शुक्रवार, 30 जून 2017

अमृत की दिशा - प्रवचन-06

कोई मानसिक दासता और गुलामी न हो; कोई बंधे हुए रास्ते, बंधे हुए विचार और चित्त के ऊपर किसी भांति के चौखटे और जकड़न न हों, यह पहली शर्त मैंने कही, सत्य को जिसे खोजना हो उसके लिए। निश्चित ही जो स्वतंत्र नहीं है, वह सत्य को नहीं पा सकेगा। और परतंत्रता हमारी बहुत गहरी है। मैं उस परतंत्रता की बातें नहीं कर रहा हूं, जो राजनैतिक होती है, सामाजिक होती है, या आर्थिक होती है। मैं उस परतंत्रता की बात कर रहा हूं, जो मानसिक होती है। और जो मानसिक रूप से परतंत्र है, वह और चाहे कुछ भी उपलब्ध कर ले, जीवन में आनंद को और कृतार्थता को, आलोक को अनुभव नहीं कर सकेगा। यह मैंने कल कहा।
चित्त की स्वतंत्रता पहली भूमिका है। आज सुबह दूसरी भूमिका पर आपसे कुछ विचार करूं। दूसरी भूमिका है--चित्त की सरलता।
पहली भूमिका है: चित्त की स्वतंत्रता।
दूसरी भूमिका है: चित्त की सरलता।

जिनके चित्त जटिल हैं, उलझे हुए हैं, द्वंद्वग्रस्त हैं, वे भी सत्य को जानने में समर्थ नहीं हो सकते हैं। और हमारे चित्त सरल बिलकुल नहीं हैं। हमारे चित्त बहुत जटिल, बहुत उलझे हुए, बहुत द्वंद्वग्रस्त, बहुत विरोधाभासों से भरे, बहुत अराजक हैं। चित्त की यह जटिलता भी बाधा है। क्योंकि जो अपने भीतर उलझा है, वह बाहर आंख कैसे खोल सकेगा? जो अपने भीतर बहुत व्यस्त है और संघर्ष में है, वह सत्य के प्रति उन्मुख कैसे हो सकेगा? जो अपने से लड़ रहा है और अपने ही भीतर खंडित है, वह अखंड को कैसे जान सकेगा?
हम सारे लोग खंडित हैं। अपने ही भीतर बहुत खंडों में विभाजित हैं। और वे सब खंड भी एक-दूसरे के विरोध में खड़े हैं।
क्राइस्ट एक गांव में एक दफा गए। एक युवक उनसे मिलने आया। उस युवक से क्राइस्ट ने पूछा कि तेरा नाम क्या है? इसके पहले कि मैं तुझे कुछ बताऊं, मैं तुझसे पूछ लूं कि तेरा नाम क्या है?
उस युवक ने कहा, माइ नेम इज़ लीजियन। मेरे तो हजार नाम हैं, मैं कौन सा नाम बताऊं? उस युवक ने कहा कि मेरे तो हजार नाम हैं, मैं कौन सा नाम बताऊं?
क्राइस्ट ने कहा, कम से कम तूने एक सत्य तो कहा। दूसरे लोग तो अपना एक ही नाम बताते हैं, जब कि उनके भीतर हजार-हजार आदमी होते हैं।
हर आदमी के भीतर बहुत से आदमी हैं। आप एक भीड़ हैं। आपके भीतर कोई व्यक्ति नहीं है। आप कोई इंडिविजुअल नहीं हैं। आपके भीतर तो एक भीड़ भरी हुई है।
महावीर ने कहा है: मनुष्य बहुचित्तवान है। हम साधारणतः सोचते हैं कि एक ही चित्त है हमारे पास। महावीर कहते हैं, बहुचित्तवान है। अभी आधुनिक खोजें भी कहती हैं, मनुष्य पोलीसाइकिक है। उसमें बहुत से मन एक ही साथ हैं। और आप खुद विचार करें तो दिखाई पड़ेगा, बहुत से चित्त हैं आपके पास। जब आप क्रोध में होते हैं, तो क्या आपके पास वही चित्त है जब आप बाद में पश्चात्ताप करते हैं? पश्चात्ताप करने वाला चित्त बिलकुल दूसरा है; क्रोध करने वाला चित्त बिलकुल दूसरा है। इसीलिए आप बार-बार पश्चात्ताप करते हैं और फिर बार-बार क्रोध करते हैं। जिस चित्त ने पश्चात्ताप किया, उसकी आवाज उस चित्त तक नहीं पहुंची, जो कि क्रोध करता है। अन्यथा, अन्यथा क्रोध बंद हो गया होता। एक ही भूल आप हजार बार करते हैं। और भूल को करने के बाद पछताते हैं, दुखी होते हैं, निर्णय लेते हैं कि अब यह भूल नहीं करूंगा। अगर आप एक ही आदमी होते, आपके भीतर एक ही मन होता, तो निर्णय पूरा हो जाता। लेकिन आपके भीतर बहुत मन हैं। जो मन निर्णय करता है, वह मन अलग है; और जो मन क्रिया करता है, वह मन अलग है। इसलिए आपके निर्णय निर्णय रहे आते हैं और जीवन जैसा है वह वैसा ही चलता जाता है। रात्रि आप तय करके सोते हैं कि सुबह चार बजे उठ आऊंगा; पूरे मन से निर्णय करते हैं कि मैं सुबह चार बजे उठूंगा। सुबह चार बजे कोई आपके भीतर कहता है, पड़े रहो; क्या फायदा है, सर्दी है। आप सो जाते हैं। सुबह उठ कर पछताते हैं और सोचते हैं, यह कैसे हुआ? मैंने तय किया था कि उठूंगा, फिर उठा नहीं। कल जरूर उठूंगा। कल आप फिर पाते हैं, आपके भीतर कोई कह रहा है, क्या फायदा उठने का, सर्दी बहुत है, सोए रहो। यह मन क्या वही है जिसने निर्णय किया था? या कि कोई दूसरा है?
आपका मन बहुत खंडों में विभाजित है। उसमें बहुत टुकड़े-टुकड़े हैं। और इन टुकड़ों के कारण आपके भीतर एक जटिलता पैदा हो जाती है। जिसका मन एक नहीं है, वह जटिल होगा ही। और जटिलता अनंत गुना हो जाती है, क्योंकि एक मन दूसरे मन के विरोध में है।
थोड़ा विचार करें। आपने अपने ही हाथ से ये विरोध खड़े कर लिए हैं। शिक्षा और संस्कार ने मन को खंड-खंड कर दिया है। उसकी अखंडता नष्ट हो गई है। उसका इंटीग्रेशन नहीं है। आप कहते हैं कि आप एक आदमी हैं, क्योंकि आपका एक ही नाम है, एक ही लेबल है। सारे लोग जानते हैं कि आप एक ही आदमी हैं। अपने भीतर खोजें, तो आपको बहुत आदमी वहां मिलेंगे। आपके विरोध में, आपसे भिन्न, अनेक-अनेक आवाजें आपको भीतर सुनाई पड़ेंगी। क्या कभी आपने खयाल किया है? कई बार आप कहते हैं कि मैंने अपने बावजूद ऐसा काम किया। इंस्पाइट ऑफ माइसेल्फ! एक आदमी किसी को क्रोध में मार देता है और बाद में कहता है, मैंने अपने बावजूद मार दिया। यह कैसे पागलपन की बात है? अपने बावजूद कैसे मार सकते हैं, अगर आपके भीतर आपसे विरोधी भी मौजूद न हों?
आपने अनेक बार अनुभव किया होगा, क्रोध जब मैंने किया तो मैं मौजूद ही नहीं था। आपने अनेक बार अनुभव किया होगा, जब मैं वासना से भर गया तो मैं मैं ही नहीं था, न मालूम कौन हो गया था। क्रोध में क्या आप वही होते हैं जो आप शांति में हैं? प्रेम में क्या आप वही होते हैं जो आप घृणा में हैं? नहीं आप होते। आपके चेहरे बदल जाते हैं। आपके भीतर कोई चीज बदल जाती है। आपके भीतर बहुत सी भीड़ है मन की, बहुत से टुकड़े हैं। कोई एक टुकड़ा आपको पकड़ लेता है और आप एक काम कर जाते हैं। उस टुकड़े के हटने के बाद, जैसे कि गाड़ी का चाक घूमता है और उसके आरे, कभी कोई एक आरा ऊपर होता है, कभी कोई नीचे हो जाता है, और आरे बदलते रहते हैं, स्पोक्स बदलते रहते हैं, वैसे ही आपका चित्त है। उसमें बहुत चित्त हैं। कोई चित्त ऊपर होता है, कभी कोई नीचे होता है और इससे जटिलता पैदा हो जाती है।
सरल तो केवल वही हो सकता है जिसके पास एक मन हो। वह तो जटिल होगा ही जिसके पास अनेक मन हैं। और ये अनेक मन भी ऐसे हैं कि इनमें एक-दूसरे का किसी को पता ही नहीं है। यह इसी बात से आपको पता चलेगा कि आपके संकल्प सब अधूरे रह जाते हैं। क्योंकि जो मन संकल्प करता है, वह मन पूरे करते वक्त मौजूद ही नहीं होता।
आपने कितनी बार तय नहीं किया होगा--मैं सत्य बोलूं। समय आता है और आप पाते हैं कि आप असत्य बोल रहे हैं। कितनी बार तय किया है कि मैं सबको प्रेम करूं, और समय आता है और आप पाते हैं कि आप घृणा कर रहे हैं। कितनी बार तय किया है कि सब मेरे मित्र हों, लेकिन आप पाते हैं, समय आता है और अनेक आपके शत्रु प्रतीत होने लगते हैं। आप ही तय करते हैं, आप ही निर्णय करते हैं, फिर इसका विरोध कैसे उठ आता है? जो विरोध उठ आता है, वह आपके भीतर मौजूद है। जिनको आप श्रद्धा करते हैं, उनके ही प्रति मन में अपमान का भाव भी लिए होते हैं। जिनको आप प्रेम करते हैं, उन्हीं को आप घृणा भी करते रहते हैं। जिनको आप सम्मान देते हैं, उनका ही अपमान करने की इच्छा भी मन में बनी रहती है। एक ही साथ आपके भीतर विरोध चलता रहता है। इसलिए आप प्रेमियों को निरंतर लड़ते देखेंगे। उन्हीं को प्रेम करते हैं; उन्हीं से लड़ते हैं; उन्हीं को घृणा भी करते हैं। मित्रों को भी आप देखेंगे; श्रद्धालुओं को भी आप देखेंगे। हमारा एक चित्त का हिस्सा जो करता है, उसके ही विरोध में हमारे चित्त के दूसरे हिस्से खड़े रहते हैं। इसीलिए प्रेम जरा सी देर में घृणा में बदल जाता है।
मैं अभी वहां दिल्ली था। किसी ने मुझसे कहा कि जिसको हम प्रेम करते हैं, उसको तो हम प्रेम ही करते हैं। यह आप कैसे कहते हैं?
मैंने उनसे कहा कि समझ लें कि आप अपनी पत्नी को प्रेम करते हैं। और कल आपको पता चल जाए कि आपकी पत्नी किसी और को प्रेम करती है, फिर क्या होगा? उसी क्षण आपका प्रेम घृणा में बदल जाएगा। और प्रेम क्या कभी घृणा में बदल सकता है? यह तो असंभव है। असल में घृणा भीतर छिपी बैठी थी। ऊपर प्रेम था, पीछे घृणा थी। अगर प्रेम का अवसर निकल गया, प्रेम हट जाएगा, घृणा ऊपर आ जाएगी।
एक फकीर हुई है। राबिया नाम की एक स्त्री हुई। एक अदभुत फकीर औरत हुई। उसने कुरान में पढ़ा कि एक वचन आता है: शैतान को घृणा करो। उसने उस वचन को काट दिया। फिर हसन नाम का एक दूसरा फकीर यात्रा पर निकला। वह उसके झोपड़े में मेहमान हुआ। सुबह-सुबह उसने कहा कि मैं जरा कुरान पढ़ना चाहूंगा। कुरान पढ़ने दी गई। उसने उसमें देखा कि उसमें तो एक लकीर कटी हुई है!
तो धर्मग्रंथ में संशोधन! पवित्र वचनों में संशोधन! उसने कहा, यह किस पागल ने कुरान में संशोधन कर दिया?
उस राबिया ने कहा, मुझे ही करना पड़ा।
क्यों? यह कैसे किया? और यह ग्रंथ तो अपवित्र हो गया।
राबिया ने कहा कि मैं तो बड़ी मुश्किल में पड़ गई हूं। इसमें लिखा है--शैतान को घृणा करो। मैं अपने भीतर सब तरफ से खोजती हूं, वहां कोई घृणा नहीं है। तो अगर शैतान मेरे सामने आएगा, तो मैं घृणा कैसे कर सकूंगी? आखिर घृणा करने के लिए घृणा होनी चाहिए, मौजूद होनी चाहिए। नहीं तो आएगी कहां से? जिस कुएं में पानी नहीं है, उसमें आप बाल्टियां डालेंगे, तो पानी आएगा कहां से? पानी होगा तो आएगा। तो उस राबिया ने कहा, मेरे भीतर घृणा नहीं है, सिर्फ प्रेम है। परमात्मा हो या शैतान हो, अगर दोनों भी मेरे सामने आकर खड़े हो जाएं, तो मैं मजबूर हूं, मैं प्रेम ही कर सकूंगी। दोनों को बराबर ही प्रेम कर सकूंगी। मेरे भीतर घृणा नहीं है। मैंने बहुत खोजा, वहां कोई घृणा नहीं मिलती।
लेकिन आप अपने प्रेम के भीतर खोजें, तो आपको घृणा मिल जाएगी। वह प्रेम के पीछे ही खड़ी है; वह प्रेम की छाया की भांति ही खड़ी है। जिससे आपकी मित्रता है, उसी के लिए आपके मन में शत्रुता का भाव भी खड़ा हुआ है। जिसको आप सम्मान दे रहे हैं, उसका ही अपमान करने का मन भी आपके पीछे ही खड़ा हुआ है। जिसकी आप प्रशंसा कर रहे हैं, उसकी निंदा करने की वृत्ति भी आपके पीछे ही खड़ी हुई है। ये दोनों विरोधी वृत्तियां हमेशा साथ हों, तो चित्त सरल कैसे होगा? और जो चित्त सरल नहीं है, वह कैसे सत्य को जान सकेगा?
