के  कि यह नासमझ चोर, इसे इतना भी पता नहीं है कि इस फकीर के घर में कुछ भी नहीं है। काश यह दो दिन पहले मुझे खबर कर देता तो मैं कुछ मांगकर जुटा लेता। इसके लिए कुछ तो इंतजाम कर लेता। गांव से दस मील दूर इस पहाड़ी पर चढ़कर आया है और मेरे घर से खाली जाएगा। जीवन भर के लिए मेरे दिल को एक पीड़ा दे जाएगा। वह उठा, चोर के पीछे हो लिया। जैसे ही चोर घर के भीतर घुसा, फकीर ने मोमबत्ती जला ली। चोर ने कहा, आप कौन हैं?
फकीर ने कहा, तुम इसकी फिकर न करो। इतना ही समझो कि दोस्त हूं, दुश्मन नहीं।
चोर ने कहा, क्या अकस्मात दो चोर इस घर में एक साथ घुस आए हैं?
फकीर ने कहा, मैं घुस नहीं आया हूं। तीस साल से इस घर में रहता हूं। और यह मोमबत्ती मैं इसलिए जला ली है तुम्हें कहीं कोई चोट न लग जाए। घर के भीतर अंधेरा है। और इसलिए भी जला ली है कि तीस साल में मैं खुद भी कुछ खोज न पाया। यह घर इतना खाली है, इतना सुना है, शायद तुम्हारे भाग्य से कुछ मिल जाए। और तुम्हारी कृपा से मैं भी कुछ भागीदार हो जाऊं! चोर तो ऐसे आदमी को देखकर बहुत घबराया। यह मालिक है, और यह कैसी बातें कर रहा है!
चोर ने कहा, मुझे जाने दो।
और उस फकीर ने कहा, यूं नहीं। कम से कम घर की पूरी छानबीन तो कर लो। जब भी कोई काम करो तो पूरा करो। और जब भी कोई काम करो तो समग्रता से करो। और फिर भय किसका? तुम मजे से खोजबीन करो, मैं सहायता के लिए तैयार हूं। अगर तुम मुझे भागीदार नहीं बनाना चाहते तो भी कोई हर्ज नहीं। मुझे तो मिला नहीं। यूं भी नहीं मिला, यूं भी नहीं मिलेगा। तुम सब ले जाना।
ठंडी रात, लेकिन चोर को पसीना छूट गया। उसने कहा, आप आदमी कैसे हैं? यह मकान आपका है।
उस फकीर ने कहा, मकान अगर मेरा होता तो मेरे साथ आता और मेरे साथ जाता। न यह मेरे साथ आया और न यह मेरे साथ जाएगा। यह मकान किसी का भी नहीं है। मुझमें तुममें फर्क यह है कि मैं तीस साल पहले इसमें प्रवेश किया था, तुम तीस साल बाद पीछे प्रवेश किए हो।
लेकिन चोर ने कहा, कुछ भी हो, तुम मुझे क्षमा कर दो और मुझे जाने दो। मुझसे गलती हो गई।
तो फकीर ने अपना कंबल उस चोर को ओढ़ा दिया और फकीर नंगा खड़ा हो गया। और फकीर ने कहा, रात सर्द है और गांव दूर है। अगर तुम्हें सर्दी-जुकाम पकड़ गया तो जिम्मेदारी मेरी होगी। और मैं तो घर के भीतर हूं, किसी तरह गुजार लूंगा सूरज के उगने तक। और कल कहीं से मांगकर कंबल भी जुटा लूंगा। तुम यह कंबल ही ले जाओ। कम से कम राहत रहेगी मन को। तुमने मुझे इतना गौरव दिया है। मुझे सम्राट बना दिया। सम्राटों के घर में चोर घुसते हैं। फकीरों के घर में कोई चोर घुसा है! इंकार न करना।
चोर इतनी घबराहट में था, उसके हाथ ऐसे कंप रहे थे, लेकिन मजबूरी में उसने कंबल ले लिया कि किसी तरह बाहर हो जाऊं। जब वह बाहर हो गया तो उसने लौटकर देखा कि फकीर उसके पीछे चला आ रहा है। उसने पूछा कि कृपा करके अब तो मुझे छोड़ दो।
फकीर ने कहा, अब तुम्हें छोड़कर क्या करूंगा? घर-बार तो तुम ले चले। अब अकेला रहकर मैं यहां क्या करूंगा? जहां तुम रहोगे वहीं मैं रहूंगा। तुमको तो राजी कर लिया, कंबल को कैसे राजी करूंगा? कंबल नाराज होगा कि इतने दिन मैंने साथ दिया और मुझे यूं छोड़ दिया! मैं छोड़ने वाला नहीं हूं। साथ ही रहेंगे। दुख, सुख जो होगा सहेंगे।
चोर ने कहा, मुझे माफ करो। यह कंबल अपना वापस ले लो और अपने घर में जाओ। मैं भूल से घर में घुस गया। मुझे पता न था कि यह फकीर का घर है। मेरी प्रार्थना, मेरी अर्जी स्वीकार कर लो। और मुझे क्षमा करो।
वह फकीर कंबल लेकर भीतर चला गया। और तभी चोर ने जोर की आवाज सुनी कि रुक, कमबख्त! लौट।
चोर हिम्मतदार आदमी था, बहादुर आदमी था लेकिन उसने ऐसी कड़कदार आवाज न कभी जीवन में सुनी थी। जेलों में रहा था। ऐसे काम किया था कि सूलियों पर चढ़ जाए। मगर यह आवाज, यह बुलंदगी। वह घबराहट में पीछे लौट आया। फकीर ने कहा, सुन दरवाजा खोलकर आया था, कम से कम दरवाजा बंद तो कर जा। इतनी सभ्यता तो सीख। और मेरे पास जो कुछ था मैंने तुझे दिया है। कम से कम मुझे धन्यवाद तो दे। अब आ ही गया है तो कम से कम थोड़ी आदमीयत ही सीखकर जा। और तो मेरे पास कुछ नहीं है।
चोर ने जल्दी से धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागा। जब वह भाग रहा था तब फकीर ने खिड़की से कहा कि देख, जब वक्त पड़ेगा तब मैं काम आऊंगा। यह छोटा सा धन्यवाद तेरी जिंदगी के लिए छाया बन जाएगा।
और कुछ दिनों के बाद चोर पकड़ा गया। आखिर चोर निन्यानबे बार बच जाए लेकिन सौवीं बार तो पकड़ाने ही वाला है। और अदालत में पूछा गया कि कोई है जो तुम्हें जानता हो इस नगर में? चोर ने कहा, मेरा धंधा ऐसा है कि दिन में तो बाहर निकलता नहीं। मेरा धंधा ऐसा है कि जब सब सो जाते हैं निकलता हूं। तो परिचय का कोई उपाय नहीं। हां, एक फकीर जै जो मुझे जानता है। वह गांव के बाहर दस मील दूर रहता है।
फकीर को बुलाया गया। वह प्रसिद्ध फकीर था। चोर नहीं जानता था लेकिन मजिस्ट्रेट जानता था, अदालत जानती थी। उन्होंने उस फकीर को पूछा कि क्या तुम इस चोर को पहचानते हो? फकीर ने कहा, यह आदमी चोर नहीं है। इसे मैं पहचानता हूं, भलीभांति पहचानता हूं। एक रात यह मेरे घर मेहमान हुआ था और चोर तो यह बिलकुल भी नहीं है। चोर होना तो दूर, मैंने इसे कंबल भेंट किया था, जो मैं अभी भी ओढ़े हुए हूं, इसने इसे भी लेने से इंकार कर दिया था। मैं इसका ऋणी हूं। चोर होना तो दूर, मैंने इसे कुछ भी न दे सका, फिर भी मुझे धन्यवाद देकर गया था। चोर होना तो दूर, जो सभ्य और शिष्ट कहे जाते हैं, वे भी इतने सभ्य और शिष्ट नहीं है, कि जब द्वार किसी का खोलें तो द्वार बंद भी करके जाए। यह आदमी बड़ा भला है। यह आदमी बड़ा प्यारा है।
मजिस्टे्रट ने कहा, फिर किसी और गवाही की जरूरत नहीं है। तुम्हारा शब्द पत्थर की लकीर है। चोर की जंजीरें खोल दी गई। फकीर बाहर निकला। चोर फकीर के पीछे आया। फकीर ने कहा, क्या बात है? चोर ने कहा, मुझे माफ कर दो। एक बार और माफ कर दो। उस रात तुम मेरे पीछे आए थे और मैंने तुम्हें लौटा दिया। मुझ जैसा अभागा नहीं है। और आज मैं तुम्हारे पीछे आया हूं और सदा तुम्हारे पीछे रहूंगा। मुझे कभी लौटाना मत। मैंने बहुत आदमी देखे हैं मगर बस आदमी की शक्लें हैं। आदमी मैंने तुम में देखा। मुझे चरणों में ले लो। मुझसे जो सेवा बन पड़ेगी, मैं तुम्हारी करूंगा। फकीर ने उसे अपने साथ ले लिया और रास्ते में कहा, मुझे पता है? मैंने कभी सोचा भी न था कि मेरे भीतर कविता की कोई क्षमता है। जिस रात तू आया और वापस गया और मैं खिड़की पर बैठकर पूरे चांद को और तुझे जाते हुए देख रहा था तो पहली बार मेरे जीवन में काव्य का जन्म हुआ। मैंने पहली कविता लिखी। एकमात्र कविता मैंने जीवन में लिखी। वह कविता बड़ी प्यारी है। उस कविता का अर्थ है कि काश यह मेरे हाथ में होता तो आज मैं इस चांद को तोड़कर उस चोर को भेंट देता। मगर यह मेरे बस में नहीं है।
इस दुनिया में तुम्हें सब तरह के लोग मिलेंगे। और यूं तुम अगर हर आदमी से प्रभावित होते रहे, थपेड़े खाते रहे, तुम्हारे जीवन की नौका यूं ही डगमगाती ही रहेंगी। तुम किनारा कभी पा न सकोगे। तुम मझधार में डूबोगे। साहिल तुम्हें मिलेगा नहीं।
एक बात ठीक से समझ लो। हम अपनी दुनिया खुद बनाते हैं। और अगर कोई तुम्हारे साथ छल करता है, या कपट करता है, क्या छीन लेगा? तुम्हारे पास है क्या? तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। और जो गरीब छल-कपट कर रहा है वह दीन, दरिद्र है। उसके पास भी कुछ नहीं है। सोचता है शायद छल-कपट से कुछ मिल जाएगा।
मेरी सलाह, पहली सलाह: जो तुम्हें धोखा दे, समझना कि बड़ा गरीब है। तुमसे तो ज्यादा गरीब है। जो तुम्हारे साथ छल कर, कपट करे, समझना कि बड़ा दीन है। तुमसे तो बड़ा भिखारी है। उस पर दया करना। उस पर करुणा करना। इसलिए नहीं कि तुम्हारी दया और करुणा से वह बदल ही जाएगा। वह बदले या न बदले लेकिन तुम बदल जाओगे। और असलियत बात यही है कि तुम बदल जाओ। और तुम एक ऐसी स्थिति में आ जाओ कि दुनिया तुम्हारे साथ कुछ भी करे लेकिन तुम्हें डांवाडोल न कर सके।
तुमने पूछा है कि लोग जब किसी वस्तु की तरह मेरा उपयोग करते हैं तो बड़ी चोट पहुंचती है। लेकिन तुम खुद अपने को वस्तु की तरह उपयोग कर रहे हो यह तुमने सोचा? तुमने अपने को आत्मा की तरह उपयोग किया है? कभी जीवन के किसी क्षण में? तुमने खुद अपने को वस्तु की तरह उपयोग किया है, एक शरीर मात्र। और जब तुम खुद ही अपने यह दुर्व्यवहार कर रहे हो, तो दूसरों से क्या शिकायत? वे तुमसे वही कर रहे हैं जो तुम अपने से कर रहे हो। और शरीर तो वस्तु है ही। तुम अपने भीतर छिपे हुए उस चैतन्य को पहचानने की कोशिश करो जो वस्तु नहीं है। फिर तुम्हारा कोई भी कैसा भी उपयोग करे, तुम भलीभांति समझोगे कि तुम दूर खड़े देख रहे हो। वह तुम्हारा उपयोग नहीं है।
