सोमवार, 5 मार्च 2018

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-10

ध्यान विधि है मूर्च्छा को तोड़ने की

दसवां प्रवचन; दिनांक ३० सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
क्या आप इस सूत्र पर कुछ कहना पसंद करेंगे?--
नास्ति कामसमो व्याधि नास्ति मोह समो रिपु:।
नास्ति क्रोध समो वहिनास्ति ज्ञानात् परं सुखम्।।
काम के समान कोई व्याधि नहीं है, मोह के समान कोई शत्रु नहीं है, क्रोध के तुल्य कोई अग्नि नहीं है और ज्ञान के उत्कृष्ट कोई सुख नहीं है।
चैतन्य कीर्ति

यह उन थोड़े से सूत्रों में से एक है जिनकी सदा ही गलत व्याख्या होती रही है। अमृत भी जहर हो जाता है गलत हाथों में। सही हाथों में जहर भी औषधि हो जाता है। सवाल गलत और सही का कम, सवाल उन हाथों का होता है जिनमें सूत्र पड़ जाते हैं। सही हाथों में तलवार जीवन का रक्षण है और गलत हाथों में निश्चित ही हिंसा बनेगी।

सूत्र तो संकेत है। उन में विस्तार नहीं है, इसलिए उन्हीं सूत्र कहते हैं। निचोड़ हैं। बहुत थोड़े में कहा है। और जब कोई चीज बहुत-थोड़े में कही जाती है तो एक खतरा है। समझने के लिए काफी अवकाश होता है। और तुम समझोगे अपनी समझ से।

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-09

संन्यास: ध्यान की कसम

नौवां प्रवचन; दिनांक २९ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
मैं वर्षों से संन्यास लेने के लिए सोच-विचार कर रहा हूं, लेकिन कोई न कोई बाधा आ जाती है और मैं रुक जाता हूं। क्या करूं क्या न करूं, आप ही कहें। और यह भी बताएं कि परमात्मा क्या है, कौन है?
रामाकृष्ण चतुर्वेदी,

सोच-विचार से संन्यास का कोई संबंध नहीं। सोच-विचार की संन्यास में कोई गति भी नहीं। सोच-विचार सेतु नहीं है, बाधा है। जितना सोचोगे उतना उलझोगे। सोच-विचार से मार्ग नहीं मिलता। मिल भी रहा हो तो छिटक जाता है।
नदी के तट पर बैठ कर कितना ही सोचो कि नदी की गहराई क्या है, कैसे जानोगे? डुबकी मारनी होगी। और डुबकी मारने के लिए सोच-विचार सहयोगी नहीं है, साहस चाहिए। सोच-विचार जगत के लिए ठीक, बाहर के लिए ठीक, भीतर के लिए अवरोध है। भीतर तो निर्विचार से गति होती है। और संन्यास भीतर की यात्रा है, अंतर्यात्रा है।

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-08

प्रतिरोध न करें

आठवां प्रवचन; दिनांक २७ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
अनुकंपा करें और गहराई से समझाएं: "प्रतिरोध न करें।'
मैं एक व्यापारी हूं और विश्व का समाजसेवी सदस्य हूं। अगर आप मुझे कोई युक्ति दें तो मैं बहुत अनुगृहीत होऊंगा।
मैंने आपकी "बुक ऑफ दि सीक्रेट्स' के पांचवे भाग को एक शब्द पढ़ा है: स्वीकार-भाव।
वह दूर नहीं है। वह तो हमारे प्राणों से भी निकट है। वह तो हमारे चैतन्य का केंद्र है। आंसुओं की धुंध में लेकिन न पहचाने गये! पर आंखें हमारी बहुत तरह की धुंधों से घिरी हैं। आंसुओं की धुंध तो है ही, क्योंकि जीवन हमारा विषाद है। और जीवन विषाद ही होगा। उसे जाने बिना कैसा आनंद? उसे पहचाने बिना कैसा प्रकाश? उसके अभाव में अंधकार है।

अंधकार अभाव का ही नाम है। अंधकार की कोई सत्ता नहीं है, कोई अस्तित्व नहीं है। रोशनी का न होना। बस दीये की गैर-मौजूदगी। दीया जला और अंधकार गया। गया कहना भी ठीक नहीं, भाषा की भूल है; क्योंकि था ही नहीं, जाएगा कहां? मिटा कहना भी ठीक नहीं; था ही नहीं तो मिटेगा कैसे? अंधकार केवल अनुपस्थिति थी। प्रकाश उपस्थित हो गया, इसलिए अब अंधकार दिखाई नहीं पड़ता। प्रकाश अनुपस्थित हो जाए, फिर अंधकार दिखाई पड़ने लगेगा।

