सोमवार, 31 जुलाई 2017

अपने माहिं टटोल-प्रवचन-10

धर तीन दिनों में सत्य की खोज में और उस रास्ते पर किन बाधाओं को मनुष्य दूर करे, किन सीढ़ियों को चढ़े और किन बंद द्वारों को खोले, उस संबंध में बहुत सी बातें हुई हैं। बहुत से प्रश्न भी उस संबंध में पूछे गए हैं। आज की रात उन सारे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर मैं चर्चा करूंगा जो शेष रह गए हैं।
सबसे पहले, अनेक प्रश्न पूछे गए हैं कि हजारों वर्षों से हजारों लोग जिन बातों को मान रहे हैं, मैं उन बातों को गलत क्यों कहता हूं? और जिन बातों को इतने लोग सही मानते हों, क्या वे बातें गलत हो सकती हैं? क्या इतनी पुरानी परंपराएं, रूढ़ियां, जिन्हें हम सदा से मानते रहे हैं, भूल भरी हो सकती हैं?

एक छोटी सी कहानी इस प्रश्न के उत्तर में कहूंगा। उस कहानी से कुछ बात ख्याल में आ सकेगी और कुछ उसके पीछे। एक राजा के दरबार में एक अजनबी अपरिचित आदमी आया। और उस आदमी ने आकर राजा को कहाः तुमसे बड़ा सम्राट पृथ्वी पर दूसरा नहीं है। और न ही इतिहास को ज्ञात है कि कभी तुमसे बड़ा कोई सम्राट हुआ हो।

राजा प्रसन्न हुआ, जैसे कि कोई भी प्रसन्न होता। और उस आदमी ने कहाः लेकिन तुम जैसे महान सम्राट के लिए आदमियों जैसे कपड़े पहनना शोभादायक नहीं है। मैं तुम्हारे लिए देवताओं के वस्त्र ला सकता हूं।
राजा ने कहाः कुछ भी खर्च हो जाए, कितनी भी संपदा लगे, लाओ तुम देवताओं के वस्त्र।
उस आदमी ने कहाः पहली बार ही पृथ्वी पर देवताओं के ये वस्त्र उतरेंगे तुम्हारे लिए, लेकिन बहुत खर्च करना होगा।
राजा के पास कोई कमी न थी, उसने खर्च का वचन दिया। राजा के सभी दरबारी चिंतित हुए, वे समझ गए कि कोई चालाक आदमी राजा को धोखा दे रहा है। देवताओं के वस्त्र! आज तक न देखे गए और न सुने गए! छह महीने का वचन दिया उस आदमी ने। और छह महीने हर दो-चार दिन में आकर दस-पांच हजार रुपये वह ले जाता रहा। देवताओं को रिश्वत खिलानी थी, और कई दफ्तर के काम निपटाने थे, तब देवताओं तक पहुंचना हो सकता था।
अंतिम तिथि आ गई, जब उसने वचन दिया था कि वह वस्त्र लेकर आ जाएगा। राजा के दरबारी प्रतीक्षा में थे कि आखिर में तो वह फंस ही जाएगा। उस दिन उसके घर पर सिपाहियों का पहरा लगा दिया गया कि कहीं वह भाग न जाए। लेकिन वह भागने को नहीं था, ठीक समय एक बहुत खूबसूरत पेटी में बंद ताला डाल कर वह बाहर निकला। लोग निश्चिंत हुए, जरूर वह वस्त्र ले आया था। राज-दरबार में वे वस्त्र पहुंचे। सैकड़ों लोग राजा के द्वार पर इकट्ठे हो गए थे। देवताओं के वस्त्र कभी देखे न गए थे। दरबारी हैरान थे, लेकिन अब शक करने की कोई बात भी न थी, वह आदमी पेटी लेकर आ ही गया था। उसने राज-दरबार में जाकर पेटी रखी। उस दिन दरबार सजा था और महल ज्योतियों से दीपायमान किए गए थे। राजा बैठा था अपने सिंहासन पर इस खुशी में कि पहला मनुष्य होगा वह, जो देवताओं के वस्त्र पृथ्वी पर पहनेगा। उस आदमी ने पेटी का ताला खोला, ताला खोल कर वह खड़ा हुआ और उसने कहाः मित्रो, एक बात सूचना कर दूं, जो देवताओं ने मुझसे कही है। उन्होंने कहा है कि ये वस्त्र केवल उन्हीं को दिखाई पड़ेंगे, जो ठीक अपने ही पिता से पैदा हुए हों। ये वस्त्र सभी को दिखाई पड़ने वाले नहीं, ये देवताओं के वस्त्र हैं। ये कोई सामान्य आदमियों के वस्त्र नहीं हैं।
उसने पेटी खोली, उसने कुछ उसके भीतर से निकाला, हाथ तो उसका खाली आया और उसने राजा से कहाः अलग कर दीजिए अपना कोट और पहनिए यह कोट देवताओं का। राजा को भी हाथ खाली दिखाई पड़ा, दरबारियों को भी हाथ खाली दिखाई पड़ा। लेकिन बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई थी, सारे दरबारी ताली पीटने लगे और कहने लगेः इतना सुंदर कोट हमने कभी देखा नहीं!
राजा ने सोचाः अगर मैं यह कहूं कि कोट दिखाई नहीं पड़ता, तो व्यर्थ ही पिता के ऊपर संदेह हो जाएगा। खुद तो उसे संदेह हो ही आया, क्योंकि पूरे दरबारी कह रहे थे कि ओह, अदभुत! और एक-दूसरे से आगे बढ़े जा रहे थे प्रशंसा में कोट की। राजा ने सोचाः पिता तो मेरा संदिग्ध हो ही गया, अब व्यर्थ इस बात को खोलने से क्या फायदा, इस कोट को पहन ही लो, जो कि था ही नहीं। उसने अपना कोट निकाल दिया, जो कि था; और वह कोट पहना, जो कि नहीं था। धीरे-धीरे एक-एक वस्त्र निकाले जाने लगे, राजा नंगा होने लगा। एक-एक वस्त्र पेटी से वह निकालने लगा और उसने कहाः यह पहनें पजामा, यह पहनें टोपी, यह फलां, यह ढिकां। कुछ भी न था, हाथ खाली था। राजा के अपने वस्त्र छिनने लगे, राजा धीरे-धीरे नंगा खड़ा हो गया, केवल अधोवस्त्र रह गया, अंडरवियर रह गया। अंत में उस आदमी ने निकाला अंडरवियर, हाथ में कुछ भी न था। उसने कहाः यह लें और पहनें। अब बड़ी मुश्किल आ गई। लेकिन मजबूरी थी, दरबारी ताली बजा रहे थे और कह रहे थे, ऐसे वस्त्र तो कभी देखे नहीं। और सब एक-दूसरे से आगे थे ताली बजाने में, क्योंकि कोई भी अपने पिता पर संदेह करवाने के लिए तैयार न था। प्रत्येक को दिख रहा था--हाथ खाली है, पेटी खाली है। लेकिन जब शेष सारे लोग कह रहे हों, तो कौन मुफ्त अपनी मुसीबत मोल ले! जब सब कहते हैं, तो ठीक ही कहते होंगे। जब इतने लोग कहते हैं, तो ठीक ही कहते होंगे। यह तर्क तो स्पष्ट था। राजा का अंडरवियर भी छिन गया, वह पूरी तरह नग्न खड़ा हो गया। और सारे लोगों ने तालियां बजाईं और कहाः धन्य है महाराज! ऐसे वस्त्र पृथ्वी पर कभी नहीं देखे गए!
राजा भी बोलाः मैं भी हैरान हूं! इतना आनंदपूर्ण मालूम हो रहा है इन्हें पहन कर, ऐसा कभी भी मालूम न हुआ था!
उस आदमी ने, जो इन वस्त्रों को लाया था, उसने कहाः महाराज, ये वस्त्र पहली दफा उतरे हैं, देवताओं ने कहा था, राजा का जुलूस निकाल देना।
उस राजधानी में उस दिन उस नंगे राजा का जुलूस निकला। गांव भर में खबर पहुंच गई कि वस्त्र उसी को दिखाई पड़ेंगे जिसका पिता संदिग्ध न हो। और गांव भर में सभी को वस्त्र दिखाई पड़े। रास्तों पर लोगों ने तालियां बजाईं, फूल फेंके और कहाः धन्य है! धन्य है! ऐसे वस्त्र, ऐसे वस्त्र कभी नहीं देखे गए!
उस गांव में उस दिन दूसरे गांव से एक अजनबी युवक भी आया हुआ था, उसे इस घोषणा की कोई खबर न थी, वह भी भीड़ में खड़ा हुआ था। वह हैरान हो गया! वह चिल्लायाः क्या तुम सब पागल हो गए हो? यह राजा नंगा है!
लेकिन लोगों ने कहाः पागल है तू! देखता नहीं, इतने लोग जिस बात को कहते हैं, वह सच होती है। तेरे अकेले को कौन मानेगा? पागल है तू! और तुझे पता नहीं कि अनजाने ही तूने यह भी बता दिया कि तेरे पिता संदिग्ध हैं। हम सब अपने पिताओं के पुत्र हैं, हमें वस्त्र दिखाई दे रहे हैं।
उस राजधानी में जो हुआ था, पूरी मनुष्य-जाति के साथ इधर पांच-छह हजार वर्षों में हुआ है। जिन बातों की कोई सच्चाई नहीं है, वे केवल भीड़ की मान्यता के आधार पर सच होकर खड़ी हैं। और हर आदमी जानता है कि वे झूठ हैं, लेकिन कौन आदमी अपने ऊपर संदेह करवाए! जब सारे लोग कह रहे हैं कि सच हैं, तो उसे भी मान लेना होता है कि सच होंगी।
एक आदमी, एक-एक आदमी जानता है बहुत गहरे में--असत्य क्या है। लेकिन भीड़, भीड़ कहती हैः यही सत्य है। और भीड़, भीड़ की संख्या, भीड़ का बल और हजारों साल से पैदा हो जाने से भीड़ की ताकत, वह एक-एक आदमी को डरा देती है कि मैं अकेला इस सागर के सामने क्या कहूं? कौन सुनेगा? और वह कहेगा भी तो कोई सुनने को नहीं है। यद्यपि प्रत्येक दूसरे आदमी की स्थिति भी यही है, वह भी जानता है कि यह सरासर झूठ है। लेकिन झूठ भी बहुत दिन दोहराए जाने से और बहुत लोगों के दोहराए जाने से सच जैसे प्रतीत होने लगते हैं।
एडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा हैः ऐसा कोई झूठ नहीं है, जिसे निरंतर दोहराया जाए तो जनता के लिए वह सच न हो जाए। और उसने लिखा है कि यह मैं कोई बातचीत और सिद्धांत नहीं कह रहा हूं, यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं। मैंने निरंतर न मालूम कितने प्रकार के झूठ बोले, लेकिन ठीक से प्रचार किया, लोगों को समझाया, और वे सच हो गए। मैं खुद ही बाद में हैरान हो गया, इतने लोग जब मानते हैं, तो ठीक ही होगा, मुझको भी ऐसा लगने लगा। जो कि मैंने ही झूठ बोले थे, जिनकी शुरुआत मुझसे हुई थी और मैं जानता हूं कि वे नितांत असत्य बातें थीं; लेकिन जब सारा मुल्क मानने लगा, तो मुझको तक शक हुआ कि कहीं मैं भूल में तो नहीं हूं! जब इतने लोग मानते हैं, तो ठीक ही मानते होंगे।
कोई भी असत्य प्रचार के माध्यम से सत्य हो सकता है। तो जिनको आप कहते हैं, हजारों वर्षों से हम मानते हैं, आपके हजारों वर्षों से मानने से कोई चीज सच नहीं हो जाती। इससे केवल इतना पता चलता है कि हजारों वर्ष तक प्रचारित होने से कोई भी चीज सच मालूम होने लगती है। और आप कहते हैं, हम इतने लोग मानते हैं, हमारी भीड़ इतनी है, इतनी संख्या है। संख्या से सत्य का क्या संबंध? सत्य कोई डेमोक्रेटिक, कोई लोकतांत्रिक पार्लियामेंट थोड़े ही है कि वहां आपने हाथ उठा दिए तो सत्य का निर्णय हो जाएगा, कि जिनके पक्ष में ज्यादा हाथ हैं वे जीत जाएंगे।
कोई लोकतंत्र नहीं है सत्य। सत्य कोई भीड़ की आवाज और हाथों का उठाया जाना नहीं है। उसका निर्णय कोई मत से नहीं होता। पुराने होने से कोई चीज सच नहीं हो जाती है और न नये होने से कोई चीज झूठ हो जाती है। ये कोई कसौटियां नहीं हैं।
फिर मैंने आपसे यह नहीं कहा है कि जो कुछ भी आप मानते हैं, वह असत्य है। मैंने यह कहा हैः मानना असत्य है। और इन दोनों बातों में भेद है। मैंने आपसे यह नहीं कहा है कि जो कुछ आप मानते हैं, असत्य है। मैं क्यों कहूं? मुझे क्या प्रयोजन? मैंने आपसे यह कहा हैः मानने वाली बुद्धि असत्य है, विचार करने वाली बुद्धि सत्य है। जो मान लेता है और विचार नहीं करता, उसकी बुद्धि असत्य है, उसकी चित्त की दशा असत्य है। वह फिर जो भी मान ले, वह भी असत्य होगा। जिन चीजों पर आपने कभी सोचा नहीं, खोजा नहीं, उन्हें किस भांति मान लिया है? क्यों मान लिया है? सिर्फ इसलिए कि बहुत लोग मानते हैं? सिर्फ इसलिए कि बहुत लोग स्वीकार करते हैं?
यह जो स्वीकृति है, बहुत लोगों के आधार पर खड़ी हुई, यही मनुष्य के चित्त पर सबसे बड़ा बंधन है। और जिस व्यक्ति को सत्य की खोज में निकलना हो, उसे मान्यता के, बिलीफ के, विश्वास के सारे बंधन तोड़ देने पड़ते हैं। उसे अपने चित्त को मुक्त करना होता है, मान्यता से, ताकि वह जान सके। जो मानता है, वह जानने से वंचित रह जाता है। जो दूसरे पर विश्वास कर लेता है, उसकी खुद की खोज समाप्त हो जाती है। और जो इस भांति स्वीकार करता है, वह अंधा है। और अंधे के लिए सत्य का दर्शन असंभव है। आंख चाहिए विचार करने वाली, खोजने वाली, सोचने वाली, चिंतन करने वाली, स्वतंत्र, निष्पक्ष बुद्धि चाहिए। विश्वासी की बुद्धि निष्पक्ष नहीं होती। विश्वासी की बुद्धि पक्षपातग्रस्त होती है, प्रिज्युडिस्ड होती है। और जो पक्षपात से भरा है, वह कभी निष्पक्ष होकर सोच नहीं पाता। और जो निष्पक्ष होकर नहीं सोच पाता है, वह कैसे उपलब्ध हो पाएगा उसे जो कि सत्य है? यह सवाल नहीं है कि कितने वर्षों से कोई बात दोहराई जा रही है। हजारों ऐसी मूढ़ताएं हैं जिनका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है।
जमीन को हजारों वर्षों तक गोल नहीं माना जाता था, चपटी माना जाता था। फिर एक दिन जिस आदमी ने कहा कि जमीन गोल है, लोगों ने कहा कि माफी मांग लो, ऐसी बात कभी मत कहो। हजारों वर्षों से जो बात मानी जाती रही है, वह सच है। उस आदमी को मजबूर किया अदालत में ले जाकर कि तुम माफी मांग लो, नहीं तो फांसी लगा देंगे। वह बेचारा बूढ़ा आदमी था, जिसने यह बात कही थी। सत्तर साल के ऊपर उसकी उम्र हो गई थी। उसे एक गांव से घसीट कर राजधानी तक ले जाया गया था। उसे घुटने के बल जबरदस्ती खड़ा कर दिया गया और कहाः मांग लो माफी और कहो परमात्मा से कि मैंने एक झूठी बात कही है। क्योंकि जो सब लोग मानते हैं और जो बाइबिल तक में लिखा हुआ है कि जमीन चपटी है, तो तुम कौन हो गोल बताने वाले? और बाइबिल तो भगवान के पुत्र की किताब है, तो उसमें कहीं झूठ हो सकता है? असत्य हो सकता है?
उस बेचारे ने क्षमा मांग ली। लेकिन क्षमा मांगते वक्त उसके मुंह से एक सच्ची बात निकल ही गई। उसने कहा कि हे परमात्मा! मैं माफी मांगे लेता हूं और मैं कहे देता हूं कि जमीन चपटी है, गोल नहीं। लेकिन मेरे कहने से क्या होता है? उसने पीछे एक बात जोड़ी, लेकिन मेरे कहने से क्या होता है, जो है वह है, जमीन तो गोल ही है।
हजारों वर्षों तक हम समझते थे कि सूरज जमीन का चक्कर लगाता है। जिस आदमी ने पहली दफा कहा कि नहीं, सूरज जमीन का चक्कर नहीं लगाता, जमीन ही सूरज का चक्कर लगाती है। तो बहुत परेशानी हो गई। हमने कहाः यह नहीं हो सकता, यह कभी नहीं हो सकता। हजारों साल तक लोग नासमझी की बात मान सकते थे क्या? हम रोज आंखों से देखते हैं कि सूरज डूबता है, ऊगता है।
लेकिन जैसे-जैसे हमारी समझ बढ़ी, हमने जाना कि नहीं, जमीन ही चक्कर लगाती है सूरज के, सूरज नहीं लगाता। और कितने ही हजारों वर्षों से यह बात कही गई हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। सूरज तब भी चक्कर नहीं लगाता था जब हम मानते थे कि चक्कर लगाता था, अब भी नहीं लगाता है।
हमारी मान्यता से सत्य प्रभावित नहीं होता, सत्य अपनी जगह है। हमारी मान्यता गलत होगी तो हम गलत और अंधेरे में भटकते रहेंगे, हमारा बोध स्पष्ट होगा तो हम सत्य के निकट पहुंच जाएंगे। सत्य हमारी मान्यता से प्रभावित नहीं होता, लेकिन हमारी मान्यता हमको प्रभावित कर देती है और अंधेरे में ढकेल देती है। क्या करें?
इन तीन दिनों में मैंने आपसे यह कहा हैः अपने विचार को निष्पक्ष, मान्यता से मुक्त, परंपरा, रूढ़ियों से ऊपर उठाना जरूरी है, अगर कोई जानना चाहता हो उसे जो कि है। अगर परमात्मा को खोजना हो, तो परमात्मा के नाम से जो-जो बताया गया है, उसे पकड़ कर बैठ रहना खतरनाक है, उसे छोड़ देना होगा। उसे छोड़ देना होगा इसलिए कि उसका अभी पकड़ना अंधेरे में पकड़ना है। और जो उसे पकड़ कर तृप्त हो जाता है, फिर वह सच्चे परमात्मा की खोज ही नहीं करता, उसे कोई जरूरत नहीं रह जाती है।
इसलिए मैंने जोर दिया है कि आपका चित्त निष्पक्ष हो, विचारपूर्ण हो, जागरूक हो, अंधा न हो, विश्वासी न हो, विवेकयुक्त हो।
अब तक कहा जाता रहा हैः विश्वास धर्म है। मैं आपसे कहता हूंः विश्वास अधर्म है। विश्वास धर्म नहीं है; धर्म है विवेक, धर्म है विचार। और चूंकि यह कहा जाता रहा है कि विश्वास धर्म है, इसी वजह से धर्म पीछे पड़ गया, विज्ञान के मुकाबले हारता चला गया। क्योंकि विज्ञान है विचार, विज्ञान विश्वास नहीं है। इसलिए विज्ञान तो रोज-रोज गति करता गया और धर्म सिकुड़ता गया, सिकुड़ता गया और सिकुड़ कर वह छोटे-छोटे डबरों में परिणत हो गया--हिंदू का डबरा, मुसलमान का डबरा, ईसाई का डबरा, जैनी का डबरा। वह सागर नहीं रह गया, वह छोटे-छोटे डबरे बन गए। और डबरे, आप जानते हैं, बहुत जल्दी सड़ जाते हैं। क्योंकि वे विराट नहीं होते, छोटे-छोटे होते हैं। तो हिंदू-मुसलमान के डबरे सब सड़ गए, उन सबसे सड़ांध उठ रही है, झगड़े खड़े हो रहे हैं, हिंसा और हत्या हो रही है।
सागर चाहिए धर्म का, डबरे नहीं चाहिए। धर्म चाहिए, हिंदू और मुसलमान और ईसाई नहीं चाहिए। एक ऐसी दुनिया चाहिए जहां धर्म तो हो, लेकिन हिंदू और मुसलमान न रह जाएं। क्योंकि हिंदू-मुसलमान की वजह से धर्म के आने में बाधा पड़ रही है। और हिंदू-मुसलमान तब तक रहेंगे, जब तक विश्वास है। जिस दिन विश्वास की जगह विचार होगा, विवेक होगा, उस दिन दुनिया में बहुत धर्मों की कोई गुंजाइश नहीं रह जा सकती है। क्यों? नहीं रह सकती है इसलिए कि कहीं हिंदू की केमिस्ट्री अलग होती है, मुसलमान की केमिस्ट्री अलग? हिंदू की एलोपैथी अलग, जैन की एलोपैथी अलग? मुसलमान का गणित अलग, ईसाई का गणित अलग, ऐसा होता है? हो सकता है? कि हम कहें कि हम तो मुसलमान हैं, हमारा गणित अलग होगा, हम हिंदुओं जैसा गणित नहीं बना सकते। हिंदू अपना गणित अलग बनाएं, दो और दो पांच करें, हम तो दो और दो चार करेंगे या दो और दो तीन करेंगे। हम हिंदू, तुम मुसलमान, हमारा-तुम्हारा गणित एक जैसा कैसे हो सकता है? नहीं, लेकिन गणित एक है सारी दुनिया का।
लेकिन मैं आपको यह बता दूं, आज से पांच सौ साल पहले गणित भी अलग-अलग थे। हिंदुस्तान में जैनियों का गणित अलग था, हिंदुओं का गणित अलग था। कैसे पागलपन की बातें हैं! गणित और अलग-अलग हो सकते हैं? लेकिन विचार ने खोज की, विवेक ने खोज की, हम युनिवर्सल, सार्वलौकिक नियमों पर पहुंच गए। गणित एक है दुनिया का, चाहे कोई कम्युनिस्ट मुल्क में रहता हो, चाहे कोई अमेरिका में रहता हो, चाहे कोई चीन में रहे, चाहे पाकिस्तान में, चाहे हिंदुस्तान में, गणित एक है। गणित विज्ञान बन गया, गणित विचार के द्वारा उपलब्ध हुआ, इसलिए एक हो सका।
धर्म अनेक क्यों हैं? जब जमीन के कानून एक हैं और जब पदार्थ के नियम एक हैं, तो आत्मा के नियम अनेक कैसे हो सकते हैं? जब सामान्य पदार्थ के नियम सार्वलौकिक हैं, युनिवर्सल हैं, तो परमात्मा के नियम भी अलग-अलग कैसे हो सकते हैं? वे भी युनिवर्सल हैं। लेकिन हमारे विश्वास के कारण हम उन सार्वलौकिक नियमों को खोजने में असमर्थ हैं। हमारा विश्वास हमें रोकता है। वह कहता हैः यही सत्य है। तो फिर सत्य की खोज नहीं हो पाती। जब तक जमीन पर हिंदू-मुसलमानों में बंटे हुए होंगे लोग, तब तक धर्म नहीं उतर सकता। और ये ही सारे लोग चिल्लाते हैं कि धर्म नष्ट हो रहा है, और ये ही उसके हत्यारे हैं। ये ही सारे लोग चिल्लाते हैं कि दुनिया से धर्म समाप्त हो रहा है। धर्म समाप्त होगा, क्योंकि विश्वास पर खड़ा हुआ धर्म धर्म ही नहीं है।
लेकिन क्या विचार पर धर्म खड़ा हो सकता है?
मैं कहता हूंः हां, विचार पर धर्म खड़ा हो सकता है। और जिन लोगों ने भी धर्म को जाना है--महावीर ने, बुद्ध ने, क्राइस्ट ने, मोहम्मद ने, राम ने, कृष्ण ने--उन्होंने विश्वास के आधार पर नहीं जाना है; अपनी खोज, अपना विवेक, अपनी चेतना के जागरण से जाना है। दुनिया में आज तक जब भी धर्म जाना गया है, तब वह एक अत्यंत वैचारिक खोज की तरह जाना गया है, अंधे विश्वास की तरह नहीं।
इसलिए मैं कहता हूं कि चाहे कितने ही लोग मानते हों और चाहे कितने ही हजारों साल से मानते हों, इस बात को अथॉरिटी मत बना लेना कि हजार साल से कोई मानता है, इसलिए वह सच्ची बात होनी चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वह जरूरी रूप से झूठ है। मैं यह कह रहा हूं, आपका यह मानने का ढंग और तर्क गलत है। आप खोजें, निजी खोज करें, थोड़ा सोचें, विचार करें, और फिर जो आपको सच मालूम पड़े, वह आपके जीवन को बदल देगा। लेकिन जब तक हम खोज ही नहीं करते, सोचते ही नहीं, तब तक हम अंधों की भांति चलते हैं। और अंधों की भांति चलना मनुष्य के भीतर छिपे हुए परमात्मा का सबसे बड़ा अपमान है।
मनुष्य होने की पहली शर्त हैः स्वयं की चेतना और विवेक के प्रति दायित्व, स्वयं की स्वतंत्रता, सामर्थ्य और शक्ति के प्रति समर्पण, स्वयं के भीतर जो छिपा है उसकी अथक खोज, स्वयं में जो बीज-रूप से बैठा है उसे पूर्णता तक पहुंचाने का साहसपूर्ण प्रयत्न--मनुष्य होने में यह सब कुछ अंतर्गर्भित है। लेकिन जो लोग विश्वास से जीते हैं, वे मनुष्य नहीं, भेड़ों की भांति हो जाते हैं।
मैंने एक घटना सुनी है। एक छोटे से स्कूल में एक अध्यापक अपने बच्चों को गणित के पाठ पढ़ा रहा था। और उसने कहा... वह गांव गड़रियों का गांव था, जहां बहुत भेड़ें थीं। तो उसने गांव के उन बच्चों को समझाने के लिए कहाः एक छोटी सी बगिया में बारह भेड़ें बंद हैं। अगर उनमें से छह भेड़ें छलांग लगा कर बाहर निकल जाएं, तो भीतर कितनी बचेंगी?
एक बच्चे ने हाथ उठाया, वह बच्चा बहुत छोटा था। शिक्षक ने कहाः हां, बोलो, आज तुमने पहली बार ही हाथ उठाया।
उसने कभी हाथ नहीं उठाया था। वह बहुत छोटा था और नया-नया स्कूल में आया था। उसने कहाः और प्रश्नों के बाबत मैं जानता नहीं था, इसलिए चुप रहा, लेकिन इस बाबत जानता हूं। आपने क्या कहा?
उसने अपना प्रश्न दोहरायाः बारह भेड़ें बंद हैं, छह भेड़ें छलांग लगा कर बाहर निकल गईं, भीतर कितनी बचेंगी?
उस लड़के ने कहाः एक भी नहीं।
उस शिक्षक ने कहाः क्या कहते हो! तुम्हें इतना भी समझ में नहीं आता कि मैं कह रहा हूं बारह भेड़ें बंद हैं, छह बाहर निकल गईं।
उसने कहाः वह मैं नहीं समझता, गणित मुझे मालूम नहीं, लेकिन भेड़ों को मैं जानता हूं, मेरे घर में भेड़ें हैं। छह भेड़ें अगर निकल गईं, तो भीतर एक भी नहीं बचेगी। उसने कहाः गणित तो मैं नहीं जानता, लेकिन भेड़ों को मैं जानता हूं, मेरे घर में भेड़ें हैं।
भेड़ें निकल जाएंगी सभी। क्योंकि भेड़ होने में अंतर्गर्भित है अनुगमन, फॉलोइंग, दूसरे के पीछे जाना। और जो आदमी दूसरे के पीछे जाता है, वह अपने भीतर भेड़ की आत्मा को विकसित कर रहा है, आदमी की आत्मा को नहीं। जो फॉलो करता है, जो किसी का अनुयायी है, वह मनुष्य नहीं रहा। उसने अपनी खो दी गरिमा, खो दिया गौरव, खो दी आत्मा। अनुगमन नहीं, किसी के पीछे जाना नहीं, बल्कि खुद के भीतर जाना धर्म है। किसी के पीछे जाना धर्म नहीं है, खुद के भीतर जाना धर्म है। और खुद के भीतर जाने के लिए किसके पीछे जाइएगा? क्योंकि कोई आपके भीतर नहीं जा सकता, सिर्फ आप जा सकते हैं।
धर्म का संबंध अनुगमन, फॉलोइंग से नहीं है। लेकिन हम तो धर्मों के नाम से यही देखते हैं। ये जो इतने फॉलोअर्स सारी दुनिया में हैं--हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, और नये-नये खड़े होते जाते हैं--ये फॉलोअर्स तो मनुष्य होने के स्वत्व को भी खो देते हैं। जो आदमी दूसरे के पीछे जाता है, उसने अपनी आत्महत्या कर ली।
नहीं जाना है किसी के पीछे। खोजना है उसे जो मेरे भीतर है। और बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जो अपने भीतर है उसे खोज लेता है, वह उसे पा लेता है जिसकी बात राम करते हैं, कृष्ण करते हैं, महावीर करते हैं, वह उसे पा लेता है। वह उस परमात्मा पर पहुंच जाता है, जिसकी सारी चर्चा है। और जो दूसरे के पीछे चलता है, वह तो खुद पर ही नहीं पहुंच पाता, परमात्मा पर पहुंचना तो बहुत दूर है। वह दूसरे के पीछे भटकता है, भटकता है, भटकता है, खुद तक भी नहीं पहुंच पाता। और खुद तक पहुंचना, खुदा तक पहुंचने की पहली शर्त है। कौन पहुंचेगा स्वयं तक? वह जो अंधा होकर अनुगमन नहीं करता, आंख खोल कर जीता है।
इस आंख खोलने के नियम के बाबत हमने इधर तीन दिनों में बात की। कुछ और प्रश्न पूछे हैं, उनकी मैं चर्चा करूं।
तो इस प्रश्न के संबंध में आपसे कह दूंः सत्य मान्यता नहीं है। सत्य विश्वास नहीं है। सत्य अनुगमन नहीं है। सत्य है स्वयं की खोज। सत्य है विवेक और विचार। सत्य है अनुसंधान--मुक्त और स्वतंत्र। इसलिए इससे डरने की कोई जरूरत नहीं कि कितने लोग मानते हैं।
रूस में बीस करोड़ लोग हैं और उनमें से, करोड़ों में से करोड़ों लोग मानते हैं कि ईश्वर नहीं है। वहां एक बच्चा पैदा होता है, वह देखता है कि बीस करोड़ लोग मानते हैं कि ईश्वर नहीं है, वह भी मानने लगता है कि ईश्वर नहीं है। वह कहेगा कि बीस करोड़ लोग मानते हैं, तो क्या गलत मानते होंगे? बीस करोड़ लोग मानते हैं, तो क्या झूठ मानते होंगे? हमारे महापुरुष लेनिन, मार्क्स, स्टैलिन, ख्रुश्चेव मानते हैं कि ईश्वर नहीं है, तो क्या गलत मानते होंगे? इतने-इतने बड़े महापुरुष, इतना बड़ा देश, इतनी बड़ी ताकत, बीस करोड़ लोग, तो क्या झूठ मानते होंगे? तो वह बच्चा क्या कह रहा है? क्या वह बच्चा ठीक कह रहा है? अगर वह बच्चा ठीक नहीं कह रहा है, तो आप जो कह रहे हैं, वह कैसे ठीक है?
आप भी गलत कह रहे हैं, वह भी गलत कह रहा है। यह सवाल ही नहीं है कि क्या मानते हैं आप, सवाल यह है कि दूसरों को देख कर मानना गलत है। उसमें आप अपने को खो देते हैं। और मैं तो चूंकि स्वयं की खोज की बात कर रहा हूं, इसलिए खुद को खो देने की किसी भी शर्त को मानने को राजी नहीं हूं। इसलिए मैंने कहा कि यह मुक्त हो जाना जरूरी है।