सिकंदर भारत आया और भारत से लौटते वक्त अरबों की संपत्ति लूटकर ले गया। भारत की सीमा छोड़ने के पहले उसे याद आया कि उसके शिक्षा-गुरु अरस्तू ने उससे कहा कि जब भारत से तुम वापस लगो तो कम से कम एक संन्यासी को लेते आना। क्योंकि दुनिया में और सब कुछ है, हीरे हैं और जवाहरात हैं, लेकिन संन्यास की अदभुत कल्पना पूरब की बस अपनी है। और मैं एक संन्यासी को देखना चाहता हूं, समझना चाहता हूं। आखिर सारा पूरब अपनी सारी प्रतिभा संन्यासी की दिशा में क्यों अनुप्रणित करता है?
तो सिकंदर ने खबर की आसपास, कि कोई संन्यासी यहां उपलब्ध होगा? किसी ने कहा, यूं तो बहुत संन्यासी हैं लेकिन अगर तुम सच में ही किसी संन्यासी को ले जाना चाहते हो तो इस गांव के बाहर, एक नदी के किनारे वर्षों से एक संन्यासी का डेरा है, उसे राजी कर लो। सिकंदर ने कहा, राजी कर लूं? यह मेरी भाषा नहीं है। मेरी तलवार हर चीज को राजी कर लेती है। तो उस गांव के लोगों ने कहा, फिर तुम्हें संन्यासी का कोई पता नहीं है। यह तलवार सब कुछ कर सकती है लेकिन संन्यासी का कुछ भी नहीं कर सकती। सिकंदर की समझ के बाहर थी यह बात। सिकंदर गया और उसने घोषणा की संन्यासी से कि मैं महान सिकंदर, विश्वविजेता, तुम्हें निमंत्रण देता हूं। तुम मेरे राज्य के अतिथि रहोगे। सारा सुख, सारा वैभव जो मेरा है, तुम्हारा है; लेकिन तुम्हें मेरे साथ यूनान चलना होगा।
वह संन्यासी नग्न खड़ा था सुबह की धूप में। उस संन्यासी ने कहा, पहले तो तुम यह भ्रम छोड़ दो कि तुम विश्वविजेता हो। आज हो, कल पानी के बुदबुदे की तरह मिट जाओगे। यह भ्रम छोड़ दो कि तुम महान हो। क्योंकि जिस आदमी को खुद यह भ्रम होता है कि मैं महान हूं, कम से कम वह तो महान नहीं होता। रही मेरे कहीं जाने की बात। संन्यास का मतलब ही है अपनी मर्जी से जीना, अपनी मौज, अपनी मस्ती। कभी आएगी। मौज, कभी आएगी मस्ती, तो आऊंगा यूनान भी; लेकिन मुझे ले जाया नहीं जा सकता। यह तलवार म्यान के भीतर कर लो। यह तलवार उनको डरा सकती है जिसको अपने भीतर के अमृत का कोई पता नहीं  है।
सिकंदर ने कहा कि तुम मुझे जानते नहीं हो, मैं खूंखार आदमी हूं। मैं तुम्हारी गर्दन एक क्षण में, एक झटके में काट दूंगा। वह फकीर हंसा। उसने कहा, अगर तुम्हें इसमें मजा आता हो, सुख मिलता हो, तो यह मेरा सौभाग्य होगा। गर्दन कभी तो गिरेगी ही। चलो, एक आदमी को सुखी कर गयी। एक बात तुमसे लेकिन कह दूं, जब तुम मेरी गर्दन को जमीन पर गिरते देखोगे तो मैं भी अपनी गर्दन को जमीन पर गिरते देखूंगा। क्योंकि मैं गर्दन नहीं हूं, मैं शरीर नहीं हूं। तुम मुझे न देख पाओगे। लेकिन मैं तुम्हें देख पाऊंगा। फिर खींच लो तलवार। और यह पहला मौका है सिकंदर के जीवन में एक ऐसे आदमी से मिलने का, जो निमंत्रण देता है कि खींच लो तलवार। फिर देर किस बात की है? और सिकंदर के हाथ रुक जाते हैं और सिकंदर कहता है, मुझे माफ कर दें। मैं यह संन्यास की भाषा नहीं समझता।
उस संन्यासी ने कहा, अपने गुरु को सिर्फ यह घटना सुना देना। शायद इस घटना से उन्हें कुछ समझ में आ जाए।
तुम्हें पीड़ा होती है कि कोई तुम्हारा वस्तु की तरह उपयोग करे। वस्तुतः तुम्हारा कोई उपयोग करे, इससे ही पीड़ा होती है। क्योंकि उपयोग का मतलब है, तुम्हारा असम्मान। उपयोग का अर्थ है, तुम्हारे व्यक्तित्व को, तुम्हारी आत्मा को स्वीकृति नहीं दी जा रही। तुमसे वही काम लिया जा रहा है जैसे किसी मशीन से कोई काम लेता हो। लेकिन चौबीस घंटे यही हो रहा है। तुम किसी की पत्नी हो, तुम किसी के पति हो। तुमने अपनी पत्नी की आत्मा जानी है या उसका शरीर ही जाना है? तुमने अपने पति के भीतर झांका है, या सिर्फ बाहर जो दर्पण में दिखाई देता है वही देखा है? तुम्हारे बच्चे हैं। तुम उनका भी तो उपयोग कर रहे हो। कोई अपने बच्चों को डाक्टर बनाना चाहता है, कोई इंजीनियर बनाना चाहता है, कोई वैज्ञानिक बनाना चाहता है। लेकिन भीतरी आकांक्षा क्या है? आकांक्षा है कि इन बच्चों का उपयोग हो। इन बच्चों को धन में कैसे रूपांतरित किया जाए? ये बच्चे रुपए के सिक्कों में कैसे ढाले जाए, यही तो तुम्हारी कोशिश है।
हर आदमी हर दूसरे आदमी को उपयोग कर रहा है। और यह तब तक जारी रहता है जब तक तुम अपने को न पहचान लो। कसूर किसी और का नहीं  है। तुम्हारे प्रश्न में झलक ऐसी है कि जैसे कसूर किसी और का है। तुम शिकार हो और शिकारी कोई और है। नहीं, तुमने खुद भी अभी अपने को नहीं जाना--उसको, जिसको तौला नहीं जा सकता, उसको जिसका कोई जन्म नहीं, उसको जिसकी कोई मृत्यु नहीं। तुम उसे पहचान लो तो फिर कोई हर्ज नहीं है। फिर तुम्हें दुख न होगा। फिर तुम्हें सिर्फ दया आएगी उस आदमी पर, जो तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम्हारी आंखों में आंसू आएंगे करुणा के, कि इस बेचारे को कुछ भी पता नहीं।
कहानी है यूनान के बहुत बड़े विचारक डायोजनीज के संबंध में। डायोजनीज नग्न रहता था और एक सुंदर व्यक्ति था। अति बलशाली व्यक्ति था। उन दिनों में सारी दुनिया में दासता की प्रथा थी। आदमी बेचे जाते थे, जैसे जानवर बेचे जाते थे। चार चोरों ने देखा इस आदमी को। उन्होंने बहुत आदमी देखे थे लेकिन यह मूर्ति की तरह सुदृढ़ यह गढ़ा हुआ आदमी--सोचने लगे कि अगर इसे हम पकड़ लें--और यह फकीर है निश्चित, नग्न बैठा है--तो बाजार में इतनी कीमत मिल सकती है, जितनी दस-पंद्रह आदमियों को भी बेचने से न मिले। मगर इसको पकड़ेगा कौन? यह हम चार आदमियों के लिए काफी है। यह हम चारों को बेच देगा।
उनकी खुसफुस डायोजनीज ने सुनी झाड़ियों के पीछे छुपे वे विचार कर रहे थे कि इसका कैसे फांसा जाए। डायोजनीज ने कहा, बाहर आओ। झाड़ियों के पीछे खुसफुस करने से काई फायदा नहीं। मुझे बेचना है, मुझसे प्रार्थना करो। जंजीरों की कोई जरूरत नहीं है। मैं अपना मालिक हूं। और अगर चार आदमियों की जिंदगी में खुशी आ सकती है मुझे बेचने से, मैं तुम्हारे साथ चलने को राजी हूं। वे चारों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे कि यह आदमी कहीं पागल तो नहीं है?
डायोजनीज ने कहा कि मत घबराओ, मेरे पीछे-पीछे आओ। वे बाजार में पहुंचे जहां आदमी बेचे जा रहे थे। ऊंची तख्ती पर आदमी खड़ा किया जाता था और नीलामी बोली जाती थी। वे चारों आदमी डायोजनीज के सामने चोरों की तरह उसके आसपास छिपे हुए खड़े थे। उनकी इतनी हिम्मत भी न था कि वे कह सकें नीलाम करने वाले से, कि हम एक गुलाम लाए हैं, इसके बेचना है। अंततः डायोजनीज खुद ही तख्ती पर चढ़ गया। और उसने तख्ती पर चिल्लाकर जो ऐलान किया वह सोचने योग्य है। उसने ऐलान किया कि यहां जितने भी गुलाम इकट्ठे हुए हैं--वहां गुलाम इकट्ठे नहीं हुए थे, वहां रईस थे, राजकुमार थे, रानियां थीं, राजा थे जो अच्छे गुलामों की तलाश में आए थे डायोजनीज ने कहा, यहां जितने भी गुलाम इकट्ठे हैं, मैं तुम सबको चुनौती देता हूं कि ऐसा मौका बार-बार न आएगा। आज एक मालिक खुद अपने को नीलाम करता है। नीलामी सस्ती नहीं जानी चाहिए। गुलाम तो बहुत बिके हैं और बिकते रहेंगे। और गुलाम दूसरे बेचते हैं, मैं मालिक हूं।
मैं खुद अपने को बचे रहा हूं। ये बेचारे चार-चार गुलाम मेरे पीछे खड़े हैं। इनको पैसे की जरूरत है। तो किसी को हो हिम्मत मुझे खरीदने की, तो खरीद ले। वहां एक सन्नाटा हो गया। वह आदमी इतना मजबूत था कि उसे खरीदना भी उपद्रव खड़ा करे। रास्ते में गर्दन दबा दे। डायोजनीज ने कहा, मत डरो, जरा इन चार गुलामों की फिकर करो। ये बेचारे मीलों मेरे पीछे चलकर आए हैं। इनकी इतनी हिम्मत भी नहीं है कि ये कह सकें कि मुझे बेचना है। इनकी बोलती खो गयी है। खरीद लो, बिलकुल घबराओ मत। मैं किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। मालिकों ने की किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। जिस आदमी को अपने भीतर का पता चल जाता है उसे एक मालकियत मिल जाती है। फिर उसके हाथों में जंजीरें भी हों, पैरों में बेड़ियां भी हों, तो भी तुम उसे गुलाम नहीं कर सकते। तुम उसे मार सकते हो लेकिन उसे गुलाम नहीं बना सकते।
तो जो लोग तुम्हारा वस्तुओं की तरह उपयोग करते हैं वे दयनीय हैं। वे खुद अपना भी वस्तुओं की तरह उपयोग करते हैं। यहां हर आदमी अपने को बेच रहा है, बड़े सस्ते में बेच रहा है। और जब वह खुद अपने को बेच रहा है तो तुमको कैसे छोड़ेगा? वह तुमको भी बेचेगा। और खुद को बिकते देखकर दुख होता है। लेकिन इस दुख से कोई हल नहीं है। सिर्फ एक ही बात इस परेशानी से तुम्हें मुक्त कर सती है और वह है, आत्मबोध। इस बात की अनुभूति कि आगे मुझे जला नहीं सकती और तलवारें मुझे काट नहीं सकती। फिर क्या हर्ज है कि तुम किसी के थोड़े काम आ गए?
और वह नासमझ है, कि उसने समझा कि उसने तुम्हारा उपयोग कर लिया। उसकी नासमझी उसके साथ, उसकी नासमझी उसका भाग्य, उसकी नासमझी उसकी नियति। लेकिन तुम्हारे लिए पीड़ित होने का कोई कारण नहीं है।