सरलता तो अनिवार्य है। सरलता तो परमात्मा को पाने की अनिवार्य शर्त है। यह जो हमारा चित्त जटिल है, इसे समझ लेना जरूरी है। चित्त की जटिलता को, उसके खंड-खंड होने को, उसके टुकड़े-टुकड़े में बंटे होने को और हमारे व्यक्तित्व के अनेक-अनेक विरोधी अंशों को समझ लेना जरूरी है। जो व्यक्ति अपने भीतर अखंड नहीं हो सकता, वह समझ ले, उसकी कोई प्रार्थना, उसका कोई ध्यान, उसका कोई योग, उसकी कोई पूजा सार्थक नहीं है, सब व्यर्थ है। वह किसी मंदिर में जाए और किसी मस्जिद में जाए और किसी भगवान को प्रणाम करे, उसका कोई अर्थ नहीं है। अखंड हुए बिना कोई अर्थ नहीं है। जब आप एक मंदिर की मूर्ति के सामने सिर झुका रहे हैं, तब भी आपके भीतर अश्रद्धा मौजूद है श्रद्धा के साथ ही; आदर के साथ ही अनादर मौजूद है; विश्वास के साथ ही संदेह मौजूद है।
मैं अपने गांव जाता हूं। मेरे एक वृद्ध शिक्षक हैं। उनके यहां मैं हमेशा जाता था। पीछे एक बार सात-आठ दिन गांव पर रुका, तो उनके घर रोज गया। सुबह-सुबह उनके घर जाता। दूसरे दिन उन्होंने खबर भेजी कि मैं उनके घर न आऊं। मैंने उनके लड़के को पूछा कि उन्होंने ऐसी खबर क्यों भेजी है? तो उसने कहा, उन्होंने एक चिट्ठी भी दी है। उस चिट्ठी पर लिखा था कि मेरे घर आते हो तो मुझे बहुत खुशी होती है, मेरे आनंद का ठिकाना नहीं होता। लेकिन मैं चाहता हूं, मेरे घर मत आओ। क्योंकि कल मैं पूजा करने बैठा, और तुम्हारी बातों का यह परिणाम हुआ, कि मैं जब पूजा करने बैठा तो मुझे यह शक होने लगा कि पता नहीं, यह सब मूर्खता तो नहीं है यह जो मैं कर रहा हूं? यह सब आरती उतारना, सब यह बालपन तो नहीं है? और जो पत्थर की मूर्ति सामने रखी है, सच में वह पत्थर ही तो नहीं है? और मैं तीस-चालीस वर्षों से पूजा कर रहा हूं और मेरे मन में संदेह आ गया; मैं डर गया। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूं कि मेरे घर दुबारा मत आना।
मैंने उनको पत्र लिखा कि मैं अब आऊं या न आऊं, जो होना था वह हो गया। और मैं आपसे यह भी प्रार्थना करता हूं कि संदेह मैंने पैदा नहीं किया है। वह निरंतर चालीस वर्ष आपने पूजा की है, लेकिन पूजा के पीछे वह संदेह खड़ा ही रहा है।
श्रद्धा करने से कहीं संदेह नष्ट हुआ है? श्रद्धा ऊपर से थोप लेंगे, संदेह भीतर खड़ा रहेगा। प्रेम करने से कहीं घृणा नष्ट हुई है? प्रेम ऊपर से दिखाएंगे, भीतर घृणा मौजूद रहेगी। आदर देने से कहीं अनादर का भाव नष्ट हुआ है? आदर ऊपर से थोप लेंगे, भीतर अनादर बना रहेगा और आप जटिल होते चले जाएंगे।
इसलिए मैं उस श्रद्धा को कहता हूं कि छोड़ दें जिसके पीछे संदेह मौजूद है। जिस दिन संदेह विलीन हो जाता है, उस दिन जो शेष रह जाती है, उसका नाम श्रद्धा है। इसलिए मैं उस प्रेम को व्यर्थ कहता हूं जिसके भीतर घृणा छिपी है। जिस दिन घृणा विसर्जित हो जाती है, तब जो शेष रह जाता है, वह प्रेम है। इसलिए उस मित्रता का कोई अर्थ नहीं है जिसके भीतर शत्रु होने की संभावना है। जिस दिन शत्रुता का भाव गिर जाता है, उस दिन जो शेष रह जाता है, वह मैत्री की भावना है। इसलिए उस सुख का कोई मूल्य नहीं है जिसके पीछे दुख बैठा हुआ है। जिस दिन दुख विलीन हो जाता है, तब जो शेष रह जाता है, वही आनंद है। लेकिन हम तो निरंतर विरोध से भरे हैं। जो विरोध से भरा है, उसका चित्त जटिल होगा, कांप्लेक्स होगा। जो विरोध से भरा है, उसका चित्त निरंतर कांफ्लिक्ट में और द्वंद्व में होगा।
और बड़े समझ लेने की बात है, जो चित्त निरंतर द्वंद्व करता है, उस चित्त की ज्ञान की क्षमता क्षीण होती जाती है। क्योंकि जो निरंतर द्वंद्व में लगा है, उसकी संचेतना, उसकी कांशसनेस, उसका बोध निरंतर धीमा और फीका होता जाता है। जो निरंतर लड़ाई में लगा है, वह दिन-रात लड़ते-लड़ते धीरे-धीरे बोथला हो जाता है। उसकी संवेदनशीलता, उसकी सेंसिटिविटी कम हो जाती है। जो निरंतर द्वंद्व में है, वह धीरे-धीरे मंदबुद्धि होता चला जाता है। उसका विवेक विकसित तो नहीं होता, क्षीण होता चला जाता है।
यही वजह है कि बच्चे से बूढ़े का मस्तिष्क वस्तुतः तो ज्यादा तीव्र और विकसित होना चाहिए, लेकिन हम देखते हैं, वह क्रमशः क्षीण होता जाता है। शरीर वृद्ध हो सकता है; मन के वृद्ध होने का कोई कारण नहीं है, अगर मन द्वंद्व में न हो। मन अगर कांफ्लिक्ट में न हो, मन अगर जटिल न हो, खंड-खंड बंटा हुआ न हो, खुद के भीतर ही विरोध से न भरा हो, तो मन के बूढ़े होने का कोई कारण नहीं है। मन बूढ़ा हो जाता है निरंतर द्वंद्व के कारण, निरंतर लड़ते रहने के कारण, निरंतर विरोध से भरे रहने के कारण। अपने ही भीतर जो निरंतर विरोध से भरा है, स्वाभाविक है कि वह धीरे-धीरे उसकी क्षमता, उसकी संवेदनशीलता कम होती जाए, क्षीण होती जाए।
हम निरंतर मन में भी वृद्ध होते जाते हैं। जब कि मन के वृद्ध होने का कोई भी कारण नहीं है। और यह जो हमारा द्वंद्व है, यह जो संघर्ष है, यह जो मन का खंड-खंड होना है, यह हमारे ही कारण है। हम ही इसे खंड-खंड में बांट देते हैं। अपने ही अज्ञान में हम अपने को ही तोड़ लेते हैं। कैसे हम तोड़ लेते हैं, उसको थोड़ा समझें, तो यह भी समझ में आ जाएगा कि सरलता क्या है, मन की सरलता कैसे पैदा होगी।
इसके पहले कि मैं उसके विचार में जाऊं, मैं आपको यह कह दूं, साधारणतः जो कहा जाता है कि फलां आदमी बहुत सरल है या साधारणतः जो हमसे कहा जाता है कि सरल होना चाहिए, उस तरह की सरलता को नहीं कह रहा हूं। साधारणतः हमसे कहा जाता है, हमें सरल होना चाहिए। लेकिन इस सरलता को नहीं कह रहा हूं। क्योंकि इस तरह की जो सरलता है, उसके पीछे जटिलता मौजूद रहती है। एक आदमी सरल होने का ढोंग कर सकता है। एक आदमी सरल होने का ढोंग अनेक रूपों से कर सकता है। वह बहुत अच्छे कपड़े न पहने; वह मोटी खादी के सामान्य सीधे-सादे कपड़े पहन ले। हम कहेंगे, बहुत सरल आदमी है। या वह और भी ज्यादा करे, वह सिर्फ एक लंगोटी लगा ले। हम कहेंगे, और भी सरल आदमी है। या और भी करे, वह नंगा ही हो जाए। तो हम कहेंगे, कितना सरल आदमी है। यह सरलता नहीं है। या एक आदमी दो बार खाना न खाए, एक बार खाना खाने लगे। हम कहेंगे, कैसा सरल आदमी है, एक ही बार खाना खाता है। या एक आदमी मांस न खाए और शाकाहार करने लगे। हम कहेंगे, कैसा सरल आदमी है। या एक आदमी धूम्रपान न करे; शराब न पीए; जुआ न खेले। हम कहेंगे, कैसा सरल आदमी है।
इतने से कोई सरल नहीं होता। ये कोई सरलता के कारण नहीं हैं। बल्कि ऐसे आदमी बहुत जटिल होते हैं। क्योंकि ऐसे आदमी ऊपर से सरलता को ओढ़ लेते हैं, भीतर की जटिलता तो नष्ट होती नहीं, वह तो वहां मौजूद रहती है।
मैं एक यात्रा में था और एक संन्यासी मेरे डिब्बे में थे। मैं था और वे थे। जिस स्टेशन से उनको लोग छोड़ने आए थे, तो बहुत लोग उन्हें छोड़ने आए थे। निश्चित ही काफी लोग उन्हें मानते होंगे। वे केवल एक फट्टा बांधे हुए थे एक रस्सी से। एक फट्टा बांधे हुए थे। फट्टी थी और एक रस्सी से उसको बांधे हुए थे। सामान भी उनके पास एक दूसरी फट्टी और थी, एक छोटी सी टोकरी थी, उसमें दोत्तीन फट्टी के टुकड़े थे, दोत्तीन रस्सियों के टुकड़े थे। यही उनका सामान था। लेकिन जब उन्हें लोग विदा करके चले गए, तो उन्होंने अपनी टोकरी उठाई और अपने फट्टी के टुकड़े गिने। मैं अकेला ही था उस कमरे में। मैं उनको चुपचाप देखता रहा। उन्होंने गिन लिए कि जितने उनके टुकड़े थे, उतने हैं। उन्होंने उसको रख दिया। फिर रात वे सो गए। जिस स्टेशन पर उन्हें उतरना था, मुझसे उन्होंने पूछा कि वह कब आएगा? मैंने कहा, वह सुबह छह बजे आएगा। आप बिलकुल चिंतित न हों। और यह डिब्बा उसी स्टेशन पर कट जाएगा, इसलिए कोई चिंता का कारण नहीं, आप मजे से सोएं। लेकिन मैंने देखा, वे तो बारह बजे के करीब फिर उठ कर किसी से पूछ रहे हैं। कोई स्टेशन आया है, वे पूछ रहे हैं कि फलां स्टेशन तो नहीं आ गया? मैंने उनको फिर कहा कि देखिए आप सो जाएं। लेकिन मैंने देखा, तीन बजे के करीब वे फिर किसी स्टेशन पर उठ कर पूछ रहे हैं कि फलां स्टेशन तो नहीं आ गया? मैंने उनको कहा कि देखिए, उस स्टेशन से आप चूक नहीं सकते। यह डिब्बा वहीं कट जाएगा। इसलिए आप बिलकुल निश्चिंत सो जाएं। आप इतने चिंतित क्यों हैं?
ऊपर से वे फट्टा लगाए हुए हैं, भीतर इतनी एंग्ज़ाइटी और ऐसी व्यर्थ की चिंता है।
मैंने सुबह देखा, उनका स्टेशन आने के पहले उन्होंने अपने फट्टे को कस कर बांधा। वह ठीक नहीं मालूम पड़ा। फिर उन्होंने उसे दूसरे ढंग से बांधा। फिर वह भी ठीक नहीं मालूम पड़ा। फिर उन्होंने तीसरे ढंग से बांधा। फिर आईने के सामने खड़े होकर उन्होंने देखा कि वह फट्टा ठीक-ठाक बंध गया।
इसको मैं सरलता कैसे कहूं? यह तो जटिलता है। यह तो उस आदमी से भी ज्यादा जटिल हो गया, जो अच्छे कपड़े पहने हुए है।
यह ऊपर से सरलता का जो ढोंग है, इसका कोई अर्थ नहीं है। यह कोई सरलता नहीं है। सरलता बड़ी दूसरी चीज है। यह वैसा ही है, जैसे कोई कागज के फूल घर में लगा ले। कागज के फूलों में और असली फूलों में बड़ा फर्क है। सरलता लाई नहीं जाती, ऊपर से थोपी नहीं जाती, भीतर चित्त अखंड हो जाए तो सरलता बाहर अपने आप आनी शुरू हो जाती है। और तब आदमी क्या पहनता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; और क्या खाता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; कैसा उठता-बैठता है, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। यह सब अपने आप सरल हो जाता है। भीतर चित्त अखंड हो तो बाहर जीवन में सरलता अपने आप प्रवेश पाने लगती है। भीतर चित्त खंडित हो, तो बाहर कोई कितनी ही सरलता को लाद ले, लादी हुई सरलता कोई सरलता नहीं है। कल्टीवेटेड है, उसका कोई मूल्य नहीं है। ऊपर से थोपी गई है। ऊपर से थोपी गई सरलता का क्यों मूल्य नहीं हो सकता? क्योंकि ऐसी सरलता केवल अभ्यासजन्य होती है; सहज उत्पन्न नहीं होती।
कबीर ने कहा है: साधो! सहज समाधि भली। वह जो सहज उत्पन्न हो और सहज विकसित हो जाए, वही भली है। जो असहज हो, थोपी जाए, अभ्यास किया जाए, वह व्यर्थ है।
मैं एक गांव गया था। एक साधु मेरे मित्र थे। वे वहां संन्यास की तैयारी में लगे थे। मैं जब उनके झोपड़े के पास गया, मैंने देखा, वे अंदर नंगे टहल रहे हैं। खिड़की में से दिखाई पड़ा। फिर मैं द्वार पर गया। मैंने द्वार पर दस्तक दी। जब उन्होंने द्वार खोला, तो वे कपड़ा लपेटे हुए हैं। मैंने उनसे पूछा, अभी खिड़की से मैंने देखा था तो आप नग्न थे। अब आप कपड़ा क्यों लपेटे हुए हैं?
वे बोले, मैं नग्न रहने का अभ्यास कर रहा हूं। आज नहीं कल मुझे नग्न साधु हो जाना है। तो उसका मैं अभ्यास कर रहा हूं। अकेले में अभ्यास करूंगा पहले। फिर कुछ मित्रों के बीच। फिर थोड़ा बाहर निकलूंगा घर के। फिर गांव में। फिर शहर में। इस भांति धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाऊंगा।
मैंने उनसे कहा, आप किसी सर्कस में भर्ती हो जाइए। आपको संन्यास लेने की कोई जरूरत नहीं। आप किसी सर्कस में भर्ती हो जाइए।
यह इसलिए आपसे कहता हूं कि अभ्यास से आई हुई नग्नता वह नग्नता नहीं है, जो महावीर को आई होगी। वह नग्नता अभ्यास से नहीं, इनोसेंस से आई। वह नग्नता प्रैक्टिस नहीं की गई थी। चित्त इतना सरल हो गया, इतना निर्दोष हो गया कि वस्त्र अनावश्यक हो गए, छूट गए। वे वस्त्र छोड़े नहीं गए, वे वस्त्र छूट गए। ऐसे जो नग्नता आ जाए, वह तो अर्थपूर्ण है। और वस्त्र छोड़ कर अभ्यास करके जो नग्नता आए, तो वह तो कोई भी सर्कस में कर सकता है। उसका तो कोई मामला नहीं है, उसकी कोई कठिनाई नहीं है।
एक आदमी इतने-इतने प्रभु के स्मरण से भर जाए कि उसे भोजन का खयाल न आए और दिन बीत जाए और उपवास हो जाए, यह तो समझ में आता है। और एक आदमी चेष्टा करके, अभ्यास करके दिन भर भूखा रह जाए, यह मेरी समझ में नहीं आता। उपवास का अर्थ ही है: परमात्मा के निकट होना, उसके पास रहना, उसके पास। जो उसके पास जिसका चित्त है, उसके कारण अगर भोजन भूल जाए और उपवास हो जाए, तब तो समझ में आता है। अन्यथा फिर साधा हुआ उपवास बिलकुल व्यर्थ हो जाता है, उसका कोई मूल्य नहीं है।
साधा हुआ सभी व्यर्थ हो जाता है। जो आ जाए, उसकी सार्थकता है। साधे हुए की सार्थकता नहीं है। जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, वह आता है, साधा नहीं जाता।
अगर मैं आपके प्रति प्रेम को साध लूं, तो वह प्रेम सत्य होगा? साधा हुआ प्रेम कैसे सत्य हो सकता है? साधा हुआ प्रेम तो अभिनय होगा, पाखंड होगा। आया हुआ प्रेम, मेरे भीतर से प्रेम फूटने लगे, उसके अवरुद्ध द्वार खुल जाएं और मेरे भीतर से प्रेम की धारा बहने लगे, वह तो समझ में आता है। और मैं चेष्टा करूं, प्रयास करूं और आपको प्रेम करूं, तो उस प्रेम का क्या मूल्य होगा? वैसे ही सरलता का भी कोई मूल्य नहीं है, जो साध ली गई हो।
लेकिन हम चारों तरफ लोगों को सरलता साधते हुए देखते हैं। जिसको हम साधु कहते हैं, वह सरलता साधे हुए है। सारी चेष्टा है उसकी। एक-एक बात के लिए नियम और विधि और विधान हैं। कब उठना है? कब सोना है? क्या खाना है? क्या पहनना है? रत्ती-रत्ती उसका हिसाब है। उसकी बड़ी प्लैनिंग है। बेहतर था वह कहीं इंजीनियर होता; बेहतर था कि वह कहीं किसी व्यवस्था में व्यवस्थापक होता, कहीं मैनेजर होता; बेहतर था वह कहीं मशीनें चलाता, उसका मस्तिष्क मशीनों को चलाने में बड़ा योग्य सिद्ध होता। लेकिन वह साधु है। साधु का जीवन स्पांटेनियस होता है। साधु का जीवन साधा हुआ नहीं, सहज होता है। उसके भीतर से जो फलित हो रहा है, वह सहज फलित हो रहा है।
जापान में एक बादशाह हुआ। और उसने लोगों को पूछा कि मैं किसी साधु के दर्शन करना चाहता हूं।
उसके वजीरों ने कहा, साधु के दर्शन! गांव-गांव, सड़क-सड़क साधु ही साधु हैं। कहीं भी जाएं और दर्शन कर लें।
जापान में वैसे ही बहुत भिक्षु हैं। बौद्ध मुल्कों में बहुत भिक्षुओं की संख्या है। कंबोडिया में कोई दोत्तीन करोड़ की तो आबादी है और कोई बीस लाख भिक्षु हैं। वैसे ही जापान में हैं, बहुत भिक्षु हैं। वैसे ही लंका में हैं।
तो बादशाह से उसके वजीरों ने कहा, भिक्षु या साधु की क्या कमी है! अभी चाहें जितनी भीड़ लगा लें।
उसने कहा, नहीं, लेकिन मैं साधु के दर्शन करना चाहता हूं।
उन्होंने कहा कि लेकिन साधु के दर्शन का क्या अर्थ है? सड़क पर आ जाएं, साधु ही साधु हैं।
उसने कहा, अगर ये ही साधु होते, तो मैं तुमसे साधु के दर्शन के लिए नहीं कहता। ये सब मुझे अभिनय करते हुए लोग मालूम पड़ते हैं। एक खास ढंग के कपड़े पहन लेने से, खास ढंग का सिर घुटा लेने से, खास ढंग का झोला लटका लेने से कोई साधु कैसे हो सकता है? ये सब मुझे बड़े इम्मैच्योर, बड़े बचकाने लोग मालूम पड़ते हैं। इनके भीतर अभिनय की वृत्ति है। ये सारे के सारे एक्टर्स तो हो सकते हैं, लेकिन ये साधु कैसे हो सकते हैं?
आप देखें जरा साधुओं को। कोई एक विशेष ढंग का टीका लगाए है; कोई एक विशेष ढंग के कपड़े पहने हुए है; कोई कुछ किए हुए है, कोई कुछ। और फिर उनके पीछे चलने वाले भी ठीक वैसे ही किए हुए हैं। यह सब कितना बचकाना, कितना चाइल्डिश, कितना इम्मैच्योर, कितना अप्रौढ़ मालूम होता है। कोई विचारशील, विवेकशील व्यक्ति ऐसा अभिनय कर सकता है?
गांधी के पास एक संन्यासी ने आकर कहा कि मैं कुछ सेवा करना चाहता हूं। गांधी ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा और कहा, इसके पहले कि तुम सेवा करो, ये गैरिक वस्त्र छोड़ दो। उसने कहा, क्यों? इनसे क्या बाधा है? उन्होंने कहा कि ये वस्त्र तुम पहने हो, ये इसी बात के सबूत हैं कि तुम लोगों से चाहते हो कि वे तुम्हें संन्यासी समझें। अन्यथा और कोई कारण नहीं इन वस्त्रों का। तुम संन्यासी हो तो किसी भी वस्त्र में हो सकते हो। लेकिन लोग तुम्हें किसी भी वस्त्र में संन्यासी नहीं समझेंगे; इसी वस्त्र में समझेंगे। तुम चाहते हो कि लोग समझें कि तुम संन्यासी हो। और जो चाहता है कि लोग समझें संन्यासी है, वह आदमी संन्यासी नहीं है। लोगों की चाह से उसका क्या संबंध?
तो उस राजा ने कहा, मैं साधु को मिलना चाहता हूं।
वजीरों ने बहुत खोज की कि कोई साधु है? बहुत मुश्किल से पता चला कि गांव के बाहर एक झोपड़े में एक आदमी रहता है। कुछ लोग कहते हैं, वह साधु है।
राजा वहां गया। वह सुबह-सुबह पहुंचा। सोचा, साधु ब्रह्ममुहूर्त में उठ आता होगा, तो वह गया। तो सुबह के कोई सात, साढ़े सात बज रहे थे, सूरज ऊपर उठ आया था और साधु सोया हुआ था। और भगवान बुद्ध की मूर्ति रखी थी, उससे वह पैर टिकाए हुए था। उस राजा ने कहा, यह कैसा साधु है? भगवान की मूर्ति से पैर टिकाए हुए है! और इतनी देर तक सोया हुआ है!