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-07

श्रद्धा और सत्य का मिथुन

सातवां प्रवचन; दिनांक २७ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान
ऐतरेय ब्राह्मण में यह सूत्र आता है:
श्रद्धया पत्नी सत्यं यजमानः। श्रद्धा सत्यं तदित्युत्तमं मिथुनम।
श्रद्धा सत्येन मिथुने न स्वर्गाल्लोकान जयतीति।
अर्थात (जीवन-यज्ञ में) श्रद्धा पत्नी है और सत्य यजमान। श्रद्धा और सत्य की उत्तम जोड़ी है। श्रद्धा और सत्य  की जोड़ी से मनुष्य दिव्य लोकों को प्राप्त करता है।
भगवान, इस सूत्र का आशय समझाने की अनुकंपा करें।
आनंद मैत्रेय,

यह सूत्र अत्यंत अर्थगर्भित है। संदेह से सत्य नहीं पाया जा सकता। संदेह से सत्य अकस्मात  मिल भी जाए, तो भी तुम चूक जाओगे। संदेह की दृष्टि सत्य को भीतर प्रविष्ट ही न होने देगी। सत्य द्वार भी खटखटाएगा तो भी तुम द्वार न खोलोगे संदेह कहेगाः "होगा हवा का झोंका।' संदेह, परमात्मा भी सामने खड़ा हो, तो उस पर भी प्रश्नचिन्ह लगा देगा।

जहां समस्या नहीं होती वहां संदेह समस्या बना लेता है, निर्मित कर लेता है। संदेह की एक ही कुशलता है: समस्या निर्माण करना। समाधान उसके पास नहीं है। और किसी तरह खींचतान कर तुम कोई समाधान बना भी लो तो तुम्हारा संदेह पुनः नयी समस्याएं निर्मित करता जाएगा।

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-06

जीवन जीने का नाम है

छठवां प्रवचन; दिनांक २६ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
ऋतस्य यथा प्रेत।
अर्थात प्र्राकृत नियमों के अनुसार जीओ।
यह सूत्र ऋग्वेद का है।
भगवान, हमें इसका अभिप्रेत समझाने की कृपा करें।
आनंद मैत्रेय

यह सूत्र अपूर्व है। इस सूत्र में धर्म का सारा सार-निचोड़ है। जैसे हजारों गुलाब के फूलों का कोई इत्र निचोड़े, ऐसा हजारों प्रबुद्ध पुरुषों की सारी अनुभूति इस एक सूत्र में समायी हुई है। इस सूत्र को समझा तो सब समझा। कुछ समझने को फिर शेष नहीं रह जाता।
लेकिन इस सूत्र का इतना ही अर्थ नहीं है कि प्राकृत नियमों के अनुसार जीओ। सच तो यह है कि "ऋत' शब्द के लिए हिंदी में अनुवादित करने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए समझने की कोशिश करो। प्राकृत शब्द से भूल हो सकती है। निश्चित ही वह एक आयाम है ऋतु का। लेकिन बस एक आयाम। ऋतु बहु आयामी है। जिसको लाओत्सु ने "ताओ' कहा है। उसको ही ऋग्वेद ने ऋतु कहा  है। जिसको बुद्ध  ने "एस धम्मो सनंतनो' कहा है, "धम्म' कहा है, वही ऋत का अर्थ है।

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-05

सत्य की कसौटी

दिनांक 25 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
मनुस्मृति का यह बहुत लोकप्रिय श्लोक है:
सत्यं ब्रूयात्प्रिंयं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम।
प्रियं च नानृतं बू्रयादेष धर्म: सनातनः।।
अर्थात मनुष्य सत्य बोले, प्रिय बोले, अप्रिय सत्य को न बोले, और असत्य प्रिय को भी न बोले। यह सनातन धर्म है।
भगवान, इस पर कुछ कहने की कृपा करें।
शरणानंद,
मनुस्मृति इतने असत्यों से भरी है कि मनु हिम्मत भी कर सके हैं इस सूत्र को कहने की, यह भी आश्चर्य की बात है। मनुस्मृति से ज्यादा पाखंडी कोई शास्त्र नहीं है। भारत की दुर्दशा में मनुस्मृति का जितना हाथ है, किसी और का नहीं। मनुस्मृति ने ही भारत को वर्ण दिए हैं। शूद्रों का यह जो महापाप भारत में घटित हुआ है, जैसा पृथ्वी में कहीं घटित नहीं हुआ, उसके लिए कोई जिम्मेवार है तो मनु जिम्मेवार हैं। यह मनुस्मृति की शिक्षा का ही परिणाम है, क्योंकि मनुस्मृति है हिंदु धर्म का विधान। वह हिंदु धर्म की आधारशिला है।