प्रश्न: प्यारे भगवान श्री, विपस्सना की साधना में केथार्सिस कब होता है? मैं विपस्सना का अभ्यास करता हूं। मेरा संगीत का कार्यक्षेत्र होश की दिशा में मेरे लिए किस प्रकार सहायक हो सकता है।
विपस्सना सदियों पुरानी पद्धति है ध्यान की। इसकी खोज--किसने इसे खोजा, पता नहीं--अदभुत प्रक्रिया है। स्वयं से परिचित होने का सरलतम उपाय है। विपस्सना शब्द का अर्थ है, चुपचाप बैठकर अपने आपका साक्षी हो जाना। पस्य का अर्थ है, देखना। विपस्सना का अर्थ है, बस चुपचाप भीतर बैठकर देखना। यह श्वास भीतर आयी, वह श्वास बाहर गयी, इसको भी देखना। यह हृदय धड़का, इसको भी देखना। चुपचाप भीतर बैठकर जो भी हो रहा है उसे देखना। और देखते-देखते ही सारी आवाजें विलीन हो जाती हैं और एक महाशून्य तुम्हें घेर लेता है।
बुद्ध ने विपस्सना की प्रक्रिया को सारे जगत में विस्तीर्ण किया। लेकिन एक अड़चन है। और वह अड़चन यह है कि बुद्ध को ढाई हजार वर्ष हो गए। विपस्सना की पद्धति वही की वही है। लेकिन आदमी की नालायकी वही की वही नहीं है। आदमी नालायकी से और नालायकी की तरफ बढ़ता गया। विपस्सना किसी भी भोले-भाले आदमी के लिए सरल मामला है। लेकिन आधुनिक आदमी भोला-भाला नहीं है। आधुनिक आदमी इतने शोरगुल से भरा है, इतनी बेईमानी से। औरों की तो बात छोड़ दो, अपने साथ भी ईमानदार नहीं है।
मैंने सुना है, एक चोर एकनाथ के साथ तीर्थयात्रा पर गया। एकनाथ तीर्थयात्रा पर जा रहे थे। उनके सारे शिष्यों का मंडल तीर्थयात्रा पर निकला था। चोर जाहिर था। सारा गांव उसे जानता था। उस चोर ने एकनाथ को कहा कि मुझे भी साथ ले लो। मुझ गरीब को भी बचा लो। मैं भी तुम्हारे साथ सारे तीर्थ हो जाऊं।
एकनाथ ने कहा, मुझे कोई ऐतराज नहीं। एक शर्त है। कम से कम तीर्थयात्रा तीन से छह महीने तक चलेगी। इस बीच तुम चोरी नहीं करोगे। उस आदमी ने वायदा किया कि कसम खाता हूं आपकी, चोरी नहीं करूंगा।
एकनाथ ने कहा, फिर कोई हर्ज नहीं है, तुम साथ हो लो, लेकिन दूसरी ही रात से गड़बड़ शुरू हो गयी। और गड़बड़ बड़ी अजीब थी। किसी के हाथ की चूड़ियां किसी दूसरे के हाथ में पहुंच गयीं। किसी की अंगूठी किसी दूसरे के हाथ में चली गयी। किसी के बिस्तर का सामान किसी दूसरे के बिस्तर में चला गया। लोग सुबह उठकर बड़े हैरान, कि मामला क्या है? चीजें मिल जाती थीं। चोरी नहीं होती थी। मगर आधा दिन इसी खोज मग निकल जाता था कि चश्मा कहां है? किसी के रुपए गायब। रुपए कहां हैं? जब तक पचास-साठ आदमियों की एक-एक चीज न खोजी जाए तब तक रुपए ने मिलें, चश्मा न मिले।
एकनाथ ने अंततः दोत्तीन दिन बाद, एक रात जागकर बिताई। शक उन्हें हुआ कि मामला उसी चोर का है। और मामला उसी चोर का था। जैसे ही सब सो जाते, वह उठता। और इसका सामान उसके सामान में, उसका सामान किसी और के सामान में। एकनाथ ने उससे कहा, पागल तूने कसम खायी थी, चोरी न करेंगे। उसने कहा, मैंने कसम खायी थी चोरी न करेंगे तो चोरी न करेंगे तो चोरी तो नहीं कर रहा। और मैंने यह तो कभी कसम न खायी थी कि चीजें न बदलेंगे। और तुम्हारी तीर्थयात्रा तो तीन महीने में खत्म हो जाएगी। यह मेरा दिन होता है। और रात भर क्या करूं खाक? और किसी का कुछ बिगाड़ तो नहीं रहा हूं। किसी का एक धेला तो लिया नहीं।
आदत! चोरी नहीं करनी लेकिन फिर भी हेराफेरी करनी है। थोड़ा रस तो आ ही जाता है। थोड़ा मजा तो आ ही जाता है। दूसरे दिन सुबह बैठकर वही एक आदमी था, जो मजे से देखता था कि कहां क्या हो रहा है।
मैंने सुना है ऐसे चोरों की बाबत भी, जो अपने एक खीसे से चुराकर दूसरे खीसे में चीजों को रख लेते हैं। दिल तो बहल जाता है। बात तो रह जाती है। इज्जत का सवाल है।
इन ढाई हजार वर्षों में मनुष्य के मन में इतने ज्यादा विकृत विचार, इतना दमन, इतने बादल उमड़-घुमड़ गए हैं कि अब विपस्सना सीधी-सीधी करना बहुत मुश्किल है। और तुम पूछते हो, विपस्सना में केथार्सिस कब होती है? विपस्सना में केथार्सिस का कोई स्थान ही नहीं है। क्योंकि जिस समय विपस्सना खोजी गयी थी, केथार्सिस की कोई जरूरत ही न थी। अब अगर कैंसर ही न हो तो कैंसर के इलाज की क्या जरूरत है?
इसलिए मैं अपने संन्यासियों को विपस्सना में प्रवेश करने के पहले सक्रिय ध्यान का आग्रह करता हूं, ताकि सक्रिय ध्यान मग सारा उपद्रव, कूड़ा-कर्कट बाहर फेंक दें। और ए बार फिर निखालिस छोटे बच्चे हो जाए। फिर विपस्सना शुरू करें। लेकिन अगर तुमने सीधे विपस्सना शुरू की, तो तुम एक खतरा करोगे। वह जो तुम्हारे भीतर इकट्ठा है, वह दबा ही रहेगा। ऊपर-ऊपर तुम शांत दिखायी पड़ने लगोगे और भीतर-भीतर सारी अशांति इकट्ठी होती जाएगी। और वह शांति एक दिन विस्फोट की भांति फूट सकती है। फूटेगी। एक सीमा है, जब तक तुम उसे दबाए रख सकते हो।
विपस्सना सीधी शुरू करने के मैं पक्ष में नहीं हूं। विपस्सना दूसरा चरण है। दो हजार वर्ष पहले पहला चरण था। अब विपस्सना दूसरा चरण है। अब पहला चरण सक्रिय ध्यान है। सक्रिय ध्यान तुम्हें विपस्सना के लिए तैयार करेगा। सक्रिय ध्यान काफी नहीं है, उससे तुम आत्मज्ञान को उपलब्ध नहीं हो जाओगे। लेकिन सक्रिय ध्यान तुम्हें धोकर--जैसा गंगा में स्नान कर आए हो, ऐसा स्वच्छ कर देगा। उन स्वच्छता के क्षणों में विपस्सना में प्रवेश करना उचित है; अन्यथा खतरा है।
लेकिन बड़ी मुश्किल यह है, हजारों वर्ष बीत जाते हैं, लोग अतीत को ऐसा जोर से पकड़ते हैं कि यह भूल ही जाते हैं कि वह अतीत किन्हीं और तरह लोगों के लिए निर्मित किया गया था, तुम्हारे लिए नहीं। तो विपस्सना के शिक्षक अभी भी विपस्सना सिखा रहे हैं। और उन्हें पता ही नहीं कि इन पच्चीस सौ वर्षों में आदमी पर क्या गुजरी है! तूफान गुजर गए हैं, आंधियां गुजर गयी हैं। आदमी के भीतर इतनी टूट-फूट इकट्ठी हो गयी है, इतना कूड़ा-कर्कट इकट्ठा हो गया है कि पहले उसे साफ कर लेना जरूरी है।
तो मेरी सलाह है, सक्रिय ध्यान को पहला कदम बनाओ। और जब तुम अपने भीतर पाओ कि अब निकालने को कुछ भी नहीं, तब विपस्सना शुरू करो। तो विपस्सना ही तुम्हें आत्मज्ञान की तरफ ले जाएगी।
दूसरा प्रश्न तुमने पूछा कि तुम संगीतज्ञ हो, जागरूक रहकर संगीत को कैसे साधो। या जागरूकता और संगीत को साथ-साथ कैसे विकसित करो। यह थोड़ा जटिल मामला है। क्योंकि जब तुम संगीत में खो जाओगे तो जागरूकता भूल जाएगी। जब तुम लीन हो जाओगे संगीत में तो कौन बचेगा जागरूक होने को? और जब तुम जागरूक होओगे तो संगीत टूट-फूट जाएगा। तो तुम दो विरोधी चीजों को जोड़ने की कोशिश में मुश्किल में पड़ जाओगे। बहुत एंचातानी हो जाएगी। कोई कोई भी एक बात चुन लो, पर्याप्त है। दो-दो नावों पर खतरा होगा। संगीत पर्याप्त ही रह जाए। और परमात्मा के द्वार खुल जाएंगे। उसके अनेक द्वार हैं। सौभाग्य है कि उसका एक ही द्वार नहीं है, अन्यथा बड़ी भीड़ हो जाती। बड़ी मुश्किल हो जाती। क्यू लग जाते। सदियों तक क्यू लगे रहते। बुद्धों को सदियों तक खड़े रहना पड़ता दरवाजों पर। लेकिन उसके अनंत द्वार हैं।
संगीत पर्याप्त है। अगर जागरूकता साधनी है तो फिर संगीत को उसकी अंतिम गहराइयों तक नहीं पहुंचाया जा सकता। तुम संगीत को एक विषय बना सकते हो। जागरूक होने के लिए तुम संगीत के प्रति होश रख सकते हो। मगर वह होश संगीत को ऊंचाइयों पर नहीं ले जा सकेगा, न गहराइयों में ले जा सकेगा।
पश्चिम में एक बहुत बड़ा नर्तक हुआ निजिन्सकी। संभवतः मनुष्य के इतिहास में वैसा अदभुत नर्तक दूसरा नहीं हुआ। क्योंकि निजिन्सकी के नर्तक में एक खूबी थी कि नृत्य करते-करते वह ऐसी ऊंची छलांग मारता था, जो कि जमीन के गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ है। जो लोग ऊंची छलांग भरने का अभ्यास करते हैं ओलिम्पिक में प्रतियोगिता के लिए, वे भी वैसी छलांग नहीं भर सकते। और निजिन्सकी कोई छलांग का अभ्यासी नहीं था। लेकिन घड़ी आती थी उसके नृत्य में कि जैसे उसे पर लग जाते थे। और वह इतनी ऊंची छलांग भरता था कि वैज्ञानिक चकित थे। जमीन की कशिश के विपरीत इतनी ऊंच छलांग भरी ही नहीं जा सकती। और मामला यहीं तक नहीं था। मामला और भी मुश्किल हो जाता था। जब वह छलांग से नीचे गिरता था तो...।
जमीन बड़ी तेजी से खींचती है चीजों को अपनी तरफ। उनकी रफ्तार बहुत होती है। प्रति मिनिट छह हजार मील की रफ्तार से चीजें खींची जाती हैं। इसलिए तुम रात में जब कभी देखते हो और कहते हो, तारा टूटा--कोई तारा नहीं टूटता। तारे बहुत बड़े हैं। अगर टूट जाएं। तो हम कभी के टूट गए होते। तारे नहीं टूटते। यह तो पृथ्वी जब सूरज से अलग हुई और चांद जब पृथ्वी से अलग हुआ, तो पृथ्वी गीली मिट्टी का लोंदा थी। चांद एक बड़ा टुकड़ा है। अलग उसका अस्तित्व हो गया है। लेकिन साथ में छोटे-छोटे मिट्टी के टुकड़े चारों तरफ छितर गए। वे आकाश में भटक रहे हैं। वे जब भी पृथ्वी के घेरे के भीतर आ जाते हैं--घेरा सौ मील है--जब भी दो सौ मील के भीतर उन मिट्टी के टुकड़ों में से कोई टुकड़ा आ जाता है, तो पृथ्वी उसे इतने जोर से खींचती है--प्रति मिनिट छह हजार मील--कि हवा और उस मिट्टी के घर्षण से आग पैदा हो जाती है। जैसे चकमक से आग पैदा हो जाए। इसलिए वह तुम्हें चमकता हुआ मालूम पड़ता है। वह कोई तारा नहीं है। मिट्टी जा, जो जल उठी है।
निजिन्सकी जब अपनी छलांग से उतरता था तो ऐसे उतरता था, जैसे कोई कबूतर का पंख आहिस्ता-आहिस्ता, डोलता-डोलता जमीन की तरफ उतर रहा हो। कोई जल्दी नहीं। यह और भी आश्चर्य की बात थी। उसका उतरना और भी हैरानी की बात थी। वह जमीन के कशिश के नियम को बिलकुल ही तोड़ दिया। निजिन्सकी से लोग पूछते कि यह मामला क्या है? तुम कैसे करते हो? निजिन्सकी ने कहा कि मुझसे मत पूछो कि मैं कैसे करता हूं। क्योंकि जब भी मैं करने की कोशिश करता हूं तब यह नहीं होता। मैं घर भी करने की कोशिश करता हूं, यह नहीं होता। मैंने मंच पर भी करने की कोशिश की है और यह नहीं हुआ। जब मैं थक जाता हूं कोशिश करते-करते, और भूल जाता हूं इस बकवास को, तब मैं अचानक एक दिन पाता हूं कि यह हो गया। लेकिन यह होता तब है जब मैं नहीं होता। जब मेरा प्रयास नहीं होता, मेरा अभ्यास नहीं होता, मेरी चेष्टा नहीं होती, मेरी आकांक्षा नहीं होती, मेरी वासना नहीं होती। यह मेरे लिए उतना ही बड़ा रहस्य है जितना यह तुम्हारे लिए बड़ा रहस्य है। मैं मिट जाता हूं तब यह घटना घटती है।
बड़े चित्रकारों का भी यही अनुभव है। जब वे मिट जाते हैं तभी उनके हाथ ईश्वर के हाथ हो जाते हैं। बड़े संगीतज्ञों का भी अनुभव है। जब वे नहीं रहते तब कोई और, कोई अनंत शक्ति उनकी वीणा पर संगीत को सजाने लगता है।
तो तुम अगर संगीतज्ञ हो और संगीत से प्रेम है, जागरूकता की फिकर मत करो। तुम संगीत में डूबने की फिकर करो। संगीत ही रह जाए, तुम न बचो। तुम वहीं पहुंच जाओगे जहां वे लोग पहुंचे हैं, जो परम जागरूकता की साधना किए हैं। वहां भी यही करना होता है। परम जागरूकता में भी स्वयं को भूलना पड़ता है। शुरुआत करते समय तो व्यक्ति होता है। जागरण की चेष्टा का अ, ब, स, तो व्यक्ति शुरू करता है लेकिन अंतिम अक्षर व्यक्ति नहीं लिखता। वह जो निर्व्यक्ति हमारे भीतर है, वह निराकार हमारे भीतर है, वे उसके हाथ से लिखे जाते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस द्वार से शून्य को उपलब्ध होते हो। सभी द्वार उसके हैं। तुम्हें जो द्वार प्रीतिकर हो। क्योंकि तुम्हारा प्रेम ही तुम्हें गहराइयों तक ले जा सकेगा--उन गहराइयों तक, जहां कि तुम मिटने को राजी हो जाओ। प्रेम के अतिरिक्त कोई दूसरी चीज तुम्हें मिटने को राजी नहीं कर सकती।
तो भला है कि तुम संगीतज्ञ हो। तो संगीत में डूबो। संगीत को ही रह जाने दो। पहुंच जाओगे। पता भी नहीं पड़ेगा कब पहुंच गए। पहुंच जाओगे तभी जानोगे कि अरे, मैं कहां हूं। परमात्मा है। मैं कहां हूं? अस्तित्व है। मगर दो घोड़ों पर सवार हो जाते हैं। कहीं भी पहुंचते नहीं। सिर्फ हाथ-पैर तुड़वा कर किसी अस्पताल में भर्ती होते हैं। एक ही घोड़ा काफी है। एक को पाने के लिए बस एक काफी है। दुई खोनी है। और तुम दुई पर सवार हो रहे हो।