लेकिन जो उसे ले गए थे, उन्होंने कहा, इतने जल्दी निर्णय न लें। क्योंकि साधु को पहचानना इतना आसान नहीं। इतने जल्दी निर्णय लेने से ही तो असाधु साधु बने हुए दिखाई पड़ रहे हैं। क्योंकि कोई भी चार बजे उठ सकता है, कोई बड़ी कठिन बात है? और कोई भी भगवान के हाथ जोड़ कर बैठा हुआ मिल सकता है, कोई कठिन बात है? जरा थोड़ा निर्णय लेने में जल्दी न करें। यह आदमी कुछ है। जो भगवान पर पैर टेके हुए है, यह कोई आदमी सामान्य नहीं है। सिर्फ साधु ही टेक सकता है भगवान पर पैर, और कोई नहीं टेक सकता। थोड़ा रुकें, जल्दी निर्णय न लें।
वह साधु कोई आठ बजे उठा होगा। राजा ने उससे छूटते ही पूछा कि तुम इतनी देर तक सोए हुए थे? साधु को ब्रह्ममुहूर्त में उठ आना चाहिए।
उसने कहा कि मैं तो ब्रह्ममुहूर्त में ही उठता हूं। जब उठता हूं तभी ब्रह्ममुहूर्त मानता हूं। जब परमात्मा उठा देता है, उठ आता हूं; जब परमात्मा सुला देता है, तो सो जाता हूं। न अपनी तरफ से सोता हूं, न अपनी तरफ से उठता हूं। अपने को छोड़ ही दिया उसी दिन जिस दिन साधु हुआ। अपने को छोड़ दिया उसी दिन। अब जो होता है। जब धूप में बैठता हूं, धूप तेज लगने लगती है, भीतर परमात्मा कहता है कि छाया में चलो, तो छाया में आ जाता हूं; और जब छाया ठंड देने लगती है और परमात्मा कहता है कि धूप में चलो, तो धूप में चला जाता हूं। अपने को मैंने छोड़ दिया है। अब मैं सिर्फ जी रहा हूं और मैं नहीं हूं। तो जब नींद खुलती है, उठ आता हूं; जब भूख लगती है तो खाना मांग लाता हूं।
राजा ने कहा, हैरान! तुम्हारा कोई विधि-विधान नहीं है? कोई व्यवस्था नहीं है?
उसने कहा, बस। कोई विधि-विधान नहीं है। जिसने परमात्मा के हाथ में अपने को छोड़ा, उसका कोई विधि-विधान नहीं होता।
सब विधि-विधान अहंकार से पैदा होते हैं। सारी विधि-विधान की व्यवस्था अहमता से पैदा होती है। हम कुछ थोपना चाहते हैं जीवन पर, उससे पैदा होती है। और जो मनुष्य भी जीवन पर कुछ थोपना चाहता है, जो मनुष्य जीवन से कोई विशेष अपेक्षा रखता है कि वह ऐसा हो, ऐसा न हो, जो कुछ निषेध करता है और कुछ स्वीकार करता है, वह मनुष्य सरल नहीं हो सकता। और सरलता साधु की अनिवार्य शर्त है। सरलता जीवन में सत्य को पाने की अनिवार्य शर्त है।
उस साधु ने कहा कि हवा-पानी की तरह जो हो जाता है, जैसे एक सूखा पत्ता उड़ता हो; हवा जहां ले जाए, चला जाता है; हवा जहां गिरा दे, गिर जाता है; फिर हवा उठा ले तो फिर उठ जाता है। सूखे पत्ते की तरह जो हो जाए, वैसा व्यक्ति केवल सरल हो सकता है, बाकी तो सारे लोग जटिल होंगे। सागर पर तैरता हुआ लकड़ी के टुकड़े की भांति जो हो जाए कि लहरें जहां ले जाएं, चला जाए; और लहरें जहां छोड़ दें, छूट जाए; जिसकी अपनी कोई विधि-निषेध की इच्छा नहीं है, जिसका अपना कोई आरोपण नहीं है, वही केवल सरल हो सकता है।
तो हम कैसे सरल होंगे जिनका कि चौबीस घंटे विधि-निषेध है? जो चौबीस घंटे अपने को एक विशेष भांति से बनाने में लगे हैं, वे लोग कैसे सरल होंगे? जो आदमी भी अपने को बनाने की चेष्टा में लगा है, वह सरल नहीं हो सकता। जो आदमी इस कोशिश में लगा है कि मैं परमात्मा को पाऊंगा, जो आदमी इस कोशिश में लगा है कि मैं साधु हो जाऊंगा, जो आदमी इस कोशिश में लगा है कि मुझे तो सज्जन होना है, जो आदमी इस कोशिश में लगा है कि मुझे अहिंसक होना है, मुझे सत्यवादी होना है, मुझे अक्रोधी होना है, जो इस कोशिश में लगा है वह आदमी सरल कैसे होगा? वैसा आदमी सरल नहीं हो सकता। जो मनुष्य जीवन में किसी आदर्श के प्रति अपने को समर्पित करता है, वह कभी सरल नहीं हो सकता। और हम सारे लोग किसी न किसी आदर्श के प्रति समर्पित हैं।
महावीर को हुए ढाई हजार वर्ष हुए, क्राइस्ट को हुए दो हजार वर्ष हुए, बुद्ध को हुए ढाई हजार वर्ष हुए; राम को और भी ज्यादा हुआ; कृष्ण को बहुत समय हुआ। उनके बाद हमने आदर्श पकड़ लिए हैं। बुद्ध के बाद ढाई हजार वर्ष से उनके पीछे चलने वाला बुद्ध होने की कोशिश में लगा है। कोई दूसरा आदमी बुद्ध हुआ? ढाई हजार वर्षों में नहीं हुआ। कोई दूसरा आदमी महावीर हुआ? ढाई हजार वर्षों में नहीं हुआ। कोई दूसरा आदमी क्राइस्ट हुआ? दो हजार वर्षों का अनुभव तो इनकार करता है कि नहीं हुआ। फिर भी लाखों लोग क्राइस्ट होने की चेष्टा में लगे हैं, लाखों लोग बुद्ध होने की, लाखों लोग महावीर होने की। जरूर इसमें कोई बुनियादी गलती है।
जो आदमी भी किसी दूसरे आदमी के जैसा होने की चेष्टा में लगता है, वह जटिल हो जाएगा। स्वभावतः जटिल हो जाएगा। वह अपने को इनकार करने लगेगा और दूसरे को अपने ऊपर थोपने लगेगा। वह अपनी वास्तविकता को निषेध करने लगेगा और दूसरे की आदर्शवत्ता को ओढ़ने लगेगा। वह आदमी कठिन हो जाएगा, जटिल हो जाएगा। उसका चित्त खंड-खंड हो जाएगा। वह टूट जाएगा अपने भीतर। उसके भीतर द्वंद्व उत्पन्न हो जाएगा। और बड़ी मुश्किल तो यही है कि महावीर होने के लिए सरल होना जरूरी है; बुद्ध होने के लिए सरल होना जरूरी है; क्राइस्ट होने के लिए सरल होना जरूरी है; और जो उनका अनुगमन करते हैं, अनुगमन करने के कारण जटिल हो जाते हैं।
यह स्थिति आपको दिखनी चाहिए। कोई किसी का अनुगमन करके कभी सरल नहीं हो सकता। अनुगमन का अर्थ ही हुआ कि मैंने दूसरे मनुष्य जैसे होने की चेष्टा शुरू कर दी, बिना उस मनुष्य को समझे हुए, जो मैं था, जो मैं हूं। मैं जो हूं, इसे समझे बिना मैंने दूसरा मनुष्य होने की चेष्टा शुरू कर दी। मैं जो रहूंगा, वह रहा आऊंगा, और दूसरे मनुष्य का आवरण, अभिनय, पाखंड अपने ऊपर थोप लूंगा।
इसीलिए धार्मिक मुल्क अत्यंत पाखंडग्रस्त हो जाते हैं। हमारा मुल्क है। इससे ज्यादा पाखंडी मुल्क जमीन पर खोजना कठिन है। इससे ज्यादा जटिल मुल्क, जटिल कौम, जटिल जाति खोजनी बिलकुल मुश्किल है। जितना पाखंड हममें घना और गहरा है, इतना जमीन पर किसी कौम में नहीं हो सकता। और उसका कारण कुल यह है कि हम सब अनुकरण, आदर्श, हम कुछ होने के पागलपन में लगे हैं, उस मनुष्य को समझे बिना, जो हम हैं। जब कि जीवन की कोई भी वास्तविक क्रांति, जो हम हैं, उसके समझने से शुरू होती है। जो मैं वस्तुतः हूं, उसे समझने से शुरू होती है।
एक आदमी क्रोधी है; एक आदमी लोभी है; एक आदमी दंभी है। एक दंभी आदमी कोशिश में लग जाता है कि मैं विनीत हो जाऊं। क्या होगा? एक अहंकारी मनुष्य है। शिक्षा और संस्कार और समझाने वाले लोग उससे कहते हैं--अहंकार छोड़ दो, तो तुम्हें बहुत शांति मिलेगी। वह अहंकारी मनुष्य अहंकार को छोड़ने में लगेगा। क्या करेगा? वह करेगा यह। अहंकार कहीं छोड़ा जाता है? अहंकार कहीं छोड़ा जा सकता है? कौन छोड़ेगा अहंकार? जो छोड़ने में लगा है, वह अहंकार ही तो है। इसलिए जब छूटने का उसे लगने लगेगा तो वह यह कहने लगेगा, मैंने अहंकार छोड़ दिया। मैं विनीत हो गया। मैं विनम्र हो गया हूं। मेरे पास कोई अहमता नहीं है। और यह सब क्या है? यह सब अहमता का हिस्सा है। कभी अहंकार अहंकार को कैसे छोड़ सकेगा? छोड़ने में और परिपुष्ट हो जाएगा, और सूक्ष्म हो जाएगा।
इसलिए संन्यासी के बराबर सूक्ष्म अहंकार गृहस्थ का नहीं होता। हो नहीं सकता। गृहस्थ तो एक-दूसरे से मिल जाते हैं। संन्यासी एक-दूसरे से मिलते भी नहीं। संन्यासियों को कहिए कि एक-दूसरे से मिलें, तो नहीं मिल सकते।
एक बड़े साधु को मैंने कहा कि फलां साधु से आप मिलें। वे बोले, जरा मुश्किल है। क्यों मुश्किल है? कौन पहले नमस्कार करेगा, यही मुश्किल है, अगर दो साधु मिलें तो। कौन कहां बैठेगा, यही मुश्किल है। कौन नीचे बैठेगा, कौन ऊपर बैठेगा?
एक जलसे में मैं था। वहां कोई तीस-चालीस साधु अलग-अलग तरह के निमंत्रित, आमंत्रित थे। उस समारोह को करने वालों की इच्छा थी कि सारे लोग एक ही मंच पर बैठें। लेकिन नहीं बैठ सके। क्योंकि कोई शंकराचार्य थे, उनको तो सिंहासन चाहिए, उस पर ही बैठेंगे। और जब शंकराचार्य सिंहासन पर बैठेंगे, तो दूसरा साधु उनके नीचे पैरों में कैसे बैठने को राजी हो सकता है? उसने कहा, मैं भी सिंहासन पर बैठूंगा। फिर यह भी डर है कि सिंहासन किसका ऊंचा-नीचा होगा?
यह सोचते हैं आप, ये पागल हैं या साधु हैं? ये विनम्र हैं या अहंकार की अत्यंत अंतिम चरम सीमा हैं ये? यह अहमता का सूक्ष्मतम रूप है। इसलिए दुनिया में साधु लड़ते हैं और लड़ाते हैं। क्योंकि अहंकार जहां भी हो, वहीं संघर्ष और द्वंद्व और लड़ाई खड़ा कर देता है।
यह अहमता है। और अहंकार कभी अहंकार को छोड़ ही नहीं सकता। जब वह छोड़ने में लगता है, तब भी अहंकार ही है जो सोच रहा है कि मैं विनम्र हो जाऊं। वह क्या करेगा? वह विनम्र होने का ढोंग कर लेगा। जब आप मिलेंगे, तो वह सिर झुका कर नीचे होकर कहेगा, मैं तो कुछ भी नहीं हूं। और जब वह यह कह रहा है कि मैं कुछ भी नहीं हूं, तब वह भीतर जानेगा कि मैं कुछ हूं। जब वह कह रहा है मैं कुछ नहीं हूं, यह केवल वही आदमी कहता है कि मैं कुछ नहीं हूं जो जानता है कि मैं कुछ हूं। अन्यथा नहीं कहता। लोभी कैसे लोभ को छोड़ेगा? वह लोभ को भी छोड़ेगा तो लोभ के कारण ही छोड़ेगा।
मैं एक जगह था और एक साधु समझाते थे लोगों को: लोभ छोड़ दो तो तुम शांत हो जाओगे; लोभ छोड़ दो तो पुण्य होगा; लोभ छोड़ दो तो मोक्ष मिलेगा। मैंने उन साधु को कहा कि अगर इनमें से कोई बहुत लोभी होगा, तो ही आपकी बात को मान पाएगा। क्योंकि जिसे मोक्ष पाने का लोभ होगा, वह सोचेगा, लोभ छोड़ दें। शांत होने का जिसे लोभ होगा, वह सोचेगा, लोभ छोड़ दें। ये सब लोभ के ही हिस्से होंगे। ये ग्रीड के ही एक्सटेंशंस हैं। ये उसके ही विस्तार हैं। लोभी कभी लोभ कैसे छोड़ सकता है?
असल में कोई बुराई कभी नहीं छोड़ी जाती। वैसे ही, जैसे अंधकार हो, तो अंधकार को हटाया नहीं जा सकता। इस भवन में अंधकार भरा हो, हम उसे धक्के देकर नहीं हटा सकते हैं। अगर कोई अंधकार को धकाने में लगेगा, तो हम क्या कहेंगे उसको? कहेंगे, विक्षिप्त हो गया। इसका मस्तिष्क ठीक नहीं है। अंधकार कहीं हटाया जाता है? हां, प्रकाश जलाया जाता है। प्रकाश जल जाए तो अंधकार अपने आप विलीन हो जाता है, वह नहीं पाया जाता। वैसे ही अहंकार नहीं छूटता। सरलता उत्पन्न होती है, तो अहंकार नहीं पाया जाता है। लोभ नहीं छूटता। शांति उत्पन्न होती है, तो लोभ नहीं पाया जाता है। जीवन में बुराई नहीं छोड़ी जाती। जो सद है उसका जन्म, उसे जगाया जाता है। जो आलोक है उसे जगाया जाता है, अंधकार अपने से छूट जाता है।
लेकिन हम अंधकार को छोड़ने में लगेंगे तो जटिल हो जाएंगे। हम सारे लोग अंधकार को छोड़ने में लगे हैं। मुझे लोग मिलते हैं, जो कहते हैं, हमें अपनी हिंसा छोड़नी है। मैं उनसे कहता हूं, हिंसा कैसे छोड़ी जा सकती है? हां, प्रेम जगाया जा सकता है; हिंसा नहीं छोड़ी जा सकती। लोग कहते हैं, हमें असत्य छोड़ना है। सत्य जगाया जा सकता है, असत्य नहीं छोड़ा जा सकता। और जब हम यह छोड़ने की भाषा में पड़ जाते हैं, तभी जटिलता शुरू हो जाती है, द्वंद्व शुरू हो जाता है, कांफ्लिक्ट शुरू हो जाती है। और हमारे चित्त इसीलिए बहुत ज्यादा द्वंद्व से भरे हैं। हम कुछ छोड़ना चाहते हैं। जब कि छोड़ना जीवन का नियम नहीं है; पाना जीवन का नियम है। कुछ पा लिया जाए तो निम्न छूट जाता है। श्रेष्ठ पा लिया जाए, निम्न विलीन हो जाता है। श्रेष्ठ आ जाए, तो निम्न जगह खाली कर देता है उसके लिए। प्रकाश आ जाए, तो अंधकार स्थान छोड़ देता है। लेकिन अंधकार अपने आप स्थान नहीं छोड़ सकता। प्रकाश का आगमन प्राथमिक है, अंधकार का जाना द्वितीय है। सत का आना प्राथमिक है, असत का जाना द्वितीय है। श्रेष्ठ का आना प्राथमिक है, अश्रेष्ठ का जाना द्वितीय है। और वह जो आगमन है, वह जो वास्तविक सरलता का आगमन है, जिससे जटिलता जाएगी, वह आरोपित नहीं होती है। उसे भीतर से जगाना होता है।
भीतर से जगाने का नियम क्या होगा? नियम होगा कि सबसे पहले हम सब भांति के आदर्शों से अपने को मुक्त कर लें। आदर्श जटिल कर रहे हैं। आप सबसे पहले अपने को जानने में लगें बजाय इसके कि आप अपने को बनाने में लग जाएं। हम पूछते हैं कि हमें कैसा होना चाहिए? मैं आपसे कहता हूं, यह व्यर्थ है। आप जानें कि आप कैसे हैं? यह वैज्ञानिक है कि आप जानें कि आप क्या हैं? अगर आप अपनी वास्तविकता को पूरी तरह जान लें, तो उस ज्ञान से ही क्रांति शुरू हो जाती है। अगर कोई मनुष्य अपने क्रोध को पूरा जान ले, तो क्रोध विलीन होना शुरू हो जाता है। क्रोध को विलीन करने के लिए और कुछ करना जरूरी नहीं, क्रोध को जान लेना ही जरूरी है। लेकिन आपने कभी क्रोध नहीं जाना।
आप कहेंगे, हमने बहुत बार क्रोध किया है।
मैं आपको कहता हूं, मुल्क में मैं घूमा हूं और अभी मैं ऐसे आदमी की तलाश में हूं, जिसने क्रोध को जाना हो। आपने क्रोध कभी नहीं जाना। जब आप क्रोध करते हैं, तब आप मौजूद ही नहीं होते हैं। आप मूर्च्छित होते हैं, बेहोश होते हैं। कभी कोई आदमी मौजूद होकर क्रोध कर सकता है? मौजूद होकर क्रोध किया ही नहीं जा सकता। अगर आप मौजूद हों, क्रोध असंभव हो जाएगा। अगर आपकी प्रेजेंस पूरी हो उस वक्त, चित्त की क्रोध की वृत्ति के समय अगर आप सजग हों, क्रोध असंभव हो जाएगा। क्रोध नहीं किया जा सकता है। जब भी हम सजग हों, तभी जो बुरा है, वह असंभव हो जाता है। बुरे के लिए असजग होना, मूर्च्छित होना जरूरी है। इसलिए जिसे बुरा काम करना है, वह अगर नशा कर ले, तो बुरा काम और भी आसान हो जाता है, क्योंकि नशे में सजगता और भी क्षीण हो जाती है।
सारे धर्मों ने नशे का विरोध किया है, केवल एक बात से। अन्यथा नशे में कोई खराबी नहीं है। एक आदमी शराब पी रहा है, इसमें क्या खराबी है? शराब में कोई खराबी नहीं है, खराबी यह है कि शराब की स्थिति में उसकी जो होश की स्थिति है, वह विलीन हो जाएगी, वह और भी मूर्च्छित होगा। और मूर्च्छा में सब पाप होते हैं। जितने हम मूर्च्छित हैं, उतने ही पाप हैं। आप जब क्रोध करते हैं, तब आप मूर्च्छित हैं। जब आप काम से पीड़ित होते हैं, तब आप मूर्च्छित हैं। आप होश में नहीं हैं। आप अपने में नहीं हैं। आपको कोई चीज खींच रही है और आपको बिलकुल होश नहीं है कि आप कहां जा रहे हैं। क्रोध में आदमी को देखें। वासनाग्रस्त आदमी को देखें। उसकी आंखों को, उसके भाव को देखें। उसके शरीर को देखें। आप पाएंगे, वह मूर्च्छित है, बेहोश है। इसीलिए जब आप क्रोध में होते हैं, तो न केवल मन के तल पर आप मूर्च्छित होते हैं बल्कि शरीर के तल पर भी। वैज्ञानिक कहते हैं, शरीर की ग्रंथियां जहर छोड़ देती हैं और उस जहर के प्रभाव में आप करीब-करीब शराब की हालत में आ जाते हैं। करीब-करीब शराब की हालत में आ जाते हैं। शरीर के और मन के, दोनों तल पर आप बेहोश हो जाते हैं।
बुद्ध का एक शिष्य था। वह नया-नया दीक्षित हुआ था, उसने संन्यास लिया था। और बुद्ध को उसने कहा, मैं आज कहां भिक्षा मांगने जाऊं?