इन पांच हजार वर्षों में शूद्रों के साथ जैसा अनाचार हुआ है, बलात्कार हुआ है, वह अकल्पनीय है। उस सबके पाप के भागीदार मनु हैं। शूद्र की स्त्री के साथ कोई ब्राह्मण अगर बलात्कार करे तो कुछ रुपयों के दण्ड की व्यवस्था है। और कोई शूद्र अगर ब्राह्मण की स्त्री के साथ बलात्कार करे तो उसे मृत्यु-दण्ड की व्यवस्था है। कैसा सत्य है! शूद्र की स्त्री की कीमत कुछ रुपये है और ब्राह्मण की स्त्री की कीमत--शूद्र का जीवन। बलात्कार भी ब्राह्मण करे तो यूं समझो कि धन्यभागी हो तुम कि तुम्हारे साथ बलात्कार किया। बड़ी कृपा है मनु की कि उन्होंने यह नहीं कहा कि उसको कुछ रुपयों का पुरस्कार दो। देना तो यही था पुरस्कार, कि कितनी कृपा की ब्राह्मण महाराज ने! धन्यभागी है शूद्र की पत्नी! उसकी देह को इस योग्य माना!

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-04

ध्यान पर ही ध्यान दो

दिनांक 24 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न:भगवान,
यह एक प्रचलित श्लोक है:
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकार: पुण्याय पापाय परपीड़न।।
अठारह पुराणों में व्यास के दो वचन ही मुख्य हैं--परोपकार से पुण्य होता है और परपीड़न से पाप।
भगवान, इस पर कुछ कहने की कृपा करें।
शरणानंद,

यह सूत्र निश्चित ही बहुत विचारणीय है, क्योंकि इस देश का सारा आधार इसी सूत्र पर निर्भर है। यह बुनियाद है तथाकथित धार्मिक व्यक्तित्व पैदा होता है, वह पाखंड का ही होता है। यह सूत्र ऐसा है कि तत्क्षण इसमें भ्रांति दिखाई पड़नी असंभव है। सोचोगे तो भी नहीं समझ पाओगे कि इसमें कुछ भूल हो सकती है। बात इतनी साफ मालूम पड़ती है--दो और दो जैसे चार होते हैं ऐसी। कौन इसका विरोध करेगा?--"परोपकार से पुण्य होता है और परपीड़न से पाप।'

लेकिन मैं इसका विरोध करता हूं। मेरे देखे बात इससे बिलकुल उलटी है। पुण्य से परोपकार होता है, पाप से परपीड़न। तब सवाल उठेगा कि पुण्य कैसे होता है। पुण्य है ध्यान की सुगंध और पाप है ध्यान के अभाव से उठती दुर्गंध। ध्यान हो तो जीवन में पुण्य की आभा होती है। जैसे फूल खिले, गंध उड़े; जैसे धूप जले और वायुमंडल सुवासित हो उठे--वैसे ही ध्यान है वहां पुण्य छाया की तरह आता है। और जहां पुण्य है वहां परोपकार है।

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-03

अंतर्यात्रा पर निकलो

दिनांक 23 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
अथर्ववेद में एक ऋचा है--
पृष्ठात्पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहम्
अन्तरिक्षाद्दि विमारूहम्, दिवोनाकस्य
पृष्ठात्ऽ सर्‌वज्योतिरगामहम्।
अर्थात हम पार्थिव लोक से उठ कर अंतरिक्ष लोक में आरोहण करें, अंतरिक्ष लोक से ज्योतिष्मान् देवलोक के शिखर पर पहुंचें, और ज्योतिर्मय देवलोक से अनंत प्रकाशमान ज्योतिपुंज में विलीन हो जाएं।
 भगवान कृपया बताएं कि ये लोक क्या हैं और कहां हैं?
चैतन्य कीर्ति,
लोक शब्द से भ्रांति हो सकती है--हुई है। सदियों तक शब्दों की भ्रांतियों के दुष्परिणाम होते हैं। लोक शब्द से ऐसा लगता है कि कहीं बाहर, कहीं दूर--यात्रा करनी है किसी गन्तव्य की ओर। लोक से भौगोलिक बोध होता है, जबकि ऋषि का मन्तव्य बिलकुल भिन्न है। यह तुम्हारे भीतर की बात है--तुम्हारे अंतरलोक की।