प्रश्न: प्यारे भगवान, दिन में अधिक समय ध्यान में डूबी, खोयी रहती हूं। शरीर क्षीण हुआ है। कुछ समय पहले दलाई लामा के डाक्टर ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा कि मुझे अधिक पार्थिव होने की जरूरत है। कृपया बताएं कि मुझे क्या करना है?
इसको ही मैं कहता हूं, दो घोड़ों पर सवार होना।
यह गुणा का सवाल है। कोई दलाई लामा का डाक्टर गुणा के घर आया हो, यह तो संभव नहीं है। यह गुणा ही दलाई लामा के द्वार पर पहुंची होगी घोड़े की तलाश में। अभी दलाई लामा भी कहीं नहीं पहुंचे, उनका डाक्टर कहां पहुंचेगा? और जब दलाई लामा के डाक्टर ने कहा था, थोड़ी पार्थिव हो जाओ, एक झापड़ खींचकर देना था। उससे तुम्हारे पार्थिव होने का सबूत मिल जाता। और दलाई लामा का डाक्टर आध्यात्मिक है या नहीं, यह भी सबूत मिल जाता।
कोई पार्थिव होने की जरूरत नहीं है। पार्थिव तो तुम जन्मों-जन्मों से हो। पार्थिव के अतिरिक्त तुम हो ही क्या? और ज्यादा आत्मिक होने की जरूरत है। मगर यही मुश्किल है। लोग भटकते फिरते हैं।
दलाई लामा के डाक्टर के पास जाने की गुणा, तुझे जरूरत क्या थीं? लेकिन नहीं लोग सोचते हैं शायद दलाई लामा के पास कुछ मिल जाएगा, कि शायद अरविंद आश्रम में कुछ मिल जाएगा, कि शायद किसी और स्वामी के पास कुछ मिल जाएगा। यह भिखारीपन छोड़ो। जो मिलना है, वह तुम्हारे भीतर मिलना है। और दलाई लामा के डाक्टर ने खुद तुम्हारा हाथ पकड़कर कहा, इससे तुम्हारा चित्त बड़ा प्रसन्न हुआ होगा कि अहा! धन्य हूं मैं। खुद दलाई लामा मेरा हाथ, उनका डाक्टर मेरा हाथ पकड़कर कह रहा है! जो सलाह बिना मांगे देता है वह नालायक है।
और क्या पार्थिव होना है? शरीर है तुम्हारे पास। खोपड़ी है हजार कीड़ों से भरी हुई। और पार्थिव होने की क्या जरूरत है?  और पार्थिव होना हो तो कठिन क्या है? और थोड़ा भोजन ज्यादा करने लगो।
पार्थिव नहीं होना है। वह जो तुम्हारे भीतर छिपा है अपार्थिव, उसके साथ अपने को जोड़ना है और जानना है कि मैं शरीर नहीं हूं, मैं पार्थिव नहीं हूं। और एक बार और दुबारा जाना, और उस डाक्टर का हाथ पकड़कर कहना कि तुम्हें थोड़ा आध्यात्मिक होने की जरूरत है।
पार्थिव तो हम हैं ही। थोड़ी सी किरण अपार्थिव की हमारे भीतर है, उस किरण को और प्रज्वलित करना है। ध्यान उसी किरण को थोड़ी और उकसाहट देता है जैसे कोई आग को उकसाता हो, राख को झाड़ता हो। अंगारे जो राख में दब गए हैं, उभर आते हों। बस वैसे ही।
मगर मैं उन लोगों के बहुत पक्ष में नहीं हूं जो भिखारियों की तरह यहां-वहां, हर कहीं पूछते फिरते हैं, क्या करें? करना कुछ भी नहीं है। एक फैशन है। इस शंकराचार्य के पास जाओ, दलाई लामा के पास जाओ। आचार्य तुलसी के पास जाओ। और इस मुल्क में इतनी दुकानें हैं जिनका कोई हिसाब नहीं। जन्मों-जन्मों तक ये दुकानें तुम्हें भटकाती रही हैं, और जन्मों-जन्मों तक भटकते रहो। और इस सारी भटकन में एक बात भूले बैठे हो कि जिसकी तुम खोज कर रहे हो वह तुम्हारे भीतर है।
दलाई लामा जब तिब्बत से भारत भागे तो जो सब से बड़ी सुखद घटना घटी वह यह थी, कि ल्हासा के किले में जितना सोना था वह तो सब दलाई लामा साथ ले आए, लेकिन जितने परेशान शास्त्र थे वे सब वहीं छोड़ आए। या यूं कहो कि गोबर ले आए और सोना छोड़ आए। गोबर की कीमत है। और तिब्बत के पास कीमती शास्त्र थे। लेकिन उन शास्त्रों को लाने की कोई फिकर नहीं। उनमें ऐसे शास्त्र थे जिनके मूल संस्कृत जला डाले गए हैं। क्योंकि हिंदुओं ने बौद्धों को नष्ट करने के लिए उन शास्त्रों को जला दिया। अब उनको पाने का एक ही उपाय है। उन्हें निब्बतीय से फिर वापस भारतीय भाषाओं में अनुवादित किया जाए। उन शास्त्रों में जीवन की बहुमूल्य कुंजियां छिपी हैं। लेकिन सोना ज्यादा कीमती है!
तो करोड़ों रुपयों का सोना...उसे तो...पूरा ल्हासा का किला खाली कर लिया और उसको लेकर भागे। इस आदमी में अगर जरा भी अध्यात्म होता तो यह सोना तो वहीं छोड़ देता, उस खालिस पारस को लेकर अपने साथ आता जो कभी भारत से तिब्बत गया था और फिर भारत से विलीन हो गया। लेकिन पारस पत्थर को पहचानना मुश्किल है। सोना तो किसी भी आंख में दिखाई पड़ जाता है।
तो न तो दलाई लामा के पास कोई अध्यात्म है; रही उनके डाक्टर की बात, सो उन बेचारे के पास क्या हो सकता है? हां, उसने एक भ्रांत धारणा जरूर गुणा के मन में भर दी कि और पार्थिव हो जाओ। बंबई में रहकर अब और पार्थिव कैसे होओ? अब तो नर्क ही जाना पड़ेगा। करो कोशिश। जाओ चौपाटी पर और छिड़को परफ्यूम, खाओ इडली-डोसा, बनो पार्थिव। तरू माता से दोस्ती कर लो।