उन्होंने कहा, मेरी एक श्राविका है, वहां चले जाना।
वह वहां गया। वह जब भोजन करने को बैठा, तो बहुत हैरान हुआ, रास्ते में इसी भोजन का उसे खयाल आया था। यह भोजन उसे प्रिय था। पर उसने सोचा था कि कौन मुझे देगा? आज कौन मुझे मेरे प्रिय भोजन को देगा? वह कल तक राजकुमार था और जो उसे पसंद था, वह खाता था। लेकिन उस श्राविका के घर वही भोजन देख कर वह बहुत हैरान हो गया। सोचा, संयोग की बात है, वही आज बना होगा। जब वह भोजन कर रहा है, उसे अचानक खयाल आया, भोजन के बाद तो मैं विश्राम करता था रोज। लेकिन आज तो मैं भिखारी हूं। भोजन के बाद वापस जाना होगा। दोत्तीन मील का फासला फिर धूप में तय करना है।
वह श्राविका पंखा करती थी, उसने कहा, भंते, अगर भोजन के बाद दो क्षण विश्राम कर लेंगे तो मुझ पर बहुत अनुग्रह होगा।
भिक्षु फिर थोड़ा हैरान हुआ कि क्या मेरी बात किसी भांति पहुंच गई! फिर उसने सोचा, संयोग की ही बात होगी कि मैंने भी सोचा और उसने भी उसी वक्त पूछ लिया। चटाई डाल दी गई। वह विश्राम करने लेटा ही था कि उसे खयाल आया, आज न तो अपनी कोई शय्या है, न अपना कोई साया है; अपने पास कुछ भी नहीं।
वह श्राविका जाती थी, लौट कर रुक गई, उसने कहा, भंते, शय्या भी किसी की नहीं है, साया भी किसी का नहीं है। चिंता न करें।
अब संयोग मान लेना कठिन था। वह उठ कर बैठ गया। उसने कहा, मैं बहुत हैरान हूं! क्या मेरे भाव पढ़ लिए जाते हैं?
वह श्राविका हंसने लगी। उसने कहा, बहुत दिन ध्यान का प्रयोग करने से चित्त शांत हो गया। दूसरे के भाव भी थोड़े-बहुत अनुभव में आ जाते हैं।
वह एकदम उठ कर खड़ा हो गया। वह एकदम घबड़ा गया और कंपने लगा। उस श्राविका ने कहा, आप घबड़ाते क्यों हैं? कंपते क्यों हैं? क्या हो गया? विश्राम करिए। अभी तो लेटे ही थे।
उसने कहा, मुझे जाने दें, आज्ञा दें। उसने आंखें नीचे झुका लीं और वह चोरों की तरह वहां से भागा।
श्राविका ने कहा, क्या बात है? क्यों परेशान हैं?
फिर उसने लौट कर भी नहीं देखा। उसने बुद्ध को जाकर कहा, उस द्वार पर अब कभी न जाऊंगा।
बुद्ध ने कहा, क्या हो गया? भोजन ठीक नहीं था? सम्मान नहीं मिला? कोई भूल-चूक हुई?
उसने कहा, भोजन भी मेरे लिए प्रीतिकर जो है, वही था। सम्मान भी बहुत मिला, प्रेम और आदर भी था। लेकिन वहां नहीं जाऊंगा। कृपा करें! वहां जाने की आज्ञा न दें।
बुद्ध ने कहा, इतने घबड़ाए क्यों हो? इतने परेशान क्यों हो?
उसने कहा, वह श्राविका दूसरे के विचार पढ़ लेती है। और जब मैं आज भोजन कर रहा था, उस सुंदर युवती को देख कर मेरे मन में तो विकार भी उठे थे। वे भी पढ़ लिए गए होंगे। मैं किस मुंह से वहां जाऊं? मैं तो आंखें नीची करके वहां से भागा हूं। वह मुझे भंते कह रही थी, मुझे भिक्षु कह रही थी, मुझे आदर दे रही थी। मेरे प्राण कंप गए। मेरे मन में क्या उठा? और उसने पढ़ लिया होगा। फिर भी मुझे भिक्षु और भंते कह कर आदर दे रही थी! उसने कहा, मुझे क्षमा करें। वहां मैं नहीं जाऊंगा।
बुद्ध ने कहा, तुम्हें वहां जान कर भेजा है। यह तुम्हारी साधना का हिस्सा है। वहीं जाना पड़ेगा। रोज वहीं जाना पड़ेगा। जब तक मैं न कहूं या जब तक तुम आकर मुझसे न कहो कि अब मैं वहां जा सकता हूं, तब तक वहीं जाना पड़ेगा। जब तक तुम मुझसे आकर यह न कहो कि अब मैं रोज वहां जा सकता हूं, तब तक वहीं जाना पड़ेगा। वह तुम्हारी साधना का हिस्सा है।
उसने कहा, लेकिन मैं कैसे जाऊंगा? किस मुंह को लेकर जाऊंगा? और कल अगर फिर वही विचार उठे तो मैं क्या करूंगा?
बुद्ध ने कहा, तुम एक ही काम करना, एक छोटा सा काम करना, और कुछ मत करना, जो भी विचार उठे, उसे देखते हुए जाना। विकार उठे, उसे भी देखना। कोई भाव मन में आए, काम आए, क्रोध आए, कुछ भी आए, उसे देखना, और कुछ मत करना। तुम सचेत रहना भीतर। जैसे कोई अंधकारपूर्ण गृह में एक दीये को जला दे और उस घर की सब चीजें दिखाई पड़ने लगें, ऐसे ही तुम अपने भीतर अपने बोध को जगाए रखना कि तुम्हारे भीतर जो भी चले, वह दिखाई पड़े। वह स्पष्ट दिखाई पड़ता रहे। बस तुम ऐसे जाना।
वह भिक्षु गया। उसे जाना पड़ा। भय था, पता नहीं क्या होगा? लेकिन वह अभय होकर लौटा। वह नाचता हुआ लौटा। कल डरा हुआ आया था, आज नाचता हुआ आया। कल आंखें नीचे झुकी थीं, आज आंखें आकाश को देखती थीं। आज उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे, जब वह लौटा। और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा और उसने कहा कि धन्य! क्या हुआ यह? जब मैं सजग था, तो मैंने पाया वहां तो सन्नाटा है। जब मैं उसकी सीढ़ियां चढ़ा, तो मुझे अपनी श्वास भी मालूम पड़ रही थी कि भीतर जा रही है, बाहर जा रही है। मुझे हृदय की धड़कन भी सुनाई पड़ने लगी थी। इतना सन्नाटा था मेरे भीतर। कोई विचार सरकता तो मुझे दिखता। लेकिन कोई सरक नहीं रहा था। मैं एकदम शांत उसकी सीढ़ियां चढ़ा। मेरे पैर उठे तो मुझे मालूम था कि मैंने बायां पैर उठाया और दायां रखा। और मैं भीतर गया और मैं भोजन करने बैठा। यह जीवन में पहली दफा हुआ कि मैं भोजन कर रहा था तो मुझे कौर भी दिखाई पड़ता था। मेरा हाथ का कंपन भी मालूम होता था। श्वास का कंपन भी मुझे स्पर्श और अनुभव हो रहा था। और तब मैं बड़ा हैरान हो गया, मेरे भीतर कुछ भी नहीं था, वहां एकदम सन्नाटा था। वहां कोई विचार नहीं था, कोई विकार नहीं था।
बुद्ध ने कहा, जो भीतर सचेत है, जो भीतर जागा हुआ है, जो भीतर होश में है, विकार उसके द्वार पर आने वैसे ही बंद हो जाते हैं, जैसे किसी घर में प्रकाश हो तो उस घर में चोर नहीं आते। जिस घर में प्रकाश हो तो उससे चोर दूर से ही निकल जाते हैं। वैसे ही जिसके मन में बोध हो, जागरण हो, अमूर्च्छा हो, अवेयरनेस हो, उस चित्त के द्वार पर विकार आने बंद हो जाते हैं। वे शून्य हो जाते हैं।
मैं कहता हूं, आपने क्रोध कभी देखा नहीं, क्योंकि क्रोध आप देखते तो क्रोध विलीन हो जाता। आपने कभी सेक्स देखा नहीं, अगर देखते तो विलीन हो जाता। जो भी देख लिया जाए मन के तल पर, वही विलीन हो जाता है। जो भी देख लिया जाए उसकी परिपूर्णता में, वही विलीन हो जाता है। उसके विलीन हो जाने पर जो शेष रह जाता है, वह है प्रेम, वह है ब्रह्मचर्य, वह है अक्रोध, वह है शांति, वह है अहिंसा, वह है करुणा, जो शेष रह जाता है। वह हमारा स्वभाव है, उसे कहीं से लाना नहीं है। जो फॉरेन एलिमेंट, जो विजातीय तत्व हमारे ऊपर हैं, वे ही भर विलीन हो जाएं, तो जो हमारे भीतर है वह प्रकट हो जाएगा।
परमात्मा हमारा स्वभाव है। उस स्वभाव में करुणा सहज है; प्रेम सहज है; ब्रह्मचर्य सहज है; दया और अहिंसा और सत्य और अपरिग्रह और सरलता वहां सहज हैं। अगर विजातीय विलीन हो जाए, तो वह सहजता प्रकट हो जाएगी। इसलिए मैंने कहा, साधुता सहजता है, सरलता है, स्पांटेनियस है। और कबीर का जो मैंने वचन कहा: साधो! सहज समाधि भली। उसका अर्थ है, उसका अर्थ है कि जो बिलकुल सहज होकर देखेगा, उसे समाधि उत्पन्न हो जाएगी। विकार विलीन हो जाएंगे और भीतर से उसका जन्म होगा जो सत्य है।
लेकिन यह किसी के पीछे जाने से नहीं होगा, अपने ही भीतर आने से होगा। यह किसी का अनुगमन करने से नहीं होगा, अपनी ही वृत्तियों का अनुसरण करने से होगा। महावीर और बुद्ध के पीछे नहीं जाना है; क्रोध और काम के पीछे जाना है, उनको पकड़ना और पहचानना है। कोई आदर्श आपको बनाने की जरूरत नहीं है। जो आदर्शतम है, वह आपके भीतर मौजूद है। आपको कुछ होना नहीं है। जो आप हैं, अगर आप उसी को जान सकें, तो सब हो जाएगा। लेकिन हम कुछ होने में लगते हैं, इससे जटिलता, इससे उलझाव, द्वंद्व पैदा हो जाता है। कुछ होने में न लगें; जो हैं, उसे जानने में लगें। और घबड़ाएं न। क्रोध से न घबड़ाएं; काम से न घबड़ाएं; द्वेष से न घबड़ाएं; घृणा से न घबड़ाएं; मोह से, लोभ से न घबड़ाएं। घबड़ाने की कोई भी जरूरत नहीं है। इनमें प्रवेश करें। इनके प्रति सजग हों। जानें, होश से इनको पहचानें। इनका विश्लेषण करें। इनमें प्रवेश कर जाएं।
जो व्यक्ति अपने लोभ में प्रवेश कर जाएगा, वह अलोभ पर पहुंच जाता है। जो अपने क्रोध में प्रवेश कर जाता है, वह अक्रोध पर पहुंच जाता है। जो अपने काम में, सेक्स में प्रवेश कर जाता है, वह ब्रह्मचर्य को अनुभव कर लेता है। लेकिन हम तो बाहर से ही डरे-डरे, परेशान, उनमें प्रवेश ही नहीं करते। कभी उनको जानना ही नहीं चाहते। कभी उनमें प्रवेश करके, पूरे उनके आंतरिक जड़ों तक जाना नहीं चाहते। हम तो बाहर ही घबड़ाए रहते हैं।
बुरे लोग वे हैं, जो बुरा काम करके नष्ट हो जाते हैं। भले लोग वे हैं, जो बुरे काम के डर से ही नष्ट हो जाते हैं।
एक गांव में, एक वृद्ध अपने गांव की सीमा के बाहर बैठा था। एक फकीर था और गांव के बाहर ही रहता था। रात उसने देखा, एक बड़ी विकराल छाया गांव में प्रवेश कर रही है। एक विकराल छाया मात्र। उसने पूछा कि तुम कौन हो? यह छाया किसकी है और यह कहां जा रही है?
सुनाई पड़ा कि मैं महामारी हूं और गांव में एक हजार बुरे लोगों को नष्ट करने आई हूं।
उसने कहा, सिर्फ बुरे लोगों को न?
सिर्फ बुरे लोगों को। तीन दिन गांव में रहूंगी और एक हजार बुरे लोगों को नष्ट कर दूंगी।
लेकिन तीन दिन में तो कई हजार लोग गांव में नष्ट हो गए! उसमें बुरे ही लोग नहीं थे, बहुत से भले लोग थे, साधु थे, सज्जन थे। वह वृद्ध सजग रहा कि तीसरे दिन जब वह लौटे छाया, तो मैं उससे पूछूं कि यह क्या हुआ? धोखा दिया? वह छाया तीसरे दिन रात को वापस लौटती थी। उस वृद्ध ने कहा कि ठहरो और मुझे बताओ कि मुझे धोखा दिया और झूठ बोली। तुमने कहा कि एक हजार बुरे लोगों को नष्ट करूंगी। तीन दिन में तो हजारों लोग नष्ट हो गए। उसमें बहुत भले और साधु और सज्जन भी नष्ट हुए।
वह महामारी बोली, मैंने तो एक हजार बुरे लोग नष्ट किए, बाकी अच्छे लोग भय से नष्ट हो गए। उसने कहा कि मैंने तो एक हजार बुरे लोग नष्ट किए, बाकी अच्छे लोग भय से मर गए। वे मैंने नष्ट नहीं किए हैं। मेरा जिम्मा एक हजार का, बाकी सब अपने से मर गए हैं।
यह तो बिलकुल ही काल्पनिक है बात, लेकिन सच है। बुरे लोग क्रोध करके नष्ट हो जाते हैं। अच्छे लोग क्रोध से डर कर नष्ट हो जाते हैं।
तीसरा रास्ता है: न तो क्रोध करने का सवाल है, न क्रोध से लड़ने का सवाल है। क्रोध को जानने का सवाल है। न तो क्रोध के पीछे क्रोधी हो जाने का सवाल है और न क्रोध से डर कर अक्रोध को लादने का सवाल है। सवाल क्रोध को जान कर क्रोध को विसर्जित करने का है। और जानते ही क्रोध विसर्जित हो जाता है। जानते ही जटिलता विसर्जित हो जाती है। ज्ञान से बड़ी कोई क्रांति नहीं है।
अभी रास्ते में हम आते थे तो बात चलती थी कि ज्ञान हो जाए तो फिर क्या करेंगे? ज्ञान हो जाए तो फिर आचरण कैसे करेंगे? ज्ञान हो जाए तो उसे फिर जीवन में कैसे लाएंगे?