इसी संबंध में पूछा है कि मैंने कहा कि ज्ञान से मुक्त हो जाना जरूरी है। यह तो बड़ी अजीब बात है!

निश्चित ही, ज्ञान से भी मुक्त हो जाना जरूरी है। किस ज्ञान से?
जो केवल शब्दों, विचारों, सिद्धांतों और किताबों से उपलब्ध होता है। उसमें कोई प्राण नहीं होते, वह एकदम निष्प्राण, थोथा, बासा, उधार, बारोड होता है। उसमें कोई प्राण नहीं होते, वह जीवन को कोई गति नहीं देता। वह वैसा ही होता है, जैसे एक आदमी तैरने के संबंध में किताबें पढ़ ले, बहुत किताबें पढ़ ले। दुनिया में जितनी किताबें लिखी हैं, पढ़ ले। दस-पांच भाषाएं सीख ले, तो दस-पांच भाषाओं में जितनी किताबें हैं, वह पढ़ ले। पचास साल जिंदगी के खतम कर दे, और तैरने के बाबत दुनिया का सबसे बड़ा विचारक हो जाए। और भाषण उससे करवाने हों, तो तैरने के बाबत घंटों भाषण कर सके। किताबें लिख सके, युनिवर्सिटीज में व्याख्यान दे सके, तर्क कर सके, विवाद कर सके। लेकिन उस आदमी को जरा सी नदी में पानी में धक्का दे दें, तो पता चल जाए कि वह पचास वर्ष में जो जाना था, किस अर्थ का है? किस कीमत का है? किस प्रयोजन का है? वह ज्ञान था। लेकिन तैरना ज्ञान से नहीं आता, तैरना तैरने से आता है। और तैरना और ही बात है।
एक फकीर था, मुल्ला नसरुद्दीन। वह एक नदी पर कुछ दिनों तक मांझी का काम करता था। छोटी सी नाव थी, उसमें लोगों को पार ले जाता था। उस गांव का एक बहुत बड़ा विद्वान, गणितज्ञ, बहुत पुरानी भाषाओं का जानने वाला पंडित, वह एक दिन उसकी नाव पर बैठा और नदी के पार गया। बीच में सहज ही उसने नसरुद्दीन को कहाः तुम गणितशास्त्र जानते हो? वह गणितशास्त्र का पंडित था।
नसरुद्दीन ने कहाः नहीं, महाराज!
उस पंडित ने कहाः तेरा चार आना जीवन व्यर्थ हो गया। फिर थोड़ी बात आगे चली, उसने कहाः तू धर्मशास्त्र जानता है?
उसने कहाः नहीं, महाराज!
उस पंडित ने कहाः तेरा और चार आना जीवन नष्ट हो गया; आठ आना बेकार हो गया। और थोड़ी बात चली, उसने कहाः तू दर्शनशास्त्र जानता है?
उस मल्लाह ने कहाः नहीं, महाराज!
वह पंडित हंसने लगा, उसने कहाः तू जीवन बेकार ही करने को उतारू है क्या? बारह आना जीवन नष्ट हो गया।
और तभी उठ आया जोर का तूफान, नाव डगमगाने लगी। तो मुल्ला नसरुद्दीन ने पूछाः पंडितजी, तैरना आता है?
उन्होंने कहाः नहीं।
मुल्ला ने कहाः आपका सोलह आना जीवन नष्ट होता है। मैं चला, मुझे तैरना आता है। बारह आना नष्ट हुआ, कोई फिकर नहीं, चार आना बचा रहेगा। लेकिन आपका सोलह आना नष्ट होता है, हुआ नहीं। मैं जा रहा हूं।
जिंदगी में भी किताबें तैरना नहीं सिखाती हैं और न परमात्मा में तैरना सिखाती हैं। परमात्मा की नदी में भी केवल वे ही लोग पार होते हैं, जो परमात्मा को जीने की कोशिश करते हैं, जानने की नहीं। जीने से जानना निकल आता है, लेकिन जानने से जीना नहीं निकलता। जो आदमी जी लेता है, वह जान लेता है; लेकिन जो जानने में लगा रहता है, वह जी तो पाता ही नहीं, जान भी नहीं पाता है। शब्द इकट्ठे कर लेता है--उपनिषद, गीता, कुरान, बाइबिल, सब उसे कंठस्थ हो जाते हैं। लेकिन शब्द तैराते नहीं, शब्द नाव नहीं बन सकते, शब्द प्राण नहीं बन सकते। शब्द बोझ बन जाते हैं उलटे, हलका नहीं करते आदमी को, और भारी कर देते हैं। जितना सिर पर किताबों का बोझ होता है, आदमी उतना और छोटा हो जाता है, बड़ा नहीं। बोझ दबा देता है।
इसलिए मैंने कहा कि शब्दों से आने वाला ज्ञान साथी नहीं है, संगी नहीं है, उस ज्ञान को छोड़ देना जरूरी है। और जो उस ज्ञान को छोड़ कर जीवन-सत्य के प्रति शांत होकर जीवन-सत्य को जीने की दिशा में गतिमान होता है, वह जान पाता है एक दिन उस सबको--उस सबको, जो शब्दों में कहा गया, लेकिन कहा नहीं जा सका है; उस सबको, जो शास्त्रों में बांधा गया, लेकिन बंध नहीं पाया; उस सब सौंदर्य को, उस सब प्रेम को, उस सब आनंद को, उस परमात्मा को, जो सब तरफ मौजूद है, वह जान पाता है जो धर्म में तैरना सीखता है।
उस तैरने की कला पर ही हम इधर तीन दिन तक बात करते थे कि वह कैसे तैरना सीख जाएं। लेकिन उस सीखने के लिए जरूरी है कि ये सारी बातें जो हमारे चित्त को बांधती हैं, छोड़ दी जाएं। ज्ञान बांधता है। ज्ञान से मेरा अर्थ? वह ज्ञान, जो हम दूसरों से सीख लेते हैं।
बंगाल में एक फकीर हुआ। छोटा उसका एक आश्रम था। उस आश्रम में नये-नये लोग आते, ठहरते, ज्ञान लेते। एक नया संन्यासी भी आया, पंद्रह दिन तक वहां रुका, उसने उस वृद्ध संन्यासी की बातें सुनीं। लेकिन उसे लगा कि उस वृद्ध संन्यासी के पास बहुत बातें नहीं हैं, थोड़ी सी ही बातें हैं। रोज-रोज उन्हीं को दोहरा देता है। पंद्रह दिन में ऊब जाना युवक का स्वाभाविक था। वह ऊब उठा और उसने सोचाः छोड़ दूं इस आश्रम को, कहीं और खोजूं। यह जगह मेरे लिए नहीं, यह गुरु मेरे लिए नहीं, यह तो बंधी हुई कुछ थोड़ी सी बातें दोहराता है और बात समाप्त। इनको कब तक सुनूंगा? और क्या सीखूंगा? लेकिन जिस संध्या वह छोड़ने को था, उसी संध्या कोई बात घट गई और फिर उस युवक ने वह आश्रम कभी नहीं छोड़ा। क्या घट गई उस रात बात?
एक और संन्यासी आ गया कहीं से। और रात उस आश्रम के अंतेवासी इकट्ठे हुए। वह जो नया संन्यासी आया था, उसने दो घंटे तक तत्व की बड़ी गहरी बातें कीं। बड़े सूक्ष्म, बड़े बारीक सिद्धांत समझाए। जो युवक संन्यासी छोड़ना चाहता था, वह भी बैठ कर सुनता था। उसके मन में हुआः ओह! गुरु हो तो ऐसा! कितनी गहरी इसकी बातें! कितने सूक्ष्म इसके विचार! कितनी पैनी इसकी दृष्टि! कैसा कुशल इसका तर्क! धन्य हुआ, ऐसा गुरु हो, इसी के साथ चला जाऊं कल सुबह। ठीक मिल गया वह आदमी जिसकी तलाश थी। एक यह बूढ़ा है, जो कुछ पिटी-पिटाई बातें रोज दोहरा देता है, जिनमें न कोई बहुत सार है, न अर्थ। सोचा उस युवक ने कि आज इस वृद्ध संन्यासी के मन में कितनी ग्लानि न अनुभव होती होगी, अपमान! कितना इसकी प्रतिभा हीन हो गई होगी मन ही मन में! कितनी हीनता लगती होगी! इस संन्यासी की बातें सुन कर कैसा मन ही मन में पछताता और दुखी होता होगा!
बात पूरी हुई, वह नया संन्यासी रुका, रुक कर उसने सबकी तरफ देखा कि क्या प्रभाव पड़ा है! उसने उस बूढ़े संन्यासी से पूछाः महानुभाव! मैंने जो बातें कहीं, क्या सोचते हैं उस संबंध में?
वह बूढ़ा इतनी देर तक आंख बंद किए बैठा सुनता था, उसने आंख खोलीं और उसने कहाः मेरे मित्र, पहली बात तो यही कहनी है कि मैं दो घंटे से सुनता हूं, तुम तो कुछ बोलते ही नहीं।
वह बोलाः मैं नहीं बोलता था, तो इतनी देर से कौन बोलता था?
उस वृद्ध ने कहाः शास्त्र बोलते थे, किताबें बोलती थीं, तुम नहीं बोलते थे। तुम्हारा बोला हुआ एक भी शब्द नहीं है। तो तुम कहते हो कि मैंने जो कहा उसका क्या परिणाम हुआ? तो पहले तो मैं यही निवेदन कर दूं कि तुमने कुछ कहा ही नहीं, परिणाम का सवाल कहां है!
वह जो संन्यासी छोड़ कर जाना चाहता था, रुक गया, फिर कभी उस आश्रम को नहीं छोड़ा उसने। यह बूढ़ा क्या बोला? यह बोला कि तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं, तुम नहीं बोलते।
ऐसा ज्ञान, जो कहीं और से आकर हमारे भीतर बोलने लगता है, किसी भी अर्थ का नहीं है, उसे छोड़ देना जरूरी है। और तब जागेगा वह, जो हमारे भीतर छिपा है।
दो तरह के ज्ञान हैं। एक तो ज्ञान होता है कुएं की भांति, और एक ज्ञान होता है हौज की भांति। हौज में हम क्या करते हैं? मिट्टी लाते, ईंट लाते, पत्थर इकट्ठे करते, दीवाल बनाते, हौज का घेरा बनाते हैं, फिर कहीं से पानी लाकर हौज में भर देते हैं। हौज में अपना कोई पानी नहीं होता, हौज में सिर्फ अपनी ईंट-पत्थर की दीवाल होती है। हौज में कोई पानी नहीं होता, हौज केवल दीवाल होती है ईंट-पत्थर की, घेरा होता है। लेकिन कुएं में? कुएं में काम उलटा करना पड़ता है। कुएं में सबसे पहले ईंट-पत्थर, मिट्टी, जो कुछ हो, उसे निकाल कर अलग करना पड़ता है। लाना नहीं पड़ता, अलग करना पड़ता है। हौज में लाना पड़ता है, कुएं में अलग करना पड़ता है। और जब सारी मिट्टी, पत्थर, ईंट अलग हो जाते हैं, तो नीचे से वह निकल आता है, जो जल का स्रोत है। कुएं में जल है, ईंट-पत्थर ऊपर पड़े हैं, उन्हें अलग कर देना होता है। हौज में जल नहीं है, जल लाना पड़ता है, रोकने के लिए ईंट-पत्थर की दीवाल बनानी पड़ती है।
ज्ञान भी ठीक ऐसे ही दो तरह का होता है। एक हौज वाला ज्ञान होता है, जिससे पंडित पैदा होते हैं। पंडित ईंट-पत्थर इकट्ठा करके दीवाल बना लेता है अपने दिमाग में--हिंदू होने की दीवाल, मुसलमान होने की दीवाल, वेदांती होने की दीवाल, फलांवादी होने की दीवाल--सब तैयार कर लेता है दीवाल। फिर जगह-जगह से पानी ले आता है और अपनी हौज में भर लेता है। फिर जिसकी हौज जितनी बड़ी, वह उतना बड़ा पंडित हो जाता है। हालांकि सच्चाई यह है कि हौज जितनी बड़ी हो, उतनी जल्दी सड़ जाती है और उसका पानी बदबू फेंकने लगता है। इसलिए पंडितों के मस्तिष्क से जितनी दुर्गंध जीवन में फैलती है, और कहीं से फैलती नहीं। लेकिन कुएं की बात और है। जो आदमी अपने मस्तिष्क से सारी ईंट-पत्थर को बाहर निकाल कर फेंक देता, जो अपने मस्तिष्क की सारी दीवालें गिरा देता, जिसके मस्तिष्क पर कोई सीमा नहीं रह जाती, मिट्टी-पत्थर की सारी पर्त अलग हो जातीं, उसके भीतर से आ जाता है वह स्रोत जीवन का, जल का, ज्ञान का। यह है ज्ञानी, जो कुएं की भांति अपने भीतर से ज्ञान को ले आता। वह है पंडित, जो हौज की भांति सब तरफ से ज्ञान को इकट्ठा कर लेता।
धर्म का पंडित से कोई संबंध नहीं है, यद्यपि पंडित सब तरफ से धर्म से संबंधित होने की घोषणा करते रहे हैं। धर्म से पंडित का कोई भी संबंध नहीं है। ज्ञानी का संबंध हो सकता है। पांडित्य एक कुशलता है, ज्ञान एक क्रांति है।
तो जिस ज्ञान को छोड़ने के लिए मैंने कहा, वह हौज वाला ज्ञान है। और इसलिए छोड़ने को कहा, ताकि कुएं वाला ज्ञान उपलब्ध हो सके। जो कुआं बनना चाहते हैं, उन्हें हौज अपनी मिटा ही देनी होगी। और जो कुआं बनने से रुकना चाहते हैं, उनकी मर्जी, वे अपनी हौज को और मजबूत बना सकते हैं, और ग्रंथ लाकर अपनी दीवाल खड़ी कर सकते हैं, और शब्द-सूत्र इकट्ठे करके इतना मजबूत किला बना सकते हैं कि उसके भीतर सूरज की कोई किरण कभी प्रवेश न कर सके।
यह चित्त की दशा है। इस चित्त की बंधी हुए दशा को, मैंने कहा, ज्ञान कोई छोड़े तो उसके जीवन में क्रांति आनी शुरू होती है।

एक मित्र ने और एक प्रश्न पूछा है। उन्होंने पूछा है, जैसा मैंने सुबह कहा, मैंने सुबह कहा कि अहंकार छूट जाना चाहिए। तो उन्होंने पूछा हैः यह अहंकार कैसे पैदा हो जाता है?

यद्यपि मैंने सुबह इस संबंध में कुछ बातें कही हैं, शायद वे ठीक से सुन न पाए हों, समझ न पाए हों, तो दो बातें उनसे कह देता हूं। एक छोटी सी कहानी कहूं, उससे उनको बात समझ में आ जाए।
एक बहुत बड़े राजमहल के निकट पत्थरों का एक ढेर लगा हुआ था। कुछ बच्चे वहां खेलते हुए निकले। एक बच्चे ने पत्थर उठा लिया और महल की खिड़की की तरफ फेंका। वह पत्थर ऊपर उठने लगा। पत्थरों की जिंदगी में यह नया अनुभव था। पत्थर नीचे की तरफ जाते हैं, ऊपर की तरफ नहीं। ढलान पर लुढ़कते हैं, चढ़ाई पर चढ़ते नहीं। तो यह अभूतपूर्व घटना थी, पत्थर का ऊपर उठना, नया अनुभव था। पत्थर फूल कर दुगुना हो गया। जैसे कोई आदमी उदयपुर से फेंक दिया जाए और दिल्ली की तरफ उड़ने लगे, तो फूल कर दुगुना हो जाए। वैसा वह पत्थर जमीन पर पड़ा हुआ, जब उठने लगा राजमहल की तरफ, तो फूल कर दुगुना हो गया। आखिर पत्थर ही ठहरा, अकल कितनी, समझ कितनी, फूल कर दुगुना वजनी हो गया--ऊपर उठने लगा!
नीचे पड़े हुए पत्थर आंखें फाड़ कर देखने लगे। अदभुत घटना घट गई थी! उनके अनुभव में ऐसी कोई घटना न थी कि कोई पत्थर ऊपर उठा हो। वे सब जयजयकार करने लगे, धन्य-धन्य करने लगे। हद्द हो गई, उनके कुल में, उनके वंश में ऐसा अदभुत पत्थर पैदा हो गया, जो ऊपर उठ रहा है!