धन्‍यवाद।

कोंपलें फिर फूट आईं - प्रवचन-04

अपने ज्ञान को ध्यान में बदलो

दिनांक 3 अगस्त, 1986,
9. 30 प्रातः सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्न: परसों ही आपने कहा कि अपने को जाने बिना अर्थी नहीं उठने देना। यह चुनौती तीर की तरह हृदय में चुभ गयी। हम कैसे शुरू करें?
मनुष्य के बहुत से नाम हैं—अरबी में, उर्दू में, पर्शियन में। आदमी मनुष्य का पर्यायवाची है। होना नहीं चाहिए। क्योंकि मनुष्य का अर्थ होता है, जो मनन करे। और आदमी का अर्थ होता है, जो मिट्टी का बना है। अंग्रेजी में भी मनुष्य का पर्यायवाची है, ह्युमैन।
होना नहीं चाहिए। अलग है अनुवाद दोनों ही आदमी को मिट्टी का बना हुआ पुतला नहीं माना गया है। इस देश में आदमी के होने की पहचान है, उसके मनन की क्षमता। इसलिए हम उसे कहते हैं मनुष्य। मनन की अनेक दिशाएं हो सकती हैं। चित्रकार भी सोचता है, मूर्तिकार भी सोचता है, दार्शनिक भी सोचता है, धर्मगुरु भी सोचता है, वैज्ञानिक भी सोचता है।
लेकिन ये सारी सोचने की प्रक्रियाएं बाहर की तरफ जाती हैं। ये किसी और विषय की तरफ इंगित करती हैं। जिसको हमने ज्ञानी कहा है वह अपने सारे सोचने की दिशाओं को भीतर की तरफ मोड़ लेता है। वह सिर्फ अपने संबंध में ही सोचता है। उसके लिए जगत में कुछ और सोचने योग्य नहीं है।, हो भी हनीं सकता। क्योंकि जिसे अपना ही पता नहीं है उसे किसी और चीज का क्या पता हो सकता है?
अलबर्ट आइंस्टीन इस सदी के सर्वाधिक बड़े विचारकों में एक थे। लेकिन मरते वक्त उन्होंने जो कहा, वह उनके जीवन भर की पीड़ा का निचोड़ था। किसी ने पूछा, आइंस्टीन जब सांस तोड़ रहे थे, कि अगर पूरब के लोग सच हों और पुनर्जन्म होता हो तो आप आगे भी वैज्ञानिक ही होना चाहेंगे या कुछ और? मनुष्य के आखिरी वचन बड़े महत्वपूर्ण होते हैं। वे उसके सारे जीवन का निचोड़ होते हैं क्योंकि उसके बाद फिर उनमें सुधार करने की भी कोई सुविधा न रहेगी। आइंस्टीन ने आंखें खोलीं और कहा कि फिजिसिस्ट होने की बजाय मैं एक प्लंबर होना पसंद करूंगा ताकि कुछ समय अपने संबंध में सोचने के लिए भी तो दे सकूं। मेरा सारा समय चांदत्तारों के संबंध मग सोचने में खो गया और मैं वैसा ही अज्ञानी मर रहा हूं जैसा अज्ञानी पैदा हुआ था और दुनिया मुझे ज्ञानी कहती है। अगर कोई आगे मेरा जन्म हो तो मैं वैसा ही नहीं मरना चाहता हूं जैसा पैदा हुआ। मैं जागकर, अपने को जीतकर, अपने को पहचानकर इस जगत से विदा होना चाहता हूं। यह जीवन तो गया। यह तो बह गया। अब इसमें तो कोई संभावना न बची।
जिस चिंतन और मनन के लिए मैंने तुमसे कहा है उसमें पहली बात है कि सब तरफ से अपने विचारों को खींचकर अपने पर ही आमंत्रित कर लेना। और एक जादू घटित होता है जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। तुम सोच सकते हो केवल उसी चीज के संबंध में जिसके संबंध में तुमने पढ़ा हो, सुना हो, किसी ने कुछ कहा हो। तुम अपने संबंध में क्या सोचोगे? तो जैसे ही व्यक्ति सारे बाह्य चिंतन छोड़ देता है और उसकी आंखें सिर्फ अपनी ही रूप पर टिक जाती हैं...इसलिए मैंने कहा, एक जादू घटित होता है: तुम अपने संबंध में सोच नहीं सकते। वहां सोचना शून्य हो जाता है। वहां सिर्फ देखना शेष रह जाता है।
इसलिए हमने इस देश में उस घड़ी को दर्शन की घड़ी कहा है, चिंतन की नहीं। तुम देखते तो कि तुम कौन हो लेकिन सोचने को कुछ बाकी नहीं। तुम जो भी हो, पूरे के पूरे खुले हो और नग्न हो। और यही आत्म—पहचान तुम्हें जीवन के सार तत्व से परिचित करा देती है, उस अमृत से परिचित करा देती है जिसका कोई अंत नहीं है। शरीर आए हैं और गए हैं। शरीर आएंगे और जाएंगे। जब तक कि तुम अपने को न पहचान लो, नए—नए रूपों में नए—ने ढंग में, तुम इसी संसार में भटकते रहोगे। और जिसने अपने को जान लिया उसकी फिर इस संसार में आने की कोई जरूरत न रही। संसार तो यूं है जैसे कोई पाठशाला हो। जब तक तुम असफल होते हो तब तक वापिस पाठशाला में लौट आना पड़ता है और जब सफल हो जाते हो तो पाठशाला से छुट्टी हो जाती है। संसार बुरा नहीं है, विद्यालय है। इसको घृणा मत करना। यह अस्तित्व की देन है। क्योंकि इसी के बीच इस बात की संभावना है कि तुम किसी दिन टकराते—टकराते, गिरते और उठते, संभालने और संभलते अपने को जाने लोगे। और जिसने स्वयं को जान लिया उसके लिए जानने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
शह ज्ञान की परमदशा हमने समाधि कही है। तुम एक शब्द से परिचित हो: व्याधि। व्याधि का अर्थ है बीमारी। यह दूसरा शब्द है समाधि। समाधि का अर्थ है, व्याधियों के ऊपर उठ जाना, सारी व्याधियों का सम हो जाना, शांत हो जाना। इस देश ने अपने शब्द भी बहुत सोच—सोचकर गढ़े हैं। वे अंधे, नासमझ व्यवहारिक लोगों के द्वारा नहीं गढ़े गए हैं। आंखवालों ने उन्हें तराशा है। अगर हम उन शब्दों को भी ठीक से समझ ले तो इशारे मिलने शुरू हो जाएंगे।
सारी दुनिया में स्वास्थ्य जैसा कोई शब्द नहीं है। हालांकि हर भाषा में स्वास्थ्य को अनुवादित करने के लिए शब्द हैं। हेल्थ है लेकिन हेल्थ का अर्थ है, घाव का भर जाना। वह बड़ी छोटी बात है। स्वास्थ्य का अर्थ होता है, स्वयं में स्थित हो जाना, स्वस्थ हो जाना। इसका किसी घाव के भरने से संबंध नहीं है। तुम हो, लेकिन अपने से भागे—भागे तुम हो, लेकिन अपने से दूर—दूर। तुम हो, लेकिन तुम्हें पता नहीं है कि तुम कहां हो। जिस दिन तुम स्वस्थ हो जो हो, स्थिर हो जाते हो, अपनी चेतना में ठहर जाते हो जैसी कोई दीए की ज्योति निष्कंप ठहर जाए, कोई हवा का झोंका उसे हिलाए नहीं, वैसी ज्योति की भांति जब तुम अपने भीतर ठहर जाते हो तो जो प्रकाश का आविर्भाव होता है, जो किरण विकीर्णित होती हैं, उसे ही मैंने मरने के पहले अपने को जानना कहा है।
और मरने के पहले पर जोर दिया क्योंकि अगर तुम जीवन में भी जीवन को न जान सके तो मृत्यु में कैसे जान सकोगे? मृत्यु तो अंधेरी गुफा है। हां, यह सच है कि जिन्होंने अपने को जीवन में जान लिया है उनकी आंखों में इतनी रोशनी होती है, कि वे मौत की अंधेरी गुफा में भी अपने को भूलते नहीं। वे मौत की अंधेरी गुफा में भी अपने को जानते हैं।
बुद्ध के जीवन में घटना है उनके अंतिम दिन की। सुबह हुई है, पक्षियों ने गीत गाए हैं, फूल खिले हैं और उन्होंने अपने सारे शिष्यों को इकट्ठा किया है, और उनसे कहा है कि मैं तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं। ध्यान करना, उन्होंने कहा, मैं तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं। वे सब निश्चित बहुत आतुर हो उठे। क्योंकि बुद्ध ने चालीस वर्षों के शिक्षण में कभी भी यह न कहा था कि मैं तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं। हालांकि उनके हर शब्द में सिवाय सुखद समाचार के और कुछ भी न था। आज कौन सी अनूठी बात घटनी थी? आज कौन सा कोहिनूर उनके शब्दों में जगेगा? आज कौन सा सूरज उगेगा? एक सन्नाटा छा गया। बुद्ध ने कहा, आज मैं शरीर छोड़ रहा हूं। जीवन को बहुत देख लिया। जीवन को बहुत जी लिया। आज मैं मौत के अंधेरे में प्रवेश कर रहा हूं। लेकिन वह अंधेरा दूसरों के लिए होगा। वह अंधेरा मेरे लिए नहीं है। मैं इतना ही ज्योतिर्मय, इतना ही प्रकाशोज्ज्वल उस अंधेरे से भी गुजर जाऊंगा जैसे जीवन से गुजरा हूं। इसलिए मैंने कहा कि तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं। मृत्यु का समाचार और सुखद। तुम्हें कुछ पूछना हो, तुम पूछ लो। दस हजार भिक्षुओं में किसकी हिम्मत थी और किसकी जुर्रत थी कि जिस आदमी ने चालीस वर्षों तक हर बात को समझाया हो, आज मरने की घड़ी में भी उसको चैन से न मरने दिया जाए। उनकी आंखों में आंसू थे लेकिन उनकी जुबानों पर कोई सवाल नहीं था। उन्होंने कहा, हमें कुछ पूछना नहीं है। आपने हमें इतना दिया है कि जितना हमने कभी सोचा भी न था। आपने हमारे वे उत्तर भी हमारे हाथों में थमा दिए हैं जिनके लिए हमारे पास प्रश्न भी नहीं हैं। मैं आपसे क्या पूछें? तो बुद्ध ने कहा, मैं विदा ले सकता हूं? और उन्होंने आंखें बंद कीं।
और घटना बड़ी प्यारी है कि उन्होंने पहले चरण में शरीर को छोड़ दिया। दूसरे चरण में मन को छोड़ दिया। तीसरे चरण में हृदय को छोड़ दिया। और तभी एक गांव से, पास के गांव से एक आदमी भागा हुआ आया और उसने कहा कि ठहरो, चालीस साल से बुद्ध मेरे गांव से गुजरते रहे हैं लेकिन मैं अंधा आदमी हूं। हमेशा सोचता रहा कि अगली बार जब जाएंगे। तब मिल लूंगा। यूं जल्दी भी क्या है? और कभी मेहमान घर में थे, कभी दुकान पर भीड़ थी और कभी पत्नी बीमार थी। और बहाने ही खोने हों तो अंतहीन बहाने उपलब्ध हैं। बुद्ध आते रहे, जाते रहे। अभी—अभी मैंने सुना कि वे जीवन छोड़ रहे हैं। और मुझे एक प्रश्न पूछना है। बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद ने कहा, अब देर हो गयी, अब बहुत देर हो गयी। वे तो जा भी चुके।
लेकिन बुद्ध ने आंखें खोल दीं और बुद्ध ने कहा, आनंद, तू मेरे ऊपर दोषारोपण करवा देगा। आने वाली सदियां कहेंगी कि मैं जिंदा था और एक आदमी मेरे द्वार से प्यासा लौट गया। शरीर छूट जाए, मन छूट जाए, हृदय छूट जाए लेकिन मैं तो हूं; और मैं तो कभी छूटने वाला नहीं हूं। तुम मेरे शरीर को जाकर अर्थी पर चढ़ाकर जला देना। लेकिन अगर किसी के हृदय से भरकर मुझसे प्रश्न पूछा तो उसे उत्तर मिल जाएगा। क्योंकि मैं तो हूं, मैं तो रहूंगा। मुझे जलाने का कोई उपाय नहीं है और मुझे मिटाने का कोई उपाय नहीं है। मैं अमृत हूं।
इस देश की प्रार्थना बड़ी अदभुत है। दुनिया में बहुत मंदिर हैं और बहुत मस्जिदें हैं और बहुत गिरजाघर हैं लेकिन उनकी प्रार्थनाएं बचकानी हैं। सिर्फ इस देश ने प्रार्थना की है कि हमें क्षणभंगुर से शाश्वत की ओर ले चलो। इसमें कोई भी बात शूद्र नहीं है। और यह प्रार्थना किसी और से नहीं की गयी है। क्योंकि कोई और तुम्हें लग जा नहीं सकता। केवल तुम ही, और केवल तुम ही मृत्यु से अपने को अमृत की ओर ले जा सकते हो। अपने जानने की सारी क्षमता को स्वयं पर केंद्रित कर लो। दूसरे शब्दों मग मैं इसे ध्यान कहता हूं। ज्ञान दूसरे का होता है, ध्यान अपना होता है। ज्ञान पराए का होता है, ध्यान स्वयं का होता है। अपने ज्ञान को ध्यान में बदल लो। तो इसके पहले कि तुम्हारी अर्थी उठे, तुम उसे जान लोगे जिसकी कोई अर्थी नहीं उठती है और न कभी उठ सकती है।