यह गलत ही बात है। यह गलत ही बात है। यह वैसा ही है जैसे कोई पूछे कि प्रकाश हो जाए, तो फिर अंधेरे का क्या करेंगे? जैसे कोई पूछे कि यहां प्रकाश तो जल गया, लेकिन फिर अंधेरे का क्या करेंगे? तो हम उससे क्या कहेंगे? हम उससे कहेंगे, फिर तुम प्रकाश के जलने का अर्थ ही नहीं समझे। प्रकाश के जलने का अर्थ ही है कि अंधेरा नहीं हो गया। ज्ञान का अर्थ यह है कि अज्ञान नहीं हो गया। और जो आचरण अज्ञान से निकलता था, वह अज्ञान के चले जाने पर नहीं हो जाएगा। वह रह कैसे जाएगा? अज्ञान अनाचरण है; ज्ञान आचरण है। ज्ञान को आचरण में लाना नहीं होता है। ज्ञान हो तो आचरण अपने आप है। अज्ञान को भी आचरण में नहीं लाना होता, अज्ञान हो तो अनाचरण अपने आप है।
आप कोई क्रोध को लाते हैं? आपने कभी क्रोध लाया है? आप हमेशा पाते हैं, क्रोध आया। आप क्रोध को कभी लाए हैं? आपने कभी घृणा की है? आप हमेशा पाते हैं, आई। आई का क्या अर्थ है? आई का अर्थ है कि भीतर अज्ञान है, अनाचरण आता है। ठीक वैसे ही, अगर भीतर ज्ञान हो तो आचरण आता है, वह भी लाया नहीं जाता। अगर भीतर ज्ञान हो, तो प्रेम वैसे ही आएगा, जैसे घृणा आती है अभी; करुणा वैसे ही आएगी, जैसे क्रूरता आती है अभी; अहिंसा वैसे ही आएगी, जैसे हिंसा आती है अभी। अज्ञान का जो प्रकाशन है, वह अनाचरण है। ज्ञान का जो प्रकाशन है, वह आचरण है। आचरण थोपा नहीं जाता, वह ज्ञान से निःसृत होता है, बहता है और आता है।
जीवन में जो भी है, वह सब आता है। लाया कुछ भी नहीं जाता है। और इसीलिए यह जो मैंने कहा कि जीवन सरल हो, जटिलता न हो उसमें, इसका यह अर्थ मत ले लेना कि आपको सरलता लानी है। इसका अर्थ केवल इतना है, अपनी जटिलता जाननी है और जटिलता में प्रवेश करना है।
जटिलता में प्रवेश का सूत्र है: जटिलता के प्रति, चित्त की सारी वृत्तियों के प्रति जागरण।
मैंने कल कहा, विचार के प्रति साक्षी हों, तो स्वतंत्रता आएगी। भाव के प्रति साक्षी हों, तो सरलता आती है। विचार के प्रति साक्षी हों, तो स्वतंत्रता आती है। भाव के प्रति साक्षी हों, तो सरलता आती है। जो विचार को जानने लगता है, वह विचार से मुक्त हो जाता है। जो भाव को जानने लगता है, वह भाव से मुक्त हो जाता है। ज्ञान विचार का, विचार से मुक्ति है; ज्ञान भाव का, भाव से मुक्ति है।
हमारा भाव जटिल हो, हम सत्य को नहीं जान सकते। विचार जटिल हो, सत्य को नहीं जान सकते। विचार सरल होगा, भाव सरल होगा, तो वह तैयारी हो जाएगी हमारे भीतर जो हमें सत्य को जानने के लिए आंख को खोल देती है।
इसलिए मैंने दूसरे चरण की बात कही: चित्त की सरलता। कल तीसरे सूत्र की बात करूंगा: चित्त की शून्यता। तीन ही सूत्र हैं: चित्त की स्वतंत्रता, चित्त की सरलता और चित्त की शून्यता। स्वतंत्रता, सरलता और शून्यता को जो साध लेता है, वह समाधि को उपलब्ध हो जाता है।

मेरी बातों को प्रेम से सुना, उसके लिए अनुगृहीत हूं। सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

गुरुवार, 29 जून 2017

अमृत की दिशा - प्रवचन-05

मैं विचार में हूं--किस संबंध में आपसे बातें करूं। और बातें इतनी ज्यादा हैं और दुनिया इतनी बातों से भरी है कि संकोच होना बहुत स्वाभाविक है। बहुत विचार हैं, बहुत उपदेश हैं, सत्य के संबंध में बहुत से सिद्धांत हैं। यह डर लगता है कि कहीं मेरी बातें भी उस बोझ को और न बढ़ा दें, जो कि मनुष्य के ऊपर वैसे ही काफी है। बहुत संकोच अनुभव होता है। कुछ भी कहते समय डर लगता है कि कहीं वह बात आपके मन में बैठ न जाए। बहुत डर लगता है कि कहीं मेरी बात को आप पकड़ न लें। बहुत डर लगता है कि कहीं वह बात आपको प्रिय न लगने लगे; कहीं वह आपके मन में स्थान न बना ले।
चूंकि मनुष्य विचारों और सिद्धांतों के कारण ही पीड़ित और परेशान है। उपदेशों के कारण ही मनुष्य के जीवन में सत्य का आगमन नहीं हो पाता है। दूसरों के द्वारा कही गई और दी गई बातें ही उस सत्य के बीच में बाधा बन जाती हैं जो हमारे पास है और निरंतर है।
ज्ञान बाहर से उपलब्ध नहीं होता; और जो भी बाहर से उपलब्ध हो जाए, वह ज्ञान को रोकने में कारण बन जाता है। मैं भी बाहर हूं। मैं जो भी कहूंगा, वह भी बाहर है। उसे ज्ञान मत समझ लेना। वह ज्ञान नहीं है। वह आपके लिए ज्ञान नहीं हो सकता। जो भी कोई दूसरा आपको देता हो, वह आपके लिए ज्ञान नहीं हो सकता। हां, उससे एक खतरा हो सकता है कि वे बातें आपके अज्ञान को ढंक दें, आपका अज्ञान आवृत हो जाए, छिप जाए, और आपको ऐसा प्रतीत होने लगे कि मैंने कुछ जाना है। 
सत्य के संबंध में जान कर यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मैंने सत्य को जाना है। सत्य के संबंध में पढ़ कर यह धारणा बन जाती है कि मैं सत्य को जान गया हूं। और जिनकी ऐसी धारणाएं बन जाती हैं वे ही सत्य को पाने में असमर्थ हो जाते हैं और पंगु हो जाते हैं।
तो सबसे पहले यह कह दूं, बाहर से जो भी आता है, कुछ भी ज्ञान नहीं हो सकता।
स्वाभाविक, मुझसे पूछा जा सकता है, फिर मैं क्यों बोलूं? मैं क्यों कहूं? मैं बाहर हूं और कुछ कहूंगा।
मैं इतनी ही बात कहना चाहता हूं कि बाहर जो भी है, उसे बाहर का समझें और ज्ञान न समझें। वह चाहे मेरा हो और चाहे किसी और का हो। ज्ञान प्रत्येक मनुष्य के भीतर उसका स्वरूप है। उस स्वरूप को जानने के लिए बाहर खोजने की कोई भी जरूरत नहीं है। बाहर से जो भी हम सीख लेंगे, यदि उस सत्य को जानना हो जो हमारे भीतर है, तो उसे अनसीखा करना होगा, उसे अनलर्न करना होगा, उसे छोड़ देना होगा। सत्य जिन्हें जानना है, उन्हें शास्त्र को छोड़ देना होता है। जो शास्त्र को पकड़ेंगे, सत्य उन्हें उपलब्ध नहीं होगा। हम सारे लोग शास्त्र को पकड़े बैठे हैं। दुनिया में यह जो इतना उपद्रव है, वह शास्त्र को पकड़ने के कारण है। ये जो हिंदू हैं, ये जो मुसलमान हैं, ये जो जैन हैं, या ईसाई हैं, या पारसी हैं, ये कौन हैं? इनको कौन लड़ा रहा है? इनको कौन एक-दूसरे से अलग कर रहा है?
शास्त्र अलग कर रहे हैं! शास्त्र लड़ा रहे हैं! सारी मनुष्यता खंडित है, क्योंकि कुछ किताबें कुछ लोग पकड़े हुए हैं; कुछ दूसरी किताबें दूसरे लोग पकड़े हुए हैं। किताबें इतनी मूल्यवान हो गई हैं कि हम मनुष्य की हत्या कर सकते हैं। और पिछले तीन हजार वर्षों में हमने लाखों लोगों की हत्या की है, क्योंकि किताबें बहुत मूल्यवान हैं। क्योंकि किताबें बहुत पूज्य हैं, इसलिए मनुष्य के भीतर जो परमात्मा बैठा है, उसका भी अपमान किया जा सकता है, उसकी भी हत्या की जा सकती है। क्योंकि शब्द और शास्त्र बहुत मान्य हैं, इसलिए मनुष्यता को इनकार किया जा सकता है, अस्वीकार किया जा सकता है। यह हुआ है। यह आज भी हो रहा है।
मनुष्य-मनुष्य के बीच जो दीवाल है, वह शास्त्रों की है। और क्या कभी यह खयाल पैदा नहीं होता कि जो शास्त्र मनुष्य को मनुष्य से अलग करते हों, वे मनुष्य को परमात्मा से कैसे जोड़ सकेंगे? जो मनुष्य को मनुष्य से ही तोड़ देता हो, वह मनुष्य को परमात्मा से जोड़ने की सीढ़ी कैसे बन सकता है? लेकिन हम सोचते हैं कि शायद वहां कुछ मिले। जरूर कुछ मिलता है। शब्द मिल जाते हैं। सत्य को दिए गए शब्द मिल जाते हैं और शब्द स्मरण हो जाते हैं। वे हमारी स्मृति में प्रविष्ट हो जाते हैं और स्मृति को हम ज्ञान समझ लेते हैं।
स्मृति ज्ञान नहीं है। मेमोरी ज्ञान नहीं है। कुछ चीजें सीख लेना, स्मरण कर लेना, ज्ञान नहीं है। ज्ञान का जन्म बहुत दूसरी बात है। स्मृति का प्रशिक्षण बहुत दूसरी बात है। स्मृति के प्रशिक्षण से कोई पंडित हो सकता है, लेकिन प्रज्ञा जाग्रत नहीं होती। और ज्ञान तो सारे जीवन को क्रांति कर देता है।
तो मैं आपको कोई उपदेश देने का किंचित भी पाप करने को तैयार नहीं हूं। जो भी उपदेश देते हैं, हिंसा करते हैं और पाप करते हैं। मैं कोई उपदेश देने को नहीं हूं। मैं कुछ थोड़ी सी बातें आपसे कहने को हूं। इसलिए नहीं कि आप उन्हें मान लें। क्योंकि जो भी कहता है मान लो, वह आपका दुश्मन है। जो भी कहता है श्रद्धा कर लो, जो भी कहता है विश्वास करो, वह घातक है। वह आपके जीवन को विकसित होने से रोकेगा। जो भी कहता है विश्वास करो, वह विवेक के जागने में बाधा बन जाएगा। और हमने बहुत दिन विश्वास किया है और विश्वास का यह परिणाम है जो हमारी दुनिया है! इससे रद्दी दुनिया और हो सकती है? इससे ज्यादा करप्टेड? लेकिन हम विश्वासी लोग हैं और हमने बहुत दिन विश्वास किया है। और इससे ज्यादा बुरा मनुष्य हो सकता है, जो आज है? इससे सड़े हुए मस्तिष्क हो सकते हैं और ज्यादा, जैसे आज हैं? इससे ज्यादा पीड़ा और दुख और अशांति हो सकती है? लेकिन हमने बहुत दिन विश्वास किया है और सारी दुनिया विश्वास करती है--कोई इस मंदिर में, कोई उस मस्जिद में, कोई उस चर्च में; कोई इस किताब में, कोई उस किताब में; कोई इस मसीहा में, कोई उस मसीहा में। सारी दुनिया विश्वास करती है। लेकिन विश्वास के बावजूद यह परिणाम है। शायद लोग कहेंगे कि विश्वास कम है इसलिए यह परिणाम है।
और मैं आपसे कहना चाहता हूं, परमात्मा करे कि विश्वास बिलकुल शून्य हो जाए। अगर कहीं विश्वास पूरा हुआ, तो मनुष्य गया! क्योंकि विवेक नष्ट हो जाएगा। विश्वास विवेक का विरोधी है। जब भी कोई कहता है कि हमारी बात मान लो, तभी वह यह कहता है कि तुम्हें खुद जानने की कोई जरूरत नहीं है। जब भी कोई कहता है विश्वास कर लो, तो वह यह कहता है, तुम्हें अपने पैरों की कोई आवश्यकता नहीं है। जब भी कोई कहता है श्रद्धा करो, तब वह यह कहता है, तुम्हें अपनी आंख की क्या जरूरत? हमारे पास आंख है।
मैंने एक छोटी सी कहानी पढ़ी है। एक गांव में एक आदमी की आंखें चली गईं। वह बूढ़ा था। वह बहुत बूढ़ा था। उसकी कोई नब्बे वर्ष उम्र थी। उसके घर के लोगों ने, उसके आठ लड़के थे, उन आठों ने उससे प्रार्थना की कि आंखों का इलाज करवा लिया जाए। चिकित्सक कहते हैं कि आंखें ठीक हो जाएंगी। उस बूढ़े आदमी ने कहा, मुझे आंखों की क्या जरूरत? मेरे आठ लड़के हैं। उनकी सोलह आंखें हैं। उनकी आठ पत्नियां हैं। उनकी सोलह आंखें हैं। मेरे पास बत्तीस आंखें हैं। मुझे आंख की क्या जरूरत है? मुझे कौन सी जरूरत है आंख की? मैं अंधा भी जी लूंगा। उन लड़कों ने बहुत प्रार्थना की। लेकिन वह बूढ़ा माना नहीं। उसने कहा, मुझे आंख की जरूरत क्या है? मेरे घर में मेरी बत्तीस आंखें हैं।
दिन आखिर बीत गए। एक रात उस भवन में आग लगी। वे बत्तीस आंखें बाहर हो गईं, वह बूढ़ा भीतर रह गया। उस घर में आग लगी, वह बूढ़ा भीतर रह गया, वे बत्तीस आंखें बाहर हो गईं। और तब उसे याद आया कि अपनी ही आंख काम आती है, किसी और की आंख काम नहीं आती है। अपना ही विवेक काम आता है, किसी दूसरे से मिले हुए विश्वास काम नहीं आते हैं।
जीवन में चारों तरफ चौबीस घंटे आग लगी हुई है। हम चौबीस घंटे जीवन की आग में घिरे हुए हैं। वहां अपनी ही आंख काम आ सकती है, किसी और की नहीं--न महावीर की, न बुद्ध की, न कृष्ण की और न राम की। किसी की आंख किसी दूसरे के काम नहीं आ सकती।
लेकिन धार्मिक पुरोहित, धर्म के व्यवसायी, धर्म के नाम पर शोषण करने वाले लोग, वे यह समझाते हैं--विश्वास करो। विवेक की क्या जरूरत है? तुम्हें खुद विचार की क्या जरूरत है? विचार तो उपलब्ध हैं। दिव्य विचार उपलब्ध हैं, इन पर विश्वास करो। और हम उन विचारों पर विश्वास करते रहे हैं और निरंतर नीचे से नीचे चले गए हैं। हमारी चेतना निरंतर नीचे से नीचे चली गई है।
विश्वास से कोई चेतना ऊपर नहीं उठती। विश्वास तो आत्महत्या है। इसलिए मैं नहीं कहता कि किसी बात पर विश्वास करें। मैं कहता हूं: विश्वास से अपने को मुक्त कर लें।
जिस व्यक्ति को भी सत्य को जीवन में अनुभव करना हो, और जिस व्यक्ति को भी परमात्मा के निकट पहुंचना हो, और जिस व्यक्ति को भी प्रभु के प्रकाश और प्रेम को अनुभव करना हो, वह स्मरण रखे, सब भांति के विश्वासों से स्वतंत्र हो जाना पहली शर्त है। स्वतंत्रता, चित्त की स्वतंत्रता, विवेक की स्वतंत्रता पहली शर्त है सत्य को जानने के लिए। और जिसका चित्त स्वतंत्र नहीं है, वह स्मरण रखे, वह और कुछ भी जान ले, सत्य को कभी नहीं जान सकेगा। सत्य के द्वार पर प्रवेश पाने के लिए चेतना का स्वतंत्र होना अत्यंत अनिवार्य है।
विश्वास बांधते हैं, परतंत्र करते हैं। श्रद्धाएं बांधती हैं, परतंत्र करती हैं। शास्त्र और सिद्धांत बांधते हैं और परतंत्र करते हैं। कितनी आश्चर्य की बात है, एक घर में आप पैदा हो जाते हैं, संयोग से वह घर हिंदू का हो या मुसलमान का हो, और जन्म के साथ आपको विश्वास दे दिया जाता है। फिर जीवन भर आप कहेंगे--मैं हिंदू हूं; मुसलमान हूं; ईसाई हूं; जैन हूं। कहीं जन्म के साथ कोई ज्ञान मिलता है? खून से ज्ञान का कोई संबंध है? पैदाइश से कोई धर्म का संबंध हो सकता है? अगर पैदाइश से दुनिया में लोग धार्मिक होते तो सारी दुनिया धार्मिक होनी चाहिए थी। यह दुनिया इतनी अधार्मिक है, इस बात का सबूत है कि जन्म के साथ धर्म का कोई संबंध नहीं हो सकता है। लेकिन हम सब जन्म से धार्मिक बने हुए हैं। और ये जन्म से बने हुए धार्मिक ही सारे उपद्रव का कारण हैं। दुनिया में इनके कारण ही धर्म का अवतरण नहीं हो पाता है।
जन्म से कोई धार्मिक नहीं होता, जीवन से धार्मिक होता है। जन्म से किसी का कोई संबंध किसी विश्वास से होने का कोई कारण नहीं है। लेकिन इसके पहले कि हमारा विवेक जाग्रत हो, हमारा समाज, हमारा परिवार, हमारे मां-बाप, शिक्षक, उपदेशक हमें विश्वास पकड़ा देते हैं। इसके पहले कि विवेक मुक्त आकाश में विचरण करे, विश्वास की जंजीरें उसे जमीन पर रोक लेती हैं और बांध लेती हैं। फिर जीवन भर हम उसी विश्वास के घेरे में लड़खड़ाते रहते हैं। फिर हम कभी सोच नहीं पाते। जिस आदमी का कोई भी विश्वास है, जिसकी कोई बिलीफ है, वह आदमी कभी विचार नहीं कर सकता, क्योंकि हमेशा वह अपने विश्वास के बिंदु से देखना शुरू करता है। वह जो भी विचार करेगा, वह पक्षपातग्रस्त होगा। वह जो भी विचार करेगा, वह उसकी पूर्वधारणा में आबद्ध होगा। वह जो भी विचार करेगा, वह हमेशा उधार और झूठा होगा। उसका निज का नहीं हो सकता है। और जो विचार अपना न हो, जो विवेक अपना न हो, वह असत्य है। उसकी कोई सच्चाई नहीं है। वह कोई वास्तविक आधार नहीं है जिस पर जीवन खड़ा किया जा सके।
तो देश भर में लोगों से यही पूछ रहा हूं, आपके पास विश्वास तो बहुत हैं, कोई विचार भी है? वे कहेंगे, बहुत विचार हैं। मैं पूछता हूं, उसमें कोई आपका है? अपना है? या कि सब दूसरों के हैं? जो संपत्ति दूसरों की है, उससे आपके जीवन को कौन सा प्राण मिलेगा?