और जब नीचे होने लगा जयजयकार और तालियां बजने लगीं, और हो सकता है पत्थरों में कोई अखबारनवीस हों, जर्नलिस्ट हों, उन्होंने खबर छापी हो; कोई फोटोग्राफर हों, उन्होंने फोटो निकाली हो; कोई चुनाव लड़ने वाला पत्थर हो, उसने कहा हो, यह मेरा छोटा भाई है, जो ऊपर जा रहा है। कुछ हुआ होगा नीचे, वह ज्यादा तो मुझे पता नहीं विस्तार में, लेकिन नीचे के पत्थर बहुत हैरान होकर देखने लगे, जयजयकार चिल्लाने लगे। नीचे की जयजयकार उस ऊपर के पत्थर को भी सुनाई पड़ी। जयजयकार किसको सुनाई नहीं पड़ जाती है? बड़ा मजा है, जो जयजयकार कभी नहीं होती, वह भी सुनाई पड़ जाती है; तो जो होती है, वह तो सुनाई पड़ ही जाएगी। वह उसे सुनाई पड़ गई, वह और फूलने लगा। उसने चिल्ला कर कहा कि मित्रो! घबड़ाओ मत, मैं थोड़ी आकाश की यात्रा को जा रहा हूं। उसने कहाः मैं जा रहा हूं आकाश की यात्रा को, ताकि जान सकूं कि क्या है रहस्य इस आकाश का? और लौट कर तुम्हें बता सकूं।
गया, महल की कांच की खिड़की से टकराया। तो पत्थर टकराएगा कांच की खिड़की से तो स्वाभाविक कि कांच चूर-चूर हो जाए। इसमें पत्थर की कोई बहादुरी नहीं है। इसमें केवल कांच का कांच होना और पत्थर का पत्थर होना है। इसमें कोई कांच की कमजोरी नहीं है और पत्थर की बहादुरी नहीं है। कांच का कांच होना, पत्थर का पत्थर होना है। पत्थर टकराया, कांच टूट कर चकनाचूर हो गया। लेकिन पत्थर खिलखिलाया और हंसा, जैसे कि नेता अक्सर खिलखिलाते और हंसते हैं। और उस पत्थर ने कहाः कितनी बार मैंने नहीं कहा कि मेरे रास्ते में कोई न आए, नहीं तो चकनाचूर हो जाएगा। वह वही भाषा बोला जो राजनीति की भाषा है--जो मेरे रास्ते में आएगा, चकनाचूर हो जाएगा। देखा अब अपना भाग्य, चकनाचूर होकर पड़े हो!
और वह पत्थर गिरा महल के कालीन पर, बहुमूल्य कालीन बिछा था। थक गया था पत्थर, लंबी उसने यात्रा की थी। सड़क की गली से महल तक की यात्रा कोई छोटी यात्रा है! बड़ी थी यात्रा, जीवन-जीवन लग जाते हैं--गली से उठते, महल तक पहुंचते। थक गया था, पसीना माथे पर आ गया होगा, गिर पड़ा। कालीन पर गिर कर उसने ठंडी सांस ली और कहाः धन्य, धन्य हैं ये लोग! क्या मेरे पहुंचने की खबर पहले ही पहुंच गई कि उन्होंने कालीन बिछा रखा है? और कितने अतिथि-प्रेमी और कैसे स्वागत-सत्कार के प्रेमी, महल बना कर रखा मेरे लिए? क्या पता था कि मैं आ रहा हूं? ठीक जगह खिड़की बनाई, जहां से मैं आने को था! ठीक-ठीक सब किया, कोई भेद न पड़ा, एक इंच मैं चूका नहीं। जो मेरा मार्ग था आने का, वहां खिड़की बनाई। जो मेरा मार्ग था विश्राम का, वहां कालीन बिछाए। बड़े अच्छे लोग हैं।
और यह वह सोचता ही था कि राजमहल के नौकर को सुनाई पड़ी होगी आवाज टूट जाने की कांच की, वह भागा हुआ आया, उसने उठाया पत्थर को हाथ में। पत्थर तो, पत्थर तो, हृदय गदगद हो उठा। उसने कहाः आ गया मालूम होता है मकान का मालिक, स्वागत में हाथ में उठाता है, प्रेम दिखलाता है। कितने भले लोग!
और फिर उस नौकर ने पत्थर को वापस फेंका। तो उस पत्थर ने मन में कहाः वापस लौट चलें, घर की बहुत याद आती है, होम सिकनेस मालूम होती है।
वह वापस गिरने लगा अपनी ढेरी पर, तो नीचे तो आंखें फाड़े हुए लोग बैठे थे। उनका मित्र, उनका साथी गया था आकाश की यात्रा को, चंद्रलोक गया था, वह लौट कर आया था। वह गिरा नीचे, फूलमालाएं पहनाई गईं, कई दिन तक जलसे चले, कई जगह उदघाटन हुआ और न मालूम क्या-क्या हुआ। और उन पत्थरों ने पूछा कि क्या-क्या किया? उसने अपनी लंबी कथा कहीः मैंने यह किया, मैंने यह किया, मेरा ऐसा स्वागत हुआ, ऐसी-ऐसी जगह मेरा सत्कार हुआ, इतने-इतने शत्रु मरे। कई चीजों का गुणनफल किया उसने। एक कांच मारा था, कई कांच बताए। एक महल में ठहरा था, कई महलों में ठहरा हुआ बतलाया। एक हाथ में गया था, अनेक हाथों में पहुंचने की खबर दी। जो बिल्कुल स्वाभाविक है, आदमी का मन। आदमी का मन जैसा करता तो पत्थर का मन तो और भी ज्यादा करेगा। और तब उसके पत्थरों ने कहाः मित्र, तुम अपनी आत्मकथा जरूर लिख दो, हमारे बच्चों के काम आएगी। ऑटोबायोग्राफी लिखो, क्योंकि सभी महापुरुष लिखते हैं, तुम भी लिखो।
वह लिख रहा है। जल्दी ही लिख लेगा तो आपको पता चलेगी, खबर हो जाएगी। क्योंकि उसके पहले भी और पत्थरों ने लिखी हैं और उनको आप अच्छी तरह पढ़ते रहे हैं। वह भी लिखेगा, उसकी भी पढ़ेंगे।
इस पत्थर पर आपको हंसी क्यों आती है? इस बेचारे में कौन सी खराबी है? यह आदमी से कौन सा भिन्न है? और इस पत्थर पर आप हंसते हैं, तो कभी अपने पर हंसे हैं? इस पत्थर की इस बात को सुन कर आप हंसते हैं कि मैं जा रहा हूं यात्रा को, लेकिन हम खुद क्या हैं? क्या हम भी किन्हीं अनजान हाथों के द्वारा फेंके गए पत्थर नहीं? हमें पता है, हम क्यों जन्म लेते हैं? हमें पता है, हम कैसे पैदा हो जाते हैं? हमें पता है, कौन हमें फेंक देता, कौन अनजान ताकत, कौन अनजान हाथ, कौन अपरिचित फेंक देता है जीवन में?
लेकिन हम कहते हैंः मेरा जन्म! मेरा जन्म-दिन है! आपसे पूछा था किसी ने कि आप किस जन्म-दिन पैदा होना चाहते हैं? आपसे कोई तारीख, तिथि, कोई पूछी थी कि आप कब पैदा होना चाहते हैं, जो आप कहते हैं, मेरा जन्म-दिन? आपका कोई निर्णय है इसमें? आपकी कोई च्वाइस? आपसे किसी ने पूछा था, आप पैदा भी होना चाहते हैं कि नहीं होना चाहते? न आपसे किसी ने पूछा कि आप पैदा होना चाहते हैं, न पूछा दिन, न कोई तारीख। लेकिन कहते हैंः मेरा जन्म-दिन!
यह ‘मेरा’ बड़ा अजीब है। कहते हैंः मेरी जवानी! आप ले आए इस जवानी को? यह आपके हाथ का कोई काम है? यह आपका प्रयत्न है कोई कि आप जवान हो गए? क्या आप चाहते कि जवान न हों, तो आप रुक जाते जवान होने से? नहीं, लेकिन कहते हैंः मेरी जवानी! यह ‘मैं’ कहां आ गया इस जवानी में?
कहते हैंः मेरी जिंदगी! क्या है जिंदगी आपकी? कौन सी चीज आपकी है इस जिंदगी में? कहते हैंः मेरा शरीर! क्या है आपका इसमें? इस शरीर में मेरे जो-जो कण हैं, न मालूम कितने शरीरों में रह चुके हैं। मुझसे पहले न मालूम इन कणों ने न मालूम कितने शरीरों में की हैं यात्राएं--पशुओं में, पक्षियों में, पौधों में। रोज अन्न खा रहे हैं, वह आपके शरीर में जाकर आपका हिस्सा बन रहा है, लेकिन कल तक किसी पौधे का हिस्सा था, किसी पौधे का शरीर था। जो श्वास मैं ले रहा हूं, कहता हूंः मेरी श्वास! यहां हम इतने लोग बैठे हैं, जो आप श्वास अभी ले रहे हैं, वह आपके पड़ोसी बहुत थोड़ी देर पहले ले चुके हैं, वह अब आपको मिल गई, थोड़ी देर बाद दूसरे को मिल जाएगी। आपका क्या है? आप कहां आते हैं? कहते हैंः मैं लेता हूं श्वास। लेकिन आपको पता है, अगर श्वास न आएगी तो आप ले सकेंगे? आप मालिक हैं श्वास के?
नहीं; जिंदगी फेंके हुए पत्थर की कथा है। लेकिन हम हर काम से अपने मैं को जोड़ लेते हैं, जो बिल्कुल झूठा है, जिसकी कोई जगह नहीं, जो बिल्कुल सब्स्टेंशियल नहीं है, जिसका कोई पदार्थगत कुछ भी सत्ता नहीं है, जो है बिल्कुल शैडो, है छाया की भांति झूठा।
उस पत्थर की कथा पर हंस गए थे, अपनी जिंदगी को थोड़ा उसकी जगह रख कर सोच लेना, तो पता चल जाएगा कि अहंकार कैसे पैदा हो गया है।
तो मैं इसमें क्या कहूं कि कैसे पैदा हो गया है? थोड़ा खोज लेना, तो पता चल जाएगा कि नासमझी है, भूल है, ख्याल है, छाया है, सत्य कुछ भी नहीं है उस अहंकार में। और यह दिख जाए, तो अहंकार छोड़ना नहीं पड़ता। यह दिख जाए, तो अहंकार गया। अगर उस पत्थर को यह दिख जाए कि वह कैसी नासमझी की बातें कह रहा है, तो बात खतम हो गई। फिर और कौन सी कथा रह गई?
तो जिस आदमी को अपने जीवन पर थोड़ी भी दृष्टि है, और जो अपने जीवन की कथा को थोड़ा आंकता है, देखता है, खोजता है, वह अनुभव कर लेता है कि अहंकार से ज्यादा असत्य और कुछ भी नहीं है। और जो यह जान लेता है कि अहंकार असत्य है, इसके साथ ही, इसके साथ ही, तत्क्षण, वह यह भी जान लेता है कि परमात्मा सत्य है। परमात्मा का सत्य होना अहंकार के असत्य होने के सिक्के का दूसरा पहलू है। जिसने यह जान लिया कि अहंकार असत्य है, उसने यह भी जान लिया कि परमात्मा सत्य है। और जो यह समझता है कि अहंकार सत्य है, वह अनिवार्य रूप से यह भी जानता है कि परमात्मा असत्य है।
तो जब तक अहंकार है भीतर, तब तक करो पूजा, करो प्रार्थना, पढ़ो मंत्र-तंत्र और जो भी उलटा-सीधा करना हो करो, कोई फर्क नहीं पड़ेगा, परमात्मा से कोई संबंध नहीं हो सकता। वह अहंकार बाधा है। वह अहंकार पूजा को भी पी जाएगा, अपना भोजन बना लेगा कि मैं पूजा करने वाला हूं! वह प्रार्थना को भी पी जाएगा और अपना भोजन बना लेगा और कहेगाः मैं प्रार्थना करने वाला हूं! तुम प्रार्थना करने वाले हो? मैं हूं असली प्रार्थना करने वाला इस गांव में! वह अहंकार सब पी जाएगा और हर चीज को अपने आस-पास जोड़ लेगा और कहेगा, मैं इससे मजबूत हो रहा हूं।
इसलिए धर्म की सबसे बुनियादी और आधारभूत क्रांति अहंकार के विसर्जन से प्रारंभ होती है और परमात्मा की उपलब्धि पर समाप्त होती है। इस अहंकार के विसर्जन के लिए बहुत कुछ मैंने आपसे सुबह बातें की हैं। लेकिन यह कैसे पैदा होता है, यह आप अपनी जिंदगी को खोजना, तो आपको दिख जाएगा। और मेरे कहने से तो दिखने का कोई संबंध नहीं है। इसलिए मैंने एक कहानी कह दी, और इस संबंध में कुछ भी नहीं कहूंगा। मेरे कहने से कुछ भी नहीं होगा, आप देखेंगे तो दिख सकता है। जो असत्य है, उसकी असत्यता को देख लेना कोई कठिनाई नहीं है। हम देखना ही न चाहें, तो बात दूसरी है। और हम देखना नहीं चाहते हैं। और देखना हम इसलिए नहीं चाहते हैं कि गहरे मन में हम अच्छी तरह जानते हैं कि देखा कि यह गया। इसलिए देखो ही मत, आंखें मूंदे रहो और चलते जाओ। इसलिए पूछो सबसे...
ऐसा एक दफा हुआ। रवींद्रनाथ ने एक गीत लिखा। गीत लिखा कि हे परमात्मा! मैं तुझे खोज रहा हूं। बहुत-बहुत वर्षों, जन्मों से मेरी खोज चलती तेरे लिए। अनेक बार थोड़ी-बहुत तेरी झलक मिली और फिर तू खो गया। लेकिन एक बार मैंने तय कर लिया कि तुझे अब खोऊंगा नहीं, और मैं तेरा पीछा ही करने लगा। आखिर एक सुबह मैं तेरे दरवाजे पर पहुंच गया, मैं तेरी सीढ़ियां चढ़ गया, मैंने तेरे द्वार की कुंडी अपने हाथ में ले ली और मैं बजाने को ही था कि मुझे ख्याल आया कि कुंडी बज जाएगी और तू निकल आएगा, तो फिर मैं क्या करूंगा? तू मिल जाएगा, फिर मैं क्या करूंगा? मैं बहुत डर गया--फिर मैं क्या करूंगा? अब तक तो तुझे खोजता था, यह काम था। अब तक तो तुझे खोजता था, यह व्यस्तता थी। अब तक तो तुझे खोजता था, रोता था, प्रार्थना करता था, गीत लिखता था, इसमें उलझा था। लेकिन तू मिल जाएगा, तो फिर क्या करूंगा? फिर अनंत-अनंत काल तक करूंगा क्या? तो मैं डर गया, मैंने कुंडी वापस छोड़ दी और मैं धीरे-धीरे जूते खोल कर सीढ़ियों से नीचे उतर आया कि कहीं तू आवाज सुन कर निकल ही न आए। और तब से मैं तुझे फिर खोज रहा हूं, हालांकि मुझे अच्छी तरह पता है कि तेरा घर कहां है, लेकिन मैं खोजता हूं। और बड़ा मजा है, खोजता भी मैं हूं और जानता भी मैं हूं कि तू कहां मिल जाएगा। लेकिन उस जगह से बच कर निकल जाता हूं, क्योंकि डर है--अगर तू मिल गया तो फिर क्या होगा?
जिंदगी बड़ी अदभुत है! मैं आपसे यह निवेदन करता हूंः जिन चीजों को आप खोजना चाहते हैं, उन्हीं चीजों से किसी गहरे तल पर आप बचना भी चाहते हैं। अगर बचना न चाहें, तो खोज तो आज और यहीं पूरी हो सकती है। लेकिन आप बचना भी चाहते हैं, खोजना भी चाहते हैं, इससे सारी कठिनाई खड़ी हो जाती है।
अहंकार, पूछते जरूर हैं आप, यह क्या है और इसको मैं कैसे समाप्त कर दूं? लेकिन हो सकता है, यह आपका अहंकार ही पूछ रहा हो--कि बड़ा मजा आ जाए अगर मैं ऐसा आदमी बन जाऊं जिसका कोई अहंकार नहीं है। यह अहंकार ही हो सकता है पूछ रहा हो--कि बहुत मजा आ जाए अगर मैं ऐसा आदमी बन जाऊं जिसका कोई अहंकार नहीं है। तो तरकीब पता लगा लें कि अहंकार खोने की तरकीब क्या है? यह हो सकता है अहंकार ही पूछ रहा हो। और तब बड़ी मुश्किल हो जाएगी। तब अहंकार से छूटने का कोई रास्ता न रह जाएगा। हमारा मन बड़े अजीब और अनूठे रास्तों पर काम करता है। लेकिन अगर मन सीधा और साफ काम करे, जो कि वह कर सकता है, तो जिंदगी बड़ी सरल है और सत्य बहुत निकट है।