प्रश्न: प्रिय भगवान, रजनीशपुरम कम्यून से लौटकर मैं बहुत अकेली, खोई—खोई सी कन्फ्यूज्ड अनुभव कर रही हूं। जो भी मैं करती हूं वह गलता लगता है और दूसरों को चोट लगता है। मुझे कुछ रूपांतरित होने में बहुत समय लगा रजनीशपुरम में और अब भारत आकर पुनः एडजस्ट करना पड़ रहा है। आप मुझे अमरीका में पीछे रह गए अपने मित्रों की कमी महसूस कर रही हूं। मैंने सुना है कि अमरीका में भी मेरे मित्र इसी स्थिति में हैं। मैं क्या करूं? कुछ सुझाव देने की कृपा करें।
संन्यास का अर्थ है, समझौता न करना। और सब तरह के समायोजन समझौते हैं। संन्यास का अर्थ है, अकेले होने को काफी समझना। दूसरे की जरूरत मालूम पड़ती हो तो तुम कम्यून में हो कि बाजार की भीड़ में हो, कोई फर्क नहीं। दूसरे की जरूरत न रह जाए, तुम अपने में काफी और पूरे हो जाओ। इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम दूसरों को छोड़ दो। और इसका यह भी अर्थ नहीं है कि तुम दूसरों के विरोधी हो जाओ। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति दूसरों के ऊपर निर्भर नहीं रह जाता, जिसके जीवन में दूसरे की जरूरत नहीं रह जाती, जो अपने में भरा—पूरा है वही व्यक्ति दूसरे को कुछ दे सकता है। उसी भरे हुए घड़े से अमृत दूसरों पर भी छलक सकता है।
तुम्हारी तकलीफ वह है कि कम्यून में तुम कम्यून के लोगों के साथ समायोजित होना चाहती थीं। वह भूल थी। अपने साथ समायोजित होना है। एक भूल वहां की, अब उसी भूल को यहां दोहराना पड़ेगा। क्योंकि वहां कम्यून के लोगों से समायोजित। हो गयी थीं। उनका रहन—सहन, उनका जीवन, उनका ढंग, उनका उठना, उनका बैठना। उनका सोचना, वह सब तुमने अपने ऊपर आरोपित कर लिया। लेकिन इसमें तुम्हारा अपना कुछ न था। कम्यून पीछे छूट गया, आदतें तुम्हारे साथ आ गयी और अब इस बाजार की दुनिया में दूसरी तरह की आदतें चलती हैं। तो फिर अड़चन है। अब तुम लोगों के साथ अपने को मुश्किल में पाती हो। मगर भूल वही है जो तुमने कम्यून में की थी वही भूल अब है। तुम दो भूलें भी नहीं कर रहे हो—एक ही भूल कि दूसरों के साथ समायोजित होना है। और हर समायोजन गुलामी है। हर समायोजन अज्ञान है और हर समायोजन में तुम्हें अपनी आत्मा बेचनी पड़ती है। समझौता करने का मतलब ही यही होता है: कुछ लो, कुछ दो। संन्यासी समझौता नहीं करता। संन्यासी केवल अपने में समाधिस्थ होता है। और उसकी समाधि का इतना बल है कि उसके पास जो भी जाएगी, खाली हाथों वापिस न जाएगा। जो भी उसके पास आएगा वह प्यासा वापिस न जाएगा।
तो तुम्हें कोई जरूरत नहीं है कि तुम किसी से समायोजित होओ। तुम्हें सिर्फ एक ही जरूरत है कि तुम समाधिस्थ बनो ताकि दूसरे तुम्हारी समाधि से खिले हुए फूलों की सुगंध से भर जाएं। और तब तुम्हारे और दूसरों के बीच एक मेल होगा जो आदतों का नहीं है और जो बाजार के लेन—देन का नहीं है। जो न तो सौदा है और न व्यवसाय है। क्योंकि समाधिस्थ व्यक्ति के केवल दिया है, लिया कुछ भी नहीं। लेकिन मजा यह है कि जिसे देने की कला आ गयी उसके पास की संपदा रोज बढ़ती ही चली जाती है। उसके भीतर का गौरव रोज निखरता ही चला जाता है। यूं ही समझो कि जैसे कोई कुआं हो, रोज तुम उसमें से पानी खींच लेते हो और नए झरने कुएं को पानी से भरते रहते हैं। वे झरने तुम्हें दिखाई नहीं देते। लेकिन कुआं दूर सागर से जुड़ा है। दूर—दूर तक उसकी पहुंच हैं। लेकिन तुम कुएं से पानी भरना बंद कर दो इस डर से कि कहीं पानी कुएं से भरते गए तो कुआं खाली हो जाएगा। तो एक दिन मुसीबत में पड़ोगे। कुएं में पानी न बचेगा। अगर तुम कुएं को बंद करके ताला लगा दो तो कुएं में फिर नया पानी नहीं आएगा। झरने कुएं में नए—नए स्रोत जल के नहीं लाएंगे। और जो पुराना पानी है वह रोज सड़ेगा, राज मरेगा और ऐसे कुएं का पानी मत पीना क्योंकि वह जहरीला हो जाएगा। लेकिन हम सारे लोग ऐसे ही कुएं हो गए हैं जिन्होंने अपनी—अपनी छातियों पर ताले जड़ रखे हैं, कि कहीं भीतर का प्रेम निकल गया, कहीं भीतर की करुणा बह गयी तो हम खाली हो जाएंगे। लेकिन तुम्हें पता नहीं कि करुणा और प्रेम, मैत्री, सहजता, शांति और मौन, जितना तुम देते हो उतना बढ़ते हैं। यह कोई साधारण अर्थशास्त्र नहीं है। यह कोई तुम्हारी तिजोरी नहीं है। हां, तिजोरी में जो रुपया है वह तुम दोगे तो रोज खाली होगा।
मैंने सुना है कि एक आदमी भीख मांग रहा है—बहुत दयनीय दशा में है। एक कार उसके पास आकर रुकी और पूछा, कितने दिन से भोजन नहीं किया? उस आदमी ने कहा, आज पांच दिन हो गए, न भोजन है, न कुछ खाने को है। उस आदमी ने अपने खीसे से पांच रुपए का नोट निकाला और उस आदमी को दिया और कहा, जाओ ठीक से भोजन करो और विश्राम करो। जाते—जाते उस भिखमंगे से उसने पूछा, लेकिन मैं यह पूछूं कि तुम्हारा चेहरा किसी भिखमंगे का चेहरा मालूम नहीं होता। तुम्हारे चेहरे पर शालीनता के निशान हैं। तुम्हारे चेहरे पर अब भी गौरव मालूम होता है। ये कोई भिखारी की आंखें नहीं हैं। वह भिखारी हंसने लगा। उसने कहा, आप ठीक कहते हैं। कभी मेरे पास भी कार थी। लेकिन जैसे आपने मुझे पांच रुपए दिए मैं दिल में सोचने लगा कि इस बेचारे पर भी वही मुसीबत आएगी जो मुझ पर आयी है। ऐसे ही मैं भी बांटता रहा। वह सब चुक गया। तो जरा संभलकर चलो। ऐसे पांच—पांच रुपए भिखारियों को देने लगे तो यह कार ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं है।
बाहर की संपदा है वह बांटने से चुक जाती है। और भीतर की जो संपदा है वह बांटने से बढ़ जाती है। तो कोई जरूरत नहीं है कि किसी से समायोजन करो। जरूरत केवल इतनी बात की है कि प्रेम देने में कंजूसी मत करो और समायोजन हो जाएगा। प्रेम से बड़ा कोई और मजबूत धागा नहीं है। बड़ा कोमल है, फूलों जैसा कोमल है लेकिन लोहे की जंजीरों से भी ज्यादा मजबूत है। प्रेम बांटो, आनंद बांटो, और तुम जहां हो, जिनके बीच हो उन सभी के लिए गौरव बन जाओगे। और खुद अपने लिए एक अपूर्व शांति का अनुभव करोगे। न कोई झंझट है, न कोई झगड़ा है। लेकिन तुमने कम्यून में भी भूल की। तुम वहां दूसरों की आदतों का अनुसरण करने लगे। तुमने सोचा कि उनके जैसे होंगे तो ही उनके साथ मैत्री हो सकती है। अब फिर वही भूल, कि अब लोगों के साथ होना है तो उनके ही जैसा होना होगा।
दुनिया में किसी व्यक्ति को किसी दूसरे जैसा होने की जरूरत नहीं है। सिर्फ अपने जैसा होने की जरूरत है—आनंदित, आहलादित, प्रफूल्ति, और सारी दुनिया उसकी है। वह फिर कम्यून में हो कि बाजार में हो कि दुकान में कि मंदिर में हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। वह जहां भी है वहीं काबा है। वह जहां भी है वहीं वाराणसी है। वह जहां पैर रख दे वहीं तीर्थंकरों ने पैर रखे होंगे। वह जहां बैठ जाए वहीं बुद्ध बैठे होंगे।
अपने से, अपने भीतर से सारे विरोध गिरा दो और अपने भीतर एक ऐसे समस्वर संगीत पैदा कर लो जो बजता ही हरे। उस संगीत ने आज तक दुनिया में करोड़ों लोगों को जीता है। तुम्हें अपना संगीत भूल गया है। सब साधन तुम्हारे पास हैं। लेकिन उन साधनों से संगीत कैसे पैदा हो इसकी कला भूल गयी है। उस कला को ही धर्म कहता हूं। हिंदू होने को मैं धर्म नहीं कहता और न मुसलमान होने को और न जैन होने को। अपने भीतर एक ऐसी शांत, एक ऐसी मौन, एक ऐसे संगीत की दुनिया पैदा कर लो कि जो तुम्हारे पास आए बिना तुम में डुबकी लिए लौट न सके। और जो एक बार तुम में डुबकी ले ले, बार—बार तुम्हारे पास आए।
ऐसी कथा है कि बुद्ध का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिष्य सारिपुत्र बुद्ध से दूर—दूर बैठता था। जब कि स्वभावतः लोग पास—पास बैठने की कोशिश करते हैं, सारिपुत्र छिप—छिपकर बैठता था, वहीं झाड़ की आड़ में, कहीं भीड़ की आड़ में। और दस हजार शिष्यों में बहुत आसान था छिप—छिपकर बैठ जाना। एक दिन बुद्ध ने उसे आखिर पकड़ ही लिया। और कहा कि सारिपुत्र, यह तुम क्या कर रहे हो? सारिपुत्र ने कहा, मुझे छोड़ दो, मुझे छिपा रहने दो। पर बुद्ध ने कहा, मामला क्या है? सारिपुत्र ने कहा कि मैं बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं होना चाहता। बुद्ध ने कहा, तुम पागल हो गए? तुम मेरे पास आए इसलिए थे कि बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओ। उसने कहा, आया था वह मेरी गलती थी। जाने वाला नहीं हूं। क्योंकि मैं देखता हूं रोज—रोज जो—जो बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाते हैं, आप कहते हैं जाओ, अब मेरे संदेश को दूर—दूर पहुंचाओ। मैं तो रोज—रोज डुबकी लूंगा। मैं बुद्धत्व छोड़ सकता हूं लेकिन आपमें डुबकी लेना नहीं छोड़ सकता हूं। अगर वचन देते हों कि मेरे बुद्धत्व के होने के बाद भी मुझे बैठने का इन चरणों में हक होगा तो मैं छिपना छोड़ दूं। अन्यथा मैं छिपता रहूंगा, अन्यथा मैं बचता रहूंगा। मैं बहुत बार बुद्धत्व के किनारे पहुंच गया हूं, और ऐसा भागा हूं कि मैंने पीछे लौटकर नहीं देखा। मुझे पक्का पता है कि मंदिर कहां है; उसी मंदिर को बच—बचकर चल रहा हूं। मुझे मत सताओ। बुद्ध ने तब उसे वचन दिया कि तू फिकर छोड़। तू भी खूब आदमी है। तू मजे से बैठ, जहां तुझे बैठना है। तेरे बुद्धत्व के हो जाने के बाद भी तू मेरे साथ ही चलेगा। तुझे मैं अपनी छाया की तरह साथ रखूंगा सारिपुत्र ने कहा, आश्वासन? कोई धोखाधड़ी तो नहीं है? लेकिन उसे पक्का विश्वास नहीं आया। वह बुद्ध के पास बैठने लगा और एक दिन बुद्धत्व को उपलब्ध भी हुआ लेकिन उसने बुद्ध से निवेदन नहीं किया कि मैंने उसे पा लिया है जिसे खोजने निकला था। बुद्ध ने कहा, सारिपुत्र, कम से कम कह तो दे। सारिपुत्र ने कहा, मैं अपने मुंह से न कहूंगा। मुझे अज्ञानी ही रहने दो। बुद्ध ने कहा, मगर तू अब अज्ञानी नहीं है, तू बुद्ध हो गया है। और वे बातें जो मैंने तुझसे कहीं थीं, तेरे अज्ञान में कही थीं। उसने कहा, देख रहे हैं, मैंने पहले ही कहा था, धोखाधड़ी नहीं चलेगी। मैं मर जाऊं मगर इस जगह को नहीं छोडूंगा। इन चरणों को नहीं छोडूंगा। यह डुबकी—इसके बिना बुद्धत्व भी मुझे मीठा नहीं है।
तुम अपने साथ, अपने भीतर, अपने सितार पर संगीत को उठने दो। लोग तुमसे समायोजित होना चाहेंगे। तुम क्यों लोगों से समायोजित होना चाहते हो? और तुम उनसे समायोजित होकर न केवल अपना अहित करोगे, उनका भी अहित करोगे। क्योंकि मैंने देखा, पश्चिम में मैंने स्त्रियां से पूछा सिगरेट क्यों पी रहे हो? उन्होंने कहा कि अगर सिगरेट न पीओ तो पश्चिम में जो बुद्धिजीवियों का वर्ग है उसमें बैठ भी नहीं सकते। यहां पूरब में कोई स्त्री बैठकर सिगरेट पीने लगे तो अशोभन मालूम होगा अशिष्ट मालूम होगा। हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वे लोग भी जो सिगरेट पीते हैं, वे भी नहीं मान सकते कि कोई स्त्री सिगरेट पी रही है। स्त्री को हमने उतना समादर दिया है। हम उसे इतने नीचे न गिरने देंगे। लेकिन लोगों के साथ बैठना है तो सिगरेट पीओ, शराब पीओ, जुआ खेलो। लोगों की जो आदतें हैं उनको अपनी आदतें बना लो। लोग अगर नालियों में गिरे हों तो तुम भी नालियों में गिरो। और लोग अगर नालियों में सड़ रहे हों कीड़ों की तरह तो तुम भी नालियों में कीड़ों की तरह सड़ो। तब तुम उनके साथ दोस्ती बना सकोगे। मगर यह दोस्ती बड़ी महंगी है। यह तो जीवन का सब कुछ खोकर तुम क्या पा रहे हो? नहीं, भूलकर भी किसी दूसरे से समायोजित मत होना। समायोजित होना है तुम्हें स्वयं की सत्ता से, क्योंकि वहीं परमात्मा का निवास है। और जो उसके साथ एक हो गया उसे इस दुनिया में किसी के साथ एक होने की जरूरत नहीं है। और जो उसके साथ एक हो गया वह हर जगह समादृत होगा।
मैं अमरीका के पहले पहले जेल में बंद था। तीसरे दिन उस जेल से मुझे दूसरी जेल में ले जाया गया। उस जेल का जेलर तीसरे दिन मेरे पास कोठरी में अकेला आया। उसकी आंखों में आंसू थे। और उसने कहा, मुझे एक बात की क्षमा मांगनी है। मैंने कहा, आपके द्वारा मेरे ऊपर कोई अत्याचार नहीं हुआ है। मेरी सब तरह से सुविधा की आपने व्यवस्था की है, क्षमा किस बात की? उसने कहा कि क्षमा मुझे इस बात की मांगनी है कि पहले दिन जब आप जेल में आए तो कोई आधा घंटे बाद जर्मनी से एक फोन आया और उस फोन करने वाले ने पूछा कि भगवान, आपकी जल में हैं यह आपका सौभाग्य है। और शायद आपके पूरे जीवन में ,बीते और आने वाले जीवन में ऐसे कोई व्यक्ति आपकी जेल में दुबारा नहीं आएगा। मेरा आपसे कोई परिचय नहीं था, उस बूढ़े जेलर ने कहा, और अकड़ भी थी तो उसने जर्मन फोन करने वाले को कहा कि नहीं, मेरे जेल में बहुत बड़े—बड़े लोग आ चुके हैं। बैबिनेस्ट स्तर के मिनिस्टर भी मेरी जेल में बंद रह चुके हैं। तो यह कोई नयी अनूठी बात नहीं है।
तो मैंने कहा, इसमें कोई हर्जा नहीं है। इसमें मुझसे क्षमा क्या मांगनी है? उसने कहा कि हर्जा यह है कि मुझे इस आदमी के फोन का कोई पता नहीं है। तुम नए आए थे, तुम्हें जानता न था। फिर हजारों फोन आने शुरू हुए, तार आने शुरू हुए, टैलेक्स आने शुरू हुए और हजारों फूलों की डालियां आना शुरू हुई। ऐसा मेरे जले में कभी भी न हुआ था। जेल बड़ा था, छह सौ कैदी थे, लेकिन इतने फूल आए कि फूलों कोर रखने की जगह न रही। उसने मुझसे पूछा, इन फूलों का मैं क्या करूं? मैंने कहा, सारे विभाग जेल के हैं उनमें बांट दो। उसने कहा, बांटने का सवाल ही नहीं हैं। उन्हीं सब विभागों में तो फूल भरे हुए हैं। तो मैंने कहा, स्कूलों में, कालिजों को, युनिवर्सिटी को, सब विभागों को, विद्यालयों को मेरी तरफ से फूल भेज दो। जिस कोठरी में मुझे रखा गया था...वह दिन में कम से कम छह बार मुझे मिलने आता था। नर्सें परेशान थीं, डाक्टर परेशान था क्योंकि वे कहते हैं यह आदमी कभी साल—छह महीने में एक बार इस तरफ आता था और यह दिन में दह बार यहां आता है। वह अपनी पत्नी और बच्चों को दिखाने के लिए मुझे अपने साथ लाया और कहा कि बस एक ही आकांक्षा है कि मेरे साथ और मेरे परिवार के साथ—साथ एक चित्र निकलवा लें और दस्तखत कर दें। दो महीने बात मैं रिटायर हो जाऊंगा। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी स्मृति है। क्योंकि मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि तुम्हारी मौजूदगी से यह जेल भी मंदिर बन सकता है।
क्योंकि कैदियों ने टेलीविजन पर निरंतर मुझे दुखा था। कई कैदियों के पास किताबें थीं। कुछ कैदियों ने ध्यान करने के प्रयोग किए थे। उन सबने प्रार्थना की जेलर से, कि यह हमारा सौभाग्य है कि वे तीन दिन के लिए हमारे जेल में हैं। हमें मौका दिया जाए कि हम उन्हें सुन सकें। हमें मौका दिया जाए कि वे हमें ध्यान करवा सकें। हमें मौका दिया जाए।
उस बूढ़े की यह कल्पना के बाहर था कि ये खतरनाक कैदी ध्यान करना चाहते हैं। और इन छह सौ कैदियों में एक भी मेरे विरोध में नहीं है। कोई डेढ़ सौ कर्मचारी जेल में होंगे, वे भी सब सम्मिलित होते थे ध्यान के लिए। और उसने एक आखिरी कदम उठाया जो कि कभी भी हनीं उठाया गया था। उसने मुझसे पूछा कि अनेक टेलीविजन स्टेशन, रेडियो स्टेशन पूछ रहे हैं कि क्या हक कुछ प्रश्न पूछने के लिए जेल के भीतर आ सकते हैं? इसका कोई इतिहास नहीं है। कोई जेल के भीतर इस तरह नहीं आ सकता। लेकिन उसने कहा कि मैंने उन सबको आज्ञा दी है आज सांझ सात बजे। अब मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा? दो महीने की कुल नौकरी है। ज्यादा से ज्यादा दो महीने पहले रिटायर हो जाऊंगा। उसने जले के भीतर वर्ल्ड प्रेस कांफ्रैंस बुलायी। कोई सौ पत्रकार जेल के भीतर इकट्ठे किए। और जब मैं पत्रकारों से बोलने जा रहा था तो उसने कान में कहा कि इस बात की जरा भी चिंता न करना कि यह जेल है। और तुम्हें वही नहीं कहना है जो हमें अच्छा लगे...नहीं; तुम्हें वही कहना है जो अच्छा है। वह चाहे हमारे विरोध में हो।
और तीन दिन के बाद छोड़ते वक्त डाक्टर की आंखों में आंसू थे, नर्सों की आंखों में आंसू थे, जेलर की आंखों में आंसू थे। डाक्टर एक महिला थी और उसने कहा कि मैं नहीं चाहती कि आपको कभी इस जेल से छोड़ा जाए। मैंने कहा कि तेरी आकांक्षा तो ठीक है लेकिन सारी दुनिया में फैले मेरे संन्यासी रहा देख रहे हैं कि मुझे छोड़ा जाए। उसने कहा, इसलिए तो मैंने सिर्फ कहा कि मेरे मन का भाव है कि तुम सदा यहीं रहो। मैं मैं जानती हूं कि वहां हजारों लोग तुम्हारी प्रतीक्षा करते होंगे। जब तीन दिन में हम तुम्हारे साथ इतना मेल—जोल बढ़ा लिए, जो लोग वर्षों से तुम्हारे साथ हैं उनके दुख और चिंता को हम अनुभव कर सकते हैं लेकिन हमें भूल मत जाना।
तुम्हें केवल अपने साथ एक होना है। तुम्हें केवल अपने भीतर वे तरंगें उठानी हैं जो आनंद की हैं। दूसरे तुम्हारे साथ एक होने लगेंगे। और यह ऊंचाई की यात्रा होगी। तुम अगर दूसरों के साथ एक होने लगे तो तुम गङ्ढों में गिरोगे। क्योंकि फिर चारों तरफ भीड़ है अंधों की और अज्ञानियों की। और उनके साथ एक होने का अर्थ है, उनके जैसा होना। एक भूल तुमने कम्यून में की, अब दूसरी भूल कम से कम मत करना। और आनंदित व्यक्ति को चाहे बाहर की दुनिया से कितना ही कष्ट मिले, कोई अंतर नहीं पड़ता। और जिसके भीतर का संगीत जगा है, बाहर कितना ही शोरगुल हो, वह अपने संगीत में लीन होता है। उसे कोई अंतर नहीं पड़ता। बस तुम अपनी नजर अपने पर रखो। दूसरों को बहुत देख लिया, बहुत—बहुत जन्मों में देख लिया, अब इस जन्म में थोड़े—बहुत दिन बाकी बचे हों, रिटायर होने के पहले, वे अपने को देखने में व्यतीत करो।