लेकिन हमारी सारी विचार की संपत्ति उधार है और पराई है और दूसरों की है। यह चित्त की पहली परतंत्रता है और चित्त को सबसे पहले इस परतंत्रता से मुक्त होना ही चाहिए। मनुष्य का नया जन्म तभी संभव होता है जब उसकी चेतना उधार विचारों और पराई धारणाओं से मुक्त हो जाए। इसलिए स्वतंत्रता को मैं पहला तत्व कहता हूं।
जो भी सत्य की खोज में जाना चाहते हैं, जिनके भीतर भी प्यास जगी है कि वे जानें कि जीवन का अर्थ क्या है? जिनके भीतर भी यह अभीप्सा सरकी है कि वे समझें कि यह सब जो है विराट, यह जो चारों तरफ फैली हुई सत्ता है, इसका प्रयोजन क्या है? यदि वे चाहते हैं कि जानें कि क्या है अमृत और क्या है आनंद और क्या है परमात्मा? तो स्मरण रखें, पहली शर्त, पहली भूमिका होगी, वे अपने चित्त को स्वतंत्रता की तरफ ले जाएं, चित्त को स्वतंत्र कर लें। अगर अंततः स्वतंत्रता चाहिए, तो प्रथम चरण में ही स्वतंत्रता के आधार रख देने होंगे।
लेकिन हम सारे बंधे हुए लोग हैं। हम सारे लोग किसी न किसी विश्वास से बंधे हुए हैं। और क्यों बंधे हुए हैं? इसलिए बंधे हुए हैं कि ज्ञान के लिए साहस और श्रम करना होता है। और विश्वास के लिए कोई साहस और कोई श्रम करने की जरूरत नहीं है। विश्वास करने के लिए किसी तरह की तपश्चर्या की, किसी तरह की साधना की कोई जरूरत नहीं है। किसी दूसरे पर विश्वास कर लेने के लिए आपके भीतर अत्यंत साहस की कमी, श्रम की कमी, तपश्चर्या की कमी, गहरा आलस्य और तामसिक वृत्ति हो, तो विश्वास सहज हो जाता है। जो खुद नहीं खोजना चाहता, वह मान लेता है कि जो दूसरे कहते हैं, ठीक ही कहते होंगे।
सत्य के प्रति जिसके मन में कोई श्रद्धा नहीं है, वही सत्य के संबंध में प्रचलित सिद्धांतों में श्रद्धा कर लेता है। सत्य के प्रति जिसकी प्यास सच्ची नहीं है, वही केवल दूसरों के दिए हुए विचारों पर विश्वास कर लेता है। अगर सत्य की अभीप्सा हो, तो कोई किसी धर्म में, कोई किसी सिद्धांत में, कोई किसी संप्रदाय में आबद्ध नहीं होगा। खोजेगा, निज खोजेगा। अपने सारे प्राणों की शक्ति लगा कर खोजेगा। और जो उस भांति खोजता है, वह निश्चित पा लेता है। और जो इस भांति विश्वास करता चला जाता है, वह जीवन तो खो देता है, लेकिन जीवन-सत्य उसे उपलब्ध नहीं होता है।
जीवन-सत्य की उपलब्धि श्रम मांगती है और तप मांगती है। लेकिन हम विश्वास कर लेते हैं। हम डरे हुए भयभीत लोग हैं। हम किसी के चरण पकड़ लेते हैं। हम किसी की बांह पकड़ लेना चाहते हैं और जीवन के समाधान को उपलब्ध हो जाना चाहते हैं। किसी गुरु की, किसी साधु की, किसी संत की छाया में हम भी तैर जाना चाहते हैं और तर जाना चाहते हैं। यह असंभव है। यह बिलकुल ही असंभव है। इससे ज्यादा असंभव कोई दूसरी बात नहीं हो सकती है।
स्वतंत्रता चित्त की अनिवार्य शर्त है।
कैसे हमारा चित्त स्वतंत्र हो? कैसे हम चित्त को स्वतंत्र करें और मुक्त करें? यह बंधा हुआ चित्त, जो ढांचों में कैद है, इसे हम कैसे इन पिंजड़ों के बाहर ले जाएं? उस संबंध में ही चाहूंगा कि इन तीन-चार चर्चाओं में विस्तार से आपसे बात कर सकूं। क्योंकि मनुष्य के सामने सबसे बड़ी समस्या उसकी चित्त की मुक्ति और स्वतंत्रता की है। प्रश्न परमात्मा का नहीं है, प्रश्न चित्त की स्वतंत्रता का है।
मेरे पास लोग आते हैं, वे पूछते हैं, ईश्वर है? तो मैं उनसे कहता हूं, ईश्वर की फिकर छोड़ दो, मुझे यह बताओ कि तुम्हारा चित्त स्वतंत्र है? कोई मुझसे पूछे, आकाश है? कोई मुझसे पूछे, सूरज है? तो उससे मैं क्या कहूंगा? उससे मैं कहूंगा, तुम्हारी आंखें खुली हैं? सूर्य तो है, लेकिन सूर्य के होने के लिए आंखों का खुला होना चाहिए। परमात्मा तो है, लेकिन परमात्मा को होने के लिए चित्त का खुला होना चाहिए। बंधे हुए चित्त और बंद आंखें उसे कैसे देख सकेंगी?
जो विश्वास में ग्रस्त है, उसकी आंखें बंद हैं और चित्त बंधा हुआ है। जिसने कोई भी मान्यता बना ली है, कोई भी कंसेप्शन बना लिया है, कोई भी धारणा बना ली है, जिसने जानने के पहले कोई मान्यता बना ली है, उस आदमी का चित्त बंद हो गया। उसने अपने द्वार बंद कर लिए। और अब वह पूछता है कि परमात्मा है? सत्य है?
निश्चित ही बंद मन के लिए न सत्य है, न परमात्मा है। इसलिए असली प्रश्न, असली सवाल, असली समस्या ईश्वर के होने, न होने की नहीं है; न आत्मा के होने और न होने की है; न सत्य के होने और न होने की है। असली समस्या है: वह चित्त आपके पास है जो जान सके? उस चित्त के बिना कोई मार्ग जीवन की उपलब्धि का, जीवन की सार्थकता को जानने का न है, न कभी था और न कभी हो सकता है। केवल वे ही जान सकते हैं जिनका विवेक परिपूर्ण रूप से मुक्त होकर जानने में समर्थ है।
कैसे हम अपने चित्त को मुक्ति की ओर ले जाएं? कैसे उसके द्वार खोलें? कैसे उसकी खिड़कियां खुलें और उनमें प्रकाश आ सके? कैसे हमारी आंख खुले और हम देख सकें जो है। जब भी हम कुछ मान लेते हैं तो हमारी आंख पर एक पर्दा पड़ जाता है और हम उसे देख नहीं पाते जो है, बल्कि उसे देखने लगते हैं जिसे हम मानते हैं।
लोगों ने कृष्ण के दर्शन किए हैं, राम के दर्शन किए हैं, क्राइस्ट के दर्शन किए हैं, बुद्ध के दर्शन किए हैं। ये दर्शन हो सकते हैं। अगर हम किसी बात को मान लें, विश्वास कर लें, आग्रहपूर्वक चित्त में उसे ग्रहण कर लें और फिर निरंतर उसका स्मरण करें और निरंतर उसका विचार करें और अपने को आत्म-सम्मोहित कर लें; उपवास से और तप से, निरंतर चिंतन और मनन से, निरंतर विचार और विश्वास से अगर हम अपने को पूरा का पूरा ग्रसित कर लें, तो हमें दर्शन हो सकते हैं। और वे दर्शन सत्य के नहीं होंगे। वे हमारी ही कल्पना के दर्शन होंगे। वे हमारे ही विचार के दर्शन होंगे। वे हमारी मान्यता का ही प्रोजेक्शन, प्रक्षेप होगा। वह हमारा ही स्वप्न होगा जो हमने पैदा किया है। इसलिए दुनिया में अलग-अलग धर्मों के लोग अलग-अलग ढंग से दर्शन कर लेते हैं। वे दर्शन वास्तविक नहीं हैं।
वास्तविक दर्शन के लिए तो जरूरी है, परमात्मा जैसा है उसे जानने के लिए, सत्य जैसा है उसे जानने के लिए तो जरूरी है कि हम अपनी सारी कल्पनाओं को और धारणाओं को छोड़ दें। हमारी सारी कल्पनाएं शून्य हो जाएं। हमारे सारे विचार विलीन हो जाएं। हमारे अपने भीतर कोई मान्यता न हो और फिर हम देख सकें। मान्यता-शून्य जो दर्शन है, वह तो सत्य का दर्शन है; मान्यता के आधार पर जो दर्शन है, वह अपनी ही कल्पना का प्रक्षेप है, अपनी ही कल्पना का दर्शन है।
इस तरह का दर्शन धार्मिक दर्शन नहीं है; इस तरह का दर्शन एक मानसिक कल्पना और स्वप्न का दर्शन है। यह अनुभूति वास्तविक नहीं है। यह अनुभूति तैयार की हुई, बनाई गई, अपने ही मन से सृष्ट है। हमने ही उसे निर्मित किया है।
और दुनिया में बहुत लोगों ने इस भांति परमात्मा के दर्शन किए हैं। वे परमात्मा के दर्शन नहीं हैं, क्योंकि परमात्मा का कोई रूप नहीं है और उसका कोई आकार नहीं है। और सत्य की कोई मूर्ति नहीं है, और सत्य के कोई गुण नहीं हैं। उस सत्य को, जो समस्त में व्याप्त है, जानने के लिए मुझे परिपूर्ण रूप से शांत और शून्य हो जाना जरूरी है। अगर मेरा चित्त बिलकुल निर्विकल्प हो, शांत और सरल हो; अगर मेरे चित्त में कोई विचार न बहते हों, कोई कल्पनाएं न उठती हों; अगर मेरा चित्त बिलकुल ही मौन हो, तो उस मौन में मैं किसे जानूंगा? उस मौन में भी कुछ जाना जाता है। उस शून्य में भी किसी से संबंध और संपर्क हो जाता है। उस शांति में भी कहीं किसी अलौकिक सत्ता से संबंध स्थापित हो जाता है। वही संबंध, वही संपर्क, वही समझ, वही बोध, वही प्रतीति परमात्मा की और सत्य की प्रतीति है।
उस तक जाने के लिए जरूरी है, जैसा मैंने कहा: पहला चरण जरूरी है कि चित्त स्वतंत्र हो जाए। विश्वास से मुक्त हो जाए। संप्रदाय और सिद्धांत की धूल झाड़ दी जाए और अलग कर दी जाए।
कितने ग्रसित हम हैं और कितने भरे हुए हम हैं! कितना ज्यादा विचार का, सिद्धांत का, शास्त्र का हमारे ऊपर भार है! हम उससे दबे जा रहे हैं। कोई पांच हजार साल से मनुष्य चिंतन करता है। पांच हजार साल का चिंतन का भार एक-एक छोटे-छोटे आदमी के सिर पर है। पांच हजार वर्षों में जो भी विचार हुए हैं, उनका भार हमारे ऊपर है। उस भार के कारण चित्त मुक्त नहीं हो पाता, ऊपर नहीं उठ पाता। हम जब भी विचार करना शुरू करते हैं, उसी भार के घेरे में घूमने लगते हैं। वे ढांचे हैं, उन्हीं में हम चलने लगते हैं। जैसे कोल्हू का बैल चलता है अपने रास्ते पर, वैसे ही हमारा चित्त चलता है। इसके पहले कि किसी को सत्य के अज्ञात जगत में प्रवेश करना हो, उसे सारे ज्ञात मार्गों को छोड़ देना बहुत-बहुत आवश्यक है। वह जो भी हम जानते हैं, उसे छोड़ देना जरूरी है, ताकि ज्ञान उत्पन्न हो सके। और जो भी हम मानते हैं, उसे हटा देना जरूरी है, ताकि उसका दर्शन हो सके जो है।
एक तो हौजों में भरा हुआ पानी होता है। ऊपर से पानी भर देते हैं। ईंट-गारे से जोड़ देते हैं हौज को, ऊपर से पानी भर देते हैं। एक कुएं का भी पानी होता है। उसमें जितना भी मिट्टी और पत्थर है, उसे निकाल बाहर कर देते हैं और तब नीचे से जल-स्रोत आते हैं। हौज का पानी थोड़े ही दिन में गंदा हो जाएगा। वह भरा हुआ है। और जिसके जल-स्रोत हैं कुएं के, उसका पानी गंदा नहीं होगा। उसके तो प्राणों का संबंध बहुत गहरे तल से है, जहां बहुत जल है। वह तो अंततः सागर से जुड़ा है। हौज किसी से नहीं जुड़ी है। उसमें ऊपर से पानी भरा है। कुआं तो अंततः सागर से जुड़ा है। उसमें ऊपर से कुछ नहीं भरा गया है।
दो तरह के ज्ञान भी होते हैं। एक तो हौज का ज्ञान होता है जो ऊपर से भर दिया जाता है। वह बहुत जल्दी सड़ जाता है। इसलिए दुनिया में पंडित के मस्तिष्क से सड़ा हुआ मस्तिष्क और कोई मस्तिष्क नहीं होता। वह सोच-विचार करने में असमर्थ ही होता है। उसकी स्थिति अत्यंत पंगु, क्रिपिल्ड होती है। उसका सब भरा हुआ रहता है। वह उसी को दोहराता है। वह मशीन की भांति होता है। इसलिए पंडित की बातें बिलकुल यंत्र की भांति चलती हैं। उससे कुछ भी पूछिए, सब पहले से तैयार है। प्रश्न बाद में है, समाधान पहले है। उत्तर उसे मालूम है। उत्तर ऊपर से भर दिए गए हैं। अब तो पश्चिम में, हमारे मुल्क में भी जल्दी आ जाएंगी, वे मशीनें तैयार हो गई हैं, जिनसे आप प्रश्न पूछें, वे उत्तर दे देंगी। पंडितों की दुनिया में अब जरूरत नहीं रह जाएगी। क्योंकि मशीनें होंगी, जिनमें प्रश्न पहले से भरे हुए हैं, उत्तर भरे हुए हैं। आप प्रश्न लगा दीजिए, कि पांचवां प्रश्न, वे उत्तर दे देंगी। मशीन भीतर से उत्तर दे देगी कि यह उत्तर है। अब पंडित की दुनिया में कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि मशीनें उसका काम कर देंगी और ज्यादा कुशलता से कर देंगी। और मशीनों में एक और भी सुविधा होगी, वे किसी को लड़ाएंगी नहीं, झगड़ा नहीं खड़ा करवाएंगी। एक पंडित के खिलाफ दूसरे पंडित को खड़ा नहीं करेंगी। विवाद नहीं करेंगी। सिर्फ उत्तर देंगी।
यह ऊपर से भरा हुआ जो ज्ञान है, घातक है। यह मस्तिष्क को मुक्त नहीं करता, मस्तिष्क को बांध देता है और खंडित कर देता है। उसकी क्षमता उड़ने की तोड़ देता है, उसके पंख नष्ट कर देता है। एक दूसरा ज्ञान है जो भीतर से आता है, कुएं के जल की तरह आता है। निश्चित ही दोनों की प्रक्रिया बिलकुल अलग और विरोधी है। कुएं में मिट्टी को, पत्थर को बाहर निकालना पड़ता है; और हौज में मिट्टी और पत्थर को जोड़ना पड़ता है। एक में पानी आता है, एक में पानी डालना पड़ता है।
क्या आप ज्ञान को हौज की तरह इकट्ठा कर रहे हैं? अगर इकट्ठा कर रहे हैं तो सावधान हो जाएं। आप अपने ही हाथ से अपने मस्तिष्क को नष्ट कर रहे हैं। वह मस्तिष्क जो कि परमात्मा तक उड़ सकता है, आप उसको जमीन से बांध रहे हैं।
बाहर से ज्ञान न इकट्ठा करें। भीतर से ज्ञान को आने दें। भीतर से ज्ञान के आने देने के लिए जरूरी है कि ईंट-पत्थर जो इकट्ठे कर लिए हैं वे अलग कर दिए जाएं। जितना ज्ञान हमने इकट्ठा कर लिया है, उसे हम हटा दें, सरल हो जाएं। अगर ज्ञान को हम हटा दें और सरल हो जाएं तो कुछ आपके भीतर से नई ऊर्जा का जन्म आपको अनुभव होगा। कोई चीज पैदा होनी शुरू हो जाएगी।
और जगत में संपत्ति को छोड़ना आसान है, विचार को छोड़ना कठिन है। निश्चित ही, आप पूछेंगे, कैसे अलग कर दें? विचार को छोड़ना बहुत कठिन है। एक आदमी साधु हो जाता है। संपत्ति छोड़ देता है, घर छोड़ देता है, मित्र-प्रियजन छोड़ देता है, पत्नी-बच्चे छोड़ देता है; लेकिन जिन विचारों को उसने गृहस्थ रहते हुए पकड़ा था, उनको नहीं छोड़ता। उनको पकड़े रहता है। अगर वह जैन था, तो वह कहता है, मैं जैन साधु हूं। अगर वह मुसलमान था, तो वह कहता है, मैं मुसलमान साधु हूं। अगर वह ईसाई था, तो वह कहता है, मैं ईसाई साधु हूं। जिन विचारों को उसने पकड़ा था, उनको पकड़े रहता है, और सब छोड़ देता है। और गृहस्थी बाहर है। विचार की गृहस्थी भीतर है, और कठिन है छोड़नी। जो उसको छोड़ देता है, वह सत्य को जानने में समर्थ होता है। घर-वर छोड़ने से कोई कभी किसी सत्य को नहीं जान सकता, क्योंकि सत्य में घर की दीवाल बाधा नहीं है। मैं इस घर में बैठा हूं कि दूसरे घर में बैठा हूं, ये दीवालें घर की कोई बाधा नहीं हैं सत्य को जानने में। मैं किनके साथ बैठा हूं, यह भी कोई बाधा नहीं है। मैं कहां हूं, यह भी कोई बाधा नहीं है। सत्य को जानने में एक ही चीज बाधा है कि भीतर जो विचार की दीवाल खड़ी हो जाती है, वही और वही केवल बाधा है। इसलिए निश्चित उसका विसर्जन कठिन है। और जब मैं कहता हूं कि विचार को छोड़ दें, तो प्रश्न उठता है, उसे कैसे छोड़ेंगे? कैसे विचार जाएगा? वह तो निरंतर हमारे भीतर है। जो हमने सीख लिया, उसे हम कैसे भूल सकते हैं?