एक छोटी सी बात, जो पूछी है, और फिर मैं अपनी चर्चा पूरी करूंगा।
एक मित्र ने पूछा है कि आप बार-बार कहते हैं कि परमात्मा को पाना सरल है, तो फिर सारे लोग पा क्यों नहीं लेते? कितने थोड़े से लोगों को तो शायद परमात्मा मिलता हो! और उसका भी कोई पक्का तो नहीं है कि उनको मिलता है कि नहीं मिलता! क्योंकि कौन तय करे? तो उन्होंने पूछा है कि आप कहते हैं बार-बार कि सरल है, सरल है, फिर मिलता क्यों नहीं है?

जरूर जब मिलता नहीं है, तो ख्याल आता है, कठिन होना चाहिए। लेकिन न मिलने के पीछे हमेशा कठिनाई ही नहीं होती है। बल्कि बड़ा मजा है, अगर परमात्मा का पाना कठिन होता, तो बहुत से लोग कभी का परमात्मा को पा लेते। क्योंकि जो चीज कठिन होती है, उसको पाने में अहंकार को बड़ी तृप्ति मिलती है।
हिमालय पर एवरेस्ट की चोटी है, और छोटी-छोटी हजारों चोटियां हैं। एवरेस्ट पर हजारों लोग चढ़ने जाते हैं, छोटी-छोटी चोटियों की कोई फिक्र नहीं करता, उनको चढ़ना बहुत सरल है, उनको कोई देखता ही नहीं। लेकिन दुनिया भर से पहाड़ों पर चढ़ने वाले पर्वतारोही गौरीशंकर पर, एवरेस्ट पर चढ़ना चाहते हैं। पचास सालों में न मालूम कितने लोग मर गए उसको चढ़ने में। मैं बहुत हैरान हुआ! मैं सोचने लगा, छोटी-छोटी पहाड़ियां हैं, इन पर क्यों नहीं चढ़ते? इन पर चढ़ना तो बड़ा सरल है। इस पर क्यों चढ़ते हैं, जिस पर चढ़ना कठिन है? और तब मुझे दिखाई पड़ा कि कठिन पर चढ़ने में अहंकार को रस आता है--इतनी कठिन चीज और मैंने जीत ली!
तो जो कठिन है, आदमी का अहंकार उस तरफ जाता है; और जो सरल है, उस तरफ नहीं। दुनिया को जीतना बहुत कठिन है, इसलिए हर आदमी दुनिया को जीतना चाहता है। परमात्मा को जीतना बहुत सरल है, अहंकार के लिए कोई चैलेंज वहां नहीं है, कोई चुनौती वहां नहीं है, इसलिए कोई आदमी उस तरफ आंख नहीं उठाता।
कुछ लोग कभी-कभी आंख उठाते भी हैं, तो वे तभी उठाते हैं जब कोई परमात्मा की कठिनाई बताने वाला मिल जाए और वह कहे कि जन्म-जन्म कोशिश करनी पड़ेगी, शीर्षासन करना पड़ेगा, भूखे मरना पड़ेगा, घर छोड़ना पड़ेगा, कोड़े मारना पड़ेंगे अपने को, आंखें फोड़ना पड़ेंगी, कांटे छिदाने पड़ेंगे, धूप में पड़े रहना पड़ेगा, तब कहीं जन्म-जन्म की कोशिश से मिलेगा परमात्मा। तो फिर कुछ लोगों को बात जंच जाती है, कि तो फिर खोजना चाहिए। क्योंकि अहंकार को रस आना शुरू हो जाता है। अगर बात कठिन है, तो चलो देख लें एक मौका, इसको भी जीत कर देख लें। इसीलिए दुनिया में धर्म के नाम पर कठिन से कठिन तरकीबों की ईजाद हुई, यह मनुष्य के मन का शोषण है, अहंकार का शोषण है, और कुछ भी नहीं।
मैं तो कहता हूंः परमात्मा को पाना बहुत सरल है। अगर अहंकार न हो, तो आप इसी वक्त पा सकते हैं। लेकिन अहंकार को सरल बात जंचती ही नहीं, उसको जंचती है कठिन बात, दुरूह, दुर्गम, अगम हो, तो फिर चलो। तलवार की धार पर चलना हो, तो अभी अहंकारी को जंचता है कि चलो आ जाएं, चल कर देख लें। लेकिन कोई कहे कि घर में सोने जैसा सरल है, तो फिर तो बात जंचती नहीं। लेकिन मैं कहता हूंः सरल है। और न पाने का कारण यह है कि हम कठिन की खोज करते हैं, इसलिए परमात्मा को नहीं उपलब्ध हो पाते।
एक छोटी सी कहानी, अपनी चर्चा मैं रात की पूरी करूं।
एक बार बहुत पुराने जमानों में, एक बड़े साम्राज्य में, उस राज्य का बड़ा वजीर मर गया। जो बड़ा महामंत्री था, उसकी मृत्यु हो गई। उस राज्य का नियम था कि देश भर में सबसे बुद्धिमान आदमी को खोज कर वे मंत्री बनाते थे। तो तीन महीने लग गए, सारे मुल्क में अनेक तरह की प्रतियोगिताएं हुईं बुद्धिमान आदमी को खोजने के लिए। एक वाइ.जमैन खोजना था। फिर परीक्षाएं होते-होते, चुनाव होते-होते, छंटनी होते-होते अंत में तीन आदमी बच रहे, जो पूरे देश में सर्वाधिक बुद्धिमान समझे गए। अब अंतिम फैसला होने को रह गया, इन तीन में से एक चुना जाना था। अंतिम परीक्षा का दिन आ गया। सारा देश उत्सुक था, वे तीनों लोग भी उत्सुक थे कि क्या होगा? जीवन-मरण का सवाल था। वे सब भांति तैयार होकर आए थे कि कोई भी परीक्षा हो।
परीक्षा का दिन आ गया, कल सुबह परीक्षा होगी। आज सांझ से वे उत्सुक थे कि किसी भांति कल का पर्चा पता चल जाए, जैसा कि सभी परीक्षार्थी उत्सुक होते हैं। और ऐसा नहीं है कि परीक्षार्थी आज ही पर्चा पता चलाने के लिए उत्सुक हो गए हैं, हमेशा से उत्सुक हैं, वे भी उत्सुक हो गए।
लेकिन वे हैरान हुए, पर्चा पता चलाने की जरूरत ही न आई, गांव में दीवाल-दीवाल पर पर्चा लगा हुआ था, दुकान-दुकान पर उसकी चर्चा थी कि कल यह परीक्षा होने को है। वे बाजार में गए तो उन्हें पता चला कि यह होने को है परीक्षा। हर आदमी को पता था पूरे गांव में कि एक गणित की पहेली से खुलने वाला ताला है। उस ताले को लगा कर तीनों व्यक्तियों को कमरे के भीतर बंद कर दिया जाएगा और उनको कहा जाएगा कि जो सबसे पहले इस ताले को खोल कर बाहर आता है, वही वजीर है।
तीनों को पता चल गया। उनमें से दो तो फौरन भागे हुए बाजार गए, पुस्तकालयों में गए और उन्होंने किताबें खोजीं, शास्त्र खोजे तालों के संबंध में, गणित-पहेलियों के संबंध में कि न मालूम क्या होगा? किताबें ले आए, रात भर पढ़ते रहे, रात भर घोखते रहे, याद करते रहे, हिसाब लगाते रहे। जिंदगी-मरण का सवाल था, सोने का कोई सवाल भी नहीं था। लेकिन एक आदमी उनमें बड़ा अजीब था, वह सांझ से ही चादर तान कर सो गया। उन दो लोगों ने समझा कि इसने मालूम होता है ड्राप ले लिया, यह परीक्षा में बैठेगा नहीं, डर गया, घबड़ा गया, क्या हो गया! यह तैयारी नहीं कर रहा है कोई! रात भर वे तो तैयारी करते रहे, वह आदमी सोता रहा। दो-चार दफा उन्होंने उसे उठाया भी, तो उसने कहाः आज तो मुझसे बात ही मत करो, तुम अपनी तैयारी करो, मुझे अपनी करने दो। वे बहुत हैरान हुए कि यह कौन सी तैयारी हो रही है?
सुबह हो गई, वह आदमी तो रोज पांच बजे उठ आता था, आज तो वह सात बजे उठा। वे लोग समझे कि या तो इसका मस्तिष्क घबड़ाहट से, शॉक से कुछ गड़बड़ हो गया। उन्होंने रात भर इतनी तैयारी की, रात भर सोए नहीं एक क्षण, सब भांति से याद किया, याद किया। सुबह वे इस हालत में पहुंच गए कि अगर उनसे कोई पूछता कि दो और दो कितने होते हैं, तो वे नहीं बता सकते थे। क्योंकि रात भर जिन्होंने इतनी तैयारी की हो, उनका दो और दो का ख्याल भी भूल जाता है। मस्तिष्क बहुत बेचैन, अशांत, तनाव से भर गया था, जैसे सभी परीक्षार्थियों का हो जाता है। सब उन्हें याद होता है, लेकिन परीक्षा-भवन में कुछ भी याद नहीं रह जाता। वही हालत उनकी हो गई थी।
वे तीनों चले। वे दो तो डगमगाते पैर, बेचैन, परेशान, उनके मन में तो गणित चल रहे हैं, और वह एक गीत गुनगुनाता हुआ। उन दोनों को बहुत गुस्सा भी आया कि तुम यह क्या गीत गा रहे हो? यह कोई वक्त है गीत गाने का?
उसने कहाः तुम अपनी तैयारी करो, मुझे अपनी करने दो। मैं तुम्हें बाधा नहीं देता, तुम कृपा करके मुझे बाधा न दो।
वे तीनों पहुंचे। अफवाह सच थी। राजा ने उन्हें एक कक्ष में बंद कर दिया। द्वार पर एक अजीब सा ताला लटका हुआ है, जिस पर गणित के चिह्न और अंक बने हैं। और राजा ने कहाः मित्रो, यह ताला है, गणित की एक पहेली, पहेली ऊपर बनी है। इसे तुम अगर हल कर पाओ, तो ताला हल करते ही खुल जाएगा। जो आदमी हल करके बाहर निकल आएगा, वह वजीर हो जाएगा, वह चुन लिया जाएगा। तो अब तुम हल करो, मैं जाता हूं।
उन तीनों को छोड़ कर द्वार को बंद करके वह बाहर चला गया। वे दो व्यक्ति, जिन्होंने रात भर तैयारी की थी, उन्होंने जल्दी से अपने कपड़ों के भीतर हाथ डाले और छिपी हुई किताबें बाहर निकाल लीं। कोई यह न सोचे कि आजकल के विद्यार्थी ऐसा करते हैं, पहले के विद्यार्थी भी ऐसा ही करते थे। जो भी समझदार है, वह यह करेगा ही। समझदारी चालाकी ले ही आएगी। वे दो समझदार थे, एक नासमझ था, न वह कोई किताबें लाया था, न कुछ। वह एक कोने में आंख बंद करके बैठ गया। उन्होंने अपनी किताबें खोल लीं, ताले पर अंक देखे और अपना हिसाब लगाने में लग गए। बड़ा अजीब सा उलझन भरा सवाल था, जल्दी हल करना था, एक सेकेंड की फुर्सत न थी। तो जितनी तेजी से लग गए वे हल करने में, उतना ही मामला और उलझता चला गया, क्योंकि अशांत आदमी कहीं कुछ सुलझा पाता है! पहेली और बड़ी पहेली होती गई, किताबों ने और सहारा दे दिया पहेली को बड़ा करने में। किताब खोलते थे, दूसरी किताब खोलते थे, अंक देखते थे, उसके अंक उतारते थे मन में, सब काम चल रहा था, वजीर होने की जल्दी चल रही थी, कहीं कोई दूसरा न निकल जाए, यह घबड़ाहट चल रही थी। ऐसी विक्षिप्त हालत थी! कहीं कोई पहेली हल होनी थी?
वह तीसरा आदमी एक कोने में आंख बंद करके बैठ गया। उन्होंने एक-दो बार उससे भी कहाः महानुभाव! कुछ तैयारी करो, क्या कर रहे हो?
उसने कहाः तुम अपनी करो, मुझे अपनी करने दो।
वे तो अपने गणित सुलझाने में लग गए। वह जो आदमी चुपचाप बैठा था मौन, वह क्या कर रहा था रात भर से? वह मौन होने की कोशिश कर रहा था। क्योंकि जिंदगी में कोई भी सवाल हल करना हो, तो मौन हो जाना जरूरी है, साइलेंट हो जाना जरूरी है। क्योंकि जितना होगा चित्त शांत, उतनी सामर्थ्य होगी चित्त की देखने की, पहचानने की, प्रवेश की, विचार की, खोज की। तो पूरी रात से कोशिश कर रहा था कि सब भांति शांत हो जाए, मन में कोई उलझन न रह जाए, कोई विचार न रह जाए, अब भी वह यही कर रहा था। फिर आखिर उसका मन हो गया शांत और वह उठा और दरवाजे पर गया, उसने दरवाजा धकाया, बड़ी हैरानी की बात थी, दरवाजा लगा हुआ नहीं था, अटका था, वह बाहर निकल गया।
दो व्यक्ति अपने काम में लगे थे, उन्हें पता भी नहीं चला कि एक हममें से बाहर निकल गया। वह तो राजा जब उसे भीतर लेकर आया, तब उनकी आंखें खुलीं। उन्होंने कहाः अरे! तुम बाहर कैसे पहुंचे? क्योंकि उनको तो कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि यह आदमी और बाहर पहुंच सकता है! इतना कठिन सवाल और ऐसा सुस्त आदमी!
राजा ने कहाः यह आदमी अदभुत है। इसने समझदारी का पहला सबूत दे दिया। अरे पागलो, पहले यह तो देख लेना था कि ताला लगा भी है या नहीं लगा है? तुम उसे खोलने की कोशिश में लग गए!
पहली बात जाननी जरूरी थी, समझदारी का पहला नियम था कि जिस सवाल को हम हल करना चाहते हैं, देख तो लें कि वह सवाल है भी या नहीं? जो इस बात को सोचे बिना सवाल को हल करने में लग जाता है, वह क्या कभी सवाल को हल कर पाएगा? क्योंकि सवाल होता तो हल भी हो जाता, सवाल तो है ही नहीं, तो हल होगा कैसे?
इसलिए कठिन होता चला जाता है, कठिन होता चला जाता है। परमात्मा इसलिए सवाल बना हुआ है कि वह सवाल नहीं है, और जो सिद्धांतों और शास्त्रों में खोजते हैं, वे उलझते चले जाते हैं और बात कठिन होती चली जाती है। परमात्मा का द्वार बंद नहीं है, इसलिए कौन उसे खोलने की कोशिश कर रहा है? परमात्मा का द्वार खुला हुआ है, लेकिन इस खुले द्वार को देखने के लिए एक शर्त जरूरी हैः साइलेंट माइंड चाहिए, शांत मन चाहिए। वह शांत मन फौरन कह देगाः दरवाजा बंद नहीं है, उठो, देखो। तुम धक्का भी नहीं दोगे कि दरवाजा खुल जाएगा।
परमात्मा तो बहुत सरल है, आदमी के शास्त्र बहुत कठिन हैं। परमात्मा तो बहुत सरल है, आदमी की बुद्धिमत्ता बहुत जटिल है। परमात्मा तो बहुत सरल है, लेकिन उस सरलता को पहचानने वाला शांत और सरल मन हमारे पास नहीं है, एक जटिल और उलझा हुआ मन लिए हम बैठे हैं। और इस उलझे मन से हम हल करने चलते हैं। हल नहीं होगा, और उलझ जाएगा। इसलिए मैं बार-बार कह रहा हूं कि तथाकथित ज्ञान परमात्मा तक पहुंचने नहीं देता।
शांत मन है उसके लिए द्वार। शून्य मन है उसके लिए द्वार। और जो शांत और शून्य हो जाता है, वह जान लेता है सब--सब जो जीवन में अर्थपूर्ण है, सब जो जीवन में आनंदपूर्ण है, सब जो जीवन को आलोक से भर देता है और अमृत से, सब जहां मृत्यु समाप्त है और अनंत का उदघाटन है। सरल है बहुत। बहुत है सरल, अत्यंत है सरल, एकदम है सरल, क्योंकि है स्वरूप, क्योंकि वही है जो मेरा है। कठिन कैसे हो सकता? और परमात्मा कठोर नहीं कि उसके द्वार हों बंद; द्वार हैं खुले। लेकिन कोई जाए उन द्वारों के निकट।
जाने की ही बात हम इधर तीन दिन किए। यह अंतिम दिन है, अंतिम दिन अब हम अंतिम बार उस शून्य में बैठने की कोशिश करेंगे, जो उस आदमी ने की थी उस कमरे में, अकेले में बैठ गया था चुपचाप, मौन। पहेली नहीं पकड़ी थी उसने हल करने को, अपने मन को पकड़ा था शांत करने को। ये दो अलग बातें हैं। पहेली को पकड़ लें हल करने को, मन हो जाएगा अशांत। और अशांत मन कोई पहेली को सुलझा न पाएगा। उसने पकड़ा मन को, पहेली को नहीं। उसने पकड़ा मन को कि कर लूं इसे शांत, फिर देख लूंगा पहेली को। शांत मन के सामने कोई पहेली कभी नहीं है।
पूछते हैं बार-बार प्रश्न आपः ईश्वर क्या है? कहां है? स्वर्ग क्या है? नरक क्या है? पहेलियों को पकड़ रहे हैं, मन को नहीं पकड़ रहे हैं। पूछते हैं कि पुनर्जन्म है या नहीं? पूछते हैंः कर्मों का कोई संबंध है या नहीं? जमाने भर के न मालूम कहां-कहां के प्रश्न पूछते हैं। पहेलियों को पकड़ते हैं, लेकिन उस मन को नहीं पकड़ते, जो शांत हो जाए तो जिसके समक्ष कोई पहेली नहीं रह जाती। पहेलियों को पकड़िए, पंडित हो जाइएगा। शास्त्र पढ़िए, गुरुओं के पास जाइए, सेवा करिए उनकी, वे खूब ज्ञान देंगे आपको। और उनका ज्ञान आपकी मृत्यु बन जाएगा, आपका बंधन, आपका बोझ। और आपका चित्त भूल जाएगा इस बात को जो कि बेसिक थी, जो कि आधारभूत थी, वह यह कि पहेली को पकड़ना है या मन को? मैं जमाने भर की पहेलियां सुलझाने जाऊं या इस मन को सुलझा लूं?
मेरा कहना हैः जो मन को सुलझा लेता है, उसके लिए सब पहेलियां सुलझ जाती हैं। सुलझा हुआ मन, सुलझा हुआ जगत; सुलझा हुआ मन, सुलझा हुआ जीवन; सुलझा हुआ मन, तो फिर कोई बाधा नहीं रह जाती परमात्मा तक उठने में, वह सुलझा हुआ मन यात्रा कर लेता है।
उस आदमी की तरह थोड़ी देर हम भी एक कोने में चुप होकर बैठेंगे। ताले के संबंध में बिल्कुल मत सोचना, सोचना ही मत। और मत सोचना यह कि गीता क्या कहती है उस ताले को खोलने के बाबत? और कुरान क्या कहता है? और महावीर क्या कहते हैं? बुद्ध क्या कहते हैं? कृपा करो, इनको छोड़ दो। ताले को छोड़ दो, उसके साथ इन सबके दिए उत्तर भी छोड़ दो। क्योंकि जो ताले को खोजता है, वह इनके उत्तर खोजता है। खोजो उस मन को, जो भीतर है, करो उसे शांत, होने दो उसे मौन, हो जाने दो उसे शून्य और फिर देखो। तो फिर दिखाई पड़ेगा कि सिवाय परमात्मा के और कुछ भी नहीं है।
इतनी ही बात। और चूंकि अंतिम दिन है और इधर तीन दिनों में न मालूम क्या-क्या बातें मैंने आपसे कहीं, तो विदा के इस क्षण में जरूरी है कि ये दो-तीन बातें आखिर में और आपसे कह दूं। एक तो मैंने ऐसी बहुत सी बातें कहीं जिससे आपके मन को चोट पहुंची होगी, लेकिन मैं क्षमा नहीं मांगूंगा। क्योंकि मैंने जान कर ही वह चोट पहुंचाई है, कोई अनजाने में नहीं। दुख तो इतना ही रह जाता है कि चोट थोड़ी ही पहुंचा पाता हूं, पूरी नहीं पहुंचा पाता, क्योंकि शब्द बहुत आदमी के कमजोर हैं और तलवार नहीं बन सकते। लेकिन अगर बन जाएं और आपके हृदय को टुकड़े-टुकड़े कर दें, तो शायद आपकी जिंदगी में कुछ हो जाए। क्योंकि जड़ता हो गई है घनी, सो गए हैं गहरे, अब तो कोई बहुत क्रूरता से और कठोरता से न हिलाए, तो हिलना भी संभव नहीं है। अब तो कोई बहुत जोर से तूफान आ जाए और कोई आंधी और भूकंप आ जाए और सब हिल जाए, तो शायद हमारी नींद टूटे। और हो सकता है न भी टूटे। क्योंकि कोई बहुत ही गहरे सोने वाले हों, तो शायद भूकंप में भी सोए रहें।
तो इधर तीन दिन मैंने बहुत सी चोटें पहुंचाईं जान कर। दुख रहेगा तो उन लोगों का, जिनको चोट न पहुंची हो, तो उनसे क्षमा मांगता हूं कि अगली बार आऊंगा तो और जोर से पहुंचाने की कोशिश करूंगा। लेकिन जिनको पहुंच गई हो, उनका धन्यवाद करता हूं, उनका स्वागत करता हूं। वह चोट उनको चिंतन का मौका दे, विचार का, खोज का, उनके जीवन में कोई घड़ी आ जाए कि वे जाग सकें, खुद कुछ जान सकें, तो ही उन्हें उनकी आत्मा उपलब्ध हो सकती है।
अंतिम बार हम अब रात के ध्यान के लिए बैठेंगे।
समाप्त 