प्रश्न: भगवान, क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति आपकी चेतन—दशा को उपलब्ध करके शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रह सके, या कि यह संभव नहीं है? ऐसा ताओ का नियत है? क्योंकि मैंने सुना है सभी सदगुरु शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे हैं।
यह सच है, ताओ का जो निष्कर्ष है वह सौ प्रतिशत सच है। ठीक आध्यात्मिक अनुभूति को उपलब्ध व्यक्ति शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ नहीं रह सकता। इसका यह मतलब नहीं है कि जो लोग बीमार हैं वे आध्यात्मिक स्थिति को उपलब्ध हो गए हैं। लेकिन जो लोग परम ज्ञान को उपलब्ध हुए हैं उनका शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना मुश्किल है—एक विशेष नियम के कारण। क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति अपने को जानता है, उसके संबंध उसके शारीर के शिथिल हो जाते हैं। सेतु टूट जाता है। कल तक वह अपने को शरीर मानता था तो उसके जीवन की सारी ऊर्जा, उसकी सारी शक्ति शरीर में प्रवाहित होती थी। आज अचानक वह अपने शरीर को एक कारागृह से ज्यादा नहीं पाता, इसलिए उसकी ऊर्जा शरीर की तरफ प्रवाहित होनी बंद हो जाती है।
रामकृष्ण परमहंस कैंसर मृत्यु को उपलब्ध हुए। रमण महर्षि कैंसर से मृत्यु को उपलब्ध हुए। बुद्ध विषाक्त भोजन के कारण मृत्यु को उपलब्ध हुए। महावीर पेट की बीमारियों के कारण मृत्यु को उपलब्ध हुए। कृष्णमूर्ति चालीस वर्षों तक सिर की भयंकर पीड़ा से परेशान रहे। ऐसे परेशान रहे कि उनका मन होता था कि सिर को दीवाल से ठोंक—ठोंककर तोड़ डालें। दर्द इतना भयंकर था। और यह किसी एक के संबंध में सच नहीं है। यह करीब—करीब मनुष्य—जाति के इतिहास में जिन लोगों ने भी ऊंचाई पायी है, उन सब के संबंध में किसी न किसी अंश में सच है। कारण बिलकुल साफ है। तुम शरीर से जुड़े हो और निकट हो। और आत्मज्ञानी शरीर से टूट जाता है और अलग हो जाता है। यूं ही समझो कि जैसे बैलगाड़ी बैलों से जुड़ी है तो चल रही है। बैल चलते हैं, बैलगाड़ी नहीं चलती। लेकिन अगर बैल बैलगाड़ी से छूट जाएं या ढीले हो जाए तो बैलगाड़ी का चलना मुश्किल हो जाता है या गङ्ढे में अटकने लगते हैं या रास्ते से उतरने लगती है। और यह इसलिए भी स्वाभाविक है कि यह अंतिम शरीर है। परमज्ञानी फिर दुबारा शरीर में नहीं आएगा। इसलिए शरीर के साथ जो थोड़ा—बहुत संबंध बचा है, बस उसको ही पूरा करने योग्य समय है उसके पास। वह थोड़ा—सा समय पूरा हुआ कि उसकी विदाई की घड़ी आ जाएगी।
आध्यात्मिक अनुभव को उपलब्ध व्यक्ति परिपूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं हो सकता। स्वस्थ होने का अर्थ, मैं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए कह रहा हूं। उसका शरीर एक खोल रह जाता है। वह उसके भीतर है जरूर, मगर वे पुराने लगाव गए, वे पुराने खिंचाव गए, वे पुरानी रस्सियां टूट गई, वे पुराने बंधन सब शिथिल हो गए।
रामकृष्ण के जीवन में महत्वपूर्ण उल्लेख है जो समझने योग्य है। रामकृष्ण प्रवचन देते होते थे। लेकिन बीच—बीच में उठकर वे घड़ी भर के लिए जाते थे बाहर और फिर लौट आते थे। शिष्य बड़े हैरान होते थे। और जो खास शिष्य थे, विवेकानंद और दूसरे लोग, उनको तो पता कि मामला क्या। है। मामला यह था कि हर थोड़ी—बहुत देर में वे जाकर झांक आते थे चौके में और पूछ आते थे शारदा मणि से, उनकी पत्नी से कि आज क्या बना है? ब्रह्मचर्य चल रही है मगर शारदा हलुआ बना रही है और हलुए की गंध आ रही है तो रामकृष्ण कहते कि भई, जरा रुकना, मैं आया। शारदा कहती कि देखो परमहंस देव, शह शोभनीय नहीं है। लोग क्या कहेंगे! कि ब्रह्मचर्चा छोटी पड़ जाती है और हलुए का अस्तित्व ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है? और एक—आध बार नहीं, तुम दोत्तीन बार उठ—उठकर आते हो। और अब धीरे—धीरे सभी को पता चल गया है कि तुम जाते कहां हो। तुम किचन में जाते हो। रामकृष्ण हंसते और टाल देते। लेकिन एक दिन शारदा जिद पकड़ गयी और उसने कहा कि यह बदनामी मुझसे नहीं सही जाती। लोग आपसे तो कुछ नहीं कहते। हिम्मत नहीं है कहने की। लेकिन मेरी जान खाए जाते हैं कि कम से कम तुम तो उनकी पत्नी हो, तुम तो उन्हें समझा सकती हो कि कुछ भी बन रहा है, तुम्हारे लिए बन रहा है। जरा धीरज रखो। इतना समझाते हो लोगों को कि धीरज से रहो, शांति से रहो, अशांत न बनो और तू खुद जरा हलुए की गंध हवा में आयी कि भागे।
रामकृष्ण ने कहा, तू नहीं मानती तो मैं तुझे कह देता हूं। जिस दिन मैं नहीं आऊंगा उस दिन तू पछताएगी। और जब शारदा थाली लेकर आती उनके भोजन के लिए तो वे बच्चों जैसा व्यवहार करते। जल्दी उठकर खड़े हो जाते थाली में देखने को कि क्या—क्या बना हुआ है। जो—जो उन्हें ठीक लगता वे उसे चखकर भी देख लेते। शारदा कहती, तुम थोड़ा तो धीरज रखो। कम से कम मुझे थाली तो जमीन पर रख लेने दो। तुम्हारे लिए पटिया बिछाया है, उस पटिए पर बैठो। तुम्हें खड़े होने की जरूरत नहीं है। थाली मैं खुद रख रही हूं। आधा मिनिट की देर नहीं होगी। और कोई यह देखेगा तो क्या कहेगा! रामकृष्ण ने कहा, शारदा, तू मानती नहीं। जिस दिन तू थाली लेकर आएगी और मैं अपने बिस्तर पर करवट बदल लूंगा दूसरी तरफ और तेरी थाली को नहीं देखूंगा, समझ लेना कि तीन दिन और बचे हैं मेरी जिंदगी के। शारदा समझी कि वे मजाक कर रहे हैं।
लेकिन यही हुआ। एक दिन शारदा रामकृष्ण के कमरे में प्रविष्ट हुई भोजन लेकर। रामकृष्ण न तो बिस्तर से उठे, न उन्होंने भोजन में कोई उत्सुकता ली, वरन दीवार की तरफ मुंह कर लिया। शारदा के हाथ से थाली गिर पड़ी। उसे याद आयी वह बात जो वर्षों पहले रामकृष्ण ने कही थी। रामकृष्ण ने कहा, अब थाली के गिराने न गिराने से कुछ भी न होगा। बस तीन दिन और हूं। और आज तुझे कहता हूं, क्यों तू बार—बार पूछती थी और मैं चुपचाप रह जाता था। आज तुझे कहता हूं कि मेरे बंधन शरीर से छूट गए हैं। किसी तरह एक छोटे से बंधन को, रस के बंधन को, भोजन के बंधन को पकड़े हुए हूं ताकि कितनी देर इस घाट पर रुक सकूं, मेरे कुछ शिष्य जाग जाए ताकि मैं निश्चित विदा हो सकूं। मेरी नाव तो बहुत दिन पहले की आ चुकी है और किनारे से बंधी है। मुझे तो पुकार आ चुकी है कि छोड़ो यह किनारा, तुम्हारा काम पूरा हो चुका। लेकिन मैं जानता हूं कि शिष्य अभी बच्चे हैं, अप्रौढ़ हैं। उनमें से कोई तो प्रौढ़ हो जाए। और ठीक तीन दिन बाद रामकृष्ण की सत्य हो गयी।
जिसके जीवन में समाधि का अनुभव होता है उसके सारे संबंध क्षीण हो जाते हैं। फिर उन संबंधों को करुणावश अगर वह किसी तरह खींचतानकर बनाए रखे, तो ऐसी यह मूढ़ दुनिया है जिसका कोई हिसाब नहीं। उसके शिष्य ही उस पर ऐतराज उठाएंगे कि बंद करो, यह बात शोभा नहीं देती। और उन्हें पता नहीं है कि यह बात ही उस आदमी को जिंदा रखे है। वह सांस ले रहा है। और यह उनके लिए है, उनकी करुणा के लिए। उसका खुद का काम तो पूरा हो गया है। जब खुद का काम पूरा हो गया तो शरीर की कोई जरूरत नहीं हैं। फिर शरीर कैसे स्वस्थ रह सकता है? फिर शरीर में ऊर्जा का प्रवाह अपने आप बंद हो जाता है। फिर शरीर जगह—जगह से अपने कमजोर स्थानों से बीमारियों को प्रकट करने लगता है। रामकृष्ण को गले का कैंसर हो गया था। यह जरा सोचने जैसी बात है। कोई जीवन की गहरी बातों पर सोचता ही नहीं है। क्योंकि यह आदमी भोजन के कारण अपने को रोके हुए था। नाव किनारे आ लगी थी उस पार ले जाने को। और इस आदमी ने तरकीब निकाल ली थी। के कारण अपने को रोकने की।
अस्तित्व बड़ा रहस्यपूर्ण है। रामकृष्ण के गले को कैंसर हो गया। वे पानी भी नहीं पी सकते थे, खाना भी नहीं खा सकते थे। वह आखिरी बंधन को तोड़ने का उपाय था। क्योंकि नहीं तो वे नाव पर सवार ही नहीं होंगे। सबने उनसे प्रार्थना की कि आप तो उस अवस्था में हैं कि अगर अस्तित्व को कह दें कि हटा लो इस कैंसर को, तो यह हट जाएगा। क्यों हमें नष्ट कर रहे हैं? उनके भक्त, उनके प्रेमी, उनके शिष्य, दिन—रात भजन में, कीर्तन मग, संकीर्तन में संलग्न थे कि किसी तरह रामकृष्ण का गले का कैंसर दूर हो जाए। और उस समय तक तो कैंसर का कोई इलाज भी न था, कोई आपरेशन भी न था। आखिर फिर उन्होंने शारदा को कहा कि तुम्हीं कहो। वे कुछ सुनते नहीं। हम कहते हैं, वे मुस्कुराते हैं। शारदा ने कहा, एक बात तो इनकी मान लो। इन्होंने जिंदगी भर तुम्हारी मानी है। इन सबकी कम से कम एक बार तो मान लो। एक बार अस्तित्व से कहो कि हटा लो इस कैंसर को। और मैं यहां से नहीं हटूंगी। मैं यहां खड़ी हूं। आंख बंद करो और कहो अस्तित्व से, कि हटा लो इस कैंसर को। रामकृष्ण ने आंख बंद की, थोड़ी देर बाद आंख खोली, हंसे आर शारदा से बोले, शारदा मैंने कहा। तेरी बात नहीं टाल सकता हूं। क्योंकि शारदा जैसी पत्नी पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन अस्तित्व से उत्तर आया कि कब तक इसी गले पर निर्भर रहोगे? यह शरीर तो छूटना ही है। आज नहीं कल, कल नहीं परसों। अब जिनको तुम प्रेम करते हो उनके गलों से भोजन करो, उनके गलों से पानी पीओ। अब इस गले का मोह छोड़ो। यह अपना और तुम्हारा, अब यह भेद छोड़ो। अब बोले, शारदा से उन्होंने कहा, मैं क्या कहूं? अब मुझे और लज्जित मत करवा। उसी रात उनके प्राण निकल गए। लेकिन वे यह कह गए कि याद रखना, मैं तुम्हारे गलों का उपयोग करूंगा। आखिर तुम्हारे गले भी तो मेरे गले हैं। आखिर हम सब जड़े हैं। और मेरी नाव को मैंने बहुत देर तक रोका है। और जरूरी था कि कोई उपाय किया जाए कि मैं नाव को न रोक सकूं। और अस्तित्व हमेशा ईजादें कर लेता हैं।
आदमी को औकात कितनी है? अस्तित्व के सामने आदमी की ताकत कितनी है?