जरूर जो सीखा गया है, उसे भूलने का रास्ता होता है। और जो इकट्ठा किया गया है, उसे बांट देने का रास्ता होता है। और जो भर लिया गया है, उसे खोल देने का रास्ता होता है। असल में जो भी भीतर लाया गया है, उसे बाहर वापस पहुंचाने का वही रास्ता है जिस रास्ते से वह भीतर लाया गया है। रास्ता हमेशा वही होता है। मैं जिन सीढ़ियों से चढ़ कर ऊपर आया हूं, उन्हीं सीढ़ियों से वापस चला जाऊंगा। और जिस रास्ते से आप तक आया हूं, उसी रास्ते से वापस लौट जाऊंगा। रास्ता हमेशा वही होता है, आने और जाने में रास्ते का फर्क नहीं पड़ता, केवल दिशा का फर्क पड़ता है, मुंह के बदल लेने का फर्क पड़ता है।
जिन-जिन रास्तों से हमने विचार को इकट्ठा किया है, उनके विपरीत मुंह कर लेने से विचारों को विसर्जित भी किया जा सकता है। किन-किन रास्तों से हमने विचार को इकट्ठा किया है? विचार को इकट्ठा करने में सबसे महत्वपूर्ण, सबसे गहरा जो तल है, वह है ममत्व का। वह इस भाव का कि वे मेरे हैं। लगता है विचार मेरे हैं।
कोई विचार आपका है? अगर मैं विवाद करने लगूं, तो आप कहेंगे, मेरा विचार ठीक है। थोड़ा विचार करिए, आपका कोई विचार है? या कि सब विचार बाहर से आए हैं? व्यर्थ ही हम कहते हैं कि मेरा विचार। जो लोग कहने लगते हैं--मेरी कोई पत्नी नहीं है, मेरा कोई बच्चा नहीं है, मेरा कोई मकान नहीं है; वे भी कहते हैं--मेरा धर्म! वे भी कहते हैं--मेरा विचार! मेरा दर्शन! उनको भी वह विचार के तल पर जो ममत्व का भाव है, मेरे होने का भाव है, नहीं जाता। और जिनका उस तल पर ममत्व का भाव नहीं गया है, उनका किसी तल पर ममत्व का भाव नहीं जाएगा। वे चाहे कितना ही कहें कि मेरी पत्नी नहीं है यह, लेकिन बहुत गहरे में उनका यह भाव रहेगा कि यह मेरी पत्नी है।
स्वामी रामतीर्थ अमरीका से वापस लौटे। सारे यूरोप में, सारे अमरीका में उन्होंने बड़ी तत्वदर्शन की चर्चा की। उनका बड़ा प्रभाव हुआ। लाखों-करोड़ों लोगों ने उन्हें पूजा और माना। फिर वे भारत वापस लौट आए। फिर वे कुछ दिन तक हिमालय में थे। उनकी पत्नी उनसे मिलने गई, तो स्वामी राम ने मिलने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, मैं नहीं मिलूंगा। तो उनके पास सरदार पूर्णसिंह नाम के एक व्यक्ति रहते थे, वे बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहा कि मैंने आपको कभी किसी स्त्री को इनकार करते नहीं देखा। यूरोप में, अमरीका में हजारों स्त्रियां आपसे मिलीं और आपने कभी किसी को इनकार नहीं किया। इस स्त्री को इनकार क्यों करते हैं? क्या किसी तल पर अब भी इसे अपनी पत्नी नहीं मान रहे हैं? छोड़ कर चले गए थे उसे। लेकिन अपनी पत्नी से मिलने को इनकार कर रहे हैं। जरूर किसी तल पर वे मान रहे हैं कि वह पत्नी उनकी है। अन्यथा और स्त्रियां आती हैं, उन्हें मिलने से इनकार उन्होंने कभी किया नहीं।
जब तक आपका विचार पर ममत्व है, तब तक आप इस भ्रम में मत रहें कि आप कुछ भी छोड़ सकते हैं। क्योंकि असली पकड़ और संपत्ति तो केवल विचार की है, बाकी सारी चीजें बाहर हैं, उनकी कोई पकड़ नहीं है। पकड़ तो सिर्फ विचार की है। तो वह जो विचार का घेरा है, वह जो विचार की संपत्ति है, जिससे आपको लगता है कि मैं कुछ जानता हूं। विचारणीय है, क्या उसमें कुछ भी आपका है?
एक बहुत बड़ा साधु था। कुछ ही दिन पहले उसके आश्रम में एक युवा संन्यासी आया। दो-चार-दस दिन तक उस संन्यासी की बातें उसने सुनीं। वह जो वृद्ध साधु था, उसकी बातें बड़ी थोड़ी सी थीं। और युवा संन्यासी थक गया उन्हीं-उन्हीं बातों को बार-बार सुन कर और उसने सोचा, इस आश्रम को छोडूं, यहां तो सीखने को कुछ दिखाई नहीं पड़ता। और तभी एक और संन्यासी का आगमन आश्रम में हुआ। रात्रि को उस संन्यासी ने जो चर्चा की, वह बहुत अदभुत थी, बहुत गंभीर थी, बहुत सूक्ष्म थी, बहुत गहरी थी। यह युवा संन्यासी उसकी बातें सुना, उस आगंतुक संन्यासी की, अतिथि की, और इसको लगा कि गुरु हो तो ऐसा हो, जिसके पास ऐसा ज्ञान है, इतना गंभीर और गहरा। और एक यह वृद्ध संन्यासी है, जिसके आश्रम में मैं रुका हूं आकर। इसको तो थोड़ी सी बातें आती हैं, और कुछ आता नहीं। फिर उसे यह भी लगा कि यह वृद्ध संन्यासी इस युवा संन्यासी की बातें सुन कर मन में कैसा दुखी नहीं होता होगा? कैसा इसे नहीं अपमान अनुभव होता होगा? यह तो कुछ भी नहीं जानता। जीवन इसने व्यर्थ गंवा दिया है।
उस नये आए साधु ने अपनी बात पूरी की और गौरव से सबकी तरफ देखा कि उन पर क्या प्रभाव पड़ा। उसने वृद्ध साधु की तरफ भी देखा। वह वृद्ध साधु बोला कि मैं दो घंटे से बहुत स्मृतिपूर्वक सुन रहा हूं, लेकिन मैं देखता हूं कि तुम तो बोलते ही नहीं।
उस संन्यासी ने कहा, आप पागल तो नहीं हैं? दो घंटे से मैं ही बोल रहा हूं, और तो सब लोग चुप हैं। और आप कहते हैं कि दो घंटे से आप सुन रहे हैं और मैं बोलता नहीं हूं!
उस साधु ने कहा, निश्चित ही मैंने बहुत गौर से सुना, तुम कुछ भी नहीं बोले। जो भी तुम बोले, सब दूसरों का है। कोई विचार तुम्हारी अपनी अनुभूति से नहीं है। और इसलिए मैं कहता हूं कि तुम नहीं बोले। दूसरे तुम्हारे भीतर से बोले, लेकिन तुम नहीं बोले।
विचार की मुक्ति के लिए और विचार की स्वतंत्रता के लिए और विवेक के जागरण के लिए, पहली बात, पहला बोध, विचार कोई भी मेरा नहीं है। कोई भी विचार मेरा नहीं है। वह जो मेरे का संबंध है विचार से, उसे देख लें, वह आपका सच नहीं है, वह झूठ है। कोई विचार मेरा नहीं है। वह जो तादात्म्य है विचार से, उसे तोड़ दें।
हम हर विचार से अपना तादात्म्य कर लेते हैं। हम कहते हैं: जैन धर्म मेरा; हिंदू धर्म मेरा; राम मेरे; कृष्ण मेरे; क्राइस्ट मेरे; हम तादात्म्य कर लेते हैं। हम अपने मैं से उनको जोड़ लेते हैं। बड़ा आश्चर्य है!
कोई विचार आपका नहीं है। कोई धर्म आपका नहीं है। यह स्मरणपूर्वक अगर प्रज्ञा में प्रतिष्ठित हो जाए यह बोध कि कोई विचार मेरा नहीं है। आप सारे विचारों को फैला कर देख लें, वे कहीं से आए होंगे। जैसे वृक्ष पर आते हैं पक्षी और संध्या बसेरा करते हैं, ऐसे ही विचार मन में आते और निवास करते हैं। आप केवल एक धर्मशाला की तरह हैं, जहां लोग ठहरते हैं और चले जाते हैं।
एक सराय का मुझे स्मरण आता है। एक छोटी सी सराय थी, वहां कुछ लोग आ रहे थे संध्या को ठहरने को। कुछ लोग जिनका काम पूरा हो गया, वे संध्या को विदा हो रहे थे। और एक फकीर उस सराय के बाहर बैठा था और हंस रहा था। एक नया-नया आदमी भीतर सराय में आ रहा था, उसने उस फकीर से पूछा, हंसते क्यों हो? उसने कहा, इस सराय को देख कर मुझे अपने मन का खयाल आ गया, इसलिए हंसी आ गई। ऐसे ही कुछ विचार आते हैं और कुछ चले जाते हैं। और मन केवल सराय है। और कोई भी विचार उसका अपना नहीं है। मन केवल सराय है। वहां ठहरते हैं विचार और चले जाते हैं।
जरा अपने मन को गौर से देखें, तो पता चलेगा, कल जो विचार थे, वे आज नहीं हैं; परसों जो विचार थे, वे आज नहीं हैं; साल भर पहले जो विचार थे, वे आज नहीं हैं; दस साल पहले जो विचार थे, वे आज नहीं हैं; बीस साल पहले जो विचार थे, उनका कोई पता नहीं है। इन पिछले, अगर आप पचास साल जीए हैं, या चालीस साल, या तीस साल, या बीस साल, तो लौट कर देखें, बीस साल में कौन से विचार आपके रहे हैं? विचार आए हैं और गए हैं। और आप केवल सराय हैं, ठहरने की जगह हैं। और फिर भूल से समझ लेते हैं कि मेरे हैं। जैसे ही समझ लेते हैं कि मेरे हैं, वैसे ही विचार को पकड़ मिल जाती है और दीवाल बननी शुरू हो जाती है।
पहला स्मरण, चित्त की स्वतंत्रता के लिए जरूरी है, जानें कि कोई विचार आपका नहीं है। अगर कोई विचार आपका नहीं है और विचार आते हैं और चले जाते हैं, तो आप कौन हैं फिर? आप क्या हैं वहां? आप निश्चित ही साक्षी से ज्यादा नहीं हैं। आप निश्चित ही देखने वाले से ज्यादा नहीं हैं। आप वहां केवल एक दर्शक हैं।
लेकिन हम तो नाटक में भी तादात्म्य कर लेते हैं। हम तो फिल्म में भी तादात्म्य कर लेते हैं। वहां फिल्म चलती हो और कोई दुखद चित्र आता हो तो हमारे आंसू बहने लगते हैं। और यह छोटे-मोटे आदमी की बात नहीं है।
बंगाल में एक बहुत बड़े विचारक हुए, ईश्वरचंद्र विद्यासागर। वे तो विद्या के सागर समझे जाते थे। एक छोटा सा नाटक हो रहा था कलकत्ते में। उस नाटक को वे देखने गए। उस नाटक में एक पात्र था, जो एक महिला पर अनाचार करता है, अत्याचार करता है। वह अत्याचार करने लगा, वह उस स्त्री को सताने लगा और विद्यासागर इतने गुस्से में आ गए कि उठ कर उन्होंने अपना जूता निकाला और उसको मार दिया, नाटक में! और वे विद्या के सागर समझे जाते थे। उन्होंने जूता मार दिया उठ कर उसे। वह जो अभिनेता था, उनसे ज्यादा समझदार रहा होगा। उसने जूते को लिया और नमस्कार किया और उसने कहा कि मैं सफल हो गया। इतने बड़े आदमी ने भी धोखा खा लिया। उसने कहा, यह मेरा पुरस्कार जीवन का हुआ। इससे बड़ा पुरस्कार मुझे कभी नहीं मिला। यानी मेरे अभिनय की कुशलता सफल हो गई।
बाद में बहुत घबड़ाए विद्यासागर और कहने लगे, यह क्या भूल मुझसे हो गई! लेकिन मैं भूल ही गया कि यह मामला नाटक का है और मैंने तादात्म्य कर लिया।
इस जीवन में विचार के तल पर भी हम दर्शक से ज्यादा नहीं हैं, लेकिन हम विचार से तादात्म्य कर लेते हैं। वे जो विचार मन के पर्दे पर आते और जाते हैं, उनके हम सिर्फ साक्षी हैं।
खयाल करें, रात आपने स्वप्न देखे, सुबह आप उठे, आप कहते हैं कि स्वप्न आए और गए। फिर आपने दिन देखा। आप बच्चे थे, आपने बचपन देखा। फिर युवा हुए। फिर बूढ़े हुए। जरा खयाल करें कि आपके भीतर कौन सा तत्व शाश्वत पूरे वक्त मौजूद है? सतत मौजूद है?
सिवाय देखने वाले के और कोई मौजूद नहीं है। बाकी सब आता है और चला जाता है। बचपन आता है, चला जाता है; जवानी आती है, चली जाती है; बुढ़ापा आता है, चला जाता है। जन्म होता है, मृत्यु हो जाती है; सुख आते हैं, दुख आते हैं; धूप आती है, छाया आती है; सम्मान आता है, अपमान आता है। लेकिन ये सारी चीजें आती हैं और जाती हैं। पूरे जीवन में कौन सा तत्व है जो न आता है और न जाता है? वह सिर्फ देखने वाले के सिवाय और कोई दूसरा तत्व नहीं है। वह जो इन सबको देखता है। वह जो देखता है कि धूप आई, जो देखता है कि धूप गई; जो देखता है कि युवा हुआ, जो देखता है कि बूढ़ा हो गया; जो देखता है कि एक विचार आया, जो देखता है कि दूसरा विचार गया। एक देखने वाले सूत्र के सिवाय आपके भीतर बाकी सब आता है और जाता है। बाकी कोई तत्व टिकता नहीं है। हां, एक चीज टिकी रहती है, वह है देखने की शक्ति और देखने की क्षमता और वह द्रष्टा होने का, वह साक्षी होने का भाव।
विचार के तल पर साक्षी हो जाएं। विचार को देखें, पकड़ें नहीं। विचार को बांधें नहीं, देखें। मात्र साक्षी होकर देखें।
लेकिन हम साक्षी नहीं हो पाते, क्योंकि हमने मान रखा है कि कुछ विचार बुरे हैं और कुछ अच्छे हैं। इसलिए हम अच्छे को पकड़ना चाहते हैं, बुरे को धक्का देना चाहते हैं। इसलिए हम साक्षी नहीं हो पाते। अच्छे और बुरे का जो भेद करता है, वह साक्षी नहीं हो सकता। जो अच्छे-बुरे का भेद करता है विचार में कि यह विचार अच्छा है, तो जो अच्छा है उसे पकड़ना चाहता है और जो बुरा है उसे हटाना चाहता है।
विचार केवल विचार है। विचार न अच्छा होता है, न बुरा होता है, विचार न अच्छा होता है, न बुरा होता है। विचार केवल विचार है। जैसे ही हमने अच्छा और बुरा कहा, वैसे ही हम एक को पकड़ने और दूसरे को छोड़ने में लग जाएंगे। और जो एक को पकड़ेगा और दूसरे को छोड़ेगा, वह समझ ले, अच्छे और बुरे जिन्हें हम कह रहे हैं, वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो अच्छे को पकड़ेगा, बुरा भी बच जाएगा; और जो बुरे को धकाएगा, तो अच्छा भी धकेगा। वे दोनों संयुक्त हैं।
विचार संयुक्त है। और इसीलिए जिसको हम अच्छा आदमी कहते हैं, आप यह मत सोचें कि उसके भीतर बुरे विचार नहीं हैं। उसके भीतर बुरे विचार हैं। ऐसा अच्छा आदमी आप नहीं खोज सकते जिसके भीतर बुरे विचार न हों और ऐसा बुरा आदमी भी नहीं खोज सकते जिसके भीतर अच्छे विचार न हों। हां, ऐसा आदमी जरूर होता है जिसके भीतर विचार ही न हों। वह बिलकुल अलग बात है। वह बिलकुल अलग बात है। उसके बाबत मैं नहीं अभी चर्चा कर रहा। ऐसा आदमी होता है जिसके भीतर विचार ही न हों। वह न अच्छा है, न बुरा है। वह तो आदमी के भी ऊपर गया। वह अच्छाई और बुराई के ऊपर गया। उसको मैं साधु कहता हूं। उसने ही जाना। जो अच्छे को पकड़ता है, वह स्मरण रखे, अभी बुरा उसके भीतर रहेगा।
इसलिए आप यह जान कर हैरान होंगे, जो सज्जन है वह स्वप्न में वह काम करता है, जो दुर्जन दिन में जागने में करता है। क्योंकि बुरा विचार उसके भीतर है। जो दुर्जन जागने में करता है, सज्जन सपने में करता है। और आप बहुत हैरान होंगे जान कर कि बुरे आदमी बुरे सपने नहीं देखते; अच्छे आदमी बुरे सपने देखते हैं। बुरे आदमी अच्छे सपने देखते हैं। बुरे आदमी साधु होने के सपने देखते हैं और अच्छे आदमी असाधु होने के सपने देखते हैं। जिसको उन्होंने होश में पकड़ा है और जिसको धकाया है, वह बेहोशी में वापस लौट आता है। वह तो मौजूद था, लेकिन होश में आप उसे प्रकट नहीं होने देते थे। वह बेहोशी में प्रकट होता है।
अगर दुनिया के सज्जन लोगों का मन खोल कर रखा जाए, तो जितने पाप वे लोग करते हैं जो कि जेलखानों में बंद हैं, उतने पाप वे भी मन में करते हैं। उसमें कोई बहुत भेद नहीं है। वे सारे के सारे वे ही पाप जो दुर्जन करता है, वे सज्जन भी करते हैं। वे मन में ही करते हैं, दुर्जन बाहर कर देता है। और वे सारी अच्छी बातें जो सज्जन करता है, उनकी कल्पना दुर्जन भी करते रहते हैं। उनके सपने वे भी देखते रहते हैं। वे दोनों ही पहलू साथ ही रहते हैं। कोई अच्छा आदमी ऐसा नहीं होता कि उसकी पीठ के साथ बुरा आदमी न जुड़ा हो। और कोई बुरा आदमी ऐसा नहीं होता कि उसकी पीठ के पास ही अच्छा आदमी न खड़ा हो। जिसे हम दबा देते हैं, वह पीछे दब जाता है; जिसे उभार लेते हैं, वह ऊपर निकल आता है। जैसे सिक्के का चेहरा हम ऊपर कर लें, तो पीठ नीचे चली जाती है; और पीठ ऊपर कर लें, तो सिक्के का चेहरा नीचे चला जाता है। वैसे ही अच्छा और बुरा एक ही विचार के दो पहलू हैं।