अपने माहिं टटोल-प्रवचन-09

मेरे प्रिय आत्मन्!
पिछली चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न मेरे पास आए हैं। सभी प्रश्न बहुत अर्थपूर्ण, बहुत महत्व के हैं। कुछ थोड़े से प्रश्नों पर अभी और कुछ पर रात में विचार करेंगे। प्रश्न चूंकि बहुत हैं, मैं बहुत थोड़े संक्षेप में एक-एक का उत्तर देने की कोशिश करूंगा।
सबसे पहले, एक मित्र ने पूछा है, और वैसी बात करीब-करीब पूरे मुल्क में जगह-जगह पूछी जाती है। आप सबके मन में भी वह प्रश्न उठता होगा। उन्होंने पूछा हैः आजकल की दुनिया खराब हो गई है। अभी यह जो गीत गाया, उसमें भी यह बात है कि आजकल की दुनिया खराब हो गई है। इस खराब दुनिया को ठीक रास्ते पर कैसे लाया जाए?
इस प्रश्न में दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो यह कहना कि आजकल की दुनिया खराब हो गई है, इस बुनियादी भ्रम पर खड़ा हुआ है कि पहले की दुनिया अच्छी थी। यह बात इतनी बुनियादी रूप से गलत है जिसका कोई हिसाब नहीं। पहले की दुनिया भी आज से अच्छी नहीं थी। आज का आदमी खराब हो गया है, इससे ऐसा ख्याल पैदा होता है कि पहले का आदमी बहुत अच्छा था। शायद आपको पता नहीं कि इस तरह के ख्याल के पैदा हो जाने का कारण क्या है।