जो जानता है, वह बात ही भीतर की करता है। बाहर कर बात तो सिर्फ इसलिए की जा सकती है, ताकि भीतर की बात का स्मरण दिलाया जा सके। तुम तो बाहर की भाषा समझते हो, इसलिए मजबूरी है ऋषियों की। उन्हें बाहर की भाषा बोलनी पड़ती है। तुम जो समझ रहे हो वही तुमसे कहा जा सकता है। लेकिन फिर खतरा है। खतरा यह है कि तुम वही समझोगे जो तुम समझ सकते हो।

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-02

जगत सत्य बह्म सत्य

दिनांक 22 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
आदिगुरु शंकराचार्य के "जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य' सूत्र का खंडन करते हुए आपने कहा कि जगत भी सत्य है और ब्रह्म भी सत्य है। लेकिन सत्य की परिभाषा है--वह, जो कि नश्वर नहीं है। इसलिये जगत जो कि नश्वर है, सत्य कैसे होगा? मिथ्या ही होगा। ब्रह्म अनश्वर है, इसलिए सत्य है।
आपसे अनुरोध है कि सत्य की परिभाषा करते हुए इस पहलू पर प्रकाश डालें।
पंडित ब्रह्मप्रकाश,
बड़े भाग्य कि आप भी इस मयकदे में पधारे! ऐसे तो मयकदे में आना अच्छी बात नहीं है और आ ही गये हैं तो बिना पीए जाना अच्छी बात नहीं है। जाम हाजिर है। जी भर कर पी कर लौटें।
पूछते हैं आप कि सत्य की क्या परिभाषा है? सत्य की कोई परिभाषा नहीं है,न हो सकती है। परिभाषित होते ही सत्य असत्य हो जाता है। सत्य तो अनिर्वचनीय है। कैसे उसकी परिभाषा होगी? कैसे उसकी व्याख्या होगी? सत्य तो शब्दों में आता नहीं, छूट-छूट जाता है। सत्य तो शब्दातीत है, मनातीत है। सत्य अनुभव है--और ऐसा अनुभव, जो कि मन के अतिक्रमण पर ही उपलब्ध होता है--निर्विचार में, शून्य में, समाधि में।
परिभाषा तो मन करेगा और मन को सत्य का कभी अनुभव नहीं होता। अनुभव होता है मनातीत अवस्था में। अनुभव किसी और को होता है, 

ज्यूं मछली बिन नीर - प्रवचन-01

अपने-अपने काराग्रह

दिनांक २१ सितंबर, १९०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
संत रज्जब ने क्या हम सोए हुए लोगों को देख कर ही कहा है: ज्यूं मछली बिन नीर। समझाने की अनुकंपा करें।
नरेंद्र बोधिसत्व,

और किसको देख कर कहेंगे? सोए लोगों की जमात ही है। तरहत्तरह की नींदें हैं। अलग-अलग ढंग हैं सोए होने के। कोई पद की शराब पी कर सोया है। लेकिन सारी मनुष्यता सोयी हुईं है। जिन्हें तुम धार्मिक  कहते हो वे भी धार्मिक नहीं है, क्योंकि बिना जागे कोई धार्मिक नहीं हो सकता है। हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं, जैन हैं--लेकिन धार्मिक मनुष्य का कोई पता नहीं चलता। धार्मिक मनुष्य हो तो हिंदू नहीं हो सकता है। ये सब सोए होने के ढंग हैं। कोई मस्जिद में सोया हुआ है, कोई मंदिर में सोया है। मैं एक बड़े प्यारे आदमी को जानता था। सरल थे, अदभुत रूप से सरल थे! और आग्नेय भी थे, अग्नि की तरह दग्ध कर दें। नाम था उनका--महात्मा भगवानदीन। वे जब भी बोलते थे तो बीच-बीच में रुक जाते। कहते, "बायां हाथ ऊपर करो। अब दायां हाथ ऊपर करो। अब दोनों हाथ ऊपर करो।' फिर कहते, "दोनों हाथ नीचे कर लो।'
मैंने उनसे पूछा कि यह बीच-बीच में रुक कर लोगों से कवायद क्यों करवानी? तो वे कहते, "यह तो मुझे पक्का हो जाए कि लोग जागे सुन रहे हैं कि सोए हैं!' और मैंने देखा कि यह सच था। जब वे कहते बायें हाथ ऊपर करो, तो कुछ तो करते ही नहीं, कुछ दायें कर देते।