जिसको साक्षी होना है और जिसे सत्य को जानना है, उसे समस्त विचार को मात्र विचार समझना होगा। न कोई अच्छा है, न कोई बुरा है। क्योंकि जैसे ही हमने यह तय किया कि कुछ अच्छा है और कुछ बुरा है, वैसे ही हम एक को पकड़ने में, दूसरे को हटाने में लग जाएंगे और साक्षी नहीं रह सकेंगे। साक्षी होने के लिए जरूरत है कि हम निष्पक्ष हों। हमारी कोई धारणा न हो; हमारी कोई कामना न हो; हमारी कोई कल्पना न हो; हम कुछ आरोपित न करना चाहते हों। विचार जैसे हैं, हम उनको वैसे ही देखने को राजी हों। और यह आश्चर्यजनक तत्व है कि अगर आप विचार के मात्र साक्षी हो जाएं, निर्णय न लें, अच्छा-बुरा न सोचें, कंडेमनेशन न करें, किसी विचार की निंदा और किसी की प्रशंसा न करें, तो आप बहुत हैरान हो जाएंगे--इस भांति जो मात्र साक्षी की तरह चुप, मौन देखता रह गया है, वह धीरे-धीरे पाता है कि विचार विलीन हो गए, विचार शून्य हो गए। उसके चित्त के द्वार पर विचार आने बंद हो जाते हैं जो उनके प्रति समस्त राग के संबंध छोड़ देता है।
समस्त राग के संबंध से अर्थ है: उनके प्रति प्रेम भी छोड़ देता है और उनके प्रति घृणा भी छोड़ देता है। वे दोनों ही राग के संबंध हैं। और जिसको हम प्रेम करते हैं, वह भी हमारे द्वार आता है; और जिसको हम घृणा करते हैं, वह भी हमारे द्वार आता है। मित्र भी हमको घेरे रहते हैं और शत्रु भी हमको घेरे रहते हैं। एक बार मित्र चाहे न भी घेरें, लेकिन शत्रु जरूर घेरे रहते हैं। वे हमारे चित्त में घूमते ही रहते हैं।
अगर कोई आदमी समझ ले कि धन बुरा है, इसका विचार बुरा है, तो वह पाएगा कि चौबीस घंटे धन का विचार ही उसको घेरे हुए है। अगर कोई आदमी समझ ले कि भोजन बुरा है और करना ठीक नहीं है, तो उसका विचार, भोजन का विचार ही उसे घेरे रहेगा। कोई आदमी समझ ले कि सेक्स पाप है, काम पाप है और उससे लड़ने लगे, तो वह पाएगा कि चौबीस घंटे उसका चित्त उसी विचार से घिरा हुआ है। जिस विचार से आप लड़ते हैं, वही विचार आपका आमंत्रण स्वीकार कर लेता है। जिससे आप लड़ते हैं, वही आने लगता है। मन का नियम है: जिससे लड़ेंगे, वही आमंत्रित हो गया। जिसको आपने धक्का दिया, वह आपके धक्का देने के कारण ही आना शुरू हो जाएगा।
इसलिए विचार से न तो लड़ना है, न विचार को स्वीकार करना है। न उसे पकड़ना है, न धक्के देना है। विचार को मात्र देखना है।
बड़े साहस की जरूरत है। क्योंकि बुरा विचार भी आएगा और मन होगा कि धक्का दे दें। और अच्छा विचार आएगा और मन होगा कि पकड़ लें। इस मन की यह जो पकड़ने और धक्का देने की वृत्ति है, इस पर थोड़ा सा बोधपूर्वक, विचारपूर्वक, स्मृतिपूर्वक अगर कोई ध्यान करेगा तो यह वृत्ति धीरे-धीरे शिथिल हो जाती है और आप विचार को देखने में समर्थ हो जाते हैं।
जो व्यक्ति विचार को देखने में समर्थ हो जाता है, वह व्यक्ति विचार से मुक्त होने में समर्थ हो जाता है। जो व्यक्ति विचार को देखने में समर्थ हो जाता है, वह व्यक्ति विचार से मुक्त होने में समर्थ हो जाता है।
हम विचार को देखते ही नहीं। हम कभी रुक कर, ठहर कर देखते नहीं कि वहां क्या चल रहा है? आपने शायद ही कभी देखा हो कि आधा घंटा बैठ कर आपने देखा हो कि क्या आपके भीतर चल रहा है? वह चल रहा है और आप भी चले जा रहे हैं; वह चल रहा है और आप भी काम किए जा रहे हैं; वह चल रहा है, आप खाना खा रहे हैं; वह चल रहा है, आप दुकान जा रहे हैं; वह चल रहा है, आप लिख रहे हैं, बोल रहे हैं; वह चल रहा है, मैं बोल रहा हूं, आप सुन रहे हैं। वह भीतर आपके चले जा रहा है। वह अलग ही चलता जा रहा है। धीरे-धीरे आपने उसकी फिकर ही छोड़ दी है कि भीतर क्या चल रहा है। आप अपना किए चले जा रहे हैं। इसलिए आप करीब-करीब सोए हुए आदमी हैं। भीतर मन कुछ और कर रहा है, आप कुछ और किए चले जा रहे हैं। आप अनुपस्थित आदमी हैं। आप अपने प्रति उपस्थित नहीं हैं। आप अपने प्रति जागे हुए नहीं हैं।
महावीर से किसी ने एक दिन पूछा, साधु कौन है? तो महावीर ने कहा, असुत्ता मुनि। जो सोया हुआ नहीं है, वह साधु है। पूछा, असाधु कौन है? उन्होंने कहा, सुत्ता अमुनि। जो सोया है, वह असाधु है। बहुत अदभुत, बहुत अदभुत सूत्र है। जो सोया है।
तो हम सारे लोग सोए हुए हैं। हम, भीतर क्या चल रहा है, उसके प्रति बिलकुल सोए हुए हैं। और वह भीतर ही हमारा असली होना है। हम उसके प्रति सोए हुए हैं। बाहर क्या चल रहा है, बाहर क्या हो रहा है, उसके प्रति जागे हुए हैं। जो बाहर चल रहा है, उसके प्रति जागे हैं; जो भीतर चल रहा है, उसके प्रति सोए हैं--यही जीवन का दुख और यही जीवन का अज्ञान है और यही जीवन की परतंत्रता और यही उसका बंधन है।
उसके प्रति जागना होगा जो भीतर चल रहा है। तो वह विचार की समस्त धारा के प्रति जो जागेगा, देखेगा, समझेगा, साक्षी होगा, वह एक बड़े अदभुत अनुभव से गुजरता है। उसे अनुभव में आना शुरू होता है: जिन-जिन विचारों का वह विराग-शून्य साक्षी हो जाता है, वे-वे विचार आने बंद हो जाते हैं। जिस-जिस विचार को वह देखने में समर्थ हो जाता है, वह-वह विचार आने में असमर्थ हो जाता है। और एक घड़ी आती है कि विचार नहीं रह जाते। और तब जो शेष रह जाता है, उसका नाम विवेक है। एक घड़ी आती है कि कोई विचार नहीं होता और आप होते हैं। तब जो आपके भीतर जाग गया है, वह मुक्त विवेक है, वह स्वतंत्र हुआ विवेक है। यही स्वतंत्र विवेक सत्य को जानने में समर्थ होता है। परतंत्र विवेक सत्य को जानने में असमर्थ होता है।
स्वतंत्रता पहली भूमिका है। यह स्वतंत्रता साधनी ही होगी। इसे साधे बिना कभी कोई सत्य के संबंध में कोई गति नहीं होगी। कितने ही शास्त्र पढ़ें, कितना ही समझें, कितने ही सिद्धांत याद कर लें। शब्द ही याद हो जाएंगे, और कुछ भी नहीं होगा। और शब्द मस्तिष्क को भर लेंगे। और बहुत शब्द किसी ज्ञान का लक्षण नहीं हैं। शब्द तो पागल में भी बहुत होते हैं। आपसे ज्यादा होते हैं। लेकिन शब्द कोई ज्ञान का लक्षण नहीं हैं। और यह भी आप निश्चित समझें, बहुत शब्द बढ़ जाएं तो आप भी पागल हो सकते हैं। पागल में और सामान्य हममें कोई बहुत भेद नहीं है। हममें शब्द थोड़े अभी कम हैं, उसमें थोड़े और ज्यादा हो गए।
हर आदमी पागलपन के किनारे पर खड़ा रहता है। जरा सा ही धक्का और पागल हो सकता है। शब्द अगर और जोर से घूमने लगें, तो वह पागल हो जाएगा। अभी मनोवैज्ञानिक यह कहते हैं कि हर तीन आदमी में एक आदमी तो करीब-करीब पागल होने की हालत में है। हर तीन आदमी में! यहां जितने लोग हैं, उनमें से एक तिहाई तो पागल होने की हालत में हैं। और आप यह मत सोचना कि आपका पड़ोसी इस हालत में है, क्योंकि यह इस बात का लक्षण है कि आप गड़बड़ हैं। अगर आपको यह खयाल आ जाए कि मेरा पड़ोसी गड़बड़ हालत में है, तो आप समझना कि आप गड़बड़ हालत में हैं। क्योंकि यह, पागल कभी यह नहीं समझ पाता कि वह पागल है। वह हमेशा समझता है कि दूसरे पागल हैं। यानी पागल का एक अनिवार्य लक्षण यह है कि वह हमेशा यह समझता है कि दूसरे लोग पागल हैं। पागल को आप समझा नहीं सकते कि वह पागल है। क्योंकि अगर इतना ही वह समझ जाए तो सबूत हो गया कि वह पागल नहीं है। हम करीब-करीब उस हालत में पहुंचते जा रहे हैं।
अमरीका में इस समय कोई पंद्रह लाख आदमी रोज अपने मस्तिष्क के बाबत सलाह लेते हैं, कि उनका दिमाग कुछ गड़बड़ है। ये तो सरकारी आंकड़े हैं उनके। और पंद्रह लाख अंदाज है कि व्यक्तिगत, प्राइवेट डाक्टर से सलाह लेते होंगे। ये कोई तीस लाख आदमी रोज सलाह ले रहे हैं। और काहे की सलाह ले रहे हैं ये? कि विचार बहुत ज्यादा हैं। और धीरे-धीरे तो इतना ज्यादा होता जा रहा है कि उनका काबू छूटा जा रहा है। अब वे क्या करेंगे, उनकी कुछ समझ में नहीं पड़ रहा है। उनके विचार की गति इतनी तीव्र होती जा रही है कि उनका अपने जीवन पर से काबू छूटा जा रहा है।
आप भी विचार करें, आप भी खयाल करें, क्या विचार इतना तीव्र है? दस मिनट बैठ जाएं और जो भी विचार मन में आए उसे लिखें, ईमान से। उसमें से एक भी न छोड़ें। जो भी आए, आधा आए तो आधा लिखें, पूरा आए तो पूरा। एक दस मिनट एक कागज पर लिखें और फिर किसी को उसे दिखाएं। तो वह कहेगा, यह किस पागल ने लिखा है? किसी को भी दिखा लें फिर। वह आपसे कहेगा, यह किस पागल ने लिखा है? असल में आपको खुद ही समझ में आएगा कि यह किस पागल ने लिखा है? जो आपके भीतर चल रहा है, अगर दस मिनट उघाड़ कर देखा जा सके, तो आप खुद ही घबड़ा जाएंगे कि मैं कैसा पागल हूं! यह क्या चल रहा है? यह क्या मेरे भीतर हो रहा है?
लेकिन हम कभी रुक कर देखते नहीं कि वहां क्या भीतर हो रहा है। और हम समझते हैं कि हम बहुत विचारशील हैं। सभी पागल ऐसा समझते हैं। और इसलिए, आपको यह पता हो कि जो विचारक अति विचार में पहुंच जाते हैं, वे पागल हो जाते हैं।
अभी यूरोप में पिछले पचास सालों में जो बड़े-बड़े विचारक थे, वे करीब-करीब सभी पागल हुए। कोई साल भर पागलखाने में था, कोई दो साल पागलखाने में था। मुझे तो ऐसा लगने लगा कि अब जो और दूसरे विचारक पागल नहीं हुए, वे जरूर कुछ थोड़े कम विचारक होंगे। एक वक्त आ जाएगा कि जो विचारक पागलखाने होकर न आया हो, हम समझेंगे कि कुछ छोटी कोटि का विचारक है। ठीक भी है। विचार की अंतिम परिणति पागलपन है, विक्षिप्तता है, मैडनेस है। इसलिए महावीर को, बुद्ध को मैं विचारक नहीं कहता हूं। वे विचारक नहीं हैं। वे ज्ञानी हैं। ज्ञानी और विचारक में जमीन-आसमान का फर्क है। वे जानते हैं, वे विचार नहीं करते। और जो नहीं जानता, वही केवल विचार करता है। अभी मैं यहां बैठा हूं, सभा खत्म होगी, हम सब उठेंगे और दरवाजों से निकल जाएंगे। कोई विचार नहीं करेगा कि दरवाजा कहां है? क्योंकि दरवाजा हमें दिखाई पड़ रहा है। एक अंधा आदमी यहां बैठा हो। जैसे ही सभा खत्म होगी, वह सोचेगा, कहां से जाऊं? कहां दरवाजा है? कहां दीवाल है? वह विचार करेगा। जो देख सकता है, वह विचार नहीं करता। जो नहीं देख सकता, वह विचार करता है। विचार अज्ञान का लक्षण है, ज्ञान का लक्षण नहीं है। तो जितना ज्यादा विचार आप करते हैं, समझें कि उतना गहन अज्ञान है। ज्ञान उत्पन्न हो तो विचार क्षीण हो जाएगा, शून्य हो जाएगा।
मैंने कहा कि विचार को देखें और उसको क्षीण होने दें, शून्य होने दें। सजग होने से विचार शून्य होता है। साक्षी होने से विचार शून्य होता है। और जब विचार शून्य हो जाता है तो विवेक मुक्त होता है। फिर वह विवेक शास्त्र को नहीं, सिद्धांत को नहीं, सत्य को जानने में उसकी गति हो जाती है। स्वतंत्र विवेक छोड़ देता है किनारा और अनंत सागर में प्रवेश करता है।
एक छोटी सी कहानी और अपनी चर्चा को मैं पूरा करूंगा।
एक रात कुछ मित्र मौज में थे और उन्होंने कहीं जाकर खूब शराब पी और फिर वे सोचे कि चांद पूरा है, रात बहुत सुंदर और रम्य, हम चलें और चल कर झील में यात्रा करें। वे गए और वे एक नाव पर बैठे और यात्रा शुरू की। उन्होंने पतवारें उठाईं और पतवारें चलाईं। और वे रात के बहुत आखिरी पहर तक नाव चलाते रहे। फिर सुबह की ठंडी हवाएं आने लगीं और चांद डूबने को होने लगा। ठंडी हवाओं ने उनके नशे को उखाड़ दिया। उनमें से कुछ लोग ताजे हुए और उन्होंने कहा, हम बहुत दूर निकल आए, अब वापस लौटें, क्योंकि घर पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो जाएगी। इतने दूर निकल आए हैं किनारे से। उन्होंने सोचा कि चल कर नीचे देखें कि हम कितने दूर आ गए हैं! वे नीचे गए और वे हैरान हो गए। वे कहीं भी नहीं गए थे। नाव वहीं खड़ी थी, क्योंकि वे जंजीर खोलना भूल गए थे। वह जंजीर वहीं बंधी थी। वह नाव की जंजीर वहीं बंधी थी। उन्होंने पतवार बहुत चलाई, लेकिन वे कहीं पहुंच नहीं सके और वे बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहा, हम व्यर्थ रात भर परेशान हुए और बड़ा सोचते रहे कि बड़ी यात्रा हो रही है। हम तो वहीं के वहीं खड़े हैं।
जिसका विचार, विवेक मुक्त होना चाहता है, उसे विश्वास के किनारे से जंजीर को खोल लेना होगा। और जिसकी विश्वास से कहीं जंजीर बंधी है, वह स्मरण रखे, सत्य के जगत में उसकी कोई यात्रा नहीं हो सकती। वह कहीं नहीं पहुंचेगा। अंतिम जीवन में वह पाएगा, जहां से शुरू किया था, मां-बाप ने जो विश्वास दे दिए थे, वह वहीं खड़ा हुआ है। यात्रा व्यर्थ गई। पतवार चलाना व्यर्थ हुआ। श्रम व्यर्थ गया। मां-बाप ने जो विचार दे दिए थे और समाज ने जो विचार दे दिए थे, उन्हीं विश्वासों पर वह खड़ा है मरते वक्त। ऐसे आदमी का जीवन दुर्भाग्य है। उसकी यात्रा व्यर्थ हो गई। वह नाव की जंजीर को किनारे से खोलना भूल गया।
किनारे से खोल लें अपनी जंजीर को। समाज ने जो दिया है, किसी दूसरे ने जो दिया है, उससे अपनी जंजीर को खोल लें और विवेक को मुक्त होने दें। मुक्त विवेक ही परमात्मा तक ले जाने का पंख बनता है और बंधे हुए विचार और विश्वास परमात्मा से रोकने वाली जंजीरें हो जाते हैं। हम सब जंजीरों में बंधे हैं। यह सारी दुनिया जंजीरों में बंधी है। इन जंजीरों में बंधे होने के कारण परमात्मा का अनुभव नहीं हो पाता। साहस करें और जंजीरों को छोड़ दें और फिर देखें कि आपकी नाव कहां जाती है!
रामकृष्ण का एक अंतिम वचन कहूंगा। रामकृष्ण ने कहा है कि तू अपनी नाव तो खोल, अपनी नाव के पालों को तो उड़ा, परमात्मा की हवाएं तुझे हमेशा अनंत में ले जाने को तैयार हैं। तू अपनी नाव तो खोल, अपने पालों को तो उड़ा, और परमात्मा की हवाएं तुझे अनंत में ले जाने को हमेशा तैयार हैं।
धन्य हैं वे लोग, जो अपनी नाव खोल लेते हैं और अपने पाल खोल देते हैं। और अभागे हैं वे लोग, जो कहीं अपनी नाव को बांधे रखते हैं और श्रम करते हैं और अंत में असफल हो जाते हैं।
अंत में मैं यही प्रार्थना करूं कि प्रभु आपको भी वैसी सामर्थ्य और साहस दे कि आपकी नाव खुल सके किनारे से विश्वास के और ज्ञान के अनंत सागर में उसका प्रवेश हो सके। जो हिम्मत करते हैं, परमात्मा उनके साथ है। और जो कमजोर हैं और रुके रह जाते हैं, परमात्मा भी उनके लिए क्या कर सकता है? इतनी ही थोड़ी सी बातें कहूंगा और धन्यवाद दूंगा।

मेरी बातों को इतने प्रेम से सुना है, उसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। मेरे प्रणाम अपने भीतर परमात्मा के लिए स्वीकार करें।