जमीन पर जो पुरानी से पुरानी किताबें उपलब्ध हैं, सबसे पुरानी किताब चीन में उपलब्ध है, जो कोई छह हजार वर्ष पुरानी है। उस पुरानी किताब में भी यह लिखा हुआ है कि आज की दुनिया खराब हो गई है, पहले के लोग बहुत अच्छे थे। ये पहले के लोग कब थे? आज तक एक भी ऐसी किताब नहीं मिली है, जिसने यह कहा हो--अभी के लोग अच्छे हैं, जो लोग मौजूद हैं, ये अच्छे हैं। अब तक मनुष्य-जाति के पास ऐसा एक भी उल्लेख नहीं, जो यह कहता हो--अभी के लोग अच्छे हैं। पहले के लोग अच्छे थे। ये पहले के लोग कब थे? बुद्ध और महावीर यह कहते हैं कि जमाना खराब हो गया, लोग बुरे हैं, पहले के लोग अच्छे थे। क्राइस्ट यह कहते हैं कि लोग बुरे हैं, पहले के लोग अच्छे थे। ये पहले के लोग कब थे? और अगर अच्छे लोग जमीन पर थे, तो अच्छे लोगों से बुरे लोग पैदा कैसे हो गए? वह अच्छी संस्कृति से बुरी संस्कृति पैदा कैसे हो गई? उस अच्छे से विकार कैसे पैदा हो गया?
नहीं, सच्चाई कुछ और है। सच्चाई बिल्कुल उलटी है। अगर पहले के लोग अच्छे थे तो युद्ध कौन करता था? हिंसा कौन करता था? पुरानी से पुरानी युद्ध की कथा हमारी महाभारत की है, वे लोग अच्छे लोग थे? अपनी पत्नियों को दांव पर लगाने वाले लोग अच्छे थे? आज एक साधारण आदमी भी अपनी पत्नी को दांव पर लगाने में दो दफा विचार करेगा, सोचेगा--यह उचित है? लेकिन उस समय, जिसको हम कहें कि जो धर्म का बहुत विचारशील आदमी था, वह भी विचार नहीं कर रहा है पत्नी को दांव पर लगाते वक्त। जुआ खेलने में कोई संकोच नहीं हो रहा है उसे। अपने ही भाई की पत्नियों को नंगा करने में किसी को कोई संकोच नहीं हो रहा है बीच सभा में। और वहां जो लोग बैठे हैं, वे बड़े विचारशील हैं, धर्म के ज्ञाता हैं, वे भी बैठे देख रहे हैं। ये लोग अच्छे थे? तो फिर महाभारत क्यों हो गया? इतना संघर्ष, इतना रक्तपात क्यों हो गया, अच्छे लोग थे तो?
अच्छे लोग एक मिथ, एक कल्पना और कहानी है। नहीं तो बुद्ध ने किन लोगों को समझाया कि चोरी मत करो? महावीर ने किनको समझाया कि हिंसा मत करो? अगर लोग अहिंसक थे, तो महावीर पागल थे, ढाई हजार साल पहले किसको समझा रहे थे कि चोरी मत करो, हिंसा मत करो, दूसरे की स्त्री पर बुरी नजर मत रखो? लोग रखते होंगे, तभी तो समझा रहे थे, नहीं तो समझाएंगे कैसे? यह ब्रह्मचर्य का उपदेश किसको दे रहे थे? अगर सारे लोग ब्रह्मचर्य को मानते थे, तो ब्रह्मचर्य का उपदेश किसके लिए था? और अगर सारे लोग ईमानदार थे, तो ईमानदारी की शिक्षाएं हमारे ग्रंथों में क्यों लिखी हुई हैं? किसके लिए लिखी हुई हैं? लोग बेईमान रहे होंगे, तब तो ईमानदारी की शिक्षा की बात लिखी है ग्रंथों में, नहीं तो कौन लिखता? जरूरत रही होगी जिंदगी को कि ईमानदारी कोई सिखाए। लोग बेईमान रहे होंगे, लोग हत्यारे रहे होंगे, लोग चोर रहे होंगे, तब तो अचौर्य समझाया जा रहा है, अहिंसा समझाई जा रही है। और लोग एक-दूसरे को घृणा करते रहे होंगे, तब तो प्रेम के इतने उपदेश दिए गए हैं, नहीं तो किसको दिए जाते?
लेकिन भ्रम कुछ और बातों से पैदा हो जाता है। हर युग में अच्छे लोग होते हैं। उन थोड़े से अच्छे लोगों की कथा बच रहती है, बाकी लोगों के जीवन का कोई हिसाब नहीं बचता। हमारे युग में गांधी थे। दो हजार साल बाद, हम जो लोग बैठे हैं, हमारी कोई कथा बच रहेगी? लेकिन गांधी की बच रहेगी। और दो हजार साल बाद लोग गांधी को कहेंगे, इतना अच्छा आदमी था, उस युग के लोग कितने अच्छे रहे होंगे! गांधी से वे सारे युग को तौल लेंगे, जो कि बिल्कुल झूठी तौल होगी। गांधी अपवाद था, नियम नहीं था। और दो हजार साल बाद, जब हम सबकी कोई कथा शेष नहीं रह जाएगी और गांधी की कथा शेष होगी, तो गांधी के आधार पर हम सबके बाबत जो निर्णय लिया जाएगा, वह बिल्कुल झूठा होगा। हम तो गांधी के हत्यारे हैं। लेकिन दो हजार साल बाद लोग कहेंगेः गांधी इतना अच्छा आदमी था, उसके समाज के लोग कितने अच्छे नहीं रहे होंगे!
तो राम और कृष्ण, बुद्ध और महावीर, दो-चार नामों के आधार पर हम उस जमाने के लोगों के बाबत सोचते हैं। वह सोचना बिल्कुल फैलेसी है, बिल्कुल झूठ है। ये आदमी अपवाद थे। ये नियम नहीं थे। जहां तक सामान्य आदमी का संबंध है, आदमी विकसित हुआ है, उसका पतन नहीं हुआ है, उसका कोई ह्नास नहीं हुआ है। आदमी, सामान्य आदमी विकसित हुआ है। उसके जीवन में पीछे के आदमी से गति हुई है, उसके विचार में गति हुई है, उसकी चेतना में विकास हुआ है।
कई कारणों से यह बात कही जा सकती है। मैं कोई कारण नहीं देखता हूं कि लोग पहले से बुरे हो गए हैं। लोग पहले से भले हो गए हैं।
मैं तीन दिन से जो बातें कह रहा हूं, अगर ये ही बातें मैंने दो हजार साल पहले कही होतीं, आप मेरी हत्या कर देते। आप ज्यादा बेहतर आदमी हैं, दो हजार साल पहले के आदमी से।
क्राइस्ट ने ऐसी कौन सी बात कह दी थी जिसकी वजह से लोगों ने क्राइस्ट को सूली पर लटका दिया? जो क्राइस्ट ने कहा था, तीन दिनों में मैंने उससे बहुत ज्यादा तीखी और आपको चोट पहुंचाने वाली बातें कही हैं, लेकिन आपमें से किसी ने पत्थर भी नहीं मारा, फांसी लगाने की तो बात दूसरी है।
क्राइस्ट के पास जो लोग थे, उनसे आप बेहतर आदमी हैं। सुकरात को जिन लोगों ने जहर पिलाया था, उनसे आप बेहतर आदमी हैं। जितना पीछे हम लौटते हैं, आदमी विचारपूर्ण नहीं है, आदमी अत्यंत अंधा है, अत्यंत अविचारपूर्ण है। विचार विकसित हुआ है, विचार आगे गया है, मनुष्य की चेतना ने नई-नई बातें विचार की हैं, नये स्पर्श किए हैं, नये अनुभव किए हैं, नई दिशाएं खोली हैं।
थोड़ा सोचें, हमारी सदी पहली सदी है, जिसने युद्ध के विरोध में सामूहिक आवाज दी है। आज तक युद्ध स्वीकृत था। पिछली किसी भी सदी ने यह नहीं कहा कि युद्ध पाप है। यह पहला मौका है कि इन दो महायुद्धों के बाद सारी दुनिया में जो भी विचारशील है, वह कह रहा है, युद्ध पाप है। आज युद्ध के विरोध में जितनी चेतना है, उतनी दुनिया में कभी भी नहीं थी। आज हिंसा के विरोध में जितनी चेतना है, उतनी कभी भी नहीं थी। आज जितना भाईचारा सारे जगत में मनुष्य-मनुष्य के बीच पैदा हुआ है, उतना कभी नहीं था। आज जितना उदार है मनुष्य, उतना कभी भी नहीं था। आज जितने उसके हृदय के द्वार दूसरों के लिए भी खुले हैं, उतने कभी भी नहीं खुले थे। जितना हम पीछे लौटते हैं, उतना नैरो माइंडेड, उतना संकीर्ण आदमी उपलब्ध होता है।
लेकिन आप कहेंगे कि नहीं, पहले का आदमी कम चीजों से तृप्त हो जाता था, उसे बहुत चीजों की जरूरत नहीं होती थी, वह अपरिग्रही था। आज बहुत चीजों की जरूरत है।
यह बात भी एकदम गलत है। चीजें नहीं थीं, यह बात दूसरी है, लेकिन चीजों से तृप्ति कम चीजों में थी, यह बात झूठ है। चीजें नहीं थीं, यह मैं मानता हूं। बुद्ध के समय में किसी आदमी को कार रखने का परिग्रह और वासना पैदा नहीं होती थी, इसका कारण यह मत समझ लेना कि कार के प्रति उसका त्याग था। कार नहीं थी। जो चीजें मौजूद थीं, उनके लिए वह दौड़ में खड़ा हुआ था हमेशा। उन चीजों के लिए कोई इनकार नहीं था उसके मन में। जो चीज नहीं थी, उसकी तो कामना वह नहीं कर सकता था। आज के आदमी का भोग बढ़ गया है, यह बिल्कुल ठीक नहीं है। हां, उसके पास भोग के साधन बढ़ गए हैं, यह जरूर ठीक है। पिछले आदमी के पास भोग के साधन कम थे। जो थे, उन्हीं में वह विचार करता था, उन्हीं में खोज करता था, उन्हीं को पाने की कोशिश करता था। आदमी वही है, उसके पास साधन बढ़ गए हैं। लेकिन इससे कोई आदमी का पतन नहीं हो गया है, बल्कि जिस आदमी ने ये साधन बढ़ाए हैं, वह उसकी उन्नत बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं, उसके ज्यादा सोच-विचार और खोज के परिणाम हैं, प्रकृति के ऊपर उसके ज्यादा नियंत्रण की सूचना हैं, प्रकृति के रहस्यों को जानने में उसकी ज्यादा गति के प्रतीक हैं।
और हम सोचते हैं कि पहले के लोग ज्यादा ईमानदार थे, ज्यादा सच्चाई पसंद थे।
यह किस हिसाब पर आप सोचते हैं? किस कारण से आप यह सोचते हैं? अगर पुरानी कथाएं उठा कर पढ़ें, तो जितनी बेईमानी हो सकती है, उनमें मौजूद है; जितने धोखेधड़ियां हो सकते हैं, वे मौजूद हैं; जितना पाखंड हो सकता है, वह मौजूद है; जितना असत्य हो सकता है, वह मौजूद है; जितनी चालाकियां हो सकती हैं, वे सब मौजूद हैं। कोई फर्क नहीं पड़ा है। हां, एक बात में फर्क पड़ गया है। पहले कुछ लोग चालाकियां करते थे, बाकी लोग, चूंकि उनकी बुद्धिमत्ता बहुत कम विकसित थी, चालाकियों के शिकार होते थे। अब चूंकि बड़े पैमाने पर अधिक लोगों की बुद्धिमत्ता विकसित हुई है, इसलिए थोड़े लोगों को चालाकी करने का मौका नहीं है।
यह थोड़ा विचारणीय है। बुद्धिमत्ता का कम होना ईमानदारी नहीं है। दुनिया में बुद्धिमत्ता विकसित हुई है, इसलिए चालाकी में भी, अगर आप आगे हैं, तो दूसरे लोग भी आगे हैं, वे आपसे पीछे खड़े होने को राजी नहीं हैं। तो शायद आप सोचते हों कि सभी लोग, सभी लोग वही करने लगे हैं, जो कि थोड़े से बुद्धिमान लोग पीछे करते रहे हैं, वह आज हर आदमी करने में समर्थ हुआ है, क्योंकि बुद्धिमत्ता बहुत बड़े पैमाने पर विकसित हुई है, विवेक और विचार विकसित हुआ है।
जैसे उदाहरण के लिए आपसे कहूं, पुरुषों ने नियम बना रखा था कि विधवाएं विवाह नहीं करेंगी, लेकिन पुरुषों ने अपने लिए नियम नहीं बनाया हुआ था कि विधुर विवाह नहीं करेंगे। पुरुष चालाक रहा होगा, बेईमान रहा होगा, होशियार रहा होगा। आज स्त्रियां भी शिक्षित हुई हैं, उनको यह चालाकी साफ समझ में आ गई है कि पुरुष अपने तो विवाह कर सके विधुर होने के बाद और स्त्री न कर सके, यह कैसा हिसाब है? तो स्त्री अगर आज विधवा होकर विवाह करना चाहती है, तो हम कहते हैंः देखो, कितना पतन हो गया, विधवा विवाह कर रही है! यह सिर्फ स्त्रियों की बुद्धिमत्ता विकसित हुई है और आपकी चालाकी अकेली नहीं चल सकती, तो आज आपको लगता है--यह स्त्री कैसी, देखो पतित हो गई! कभी स्त्रियों ने सोचा था कि विधवा और विवाह करेगी? और आप कैसे विवाह करते रहे थे? स्त्री भी पुरुष के समकक्ष खड़ी हो गई है विचार करने में, तो आज कठिनाई हो रही है पुरुष को।
तीन हजार वर्ष तक हिंदुस्तान में करोड़ों हरिजनों को हमने सताया, शूद्रों को सताया। जो बुद्धिमान थे, उन्होंने उनको जमीन पर लिटा रखा, उनकी छाती पर बैठे रहे। उनके साथ जो भी अनाचार किया जा सकता था, किया गया। उन्हें जिस भांति हीन किया जा सकता था, किया गया। उनके भीतर की मनुष्यता की जिस भांति हत्या की जा सकती थी, वह की गई। न उन्हें ज्ञान, न उन्हें विचार के विकास का कोई मौका दिया गया। आज वे भी बुद्धिमान हो गए हैं। वे इनकार कर रहे हैं कि अब यह आगे नहीं चलेगा। तो हम कहते हैंः जमाना कैसा बिगड़ गया! वर्ण-धर्म सब छूटा जा रहा है। यह शूद्र देखो, यह हमारे साथ खड़े होने की हिम्मत कर रहा है, धक्का देकर हमारे साथ खड़ा होना चाहता है। आपने तीन हजार वर्ष तक क्या किया था उसके साथ? वह ईमानदारी थी? वह नैतिकता थी? वह धर्म था? तो आज उसके मन में विद्रोह खड़ा हो गया, आज उसकी बुद्धिमत्ता, वह भी जाग गया, उसके बच्चे भी सोचने लगे हैं, तो आपको लग रहा है कि सारा वर्ण-धर्म नष्ट हो गया! हे भगवान, यह कलियुग आ गया!
यह कलियुग नहीं आ गया है। ये जितनी मूढ़ताएं और जितने शोषण हम चलाते रहे थे, उनकी मृत्यु का वक्त आ गया है। इसलिए सारी परेशानी खड़ी हो गई है। हर जगह परेशानी खड़ी हो गई है। एक ढांचा था हमारा, वह ढांचा टूट रहा है, तो हम परेशान हैं, हम कहते हैं, दुनिया बड़ी बुरी हुई जा रही है। दुनिया बुरी नहीं हो रही, बल्कि दुनिया में बहुत सी बुराइयां चल रही थीं, उनको तोड़ने का ख्याल आदमी के सामने स्पष्ट हो गया है। अब वे बुराइयां नहीं चल सकेंगी। इसलिए उन बुराइयों से जो लोग फायदा उठा रहे थे, जिनका स्वार्थ उनसे तय हो रहा था, वे सब परेशान हो गए हैं। और वे सारे जमाने को गाली दे रहे हैं, सारे बच्चों को गाली दे रहे हैं, नये युवकों को गाली दे रहे हैं, नई पीढ़ी को गाली दे रहे हैं।
लेकिन मैं आपसे निवेदन करता हूं, हमने हजारों सालों में जो-जो किया है आदमी के साथ, बड़ा बेहूदा था, उसको तोड़ने का ख्याल आया, क्योंकि सारे लोगों के पास विचार पहुंचे, ख्याल पहुंचे, जागृति आई, चेतना आई।
मनुष्य की चेतना निरंतर विकसित हो रही है। और यह उचित भी है परमात्मा के जगत में कि चेतना निरंतर विकसित हो। विकास जीवन है। पतन का क्या कारण है वहां? कोई वजह नहीं है।
आपको पता है, आज बिहार में आपका आदमी भूखा मर रहा है, इंग्लैंड, अमेरिका और रूस के बच्चे अपनी जेबों से पैसा काट कर बिहार के आदमी को भोजन भेज रहे हैं। यह आदमी का विकास है कि पतन? यह कल्पना के बाहर था आज से हजार साल पहले कि एक कौम में कोई भूखा मरे और दूसरी कौम उसकी फिकर करे। दूसरी कौम कहतीः बहुत अच्छा हुआ, मर जाओ बिल्कुल, तो हम तुम्हारी पूरी जमीन पी जाएं, हड़प जाएं।
आज सारी जमीन पर आदमी-आदमी के प्रति एक अभूतपूर्व संबंध पैदा हुआ है, जो कभी नहीं था। पुराने दिन तो ये थे कि एक हिंदू मुसलमान को छूता तो स्नान करता। तो इस मुसलमान के मरने से हिंदू क्या फिकर करने वाला था? मर जाए यह। लेकिन आज बिहार में जो अनजान लोग मर रहे हैं, क्या मतलब है किसी किसान को जो हालैंड में काम करता हो? क्या प्रयोजन है किसी बच्चे को जो बेल्जियम में पढ़ता हो? क्या मतलब है उसे कि बिहार में कोई मर रहा है? मर जाए। उदयपुर के आदमी को उतनी फिकर नहीं है बिहार के आदमी की, जितना अमेरिका का किसान सोच-विचार में पड़ा हुआ है कि उसे कुछ भेजे। आज अमेरिका में चार किसानों में से एक किसान जितना पैदा कर रहा है, वह हिंदुस्तान आ रहा है। और यह बात जानते हुए कि हिंदुस्तान के नासमझ लोग गाली देते रहेंगे कि ये भौतिकवादी हैं, पापी हैं और हम आध्यात्मिक हैं, यह जानते हुए यह आ रहा है। हम गाली दिए जा रहे हैं सारी दुनिया को और वह सारी दुनिया हमारे लिए हर तरह की चिंता किए जा रही है। यह कभी पिछले दिनों में संभव हुआ था? यह कभी संभव हो सकता था? यह संभव हुआ है।
लेकिन हमें यह पीछे का रोग क्यों पकड़ता है कि पीछे सब अच्छा था?
इसके कुछ बुनियादी मनोवैज्ञानिक कारण हैं। पहला कारण तो यह है, पहला बुनियादी कारण तो यह है, यह थोड़ा सोचने-समझने जैसा जरूरी है। हर आदमी का मन बचपन में आनंद को अनुभव करता है। बचपन में न तो चिंता होती है, न फिकर होती है। मां-बाप फिकर करते हैं, चिंता करते हैं, बच्चा सिर्फ जीता है। कोई दायित्व नहीं, कोई बोध नहीं, कोई भार नहीं। फिर बच्चा बड़ा होता है, जैसे-जैसे जवान होने लगता है, दायित्व बढ़ता है, बोझ बढ़ता है। उसे दिखाई पड़ने लगता है कि बचपन बहुत अच्छा था, अब बड़ी मुसीबत शुरू हो गई। इस भांति उसका चित्त पीछे की तरफ सोचना शुरू कर देता है कि पीछे अच्छा था, अब सब गड़बड़ हो गया। फिर जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, जवान होता है, प्रौढ़ होता है, बूढ़ा होता है, कठिनाई बढ़ती जाती है। उसका चित्त सोचने लगता हैः पीछे सब अच्छा था, अब सब गड़बड़ होता जा रहा है।
एक-एक व्यक्ति को यह अनुभव होता है उसके चित्त में कि पीछे सब अच्छा था, अब सब गड़बड़ होता जा रहा है। यह जो बुद्धि का निर्माण हो जाता है, पीछे सब अच्छा था, यह मोड ऑफ थिंकिंग, यह सोचने का ढंग फिर सारी चीजों में काम करता है और वह कहता है कि पीछे सब अच्छा था और अब सब गड़बड़ हो गया है। इसका संबंध व्यक्तिगत मन की सोचने की विधि से है। हमारा व्यक्तिगत मन बचपन में आनंद अनुभव करता है, बाद में दुख अनुभव करता है, हर आदमी। इसलिए उसके सोचने का ढंग यह हो जाता हैः पहले सब अच्छा था। फिर इस बात को वह हर चीज पर लागू करता है--समाज पर, जीवन पर, संस्कृति पर, सभ्यता पर--पीछे सब अच्छा था। यह उसके चित्त में बैठी हुई बचपन की याद है, जो काम करती है। और इसके आधार पर वह जो नतीजे लेता है, वे नतीजे एकदम भ्रांत और झूठे हैं, उनमें कोई अर्थ नहीं है।
मनुष्य विकसित हो रहा है, मनुष्य आगे जा रहा है, मनुष्य की चेतना निरंतर ऊर्ध्वगामी है। और यही उचित है। परमात्मा के इस जगत में नीचे जाना कैसे संभव है? नीचे जाने की बात अधार्मिक है। मनुष्य तो ऊपर जा रहा है, रोज नये अनुभव उसे और ऊपर ले जा रहे हैं।
लेकिन कुछ लोगों को लग रहा है कि नीचे जा रहा है। उनके निहित स्वार्थ टूट रहे हैं। जिन-जिन के स्वार्थ थे, उनको लग रहा है कि मनुष्य नीचे जा रहा है। जो मंदिर में बैठ कर पूजा करता था, आज मंदिर में कम लोग जा रहे हैं कल की बजाय। जो पादरी चर्च में भाषण करता था, उसके भाषण सुनने लोग नहीं जा रहे हैं। जो किताबें कल तक भगवान की किताबें समझी जाती थीं, लोग समझने लगे कि वे भी आदमियों की किताबें हैं। दुख पैदा हो रहा है, परेशानी पैदा हो रही है। पुरोहित का वर्ग सारी दुनिया में परेशान है, क्योंकि उसका धंधा एकदम विलीन हो रहा है। लोग समझ रहे हैं, भगवान मंदिर में नहीं है। लोग समझ रहे हैं, भगवान जीवन में है। लोग समझ रहे हैं, गंडे, ताबीज, तंत्र-मंत्र नासमझियां हैं। लोग जीवन के सूत्र खोज रहे हैं। लोगों की आंखें खुल रही हैं, कि तुम उनको अब समझाओ कि नरक में सड़ोगे, तो वे विश्वास करने को राजी नहीं हैं। तुम उनको कहो कि स्वर्ग में आनंद मिलेगा, दान करो, तो भी वे विश्वास करने को राजी नहीं हैं।
विश्वास की शक्ति कम हुई है। होगी। जब विचार विकसित होता है, तो विश्वास कम होता है। विश्वास अंधापन है। जब आंखें खुलती हैं, तो कोई आदमी विश्वास नहीं करता, विचार करता है। दुनिया में विचार जग रहा है, विश्वास शिथिल हो रहा है। इसलिए जो लोग विश्वास को धंधा बनाए हुए थे और विश्वास के आधार पर जी रहे थे, वे सब परेशान हो गए हैं।