तो अब मैं चलूं और पता लगाऊं कि क्या भोजन बन रहा है!

कोंपलें फिर फूट आईं - प्रवचन-03

शून्‍य शिखर पर सुख की सेज

दिनांक 2 अगस्त, 1986,
3.30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई।

प्रश्न:

भगवान, वह कौन सी ऐसी अज्ञात शक्ति है, जो हमें आपकी तरफ खींच रही है?
जीवन में सभी कुछ अज्ञात है--वह सब भी, जो हम सोचते हैं कि ज्ञात है।
सुकरात का वचन है कि जब मैं युवा था तो सोचता था, बहुत कुछ जानता हूं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, जानना भी बढ़ा। लेकिन एक अनूठी घटना भी साथ-साथ, कदम से कदम मिलाते हुए चली। जितना ज्यादा जानने लगा, उतना ही अनुभव होने लगा कि कितना कम जानता हूं। और अंततः जीवन की वह घड़ी भी आई, जब मेरे पास कहने को केवल एक शब्द था कि मैं सिर्फ इतना ही जानता हूं कि कुछ भी नहीं जानता। यह सुकरात के अंतिम वचनों मग से हैं। जीवन भर की यात्रा, ज्ञान की खोज, और परिणाम एक बच्चे का भोलापन: जिसे कुछ भी पता नहीं है।
यूनान में डेल्फी का मंदिर है। उन दिनों बहुत प्रसिद्ध था, अब तो सिर्फ उसके खंडहर बाकी हैं। डेल्फी के मंदिर की जो पुजारिन थी, वह रामकृष्ण जैसी रही होगी। कभी-कभी गीत गाते-गाते, नाचते-नाचते बेहोश हो कर गिर पड़ती थी। और उस बेहोशी में जो कहती थी, वह होशवालों को होश गुम कर देते। जब सुकरात ने यह वचन कहा था, उसके थोड़े ही दिन बाद डेल्फी की पुजारिन ने घोषणा की कि सुकरात दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी है।
लोगों ने सुना, हैरानी में पड़े। सुकरात कहता है, मैं कुछ भी नहीं जानता, बस इतना ही जानता हूं। और डेल्फी की पुजारिन की बात कभी झूठ नहीं गई थी। और वह कहती है, सुकरात जगत का सबसे बड़ा महाज्ञानी है। वे लोग सुकरात के पास आए। सुकरात से निवेदन किया कि देवी की आविष्ट अवस्था में यह उदघोष हुआ है। सुकरात ने कहा, देवी बेहोश थी, मैं होश में हूं। मैं फिर कहता हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं। देवी गलत हो सकती है, सुकरात गलत नहीं हो सकता। देवी मुझे बाहर से जानती है, मैं स्वयं को भीतर से जानता हूं। लौट जाओ और देवी को कहना कि तुम्हारी एक भविष्यवाणी गलत हो गई। कम से कम एक तो निश्चित ही गलत हो गई। लोग वापिस लौटकर देवी से कहे और देवी हंसी। उसने कहा, कहना सुकरात से कि मैंने तुम्हें महाज्ञानी इसीलिए तो कहा था कि तुमने जान लिया है कि जगत में सभी कुछ अज्ञात है और रहस्यमय है। मेरे वक्तव्य में और तुम्हारे वक्तव्य में कोई विरोध नहीं है।

कोंपलें फिर फूट आईं - प्रवचन-02

आत्मिक विकास एकमात्र विकास

१ अगस्त, १९८६, ४. ०० अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्न: भगवान श्री, आपको समझने में आज की सरकारें और चर्च तो क्या बुद्धिजीवी भी जिस जड़ता का परिचय दे रहे हैं वह घबराने वाली है। ऐसा क्यों हुआ कि मनुष्य-जाति अपने श्रेष्ठतम फूल के साथ यह दुर्व्यवहार हुआ करे? क्या उसकी आत्मा मरी हुई है? आपके साथ पिछले दस महीनों से जो दुर्व्यवहार हुआ है, वह क्या एक किस्म का अंतर्राष्ट्रीय तल का एपारथाइड नहीं है जो साउथ अफ्रीका के एपारथाइड से भी बदतर है? क्या इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करेंगे?

मैं एक बात इन दस महीनों में गहराई से अनुभव किया हूं और वह है, हर आदमी के चेहरे पर चढ़ा हुआ झूठा चेहरा। मैं सोचता था कुछ लोग हैं जो नाटक मंडलियों में हैं, लेकिन जो देखा है तो प्रतीत हुआ कि हर आदमी एक झूठे चेहरे के भीतर छिपा है। ये महीने कीमती थे और आदमी को देखने के लिए जरूरी थे; यह समझने को भी कि जिस आदमी के लिए मैं जीवन भर लड़ता रहा हूं, वह आदमी लड़ने के योग्य नहीं है। एक सड़ी-गली लाश है, एक अस्थिपंजर है। मुखौटे सुंदर हैं, आत्माएं बड़ी कुरूप हैं।

कोंपलें फिर फूट आईं - प्रवचन-01

आत्‍मा की अग्‍नि

प्रश्न: भगवान, आप कैसे हैं?
मैं तो वैसा ही हूं। और तुम भी वैसे ही हो। जो बदल जाता है वह हमारा असली चेहरा नहीं है। वह हमारी आत्मा नहीं है। जो नहीं बदलता, न जीवन में न मृत्यु में, वही हमारा यथार्थ है। हम लोगों से पूछते हैं, कैसे हो। नहीं पूछना चाहिए। क्योंकि हमने स्वीकार ही कर लिया पूछने में...बदलाहट को, परिवर्तन को, बचपन को, जवानी को, बुढ़ापे को, जीवन को, मौत को।
कुछ है तुम्हारे भीतर जिसका तुम्हें भी पता है। बचपन में भी यही था और नहीं जन्में थे तब भी यही था। गंगा में बहुत जल बहता गया लेकिन तुम किनारे खड़े हो और वही हो। तुम दिखाई भी न पड़ोगे कल तो कभी वही होगे। नए होंगे रूप, नयी आकृतियां, शायद तुम अपने को भी पहचान पाओ। नए हों नाम, नया होगा परिचय, नया होगा वेष, फिर भी मैं कहता हूं तुम वही होओगे। तुम सदा से वही हो और तुम सदा परिचय, नया होगा वेष, फिर भी मैं कहता हूं तुम वही होओगे। तुम सदा से वही हो और तुम सदा वही रहोगे। इस सदा सनातन, शाश्वत को चाहो तो ईश्वर कहो, चाहो तो तुम्हारी सत्ता कहो। इस पर बहुत लहरें आती और जाती है, पर समंदर वही है।

कोंपलें फिर फूट आईं - प्रवेश के पूर्व

तुमने पूछा है: मैं कैसे अपने अचेतने, अपने अंधरे को प्रकाश से भर दूं?
एक छोटा सा काम करना पड़ेगा। बहुत छोटा सा काम।
चौबीस घंटे तुम दूसरे को देखने में लगे हो—दिन में भी और रात में भी। कम से कम कुछ समय दूसरे को भूलने में लगो। जिस दिन तुम दूसरे को बिलकुल भूल जाओगे, बुद्धि की उपयोगिता नष्‍टा हो जाएगी।
इसे ज्ञानियों ने ध्‍यान कहा है। ध्‍यान का अर्थ है: एक ऐसी अवस्‍था,जब जानने को कुछ भी नहीं बचा। सिर्फ जानने वाला ही बचा। उससे छुटकारे का कोई उपाय नहीं है। लाख भागो पहाड़ों पर और रेगिस्‍तानों में, चाँद—तारों पर,लेकिन तुम्‍हारा जानने वाला तुम्‍हारे साथ होगा। चूंकि वह तुम हो, वह तुम्‍हारी आस्‍तित्‍व है। रोज घडी भर, कभी भी सुबह या सांझ या दोपहर, इस अनूठे आयाम को देना शुरू कर दो। बस आँख बंद करे बैठ जाओ, .......

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

कृष्‍ण-स्‍मृति - प्रवचन-21

वंशीरूप जीवन के प्रतीक कृष्‍ण
दिनांक 5 अक्‍टूबर,।970;
सांध्‍या, मनाली (कुल्लू)

"भगवान श्री कृष्ण के संदर्भ में जीसस पर चर्चा करते समय एक बार आपने कहा कि जीसस के’क्रॉस' से जिस सभ्यता का शरम हुआ उसका अत आधुनिक स्थिति में एटम बन पर जाकर हुआ। और आधुनिक सभ्यता को अभी वर्तमान स्थिति में’क्रॉस या वंशी के बीच चुनाव करना है। कृपया इस बात को फिर स्पष्ट करें। तथा जिस प्रकार’क्रॉस' की संस्कृति का अंत एटम बन पर हुआ है अभी उसी प्रकार वंशी से जो जीवनधारा चली उसका भी तो अंत सुदर्शनचक्र और महाभारत पर हुआ था। मैं यह पूछना चाहूंगा कि आप’क्रॉस’ और एटम बन का जोड़ बुनेगे कि वंशी और महाभारत का जोड़ भारत के लिये चुनेगे?"

क्रॉस’ मृत्यु का सूचक है। कब्र पर लगता है तो उसका अर्थ है, और जब जीवन पर लग जाता है तो खतरनाक है। लेकिन, बहुत सारे तथाकथित धार्मिक लोगों ने मनुष्य के शरीर को कब्र ही समझा है। उनकी इस समझ का परिणाम खतरनाक होने वाला है। और अगर मनुष्य की छाती पर’क्रॉस लटका दिया जाये, जैसे कब पर’क्रॉस' लगा होता है, तो हम जीवन को स्वीकार नहीं करते, अस्वीकार की घोषणा करते हैं।

हम जीवन को वरदान नहीं मानते हैं, अभिशाप मानते हैं। ईसाइयत — जीसस का नाम नहीं कह रहा हूं — ईसाइयत रेखा समझती रही है कि जो मनुष्य का जीवन है पाप का फल है, ’ओरिजनल सिन' का फल है। जिसे हम जिंदगी समझ रहे हैं, वह जिंदगी परमात्मा के द्वारा दिया गया वरदान नहीं, परमात्मा के द्वारा दी गयी सजा है।
ऐसा चिंतन गहरे में दुखवादी और’ पैसिमिस्ट’ है। रेखा चिंतन गुलाब के फूल के पास खड़े होकर कांटों की गिनती करता है, फूल को भूल जाता है। ऐसा चिंतन दो अंधेरी रातों के बीच में एक छोटे—से दिन को देखता है, दो प्रकाशित दिनों के बीच में एक अधेरी रात को नहीं। रेखा चिंतन जीवन के दुखों को बटोर कर इकट्ठा कर लेता है, जीवन के सुखों को विस्मृत कर देता है। असल में दुख को बटोर कर इकट्ठा करना भी रुग्णचित्त का लक्षण है। अस्वाभाविक, भटका हुआ। और फिर उस दुख के आधार पर पूरे जीवन के संबंध में जो’ फिलॉसफी’, जो दर्शन का फैलाव होता है, वह उदासी का, अंधेरे का, निषेध का, नकार का और’ क्रॉस’ का हो जाता है।

कृष्‍ण-स्‍मृति - प्रवचन-20

राजपथरूप भव्य जीवनधारा के प्रतीक कृष्ण
दिनांक 5 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू)


"भगवान श्री, महावीर की वीतरागता, क्राइस्ट की "होली इनडिफरेंस', बुद्ध की उपेक्षा, कृष्ण की अनासक्ति, इनमें क्या सूक्ष्म समानता व भिन्नता है? इस पर प्रकाश डालें।"

क्राइस्ट की तटस्थता, बुद्ध की उपेक्षा, महावीर की वीतरागता और कृष्ण की अनासक्ति, इनमें बहुत-सी समानताएं हैं, लेकिन बुनियादी भेद भी हैं। समानता अंत पर है, उपलब्धि पर है, भेद मार्ग में हैं। अंतिम क्षण में ये चारों बातें एक ही जगह पहुंचा देती हैं। लेकिन चारों के रास्ते बड़े अलग-अलग हैं।
जीसस जिसे तटस्थता कहते हैं, बुद्ध जिसे उपेक्षा कहते हैं, इनमें बड़ी गहरी समानता है। यह जगत जैसा है, इस जगत की धाराएं जैसी हैं, इस जगत के अंतर्द्वंद्व जैसे हैं, इस जगत के भेद और विरोध जैसे हैं, उनके प्रति कोई तटस्थ हो सकता है। लेकिन तटस्थता कभी भी प्रसन्नता नहीं हो सकती। तटस्थता बहुत गहरे में उदासी बन जाएगी।
इसलिए जीसस उदास हैं। और अगर वे किसी आनंद को भी पाते हैं, तो वह इस उदासी के रास्ते से ही उन्हें उपलब्ध होता है। लेकिन उनका पूरा रास्ता उदास है। वे इस जीवन के पथ पर गीत गाते हुए नहीं निकलते। तटस्थता उदासी बन ही जाएगी। और जीसस की तटस्थता बहुत उदासी बन गई है।