थाईलैंड में चार करोड़ की आबादी है। चार करोड़ में बीस लाख भिक्षु, साधु। चार करोड़ की आबादी में बीस लाख साधु! थाईलैंड के युवकों ने कह दिया कि आप साधु हो, ठीक, लेकिन खेती-बाड़ी करो, अनाज पैदा करो, मुफ्त हम खाने नहीं देंगे। तो थाईलैंड का साधु कहता हैः जमाना बिल्कुल बिगड़ गया। यह क्या बात कर रहे हो? यह कोई बात करने की है? साधुओं ने कभी काम किया है? साधुओं ने कभी खेती-बाड़ी की है? जूते सीए हैं? कपड़े बुने हैं? साधु यह नहीं करता। तो थाईलैंड कहेगा कि तो फिर साधु मत रह जाओ। लेकिन अब बीस लाख लोगों की पलटन को मुफ्त नहीं पोसा जा सकता। भारी पड़ गई है। चार करोड़ की आबादी में बीस लाख आदमी कितने भारी हो गए हैं? तो वे बीस लाख आदमी चिल्ला कर कह रहे हैं कि जमाने का पतन हो गया। और बीस लाख आदमी जब चिल्ला कर कह रहे हों, तो सबके दिमाग में यह बात पैदा हो जाती है कि पतन हो गया है, जरूर हो गया होगा। लेकिन ये बीस लाख लोग अब जी नहीं सकेंगे।
हिंदुस्तान में भी वही हालत है, सारी दुनिया में वही हालत है। कैथलिक पादरियों की संख्या बारह लाख है। बारह लाख आदमी बिना कुछ किए जी रहे हैं। बारह लाख पादरी हैं सारी दुनिया में, वे मुफ्त जी रहे हैं। उनके आप पैर भी छू रहे हैं, आदर भी दे रहे हैं, भगवान भी मान रहे हैं, वे मुफ्त जी रहे हैं। कुछ क्रिएट नहीं किया, कुछ पैदा नहीं कर रहे हैं। एक ही काम करते हैं, वक्त आ जाए तो लड़वाने का काम करते हैं। प्रोटेस्टेंट से लड़ो, तो कैथलिक पादरी लड़वाने का काम करता है; मुसलमान से लड़ो, तो लड़वाने का। एक धंधा है पादरी के पास कि लड़वाने का वक्त आ जाए तो वह भाषण देता है कि लड़ो! और समझाता है कि अगर धर्म के युद्ध में मर गए, तो मोक्ष बिल्कुल निश्चित है। और पागल होते हैं जो इस मोक्ष की आशा में मर भी जाते हैं।
अब ये बारह लाख पादरी परेशान हैं, क्योंकि इंग्लैंड और यूरोप और अमेरिका में लड़के उनसे कह रहे हैं कि अब यह आगे नहीं चलेगा, यह आखिरी वक्त है, यह आखिरी पीढ़ी है जो तुमको चलने दे रही है। यह फौज-फांटा हम नहीं पाल सकते, इसकी कोई जरूरत भी नहीं है।
चर्च खाली होते जा रहे हैं, इसलिए परेशानी है। क्योंकि जब नहीं आते चर्च में सुनने वाले, तो दान भी नहीं आता है। दान नहीं आता, तो पादरी भी मुश्किल में पड़ता है।
अब नये युवक यज्ञ नहीं करवाएंगे, हवन नहीं करवाएंगे। तो यज्ञ और हवन पर जो जी रहे थे, वे क्या कहेंगे? वे कहेंगेः अधर्म आ गया, धर्म के दिन चले गए, न लोग यज्ञ करते हैं, न हवन करते हैं।
सच्चाई यह है कि यज्ञ और हवन करने वाले लोग नासमझ थे। उनके पास विचार की कोई शक्ति नहीं थी, कोई वैज्ञानिक बुद्धि नहीं थी, इसलिए उनका कोई भी शोषण कर रहा था। अब यह तो वक्त नहीं रहा। तो बीच में आने वाले पचास वर्षों में यह होगा कि सारी दुनिया में एक अव्यवस्था मालूम पड़ेगी, जो व्यवस्था थी वह टूट जाएगी। और जब कोई पुरानी व्यवस्था टूटती है और नई व्यवस्था निर्मित होती है, तो बीच में एक संक्रमण का वक्त होता है, जो बड़ी पीड़ा का और तकलीफ का होता है। हम सारी दुनिया में उसी वक्त से गुजर रहे हैं, संक्रमण का एक समय है। जब हमने पुराना मकान तो गिरा दिया है और नया अभी बना रहे हैं, तो बीच में थोड़ी तकलीफें झेलने का वक्त है। लेकिन दुनिया किसी बुरे रास्ते पर नहीं है। विचार उसे भले रास्ते पर ले जा रहा है। और अगर कहीं कोई दिखाई पड़ती हो बुराई, तो मेरा कहना है कि वह पिछली ही पीढ़ियों से पैदा हुई है, पिछली ही संस्कृतियों से पैदा हुई है।
जैसे हम देख रहे हैं, यह बात सच है, आप कहेंगे कि दिखाई पड़ता है कि आदमी नैतिक नहीं रह गया, झूठ बोलता है, धोखा करता है, पाप करता है। ये पूछे हैं सारे प्रश्न कि यह आदमी करता है। तो आप सोचते हैं आदमी बुरा हो गया है?
मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि अब तक आपने आदमी को पाप से रोकने के लिए जो उपाय किए थे, वे उपाय गलत थे। अब तक फियर सिर्फ एक उपाय था। धार्मिक लोगों ने भय, भय के आधार पर दुनिया में पाप रोकने की कोशिश की थी। घबड़ाया था लोगों को कि नरक में डलवा देंगे, कड़ाहों में जलाए जाओगे, यह होगा, वह होगा, जन्म-जन्म तक कुत्ते हो जाओगे, बिल्ली हो जाओगे, योनियां बदल जाएंगी, कष्ट भोगोगे, चौरासी करोड़ योनियों में भटकोगे, फिर मनुष्य हो पाओगे। ऐसी-ऐसी घबड़ाहट और फियर पैदा किया था। और इसी भय के आधार पर उसको अच्छा बनाया था कि चोरी मत करो, बेईमानी मत करो। भय के आधार पर नीति खड़ी की गई थी। जब तक लोग अंधे थे, उस नीति ने काम किया। अब लोग विचार करने लगे। और विचार में उनको दिखाई पड़ने लगा कि यह नरक है भी या नहीं? भय के जो मुद्दे थे, वे विचार के सामने टूट गए। तो अब उस आदमी को आप कहिए कि नरक चले जाओगे अगर चोरी की, तो वह कहता है कि कोई हर्जा नहीं, चले जाएंगे, आप फिकर मत करो। क्योंकि नरक का हमें कोई पक्का भरोसा नहीं कि है। तो अब वह चोरी कर रहा है। आपका पुराना ढंग जो था, वह व्यर्थ हो गया और आपको नया ढंग सूझ नहीं रहा कि वह चोरी से कैसे बचे।
पांच हजार साल तक केवल भय के आधार पर हमने आदमी को बेईमानी और चोरी करने से रोका। वह आधार नासमझ लोगों में चल सकता था, समझदार लोगों में नहीं चल सकता। तो फिर अब क्या हो? हमारा आधार गलत था, इसलिए लोग अनैतिक दिखाई पड़ रहे हैं। नये आधार रखने होंगे। भय आधार नहीं हो सकता। फियर के आधार पर कोई आदमी कभी नैतिक नहीं होता है। चौरस्ते पर एक पुलिसवाला खड़ा हुआ है और आप वहां से निकलते हैं और चोरी नहीं करते, तो आप यह मत सोचना कि आप नैतिक हैं। लेकिन चौरस्ते पर कोई पुलिसवाला नहीं है और आप चोरी नहीं करते, तो ही आप समझना कि आप नैतिक हैं। अदालतें, कानून, पुलिस, सब रोकते हों, तो आप चोरी नहीं करते, इससे कोई नैतिकता का संबंध नहीं है, सिर्फ भय है।
तो हमने बहुत भय खड़े किए। चौरस्ते पर पुलिसवाला खड़ा है, फिर अदालत है, फिर नीचे नरक है और फिर ऊपर सुप्रीम कांस्टेबल है भगवान, वह सबसे बड़ा पुलिसवाला, वह ऊपर से देख रहा है, नजर रखे हुए है हरेक को कि किसी ने चोरी की, तो उसको फिर सजा दिलवानी है, नरक में डालना है। वह यही धंधा कर रहा है बेचारा हजारों साल से। बहुत ऊब गया होगा, परेशान हो गया होगा। उसकी तो कोई गति नहीं, उसका कोई ट्रांसफर भी नहीं होता, उसकी कोई बदली नहीं होती, वह कोई रिटायर नहीं होता। वह भगवान ऊपर बैठा हुआ है और एक-एक आदमी का पाप देख रहा है। कितने आदमी, और कितने आदमी मर चुके, और वह पाप देखते-देखते कितना नहीं घबड़ा गया होगा, पागल नहीं हो गया होगा, उसको हम ऊपर बिठाए हुए हैं। यह हमने आदमी को घबड़ाने के लिए सारा इंतजाम किया। और इस घबड़ाहट में, इस डर में आदमी अगर थोड़ा सा नैतिक मालूम पड़ता था, वह नैतिकता झूठी थी। आज यह सारा भय छूट गया। मनुष्य को उदय हुआ विचार, उसने चीजें देखीं और सोचीं, उसे लगा कि ये मामले सच्चाई के नहीं हैं, कल्पना के हैं। और कल्पना के हैं।
आपको पता है, तिब्बतियों का नरक कैसा होता है? और हिंदुओं का नरक कैसा होता है? हिंदुस्तान में हम गर्मी से परेशान हैं, तो हमने नरक में गर्मी का इंतजाम किया हुआ है--आग जल रही है, कड़ाहे जल रहे हैं, तेल खौल रहा है। लेकिन तिब्बत? तिब्बत ठंड से परेशान है, तो अपने पापियों के लिए अगर गर्म जगह भेज दें तो पापी बहुत प्रसन्न हो जाएंगे। तो उन्होंने इंतजाम किया है कि वहां ऐसी बर्फ है जो कभी गलती ही नहीं, बर्फ ही बर्फ है तिब्बतियों के नरक में। और उस नरक में डाल देंगे, बर्फ ही बर्फ में, ठंडक-ठंडक में मरेगा आदमी। तिब्बतियों के लिए बर्फ का भय हो सकता है, इसलिए तिब्बत के नरक में बर्फ है। हिंदुओं के लिए, भारतीयों के लिए गर्मी का भय है, इसलिए गर्मी का। अगर हिंदू को तिब्बतियों के नरक में भेज दिया जाए, तो वह समझेगा कि किसी एयरकंडीशन दुनिया में भेज दिया गया। वह एकदम आनंदित होकर नाच उठेगा कि लगेगा स्वर्ग आ गया।
लेकिन सारी दुनिया के अगर नरकों का आप विचार करेंगे, तो हैरान हो जाएंगे। हर कौम में जो तकलीफ है, वह तकलीफ नरक में पैदा कर दी है। वही तकलीफ नरक में पैदा कर दी है--भय देने के लिए। और स्वर्ग में? स्वर्ग में प्रलोभन दे दिया है। भय का उलटा प्रलोभन है। जो लोग अच्छे काम करेंगे, उनको स्वर्ग भेज देंगे। और स्वर्ग में क्या होगा? अरब के मुल्कों में, क्या वायदा किया गया है मुसलमान मुल्कों में? वायदा किया गया है कि स्वर्ग में शराब के झरने बह रहे हैं। हद्द हो गई! यहां हम समझाते हैं लोगों को कि शराब मत पीओ! जो शराब नहीं पीएगा उसको स्वर्ग में शराब की नदियां बह रही हैं, पीए, नहाए, डूबे, जो करना हो करे, यह प्रलोभन है।
जमीन पर स्त्रियों के लिए हम कहते हैं कि स्त्रियों से बचना, संयम रखना। लेकिन स्वर्ग में हमने अप्सराओं की व्यवस्था कर दी है। और अप्सराएं, जो लोग स्त्रियों से यहां बचेंगे, उनको मिलेंगी। और वे अप्सराएं बहुत अच्छी होंगी। यहां की स्त्रियां तो आखिर बूढ़ी हो जाती हैं, अप्सराएं कभी बूढ़ी नहीं होतीं। उनकी उम्र सोलह ही वर्ष बनी रहती है कांसटेंट, उसमें फर्क नहीं पड़ता। उम्र बदलती नहीं, बस सोलह पर टिकी रहती है, अप्सराओं की उम्र सोलह ही रहती है, उसके ऊपर नहीं जाती। ये प्रलोभन हैं हमारे। हद्द बेईमानी, हद्द नासमझी और मनुष्य के साथ खूब खिलवाड़ किया गया है। यह वहां उनको मिल जाएगा। यहां इच्छाओं से बचना, कामनाओं से बचना, वहां हमने कल्पवृक्ष निर्मित कर रखे हैं। उनके नीचे बैठना और जो कामना करो, पूरी हो जाएगी।
तो यहां नरक का भय और स्वर्ग का प्रलोभन, इन दो के बीच हम आदमी की कोशिश किए कि तुम नैतिक हो जाओ। जो आदमी अंधा था, विचारहीन था, वह रुक गया होगा। लेकिन उसका रुकना नैतिकता नहीं है। क्योंकि जिस चीज में भय के कारण हम रुकते हैं, प्रलोभन के कारण रुकते हैं, उसमें हम वस्तुतः नहीं रुकते, हमारा चित्त तो काम करता ही रहता है, करता ही रहता है, ऊपर से हम रुक जाते हैं।
यह नीति खतम हो गई है। और यह अच्छा हुआ है, यह शुभ है। यह नीति गलत आधारों पर खड़ी थी। अब एक नई नीति को जन्म देने का सवाल है। और ये पुराने लोग जो पुरानी नीति के अतिरिक्त सोचने में जरा भी समर्थ नहीं हैं, उनको ऐसा लग रहा है कि आ गया यह तो महाकाल का समय, प्रलय आ जाएगी, अब क्या होगा?
नहीं साहब, प्रलय नहीं आ जाएगी, नई नीति का जन्म होगा। मनुष्य के ऊपर जब संकट खड़े होते हैं, तभी विचार पैदा होता है। अब एक बड़ा संकट, एक बड़ी क्राइसिस पैदा हो गई सारी दुनिया में कि क्या करें, नीति अब कैसे खड़ी हो? भय पर अब खड़ी नहीं हो सकती, प्रलोभन पर अब खड़ी नहीं हो सकती। वे पिटे-पिटाए रास्ते गए, अब बच्चे स्वर्ग-नरक नहीं मानेंगे।
छोटा सा बच्चा मुझसे एक स्कूल का पूछता था कि कहां है यह नरक, मुझे बताइए! मैंने तो पूरी भूगोल पढ़ डाली, उसमें कहीं है नहीं। यह बच्चा उन बूढ़ों से ज्यादा विकसित है जिन्होंने नरक मान लिया होगा चुपचाप। यह ज्यादा विकसित है, इसकी चेतना ज्यादा प्रबुद्ध है। इसकी प्रबुद्ध चेतना के लिए नई नीति चाहिए। उसी नई नीति की मैं आपसे बात कर रहा हूं। वह नीति शांत मन से निकलती है, भयभीत मन से नहीं। जब कोई व्यक्ति चित्त को शांत करता है, तो शांत चित्त अनैतिक होने में असमर्थ हो जाता है। किसी भय के कारण नहीं, किसी प्रलोभन के कारण नहीं, एक आंतरिक बोध के कारण। शांत मनुष्य, विचारवान मनुष्य, जाग्रत मनुष्य अनैतिक होने में असमर्थ हो जाता है। अनैतिकता सोए हुए मन का लक्षण है, इसकी हम तीन दिन से बात कर रहे हैं। सोया हुआ आदमी जो भी करेगा, वह अनैतिक होगा। जागा हुआ आदमी जो भी करेगा, वह नैतिक होगा।
तो जागरण कैसे आ जाए? तो हम जगत में एक नई नीति के जन्म की शुरुआत कर सकेंगे। करनी पड़ेगी, सोचना पड़ेगा, खोजना पड़ेगा कि छोटे-छोटे बच्चे के चित्त को हम कैसे जाग्रत कर सकें।
अभी तो हम भयभीत करते थे। और भयभीत होने से चित्त विकसित नहीं होता, क्रिपिल्ड होता है, ग्रंथि से भर जाता है, दब जाता है। यही तो वजह है कि जिन-जिन कौमों ने बहुत ज्यादा इस तरह की बातें सिखाईं, उन कौमों के बच्चे विकसित नहीं हो पाए। हमारी कौम के बच्चे सबसे कम विकसित हैं। दुनिया में आज किसी भी कौम के बच्चों के सामने हमारे बच्चे कमजोर हैं--बौद्धिक रूप से, शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से, सब तरह से कमजोर हैं। और उसका कुल कारण इतना है कि हमने उनको दबाया, दबाया, कभी हमने उनके चित्त को स्वतंत्रता से विकसित होने का मौका नहीं दिया। हमारे बच्चे वैसे हैं, जैसे एक पौधा पैदा हो और जगह-जगह से हम उसको मोड़ दें, इधर जाओ, इधर जाओ, सब तरफ से शाखाएं उसकी दबाएं, तो आखिर में एक पौधा पैदा होगा पंगु, जिसमें पत्ते तो लगेंगे, लेकिन उनमें जान न होगी, जिसमें डालें तो निकलेंगी, लेकिन वे इतनी घुमाई-फिराई गई होंगी कि बेजान हो जाएंगी। वह कुरूप, अग्लीनेस का एक सबूत हो जाएगा, और कुछ भी नहीं।
तो अब चिंतन सारी दुनिया में है कि मनुष्य का चित्त--ज्ञान, शांति, अभय, इनके आधार पर कैसे नैतिक हो सकता है? हो सकता है। कोई कठिनाई नहीं है। बल्कि सच्चाई यह है कि तभी हो सकता है, और कभी नहीं हो सकता, भय के आधार पर कोई नैतिक नहीं हो सकता। भय खुद ही अनीति है। भय सबसे बड़ी अनीति है। लेकिन हम तो कहते रहे हैं कि गॉड फियरिंग, ईश्वर-भीरु, ईश्वर से डरने वाला धार्मिक होता है। और मैं आपसे यह कहता हूंः जो किसी से भी डरता है, वह कभी धार्मिक नहीं होता। डरने वाला कभी धार्मिक होता ही नहीं। धार्मिक तो वह होता है, जो डरता ही नहीं। अभय, फियरलेसनेस उसका पहला सूत्र है, वही धार्मिक हो सकता है। वही नैतिक हो सकता है, जो अभय को उपलब्ध होता है, जो सारे भय से मुक्त हो जाता है। यह भय की मुक्ति की खोज बच्चों के लिए करनी है।
मनुष्य का ह्नास नहीं हुआ है। एक संस्कृति का, एक सभ्यता का ह्नास हो गया है। और वह गलत थी, इसलिए ह्नास हो गया, और कोई कारण न था। अब मनुष्य बिना संस्कृति के खड़ा है, उसकी नई संस्कृति की खोज का सवाल है। और वे लोग जो पुरानी ही बातों को दोहराए चले जा रहे हैं, वे मनुष्य के इस संकट को मिटाने में सहयोगी नहीं होंगे। क्योंकि वे पुराने ढांचे गलत हो गए थे, इसलिए छोड़ने पड़े हैं। उन्हीं ढांचों को हम वापस आदमी के ऊपर थोपने की कोशिश करेंगे जितनी देर तक, उतनी देर तक नई दिशाएं नहीं खुल सकेंगी।
एक बात स्पष्ट रूप से जान लेना जरूरी हैः एक जमाना मर गया, जो कल तक था। लेकिन उसकी मृत्यु से कोई अहित नहीं हो गया है। एक नया जमाना पैदा हो सकता है, जो कल होगा। इसलिए जो लोग भी थोड़ा सोच-विचार करते हैं, उन्हें खोज करनी चाहिए--कि किन कारणों से पुराना ढांचा मर गया? किन कारणों से? और नया ढांचा किन कारणों से खड़ा हो सकता है और विकसित हो सकता है?
हमारी पुरानी पूरी नीति दमन, सप्रेशन की थी--दबाओ, दबाओ, दबाओ! लेकिन मन को मुक्त करो, खोलो, उसके द्वार खोलो, पहचानो, वह नहीं थी। वह गई। लेकिन यह कोई पतन नहीं है, यह विकास है। मनुष्य ज्यादा सुदृढ़ भूमि पर, ज्यादा आलोकित भूमि पर कदम रख रहा है।
तो मुझे तो ऐसा नहीं दिखाई पड़ता कि आज का आदमी बुरा है कल के आदमी से। मैं तो आशान्वित हूं, आज का आदमी बहुत भला है। और मैं यह भी कहना चाहता हूंः कल का आदमी और भला होगा, परसों का आदमी और भला होगा। विकास आगे की तरफ है, क्योंकि विकास परमात्मा की तरफ है। बीज विकसित हो रहा है आगे की तरफ। केवल वे ही लोग इस विकास में बाधा बनते हैं, जो ढांचों के ऊपर जोर पकड़ लेते हैं।
एक बच्चा घर में पैदा होता है, हम उसको कपड़े पहनाते हैं। फिर बच्चा बड़ा होने लगता है, तो अगर हमारा कपड़ों से बहुत मोह हो, तो हम कहेंगेः यह बच्चा बिल्कुल बिगड़ता जा रहा है, बच्चा बिल्कुल बिगड़ रहा है। कल तक जो कपड़े ठीक आते थे, अब यह गड़बड़ कर रहा है, और कपड़े ठीक नहीं आ रहे हैं। अगर हम कपड़ों के बहुत प्रेमी हों, तो बच्चे की टांग काट देंगे, हाथ काट देंगे, ताकि कपड़े के भीतर रहे, क्योंकि कपड़ा हमने इतनी मुश्किल से बनाया था। लेकिन अगर हम बच्चे को प्रेम करते हैं, तो हम कहेंगेः यह कपड़ा फेंक दो और नये कपड़े बनाओ, बच्चा विकसित हो रहा है।
मनुष्य-जाति विकसित हो रही है, तो जो कपड़े तीन हजार वर्ष पहले उसे पहनाए गए थे, वे तंग हो गए हैं, वे उसके प्राणों में फंदा बन गए हैं। और हम कहते हैंः यह आदमी गड़बड़ हुआ जा रहा है। हमारे सब कपड़े फिजूल हुए जा रहे हैं। हमारी सारी नीति, हमारा धर्म, हमारे शास्त्र फिजूल हुए जा रहे हैं। तो इस आदमी को काटो, छांटो, ताकि कपड़े के भीतर रहे।
नहीं; आदमी गड़बड़ नहीं हुआ है, आपके ढांचे छोटे पड़ गए हैं। ढांचे बदल देने होंगे। आदमी तो विकसित हो रहा है। और आदमी की सारी तकलीफ तभी पैदा होती है, जब वह तो विकसित हो जाता है और ढांचा छोटा रह जाता है। किसी बड़े आदमी को छोटे बच्चे का कमीज पहना दें, तो जैसी हालत हो जाएगी, वैसी हालत पूरी मनुष्य-जाति की आज है। मनु महाराज को हुए हो गए होंगे ढाई हजार, तीन हजार साल। और तीन हजार साल पहले मनु महाराज जो लिख गए, वह आज के आदमी को पहनाया जा रहा है। हद्द नासमझी की बात है! तीन हजार साल में क्या हम भाड़ झोंकते रहे? तीन हजार साल में कोई विचार नहीं किया? आदमी के बाबत नई खोज नहीं की? तीन हजार साल में हमने कुछ भी नहीं जाना? कोई नया अनुभव नहीं कि मनु के आगे हम विकसित हो सकें?
लेकिन नहीं, मनु जो ढांचा दे गए, उस पर हम खड़े हैं। और तकलीफ इसलिए हो रही है कि ढांचा बदलने को हम राजी नहीं हैं। हम इसी के लिए राजी हैं कि चाहे आदमी को बदलना पड़े, ढांचा हम न बदलेंगे। तो फिर तकलीफ खड़ी हो रही है, उससे आदमी के ऊपर हम क्रोधित हो रहे हैं, निंदा कर रहे हैं उसकी और वही बातें दोहराए जा रहे हैं जिनसे आदमी विकृत हो रहा है। छोटे-छोटे बच्चों को हम क्या सिखा रहे हैं? वे ही गलत बातें, जिनकी वजह से आदमी परेशान है, उनको सिखाए जा रहे हैं।

इस संबंध में एक प्रश्न पूछा है, उसकी भी मैं इसी संबंध में बात कर लूं। एक मित्र ने पूछा है कि अगर हम बच्चों को कोई भी शिक्षा न दें, तब तो बच्चे बिगड़ जाएंगे। अगर हम उनको आदर्श न सिखाएं, अगर हम उनको सिद्धांत न सिखाएं, तो वे बिगड़ जाएंगे।

बड़े मजे की बात है कि आप तीन हजार साल से सिखा रहे हैं, फिर भी वे बिगड़ क्यों गए हैं? आदर्श भी सिखा रहे हैं, शिक्षा भी दे रहे हैं, सिद्धांत भी, गीता भी पिला रहे हैं, रामायण, कुरान, बाइबिल भी पिला रहे हैं और फिर भी वे बिगड़ गए? तीन हजार साल से आप क्या कर रहे हैं और?
तो मैं यह नहीं कहता हूं कि कुछ भी न सिखाएं। मैं यह कहता हूं कि उनके ऊपर थोपें नहीं, उनके भीतर जो छिपा है, उसके सहारे बनें, उसे विकसित करें।
दो बातें हैं। एक बच्चे पर हम थोप दें कोई बात, तो बच्चे की आत्मा हमेशा के लिए परतंत्र हो जाती है। और बच्चे के भीतर जो छिपी हुई शक्तियां हैं, उनको सहारा दें, उनको विकसित होने का मौका दें, समझें उस बच्चे को और उन-उन ताकतों को जो उसके भीतर सोई हैं, जगाएं, तो बच्चा विकसित होगा। बच्चे के ऊपर ढांचे नहीं देने होते, उसकी चेतना को दिशा देनी होती है। और हम ढांचे देते रहे हैं।
हम छोटे-छोटे बच्चों को क्या कहते हैं? हम उनसे कहते हैंः महावीर जैसे बनो, बुद्ध जैसे बनो, गांधी जैसे बनो। यह बात एकदम गलत है। कोई बच्चा क्यों महावीर जैसा बने? वह खुद बनने को पैदा हुआ है। कोई महावीर की ट्रू कॉपी बनने को पैदा हुआ है? उसकी जिंदगी अपनी है, वह अपनी आत्मा लेकर आया है, क्यों बने महावीर जैसा? क्यों बुद्ध जैसा बने? क्यों गांधी जैसा बने? वह खुद अपने जैसा बनेगा। लेकिन हम उसे सिखा रहे हैं कि फलां जैसे बनो, उस जैसे बनो। और इस सिखाने का परिणाम यह होगा कि अगर बच्चा बुद्ध, महावीर और राम जैसा बनने की कोशिश में पड़ गया, तो एक बात तय है, वह जो होने को पैदा हुआ था, वह नहीं बन पाएगा। और वही होता उसका विकास, वही होती उसकी आत्मा, वह नहीं हो पाएगा। और जब उसका विकास नहीं हो पाएगा, उसकी आत्मा पूर्णता को नहीं पा पाएगी, तो वह होगा दुखी, पीड़ित, परेशान, चिंतित, हैरान। उसकी समझ में नहीं आएगा कि यह क्या हो रहा है?
और क्या आपको पता है, आज तक जमीन पर कोई एक आदमी दूसरे आदमी जैसा हुआ है? बुद्ध को हुए ढाई हजार साल हो गए, फिर दूसरा बुद्ध क्यों नहीं पैदा हुआ अब तक? ढाई हजार साल कोई कम वक्त है? राम को हुए और भी वक्त हो गया, अब तक दूसरा राम क्यों पैदा नहीं हुआ? कोई कम समय मिला है राम को होने में फिर दुबारा? लेकिन सच्चाई यह है... और हमारी आंखें इतनी अंधी हैं कि हम देखते नहीं, फिर भी हम दोहराए चले जा रहे हैं--राम जैसे बनो, कृष्ण जैसे बनो, क्राइस्ट जैसे बनो। सच्चाई यह है कि कोई आदमी कभी किसी दूसरे जैसा न बन सकता है, न बनने की जरूरत है। हर आदमी यूनीक है, हर आदमी बेजोड़ है, हर आदमी अद्वितीय है। परमात्मा अदभुत कलाकार मालूम होता है, वह एक ही चीज को दुबारा पैदा ही नहीं करता। इतना इनवेंटिव मालूम होता है, इतना आविष्कारक। उसकी आविष्कार की बुद्धि चुकती ही नहीं है। वह एक ढांचे को बनाता है और तोड़ देता है, फिर नये आदमी बनाता है। वह कोई फैक्ट्री नहीं खोली हुई है उसने कि जहां ढांचे लगे हुए हैं, सांचे लगे हुए हैं, एक सी मॉडल की फोर्ड गाड़ियां निकलती जा रही हैं हजारों। एक-एक आदमी अद्वितीय और बेजोड़ है। सृष्टि की अदभुत से अदभुत लीलाओं में यह एक लीला है कि हर आदमी बेजोड़ और अलग है। हर आदमी अपने जैसा है, और किसी जैसा भी नहीं है।
लेकिन हम बच्चों को सिखाते हैंः दूसरों जैसे हो जाओ। यह शिक्षा बुनियादी रूप से गलत है। इसका फल क्या होगा? उस बच्चे का व्यक्तित्व मर जाएगा। उधार होगा उसका व्यक्तित्व। और अगर वह बन भी गया किसी जैसा, तो वह नकल होगी, सच्चाई नहीं। राम तो नहीं बन पाएगा, रामलीला का राम जरूर बन सकता है। और रामलीला के राम की कोई भी जरूरत दुनिया में नहीं है। क्योंकि रामलीला का राम एकदम झूठा आदमी है, एकदम झूठा, उसमें कोई भी मतलब नहीं है। पाखंड इसी से पैदा हुआ दुनिया में, दूसरे जैसे बनने की कोशिश से।
अगर किसी फूलों की बगिया में कोई उपदेशक पहुंच जाए और फूलों को समझाने लगे, गुलाब से कहे कि जुही जैसे हो जाओ; चंपा से कहे, चमेली जैसे हो जाओ; तो क्या होगा उस बगिया में? पहली बात तो यह कि फूल उसकी बात ही न सुनेंगे। फूल इतने नासमझ नहीं हैं जितना आदमी कि हर किसी की बात सुनने लगें। वे उसकी फिकर ही नहीं करेंगे। वह उपदेशक बकता रहेगा, न वे ताली बजाएंगे, न संगठन बनाएंगे। लेकिन हो सकता है कुछ फूल आदमियों के साथ रहते-रहते बिगड़ गए हों। साथ रहने से बुरा परिणाम तो होता ही है। जंगल में जो जानवर रहते हैं, उनको वे बीमारियां नहीं होतीं, आदमी के पास जो जानवर रहते हैं, उनको आदमी की बीमारियां हो जाती हैं। तो आदमी के बगीचों में रहते-रहते कुछ फूल बिगड़ गए हों और उपदेशकों की बातें सुनने लगे हों, तो शायद कुछ फूल सुन लें और मान लें। और चमेली चंपा जैसे होने की कोशिश में लग जाए और गुलाब जुही जैसा होने लगे, तो फिर उस बगिया में क्या होगा? वह बगिया उजड़ जाएगी, उसमें फूल फिर पैदा नहीं हो सकेंगे।
इसलिए नहीं हो सकेंगे फूल पैदा कि गुलाब सिर्फ गुलाब ही हो सकता है। वही उसकी नियति, वही उसकी डेस्टिनी, वही उसका आनंद, वही परमात्मा के द्वारा दिया गया उसका दायित्व है। वह जुही नहीं हो सकता। लेकिन जुही होने की कोशिश में, उसकी सारी ताकत तो लग जाएगी जुही होने की कोशिश में और तब वह गुलाब भी नहीं हो पाएगा, क्योंकि ताकत खर्च हो जाएगी जुही होने में। जुही तो हो नहीं सकेगा और इस जुही होने की कोशिश में गुलाब भी नहीं हो पाएगा। उस पौधे पर फिर फूल नहीं आएंगे। वह बगिया उजड़ जाएगी। और बगिया उजड़ जाएगी, तो उपदेशक कहेगाः देखो, कैसा कलियुग आ गया है, फूल नहीं लग रहे पौधों में! यह जमाना ही खराब है।
यह उपदेशक की करतूत है यह कलियुग। यह जमाना खराब नहीं है, यह बगिया में फूल आते, यह उपदेशक की करतूत है कि फूल बगिया में नहीं आ रहे हैं।
आदमी की जिंदगी पर जो सबसे बड़ा पाप और दुर्भाग्य हो गया है, वह उपदेशकों की अदभुत शिक्षाएं हैं। उन्होंने हरेक को सिखा दिया, किसी और जैसे हो जाओ। फिर कोई आदमी अपने जैसा नहीं हो पा रहा है। आदमी की जिंदगी में फूल आने बंद हो गए हैं।
नई शिक्षा, नई नीति, नया धर्म मनुष्य से कहेगाः तुम भूल कर भी किसी और जैसे होने की कोशिश मत करना। तुम तो खोजना अपने भीतर कि तुम क्या हो सकते हो? क्या तुम्हारे भीतर बीज छिपा है? कौन सी पोटेंशियलिटी है? तुम उसी को विकसित करना, उसी को फैलाना, तुम वही हो जाना। तुम्हारे ऊपर यही दायित्व है परमात्मा का कि तुम वही हो जाना जिसको लेकर तुम पैदा हुए हो। तुम नकल में मत पड़ना, क्योंकि नकल करने वाला आदमी अपनी आत्मा खो देता है।
और हम सब नकल में पड़े हुए हैं। अजीब-अजीब नकलें हैं! और हममें जो जितना नकल करने में कुशल होता है, वह उतना बड़ा नेता हो जाता है, उतना बड़ा ज्ञानी हो जाता है। हममें जो सबसे ज्यादा ईडियट होता है, हममें जो सबसे ज्यादा मूढ़ होता है, वह सबसे ज्यादा नकल कर पाता है। नकल करने के लिए बुद्धिमत्ता की जरूरत नहीं है, नकल करने के लिए बुद्धिहीनता की जरूरत है। जितना बुद्धिहीन आदमी हो, उतनी नकल कर सकता है। क्योंकि उसे कोई सोच-विचार ही पैदा नहीं होता। अगर महावीर नग्न खड़े हैं, तो वह भी नग्न खड़ा हो सकता है। लेकिन महावीर की नग्नता उनका अपना फूल है, वह उनके अपने भीतर की जिंदगी है, वह उनकी अपनी इनोसेंस, अपने निर्दोष चित्त से आई हुई बात है। वह उनका अपना व्यक्तित्व है, वह नग्नता उनके फूल की अपनी सुगंध है। दूसरा आदमी नंगा खड़ा हो जाए, तो महावीर की नग्नता और इसकी नग्नता एक हो जाएगी? महावीर की नग्नता निकल रही है उनकी इनोसेंस से, उनकी अपनी निर्दोषता से, और यह आदमी नग्नता का अभ्यास करके खड़ा हो गया। यह सर्कस का आदमी है, इसकी नग्नता बिल्कुल झूठी है। और यह झूठा नंगा आदमी सब तरह की कोशिश करके बिल्कुल महावीर जैसा बन सकता है, बल्कि यह भी हो सकता है कि अगर महावीर और इसको परीक्षा में बिठाया जाए, तो यह पास हो जाए, महावीर फेल हो जाएं। यह इसलिए हो सकता है कि महावीर के लिए जो सहज है, उसमें भूल-चूक भी हो सकती हैं, इससे भूल-चूक हो ही नहीं सकतीं, इसका तो गणित का हिसाब है। इसका तो एक-एक रत्ती-रत्ती हिसाब है।
ऐसा एक दफे हो गया है, इसलिए मैं कह रहा हूं, ऐसी एक परीक्षा हो चुकी है। यूरोप में हंसोड़ अभिनेता है, चार्ली चैपलिन। ख्यातिनाम है, हजारों-लाखों उसको प्रेम करने वाले हैं सारी दुनिया में। चैपलिन का जन्म-दिन था और उसके मित्रों ने जन्म-दिन पर एक समारोह आयोजित किया। और सारे यूरोप और अमेरिका से आमंत्रित किए उन्होंने अभिनेता, जो चार्ली चैपलिन का पार्ट करें। चार्ली चैपलिन का पार्ट करने के लिए एक काम्पिटीशन रखा। दुनिया भर के अभिनेताओं को आमंत्रित किया कि चार्ली चैपलिन का पार्ट करो। जगह-जगह प्रतियोगिताएं हुईं, आखिर में सौ अभिनेता चुने गए और वे लंदन में इकट्ठे हुए। वे सौ अभिनेता चार्ली चैपलिन का पार्ट करेंगे, और उनमें जो सबसे अच्छा पार्ट कर सकेगा चार्ली चैपलिन का, ऐसे तीन अभिनेताओं को तीन बड़े पुरस्कार इंग्लैंड की महारानी देगी।
चैपलिन ने अपने मन में सोचा कि मैं भी दूसरे नाम से भरती क्यों न हो जाऊं? मैं भी दरख्वास्त लगा दूं दूसरे नाम से और प्रतियोगिता में दूसरी नकल से चला जाऊं। कौन पता लगा सकेगा? वहां तो एक से सौ आदमी हैं, मैं उसमें खो जाऊंगा। और पहला पुरस्कार तो मुझे मिल ही जाएगा, क्योंकि मैं असली चार्ली चैपलिन हूं।
उसने झूठे नाम से दरख्वास्त भर दी और प्रतियोगिता में सम्मिलित हो गया। लेकिन जब प्रतियोगिता का फल निकला, तो बड़ी मुश्किल हो गई, उसको नंबर दो स्थान मिला, नंबर एक दूसरा आदमी ले गया। वह असली चार्ली चैपलिन को नंबर दो का पुरस्कार मिला। यह तो बाद में पता चला कि चार्ली चैपलिन खुद भी थे और नंबर दो आए।
इसलिए मैंने कहा कि महावीर की नकल करने वाला साधु, क्राइस्ट की नकल करने वाला पादरी, शंकराचार्य की नकल करने वाला संन्यासी, जीत सकते हैं अगर प्रतियोगिता हो तो, उनसे जो कि मूल थे। क्योंकि यह नकल करना एक कुशलता की बात है।
यह नकल सारी दुनिया में पैदा हुई है। और इस नकल की वजह से, जो असली आदमी का जन्म होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है।
तो मेरा कहना हैः नकल पर खड़ी हुई नीति खतरनाक, आत्मघाती, स्युसाइडल है। अब एक ऐसी नीति को विकसित करना है कि प्रत्येक बच्चे को खुद होने का मौका मिल सके। बच्चों से कहना है कि तुम अपने जैसे होना।
उस मां को, उस पिता को मैं सच्चा मां और पिता कहता हूं, उस गुरु को मैं सच्चा गुरु कहता हूं, जो अपने बच्चों से कहे कि तुम खुद जैसे बनने की कोशिश करना और कभी भूल कर भी किसी और जैसे मत बनना। तो तुम्हारे भीतर एक सुगंध, एक सौरभ, एक गरिमा पैदा होगी, जिसके लिए तुम जमीन पर आए हो। और जिस दिन वह सुगंध तुम्हारे भीतर पैदा होगी, उसी दिन तुम्हारे जीवन में आनंद की घड़ी होगी। उसी सुगंध के आधार पर तुम जान सकोगे उसको जो परमात्मा है, उसके बिना कोई उसे जानता नहीं। खुद को पूरी तरह से विकसित करने पर ही, खुद के जीवन की सारी कलियां जब खिल जाती हैं तभी, खुद का व्यक्तित्व जब पूरी तरह प्रफुल्लित होता है तभी--तभी जीवन में आनंद का, कृतज्ञता का, धन्यता का भाव पैदा होता है। वही धर्म है। और वैसा व्यक्ति अनजाने, अनचाहे, बिना प्रयास के शुभ होता है, मंगलदायी होता है। क्योंकि जो खुद आनंद से भर जाता है, वह दूसरे को दुख देने में असमर्थ हो जाता है।
यह मैं अंतिम बात इस चर्चा में आपसे कहना चाहता हूं। जो खुद आनंद से भर जाता है, वह दूसरे को दुख देने में असमर्थ हो जाता है। और अनीति क्या है? दूसरे को दुख देना। और नीति क्या है? दूसरे को दुख न दे पाना। जो आदमी खुद दुखी है, वह बच नहीं सकता दूसरे को दुख देने से, दुख देगा ही। क्योंकि जो हमारे पास है, वही हम दूसरे को दे सकते हैं। जो हमारे पास नहीं है, वह हम कैसे देंगे? अगर मैं दुखी हूं, तो मैं आपको दुख ही दे सकता हूं। मैं आपको आनंद कैसे दूंगा? कहां से दूंगा? वह मेरे पास नहीं है। तो चाहे मैं कितना ही कहूं कि मैं आपको आनंद देना चाहता हूं, प्रेम देना चाहता हूं, लेकिन अगर मैं दुखी हूं, तो मैं दूंगा दुख। और अगर मैं आनंदित हूं, तो मैं चाहूं भी कि आपको दुख दूं, तो दुख न दे सकूंगा। क्योंकि जो मेरे पास है, वही तो मैं दूंगा।